मैं उसी पतली गली से होता हुआ बरामदे में आया तो ऐसा लगा जैसे वापिस मैने बीते कल में कदम रखा हो....सामने ही वो गुसलखाना था जहाँ पर मैने ताहिरा मौसी को ना जाने कितनी बार चोदा था...उफ्फ उसके बाद रूपाली भाभी ने हमे रंगे हाथो पकड़ा उसके बाद उसके दिल पे क्या गुज़री थी? एक तो उसकी निगाहों में मेरे लिए जो गुस्सा था...जब उसने मुझसे नफ़रत भरे अंदाज़ में मुँह मोड़ लिया और मैं भी उसे उस अधूरे रास्ते पे छोड़के वापिस शहर आ गया था...वाक़ई आज एक साल बाद भी जैसे वो सब एकदम ताज़ी ताज़ी सी घटना लग रही थी मुझे...
अंदर चहेल पहेल थी गनीमत थी कि मुझे मौसा और रूपाली के पति कहीं नही दिखे समझ आया कि घर में महेज़ औरतें ही थी...जैसे ही दो कदम आगे ही बढ़ा तो बगल वाले कमरे में मुझे माँ दिखी साथ में ताहिरा मौसी भी बैठी हुई थी...जैसे ही मैं अंदर आया तो पाया उनके हाथ में रूपाली का बेटा था जिसे माँ खिला रही थी...वो उसकी गोद में किल्कारियाँ ले रहा था...
मुझे ताहिरा मौसी देखके बहुत खुश हुई और बैठने को कही तो मैं उसके बगल में बैठ गया माँ मुझे बेहद खुश नज़र आई वो तो जैसे रूपाली के बेटे को लेके ही व्यस्त थी उसे कभी पूचकार रही थी तो कभी गोद में लिए टहला रही थी....उसे क्या मालूम जो बच्चा उसकी गोद में है वो किसी और का नही बल्कि मेरा खुद का है ताहिरा मौसी मेरे कंधे पे हाथ फेरते हुए मुझसे पूछी और मैं कैसा हूँ? मैने भी जवाब दिया कि मैं ठीक हूँ मैं उनका हाल चाल पूछने लगा....ताहिरा मौसी काफ़ी कमज़ोर दिख रही थी आँखो के नीचे काले घेरे पड़ चुके थे ना कोई साज़ था ना सिंगार ऐसा लग रहा था जैसे कितनी बीमार सी हो गयी हो...फिर माँ ने मेरी गोद में राहिल को दिया उसे एक बार गोद में लेके मैने बड़े गौर से देखा सच में भाभी का बेटा तो पूरा मुझपे गया था
वो मेरी गोद में आते ही शांत हो गया मैं उसे लेके खड़ा होके टहलने लगा....माँ प्यार से मुझे राहिल को खिलाते देख खुश हो रही थी...."देख री ताहिरा एक टाइम था बच्चे को पसंद भी नही करता था? और आज कैसे अपने ही भतीजे को खिला रहा है
......."हां अंजुम दी वैसे एक बात बोलू राहिल को अब देखो और अपने आदम को देखो चेहरा एकदम एक जैसा है".........
माँ हंस पड़ी उसने भी शरारत भरे अंदाज़ में कहा चलो अच्छा हुआ अपने गोरे हॅंडसम चाचा पे गया है....मैं उन दोनो की बातों से शर्मा सा गया...उस वक़्त मैं जैसे अपनी आप बीती में चला गया था...
इतने में रूपाली भाभी अंदर आई उसे देखते ही जैसे मेरी साँसें रुक गयी जैसे उसे देखते ही मैं खुद को मुजरिम सा महसूस करने लगा उसके हाथ में चाइ का ट्रे था सच में रूपाली भाभी निखर गयी थी....कितना सुडोल बदन हो गया था उनका साड़ी के पल्लू के बीच से उसकी गोल गहरी नाभि दिख रही थी राहिल के जनम के बाद जैसे बदन और भी रूपाली भाभी का निखर गया था..पेट भी थोड़ा निकल गया था...वो भी एक टक मुझे घूर्र रही थी उसने पाया कि उसका बेटा राहिल मेरे हाथो में था..हम जैसे एकदुसरे के निगाहो में मुजरिम से थे मौसी और माँ दोनो जैसे हमे देखके मुस्कुरा रहे थे उन्हें ये नही मालूम था हमारे संबंधो के बारे में उन्हें ये नाही मालूम था कि जिस बच्चे को मैने गोद में लिया था वो रूपाली के पति का नही बल्कि मेरा और रूपाली भाभी का था...
इतने में मुझे अहसास हुआ कि राहिल ने मेरी गोद में सूसू कर दिया..तो माँ ने हड़बड़ाते हुए चाई की प्याली रख ली...."अर्रे ओह हो रूपाली ज़रा इसे थामना तो उफ्फ बेटा तेरा तो पूरा शर्ट खराब हो गया"........
"ओह काकी आइ आम सॉरी मेरी वजह से"......रूपाली ने आगे आके मुझे राहिल को लिया तो एक नज़र हमारी एकदुसरे की ओर हुई...
."कोई बात नही माँ कोई बात नही बच्चा है क्या फरक पड़ता है"........मैं अपने शर्ट के बटन्स को खोलता हुआ बोला
ताहिरा : हां वोई तो बच्चे तो पाक होते है अर्रे रूपाली तुम जाओ और आदम को उसके बड़े भाई का कोई एक शर्ट निकाल के दे दो
रूपाली : जी काकी (रूपाली ने कुछ नही कहा वो बस जैसे आगे आगे चली गयी बिना मुझे कुछ कहे जैसे नाराज़गी अब भी थी उसे मुझसे)
मैं पीछे ताहिरा मौसी और माँ को गफलत में छोड़ बाहर आया...हम दूसरे वाले कमरे में आए...रूपाली मुझे देखते हुए नज़रें चुराने लगी और मुझे एक शर्ट अपने पति यानी मेरे भाई का निकालते हुए मुझे देते हुए जाने लगी....मैने उसे रोका
आदम : रूपाली प्लीज़ रुक जाओ
वो ठहर गयी पर कोई जवाब नही दिया...जैसे नाराज़गी को वो ज़ाहिर कर रही थी अपनी खामोशी में (उसकी गोद में मेरा बेटा राहिल था)
आदम : मैं मानता हूँ जो मुझसे हुआ लेकिन प्लीज़ ऐसे कब तक नाराज़गी रखोगी जवाब दो
रूपाली : कब तक आदम कब तक नाराज़गी रखूँगी? (उसने पलटते हुए जैसे मेरे शब्दो को दोहराया उसकी आँखो में गुस्सा और आँसू दोनो उमड़े हुए थे)
रूपाली : भला मैं क्यूँ नाराज़ रहूंगी तुमसे क्यूँ कोसुन्गि तुम्हें कोसुन्गि तो अपनी किस्मत को जो मुझे ऐसी ज़िंदगी मिली देखो आदम मैं बदल चुकी हूँ अब मैं खुश हूँ मेरे पास राहिल है और परिवार वाले इस बात से बेहद खुश है और मैं भी
आदम : क्या ताहिरा मौसी अब भी तुमसे नाराज़ है? जो कुछ हुआ था? जवाब दो
रूपाली ने कोई जवाब नही दिया मैने उसे अपनी तरफ पलटा तो वो थोड़ी घबराई नज़रें इधर उधर फैरने लगी...उसने राहिल को बिस्तर पे रखते हुए उसके गीले पॅंट को उतार उसे डाइपर ढूँढते हुए पहनाना शुरू किया
आदम : मेरी बातों को इग्नोर करके तुम ये मत समझो कि मैं तुम्हारी हालत को नही जानता मैं जानता हूँ कि सबने तुम्हें मान लिया है ताहिरा मौसी को अभीतक कुछ मालूम नही और मुझे खुशी है और ना मैं चाहता हूँ कि सिर्फ़ मौसी बल्कि मेरी माँ को भी कुछ मालूम ना चले पर तुम्हारे चेहरे का दुख ये मुझे अच्छा नही लग रहा
रूपाली : तुम्हें क्या अच्छा नही लग रहा और क्या नही ? मुझे फरक नही पड़ता प्लीज़ अब इस टॉपिक को और मत छेड़ो मैं नही चाहती की किसी को कुछ भी मालूम चल जाए
आदम : मेरे अच्छा लगने से क्या होता है? मैं तो बस यही चाहता हूँ कि तुम जहाँ भी रहो खुश रहो लेकिन तुम्हारे चेहरे पे सिमटा ये दुख मुझे भा नही रहा अगर तुम बदल ही चुकी हो तो क्यूँ तुम खुश नही?
