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Incest माँ को पाने की हसरत

इस बार राज़ौल कुछ बोल नही सका क्यूंकी अंजुम ने कस कर उसे थप्पड़ जड़ दिया और हो भी क्यूँ ना? जिस बीते कल को वो भुलाए आज अपने बेटे के साथ खुश रह रही थी उसमें फिर ग्रहण लगाने और बीते ज़ख़्मो को याद दिलाने राज़ौल आया था....अंजुम ने सोचा नही था कि राज़ौल इस हद तक उसके पीछे पड़ जाएगा...उसने कस कर थप्पड़ राज़ौल को जड़ने के बाद अपने गुस्से भरी निगाहो से उसे घूरा ये मन ही मन अपना नाम किसी गैर मर्द से जुड़ने पे भी उसका खून कितना खौल उठता है...जैसा भी रहे अपने पति के बाद वो सिर्फ़ अपने बेटे की अमानत थी...और आज राज़ौल गैर मर्द जैसा था..

अंजुम : एक लव्ज़ और कहा तो इस बार ऐसी जगह पे लात मारूँगी कि सारी ठरक निकल जाएगी तुम्हारी मिस्टर.राज़ौल भलाई इसी में है यहाँ से दफ़ा हो जाओ वरना मेरा बेटा किसी भी वक़्त यहाँ आता होगा और फिर देख लेना

राज़ौल : देख लेना क्या देख लेना? अर्रे आने दो उसे आज फ़ैसला हो ही जाए आज उसे मैं बताउन्गा कि उसकी माँ उसके पिता से पहले मेरे साथ थी

अंजुम : रज़्ज़ौल्ल्ल (अंजुम चीखी राज़ौल ने उसके होंठ पे उंगली रखी तो उसे अंजुम ने कस कर झटक दिया और उसे गुस्से से देखा साथ में दिल घबरा भी रहा था एक तो बेटा आया नही था अभीतक और उपर से वो घर में एक अकेली औरत कौन आता दूर दूर तो घर थे वो भी चिल्लाने से किसी को सुनाई भी नही देता क्यूंकी इस वक़्त सब दोपहर की नींद के आगोश में होंगे)

राज़ौल : देखो अंजुम आइ कॅन एक्सप्लेन दिस ऑल प्ल्स अंजुम देखो शांत हो जाओ प्लस्स प्लस्स

राज़ौल कहते कहते अंजुम को छूने लगा अंजुम विरोध करने लगी...वो बार उसके कंधे और चेहरे पे हाथ रखने की कोशिश कर रहा था उसके नज़दीक आ रहा था....अंजुम जानती थी कि राज़ौल की उमर ज़रूर हो चुकी थी पर ठरक अब भी बरक़रार थी वो किस हद तक जानवर बन जाता था ये वो जानती थी बस दिल ही दिल में दुआ कर रही थी कि आए खुदा जल्दी से उसके बेटे को भेज दे...पर राज़ौल के धीरे धीरे उसके करीब आने से उसका डर ज़्यादा और हिम्मत कम हो रही थी...वो घबराते हुए अब दोनो हाथो से उसे बाहर की ओर धकेलने लगी तो राज़ौल ने उसके दोनो हाथ कस कर पकड़ लिए...

राज़ौल : प्लस्स मेरी बात तो सुनो अंजुम अंजूमम्म देखो हम आराम से भी इस बारे में बात कर सकते है मैं तुम्हें समझाता हूँ अंजुमम

अंजुम : छोड़ो मुझहही रज़औल्ल्ल तुम अपने आपे से बाहर हो रहे हो छोड़ो प्लस्सस देखो ये त्तुम्म अच्छा नही कर रहे छोड़ो (आख़िर कार अंजुम ने अपने दोनो हाथ छुड़ा लिए और जैसे ही उल्टे पाँव बाहर की ओर भाग ही रही थी ये सोचके कि शायद बाहर भाग जाने से राज़ौल से दूर हो सके पर उसी बीच वो अपने बेटे से टकरा गयी जो दरवाजे पे खड़ा राज़ौल को माँ को छेड़ते देख रहा था उसका बेटा आदम घर पहुच चुका था )

अंजुम जैसे ही बेटे के सीने से टकराई उसकी तरफ बौखलाई निगाहो से देखते हुए पल भर में रोते उसके सीने से लिपट गयी....माँ को रोता घबराया हुआ देख आदम की तो जैसे आँखे एकदम लाल लाल हो गयी...उसने एक बार राज़ौल की तरफ देखा...राज़ौल का गला आदम को देखके ही सूख गया था...उसकी फॅट गयी थी आदम ने एक हाथ से माँ को अपने से दूर किया...राज़ौल धीरे धीरे आदम को कहने लगा ऐसा कुछ नही है प्लस्स आदम बेटा तुम मेरी बात तो सुनो

कहने को और शब्द भी नही मिला उसे क्यूंकी उसके बाद आदम जैसे किसी बाघ की तरह उस पर झपटा..."साले बेहेन्चोद"......आदम ज़ोर से दहाड़ता हुआ उसका गिरहबान पकड़े उसे दीवार से सटा देता है...राज़ौल अपने गिरहबान से उसके हाथ को मज़बूती से छुड़ाने लगता है....पर आदम का तो पारा चढ़ गया था...उसने एक ही पल में अपना घूँसा उसके चेहरे पे दे मारा....ऐसे ही वो गुस्सैल मिज़ाज़ बंदा था और उपर से मिक्स्ड मार्षल आर्ट का दीवाना जिस वजह से उसे कयि पैच देने आते थे....राज़ौल काँप गया क्यूंकी जवान आदम के आगे उसकी एक भी नही चली....आदम ने उसे एक ही घुसे में फर्श पे गिरा देता है और ठीक उस पर हमला करते हुए लात घुसा की बौछार कर देता है...उसका गुस्सा अब थमने वाला नही था इसलिए माँ उसे रोकने की कोशिस करती है....पर वो एक पल को माँ को भी धक्का दे देता है..लेकिन अंजुम अपने बेटे को छुड़ाने की नाकाम कोशिशें कर रही थी....

जब आदम ने उसका गला दबोच लिया और उसे लगभग मारना चाहा तो विरोध के तौर पे राज़ौल उसे हर मुमकिन अपने से अलग करने के लिए काफ़ी प्रयत्न करने लगा...इस बीच आदम ने ठीक एक लात उसकी पीठ पे मारते हुए गिरा दिया

आदम : हरामजादे तेरी माँ की चूत भोसड़ी के तेरी ये मज़ाल की तू मेरी माँ को छुए कमीने (जैसे ही राज़ौल उससे अलग होके अपना गला पकड़े साँस भर ही रहा था कि इतने में आदम ने पास रखा बल्ला उठाया और दो-तीन उसके पीठ और गान्ड पे जड़ दिए)

 
राज़ौल दर्द से बिलबिला उठा....अब भागना ही एक आखरी उपाय था उसके लिए...वो किसी कुत्ते की तरह हान्फते चोट लगी हालत में घर से बाहर निकल गया तो आदम भी उसके पीछे भागा बेसबॉल बॅट लिए...माँ उसे चीख चीख के रोकने की कोशिश करने लगी...इतने में आस पड़ोस के लोग चिल्लम चिल्ली से बाहर को आए उन्होने देखा कि एक आदमी के पीछे आदम किसी भेड़िए की तरह उसके पीछे तेज़ी से भाग रहा था हाथ में उसके बल्ला था...आधे रास्ते से वापिस आते हुए हान्फते हान्फते आदम पसीना पसीना अपनी शर्ट की आस्तीन को फोल्ड करते हुए वापिस घर में आया लोगो को जमा देख वो सबकी ओर हैरानी भरी नज़रों से देखने लगा...

माँ उसके गले लग्के उसके चेहरे को थपथपाने लगी कि वो ठीक तो है...आदम ने सिर्फ़ हान्फते हुए मुस्कुराया....फिर सबको उसने जाने को कहा झूठ बोला कि चोर आ गया था माँ गुसलखाने में थी तो जैसे ही मैने उसे देखा तो उसके पीछे भागा...लोग भी रज़ामंद होते हुए अहेतियात करते हुए उल्टे पाओ चले गये...दोनो माँ-बेटे वापिस घर में दाखिल हुए

अंजुम : तू ठीक तो है ना?

आदम : हां माँ वो कमीना बहुत दूर निकल गया था इसलिए हाथ नही लग सका पर माँ ये सब क्या था? ये तो वहीं कमीना है वहन्चोद राज़ौल

अंजुम : हां यही वो था जिसने सब्ज़ी मंडी में मेरा पीछा किया था...

आदम : उफ्फ तूने मुझे पहले क्यूँ नही बताया? इसकी खाट खड़ी कर देता ये भला हमारा पीछा करते यहाँ तक क्यूँ आया था? (अंजुम जैसे नज़रें झुकाए अपने आपको मुजरिम समझ रही थी)

आदम ने उसके चेहरे को हाथो से उपर उठया और उसके एक हाथ पे चेहरा रखते हुए कहा बाहर खड़ा था तो तेरी और उसकी ज़ोर ज़ोर बहसा बहसी की आवाज़ सुनी मुझे नही पता था कि वो तेरे साथ ऐसी नीच हरकत करने लगेगा मैं बाहर ही खड़ा चुपके सुन रहा था कि आख़िर वजह क्या है? तू डर मत मुझे कोई बुरा नही लगा कि वो तेरा कभी बाय्फ्रेंड हुआ करता था पर प्ल्ज़्ज़ मैं अपने पिता जैसा नही जो तेरा फॉल्ट ढूंढता मुझे तफ़सील से बता आख़िर ये इतने सालो बाद तेरे पास वापिस कैसे आया?

