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Incest माँ को पाने की हसरत

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अंजुम शरमा गयी जैसे सोफीया ने उसकी चोरी पकड़ ली हो...उसने फिर अपने पति की हरकतों के बारे में बताना शुरू किया एक पल को उसका चेहरा फिर उदास सा हो गया..सोफीया समझाती रही कि अब टेन्षन ना ले बेटा आ गया है अब उसके सिवाह किसी पे भी ध्यान देने की ज़रूरत नही सब ठीक हो जाएगा खुदा पे भरोसा रखो और ये ना सोचो कि ये गुनाह है पाप है...कुछ देर तक दोनो ऐसे ही वार्तालाप करती रही...बीच में बेटों ने आके दोनो का ध्यान तोड़ा....

रात का डिन्नर ख़तम होने के बाद समीर जैसे आदम से गले लग्के भावुक हो गया इधर अंजुम भी आँसू पोंछ रही थी...सोफीया आंटी भी आदम और अंजुम के गले मिली..

."वाक़ई ऐसा लग रहा है जैसे रिश्ता जुड़ सा गया है आप लोगो को सच में हम दोनो बहुत मिस करेंगे"........आदम भी अपने आँसू पोंछने लगा

आदम : कोई बात नही आंटी हम तो कॉंटॅक्ट में रहेंगे ही साथ ही साथ रोज़ आपसे बात करेंगे

अंजुम : और हां समीर बेटा माँ का पूरा ख्याल रखना

समीर : जी आंटी तू भी सुन ले आदम आराम से रहना कोई कमी ना पड़े....माँ का खूब ख्याल रखना आंटी अब तेरी ज़िम्मेदारी है

अंजुम और आदम दोनो शरमा गये...सोफीया भी मुस्कुरा पड़ी...

."हाहाहा तू भी ध्यान रखना".....इतना कहते हुए दोनो दोस्त फिर एकदुसरे के गले मिले..समीर उन्हें सी ऑफ की बात कहने लगा तो आदम ने बताया गाड़ी सुबह 4 की है तो इसलिए खामोखाः वो इतना दूर जाएगा वो लोग चले जाएँगे फिकर ना करे..आख़िर में दोनो माँ-बेटे वहाँ से रुखसत हुए...समीर की आँखो में आँसू उमड़ पड़े...अपने दोस्त के बिछड़ने से....माँ ने उसके कंधे पे हाथ रखा तो समीर भावुक होके उसके सीने से लग गया...सोफीया उसे चुप कराने लगी उसके बालों पे हाथ फेरते हुए दोनो अंदर चले आए

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20 तारीख की सुबह 4 बजे आदम अपने पिता से विदाई लेता है....जो चुपचाप सिर्फ़ इतना बोले कि अपना ख्याल रखे कोई प्राब्लम हो रास्ते में तो कॉल करे...आदम ने कॅट्सी निभाने के लिए सिर्फ़ हां में सर हिलाया....माँ ने भी ज़्यादा पति से कोई बात नही की....पिता उन्हें जाते हुए देख रहा था....

गनीमत थी कि सुबह खाली रास्ते की वजह से दोनो आधे घंटे पहले रेलवे स्टेशन पहुच गये....वहाँ से कुली किए अपना सामान प्लॅटफॉर्म में खड़ी रेल गाड़ी में ले आए...जल्दी अपना कोच ढूँढा और अपनी सीट के नीचे समान को अड्जस्ट किया....दोनो कुछ देर तक काम काज में फसे थे....माँ ने कहा कि अब बाहर ना जाए ट्रेन चलने वाली है...आदम बस मुस्कुराया वो खिड़की से बाहर झाँक रहा था...कुछ ही देर में ट्रेन में दो मिया बीवी जो बिहारी थे वो सामने आके कोच अपना दाखिल हुए बैठ गये....वो दोनो बिना माँ-बेटे की परवाह किए सामान रखने के बाद एकदुसरे के साथ छेड़ छाड़ और गंदे गंदे मज़ाक कर रहे थे....आदम को उनसे मतलब तो नही था पर माँ उन्हें देखके मुस्कुरा रही थी आदम को कोहनी मार कर उन दोनो को देखने का इशारा कर रही थी...आदम भी मन ही मन हंस पड़ा...

ट्रेन छूट पड़ी....अपनी सीट ठीक किए माँ का बिस्तर लगाए आदम उपर की सीट पे आके बैठ गया हालाँकि उसे नींद तो नही आती थी ट्रेन में इसलिए सामान को बार बार चेक कर रहा था नीचे झाँक कर....दोनो बिहारी मिया बीवी सो गये थे...आदम भी उबासी लेता हुआ माँ की तरफ देखता है जो थकि होने से सो गयी थी...आदम भी चुपचाप सो जाता था...रैल्गाड़ी काफ़ी रफ़्तार से चल पड़ी थी...सुबह 4 बजे उठने की वजह से उसे बड़ी नींद लग रही थी इसलिए वो नींद की आगोश में कुछ ही देर में आ गया

कुछ घंटो बाद जब अंजुम की नींद खुली तो उसने पाया कि गाड़ी तेज़ रफ़्तार में चल रही थी क्यूंकी पूरी बौगी काँप रही थी...स्पीड शायद रात को ज़्यादा बढ़ा दी थी ट्रेन ड्राइवर ने...वैसे भी 24 घंटे का रास्ता था..वो उठके एक बार खड़ी होके आदम की बर्थ में झाँकति है तो पाती है कि बेटा गहरी नींद में सो रहा है....उसे अच्छा ही लगा कि बेटा इतना थक हारके सामान लिए अपनी नींद खराब किए माँ के साथ रैल्गाड़ी में चढ़ा था....उसे सोने देना ही माँ ने बेहतर समझा....और फिर वो लेट गयी

उसे अहसास हुआ कि उसे जोरो की पेशाब लग रही है..अंजुम ने अपने चप्पल पहने और दुपट्टा ठीक करते हुए टाय्लेट के पास आई...इस वक़्त वहाँ कोई नही मज़ूद था...वो टाय्लेट में घुस गयी....वही बैठके पिट के पास अपनी चूत से ज़ोर की पेशाब की धार छोड़ी प्सस्ससस्स......उसे इतनी ज़ोर की पेशाब लगी कि करीब 10 मिनट तक उसकी चूत की पानी की मोटी धार छोड़ती रही मूतने के बाद फारिग होके उसने अपने गुप्तांगों पे नल से पानी हाथो में लिए उसे हाथो से ही धोया फिर जंपर को मुँह से दबाए पाजामा ठीक किए उसे पहनते हुए प्यज़ामे की डोरी को बाँधने लगी..उसे जल्दी जल्दी वापिस जाने का मन कर रहा था क्यूंकी अकेले आई थी बेटा बौगी में अकेला सो रहा था...वो जैसे बाहर आई एकदम से घबरा गयी क्यूंकी एक 42 वर्ष उमर का शॅक्स काली टोपी और काले कोट और सफेद शर्ट और पॅंट पहना उसके सामने खड़ा हुआ था..जानने में आया कि ये टीटी है

अंजुम उसे चौंकते हुए देखने लगी...उसने मुस्कुरा कर माँफी माँगी..अचानक उसके माथे पे शिकन की लहर दौड़ पड़ी..अंजुम उसे खुद को घूर्रते देख अज़ीब निगाहो से देखते हुए वापिस अपनी बौगी की तरफ बढ़ गयी....वो उसे जाते हुए देख रहा था.....जब वो बौगी में आई तब तक ट्रेन कोई नये स्टेशन पे आके रुकने को हुई थी...आदम को जागते देख माँ ने उसकी चादर को ठीक करके उसे उधाने लगी....आदम ने आँखे खोली

आदम : मों कहाँ थी तुम? मैं अभी उठा था तो तुम थी नही मुझे लगा टाय्लेट गयी हो

अंजुम : हां रात से नही किया था...उपर से गॅस बन रहा है ना यहाँ तो फारिग भी नही हो सकते

आदम : हां कोई बात नही

अंजुम : अच्छा तू सो जा ना

आदम : ह्म अब नींद खुल गयी है बाद में आराम कर लेंगे (आदम वैसे ही लेटे रहा माँ अपने बर्थ पे आके लेट गयी)

कोच की लाइट्स ऑफ थी इसलिए अंजुम की नज़र आने जाने वाले को नोटीस कर रही थी....कुछ पॅसेंजर्स थे तो कुछ करम्चारि...आस पास के लोग सभी सो रहे थे...इतने में अंजुम ने नोटीस किया कि वो टीटी बर्थो में झाँकता हुआ सबको सोया देख आगे बढ़ गया....अंजुम को थोड़ा अज़ीब लगा उसे ऐसा लगा जैसे इस टीटी को उसने पहले कभी देखा है....चेहरा रौबदार था मुच्छे थी भरा पूरा बदन था...उमर भी 40 से कही ज़्यादा उपर लग रही थी....अंजुम ने भी सोचा शायद उसका वेहेम हो लेकिन टीटी उसे ऐसे घूर्र रहा था उसे थोड़ा अज़ीब लगा...लेकिन उसने इस बात को ज़्यादा महत्व नही दिया

 
अगले दिन सुबह सुबह 10 बजे तक दोनो नाश्ता ख़तम किए टिफिन से निकाल कर चाइ खरीद के पीते है...आदम ब्रश करने चला जाता है क्यूंकी ट्रेन में तो सिर्फ़ हाथ मुँह धो सकता है...जब आदम गया तो उसके बाद अंजुम ने नोटीस किया कि कल रात वाला वोई टीटी सबकी टिकेट्स वेरिफाइ कर रहा है...अंजुम ने फ़ौरन बेटे के पास रखा अपना पर्स उठाया उसमें से अपने आधार कार्ड के साथ टिकेट्स भी निकाल लिए....जैसे ही वो उसके बौगी में आया तो अंजुम के सामने वाले पॅसेंजर की टिकेट्स देखने लगा वो रिजिस्टर में कुछ मार्क भी कर रहा था...लगभग वो अंजुम की बर्त पे बैठ गया बगल में टिकेट को रजिस्टर में एंक्वाइरी करने के लिए...अंजुम ने कोई आपत्ति नही जताई वो चुपचाप उसे देख रही थी...

जैसे ही वो टिकेट के लिए अंजुम के पास हाथ बढ़ाता है उसे पहचानते देख मुस्कुराता है..."जी आप अकेले?"......

"जी नही बेटा भी है मेरा ये दो टिकेट्स".......

"ह्म ठीक है".....एक पल को टीटी अंजुम के पूरा नाम पे गौर करता है फिर उसे एक बार देखता है

अंजुम : क्या हुआ कोई प्राब्लम ?

टते : जी बिल्कुल नही हाहाहा ये लीजिए आपके टिकेट्स? (इतने में आदम को देख टीटी उठ खड़ा होता है और उसे गौर से देखता है)

आदम उसे घुरते देख माँ के बर्त वली सीट पे बैठ जाता है.....टीटी के दूसरे बौगी में जाते ही आदम मुस्कुरा के माँ को देखता है..."क्या हुआ माँ?"..........आदम के सवालात पे माँ उससे बात करने लगती है

अंजुम : पता नही कल रात को भी टाय्लेट के पास खड़ा मुझे घूर्र रहा था

आदम : क्या? इसकी इतनी हिम्मत साले की माँ की

अंजुम : अर्रे पागल घूर्र रहा था मतलब ऐसे देख रहा था जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो

आदम : हाहाहा पहचानने की भला आपका कौन जानने वाला निकल आया अब?

