• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Incest मटकनी गांड का कमाल

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
(सुगंधा को आज भी वह पल बड़े अच्छे से याद था,, उस बैगन के मोटे हिस्से को देखकर उसके तो होश उड़ गए थे,,, वह समझ गई थी की उसके बुरे के छोटे से छेद में इतना मोटा बैगन वाकई में नहीं घुस सकता,,,, अपनी सहेली की बात सुनकर वह बोली)

तू सही कह रही है मुझे तो बहुत डर लग रहा है,,,।

देख कर डरेगी तो सुहागरात का मजा नहीं ले पाएगी इसलिए तुझे समझा रही हूं कि अपने साथ सरसों के तेल की शीशी रखना,,,।

सरसों के तेल की सीसी क्यों,,,?

अरे बुद्धू सरसों के तेल को तू अपने पति के लंड पर लगा लेना एकदम चिकना कर लेना और थोड़ा सा तेल अपनी बुर पर भी लगा लेना,,,

इससे क्या होगा,,,?(सुगंधा फिर से नादानीयत भरा सवाल पुछी,,,)

तू सच मेंपागल है,,, अरे सरसों का तेल तेरी बर और लंड को एकदम चिकनाहट से भर देगा और उसके बाद तेरी बुर में जाने में आराम रहेगा,,,, तब तुझे मजा भी बहुत आएगा,,,,

(अपनी सहेली की बात सुनकर थोड़ी बहुत राहत उसे महसूस हुई थी लेकिन जल्द ही शादी की रात आ गई थी सुगंधा की शादी गांव में हुई थी उसके पति गांव में ही पढ़ाने का काम करते थे,,,,,,और शादी के बाद उनकी नौकरी शहर में लग गई एक अच्छे से स्कूल में जिसमें आज खुद सुगंधा भी पढाती है,,, शादी की पहली रात को ही इतनी खूबसूरत औरत पाकर सुगंधा का पति बहुत खुश था,,,,।

सुगंधा को आज भी याद है पहली रात को ही,, सुगंधा के पति ने ज्यादा कुछ किया नहीं था बस बातचीत ही किया था और फिर बातचीत के अंत में केवल साड़ी को कमर तक उठाकर,, और सुगंधा की चड्डी उतार कर उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर सिर्फ थोड़ा सा थूक लगाकर सुगंधा के बुर में डालने की कोशिश करने लगा लेकिन सुगंधा की बुर का छेद छोटा होने की वजह से सुगंधा का पति एकदम असफल रहा और उसका वीर्यपात हो गया,,,, ।

अपने पति के असफल रहने से वह पूरी तरह से निराश हो गई थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें इस बात को किसी से का भी नहीं सकती थी ना ही अपने पति से बता सकती थी क्योंकि सुगंधा दूसरी औरतों की तरह नहीं थी उसे इस बात का डर था कि अगर वह इस बारे में अपने पति से बात करेगी तो उसका पति उसके बारे में गलत धारणा बांध लेगा उसे चरित्रहीन समझेगा इसीलिए वह इस बात को का भी नहीं सकती थी,,,, उसे अपनी सहेली की बात याद आ रही थी मोटा और लंबा लंड बुर फाड़ देगा लेकिन उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसके पति लंड कुछ ज्यादा लंबा और मोटा नहीं था बस काम भर का था,,,।

दूसरे दिन वह फिर से अपने पति का इंतजार कर रही थी उसे बहुत डर लग रहा था,,,, क्योंकि जिस तरह का उसने अपने मन में सुहागरात को लेकर सपना संजोए थी वह पूरी तरह से चकनाचूर हो गया था,,, सब कुछ बिखरा हुआ सबसे नजर आ रहा था उसका इंतजार की घड़ी खत्म हुई और कमरे का दरवाजा खुला अपने पति को देखकर वह घबराने लगी थी,,, सुगंधा के चेहरे को देखकर उसके पति ने समझ लिया था कि सुगंधा क्या सोच रही है और वह उसके दर को दूर करके हुए बोला,,,।

मैं जानता हूं सुगंधा कल की मेरी हरकत की वजह से तुम डरी हुई हो,,, मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था,,,(ईतना सुनकर सुगंधा आश्चर्य से अपने पति की तरफ देखने लगी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि उसका पति क्या बोल रहा है वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,) कल मैं जानबूझकर तुमसे प्यार किए बिना तुम्हारे साथ शारीरिक संबंध बनाया था और असफल होने का नाटक किया था क्योंकि मैं देखना चाहता था कि अगर तुम दूसरी लड़कियों की तरह होगी तो इस बारे में जरूर मुझे शिकायत करो कि लेकिन तुमने मुझे एक शब्द भी नहीं कहा नहीं घर वालों को कुछ बताया और मैं समझ गया कि तुम बहुत ही सीधी शादी हो चरित्रवान हो ,,, तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो तुम्हें संतुष्ट करने की ताकत मुझ में है,,,,।

(अपने पति की बातें सुनकर सुगंधा पूरी तरह से भाव भीबोर हो गई थी कल रात को जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर वह सोच रही थी कि उसका जीवन पुरा तहस-नहस हो गया है इस तरह का पति पाकर,,, लेकिन उसके पति ने सब कुछ साफ कर दिया था और उसके बाद रात भर जमकर सुगंधा की चुदाई किया था और पूरी तरह से संतुष्ट किया था लेकिन एक बात का हिसाब सुगंध का हो रहा था कि उसके पति का लंड उसकी सहेली ने जिस तरह से बताया था मोटा और लंबा उसे तरह का बिल्कुल भी नहीं था लेकिन फिर भी वह अपने पति के लंड से पूरी तरह से संतुष्ट थी,,,,,।

अपने बिस्तर पर बैठी हुई सुगंध अपनी सुहागरात की रात के बारे में सोच ही रही थी कि तभी उसके कानों में उसके बेटे की आवाज सुनाई दी,,,।

क्या हुआ मम्मी नहाना नहीं है क्या तुम्हारे लिए बाथरुम में हल्का कुनकुना पानी रख दिया हूं क्योंकि अभी ठंडा पानी से नहाओगी तो तबीयत और खराब हो जाएगी ,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर वह एकदम से सपनों की दुनिया से वापस आ गई और अपने बेटे की तरफ देखने लगी,,,, गहरी सांस लेते हुए बोली,,,)

ठीक है तु चल मैं आती हूं,,,,।

(ईतना सुनते ही अंकित वहां से दूसरा काम करने के लिए चला गया था लेकिन उसकी जाते-जाते उसके पेट के आगे वाले भाग पर सुगंधा की नजर फिर से चली गई थी जिसमें अभी भी अच्छा खासा तंबू बना हुआ था उसे देखकर सुगंधा की बुर में हलचल होने लगी वह समझ गई थी कि उसका बेटा कितना ज्यादा उत्तेजित है,,,, थोड़ी देर बाद वह बिस्तर पर से उठी और बाथरूम की तरफ जाने लगी,,,,,,, और बाथरूम से पहले चलते समय उसके कदम थोड़े से डगमगा गए,,, अंकित बाथरूम में साबुन रख रहा था उसकी नजर अपनी मां पर पड़ी तो वह एकदम से उसे संभालने के लिए उठकर खड़ा हो गया लेकिन तब तक सुगंधा दीवाल पर हाथ लगाकर संभल चुकी थी,,,)

संभाल कर मम्मी लगता है अभी भी तुम्हें चक्कर आ रहा है,,,,,।

(चक्कर की बात सुनते हैं सुगंधा के तन-बाद में अजीब सी हलचल होने लगी और वह जानबूझकर बोली,,,)

मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,,,,।

तब रहने दो मम्मी मत नहाओ,,,,

नहीं नहीं नहाना पड़ेगा मुझे अच्छा नहीं लग रहा है,,,,।

ठीक है लेकिन बाथरूम का दरवाजा खुला रखना ताकि कोई गड़बड़ हो तो मैं देख सकूं,,,,।

(अंकित के मन में दोहरे विचार चल रहे थे एक तरफ से वह अपनी मां की चिंता भी कर रहा था और दूसरी तरफ वह बाथरूम का दरवाजा खुला रखने पर अपनी आंखों को सेंक भी सकता था,,,, अपने बेटे की बात पर सुगंधा को कोई एतराज नहीं था,,, क्योंकि उसके मन में भी बहुत कुछ चल रहा था वह अपने बेटे से खुलना चाहती थी,,,। इसलिए वह दीवार का सहारा लेकर बाथरूम के दरवाजे तक पहुंच कर बोली,, )

ठीक है,,,,(बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ था और वह धीरे से बाथरूम के अंदर प्रवेश कर गई,,, अंकित इतने में जल्दी से एक कुर्सी लेकर आ गया और ठीक बाथरूम के सामने किताब लेकर बैठ जा वह ऐसा जताना चाहता था कि वह पढ़ रहा है लेकिन वह अपनी मां पर ही नजर रखना चाहता था उसे देखना चाहता था नहाते हुए उसके खूबसूरत भजन को देखना चाहता था और इस बात का एहसास सुगंधा को भी था इसलिए उसके बदन में भी हलचल मची हुई थी,,,,।

कुछ देर तक सुगंधा बाथरूम में उसी तरह से खड़ी रही,,, जहां एक तरफ अपने बेटे की आंखों के सामने वह नहाने के लिए उत्सुक थी,,, वहीं दूसरी तरफ ना जाने क्यों उसे अपने बेटे की आंखों के सामने अपने कपड़े उतारने में शर्म महसूस हो रही थी जबकि उसके बेहोशी की हालत में उसके बेटे ने क्लीनिक के बाथरूम में उसकी चड्डी तक अपने हाथों से उतारा था ,,,,, फिर अपने मन में यह सोचकर की यही तो वह चाहती थी फिर अब क्यों शर्मा रही है अगर शर्माएगी तो जिंदगी का सुख नहीं ले पाएगी,,, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है और यही सही मौका भी है,,,, मर्दों का दिमाग औरत की खूबसूरत बदन को देख कर ही खराब होता है फिर वह भले ही चाहे उसका भाई हो बेटा हो या चाहे जो भी हो उसे सिर्फ औरतों में सिर्फ औरत ही नजर आती है ना ही कोई रिश्ता नजर आता है,,,।

सुगंधा ऐसा अपने मन में सोच कर धीरे से अपनी साड़ी का पल्लू अपने कंधे पर से नीचे गिरा दी,,, और उसके ऐसा करने से उसकी भारी भरकम छाती एकदम से उजागर हो गई,,,,,,, वह अंकित तरफ मुंह करके खड़ी थी,,,, अंकित उसे तिरछी नजर से देख रहा था अपनी मां को इस तरह से अपनी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरा था वह देखकर उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी थी,,, अंकित किताब का पन्ना खोलकर भले ही किताब पढ़ने का नाटक कर रहा था जबकि हकीकत यात्रा की वह अपनी मां की खूबसूरत बदन के पन्ने को खुलता हुआ देखना चाहता था,,,, जिसकी शुरुआत उसकी मम्मी अपनी साड़ी का पल्लू नीचे गिरा कर कर चुकी थी,,,।

अंकित बहुत उत्साहित और उत्तेजित था,,,, बाथरूम के दरवाजे में बने छोटे से छेद से वह अपनी मां को पूरी तरह से नग्न अवस्था में नहाते हुए देख चुका था लेकिन फिर भी उसके बदन की प्यास अपनी मां को नंगी देखने की चाहत कम नहीं हुई थी यहां तक कि वह खुद अपनी मां की अंतर्वस्त्र को अपने हाथों से उतारा था लेकिन फिर भी उसके मन की ललक कम नहीं हुई थी,,,,।

बाथरूम के अंदर का माहौल धीरे-धीरे कम हो रहा था एक मां अपने बेटे के सामने अपने कपड़े उतार रही थी नहाने के लिए,,,सुगंधा ऐसा बिल्कुल भी ना करती है अगर उसके अंदर की एक औरत न जागी होती,,, क्योंकि उसके मन के चरित्र पर औरत का चरित्र को ज्यादा ही हावी होता जा रहा था जिसके चलते वह अपने बेटे के सामने कपड़े उतारने के लिए अपने आप को तैयार कर चुकी थी धीरे-धीरे वह अपने कमर पर भरी हुई साड़ी को खोलने लगी थी वह अपने दोनों हाथों से अपनी साड़ी को खोल रही थी और अंकित को ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे उसकी मां उसके लिए अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी होने जा रही है,,,। दोनों के बीच पूरी तरह से खामोशी छाई हुई थी आंखों ही आंखों में बहुत सी बातें हो रही थी अंकित बार-बार किताबों के पन्नों में अपनी आंखों को भरमाने की कोशिश करता था लेकिन उसका चित उसकी मां पर टिका हुआ था,,,, अपनी साड़ी को खोलकर सुगंधा अपनी साड़ी को बाथरूम में कोने में रख दी थी और वह बाथरूम में केवल ब्लाउज और पेटीकोट में थी ब्लाउज और पेटीकोट में उसका गदराया बदन और भी ज्यादा मादक लग रहा था,,,, जिसे देख कर अंकित का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आ गया था,,,।

...............................
 
सुगंधा बाथरूम के अंदर धीरे-धीरे करके अपनी साड़ी अपनी खूबसूरत वतन से अलग करके बाथरूम के कोने में रख दी थी,,,, और अंकित उसकी मां को बिल्कुल भी तकलीफ ना हो इसलिए उसकी देखरेख के लिए बाथरूम के सामने ही कुर्सी रखकर बैठकर किताब पढ़ रहा था किताब क्या पढ़ रहा था किताब पढ़ने का वह बहाना बता रहा था उसकी नजर तो अपनी मां की खूबसूरत बदन पर ही थी तिरछी नजर से वह अपनी मां की एक-एक क्रियाकलाप को देख रहा था,,,,, सुगंधा भी कुछ कम नहीं थी,,,,,, अपने बेटे से वह जो चाहती थी धीरे-धीरे उसकी ख्वाहिश पूरी होती जा रही थी उसके बेटे में आए इस बड़े बदलाव से वह अंदर-अंदर बहुत खुशी और इसीलिए वह अपनी बीमारी का बहाना बनाकर एक बहाने से अपनी खूबसूरत बदन की नुमाइश करना चाहती थी अपने बेटे के सामने,,,।

सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि उसकी जवानी अभी भी बरकरार है,,, उसके बदन से अभी भी जवानी का रस टपकता है,,,, इस बात को भी अच्छी तरह से जानती थी कि मर्दों की सबसे बड़ी कमजोरी होती है औरत का नंगा जिस्म एक नंगी औरत जिसे देखकर मर्द पूरी तरह से अपने होशो आवाज होकर औरत का गुलाम बन जाता है इसीलिए सुगंधा अपने आप से अपने बेटे को अपना नंगा बदन दिखाना चाहती थी ताकि उसका बेटा पूरी तरह से उसके जवानी के आगे घुटने टेक दे,,,,,, जबकि वह ऐसा पहले भी अपने बेटे के सामने कर चुकी थी,,, लेकिन यह क्रियाकलात ऐसी होती है कि जितनी बार करो उतनी बार काम ही लगती है और हर एक बार एक नया उमंग और जोश से भर देती है इसीलिए सुगंध बेकरार थी अपने बेटे को अपना नंगा बदन दिखाने के लिए,,,।

वैसे तो दुनिया का हर एक मर्द जानता है कि औरत के बदन में उसके कौन-कौन से अंग होते हैं जिन्हें वह न जाने कितनी बार देखा है लेकिन हर बार उसे औरत का अंग देखने का मन करता है और हर बार देखकर मस्त हो जाता है,,, सुगंधा यह भी जानती थी कि उसका बेटा भले ही देखभाल के बहाने बाथरूम के बाहरी कुर्सी डालकर बैठा है लेकिन उसका असली मकसद तो दूसरे मर्दों की तरह ही है एक खूबसूरत औरत के खूबसूरत नंगे जिस्म को निहारना,,,,।

कार्यक्रम की शुरुआत हो चुकी थी बाथरूम के अंदर सुगंध अपनी साड़ी उतार कर बाथरूम के कोने में रखती थी और इस समय बाथरूम के अंदर वह केवल ब्लाउज और पेटीकोट में ही थी ब्लाउज और पेटीकोट में औरत का जिस्म पूरी तरह से मादकता से भर जाता है,,,, और इस समय सुगंधा भी स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा की तरह दिखाई दे रही थी,,,। कुछ देर तक सुगंधा इसी अवस्था में खड़ी रही,,, क्योंकि वह अपने मन में सोच रही थी कि अब क्या करें,,, और अंकित अपनी मां को इस तरह से बाथरूम में खड़ी देखकर कुछ बोलने वाला था कि उसकी मां तुरंत अपने दोनों हाथों को हरकत देते हुए अपने ब्लाउज के बटन पर अपनी उंगलियां रख दी,,,,, अपनी मां की हरकत को देखकर अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा क्योंकि वह समझ गया था कि उसकी मां उसके ब्लाउस को खोलने जा रही है,,, कुछ ही देर में ब्लाउज के अंदर छुपा उसकी मां का पका हुआ दशहरी आम देखने को मिलेगा लेकिन उसे भी देखने के लिए उसके ऊपर का छिलका मतलब की ब्रा उतारना पड़ेगा,,, और अंकित इस बात से दुविधा में था कि उसके सामने उसकी मां अपनी ब्रा उतरेगी कि नहीं उतारेगी,,,,।

लेकिन इसी बीच उसकी मां अपने ब्लाउज का बटन खोलना शुरू कर दी,,, सुगंधा का मुंह अंकित की तरफ था,,, सुगंधा जानबूझकर अपने बेटे की तरफ मुंह करके खड़ी थी ताकि उसका बेटा अपनी आंखों से सब कुछ देख सके,,,, वैसे भी बाथरुम का दरवाजा खुला छोड़कर वह अपने बेटे को एक तरह से इशारा दे दी थी कि जो कुछ भी होगा उसकी आंखों के सामने ही होगा,,,, सुगंधा धीरे-धीरे अपने ब्लाउज का एक-एक करके बटन खोलती चली जा रही थी और अंकित के दिल पर बिजलियां गिरा रही थी,,,, अपनी मां की हरकत पर अंकित का लंड पूरी तरह से फटने की स्थिति में आ गया था,,, औरत को और वह भी खूबसूरत औरत को कपड़े उतारते हुए देखना भी बहुत बड़ी किस्मत की बात है ऐसा मौका तो बहुत से लोगों के पास आता ही है लेकिन ऐसा मौका कम ही आता है जब एक मां अपने बेटे की आंखों के सामने ही अपने कपड़े उतार कर निर्वस्त्र होती हो और इसलिए अंकित इस समय बेहद खुश नसीब था,,,, एक तो उसकी मां बला की खूबसूरत थी,,, और ऐसे में खूबसूरत औरत के नंगे जिस्म को अपनी आंखों से देखना वाकई में किस्मत की बात थी इसलिए अंकित अपने आप को खुशकिस्मत समझ रहा था,,,।

देखते ही देखते सुगंध अपने ब्लाउज के सारे बटन को खोल देती और अपने ब्लाउज के दोनों पट को बंद कमरे के दरवाजे की तरह धीरे से खोलकर दोनों पट को अलग कर दी,,,, और जैसे दरवाजा के खुलते ही कमरे के अंदर का सब कुछ एकदम साफ नजर आने लगता है वैसे ही सुगंधा के ब्लाउज के दोनों पट खुलते ही उसके लाल रंग की ब्रा एकदम से साफ नजर आने लगी थी ब्रा में कसा हुआ उसका दशहरी आम बेहद आकर्षक लग रहा था,,,,,,, तिरछी नजर से अंकित सब कुछ देख रहा था उसे इस बात का एहसास भी हो रहा था कि उसकी मां अपनी चूचियों के साईज से कम नाप की ब्रा पहनी हुई थी जिसकी वजह से उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां उसके छोटे से ब्रा में किस तरह से समा नहीं पा रहे थे लेकिन एक नया समा बांध दे रहे थे जिसे देख पाना आंखों को गर्माहट प्रदान कर रहा था,,,, धीरे से सुगंधा अपनी बाहों में से अपने ब्लाउज को धीरे-धीरे उतारकर उसे भी साड़ी के ऊपर फेक दी,,,,।

अंकित का दिल जोरो से धड़क रहा था उसका पूरा ध्यान अपनी मां के ऊपर ही था भले ही वह किताबों के पन्ने पलट कर अपनी नजर को किताबों में उलझाया हुआ था लेकिन उसका पूरा ध्यान अपनी मां के ऊपर ही था और इस बात को सुगंधा भी अच्छी तरह से जानती थी,,,, अंकित के साथ-साथ सुगंधा भी अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,,, कुछ देर पहले उसके बदन में दर्द था ज्वर से उसका बदन तप रहा था लेकिन अब बदन का वातावरण पूरी तरह से बदल चुका था हालांकि उसका बदन अभी भी तप रहा था लेकिन ज्वर से नहीं उत्तेजना से,,, सुगंधा को अपनी बुर गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, वह मदहोश हो रही थी मस्त हो रही थी,,, और इस समय इस बात के लिए मन ही मन तृप्ति को धन्यवाद दे रही थी कि अच्छा हुआ कि वह उसकी देखभाल के लिए अंकित को छोड़कर गई अगर ऐसा ना होता तो शायद इस तरह का दृश्य बिल्कुल भी भजा नहीं जा सकता था,,,।

