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Incest माँ को पाने की हसरत

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मैने चूत पे ज़बान चलानी जारी रखी इस बीच अपना एक अंगूठा उसकी गान्ड के छेद में सरका दिया....उसने गान्ड ढीली छोड़ी और उसका सिकुडे छेद के खुलने से अंगूठा अंदर तक सरक गया...मैं वैसे ही गान्ड को उंगली से खोलता हुआ दूसरी उंगली छेद में करते हुए उसकी चूत को चाटें जा रहा था....इस बीच मुझे अपने ज़बान से उसके निकलते रस का स्वाद लगा तो मैने मुट्ठी में लेके उसके चूत को दबोच लिया....वो सिसक उठी "हाए राम मैं गयी आआई हाए आहह"....उसने ढेर सारा पानी का फवारा छोड़ा

जिसे देखते हुए पीछे खड़ा समीर अपना लॉडा हिलाने लगा...."उफ्फ देख तो कैसे पानी छोड़ रही है साली? तेरे आने से एक दिन पहले ही तो इसकी यहाँ आके चुदाई की थी तो भी इसे इतना उत्तेजित नही देखा था"......समीर ने आगे बढ़के अपनी दोनो टाँग लेटी हेमा के आज़ु बाज़ू रख दी और उसके लगभग सर के पास झुकता हुआ अपना लॉडा उसके होंठो पे घिस्सने लगा...उसने उसके लौडे को मुँह में लेके फिर चुस्सना शुरू कर दिया...मैं नीचे से हेमा को पूरा मज़ा दे रहा था...हेमा की योनि मेरी ज़ुबान से कुलबुला गयी....मैं जब उसकी चूत चाटना बंद करते हुए उठा...तो तब तक समीर उसे लॉडा चुस्वाते ही रहा....

उसने जब अपना लंड बाहर निकाला...तो हेमा हाँफ रही थी...मैने उसे हाथ देके उठाया...वो 76 किलो की भारी भरकम औरत थी इसलिए उसे उठाने में बड़ी ताक़त लगी मैं सोफे पे बैठ गया और उसकी पीठ अपनी तरफ मोडते हुए अपने उपर आहिस्ते से बिठाया...जिससे उसके शरीर के वजन का भार मुझपे आ गया पर मैं उसकी चुदाई इतने जुनून से करने में मगन था की मैं उसके बोझ को से लेने को तय्यार था...मैने भोसड़ी की दोनो सूजी चूत की फांकों पे लॉडा रगड़ा और अपना लंड फुरती से उसकी भोसड़ी में सरका दिया...उफ्फ ऐसा लग रहा था जैसे किसी रंडी को चोद रहा हूँ उसकी भोसड़ी पूरी खुली हुई थी...इतने सालो बाद चुदाई की ठरक ने मुझे पागल कर दिया था की मैं उस जैसी चुड़दकड़ औरत को चोदने के लिए तय्यार हो गया था

समीर हमारी चुदाई देखने में मशरूफ था...मैं आगे हाथ ले जाके उसकी चुचियो के कठोर निपल्स के साथ उसे हाथो से दबाए जा रहा था नीचे से हेमा ने खुद मेरे लंड को अपनी भोस्डे में अड्जस्ट किया....उसने अपनी गान्ड ढीली छोड़ी और मेरे लंड को पूरी तरह अपनी भोसड़ी में सरका लिया.....मैं नीचे से धक्के पेलने लगा और उसकी पीठ गर्दन को चूमने भी लगा..."आहह उ उई आहह"......हेमा सिसक उठी

"ओह्ह हेमा आंटी कितना चुदि हो कितना खुली हुई है तुम्हारी चूत ऐसा लग ही नही रहा कि अंदर डाल रखा है".........मैने आहें भरते हुए उसे चोद्ते हुए कहा

"हाए रे कमीना अगर तुझे अहसास नही हो रहा था तो मुझे तेरे मूसल लंड की चुभन अपनी चुत में रगड़ाती क्यूँ महसूस हो रही है? अर्रे क्या खाया है तूने तेरा शरीर तो हड्डी सा है और तेरा लंड कितना मोटा और लंबा हो गया बिल्कुल सांड़ के जैसा".......हेमा अब लगभग मेरे लंड पे कूदते हुए बोल रही थी

उसके कूदने से मेरी टांगे दर्द कर रही थी....पर मैं भी हवस में अँधा था...मैं उसकी दाई चुचि को उसके बाज़ू को अपने चेहरे से हटाए उसे चूसने लगा...समीर ने तब तक हेमा के हाथो में अपना लॉडा सहलाने को दे दिया...हेमा उसे बस सहला रही थी...इधर उसकी चुदाई पूरी ज़ोर शोर से हो रही थी इतने में समीर ने मुझे मुद्रा बदलने को कहा हेमा का मन तो नही था...पर वो मजबूरन उठ खड़ी हुई...

फिर समीर ने उसे घोड़ी बनाया और उसके नितंबो की फांकों को चौड़ा करता हुआ उसके गान्ड के सुराख में लंड घुसाने लगा..वो काफ़ी सुखी थी...इसलिए उसने अपने साथ लाई ल्यूब उसके छेद पे अच्छे से लगाई और एक अंगुल पे लगाते हुए उस अंगुल को अंदर छेद तक घुसाया उसके बाद उसने मुझे आमंत्रित करते हुए हेमा की गान्ड चोदने को कहा....वो ये देखना चाहता था कि मैं अपने मूसल लंड से उसके छेद को चौड़ा करके फाड़ डून

मैं आगे बढ़ा और अपने विशालकाय लंड को उसके छेद में रगड़ने लगा....उसके बाद सुपाडा हल्का सा अंदर गया तो हेमा चीखी...

"अबे साली थोड़ा सा दर्द बर्दाश्त कर चूत को तो भोसड़ा बना रखा है कम से कम गान्ड का मज़ा ही दे दे"........समीर ने उसके मुँह को हाथो से कस कर बंद करते हुए कहा

मैं फिर उसके गुदा द्वार में अपना लंड घुसाने की नाकाम कोशिश करने लगा..और इस बीच उसका पूरा बदन थर्र थॅर काँप गया...मेरा 8 इंच का लंड उसके छेद के अंदर घुसता जा रहा था....हेमा की आँखे बड़ी बड़ी हो गयी वो किसी घोड़ी की तरह आवाज़ कर रही थी....जब मेरा पूरा अंदर जड़ तक बैठ गया..तो मैने कस कर उसके नितंबो को दबोचे एक धक्का मारा....मेरा सुपाडा उसकी बच्चेदानी को छू रहा था...

मेरे एक करारे धक्के से से हेमा का पूरा बदन काँप उठा...मारे उत्तेजना में मैं फिर से एक कस कर धक्का मारा तो उसका पूरा शरीर काँप उठा...ऐसा 2-3 धक्को में ही वो बदहवास हो गयी काँपते हुए उसके बाद मैं उसके नितंबो पे थप्पड़ मारता हुआ उसे चोदने लगा..."उई आहह हाहह आहह"......समीर हेमा को दर्द से कराहते देख मज़ा ले रहा था...."मांर इसकी गान्ड ले ले अपना बदला चोद इसे अच्छे से पूरा सुख दे इसको जितना इसके किसी भडवे ने नही दिया हो"....समीर ने मेरी गान्ड पे हाथ फेरते हुए उस पर दबाव दिया जिससे मेरे कूल्हें पे दबाव देने से लंड जड़ तक जो गान्ड की दरारों में फसा हुआ था वो बुरी तरह अंदर बाहर होने लगा..

हेमा का पूरा गला लाल हो गया मैं नितंबो को मसल्ते हुए उसके बालों को हाथो में समेटते उसके सर को उपर किए उसकी घोड़ी मुद्रा में चुदाई कर रहा था..अब धक्के बहुत तेज़ी से शुरू कर दिए थे मैने ...हर एक धक्के में हेमा की आँखे बाहर आ जाती....कुछ ही देर में हेमा पश्त पड़ गयी वो फिर झड चुकी थी समीर नीचे से उसकी झूलती चुचियो को दबाते हुए उसका रस्पान करने लगा....ताकि हेमा को मज़ा भरपूर मिले...उसके बाद जब मैं थक गया..तो मैने अपना लॉडा बाहर खीचा...छेद सिकुड रहा था खुल रहा था....हेमा काँपते हुए बिस्तर पे ढेर हो गयी...समीर उस पर चढ़ा और उसकी चूत में फटाक से लंड घुसाए उसकी चुदाई करने लगा...उसका लंड एक ही करारे धक्के में हेमा की भोसड़ी के अंदर तक सरक गया....वो एकदम कस कस कर भीषण चुदाई कर रहा था

"क्या समीर ऐसे ही अपनी माँ को चोदता होगा?".....यही सोचते हुए मेरा दिल दहेल गया...क्यूंकी वो बहुत हार्डकोर तरीके से उसकी रफ चुदाई कर रहा था....वो कुछ ही देर में 2-4 धक्के लगाने के बाद उसके अंदर ही अपने रस को उगलने लगा....उसकी चूत समीर के रस से भर गयी वो हेमा पे पश्त पड़ के लिपट गया...मैने समीर को उठाया और उसे हटाते हुए फिर से हेमा की टाँगों को अपने कंधो पे रखा....और उसकी रस उगलती चूत के नीचे बहते हुए वीर्य को चादर से ही पोंछ दिया फिर उसकी चौड़ी गान्ड की छेद में लंड घुसाने लगा...हेमा फिर तड़पने लगी

वो बुरी तरह थक चुकी थी....मैने फिर बराबर धक्के लगाने शुरू किए....वो हर धक्के के अहसास से रोमांचित हो उठ रही थी....वो मेरे होंठो को किस करते हुए मुझे उत्तेजित कर रही थी....मेरा लंड छेद से अंदर बाहर हो रहा था....पूरे कमरे में हेमा की आवाज़ें गूँज़ रही थी...वो लगभग पष्ट पड़ गयी थी समीर ने उसकी बेहद करारी चुदाई की थी....समीर बगल में नंगा लेटा हम दोनो को चुदाई करते देख रहा था...."आहह आहह सस्स आह कमीने झड भी जा"..........

 
."अभी नही रे कुतिया अभी तुझे मेरा अंदाज़ा नही ....मैने इतना कहते हुए उसकी टांगे अपनी कमर पे लिपटा ली और काफ़ी ज़ोर ज़ोर से गान्ड के अंदर तक गहराई में लंड पेलने लगा....वो उस अहसास से ही चीख उठी...चुदाई मेरी बड़े जोरो से चल रही थी....इस बीच समीर ने भी मेरे बीच में आते हुए हेमा की गीली वीर्य से भारी योनि में अपना लॉडा घुसा दिया...मैं समीर को हेमा पे लिटाए उसके नीचे से हेमा की गान्ड मारे जा रहा था दो दो लौडो से चुदने का अहसास शायद हेमा को कभी महसूस नही हुआ था..वो बुरी तरह चीखे जा रही थी....

और कुछ ही देर में समीर फिरसे उसकी चूत में फारिग हो गया उसके बाद उसके हटते ही मैं फिरसे हेमा की चुचियो को हाथो में भीचते हुए उसकी गान्ड में ही फारिग हो उठा...रस की धार से गान्ड पूरी गीली हो गयी जब मैने उसकी गान्ड के छेद से अपना लंड बाहर खींचा तो उसकी योनि और गान्ड के छेद दोनो से वीर्य बह रहा था...वो वैसे ही पश्त पड़ी लेटी हाँफ रही थी...इस बीच जब मैं अपनी उखड़ती साँसों पे काबू पाता हुआ दाई ओर दरवाजे पे मूड के देखता हूँ

तो पाता हूँ फटी नज़रों से देख रही बिल्कुल सहमी हेमा की दोनो बेटियाँ दरवाजे पे ना जाने कब से खड़ी थी....हेमा की भी उनपे नज़र पड़ी तो वो फ़ौरन उठ खड़ी हुई मेरी तो फॅट गयी क्यूंकी मैं उनसे नज़र नही मिला पा रहा था...वो मेरे झूलते लौडे को देख रही थी ना जाने कब से हम तीनो की चुदाई देख रही थी वो दोनो उसने अपनी माँ को नंगा पाया उसकी योनि और गुदा द्वार की छेद को लबालब सफेद वीर्य से लथपथ पाया ऐसा लग रहा था जैसे उनकी नज़रों में मेरे और अपनी माँ के लिए घृणा हो....समीर की भी नज़र जब उन दोनो से मिली तो वो भी शर्मिंदा सा होके अपने गुप्ताँग को छुपाए मेरी तरफ बौखलाई नज़र से देखने लगा...