अंजुम ने सोचा कि अब वक़्त आ ही गया है कि उसे समझाए...उसने तफ़सील से ब्यान देना शुरू किया...वो तो खुद नही जानती थी कि इन 24 सालो बाद वो वापिस उसकी ज़िंदगी में कैसे आ गया? शायद उस दिन इत्तेफ़ाक़ से उसने उसे ट्रेन में पहचान लिया था अंजुम ने बताया कि किस तरह वो उसका पीछा करते हुए इस शहर तक पहुचा और फिर उसके घर का पता लगाते हुए...फिर वो बताने लगी कि अपने बीते उन ज़ख़्मो के बारे में...आदम जानता था कि उसकी माँ की शादी से पहले किसी से मुहब्बत थी पर माँ फ्रॅंक्ली थी उसने ये अपने बेटे से छुपाए नही रखा था जिसका ज़िक्र हमेशा उसने किया आज वो उसके और उसके बेटे के सामने आ गया था वहीं राज़ौल...

अंजुम : तू तो जानता है 24 साल पहले मैने जब बिहार छोड़ा था तो अपने कितने ज़ख़्मो को भरने के लिए यहाँ आई थी पिता के पास फिर पिता ने ग़रीबी से तंग आके मेरी शादी तय कर दी थी और मैने भी फ़ैसला कर लिया था कि दुबारा बिहार ना लौटू वहाँ मेरी हैसियत मेरे ताउ ताई के घर किसी नौकरानी जैसी थी जिनके पास संतान नही थी तो मुझे गोद लिया था....

आदम चुपचाप सुन रहा था....गंभीरता से अपनी माँ को देखते हुए...

अंजुम : जैसे जैसे जवान होने लगी रिश्ते आने लगे और तू तो जानता है छोटे ज़िले के लोगो की कैसी सोच होती है? उसी बीच सहेलियों के साथ स्कूल जाया करती थी अपनी दसवी की बोर्ड की क्लासस अटेंड करने और उसी बीच राज़ौल आया उस वक़्त उसकी उमर 30 वर्ष थी तो सोच अब कितना होगा? वो काफ़ी अमीर था पैसे वाला था...और साथ ही साथ अय्याश भी उसके घर को कोई भी पसंद नही करता था पर बेवकूफ़ मैं थी....मैं उसके प्यार में पड़ गयी...उसके बाद उसके बिना नही रह सकती थी...इतनी पागल और जुनूनी हो गयी कि भाग जाने तक का फ़ैसला कर लिया..

वो तो भला हो उस रोज़ी का जिसे राज़ौल ने फँसा रखा था शायद उसके बाद मेरा ही नंबर था...उसे प्यार का नाटक किया और उसे प्रेग्नेंट कर दिया उसे उल्टिया होने लगी और फिर उसने ये बात मुझे कही तो मेरा दिल जैसे टूट गया रोज़ी ने एक चौका देने वाली बात भी मुझे बताई कि उस कमीने को कोठे जाने की भी लत है वहीं से वो किसी रंडी से मिला और उसे सूजाक की बीमारी पकड़ ली...(आदम के नेत्र फैल गये माँ ने उसे बताया कि सूजाक की एक ऐसी घिनोनी बीमारी होती है जिससे मर्दो के लिंग में मवाद होने लगती है उसके लिंग में हरपल दर्द रहता है और उसका लिंग किसी हबशी से भी ज़्यादा मोटा और लंबा हो जाता है नॉर्मल साइज़ से कहीं ज़्यादा जो मर्दो का असल में होता है वो उस घिनोनी बीमारी को माँ को देके खुद फारिग होके बच जाना चाह रहा था मेरे गुस्से की जैसे इंतेहा नही रही आख़िर कितना नीच इंसान था वो?)

मुझे राज़ौल से घृणा होने लगी अब समझी थी क्यूँ मेरी सहेलिया मुझे बार बार राज़ौल से दूर रहने को कहती थी..पर थी तो मैं भी बेअकल ही उसके बाद रोज़ी को तो राज़ौल ने डंप कर ही दिया फिर मेरे पीछे पड़ा रहा मैं उससे दूरिया बनाने लगी तो मेरी सहेलियो ने भी उसके बार बार मेरे बारे में पूछने पे उससे झगड़ा कर लिया और एक दिन तो उनके हाथो से बेशरम ने मार भी खा ली…लेकिन वो टस से मस नही हुआ उसने मेरे पीछे अपने दोस्तो को लगाना शुरू कर दिया…मैने उसे दो-तीन बार कह भी दिया कि तुम्हारा सच जान चुकी हूँ अब भलाई इसी में है कि मुझसे दूर रहना…वो मुझे फसाने के लिए और बदनाम करने के लिए नये नये तरीके ढूँढने लगा…मैने बहुत कोशिशें भी की पर इधर मेरे ताऊ ताई मुझे भगाने लगे कहा जाके अपने पिता के यहाँ मर तेरी यहाँ किसी को ज़रूरत नही उनसे लड़ झगड़ के पिता के घर लौटने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नही था ..

और ठीक इसी बीच पिताजी ने मेरी शादी तय कर दी सिर्फ़ इसलिए कि यहाँ भी मेरा जीना तेरी ही ताहिरा मौसी के जीजा ने दुश्वार कर दिया था....यहाँ तो वो आ नही पाया...लेकिन उसकी खबरी जिसे मैने खूब सुनाया था उसने ये तेरे पिता तक खबर पहुचा दी कि मेरे पहले किसी से संबंध थे बस तेरे पिता भी मुझे हीनभावना से शादी के बाद देखने लगे छोड़ तो नही पाए क्यूंकी उन्हें मुझसे दान दहेज जो चाहिए था पर हर लड़ाई झगड़े में ताना इस बात का ज़रूर देते थे कि उन्होने मुझपे अहेसान किया वरना मैं तो ऑलरेडी चुदि हुई थी

 
ये सुनके मेरा खून खौल उठा मैने माँ के मुँह पे हाथ रखा कि दुबारा ऐसा कुछ ना कहे पर माँ ने रोई निगाहो से मुस्कुराते हुए मेरे हाथ को नीचे किया

अंजुम : मैं जानती हूँ तू एक लव्ज़ भी मेरे अगेन्स्ट सुन नही सकता और सुन तेरे पिता की क़र्ज़ मारी की वजह से आएदीन क्लब के गुंडे भी मुझसे क़र्ज़ लेने आने लगे...जबकि उन्हें मालूम था कि मैं गर्भवती थी कोई गंदी से गंदी बात बोलता तो कोई कुछ और ये सब सुनके ही मुझे तेरे पिता और इस जगह से इतनी नफ़रत हुई कि इन लोगो की वजह से मेरा ये हाल हुआ पर मैं कसम खाती हूँ तेरी और अपनी खुद की जान की भी मैने राज़ौल से कोई संबंध नही बनाए थे...पर मुझे मालूम नही था कि साए की तरह वो मेरे पीछे आ लगेगा

माँ ने इस बीच जज़्बातो में बहते हुए ये तक बता दिया कि राज़ौल उनकी ज़िंदगी का वो पहला मर्द था जिसने उन्हे छुआ था उस दिन वो अकेलेपन का फ़ायदा उठा रहा था पर उसके हाथ शरीर को टच करते ही माँ को स्खलन हो गया था....मतलब वो झड गयी थी ये उनकी ज़िंदगी का पहला अनुभव था उसके बाद आज इतने सालो बाद उसके बेटे के छूने से उस दिन वो झड़ी थी...ये सुनके आदम दाँत पीसता हुआ माँ को चुप कराने लगा....

माँ ने ये तक बताया कि उसके पिता ने उसे रात गये एक सरव नाम के आदमी के पास पैसे तक ले जाने भेजा था उस वक़्त तो दुनिया में आ चुका था....माँ अकेले उसके पास पैसे लाने गयी पिता का दोस्त सरव माँ पे फिदा था...माँ ने महेज़ नाइटी पहन रखी थी बहुत ग़रीब हो चुकी थी और पति तो वैसे ही क़र्ज़ में डूबा था....सरव ने माँ को अपने पास बिस्तर पे बिठाया उसने ये तक कहा कि वो उसके बेटे को अपना नाम देगा उसका बाप बनेगा और माँ को अपनी बीवी बनाएगा वो था भी बहुत अमीर माँ पे तो जैसे साँप लॉट रहे थे इतना शरम्शार उसे अपनी ज़िंदगी में कभी नही होना पड़ा था...और उसने पाया कि माँ की नाइटी एकदम गीली थी हो भी क्यूँ ना? उनकी छातिया दूध छोड़ रही थी....उस अवस्था में भी वो एकदम पागल सा गया...माँ को हवस भरी निगाहो से छूने की कोशिश करने लगा तो माँ उससे दूर हो गयी इतने में मेरी पालनहार यानी मेरी दाई माँ उस वक़्त जो वहाँ काम करती थी कपड़े धोने का वो कमरे में आहट सुनते ही पहुच गयी माँ बच गयी...और सरव का मुँह लटक गया

दाई माँ ने उसे खूब सुनाया कि एक शादी शुदा और एक बच्चेदार औरत को छूते उसे शरम नही आई...सच में कहा था उस वक़्त साथ निभाने वाला वो पति...कहाँ थी उस वक़्त वो दादी की पैदावार जो मेरे पैदा होने के बाद ज़रा सा भी मुझे और मेरी माँ को ना अपनाए...सच में माँ की दर्दभरी कहानी सुनके मेरी आँखो में आँसू उबल गये कसम खा लिया कि ना उस मदर्चोद बाप की शकल देखूँगा और ना ही किसी और को अब अपनी माँ को हर्ट होते देखूँगा माँ अपनी दास्तान बताते हुए मेरे सीने से लग्के कुछ देर तक सुबक्ती रही फिर मैने उसे फ्रिड्ज से पानी ग्लास में डालके दिया....फिर हम दोनो रिलॅक्स हुए

