माता अन्तर्यामी होती है। टीना जी झट से अपने पुत्र की इस नवीन फ़र्माइश का अर्थ जान गयीं थीं। पुरुष उसी स्त्री से वंशावृद्धि की आकांक्षा करता है जो कि मातृत्व के दायित्व को सही मायने में निभा सके, उसकी संतानों को निश्छल प्रेम व त्याग से पाल पोस कर बड़ा कर सके। जय ने अपने प्रस्ताव से अपनी माता के प्रति एक हृदय स्पर्शी विश्वास जताया था। जिस माँ ने उसे नौ महीने कोख में पाला, पीड़ा से जनम दिया, अपने स्तनों से दूध का पान करवाया, लाड़ प्यार से पोस कर बड़ा किया, उन्हीं पूज्य माता की कोख में जय अपनी संतान का बीज बोना चाहता था। पाठकों, पुत्र के माता के प्रति पवित्र प्रेम का और दूसरा क्या उदाहरण हो सकता है? टीना जी को इस अलौकिक सत्य का ज्ञान था। । रही बात जय की माता को 'कुतिया' कहकर पुकारने की, वह भी दरसल जय के निश्पाप प्रेम का एक पहलू था। कुतिया प्रजनन क्रीड़ा के समय नर- कुत्ते के लिंग की गाँठ को घंटों तक जकड़े रखती है, तकि उसके प्रजननकारी बीज को अपनी योनि में लेती रहे, एक बूंद भी बाहर नहीं टपकने देती। इसी कारणवश चार से आठ पिल्लों को जन्म देती है। जय भी अपनी माता की कामकुशलता की दाद दे रहा था, और उनसे कईं सन्तानें उत्पन्न करना चाहता था।
चलिये पाठकों, ज्ञान-विज्ञान अपनी जगह है, माता-पुत्र के पास गहन अध्ययन का समय कहाँ था। वे तो अपनी इन्द्रियों के वश में थे। जैसे ही जय के अन्तरमन में यह बोध हुआ, उसका अण्डकोष हलचल में आ गया। तुरन्त उसने अपनी नाड़ियों में उबलते वीर्य को लिंग के रास्ते ऊपर की ओर दौड़ते हुए महसूस किया। वीर्य उसके दबे हुए रोश को मुक्त करता हुआ किसी ज्वालामुखी की तरह लिंग के छिद्र से स्फोटित हुआ।
पुत्र के वीर्य-भरे अण्डकोष जब धमाके के साथ खाली होने लगे, तो टीना जी बेसुधी के मारे चीत्कार कर रही थीं। जय उनकी पूज्य योनि को अपने खौलते वीर्य की पावन धाराओं से सराबोर करने लगा।
"ले कुतिया! मेरा वीर्य मांगती थी ना मम्मी, ले भर ले अपनी कोख मेरे वीर्य से !" । टीना जी ने अपने कूल्हों को उस पर डकेला, और जय के लम्बे, दमदार ठेलों का उत्तर अपने वहशियाना ठेलों से दिया। टीना जी अपने ऑरगैस्म की तीक्ष्णता के बावजूद जय के उबलते वीर्य की हर बौछार को अपनी योनि में फुटकर लबालब भर देने का आभास कर पा रही थीं। लैन्गिक क्रिया के उपरान्त मिलते हुए विलक्षण इन्द्रीय सुख के प्रभाव से वे बेसुध होकर जानवरों सी चीत्कार कर रही थीं, और उनका पुत्र अपने अण्डकोष को उनकी कसमसाती योनि में खाली करता जा रहा था।
चलिये पाठकों, ज्ञान-विज्ञान अपनी जगह है, माता-पुत्र के पास गहन अध्ययन का समय कहाँ था। वे तो अपनी इन्द्रियों के वश में थे। जैसे ही जय के अन्तरमन में यह बोध हुआ, उसका अण्डकोष हलचल में आ गया। तुरन्त उसने अपनी नाड़ियों में उबलते वीर्य को लिंग के रास्ते ऊपर की ओर दौड़ते हुए महसूस किया। वीर्य उसके दबे हुए रोश को मुक्त करता हुआ किसी ज्वालामुखी की तरह लिंग के छिद्र से स्फोटित हुआ।
पुत्र के वीर्य-भरे अण्डकोष जब धमाके के साथ खाली होने लगे, तो टीना जी बेसुधी के मारे चीत्कार कर रही थीं। जय उनकी पूज्य योनि को अपने खौलते वीर्य की पावन धाराओं से सराबोर करने लगा।
"ले कुतिया! मेरा वीर्य मांगती थी ना मम्मी, ले भर ले अपनी कोख मेरे वीर्य से !" । टीना जी ने अपने कूल्हों को उस पर डकेला, और जय के लम्बे, दमदार ठेलों का उत्तर अपने वहशियाना ठेलों से दिया। टीना जी अपने ऑरगैस्म की तीक्ष्णता के बावजूद जय के उबलते वीर्य की हर बौछार को अपनी योनि में फुटकर लबालब भर देने का आभास कर पा रही थीं। लैन्गिक क्रिया के उपरान्त मिलते हुए विलक्षण इन्द्रीय सुख के प्रभाव से वे बेसुध होकर जानवरों सी चीत्कार कर रही थीं, और उनका पुत्र अपने अण्डकोष को उनकी कसमसाती योनि में खाली करता जा रहा था।