अब तक आदम और समीर को ये अहसास तक नही हुआ था कि बाहर दरवाजे पे हेमा की दोनो बेटियाँ उमा और रैना खड़ी अपनी माँ को अपने ही मुँह बोले भाई और उसके दोस्त से चुदाई करते हुए देख रही थी....उसकी माँ की सिसकियाँ और दोनो मर्दो का गाली गलोच भरी बातें वो दोनो सॉफ सुन चुकी थी...अब जब आदम की नज़र साथ साथ उसकी माँ की भी नज़र अपनी बेटियों पे पड़ी जो एकदम दंग रह गयी थी उन लोगो के कारनामे को देखके....तो फिर हेमा के मुँह से एक बोल भी नही फूटा..उसने सहमी हुई नज़रों से बस आदम की ओर देखा जो खुद नज़रें इधर किए पास रखे कपड़े अपने गुप्तांगो के बीच छुपाए एकदम नंगा अपनी मुँह बोली बहनों के सामने खड़ा था....

अब तक दोनो घृणा और सहमी नज़रों से आदम और अपनी माँ हेमा और साथ में आदम के दोस्त समीर को भी घूर्र रही थी...समीर जल्दी जल्दी जैसे तैसे कपड़े पहनने लगा...आदम अपनी कहने जा ही रहा था कि बड़ी बेटी रैना चिल्ला उठी....उसका बरसना स्वाभाविक था...आदम लगभग चुपचाप हो गया ऐसा लग रहा था जैसे रूपाली भाभी वाला वाक़या उसके सामने चल रहा हो...

छोटी बेटी उमा एकदम चुपचाप खड़ी रो रही थी...बड़ी बेटी रैना ने अपने आँसू पोंछे...और लगभग माँ पे चिल्लाते हुए उनसे इन हरकतों का कारण पूछा....हेमा बेशरमो की तरह बेलज्ज नंगी खड़ी अपनी बेटियो की बातों से झेंप सी रही थी...लेकिन बेटियो की आवाज़ में ज़रा भी कमी नही हुई वो माँ और आदम से जवाब माँग रही थी

रैना : आप लोगो को शरम नही है खासकरके आपको भाई आपको अपना भाई माना और आप हमारी ही माँ के साथ इस चार दीवारी के अंदर हमारे आब्सेंट में ना जाने कब से ये गुल खिला रहे है?...अर्रे हम तो जानते है हमारी माँ कितनी गंदी औरत है पर आप भी इसमें माँ का साथ दे रहे है...हम आपको क्या समझते थे और आप क्या निकले (आदम जैसे अपने आपको उनकी आँखो में मुजरिम कह रहा था)

इतने में हेमा रैना को चुप होने को कहने लगी...पर रैना का गुस्सा जायेज़ था...उसने अपनी माँ को धमकाया कि अगर कल को सरदार जी को मालूम चला तो तुम्हारा क्या हश्र करेगा? हम सबको बेघर होना पड़ जाएगा.....हेमा वैसे ही उसकी बहुत देर से बातें सुन रही थी वो समझाने की लगातार कोशिश करती रही पर रैना समझने को जैसे कुछ तय्यार नही थी उसकी आवाज़ तेज़ हो गयी थी...अगर आवाज़ बाहर जा रही होगी तो उसी का घर बदनाम होगा...ये सोचते हुए हेमा को गुस्सा चढ़ गया और रैना पे एकदम से बरस पड़ी...समीर चुपचाप एक कोने पे बिस्तर पर बैठा हुआ था और मैं तो ठीक सामने चुपचाप खड़ा खुद को कोस रहा था कि काश ज़मीन फटे और मैं उसमें धँस जाउ.....

हेमा : बस कर तू अब और कोई लव्ज़ भी मत निकाल ना मुँह से

रैना : और कहूँगी मैं? ये सब जो कांड आप कर रही थी इतने दिनो तक हमारे आब्सेंट में अब आपकी हमारी निगाहो में आपकी कोई इज़्ज़त नही बची

हेमा अब तक हुई अपनी बेज़्ज़ती को बर्दाश्त कर रही थी लेकिन जब अपनी ही बेटियो ने उसे इतना हद तक जॅलील करना शुरू किया...कि हेमा अपने गुस्से पे काबू ना पा सकी और उसने दो खीचके थप्पड़ अपनी बेटी के मुँह पे लगाए...वो चेहरा पकड़े दर्द को पीए माँ की तरफ आँसू भरी निगाहो से देखने लगी

हेमा : अर्रे रंडियो अर्रे हरमज़ादीयो उस माँ को तुम गाली दे रही हो जिसने तुम्हारे इतने नखरे सहे तुम्हें इतना पाला पोसा..अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला करवाया क्या इतने सारे पैसे? क्या तुम्हारा मरा हुआ बुज़दिल नामर्द बाप लाके क़बर से दिया बता ज़रा...तू सरदार जी की धमकी मुझे दे रही है तुझे लगता है कि वो रोज़ यहाँ जो आया करता है सिर्फ़ इसलिए की वो तुम्हारी माँ को चोदने आता है अपनी हसरत मिटाने आता है अपनी ठरक बुझाने आता है और वो मेरा पति ? अर्रे भडुये की पैदाइश तुम क्या जानोगी अपनी माँ का दुख? इतने सालो से जिस माँ ने तुम्हें खिलाया पिलाया बाप के मर जाने के बाद वो सारे ऐशो आराम देने की कोशिश किए जिससे तुम्हारी ज़िंदगी में कोई प्राब्लम ना आए उस माँ का आज तुम्हें एक राज़ क्या मालूम चला कि उस माँ पे तुम उंगली उठाने लगी

जैसे कितनी इज़्ज़त का पहाड़ पार कर आए हो? सच कहूँ तो ना किसी भडवे ने मदद की और ना किसी ने एक मुट्ठी खाने के लिए भी पूछा...आज कामवाली का धंधा छोड़के सरदार की रखैल बनी हूँ...तो क्या सोसाइटी में मेरी इज़्ज़त बहुत बढ़ गयी...कल भी मेरी इन लोगो ने इज़्ज़त नही की और ना आज करते है...तुम लोगो को लगता है कोई हमे अच्छी नज़रों से देखता है अर्रे बेशरम बहयाओ ज़रा गौर करोगी तो पओगि ये सोसाइटी वाले तुम लोगो को केरेकटारलेस बदचलन रंडी की औलाद कहते फिरते है....जानती हो कितना दुख होता है मुझे?

आज जिस मुँह बोले भाई को तुम लोग गालियाँ दे रही हो....उसने और ये लड़का (समीर की तरफ उंगली का इशारा करते हुए) अगर ना आते ना तो तुम्हारी यह माँ ये रंडी ज़िंदा नही होती...जिस सरदार की तुम लोग दुहाई देती हो ना उनकी नज़रों में तुम उनकी बेटी नही एक तरस खाई वो बेसहारा लड़कियाँ हो जिसकी कोई औकात नही जिसे उसने तरस खाते हुए अनाथ लड़कियो की तरह तुम्हें पाला है और वो पैसा जानती भी हो क्यूँ देता है? क्यूंकी वो तुम्हारी माँ को चोद्ता है मज़े लेता है....जब ठरक पूरी हो जाती है तो फिर किसी गैर लड़कियो के पीछे कुत्ते की तरह भाग जाता है देखती हो कितना कम आना कर दिया उसने...अर्रे ये मर्द ज़ात सिर्फ़ सेक्स के भूके है ठरक के लिए पैसे उड़ाते है पैसे...और उन्ही पैसो के टुकड़ो में पल रही तुम रंडिया हो समझी...जानती भी है कि अगर ये दोनो उस दिन ना आते तो मेरा क्या अंजाम होता? अर्रे कम से कम मेरा ना सही अपने भाई का तो लिहाज़ करती लेकिन तुम्हे तो ये सब गुनाह दिख रहा होगा कि मेरी माँ को चोद रहा है मेरा अपना भाई...ये भी उसकी मर्ज़ी नही मेरी मर्ज़ी से हो रहा था....तुम्हारे सो-कॉल्ड सरदार बाप ने तुम्हारी रखैल माँ को पैसे देने से इनकार कर दिया था...मेरी मज़बूरी मुझे फिर उस राह पे जाने को कहने लगी...तुम्हारी माँ हां धंधे वाली है रंडी है इसी से गुज़ारा करती है

संजय भी आता है सुन लो हां संजय भी आता है कह देना जिसकी बोली बोलती हो इन सोसाइटी वालो से...अपने उस भद्वे बाप सरदार जी से...मज़बूरी की मारी पार्टी में मैं गयी और मेरी वजह से इसकी माँ (आदम की तरफ इशारा करते हुए) जो हर दुख सुख में मेरे साथ रही हर मुसीबत में उसने कभी मुकरा नही ये आया था मुझे मेरी ग़लतियो के लिए मुझे कितना कोसा फिर भी मैं मोटी चॅम्डी की एक कमीनी बड़जात औरत अपनी नापाक मज़बूरी के लिए इस्की माँ को लेके गयी...और उस बेचारी को मेरी वजह से कितना कुछ सहना पड़ गया...उस दिन तो वो ठरक के मारे कुत्तो का दल मुझे नोच नॉचके के मांर डालते लेकिन किस्मत में बचना था भगवान ने बचा लिया...मैं इतने सालो तक चुपचाप रही कि मैं नही चाहती थी कि तुम्हें मेरे वज़ूद के बारे में कुछ भी मालूम चले...तुम्हारे पिता की वजह से मुझे दूसरो मर्दो का शिकार बनना पड़ा...तुम्हारे पिता की वजह ग़रीबी की ज़िल्लत झेलनी पड़ी..और अब तुम्हारा यह पिता जो तुम्हारी माँ को बीवी नही एक रखैल की तरह रखता है और उसे बुरी तरह चोदता है उसकी वजह से दर्द सहना पड़ा क्या अब भी तुम मुझे खराब कहोगी तो मैं हूँ खराब...

 
अब तक हेमा इतना कह कर चुप हो गयी....वो हाँफने लगी थी....इस बीच मैने उसके बदन पे उसकी साड़ी रख दी थी...मैं जैसे तैसे अपने कपड़े पहनने लगा..और बिना हिचकिचाए रैना के पास आया जो ये सब सुनके लगभग कठोर सी बनी खड़ी थी...ऐसे लग रहा था जैसे उसे कितनी गहरी चोट दिल में लगी हो...मैं उसे और उसकी बहन उमा को समझाने लगा....जो हमारे बीच उसने देखा वो सिर्फ़ एक ज़रूरत थी...उसे उसकी माँ की बच्चेदानी में हुई सूजन की रिपोर्ट्स मैने दिखाई तो वो एक टक उसे देख कर चुपचाप नम निगाहो से अपनी माँ को रोते हुए पाई...

समीर : रैना ग़लती मेरी है तुम अपने भाई और माँ को मत कोसो...शायद मुझे तुम माँ-बेटी के बीच में बोलने का कोई अधिकार नही बनता पर हां मैने हेमा आंटी को पैसे देके इनके साथ संबंध बनाए....हालाँकि इसमें इनकी भी मर्ज़ी थी...और रही बात आदम की तो आंटी की इच्छा अनुसार ही वो हमारे साथ शामिल हुआ

समीर की बात सुन चुपचाप दोनो बहने उसकी तरफ देखने लगी..."सच कह रहा है समीर ग़लती मेरी भी है कि मैने सबकुछ जाने सुने तुम्हारी माँ के साथ संबंध बनाए...कौन बेटी अपनी माँ को ऐसे हालत में देखना चाहेगी अभी कुछ देर पहले जो हमारे बीच हुआ उसके बाद तो हम तुम्हारे सामने मुज़रिम ही है...पर कम से कम हमारे लिए ना सही अपनी माँ का तो सोचो जिसने तुम्हारे लिए इतना कुछ सॅक्रिफाइस है आंड ट्रस्ट मी रैना आंटी की कोई ग़लती नही है अगर अब भी तुम्हें हमसे नफ़रत है तो करो लेकिन आंटी जिसने तुम्हें इतना सपोर्ट किया कम से कम उस बेचारी को तो ऐसे ना कहो एक वक़्त था कि तुम्हारे पिता इन्हें जब काम से आती थी तो साड़ी उतारके इनके गुप्तांगो को चेक करते थे मैं ये बेशरामी से कह रहा हूँ क्यूंकी ये एकदम सच है तुम दोनो को सुनना होगा हां फिर बदन को चेक करते थे कि कही कोई नाख़ून नोचने के किसी गैर मर्द से कही कुछ करके तो नही आई"......आदम ने हिचकिचाते हुए कहा...