आदम : माँ तू फिकर मत करना वो कमीना किस हद तक गुज़रता है मैं देखता हूँ उस वक़्त तो मैं तेरे साथ नही था पर अब हूँ और उस कमीने को अपनी औरत को छूने तक नही दूँगा पिता तो ना मर्द था पर मैं नही (मैने गुस्से में दाँत पीस लिए माँ को खुशी हुई कि मैं उसका सहारा जैसे बन गया था)

उस रात मैं राजीव दा से मिला मैने राजीव दा पे भरोसा किया था उन्हें जैसे बताया वो मुझपे गुस्सा हुए उन्होने मुझे कहा कि आख़िर उन्हें बताया क्यूँ नही फोन तक क्यूँ नही किया? वो आके उस कमीने की खबर लेते ...पर मैं मुस्कुराया कहा कि आज का डोस तो मैने उसे बड़े अच्छे से दिया है...माँ भी उस वक़्त वहीं मौज़ूद थी...वो लज्जा पा रही थी की भला किसी गैर आदमी को इतना कुछ कहना पर मैने माँ को इशारो इशारे में कहा कि राजीव दा मेरे अपने है और ये ज़रूर मेरी हेल्प करेंगे उस कमीने से निपटने में

राजीव : आप लोग फिकर मत कीजिएगा ज्योति कल आपके साथ दिन भर रुकेगी और उसका मन भी बहेल जाएगा मुझे आप लोग उसके आते होते ही फोन कीजिएगा दरवाजे खिड़किया लगाए रहिएगा वैसे तो वो किस हद तक जाता है ये देखना पड़ेगा और आदम तुम भी सावधान रहना वो साँप बन चुका है फिरसे जोश में ज़रूर लौटेगा

आदम : पक्का तय्यार रहूँगा

उस रात माँ और मेरे बीच कोई संबंध नही बने ना हमने एकदुसरे से मुहब्बत करने की कोशिश की वो दिन हम दोनो के लिए जैसे बुरा सा दिन था हम दोनो का मूड खराब था उस दिन..मैं बियर की चुस्की लेते हुए माँ की तरफ देख रहा था मुझे अपनी माँ पे अटूट विश्वास था....काश माँ से ये नही मालूम चलता कि उस कमीने ने माँ पे हाथ भी सॉफ किया ऐसे गंदे थॉट्स को मैने अपने दिमाग़ से झटकते हुए बियर की चुस्की लेते हुए माँ की तरफ करवट बदले सो गया..

दूसरे दिन ज्योति भाभी दिन में ही आ गयी मैं आज लेट ऑफीस के लिए निकला ही था...मैं उनसे मिला और माँ और दोनो से विदा लेते हुए ऑफीस चला आया...राजीव दा ने माँ से वैसे ही केस दर्ज़ कर लिया थी...कि अगर दुबारा कोई नुकसान पहुचाने की राज़ौल ने कोशिश भी की तो टीटी नौकरी से तो हाथ धोएगा ही अब वो शिकंजे में आ जाएगा राजीव दा ने शाम को मुझे कॉल किया और बताया कि उन्होने उस कमीने राज़ौल के बारे में मालूमत की वो बिहार और बेंगल के सतले शहर में पोस्टिंग लिए रह रहा था क्वॉर्टर में घरवालो ने उसे निकाल दिया था उसे उसके रिश्तेदार की ही पोस्ट मिली थी चूँकि उसके बड़े भाई ने उसे घर से निकाल दिया था और सारी जाएज़ाद भी छीन ली थी उससे...मैं तो मन ही मन खुश हुआ कि शायद माँ की बद्दुआ का असर था जब उसने बिहार छोड़ा होगा उसके सितम से

कुछ दिन तो सब ठीक रहा पर ज्योति भाभी के घर अक्सर मैं माँ को बाइक से छोड़ते हुए ऑफीस चला जाता था क्यूंकी वहाँ वो अकेली रहती थी....क्या मालूम वो कमीना फिर कोई नयी मुसीबत के साथ मेरी माँ को नुकसान पहुचाए....लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ....और एक दिन ऑफीस में बैठा काम कर ही रहा था इतने में पीयान ने आके कहा की आपसे कोई मिलने आया

जब बाहर निकला तो सामने राज़ौल खड़ा था..

राज़ौल को बाहर खड़ा देख मेरी तो जैसे तन बदन में आग लग गयी....उसके एक हाथ पे पट्टी थी और शर्ट के बटन खुले होने से उपर के...सॉफ देख सकता था कि पट्टी अंदर से उसके कंधे तक जा रही थी....कल के दिए मेरे ज़ख़्म अब भी वो लिए घूम रहा था मुझे इस बात की खुशी हुई....वो मुझे देखके रोई निगाहो से मुस्कुराते हुए मेरे पास आया जैसे कल कुछ हुआ ही नही था....मैं बस दाँत पीसते हुए अपने गुस्से पे काबू पाकर उसकी तरफ देख रहा था....मैने राज़ौल के पास आने से पहले ऑफीस के कॅबिन से ही राजीव दा को कॉल कर दिया था...उन्होने बताया था कि मैं उससे शांति से बात करूँ वो वहाँ किसी भी पल आके उसे अरेस्ट कर लेंगे...इसलिए मुझे वहाँ कोई तमाशा खड़ा करने की ज़रूरत नही थी...जैसे ही उसके करीब आया तो जैसे उसके चेहरे पे मांसूमियत और बातों में ज़ज़्बात फुट रहे थे....वो इस अंदाज़्ज़ पेश आ रहा था जैसे मैं उसका बिछड़ा कोई बेटा हूँ...माँ ने सॉफ कह दिया था कि वो तुझे भड़काएगा कुछ ऐसी झूठी बात कहेगा कि सुनके तुझे यकीन होने लगेगा..यक़ीनन वो बहुत ही शातिर और मनिप्युलेटिव इंसान था

 
आदम : अब यहाँ क्या करने आया है तू? कल का डोज कम पड़ गया था क्या?

राज़ौल : देखो मुझे परवाह नही कि तुम मुझसे कितना गुस्सा हो? जो भी कल तुमने देखा वो महेज़ सिर्फ़ तुम्हारी मिसांडरस्टॅंडिंग्स थी मैं तुम्हारी माँ के साथ कोई ऐसी हरकत नही कर रहा था...

मैने अपनी मुट्ठी कस ली और उसे बड़े घूर्र के देखा...

आदम : फिलहाल तो माँ का लव्ज़ भी मुँह से मत निकालना तुम्हारी बातों में मुझे कोई विश्वास नही

राज़ौल : तुम्हें विश्वास करना होगा आदम मुझपे ना सही पर अपने पिता पे..

मैं जैसे एकदम ठिठक गया पिता पे क्या इस कमीने ने मेरे सो-कॉल्ड बाप को भी मोहरा बनाया था....शायद ये उसकी कोई धमकी हो पर उसके चेहरे पे ऐसे भाव थे जैसे वो मुझे ज़ज़्बातो के समुन्द्र में डूबो देना चाहता था..

आदम : पिता कौन सा पिता? मेरे पिता हमारे साथ नही रहते और भला उससे तुम्हारा क्या मतलब?

राज़ौल : मैं जानता हूँ शायद ये सुनके तुम्हें झटका लगे पर मैं यहाँ तुम्हारी ज़िंदगी को सवारने आया हूँ दरअसल अंजुम सॉरी तुम्हारी माँ और मेरा!

आदम : आगे कहो मुझे हिस्टरी नही जाननी

राज़ौल सकपकाता हुआ मेरी तरफ ऐसे देख रहा था जैसे माँ ने सबकुछ उसके बारे में मुझे बता दिया हो..

राज़ौल : कल जो तुमने किया शायद तुम्हें ये अहसास नही कि तुमने किसके गेरेबान पे हाथ डाला? किसे मारा? तुम्हारी माँ की नफ़रत जायेज़ थी भला तुम्हें और तुम्हारी माँ को राह पे छोड़के मैने गुनाह ही तो किया

आदम : तू कहना क्या चाहता है ?

राज़ौल : यही कि जिससे तुम्हारी मोम की शादी हुई है वो तुम्हारा पिता नही तुम्हारा पिता मैं हूँ

राज़ौल की इस बात से मेरी जैसे ज़मीन खिसक गयी...मुझे माँ पे अटूट यकीन था पर उस कमीने ने आज तो कल से भी ज़्यादा हद पार कर दी थी...मेरी माँ अंजुम जिसने अपनी कसम मुझे दी मेरी कसम मुझे दी जो कभी मेरी झूठी कसम नही खा सकती उस पवित्र औरत को अपनी बीवी और मुझे अपना बेटा कहना चाह रहा था यही कहना चाह रहा था कि मेरी माँ ने मुझे उस कमीने से लिया था...उसके साथ संबंध बनाए थे...अगर ये बात किसी बेटे के आगे कोई आदमी रखे तो उस पर क्या बीतती है ? वो उस गैर को कम और अपनी माँ को कोस्ता लेकिन यहाँ मुझे माँ पे पूरा विश्वास था मैं जानता था ये कमीना अपनी आखरी चला चलेगा और इसने इतनी घिनोनी बात कही वो बोलता गया और मैं उसे मारने का बस सवर करने लगा था मुट्ठी कस्स चुकी थी मेरी..

राज़ौल : हां हां मैं सच कह रहा हूँ तू मेरी औलाद है ना कि उस आदमी की जिसने तुम दोनो को इस राह पे छोड़ दिया तुम्हारी माँ और मेरे बीच अटूट रिश्ता था यही सच्चाई तुम्हारी माँ तुमसे छुपाना चाहती है एक बार यकीन करके देखो मैं बस इसी लिए इतने सालो बाद यहाँ आया जब खबर मिली थी तुम्हारी पैदाइश की तो मैं बेहद खुश हुआ मुझे इसलिए यकीन है क्यूंकी तुम्हारी माँ बिहार छोड़ने से पहले उस दिन मुझसे होटेल मे मिली थी !