अंजुम : बस मुझे ऐसा लगा

आदम : आप भी उसे पहचानी

अंजुम : देखा देखा तो लग नही रहा क्यूंकी उमर दराज़ आदमी है होगा मेरी तरह कोई दिखने वाली जिसे पहले उसने देखा हो

आदम : ह्म हो सकता है

आदम और अंजुम टीटी की बात को भूल फिरसे एक दूसरे में जैसे उलझ गये...दोनो एक पल को उसकी बात भूल ही गये....आदम टाय्लेट करने जब जा रहा था तो उसने शाम को पाया कि वो टीटी किसी पॅसेंजर के टिकेट को लेके उसे झगड़ रहा था वो काफ़ी एजुकेटेड लगा क्यूंकी इंग्लीश में बहसा बहसी हो रही थी इतनें आइन आदम ने उसे गौर से देखा तो पाया उसने हल्के शीशे रंग का ब्राउन रंग का चश्मा पहना हुआ था...काफ़ी रौबदार चेहरा था उसके नेमप्लेट पे थोड़ा पास आने से उसने सॉफ देखा कि उसका नाम राज़ौल शैख़ था..आदम ने उसे कुछ नही कहा वो टाय्लेट की तरफ बढ़ गया

करीब 24 घंटे के उस रास्ते में फिर कुछ अंजुम और आदम के साथ कुछ नही घटा...लेकिन बार बार आदम को ना जाने ऐसा क्यूँ लग रहा था जैसे वो कोई जानने वाला हो...इसी कशमकश में आदम का होमटाउन आ गया अगले दिन के सुबह 6 बज चुके थे....आदम और माँ दोनो ने गाड़ी के थमते ही जल्दी जल्दी सामान को लादा और उसे लेके बाहर जाने लगे...क्यूंकी ट्रेन सिर्फ़ 10 मिनट के लिए ही रुकने वाली थी....टीटी राज़ौल फिरसे एक बार चक्कर लगाने बौगी मे आया तो उसने पाया कि बर्त पूरा खाली था वो माँ-बेटे वहाँ मज़ूद नही थे...अचानक उसे ना जाने क्या याद आया वो फ़ौरन फुरती से बाहर की ओर भागा..ट्रेन के दरवाजे तक आने पे उसने पाया कि दूर सीडियो पे आदम अपनी माँ को लिए कुली को सामान तमाए चढ़ रहा था..

वो उतरने को हुआ तो उसे दूसरे टीटी ने लगभग पकड़ा "पागल है क्या? ये क्या कर रहा है? तेरी ड्यूटी मालदा तक की थोड़ी ना है जो उतर रहा है सीनियर टीटी होके क्या बेवकूफी कर रहा है तू".....दूसरे सीनियर टीटी के रोकने से राज़ौल उसे आँख फाडे देखने लगा जैसे वो होश में नही था

राज़ौल : नही नही दरअसल वो पॅसेंजर्स वो औरत उसे मैं !(कहते कहते राज़ौल रुक गया वो अपने सीनियर की मज़ूद्गी का अहसास उसे होता है)

सीनियर टीटी ने कोई जवाब नही दिया उसकी बेवकूफी पे बस नाराज़ होता हुआ ना में सर हिलाए आगे बढ़ गया बौगी में....ट्रेन छूट पड़ी...उसकी बदक़िस्मती कि वो उतर ना सका..और उसके मन में जो आया था वो ट्रेन की पूरी रफ़्तार के साथ छूटता चला गया वो ट्रेन के दरवाजे पे ही खड़ा रह गया और उसकी ट्रेन मालदा स्टेशन को छोड़ते हुए दूर चली गयी...इधर बेटे और माँ एकदुसरे में मगन स्टेशन से बाहर आए सूरज निकलने लगा था...

स्टेशन से बाहर निकलते ही मैने थ्री वीलर रिक्क्षा ले लिया था...पूरे रास्ते माँ टाउन को देख रही थी..जैसे सबकुछ कितना बदल गया हो..वो मुस्कुरा भी रही थी साथ में मेरी तरफ देखते हुए मुझे बता रही थी कि जब वो यहाँ रहती थी तो यहाँ आती थी तो वहाँ आया करती थी....मैं चौक पे भीड़ थोड़ी कम थी इसलिए हमारा रिक्क्षा रोड क्रॉस करता हुआ सीधा मूड गया अब हम ब्रिड्ज पे थे...

 
माँ मुझे बता रही थी कि यह जगह कितनी बदल चुकी है? आखरी बार वो 1993 में यहाँ से गयी थी..और आज इतने सालो बाद फिर अपने ससुराल आना उन्हें अच्छा तो नही लग रहा था लेकिन बेटे के दिल ने उनके दिल को भी पिघला दिया था...उनके अंदर अब इस जगह के लिए नफ़रत और गुस्सा नही बल्कि आज जैसे वो अलग ही अंजुम थी...जल्द ही हम मोरतुज़ा काका के घर पहुचे....समान लेते हुए माँ ने बताया कि यही मोरतुज़ा काका का घर है मैं इससे पहले आया नही था मैं तो बस इस शहर में आते ही अपना कदम रखते हुए यही सोच में था कि जिन लोगो के साथ मेरे संबंध थे कहीं उन्हें मालूम ना चल जाए? मैं अपने ही सोच में डूबा सा था

जब मोरतुज़ा काका ने दरवाजा खोला तो हमे देखके सर्प्राइज़ हुए...मुझे गले लगे और हमे अंदर आने को कहा....बुआ भी हमे देखके खुश थी काफ़ी उमर ढल चुकी थी उनकी...घर अच्छा ख़ासा था मोरतुज़ा काका के कारोबार से ही मैं अनुमान लगा सकता था कि वो कितने अमीर हो गये है? एक बेटी थी जो कोलकाता ब्याह दी गयी और आज दो जुड़वा बच्चों की माँ है तबस्सुम दी के बारे में सोचते ही बदन जैसे सिहर उठा....सच में उनकी चुदाई करने में मेरा पसीना निकल गया था उफ्फ तरबूज़ जैसी उनकी चुचियाँ...इतने में ध्यान टूटा

तो बुआ पानी दे रही थी...मैं खुद पे काबू करता हुआ पानी पीने लगा....मोरतुज़ा काका से फिर बातचीत का दौर शुरू हुआ घर बार की बात हुई फिर काम काज की...मैं ध्यान से उनकी बातें सुनने लगा उन्होने कहा आज यही ठहर जाओ किराए के घर में कल शिफ्ट हो जाना...पर माँ बोली नही नही खामोखा पर बुआ भी ज़िद्द करने लगी...लेकिन सामान बहुत सारा लाए थे इसलिए घर भी देखना था और शिफ्ट भी होना था....माँ और मैं सामान लिए मोरतुज़ा काका के साथ नये किराए के घर की ओर निकल गये....जहाँ मोरतुज़ा काका ने मुझे घर दिलवाया था वो टाउन से बाई ओर यानी उल्टा साइड पड़ता था इसलिए वो जगह मेरे जानने वालों के घरो से काफ़ी दूर था...और अगर कभी बारिश होती थी तो बीच का जो ब्रिड्ज था जो टाउन और हमारे एरिया को जोड़ता था वो नदी के पानी से भर जाता था

हालाँकि माँ को आपत्ति हुई पर मैने कहा कि क्या फरक पड़ता है? हमे प्राइवसी ही तो चाहिए मैने माँ के कान में फुसफुसते हुए कहा तो माँ मुस्कुराइ उन्हें भी किसी रिश्तेदार या किसी भी जानने वाले लोगो से मतलब नही रखना था...हालाँकि ताहिरा मौसी से मिलने की इच्छा जाहिर की पर वो उनके घर नही जाना चाहती थी ताहिरा मौसी और उनके घर का ज़िक्र सुन कर ही मैं फिरसे उन्ही पॅलो में चला गया जो दर्द और वाक़या जिन्हें समेत कर मैने इस एरिया को अलविदा कहा था

ब्रिड्ज क्रॉस करते ही बड़ा सा कब्रिस्तान शुरू हो गया और उसके बाद हरियाली छाने लगी ठीक उसके बाद कुछ घर शुरू हुए..थ्री वीलर एकदम सामने एक घर के आगे रुका....तो मोरतुज़ा काका मेरा बॅग उठाने लगे मैने मना किया....माँ हमारे पीछे थी....जैसे ही हम दरवाजे के पास आए...मोरतुज़ा काका ने चाबी से दरवाजा खोला

घर काफ़ी बड़ा था सारी सुविधाए थी....लिविंग रूम में बड़ी सी खिड़की थी वो एक सेपरेट फ्लोर था हमारा लेकिन नीचे का घर था..उपर तीन मंज़िला इमारत थी...जिसमें मकान मालिक को अब तक कोई किरायेदार नही मिला था...इसलिए हम बहुत खुश थे ओर वैसे भी इस एक पूरे ग्राउंड फ्लोर में हम माँ-बेटे को ही तो सिर्फ़ रहना था...माँ को घर बहुत पसंद आया क्यूंकी चारो तरफ चिड़ियो की आवाज़ और काफ़ी शांति थी पैड पौधे थे सुना था कि अभी लोग यहाँ धीरे धीरे बसने शुरू हुए है....

मोरतुज़ा काका फिर मुझे बोले कि थोड़ा रेस्ट कर लो अगले दिन फिर चलना पर मैने कहा शाम को ही आपके उस आदमी से मिल लून जो दिल्ली का माल यहाँ भिजवाएगा ताकि अपनी नौकरी मैं जल्दी संभालू...मेरा हौसला देखके मोरतुज़ा काका को अच्छा लगा माँ ने उन्हें कसम दी कि किसी को भी ससुराल के लोगो में ना बताए कि हम यहाँ है मोरतुज़ा काका ने निश्चिंत होने को माँ को कहा...मैं देख रहा था मोरतुज़ा काका माँ को बड़े गौर से देख रहे थे वो फिर माँ से मज़ाक सा करने लगे...लेकिन मेरी वहाँ मज़ूद्गी का अहसास उनको था शायद इसलिए वो बहुत जल्दी वहाँ से चले गये....शाम को मैं उनके साथ उनके आदमी से मिलने गया जिसने मुझे मामलो के बारे में जानकारी दी...फिर मैं डिस्ट्रिब्यूशन के साथ साथ जो माल लेना होता है उसके सॅंपल्स लेने का तरीका कौन सा माल लेना ठीक है? और उन्हें कौन कौन सी जगह में प्रवाइड करना है किसकी प्राइसस कितनी है उसमें कितना टॅक्स लगता है? बहुत सारा कारोबार को संभालने के लिए मैने रात दिन एक किए उन्हें मोरतुज़ा काका से जाना और संभालना शुरू किया

धीरे धीरे मैं मोरतुज़ा काका का काम संभालने लगा...और जैसे पहले करता था ठीक उससे दुगनी मेहनत करने लगा....मुनाफ़ा ज़्यादा कमाने लगा...हमारा घर जमने लगा..और इसके साथ ही माँ भी मेरे साथ हसी खुशी रहने लगी थी अब उसे कोई भी चीज़ की कोई तक़लीफ़ ना थी....हालाँकि प्राइवसी के चक्कर में और मोरतुज़ा काका के दिलाए किराए का घर जहाँ लिया था वो जगह थोड़ा सुनसान थी...इसलिए काम पे रहने के बाद मुझे हमेशा माँ की फिकर रहती थी....माँ ने पास की पड़ोसी औरतो से जो उमर में काफ़ी उम्रदराज थी उनसे दोस्ती कर ली इसलिए पूरे घर का काम निपटा देने के बाद वो उन लोगो से ही बैठके आँगन में बात करती रहती थी....मैने उन्हें सख़्त हिदायत दी थी कि अंधेरा होते ही घर से ना निकले मोबाइल चार्ज में रखे पहले पास की खिड़की जो लॉन में खुलती थी उससे झांन्कके देख ले कि कौन दरवाजे पे खड़ा है उसके बाद ही दरवाजा खोले रात को मैं घर जाने से पहले एक बार मिस कॉल मार देता था इसलिए माँ दरवाजा खोल देती थी

हालाँकि कभी कभी काम से लेट होने पे देर रात हो जाती तो मुझे रिक्क्षा भी बड़ी मुस्किल से मिलता था घर जाने के लिए...इसलिए मैने 2 महीने बाद ही इंस्टल्लमेंट पे बाइक खरीद ली थी इससे मुझे आसानी होने लगी और मेरा वक़्त बचने लगा...घर में शिफ्ट होने के तीसरे दिन ही ट्रक में लादा हुआ हमारा दिल्ली का सामान आ गया खटाखट करम्चरियो को पैसे दिए और जो पीसी और कुछ एक आध समान था उसे हमने रखना शुरू किया...मोरतुज़ा काका ने हमारे शिफ्ट होने के बाद ही हमे एक सेकेंड हॅंड बेड दिला दिया था....बाद में कहा कि पैसा हो जाए तो खरीद लेना माँ को भी इससे आपत्ति नही हुई....हम उसमें शीतलपाटी (एक तरह की बिंगाली चटाई जिसे बिस्तर के नीचे रखा जाता है) रज़ाई के उपर बिछाए उस पर चादर फैलाक़े सोते थे....रात को कुत्ते बड़े एकदुसरे से लड़ाई करते थे एकदम चुप्पी भरा सन्नाटा छा जाता था..