ब्लाउज को उतार देने के बाद सुगंधा अपने दोनों हाथ को पीछे की तरफ ले गई और अपने ब्रा का हुक खोलने की कोशिश करने लगी वैसे तो वह अपने ब्रा का हक बड़े आराम से खोल देती थी लेकिन इस समय केवल वह नाटक कर रही थी वह जानबूझकर अपने हाथ को अपने ब्रा के हक तक नहीं ले जा पा रही थी,,,,, और ऐसा करते हुए अंकित उसे देख रहा था और मन ही मन प्रसन्नता के साथ-साथ उत्तेजित हो जा रहा था कि कुछ ही देर में उसकी मां के दशहरी आम उसे देखने को मिल जाएंगे,,, और इस बात से तो और भी ज्यादा उत्साहित था कि उसकी मां बिना शर्माए बही जब उसके सामने अपने कपड़े उतारने के लिए तैयार हो चुकी थी और उतार भी रही थी बस इस बात की उत्सुकता उसके मन में अत्यधिक की उसकी मां नहाने से पहले अपने बदन से क्या-क्या उतारती है,,, और इसलिए अंकित अपने मन में प्रार्थना कर रहा था कि,,, कल की तरह उसकी मां के दिलों दिमाग पर बदहवासी छा जाए और उसे बिल्कुल भी होश ना हो और बेहोशी की हालत में वह खुद अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी हो जाए,,, ऐसा सोच कर वह अपनी मां से नजर बचाते हुए पेट के ऊपर से ही अपने लंड को जोर से मसल दिया,,,,,।

बार-बार सुगंधा ब्रा का हुक खोलने की कोशिश कर रही थी लेकिन जानबूझकर खोल नहीं रही थी,,, और दोनों हाथों को पीठ की तरफ ले जाने की वजह से उसके आगे की छाती पूरी तरह से निकाल कर बाहर की तरफ आ गई थी जिसे उसके दोनों खरबूजे ऐसा लग रहा था कि ब्रा फाड़ कर बाहर आ जाएंगे,,,, अंकित का मन तो कर रहा था कि,,, आगे बढ़कर बाथरूम में कोई चाय और अपनी मां के दोनों खरबूजा को अपने हाथ में लेकर दबा दबा कर उनका रस पी जाए,,, लेकिन ऐसा करने की हिम्मत उसमें अभी नहीं थी,,,,, क्योंकि भले ही वह अपनी बातचीत के जरिए अपनी मां से थोड़ा बहुत खुल चुका था लेकिन इतना नहीं खुला था कि वह अपनी मां की खूबसूरत बदन से खेलना शुरू कर दे या अपनी मां से गंदी हरकत करना शुरू कर दे क्योंकि वह जानता था कि इस तरह की हरकत से उसकी मां के बारे में क्या सोचेगी क्या बर्ताव करेगी यह अभी उसे नहीं मालूम था लेकिन जरा भी उसे इस बात का भनक लग जाए कि उसकी मां की उसके साथ एक जाकर होना चाहती है तो इसी समय अंकित बाथरूम में घुसकर अपनी मां की जवानी पर पूरी तरह से काबू पा ले,,,,, लेकिन अंकित नहीं जानता था कि उसकी मां क्या चाहती है इतना तो उसे एहसास हो गया था कि उसकी मां भी जिस अवस्था से गुजर रही है प्यार की भूखी है लेकिन यह जानकर भी अंकित ऐसा कुछ नहीं करना चाहता था जिससे आगे चलकर उसे ही तकलीफ हो वह इस खेल में धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहता था और इतना तो वह कामयाब हो ही गया था कि अपनी आंखों के सामने अपनी मां को वस्त्र उतारने के लिए मना लिया था,,,,।

कुछ देर और कोशिश करने के बाद उसे कुछ याद आया हो इस तरह से वह तुरंत बाथरूम के दीवार की तरफ मुंह करके खड़ी हो गई और पीठ को अंकित की तरफ कर ली और ऐसे में वह अपनी उंगलियों को अपनी तरह के होकर तक पहुंचाने की कोशिश करने लगी,,, वह अच्छी तरह से जानती थी कि अंकित तो सही देख रहा होगा और उसकी नाकाम हो रही कोशिश को देखकर जरूर कुछ करने की सोचेगा और कुछ देर तक यह दृश्य इसी तरह से चलता रहा,,, अंकित देख रहा था कि उसकी मां ब्रा कहो खोलना चाह रही थी लेकिन उसका हाथ उसकी उंगली ब्रा के हक तक पहुंच नहीं रही थी और अंकित अपने मन में सोच रहा था कि पहले भी तो उसकी मां इस तरह से अपना ब्रा उतरती होगी लेकिन तब तो किसी प्रकार की तकलीफ नहीं आती है लेकिन आज ऐसा क्यों हो रहा है,,,, अंकित के मन में यही सब चल रहा था वह अपने मन में सोच रहा था कि कहीं उसकी मां जानबूझकर तो यह नाटक नहीं कर रही है लेकिन तभी वह सोचा कि शायद बीमारी की वजह से वह अपने हाथ को ज्यादा पीछे की तरफ नहीं उठा पा रही है इसलिए अपनी मां को कोशिश करता हुआ देखकर वह खुद कुर्सी पर बैठा बैठा बोला,,,,।

क्या हुआ मम्मी,,,,?

अरे देखना,,,,(नजर घुमा कर अपने बेटे की तरफ देखते हुए) मेरा हाथ ब्रा की हुक तक नहीं पहुंच रहा है,,,,।

मैं मदद कर दूं क्या मम्मी,,,,।

हा रे अब तो तुझे ही मदद करनी होगी,,, बुखार की वजह से हाथ में दर्द हो रहा है और ऊपर की तरफ नहीं जा रहा है,,,,

(अपनी मां की बात सुनकर कुर्सी पर बैठे हुए ही अंकित तपाक से बोला)

तब तो अच्छा ही हुआ मम्मी की डॉक्टर ने तुम्हारे पिछवाड़े पर सुई लगाया अगर हाथ में लगाया होता तो शायद हिलाना भी मुश्किल हो जाता ,,,(अंकित अपनी मां की गांड के बारे में बात करने लगा था हालांकि गांड को बोलने का तरीका कुछ और था लेकिन इसका मतलब भी वही होता है,,, इसलिए तो अपने बेटे के मुंह से यह शब्द सुनकर सुगंधा के तन बदन में हलचल होने लगी और अपने आप ही उसकी नजर एकदम से झुक गई वह शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी,,, क्योंकि वह देख रही थी कि उसका बेटा अब उसके सामने बिल्कुल भी शर्म नहीं कर रहा था,,, फिर भी अपने बेटे की बात सुनकर गहरी सांस लेते हुए वह बोली,,,।)

तू सही कह रहा है अंकित अगर हाथ में लगा देता तो शायद मेरा उठना बैठना भी मुश्किल हो जाता जब बीना सुई लगाए इतना दर्द कर रहा है तो सुई लगाने के बाद कितना दर्द करता ,,,,,, अब जरा मेरी ब्रा का हुक तो खोल दे,,,।

ठीक है मम्मी अभी खोल देता हूं,,,,,(अंकित के बदन में उत्साह के साथ-साथ उन्माद भी फैलने लगा इन शब्दों में कितना रस घुला हुआ था इस बात को केवल अंकित ही समझ सकता था एक औरत के द्वारा एक जवान लड़के को आजा देना कि जाकर उसके वस्त्र उतार दे भला एक मर्द के लिए दुनिया में इससे बड़ा तोहफा और क्या हो सकता है और वह भी एक खूबसूरत औरत के वस्त्र उतारने की बात हो तो बात ही कुछ और हो जाती है,,,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि वक्त और हालत कितनी जल्दी बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता,,, पहले मम्मी अपने इस अंतर्वस्त्र को हमेशा नजरों से छुपा कर रखती थी छत पर कपड़े सुखाने के लिए भी डालती थी तो उसे साड़ी के अंदर डालती थी ताकि उस पर मेरी नजर ना पड़ जाए,,,,,, भूल से भी अपने बदन का ऐसा हिस्सा कभी भी उजागर नहीं होने देना चाहती थी जिसे देखकर मन पर बुरा असर पड़े,,, लेकिन आज देखो हालात और वक्त कितना बदल चुका है कि आज वह खुद अपने ही बेटे को अपने कपड़े उतारने के लिए बोल रही थी,,,।

यह बदलाव शायद एक मां के अंदर औरतों के जागरूक होने पर आया था वरना जब तक मां का अस्तित्व था तब तक उसके अंदर की औरत कभी बाहर नहीं आई थी बरसों से एक तरह से एकाकी जीवन की रही थी लेकिन फिर भी अपने बदन की प्यास को वह अपने सीने में दफन कर चुकी थी लेकिन वह प्यास उबाल करने लगी थी एक मां के अंदर एक औरत का अस्तित्व छुपा हुआ था जो बाहर आने लगा था और जब एक औरत एक मां के अंदर से बाहर आती है तो फिर वह अच्छे बुरे का ख्याल अपने मन से निकाल देती है इसलिए तो वह अपने बेटे में भी एक मर्द को खोजने लगती है,,,, पर मर्दों का तो हमेशा सही रहा है खूबसूरत बदन पर आकर्षित हो जाना भले ही वह रिश्ते से कितनी करीबी क्यों ना हो उसे हर एक रिश्ते में केवल एक खूबसूरत औरत ही नजर आती है जैसा की अंकित की नजरे देख रही थी बाथरूम के अंदर उसकी मां थी लेकिन वह अपनी मां को नहीं बल्कि यह खूबसूरत औरत को देख रहा था,,,,।

अपनी मां की बात सुनकर अपनी मां की तरफ से आज्ञा पाकर ज्यादा देर तक अंकित अपनी जगह पर बैठा नहीं रह सकता था क्योंकि वह भी उतावला हो रहा था अपनी मां की ब्रा को अपने हाथों से चुने के लिए उसका हक खोलकर उसके जोड़ों को अलग करने के लिए ताकि उसकी मां अपने हाथों से अपनी ब्रा उतार कर अपने दोनों दशहरी आम को उजागर कर दे अपनी चूची को नग्न कर दे,,,, इसलिए जल्दी से अंकित कुर्सी पर से उठा और कदम आगे बढ़ते हुए बाथरूम के दरवाजे पर पहुंच गया उसकी मां दीवाल की तरफ मुंह करके खड़ी थी और शर्म के मारे वह अपनी नजरों को दीवार की तरफ फेर ली थी क्योंकि एक औरत के उजागर हो जाने के बावजूद भी अभी भी उसके अंदर मां का अस्तित्व बाकी था अभी भी उसमें शर्म और हया बाकी थी भले ही अपने बेटे को पूरी तरह से छूट दे रही थी लेकिन शर्म का घूंघट अभी भी उसके बदन पर बना हुआ था,,,,।
 
अंकित धीरे से अपना दोनों हाथ आगे बढ़ाया और जैसे ही उसकी उंगलियां उसकी मां की नंगी चिकनी पीठ पर इस पर से हुई एकदम से सुगंधा के बदन में मदहोशी छा गई और हल्का सा उसका बदन उचक गया मानव की जैसे उसके बदन में उन मादकता की लहर उठी हो,,, और यही हाल अंकित का भी हो रहा था अपनी मां की नंगी चिकनी पीठ का स्पर्श बातें ही उसकी दोनों टांगों के बीच की स्थिति बदलने लगी हालांकि उसका लंड पूरी तरह से टनटनाया हुआ था,,, लेकिन पीठ का स्पर्श बातें ही उसके अंदर इतनी अत्यधिक उत्तेजना का संचार होने लगा कि उसे अपने लंड में दर्द महसूस होने लगा था वह पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था उसे ऐसा लग रहा था कि उसके लंड में अद्भुत शक्ति का संचार हो रहा है और उसे इतना अत्यधिक विश्वास हो गया था कि अगर मौका मिले तो वह इसी समय अपनी मां की चुदाई कर दे,,,,, लेकिन फिर भी बड़ी मुश्किल से वह अपनी बेकाबू मां को काबू में रखे हुए था,,,,,।

दोनों पट्टीयों को एक दूसरे के सामने खींचना आराम से खुल जाएगी,,,,।

ठीक है मम्मी,,,,(अपनी मम्मी का दिशा निर्देश पाकर वह अपनी मां की ब्रा का हुक को खोलने की कोशिश करने लगा,,, लेकिन ऐसा करने में उसके पसीने छूट जा रहे थे ऐसा नहीं था कि वह अपनी मां के ब्रा का हुक खोल नहीं पा रहा था,,,, वह चाहता तो वह अपने हाथों की ताकत दिखाते हुए अपनी मां की ब्रा को खोले बिना उसे फाड़ कर उसके बदन से अलग कर सकता था,,,, लेकिन एक अद्भुत एहसास उसके तन बदन में नई उत्तेजना का संचार कर रहा था एक औरत का ब्रा खोलने में शुरू-शुरू में एक मर्द को कितनी मस्सकत करनी पड़ती है ,,, वही हाल इस समय अंकित का हो रहा था भले ही वह एक बार क्लीनिक में क्लीनिक के बाथरूम में अपनी मां की चड्डी अपने हाथों से उतर चुका था लेकिन इस समय वह पूरी तरह से उत्तेजित अवस्था में थोड़ा बहुत घबरा रहा था उसके हाथों में कंपन हो रहा था,,,, क्योंकि क्लीनिक के बाथरूम में तो उसकी मां बुखार की वजह से बेहोशी की हालत में थी लेकिन इस समय बाथरूम के अंदर वह पूरी तरह से होशो हवास में थी पूरी तरह से जगाती हुई और ऐसे में अंकित को उसकी ब्रा कहो खोलने में थोड़ी घबराहट हो रही थी जबकि वह अपनी मां से पूरी तरह से आज्ञा पा चुका था,,,।

कुछ देर तक अंकित को इधर-उधर करता देखकर सुगंधा बोली,,,।

क्या कर रहा है अंकित तुझसे ब्रा का हक नहीं खुल रहा है पता नहीं तुझे क्या होगा,,,?(सुगंधा एक तरह से यह बात कह कर अपने बेटे पर व्यंगय कस रही थी एक तरह से वह अपने बेटे की मर्दानगी को ललकार रही थी अंकित भी अपनी मां के कहने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था,,,, और वह अपने मन में बोला मम्मी,,, यह तो मैं बेटे की हैसियत से ब्रा की हुक खोलने की कोशिश कर रहा हूं,,, अगर पूरी तरह से मर्दानगी पर उतर गया तो ब्रा को खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी फाड़ के अलग कर दूंगा,,,। फिर भी वह धीरे से बोला,,)

खोलने की कोशिश तो कर रहा हूं मम्मी लेकिन ब्रा की पट्टी एकदम कसी हुई है ऐसा लग रहा है कि तुम अपनी साइज से कम नाप की ब्रा पहनी हो,,, ।

अरे वह बेटा तेरी नजर तो बहुत तेज है,,,,(अपने बेटे की बात सुनकर खुश होते हुए सुगंधा बोली,,,, और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) लेकिन तुझे कैसे मालूम पड़ा की साइज से कम नाप की में ब्रा पहनी हूं,,,,।

क्योंकि पट्टी एकदम कसी हुई है अगर ना आपकी पहनती तो मेरी उंगली ब्रा की पट्टी में आराम से चली जाती और मैं आराम से खोल पाता,,,(ब्रा की पट्टीयों में अपनी उंगली को उलझाए हुए वह बोला,,,)

कोई बात नहीं बेटा अभी भी खुल जाएगी ,,रोज तो मै खोलते ही हूं आज मेरा हाथ ऊपर की तरफ नहीं पहुंच रहा है इसलिए दिक्कत आ रही है,,,।

ठीक है मम्मी थोड़ा रुक जाओ,,,(और इतना कहने के साथ ही वह थोड़ा सा दम दिखाया और पट्टी को एक दूसरे के सामने खींचा और हुक एकदम से खुल गया,,,)

.//////////////////////

काफी मशक्कत करने के बाद आखिर कर अंकित ने अपनी मां की ब्रा का हुक खोल ही दिया ,,,,, अंकित को इतने सही समझ में आ गया था कि औरत को नंगी होते हुए देखना और खुद अपने हाथों से उसके कपड़े उतार कर नंगी करने में कितना फर्क है,,,। अंकित को इसमें थोड़ी बहुत शर्मिंदगी का एहसास हुआ था,,, जब उसकी मां ने यह कहा था कि क्या कर रहा है तुझसे हुक नहीं खुल रहा,,, अपनी मां के मुंह से यह सुनकर उसे अपनी मर्दानगी पर थोड़ा गुस्सा आने लगा था पर वह अपने मन में यही सोचता था कि जब वह खूबसूरत औरत का ब्रा नहीं खोल सकता तो उसके साथ संभोग कैसे करेगा,,, लेकिन अंकित अपनी मरदान की साबित करते हुए अपनी मां का ब्रा का हुक खोल दिया था अभी भी उसके हाथों में ब्रा का हुक था,,,,।

बाथरूम के अंदर बेहद अद्भुत दृश्य की रचना हो रही थी और रचनाकार थी सुगंध जो अपनी जवानी के जंगलों में अपने बेटे को पूरी तरह से फांस रही थी,,, और अंकित अपनी मां की जवानी के चलते उसकी मदहोशी भारी जाल में फसता चला जा रहा था,,, औरजब सुगंधा जैसी जवानी से लदी हुई जाल साज हो तो दुनिया का कौन सा मर्द होगा जो ऐसे जाल में फंसना नहीं चाहेगा,,, इसलिए तो उनमें से अंकित भी बाकात नहीं था,,,वह भी अपनी मां की जवानी के रस में डूबने के लिए तैयार था,,,।

बाथरूम में सुगंधा सामने की दीवार की तरफ मुंह करके खड़ी थी उसकी पीठ अंकित की तरफ थी और उसकी ब्रा खुली हुई थी उसे खोलने वाला था खुद अंकित जिसके हाथों में अभी भी उसके ब्रा की पट्टी थी,,,, अंकित का दिल बड़ी जोरों से धड़क रहा था,,, क्योंकि वह जानता था कि हुक खुल जाने की वजह से उसकी मां की चुचियों का कैसा हुआ ब्रा का कप एकदम से ढीला हो गया होगा उसकी मां की चूची आजाद हो गई होगी लेकिन वह देख नहीं पा रहा था,,,, उसका मन मचल रहा था अपनी मां की नंगी चूचियों को देखने के लिए पागल हुआ जा रहा था लेकिन आगे चलकर वह खुद से तो अपनी मां की चूची देख नहीं सकता था क्योंकि ऐसा करना उसे इस समय थोड़ा बहुत गलत लग रहा था,,,, क्योंकि इस समय उसकी मां बीमार थी भले ही उसे थोड़ा आराम होने लगा था बुखार उतर चुका था लेकिन फिर भी वह बीमारी ही थी और ऐसे हालात में फायदा उठाना अंकित को अच्छा नहीं लगना था,,,।

अगर बीमारी की हालत में वह अपनी मां का फायदा उठाना चाहता तो दवा खाने के क्लीनिक में ही उसके अंगों को दबा देता मसल देता अपनी मां की बुर पर हथेली रख देता या उसमें उंगली डाल देता कुछ भी कर सकने की स्थिति में वह था क्योंकि उसकी मां को बिल्कुल भी होश नहीं था,,, यहां तक कि जब दवा लेकर घर पर आया तब भी दवा खाने के बाद उसकी मां एकदम बेहोशी की हालत में सो रही थी उसे समय भी वह चाहता तो कुछ भी कर सकता था यहां तक की अपने जीवन की पहली चुदाई का सुख भोग सकता था और वह भी अपनी मां की खूबसूरत बदन के साथ लेकिन वह ऐसा नहीं किया और इसीलिए इस समय भी वह अपनी मनमानी नहीं करना चाहता था,,,।

फिर भी हालात पूरी तरह से नाजुक हो चुके थे अंकित के पेंट में तंबू बना हुआ था और ठीक उसके लंड के सामने उसकी मां की उभरी हुई गांड थी जो की पेटिकोट के परदे में कैद थी,,,, पेटीकोट में होने के बावजूद भी अंकित को अपनी मां की गांड का उभार और उसका कटाव एकदम साफ झलक रहा था मन तो उसका कर रहा था कि बस एक कदम आगे बढ़कर अपने लंड की रगड़ अपनी मां की गांड पर महसूस करा दे,,, लेकिन ऐसा करने से वह डर रहा था वह कोई भी काम बिगड़ता नहीं देना चाहता था वह नहीं चाहता था कि उसकी एक गलती से सब कुछ बिगड़ जाए उसे ऐसा लग रहा था कि उसकी मां नाराज हो जाएगी लेकिन वह तो खुद चाहती थी कि अंकित आगे बढ़े,,,, उसके साथ कोई हरकत करें उसके बदन से खेले,,, और वह ईसी इंतजार में थी,,,,,,और वह जानती थी कि,,,,,अगर वह थोड़ा सा भी पीछे अपनी गांड को ले गई तो तुरंत उसके बेटे का तंबू उसके नितंबों पर रगड़ खाने लगेगा और वह इस अनुभव के लिए तड़प रही थी और मन ही मन अंकित पर थोड़ा गुस्सा भी कर रही थी,,,।