राज़ौल आगे कुछ और कह पाता या अपने घिनोने झूठ और आगे कहता ही..कि अंजुम की बेज़्ज़ती ना बर्दाश्त किए रह नही पाया आदम..और उसने एक कस कर थप्पड़ जड़ दिया राज़ौल को वो तो गाल पकड़े वहीं गिर पड़ा..

आदम : मदर्चोद बेहेन्चोद माँ के लौडे क्या समझ रखा है रांड़ की पैदाइश कि मैं तेरी बातों पे विश्वास कर लूँगा अर्रे कल तो तुझे मौका दिया था कि तू यहाँ से दफ़ा हो जा पर तू तो ठहरा सूअर की चॅम्डी का तू कहाँ इतनी जल्दी हार मानता हराम के पिल्ले तेरी माँ सोई होगी किसी के साथ उससे चुद के तुझे पैदा किया होगा तूने कैसे कही ये बात कि मेरी माँ मेरी माँ तेरे से संबंध बनाई है..साले हराम के जने एक पवित्र औरत के उपर ऐसा गंदा इल्ज़ाम लगाने से तेरी आत्मा नही कांपी कुत्ते उसे तिल तिल के तक़लीफ़ पहुचाई अब मुझे ज़रिया बनाके उसके पास आना चाहता है हरामजादे आज तो मैं तुझे नही छोड़ने वाला

राज़ौल मेन गेट पे ना खड़ा होके पीछे के कॉंपाउंड में आया था.जहाँ एक पतली सी गली शुरू होती थी वहाँ से आस पास के लोग बहुत कम गुज़रते थे वो ऑफीस का पिछवाड़ा था...मैं तो बस उस पर टूट पड़ा था...कल की कसर आज एक बार फिर पूरी कर दी थी मैने उसे मैने एक लात देके साइकल के ठेलो पे गिरा दिया और ठीक उसके उपर झपटते हुए उसके चेहरे पे अनगिनत मुक्के बरसाने शुरू कर दिए उसे गेरेबान से उठाया और पीछे की दीवार पे उसके सर को दे मारा...वो चक्कर खाए सर पकड़े वहीं ढेर हो गया...मैने उसके हाथ को मरोड़ते हुए तोड़ने का प्रयत्न किया वो दर्द से बिलबिला उठा सर नाक और होंठ से उसके खून बह रहा था...उसे शायद पछतावा हुआ होगा कि उसकी ये चाल भी कामयाब नही हो सकी...उसने सोचा था कि वो यहाँ आएगा मुझे भड़काएगा और फिर मैं धीरे धीरे उसे अपनी माँ के करीब ले आउन्गा और फिर वो मुझे ज़रिया बनाके माँ से अपनी हसरत पूरी कर लेता यही उसकी चाल थी...पर कमीना ये भूल गया कि माँ की हसरातों पे भी अब मेरा क़ब्ज़ा था और उसकी रूह पे भी वो ये नही जानता था उसका बेटा उससे भी कितना उसकी माँ के लिए जुनूनी और दीवाना था..

अभी उसकी बाँह को मरोड़े मैं वहीं फर्श पे उसके साथ गिरा उसकी हड्डी तोड़ने ही वाला था कि इतने में राजीव दा अपनी वर्दी में अपने कॉन्स्टेबल और बाकी पोलीस कर्मी के साथ वहाँ पहुच गये थे वो सब मुझे छुड़ाने लगे पीछे स्टाफ मेंबर भी दफ़्तर के आ गये कि आख़िर क्या हो रहा था? मेरे शर्ट के बटन टूट गये थे लगभग हाथा पाई में मुझे भी बहुत जगह चोट आई थी शर्ट पूरा गंदा हो गया था...राजीव दा ने फुरती से मुझे कस कर उसकी गर्दन और बाँह से छुड़ाया...वो दर्द से कराहता हुआ वहीं ज़मीन पे ढेर हो गया....राजीव दा ने कॉन्स्टेबल को कहा तो वो लोगो भी लगभग घँसीटते हुए उसे पकड़े ले जाने लगे..

राजीव : पागल हो गये हो क्या? आदम शांत हो जाओ शांत हो जाओ लो पानी पियो (राजीव दा ने वॉचमन से बॉटल लेते हुए मुझे दिया)

मैं हान्फ्ते हुए खुद के साँसों पे काबू पाया...फिर उन्हें बताया कि राज़ौल यहाँ क्या कहने आया था सुनके राजीव दा का भी खून खौल उठा..और फिर उन्होने कहा कि अब डरने की ज़रूरत नही...उन्होने पीछे ले जाते राज़ौल को पोलीस वालो की गिरफ़्त में देख गुस्से से ज़ोर से दहाड़ते हुए कहा "गिरफ्तार करो साले को बिठाओ जीप में हरामी के जने को आओ आदम चलो"........राजीव मेरे कंधे पे हाथ रखके मुझे वहाँ से ले आए

हम जल्द ही थाने पहुचे सलाखो के पीछे राज़ौल को वॉटर ट्रीटमेंट और लाठी की मार दी जा रही थी वहाँ सब क़ैदियो में से सबसे ज़्यादा उसी की दहाड़ सुनाई दे रही थी..पोलीस उसकी 2 घंटे तक धुलाई करती है तो इस बीच राजीव दा खुद अंदर जाके सबको रोकके वापिस अपने सीट पे आके बैठ जाते है...

राजीव : बस कुछ ही देर में तुम्हारी मोम भी यहाँ आ जाएगी आदम

आदम : उन्हें बुलाने की क्या ज़रूरत थी?

राजीव : केस उन्होने फाइल किया था इसके खिलाफ अब ये पकड़ा जा चुका है तुम्हें फिर ये धमकी देने आया और अगर तुम शांति से भी पेश आते जो तुम करने नही वाले थे फिर भी यह बाज़ नही आता ये फिर कोई और ख़तरनाक चाल इस बार चलता क्यूंकी मैने जैसा कहा था ये ज़हरीला साँप बन चुका है अब पोलीस वाले इससे इसका स्टेट्मेंट उगलवा लेंगे कि आख़िर क्या वजह थी जो यह तुम्हारी माँ के पीछे आया? तुम फिकर मत करो मैं उसे खुद इंटेरगेट करने जा रहा हूँ तुम यही बैठो

 
राजीव दा अंदर चले गये...अंदर उनके कर्कश स्वर की दहाड़ सुनाई बाहर तक दे रही थी...मैं वैसे ही बैठा रहा इनटेरगेशन कुछ देर तक चली इस बीच राजीव दा ने भी उसकी जमके धुलाई कर दी ...इस बीच माँ आ गयी उसके चेहरे पे ख़ौफ्फ और चिंता दोनो आए हुए थे...वो मेरे हाल को देख मेरे सीने से लगते हुए मेरी हालत के बारे में पूछने लगी

अंजुम : क्या हुआ तुझे? तू ठीक तो है ना उस कमीने ने फिर कोई!

आदम : माँ सबकुछ ठीक हो चुका है मुझे कुछ नही हुआ ये तो भला हो राजीव दा कि उन्होने आके उस कमीने को बचा लिया वरना आज तो मैं उसे जान से मार देता और तेरी कसम भला तुझे अकेला इस ज़ालिम दुनिया में कैसे छोड़ देता अगर मेरे हाथ से कुछ हो जाता तो

माँ शरमाते हुए मुस्कुराइ फिर हम दोनो वहीं सीट पे बैठे राजीव दा का इंतेज़ार करने लगे....इतने में राजीव दा अपने पसीने पसीने होती वर्दी को झाड़ते हुए मेरे सामने आके सीट ग्रहण करते हुए उस पर बैठे...

राजीव : माँ अब चिंता की बात नही है उसने क़बूला है कि उसने जो कुछ भी किया बस आपको फिर से पाने के लिए (माँ शर्मा गई और वो नज़रें झुकाए रही) दरअसल ये कमीना आपका पीछा करते हुए आया ये तो इत्तेफ़ाक़ है कि इसे आप ट्रेन में मिल गयी थी और इसने आपको पहचान लिया वरना इसका आपके पास आना नामुमकिन था...

राजीव दा के आने से पहले मैने माँ को सबकुछ खुलके बता दिया था कि उस कमीने ने आख़िर क्या नयी चाल चली थी? माँ सुनके उस पर बहुत नाराज़ हुई उसकी घृणा राज़ौल के प्रति और भी बढ़ गयी छी उस पर इतना वाहियात इल्ज़ाम भला अंजुम अपने पति के सिवा किसी को अपना कुँवारापन नही दी थी वो एक संस्कारी स्वाभिमानी औरत थी..और राज़ौल जैसा गंदा इंसान यही तो चाहता था

राजीव दा ने फिर माँ से चार्जेशेट पे साइन करवाया फिर कुछ और दस्तावेज़ पूरे कराए और उसके बाद सुनिश्चिंत किया कि अब डरने की हमे कोई बात नही अब वो सीधा जैल ही जाएगा अगर इस बीच कोई ज़मानत के लिए आता भी है तो भी जैल की सज़ा काटनी पड़ेगी 1 साल या उससे भी ज़्यादा की जैल तो उसे पक्का होगी क्यूंकी उसने मेरी माँ के साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की थी मौका पाके..हम खुश हुए की चलो हमारी ज़िंदगी से राज़ौल नाम की आफ़त दूर तो हुई

माँ को बहुत देर समझाने के बाद मैं माँ को लेके बाहर आया तो राजीव दा ने मुझे रोक लिया वो मुझसे पर्सनली कुछ बातें करना चाह रहे थे...मैं उनके साथ एक आड़ मे हो गया...तो उन्होने जो बताया वो मेरी माँ के सामने उनें बताने में आपत्ति होती..उन्होने बताया

राजीव : उस कमीने का इंटेन्षन तुम्हारी माँ के साथ ग़लत काम करने का था तुम बुरा मत मानना आदम अगर मैं ऐसा कुछ कह रहा हूँ तो उस कमीने ने बताया कि उसे सूजाक की प्राब्लम है मैने खीचके उसकी पॅंट उतार दी और जो देखा उसे डॅंग हो गया ये बीमारी उसे करीब बहुत सालो से थी जो कि अब बढ़ चुकी है और अब इलाज ना होने से उसे इस गंदी बीमारी से जान से भी हाथ भी धोना पड़ सकता है

आदम : मतलब?