आदम जानता था रूपाली ने उसे क्यूँ जवाब नही दिया? क्यूंकी रूपाली खुद को भी शर्मिंदा महसूस कर रही थी...उसे जैसे दर्द हुआ था आदम की बेवफ़ाई से...उसे दुख हुआ कि उसके पेट में उसके पति का नही आदम का गर्भ ठहरा था...लेकिन ताहिरा मौसी की बेज़्ज़ती और उनसे अपने सच के ना खुलने का ही डर उसे खा रहा था...आदम ने उसे अपनी तरफ किया और उसे तफ़सील से समझाने लगा जो हुआ सो हुआ अब वो ये गिले शिकवे दूर करे वो आज यहाँ अपने मर्ज़ी से नही आया बल्कि माँ की वजह से आया वरना जिस दिन रूपाली ने उसे कहा था उस दिन से ही उसने कसम खा ली थी कि वो और रूपाली की ज़िंदगी में दखल नही देगा...पर आज राहिल को देख जैसे उसके दिल में फिर से प्यार उमड़ सा गया था...वो न ही चाहता था कि रूपाली भाभी के साथ वो दुबारा कोई संबंध बनाए ना ही वो उसके ग्रहस्थी को उजाड़ना चाह रहा था वो बस यही चाहता था कि रूपाली उसे मांफ कर दे क्यूंकी अब हालत दोनो के काबू में थे....किसी को कुछ मालूम नही था....उसने ये भी जानना चाहा कि रूपाली के दिल में क्या है? क्या वो अब भी आदम के लिए अपने दिल में फीलिंग्स रखी हुई है...रूपाली ने बस अपने आँसू पोंछते हुए आदम की ओर रोई सी निगाहो को देखा...और मुस्कुरा कर बस इतना कहा
रूपाली : जो भी हुआ शायद उसमें शायद तुम्हारा भी नही मेरा ही कसूर था या शायद किस्मत अगर मैं बच्चा जनम ना देती तो सास तानो पे ताना देती या अगर तुमने मुझे उस वक़्त सहारा ना दिया होता तो शायद मैं आज इस काबिल ना हो पाती कि खुद पे डिपेंड हूँ ना कि अपने पति पे उस नामर्द का क्या तुम्हारे भाई का क्या? वो तो बस पड़ा रहता है मेरे ससुराल में तो कभी यहाँ उसे तो मैं सुधार नही सकी पर अपनी ज़िंदगी मैं ज़रूर सुधार सकती हूँ तुम्हारे जाने के बाद मैने काफ़ी सोचा मुझे तुमसे अब भी नफ़रत है कि तुम तो मेरा साथ तो दोगे नही फिर क्या दुख करना? बस तुमने एक उपकार किया कि मुझे राहिल दिया (हम दोनो की नज़र उसकी उंगली उठते ही बिस्तर पे सोए राहिल की ओर हुई)
आदम : सच में रूपाली तुम्हारा हक़ है कि तुमने मुझसे नफ़रत की नाराज़गी की पर सच में मैं भी अब पहले जैसा नही हूँ और ना ही कहूँगा कि कोई है ज़िंदगी में जिसका शायद तुम्हें अहसास लगे पर ऐसा नही है मैं अकेला आज भी हूँ कल भी था (माँ के व्यभाचार रिश्तो को सोचते हुए आदम ने रूपाली से झूठ कहा लेकिन सच्चाई तो ठीक वैसी ही थी वो अकेला था बिना किसी औरत के )
रूपाली : तो अब यही रहोगे?
आदम : ह्म और ये मेरी तरफ से (आदम ने कुछ पैसे दिए रूपाली उसे लेने से इनकार करने लगी क्यूंकी वो राहिल के लिए आदम ने रिवाज़ के तौर पे दिए थे)
रूपाली : नही इसकी कोई ज़रूरत नही प्ल्स
आदम : प्ल्स मुझे कहने दो इसके पिता का हक़ ना सही पर एक चाचा होने के हक़ से तो दे सकता हूँ ना
रूपाली के मुँह से एक बोल ना फूटा और वो मुस्कुरा दी सच में उसके पास इस हालात के आगे कोई जवाब नही थे क्यूंकी यक़ीनन आदम का अगर उसके पिता का रिश्ता राहिल से ना होता तो चाचा का तो होता ही आदम ने प्यार से राहिल को चूमा और फिर अपनी शर्ट को उतारने लगा....रूपाली ने नज़रें फेर ली आदम मुस्कुराया...इतने में माँ की आहट से दोनो ठिठक गये
अंजुम : उफ्फ हो अभी तक तूने चेंज नही किया क्यूँ रूपाली ये तुम्हे तंग तो नही कर रहा ना बहुत बातुनी है यह लड़का?
रूपाली : नही नही काकी माँ आदम तो हमारे यहाँ बहुत पहले से आ रहा है अच्छा हुआ आज आप आई मेरे साथ
आदम ने शर्ट तब तक पहन ली थी...अंजुम ने आदम की तरफ मुस्कुराया "वाक़ई तुम्हारा बेटा राहिल सच में देखना बड़ा होके ज़रूर कुछ बनेगा तुम अपने पति की टेन्षन ना लो देख ना ये कामयाब ज़रूर होगा"...........रूपाली को जैसे अंजुम आशीर्वाद दे रही थी रूपाली शरमा रही थी और मैं मुस्कुरा रहा था
रूपाली : थॅंक यू काकी मुझे पूरा यकीन है खून तो आप लोगो पे ही गया है ये ज़रूर आप लोगो पे ही जाएगा (रूपाली ने माँ को देखते हुए फिर मेरी तरफ देखके मुस्कुराया मैं उसके इशारे को भाँपते हुए खुश हुआ चलो रूपाली ने ये तो कहीं ना कहीं जताते हुए कहा कि राहिल मेरी औलाद तो है )
रूपाली भाभी मुझे और माँ को बोलते हुए बाहर चली गयी टाय्लेट करने....मैं माँ के पास आया अब तक मैं रूपाली के ज़ज़्बातो में उलझा था अब मैं वापिस अपने होशो हवास में लौट आया था रूपाली के जाते ही मैं माँ के पास आया
आदम : माँ क्या बात थी जो तूने मुझे फोन पे नही बताई? (अंजुम फिर से सवाली निगाहो से मुझे घुरि फिर उसे राज़ौल का ध्यान आया)
माँ थोड़ी परेशान लगी फिर उसने कहा कि आज मार्केट में कोई उसका पीछा कर रहा था....उसने ज़्यादा कुछ नही कहा कि वो कौन था? माँ ने जैसे मुझसे वो बात छुपा ली थी पर उसके कुछ देर पहले के चेहरे पे अब मुझे जैसे गंभीरता के भाव बार बार दिख रहे थे वो उन्हें छुपाने की कोशिश कर रही थी ना जाने क्यूँ वो मुझे नही बताना चाह रही थी?
ताहिरा : अर्रे तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो? राहिल को सोने दो
आदम : हां हां सोने ही दे रहे है आपसे भी मुझे बहुत गुफ्तगू करनी है चलिए
माँ ने भी अपनी गंभीरता भरी सोच को तोड़ा और फिर नॉर्मल होते हुए हँसी मज़ाक करने लगी अपनी बहन से "हां रे ताहिरा तेरे घर में बहुत खूबसूरत बेटा आया है मुझे ये तू दे दे मैं इसको अपने आदम के साथ रखूँगी"....
ताहिरा मौसी मुँह पे हाथ रखके हँसने लगी रूपाली भी पास खड़ी मुस्कुराते हुए शरमा रही थी उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो कितनी अंजान हो और अंजान तो थी जो अपने पोते की ही तारीफ किए जा रही थी मैं जानता था इसलिए चुपचाप था...
कुछ देर बाद खाना बनाने रूपाली चली गयी हमे रोक लिया पर मौसा और भाई दोनो नही आए थे कारण मौसा शहर से बाहर गये हुए थे और भाई कहीं नशे में धुत्त देर रात को ही आता...सच में रूपाली ने कैसे उसे झेल रखा था
ताहिरा मौसी को अकेला पाके मैं उसके पास आया माँ उस वक़्त रूपाली का हाथ बटाने में चली गयी....ऐसा लग रहा था जैसे दोनो सग़ी बहनें हो एकदम यंग उपर से दोनो ही जवान बस एक कम उमर की और दूसरी थोड़ी बड़ी मैं दोनो को ताड़ते हुए मौसी के कंधे पे हाथ रखके उसकी पीठ सहलाने लगा मौसी मेरे इतने सालो बाद के हाथो के स्पर्श से मुस्कुराइ मुझे देखी फिर उसने मेरे हाथ को हटा दिया
ताहिरा : क्या करूँ बेटा? बीमारी ने मुझे तोड़ दिया है अब तो तेरे मौसा के साथ भी सोती नही हूँ उन्हें भी बीमारी है ना इसलिए उन्हें ज़्यादा ऐतराज़ नही होता
आदम : ओह हो तो फिर क्या तुम्हारी अब सेक्स की इच्छा मर गयी है
ताहिरा : हां बहुत हद तक अब मन नही करता और अगर एक बार चुदाई करने लगी भी तो शरीर बहुत थक जाता है...फिर कोई भी काम करा भी नही जाता शरीर काँप उठता है
आदम : ओह्ह ये तो बहुत भयानक बीमारी है इलाज क्यूँ नही कराती
ताहिरा : करती हूँ डॉक्टर ने तो बस सेक्स करने से परहेज लिख दी है और अब मन भी नही मानता क्या अब तो पोता भी हो गया?