अब तो आदम का हिचखिचाना भी कम हो गया इतना समझाने के बाद भी अगर वो लोग खफा होते तो लाज़मी ही था...समीर मेरे पास आया उसने मेरे कंधे पे हाथ रखा और कहा चल अब यहाँ रुकने का कोई फ़ायदा नही...मैने समीर की बात बीच में रोकी और उन दोनो की तरफ गंभीरता से देखने लगा उमा मुझे देख रही थी..मैं उनके सामने अपने कपड़े पहनने लगा...दोनो ने नज़रें इधर उधर कर ली क्यूंकी बहुत देर से हम तीनो उनके सामने अध नंग अवस्था में थे....जाते जाते मैने सिर्फ़ इतना कहा कि अगर मुझसे कोई गुनाह हो गया तो माँफी चाहूँगा लेकिन प्लीज़ मेरे लिए अपनी माँ को मत कोसना...मैं अब कभी इस घर में पाँव भी नही रखूँगा....मुँह बोला भाई ज़रूर दुनिया कहे पर मैं सच्चे दिल से तुम दोनो को मानता हूँ...हालाँकि हेमा आंटी को मैं अपनी माँ जैसा नही मानता पर उनसे मेरा अटूट रिश्ता है जो शायद कोई समझ ना पाए शायद वो भी नही...

इतना कह कर समीर ने मेरी बाँह पकड़ी और हेमा आंटी और उनकी बेटियो को वैसे कशमकश की हालत में छोड़े वहाँ से निकल आए....पूरे रास्ते हम चुपचाप थे समीर ने गाड़ी एक जगह पार्क की...और दो बियर की बॉटल्स लाया...मैं ना नुकुर करने लगा..पर उसने कहा फिलहाल यही एक चीज़ है जो मरहम की तरह काम देगी शायद दिलो के सदमे को ख़तम ना कर पाए पर उभरने तो देगी....मैं बियर वैसे पीता नही था फिर भी दो घूँट मारे उसकी कड़वाहट में मैं मुँह बनाने लगा...समीर हंस पड़ा

समीर : बेहेन्चोद ग़लती मेरी ही थी...खामोखाः तुझे बुलाया इतने सालो का रीलेशन था तुम लोगो का अब ऐसे मुँह फुलाए सदमा लिए उनके घर से रुखसत होना पड़ा तुझे अंजुम आंटी को कुछ बता ना दे उनकी बेटियाँ

आदम : नही समीर वो लोग कुछ नही कहेंगी माँ के इतना कुछ कहने के बाद वो लोग चुपचाप हो गयी पर गहरा सदमा लगा है उन्हें और लगे भी क्यूँ ना? खैर यार हम अपनी शहवत (ठरक) की हसरत को पूरी करने के चक्कर में अपने रिश्तो की बलि चढ़ा देते है...महेज़ दो पल की ठरक के लिए एक चुदाई ने हमारे रिश्तो को कैसे शरम सार कर दिया....यार सच में ये नाजायेज़ रिश्ते सुख कभी नही दे सकते

समीर : उफ्फ हो आदम जो हुआ अब उस पर तेरा बस थोड़ी था.....कल भी तो मैं हेमा के घर गया तो कहाँ उसकी कोई बेटी आई हुई थी? अब एकदम से इत्तेफ़ाक़ देख कि वो दोनो दरवाजे पे खड़ी थी और हम दरवाजे को लॉक्ड भी नही कर सके चल कर भी लेते तो क्या उनके दरवाजे पे दस्तक देने के बाद हम तीनो को एक साथ देख उन्हें फिर भी तो शक़ होता

आदम : खैर जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ...उमा और रैना उनपे क्या बीतेगी यार?

समीर : भाई तेरा दुख समझता हूँ तू छोड़ ना इस बात को...और हेमा का राज़ तो उन दोनो के सामने एक ना एक दिन आना ही था...अब आ तो गया ना सच्चाई से तो वाक़िफ़ हो गये ना

समीर आदम को समझाने लगा आदम भी चुपचाप समीर की बातों को सुनने लगा...उसे दुख तो पहुचा था कि उसकी बेटियाँ ये सब देखके एकदम शॉक्ड हो गयी थी उन्होने अपनी माँ की चुदाई गैर मर्दो से नही देखी थी और आज ग़लती से ही सही उनकी नज़र अपनी माँ पे जब इस हालत में पड़ी तो कहेर उनपर टूट पड़ा था...ना जाने घर में उनके क्या अब तक कलेश हो रहा होगा? यही सोचते हुए मैं चुपचाप सोच की कशमकश में घिरा रहा

समीर : भाई ज़्यादा टेन्षन ना ले अब जो हुआ सो हुआ भूल जा कोशिश कर अब तो मेरा भी हेमा आंटी के घर जाना नही हो पाएगा शायद वो हमसे बात तक करना छोड़ दे...तू अंजुम आंटी के साथ हमेशा हमेशा के लिए जा रहा है बस अपनी गृहस्थी पे ध्यान दे जैसे मैं दे रहा हूँ समझता हूँ आंटी की सहेली थी उनकी बेटियाँ तुझे भाई मानती थी तुझे ये सब सोचके बहुत बुरा लग रहा है पर यार अब हम किस्मत के आगे कर भी क्या सकते है

आदम : हां यार

समीर : अच्छा इन सब हालातों के चक्कर में मैं तुझे बता नही पाया?

आदम : क्या नही बता सका? बोल मैं सुन रहा हूँ

समीर चुपचाप उदासी भरे लहज़े में मुस्कुराया और उसने आदम के कंधे पे हाथ रखा...."अब तू जा रहा है तो मैं भी अब अगले साल तक यहाँ से चला जाउन्गा मुंबई जाने का फ़ैसला कर लिया है मैने"........

."हां तूने बताया था"......आदम ने सुनते हुए कहा

समीर : ह्म वहीं से अपना कारोबार संभाल लूँगा और सोच रहा हूँ कि?

आदम : अर्रे बोल ना भाई चुपचाप क्यूँ है इतना?

समीर : देख अंजुम आंटी कैसा रिक्ट करे? पर मैं चाहता हूँ तू आना ज़रूर अगर आंटी को हमारे बारे में सब मालूम चले तो वो भी आ सकती है...

आदम चुपचाप समीर की तरफ सवली निगाहो से देख रहा था...."किस चीज़ का तू मुझे बुलावा दे रहा है भाई खुल के बता".......समीर शरामते हुए मुस्कुराया और अपनी और सोफीया की शादी की बात बताई....आदम ये सुनके हैरत में पड़ गया फिर उसका चेहरा भी गुलाबी हो उठा ...वो उठके समीर के गले लगा

आदम : ओह हो तो बात यहाँ तक पहुच गई?

समीर : हां भाई अब हम दोनो ने फ़ैसला कर लिया है कि हम शादी करेंगे माँ तय्यार है

आदम : किसी को अगर मालूम!

समीर : अर्रे सिर्फ़ क़ाज़ी ही तो होगा और कौन होगा? और अगर तू शामिल रहा तो वारे न्यारे

आदम : हाहाहा कोंग्रथस ब्रो अब सोफीया आंटी तेरी बीवी बन जाएँगी...फिर उसके बाद

समीर : उसके बाद वोई होगा जो हर शादी के बाद होता है

समीर के इरादे भापते हुए आदम ज़ुबान पे दाँत रखके काटा फिर दोनो हंस पड़े...एकदुसरे से गले मिले...समीर ने आदम को काफ़ी समझाया..फिर कहते हुए गया कि अंजुम को लेके उससे और उसकी माँ से मिलने आए जिस दिन वो जाएगा उससे पहले...आदम पूरा रज़ामंद हुआ उसने समीर से वादा किया...समीर से दूर होने में उसे दुख हो तो ज़रूर रहा था पर नियती का यही खेल था....वो अपनी गृहस्थी को लेके उलझा था तो यहाँ आदम अपनी गृहस्थी को लेके...पूरे दिन का दुख समीर की खुशख़बरी ने एक झटके में गायब कर दिया था

 
मैं जब घर लौटा तो पाया कि माँ चाइ बना रही थी...टी.वी पे गाना चल रहा था...गाना बहुत सेक्सी सा आ रहा था धक धक करने लगा ओह मोहे जिय रा डरने लगा....सय्या बय्या तोड़ना कच्ची कालिया तोड़ ना...दिल से दिल मिल गया मुझे कैसी यह हया...तू है मेरी दिलरुबा क्या लगती है वाह रे वाह".....उसमें माधुरी का नेवेल काफ़ी सेक्सी लग रहा था देखने में उसे देखके ही मैं अपनी पॅंट के उभार को अड्जस्ट करने लगा...इतने में अंजुम अंदर आई तो उसने मुझे मेरे पॅंट को ठीक करते हुए पाया जब उससे निगाह मिली तो माँ जैसे लजा गई

हम दोनो बैठके गाना सुनने लगे..माँ ने देर से आने का कारण पूछा...मैने कहा कि बस समीर के यहाँ चला गया था...माँ फिर शरमाने लगी...उसे कैसे कहता? की अभी कुछ घंटे पहले हेमा आंटी की हम दोनो मिलके चुदाई कर रहे थे..उसके बाद क्या हुआ? वो सब फिर मेरे नज़रों से गुज़रने लगा मैं फिर थोड़ा गंभीर होके चाइ पीने लगा

अंजुम : और कैसी है तेरे दोस्त की माँ? (माँ ने सेक्सी अंदाज़ में कहा वो तीखी नज़रों से मेरी तरफ देखते हुए चाइ की चुस्की लेने लगी)

आदम : बस ठीक है तुझे पता है? समीर और सोफीया आंटी शादी करने वाले है अगले साल

अंजुम : क्या? (इतना कहते हुए अंजुम ने वॉल्यूम थोड़ी कम की टी.वी की) क्या कह रहा है? सोफीया अपने बेटे से निक़ाह

आदम : ह्म तू तो पहली बार ऐसा सुन रही है इसलिए ऐसा भाव प्रकट कर रही है यही सच्चाई है एक माँ होके अपने ही बेटे के साथ वो ब्याह करेगी

अंजुम : रिश्तेदारो को किसी को?

आदम : सवाल ही नही उठता कोई है ही कहाँ उसका? जो लोग थे भी उसके पिता की मौत के बाद उन्हें मामली हालत ना देने से पीछे होके हट गये...वो दोनो तो अकेले है अर्रे तुझे पता है उसने मुझे भी इन्वाइट किया है पर वो जानता नही कि तुझे उसके बारे में ये सब पता है?

अंजुम सर पे हाथ रखके आश्चर्य भाव से बेटे की तरफ बार बार यही सवालात कर रही थी कि एक माँ होके बेटे से वो निक़ाह कैसे कर सकती है?.....मैने उसे समझाया कि प्यार अँधा होता है और भला दोनो की डोर क्या सिर्फ़ जिस्मानी रिश्ते तक सीमित रहेगी इस रिश्ते को वो नया नाम देना चाहते है...और हर रिश्ते के आख़िर में शादी ही होती है फिर संसार बढ़ता है...मुझे तो लगता है कि कहीं शादी से पहले ही बेटा उसे प्रेग्नेंट ना कर दे

अंजुम : हट पागल (माँ ने मेरे कंधे पे थोड़ी कस कर चपत लगाते हुए कहा) ऐसा भी होता है भला

आदम : क्यूँ नही होता? क्या मैं तुझसे प्यार नही करता? चल हम दोनो भी उनकी देखा देखी निक़ाह कर लेते है

अंजुम : छी छी तू भी ना पूरा पागल हो गया है (माँ के शरम से गाल गुलाबी हो गये)

मैं माँ को लज्जा पाते देख मुस्कुरा पड़ा...उसे कस कर अपनी सीने से लगाया और उसके खुले बालों में उंगलिया लपेटने लगा....गाने बहुत सेक्सी आ रहे थे उस गाने के ख़तम होने के बाद रेखा और अक्षय कुमार का गाना बजने लगा उसमें अक्षय कुमार से कैसे उससे तिगनि उमर बड़ी रेखा लिपट लिपट के रोमॅन्स का रही थी....इन दा नाइट नो कंट्रोल क्या कहूँ कुछ तो बोल?....माँ बेशर्मी से मेरे साथ गाना देख रही थी..मैं चुपचाप माँ के साथ गाने का लुफ्त उठा रहा था...बीच बीच में प्यज़ामे के उपर अपना हाथ सहला भी रहा था...माँ ने ये हरकत नोटीस की मेरे हाथ पे थप्पड़ मार मुझे तीखी नज़रों से देखने लगी..