राजीव : ही कॅन डाइ

आदम : ओह माइ गॉड अच्छा हुआ कि वक़्त चलते माँ उससे दूर हो गयी

राजीव : जो भी हो आदम तुम्हारी मोम से उसकी दोस्ती थी उस कमीने ने बताया पर अब वो और कुछ नही बता पाएगा क्यूंकी अब उसे मैने उस हाल छोड़ा नही अब डरो भी मत वो कुछ नही कर पाएगा अब निश्चिंत हो जाओ और हां आंटी को ये सब बताना मत

आदम : जी बिल्कुल

राजीव : और सुनो अब जल्दी से फ्लॅट चेंज करो यार कब तक अकेले अकेले वहाँ माँ के साथ रहोगे

आदम : हाहाहा थॅंक यू सो मच राजीव दा अब भाई के पास जल्दी शिफ्ट जाउन्गा

राजीव : चल प्रार्थना रहेगी मेरी ..तुम्हारी ज्योति भाभी भी यही चाहती है

आदम : चलिए राजीव दा आज आपने बहुत हेल्प किया मेरा

राजीव : भाई ड्यूटी है (हम दोनो हंस पड़े)

माँ मुझे खुश देख मुस्कुराइ कि क्या बातें हो रही थी? मैने कहा कुछ नही...उनका दिल आज सच में काफ़ी सेहेम उठा था कि किस हद्तक राज़ौल उसके करीब आना चाह रहा था....राजीव दा की उन्होने काफ़ी प्रशंसा की....हम घर लौटे...आज हम बेहद खुश थे माँ ने मेरे लिए खाना बनाया था...मुझे एक एक नीवाला खिलाते हुए प्यार से मेरे सर पे हाथ फेरा और अपने आँचल से खाने से फारिग होते ही मेरे मुँह को पोन्छा जो कि मेरे लिए बहुत ही सुहाने पलों में से एक था उन्हें फकर था कि उनका बेटा उनकी कितनी हिफ़ाज़त और केर करता आया है ऐसा तो उसका पति भी नही कर सकता था...

माँ ने बियर की बोतल को देखा तो मैं झेंप गया कहा बस राजीव दा के साथ एक दो बार पी थी तो घर ले आया था ऐसे ही टेन्षन दूर करने ...तो वो पहले तो नाराज़ हुई उसके बाद उन्होने एक घूँट मेरे सामने ही ले ली...अपने होंठो को पोंछते हुए मेरी तरफ नज़ाकत से देखा मैं मुस्कुराया....

अगले दिन ऑफीस में मैं लौटा तो सब हैरत में गुपचुप बातें कर रहे थे मालिक मुझसे पर्सनली मिलने आए थे कि आख़िर क्या मॅटर था? यक़ीनन पोलीस का लफडा था तो इसलिए उन्हें मुझपे शक़ हुआ..

 
मैने उन लोगो को समझाया कि ऐसा कुछ नही था दरअसल राजीव दा इनस्पेक्टर राजीव मेरे फ्रेंड थे और ये आदमी मेरे पीछे बहुत दिनो से मुझे परेशान कर रहा था जिसमें हाथा पाई हुई और राजीव दा ने उसे अरेस्ट कर लिया मौके पे आके...मालिक को निश्चिंत करने के बाद मैं फारिग हुआ...आज पूरे दिन फीलडिंग का काम था इसलिए बाइक पे बड़े चक्कर मार्केट और शॉप्स पे लगाने पड़े थे....जब घर लौट रहा था तो बॅंक से फोन आया..एक खुशख़बरी खुदा की तरफ से थी मेरा लोन पास हो चुका था

अंजुम ने जैसे ही दरवाजा खोला मैने उसे जांघों से ही अपनी बाहों में उठा लिया वो एकदम से सहम उठी..."अर्रे बेटा क्या कर रहा है छोड़ अर्रे? गिरा देगा हाहाहा?".......

."हाहहाहा माँ आज मैं बहुत खुश हूँ आज मेरा लोन पास हो गया अब हम जल्द ही अपने नये फ्लॅट में शिफ्ट हो सकते है".........माँ को मैने उतारते हुए कहा तो माँ का चेहरा खिलखिला सा गया खुशी से

माँ : क्या सच में? ओह्ह बेटा

आदम : मैने कहा था ना कि हमारे दिन अब बुरे नही भले होंगे

माँ : सच में आदम बेटा तूने मेरे दिल को आज लुभा दिया है मुझे गर्व है कि मैने एक हीरे को जनम दिया मेरी बरसो से ये तम्माना थी कि हमारा भी घर हो

आदम : माँ रो मत ये आँसू दुख तक ठीक थे पर अब तेरे चेहरे पे अच्छे नही लगते हम बहुत जल्द ही शिफ्ट होंगे (माँ के आँसू पोंछते हुए)

माँ : ओह आदम (माँ और मेरे होंठ एकदुसरे से जुड़ गये लंबा सा किस लेने के बाद उसने मुझे धकेला और ना में नज़ाकत से इशारा किया)

मैं समझ गया कि माँ मुझे मुँह हाथ धोने और पहले अपने घरेलू कामो से फारिग होने कह रही है तो मैं नहाने चला गया....वापिस जब आया तो माँ अपनी साड़ी उतारे पेटिकोट और ब्लाउस में टी.वी देख रही थी हम दोनो ने मिलके मुरमुरा और घुघनी खाया फिर मेरे शाम के नाश्ते से फारिग होते ही माँ बर्तन धोने चली गयी तो मैं उसके साथ जाके बर्तन धोने में उसकी मदद करने लगा इस बीच उसके पेटिकोट के पीछे से ही उसके नितंबो की उभारो में अपना लॉडा पाजामा उतारे बिना ही मैं हौले हौले से घिस्सने लगा पेटिकोट का कपड़ा नितंबो के बीच मेरे अकडे लौडे की घिसाई से और नितांबो की दरार में फस गया...जिससे मुझे पेटिकोट के बाहर ही माँ के नितंबो का अहसास हुआ इससे माँ काँप उठी...धीरे धीरे मेरे हाथ उसकी कमर से होते हुए उसके नंगे गुदाज़ पेट की नाभि को छेड़ने लगे...मेरे हाथ धीरे माँ के गुदाज़ गोल पेट से होते हुए नाभि तक आके कस गये तो माँ के हाथो से बर्तन फिसल गया उसने हल्की साँस लेते हुए मेरी तरफ पलटके देखा और मुस्कुराइ

मैं माँ को वैसे ही पकड़े उसके नितंबो के बीच पेटिकोट के उपर से ही लॉडा घिस रहा था जो कि अकड़न से काफ़ी बड़ा और मोटा हो गया था साथ ही साथ मेरे हाथ उसके ब्लाउस के नीचे उसके पेट को सहला रहे थे माँ को अच्छा लग रहा था इस बीच हमारी प्रेम प्रक्रिया में एक फोन आ गया मुझे मज़बूरन माँ की गोल गहरी नाभि में उंगली करने से रुकना पड़ा..

मैने हाथ हटाया और हड़बड़ाते हुए माँ के पीछे पलटने से पहले ही अपने पाजामे को उपर किया और लंड को ठीक करते हुए कमरे में आया....फोन चेक किया तो पाया राजीव दा का था....मैं इतमीनान से सोफे पे ही बैठ कर राजीव दा से बात करने लगा....राजीव दा ने बताया कि अब हमे फिकर की कोई बात नही करनी है मैने उन्हें लोन पास होने की खुशख़बरी दी तो वो भी काफ़ी खुश हुए....हमने कुछ देर बात की इस बीच राजीव दा ने कहा कि मैं उनसे कल घर आके मिल लून आज तो मुलाक़ात हो ही नही पाई पूरी तरीके से मैने उनसे वादा करते हुए फोन कट किया....

माँ और मैं दोनो खाना ख़ाके फारिग हुए और फिर कुछ ही देर में बिस्तर पे आके लेट गये...माँ मेरे खुले बदन से सटे मेरे सीने के बालों से खेलते हुए उस कमीने राज़ौल का ही किस्सा बता रही थी उसने सोचा नही था कि इतने सालो बाद वो इस तराहा दस्तक देगा...माँ वहीं पेटिकोट और ब्लाउस पहनी मुझसे लिपटी हुई थी....मैने उसे हल्का सा डाँटते हुए कहा तू बस अब उस कुत्ते की बात ना कर तुझे पता भी है कि ऑफीस में उसके चक्कर में कितना बवाल मचा माँ को खुद को कोसने लगी इन सब के लिए आज जो कुछ भी हुआ उन्ही की वजह से हुआ था मैने माँ को समझाया ऐसा कुछ नही है ये तो महेज़ इत्तेफ़ाक़ था कि बीता कल उस ट्रेन में उनसे दुबारा रूबरू हुआ और वो कमीना यहाँ आ पहुचा अब उससे घबराने की कोई ज़रूरत नही अब वो पोलीस की गिरफ़्त में है बाकी इन्फर्मेशन कल राजीव दा से मुलाक़ात में मालूम चलेगी फिलहाल वो उसके बारे में और कुछ नही कहे माँ ने इसी बीच बताया कि राज़ौल की पत्नी का नाम शमा था और वो उसकी अपनी सग़ी मौसेरी बहन लगती थी लेकिन उसे ये जानकारी दी है कि नही या उसे मालूम चल गया था ये माँ को भी नही पता था...मैने बस इतना सोचा कि व्यभाचार रिश्ते एक के बाद एक मेरे कितने सामने खुल रहे है

अगले दिन राजीव दा के फ्लॅट पहुचा शाम को...घर में ज्योति भाभी थी जो हमारे लिए चाइ बनाने चली गयी...राजीव दा और मैं लिविंग रूम में ही बैठके बातें करने लगे...