सच में ताहिरा मौसी की हालत काफ़ी खराब थी और उपर से छोटे टाउन की सोच रखने वाली हो गयी थी क्यूंकी उसकी सेक्स करने की फ्रीक्वेन्सी कम हो चुकी थी....वो अगर चुदती भी तो हाँफ जाती अब उसमें कोई आकर्षण वाली बात ही नही रही थी...इसलिए अब मेरा भी दिल उनसे जैसे हट गया था हमारा रिश्ता बरक़रार था मौसी भानजे के प्रेम का मैने उसे समझाया फिर मुलाक़ात करने का वादा किया
इधर हम चारो ने बैठके रात का डिन्नर किया फिर मुझे भी खुशी हुई कि मेरे और इस घर के बीच खासकरके रूपाली भाभी के बीच कोई गीले शिकवे या बैर या नाराज़गी नही रहे थे...मैने राहिल को खूब प्यार किया उसके बाद रूपाली भाभी उसे मेरे ही सामने आँचल किए दूध पिलाने लगी तो शायद माँ के प्रेज़ेन्स में वो एक गैर मर्द के आगे ऐसा दिखाना नही चाह रही थी इसलिए अंदर चली गयी हम घर की ओर रवाना हुए उसने विदा लेते हुए रुखसत हुए वहाँ से...
पूरे रास्ते माँ से जब पूछा तो उन्होने बस कहा कि उनका किसी आदमी ने अकेला देखके पीछा किया मैने माँ को खूब डांटा की अगर कोई हादसा हो जाता तो अब उसे घर में ही रहने की मैने सख़्त हिदायत दी और अगर कोई चीज़ की ज़रूरत भी रहती तो मुझे ही कहेगी....माँ ने हामी भर दी
हम घर आए...माँ जैसे नॉर्मल होने की कोशिश कर रही थी मेरा आज फिर मूड बन रहा था...हम कुछ देर रूपाली भाभी के घर की ही बात कर रहे थे उसके बाद राहिल की उसके बाद ताहिरा मौसी की बुरी तबीयत की माँ थोड़ी परेशान सी हुई उनकी चिंता लगी उन्हें....रूपाली के पति पे उन्हें सख़्त गुस्सा भी आया पर मैं खुश था कि वो राहिल के राज़ से वाक़िफ़ नही थी...
माँ ने अपने मूड को ठीक करने के लिए मुझसे कहा कि मैं और सब्ज़ी मंडी वाली बात की चर्चा ना करू वो मेरे गले लग गयी मैने उसकी ज़ुल्फो में उंगलिया फिराते हुए उसे अपने सीने से लगा लिया...आज रात को नींद नही आ रही थी...जब बाहर आया तो देखा कि चाँद एकदम रोशन था बस हल्के बादलो से गुज़रता हुआ उन्हें छाँटते हुए अपनी रोशनी चारो ओर फैला रहा था....मैने पाया कि माँ की आँखे खुली हुई थी उसने मुझे प्यार से देखा तो मैने खिड़की का दरवाजा लगाते हुए बंद किया...
मैने जब खिड़की की कुण्डी लगाई और पीछे मूड कर देखा तो माँ को जगा हुआ देख हैरान हुआ रात करीब डेढ़ बज चुके थे और माँ की आँखो में इस वक़्त नींद नही उन्होने मेरी तरफ देखके मुस्कुराया मैं उनके पास आया फिर बिस्तर पे चढ़ते हुए करीब उनके बगल में लेट गया....
आदम : क्या हुआ तुझे अभीतक नींद नही आई?
अंजुम : नही रे बस कभी कभार जल्दी नींद नही आती तू अभीतक सोया नही कल ऑफीस!
आदम : अफ ऑफीस ऑफीस अर्रे मेरी जान ऑफीस ही तो सुबह उठके जाना होता है और है ही क्या लाइफ में बस काम काम ! (माँ ने मेरे चेहरे पे हाथ फेरते हुए मुझे नज़ाकत से देखा)
अंजुम : कितना बड़ा हो गया है तू? और कितना ज़िम्मेदार हम आज एक होके भी चाह कर भी एकदुसरे के साथ सारा वक़्त नही बिता पाते
आदम : तू कहे तो नौकरी से इस्तीफ़ा देके घर बैठ जाउ
अंजुम : नही नही पागल है हर मर्द कमाता है और तेरी तो अभी शादी भी नही हुई तो फिर तुझपे कैसा प्रेशर है अपने पेट के लिए तो इंसान को कामना ही पड़ता है
आदम : हाहाहा क्या करे माँ? आज हम इतने पास है एकदुसरे के कोई रोक टोक करने वाला नही कोई कबाब में हड्डी नही जो हमारे संबंधो में रुकावट पैदा करे बस यही शाम से रात का वक़्त ही तो मिलता है गुज़ारने को फिर वोई व्यस्तता भरा दिन
अंजुम : अच्छा छोड़ वो सब ये बता कि आजक दिन कैसा गुज़रा?
आदम को लगा था कि माँ शायद आज परेशानी की वजह से सोई नही थी क्या मालूम अब अकेले में वो बता दे कि क्या वजह थी? जब माँ के बर्ताव में बदलाव सा देखा तो अहसास सा लगा कि वो शायद कुछ भूलने की कोशिश कर रही हो या शायद आज जो उसके साथ घटा वो वाकियात पर सच पूछो तो उन्ही की बदौलत रूपाली भाभी से फिरसे मेरे रिश्ते जुड़े जो कल्तक टूटे हुए थे उफ्फ इस दिन का मुझे बेसवरी से इन्तिजार था...
अभीतक मेरी चुप्पी देख माँ ने मेरे सीने पे हाथ फेरा....और प्यार से मेरे गले और गाल को चूमा अंजुम भी आज हुए हादसे को भूल जाना चाहती थी इसलिए वो पुरज़ोर कोशिश कर रही थी कि वो खुद आज संबंध बनाने में पहेल कर ले ताकि बेटा भी खुश हो जाए और वो उस बात को भुला सके जो रह रहके उसके दिल में उमड़ रहा था....
आदम ने पास ही रखा फोन उठाया और उसमें एक सेक्सी सी क्लिप लगा दी दोनो माँ-बेटा उस क्लिप को देखने लगे...."अर्रे इसमें तो वोई सीन चल रहा है ना जो मुझे उस दिन हेमा ने दिखाया था".......माँ ने मेरी तरफ घुरते हुए कहा
"ह्म वोई सीन है कुंशोट फेशियल "........मैने वीडियो देखते हुए कहा
माँ उसे बड़े गौर से देखने लगी ऑडियो वॉल्यूम थोड़ा तेज़ कर दिया तो सेक्सी सेक्सी आवाज़ पूरे कमरे में लड़की की गुंज़्ने लगी जो एकदम नंगी बैठी हुई थी और कुल 3 मर्द अपने विशाल बेलन जैसे साइज़ के लौन्डो को उसके चेहरे पे रगड़ रहे थे माँ बेहद गौर से उस सीन को देख रही थी....वो लोग दहाड़ रहे थे और कुछ ही पल में लड़की चीख उठी क्यूंकी उसके चेहरे पर जैसे वीर्य की बौछार पिचकारियो के रूप में लगने लगी...वो आँखे मुन्दे अपने बहते गिरते वीर्य भरे चेहरे के अहसास से रोमांचित थी और वो तीनो अपने मूसल जैसे लंड को आगे पीछे हिलाते हुए हाँफ रहे थे उनकी साँसें तेज़ चलने की आवाज़ आ रही थी...
जब तक उन्होने अपने वीर्य से लड़की को पूरा तरबतर नहला नही दिया वो लोग उसके उपर से अपने लौन्डे नही हटाए...जब वो उसके उपर से हटे तो लड़की के पूरे चेहरे और मुँह पर वीर्य की बूँदें बह रही थी उसके पूरे नंगे जिस्म पे वीर्य ही वीर्य उन तीनो मर्दो के लंड से निकला बह रहा था उसके बदन पे....वो हंसते हुए मज़ाक कर रही थी कुछ वीर्य उसकी ज़ुबान पे भी लग गया था..जब क्लिप बंद हुई तो मैने माँ की तरफ देखा उसकी साँसें एकदम तेज़ चल रही थी....मैने माँ की तरफ देखा और उसके कंधे पे हाथ रखा...
उसे महसूस हुआ कि बेटा उसके कंधे पे लगी नाइटी के फितो को खोल रहा है...जल्द ही नाइटी की दोनो डोरिया के खुलते ही उसने अपना हाथ नीचे माँ की चिकनी जांघों पे फेरते हुए टाँगों तक की नाइटी को एक झटके में उपर ले जाते हुए माँ के बदन से खीचके उतार दिया....माँ ने अपनी दोनो बगलो को उठा लिया था जिससे बाज़ू से होते हुए उसकी झिल्लिदार नाइटी एक ही झटके में बेटे ने उतार दी....नाइटी के उतरने के बाद आदम की निगाह माँ की नंगी चुचियो से टकराई उन्हें हाथो में लेके आदम ने मसला..
तो माँ ने उसकी टाँगों के बीच पाजामे में बड़ा सा तंबू बना देखा...उसने पाजामे को खीचके उतारा तो ज्यो ही उतारने से आदम का लंड एकदम सख़्त लोहे जैसा खड़ा उसके सामने प्रस्तुत हो गया...उसने उसे हाथ में लेके भीचा और फिर उसे आगे पीछे मुत्ठियो में सहलाया...इधर बेटे ने माँ की ज़ुल्फो को समेत ते हुए माँ के खुले बालों को पीछे की तरफ समैट दिया....उसने माँ के दोनो चेहरे को अपने हाथो में लिया और उसकी ठुड्डी और नाक और गाल को चूमते हुए उसके होंठो पे एक ज़बरदस्त किस दी..