अंजुम : बहुत गंदा हो गया है तू

आदम : इसमें गंदगी क्या है? बताओ ज़रा

अंजुम कह नही पा रही थी वो लज्जित हुए मुस्कुरा रही थी ...उसके बाद टीवी के पास ही बैठके वो अपने बालों पे कंघी करने लगी...मैं भी उसे कमरे में छोड़ वापिस कंप्यूटर में आके बैठ गया....बार बार ख्यालो में हेमा आंटी के घर हुआ वाक़या घूम रहा था...क्यूंकी उमस बहुत पड़ी थी इसलिए मैं सिर्फ़ जॉकी का फ्रेंची पहने कंप्यूटर के सामने बैठा काम कर रहा था....बार बार मन से उन बातों को हटाने के लिए मैं पीसी पे ही आवा आडम्स जो कि लगभग मेरी माँ के उमर की पोर्न्स्टार है उसकी नंगी तस्वीरें देखने लगा....

इस बीच अंजुम अपने बालों को सवारे....जब दूसरे कमरे में अभी घुसने ही वाली थी कि उसने अपने बेटे को देखा जो पीसी पे गंदी गंदी तस्वीरें नंगी औरतो की देख रहा था....अंजुम ने गौर किया तो पाया उन औरतो के स्तन कितने मोटे और लटके हुए थे उनकी चूत पे भी बाल किसी स्टाइल में कटे हुए थे....एक जगह अपनी चूत पे उंगली किए वो दोनो चूत के माँस को हटाए अपनी फांको का हिस्सा दिखा रही थी तो किसी में...बिकिनी उतारते हुए अपने खरबूज़े जैसी चुचियाँ दिखा रही थी...किसी तस्वीर में वो हॅगने की अवस्था में बैठी अपनी गान्ड का चौड़ा छेद दर्शा रही थी...ये सब देखते हुए अंजुम ने चुपचाप चोरी छुपे बेटे को उन तस्वीरो को घूर्रते पाया....

इस बीच आदम ने उन तस्वीरो को हटा दिया और एक फोल्डर खोला उसमें उसकी माँ की कुछ तस्वीरें थी...जिसमें उसने कयि पार्टी वीयर खुले गले और काफ़ी स्टाइलिश ड्रेसस पहने हुए थे...उसके पिता गारमेंट्स लाइन में काम करते थे इसलिए कभी कभी बचा कूचा सॅंपल्स घर ले आते थे...माँ वेस्टर्न ड्रेस नाहही पहनती थी इसलिए वो उन्हें अपने रिश्तेदारो या अपनी सहेलियो में बाँट देती थी कुछ ड्रेस उसने ऐसी ही हेमा आंटी की बेटियों को दिए थे...जिन्हें बेहद पसंद आए

अंजुम ने गौर किया कि कितने अहेतियात से उसके बेटे ने उन तस्वीरो को संभाले रखा है...हर एक तस्वीर में किसी में फिते वाली उपर से लेके नीचे गले से होते हुए छातियो के कटाव दिख रहे है नीचे से घुटनो तक कपड़ा लटका हुआ किसी में उसने एक टॉप जैसी ड्रेस पहनी है जिससे उसकी खुली पीठ से ब्रा का स्ट्रीप दिख रहा है तो किसी में उसने एक स्टाइलिश फ्रॉक पहना हुआ है जो कि हवा के हिलने से लगभग उसकी पैंटी को दर्शा रहा है...आदम ने गौर से उस टाँगों वाले साइड को ज़ूम किया तो पाया माँ ने नीले रंग का कच्छा पहना हुआ था...ये सब तस्वीरे खुद आदम ने ली थी इसलिए उसे याद था...

माँ ने कयि दफ़ा बेटे को मना किया कि ऐसी पिक्स डेलीट कर दे...पर बेटे ने इन्हें संभाल कर एक फोल्डर में रख रखा था कोई 2-3 साल पुरानी पिक्स थी वो....माँ अंदर आई आदम एकदम से माँ की आहट को सुन काँप उठा..माँ उसके कंधे पे हाथ रखके उन तस्वीरो को देखने लगी...."बाप रे ये अब भी तूने संभाल रखी है"........

"ह्म ये ड्रेसस है क्या तुम्हारे पास अब भी".........

."हां है ना अंदर कही दबी हुई है मुझे ये सब पहनने की आदत थोड़ी ना है".......

."ह्म जानता हूँ माँ पर कभी कभी थोड़ा बदलके खुद को देखना चाहिए तुम सच में कितनी मस्त लग रही हो".....

.माँ ने बेटे की पीठ पे हल्की सी चपत लगाई वो शरम से लाल हो गयी थी

अंजुम : ये वाला डेलीट कर दे ना कितना गंदा लग रहा है मेरी पैंटी दिख रही है

आदम : कर दूँगा डेलीट पर तुम वादा करो ये ड्रेसस तुम फिर एक बार पहनोगी और मैं इससे अच्छी ड्रेसस तुम्हें लाके दूँगा

अंजुम : अफ इतना प्यार मुझसे करता है तू (माँ ने नज़ाकत से बेटे के चेहरे की तरफ अपना चेहरा लाते हुए कहा)

आदम : हां माँ बिल्कुल एक बार बस सेट्ल डाउन होने दे फिर देखना

अंजुम : हां देखती हूँ कि तू कितना ज़िम्मेदार मर्द है कैसे मुझे संभालता है? हाहाहा

 
अंजुम को खुश देख आदम को अच्छा लगा वरना कल परसो से उसने सिर्फ़ उसे दुखी पाया था....उसने उठके माँ की तरफ देखा...माँ उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुराइ...माँ ने उसकी गर्दन पे दोनो हाथ रखे और उसे प्यार से देखा तो आदम ने उसके होंठो पे होंठ रखके एक ज़ोर का चुम्मा ले लिया..अंजुम उसकी इस हरकत पे हंस पड़ी...दोनो फिर एकदुसरे से अटखेलिया करने लगे...जैसे दोनो के बीच कितना प्यार हो

अगले दिन आदम ने हेमा की छोटी बेटी उमा को कॉल लगाया उसे कल रात से हेमा आंटी की फिकर थी एक उमा ही थी जो उससे काफ़ी फ्रॅंक थी आदम को लगता था कि दिल ही दिल में उमा उसे अलग निगाहो से देखती हो क्यूंकी आदम के साथ उसकी हर पिक एडिटिंग की हुई होती थी चाहे वो रक्षा बंधन की खीची हुई फोटो हो या फिर ऐसी ..."हां उमा हेलो?"......"ह..हाँ भैया"........उमा ने आवाज़ पहचानते हुए एकदम से कॉल उठा लिया था

आदम : अभी कैसी है तू? रैना कैसी है?

उमा : सब ठीक है यहाँ कल दिन से रैना दी और माँ ने कुछ खाया नही था लेकिन बहेन ने माँ से माँफी माँगी अभी सब ठीक है...दोनो माँ-बेटी बात करने लगी है

आदम : उफ्फ चलो शूकर है आइ आम सॉरी उमा कल मेरी वजह से तुम लोगो को इतना गहरा ठेस पहुचा मैं कैसे माँफी मांगू मैं तो तुम दोनो से नज़रें भी ना मिला सकता

उमा : भैया मैं समझती हूँ मैं जानती थी कि माँ के नाजायेज़ संबंध है पर भैया आप भी उनके साथ कैसे? खैर हम कर भी क्या सकते है हालत के आगे मज़बूर तो हम भी है

आदम : सरदार जी आए उनको कुछ मालूम तो नही चला ना?

उमा : नही भैया वो क्यूँ आते? वो तो मर रहे होंगे अपनी बीवी को लेके उन्हें हमारे घर से क्या? कल कोई और कलेश नही हुआ था माँ से दीदी का वो थोड़ी गुस्सा ज़रूर थी पर अब उसने मुझे कहा कि उसे बेहद बुरा लगा वो आपसे माँफी भी माँगना चाहती थी

आदम : हालत के आगे वो भी क्या कर सकती है उमा खैर जाने दो जो हो गया सो गया बस मैं ये चाहता हूँ कि तू तो कम से कम मांफ कर दे मुझे

उमा : मैने आपको कब बुरा भला कहाँ था भैया? मैं तो आपको अपने भाई से भी बढ़ के मानती हूँ

आदम : खैर मैं अब जा रहा हूँ ना अगले महीने इसलिए सोचा कि मन खट्टा करके ऐसे तुम लोगो से विदा ना लूँ

उमा : क्यूँ कहाँ जा रहे हो आप?

आदम : माँ के साथ शहर छोड़ रहा हूँ...कल ऐसे मोमेंट पे हम मिले कि कोई बात ही नही हो सकी

आदम उमा को सबकुछ ब्यान कर देता है...उमा को बताता है कि वो हेमा आंटी का राज़दार था..वो उमा से मिलने की ज़िद्द करता है..पर उमा बहन के डर से उससे मिलना नही चाह रही थी...पर वो ये बात अपनी माँ को बताती है कि भाई मिलना चाहता है...तो हेमा कोई आपत्ति नही जताती...उमा आदम को बस स्टॉप पे मिलने का कहते हुए फोन काट देती है...वक़्त के अनुसार आदम वहाँ शाम 5 बजे पहुचता है...

जब वो वहाँ जाता है तो साथ में रैना को भी खड़ा पाता है...रैना की मज़ूद्गी पाके वो शर्मिंदगी महसूस करने लगता है....रैना उससे कल जो हुआ उसके लिए माँफी मांगती है....आदम कहता है कि क्या वो अब भी उससे गुस्सा है? बस वो नही चाहता कि वो ऐसे रिश्तो को ऐसे हालात में छोड़के विदा ले..उमा पूछती है कि आख़िर क्या बात हो गयी जो वो अंजुम आंटी को लिए शहर छोड़ रहा है...आदम कहता है कि ये जगह बात करने के लिए ठीक नही....वो उन्हें अपने साथ एक रेस्टोरेंट ले आता है...पहले रैना ना नुकुर कर रही होती है कुछ ना ऑर्डर देने के लिए वो उदास होती है तो आदम ही तीन कॉफी का ऑर्डर देके बाद में बाकी ऑर्डर देगा बोलके वेटर को भगा देता है

फिर दोनो को तफ़सील से समझाने लगता है...."देखो रैना और उमा हेमा आंटी के सामने तुम्हें मैं इतना कुछ कह तो नही सकता था...पर तुमने हमे जिस हालत में देखा उसके बाद यक़ीनन किसी भी बेटी का अपने भाई या माँ से विश्वास उठना तय है...पर यही सच्चाई है कि मैं आंटी से पहली बार मिला हूँ"......इतना सुनते ही रैना और उमा दोनो जैसे लजा जाती है आदम हिचकिचाते हुए उनके हालत को समझे चुप हो जाता है

फिर वो उन्हें कहता है कि जो कुछ भी हुआ वो किस्मत का फेर है...समीर अब उनके घर नही आएगा...वो पार्टी वाली बात दोनो के आगे रखता है फिर दोनो को समझाता है कि उसकी माँ ये सब मजबूरी में कर रही है आज से नही करीब 7 सालो से पर वो हर किसी से संबंध नही बनाती थी लोग ही उसकी आबरू के दुश्मन बने फिर रहे थे उसने ये लाइन इसलिए चुना कि उसे अपना घर चलाना था तुम दोनो को पालना था वो ईमानदारी से कामवाली की भी नौकरी के बाद फॅक्टरी में लगी लेकिन वहाँ भी ग़रीबी और लोगो की हवस ने उसे एक बार फिर मज़बूर कर दिया कि वो संबंध बनाए...उनकी बातों का बुरा ना माने...उन्हें उल्टे समझने की कोशिश करे....उनके ही बदौलत आज सरदार उसकी बेटियों को देख रहा था....रैना दिल ही दिल में सरदार से नफ़रत करती थी उसने सॉफ कहा कि हम जानते है लेकिन हम चुपचाप थे हमे बस ये लगा कि हमारी माँ कितनी गंदी औरत है?