और गुस्सा इस बात से कर रही थी कि,,, अंकित पूरी तरह से जवान होने के बावजूद भी दूसरे लड़कों की तरह हरकत करने वाला नहीं था नहीं तो उसकी आंखों के सामने इतनी खूबसूरत औरत और जिसे खुद अपने हाथों से ब्रा का हुक खोलना हो भला ऐसा लड़का ऐसी खूबसूरत औरत के बदन के साथ छेड़छाड़ किए बिना कैसे रह सकता है,,, कुछ देर तक सुगंध भी उसी अवस्था में खड़ी रही वह चाहती थी कि अंकित की तरफ से कोई हरकत हो अंकित उसके बदन पर अपना हाथ रखे या कोई ऐसा हरकत करें जिससे वह एकदम से मस्त हो जाए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वह पागल की तरह अपने दोनों हाथों में उसकी ब्रा की पट्टी पकड़े खड़ा रहा,,,,,,,ऐसा नहीं था कि,, अंकित के मन में यह सब नहीं चल रहा था वह भी अपने लंड को अपनी मां की गांड पर रगड़ना चाहता था उसके नितंबों पर अपने तंबू को सहलाना चाहता था लेकिन ऐसा करने में उसे डर लग रहा था,,,, बार-बार अंकित की नजर अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड पर जा रही थी और वह ऊंचाई में थोड़ा अपनी मां से एक दो इंच बड़ा ही था इसलिए वहां ऊपर से ही अपनी मां की छातिया की तरफ देख रहा था लेकिन वह ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी,,, अगर वह एक कदम आगे बढ़ा देता तो उसे सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगता लेकिन ऐसा करने से उसका तंबू उसकी मां की नितंबों पर एकदम से रगड़ खा जाता और उसे इस बात का डर था कि कहीं उसकी मां बुरा ना मान जाए,,,,।

जब कुछ देर तक दोनों की तरफ से किसी भी प्रकार की हरकत नहीं हुई तो सुगंधा ही गहरी सांस लेते हुए बोली,,,।

बस कर अब मैं उतार लूंगी,,,,।

ठीक है मम्मी,,,(इतना कहने के साथ ही बेमन से अंकित वापस अपनी जगह पर आकर बैठ गया उसका तो मन कर रहा था कि अपनी मम्मी से कह दे कि तुम रहने दो मेरी तुम्हें नहला देता हूं,,,,,,।

अंकित अपनी जगह पर आकर बैठ गया था और सुगंधा मन ही मां अपने बेटे पर गुस्सा कर रही थी,,, वह धीरे से अपने खुली हुई ब्रा को अपनी बाहों में से बाहर निकाली और उसे दूसरों कपड़ों के साथ रखदी,,, अंकित तिरछी नजर से अपनी मां की तर्पी देख रहा था ब्रा के उतरते ही वह समझ गया था कि उसकी मां कमर के ऊपर पूरी तरह से नंगी हो चुकी है,,, और अपने मन में यही सोच कर मस्त हो रहा था कि क्या मस्त लगती होगी उसकी मां इस समय,,, बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां एकदम गोल गोल जिसे देखकर ही मुंह में पानी आ जाए,,,, अंकित की हालत खराब हो रही थी बाथरूम में खड़ी उसकी मां के बदन पर केवल पेटिकोट भर रह गई थी,,,,।

सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था उसका मन तो कर रहा था कि लगे हाथ अपनी पेटिकोट के उतार कर पूरी तरह से नंगी हो जाए लेकिन ऐसा करने में उसका बेशर्मी पन झलक सकता था क्योंकि इस समय वह पूरी तरह से होश में थी,,, बेहोशी की बात कुछ और थी,,, लेकिन आज ऐसी कोई बात नहीं थी आज वह पूरी तरह से होश में थी इसलिए ऐसा करना उचित नहीं था लेकिन फिर भी वह जिस तरह की अदाकारी दिख रही थी उसे पूरा विश्वास था कि उसके बेटे की हालत पल-पल खराब होती जा रही थी,,, सुगंधा इस बात को भी अच्छी तरह से जानती थी कि केवल उसकी देखभाल के बहाने उसका बेटा जानबूझकर बाथरूम के सामने बैठा हुआ है वह उसे कपड़े उतारते हुए देखना चाहता है उसे नंगी देखना चाहता है,,, ईसी बात का एहसास सुगंधा केतन बदन में उत्तेजना की फुहार उठा रहा था जो कि यह फुआ उसकी टांगों के बीच की पतली दरार के झरने में से बह रही थी,,,।

बाथरूम के इर्द-गिर्द का वातावरण पूरी तरह से मादकता से भरता चला जा रहा था अंकित की आंखों के सामने दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत धीरे-धीरे करके अपने बदन पर से कपड़े उतार रही थी,,, ब्लाउज ब्रा और पेटिकोट का नंबर था और यही देख देख कर अंकित पूरी तरह से मदहोश हुआ जा रहा था मस्त हुआ जा रहा था,,, लेकिन सबके बावजूद भी उसके मन में इस बात का मलाल था कि इतनी खूबसूरत औरत उसकी आंखों के सामने कपड़े उतार रही थी लेकिन वह कुछ कर नहीं पा रहा था,,,,। बस देखने के सिवा वह कुछ कर भी नहीं सकता था,,, अंकित के हालात इस कदर बिगड़ गए थे कि,,, उसे इस बात का डर लगने लगा था कि कहीं उत्तेजना की वजह से उसके लंड के नशे फट ना जाए,,,। इसलिए बार-बार पेट के ऊपर से अपने लंड को दबा दे रहा था,,,,।

बाथरूम के अंदर सुगंधा अपने पेटिकोट की डोरी खोलने लगी और अपनी मां की हरकत को देखकर अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा उसके मन में उमंग जगने लगी,,, वह अपने मन में सोचने लगा आज तो उसकी मां बिल्कुल होश में है तो बना हुआ उसकी उपस्थिति में इस तरह से अपने कपड़े कैसे उतार सकती है क्या ऐसा तो नहीं कि उसकी मां ही कुछ चाहती हो उसके मन में भी कुछ चल रहा हो जिस तरह से उसके दोस्त ने बताया था कि,, इस तरह के जीवन जीने वाली औरतें चुदवासी होती है,,, इनमें भी समय-समय पर कामाग्नि भड़कने लगती है,,, इस तरह की औरतों को भी समय-समय पर लंड की जरूरत पड़ती है,,, अपने दोस्त की कही बात याद आते ही अंकित के लंड की अकड़ और ज्यादा बढ़ने लगी,,,,,, उसके तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी,,,,,।

अंकित अपनी मां के जीवन के बारे में अच्छी तरह से जानता था वह जानता था कि बरसों से उसकी मां इस तरह की एकाकी जीवन की रही थी,,,, और इतना भी जानता था कि उसकी मां का चरित्र दूसरी गंदी औरतों की तरह बिल्कुल भी नहीं था वरना अप तक तो उसकी मां शादीशुदा जीवन व्यतीत करने लगती दूसरी शादी करके अगर ऐसा नबी होता तो अब तक न जाने कितने मर्दों के साथ संबंध बना ली होती लेकिन ऐसा भी बिल्कुल नहीं था,,,, जहां तक अंकित का ज्ञान था कुछ गंदी किताबों को देखकर और कुछ अपने दोस्तों से बटोर कर वह इतना तो समझ गया था कि उसकी मां भी चुदवासी है,,, क्योंकि इस समय उसके बदन में बुखार नहीं था वह पूरी तरह से होशो आवाज में थी तो भला एक मां अपने होशो आवाज में होने के बावजूद अपने ही बेटे के सामने और वह भी जवान लड़के के सामने अपने वस्त्र उतार कर नंगी क्यों होगी,,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि कहीं उसकी मां जानबूझकर उसे अपना नंगा बदन तो नहीं दिखा रही है,,, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह खुद अपने बेटे को उत्तेजित कर रही है अपनी तरफ आकर्षित कर रही है संबंध बनाने के लिए,,,,

ऐसा ख्याल उसके मन में आते ही वह पूरी तरह से रोमांचित हो उठा उसे लगने लगा कि उसकी मां उसके लिए ही यह सब सारा खेल रच रही है,,, उसे लगने लगा कि उसकी मां उसके साथ संबंध बनाना चाहती है और इसी बात की खुशी उसके चेहरे के साथ-साथ उसकी दोनों टांगों के बीच के हथियार में बड़े अच्छे से झलक रही थी जो कि इस समय पूरी तरह से लोहे के रोड की तरह एकदम कड़क हो चुका था अगर इस समय वहां मौका मिल जाने पर अपनी मां की बुर में अपना लंड डालता तो शायद पहली बार में ही वह अपनी मां की बुर का भोसड़ा बना देता इस कदर पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में डूबता चला जा रहा था,,,, लेकिन तभी उसके मन में ख्याल आया नहीं अगर ऐसा नहीं हुआ तो अगर उसकी मां सच में बीमारी की वजह से कहीं अकेले में चक्कर न आ जाए,,, इसलिए ना चाहते हुए भी उसके सामने अपने कपड़े उतार कर नहाने की तैयारी कर रही हो तो,,,, इतने वर्षों में तो उसने कभी अपनी मा में इस तरह के बदलाव नहीं देखे थे,,,।

और पहली बार ही तो मां इस तरह से बीमार हुई थी,,, बीमारी की वजह से ही वह मजबूर होकर इस तरह की हरकत कर रही है,,,, क्योंकि होशो हवास में भर ऐसी कौन सी मैन होगी जो अपनी बेटी के सामने अपने कपड़े उतार कर निर्वस्त्र होकर नंगी होकर बाथरूम में उसकी आंखों के सामने ही नहाएगी,,, नहीं नहीं मैं ही अपनी मां के बारे में कुछ गलत सोच रहा हूं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है अच्छा हुआ मैं किसी प्रकार की हरकत अपनी मां के साथ नहीं किया वरना लेने के देने पड़ जाते,,,,। अंकित अपने मन में यह सोच कर रहा की सांस ले रहा था क्योंकि वाकई में उसने अभी तक अपनी मां के साथ कोई गलत हरकत नहीं किया था जो कुछ भी किया था उसके होशो हवास में किया था और दवा खाने में तो मजबूर होकर किया था,,,।

वह यह सब सोच ही रहा था कि इसी बीच उसकी मां अपने पेटिकोट की डोरी एकदम से खोल दी और डोरी के खुलते ही उसकी कमर पर कसी हुई ,,, पेटिकोट एकदम से ढीली पड़ गई,,, और एक पल के लिए तो अंकित को लगा कि उसकी मां की पेटिकोट सड़क कर नीचे उसके कदमों में गिर जाएगी क्योंकि ऊपर वाला पेटीकोट का हिस्सा ढीला होकर उसके नितंबों के उभार पर नीचे लुढ़ककर टिक गया था और वह भी उसके नितंबो की गोलाकार उभरी हुई गांड की वजह से ही उसका पेटिकोट रुका हुआ था वरना वाकई में पेटिकोट की डोरी खुलते ही पेटिकोट उसके कदमों में जाकर गिर जाती और वह निर्वस्त्र हो जाती,,, इसलिए तो एक पल के लिए अंकित का दिल धक से करके रह गया था,,,, अंकित को ऐसा ही लग रहा था कि आज उसकी मां अपना पेटिकोट की उतार देगी लेकिन उसे इस बात कर सकता कि उसकी मां पेटिकोट के अंदर कुछ पहनी होगी कि नहीं ,,, इस बात के बारे में सोच ही रहा था कि तभी उसे याद आया कि कल ही तो वह अपने हाथों से ही अपनी मां की पेंटिं दवा खाने के बाथरूम में उतारा था,,, और अब तक उसकी मां ने अपने कपड़े बदले नहीं थे इसका मतलब पेटिकोट के अंदर उसकी मां चड्डी पहनी हुई है,,,,।

अंकित का दिल जोरो से धड़क रहा था उसे उम्मीद थी कि उसकी मां पेटीकोट भी उतार देगी और जल्द ही उसकी मां की चड्डी देखने को मिलेगी जिसे वह कल दवा खाने के बाथरूम में अपने हाथों से उतारा था और पहनाया था,,, और वह अपनी मां की चड्डी देखने के लिए व्याकुल हुआ जा रहा था जिस तरह से उसकी मां अपने बदन से एक-एक करके सारे कपड़ों को बाथरूम के कोने में उतर कर फेंक दी थी उसे ऐसा ही लग रहा था कि वह अपनी पेटीकोट भी उतार देंगी,,, और उसके सोच के मुताबिक है उसकी मां पेटिकोट के घेरे को अपनी कमर के घेरे से अलग करने लगी,,, अंकित बार-बार किताब हमेशा अपनी नजर उठा कर अपनी मां की तरफ देख ले रहा था अब वह तिरछी नजर से नहीं बल्कि अपनी नजर उठा कर देख रहा था क्योंकि उसकी मां की पीठ उसके ठीक सामने थी और उसका मुंह दीवाल की तरफ था,,,, ऐसे में उसकी मां का अंकित की तरफ एकदम से देख पाना नामुमकिन था इसलिए वह इसका फायदा उठा रहा था,,,,।

अंकित की नजर एकदम से अपनी मां के ऊपर खड़ी हुई थी लेकिन तभी उसके अरमानों पर पानी फिर गया जब उसकी मां पेटीकोट को दोनों हाथों से पकड़कर उसे नीचे ले जाने के बजाय ऊपर की तरफ ले जाने लगी और अपनी चुचियों तक लाकर उसे एकदम से रोक दी,,।,,, यह देखकर अंकित के दिल की धड़कन पढ़ने लगी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां ऊपर से पेटिकोट निकलेगी कि नीचे से नीचे से तो वह अब नहीं निकाल सकते थे क्योंकि वह पेटिकोट अपने हाथ में लेकर ऊपर की तरफ ले गई थी और चूचियों के पास आते ही उसे रोक दी थी,,,,, अंकित को कुछ-कुछ शक हो रहा था कि उसकी मां पेटीकोट को नहीं निकालेगी,,, वरना पहले प्रयास में ही वह पेटीकोट को नीचे सी सही ऊपर से ही उतार देती और उसका यह सब बिल्कुल सही निकला जब उसकी मां पेटिकोट की डोरी को चूचियों की ऊपर लाकर बांधने लगी,,, यह देखकर अंकित के अरमान पर पानी फिर गया था लेकिन इसके बावजूद भी सुकांता जानबूझकर अपनी बेटी को चूचियों के थोड़ा ऊपर की तरफ उठाई थी ताकि उसका पिछवाड़ा उसकी मदमस्त कर देने वाली गांड उसके बेटे को दिखाई दे और ऐसा ही हुआ वह जिस तरह से पेटिकोट की डोरी को बंद रही थी उसके पीछे का पेटीकोट ऊपर की तरफ उठ गया था जिसे नितंबों के नीचे की गोलाई एकदम साफ नजर आ रही थी,,, उसके बीच की गहरी दरार भी एकदम साफ दिखाई दे रही थी यह देखकर अंकित का हांथ अपने आप उसके लंड पर आ गया और वह जोर से दबा दिया,,,, भले उसकी मां पेटीकोट को पूरी तरह से नहीं निकली थी लेकिन फिर भी अपने बेटे को पूरी तरह से मदहोश कर गई थी,,,,,।

अंकित की मां पेटिकोट को बांधकर घूम गई लेकिन ना तो दीवाल की तरफ मुंह करके और ना तो अंकित की तरह वह सामने की तरफ मुंह कर ली,,,और बाथरूम में छोटा सा लकड़ी का पाटी रखा हुआ था उस पर बैठ गई,,, वह इस तरह से बैठी थी कि इतनी दोनों टांगें खोल दी थी,,,,, इस अवस्था को देखकर अंकित को इस बात का मलाल था कि उसकी मां अगर उसकी तरफ मुंह करके इस तरह से बैठती तो शायद उसके खूबसूरत बुर के या उसकी चड्डी के दर्शन हो जाते,,, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया था क्योंकि उसकी मां तिरछी बेठी हुई थी,,,। लेकिन फिर भी इस अवस्था में भी अंकित को उसकी मां की मोटी मोटी जांघें उसकी नंगी टांग एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, इतना ही अंकित के लिए काफी था वह पूरी तरह से उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंच चुका था क्योंकि औरतों की चिकनी मोटी मोटी जांघें उनकी नंगी टांगें भी मर्दों के लिए उत्तेजना का प्रमुख कारण होती हैं,,,।

अंकित ने पहले से ही बाथरूम में पानी से भरा हुआ टब रख दिया था जिसमें से सुगंधा मग भरकर पानी को अपने ऊपर डालने लगी,,, इस स्थिति में ठंडा पानी सुगंधा को बेहद सुकून दे रहा था लेकिन अंकित की हालत खराब कर दे रहा था ,,,,, अंकित अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां लगभग अर्धनग्न अवस्था में ही थी और ऐसे हालात में एक खूबसूरत औरत को नहाते हुए देखना कितना उत्तेजनात्मक होता है और वही अंकित को भी हो रहा था अपनी मां की मादकता भरी जवानी में वह पूरी तरह से अपने आप को डुबोते चला जा रहा था,,, धीरे-धीरे सुगंधा अपने ऊपर पानी डाल डाल कर अपने पूरे बदन को भिगो डाली और उसके बाद साबुन लगाना शुरु कर दी,,,।

अंकित किताब खोलकर बस किताब के पन्ने को देख रहा था उन्हें पढ़ने की तस्दी बिल्कुल भी नहीं ले रहा था,,, और वैसे भी जब आंखों के सामने जवानी से भरी हुई किताब खुली पड़ी हो तो भला,, दुनिया का कौन सा मर्द होगा जो स्कूल की किताब में ध्यान लगाएगा,,,, अंकित बार-बार अपनी लंड पर अपना हाथ रख कर उसे ज़ोर से दबा दे रहा था,,,, धीरे-धीरे सुगंधा आपने पूरा बदन पर साबुन लगाने लगी साबुन के झाग में उसका गोरा बदन और भी ज्यादा खूबसूरत लगने लगा,,,, सुगंधा भी इस स्थिति में बेहद उत्तेजना महसूस कर रही थी क्योंकि वह अपनी बेटे की आंखों के सामने लगभग लगभग निर्वस्त्रावस्था में ही नहा रही थी क्योंकि उसके बदन का आधे से भी ज्यादा भाग उसके बेटे की आंखों के सामने उजागर था उसकी मोती-मोती जंग उसकी नंगी चिकनी टांग यहां तक की उसकी पेटीकोट भी एकदम कमर तक थी और जांघ की शुरुआत से ही उसकी पूरी टांग दिखाई दे रही थी,,,, यहां तक की उसकी चड्डी भी नजर आने लगी थी सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि उसका बेटा उसके अंगों के साथ-साथ उसकी चड्डी भी देख रहा होगा जिसे वह कल अपने हाथों से उसके बदन से उतारा था,,,,,, अनुभव से भारी होने के बावजूद भी सुगंधा चड्डी के मामले में निश्चित तौर पर नहीं कह सकती थी की औरतों की चड्डी देखकर मर्दों की उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है,,,, क्योंकि विवाहित जीवन की शुरुआत से ही वह अपने पति के मुंह से सुनती आ रही थी चड्डी ना पहना करें क्योंकि रात को उतारते समय उसे दिक्कत होती है,,, इसलिए सुगंधा को भी ऐसा ही लगता था कि सारे मर्द चड्डी के मामले में एक जैसी सोच रखते होंगे,,,।।

लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था एक उसका पति ही दूसरे मर्दों से अलग था जबकि सारे मर्द औरतों की चड्डी के मामले में जैसे ही होते हैं औरतों की चड्डी देखकर उनकी उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है औरतों के बदन से चड्डी उतारने में मर्दों को इतना आनंद आता है कि वह बार-बार इस क्रिया को दोहराते रहते हैं,,, यहां तक की लंड की सुसुप्तावस्था मैं जैसे ही औरतों की चड्डी के उतारने का कार्य करते हैं वैसे ही उनका लंड एकदम से टनटना कर खड़ा हो जाता है,,,, और इसीलिए इस समय अंकित की भी उत्तेजना अद्भुत तरीके से बढ़ती चली जा रही थी क्योंकि उसकी नजर में भी हुई उसकी मां की चड्डी दिखाई देने लगी थी वह जिस तरह से बैठी थी कमर और जानू के बीच की जोड़ होती है उसमें एक पतली सी हल्की सी दरार मांसलता लिए पेट से दोनों टांगों के बीच की तरफ जा रही थी जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था लेकिन वह कुछ भी कर सकते की स्थिति में नहीं था बस बार-बार अपनी मां को देखकर अपने लंड को दबा दे रहा था,,,,,।

वह अभी यह सब सोच ही रहा था कि,,, तभी उसकी मां बोली,,,,।

बेटा जरा मुझे साबुन लगा देना तो पीछे मेरा हाथ नहीं पहुंच रहा है,,,,।(सुगंधा अपने बदन के साथ-साथ अपने चेहरे पर भी साबुन लगा लेती जिसकी वजह से झाग उसकी आंखों तक पहुंच रही थी और अपनी आंखों को बंद की हुई थी वह जानबूझकर ऐसा कर रही थी,,,,, अंकित को तो अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हुआ उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां वाकई में उसे साबुन लगाने के लिए बोली है या उसके कान बज रहे हैं इसलिए वह कुछ देर तक अपनी जगह पर ही बैठा रह गया और जब अंकित की तरफ से कोई हरकत नहीं हुई तो सुगंध फिर से बोली,,,,)