माँ इससे हड़बड़ा उठी और उसने बेटे के कंधे पे हाथ लपेटते हुए उसे अपनी तरफ झुकाया दोनो एकदुसरे को पागलो की तरह किस करने लगे...इसी बीच अंजुम ने बेटे के लंड को हाथो में लेके दो-तीन बार दबाया....वो किसी फुन्कार्ते हुए अजगर जैसा हो गया था...उसके इर्द गिर्द नसे फैली हुई थी...आदम ने उसे रोका और वैसे ही नंगा खड़ा होके पलंग को उठाए अंदर से कुछ निकालने लगा माँ नंगी हाँफती हुई बैठी चुपचाप आदम की हरकत को देख रही थी....जब आदम ने पलंग के उपर अपना सर उठाया....तो उसके चेहरे पे वोई मास्क था जो उस दिन उसने पार्टी में पहना था....अंजुम हंस पड़ी उसे वो दिन याद आया कि इसी मुखौटे को पहने आदम के चेहरे को वो पहचान नही पाई थी...उसने मुँह पे रखके हाथ खिलखिलाए हँसी
अंजुम : अब ये क्या हरकत है बेटा?
आदम : हाहाहा हरकत नही है माँ बस सोचा आज रोमॅन्स थोड़ा अलग ढंग से करे
आदम : इंसान का बच्पना जाता कब है? बस वो उमर के साथ साथ और भी बढ़ते जाता है कुछ अलग हटके हो जाता है सोचो कि ये मैं नही कोई और है
अंजुम : भला मैं तेरे बजाय किसी और के साथ संबंध बनाउन्गी ये तू सोचता है ?
आदम : हाहाहा मैं जानता हूँ माँ कि तू ऐसा कभी कर ही नही सकती पर ये तो महेज़ एक फॅंटेसी है सोच कि मैं वोई नक़ाबपोश हूँ जिसने तुझे बचाया और पार्टी से अपने घर ले आया....
अंजुम : ह्म तो फिर आप मुझे मेरे घर छोड़ने की बजाय यहाँ क्यूँ लाए? (माँ फिर हंस पड़ी कहते हुए)
मैने वो जोकर का नक़ाब ऐसा पहना हुआ था कि उसके गोल्डन रंग के सिवाय उसमें तीन छेद थे जिससे सिर्फ़ मेरे होंठ ही दिख रहे थे और उपर के दोनो छेदों से सिर्फ़ मेरी आँखे....मैं बिस्तर पे एक एक हाथ रखते हुए उसके पास आया....माँ ने नज़ाकत से अपना एक पाँव मेरे सीने पे रखा और मेरे सीने के बालों को सहलाते हुए मेरे कंधे पे अपना पाँव रखा....मैने उनका पाँव पकड़ा और नक़ाब को अड्जस्ट करते हुए उसमें से अपनी जीब निकालते हुए पाँव को चाटने लगा....फिर पाँव को हाथो में लेते हुए होंठ बाहर किए उन्हें चूम लिया..माँ कसमसा रही थी...
अंजुम एकदम खामोश सी थी...मैने उसकी जांघों पे हाथ फेरते हुए उसकी तरफ देखा....मेरे हाथ उसकी टाँगों के बीच के चूत के कटाव पे आए..उसे सहलाया और चूत को मुट्ठी में कस्स लिया...दो तीन बार ही दबाने से माँ की चूत एकदम गीली तरबतर हो गयी..."उईईइ उफ़फ्फ़ फुम्म्म"......माँ सिसकते हुए आँखे मुन्दे बिस्तर पे लेट गयी....
मैने उसकी टाँगों को फैला दिया और अपने होंठो को चूत की फांको के पास लाया और उस पर अपना मुँह लगाया..
अंजुम : उम्म्म उफ़फ्फ़ इस्शह सस्सस्स (माँ तड़प रही थी और मैं उसे मुख मैथुन दे रहा था)
आदम : स्लूर्रप्प्प एम्म्म वाहह (मैने चूत के होंठो को चुसते हुए चूत पे मुँह रखके दबाया और फिर उसे जीब से चाटते हुए उसका स्वाद चखा)
माँ इस बीच जैसे पूरी होशो हवास खोए सेक्स का आनंद ले रही थी...इस बीच मैं उठा और अपने मोटे लंड को माँ के चेहरे के करीब लाया इस बीच उसने मेरी मास्क की तरफ बड़े गौर से देखा फिर मेरे लंड को मुँह में लिए ही वैसे चूसने लगी...."म्म्म्मम उम्म्म्म"....माँ सिर्फ़ मोनिंग की आवाज़ निकाल रही थी...जैसी किसी लॉलिपोप की तरह उसे चूस रही हो और मुझे देख रही हो..
मैं उसके बालों पे हाथ फेरते हुए उसके सर को सहला रहा था जैसे मुझे मज़ा मिल रहा हो और मैं उसे और चूसने के लिए उकसा रहा हूँ....माँ लंड को मुँह में किसी प्रोफेशनली तरीके से चुस्स रही थी और उसे मुँह से तब तक नही निकाला जब तक मैने नही कहा....मेरे कहने पे ही उसने लंड को अपने मुँह से बाहर निकाला फिर मेरे अंडकोष के नीचे अपना मुँह लगाया और दोनो टट्टो पे ज़ीब चलाई...फिर लंड को मुठियाते हुए मुझे लेटा दिया....उसने अपने होंठो पे लगे थूक को पोछा...
फिर धीरे धीरे लंड को अपनी गीली चूत में अड्जस्ट करते हुए मुझे सीधा लेट जाने को माँ ने कहा....मैं वैसे ही सीधे लेट गया तो माँ मेरी टाँगों के बीच मेरी तरफ होके धीरे धीरे मेरे लंड को अपनी चूत में सरकाते हुए बैठने लगी...उनकी चूत के गीलेपन से ही मेरा लंड फकच से अंदर जाने लगा....उसे अपनी चूत के भीतर जब लंड गढ़ता महसूस हुआ तो जैसे कोई खुन्टा जब माँस में धँस जाता है ठीक उस पल जैसे दर्द से भाव चेहरे पे आते है ठीक उसी पल माँ के चेहरे पे भी दर्द सिमट सा गया...मैने उनके नितंबो को सहलाते हुए उन्हें हल्का होने कहा तो जैसे वो अपने गुदा क्षेत्र को ढीला छोड़ने लगी इससे उनकी चूत में मेरा लंड और अंदर जाता मुझे महसूस हुआ
"उफफफफ्फ़".....माँ ने काँपते हुए आहिस्ते स्वर में आवाज़ निकाली....मैने उसके कंधो से उसे जकड़ा और नीचे से धड़ा धड़ धक्के पेलने लगा...इससे माँ का पूरा शरीर उछल उछल के बाउन्स हो रहा था उनकी चुचियाँ भी आपस में टकरा रही थी उछलने से...मैने उनकी हिलती छातियो के निपल्स को दबोचा और उन्हें खूब मसला...माँ आहें भरते हुए अब खुद ही मेरे सीने पे हाथ रख कर मेरे लंड पे कूद रही थी...फिर अपनी नितंबो को मेरे अंडकोष पे घिसते हुए और ज़ोर ज़ोर से कूदने लगी...जैसे चुदाई का उसे चरम सुख प्राप्त हो रहा था...
"आहह सस्स्सस्स आहह आदंम और ज़ोरर्र से धक्के पेल इसस्सह उफ्फ ऐसा लग रहा है जैइस कितनी लज़्ज़त मिल रही हो?"......माँ चुदते हुए आहें भरते हुए मेरे सीने को सहलाए बेहोशी हालात में जैसे कह रही थी...
"हां माँ तेरी चूत के अंदर की गर्मी मुझे अपने लंड पे महसूस हो रही है उफ्फ हाईए रानी ऐसे ही चुद मुझसे आअहह ओह्ह्ह माँ तुम तो बहुत मस्त हो इस्सह आहह माँ ज़ोरर से नही आअहह छिल जाएगा मेरा सुपाड़ा आहह मामा"......मैं मदहोशी हालात में आँख भुजाए माँ के छातियो के साथ उनकी कमर को सहलाए उनके चूड़ते शरीर पे अपना पूरा हाथ फायर्ता हुआ बोला
माँ खिलखिलाके हंस पड़ी जैसे उसे मेरी मदहोश हालत और दर्द का अहसास हो उसने शरारत भारी हरकत करनी शुरू की और वो मेरे सुपाडे को अपनी चूत मे अंदर की गहराइयो में दबोच ली जिससे मेरे लंड में जलन होने लगी और हल्का सा दर्द भी मैं दाँतों में दाँत रखकर माँ को हवस भरी निगाहो को देखने लगा...मैने भी उसके नितंबो को मसल्ते हुए पीछे हाथ ले जाके उसके छेद में उंगली करने लगा...माँ का पूरा बदन पसीने पसीने होने लगा वो मुझपे जैसे रहम नही करने वाली थी वो तो बस मेरे मोटे लंड का मज़ा अपनी चूत में अंदर बाहर लेते हुए ले रही थी...