आदम : बस इसलिए तुम लोग उसे बुरा कह रहे हो हालत को समझो अगर उसने सरदार से झूठी शादी का ढोंग जो खुद सरदार ने किया सिर्फ़ इस संबंध को और तुम्हारे आगे इस रिश्ते को जायेज़ करार देने के लिए तो सिर्फ़ तुम्हारे लिए वरना उसे हेमा आंटी से कोई प्यार नही....देखा कल रिपोर्ट्स मे कैसे उसने हेमा आंटी को दर्द दिया

उमा : हम जानते है भैया पर अब हम क्या करें? हमे लगा कि आप भी उन आदमियों जैसे है जो हमारी माँ के पेशे का फ़ायदा उठा रहा है

आदम : ऐसा बिल्कुल नही सबकुछ रज़ामंदी से हुआ था...लेकिन वो मेरी पहली और आखरी भूल थी अब मैं वहाँ कभी नही आउन्गा

रैना : भैया ऐसा ना कहे हमे अपनी ग़लती का अहसास है हम मिसअंडरस्टेंडिंग में आ गये थे

आदम समझता था दोनो को झटका लगा था अपनी माँ की चुदाई देखते हुए....रैना ने ये तक बात रख दिया कि वो नही चाहती कि उसकी माँ ये पेशा और अपनाए उसने आदम को कहा कि अगर मज़बूरी ज़्यादा है तो वो भी ये पेशा जाय्न कर लेगी चाहे जो कुछ उसकी माँ ने पैसो की मज़बूरी में किया वो भी कर सकती है...उमा ने भी साथ में हामी भरी..तो आदम ने उन्हें डांटा

आदम : भूल से भी ये बात ना कहना बहन मानता हूँ तुम्हें मानता हूँ ठरक और हवस की हसरतों ने मेरे ईमान को डगमगा दिया जो मैं आंटी के साथ ये कर बैठा पर प्ल्स तुम लोग इस लाइन को नही चुनना तुम पढ़ी लिखी हो उमा बी.कॉम कर चुकी है सी.ए के अंडर काम करती है क्या मैं नही चाहता कि तुम दोनो किसी लायक बनो अपने घर पे लगे उस दाग को मिटाओ जिन लोगो ने लांक्षन लगाए है उनके चेहरो पे कालिख पोतो और उन्हें दिखलाओ कि तुम भी कुछ हो तुम किसी रंडी की बेटी नही एक ईमान घर की लड़किया हो तुम दोनो कुँवारी हो कल को शादी होगी क्या मैं नही चाहता कि तुम्हारी गृहस्थी खुशियो से भारी हो कोई चीज़ की कमी नही हो तुम्हे ये पेशा जो तुम्हारी माँ ने इकतियार किया क्या है इसमें? सिर्फ़ मज़बूरी और दर्द हम में से कुछ ही मर्द हों जो औरतो की मज़बूरी और खासकरके ऐसे औरतो के दिल को समझ पाए पर मैने समझा है कि तुम्हारी माँ ने कितना दुखा झेला कितने दर्द से तुम लोगो की परवरिश की...सिर्फ़ अपना जिस्म बेचके क्या हसरत पूरी कर लोगे तुम जिंदगी की हसरत कभी मिटती नही ये और भी ज़्यादा सुलगती है

आदम की बातों से दोनो चुपचाप सी हो गयी.....उन्हें जैसे अहसास हुआ अपनी माँ और खुद के हालातों का....क्या कोई कह सकता था? कि वो यह वो इंसान बोल रहा है वो इंसान जिसकी निगाहो में रत्ती भर के लिए अपनी बहन के प्रति कोई बुरे ख्याल नही थे हालाँकि वो उसकी सग़ी बहनें नही थी...क्या कोई कह सकता है जो कल तक आयाशी करता फिरता था वो आज एकदम से इतना बदल गया था

आदम के हौसला देने से दोनो काफ़ी चुपचाप हुए जैसे उसकी बातों को मान रही थी....आदम के समझाने के बाद दोनो उसके गले लग्के रोने लगी...आदम ने दोनो को समझाया कि वो भले ही उनका गैर ही सही पर जब बहन माना है तो वो उनपे ऐसी गंदी नज़र नही रख सकता ना ही उन्हें किसी भी गंदे हालातों में देख सकता है...आदम ने उनसे कहा कि घर जाए माँ को मनाए समझाए और खुशी मन से रहे...उमा और रैना को नाज़ हुआ कि वो जैसा आदम को समझ रही थी वो वैसा था नही शायद जो कुछ उस दिन उन लोगो ने देखा वो सिर्फ़ हेमा और आदम के बीच एकदुसरे की हवस थी

आदम के मनाने के बाद वेटर को दोनो ने ऑर्डर्स दिए फिर खुशी मन से दोनो बहनें आदम से गले मिलके चली गयी.....उन्होने चाहा कि अंजुम हेमा से मिल ले....पर आदम ने बताया कि शायद ही वो माने....आदम को खुशी हुई कि उसका टूटते रिश्ते की डोर उसने वक़्त रहते संभाल ली वरना ज़िंदगी भर ये अफ़सोस रह जाता और दोनो उसे हीनभावना और घृणा भरी नज़रो से ही देखती....घर आके उसने माँ को काफ़ी समझाया था.....काफ़ी समझाने के बाद माँ और आदम दोनो हेमा आंटी के घर गये उनसे मिले.....दोनो सहेलियो ने आपस के गीले शिकवे दूर किए तो आदम भी अपनी बहनों से मिलके उनके साथ हँसी खुशी पल बिताने लगा

वो जैसे आखरी मुलाक़ात थी...उनसे विदा लेने के बाद सच में दोनो का मन भर आया था....समीर को फोन करके आदम ने जब सबकुछ बताया तो वाक़ई वो आदम से काफ़ी इंप्रेस हुआ कि किस तरह उसने उसने रिश्तो को टूटने और बिखरने से बचा लिया था...और उससे भी बढ़के वो चाहता तो अपनी बातों से उमा और रैना अपनी मुँह बोली बहनों को राज़ी करके उनके साथ कुछ भी कर लेता...पर समीर मुस्कुराया वो जानता था आदम का दिल सॉफ है वो रिश्तो की अहमियत को समझता था...हालाँकि समीर को ये नही मालूम था कि आदम अपनी माँ को सिर्फ़ माँ नही एक अलग नज़रिए से देखता है उससे अटूट प्यार करता है...क्यूंकी उसका प्यार सच्चा था और कही हद तक उसी के प्यार ने आदम को हवस भरी हसरतों से निकाल एक सच्चा प्रेमी बना दिया था

आगे ये कहानी क्या मोड़ लेने वाली थी इसका अंदाज़ा किसी को नही था

 
सुबह 9 बज चुके थे...और पति के जाने के बाद अंजुम रसोईघर में आके बर्तनो को मान्झ्ने लगी थी...मान्झ्ते वक़्त वो एक बार पीछे मूड के थोड़ा सा झाँकके बेटे के रूम को देख रही थी...उसने पाया बेटा अब तक घोड़े बेचके सो रहा था...अफ ये लड़का कितना आलसी हो गया? फिर माँ के दिल में आया बेचारे के पास है ही क्या? ना सर छुपाने के लिए अपना छत ना ही कोई संपत्ति ना ही कोई आशा ना ही कोई लाइफस्टाइल...उसका रावय्या हमेशा से अंजुम के लिए चिंता जनक ही रहता था कितना गुस्सैल था वो? और आज कैसे बड़ी बड़ी बातें करता है?...कितना बड़ा हो गया है ऐसे ख्याल रखता है उसका कि जैसे उसकी घरवाली हो

और एक उसका पति है जिसे अपने बीवी बच्चे से अलग होने का कोई दुख नही....अंजुम अपने पति को कोसते हुए काम कर रही थी....आज वो पति के ऑफीस के जाने के बाद सोई नही उसने अपनी नमाज़ पूरी की और फिर घर के काम काजो में लग गयी...जब वो फिरसे बेटे के रूम में आई तो उसने पाया कि बेटा आधी नगन अवस्था में सो रहा था....एक तो वो गर्मी ज़्यादा लगने की वजह से उपरी बदन पे कोई कपड़ा नही पहनता था और आज उसका पाजामा उसके पिछवाड़े से नीचे तक उतर गया था....नींद में इतना था कि उसे ख्याल नही.....आज पहली बार माँ की नज़र अपने बेटे की नंगी गान्ड पे गयी..जो कि बालों से भरी थी...अंजुम बार बार देख रही थी बीच बीच में लजाते हुए अपनी नज़रें फेर देती..लेकिन बार बार उसकी निगाह बेटे की नंगी पीठ से होते हुए उसकी गान्ड पे आ जाती..वो आगे बढ़ी उसने अपने दाँत पीसते हुए बेहद शर्मो हया में अपने बेटे के प्यज़ामे को ठीक करते हुए उसे उपर किया..जिससे बेटा एकदम से हरकत में आ गया और उसने लगभग माँ की कलाई पे हाथ रखा.....वो अधखुली आँखो से माँ की तरफ देखने लगा

माँ एकदम से उसकी पीठ पे चपत लगाते हुए उसे नज़ाकत से देखने लगी..

आदम : क्या माँ उफ्फ? तुमने जगा दिया

अंजुम : अर्रे ओ आदम कम से कम सोते वक़्त ठीक से कपड़े तो पहना कर तेरा पाजामा उतरके तेरी टाँगों के बीच में आ गया था...छी तेरा पाछा (आस) देख लिया मैने (माँ इतना कहते हुए शरमाते हुए हँसने लगी)

आदम : हाहाहा क्या माँ? तुम भी अफ (आदम ने अपने पाजामे को ठीक किया और उठ बैठा उसे अहसास हुआ कि वो सपना नही हक़ीक़त में माँ उसके बदन पे हाथ रखी थी लगभग पाजामा उपर खिसकाने के वक़्त उनका नरम हाथ बेटे की गान्ड पर से होता हुआ पीठ तक टच हुआ था)

अंजुम : अब चल ज़्यादा देर मत कर दोपहर सर पे है अब जल्दी उठ नाश्ता कर और थोड़ा फ्रेश हो जा और अपने कपड़े दे धोने है

आदम : तुम भी माँ इतनी सुबह सुबह सब करने लगती हो

अंजुम : अच्छा जी देर से सोयु देर से जागू पता है तुझे है मेरी कमर दर्द कितना बढ़ जाता है...उपर से अब तू ज़िम्मेदार हो गया है कल नौकरी करेगा ऐसे सोए पड़े रहेगा क्या?

आदम : अच्छा मेरी अंजुम मैं उठता हूँ

अंजुम : हावव माँ का नाम लेता है

आदम : क्यूँ मैं तेरा नाम नही ले सकता?

अंजुम : चल पगले उठ अर्रे हाथ छोड़ ना (आदम ने शरारत से माँ की कलाई पकड़ी...माँ अपने कलाईयों को छुड़ाने के लिए मरोडने लगी)

आदम : माँ आज तूने मेरी पसंद की चूड़ियाँ पहनी है

अंजुम को समझ आया कि बेटे ने उसकी कलाई क्यूँ पकड़ी? ...... बेटा की दिलाई हुई उसने चाँदनी चॉक से खरीदी वो लाल रंग की चूड़ियाँ पहनी हुई थी...माँ शर्मा गयी....बेटे ने उस पर हल्का सा चुंबन ले लिया

अंजुम : बस बस बहुत हुआ अब चलो उठो मुझे भूक लगी है बाबू (माँ ने बेटे के बालों पे हाथ रखके उसे झाड़ा)

आदम : अच्छा माँ उठ रहा हूँ चल

बेटा माँ के हाथो का सहारे लिए उठ बैठा और उसके कंधे पे अपना हाथ रखा....माँ ने कोई आपत्ति नही जताई...वो रसोईघर वापिस से चली गयी तो आदम बाथरूम....कुछ ही मिनट में ब्रश करके मुँह हाथ धोके आदम ने अपने गंदे कपड़े उतारके उसे टब पे रखा....वो रसोईघर में तौलिया लपेटे आया...उसने माँ की तरफ देखा जो उपर हाथ ले जाके सौंफ का डिब्बा उतार रही थी....वो एडियों को उच्काये हुए हाथ उपर ले जाने का प्रयत्न कर रही थी...

आदम : माँ वो उम्म नीला हाफ पॅंट कहाँ है?

अंजुम : अफ आल्मिरा में होगा देख ले ना?

आदम : अर्रे माँ पूरा अलमारी छान लिया कही नही मिली?

अंजुम : देख बेटा मैं अभी इस डब्बे को उठाने में लगी हूँ तू देख लेना

आदम : ठीक है माँ

आदम अभी दो कदम पीछे मुड़ा ही था कि इतने में वो वापिस मुड़ा....क्यूंकी डिब्बा जो काफ़ी उचाई पे था वो माँ को पाना संभव नही था हालाँकि उनके हाथ काफ़ी उचाई तक पहुचे थे पर उतने नही....उनकी उंगलिया कगार तक को छू रही थी....आदम माँ के पास आया करीब 1 उंगली के फ़ासले पीठ माँ की उसकी तरफ थी माँ पसीने पसीने हो रही थी...क्यूंकी रसोईघर में वो बहुत देर से काम कर रही थी..."बेटा तू मदद कर ना"...माँ ने आख़िर कह दिया....इसमें आदम को एक शरारत सूझी...और उसने बिना माँ को आभास कराए उसके नितंबो के नीचे से पेट तक अपने हाथो को लपेट लिया...इस हरकत से माँ बौखलाई...