माँ को शुरू शुरू में नींद नही आती थी लेकिन धीरे धीरे उन्हें आदत पड़ने लगी पर जब भी मूतने की इच्छा होती थी तो मुझे जगाके साथ ले जाती थी हालाँकि हमारा घर चारों तरफ से बंद था....लेकिन उन्हे डर लगता था..मैं कभी कभी नींद में ज़्यादा होता पर माँ के मूतने की बात सुन मेरे अंदर की कामवासना जैसे जाग उठती थी मैं उनके साथ गुसलखाने के पास बने खाली जगह पे खड़ा रह जाता...वो अंदर टाय्लेट में घुस कर मूतने लग जाती...तो उनकी पेशाब की मोटी धार जब चूत से निकलती तो मेरे कानो में उसकी सिटी जैसी आवाज़ आती....लंड पाजामा में ही अकड़ जाता

मैं पहले की तरह खुले बदन और पाजामे के अंदर कुछ ना पहने माँ के साथ चिपक के सोता था...घर का माहौल मेरा बहुत ही रंगीन किसम का था...साला मकान मालिक भी बहुत महीनो महीनो बाद इकहट्टे पैसे लेने आता था कोलकाता से मोरतुज़ा काका का दिलाया घर अच्छा ही था...इससे पहले मैं जिस घर में था उससे भी ये घर शानदार था...मुझे चंपा की याद आई और बाकियो की भी

 
ताहिरा मौसी को नानी ने बता दिया था कि मैं वापिस होमटाउन में इस बार माँ के साथ शिफ्ट हो गया हूँ तो वो खुश हुई लेकिन उन्हें जगह का मालूमात नही था...नंबर मैने यहाँ से जाने का बाद सिम चेंज कर दिया था इसलिए वो नंबर जो ताहिरा मौसी के पास था वो अब बंद हो चुका था...इसलिए वो मुझे कॉंटॅक्ट नही कर पा रही थी...नानी की ही बदौलत ताहिरा मौसी मेरे घर तक पहुचि मुझसे जिस दिन मिली थी उस दिन वो मुझसे लिपटके रोने ही लगी इतने दिनो बाद जो मुझे वापिस देख रही थी...उन्होने मेरे होंठो और गालो को चूमा पर माँ की मज़ूद्गी के अहसास से उसने अपने आँसू पोंछे और माँ से भी गले मिली

फिर वोई पुराना घरों जैसा माहौल दोनो बहने बात करने लगी फिर ताहिरा मौसी ने बताया कि सुधिया काकी बूढ़ी हो चुकी है और वो लगभग डिस्ट्रिक्ट में रहती है बेटे ने उनके शादी कर ली और बहू के साथ उनकी बनती नही इसलिए अक्सर गाओं में ही पड़ी रहती है...मैने कहा कि मेरी कोई चर्चा अब किसी से ना करे...रूपाली भाभी का तो ताहिरा मौसी ने ज़िक्र ही नाही किया मेरे सामने थोड़ा बहुत माँ के ही सामने की फिर उसकी शिकायत करने लगी कि ऐसा करती है वैसा करती है उनका घर बार आज भी कलेश में ही चल रहा था....रूपाली का हज़्बेंड यानी मेरा भाई एक आध बार आया था मिलने पर ना उसे अपनी औलाद में कोई इंटेरेस्ट था ना रूपाली में सुना था जब ठरक चढ़ती है तो तब बीवी को अकेला पाके उस पर टूट पड़ता है ये सब सुनके ही मुझे बेहद बुरा भी लगा और अच्छा भी ना लगा सुनके

मैने ताहिरा मौसी को अपने और माँ के संबंधो की कोई चर्चा नही बताई थी....उनके जाने के बाद उन्होने भी आना कम कर दिया....हालाँकि मौसा ने माँ को देखने की इच्छा जाहिर की थी..पर माँ उनसे मिलने के लिए कोई ख़ास मन ना बनाई हुई थी ऐसे ही तो मेरी मर्ज़ी पे मज़बूरी ही कह लो होमटाउन यानी अपने ससुराल आई थी...अपने ससुराल भी नही गयी थी किसी को कुछ खबर नही था....पिताजी भी कम कॉल किया करते थे

धीरे धीरे मेरे पैसो में बढ़ोतरी होने लगी और मैं अच्छी आमदनी कारोबार से कमाने लगा...मैं एक पर्चेस ऑफीसर की भमिका निभा रहा था....अब मेरी जान पहचान मार्केट में बहुत बढ़ चुकी थी....रिश्तेदार लोगो से भी मुलाक़ात की थी..पर ना तो रूपाली से मिला था ना ही चंपा से कभी भेट की थी....हालाँकि चंपा की बड़ी याद सताती थी उसके साथ मेरा रिश्ता गहरा सा था...लेकिन मैं तौबा कर चुका था की माँ के बाद अब किसी और औरत को टच तक नही करूँगा...

माँ भी धीरे धीरे सब्ज़ी लाने टाउन जाने लगी कहने लगी कि इतनी औरते रात रात गये अकेली लड़कियाँ तक टाउन से यहाँ आती है क्या हर्ज़ है? मैने कोई आपत्ति नही जताई...मैं तो अपनी ज़िंदगी में खुश था...सब्ज़िया राशन खरीदके वो घर लाती और हम माँ-बेटे एकदम इतमीनान से ज़िंदगी गुज़ारते

धीरे धीरे टीवी भी खरीद लिया और साथ में एक होम थियेटर सेट भी...कभी कभी गंदी गंदी फ़िल्मो वाली सीडी भी बेझीजक ले आता तो माँ टोकती...पर मैं कहता साथ देखेंगे तो वो शरमा जाती..जब घर पहुचता तो माँ खुले बाल को कंघी करते हुए टीवी पे लाउड वॉल्यूम में गाना सुन रही मुझे मिलती...आजकल माँ मेरे साथ ज़्यादा से ज़्यादा घुलने लगी थी...

एक दिन टीवी पे मस्त फिल्म आ रही थी....जो कि बी-ग्रेड मूवी थी उसमें पति को शराब पिलाके उसके दोस्त उसे बेहोश कर देते है उसके बाद उसी कमरे में मौज़ूद बीवी के साथ ज़बरदस्ती करने लग जाते है...वो विरोध करती है तो उसे उसके पति के नशे में धुत्त दोस्त धमकाने लगते है कि वो उसे चोदेन्गे भी साथ में उसका वीडियो भी बनाएँगे...ये सुन औरत डर जाती है वो दुल्हनो के जैसी लाल साड़ी वाले कपड़ों में होती है मैं वॉल्यूम थोड़ा कम किया इस बीच देखा कि माँ फिल्म मे ऐसे सीन्स को लेके कोई आपत्ति नही कर रही जब मैने टोका तो उसने फटाक से कहा तुझे बुरा लग रहा है ये सब देखके तो बंद कर दे मैने कहा नही नही...मैने उसके कंधे पे हाथ रखा...हम फिल्म देखने लगे..लड़की की चीखें पूरे कमरे में गूँज़ रही थी उसकी साड़ी और ब्लाउस फाड़ दी जाती है उस पर पाँचो के पाँच टूट पड़ते है

उसकी ज़बरन चुदाई शुरू हो जाती है...हर एक गुंडा उस पर चढ़ता है उसकी पेटिकोट के नाडे को जो कि नाभि के उपर हाथ डालता गुंडा खोल देता है उसके बाद सीन में बस उसकी पैंटी के उपर हाथ दिखाए जाते है उसके बाद सीन गुन्डो पे फिल्माया जाता है फिर उनके हाथो में उसके नीले रंग की पैंटी होती है जिसे सूंघते हुए वो लोग ठहाका लगाए उसे बेबस देखने लगते है....औरत रो रही है अब उसे गले और बगलो से ऐसा दिखाया जा रहा है कि वो नंगी उसका पूरा बदन पसीना पसीना हो रहा है साथ में उस पर चढ़ा उससे लिपटा गुंडा भी पसीने पसीने और गुलाबी आँखो में दिखाया जाता है बस सीन में उसके आगे पीछे होने के सीन होते है उसके हाथो की चूड़िया टूटते और उसके कलाईयों को मरोदते दिखाया जाता है...लड़की बेदर्दी से चीख रही है उसके माथे के सिंदूर और बिंदी को पोंछ दिया गया है...उसके बाल बिस्तर पे बिखरे हुए है बस उसकी छातियो और गले पे हाथ फिरता और उसकी नाभि को दबोचते गुंडे लोगो को दिखाया जाता है

उसके बाद उसका हिलना डुलना रुक जाता है...वो बस सिसक रही होती है...सूबक रही होती है पाँचो गुंडे अपने अपने कपड़े पहनते हुए हान्फते हान्फ्ते दिख रहे होते है फिर वो कमरे से निकल जाते है तो सोफे पे उसके नशे में चूर गहरी नींद में सो रहे हज़्बेंड को देखके हंसते ठहाका लगाते चले जाते है....

"उफ्फ कैसे कैसे सीन्स बना लेते है ये लोग इन औरतो को शरम नही आती".....माँ की आँखो को जब देखा तो वो गुलाबी हो चुकी थी....मैने टीवी ऑफ किया और माँ के एकदम करीब सॅट गया...."अर्रे माँ छोड़ ना ये तो नौटंकी है आक्टिंग के लिए इस फील्ड में लड़किया कोई भी हद तक जा सकती है"..........

"ह्म तू सही कहता है ऐसा लगता है जैसे रंडियो को ही कास्ट करते है यह लोग"......

"और नही तो क्या तू फिगर देख कितना बेढंगा है इसके पिछवाड़े को देख इसकी छातियो को देख"......मेरे ऐसा कहने से माँ शर्मा गयी...

"तू भी ना बहुत अकेलेपन का फ़ायदा उठाने लगा है"..........

"अर्रे माँ मैं तो बस मज़ाक कर रहा हूँ देखा तूने समीर और आंटी को कैसे एकदुसरे के साथ प्रेमी जोड़ा की तरह रहते है".......

."ह्म ये तो है".......फिर माँ मेरे साथ लेटते हुए मुझे सोफीया आंटी के साथ जो वार्तालाप किया वो बताने लगी मैं सुनके हैरान चलो ये तो अच्छा ही हुआ कि माँ ने हमारे रिश्तो के बीच के इस फ़ासले को ख़तम ही कर दिया था अब समीर और सोफीया आंटी की शादी में माँ को भी ले जा सकता था

अगले दिन समीर का कॉल आया था मैने उससे खूब बात की उसे मेरी फिकर लगी हुई थी....उससे बात चीत ख़तम करने के बाद मैं घर लौटा तो पाया आज मैं जल्दी घर आ गया था माँ खाना बना रही थी...मैं माँ को नोटीस कर रहा था उसके बदन को निहार रहा था आजकल वो नाइटी पहनने लगी थी आज उसने हरी रंग की मेरी दिलाई हुई नाइटी पहनी थी....उसके चूतड़ काफ़ी उभरे हुए लग रहे थे...चलो अच्छा है माँ को यहाँ आके खाना पीना लगने लगा था...

मैने पीछे से माँ को फिर पकड़ा इस बार उनके पेट पे अपने हाथ फँसाए और उसे हल्का सा दबाया तो मेरे चिपकने से हंस पड़ी..."चल आज तुझे मार्केट घुमा लाता हूँ कैसी फीका फीका चेहरा लिए रहती है"......

."हां अब तू मुझे सोफीया की तरह तय्यार करना चाहता है"......

."क्यूँ कौन बेटा अपनी माँ को तय्यार नही देखना चाहता चल तो सही सारा दिन चूल्हा रसोईघर में खड़ी रहती है अब बस भी कर तेरे दिन आ गये अब ये बाबूजी का दिन नही कि 24 घंटे उनकी सेवा में लगी रहे".......

"अच्छा ठीक है पहले तू छोड़ तो"........

"नही मैं नही छोड़ूँगा"....