राजीव : वाक़ई आदम तुमसे और आंटी से मिलने के बाद ऐसा लगता है कि अपनो से मिल रहा हूँ ज्योति भी यही दिल ही दिल में समझती है

आदम : अर्रे राजीव दा अब गैरो जैसा हमारे बीच क्या है? ये तो मेरी ख़ुशनसीबी है कि मेरी दोस्ती आपसे हुई

राजीव : मुझे भी ये लो चाइ (ज्योति भाभी ने चाइ की दो कप रखते हुए वापिस किचन में बर्तन मान्झ्ने चली गयी इस बीच हम मर्द आपस में बात चीत करने लगे)

आदम : ह्म वैसे राजीव दा राज़ौल की तरफ से कोई खबर (मैने गंभीरता से चाइ की चुस्की लेते हुए कहा)

 
राजीव : ह्म काफ़ी हाथ पाँव चलाए उसने भी....कह रहा था कि वो अपने रिश्तेदारो से बात करना चाहता है लेकिन फिर ज़्यादा ख़ौफ्फ दिलाने पे वो चुप हो गया क्यूंकी कसूर उसका ही तो था अगर कल को उसके रिश्तेदारो को ये मालूम चलता कि वो एक अन्य ज़िले मे आके किसी घरेलू औरत को परेशान कर रहा है तो यक़ीनन उसके बोल नही फूटते है उल्टे उसके ही रिश्तेदार उसे कोसते...खैर फिर भी उसकी बीवी से उसकी बात कराई पूछताछ पे मालूम चला कि उसका नाम शमा था

आदम : फिर?

राजीव : फिर कल शाम को ही वो अपने क्वॉर्टर से बच्चो के साथ आई थी उसने अपने हज़्बेंड के लिए भीक माँगी कि उसे छोड़ दे..बाद में उसकी ज़मानत भी करनी चाही पर ज़मानत खारिज कर दी गयी क्यूंकी आजकल औरतो के साथ हो रहे अत्याचार से क़ानून बहुत सख़्त हो गये है (मैने सहमति में सर हिलाया) हालाँकि अब उसने ऐसा कोई प्राणघातक काम तो किया नही था इसलिए उसे कम से कम 6 महीने या 1 साल की जैल तो होके रहेगी...उसकी सिफारिश की रेलवे पोस्टिंग भी उससे छीन ली जा चुकी है जैसे ही रेलवे वालो को मालूम चला बुरा तो लगा दो बच्चो का बाप था और देखो क्या कर बैठा? ऐसे छिछोरो का यही नतीजा होता है

आदम : ह्म

राजीव : अब तुम्हें टेन्षन लेने की कोई ज़रूरत नही है अगर वो जैल से रिहा भी हो जाएगा तो उसे सख़्त हिदायत मिलेगी की वो फिरसे कोई ऐसा गुनाह ना करे वरना इस बार सज़ा बेहद सख़्त होगी और शायद इस बार उसे जैल में लंबा जाना पड़ जाए

आदम : ह्म बिल्कुल ठीक हुआ उसके साथ जिस तरीके से उसने मेरी माँ का फ़ायदा उठाना चाहा कसम से राजीव दा मेरे तो!

राजीव : रिलॅक्स रिलॅक्स आदम अब फिकर की कोई बात नही है सो जस्ट चिल यार...खैर अब ये सब टॉपिक छोड़ो और ये बताओ कि अब कब शिफ्ट हो रहे हो?

आदम : बस आपकी दुआ से बहुत जल्द ही मैने पॅकर्स आंड मोवेर्स वालो से बात कर ली है वो लोग कुछ दिन में ही सामान यहाँ धीरे धीरे शिफ्ट करना शुरू कर देंगे

राजीव : दट'स ग्रेट खैर अब आदम एक बात कहूँ तुमसे?

आदम : हां कहिए ना

राजीव : यार तुम कुछ दिन के लिए कहीं घुमाने माँ को ले जाओ

आदम : घूमने? हाहाहा पर कहाँ?

राजीव : अबे यार इस छोटे से टाउन में कहाँ घुमोगे? मेरी मानो तो आउट ऑफ स्टेशन या कोई अच्छी जगह कुछ दिन काटो यार

आदम : भैया नौकरी की प्राब्लम है ना? और राज़ौल के चक्कर में मालिक ने भी काफ़ी पूछताछ की

राजीव : ओह हो ज़्यादा प्राब्लम अगर है तो मैं तुम्हारे हेड से बात करता हूँ एक पोलिसेवाले के ब्यान पे वो शायद तुम्हारी बात पे यकीन कर ले

आदम : वो समझ गये है वैसे भी मैं एक शरीफ लड़का हूँ भला उन्हें मुझपे क्या शक़ हाथा पाई करना कोई जुर्म नही होता?

राजीव : हाथा पाई अर्रे तुम तो उसका कल्याण ही कर देते अगर मैं ना आता

आदम : हाहाहा (राजीव और मैं दोनो ही ठहाका लगा कर हँसने लगे राजीव दा ने चाइ ख़तम करते हुए फिर धीमे से कहना शुरू किया)

राजीव : ज़ोर से कहूँगा तो तेरी ज्योति भाभी सुन लेंगी (उन्होने इशारे से मुझे अपनी कान मेरे पास लाने को कहा हम दोनो एकदम नज़दीक आगे धीरे धीरे बातें करने लगे)

राजीव : अगर तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड या बीवी होती तो मैं तुम्हें सन टेंपल जाने को कहता है जो पूरी के पास उड़ीसा स्टेट में पड़ता है

आदम : हां हां वो जगह वाक़ई वो जगह तो ज़्यादातर शादी शुदा लोग ही जाते है वहाँ पे काफ़ी प्राचीन मूर्तिया है जो कि काफ़ी नंगी होती है और तो और वो सब प्रेम क्रीड़ा को दर्शाते है

राजीव : हां हां वहीं जगह काफ़ी मस्त जगह है ज़्यादातर वहाँ उन मूर्तियो को देखने ही लोग जाते है काफ़ी हिस्टॉरिकल जगह है दोस्त लेकिन तुम्हारी बदक़िस्मती कि तुम अकेले हो पर कभी अगर जाना पड़े तो अपनी किसी गर्लफ्रेंड को लेके जाना

आदम : बिल्कुल बिल्कुल राजीव दा खैर वैसे माँ को कहाँ ले जाउ एक काम करता हूँ न्यू दीघा ले चलता हूँ वहाँ का बीच भी देख लेंगी और थोड़ा हवा भी बदल जाएगी

राजीव : ह्म पर्फेक्ट आइडिया

आदम : वैसे आप कभी गये हो क्या?

राजीव : तेरी ज्योति भाभी के साथ गया था रे (बोलते बोलते राजीव दा का चेहरा लाल हो गया शरम से) बहुत मज़े किए थे हम दोनो ने अच्छा कभी जाएगा ना तो वहाँ पे काफ़ी नज़दीकी होटेल्स मिल जाएगा तुझे काफ़ी सस्ते भी पड़ते है तू जाना कभी क्सिी के साथ

आदम : बिल्कुल राजीव दा पक्का जाउन्गा (मैने और राजीव दा ने हाथ मिलाते हुए मुस्कुराया)

 
मैं वैसे माँ से ही पहले सुनता था कि ऐसा कोई पूरी के पास मंदिर पड़ता है जो कि सूर्य मंदिर कोनर्क कहलाता है ये उड़ीसा में स्थित है और ज़्यादातर यहाँ प्राचीन मूर्तिया जिन्हें प्राचीन काल में किसी राजा ने बनाया था उसे देखने जाते है ज़्यादातर शादी शुदा लोग ही वहाँ जाते है क्यूंकी वो मूर्तिया ऐसी अवस्था में होती है कि आपस में उनके सेक्स पोस्चर्स और प्रेम आलिंगन को प्रकट करती है वो मूर्तिया इतनी नगन और अडल्टरी होती है कि वहाँ पे सिर्फ़ मिचयोर्ड लोग ही जाते है...उड़ीसा के सन टेंपल कोनर्क को जाने के लिए मैं इक्चुक हो गया...

जानता भी था कि इस बीच माँ और मैं कही घूमने भी नही गये थे और उपर से इतना कुछ हादसा हो गया था....इसलिए माँ का मूड बेहद खराब था पर माँ को राज़ी करना ज़रूरी था...इधर राजीव दा को ये नही मालूम कि उन्होने मुझे माँ को ऐसी जगह ले जाने का आइडिया दे दिया था कि ऐसी जगहो में माँ के साथ और अपना वक़्त मौज मस्ती से काट सकता था....राजीव दा और भाभी से मिलके मैं घर लौटा...