थप्प थप्प करते हुए अंडकोष से उनके मोटे मोटे नितंबो का टकराव हो रहा था...हमारी चुदाई बस चरम सीमा पे थी मैने उसे इस बीच अपने आगोश में भर लिया और उसकी ज़ुल्फो को समेटते हुए उसकी पीठ को सहलाने लगा...फिर उसके गले और गाल को चूमते हुए हाँफने लगा...इस बीच मुझे अहसास हुआ कि मेरा प्री-कम जैसे निकल रहा है...मैने झट से माँ को अपने उपर से हटाना चाहा पर माँ ने मुझे कस कर पकड़ लिया उसकी चूत भी कस कर मेरे लंड को जैसे जकड़े हुई थी...
वो झड रही थी...जब वो हाँफती हाँफती हुई मुझसे अलग हुई तो मैने झट से पलंग के पास की साइड टेबल पे रखके कॉन्डोम जो अक्सर टेबल पे ही रखे रहा करते थे उसमे से एक पॅकेट निकाला उसे फाडा और मैने अपने लंड पे चढ़ाया...माँ बस हन्फते हुए अध्बुझि निगाहो से मेरे लंड की तरफ देख रही थी...मैं उठा और उसे सीधा लेटा दिया वो सीधे लेट गयी...मैने पास रखी बॉडी आयिल की डिब्बी का बहुत सा तेल माँ और खुद के जिस्म पे डाला इससे हमारा बदन एकदम तेल से चिकना हो गया इससे माँ का पूरा शरीर लाइट में चमक रहा था...उफ़फ्फ़ वो आयिली होके कितनी सेक्सी लग रही थी मैने उसके नितंबो को दबोचते हुए उसमें एक अंगुल घुसाइ और अंदर बाहर करते हुए उंगली की...
"ओह्ह्ह आहह सस्स".....माँ सिसकते हुए मुझे अपने नितंबो के बीच उंगली घुसाते देख रही थी...उसकी आँखो में लाल लाल डोरे खिंच रहे थे...मैने अब उसकी दोनो टांगे अपनी पीठ पे रखी उसके एक चुचि को मुँह में लेके चूसना शुरू किया और उसी हालत में उसकी चूत पे निरोधक चढ़ा लंड रखा और हल्के हल्के दबाव देने लगा पहले तो गीली चूत उपर से तेल मलने से चूत और भी चिकनी हो गयी और साथ ही मेरा लंड भी....जब मुझे अहसास हुआ कि माँ की चूत में और कुछ लगाना पड़ेगा...तो पास रखी ल्यूब की डिब्बी से थोड़ा जेल फॉर्म में ल्यूब निकाला और उसे चूत के भीतर तक उसके मुंहाने में लगा दिया....इससे मेरी तीन उंगली भी अंदर घुस रही थी...मैने थोड़ी सी जगह और बनाई तो मेरे पाँचो की पाँच उंगलियाँ अंदर घुस रही थी..
मुझे एक आइडिया सूझा और मैं माँ की चूत में फीस्टिंग करने लगा...जैसे ही मैने पाँचो उंगली और थोड़ा हाथ अंदर दाखिल चूत के भीतर दबाव देके किया ही था कि माँ का पूरा जिस्म हिल गया और वो दर्द से करहाने लगी "नही नही निकाल निकाल".....
."अर्रे माँ इसी में तो मज़ा है"......
."नही तू निकाल ले ना दर्द लग रहा है".....
."अच्छा ठीक है ठहर".....मैं उंगली करता रहा और हाथ बाहर निकाल लिया...फिर अपने मोटे लंड को छेद में घुसाने लगा....अफ कुछ 20 सेकेंड के अंदर ही दबाव ज़्यादा देने से लंड एकदम अंदर तक घुसता चला गया...इस बीच मैने अपना मास्क उतार फैका था और माँ ने उसी पल मेरे चेहरे को अपने करीब लाके मुझे किस करना शुरू कर दिया...
माँ ने फिर मेरी कमर पे टांगे लपेट ली...."अब धक्के पेल उईइ"...माँ ने हल्की सिसकती भरते हुए मुझे जैसे उकसाया उसने मेरे होंठो से होंठ अलग करते हुए कहा ....
उन्हें अब अपने बच्चेदानी तक मेरा लंड छूता महसूस हो रहा था..."हाए सस्सस्स माँ बहुत टाइट है तेरी चूत".......
."ले अब कर"......माँ ने गान्ड ढीली छोड़ दी तो मुझे अंदर बाहर करने में आसानी होने लगी...मैं ज़ोरो से धक्के पेलते हुए माँ को पूरा मज़ा देने लगा...माँ हान्फ्ते हुए मेरे लंड को अपनी चूत के अंदर बाहर होता महसूस करने लगी...वो लज़्ज़त में होंठो पे दाँत दबाए अध्बुझि आँखो से मेरे चेहरे को सहला रही थी....
मैं ताबड़तोड़ धक्के पेलता हुआ जैसा स्खलन की कगार पे आ गया...तो हम दोनो ने एकदुसरे के होंठो से होंठ जोड़ लिए...एकदुसरे को किस करते हुए अपने प्रेम पे विराम लगाने लगे...माँ के होंठो को चुसते हुए मैं दहाड़ने लगा....गरर गरर की आवाज़ निकालता हुआ मेरा लंड निरोधक जो कि चूत के भीतर तक था उसमें अपनी पिचकारिया छोड़ते हुए धार बहाने लगा....मैं कांपता हुआ माँ को अपने आगोश में जकड चुका था वो भी मेरे साथ जैसे रुक गयी...उसे अपनी गान्ड में गरम गरम जैसा कुछ अहसास होने लगा था..कुछ देर बाद जब हम एकदुसरे से अलग हुए तो फॅट से उनकी चूत से निकला मेरा निरोधक चढ़ा लंड वीर्य से सना हुआ लिपटा था..मैने फ़ौरन चुटकी से उपरी सिरे को उठाते हुए वीर्य भरे कॉंडम को खींचा और पास पड़े डिब्बे में फैक दिया...
माँ और मैं अपनी उखड़ती साँसों पे काबू पाते हुए एकदुसरे से लिपट गये उस वक़्त जब मैं झड जाता हूँ तो मुझे बेहद अज़ीब सा लगता है...संतुष्टि भी और गिल्टी सी भी..पर दिल तो यही कहता है कि ये तो सुख है जो तुझ जैसे खुशकिस्मत को प्राप्त होता है इसमें गिल्ट कैसा?
माँ मेरे सीने से लिपटते हुए मेरे तेल और पसीने से तरबतर बदन को सहलाते हुए छाती पे उगे बालों से खेलने लगी....और मैं उसके नंगे जिस्म को अपने बदन से लिपटा देख उसे देखते हुए सोने लगा....मेरा पूरा बदन टूट रहा था....माँ की चुदाई करने से पुरज़ोर थकावट लग रही थी...धीरे धीरे हम दोनो ही नींद की आगोश में चलते गये...जब एक बार उठा था पेशाब करने तो माँ खर्राटे भर रही थी...उसकी दोनो चुचियाँ मेरे बदन से दबी हुई थी उसे अलग करके मैने उसके नंगे जिस्म पे चादर ढक दी...फ्रिड्ज से एक बोतल पानी निकाला उसका कुछ घूँट लिया उसे रख पेशाब करने गया फिर लंड से मोटी पेशाब की धार निकाल जब वपयस कमरे में आया तो माँ जैसे मुझे ही खोज रही थी नींद में...मैने चादर अपने उपर करते हुए उसके बदन से लिपट गया...हम माँ-बेटे पूरी रात एकदुसरे से यूँ ही नंगे लिपटे सो गये...
अगले दिन ऑफीस के लिए रवाना हुआ पूरे रास्ते हुए जम्हाई छोड़ता हुआ जा रहा था..करम्चारी लोग बोले कि बाबू कल रात नींद नही पूरी हुई सब जानते थे कि मैं कुँवारा था मैने कहा नही बस थोड़ी थकान रह गयी उन्हें क्या पता कि कल माँ ने मुझे कितना खूब थकाया था
शाम को ऑफीस से जल्दी काम निपटाके मैने सोचा कि अपने खरीदने वाले फ्लॅट को भी एक बार देख लून क्यूंकी उसके लिए आधे पैसे इकहट्टे कर चुका था बाकी लोन पास करने की देरी थी...जब वहाँ गया तो पाया कि मेरे उपर वाले माले पे ऑलरेडी कोई खरीदार रहने आ गया था....वो मेरे डीलर से वहाँ बात कर रहा था मेरी निगाह उसकी ओर हुई और उसकी मेरी ओर....ऐसा लगा जैसे कोई जाना पहचाना चेहरा था क्यूंकी वो भी मुझे बड़े गौर से देख रहे थे...