"प्ल्ज़्ज़ ना"......माँ ने नज़ाकत से कहा

तो मैने मुस्कुरा कर अपने होंठ आगे बढ़ाए तो माँ ने मेरे होंठ पे होंठ रखके एक हल्का चुंबन दिया...हम दोनो एकदुसरे से अलग हुए फिर मैं बिस्तर पे जाके लेट गया...फिर माँ तय्यार हुई और हम बाहर गये

 
मार्केट जाना तो एक बहाना था क्यूंकी माँ के साथ मैं एकदम प्रेमी जोड़ो की तरह ही घूमना फिरना चाहता था रोड क्रॉस करते वक़्त उसने कस कर मेरी बाँह में अपने हाथ को फँसाया...हम एकदुसरे से चिपके हुए रोड क्रॉस करते बाइक पे भी सवार माँ मुझसे लिपटके बैठी होती...फिर उसकी मनपसंद चीज़ें खाने पीने के बाद हम मार्केट आए वहाँ महेंगे कान के सेट्स लिए और मैने माँ को अपनी पसंद की दो साड़ी दिलाई...फिर हम घर लौट आए

आजकल सॅंपल्स में कॉसमेटिक का सामान भी घर ले आता था अगर मैं चाहता तो उसे रख भी सकता था अपने पास इसलिए मैने माँ को लिपस्टिक और उनकी साइज़ की अनगिनत ब्रा ऐसी दिलवाई थी जो उन्हें पूरी फिट आती मैं खुद उनके टू पीस वाली ब्रा में आयने के वक़्त उन्हें देखके मुआयना करता था माँ शरमाती नही थी मुझसे उसने ईवेन जो साड़ी दिलाई थी एक काला ब्लाउस और गुलाबी साड़ी और एक लाल साड़ी वित मॅचिंग ब्लाउस जिन्हें पहनी वो पूरी सेक्सी लग रही थी उनकी नाभि के नीचे से उनके स्ट्रेच मार्क्स दिख जाते जिन्हें वो पल्लू से छुपा रही थी उन्हें इसलिए साड़ी पहनने की आदत नही थी...मैने कहा कोई बात नही बाहर ना पहने पर घर में यही पहना करे मुझे अच्छा लगेगा माँ मेरी ज़िद्द मान गयी और उस रात वो मेरी गुलाबी वाली दिलाई साड़ी पहनी

उफ्फ क्या कहेर ढा रही थी उनका फिगर काफ़ी उभर गया था....मुझे उनके नाभि के बीच स्ट्रेच मार्क्स और उनके बगलो के बाल काफ़ी पसंद थे क्यूंकी देसी औरतो की वो निशानी होती है मेरी ऐसी फॅंटेसी को जब माँ ने जाना तो वो लजा गई मुझसे...उस रात माँ वो साड़ी पहने ही मेरे साथ सो गयी मैं उनके गुदाज़ पेट पे हाथ रखके उसे अपने बदन से लिपटाए सो गया....

होमटाउन आए 1 माँस होने को था....इतने 30 दिनो के अंदर मेरे और मेरी माँ अंजुम के बीच के रिश्तो की दरार फ़ासले जैसे ना के बराबर होने लगे थे....साथ ही साथ जो दूरिया और जो फंसाद रुकावटें जो हमारे संबंध बनने के बीच आड़े आ रही थी...उसे मैने होमटाउन आके जरह से उखाड़ फैका...ना यहाँ माँ की कोई सहेली थी...ना यहाँ मेरा कोई दोस्त था और जो अवैध नाजायज़ संबंध बनाए भी थे वो माँ के मेरे संग आ जाने के बाद उनका वजूद ही मिट चुका था...अब सिर्फ़ मैं था और मेरी माँ...और मुझे मेरी अंजुम से कोई भी दूर नही कर सकता था कोई भी नही

अगली सुबह सनडे पड़ गया इसलिए जी भरके आज सो रहा था...सुबह के 10 बज चुके थे और माँ अकेले अकेले काम सारा निपटाए घर का झाड़ू पोंच्छा लगाए और कपड़े धोने के साथ गुसलखाने की ऑर नहाने चली गयी....उसने मुझे दो मर्तबा बार उठाया भी पर मैं गहरी नींद में सो रहा था...मेरी मेहनत और थकान दोनो देख माँ ने मेरे चेहरे को प्यार से सहलाया और नहाने चली गयी..लेकिन उसके सहलाने से ही मेरे बदन सिहर उठा इसलिए मैं जाग चुका था...अचानक मुझे कुछ सूझा और मैने शरारत के लहज़े में अपना पाजामा उतार फैका और अपने उपर एक झिल्ली सी चादर डालके आँखे मूंद ली...सोने का नाटक करीबन माँ के कमरे में आ जाने तक कर रहा था

इतने में मेरी सोच अनुसार माँ भीगे बदन अपने खुले गीले बालों को झाड़ते हुए कमरे में प्रवेश की वो अपने बालों को समैट रही थी उसके बाज़ू उठाने से मैने अधखुली निगाहो से झाँका तो पाया माँ की दोनो बगलो में बाल थे उन्होने अब तक बगल के बाल सॉफ नही किए थे जो काफ़ी लंबे लंबे हो चुके थे वोई देखके ही मेरा लंड तनाव में आ गया...एक तो उन्होने छाती के उपर से होते हुए घुटनो के उपर तक सफेद तौलिया बाँध रखा था और उनका बदन एकदम पानी से भीगा हुआ था

मैं उनके हिलते नितंबो के उभार को नोटीस करने लगा...वो जब चल रही थी तो उसके हिलते चूतड़ मेरे लंड में सनसनी दौड़ा रहे थे...उनके चुतड़ों के उभार पहले से कितने ज़्यादा लग रहे थे....माँ गुनगुनाते हुए अपने बाल सुखाते हुए उन्हें बिखेरने लगी...मैने मुआयना किया कि शायद उन्हें यही लगा हो कि मैं तो जल्दी उठने नही वाला इसलिए नंगे बदन तौलिया ही लपेटे वो चेंज करने मेरे सामने अपने बेटे के सामने अलमारी को खोल कपड़े निकालने लगी उनके एक हाथ में ब्रा का फीता लटका हुआ था और उसी के साथ उनकी गुलाबी सी छोटी सी पैंटी...मेरा बस चले तो उन्हें अंडरगार्मेंट्स कभी पहनने ही ना दूं...

माँ ने एक बार मेरी तरफ देखा मैं झट से सोने की आक्टिंग करने लगा ऐसा लग रहा था जैसे मैं कितनी गहरी नींद में हूँ...वो वापिस से अपने कपड़े निकालने को झुकी तो उसका तौलिया जो घुटनो तक था पीछे उठ गया....मैने हल्का सा झाँका तो लगा जैसे दो टाँगो की भैंस झुकी हुई हो..ख़ास कुछ निगाह नही पड़ा बस उसकी मोटी मोटी जांघों का दीदार हुआ...

फिर उसने खड़े होके कपड़े बिस्तर पे रखके और अपने बाल समेटते हुए अपनी ब्रा को सीधा करने लगी...उसने एक बार फिर मेरी तरफ देखा मैं बहुत मुस्किल से खुद पे क़ाबू कर पा रहा था....अचानक वो ब्रा पलट ही रही थी इतने में उसके तौलिए का गाँठ खुल गया...वो एकदम से हल्की सी चीखी "उूउउइइ".....उनकी आवाज़ सुन मैने हल्का सा आँख खोला तो मैं दंग रह गया

उफ्फ वो एकदम मदरजात मेरे सामने नंगी खड़ी हुई थी..उसकी टाँगों के बीच काफ़ी झान्टे उगी हुई थी...उसके मोटे मोटे नितंब की गोलाइयाँ और पेट के निचले भाग से लेके झान्टो के अंदर तक बहुत ज़्यादा स्ट्रेच मार्क्स हो रखे थे जिससे तालपेट का चमड़ा सिकुडा हुआ था...वो एकदम से झट से झुक गयी तो उसके पेट की तोंद और गहरी नाभि मेरी आँखो से ओझल हुई और उसके झुकने से उसके मोटे ब्राउन निपल्स जो उसके 35इंच की चुचियो के साथ झूल रहे थे काफ़ी मस्त लग रहे थे....वो झुकके जैसे तैसे तौलिया उठाने की कोशिश में पलट गयी जिससे मुझे उसके मोटी मोटी गान्ड के बीच की दरार सॉफ नज़र आई उफ्फ उसके गान्ड का सिकुडे छेद के आसपास थोड़े बहुत झान्ट उगे हुए थे...

वो एकदम से तौलिया उठाए अपनी छातियो के साथ साथ अपनी टाँगों के बीच की झान्टेदर चूत को छुपाते हुए मेरी तरफ शरमाई निगाहो से देखने लगी...वो तो गनीमत थी कि मैने उसके नंगे जिस्म को देखके एक पल में ही आँख कस कर बंद कर ली थी वरना मैं पकड़ा जाता...

अंजुम लज्जा से सेहेम उठी....वो खैर मनाने लगी कि उसका बेटा अब भी सो रहा था जैसे ही उसने अभी आँख पलटी ही थी कि उसे अपने बेटे की आधी चादर में ढके जिस्म में कुछ हरकत सी लगी ये हरकत उसकी टाँगों के बीच के बनते उभार से उसे लग रही थी...जो टाँगों के बीच से उठता एकदम तंबू बन गया था....उसका खड़ा लंड माँ को आभास कराने के लिए सॉफ था कि उसका बेटा या तो जगा हुआ है या सेक्सी सपने देख रहा है

अंजुम ने एक एक पाँव आगे बढ़ा कर अपने बेटे को धरने के चक्कर में उसकी चादर एक ही झटके में उसके जिस्म से अलग कर दी तो उसकी आँख फटी की फटी रह गयी...ये उसका कोई तीसरा बार था जो उसने अपने बेटे को नंगा पाया था उसकी टाँगों के बीच उसका लंड एकदम तोप की तरह खड़ा एकदम सख़्त मोटा और लंबा था...अंजुम थूक घोटने लगी उसने एक बार हड़बड़ा के आदम को जगाना चाहा लेकिन उसके क्या मन में आया? उसने चादर वैसे ही बेटे के उपर ऊढा दी और लगभग कपड़ा लिए कमरे से बाहर निकल गयी....आदम ने आँख खोला और करीब मुस्कुरा उठा...उसकी ये शरारत में उसे काफ़ी मज़ा आया था

जब सोके उठा था तो करीब 12 बज गया था...उसे बड़ा गुस्सा आया अपने उपर वो पहले मूतने गया अपने लंड को मुठियाए पेशाब की धार छोड़ी और वापिस कमरे से होते हुए रसोईघर में आया जहाँ उसकी माँ रोटिया बना रही थी...माँ ने बेटे को जगा देख मुस्कुराया....

अंजुम : उफ्फ उठ गये महाराज जी अब लीजिए लेट सवेर नाश्ता कीजिए

आदम : अर्रे माँ छुट्टी तो मिलती है ना इसलिए जी भरके आराम करता हूँ

अंजुम : बेटा इसलिए कहती हूँ रात को जल्दी सो जाया कर आज सनडे है तो क्या हुआ? इंसान को आलस्पन मार देता है

आदम : अच्छा दे

अंजुम ने बेटे की तरफ चोरी निगाहो से देखा और उसे एक सेक्सी लहज़े में मुस्कुराए ताना मारी

अंजुम : तू अंदर कुछ पहना कर ?

आदम : क्या माँ?

अंजुम : तू जब सोता है तो सिर्फ़ पाजामा पहनके सोता है अंदर कुछ भी नही पहनता इतने कच्छे पड़े है तेरे पास क्यूँ नही पहनता?

आदम : हाहाहा बस माँ ऐसे ही मैने सुना है लिंग को भी हवा लगनी चाहिए वो भी तो शरीर का एक अंग है

अंजुम : आए हाए बड़ी तुझे अपने नुन्नु की चिंता होने लगी

आदम : हां माँ

मैने हल्का रज़ामंद होते हुए आँख मारी तो माँ शरमा गयी .

."चल हट बहुत बिगड़ गया है तू चल अब मुझे खाना बना लेने दे जा जल्दी से नहा ले कपड़े धो दिए तेरे और हां सुन पाजामा अपना टब में डाल देना सर्फ डालके".......