अरे सुन रहा है कि नहीं,,,,, मेरा हाथ पीछे नहीं पहुंच रहा है जरा साबुन लगा देना तो,,,,,।

(इस बार उसे यकीन हो गया कि उसकी मां वाकई में से साबुन लगाने के लिए बोल रही है उसकी मां के मुंह से कह गए एक-एक शब्द उसके कानों में मिश्री खोल रहे थे वह तुरंत किताब को एक तरफ रखकर कुर्सी पर से उठकर खड़ा हो गया और तुरंत अपनी मां के पास पहुंच गया उसके हाथ में साबुन था जो कि वह अंकित की तरफ हाथ करके उसे दे रही थी हालांकि वह उसे देख नहीं रही थी क्योंकि उसकी आंखों में साबुन लगा रहा था इसलिए अपनी आंखों को बंद की हुई थी जो कि यह औपचारिकता नहीं थी वह जानबूझकर ऐसी कर रही थी वह देखना चाहती थी महसूस करना चाहती थी कि उसका बेटा उसके साथ क्या-क्या हरकत करता है अंकित तुरंत अपनी मां के हाथ में से साबुन ले लिया और साबुन लगाने से पहले बोला,,,,)

कहां लगाना है मम्मी पीठ में,,,,

हां पीछे मेरा हाथ नहीं पहुंच रहा है गरदन से लेकर के नीचे तक साबुन लगा दे,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा लकड़ी के पाटी पर ही दीवार की तरफ मुंह करके घूम गई क्योंकि जिस तरह से वह बैठी थी उसके पीछे खड़े होकर साबुन लगाने में दिक्कत आ सकती थी क्योंकि चौड़ाई बाथरूम की कम थी,,,,,,,, और जैसे ही वह दीवार की तरफ मुंह करके घूमी अंकित की नजर सीधे उसकी मां के नितंबों पर गई जो की पाटी पर एकदम दबी हुई थी एकदम जवानी से लदी हुई अपने विस्तार से बाहर निकलने के लिए तड़प रही थी,,,,, पेटिकोट पानी में भीग कर ऊपर हो जाने की वजह से उसके नीचे का अंग एकदम साफ दिखाई दे रहा था हालांकि चड्डी पहनी होने की वजह से ज्यादा तो नहीं लेकिन फिर भी नितम्बो के ऊपरी लकीर एकदम साफ दिखाई दे रही थी,, अंकित के लिए तो इतना भी बहुत था,,,
 
अब ऐसा लग रहा था कि अपनी मां को नहलाने की जिम्मेदारी अंकित ने अपने हाथों में ले लिया था अपने हाथ में साबुन लेकर वह अपनी मां की गर्दन पर साबुन लगाना शुरू कर दिया लेकिन पानी कम होने की वजह से चिकनाहट कम थी और वह मग जो कि उसके पास में ही पड़ा था और वहां पानी से भरा हुआ था उसे लेकर एक बार फिर से अपनी मां के गर्दन पर डालकर उसकी पीठ तक को भिगोने की कोशिश करने लगा और फिर साबुन लगाने लगा,,,,, यह उसका पहला अवसर था जब वह अपनी मां को अपने हाथों से नहला रहा था,,, इस बहाने उसे अपनी मां का खूबसूरत बदन स्पर्श करने का मौका मिल रहा था और वहां पर है तो भेजने का अनुभव कर रहा था उसके पेंट में अच्छा खासा तंबू बना हुआ था एकदम भाले की नौक की तरह,,,।

धीरे-धीरे अंकित अद्भुत सुख भोग रहा था औरत की दोनों टांगों के बीच उसके कोमल अंक में अपना कड़क अंग डालकर उसके साथ संभोग करना ही औरतों के साथ सुख भोगने नहीं होता उसके साथ अनेक क्रिया करके भी उसके साथ सुख भोगने का सौभाग्य प्राप्त किया जा सकता है ऐसा अंकित अपने मन में सोच रहा था क्योंकि इस समय उसे चुदाई से भी अधिक अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी,,, अंकित अपनी मां की पीठ पर साबुन लगाते लगाते हैं नीचे की तरफ बढ़ रहा था और देखते ही देखते हो एकदम कमर तक उसके साबुन लगाना शुरू कर दिया और वह अपने मन में सोच रहा था क्या करें उसकी मां खड़ी होती तो कितना मजा आता है वैसी बहाने अपनी मां की चड्डी में हाथ डालकर उसे साबुन लगाता,,, लेकिन फिर भी उसे बहुत मजा आ रहा था,,,,, लेकिन साबुन लगाने के दौरान वहां अपनी मां की छतिया की तरफ देख रहा था जो कि उसकी आधी चूची पर पेटिकोट की डोरी बंधी हुई थी,,, और आधी एकदम साफ दिखाई दे रही थी जिसे देखकर अंकित को पपाया का फल याद आ गया जो कि इसी आकार में होता है,,,,, अपनी मां की चूची देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था और अपने मन में सोच रहा था कि काश चूचियों पर साबुन लगाने का मौका मिल जाता तो कितना मजा आता है,,,,,, यही सब सोचते हुए वह गर्दन पर साबुन लगाने लगा लेकिन तब तक साबुन का झाग सूख चुका था इसलिए वह फिर से अपनी मां के बदन पर पानी डालने की सोचने लगा,,, और पानी का टब ठीक उसकी मां के सामने रखा हुआ था,,,, और वह हाथ में मग लेकर आगे की तरफ झुककर तब में से पानी लेने लगा लेकिन उसकी हरकत की वजह से उसके पेट में बना तंबू सीधे-सीधे उसकी मां की गर्दन हो के ऊपर से उसकी मां की गाल पर रगड़ खाने लगा और यह रगड़ महसूस करते ही सुगंधा की तो हालत खराब हो गई सुगंधा की आंखें एकदम से खुल गई वह इतना तो समझ गई थी कि उसके गाल पर और गर्दन पर रगड़ खाने वाली चीज और कुछ नहीं उसके बेटे का लंड है,,,।

यह एहसास सुगंधा को पूरी तरह से मदहोश कर गया,,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें उसका बेटा आगे की तरफ झुक कर प्लास्टिक के टब में से पानी लेने की कोशिश कर रहा था,,,, और लगभग वह पानी के पास पहुंच भी गया था,,,, और अंकित को इसका अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि पानी लेते समय उसके पेंट में बना तंबू उसकी मां की गर्दन के साथ-साथ उसकी गालों पर भी रगड़ खाएगा लेकिन जैसे ही उसे इस बात का एहसास हुआ पूरी तरह से मस्त हो गया,,,, उसे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वहां अपने लंड को अपनी मां के मुंह में डालने के लिए आगे बढ़ रहा है,,,,, सुगंधा की खुद की हालत खराब होती जा रही थी पल भर के लिए उसे लगा कि अपना हाथ अपने बेटे के लंड पर रखकर उसे ज़ोर से दबा दे और कह दे कि मुझे तुझसे प्यार चाहिए मुझे जी भर कर प्यार कर मुझे प्यार कर,,, मुझे प्यार करो बेटा,,,आहहहहहहहह,,,,, ऐसा सोचकर सुगंधा अंदर ही अंदर तड़प रही थी बरसों की प्यास का जुगाड़ उसके गालों पर रगड़ खा रहा था लेकिन वह उसे अपनी प्यास बुझाने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं थी क्योंकि वहां उसका सगा बेटा था अगर इस वक्त ऐसे माहौल में अंकित की जगह कोई और होता है तो शायद सुगंधा अपना काबू खो बैठती,,, लेकिन अपने बेटे के साथ ऐसा करने में उसे डर लग रहा था घबराहट हो रही थी,,,,।

ज्यादा देर तक अंकित इस अवस्था में नहीं रह सकता था इसलिए पानी लेकर वह फिर से अपनी स्थिति में आ गया और फिर अपनी मां के गर्दन पर पानी डालने लगा और उसे पर साबुन लगाने लगा साबुन के छाव की वजह से उसके हाथ से साबुन एकदम से फिसल गया और सीधे जाकर उसकी मां की चूचियों के बीच जहां पर उसकी मां ने पेटिकोट की डोरी बांधी थी उसी में जाकर फंस गया,,,, यह देखकर अंकित के दिल की धड़कन बढ़ने लगी और सुगंधा के भी बदन में मदहोशी छाने लगी,,, क्योंकि उसके मन में एहसास होने लगा कि उसकी चूचियों के बीच से साबुन उसका बेटा अपने हाथों से निकालेगा,,,, इसलिए वह तुरंत दोनों हाथों से अपनी आंखों को मारने लगी यह जताने के लिए की साबुन का झाग उसकी आंखों में लग रहा है,,,, अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें तभी उसकी मां अपनी आंखों को मलते हुए बोली,,,)

अरे अंकित क्या किया जल्दी से साबुन लगाकर पानी डाल मेरी आंखों में जलन हो रहा है,,,,।

लेकिन मम्मी साबुन तो तुम्हारे,,,,,,(इतना कहकर आगे बोलने की उसकी हिम्मत नहीं हुई तो सुगंधा ही एकदम से बोली,,,)

जल्दी से साबुन ले लै मुझे बहुत जलन हो रही है,,,,।

ठीक हैमम्मी,,,,(अपनी मां की तरफ से इजाजत मिलते ही अंकित अपना हाथ आगे बढ़कर अपनी मां की चूचियों के बीच लेकर गया जहां पर पेटिकोट की डोरी बंधी हुई थी और साबुन लेने के चक्कर में उसके हाथ से साबुन पर थोड़ा सा दबाव पड़ा तो साबुन और नीचे से रखें उसकी दोनों चूचियों के एकदम बीचों बीच आ गया,,,,,, यह एहसास करके सुगंधा के तन बदन में आग लगने लगी उसे बहुत मजा आ रहा था आनंद आ रहा था वह फिर भी सहज होते हुए बोली ,)

अरे क्या कर रहा है अंकित तुझसे साबुन नहीं पकड़ा जा रहा है,,,

मम्मी साबुन छटक गया,,,,

अब जल्दी से साबुन ले मुझे बहुत जलन हो रही है,,,,,।

(फिर से प्रयास करते हुए अंकित धीरे से अपने हाथ को अपनी मां की चूचियों की तरफ लेकर और अपनी उंगली से साबुन को दोनों चूचियों के बीच से निकलने की कोशिश करने लगा लेकिन फिर भी फिसलते हुए साबुन अंदर की तरफ जाने लगा,,,,,, वजह से जैसे चुचियों के बीच से अंदर की तरफ फिसल रहा था वैसे-वैसे सुगंधा के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी और अंकित भी मदहोश होता चला जा रहा था,,,,, और अंकित धीरे-धीरे अपनी उंगली के साथ-साथ अपना आदि कलाई को अपनी मां की चूचियों के बीच डाल दिया था लेकिन साबुन फिर भी उसके हाथ में नहीं आया तो साबुन एकदम से फिसल कर उसकी दोनों टांगों के बीच उसकी पेंटिं के ऊपर जा गिरा,,,,, यह देखकर धड़कते दिल के साथ अंकित बोला,,,)

मम्मी यह तो नीचे फिसल गया,,,,।

तू सच में बुद्धू है अंकित एक साबुन तो उसे संभाल नहीं जाता जल्दी से निकाल साबुन मुझे रहा नहीं जा रहा है आंखों में जलन हो रही है,,,,।

(इतना सुनते ही अंकित इस बार हिम्मत दिखा कर अपनी मां की पेटिकोट के अंदर उसकी चूचियों के बीच एकदम से हाथ डाल दिया और उसे साबुन को टटोलने लगा,,,, साबुन को टटोलने के चक्कर में अंकित का हाथ उसकी मां के पेट के नीचे की तरफ आने लगा और एकदम से पूरा हाथ पेटिकोट की डोरी के अंदर डालते हुए वह एकदम जमीन पर अपने हाथ को स्पर्श करने लगा तभी उसे एहसास हुआ कि उसकी मां की दोनों टांगों के बीच साबुन चिपका हुआ है अब उसके दिल की धड़कन एकदम से बढ़ने लगी और सुगंध की भी हालत खराब होने लगी क्योंकि सुगंध को मालूम था कि उसका गिरा हुआ साबुन उसकी पेंटिं पर चिपका हुआ है,,, अब वह देखना चाह रही थी किसका बेटा क्या करता है हालांकि देखते ही देखते उसके बेटे ने उसकी दोनों चूचियों के बीच से होते हुए अपने हाथ को उसकी पेंटि के इर्द-गिर्द पहुंचा दिया था,,, जिसकी वजह से सुगंधा अंदर ही अंदर एकदम खुश हो रही थी,,,,,।

अंकित समझ गया था कि साबुन उसकी मां की पेंटी के ऊपर ही है,,, अंकित करती जोरों से ढक रहा था और यही मौका था उसे अपनी मां की पेटी पर हाथ रखने का अपनी मां की बुर को अपनी हथेली में पहुंचने का और इसीलिए वह साबुन पकड़ने का बहाना करके एकदम से अपनी हथेली को अपनी मां की पेंटिंग पर रखकर साबुन पकड़ने के बहाने अपनी मां की बुर को दबोच दिया ऐसा करने में उसे अद्भुत उत्तेजना और मदहोशी का एहसास होने लगा और यही हरकत सुगंधा के तन बदन में मदहोशी का रस घोलने लगी,,,, जिस तरह से उसके बेटे ने साबुन पकड़ने के बहाने उसकी बुर को अपनी हथेली में दबोचा था सुगंधा एकदम से चौंक गई थी और एकदम से मदहोश हो गई थी,,, और यह एहसास एकदम पल भर के लिए था ऐसा करते ही अंकित ने तुरंत साबुन पड़कर उसे वापस से अपनी मां की पेटीकोट से ही बाहर निकाल दिया और जल्दी-जल्दी साबुन लगाने लगा था कि इस बारे में उसकी मां उससे कोई शिकायत ना कर पाए,,,,,।

शिकायत करने की बात तो दूर उसकी मां अपने मन में यही सोच रही थी कि कुछ देर तक और उसका बेटा अपनी हथेली में उसकी बुर को दबोच कर रखा है तो शायद उसका पानी निकल जाता उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो जाती,,,, बुर को दबोचने की शिकायत नहीं बल्कि वह तो अपने बेटे से इस बात की शिकायत करने वाली थी कि ज्यादा देर तक वह क्यों दबोच कर नहीं रखा,,,, अंकित जल्दी-जल्दी अपनी मां के बदन पर पानी डालने लगा था,,, आया था तो अंकित अपनी मां के बदन पर केवल साबुन लगाने के लिए लेकिन अब वह उसे नहला रहा था और सुगंध भी अपने बेटे के हाथों से नहाने में आनंद लूट रही थी उसे बहुत मजा आ रहा था उसकी पेटिकोट आगे से पूरी तरह से भेज चुकी थी जिसकी वजह से गिरी बेटी को उसकी चूचियों से चिपक गई थी और उसकी निप्पल कैडबरी चॉकलेट की तरह एकदम तनकर पेटीकोट से बाहर झांक रही थी,,,,।

सुगंधा नहा चुकी थी और अंकित बाथरूम से बाहर आकर खड़ा हो गया था सुगंध उठकर खड़ी हुई और अपनी पेटिकोट की डोरी को खोलकर पेटीकोट को दिल्ली करने लगी और एक हाथ आगे की तरफ डालकर अपनी चड्डी को बाहर निकलने लगी लेकिन जल्दी पानी में पूरी तरह से भी होने की वजह से उसकी कमर से नीचे की तरफ सरक नहीं पा रही थी,,, यह देखकर अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा उसे उम्मीद नजर आने लगी और वह अपनी मां से बोला,,,।

मैं निकाल दुं,,,,,।

(इतना सुनकर सुगंधा अपने बेटे की तरफ मुस्कुराते हुए देखने लगी और बोली,,,)

बिल्कुल नहीं,,,, आज मैं होश में हूं,,,,,(और इतना कहने के साथ ही सुगंध अपने बेटे की आंखों के सामने ही अपनी चड्डी को उतारने लगी और जैसे ही चड्डी उसके घुटनों के नीचे तक आई उसे पर नजर पड़ते अंकित के लंड की अकड़ बढ़ने लगी,,,, वह मस्त हो जा रहा था उसकी मां अपने पैरों के सहारे से घुटनों के नीचे से अपने चड्डी को अपने पैरों से बाहर कर रही थी यह नजारा बेहद देखने लायक था और अगले ही पल हुआ अपनी चड्डी को अपने बदन से दूर कर चुकी थी उसके बदन पर केवल उसका गिला पेटिकोट था जो उसके बदन से एकदम चिपका हुआ था और पेटिकोट की चुपके होने की वजह से उसकी चुचियों का आकार के साथ-साथ जांघों के ऊपरी हिस्से का त्रिकोण वाला जाकर एकदम साफ नजर आ रहा था,,, और उसकी बुर वाला हिस्सा कचोरी की तरह फुला हुआ नजर आ रहा था यह सब नजारा पूरी तरह से मादकता से भरा हुआ था इस नजारे को देखने पर से ही किसी भी मर्द का पानी छुट जाए लेकिन न जाने कैसे अंकित अपने आप पर काबू रखा हुआ था,,,,।

अब बारी थी पेटिकोट उतारते की अंकित अपने मन में सोच रहा था कि उसकी आंखों के सामने उसकी मां अगर पेटीकोट भी उतार देती तो कितना मजा आता है लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था हालांकि सुगंधा भी यही चाहती थी लेकिन वह अभी इतना नहीं खुली थी कि अपने बेटे के सामने सारी हदें पार कर देती,,, क्योंकि यह सब तो अंकित की जानकारी में हो रहा था अगर उसकी जानकारी में ना होता केवल सुगंध ही जानती तो शायद वह अपने बेटे के सामने नंगी होने में बिल्कुल भी देर ना करती क्योंकि ऐसा हुआ पहले भी कर चुकी थी लेकिन इस समय वह अपने बेटे की निगरानी में थी कुछ भी छुपा हुआ नहीं था उसका इस तरह से अपना पेटिकोट उतार कर नंगी हो जाना उसे भी दूसरी औरतों की श्रेणी में ला सकता था,,,,।

जरा टावल ला देना मैं भूल गई,,,,।

अभी लाया मम्मी,,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी मां के कमरे की तरफ जाने लगा और सुगंध उसे जाते हुए देखने लगी हालांकि स्पीच वह अपने बेटे के पेट में बने तंबू को भी बड़े अच्छे से देख रही थी और मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि वह जानती थी कि उसका लैंड किस लिए खाना है एक मर्द का लैंड किस वजह से खड़ा होता है यह वह अच्छी तरह से जानती थी वह समझ रही थी कि इस समय उसका बेटा उसमें एक मन नहीं बल्कि एक औरत के दर्शन कर रहा है इसलिए उत्तेजित हुआ जा रहा हैं और यही तो वह चाहती थी,,,,।

.............................
 