माँ उस टाइम नाहके निकली ही थी मेरी उपस्थिति पाके माँ मुस्कुराइ मैने कहा कि आज इतना लेट तो माँ ने कहा कि वो घर के कुछ सामानो को सॉफ करने में जुटी हुई थी...वो मेरे सामने ही अलमारी खोल अपने तौलिए की गाँठ खोलते हुए उसे एक झटके में अपने बदन को पोंछते हुए उपर लगी रस्सियो पे टाँग देती है....माँ एकदम नंगी थी और मेरी नज़र उसकी नंगी पीठ से होते हुए उसके गोल गोल नितंबो में थी और साइड से दिखती उसकी चुचियाँ जिन्हें बस मैं एकटक देखें जा रहा था....इस बीच माँ मेरी ओर पलटते हुए अपनी ब्रा पहनने लगी....मैं इस बीच माँ से उड़ीसा में छुट्टी बिताने की बात कहने लगा..तो माँ आश्चर्य भाव से मेरी ओर पीठ करते हुए अपने ब्रा का हुक लगाने लगी

अंजुम : क्या कह रहा है तू? अभी और मुझे लेके घूमने

आदम : अर्रे मेरी जान यही तो ज़िंदगी है नौकरी हो गयी घर भी हो गया अब कुछ दिन तो घूमने चलना बनता है ना (मैं माँ के पास आया और खुद ही उसकी ब्रा का हुक लगाने लगा)

अंजुम : नही नही आदम अभी तो हम शिफ्ट भी नही हुए और इतना खर्चा नही नही

आदम : अर्रे माँ क्या बुराई है जाने में? अब हमारे बीच और रह ही क्या गया है? क्या तू नही चाहती कि कही घूमने चलें

अंजुम : अर्रे बाबा वो सब तो ठीक है पर इतनी जल्दी (माँ मेरे सामने ही झुकते हुए अपनी पैंटी अपनी टाँगों में फन्साते हुए उसे उपर उठाते हुए अपनी चिकनी चूत और गान्ड की दरार पे चढ़ा लेती है)

आदम : देख माँ कोई जल्दबाज़ी नही हो रही....कुछ दिन अगर यहाँ से निकलेंगे तो हर्ज़ क्या है? तू लोन की पेमेंट की फिकर ना कर मेरे पास है मैं चुका लूँगा कोई ज़्यादा मेहनत नही करनी होगी मुझे वैसे भी पहले से मैने ऑलरेडी काफ़ी पैसा फिक्स भी कर दिया है कम्यूनिटी में भी डाल दिया

अंजुम : देख मैं सिर्फ़ इतना चाहती हूँ कि तू ज़्यादा खर्चा ना करे और तू मुझे पूरी के पास उड़ीसा की मंदिर ले जाना चाहता है तुझे पता भी है वहाँ ज़्यादातर कौन जाते है? मैने सिर्फ़ सुना है देखा नही मेरी एक सहेली की जब नयी नयी शादी हुई तो वो गयी थी बोली थी काफ़ी सेक्सी जगह है और तू मुझे अपनी माँ को वहाँ ले जाना चाहता है छी

आदम : अर्रे किसको पता चलेगा कि तुम मेरी कौन हो? मैं तो चाहता ही हूँ कि आप मेरी धरमपत्नी ही बनके जाओ

अंजुम ने हल्की सी चपत बेटे को लगाते हुए पास रखी सलवार और जंपर को मुस्कुराते पहनना शुरू कर दिया..."ठीक है लेकिन मुझे थोड़ा सोचने दे और सुन ज़िद्द मत करना ठीक है"..........माँ के फ़ैसले से मैं थोड़ा उदास हो गया क्यूंकी मेरा जाने का बहुत मन था वहाँ...

आदम : देख अंजुम (इस बार मैने उसके दोनो कंधे पे हाथ रखते हुए उसे अपनी तरफ मोड़ ते हुए कहा)

आदम : एक बार प्लीज़ मेरे खातिर चल तो सही तू अगर चाहे तो मैं उसके बाद और भी जगह तुझे लेके जाउन्गा प्रॉमिस

अंजुम : अच्छा बाबा अच्छा पर कम से कम मुझे सोचने का थोड़ा अवसर तो दे अभी तू यहाँ मुझे लाया एक साल भी नही हुआ अभी तूने मेरे लिए फ्लॅट भी ले लिया और अब घूमने की बात कर रहा है छि .. मुझे तो शरम आ रही है तू जहाँ जाने का ज़िक्र भी कर रहा है

 
आदम : ठीक है दिया तू हर वक़्त ऐसी ही शरमाती रहना जा मैं तुझसे बात नही करता जा

आदम बिना कुछ कहे बाहर निकल गया.."अर्रे सुन तो अर्रे बेटा सुन तो सही उफ्फ काफ़ी ज़िद्दी है ये लड़का भी ना ...माँ मन ही मन जैसे हंस पड़ी उसकी हरकते देखकर

सच ही तो था कि पति ने कभी उसे टाइम नही दिया ना उसे कही लेके गया एक अच्छा कपड़ा भी उसे नही दिलाया एक मार्केट घूमने भी जाने को कहती तो झल्ला जाता उस पर उस जैसा बद्शौकीन तो उसका बेटा नही था वो बेचारा तो ज़िंदगी की उसे सारी खुशिया दे रहा था...और बेटा उदास हो गया था जो अंजुम बर्दाश्त नही कर सकती थी फिर उसे याद आई सहेली बात फिर उसे अहसास हुआ कि उसका बेटा उसके साथ किस कदर और करीब आना चाह रहा था उसकी हसरत दिन पे दिन उसके प्रति कितनी बढ़ती जा रही थी ये सोचते ही माँ का चेहरा शरम से लाल हो गया और एका एक उसके चेहरे पे मुस्कुराहट आ गयी....उसने सोचा थोड़ी देर बेटे को तरसाए थोड़ा तडपाए फिर उसे कहेगी अपना फ़ैसला क्यूंकी वो अपने बेटे के साथ वहाँ अगर जाएगी भी तो लोग क्या सोचेंगे? या तो उसे अपना परिचय बीवी का देना होगा क्यूंकी कोई फॅमिली वाकेशन वाली साइड तो थी नही जहाँ ले जाना चाह रहा था जहाँ सिर्फ़ अडल्ट्स और कपल को जाने की अनुमति थी...अंजुम टहलते हुए काफ़ी देर सोचती रही....फिर रात का खाना बनाने किचन में चली आई..

आदम ब्रिड्ज के पास खड़ा नदी की लहरो को देख रहा था इतने में उसका फोन बज उठा....तो उसने पाया नंबर माँ का था....उसने जैसे ही फोन कान में लगाया और हेलो कहा तो उधर माँ ने शरम और नज़ाकत से मुस्कुराते हुए कहा कि वो जाने को राज़ी है......आदम जैसे झूम उठा...वो कितनी बार चिल्लाते हुए माँ को लव यू लव यू कह रहा था आस पास के लोग सुनके हंस रहे थे...जब उसे अहसास हुआ तो झिझकते हुए शरमाते हुए नज़रें चुराए जल्दी से बाइक पे बैठा और घर लौटा...वो घर आके माँ से गले लग गया..

अंजुम : अर्रे खाना तो कम से कम बनाने दे बेटा

आदम : नही माँ आज मैं तुझसे जी भरके प्यार करूँगा

अंजुम : वो तो तू रोज़ ही करता है रात को

आदम : फिर भी माँ आज मैं बहुत खुश हूँ

अंजुम को अपनी तरफ मोडते हुए आदम ने उसके गाल को चूमा तो माँ ने उसे शांत होने को कहा..."शांत शांत पर मेरी कुछ बात मानी होगी".........

"हां बोल तो सही"......

."पहली बात अपने राजीव को ये बात ना कहना और ना उनकी बीवी से उन्हें पता नही चलना चाहिए कि तू मुझे अपनी माँ को लेके जा रहा है"........

"ठीक है मंज़ूर".........

"दूसरा यह कि वहाँ तू मुझे क्या पहचान देगा लोगो को अगर किसी ने पूछा मान ले"......

."अर्रे किसी को क्या फरक़ पड़ता है? चल कह दूँगा कि तू मेरी वाइफ है"........

."वाहह लोग तो यही कहेंगे कि माँ की उमर की है और अपने से जवान लड़के के साथ घूम रही है".........

."अबे यार तुम्हारा दिमाग़ भी ना मैं यही कहूँगा कि तू मेरी वाइफ है कोई क्या कहेगा इससे मुझे फरक़ नही पड़ता".......

."पर".......

."तेरी बहुत पर वर सुन ली क्या माँ क्या तू नही चाहती की ऐसा हो .....

."बेटा मैं तुझे बेपनाह चाहती हूँ पर तू बीवी कहेगा थोड़ा अज़ीब लगेगा ......

."ठीक है फिर जाना कॅन्सल"......

."नही नही अच्छा बाबा चल तू जीता मैं हारी".........

आदम ने माँ को अपने गिरफ़्त में खींचते हुए उसकी ज़ुल्फो को प्यार से सहलाया

आदम : माँ सच कहता हूँ तूने मुझे ज़िंदगी की वो खुशियाँ दी है जो आजतक मुझे किसी से नही मिली (आदम ने सोचा अपने पिछले नाजायज़ रिश्तो के बारे में जिससे सिर्फ़ उसे दुख ही मिला था फिर उसने माँ की तरफ अपना पास्ट भूलते हुए देखा और मुस्कुराया) और सच में तेरे साथ एक एक वक़्त गुज़ारना मेरे जीवन का जैसे अरमान बन गया है

अंजुम : हट पागल और कितना अपनी माँ को झाड़ के पैड पे चढ़ाएगा

आदम और माँ दोनो हंसते हुए एकदुसरे के गले लग गये माँ को अपने सीने से कस कर बेटे ने लिपटा लिया...माँ ने भी बेटे की पीठ पे अपने हाथ मज़बूती से पकड़ करते हुए उसे थाम लिया जैसे...दोनो कुछ देर तक वैसे ही लिपटे रहे...

बेसवर आदम से सवर् भी नही हो सका और वो सुबह सुबह ही अगले दिन रेलवे काउंटर की लाइन में लग कर उड़ीसा के लिए दो टिकेट्स ले लेता है....घर आके वो माँ को ये खुशख़बरी बताता है माँ भी सोच रही थी कि जब उसकी नींद टूटी तो बिस्तर पे उसका बेटा उसे क्यूँ नही मिला? वो तो आदम को हँसी खुश देख काफ़ी खुश हो रही थी ऐसा लग रहा था जैसे उसकी खोई हुई मुस्कान उसके चेहरे पे वापिस आ गयी हो....