 
माँ की बात सुन मैं उठ खड़ा हुआ मैने नोटीस किया माँ अब भी मेरी टाँगों के बीच के उभार का जायेज़ा ले रही थी मेरे अंडकोष झूल रहे थे जो बार बार पाजामे पे अपना उभार दर्शा रहे थे..माँ का चेहरा एकदम लाल लग रहा था...

आदम : अच्छा माँ तुझे कैसे मालूम कि मैं बिना कच्छे के सोता हूँ

अंजुम : चल हट कम्बख़्त जा नहा ले

आदम : अर्रे बता ना माँ (मैने नज़ाकत भरे लहज़े में ज़िद्द की)

अंजुम : बहुत कमीना हो गया है तू हाए बेशरम कुछ लिहाज़ तो कर माँ का

आदम : बता ना

अंजुम : ठीक है तो सुन आज जब मैं नहा कर अंदर आई तो मुझे लगा कि तू गहरी नींद में है जब मैने तेरी चादर हटाई तो अचानक से मेरी नज़र तेरे तानव में उठे लिंग पे पड़ी

माँ की इस बात को सुन मुझे जैसे करेंट लगा मैं अपने होंठो पे ज़ुबान फेरने लगा....माँ जैसे शरमा गयी फिर मुझे लगभग भगाने लगी...जब मैं नहाने घुसा तो अपने भीगे बदन पे साबुन मलते हुए लंड को एकदम उत्तेजित पाया जो माँ के सेक्सी बदन को नोटीस करने से ही खड़ा था...उपर से आज मैं इतनी ठरक महसूस कर रहा था..मैं उत्तेजना के चरम सुख पे था इसलिए 1 मिनट की मूठ मारी मेंने मेरे लौडे ने सफेद गाढ़ा वीर्य छोड़ा..मैने पूरे बदन को सॉफ किया नाहया फारिग होके बाहर आया

माँ और मैं फिर व्यस्त हो गये....माँ खाना बनाने में जुटी हुई थी तो मैं एजेंट को कॉल करके नये माल के आने की खबर जानने में लगा हुआ था....एजेंट ने बताया कि माल आ चुका है अगर हो सके तो मैं मार्केट आ जाए ताकि मामलो का जायेज़ा और इनस्पेक्षन दोनो कर ले...मैने शाम का टाइम लिया और पानी पीने रसोईघर के अंदर आया तो पाया माँ के चुतड़ों की गोलाइयाँ पाजामे के बाहर से काफ़ी उभरी हुई दिख रही थी पसीने पसीने होने से कपड़ा माँ के चूतड़ से चिपक गये थे और उसके नितंबो के बीच कुछ धँस से गये थे मैने ग्लास रखा

और माँ के पास आते हुए उसे काम में व्यस्त पाया वो अपनी ज़ुल्फो को हटाए माथे को पोंछ रही थी.....दोनो गॅस में चूल्हा चढ़ा हुआ था...मैने हल्के से उसके दाए नितंब को पाजामे के उपर से ही उस पर हाथ रखा और उसे हल्का सा दबाया..माँ सिहर उठी उसके हड़बड़ाने से पहले मैने उसे पीछे से अपने बदन से चिपका लिया और उसके पसीनेदर गले को चूमा और उसके गाल पर मैं अपना चेहरा उसके चेहरे से रगड़ने लगा माँ मेरे सर को धकेलने लगी

अंजुम : अर्रे ये क्या बेहुद्गि है आदम? उफ्फ बहुत ज़्यादा नही हो रहा (माँ ने हल्का सा विरोध किया)

आदम : क्यूँ मेरा छूना तुझे अच्छा नही लगता?

अंजुम : हमारे बीच कुछ तय हुआ था ना तू भूल गया

आदम : मैने तुझसे वादा किया था कि मैं तुझे हर सुख और आराम दूँगा

अंजुम : अच्छा जी तो तू अब मेरे दिए हुए वायदे का फ़ायदा उठा रहा है....तूने ही मुझसे कहा था जब तक मैं ना कहूँ तू मुझे छुएगा भी नही

आदम को ख्याल आया तो उसे अपनी ग़लती का अहसास हुआ...लेकिन उसने माँ के जंपर के अंदर हाथ डाला और उसके गुदाज़ पेट पे अपने दोनो हाथ कस लिए "ह्म भुला तो नही हूँ पर तुझसे दूर नही हो पा रहा अब जब तक घर में रहूँगा तुझसे अलग नही हो पाउन्गा"...........माँ मुस्कुराइ वो चाकू से नींबू काट रही थी

अंजुम : लगता है जेठ जी से बात करनी ही पड़ेगी ताकि तुझे सनडे की भी छुट्टी ना मिले

आदम : क्यूँ ? मेरे साथ वक़्त गुज़ारने में तुझे अच्छा नही लगता

अंजुम ने प्यार से मेरे चेहरे और बालों पे हाथ फेरा फिर उसने मेरे गाल को चूमा....उसके इशारे भरे मुस्कुराए लहज़े को समझा तो माना कि वो मज़ाक था...माँ ने इस बीच मुझे अपने से दूर धकेला और फिर थाली देते हुए बोली जाओ खाना लगाओ मैं हार मानते हुए मुस्कुराए उसकी नरम कलाईयों को छूते हुए थाली लिए अंदर चला आया

हम माँ-बेटे ने एक साथ लंच किया...उसके बाद माँ को थोड़ी सुस्ती होने लगी तो वो बेड पे बैठके टीवी देखने लगी...मुझे तय्यार होता देख उसने सवाल किया मैने कहा कि मैं आता हूँ एजेंट से मिलके....माँ ने कहा कि अच्छे से जाना और जल्दी घर आ जाना

मैं मेन मार्केट के लिए निकल गया...वहाँ एजेंट से मुलाक़ात की फिर उसके साथ उसके घर पहुचा वहाँ उसने मुझे नये नये आए माल दिखाए....उन्हें सेलेक्ट करना और डिसट्रिब्यूट करने का मेरा काम था....जो जो चीज़ो की डिपार्ट्मेनल स्टोर को रिक्वाइयर थी उतना सामान मैने चूज किया...अचानक एक नया माल हाथ लगा....वो कोई झिल्लिडर बिकिनी थी जिसके फिते काफ़ी पतले डोरी जैसे थे काफ़ी सेक्सी पीसस थे वो...एजेंट मुस्कुराया उसने कहा कि यह यहाँ यक़ीनन सेल होगी क्यूंकी यहाँ ठरकीयो की कमी नही हम दोनो मज़ाक कर रहे थे...

मैने वो सॅंपल एक अपने पास रख लिया और बाकी मामलो बताए वक़्त पे डिपार्ट्मेनल स्टोर पहुचने के लिए मुहय्या कराया...काम काज से निपटते हुए जब मैं बाइक से घर आ रहा था तो एक बार केमिस्ट शॉप पर रुका वहाँ मैने एक दवाई मेडिकल शॉप वाले को देने के लिए कहा...उसने मुझे सुडोल कॅप्सुल का एक डिब्बा दे दिया...मैने माँ के स्तनों को नोटीस किया था सोचा कि इस बार माँ को ये कॅप्सुल खिलाके देखता हूँ ताकि मेरी माँ और भी सेक्सी लगे...माँ अगर ऐतराज़ करती तो मैं ज़िद्द पे आमादा हो जाता यही सोचके मैं घर लौटा

मैने माँ को तोहफे में वो सॅंपल वाली बिकिनी दी...जिसे देखके वो शरमाने लगी..."हाए अल्लाह ये तू मेरे लिए लाया है".....

.."हां माँ मेरा दिल है कि तू यह पहने".......

."छी तौबा मेरी उमर नही ये सब पहनने की क्या अज़ीब चीज़े तू लाता है"........

"तू पहनके दिखना ब्रा और पैंटी भी तो फिट आती है तुझे ये भी आएगी तू पहनके दिखा ना"......माँ बहुत झिझक रही थी क्यूंकी उसका साइज़ काफ़ी छोटा था पर मेरी ज़िद के आड़े उन्हें मानना पड़ा

जब मैं बेडरूम में बैठा टीवी देख रहा था तो इतने में दरवाजे के खुलने की आहट हुई..मैं एकटक माँ की तरफ देखते ही हक्का बक्का मुँह खोले खड़ा रह गया ...एक तो माँ के बाल खुले हुए थे और ब्यूटी पार्लर हाल ही में उसे भेजा था इसलिए फेशियल की वजह से उसका चेहरा चमक रहा था...उसने आइब्रो भी बनाए हुए थे

उसने मेरी दी हुई बिकिनी पहनी हुई थी जो उसकी कंधो से लेके पीछे पीठ पे एक गाँठ बनके फसि हुई थी वो फिते नीचे जाते हुए माँ की दोनो चुचियो के कटाव के साथ साथ सिर्फ़ माँ के निपल्स को ही छुपा रहे थे नीचे टाँगों के बीच पैंटी जैसी वो लाइनाये वो तो माँ की झान्टेदार चूत को छुपा ही ना सकी बस उसने चूत की दरार से लेके पीछे दोनो नितंबो को ऐसे छुपाया हुआ था कि माँ के गोल गोल नितंब उससे एकदम चिपके खुद को दर्शा रहे थे...पैंटी की डोरी महेज़ एक धागा था जो पैंटी को दोनो टाँगों के बीच जोड़ा हुआ था जो दोनो कमर में फँसा हुआ था....माँ की गोल गहरी नाभि और उसके नीचे नाभि से शुरू होते मैं स्ट्रेच मार्क्स को घूर रहा था उफ्फ वो उस बिकिनी में काफ़ी सेक्सी लग रही थी माँ का चेहरा एकदम गुलाबी सुर्ख था

आदम : उफ्फ माँ बगलो को भी उठाओ

अंजुम ने अपने बगलो उठाया और दोनो में उगे हुए अपने काख के बाल दिखाए उफ्फ उनकी बाँह उठाने से ही मैं जैसे फर्श पे गिरते गिरते बेहोश होते बचा...वो काफ़ी सेक्सी लग रही थी मैं उन्हें पलटा और उनकी पीठ पे हल्की रोयेदार बाल पे अपना हाथ फेरा फिर उनकी कमर की निकली दोनो तोंद पे हाथ फेरा और उनके नितंबो के बीच की दरार में फासी पैंटी की सिलवटों को देखने लगा...ब्रा की हुक तो महेज़ एक धागा ही थी सामने पलटने के बाद मैं बड़े गौर से माँ की छातियो को घूर्रने लगा वो बिकिनी मुस्किल से ही माँ की चुचियो को छुपा रही थी माँ शरम से एक दम पानी पानी हो रही थी लेकिन बेटे की ज़िद्द के आगे वो चुपचाप खड़ी बस लजा रही थी..

 
अंजुम : अब हो गया देखना अब तो उतार लेने दे

आदम : दिल तो कर रहा है आपकी तस्वीरें उतार लूँ

अंजुम : हट पागल ये भला कोई ड्रेस है तू बहुत गंदा हो गया है और क्या क्या करवाएगा अपनी माँ से सच में तू तो तेरे बाप से भी ज़्यादा ठरकी है अर्रे कुछ तो मान रख कमीने अपनी माँ का

अंजुम को ये सब करते हुए शरम बहुत महसूस हो रही थी दिल ही दिल में उत्सुकता सी थी...

बेटे ने माँ के हाथ में सुडोल कॅप्सुल दिया माँ आँखे फाडे उसे देख रही थी...

"इसे दूध के साथ खाने के बाद लेना बोला है 2 महीने के अंदर फरक पड़ने लगेगा"......

.आदम की बात सुन माँ ने लजा कर सर झुका लिया

अंजुम : अफ ये मैं नही ले सकती मत ज़िद कर

आदम : अर्रे माँ मैं तुझे सबसे अलग देखना चाह रहा हूँ इतनी जवान है तू और खुद को हर्वक़्त बस बुढ़िया कहती है उफ्फ इस वक़्त कोई पराया मर्द तुझे देख ले तो उसका तो

अंजुम : उसका तो क्या?

आदम : छोड़ो ना

अंजुम : देख छुपा मत

आदम : अच्छा तो सुनो कोई पराया मर्द तुम्हें ऐसे देख ले तो अपने उपर से अपना आपा खो बैठे तेरा मुरीद हो जाए

अंजुम : हाए अल्लाह हावव ये कोई बात हुई

आदम : हाहाहा तुझे कुछ नही पता?