सुगंधा एक अद्भुत स्नान का प्रदर्शन करते हुए अपने बेटे की आंखों के सामने और उसका सहयोग प्रकार नहा चुकी थी लेकिन इस स्थान में इतनी मादकता इतनी उत्तेजना थी कि,, अगर मां बेटे दोनों मेंसे किसी को भी इस बात का एहसास होता कि दोनों एक दूसरे का साथ चाहते हैं दोनों संभोग सुख प्राप्त करना चाहते हैं तो नल से गिरने वाला पानी अंकित के मोटे तगड़े लंड से फुआरा बनके गिरता और बरसों से सुखी बंजर जमीन को हरी भरी कर देता,,,,।

लेकिन अफसोस इस बात का था कि दोनों मां बेटे भले ही एक दूसरे का सहयोग कर रहे थे एक दूसरे के अंगों को देख रहे थे लेकिन दोनों में से कोई भी एक दूसरे के मन की बात को मन की हालत को नहीं जानता था,, हालांकि ईस स्नान क्रिया में जितना दोनों बाहर के पानी से नहीं भेजे थे उतना अंदरूनी पानी से गीले हो चुके थे सुगंध तो बार-बार अपनी बुर से मदन रस बहा रही थी और अंकित भी मुंह के साथ-साथ लंड से भी लार टपका रहा था,,, वह इतना ज्यादा अत्यधिक उत्तेजना से सरोबोर था कि कभी-कभी तो उसे लगने लगता था कि कहीं उसके लंड की नशे ना फट जाए,,, लोहे के रोड से भी ज्यादा कड़कपन का एहसास उसे अपने लंड में हो रहा था,,,।

और सुगंधा अपने बेटे के पेट में बने तंबू को देखकर मन ही मन उत्तेजित हो जा रही थी इतना तो वह जानते ही थी कि उसके बेटे का लंड वाकई में कुछ ज्यादा ही लंबा और मोटा था जिसे वह अपनी आंखों से ही देख चुकी थी और उसे पर अपनी उंगली का स्पर्श भी करा चुकी थी,,, लेकिन अभी तक उसने खुलकर अपने बेटे के लंड के दर्शन नहीं किए थे इसलिए उसके मन में यह अभिलाषा पूरी तरह से जागरूक होती जा रही थी कि ना जाने कब उसे अपने बेटे के लंड के दर्शन करने को मिलेंगे,,, और इसी चाह में बार-बार उसकी बुर गीली हो जा रही थी,,,,। सुगंधा भी जीवन में पहली बार अद्भुत स्नान का आनंद ले चुकी थी आज तक उसने कभी भी अंकित के सामने इस तरह से स्नान नहीं की थी,,, हमेशा अंकित की नजरों से बचकर या यूं कहना कि अपनी खूबसूरत बदन को अपने जवान बेटे की नजरों से बचकर ही स्नान की थी नहीं उसके सामने कभी कपड़े भी बदली थी लेकिन आज हालात इस तरह से हो गए थे कि आज खुद अपने हाथों से अपने कपड़े उतार कर और अपने बेटे के सहयोग से वस्त्र को उतार कर उसके ही सहयोग से स्नान कर रही थी,,,।

एक तरफ जहां आनंद की अनुभूति में वह पूरी तरह से डूबती जा रही थी वहीं दूसरी तरफ उसे अपने बेटे पर गुस्सा भी आ रहा था,,, क्योंकि स्नान करते समय अपने बेटे को सहयोग के बहाने पूरी तरह से इशारा कर चुकी थी कि वह किसी भी तरह से उसके बदन से खेल सकता है उसे सहला सकता है दबा सकता है,,, लेकिन उसका बेटा बुद्धू की तरह कुछ ज्यादा उपभोग नहीं कर पाया था,,, लेकिन हां जिस तरह से साबुन लेने के लिए वह पेटीकोट में हाथ डालते हुए सीधा नीचे दोनों टांगों के बीच अपनी हथेली जमा दिया था उससे अभी भी सुगंधा के तन बदन में आग लग जा रही थी,,,, उसे अभी भी अपने बेटे की हथेली अपनी बुर के ऊपर महसूस हो रही थी,,, उसे पल को याद करके सुगंधा का मन एकदम गदगद हुआ जा रहा था,,, क्योंकि इस बात को सुगंध समझ नहीं पा रही थी उसका बेटा अनजाने भी उसकी बुर को साबुन के साथ तब उसे लिया था या जानबूझकर उसकी बुर को अपनी हथेली से दबोचा था,,,,।उफ्फ,,, अद्भुत एहसास,,,, काश अंकित उसके इशारों को समझ पाता,,,,, अपने मन में ही इस तरह की आशा जगाते हुए सुगंधा बोली,,,।

बाथरूम में अर्धनग्न अवस्था में सुगंधा नहा कर खड़ी थी उसके पतन से पानी की बूंदे मोती के दाने की तरह उसके खूबसूरत मखमली बदन से फिसल कर नीचे बाथरूम के फर्श पर गिर रहे थे,,, इस समय सुगंधा किसी चित्रकार के उन्मादकता भरे चित्र की तरह लग रही थी,,, किसी कलाकार की मूरत की तरह लग रही थी उसका गिला पेटिकोट उसके बदन से इस कदर चिपका हुआ था कि उसके अंग अंग को उजागर कर रहा था,,, इस अवस्था में कोई अगर उसे देख ले तो शायद उसके लंड का पानी अपने आप ही छूट जाए लेकिन न जाने कैसे अंकित अपने आप को संभाले हुए था अपनी मर्दानगी को काबू में किए हुए था वरना अंकित की जगह कोई और होता तो शायद बाथरूम के अंदर ही सुगंधा की चुदाई कर दिया होता और सुगंधा को तृप्त कर देता,,, और यही तो फर्क था दूसरे मर्द में और अंकित में,,,,।

अंकित टावल लेने के लिए अपनी मां के कमरे में आ गया था लेकिन इस बीच वहां जो कुछ भी बाथरुम में हुआ था उसके बारे में ही सोच कर मदहोश हुआ जा रहा था वह मन ही मन बहुत प्रसन्न था क्योंकि आज उसे अपनी मां को नहलाने के बहाने उसके खूबसूरत अंग पर अपने हाथ रखने का मौका जो मिला था उसे स्पर्श करने का एहसास ही कुछ और था,,,, अपनी मां की ब्रा की पट्टी खोलने में जिस तरह का उसे अद्भुत उत्तेजना का एहसास हुआ था उसने आज तक महसूस नहीं किया था और उसके खूबसूरत बदन पर साबुन लगाना सब कुछ अद्भुत था,,,, और जैसे ही अंकित को साबुन वाली बात याद आई तो वह एकदम से उत्तेजना के सागर में डूबने लगा क्योंकि उसे याद आ गया कि वह किस तरह से साबुन उठाते हुए अपनी मां की बुर को अपनी हथेली में दबोच लिया था पानी में डूबी होने के बावजूद भी उसकी मां की बुर कितनी गर्म थी इसका एहसास उसे अभी भी अपनी हथेली में हो रहा था,,,,। पेट में पूरी तरह से तंबू बना हुआ था लेकिन उसे छुपाने की दरकार अंकित बिल्कुल भी नहीं दे रहा था न जाने क्यों उसके मन में हो रहा था कि उसकी मां भी उसके पेंट में बना तंबू देखें ताकि कुछ बात आगे बढ़े जबकि उसे नहीं मालूम था कि उसकी मां तिरछी नजर से उसके पेंट में बने तंबू को ही देखकर मन ही मन उत्तेजित हुए जा रही थी,,। दोनों मां बेटे का अगर जान जाते की दोनों की मंजिल एक ही है तो शायद इस सफर का मजा और भी ज्यादा बढ़ जाता ,,, अंकित को टावल मिल चुकी थी क्योंकि उसकी मां की बिस्तर पर हुई थी वह जल्दी से टावर लेकर अपनी मां के कमरे से बाहर निकल गया,,,।

टावल लेकर जैसे ही वह अपनी मां के करीब पहुंचा तो उसकी नजर अपनी मां की भारी भरकम गोलाई लिए हुए छाती पर पडी ,,,, और उसकी पेटीकोट से उसकी भारी भरकम खरबूजा जैसी चूजियां एकदम से उजागर हो रही थी उनका जाकर उनके क्षेत्रफल सब कुछ एकदम साफ नजर आ रहा था यहां तक की चूचियों के बीच की शोभा बढ़ा रही उसकी किशमिश के दाने की तरह निप्पल कैडबरी चॉकलेट की तरह एकदम से बाहर आने को अातुर नजर आ रही थी,,, अंकित देखा तो देखा ही रह गया और साथ ही उसकी नजर जैसे ही अपनी मां की दोनों टांगों के बीच गई तो देखा की गली पेटिकोट उसकी मां की दोनों टांगों के बीच ऐसी चिपकी थी कि जानवर और कमर के बीच त्रिकोण आकार एकदम साफ नजर आ रहा था और उसे यह भी दिखाई दे रहा था कि उसकी मां की बुर कौन सी जगह पर है क्योंकि वह भी कचोरी की तरह फुल कर एकदम से उजागर हो रही थी,,,।

अंकित अपनी मां को टॉवल देना ही भूल गया था वह अपनी मां की खूबसूरती में पूरी तरह से डूब चुका था उसकी मां भी यह देख रही थी और मन ही मन प्रसन्न हो रही थी वह जानती थी कि उसका बेटा क्या देख रहा है इसलिए अपने बेटे की तड़प और ज्यादा बढ़ाते हुए सुगंधा पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी बुर को खुजलाने का नाटक करते हुए बोली,,,।

अरे क्या देख रहा है देना टावल,,,,

(अपनी मां की बात सुनकर जैसे कोई नींद से उसे एकदम से झकझोर कर जगा दिया हो वह ऐसे हड़बड़ाहट भरे स्वर में बोला,,,)

ओ,,,,, हां,,,,,,, ये लो टॉवल,,,(अपनी मां की तरफ टॉवल बढ़ाते हुए बोला और उसकी मां मुस्कुराते हुए अपने बेटे के हाथ से टॉवल को ले ली और उसे अपनी खूबसूरत बदन पर लपेटने लगी वह अपने बदन पर टॉवल को लपेटकर टावर को एक हाथ से पकड़ कर अपनी पेटी कोट को नीचे की तरफ खींच रही थी,,, यह नजारा देखकर अंकित की तो सांसे ऊपर नीचे होने लगी एक पल को ऐसा लगा कि अपनी मां की आंखों के सामने अपने लंड को बाहर निकाल कर मुठ मार ले क्योंकि उसे इस उत्तेजना की गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी वह पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था इतना अद्भुत नजारा इतना कामुकता भरा दृश्य तो उसने गंदी किताब में भी नहीं देखा था,,, अंकित की हालत बद्तर हुए जा रही थी,,, अंकित अपनी मां की खूबसूरत बदन पर से बिल्कुल भी नजर नहीं जाता रहा था वह अपनी मां को ही देख रहा था और सुगंधा भी उसकी हरकत पर उसे बिल्कुल भी टॉप नहीं रही थी क्योंकि उसे भी बहुत मजा आ रहा था अपने जवान बेटे के सामने कपड़े बदलने में कैसा अनुभव होता है कैसा एहसास होता है आज उसे अच्छी तरह से मालूम हो रहा था,,, देखते ही देखते सुगंधा अपनी पेटीकोट को उतारकर कपड़े के देर में रखती और टावर को अच्छी तरह से अपनी चूचियों के आधे भाग पर लाकर उसे लपेट दी आधा भाग अभी भी उसकी नजर आ रहा था और इस अवस्था में उसकी चूची एकदम पपाया की तरह नजर आ रही थी यह देखकर अंकित मन ही मन सोच रहा था कि काश इतनी बड़ी-बड़ी चूचियां उसे पकड़ने को मिल जाती तो कितना मजा आता,,,,।

अपने बदन पर टावल लगाकर,,, सुगंधा सामने की दीवार की तरह मुंह करके खड़ी हो गई और कपड़े धोने के लिए नीचे बैठ गई और उसके नीचे बैठते ही उसके नितंबों का आकार एकदम से उजागर हो गया टॉवल उसकी गांड को छुपाने में छोटी पड़ गई और अपनी मां की नंगी गांड और उसकी गांड की गहरी दरार को देखकर अंकित से रहा नहीं गया और वह अपने लंड पर हाथ रखकर उसे दबा दिया,,, और अपनी मां के खूबसूरत जवानी को निहारने के चक्कर में वह यह भूल गया कि उसकी मां कपड़े धोने जा रही थी,,, और वह ऐसा नहीं चाहता था क्योंकि वह जानता था किसकी मां की तबीयत खराब है इसलिए वह तुरंत आगे बढा और अपनी मां को रोकते हुए बोला,,,।

अरे अरे क्या कर रही हो मम्मी मैं धो दूंगा,,, तुम्हें कपड़े धोने की जरूरत नहीं है जाकर आराम करो,,,।

अरे नहीं रे मुझे धोने दे अच्छा थोड़ी लगता है कि मेरे कपड़े तु धोए,,,,(ऐसा कहकर वह अपनी साड़ी को अपने पास खींच कर उसे पर साबुन लगाने ही वाली थी कि अंकित अपना हाथ बढ़ाकर अपनी मां की बांह पकड़ लिया और उसे रोकते हुए बोला,,,)

नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं मैं हमेशा के लिए थोड़ी कह रहा हूं अभी तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए कह रहा हूं मैं तुम्हें कपड़े नहीं धोने दूंगा तुम चलो कमरे में आराम करो,,,,।

(अंकित का इस तरह से उसे कपड़े धोते हुए रोकना उसे बहुत अच्छा लग रहा था वह मन ही मन बहुत खुश हो रही थी लेकिन तभी उसकी नजर अपनी उतरी हुई चड्डी पर पड़ी तो वहां हाथ आगे बढ़कर अपनी चड्डी को अपने हाथ में ले ली और उसे धोने के लिए जैसे ही साबुन हाथ में उठाई फिर से उसे अंकित रोकने लगा,,,,)

नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं तुम अपने कमरे में चलो आराम करो मैं कपड़े धो दूंगा,,,,।

अरे हाथ धो देना लेकिन इसे तो धोने दे,,,(पेंटी की तरफ हाथ आगे बढ़ाकर वह बोली वह जानबूझकर अंकित का ध्यान अपनी पैंटी पर ले जा रही थी और अंकित भी अपनी मां के हाथ में उसकी चड्डी देखकर मदहोश होने लगा था और उसे धोने का सुख प्राप्त करना चाहता था इसलिए बोला,,,)

कोई बात नहीं मैं धो दूंगा तुम चलो अपने कमरे में,,,,।

अरे बेटा इसे तो धोने दे,,,,।

नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं तुम अपने कमरे में चलो बस,,,(इतना कहते हुए वह अपनी मां का हाथ पकड़ कर उसे खड़ी कर दिया उसकी जीत देखकर सुगंधा मन ही मन प्रसन्न भी हो रही थी और उत्तेजित भी हो रही थी,,, लेकिन फिर भी आशंका जताते हुए बोली,,,)

अरे बेटा समझने की कोशिश कर अगर किसी को पता चल गया कि तू मेरे कपड़े धोया है तो लोग क्या समझेंगे,,,,।

अरे वाह लोग क्या समझेंगे,,, इसमें क्या लोग समझेंगे,,,, और वैसे भी लोगों को कहां पता चलेगा कि कपड़े कौन धोया है,,,।

लेकिन अगर तृप्ति को पता चल गया तो की मेरे कपड़े तूने धोया है और साथ मेंमेरी चड्डी भी तो वह क्या समझेगी,,,,(सुगंधा जानबूझकर इस बार खुले सकते हैं अपने अंतर्वस्त्र का नाम ली थी और वाकई में इसका असर अंकित के मन पर बहुत ही गहरा पड़ा था अपनी मां के मुंह से चड्डी शब्द सुनकर उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी थी,,, हालांकि इस दौरान सुगंधा की नजर बराबर अपने बेटे की पेंट के ऊपर थी जिसमें अच्छा खासा तंबू बना हुआ था और उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि वाकई में उसके बेटे के पेट में लंड नहीं बैल को काबू करने वाला खुंटा छुपा हुआ है,,, अपनी मां की बात सुनकर अंकित बोला,,,)

दीदी को बताना ही नहीं ना,,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा मन ही मन खुश हो रही थी क्योंकि इस बात की तसल्ली ठीक है उसके बेटे को इतना तो पता था कि कौन सी बात बतानी चाहिए कौन सी बात छुपानी चाहिए,,,,,,, वह इस बात से खुशी की उसका बेटा यह बात जानता है की औरतों के अंग वस्त्र को धोना उनकी पेंटिं धोना उनकी ब्रा धोना,, कुछ हद तक उचित तो है लेकिन उसे किसी को बताना उचित नहीं है और इस बात से सुगंधा भी खुश थी कि बाथरूम में जो कुछ भी हो रहा है वह किसी को पता नहीं चलेगा,,, अपने बेटे की बात सुनकर मुस्कुराते हुए सुगंधा बोली,,,)

चल कोई बात नहीं किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा बस,,,,, अच्छा मैं अपने कमरे में जाती हूं,,,,(इतना कहकर वह अपने कमरे की तरफ जाने लगी लेकिन उसके मन में युक्ति चल रही थी वह जानती थी कि उसे क्या करना है और जैसे ही तो कदम आगे बढ़ी थी कि उसके बदन से टावल एकदम से खुलकर उसके पैरों में जा गिरी और वह एकदम से नंगी हो गई,,,। पल भर में ही नजारा पूरी तरह से बदल गया,,, अंकित की तो हालत एकदम से खराब हो गई उसकी आंखें फटी की फटी रह गई उसकी आंखों के सामने उसकी मां पूरी तरह से नंगी खड़ी थी उसका टावल उसके बदन से सरक कर नीचे गिर गया था,,, जो कि यह सब सुगंधा की ही चाल थी सुगंधा जानबूझकर अपनी टावेल खोल दी थी जानबूझकर अपने बेटे के सामने संपूर्ण रूप से नंगी हो गई थी,,, अंकित की नजर अपनी मां के नंगे बदन से हटा ही नहीं रही थी वह आश्चर्य से मुंह खोल अपनी मां की नंगी जवानी कोई देख रहा था एकदम गदराया बदन,,, गोरी गोरी काया ,,मांसल देह,,, बदन के हर कोने से जवानी का रस टपक रहा था,,, अपनी मां की नंगी बड़ी-बड़ी गांड को देखकर अंकित की हालत और ज्यादा खराब हो गई बहुत पूरी तरह से पागल होने लगा,,,।
 
अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें बस वह अपनी मां को देखे जा रहा था,,, और सुगंध भी अपने बेटे की तरफ इस तरह से आश्चर्य से देख रही थी कि मानो यह क्या हो गया कह रही हो,,,, कुछ क्षण तक वह जानबूझकर अपने बेटे की आंखों के सामने एकदम नग्नवस्था में खड़ी रही और फिर जैसे उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसके बेटे ने उसकी नंगी जवानी के दर्शन कर ली है वह तुरंत नीचे झुक गई और नीचे झुकता ही उसकी गोल-गोल गाने एकदम से उभर कर चांद की तरह नजर आने लगी जिसे देखकर अंकित कहां अपने आप उसके लंड पर आ गया और उसके हरकत नीचे झुकने पर चोर नजरों से सुगंधा ने देख ली थी और उसके बेटे की हरकत उसके बदन में मदहोशी भर गया वह समझ गई कि उसका बेटा उसको देखकर अपने लंड पर हाथ क्यों रख रहा है,,,, वह तुरंत टावल को उठाई और फिर अपने नंगे बदन पर लपेटकर अपने कमरे की ओर चली गई,,,,।

लेकिन जाते-जाते अपने बेटे की हालात पूरी तरह से खराब कर गई थी कुछ देर तक अंकित अपनी मां के कमरे की तरफ देखता रह गया दरवाजा बंद हो चुका था पहचानता था कि उसकी मां अपने कपड़े बदल रही होगी लेकिन उसे कपड़े धोना था गहरी सांस लेकर वह बाथरूम में बैठकर अपनी मां के कपड़े धोने के लिए या उसका पहला अनुभव था जब वह अपनी मां के कपड़े धो रहा था एक औरत के कपड़े धो रहा था,,,, औरत के कपड़े धोने में कैसा अनुभव होता है आज से पहली बार एहसास हो रहा था उसे उत्तेजना का अनुभव रहा था वह अपनी मां की साड़ी पेटिकोट धोने के बाद अपनी मां की ब्रा हाथ में ले लिया वह अपनी मां की ब्रा को हाथ में लेकर पूरी तरह से उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंचने लगा,,,,

अंकित के दिल और दिमाग पर वासना पूरी तरह से घर कर गया था वह अपनी मां की ब्रा को अपनी नाक से लगाकर सुंघ रहा था,,, ब्रा के कप को दोनों हाथों में लेकर इस तरह से दबा रहा था कि मानो जैसे उसके हाथ में उसकी मां की ब्रा नहीं बल्कि उसकी मां की चूचियां आ गई हो इस हरकत से वह मदहोश हुआ जा रहा था उसे बहुत मजा आ रहा था और फिर उसे धोने के बाद वह अपनी मां की पेंटिं को अपने हाथ में ले लिया और पेंटी के हाथ में आते हैं उसके लंड में हरकत बढ़ने लगी,,, उसका लंड ऊपर नीचे होने लगा ऐसा लग रहा था कि मानो उसका लंड उसकी मां की पेटी को सलामी भर रहा हो,,,, अंकित अच्छी तरह से जानता था कि उसके हाथ में उसकी मां के अंग का कौन सा वस्त्र है इसलिए उसकी उत्तेजना और भी ज्यादा बढ़ती जा रही थी,,,।

वह अपनी मां की चड्डी को दोनों हाथों में लेकर इधर-उधर घूम कर देख रहा था कि तभी उसकी नजर उसकी मां की चड्डी के छोटे से छेद पर गई और उस छेंद को देखते ही उसके लंड की अकड़ एकदम से बढ़ गई मानो कि जैसे उसने अपनी मां की चड्डी में छेद नहीं बल्कि अपनी मां का गुलाबी छेद देख लिया हो,,,,

अपनी मम्मी की चड्डी को हाथ में लिए हुए वह बार-बार बाहर की तरफ देख ले रहा था कि तुम उसकी मां तो नहीं आ रही है,,,, वह अच्छी तरह से जानता था कि इस चड्डी में उसकी मां का सबसे बेश कीमती खजाना छुपा हुआहोता है,,, उसकी बुर और गांड जो मर्दों की उत्तेजना को हमेशा बढ़ा देती है,,,। अंकित अपना होश खो रहा था,,, उसके हाथ में उसकी मां की पेटी थी लेकिन उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे दुनिया का सबसे बेश कीमती खजाना उसके हाथ लग गया हो,,,

अपनी मां की चड्डी को हाथ में लेकर हुआ बार-बार अपने लंड को दबा दे रहा था उसके मन में अजीब सी हलचल हो रही थी वह कुछ कर गुजरना चाहता था बार-बार वह अपनी मां की पेटी के छेद में अपनी उंगली डालकर उसे अंदर बाहर कर रहा था और ऐसा एहसास कर रहा था कि मानो जैसे वह अपनी उंगली को चड्डी के छेंद में नहीं अपनी मां के गुलाबी छेद में अंतर बाहर कर रहा हो,,, वह बार-बार दरवाजे की तरफ देख ले रहा था उसे डरता कि कहीं उसकी मां आ जाए,,, और उसे अपनी पेंटी के साथ इस तरह की हरकत करता हुआ देखकर पकड़ ना ले नहीं तो क्या समझेगी,,, लेकिन उसकी उत्तेजना कम नहीं हो रही थी जो कुछ भी उसने बाथरूम में देखा था जिस तरह का सहयोग उसने अपनी मां को दिया था उसे देखते हुए और अभी-अभी कुछ देर पहले टावल के गिर जाने से अपनी मां के नंगे बदन के दर्शन करके जिस तरह की उत्तेजना का अनुभव कर रहा था उसे शांत करना उसके लिए बहुत जरूरी हो गया था,,,,