डीलर वहाँ खड़ा जिस शक्स से बात कर रहा था वो दिखने में काफ़ी हॅंडसम था...5 फुट 10 इंच की हाइट थी उसकी रौबदार चेहरा आँखे गुलाबी घनी काली मुछ और बदन भी काफ़ी गठीला लग रहा था उमर लगभग 28 वर्ष ....डीलर उससे काफ़ी हंस हंस के बात कर रहा था मेरी उपस्थति पाते ही वो आगे बढ़ा और मुझसे हाथ मिलाया साथ ही साथ हमारे उपर वाले फ्लोर के खरीदार उस आदमी से भी मिलवाने लगा...वो मुझे बड़े गौर से देख रहा था और मैं उसको
डीलर : आओ आदम आओ इनसे मिलो ये है हमारे इस फ्लोर के खरीदार जिन्होने हाल ही में यहाँ शिफ्टिंग की है मिस्टर राजीव
राजीव : हेलो (उन्होने आगे हाथ बढ़ाते हुए नर्मी से कहा उनकी इस पोलाइट आटिट्यूड का मुझपे काफ़ी असर पड़ा और मेरे हाथ भी एका एक उनके हाथो से जा मिले)
डीलर : राजीव जी यह है मिस्टर.आदम इन्होने भी अभी नीचे वाले फ्लॅट को खरीदने की इच्छा जताई है
राजीव : ह्म्म काफ़ी अच्छा फ्लॅट है यह मिस्टर.आदम आपको यहाँ किसी भी चीज़ की कमी नही होगी
डीलर : हा हा हा हा ज़रूर ज़रूर
आदम : ह्म तभी तो मिस्टर शर्मा का यह फ्लॅट चुना है खरीदने को (एका एक हम सब हंस परे)
राजीव : ह्म वैसे आप अभी रह कहाँ रहे है?
आदम : यही आपके टाउन से थोड़ा बाहर जो जो डिस्ट्रिक्ट के अंडर एरिया मे पड़ता है पाइप लाइन रोड
राजीव : पाइप लाइन रोड ओह व्हाट आ को-इन्सिडेन्स वहाँ तो मैं भी रहता हूँ वहीं से तो हम यहाँ शिफ्ट हुए है
आदम : ओह दट'स ग्रेट मैं वहीं हाउस नंबर.26 में रेंट में रह रहा हूँ
डीलर : आप लोग ऑफीस चलिए वहीं बैठके बातें कीजिएगा
राजीव और मैं डीलर के साथ उनके नीचे वाले ऑफीस पहुचे...वहाँ आते ही हमने अपनी अपनी सीट ग्रहण कर ली..सीट पे पसरते हुए डीलर ने राजीव को अपनी जेब से मार्लबरो का सिगरेट निकालते हुए देखा....राजीव ने फॉरमॅलिटी के तौर पे हमे सिगरेट ऑफर किया तो मेरा जवाब ना पाके उन्होने प्रॉपर्टी डीलर के आगे सिगरेट का खुला डिब्बा पेश किया...एक सिगरेट निकालके डीलर ने घप्प से अपने होंठो पे लगाया और पास रखी मांचीस जला कर उसे सुलगाया इधर राजीव ने भी अपनी जेब से एक लाइटर निकाला और अपनी सिगरेट सुलगाते हुए कश लेना शुरू किया...कॅबिन में सिगरेट की हल्की हल्की महेक धुए के साथ गूँज़ रही थी...
धुआ छोड़ते हुए राजीव ने मुझे फिर मुस्कुराते हुए देखा और बात शुरू की..डीलर इस बीच सिगरेट का कश लिए हम दोनो की जैसे बातें सुन रहा था...
राजीव : ह्म वाक़ई ये तो अच्छा हुआ कि मुझे यहाँ अब अकेलापन महसूस नही होगा बस आप जल्द से जल्द इस फ्लॅट में शिफ्ट हो जाए तो मेरी और कोई चिंता नही रहेगी हाहहा
आदम : हाहाहा कोशिश तो यही है सर कि जल्द से जल्द शिफ्ट हो जाउ बस वही लोन की दिक्कत है
डीलर : वो भी हो जाएगा आदम तुम फिकर मत करो बस एक बार बॅंक से धनराशि मिल जाएगी तो फिर कोई दिक्कत नही होगी आजकल नकद घर लेता ही कौन है?
राजीव : ह्म नकद धनराशि एक साथ देना भी जुर्म माना जाता है
डीलर : हाहाहा आप भी ना राजीव सर यहाँ पे भी आप क़ानून की बातें करने लगे
राजीव : ऑफ ड्यूटी है तो क्या हुआ फ़र्ज़ से थोड़ी ना छुट्टी ली है
मैं चौंकते हुए राजीव की तरफ देखने लगा....मैं समझा नही कि उनका पेशा क्या था इसलिए तपाक से बोल पड़ा..."वैसे आप करते क्या है?".........राजीव ने मेरे सवालात को सुन मुस्कुराया
राजीव : जी दरअसल इस टाउन के मालदा पोलीस डिपार्टमेंट में मैं ऐज आ इनस्पेक्टर हूँ...अभी अभी तो पोस्टिंग हुई है इसलिए क़ानून के दाँव पैच भी सीख रहा हूँ कह लीजिए
आदम : ओह दट'स ग्रेट यानी आप एक पोलिसेवाले वैसे मैं पर्चेस ऑफीसर हूँ और टाउन से बाहर भी आना जाना लगा रहता है
राजीव : ह्म तब तो हममें थोड़ी सी समानता है
आदम : वो कैसे?
राजीव : हम जुर्म की इनस्पेक्षन करते है और आप चीज़ो की
आदम : हा हा हा हा हा (राजीव और मैने हाथ मिलाते हुए ठहाका लगाया डीलर की भी हँसी छूट गयी?)
राजीव ने घड़ी देखी और बोले कि उन्हें वाइफ को रिसीव करने जाना है...तो मैं कुछ समझ नही पाया....डीलर भी उठने को हुए उन्होने मुझसे पूछा कि फ्लॅट देख आएँ...तो मैने कहा हां बस इसी लिए आया था कि बॅंक होके आपके पास कोई खबर लाउ पर अभी लोन पास नही हुआ काम काज की बात करते हुए हम तीनो बाहर निकले तो डीलर वहाँ से अपने घर की ओर निकल गया....मैने जैसे ही थ्री वीलर पकड़ा ही था राजीव दा बोले कि चलो मैं भी तुम्हारे संग चल लेता हूँ रास्ते में डॅन्स क्लास स्कूल पड़ेगा वहाँ से मुझे अपनी वाइफ को भी रिसीव करना है...मैं वैसे भी उनसे पर्सनली बात करना चाह रहा था इसलिए हम साथ बैठ गये थ्री वीलर चल पड़ा....
बातों ही बातों में राजीव सर के साथ पूरे रास्ते में मैं थ्री वीलर में बहुत कुछ जानता गया...ऐसा लग रहा था कि इस छोटी सी पहले मुलाक़ात में हम एकदुसरे के कितना क्लोज़ हो गये ....राजीव दा को मेरी बातों में काफ़ी रूचि हुई उन्होने मेरी हालातों से झुझती ज़िंदगी की दास्तान को सुना तो वो काफ़ी इंप्रेस हुए फिर वो अपने घर की बात करने लगे....मुझे ये मालूम चला कि राजीव दा की ज़िंदगी कुछ हमारी जैसी ही थी वो भी इन व्याबचारी रिश्तो में जैसे घिरे से हुए थे......उन्होने अपनी बीवी की तस्वीर दिखाई और बताया कि ये खूबसूरत महिला उनकी वाइफ है...साथ ही साथ उन्होने बताया कि मेरे वहाँ शिफ्ट होने से उनकी क्यूँ चिंता कम हुई ?