मैने माँ के दोनो चेहरे को अपने हाथो में लेते हुए उनकी ज़ुल्फो को बालों के साथ पीछे समेटा....वो मेरी आँखो में बड़ी बड़ी निगाहो से झाँक रही थी...हम दोनो कुछ पल के लिए एकदम चुपचाप थे मज़ाक मस्ती अब गंभीरता का रूप दोनो के बीच ले चुकी थी

आदम : सच कहूँ तो तुझमें मुझे वो सब दिखता है जो हसरतें मैं अपने दिल में काई सालो से लिए दबाए हूँ

अंजुम : जैसे क्या?

आदम : क्या फायेदा? तेरी रज़ामंदी तो नही

अंजुम : भला कहने में क्या रज़ामंदी नही?

आदम : तूने मुझे खुद को छूने से मना किया है ना

अंजुम : प..पर

अंजुम सच में अपनी बातों से फस चुकी थी उसने तो खुद ही आदम को मना कर रखा था कि उसे ना छुए...वो बार बार नज़र पलट रही थी....नही ये ठीक नही वो तेरा बेटा है...उसके दिल में किसी ने आवाज़ दी...तो किसी ने पलभर में कहा कि मत सुन इसकी ये शरम हया मर्यादा तुझे सिर्फ़ बर्बाद कर देगी तेरी ज़िंदगी को नष्ट कर चुकी और कितना इसे हावी अपने उपर होने देगी.....माँ कशमकश के घेरे में बिकिनी पहने खड़ी थी और बेटा उसके करीब आए उसके दोनो चेहरो को हाथो में लिए उसकी ज़ुल्फो को समेटते कानो के पीछे किए उसकी तरफ एक टक देख रहा था जैसे अब भी रज़ामंदी की इज़ाज़त चाह रहा हो

माँ के होंठ काँपे...वो अपने बेटे के निगाहो में निगाह डाले एकटक खड़ी बुत बनी सी थी...अचानक बेटा उसके चेहरे के पास अपना चेहरा लाया और उसके होंठ पलभर में अपने होंठो में ले लिए और उसे लगभग बारी बारी से उपरी निचली होंठ को चूसने लगा...माँ काँप उठी बेटा अपने ज़ज़्बातो को काबू ना कर सका उसका दिल बहुत दिनो से मचल रहा था...माँ उसके पीठ पे हाथ रखके उसे सहला रही थी...बेटे को अहसास हुआ कि माँ उसके होंठो को मुँह में लेके चुस्स रही है उसके होंठो की हरकत का अहसास से आदम का लंड एकदम पाइंट फाडे तनाव में आ गया

दोनो एकदुसरे को लगभग स्मूच कर रहे थे...और तभी एकदम से माँ ने बेटे को धकेल दिया उसके आँखो में आँसू उबल उठे...बेटा हाँफटा हुआ माँ की तरफ हैरत से देखने लगा उसे अपने होंठो पे माँ के गरम होंठो को चूसने से अब भी एक मीठी सी जलन अपने होंठो पे हो रही थी....

आदम माँ के पास आया माँ चुपचाप खड़ी खुद की साँसों को काबू करने में संयम पा रही थी..इतने में बेटे ने माँ को दरवाजे से सटा लिया....माँ एकदम कांपति निगाहो से उसे देख रही थी उसकी आँखो में एक रोमांच सा था उसे पता था कि ये अहसास शुरू शुरू में थोड़ा अज़ीब था पर इसमें मज़ा दुगना आनेवाला था....अंजुम हार गयी उसने अपने दिल की उस आवाज़ को दबा दिया....अपने हया शरम लाज को उसने पलभर में छोड़ दिया अब उसका खुद पे कोई बस नही था....बेटा अब तक उसके गाल को चूमे जा रहा था उसने बेटे के सर के बालों पे हाथ फेरा

आदम माँ के कंधे पे हाथ रखके उसे अपने साथ बिस्तर के पास ले आया दोनो पलंग पे बैठ गये...माँ किसी दुल्हन की तरह शरमा रही थी...."अब तक मुझे तेरी इजाज़त नही मिली".....आदम ये कह कर मुस्कुराया...

माँ उसे एकटक देखने लगी..."क्या एक माँ अपने बेटे को ऐसे किस करती है इतना कुछ हो गया और तुझे इजाज़त चाहिए"......

माँ के सवालात से बेटा हंस पड़ा...इतने में माँ भी हंस पड़ी

अंजुम : अब तुझे और किस चीज़ की इजाज़त चाहिए..इतना कुछ हो गया क्या एक साधारण माँ-बेटे ऐसी हरकते करते है....जब तुझे मुझपे पूरा हक़ है तो फिर पहल कैसा मैं खुश हूँ कि तूने अब तक अपनी माँ को वासना भरी निगाहो से नही छुआ बल्कि उस छूने के पीछे तेरी मुहब्बत थी...मैं समझ चुकी हूँ कि क्यूँ सोफीया जैसी औरत अपने बेटे से ऐसे समबंध बनाई..जो सुख जो खुशी उसे एक मर्द से चाहिए था बस उसे उसके बेटे ने पूरी कर दी..तो बता अब तुझे मेरी किस पहेल का इंतजार है मैं सम्पूर्न तेरी हूँ

आदम : बस मुझे तुझसे यही सुनना था मेरी दिल को जो हसरत है उसे मैं तेरे लवजों से सुनना चाहता था कि यही कि तू सम्पूर्न मेरी हो चुकी....और मुझे दुनिया की कोई परवाह नही कोई नही

आदम ने धीरे धीरे अपने हाथ आगे बढ़ाए पर वो झिझक रहा था जैसे कुँवारा हो उसने काँपते हुए अपनी माँ के ब्रा पे हाथ रखा और उसकी चुचि को ब्रा सहित हल्का सा सहलाते हुए दबाया माँ ने आँखे मूंद ली वो लेट गयी जैसे सबकुछ उसने अपने बेटे पे छोड़ दिया हो...

आदम को अहसास हुआ कि उसने ना जाने कितनी औरतो को चोदा था? पर अपनी माँ को स्पर्श करते ही जैसे अपने उपर से उसका काबू हट सा गया था वो इतना झिझक रहा था हो भी क्यूँ ना? संबंध के बीच माँ-बेटे का रिश्ता जो आ रहा था

माँ जैसे उसे आमंत्रित कर रही थी माँ की गुलाबी निगाहो को देखते हुए बेटा धीरे धीरे उसके बदन से लिपटता चला गया उसने पाया कि माँ ने कोई विरोध नही किया....आदम ने कब अपने पॅंट की बेल्ट सहित अपने पॅंट को अंडरवेर के साथ फर्श पे उछाल फैंका मालूम ही ना चला...बस फर्श पे दोनो के कपड़े बिखरते हुए गिरने लगे....

बाहर मौसम अंगड़ाई ले रहा था काले बदल गरजते हुए एकदुसरे से पुरज़ोर टकरा रहे थे बिजलिया कड़क रही थी बारिश का पानी सब जगह को भिगो रहा था बड़े बड़े पेड़ घर के बाहर लहरा रहे थे....और दो जिस्म भीतर कामवासना की आग में जल रहे थे

 
उफ्फ वो रात जो उन माँ-बेटों को अपनी ठंड से और एकदुसरे से लिपटा रही थी पसीने पसीने हो रहे थे कमरे में जैसे उमस भरी गर्मी थी बेटे के बदन का पसीना माँ के बदन पे गिर रहा था....माँ ने कस कर चादर पकड़ ली थी अपने हाथो....उसकी एक कलाई पे बेटे का हाथ आगे बढ़ते हुए उसकी उंगलियो में अपनी उंगली फसाते हुए उसके हाथो को अपने हाथो में जकड लिया....ऐसा लग रहा था जैसे दो आत्माओ का मिलन हो रहा था क्यूंकी उस तूफ़ानी रात में ना जाने कितने रिश्तो पे बिजली गिरी थी? जैसे भूचाल आ गया था..पलंग के उपर दोनो अपनी कामवासना में डूबे एक अलग ही संबंध को जनम देने में व्यस्त थे....

ऊफ्फ इस रात की सुबह ना हो....जैसे ये वक़्त थम जाए...ये सिलसिला यूही चलता जाए....दिल के हाथो बेसवरा मैं....बस यूही मन में बुदबुदाता गया....

माँ मेरे नीचे लेटी मदरजात नंगी अपनी टाँगों को मेरी जाँघो से रगड़ रही थी...ऐसा लग रहा था जैसे उसके अंदर की उत्तेजना मैने भड़का दी थी..और अब इस जलती चिंगारी में बस आग भड़काने की सी देर थी...मैने माँ की दोनो टाँगों को चूमा....पलंग के नीचे माँ को पहनी बिकिनी पड़ी हुई तो उससे दो हाथ दूर मेरा पॅंट जिसके बीच बेल्ट भी फसि पड़ी थी वैसी गिरी पड़ी थी....कच्छा पॅंट के भीतर उतारने के वक़्त रह गया था...

माँ की दोनो टाँगों को चूमते हुए मैने नोटीस किया कि माँ ने तो मेरी दी हुई उस दिन की पायल अब भी पहनी है....तभी सोचु कि बीच में खनकता वो शोर कहाँ से आ रहा था?.....मैने माँ की दोनो टाँगों को फैला लिया और उनकी चूत जो झान्टो से भरी थी उस पर हाथ मलता हुआ उसे मुट्ठी में लेके दबाने लगा...दो-तीन बार दबाने से ही माँ शिथिल पड़ गयी...मैने हाथ उठाके देखा तो पाया उंगली के बीच और पूरे हाथ में माँ की चूत से निकला चिपचिपा पानी लगा हुआ था...मेरे महेज़ हाथ रखने से ही वो गरमा गयी थी या हमारी चूमा चाटी से ही उत्तेजित होके..

इसी कशमकश में माँ ने मेरी टाँगों के बीच अपना हाथ रखा मुझे अहसास होते ही मैं माँ की तरफ देखने लगा माँ मुझे एकदम गौर से देख रही थी....

"देख कितना उत्तेजित है यह?".......मैने माँ के हाथ को अपने लिंग को सहलाते मुठियाते पाया...माँ ने सिर्फ़ मुस्कुराया उसने मेरे लंड को हाथो में लिए खीचते हुए जैसे अपनी योनि के पास लाई

मैने उसकी कलाई को कस कर पकड़ा..."अभी नही पहले कुछ और?"......मैने माँ को आँख मारी....माँ समझ ना सकी कि मेरा क्या तात्पर्य था?....मेरे चेहरे को नीचे जाते देखते हुए वो हैरत में पड़ी उसे आभास होते ही उसने मेरे माथे पे अपना हाथ रखा और मुझे दूर करने लगी अपनी टाँगों के बीच से...मैने उसकी कलाई को पकड़ा और उसके चुचि पे हाथ रख दिया माँ चुपचाप हो गयी....जल्द ही उसे अहसास हुआ अपनी चूत पे बेटे के गरम मुँह का...वो कसमसाने लगी...आहें भरते हुए उसने अपने दोनो हाथ बेटे की पीठ को सहलाने से रोक दिए

बेटे ने फुरती से अपनी जीब माँ की योनि के भीतर प्रवेश की और उसे प्यासे शेर की तरह चाटने लगा...अब बेटे ने अपना पूरा मुँह माँ की चूत में रख दिया और उसे लगभग कुरेदने लगा..उसके होंठ और ज़ुबान की गुदगुदी से ही माँ की चूत में जलन सी होने लगी....बेटा जीब से गीली चूत की दरार को चाटते हुए...दाई बाई की सूजी फूली हुई चूत के होंठो को भी मुँह लेके खींच रहा था उसे चूस रहा था...माँ ने मारे उत्तेजना में टाँग एकदम फैला ली उसने कस कर चादर को पकड़ लिया..बेटे ने इस बार माँ की उभरी चूत के दाने को मुँह में भर लिया..तो जैसे माँ तड़प उठी.....ये रोमांच ये मज़ा उसे किसी मर्द ने नही दिया था अगर ज़िक्र भी हुआ था तो उसने सिर्फ़ इसे अंग्रेज़ो की गंदगी मानी थी...