इसलिए वह कुछ करना चाहता था और वह धीरे से उठकर खड़ा हूं क्या उसके एक हाथ में में उसकी मां की चड्डी थी पर दूसरे हाथ से वह अपने पेट को खोलकर नीचे कर दिया और उसका लंड एकदम से आजाद हो गया अपने लंड को देखकर अंकित को लग रहा था कि जैसे आज कुछ ज्यादा ही मोटा और लंबा हो गया है,,,, एक नजर दरवाजे पर रखकर वह अपनी मां की चड्डी को अपने लंड पर लपेटने लगा,,,,, यह क्रिया उसके लिए बेहद अद्भुत थी ,,,और वह पहली बार इस तरह की क्रिया अपनी मां की पेंटिं लेकर कर रहा था,,,, वह उसे पूरी तरह से लपेटकर उसे मुट्टी में भरकर मुठिया रहा था,,, उसे बहुत मजा आ रहा है आनंद की पराकाष्ठा उसे महसूस हो रही थी वह परम आनंद में खोने लगा था,,, कुछ देर तक कोई इसी तरह से अपने लंड पर पेंटिं लपेटे मुठीयाता रहा,,,,।

अंकित आज तक ऐसी हरकत नहीं किया था हालांकि मुठ तो मरने लगा था लेकिन अपनी मां के अंतर्वस्त्र को लेकर कभी इस तरह की क्रिया किया नहीं आज पहली बार वह अपनी मां की उपयोग में ली हुई पेटी से हस्तमैथुन कर रहा था और उसे बेहद मेहनत की प्राप्ति हो रही थी लेकिन तभी उसे याद आया कि उसकी मां की पेंटिं में छोटा सा छेद है,,,, और उसका दिमाग बड़ी तेजी से दौड़ने लगा,,,, उसने तुरंत अपने लैंड पर से अपनी मां की चड्डी को हटाया और उसे दोनों हाथों से खोलकर उसके छेद को देखने लगे और उस छेंद को देखकर उसके चेहरे पर कामुक मुस्कान तैरने लगी,,, इस समय अपनी मां की चड्डी का छोटा सा छेंद उसे छेंद नहीं बल्कि अपनी मां का गुलाबी छेद नजर आ रहा था,,, अब उसका धैर्य जवाब देने लगा,,, उसके कल्पनाओं का घोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ने लगा चड्डी के अंदर का छोटा सा छेद उसे अपनी मां की बुर का छेद नजर आ रहा था जो उसकी आंखों के सामने थी अब वह अपने आप को रोक नहीं सकता था,,,, आज वह अलग तरीके से मुठ मारना चाहता था।

अंकित बार-बार दरवाजे की तरफ देख ले रहा था लेकिन पूरी तरह से जगह पर सन्नाटा छाया हुआ,, था,,, इसलिए उसकी हिम्मत बढ़ने लगी थी लेकिन वह यह भी जानता था की चड्डी का छोटा सा छेद उसके लंड के सुपाड़े से बहुत छोटा था,,, अगर वह उसमें अपना लंड प्रवेश कराएगा तो उसका छेद और ज्यादा बढ़ जाएगा,,,, इस बात को अच्छी तरह से समझना लेकिन वासना का भूत उसके दिलों दिमाग पर पूरी तरह से हावी हो चुका था,,, इसलिए अपनी चड्डी में हुए छोटे से छेद को जब एकदम बड़ा हुआ छेंद देखेगी तो उसकी मां क्या सोचेगी,,, अब इसकी फिकर उसे बिल्कुल भी नहीं थी,,, उसे तो बहुत जल्दबाजी थी छोटे से छेद में अपने लंड को डालने में क्योंकि इस समय उसकी मां की चड्डी का छोटा सा छेंद उसके लिए उसकी मां की बुर से कम नहीं था,,,।

अंकित तैयार हो चुका था एक नए अनुभव के लिए,,, इसलिए वह दोनों हाथ से अपनी मां की चड्डी पकड़ कर उसमें अपना लंड प्रवेश कराने लगा,,, सूपाड़ा के प्रवेश करते ही छोटा सा छेद बड़ा होने लगा,,, और अंकित अपने मन में कल्पना करने लगा कि उसकी मां की बुर उसके लंड डालने से फैलती चली जा रही है,,, धीरे-धीरे करके वह अपना समुचा लंड अपनी मां की चड्डी के छोटे से सुराख में डालकर उसे फैलाता चला गया,,,, इस क्रिया को करने में अंकित पूरी तरह से मदहोश हुआ जा रहा था उसकी कोई आनंद की पराकाष्ठा नहीं थी वह मदहोश चुका था पागल हो चुका था उसके दिलों दिमाग पर वासना पूरी तरह से सवार हो चुकी थी और देखते ही देखते वह अपनी मां की बुर समझ कर अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया,,,, और उसकी उत्तेजना इतनी अत्यधिक थी बहुत ही जल्द उसके अंदर से वीर्य पात हो गया,,,।

जैसे ही उसकी दिलो दिमाग से वासना का भी कितना बड़ा कर चुका था अब उसे थोड़ा डर लगने लगा क्योंकि उसकी मां क्या सोचेगी,,, लेकिन इसके लिए भी वह अपने मन में उपाय सोच लिया था और वह कपड़े धोकर छत पर सूखाने के लिए चला गया,,,।

..............................
 
अंकित कपड़े धोते समय अपनी मां की चड्डी को देखकर अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव करने लगा था और वह अपनी मां की चड्डी के साथ मनमानी कर चुका था उसके छोटे से छेद को अपने लंड की मोटाई की रगड़ से उसे और भी बड़ा बना दिया था,,,, और इस समय सुगंधा की चड्डी उसे कुंवारी लड़की की बुर तरह हो गई थी जो सुहागरात से पहले एकदम कसी हुई होती है लेकिन सुहागरात की रात के बाद से ही ढीली हो जाती है,,,, अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां उसकी चड्डी के छोटे से खेत को बड़ा छेद हुआ देखकर जरूर उससे पूछे कि यह क्या हुआ है और इसके लिए उसने अपने मन में जवाब भी ढूंढ लिया था,,,।

सुगंधा अपने कमरे में ही थी जिस तरह का नजारा उसने अपने बेटे को दिखाई थी वह जानती थी कि उसकी जवानी का जलवा देखकर उसका बेटा चारों खाने चित हो गया है,, वह अपने मन में बहुत खुश थी क्योंकि आज के दिन वह कुछ ज्यादा ही अपने बेटे से खुल गई थी,,, बातचीत में अभी इतना नहीं खुली थी लेकिन अपने बेटे के सामने कपड़े उतारना बदलना नहाना इन सब में वह धीरे-धीरे खुलती चली जा रही थी,,, और उसे पूरा यकीन था कि एक दिन जिस तरह से वह अपने बेटे के सामने खुलती चली जा रही है एक दिन जरूर उसका बेटा अपने हाथों से उसकी दोनों टांगें खोलेगा और उस दिन का उसे बेसब्री से इंतजार भी था,,,,,, सुगंधा अपने बदन में उत्तेजना का संचार होता हुआ महसूस कर रही थी आज बाथरूम के अंदर जो कुछ भी हुआ वह उसकी सोच से बिल्कुल पड़े था वह कभी सोची भी नहीं थी कि हालात इस कदर से उसके पक्ष में आ जाएंगे कि जो वह चाहती है वह खुद अपने बेटे की आंखों के सामने करेगी वह कभी सोची नहीं थी कि बाथरूम के अंदर वह अपने बेटे की आंखों के सामने ही अपने बदन से धीरे-धीरे अपने कपड़े उतरेगी नहाएगी उसके सामने अपनी चड्डी उतारेगी यह सब सो कर ही उसके बदन में गर्मी छा रही थी,,,।

अपने बेटे के सामने संपूर्ण रूप से नंगी हो जाने का ख्याल उसके मन में बिल्कुल भी नहीं था वह सिर्फ इतना चाहती थी कि उसके बेटे के सामने वह नहाएगी,,, उसकी सोने से तो सब कुछ सामान्य लग रहा था लेकिन जैसे-जैसे वहां अपने बदन से कपड़े उतारती गई वैसे-वैसे उसकी टांगों के बीच की गली गीली होती चली गई,,, अपने बेटे की आंखों के सामने अपनी चड्डी उतरना उसे और भी ज्यादा मदहोशी से भरता चला गया था,,, और अपने बदन से अपने बेटे की आंखों के सामने चड्डी उतारते हुए उसके मन में यही ख्याल आ रहा था कि क्यों ना वह अपने बेटे के सामने पूरी तरह से नंगी हो जाए लेकिन इस समय तो वह ऐसा कर नहीं सकती थी क्योंकि वह अपनी पेटीकोट को अपने बदन के नंगेपन को ढकने का सहारा जो बना रखी थी अगर वह उसी समय अपनी बदन पर से पेटीकोट भी उतार कर फेंक देती तो उसका बेटा क्या समझता है वह यही समझता कि फिर उसे अब तक बदन पर चढ़ाई रहने का क्या फायदा है उतार कर ही नहरी होती जब उतारने का ही था तो,,,, वह किसी और बहाने से अपनी बेटी के सामने नंगी हो जाना चाहती थी अपनी खूबसूरत बदन के हर एक हिस्से को दिखा देना चाहती इसलिए टॉवल से अच्छा कारण उसे कोई दिखाई नहीं दे रहा था,,,।

इसलिए कपड़े उतार कर टावल को लपेटकर,, वह अपने मन में दृढ़ निश्चय कर ली थी कि आज वह अपने बेटे की आंखों के सामने पूरी तरह से नंगी हो जाएगी ऐसा नहीं था कि वह अपने बेटे के सामने पहली बार नंगी हो रही थी ऐसा वह बाथरूम के अंदर पहले भी कर चुकी थी लेकिन उसे समय उसकी जवानी का जलवा उसका एक खूबसूरत हमको का नजारा उसका बेटा बाथरूम के दरवाजे के छोटे से छेद से देख रहा था लेकिन वह अपने बेटे के सामने बिना किसी रूकावट के नंगी हो जाना चाहती थी ताकि उसके बेटे की आंखों में पूरी तरह से वासना उतर जाए वह उसे देखा ही रह जाए उसकी जवानी का रस अपनी आंखों से पीने के लिए मजबूर हो जाए,,, इसलिए टावल लपेटकर जैसे ही अपने कमरे की तरफ आगे बढ़ने लगी वह बड़ी सफाई से अपने बदन पर से टावल को एकदम से ढीला कर दी और टॉवल भी उसकी बात मानते हुए एकदम से उसके बदन से भर भरा कर नीचे उसके कदमों में जा गिरा और उसके खूबसूरत बदन को उजागर कर दिया,,, उस समय सुगंधा भी पूरी तरह से उत्तेजना और मदहोशी में डूब चुकी थी वह प्यासी आंखों से अंकित की तरफ देखने लगी अंकित उसे ही देख रहा था,,,। सुगंधा को अपने बेटे की आंखों में अपनी जवानी के लिए वासना एकदम साफ नजर आ रही थी और यह देखकर सुगंधा अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रही थी,,,। सुगंधा को इस बात का एहसास बड़े अच्छे से हो रहा था, वह जानती थी कि जिस तरह की वासना उसे अपने बेटे की आंखों में दिखाई दे रही है अगर वह उसे इशारा करके अपने कमरे में बुला ले तो उसका बेटा खुशी-खुशी उसके कमरे में आ जाएगा और उस पर चढ़े बिना नहीं रह पाएगा,,, लेकिन अभी इतनी जल्दी वह ऐसा करना नहीं चाहती,,,।

ऐसा लग रहा था की सुगंधा के जीवन में यह बुखार बहुत बड़ा बदलाव लेकर आई थी ना तो इससे पहले कभी सुगंध इस तरह से बीमार पड़ी थी और ना ही उसे मौका मिला था अपने बेटे के सामने इस तरह से खुलने का,,, और उसका बेटा भी इस मौके का बहुत अच्छे से फायदा ले रहा था,,,, इस बात को सोचकर उसके तन-बदन में अजीब सी हलचल मच जाती थी की दवा खाने के बाथरूम में उसका बेटा उसकी चड्डी उतारते समय क्या-क्या सोच रहा होगा,,, भले ही उसे समय वह ज्यादा बीमार थी उसे कुछ होश नहीं था लेकिन उसका बेटा तो पूरे हो तो हवास में था वह तो अपने होश में ही उसकी चड्डी अपने हाथों से उतार रहा था चड्डी उतारने में एक मर्द को कितना आनंद आता है इस बात को सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी,,, भले ही इस सुख को उसके पति ने ना भोगा हो लेकिन मर्दों की फितरत से वह धीरे-धीरे अच्छी तरह से वाकिफ हो गई थी,,,।

छत पर कपड़े सूखने के लिए डालने के बाद अंकित अपनी मां के कमरे में नहीं गया था,,,, वह कुछ हद तक शर्मिंदा भी था इसलिए अपनी मां से नजर मिलाने से कतरा रहा था और इस समय वह क्यों शर्मा महसूस कर रहा है इस बात को वह भी नहीं जानता क्योंकि उसके और उसकी मां के बीच बहुत कुछ हो चुका था कपड़ों का उतारना,, उसको नहीं लाना,,, उसके कपड़े धोना उसे नग्न अवस्था में देखना सब कुछ लेकिन फिर भी वासना का बहुत सर से उतर जाने के बाद उसे थोड़ी बहुत शर्मिंदगी का एहसास हो रहा था क्योंकि वह जानता था कि जो कुछ भी वह अपनी मां के बारे में सोच रहा है या उसके बारे में उसके मन में गलत भावना जाग रही है यह सब कहीं ना कहीं गलत है ऐसा मां बेटे के बीच बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए लेकिन फिर भी यह सब करने में उसे बहुत मजा आ रहा था आनंद आ रहा था और इसीलिए वह इस बारे में घर के बाहर इधर-उधर घूमते हुए सोच रहा था,,,।

वह यह सोचकर हैरान हो रहा था कि क्या मां बेटे के बीच जिस्मानी ताल्लुकात सही है या गलत,, क्या बेटे को चाहिए कि वह अपनी मां के साथ संभोग करे उसके साथ शरीर संबंध बनाए ,,, यह सब किस हद तक सही है,,,, क्या कोई मां होगी जो अपने बेटे के साथ चुदवाना चाहेगी,,,,,, बरसों से अपनी प्यासी जवानी की प्यास बुझाना चाहेगी,,,,, राहुल और उसकी मां के बीच उन्हें देखकर तो ऐसा ही लगता है कि उन दोनों के बीच ऐसा ही संबंध है राहुल की बातें सुनकर ऐसा ही लगता है कि वह अपनी मां को जरूर चोदता होगा उसकी मां भी तो उससे बहुत खुश रहती है,,, यह सब सो कर उसका दिमाग काम करना बंद कर दिया था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए,,,,, अपने ही सवाल का जवाब अपने मन में ही देते हुए वह बोला अगर चार दिवारी के अंदर मां बेटे के बीच इस तरह का रिश्ता कायम हो जाता है तो भला किसे पता चलने वाला है ऐसा तो है नहीं की औरतों को मर्द की जरूरत नहीं होती,, मां को भी एक मर्द की जरूरत है और वह जरूरत वह पूरी कर सकता है,,,,,, लेकिन क्या इसके लिए मन तैयार होगी,,,,? जरूर होगी क्यों नहीं होगी,,,, यही सब सो कर उसका दिमाग खराब हुआ जा रहा था उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,,, वह अपने मन में यही सोच रहा था कि भले वह कुछ भी सोच लेकिन हालात तो दोनों के बीच इस तरह से बनते चले जा रहे हैं कि एक नई दिन जरूर दोनों के सब्र का हाथ टूट जाएगा और दोनों एक हो जाएंगे और उसे दिन का उसे भी बड़ी बेसब्री से इंतजार था लेकिन जिस तरह का सफर जारी था उसका आनंद वह पूरी तरह से लेना चाहता था इसीलिए इधर-उधर टहलते हुए जब शाम ढलने लगी तो वह घर पहुंच गया,,,,।

घर पर पहुंच कर देखा तो उसकी मां कुर्सी पर बैठकर आराम कर रही थी,,,, अपनी मां को देखते ही अंकित के चेहरे पर प्रश्ननता के भाव नजर आने लगे और वह एकदम से उसके पास जाकर उसके माथे पर अपना हाथ रखकर बोला,,,।

आप कैसी तबीयत है तुम्हारी मम्मी,,,।

ठीक है इसलिए तो यहां पर बैठी हूं नहीं तो बिस्तर पर पड़ी रहती,,,।

चलो अच्छा है कि आराम हो गया बिस्तर पर बीमार होकर पड़े रहने से अच्छा है कि इधर-उधर घूमते रहो,,,, अच्छा तुम यहीं बैठो तब तक में कपड़े उतार कर लाता हूं,,,।

रुक मैं भी चलती हूं थोड़ा सा हवा भी लग जाएगा छत पर,,,,।

चलो ठीक है,,,, सहारा देना पड़ेगा,,,,

नहीं नहीं अब आराम है मैं चल लूंगी,,,

ठीक है,,, लेकिन तुम आगे आगे चलो मैं पीछे-पीछे चलता हूं,,,, कहीं चक्कर आ गया तो संभाल लूंगा,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी और वह मुस्कुराते हुए बोली,,)

तू मेरा कितना ख्याल रख रहा है,,, तू सच में बहुत बड़ा हो गया है मुझे तुझे कर सके एकदम बच्चा ही समझती थी लेकिन जिस तरह से तूने मुझे संभाला है,,,, मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है,,,।

यह तो मेरा फर्ज है मम्मी,,,,

तेरा फर्ज तो बहुत कुछ बनता है अभी तो बहुत फर्ज निभाना बाकी है,,,,(इतना कह कर वह सीढ़ियां चढ़ने लगी,,, और अंकित उसके पीछे-पीछे सीढियां चढ़ता हुआ आश्चर्य जताते हुए बोला,,,)

कौन सा फर्ज मम्मी,,,,।

अरे बहुत सब फर्ज है बेटा यह तो बीमार होने पर का फर्ज निभाया है तुने ,,, ऐसे छोटे-बड़े बहुत से फर्ज हैं जो समय आने पर तुझे खुद ही पता चल जाएगा,,,।

(सुगंधा बातों ही बातों में अंकित को इशारा दे रही थी लेकिन की समझ नहीं पा रहा था वह सीढ़ियां चढ़ती हुई अपनी मां के गोलाकार नितंबों की खूबसूरती में और फर्ज निभाने के उलझन में उलझ कर रह गया था और अपनी मां के कहने के असली मकसद को समझ नहीं पा रहा था,,,, सीढ़ीया चढ़ती हुई उसकी मां इस समय बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही थी उत्तेजक बदन की महिला होने के साथ-साथ बड़ी गांड वाली औरत की थी और सीढ़ियां चढ़ते समय उसकी गांड की दोनों फाके आपस में इस कदर ऊपर नीचे होकर रगड़ खा रही थी कि कसी हुई साड़ी में उसके उभार एकदम साफ नजर आ रहे थे,,, अभी कुछ घंटे पहले वह अपनी मां को पूरी तरह से नंगी देख चुका था लेकिन फिर उसकी प्यास थी कि खत्म नहीं हो रही थी की साड़ी में भी अपनी मां के नितंबों को देखकर वह उत्तेजित हुआ जा रहा था,,, देखते ही देखते दोनों छत पर पहुंच गए,,,।

छत पर पहुंच कर सुगंधा देखी कि उसके बेटे ने धुले हुए कपड़ों को बड़े अच्छे से रस्सी पर डाल कर रखा था ऐसा लगी नहीं रहा था कि जैसे वह पहली बार रस्सी पर कपड़े सुखाने के लिए डाला हो,,, कैसा लग रहा था कि मानो जैसे यह उसका रोज का काम है लेकिन हकीकत यही था कि वह पहली बार कपड़ों को रस्सी पर सूखने के लिए डाला था,,,, यह देखकर सुगंधा खुश होते हुए बोली।

बहुत अच्छे चलो एक काम से तो मुझे छुटकारा मिल जाएगा,,,।

कौन से काम से मम्मी,, (ऐसा कहते हुए वह दूसरे छोर पर पहुंचकर वहां से धीरे-धीरे कपड़े उतारने लगा और उसकी मां एक किनारे से कपड़े को उतारने लगी)

यही कपड़े सुखाने के काम से,,,।

कोई बात नहीं मुझे तो अच्छा लगता है तुम्हारे काम में हाथ बंटाना,,,।

तो पहले क्यों नहीं बंटाता था,,,।

पहले कभी मौका ही नहीं मिला वैसे भी दीदी सारा काम कर देती थी तो मुझे कुछ करने को रहता ही नहीं था,,,,.।