राजीव : दरअसल मैं सोच रहा था कि एकात जगह है फ्लॅट के आज़ु बाज़ू क्यूंकी रिहायशी इलाक़ा है किसी को किसी से मतलब नही और मैं तो सिर्फ़ अपनी वाइफ के साथ ही रहता हूँ हमारी कोई फॅमिली तो है नही तो सोचा अगर कोई फॅमिली पर्सन नीचे का घर लेगा तो हमे बड़ी खुशी होगी और देखो भगवान ने मेरी सुन ली कि इस पहली मुलाक़ात में आप जैसा दोस्त ही मिल गया
आदम : इट'स माइ प्लेषर टू मीट यू राजीव दा वरना मैं भी खुद को अकेला ही महसूस कर रहा था घर में तो सिर्फ़ माँ है और है ही कौन मेरा? दरअसल हम यही के है पर ददिहाल से हमारा कोई नाता नही पिताजी से तो माँ सेपरेट हो गयी है
राजीव : ओह आइ आम सॉरी ना जाने क्यूँ तुम्हारे दुख में अपना दुख सा लगता है.....दरअसल तुम्हें कैसे कहूँ ? कि तुम मेरे बारे में क्या सोचो पर तुम्हें देखके लगता नही कि तुम मज़ाक उड़ाने वाले बन्दो में से हो अभी चार दिन भी नही हुए मुझे यहाँ आए और मैं किसी से ढंग से बात भी नही करता था और देखो आज हमारी बातों में बातों का सिलसिला शुरू हो गया
आदम : मैं भी राजीव दा ऐसा लगता है जैसे एक ही कश्ती के सवार हों हम हाहाहा बताइए क्या ऐसी बात है जो आपको इतना दुख देती है
राजीव : क्या कहे? दरअसल मेरी वाइफ ज्योति बर्धमान से बिलॉंग करती है वो असल में मेरी बहन लगती है तुम तो जानते हो कि एक ही घर में रिश्ता करना या ब्याह करना ग़लत माना जाता है क्यूंकी रिश्ता खून का हो जाता है पर मैं खुद पे काबू नही कर सका...ज्योति थी ही इतनी खूबसूरत पहल मैने ही कर दी वैसे ही मैं बहुत मेहनती था और भगवान की दया से थोड़ा नैन नक्श का ठीक बस ज्योति भी जैसे मेरी तरफ खिंचती चली आई....हम दोनो के संबंध शादी से पहले ही बन गये घूमना फिरना होने लगा और एक दिन घरवालो को बात पता चल गयी....बस फिर क्या था ताना कसी शुरू होने लगी झगड़ा हो गया उनके और मेरे माँ बाबूजी से उसके बाद हमे लगा कि इससे पहले हमे कोई अलग करे हमने भाग के मंदिर में शादी कर ली...उसके बाद तो जैसे आफ़त ही आ गयी और मुझे घर से ज्योति के साथ निकाल दिया गया
कहते कहते राजीव दा अपने आँसू पोंछने लगे मैने उन्हें सहानुभूति दी...फिर उन्होने अपने ज़ज़्बात पे काबू पाते हुए कहना शुरू किया
राजीव : यक़ीनन परिवार ने हमारे रिश्ते पे थू थू कर दी लेकिन सच कहूँ तो हमारी नयी ज़िंदगी की शुरूवात सी हो गयी...आज हम एकदुसरे के साथ अकेले रह रहे है खुश है ज्योति के ही प्यार ने मुझे इस काबिल बनाया कि मैने पोलीस डिपार्टमेंट के लिए इतनी मेहनत करी और भगवान का करिश्मा देखो कि आज इस पोस्ट पे हूँ
आदम : वाक़ई सच में व्याबचारी रिश्तो को ऐसा माना जाता है जैसे गुनाह हो पर मुहब्बत तो दिल से होती है ये तो एक अँधा विचार है जिसे कोई राह नही दिखा सकता
राजीव : ह्म तो फिर तुमने क्यूँ नही शादी की अभीतक?
आदम : आप तो जानते है आजकल के माहौल को पराई बहू मोस्ट्ली सेपरेशन करने में ज़्यादा विश्वास रखती है ताकि उनका अपना परिवार सुखी से रहे वो खुशी से रहे मुझे ये सब करने का कोई मन नही मैं माँ के साथ ही खुश हूँ
कैसे कह पाता कि व्याबचारी रिश्तो में तो मैं खुद उलझा हुआ हूँ पर राजीव दा जितना कामयाब तो नही हो पाया भला माँ से रिश्ता शादी तक का इसके लिए तो अभी तक इंतजार में था मैं ...हम कुछ देर और बात किए फिर वो उतर गये बोले कि यही पे उनकी पत्नी ज्योति ट्रडीशनल डॅन्स सीखती है..वो उन्हें पिक अप करने चले गये मैने देखा कि एक बड़ी सुंदर सी महिला करीब 25 वर्ष की खड़ी कन्जिवरम साड़ी में बोतल जैसा उनका फिगर था वाक़ई बड़ी खूबसूरत नैन नक्श की थी वाक़ई राजीव दा बड़े भाग्य शाली थे...राजीव दा को देखतेः हुए वो मुस्कुराइ और उनसे गले मिली इतने में थ्री वीलर आगे बढ़ गया क्यूंकी एक आध कस्टमर मेरे बगल में आज़ु बाज़ू बैठ गये थे...
जब घर पहुचा तो मुझे खुशी हुई चलो समीर के बाद कोई और तो मिला ज्सिके साथ मैं अपना वक़्त काट तो सकता हूँ वरना अपनी इस जगह में आके भी इतने साल बाद जैसे अजनबी सा महसूस हो रहा था...घर में माँ बालों में तैल लगाए जैसे मेरा ही इंतेज़ार कर रही थी...आज उसका मूड ठीक था...मैने भी कोई कल उनके साथ हुए वाक्यात की बात नही छेड़ी..
और उनके पास बैठ गया और उन्हें राजीव दा से हुई नयी दोस्ती और मुलाक़ात दोनो बताने लगा....माँ बेहद खुश हुई कि चलो कोई तो मिला जिससे मैने दोस्ती तो की वरना समीर के बाद तो जैसे मैं अकेला सा हो गया था....माँ कंघी कर खाना बनाने चली गयी....मैने पाया कि माँ टीवी पे हिन्दी गाने लगाए सुन रही थी.....गाना काफ़ी रोमॅंटिक था इसलिए मैं बड़े गौर से सीन को देखने लगा जिसमें माधुरी को जॅकी कैसे सिड्यूस कर रहा था?
"देर से आना जल्दी जाना आए साहिब ये ठीक नही...
आए साहिब ये ठीक नही रोज़ बहाना करके जाना
प्यार किया है तो निभाना आए साहिब ये ठीक नही"
.....माँ भी जैसे किचन में गाने को सुन गुनगुना रही थी....मैने उसे पीछे से पकड़ लिया तो वो खुद को मुझसे छुड़ाने लगी....मैने उसे बताया कि अब हम जल्दी यहाँ से शिफ्ट हो जाएँगे तू बस चिंता ना कर तो माँ ने कहा कि तू अगर मुझे कहीं भी लेके जाए तो भी मैं खुश रहूंगी"....हम दोनो एकदुसरे के गले लग गये...
दो-तीन दिन तक सबकुछ नॉर्मल रहा माँ और मेरी ज़िंदगी में ऐसी कोई वाक़या नही घटा जिससे ये लगे कि कुछ हुआ है या फिर कुछ होगा? सबकुछ जैसे चल रहा था ठीक वैसे ही चल रहा था...इधर राजीव दा से एक आध बार और मुलाक़ात हुई इस बार वो सिविल ड्रेस में नही थे : वो अपनी वर्दी में थे मैं उनकी बाइक पे बैठा उनके घर भी गया था...वहाँ उन्होने अपनी वाइफ ज्योति से मिलवाया जैसे खूबसूरत थी वैसे ही दिल की भी उतनी नायाब और पाक वाक़ई मियाँ बीवी दोनो से ही मिलके जैसे मुझे अपनापन सा लगा था....राजीव दा आजकल मेरे साथ ड्यूटी के बाद काफ़ी देर रात गये तक फोन पे बात करते थे इस बीच माँ को भी राजीव दा के यहाँ ले गया था...तो वो माँ से मिलके काफ़ी खुश हुए साथ में उनकी बीवी ज्योति भाभी भी...हम मे कपल्स जैसा संबंध सा बन गया था....हम काफ़ी खुश रह रहे थे और राजीव दा वो तो मुझे अपनी बीवी के साथ हर रंगीन सिलसिलो की कहानी भी बताते थे उसे सुनके मैं गरम हो जाता था और वो गर्मी मैं अपनी प्यारी अंजुम से शहवत के तौर पे पूरी करता था
उस दिन मैं डेपारमेंटल स्टोर में एंक्वाइरी करने बैठा काम कर रहा था....पर थकावट बहुत ज़्यादा लग रही थी तबीयत भी कुछ ठीक सी नही लग रही थी सोचा हाफ-डे कर लूँ उपर से काम भी कम मिला हुआ था...मॅनेजर से बात करके मैं घर की ओर निकल गया...पता नही आज दिल क्यूँ घबराया बेचैन सा लग रहा था....कुछ समझ नही रहा था पूरे रास्ते बस फिकर हो रही थी जब माँ को कॉल लगाया तो माँ ने तुरंत फोन उठाया
माँ : हेलो?
आदम : हां माँ अफ तुम फोन नही उठा रही थी तो मुझे अज़ीब सी बेचैनी हो रही थी
माँ : हाहाहा तू भी ना काम में भी अपनी माँ के बारे में सोचता रहता है क्या होगा मुझे? काम में मैं व्यस्त थी वो क्या है ना कि लॉन में कपड़े डाल रही थी अब फिर फारिग होके खाना बनाउन्गी अब जा रही हूँ नहाने
आदम : अच्छा सुन मेरे लिए भी दोपहर का खाना बना लेना मैं घर आ रहा हूँ
माँ : अच्छा ठीक है तू आ जल्दी घर आ फिर
आदम : ठीक है माँ लव यू
माँ : लव यू टू बेटा
माँ ने इतना कह कर फोन कट कर दिया....वो अपने पास रखके तौलिए को लिए गुसलखने में घुस गयी वहाँ आके उसने अपनी गंदी नाइटी को उतारा साथ ही साथ अपने ब्रा और पैंटी को भी उसने आयने की तरफ देखते हुए अपने आर्म्पाइट्स में उग रहे बालों को सॉफ करना शुरू किया उसके बाद साबुन का झाग बना कर अपने गुपतांग के उपर उग रही झान्टो को सॉफ करने लगी क्यूंकी बेटा अगर देख लेगा तो फिर वो खुद उन्हें सॉफ कर देगा जिससे उसे शरम आती है...वो अपने गुपतांग के बाल सॉफ करते हुए नहाने लगी....
कुछ ही देर में वो टवल पहने बाहर आई फिर उसने पास पड़ी आज लाल कलर की मॅचिंग ब्लाउस पेटिकोट वाली साड़ी को पहना...उसने अभी साड़ी के बॅकलेस ब्लाउस की डोरियो को अभी बाँधा ही था कि इतने में दरवाजे पे दस्तक हुई....