"अर्रे अर्रे क्या कर रहा है उईइ माँ गिर जाउन्गीइ या अल्लहह आहह"....माँ चीख पड़ी बेटे ने उसे अपने बल से झुकाते हुए उसके नितंबो से लेके पेट पे हाथ रखके कस कर उपर उठा लिया..माँ उसके सहारे से उठने से काफ़ी उपर तक आ गयी...उसने फट से सौंफ की डिब्बी उठाई और काँपते हाथो से उसे लगभग नीचे गिरा डाला...."बाप रे बेटा मुझे उतार ना बहुत डर लग रहा है"........आदम हँसने लगा माँ को भयभीत देख...पर उसे अपनी माँ का गुदास नितंबो के बीच सर रखने में कोई हीचिकिचाहट नही हुई..बल्कि माँ के जंपर और पाजामा दोनो पसीने से भीगे थे

आदम : अर्रे माँ और कुछ है तो उठा के नीचे रख दे मैं तुझे आराम से पकड़ा हुआ हूँ

 
अंजुम : बेटा तू मुझे नीचे उतार ना बस बस हो गया प्लज़्ज़्ज़

आदम : तेरे जैसी नाज़ुक औरत को मैं ज़िंदगी भर तक ऐसे अपनी गोद में उठाए थामे रह सकता हूँ

अंजुम सहमी बेटे के अपने पेट को लपेटे हाथो पे हाथ रखके कस कर पकड़ी हुई थी....बेटे ने जिस भाती उसे नितंबो से उठाया था फिर उसे वापिस नीचे उतारने लगा...इस बीच उसका तौलिया खुला और वो एकदम नंगा माँ को गोद में उठाए ठहर गया

अंजुम : क्या हुआ अब उतार भी?

बेटा झुक गया वो कैसे माँ को कहता कि नीचे उसका 8 इंच का लॉडा उसे उसकी माँ को गोद में उठाने से खड़ा है....उसके नितंबो को बीच बेटे का सर था इसलिए उसने धीरे धीरे माँ को उतारना शुरू किया जब माँ ने किचन सेल्फ़ पे हाथ रखा तो उसके जान में जान आई..वो पूरी तरीके से बेटे की गोद से उतर चुकी ज़मीन पे पाँव रख चुकी थी..उसकी जान में जान आई बेटा इस बीच पीछे होके तौलिया उठाने लगा

तो माँ जैसे पलटी तो वो सहन उठी बेटा पूरा नंगा उसके सामने झुका हुआ था और उसके टाँगों के बीच उसका लंड झूल रहा था वो उत्तेजित हालत में अंजुम को लगा....उसने फट से नज़रें फेर ली

अंजुम : उफ्फ इस लड़के का क्या करूँ? पहन जल्दी अपना तौलिया क्या करता है तू? ढंग से तौलिया बाँध नही सकता इतना बड़ा हो गया पर अकल रत्तिभर की नही तुझमें

आदम : हाहाहा सॉरी माँ वो बस ध्यान से हट गया मुझे लगा कि सौफ़ की डिब्बी उठाने में तुझे कही चोट ना लग जाए

अंजुम मन ही मन शर्मा रही थी उसकी निगाहो में बेटे का लंड घूम रहा था वो इस बात से परेशान हो गयी कि उस दिन के बाद फिर उसके ज़ज़्बात उमड़ रहे थे उसने अपने उत्तेजित होते दिल को संभाला और चुप सी हो गयी...आदम तौलिया लपेटे माँ को पीछे से अपने बाहों में भर लेता है...माँ उसके इस हरकत से आँखे बड़ी किए हड़बड़ा जाती है..."उफ्फ क्या कर रहा है छोड़ ना".....

"अर्रे माँ बस ऐसे ही तुझपे प्यार आ गया"...

."अच्छा नाश्ता तो बनाने दे फिर जी भरके प्यार कर लेना और अभी तूने कपड़े भी नही पहने तू जा"......

"अच्छा जाता हूँ".....आदम तौलिया ठीक किए वापिस रूम में चला गया

इस बीच अंजुम को अहसास हुआ कि बेटे के टाँगों के बीच जो लंड उसने फुरती से अपनी तौलिया लपेटके छुपा लिया था वोई उत्तेजित लंड उसे अपने नितंबो के बीच कपड़े के उपर से ही चुभता महसूस हुआ...वो जानती थी बेटा उत्तेजित हो जाता है इसलिए वो खुद पे संयम नही पा पाता और अंजुम के साथ ऐसी हरकत कर बैठता है...लेकिन आज अंजुम को बेटे के उत्तेजित लंड और उसके स्पर्श से ही उत्तेजना अपने तन बदन में महसूस हो रही थी..."उफ्फ ये मैं क्या सोचने लगी छी नही मैं आदम को समझाउंगी मैं उसकी माँ हूँ माना मैने उससे वादा किया था उस दिन पर नही अगर मैं उसे कुछ कहूँगी नही तो खामोखाः फिर उदास हो जाएगा या अल्लाह किस दुविधा में फस गयी हूँ मैं"........अपने आप को कोसते हुए अंजुम थोड़ी परेशान सी हुई

जब वो बेटे के साथ नाश्ता कर रही थी...तो उसने पाया बेटा उससे नॉर्मली बात चीत कर रहा था...अंजुम भी एक पल को सब भूल गयी और वो भी नॉर्मल उससे बातें करने लगी...दोनो हेमा और उसकी दोनो बेटियो की बात कर रहे थे..उसका दिल उस दिन के बाद खुद को कोस रहा था कि शायद हेमा का उसने ज़्यादा दिल दुखा दिया...पर आदम ने उसे गिल्ट करने से मना किया उसने समझाया कि ग़लती उसकी भी थी..खैर वो सब बातें अब तू भूल जा और अब आगे की सोच...अंजुम भी भूल गयी थी कि उसे अपने बेटे के साथ दिल्ली छोड़ना था...आदम ने नाश्ता ख़तम किया माँ को टिकेट्स दिखाई...माँ उससे उसके काम काज और घर जो उसके काका ने मूहाय्या कराया था दोनो के लिए उस विषय पे चर्चा करने लगी...

आदम : तू फिकर मत कर माँ बस एक बार हम बाबा को छोड़ दें और एक साथ रहने लगे फिर देखना पिताजी खुद पे खुद तेरे पाँव पे गिरके आएगा

अंजुम : बेटा इतने सालो से साथ थे हम मुझे भी तेरे पिता से ना जाने क्यूँ इतनी नफ़रत सी होने लगी है....कभी समझे नही हम लोगो को

आदम : तू फिर दुखी होने लगी क्या फायेदा? उस आदमी का सोचके जिसे हमारी रत्तिभर परवाह नही मानता हूँ उससे मैं पैदा हुआ पर क्या सुख मिला तुझे? तू ही बता एक बार भी उसने हमारे लिए कुछ सोचा क्या कर रखा है उसने?

अंजुम : ठीक है बेटा तू नाराज़ मत हो गुस्सा थूक दे मैं भी देखती हूँ उस आदमी को कितने दिन अकेले खाता पीता है आज जो यहाँ का मुँह देख रहा है मेरी वजह से वरना किसी जुआरी और कर्ज़ख़ोर से कम नही था वो इंसान (अंजुम ने जैसे घृणा भरी नज़रों से कहा)

आदम ने अंजुम के चेहरे को सहलाया...और दोनो एकदुसरे के गले लग गये...आदम ने अंजुम की पीठ को सहलाया और उसके लगभग पीठ पे चूम लिया.....अंजुम से अलग होते ही आदम बाहर चला गया....अंजुम ने उसे प्यार से देखा जैसे उसे कितना प्यार उस पर आ रहा हो..अगर आज वो सहारा ना बनता तो पति कबका उसको घर से निकाल देता...उसे खुशी थी उसके पति का घमंड गुरूर आदम ने एक ही बार में सब चकनाचूर कर दिया था...

दिन कटने लगे.....शिफ्टिंग वालो को उनके पिता ने बुलाके जितने सामान थे सब सामान ट्रक्स में लोडेड करवाना शुरू किया...कुछ सामान उन्होने बेच दिया और कुछ को उनके नोएडा वाले किराए के कमरे में भेज दिया....आदम ने भी अपने सामान को बाँधना शुरू किया और उसे एक जगह रख दिया....माँ चुपचाप समान को जाते देख रही थी उसे बेहद बुरा लग रहा था...आदम जो टेप लगा रहा था वो सामान में टेप लगाते हुए माँ को ज़ज़्बाती होता देख उनके पास आया और उसने माँ के दोनो कंधो को पकड़ा और मुस्कुराया...जैसे वो माँ को हौसला दे रहा था....माँ भी मुस्कुराइ अब उसे पीछे मूड के देखने की कोई ज़रूरत नही था....

बस अब कुछ दिन ही रह गये थे....पिता ने उससे सवाल किया कि वो कब जा रहा है? तो आदम ने उसे टिकेट्स दिखाए पिता ने उसे ले जाते अपने सामान को देखा खर्चे के बारे पूछा नही जानते थे ना बेटा उस पर उन्हें हाथ रखने देता ना ही उन्हें बेचने..क्यूंकी वो सामान सब उसकी ज़रूरत के थे और वो उन्हें अपने साथ होमटाउन ले जा रहा था....

समीर की मदद से आदम ने अपने सामान को होमटाउन भिजवाने के लिए ट्रांसपोर्ट वालो को दे दिया...जो सामान लेके होमटाउन के लिए निकल चुके थे....समीर ने उसे बताया कि जब वो वहाँ पहुचेगा उसके ठीक दूसरे दिन ही वो सामान सारे बताए पते के अनुसार उसके घर के पास ट्रक के साथ आ जाएगा....आदम ने समीर की मदद का काफ़ी शुक्रियादा किया..पर समीर ने उसके पीठ पे थापि मारते हुए कहा भला वो उसके काम नही आएगा तो कौन आएगा?....

समीर : खैर तो आंटी और आदम तुमको मेरे घर आना पड़ेगा...इतने दिनो बाद आप लोगो से मुलाक़ात हुई और इस तरह अचानक यूँ आप लोग घर छोड़के जा रहे हो मुझे बुरा लग रहा है

अंजुम : कोई बात नही बेटा तुम भी आना और तुम सोफीया के साथ ही आओगे पर मुझे आदम ने बताया कि तुम जा रहे हो

समीर : हां आंटी बस अगले साल ही तो मैं चला जाउन्गा अब वैसे भी यहान रहके क्या दोस्त भी नही यहाँ रहेगा और माँ भी कह रही है कि उन्हें यहाँ अच्छा नही लग रहा कोई है नही ना अपना उनकी सहेलिया भी उधर ही मुंबई में है और हम तो वहीं के थे सो

अंजुम : आइ आम सॉरी बेटा कि हमारी वजह से तुम

समीर : नही नही आंटी मैं तो आदम का कॉलेज से ज़रूर दोस्त बना पर सच में ऐसा लगता है जैसे एक ही कश्ती के दो सवार हों

 
आदम जानता था समीर ने ऐसा क्यूँ कहा? अपनी माँ की तरफ आकर्षित होने की वजह से उसने ऐसा कहा था लेकिन उसकी बातों में ही वो जता रहा था कि शायद वो ग़लत था आदम बहुत पाक दिल का है..कि उसने अपने खुशी भरी ज़िंदगी को छोड़के वापिस दिल्ली आने का फ़ैसला किया....और सबसे बढ़ कर अपनी माँ को संभाला

अंजुम भी समीर के सामने बेटे की तारीफ करने लगी...आदम शरमा रहा था...समीर ने उसे आँख मांर दी....कुछ देर बातचीत के बाद समीर ने आदम और अंजुम दोनो को अपने घर दावत में इन्वाइट किया कहा फिर मौका मिले ना मिले....आदम उसके गले लगा समीर थोड़ा भावुक हो गया

आदम : अर्रे भाई मैं तो हूँ ना हर्वक़्त कॉल करूँगा और वीडियो चॅट भी

समीर : बिल्कुल करना होगा साले पहले तो फोन करता था तो उठाता नही था (समीर ने आँख मांर दी आदम समझ गया कि उसने ऐसा क्यूँ कहा उसे याद आया कि जिस दिन उसका कॉल आया था वो चंपा के साथ था समीर तो सबकुछ जानता था उसने मुस्कुरा दिया आदम को भाँपते हुए देखकर)

आदम : अब गॅरेंटी देता हूँ तेरे उठाने से पहले मैं फोन रिसीव करूँगा और इतना तुझे परेशान कर दूँगा फोन कर करके कि पगला जाएगा तू

समीर आदम और अंजुम हँसने लगे...समीर ने फिर अंजुम को सलाम किया जाने से पहले...आदम उसे गेट तक छोड़ने गया..फिर समीर आदम के घर से चला गया....माँ उसके उपर आते ही उसके कंधे पे हाथ रखके उसे अंदर ले आई....शाम तक पिता नोएडा में सामान शिफ्ट करके आ चुके थे...वो आदम और माँ के निकलने के 20 तारीख के बाद घर खाली करके जाने वाले थे...