पर आज अपने बेटे के दिए मुख मैथुन से ही अंजुम को बड़ा ही मज़ा मिल रहा था...वो अब आहें भरने लगी बड़े ज़ोर से...उसका बदन ऐंठ रहा था....इस बीच उसे अहसास हुआ कि कब चूत को चाटते आदम उठ बैठा और उसने झुकके अपनी लंबी दो उंगली माँ की चूत के गहराई में डाल दी...माँ को अपने भीतर उंगली का अहसास हुआ...बेटा माँ की चूत में उंगली कर रहा था....ताकि माँ को पूरा मज़ा मिल सके इस बीच वो माँ के दाने पे मुँह लगाए उसे चूस देता या फिर फूली चूत के बीच की फांकों में अपनी ज़बान लगाने लगता...माँ का गला सुख गया उसके आँख लगभग बुझने सी लगी...

अंजुम : उफ़फ्फ़ अहहह उम्म्म आहह इसस्शह अल्लहह सहन नही हो पा रहा आहह स्स्स आहह हंसस अहहह

माँ को सिसकते आहें भरते देख आदम ने अपने अंगूठे को भी माँ की चूत में घुसा दिया...इससे अब तीन उंगली माँ की चूत के अंदर बाहर आराम से हो रही थी...पर चूत के होंठ उसे अपने अंदर लेने को जैसे राज़ी नही थे...हो भी क्यूँ ना अब तक उसकी माँ अपने पति से कितनी बार ही चुदि थी यही कोई दस साल पहले और इतने सालो तक तो उसकी चूत की पर्त का टाइट होना तो तय ही था क्यूंकी उसे फिर किसी ने खोला जो नही था..

आदम ने चूत से उंगली बाहर निकाल ली और इस बार माँ की चूत को मुट्ठी में लेके दबोच लिया...उसने बड़े कस कर माँ की चूत को पकड़े रखा...अंजुम उठ बैठी और उसने बेटे के हाथ को कस कर अपनी चूत के द्वार से हटाना चाहा पर उसे अहसास हुआ कि उसके अंदर अब और सहने की ताक़त नही वो वैसे ही नंगी अपने बेटे के गले लग गयी उसके सख़्त निप्प्ल्स और छातिया बेटे के सीने से दब गयी..."आहह उउंम्म".....माँ कराहते हुए काँपते टूटे पत्ते की तरह वापिस बिस्तर पे ढेर हो गयी उसका बदन पसीना पसीना हो चुका था

आदम ने चूत की तरफ देखा जो पानी छोड़ रही थी...उसने फिंगरिंग जारी रखी वो काफ़ी सटीक और गहराई से माँ की चूत में उंगली करता रहा...माँ की आवाज़ में फिर कपकपाहट उठ गयी और चरम सीमा पे वो फिर्र चीखने लगी..पूरा कमरा माँ की आवाज़ से गूँज़ उठा तो बेटे ने उसी पल उंगली चूत से निकाली और फूली चूत को अपने मुट्ठी में कस लिया....माँ का चेहरा लाल हो गया और वो हाफने लगी...जैसे अब उसमें जान ही ना हो...बाहर कड़कड़ाती बिजली का शोर और तूफान की हो हो करती हवा सुनाई दे रही थी

लाइट तो कबकि जा चुकी थी दोनो अंधेरे में वैसे ही दिन दुनिया से बेख़बर परे हुए थे जब आदम को तक़लीफ़ ज़्यादा लगी तो उसने उठके थोड़ा सा ब्रेक लिया माँ वैसे ही नंगी लेटी बेटे को कमरे से बाहर जाते देख रही थी...कुछ ही देर में बेटा लिविंग रूम से दो मोमबत्ती मांचीस से जला कर लेके आया...एक उसने टेबल के उपर रखी सामने और दूसरी पलंग के पास वाले मेज़ पे...अब कमरा कही हद तक रोशन हो चुका था....दोनो को एकदुसरे के बदन नग्न अवस्था में देख सकते थे साथ ही साथ आदम ने मच्छरों के प्रकोप से बचने के लिए पलंग के चारो तरफ मच्छरदानी लगा दी...माँ अंदर नंगी लेटी जैसे बेटे के इंतजार में थी..बेटा नंगे पाओ बिस्तर पे चढ़े मच्छरदानी को ठीक से लगा कर माँ के उपर फिर सवार हुआ माँ को अपनी चूत के ठीक उपर बेटे का झूलता लंड दिखाई दिया

 
आदम ने माँ की जांघों को फिर चूमना शुरू किया और उसकी टाँगों पे रोए दार बालों पे अपनी ज़बान से गुदगुदी करने लगा...माँ हंस पड़ी...उसे मज़ा आ रहा था...अब तक दोनो के बीच कोई वार्तालाप नही हुआ था....आदम ने चूमते चूमते फिर तालपेट के उपर चूमना शुरू किया स्ट्रेच मार्क्स से सिक्युडा माँ की नाभि के नीचे का हिस्सा जैसे कोई बंजर ज़मीन हो..लेकिन ये तबाही भरे निशान उसके पैदा होने से थे..आदम ने तालपेट के उपर चूमते हुए आके माँ की नाभि में ज़बान डाली दी...उसमे जीब चलाने लगा...तो माँ मारे उत्तेजना के पगला सी गयी..

फिर आदम ने दोनो चुचियो को हाथो में लेके दबाना शुरू किया...फिर एक एक करके दोनो के मोटे निपल्स को अपने मुँह में भी लेके चूसना शुरू किया.."वाहह काश इसमें दूध होता?"......उसने बड़बड़ाते हुए कहा तो माँ सुनके शरमा गई....आदम ने माँ की दोनो चुचियो को भरपूर तरीके से चूसा....एक को चूस कर वो मुँह से निकाल देता और दूसरा मुँह में भर लेता...वो दोनो को करीब मालिश के तरीक़ो से मसलता हुआ उन्हें दो हाथो से दबोचता हुआ खूब दबाए जा रहा था....माँ एक बार फिर बेटे के कुल्हो के उपर अपनी टांगे लपेट चुकी थी...

आदम के मोटे लंड का अहसास उसे अपनी चूत के मुंहाने पे लगा...इस बीच आदम ने माँ के चेहरे को सहलाते हुए उसे किस करना शुरू किया..तो माँ ने जैसे बिना आपत्ति के उसके होंठो को अपने मुँह में भर लिया....दोनो माँ-बेटे एकदुसरे को लंबा स्मूच कर रहे थे...एक दूसरे को पागलो की तरह किस कर रहे थे....एकदुसरे के मुँह के भीतर ज़ुबान डाल रहे थे....ज़ुबान से ज़ुबान लगा रहे थे...तो ज़ुबान को चूस भी रहे थे....अंजुम को अहसास हुआ कि बेटे ने उसके मुँह में अपना गरम थूक डाल दिया है...तो अंजुम उसे घोटते हुए आदम के होंठो का रस्पान करने लगी...दोनो एकदुसरे के होंठो काफ़ी देर तक चूस्ते रहे उसके बाद आदम सीधा लेट गया माँ के खुले बाल उसके चेहरे से होके गुज़रे...माँ उठ बैठी उसने बेटे के लंड को अपने हाथो में लिए मसला...और एक बार बेटे की तरफ देखा

आदम : माँ अब आप की बारी है अपने बेटे को खुश करने की भूल जाओ सबकुछ बस मुझे प्यार कर लेने दो खुद से ना परवाह करो रिश्तो की ना गैरो का...सिर्फ़ और सिर्फ़ ख्याल करो कि हमारे बीच जो कुछ हो रहा है वो ज़रूरी है...इस आखरी फ़ासले को भी दूर कर लो

माँ ने मुस्कुराते हुए बेटे की बात सुनी तो बेटे ने माँ की पीठ को सहलाते हुए थोड़ा उठके माँ के बालों को समेटते हुए उसकी ज़ुल्फो को चेहरे से भी हटा कर अपने हाथो में समेटते हुए जकड लिया.....उसने माँ के सर पे हल्का दबाव दिया....माँ धीरे धीरे बेटे के लंड के पास अपना चेहरा लाई....फिर दूसरे हाथ से आदम ने माँ के होंठो पे अपने लंड को फिराया

आदम : मुँह में हां ले ले (धीरे धीरे आदम ने माँ को इन्स्ट्रक्षन देते हुए कहा)

माँ ने घप्प से बेटे के लंड को मुँह में ले लिया....उसने अपनी आँखे मूंद ली...उसने महसूस किया कि बेटे का लंड कितना मोटा और लंबा है? "म्म्म्मम"......माँ के मुँह से स्वर निकला माँ उसे बड़े चाव से मुँह में लिए चूसने लगी...इस मुख मैथुन के अहसास से आदम गरमा गया...वो स्थिर हो गया...बस माँ के बालों को सेमेट हुए जकड़ा था उसने माँ की पीठ पर...

माँ उसकी तरफ देखते हुए उसके लंड को चूस रही थी....माँ के मुँह की गर्मी के अहसास से ही बेटा पागल होता जा रहा था...जब माँ ने लंड को बाहर मुँह से निकाला तो उसके गरम थूक से लंड एकदम गीला था....माँ ने फिर लंड को मुठियाया...और उसने काफ़ी अच्छे से लंड को आगे पीछे हिलाया...शादी शुदा औरत थी उसे पता था कि मर्द को किन किन चीज़ो से लुफ्त उठाने का मन करता है?....और ये तो उसका बेटा था जिसकी हर चीज़ से और रग रग से वाक़िफ़ थी

अंजुम ने बहुत देर तक लंड को हिलाया और उसे मुँह में लेके चुसा...आदम को उसके मुँह की भीतरी गर्मी के साथ साथ उसके लंड पे दाँत घिसने का भी अहसास हो रहा था "ओह्ह्ह मामा इस्सह आहह उहह".........आहें भरता आदम सोचने लगा कि सच में माँ को पाने के उसकी तपस्या उसकी प्रतीक्षा पूरी हो गयी थी आज रात...माँ उसके लंड को चुसते हुए उसे अपने हाथो में थामे उसके निचले अंडकोषो पे अपनी ज़ुबान लगाने लगी पर उसकी गंध पाके उसे थोड़ा अज़ीब लगा....

बेटे ने उसके चेहरे को अपने लंड पे दबा दिया...और लगभग उसके चेहरे पे अपना लॉडा रगड़ने लगा...जब उसने माँ का चेहरा हटाया तो पाया वो हाँफ रही थी...अंजुम को अपने चेहरे पे बेटे का निकलता गीला प्री-कम का अहसास हुआ...बेटे ने निकलते अपने प्री-कम की बूँदो को उंगली में लेके चाट लिया तो माँ उसे हैरत से देखने लगी...उसने फिर माँ को अपना लंड चूसने कहा...पर माँ को शरम सी आई

आदम : कर ना रे क्यूँ तडपा रही है? प्लस्सस

अंजुम : अच्छा ठहर (माँ ने फिर झुक कर बेटे के लंड को मुँह में घप्प से लिया और उसे 2-3 बार चुसा फिर उसे मुँह से निकाला फिर दो-तीन बार मुँह में लिए चूसा ये प्रक्रिया उसने कुछ देर दौहराई)

आदम ने उठके माँ के गाल को पहले किस किया फिर उसके इर्द गिर्द चेहरे के हर हिस्से को चूमा....फिर उसने माँ के होंठो में उसकी चूत का निकला वीर्य जो अब सूख चुका था उसका स्वाद चखने के लिए उसके मुँह के भीतर उंगली डाली....माँ उंगली को चुसते हुए बेटे की तरफ नशीली आँखो से देख रही थी...

आदम ने माँ के होंठ फिर मुँह में भर लिए...माँ ने अपने दोनो बाजुओं को बेटे के कंधे से लिपटा लिया...दोनो एकदुसरे को किस करते रहे..फिर आदम ने हान्फ्ते हुए माँ की बाजों को उठाया और उसके काले काले बालों से भारी बगलो को उठाया उसके काले काले बालों पे अपनी ज़ुबान लगाई और उसके पसीने से भरी हेयरी बगलो को चाटने लगा

उफ्फ उसकी भीनी भीनी गंध जैसे आदम को पागल कर रही थी...देसी औरत का स्वाद ही जुदा है...वो अपनी माँ की दोनो बगलो को चाट्ता रहा फिर उसने माँ की गर्दन गले को चूमते हुए उसके बाजुओं को सहलाया....माँ आहिस्ता आहिस्ता लेट गयी...आदम को याद आया कि सारे सामानो में उसका एक बॉक्स था जिसे वो बड़े अहेतियात से रखा हुआ था...उसने उस बॉक्स में से एक कॉंडम निकाला उसे फाडा और माँ के सामने अपने लंड पे चढ़ाने लगा.....माँ ने पूछ ही लिया कि तू कॉंडम कब लाया? तो बेटा सवाल सुनके मुस्कुराया और कहा कि उसे पता था कि कैसे ऐसे मोड़ आने पे इसकी ज़रूरत पड़ेगी?...