"अफ लगता है यह लड़का आ गया".......माँ मुस्कुराते हुए साड़ी लपेटते हुए पल्लू कर ली..
फिर वो मुस्कुरा कर दरवाजे के पास आती है इस बीच दरवाजे पे दो बार और दस्तक होती है..
"उफ्फ इस लड़के से सवर भी नही होता"......इतना कहते हुए अंजुम दरवाजा खोलती है...दरवाजा खुलते ही उसकी नज़र सामने की ओर जाती है और फिर ..............
उधर ट्रॅफिक में उलझा आदम चिलचिलाती धुंप की गर्मी से तप्ता हुआ अपना हेल्मेट ठीक किए आँखे तीखी सी किए एक बार चारो तरफ का जायेज़ा लेता है....काफ़ी ज़्यादा ट्रॅफिक आज मेन रोड और ब्रिड्ज के साइड लगा हुआ था....जब तक ट्रॅफिक नही हटेगा तब तक ब्रिड्ज क्रॉस करना और घर पहुचना बहुत ही मुस्किल भरा काम था....वो बार बार घड़ी की सुइयो की तरफ देखता हुआ बस यही मन में कह रहा था कि यार ये कहाँ लफडा है? आज ही ये ट्रॅफिक लगना था..गाड़ी के हॉर्न के शोर्र में कुछ समझ भी नही आ रहा था...थोड़ा सा ट्रॅफिक हटा तो आदम धीरे धीरे बाइक को थोड़ा आगे खिसका रहा था..पर जाम वैसे ही लगा हुआ था...
उधर अंजुम की नज़रों में परिवर्तन आने लगता है...और उसके चेहरे पे हँसी और मुस्कान गायब होते हुए घबराहट और माथे पे शिकन दोनो आ जाते है...वो बड़ी बड़ी आँखे किए एकदम हैरत भरी निगाहो से सामने खड़े आदमी की तरफ देखते हुए थोड़ा भारी आवाज़ में कहती है
अंजुम : तुम यहाँ?
(राज़ौल मुस्कुराता हुआ अपने पसीने को रुमाल से पोंछते हुए उस रुमाल को कोट में डाल देता है उसका चेहरा खुशी से अंजुम को देखके दमक जाता है)
राज़ौल : हां मैं (राज़ौल ने एक सड़ी सी शैतानी भरी मुस्कुराहट देते हुए कहा अंजुम नज़र फेर देती है उसकी आवाज़ में कठोरपन आने लगता है)
अंजुम : यहाँ क्या करने आए हो? उस दिन तुम ही थे जो मेरा पीछा सबज़िमंडी में कर रहे थे तुम्हें मालूम भी है कि तुम क्या कर रहे हो?
राज़ौल : चलो अच्छा हुआ कि तुमने मुझे पहचाना तो सही पर ऐसे मुँह फैरने से क्या फायेदा अंजुम
अंजुम : देखो राज़ौल उस दिन ट्रेन में मैं तुम्हें पहचान नही सकी थी लेकिन जब बाद में ज़्यादा गौर किया तो समझ आया कि तुम कौन थे? (अंजुम के स्वर में कठोरता अब भी थी)
राज़ौल : तुम शायद मुझे पहचान ना पाओ पर मैं तुम्हें पहचान ज़रूर गया था...भला तुम भूलने की चीज़ हो डार्लिंग
अंजुम : क्या कहा तुमने? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ? (अंजुम चिड सी गयी)
राज़ौल : माना कि तुमने उस दिन मुझे नही पहचाना पर मैने तुम्हें एक झटके में ही पहचान लिया था पर बदक़िस्मती कि तुम अपने बेटे के साथ ट्रेन से उतर गयी और मैं कुछ कर भी नही सका भूल गयी वो दिन थे जब तुमसे नही मिलता था तब भी तुम मैदान में मेरा इंतेज़ार करती थी...
अंजुम : मुझे कुछ याद दिलाने की ज़रूरत नही मुझे सब याद है कि मैने तुम जैसे घटिया आदमी से अपना दिल लगाया जो कि एक तो उमर में मुझसे बड़ा था और सिर्फ़ अपने फाय्दे के लिए मेरे पास आ रहा था
राजौल अंजुम के एकदम नज़दीक आने लगा तो अंजुम ने उसे हाथ दिखाके वहीं ठहरने का इशारा किया उसकी आँखे बड़ी बड़ी हो गयी गुस्से में....लेकिन राज़ौल को कोई फरक नही पड़ा वो ढीठ सा होके और अंदर आने लगा
राज़ौल : तुम्हारी सोच ग़लत है मेरे दिल में अब भी तुम्हारे लिए वहीं फीलिंग्स है जो थे और तुमने सोचा नही था कि इस मोड़ पे ? सुनने में आया है कि तुम्हारा पति तुम्हें छोड़ चुका है (अंजुम एकदम से हड़बड़ाई उसे ये कैसे मालूम चल गया? वो कशमकश के घेरे में नज़र इधर उधर करने लगी)
अंजुम : किसने कहा तुमसे?
राज़ौल : तुम्हारे तक पहुचने के लिए सब जान आया हूँ मेरी अंजुम
अंजुम ने फॅट से राज़ौल का हाथ झटका..और उसे घुरते हुए उंगली दिखाई
अंजुम : बदतमीज़ी पे मत उतर आओ राज़ौल देखो मुझे तुमसे बात करने का ना शौक है और ना ही कुछ भी जानने का ना मैं तुम्हें देखके खुश हुई हूँ और ना ही मुझे तुमसे कोई मतलब है
इस बीच अंजुम ने महसूस किया कि राज़ौल उसकी साड़ी के पल्लू के थोड़े खिसक जाने से उसके ब्लाउस के उभार को बखूबी घूर्र रहा था....अंजुम को अहसास हुआ कि उसमें से उसके मोटे निपल्स तने हुए सॉफ दिख रहे है क्यूंकी वो बेटे की मज़ूद्गी में सिर्फ़ साया कर लेती थी कोई ब्रा पैंटी नही पहनती थी...लेकिन राज़ौल की निगाह वहीं पे गढ़ी देख...वो पल्लू से अपने उभारो को छुपाने लगती है...और इस बार उसके चेहरे पे शरम के भाव थे राज़ौल मुस्कुराते हुए उसे हवस भरी नज़रों से देखता है
राज़ौल : भूल गयी वो दिन जब मैने तुमसे नज़दीकिया बढ़ाने के लिए कितनी कोशिशें की थी तुम्हें याद है वो गार्डन जहाँ हम अक्सर जाया करते थे उस दिन मैने तुम्हें अकेला पाके छुआ था और तुम्हें कुछ हुआ था तुम इज़हार नही कर सकी पर तुम्हारा काँपता जिस्म इस बात की गवाही दे रहा था कि तुम्हारे शरीर में मेरे छूने से कुछ हुआ था...उस वक़्त तो तुम शर्मीली मासूम कमसिन कली थी और आज उमर के साथ तुम्हारी जवानी भी कितनी खिल सी गयी है
अंजुम : पीछे हटो राज़ौल कैसे बेहया हो तुम? एक घरेलू औरत के साथ इस तरीके से बात करते हुए शरम नही आती हमारा तुम्हारा कोई रिश्ता कभी नही था भूल थी कि सिर्फ़ मैने तुमसे दिल लगाया पर रोज़ी उसे तो जानते हो ना उसने मुझे तुम्हारी सारी काली करतूतो के बारे में बताया था उसके साथ दो बार तुम हमबिस्तर हुए थे ना उसे उल्टिया होने लगी तो कॉलेज के बाद मैं ही उसे गुप्त तरीके से हॉस्पिटल लेके गयी वहीं पता चला कि तुमने उसे कितना बड़ा धोका दिया और उसे प्रेग्नेंट कर दिया बेचारी उसे तो अबॉर्षन करना पड़ा था बदनामी के डर से पर उसे देखके मुझे सबक मिला कि मैं तुम जैसे घिनोने इंसान के हाथो की वो ही शिकार बनने वाली हूँ जब तुमसे अलग हुई तो तुमने मेरे पीछे लड़के लगाने शुरू कर दिए जो मुझे कयि जगहो पे छेड़ते थे तुमसे और तुम्हारे दोस्तो से ही तंग आके मैने फ़ैसला कर लिया कि मैं बिहार छोड़ दूं तुम्हें मालूम चल गया था ना कि मेरा रिश्ता तय हो गया था अर्रे तुमने तो मेरे घरवालो को भी मनिपुलेट करना चाहा था है ना मेरी इन्फर्मेशन मेरे घर की कामवाली बाई से निकलवाने के लिए पैसे देते थे उसे और उस पर हाथ सॉफ भी किया क्या ये सब सच है ना?
राज़ौल : बिल्कुल झूठ है सरासर झूठ है मैं सिर्फ़ तुम्हारे पास आना चाहता था...और बस कुछ नही माना कि आज मैं शादी शुदा हूँ पर क्या फरक़ पड़ता है? जिस औरत से मुझे कभी कोई सुख नही मिल सका उसे भला क्यूँ प्यार करना? प्यार और मुहब्बत दोनो तो तुम थी मेरी अंजुम और तुम भी तो मुझे चाहती हो!