इस बीच आदम ने नये फ्लॅट में शिफ्टिंग कर ली..क़ुरान खानी भी कराई और फिर दावत पे राजीव दा और उनकी पत्नी को भी आमंत्रित किया आदम ने...पड़ोसी नही बल्कि अपने हो कुछ ऐसा ही माहौल बना था उस वक़्त....भाभी तो माँ से जैसे जुड़ गयी थी और मैं और राजीव दा तो जैसे गप्पे लड़ाने में ही व्यस्त थे...खैर राजीव दा को इतना बताया कि माँ को लेके दीघा जा रहा हूँ घुमाने कुछ दिन के लिए थोड़ा उनका मूड अच्छा हो जाएगा तो उन्हें जानके खुशी हुई..

12 तारीख आते आते हम चलने की तय्यारी कर चुके थे माँ ने सारा समान पॅक कर लिया था जाने के लिए मैने कहा लगेज थोड़ा कम लेके ही चलेंगे माँ ने सहमति में इशारा करते हुए हामी भरी ....12 तारीख के दिन हम उड़ीसा के लिए ट्रेन से रवाना दे चुके थे ट्रेन सूपरफास्ट थी और ट्रेन में माँ के साथ सफ़र बड़ी अच्छी कट रहा था....और करीब डेढ़ दिन बाद ही हम उड़ीसा पहुच गये अपने लंबे सफ़र को काटते हुए....

ट्रेन से उतरते हुए मैं और माँ अपना लगेज लिए स्टेशन से बाहर आए..इस बीच राजीव दा ने जो होटेल का ज़िक्र किया था वहाँ मैने ऑनलाइन ही बुकिंग करवा ली थी ...सो इसलिए मुझे किसी गाइड या ऑटो वाले की मदद लेनी नही पड़ी....हालाँकि काफ़ी लोग हमारा रास्ता चैक रहे थे पर मैने मना कर दिया....उड़ीसा के पूरी स्टेशन से बाहर आते हुए माँ को लेके मैने सीधे एक टॅक्सी को हाइयर किया...

उसने तुरंत बताए हमारे 4 स्टार होटेल की तरफ रवानगी दी....माँ पूरे रास्ते इधर उधर के जगहो और लोगो को देख रही थी जल्द ही पूरी सी बीच के सामने से गुज़रते हुए जल्द ही होटेल के सामने आके रुकी...."चल माँ आ गये".....माँ को एकदम से बताते हुए मैने अपना एक हॅंडबॅग साथ में लिया और गाड़ी से बाहर निकलते हुए झटपट माँ की तरफ का दरवाजा खोला जिससे माँ गाड़ी से बाहर आई वो होटेल उसे काफ़ी महँगा लग रहा था....वो बस एकदम हैरत से देख रही थी...

अंजुम : वाह बेटा ये तो महँगा होटेल लगता है वो भी समुन्द्र के पास है

आदम : अर्रे मेरी जान तू फिर पैसो की बात लेके बैठ गयी आस पास का नज़ारा देख कितना दिलकश है सामने मेन रोड और पीछे बीच है ना लाजवाब

अंजुम : बेटा तुझे इतना खर्चा करने की क्या ज़रूरत थी?

आदम : अब यहीं सारी कसर निकाल लो क्या ज़रूरत और क्या नही थी? प्ल्स डॉन'ट से नो...फिलहाल हम यहाँ छुट्टी बिताने आए है मूड फ्रेश करने आए है और वहीं हम करेंगे (माँ के कंधे पे हाथ रखते हुए माँ मुस्कुरा कर मेरे कंधे पे सर मारे हल्के से हंस पड़ी)

 
हम दोनो होटेल में दाखिल हुए तो रिसेप्षनिस्ट के साथ मॅनेजर को मौज़ूद पाया..मैने अपना परिचय दिया और अपनी बुकिंग डीटेल्स दी माँ इसलिए शरमा गयी क्यूंकी मैने कुछ ऐसा वहाँ मेन्षन किया था "उम्म्म आइ हॅव बिन बुक्ड फॉर आ सिंगल रूम इन दा नेम ऑफ मिस्टर आंड मिसेज़ शैख़ .

"ओह या सर ये लीजिए आपकी चाबी".........

"थॅंक यू"....मैने चाबी ली तो एक लड़का आके मॅनेजर के ऑर्डर अनुसार मेरा सामान कमरे तक ले जाने लगा....

माँ इस बीच चुपचाप थी....हम लड़के के पीछे पीछे जाने लगे...."सर आप लोगो का रूम नंबर 205 है जो कि चौथे मामले पे है इसलिए प्लीज़ मॅम दिस साइड".......माँ की तरफ देखते हुए उसने बड़े लहज़े में इशारा करते हुए कहा....क्यूंकी माँ आगे बढ़ रही थी उल्टे साइड जा रही थी....हम लिफ्ट में दाखिल हुए....फिर मैं उस लड़के से होटेल के बारे में पूछताछ करने लगा...

रूम बॉय ने खुद ही मुझसे चाबी ली और दरवाजा खोलते हुए हमारा वेलकम किया...हम अंदर आए और रूम देखने लगे जहाँ किंग साइज़ डबल बेड थी वेल-फर्निश्ड पूरा रूम था सामने एक बड़ी सी बाल्कनी थी जिसका शीशे का स्लाइडिंग डोर था...रूम बॉय ने जाके स्लाइडिंग डोर को खोला और समुन्द्र की तेज़ हवा कमरे के अंदर आने लगी....मैं अपना सामान पलंग के पास रखे बाहर बाल्कनी का जायेज़ा लेने लगा..."अंजुम इधर आओ देखो कितना शानदार व्यू दिखता है यहाँ से".......माँ मेरे ऐसे कहने से शरमा गयी...उसने मेरी तरफ देखा थोड़ा गुस्से में कि ये क्या हरकत थी? पर मैने तो ऑलरेडी उसे अपनी वाइफ बताके ही रूम लिया था इसलिए वो चुपचाप मेरे पास आई...वो भी चारो तरफ की तेज़ हवा को महसूस करते हुए सामने के बीच को देखने लगी....बीच की लहरो का शोर सुनाई दे रहा था...

रूम बॉय : सर जो भी कपल्स यहाँ आए है वो यह रूम अक्सर लेते है पूछके... मोस्ट्ली ऐसी बाल्कनी रूम्स की डिमॅंड करते है ताकि बीच का व्यू सॉफ दिखे

आदम : ह्म वाक़ई भला ऐसे खूबसूरत नज़ारे को देखने के लिए ही तो लोग यहाँ आते होंगे इस होटेल में

रूम बॉय : यू'रे राइट सर वेल,आप और मॅम को अगर कोई भी चीज़ की ज़रूरत परे तो इंटरकम कर दीजिएगा चलता हूँ

मैने जाते जाते रूम बॉय को कुछ टिप दे दी जिससे वो खुश हो गया...वो वहाँ से चला गया...मैने देखा कि माँ कमरा देखते हुए टाय्लेट चली गयी फिर मुझे आवाज़ दी...मैं वहाँ आया तो उनका मुँह बना हुआ था..."बेटा ये इंग्लीश टाय्लेट है"........

"अर्रे माँ यहाँ संडास करने के लिए कौन सा देसी टाय्लेट लगा हो अच्छे लोग आते है अर्रे यार थोड़ा अड्जस्ट कर लो ना काम तो एक ही तो करना है ........माँ मेरी शरारत भरे लहज़े को सुन लजा गई

"अच्छा तू जा मैं थोड़ा फ्रेश हो लूँ".....मैं माँ का वाक़्य समझा तो उसे कहा कि दरवाजा लॉक ना करे....तो माँ ने मुझे पीठ पे एक कस कर थप्पड़ मारते हुए मुस्कुराहट दी

मैं हंसते हुए कमरे में आया....प्सससस माँ शायद मूत रही थी इसलिए उसकी आवाज़ सुनके मेरे रोम रोम जैसे काँप उठे....मैं क्या इस कंफर्टबल रूम का आनंद लेता मेरे दिमाग़ में तो बस माँ ही घूम रही थी...मैं आहिस्ते आहिस्ते दबे पाँव टाय्लेट के रूम में गया और झट से दरवाजा खोला इससे माँ हड़बड़ाई जो टाय्लेट सीट पे बैठी हुई थी और उसके सूट का पाजामा उसके घुटनो के नीचे पाँव के बीच फसा हुआ था....मैने सॉफ देखा कि उसकी चिकनी चूत से पेशाब की मोटी धार बह रही थी...माँ मुझे देखके लजा गई और लगभग चिल्लाई

अंजुम : अर्रे पागल ये क्या हरकत है? शरम नही आती माँ को पेशाब करते हुए देख रहा है

आदम : हाहाहा करती रहो माँ रोको मत (माँ ने शायद हड़बड़ी में अपने गुप्त द्वार को रोक लिया था इसलिए पेशाब की धार निकलनी बंद हो गई थी)

अंजुम : पर ऐसे हो नही पाएगा

आदम : अर्रे कर तो ना थोड़ा ज़ोर लगा चल मैं ही तेरे सामने मुतता हूँ

इतना कहते हुए मैं माँ के सामने ही अपने कपड़े उतारते हुए सिर्फ़ एक जॉकी कच्छा में आ गया...उसे भी खिसकाते हुए मैने पाँव से आज़ाद कर दिया....फिर माँ के सामने ही अपना झूलता मोटा सा लंड हाथ से हिलाते हुए उसे दिखाने लगा....माँ यह दृश्य देखके अपना थूक घोंट रही थी बड़ी बड़ी आँखो से मेरे लंड को घूर्र रही थी....ज्यो ही उसने धीरे धीरे शांत होना शुरू किया उसकी पावरोटी जैसी गुलाबी चूत की छेद से पेशाब की मोटी धार छूटने लगी.....गॅड गॅड करते हुए टाय्लेट सीट में माँ की पेशाब के गिरने की आवाज़ सॉफ सुनाई दे रही थी ऐसा लग रहा था जैसे की बाल्टी में खुले नल का पानी गिर रहा हो

 
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