नानी के घर जाने से पहले हम समीर और उसकी माँ से एक आखरी मुलाक़ात कर लेना चाहते थे...इसलिए हम दोनो माँ-बेटे समीर की दी दावत पे दोपहर 12 बजे निकले...चूँकि समीर अपनी माँ के साथ अकेला ही रहता था इसलिए हमे उसके किसी भी और सदस्य के ना होने से टेन्षन ना थी...माँ थोड़ा खुले गले वाला सूट पहनी थी जो काफ़ी उनपे सेक्सी लग रहा था...मैं वोई फॉर्मल शर्ट और जीन्स में तय्यार था जल्दी जल्दी तय्यार होके समीर के यहाँ पहुचे

समीर जैसे हमारे ही स्वागत में पलके बिछाए बैठा था....झट से दरवाजा खोल उसने मेरा और माँ का बड़ी इज़्ज़त से स्वागत किया....मैं समीर के गले लगा और हम भाई अंदर आए....माँ के वेलकम के लिए सोफीया आंटी पास ही खड़ी थी उन्होने ट्रॅन्स्परेंट सी ब्लॅक साड़ी पहनी हुई थी और मॅचिंग फिते वाला ब्लाउस देखके लग ही नही रहा था...कि वो सोफीया आंटी थी....समीर ने मुझे पीछे से हल्का सा धक्का दिया मैं जब उसकी तरफ मुड़ा तो उसने इशारे से कहा देख मस्त लग रही है ना?....मैने भी इशारे से एक आँख मारते हुए अंगूठा दिखाया

सोफीया आंटी माँ के गले मिली...दोनो को आपस में घुलते मिलते देख ऐसा लग रहा था जैसे कितने सालो की सहेलियाँ हो .....इतने में समीर ने मेरी माँ ने जो सूट पहना उसकी तारीफ कर डाली....अंजुम जैसे झेंप गयी वो शरमाई नज़रों से मुझे देखने लगी और सोफीया आंटी को...सोफीया आंटी भी हंस पड़ी

समीर : सच में आंटी आज आप बड़ी ब्यूटिफुल लग रही हो लगता है आदम ने आते ही आपको बिल्कुल बदल दिया

सोफीया : हां हां क्यूँ नही भला बेटे के सुख से बढ़ के हम माँ को कहाँ से खुशी मिल सकती है भला?

आदम : अर्रे आंटी खाली मेरी माँ की तारीफ होगी और आप तो लग ही नही रही कि आप सोफीया आंटी हो जिसे मैं कॉलेज टाइम से देखता हुआ आया हूँ

समीर और सोफीया भी शरमाते हुए हंस पड़े इस बार अंजुम भी मेरी तारीफ सुनके हंस पड़ी...."हां सच में सोफीया जी आप तो बहुत ही खूबसूरत लग रही है चेहरे पे कितना निखार आ गया आपके"........अंजुम की बात सुन समीर की माँ का चेहरा लाल हो गया...समीर बस शरमाता हुआ माँ की तारीफ सुन रहा था और सोफीया आंटी उसे चोर निगाहो से शरमाये देख मुस्कुरा रही थी....दोनो का नैन मटक्का देख मैने समीर को हल्की सी चूटी काटी तो समीर हंस पड़ा

मैं उसे ऐसा जता रहा था कि कम से कम मेरी माँ का तो लिहाज कर ......लेकिन उसे क्या पता? कि अंजुम को कल रात ही मैने इन माँ-बेटो की शादी तय होने की बात बता दी थी इसलिए माँ उन्हें देख देखके मुस्कुरा रही थी...

सोफीया : अच्छा भाई सारी बात यही हॉल रूम में करेंगे क्या चलो आदम बेटा उम्म्म अंजुम जी मैं खाना लगाती हूँ

समीर : हां आज मेरी माँ ने गरमा गरम आप लोगो के लिए चिकन बिरयानी बनाई है

अंजुम : अर्रे वाह सोफीया जी तब तो आज आपके हाथो का ज़ाएका मिलेगा खाने को

सोफीया : ज़रूर ज़रूर चलिए आओ तुम लोग भी (सोफीया अंजुम को कह कर किचन में चली गयी अंजुम मदद करने गयी तो समीर ने उन्हे मना कर दिया)

हम दोनो माँ-बेटे डाइनिंग टेबल के पास लगी कुर्सियो पे बैठ गये....माँ पानी पीने लगी...माँ दोनो माँ-बेटों को किचन में इकहट्टे काम करते देख काफ़ी खुश हुई उसे लग ही नही रहा था कि ये कोई प्रेमी जोड़ा हो सकता है कैसे इन्होने खूनी रिश्तो के अंदर ही अपने एक नये संबंध को जनम दिया था...माँ ने मेरे बाज़ू पे कोहनी मारी तो मैं उनकी तरफ पलटा

आदम : क्या हुआ माँ?

अंजुम : वाक़ई देख किस्मत हो तो ऐसी तेरा दोस्त समीर अपनी माँ का कितना ख्याल रखता है? और इतने आलीशान फ्लॅट में रहता है वाक़ई देख कैसे अपनी माँ का हाथ बटा रहा है (माँ ने मुझे माँ-बेटों की तरफ इशारा करते हुए कहा)

आदम : अर्रे माँ क्या मैं तेरा घर के कामो में हाथ नही बटाता

अंजुम : उफ्फ पगले मैं कह रही हूँ दोनो को देख मैं तो सिर्फ़ सुनती थी पर सच में तेरा दोस्त तो अपनी माँ का पूरा दीवाना है.....ऐसे उसके साथ व्यवहार कर रहा है जैसे मिया बीवी हो

आदम : तो क्या हर्ज़ है? मैं क्या कहता नही था? कि ऐसे रिश्तो में प्यार भरपूर होता है

अंजुम : हां सच कहा तूने शुरू शुरू में अज़ीब सा महसूस होता है पर माँ-बेटों के रिश्तो में जो प्यार घुला हुआ होता है वो तो हर संबंधो से बढ़ के है

आदम : ह्म अच्छा वो लोग आ रहे है ज़्यादा डिस्कशन मत करना मैं समीर को अपने और तेरे बारे में कुछ नही बताता

अंजुम : मतलब क्या नही बताता?

आदम : कि हमारे बीच भी एक और रिश्ता जुड़ सा गया है (इस बीच आदम ने टेबल पे रखे माँ के हाथो पे हाथ रख दिया और उसे हल्का सा सहलाया दोनो एकदुसरे को प्यार भरी निगाहो से देखने लगे)

समीर के आने की आहट को सुन दोनो ने झट से अपने हाथ अलग किए...समीर मुस्कुराए अपनी माँ के साथ थाली परोसने लगा...माँ भी पतीले से गरमा गरम चिकन बिर्यानी प्लेट्स में डालने लगी

आदम : अर्रे आंटी बस बस

सोफीया : ह्म यहाँ ना नुकुर नही चलेगा समीर के बाद तुमपे भी मेरा हक़ बनता है क्यूँ अंजुम?

अंजुम : हां हां ये भी आपका ही तो बेटा है

सोफीया : जवान लड़के हो और इतना कम खाओगे

समीर : हां मम्मी देख ना कैसे पतला दुबला हो गया चल चुपचाप खा आंटी आप भी लीजिए

आदम : अच्छा बाबा बस बस

हम चारो हंसते हुए बात करने लगे थे....साथ में लंच का भी आनंद ले रहे थे....समीर की मोम फिर समीर के पिता के बारे में बताने लगी....समीर थोड़ा उस वक़्त भावुक होके चुप सा हो गया....जैसे उसे अच्छा नही लग रहा हो....सोफीया आंटी ने बताया कि पिता के गुज़रने के बाद उसने एक मर्द की तरह माँ को सहारा दिया है कोई कमी नही होने दी...अंजुम भी सहमति में मुस्कुरा रही थी....समीर शरमा रहा था....फिर बातों बातों में हमारे होमटाउन की बात निकल गयी....गपशप होते होते 3:30 बज गया...झूठे खाली प्लेट्स को सोफीया आंटी ले जाने लगी तो माँ भी उनकी हेल्प करने चली गयी..

 
समीर और मैं भी उठके हाथ मुँह धोने गये....फिर हाथ मुँह पोछ कर बात करने लगे...."आ ना मेरे और सोफीया के बेडरूम में चल आंटी को भी माँ के साथ अकेला छोड़ ना"............

"अच्छा चल ठीक है"......समीर और मैं उसके बेडरूम में जाने लगे.....तो समीर की माँ को जब उसने बेडरूम जाने की बात कही तो ना जाने क्यूँ उसकी माँ शर्मा गयी? मैं समझा नही क्यूंकी समीर के घर मैं पहली बार आया था उसका घर भी देख रहा था जो काफ़ी आलीशान और चका चौंध लग रहा था...

बेडरूम में प्रवेश करते ही पाया कि किंगसाइज़ की डबल बेड थी और कमरे में हर चीज़ काफ़ी सजाया हुआ था....बिस्तर पे हार्ट शेप में तकिये कयि रंग के मज़ूद थे...और एक स्टाइलिश सोफा ठीक बिस्तर के सामने था...दीवार पे एलसीडी टीवी लगी हुई थी और नीचे होम थियेटर फिट था....बेड के ठीक बगल में एक बड़ा सा अलमारी था....समीर ने आदम को बैठने को बोलते हुए अलमारी के पास गया और उसने वॉर्डरोब्स खोलने शुरू किए मेरी आँखे फॅट गयी

समीर : ये देख यहाँ माँ की अंडरगार्मेंट्स ही लटकी हुई होती है....तो इस दराज़ में माँ के कपड़े जैसे साड़ी सूट हिजाब...ये देख खोल इस दराज़ को

इतना कहते हुए समीर मुझे ही खोलने को बोलके बैठ गया...मैने जैसे ही नीचे का दराज़ खोला तो वॉर्डरोब्स में मेह्न्गे मेह्न्गे चूड़िया,ज़ेवर मेक अप कीट्स कॉसमेटिक का अनगिनत समान जैसे लिपस्टिक्स मज़ूद था...सारा वॉर्डरोब्स खुला था....हर एक चीज़ काफ़ी कॉस्ट्ली लग रहा था....समीर जैसे माँ को बीवी की तरह रखता था....उसे कोई चीज़ की कमी नही थी

अलमारी के ठीक बगल में साज़ सिंगार करने के लिए एक आएना लगा हुआ था जिसके सामने एक स्टूल थी.....समीर ने दूसरा दराज़ खोला तो उसमें सोफीया आंटी के अनगिनत के सेक्सी सेक्सी नाइटी मज़ूद थे....अफ उसने अंदर हाथ डालके डिल्डोस दिखाते हुए मुझे चिड़ाया मैं चुपचाप उसका शकल ही देख रहा था....

आदम : अबे साले तू इतना खुल्लम खुल्ला वातावरण रखता है घर में कोई आदमी या रिश्तेदार ऐसे तेरे घर को चेक करेगा तो और वैसे भी तुम दोनो माँ-बेटे के अलावा यहाँ रहता ही कौन है? उन्हें अज़ीब सा शक़ नही लगेगा

समीर : इस घर में माँ को लाते वक़्त उन्होने मुझसे कसम ली थी कि वो यहाँ किसी को भी आने ना देगी ना गैर को ना किसी और को...हालाँकि तू तो मेरा ख़ास है और जैसा मैने कहा हमारे ख्यालात कुछ सेम सेम है हालाँकि तूने वो आइडिया दिल्ली आने के बाद ड्रॉप कर दिया लेकिन मैं कायम हूँ

आदम : ह्म सो तो है (आदम चुपचाप शरमाया सा समीर को देखने लगा)

आदम ने उन डिल्डोस को उठाया जिनकी लंबाई करीब 9इंच तक तो होगी...उसकी मोटाई भी काफ़ी ज़्यादा थी प्लास्टिक और लचीले थे इसलिए आदम उसे हर तरह से मोडके देख रहा था...क्या ये पूरा का पूरा समीर अपनी माँ की चूत में डालता होगा

समीर : हाहाहा तभी देखा तूने माँ क्यूँ शरमा रही थी एक चीज़ और दिखाऊ?