अंजुम : हाहाहा तूने कभी इसे यूज़ किया है?

आदम : नही माँ पहली बार लिया है तू ही लगा दे (क्या कहता माँ को कि चुदाई में कितना वो प्रोफेशनल है? उसने कितनो की चुदाई की और दो औरतो को पेट से भी कर दिया माँ कुछ नही जानती थी इसलिए उसने अंजान बनके नही में सर हिला दिया)

 
अंजुम ने कॉंडम उसके खड़े लौडे को लेते लेते सहलाते हुए अच्छे से....कॉंडम को फाड़ के उसे निकालके उसे सुपाडे के उपर लगाके उसे धीरे धीरे पूरे लंड पे चढ़ाने लगी...थोड़ी ही देर में लार्ज साइज़ का कॉंडम बेटे के लंड पे अंजुम ने पूरा अच्छी तरह से चढ़ा दिया

अंजुम : अच्छा किया जो निरोधक ले लिया अब देर ना कर

माँ के निरोधक लगाने के वक़्त उनके हाथो के सपर्श से ही लॉडा झटके खा रहा था अब उनकी बातों ने उत्साह मेरे मन में और बढ़ा दिया था....मैं झट से पलंग पे आया माँ की दोनो टाँगों को फैलाया...थूक हाथो में लिए चूत पे अच्छी तरह मला और उसे गीला किया...उसकी झान्टेदार चूत के मुंहाने को अंगूठे से कुरेदने लगा..जिससे माँ ने अपनी गान्ड ढीली छोड़ दी...मैने आगे बढ़के निरोधक चढ़े अपने लंड को फुरती से चूत के मुँह के पास लाया हल्के हल्के से घुसाने की नाकाम कोशिशें की...

और कुछ ही पल में मेरे दबाव देने से लंड अंदर प्रवेश होने लगा साथ ही साथ माँ के चेहरे का हाल बदलने लगा वो जैसे दर्द को पी रही थी..मेरा लंड साँप की भाती धीरे माँ की चूत की दरारों में घुसता चला गया...और कुछ ही क्षण मे माँ की चूत ने मेरे लंड को आधे से ज़्यादा अपने भीतर ले लिया...अंजुम ने मेरी कमर के दोनो हिस्सो को कस कर हाथो से जकड लिया उसके नाख़ून मुझे गढ़ रहे थे...उसकी दोनो टाँगों को मैने अपने कुल्हो पे लिपटा महसूस किया...और एक करारा धक्का मारा भीतर बच्चेदानी को मेरा लंड छूता महसूस करने लगा....मैं अब लंड अंदर बाहर करने लगा...

"आहह आहह उहह ईयी आहह".......माँ को अब दर्द शुरू होने लगा था....वैद्य जी की दवाई का असर अब भी था..इसकी इतनी कड़ी मालिश की थी की लंड की सख्ती और मोटाई दोनो बनी हुई थी और वो इतना ज़्यादा तगड़ा और लंबा मूसल जैसा था की माँ के लिए पहला अनुभव था वो कोई चूड़ी छुदाई औरत नही एक घरेलू औरत थी जिसने सिर्फ़ मेरे पिता का ही लंड अपने अंदर लिया था....जिस छेद को मैं फाड़ रहा था कल उसी से ही मैं निकला था..

"आहह अयीई आहह बॅस करर आहह अल्लाह दर्द हो रहा है"......माँ पसीने पसीने दर्द की आहों में लिपटी मेरी पीठ और कमर पे नाख़ून गढ़ा रही थी

आदम : बस हो गया अंजुम बस हो गया (मैं पहली बार अपनी माँ का नाम ले रहा था क्यूंकी उत्तेजना में मैं सबकुछ भूल जाना चाहता था माँ से पूरा मज़ा लेना चाहता था अब हमारे बीच माँ-बेटे का रिश्ता ख़तम हो चुका था)

आदम : आहह बस हो गया इस्श ह आहह

अंजुम : आहह नहियिइ ससस्स ज़ोर से मत कर आहह

माँ कराहती रही और मैं धक्के पेलता रहा...और उसी वक़्त 15-20 धक्को में ही मेरा गाढ़ा वीर्य निकलने लगा....मैं झड़ने लगा...मेरी रफ़्तार बहुत तेज़ हो गयी माँ की चूत चोदते हुए मेरे अंडकोष उसके निचले भाग से टकरा रहे थे...ठप ठप्प की आवाज़ आ रही थी हम दोनो की सिसकिया अगर कोई बाहर होता तो सुन लेता लेकिन इतनी तूफ़ानी बारिश से भरी भयंकर रात में कौन बाहर सुन सकता था?

जब मैं स्खलन से फारिग हुआ तो हन्फते हुए माँ पे ढेर हो गया हम दोनो की उखड़ती साँसें चल रही थी....दोनो एकदम थक के चूर हो चुके थे....मैने माँ के छातियो को फिर दबाना शुरू किया और माँ के चेहरे को चूमता रहा...माँ बदहवास आँखो में आँसू लिए जैसे छत की ओर देख रही थी और मैं उसके चेहरे की ओर

जब सुबह 4 बजे नींद खुली तो मुझे अहसास हुआ कि मेरे हाथो से क्या हो गया है? मुझे मज़ा तो बहुत आया ऐसा लगा कि इतने दिनो बाद संतुष्टि का आनंद आया हो...पर एक बार माँ की हालत का जायेज़ा लेना चाहता था वो सो रही थी और उसकी टांगे खुली हुई थी...जब गौर किया तो पाया चूत के पास चादर पे कुछ खून के धब्बे लगे हुए थे...मैने माँ की चूत पे अपना हाथ लगाया...मैने एक उंगली अंदर की तो माँ सिसकी जब उसे बाहर किया तो खून रस में घुला हुआ था...शायद ये हमारी सुहागरात की निशानी थी जैसे आज मैने उसका कुँवारापन पूरी तरीके से छीन लिया था....अब माँ सिर्फ़ मेरी थी सिर्फ़ मेरी...

हम दोनो अंगली सुबह उठे माँ टांगे खोल खोल कर चल रही थी उसे चला नही जा रहा था तो मैने उसे पकड़ कर बिठा दिया....गरम पानी किया उसे फिर थोड़ा गुनगुना करके उसमें कपड़ा निचोड़के माँ की चूत सॉफ की और उसकी भीतर तक कपड़ा डालके सॉफ किया...तो माँ बीच बीच में हल्का सी आहह निकाल देती....माँ मेरी तरफ देख रही थी

अंजुम : अब बस भी कर हो गया इतना तो कोई मर्द अपनी औरत के लिए नही करता अब मिल गयी तुझे तस्सली

आदम : अच्छा जी जो कल रात हम दोनो के बीच हुआ क्या उसका तुझे गिल्ट है? या अफ़सोस या मज़बूरी थी तेरी जो तूने मेरे साथ संबंध आए

अंजुम : हाए अल्लाह क्या अब तुझे मुझपे ऐतबार है? अगर मज़बूरी होती तो मुहब्बत नही वासना और हवस झलकती

आदम : तो फिर तू संतुष्ट हुई

माँ ने कुछ नही कहा....बस यह कहा भला माँ कभी बेशर्मो की तरह ऐसा पहल कर सकती है क्या? कि वो बेटे से चुदके संतुष्ट हुई कि नही मैं मुस्कुरा उठा कि चलो हमारे बीच के ये फ़ासले दूर हो गये....उस दिन मैने छुट्टी कर ली थी और ऑफीस गया ही नही माँ को चलने फिरने में कुछ देर तक़लीफ़ हुई फिर उसने पाया कि अब हमे गृहस्थी पे भी तो ध्यान देना है वो घरेलू काम काज के लिए उठ खड़ी हुई उसने कपड़े पहने और नहाने के बाद खाना बनाने में जुट गयी मैं भी उस वक़्त तक फारिग होके उसके बनाए नाश्ते को खाकर उठ खड़ा हुआ

माँ और मैने इकहट्टे लंच किया फिर हम पलंग पे आके बैठे...माँ ने चादर हटा दी...माँ ने बताया कि पास ही में रहती एक काकी ने उन्हें घाट दिखाया था जहाँ लोग बड़े बड़े कपड़ों को धोते है...वहाँ नदी के पानी में आसानी से कपड़े धुल जाते है माँ ने कहा कि मैं भी वहाँ जाउन्गी तो मैने आपत्ति की तो माँ ने कहा कि यहाँ से बस कुछ देर चलना है आगे रास्ते पे ही तो पड़ता है....लेकिन मैने माँ से कहा कि ये चादर किसी और दिन धो लेना...फिलहाल तो हमे एकदुसरे के साथ वक़्त बिताना चाहिए माँ मुस्कुरा पड़ी...और फिर मेरे सीने से लग गयी...

दोपहर को कुछ राशन लेने मुझे अकेले निकलना पड़ा माँ को आराम कर लेने दिया कल रात पूरा सोई नही थी वो...बाहर बहुत कीचड़ हो गया था कल रात भारी बरसात हुई थी अहसास ही ना हुआ कि इतनी तबाही लाएगी...रास्ते के पास पेड़ गिरा हुआ था जो काफ़ी पुराना था उसे पार करते हुए मैं दुकान पहुचा...वहाँ दुकान से मैने बॉडी आयिल खरीद ली सोचा मालिश तो आती है माँ की आज अच्छे से मालिश किए देता हूँ ताकि उसका दर्द चला जाए...

घर जैसे ही पहुचा पाया माँ पोंचा लगा रही थी घुटनो के बल बैठी....मुझे उसकी नाइटी में से ही कुल्हो का उभार दिख रहा था मेरी निगाह उसके चूतड़ पे ही अटकी सी थी कि वो पीछे मूडी और मेरे आने की मौज़ूदगी पाकर मुस्कुराइ . माँ ने कहा अर्रे आ गया तू उफ्फ चल जल्दी हाथ मुँह धो ले और चादर बाल्टी में पड़ी है मेरे साथ चलके पहले उसे निचोड़ दे...मैने पाया माँ काफ़ी थकि हुई सी लग रही थी हो भी क्यूँ ना ? कल रात उसकी दनादन चुदाई जो की थी इसलिए उसकी चाल बदल गयी थी चलना फिरना भी कम कर रही थी...काफ़ी थकि सी हुई थी और उपर से उठते ही फिर वोई काम काज करने लगी थी...

आदम : अफ हो माँ अभी तुझे प्रॉपर आराम करना चाहिए तो तू काम करे में जुट गयी ये कहाँ की बात हुई? अब तो मुझे तेरी सेवा करनी चाहिए तू पोछा छोड़ और फारिग हो जा फिर साथ में खाना खाएँगे

अंजुम : अर्रे मैं जानती हूँ तू मेरी कितनी परवाह करता है? पर गृहस्थी को भी तो संभालना है और मैं घर की एकमात्र औरत हूँ मैं नही करूँगी और कौन करेगा?

आदम : अर्रे मेरी छम्मक छल्लो तुझे काम काज से कब रोका है पर तू पिताजी के नही मेरे राज में है तो इसलिए फिलहाल तूने कल वैसे ही मेरी इतनी सेवा की और वो तेरा पहली बार था इतने सालो बाद तो आराम तो एक दिन कर कम से कम घर के काम काज की चिंता छोड़

अंजुम : इतना भी आराम मत दे मुझे वरना तेरी आदत पर जाएगी

आदम : मैं तो चाहता हूँ कि तुझे मेरी लत लगे ताकि तू मेरे बिना जी ना पाए

अंजुम : तेरे बिना भला कैसे जियूंगी मैं मर जाउन्गी और तू मुझसे यह कहता है अब तो तेरे बगैर मेरी ज़िंदगी का कोई वजूद नही अब तो तेरा पूरा मुझपे अधिकार भी बन चुका है

 
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