चल अब तो करेगा ना,,,(धीरे-धीरे रस्सी पर से कपड़े उतारते हुए सुगंधा बोली धीरे-धीरे दोनों करीब आते जा रहे थे दोनों के बीच के दूरी तकरीबन डेढ़ मीटर जितनी ही रह गई थी मौसम सुहावना होता जा रहा था सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और दूर पंछियों का झुंड अपने घर की तरफ लौट रहा था यह सब देखना बहुत ही अच्छा लग रहा था,,,, और कपड़े उतारते समय अंकित मौसम के इससे खूबसूरत वातावरण का आनंद भी ले रहा था लेकिन इस समय उसके मन में कुछ और चल रहा था वह अपनी मां की तरफ पूरी तरह से आकर्षित हो चुका था.. इसलिए हाथ बंटाने वाली बात पर अंकित बोला,,)

जरूर मम्मी,,,,(इतना कहता कि दोनों बेहद करीब आ गए थे कि दोनों के बीच केवल दो फीट की ही दूरी रह गई थी और तभी सुगंधा के हाथ में उसकी चड्डी लग गई और उसकी नजर चड्डी में बने बड़े से छेद पर चली गई यह देखकर तो अंकित के होश उड़ गए क्योंकि वह भूल चुका था कि उसकी मां की चड्डी उसने ही बड़ा किया है और इस समय वह चड्डी उसकी मां के हाथ में आ चुकी है,,,,।

मादकता भरे वातावरण और एक दूसरे के प्रति आकर्षण के पहले सुगंधा कभी भी अपने बेटे की नजर में अपनी पहनी हुई चड्डी या साफ सुथरी चड्डी आने नहीं देती थी कपड़े सुखाने के लिए डालती भी थी तो साड़ी के नीचे छुपा कर रखती थी,,, लेकिन 2 दिन में जिस तरह की हालात दोनों के बीच बदले थे उसे देखते हुए सुगंधा अपने बेटे की आंख के सामने से अपनी चड्डी को छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रही थी क्योंकि इस बात को वह भी अच्छी तरह से जानती थी की चड्डी को धोया भी उसके बेटे नहीं है और सूखने के लिए डाला भी उसी में इसलिए अब उसकी आंख के सामने से अपने अंतर्वस्त्र को छुपाना बिल्कुल भी ठीक नहीं था,,,।

सुगंधा अपनी चड्डी को इधर-उधर घूमा कर उसे बड़े से छेद को देख रही थी उसकी चड्डी में छोटा सा छेद था इस बात को अच्छी तरह से जानती थी लेकिन इतना बड़ा कैसे हो गया उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और अंकित यह देखकर लेकिन फिर भी जिस तरह का आकर उसने अपनी मां की चड्डी में बनाया था उसे देखकर उसके होश उड़ गए थे,, चड्डी में वह छेद एकदम गोलाकार आकार में तब्दील हो चुका था अच्छा खासा गोलाकार जिसमें से अंकित का लंड बड़े आराम से गुजर चुका था,,,, अपनी चड्डी के उसे छोटे से छेद को जो किया बड़ा हो चुका था उसे अंकित की तरफ आगे बढ़ाकर उसे दिखाते हुए बोली,,,,।

अंकित यह कैसे हो गया यह तो बहुत छोटा था,,,,।
 
सुगंधा अपनी चड्डी को इधर-उधर घूमा कर उसे बड़े से छेद को देख रही थी उसकी चड्डी में छोटा सा छेद था इस बात को अच्छी तरह से जानती थी लेकिन इतना बड़ा कैसे हो गया उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और अंकित यह देखकर लेकिन फिर भी जिस तरह का आकर उसने अपनी मां की चड्डी में बनाया था उसे देखकर उसके होश उड़ गए थे,, चड्डी में वह छेद एकदम गोलाकार आकार में तब्दील हो चुका था अच्छा खासा गोलाकार जिसमें से अंकित का लंड बड़े आराम से गुजर चुका था,,,, अपनी चड्डी के उसे छोटे से छेद को जो किया बड़ा हो चुका था उसे अंकित की तरफ आगे बढ़ाकर उसे दिखाते हुए बोली,,,,।

अंकित यह कैसे हो गया यह तो बहुत छोटा था,,,,।

हां मम्मी छोटा तो था लेकिन मुझे अच्छा नहीं लग रहा था क्या तुम्हारे पास नई चड्डी नहीं है पहनने को जो इस तरह की फटी हुई चड्डी पहनती हो,,,,(अंकित अपनी मां के सवाल के घेरे में आता है इससे पहले ही वह अपनी मां को ही घेरे में लेते हुए बोला,,,, अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा की शर्म के मारे हालत खराब हो रही थी वह सर में से पानी पानी में जा रही थी और उसकी दोनों टांगों के बीच की दरार में से वह शर्म का पानी बहने लगा था,,,, अपने बेटे की बात सुनकर वह बोली,,,)

तुझे क्या लगता है,,,?

मुझे तो लगता है कि सच में तुम्हारे पास पहनने को चड्डी नहीं है,,,,(अंकित अब तक के हालात को देखते हुए हिम्मत जुटाकर बोला,,,)

ऐसा क्यों कह रहा है तु,,,(चड्डी के छेद में जानबूझकर उंगली डालकर उसे अंदर बाहर करते हुए बोली यह देखकर अंकित के पेट में तंबू बनने लगा,,,, क्योंकि जिस तरह से उसकी मां चड्डी के छेद में उंगली बाहर कर रही थी कुछ घंटे पहले वहां उंगली की जगह अपने लंड को अंदर बाहर कर चुका था और सुगंध भी जानबूझकर अपनी हरकत को अंजाम दे रही थी वह अपने बेटे को उकसाना चाहती थी वह इसके मतलब को बताना चाहती थी,,,,, अपनी मां की बात सुनकर उसकी हरकत को देखकर अंकित बोला,,,)

क्योंकि मैं पहले भी देख चुका हूं,,(गहरी सांस लेते हुए अंकित बोला)

पहले भी देख चुका है क्या देखचुका है,,,!(सुगंधा आश्चर्य जताते हुए बोली)

उसे दिन मार्केट में जब मार्केट से वापस लौट रहे थे शाम हो चुकी थी और तुम्हें बड़े जोर की पेशाब लगी थी यादहै तुम्हें,,,,(पेशाब वाली बात एकदम से अंकित भूल गया था और उसके मुंह से पेशाब वाली बात सुनकर सुगंधा को सब कुछ याद आ गया था और उसका भी जोरों से धड़कने लगा था अंकित का जवाब देते हुए वह हां में सिर हिला दी,,,)

तुम पेशाब करने के लिए बैठ रही थी कि अचानक मेरी नजर तुम पर चली गई थी और मैं देखा था तुम चड्डी नहीं पहनी थी बस साड़ी उठाकर बैठ गई थी पेशाब करने के लिए,,,,(अंकित पर सुरूर जा रहा था वह मदहोश हुआ जा रहा था वह अपनी मां से इस तरह की बातें करना नहीं चाहता था लेकिन वक्त और हालात को देखकर अपने आप ही उसके मुंह से इस तरह की गंदी बातें निकल रही थी और सुगंधा तो अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर एकदम से मदहोश हो जा रही थी उत्तेजित हुए जा रही थी उसे अच्छा लग रहा था अंकित के मुंह से इस तरह की बातें सुनने में,,,,, अंकित की बात को सुनकर सुगंधा को सब कुछ याद आ गया था,,, उसे अच्छे से याद था,,वह जानबूझकर चड्डी नहीं पहनी थी,, क्योंकि मार्केट में पेशाब करने के लिए वह पहले से ही सोच कर रखी थी यह उसके प्लान का ही भाग था चक्की ना पहनना क्योंकि वहां जानबूझकर अपने बेटे को यह दिखाना चाहती थी अपने आप को पेशाब करते हुए दिखाना चाहती थी और उसके बेटे ने देखा भी था और यह वह जानबूझकर बोल रहा था कि वह अनजाने में देख लिया था,,, फिर भी अपने बेटे की बात सुनकर आश्चर्यजताते हुएबोली,,,)

बाप रे तू मुझे देख रहा था,,,।

नहीं नहीं देखा नहीं रहा था बस अनजाने में मेरी नजर पहुंच गई थी,,,।

लेकिन तू कितना समझदार है देख कर भी तुझे मेरी तकलीफ के बारे में पता चल गया,,, सच में मेरे पास चड्डी नहीं है,,,,। तु खरीद कर लाएगा,,,,!

(इतना सुनते ही ऐसा लग रहा था जैसे अंकित के कानों में कोई रस घोल रहा हो वह मदहोश हुआ जा रहा था,,,, उसे बहुत अच्छा लग रहा था उसकी मां उसे अपने इसलिए चड्डी खरीदने के लिए बोल रही थी लेकिन फिर भी वह औपचारिकता निभाते हुए बोला,,)

मम्मी में कैसे लाऊंगा मुझे तो इसका अनुभव भी नहीं है दीदी को बोल देना ना,,,,।

नहीं दीदी को नहीं मैं भी तो देखूं तु मेरी कितनी फिक्र करता है,,,(सुगंधा जानबूझकर अपनी बेटी से नहीं मांगना चाहती थी क्योंकि महीना पहले ही वह अपनी बेटी से अपने लिए चार पेटी मंगवाई थी इसलिए अगर वह अपनी बेटी से कहती तो वह क्या कहती कि अभी-अभी तो चार पेंटी खरीद कर दी थी वह कहां गई और अंकित तो इस बारे में कुछ जानता भी नहीं है,,, अंकित अपनी मां की बात सुनकर बोला,,,)

लेकिन मुझे तो कुछ पता ही नहीं है कि कैसे खरीदी जाती है,,,।

अरे इसमें क्या हुआ बड़ा तो तू हो ही गया है इतना तो तुझे समझ में आ जाना चाहिए की औरतों की पेंटिं कैसे खरीदी जाती है,,, बोल खरीदेगा ना,,,,।

अगर रहती हो तो जरूर खरीद दूंगा मुझे अच्छा नहीं लगता है तुम इस तरह की फटी चड्डी पहनती हो,,,।

ठीक है तो खरीद कर देगा तो नहीं पहनूंगी फटी चड्डी,,,,,। लेकिन हां अपनी बहन को कुछ भी मत बताना नहीं तो वह क्या समझेगी,,,।

बिल्कुल नहीं बताऊंगा,,,,।

(पेंटिं खरीदवाने के चक्कर में सुगंधा वह छोटा सा छेद बड़ा कैसे हो गया इस बारे में पूछना भूल ही गई थी,,, और दोनों सूखे हुए कपड़े उतार कर नीचे आ गए थे तब तक तृप्ति भी घर पर आ चुकी थी,,,,)

.........................
 
मां बेटे दोनों सुखी हुए कपड़े लेकर नीचे आ चुके थे और थोड़ी ही देर में तृप्ति भी आ गई थी,,, लेकिन जिस तरह की बातें हो रही थी दोनों मां बेटे के बीच उत्तेजनात्मक मदहोशी भारी उसके चलते इस समय तृप्ति का घर आना मां बेटे दोनों को भी अच्छा नहीं लग रहा था उन दोनों को ऐसा ही लग रहा था जैसे मानो कबाब में हड्डी,,, क्योंकि दोनों जिस तरह से बातें कर रहे थे वह मां बेटे के बीच नहीं बल्कि एक मर्द और औरत के बीच बातें हो रही थी,,,,।

अंकित तो खुशी से फुल नहीं समा नहीं रहा था क्योंकि उसकी मां ने उसे अपने लिए पेंटिं खरीदने के लिए जो बोल दी थी,,, यह उसके लिए पहला अनुभव होगा जब वह अपनी मां के लिए चड्डी खरीदने बाजार जाएगा आज तक अंकित ने औरतों के अंतर्वस्त्र को खरीद नहीं था और ना ही कुछ अनुभव था उनके साइज के बारे में,,,,, अंकित इसलिए हैरान था कि उसकी मां उससे कितना ज्यादा खुलती चली जा रही थी जो अपने अंतर्वस्त्र को हमेशा कपड़े के नीचे ढक कर रखती थी उसे सूखाती थी,, आज खुद ही उसे धोने के लिए दी थी उसे सूखाने के लिए दी थी,,, अंकित को इस बात का एहसास हो रहा था कि जिस तरह की बातें उन दोनों के बीच हो रही थी उसकी मां बिल्कुल भी हिचकिचा नहीं रही थी एकदम सहज होकर बातें कर रही थी,,,, खास करके अपनी ही चड्डी के छोटे से छेद को बड़ा हुआ देखकर उसमें उंगली डालकर अंदर बाहर करना यह इशारा बहुत ही खास था जो ठीक तरह से अंकित समझ नहीं पाया था लेकिन अब उसे थोड़ा-थोड़ा एहसास हो रहा था कि उसकी मां इस तरह की हरकत करके क्या जताना चाह रही थी इसलिए अपनी मां की उस हरकत के बारे में सोच कर इस समय उसका लंड खड़ा हो चुका था,,,,।

तृप्ति आते ही चाय बनाना शुरु करती थी क्योंकि वह जानती थी कि उसकी मां की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए घर का सारा काम सही करना था और वह किसी भी तरह से अपनी मां को परेशान नहीं होने देना चाहती थी इसलिए जल्दी से चाय बनाकर अपनी मां के कमरे में पहुंच गई जहां पर वह लेटी हुई थी,,,, वैसे तो दवा अपना असर कर रही थी और सुगंधा अच्छा खासा अनुभव कर रही थी,,, उसे जल्द ही आराम हो गया था,,,, लेकिन फिर भी न जाने क्यों सुगंधा अपनी बेटी को यह दिखाना चाहती थी कि उसे अभी ठीक से आराम नहीं हुआ है इसका कारण एक ही था कि दूसरे दिन भी अंकित स्कूल न जाए और उसकी देखभाल करें,,।

एक ही कमरे में तीनों बैठकर चाय की चुस्की ले रहे थे,,, और चाय की चुस्की लेते हुए तृप्ति बोली,,,।

हां मैं यह बताना तो भूल ही गई हमारे कॉलेज में तीन-चार दिनों की छुट्टी है,,,,,, चलो अच्छा ही हुआ तीन-चार दिन में ही तुम्हारा ख्याल रखूंगी,,,, अंकित परेशान हो गया होगा,,,,।

(कॉलेज की छुट्टी के बारे में सुनते हैं मां बेटे दोनों एकदम से सन्न रह गए दोनों के चाय के कप उनके होठों तक आकर एकदम से रुक गए थे,, और अनजाने में ही दोनों एक दूसरे के सामने देखने लगे थे क्योंकि वह दोनों जानते थे कि तृप्ति के घर पर न होने की वजह से दोनों आपस में कितना खुल रहे थे और उसकी हाजिरी में ऐसा कुछ भी नहीं हो पाएगा इसलिए दोनों अंदर से दुखी हो गए थे लेकिन फिर भी अंकित सहज होता हुआ बोला,,,)

इसमें परेशानी की कौन सी बात है दीदी,,, यह तो हमारा फर्ज है ना अगर मैं बीमार पड़ता तो मम्मी दिन-रात मेरी सेवा करती रहती अगर आज वह बीमार है तो सेवा तो करना ही पड़ेगा ताकि जल्दी ठीक हो जाए,,,।

वैसे मम्मी तुम नही थी,,,।

हां,,,, बिना नहाए अच्छा नहीं लग रहा था,,,,।

कपड़े तो रखी हो ना मैं धो देती हूं,,,।

अरे नहीं नहीं कपड़े तो मैं धो दी,,,

क्या करती होमम्मी,,,,(एकदम गुस्से से अंकित की तरफ देखते हुए अपनी मां से बोली) तुम्हारी तबीयत खराब थी ना तुम्हें सब नहीं करना चाहिए था पर तुम्हारी देखभाल करने के लिए मैं अंकित को तो घर पर छोड़कर गई थी और अंकित क्या तू एक दिन मम्मी के कपड़े नहीं धो सकता,,,,।

अरेलेकिन,,,(अपनी बड़ी बहन की बात सुनकर अंकित बोल तो उसकी बात को बीच में ही काटते हुए सुगंधा झट से बोली)

अरे तो क्या हो गया तृप्ति मुझे आराम लग रहा था तो मैं धो दी वैसे अंकित मुझे धोने नहीं दे रहा था लेकिन फिर भी मैं धो डाली,,,,।

(सुगंधा अंकित की तरफ देखते हुए बोली अंकित अपने मन में ही बोल रहा था तुम क्या जानो दीदी तुम्हारे जाने के बाद घर में क्या-क्या हुआ है आज जो नजर मैंने देखा हूं वैसा नजारा मैंने कभी नहीं देखा और पहली बार मम्मी के कपड़े धोने में मुझे इतना मजा आया कि पूछो मत खासकर की मम्मी की ब्रा और चड्डी,,,,, अपनी मां की बात सुनकर तृप्ति बोली,,,)

चलो आज जो हुआ सो हुआ अब दो-तीन दिन बिल्कुल भी नहीं काम करना,,,, ठीक है ना,,,।

हां बाबा बिल्कुल ठीक है बस,,,,

अब मैं जल्दी से खाना बना देती हूं,,,,।

ठीक है जाकर बना दे,,,,।

वैसे तुम क्या खाओगी मम्मी,,,,।

मम्मी को तो डॉक्टर ने हल्का खाना खाने को बोला है ऐसा करो,, तुम खिचड़ी ही बना दो,,,(अंकित समझदारी दिखाते हुए बोला और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,) जल्दी से बन भी जाएगा,,,,

हां यह तो ठीक कह रहा है एक ही दिन में समझदार हो गया है,,,,।

(तृप्ति की बात सुनकर सुगंधा अपने मन में बोली एक ही दिन में समझदार और मर्द दोनों बन गया है,,,

तृप्ति खाना बनाने के लिए चली गई और अंकित घर से बाहर थोड़ा टहलने के लिए निकल गया और टहलते हुए वह अपनी मां के बारे में ही सोच रहा था दिन भर जो कुछ भी हुआ उसके बारे में सोच रहा था,,,, उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि एक औरत का साथ मर्द को कितना आनंदित कर देता है,, औरत की हर एक अदा मर्दों के लिए कितनी कामुकता भरी होती है आज ईसका एहसास हो रहा है,,, औरतों का नहाना कपड़े बदलना कपड़े उतारना बातें करना सब कुछ तो उत्तेजित कर जाता है,,, आज कितना अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव कर रहा था इसका एहसास उसे अभी तक हो रहा था,,,।

अंकित अपनी मां के बारे में सोच कर मदहोश हो रहा था कि तभी उसके कानों में आवाज आई,,,।

अंकित,,,ओ अंकित,,,,,।

(अपना नाम सुनाई देते हैं अंकित पीछे मुड़कर देखा तो ठीक उसके पीछे सुमन खड़ी थी उसे देखते ही उसकी आंखों की चमक एकदम से बढ़ गई और वह एकदम से हडबढ़ाते हुए बोला,,)

कककक,,, क्या हुआ दीदी,,,?