आदम के सामने ही समीर ने दो-तीन पर्दे एकदम से हटाए दीवार से जो उसे लगा शायद खिड़किया हो पर वहाँ खिड़किया नही बल्कि बड़ी बड़ी पोस्टर जैसी तस्वीरे लगी हुई थी...हर एक तस्वीर में उसकी माँ का खूबसूरत अदाओ से भरा चेहरा और बदन दोनो दिख रहा था हालाँकि वो तस्वीरे किसी प्लेबाय मॅगज़ीन की तस्वीरो जैसी थी...मेरी आँख फॅट गयी क्यूंकी तस्वीर में सोफीया आंटी किसी में लाइनाये में थी...तो किसी में उसने चुन्नी कर रखी थी पर ऐसा लग रहा था जैसे अंदर उसने कोई कपड़े नही पहने जैसे ब्रा या पैंटी तस्वीर बड़ी सी थी इसलिए उनके निपल्स सॉफ चुन्नी में उभरे दिख रहे थे...मेरा गला सुख गया...समीर ने तीसरी वाली तस्वीर पे हाथ रखा उसका हाथ माँ के पेट पे था...क्यूंकी उसमें आंटी ने हाफ टॉप पहन रखी थी और नीचे जीन्स...ऐसा लग रहा था कि समीर माँ का कितना दीवाना था मेरी आँखे उन हर तस्वीरो को दीवार पे लटकी देख फटी सी रह गयी थी....समीर मुस्कुराया

आदम : माइ गॉड समीर ये सब क्या है यार? उस दिन ऑफीस में मुझे तेरे दिखाए पिक्स पे यकीन तो हो गया था पर ये सब क्या है? बेडरूम में आंटी की इतनी बोल्ड तस्वीरे (मैं एक एक तस्वीर को देख रहा था)

समीर : ये वाली 2015 की है ये 2016 की पिक है हां ये हाफ टॉप और जीन्स वाला लेटेस्ट है....माँ को हर चीज़ ऑनलाइन ही ऑर्डर कर देने को बोलता हूँ ये सब ड्रेसस और कपड़े मेरी पसंद के होते है

आदम : यार तूने तो माँ को काफ़ी सुख देके रखा है

समीर : साले माँ के सुख से बड़ा कुछ और हो सकता है

आदम : अब तो मुझे पक्का यकीन है कि सोफीया आंटी शादी के बाद तेरे से खुश रहेंगी

 
समीर झेंप सा गया वो अपने होंठो पे ज़ुबान फिराने लगा....उसने सारे दराज़ो को बंद किया और मुझे बाथरूम दिखाने लगा...बाथरूम भी कमरे से कोई कम नही था एक तो इतना बड़ा उपर से अटॅच इंग्लीश टाय्लेट के साथ... एक जगह जहाँ गुलाब की पंखुड़िया बिखरी हुई थी...ऐसा लग रहा था जैसे उसमें माँ और बेटे दोनो हमारे आने से पहले नहाए होंगे एक साथ...समीर मुस्कुराने लगा...मैं शरमा गया समीर ने नल पे टॅंगी माँ की पैंटी और ब्रा मुझे दिखाई

वो उसे पागलो की तरह सूंघने लगा..."क्या कर रहा है पागल? आंटी देख लेंगी तो क्या सोचेंगी?"........समीर मुस्कुरा के मेरे हाथ में अपनी माँ की पैंटी देता है जिसपे कुछ धब्बा सा लगा था...

समीर : ये गंध ये महेक मेरे लिए गुलाब की खुश्बू सी है जिसमें एक बार नाक देने के बाद मैं स्वर्ग में पहुच जाता हूँ अफ क्या खुश्बू है इसकी इसमें माँ की भीनी भीनी पसीने की महेक के साथ साथ उन्हें उत्तेजित करने के बाद उनकी चूत से निकला चिपचिपापन है तुझे आहेसस नही हो रहा

मैं ताहिरा मौसी को चोद रखा था चंपा को चोद रखा था तबस्सुम दी और आकांक्षा के साथ रूपाली भाभी को चोद रखा था इसलिए मुझे पैंटी की वो महेक सूंघने में कोई घिन नही लगी मैं औरत की महेक पहचानता था...मैं भी पैंटी हाथो में लिए उसे सूँघा मुझे थोड़ा अज़ीब लगा क्यूंकी मैं सोफीया आंटी की काफ़ी इज़्ज़त करता था समीर जैसे इस दृश्य को देख मज़े ले रहा था...

आदम : अच्छा भाई छोड़ ये सब और ये बता कि शादी से अब आगे का क्या प्लान है?

समीर : क्या बताऊ यार? नियती का खेल है सब माँ ने मुझे बतया नही था कि कॉपर टी उन्होने लगवा रखी थी अपने गुप्तांगो के भीतर...तभी मैं सोचु माँ को चुदाई के वक़्त दर्द क्यूँ इतना बर्दाश्त करना पड़ता था मैने पिछले ही महीने माँ को राज़ी करके कॉपर टी निकलवा ली उमर ही क्या हुई है 35-36 बरस अब तो मैं भी चाहता हूँ कि माँ पेट से हो जाए अब हम अपने बीच कोई और दूरिया नही रखना चाहते

समीर की बात सुनके मुझे थोड़ा शॉक ज़रूर लगा कि वो पहले से ही माँ का दीवाना है माँ के साथ ग्रहस्थी तो वो बसा चुका लेकिन निक़ाह के बाद वो बाप बनना चाहता था वो भी अपनी सग़ी माँ से बच्चा लेना चाहता था...ये सब सुनके मैं हैरत में पड़ गया उसने बताया कि इतने कोशिशो के बाद उसे लगा शायद माँ को गर्भ ठहर जाए पर माँ को कोई फरक नही पड़ रहा था...फिर लेडी डॉक्टर से मिलने की जब बात कही तो उन्होने खुद ही बताया कि वो समीर के पैदा होने के बाद कोई और उसके पिता से औलाद नही चाहती थी इसलिए उन्होने कॉपर टी का सहारा लिया

समीर वही नल पे उन ब्रा पैंटी को रखके मेरे साथ बाहर आया...उसने बताया कि इससे पहले सोफीया पे हक़ सिर्फ़ उसके पिता का था...अब उसका है..और हर पिता के बाद औरत का ख्याल उसके बेटे को रखना होता है उसके बेटे का उस पर पूरा हक़ हो जाता है....समीर व्यभिचारी बेटा बन चुका था..कितने रिश्ते उसके आने लगे थे तो उसने रिश्ते बुलाने वाले अपने एक दोस्त को थप्पड़ जड़ दिया था सिर्फ़ इस बात से कि उसने उसके लिए घर पे उसके गैर हाज़िरी में रिश्ते लाने शुरू कर दिए...बस लड़का अमीर था इसलिए लड़कियो ने उसे पसंद किया एक अकेले घर का राजा था वो सिर्फ़ माँ थी जो कोई नही जनता था कि दोनो माँ-बेटे नही एकदुसरे के पति पत्नी जैसे थे....भला समीर पराई औरत को देखे.....समीर फिर भावुक हो गया उसने बताया कि वो ये आलीशान बांग्ला बेच बाचके माँ को लेके वापिस मुंबई शिफ्ट हो जाएगा उसके लिए ये कोई बड़ी बात तो नही थी...

उधर अंजुम सोफीया की बातों को नोटीस कर रही थी कि वो कितना झिझक रही है...उसे डर लग रहा था कि कही आदम की माँ उसके और उसके बेटे के रिश्ते को समझ तो नही गयी.....लेकिन उसे क्या पता? कि अंजुम तो उनसे भी एक कदम आगे थी....भले ही वो इन व्यबचार रिश्तो को समझने की कोशिश कर रही थी...दोनो औरतें अपने दिल को जैसे हल्का करते हुए एकदुसरे के ग्रहस्थी को लेके चर्चा कर रही थी...

अंजुम : वाक़ई सोफीया जी जितना आराम समीर ने आपको दिया वो कोई घरवाला भी नही दे सकता

सोफीया : सच कहा आपने समीर की बात ही जुदा है उसने जो आराम मुझे दिया है वो लाखो बेटों में से कोई ही दे पाते है वरना आजकल ज़रा सा उमर क्या होती है? बस लड़कियो को सेलेक्ट करते है शादी करते है फिर तो जानती हो हम माँ का किरदार अपने ही घर में कितना पराया सा होके रह जाता है...

अंजुम : लेकिन आपको कैसी फिकर आदम ने बताया मुझे वो आपका काफ़ी ख्याल रखता है आपकी हर छोटी मोटी ज़रूरतो को पूरा भी करता है

सोफीया झिझक रही थी उसे डर लग रहा था कि कही उसके बेटे समीर ने आदम को सबकुछ बता तो नही दिया था....अंजुम सिर्फ़ मुस्कुरा रही थी उसके सहमते दिल को समझ उसने सोफीया के कंधे पे हाथ रखा

अंजुम : मैं भी एक जवान बेटे की माँ हूँ आप ही की तरह मेरा भी इकलौता है

सोफीया : सच में अंजुम जी आपका बेटा भी हीरा है जो अपनी इच्छाओ को त्याग के वापिस आपके पास आ गया मुझे समीर बताता था उसका बर्ताव शुरू शुरू में बहुत ग़लत था पर अब देखिए कैसे वो समझदार हो गया उस वक़्त नादान था वो

अंजुम शरमाई...उसने सहमति से सर हां में हिलाया...."लेकिन ये बात तो तय है कि जब तक हमारे बेटे हमारे साथ है हमे किसी भी चीज़ की कोई ज़रूरत नही"..........

."सही कहा आपने अंजुम जी अब हम भी अगले साल शिफ्ट हो रहे है वापिस मुंबई आप लोगो को बड़ा मिस करेंगे".....

."हाहाहा हम भी बहुत करेंगे एक लगाव सा जुड़ गया है आप लोगो से ऐसा लगता है जैसे आयने में खुद के ही रिश्तो को देख रहे है"...........

"ह्म एनीवे आज आप रात का डिन्नर करके ही जाइएगा आप लोग भी ना इतने दिनो बाद ऐसे मोमेंट पे आए कि अब 20 तारीख को निकल जाएँगे".......

."अर्रे नही नही ऐसी कोई बात नही हम जहाँ पे घर लिए है वहाँ पे आप भी आईएगा".....

."ज़रुरर् ज़रूर क्यूँ नही? वैसे एक बात कहूँ?"......

.अंजुम चुपचाप सी हो गयी

सोफीया : मुझे ऐसा क्यूँ लगता है जैसे आप सबकुछ जानती है

अंजुम जैसे मुस्कुराइ दोनो औरतें एकदुसरे के हाथो में हाथ रखके सिर्फ़ शरमाई....

"सही कहा एक औरत ही तो एक औरत के दिल को समझ सकती है दरअसल मैं काफ़ी खुश हूँ कि समीर आपके साथ निक़ाह करने वाला है".........

सोफीया ये सुनके चौंक उठी पहले तो काफ़ी झिझकी फिर उसकी शरम थोड़ी थोड़ी कम हुई

सोफीया : अब आप जब जान ही गयी है तो फिर छुपाना कैसे ? बस सोसाइटी से डर लगता है कि ये रिश्ता जो हमने जोड़ा है उसे लोग गुनाह ही कहेंगे

अंजुम : बाहरवालो को कहने कौन जा रहा है? पहले मैं भी ऐसा ही समझती थी लेकिन अपने बेटे के अंदर बदलाव देख मुझे भी ऐसा लगा

सोफीया : ये आदम पूरा छुपा रुस्तम है सेम मेरा समीर जैसा

अंजुम : हाहाहा और नही तो क्या? लेकिन आप बताईएगा नही समीर को कि मैं ये बात जानती हूँ

सोफीया : नही नही ये हमारे बीच ही रहेगी मैं चाहती हूँ कि हमारे निक़ाह में जब आए तब समीर को सर्प्राइज़ दे आदम के साथ मिलके

अंजुम : बिल्कुल बिल्कुल

सोफीया : वैसे आपका भी कुछ आदम के प्रति देखिए अब आप भी कुछ ना छुपाइएगा

अंजुम : सच कहूँ तो सोफीया जी मैं उसे बेटे की नज़र से कभी अलग देखी ही नही थी...लेकिन उस दिन (अंजुम ने धीरे धीरे सोफीया को उस दिन अपने और बेटे के बीच प्यार का इज़हार वाली बात बताई जिसमें आदम स्यूयिसाइड करने जा रहा था सोफीया मुँह पे हाथ रखके चुपचाप गौर से सुन रही थी अंजुम के चुप होते ही)

सोफीया : नही वो दबाव नही था उसके प्यार का जुनून था सच्चा प्यार है उसे आपसे और एक तरह से अच्छा ही तो है कि आदम आपसे कभी दूर नही होगा वरना आजकल लड़कियों को ज़रा सा भी वक़्त नही लगता लड़को को घरवालो से दूर करने में

अंजुम : लेकिन फिर भी मैं बूढ़ी हो रही हूँ वो कमसिन जवान लड़का भला मैं उसकी ज़िंदगी क्यूँ खराब करूँ?

सोफीया : ये बात मैं भी कुछ साल पहले सोचती थी पर मुहब्बत उमर रिश्ते और वक़्त नही देखती और वैसे भी आप तो मुझसे यंग है खुद को देखिए ऐसा लगता है जैसे आप अपने शौहर से मिलती भी नही होंगी

 
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