अरे हुआ कुछ नहीं है मैं घर का थोड़ा सामान लेने जा रही थी तुझे देखी तो रुक गई वैसे तुझे कोई काम है क्या,,,।

नहीं नहीं दीदी मैं तो ऐसे ही घूम रहा हूं,,,।

तो चल मेरे साथ थोड़ा सामान खरीद कर वापस आ जाते हैं,,,।

हां,,, हां,,,,, चलो,,,,।

(और इतना कहने के साथ ही दोनों पास ही नुक्कड़ के किराना की दुकान पर चल दिए चलते हुए सुमन अंकित की तरफ देखते हुए बोली,,,)

वैसे लगता है कि पढ़ने में ध्यान नहीं दे रहे हो,,,।

नहीं नहीं दीदी ऐसी कोई भी बात नहीं है लेकिन ऐसा क्यों कह रही हो,,,,।

ऐसा इसलिए कह रही हूं कि तुम्हें मैं अपने घर बुलाई थी पढ़ने के लिए,,, कोई भी सब्जेक्ट में परेशानी हो तो मुझसे पूछ लेना ऐसा मैं बोली थी लेकिन तुम तो उस दिन से दिखाई ही नहीं दिए,,,।

नहीं दीदी ऐसी कोई भी बात नहीं है,,,, जब जरूरत पड़ेगी तो बिना कहे तुम्हारे पास आ जाऊंगा पूछने के लिए,,, वैसे भी एग्जाम आने वाले हैं तब तुम्हारी जरूरत मुझे पड़ेगी,,,,।

ठीक है बेझिझक पूछ लेना,,,, तुम्हारे लिए मैं हमेशा तैयार हूं,,,,,, लो बातों ही बातों में दुकान भी आ गई,,, और दोनों दुकान की सीढ़ियां चढ़ने लगे लेकिन आगे आगे सुमन थी और पीछे अंकित था और ऐसे में अंकित की नजर अपने आप ही सुमन की गदराई गोल गोल गांड पर चली गई और इस समय वह पजामा और कुर्ती पहनी हुई थी,,, जिसकी वजह से उसका बदन और भी ज्यादा भरा हुआ लग रहा था ,, खास करके उसकी गांड को ज्यादा ही उभरी हुई नजर आ रही थी जिसे देखते ही अंकित की हालत खराब होने लगी उसके मुंह में पानी आने लगा,,,, दुकान पर अच्छी खासी भीड़ थी जिसकी वजह से सुमन आगे खड़ी थी और ठीक उसके पीछे अंकित खड़ा था,,,।

इस तरह से दुकान पर खड़े होने की वजह से उसे बाजार वाली बात याद आ गई जब वह इसी तरह से अपनी मां के साथ घर का सामान खरीदने के लिए आया था और तभी एक औरत के हाथ से कुछ सामान गिर जाने की वजह से वह एकदम से नीचे चुका गई थी और उसके झुकने की वजह से उसकी बड़ी-बड़ी गांड ठीक उसके लंड पर आ लगी थी,,, जिसकी वजह से अंकित केतन बदन में अजीब सी हलचल महसूस हुई थी,,, और वह औरत भी जाते-जाते उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी,,,, उस पल अंकित पहली बार किसी औरत को टकटकी लगाए देख रहा था,, पहली बार उसे उत्तेजना का एहसास हुआ था क्योंकि उसे समय उसकी उत्तेजना के केंद्र बिंदु में औरत के आकर्षण का मुख्य जरिया जो आ लगा था,,,।

दुकान पर अच्छी खासी फिर सब लोग अपना-अपना सामान ले रहे थे और दुकान पर दुकान के शेठ के साथ-साथ उसके दो मजदूर भी थे , जो जल्दी-जल्दी ग्राहकों को सामान दे रहे थे,,,, उस दिन वाली घटना को याद करके अंकित का लंड खड़ा हो चुका था,,, और उसे अपनी स्थिति पर शर्मिंदगी का भी एहसास हो रहा था क्योंकि वह नहीं चाहता था कि किसी की भी नजर उसके पेंट के आगे वाले भाग पर पड़े,,,, इसलिए वह सुमन से भी तकरीबन चार पांच अंगुल की दूरी बनाए हुए था क्योंकि वह जानता था कि अगर वह थोड़ा सा भी आगे किया तो उसके पेट में बना तंबू सुमन की गांड पर रगड़ खाने लगेगा और वह न जाने क्या समझेगी लेकिन ऐसा एहसास उसे सुमन के घर में ही प्राप्त हो चुका था जब वह उसके घर गया था और उसे समय तो हुआ है उसके नितम्बो की रगड़ अपने लैंड पर महसूस करके उसकी कमर को भी दोनों हाथों से दबोच दिया था क्योंकि सब कुछ अपने आप ही हुआ था,,, और वह इस बात से अनजान था कि उसी दिन से सुमन उसके आकर्षण में बंध गई थी,, उसके मर्दाना अंग पर मोहित हो गई थी।

सुमन के मन में भी कुछ और चल रहा था सुमन चाहती थी कि उसे दिन की तरह आज भी अंकित का मर्दन अंग उसकी गांड से रगड़ खाएं इसलिए वह अभी तक दुकानदार से सामान नहीं मांगी थी बस खड़ी होकर हल्के हल्के अपनी नितंबों को थिरकन दे रही थी और एक बहाने से,, अपनी गांड को पीछे की तरफ ढकेल के अंकित के लंड से अपनी गांड को स्पर्श करा रही थी लेकिन वह अपने इरादे में कामयाब नहीं हो पा रही थी क्योंकि अंकित थोड़ी सी उससे दूरी बनाकर खड़ा था,,,, अंकित देख रहा था कि सब लोग धीरे-धीरे अपना सामान लेकर जा रहे हैं लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी और सुमन थी कि अभी तक कुछ बोल ही नहीं थी कि उसे क्या चाहिए इसलिए अंकित धीरे से उसके कान के पास अपने होठों को लाया और बोला,,,।

दीदी कुछ बोलो तो सही वरना खड़े रह जाएंगे,,,,।

(अंकित उसके कान के इतने करीब अपने होठों को ले जाकर के बोला था कि उसकी गर्म सांसे उसे अपनी कानों पर महसूस हुई थी और वह इस एहसास से पूरी तरह से मत हो गई थी उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि मानो जैसे अंकित उसके गर्दन पर चुंबन करने जा रहा हो,,,,, फिर भी गहरी सांस लेते हुए वह बोली,,,)

हां,,,, बोल रही हूं,,,,,,(और इतना कहने के साथ है वह दुकानदार से सामान मांगना शुरू कर दी धीरे-धीरे उसके मजदूर सामान पैक करने लगे अंकित अच्छा खासा उत्तेजित हो चुका था बार-बार उसकी नजर पजामे में सुमन की गांड पर चली जा रही थी जिसकी वजह से उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर पेंट में खुंटा बनाया हुआ था अंकित इस बात से डर भी रहा था कि कहीं उसका खुंटा सुमन के छेद में न घुसने लगे इसलिए वह बहुत संभाल कर खड़ा था,,,।

लेकिन तभी उसके पीछे दो-तीन लड़के आ गए जो आपस में मस्ती करते हुए अंकित से टकरा गए और अंकित अपने आप को पूरी तरह से बढ़ाने की कोशिश करते हुए भी नाकामयाब रहा और वास्तव में उसका खुंटा जाकर सुमन की गदराई गांड के बीचों बीच दस्तक देने लगा,,,, एक तरफ आश्चर्य से अंकित की आंखें फटी की फटी रह गई थी वहीं दूसरी तरफ सुमन पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,,, उसे अपनी गांड के बीचों बीच अंकित का खुंटा धंसता हुआ महसूस हो रहा था,, वह पूरी तरह से गदगद हुए जा रही थी दुकान पर लगी थी इस बात से पूरी तरह से अनजान अच्छी दुकान पर ही एक जवान लड़की और एक जवान लड़का आपस में अपने अंगों को रगड़ रहे हैं,,,, अंकित की तो हालत खराब हुए जा रही थी,,, वह जल्द से जल्द अपने आप को पीछे लेना चाहता था लेकिन तभी फिर से वह लडके आपस में मस्ती करते हुए धक्का मुककी करने लगे और इस बार सुमन को ऐसा लग रहा था कि कहीं उसका पजामा फाड़ के अंकित का लंड उसकी गांड के छेद में ना घुस जाए,,,।
 
अनुभव से भरी हुई सुमन अच्छी तरह से समझ गई थी कि वाकई में अंकित के पास दमदार लंड है उसकी तो बोलती बंद हो गई थी,,,, लेकिन अंकित एक तरफ उत्तेजना का अनुभव करता हूं दूसरी तरफ शर्मिंदा भी था इसलिए फिर से उसके कान के पास अपने होंठ को लाकरबोला,,,।

सॉरी दीदी,,, बच्चे धक्का मुक्की कर रहे हैं,,,(उसका इतना कहना था कि तभी फिर से धक्का लगा और इस बार पजामा पहने होने के बावजूद भी सुमन को साफ-साफ महसूस होने लगा कि अंकित का लंड उसके बुर के मुख्य द्वार पर दस्तक दे रहा था,,, सुमन तो चारों खाने चित हो चुकी थी उसे अपनी बर से मदन रस बहता हुआ महसूस हो रहा था वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी और वह कुछ बोल नहीं पा रही थी वह इसी तरह से खड़े रहना चाहती थी लेकिन दुकानदार बार-बार उससे पूछ कर उसका सारा सामान पैक कर दिया था इस बीच अंकित अपने आप को सुमन के बदन से अलग नहीं कर पाया था क्योंकि वह लड़के भी ठीक उसके पीछे खड़े होकर अपना नंबर का इंतजार कर रहे थे,,, इस पल का अंकित पूरी तरह से फायदा उठाना चाहता था वह चाहता था कि वह अपनी कमर को आगे पीछे करके इस तरह से जताए की मानों जैसे वह सुमन की चुदाई कर रहा हो और ऐसा करने में उसे आनंद भी आता लेकिन वह ऐसा करने से डर रहा था बस उसी तरह से,,, खड़े रह गया था सुमन की गांड में लंड धंसाए,,,,।

इस बीच सुमन पूरी तरह से पानी पानी हो गई थी उसकी पेंटि पूरी तरह से गीली हो चुकी थी क्योंकि अंकित के मोटे-मोटे लंड को अपनी बर के द्वार पर महसूस करके वह झड़ चुकी थी ,, इस बात का दुकान पर खड़ी भीड़ को पता भी नहीं चला था कि एक लड़की एक लड़के के लंड को अपनी गांड पर महसूस करके पानी छोड़ दी थी,,, यह एहसास यह अनुभव अंकित के साथ-साथ सुमन के लिए भी बेहद अद्भुत था क्योंकि सुमन इस तरह का अनुभव कभी नहीं प्राप्त की थी हां कभी कबार भीड़ भाड़ में आते जाते बस में सफर करते हुए मनचले लड़के भीड़ का फायदा उठाते हुए उसकी गांड से अपने लंड को स्पर्श करा देते थे या तो फिर उसकी गांड पर अपना हाथ रख कर दबा देते थे बस इतना ही होता था,,, लेकिन आज पहली बार भीड़ में किसी का लंड उसकी बुर के मुख्य द्वार तक पहुंचा था जिसकी वजह से वह झड़ गई थी,,,,।

ना चाहते हुए भी सुमन को अपना सामान थैली में रखकर वहां से हटना पड़ा,,, वापस लौटते समय शर्म के मारे अंकित कुछ बोल नहीं पा रहा था तो सुमन ही उसका हौसला बढ़ाते हुए बोली,,,।

क्या हुआ खामोश क्यों हो,,कुछ बोलते क्यों नहीं,,?

वो , दीदी,,,, मैं जानबूझकर नहीं,,,,

(उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वह उसे रोकते हुए बोली,,)

कोई बात नहीं अंकित भीड़ में तो यह सब होता ही रहता है मुझे मालूम है तुम्हारी गलती बिल्कुल भी नहीं है,,, तुम शर्मिंदा मत हो,,,।

(सुमन जानबूझकर उसे इस तरह से बोल रही थी ताकि आगे भी इस तरह की गलती करने में उसे बिल्कुल भी डर महसूस ना हो और वह उसके साथ एकदम से खुल जाए क्योंकि सुमन उसके साथ आनंद लेना चाहती थी ,, उसके कठोर लंड को अपनी बुर की गहराई में महसूस करना चाहती थी,,, देखते ही देखते दोनों घर आ चुके थे और सुमन उससे बोली,,,)

याद रखना अंकित पढ़ाई में किसी भी प्रकार की तकलीफ आए तो मुझसे मिल लेना मैं तुम्हारी मदद करूंगी,,,।

जी दीदी,,,,

(पर फिर सुमन अपने घर चली गई और एक नए अनुभव के साथ अंकित अपने घर में आ गया,,,, थोड़ी ही देर में खाना तैयार हो चुका था तीनों साथ में मिलकर खाना खाकर कुछ देर के लिए टीवी देख रहे थे और टीवी देखते देखते रात के 12:00 बज गए थे,,,, सुगंधा धीरे से उठी और अंकित से बोली,,,)

अब मैं जा रही हूं सोने और तु भी जाकर सो जा,,, और त्रप्ती तू भी सो जा,,,।

बस थोड़ी देर और मम्मी,,,, फिल्म खत्म होने वाली है,,,।

ठीक है इसके बाद टीवी बंद करके सो जाना,,,,।

(इतना कहकर सुगंध कमरे से बाहर जाने लगी लेकिन अंकित की नजर अपनी मां पर ही टिकी हुई थी तभी उसने देखा कि उसकी मां ड्राइंग रूम से बाहर निकाल कर अपने कमरे की तरफ जाने के बजाय घर के पीछे की तरफ जा रही थी और जाते समय एक नजर उसके ऊपर भी डाल कर गई थी,,,, अंकित का दिल जोरों से धड़कने लगा था वह अपने मन में सोचने लगा कि उसकी मां अपने कमरे में जाने क्यों बजाई पीछे की तरफ क्यों जा रही है जरूरवह पेशाब करने जा रही है,,,, यह ख्याल उसके मन में आते ही वह भी अपने आप को रोक नहीं सका वह भी एक अद्भुत दृश्य को देखने की चाह में धीरे से उठा ओर ड्राइंग रूम से बाहर निकल कर घर के पीछे की तरफ जाने लगा,,,,,।

उसे डर भी लग रहा था कि कहीं उसकी मां उसे कुछ भला बुरा ना कह दे लेकिन फिर भी वह एक मनमोहक दृश्य को देखने की चाह में अपने मन से डर को निकाल दिया घर के पीछे के दरवाजे के पास पहुंच गया और वहां दीवार के पीछे खड़े होकर वह अपनी मां की तरफ देख चलेगा जो कि अभी भी सामने की तरफ मुंह करके खड़ी थी मानो की जैसे उसके ही आने का इंतजार कर रही हो,,,, डर और उत्तेजना के मारे अंकित गहरी गहरी सांस ले रहा था उसकी किस्मत अच्छी थी कि आज भी चांदनी रात थी और उसे सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था,,,,।

और यह हकीकत ही था की सुगंधा उसके आने का ही इंतजार कर रही थी,,, और जैसे ही उसे बात का एहसास हुआ कि अंकित ठीक उसके पीछे दरवाजे के पास खड़ा है तो वह धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठने लगी वह अपने बेटे को अद्भुत नजारे का दर्शन करना चाहती थी जो कि वह कर भी चुकी थी लेकिन वह जानती थी कि इस तरह का दृश्य मर्दों के लिए हमेशा नया अनुभव ही लेकर आता है हर बार नया ही लगता है वह जानती थी इस दृश्य को बार-बार देखने में भी उसके बेटे को बिल्कुल भी बुरा नहीं लगेगा बल्कि हर बार ही वह पहले की तरह ही उत्तेजना का अनुभव करेगा,,,।

जैसे ही सुगंधा अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठने लगे वैसे ही अंकित की हालत खराब होने लगी,,, उसका दिल जोरो से धड़कने लगा देखते ही देखते सुगंध अपनी साड़ी को अपनी जांघों तक उठा दी उसकी मोटी मोटी जांघ चांदनी रात में भी चमक रही थी एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, जिसे देख कर अंकित का लंड खड़ा हो रहा था,,, और फिर एकदम से नाटक पर से पर्दा उठाते हुए सुगंधा अपनी साड़ी को कमर तक उठा दी और अपनी मां की नंगी गांड देखकर अंकित की हालत खराब हो गई और अपने आप ही उसका हाथ उसके लंड पर आ गया और वह पजामे के ऊपर से ही अपने लंड को दबाना शुरू कर दिया,,, और उसे इस बात का भी एहसास हो रहा था कि उसकी मां चड्डी नहीं पहनी थी इसका मतलब साफ था कि उसकी मां के पास चड्डी नहीं था और उसे अपनी मां के लिए चड्डी खरीदना बेहद जरूरी हो गया था,,,,।

लेकिन उसे अपनी मां के बदन पर चड्डी ना देखकर इस बात का संतोष भी रहता था कि उसका बेस कीमती हुस्न एकदम से उसके सामने आ जाता है चड्डी उतारने का झंझट ही नहीं रहता,,, लेकिन फिर भी उसकी मां के लिए चड्डी बेहद जरूरी था,,, उसकी मां कमर तक साड़ी उठाई कुछ देर तक ऐसे ही खड़ी रही और अपने दोनों हाथों को अपने नितम्बों पर लाकर हल्के हल्के सहला रही थी,,, यह देखकर अंकित अपने मन में ही बोला यह क्या कर रही हो मम्मी यह काम तो मुझ पर छोड़ दो मैं अच्छे से तुम्हारे पूरे बदन को सहला दूंगा बहुत प्यार करूंगा,,,, अभी वह अपने आप से इस तरह की बातें कर ही रहा था कि तुरंत उसकी मां पेशाब करने के लिए नीचे बैठ गई,,,,।

भला हो चांदनी रात का की उसे रात में भी अपनी मां का बेस कीमती खूबसूरत अंग उसका बदन एकदम साफ दिखाई दे रहा था जिसे देखकर वह उत्तेजना के परम शिखर पर विराजमान हो चुका था,,, अगले ही पल उसके कानों में अपनी मां की गुलाबी बुर में से निकलने वाली सिटी की आवाज एकदम साफ सुनाई देने लगी यह सिटी की आवाज नहीं थी बल्कि मटकना से भरी हुई अद्भुत संगीत की अकल्पनीय और था जिसे सुनने के लिए दुनिया का हर मर्द तरसता है और वह सुर इस समय अंकित के कानों में बड़े अच्छे से सुनाई दे रहा था वह मदहोश हुआ जा रहा था वह पेट के ऊपर से अपने लंड को जोर-जोर से मसल रहा था उसकी तो इच्छा हो रही थी किसी समय अपने लंड को बाहर निकाल कर अपनी मां को पेशाब करता हुआ देखकर अपने लंड को मुठिया कर उसका पानी निकाल दे लेकिन ऐसा करने में उसे डर लग रहा था,,,,।

अंकित की आंखों के सामने बेहद अद्भूत नजारा था,,, उसकी मां अपनी गांड खोलकर पेशाब कर रही थी और वह छूकर अपनी मां को देख रहा था उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि उसकी मां जानती है कि उसका बेटा पीछे छुपकर उसे पेशाब करता हुआ देख रहा है और यही एहसास सुगंधा के तन बदन में आग लग रहा था वह मदहोश हो जा रहे थे वह अपने मन में सोच रही थी कि इतने करीब होते हुए भी वह अब तक अपने बेटे का सही उपयोग नहीं कर पाई है उसका उपभोग नहीं कर पाई है,,,,, उसकी बुर से लगातार पेशाब की धार बड़ी तेजी से निकल रही थी और इतने में वह तुरंत अपनी नजर घुमा कर अपने बेटे की तरफ देखने लगी अंकित को इस बात का अंदाजा नहीं था कि उसकी मां पीछे देख लेगी और दोनों की नजर आपस में टकरा गई दोनों एक दूसरे की आंखों में देखने लगे दोनों एकदम स्तब्ध थे,,,।

दोनों की नजर आपस में टकरा जाने की वजह से दोनों के तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी दोनों कुछ पल के लिए एक दूसरे को ही देखे जा रहे थे यह नजारा अभी क्या खूब था सुगंधा पेशाब करते हुए अपने बेटे को देख रही थी और अपनी मां को पेशाब करता हुआ अंकित देख रहा था दोनों केतन में आग लगी हुई थी दोनों उत्तेजना के परम शिखर पर विराजमान हो चुके थे,,, अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है और सुगंधा पूरी तरह से मदहोशी के सागर में डुबकी लगा रही थी उसकी आंखों में प्यास झलक रही थी उसके चेहरे पर वासना की खुमारी नजर आ रही थी वह अपने बेटे को अपने करीब आने देना चाहती थी लेकिन उसका बेटा उसके ईसारे को समझ नहीं पा रहा था,,, सुगंधा सोच रही थी कि यह पल है उसकी जिंदगी से कभी खत्म ना हो बस वो इसी तरह से बैठकर पेशाब करती रहे और उसका बेटा उसे जी भर कर देखता रहे ,,, लेकिन ऐसा संभव नहीं था क्योंकि कुछ ही देर में सुगंधा की गुलाबी छेंद से पेशाब के निकलने वाली धार कमजोर पड़ने लगी,,,

वह ऐसा चाहते नहीं थी लेकिन ऐसा उसके बस में भी नहीं था वह पेशाब कर चुकी थी लेकिन फिर भी कुछ देर तक इस अवस्था में बैठे रह गई वह अपने बेटे को जी भर कर अपनी नंगी जवानी के दर्शन करा रही थी और अभी तक अपने बेटे को ही देख रही थी और यह भी देख रही थी कि उसका बेटा उसकी नंगी जवान को देखकर किस कदर उत्तेजित हो रहा था वह लगातार अपने लंड को पेट के ऊपर से ही दबा रहा था मसल रहा था उसकी यह उत्तेजना देखकर उसके तन बदन में आग लगने लगी,,,,,अंकित भी अपनी मां को ही देख रहा था दोनों एक दूसरे के ऊपर से अपनी नजर को हटा नहीं रही थी दोनों की नजर में वासना एकदम साफ दिखाई दे रहा था,,,,, इसके पास धीरे से मुस्कुराते हुए सुगंधा अपनी साड़ी को इस तरह से उठाए हुए ही खड़ी हो गई अभी भी खड़ी होने के बावजूद भी उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी और वह एक बार फिर से अपने बेटे की तरफ देखकर अपनी साड़ी को ऐसे गिरा दी जैसे कि एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा पड़ गया हो,,,,,।

अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह वहीं पर खड़ा रहेगा अपने कमरे में चला जाए लेकिन वह इस समय अपनी मां के आकर्षण में इस तरह से बंध गया था कि वह चाह कर भी वहां से हील नहीं पा रहा था और उसकी मां मुस्कुराते हुए उसकी तरफ आगे बढ़ने लगी और उसके पास से गुजरते हुए उसे मुस्कुरा कर देखी और आगे बढ़ गई अंकित तो पूरी तरह से अपनी मां की मदद कर देने वाली जवानी का गुलाम बन चुका था वह उसे जाते हुए देखने लगा और फिर उसके जाते ही वह जैसे होश में आया हो धीरे से वह भी अपने कमरे में गया लेकिन जिस तरह की उत्तेजना का वह अनुभव कर रहा था उसे अपनी गर्मी शांत करनी थी और वह अपने कमरे में जाते ही अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा होकर अपनी मां को याद करके मुठ मारने लगा,,,।

......................................
 
Back
Top