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Incest माँ को पाने की हसरत

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वो पसीने पसीने एकदम दहशत से भी डरा हुआ था कि कब कोई सामने प्रकट ना हो जाए या फिर कोई जंगली जानवर उस पर और उसकी माँ पे हमला ना कर दे उनकी उपस्थिति का किसी को खबर ना लग जाए की वो लोग जंगल में छुपे हुए है...काफ़ी 1 एक आध घंटे बाद जब

माँ ने उससे कहा की जल्दी जल्दी हाथ चला बेटा वक़्त कम है तब तक वो मज़बूती से परख के लिए पहले से तय्यार की दो बाँस की जुड़ी बँधी लकड़ी को पानी में फैक देता है जिससे वो डूबती नही बल्कि तैरने लगती है....

अर्जुन का हौसला बढ़ जाता है...फिर वो माँ को उस तख्ते जैसे बनी बाँस की लड़की की नाव पे बैठने को कहता है...इतने में उसे कुछ आवाज़ सुनाई देती है..वो पीछे बिना मुड़े ज़ोरो से नाव को घँसीटते हुए ढल्लां से उतारते हुए सीधा पानी में उतार देता है जिससे बाँस की

लकड़ी का बना नाव तैर पड़ता है गनीमत थी कि उसे नाकामी नही हासिल हुई बल्कि माँ के वजन को उस नाव ने झेल लिया था और वो ना डूबा....

तब तक अरुणा को दिखा कि मशाल की आग जहाँ वो साँस लिए ठहरे थे वहाँ तक पहुच चुकी है...उनमें किसी ने चिल्लाते हुए कहा "आई

कौन है उधर?"......"वो माँ-बेटे भाग रहे है पकडो उन्हें बचके ना जा पाए"......

.अरुणा चिल्ला उठी उसने किनारे पे खड़े बेटे को पुकारा

अरुणा : अर्जुन कूद अर्जुन (धीरे धीरे नाव पानी पे बहती हुई जैसे किनारे से दूर होती जा रही थी और अरुणा का दिल धक धक करने लगा उसका बेटा अब भी किनारे पे ही मज़ूद था)

अर्जुन जानता था अगर उन्हें मार ना दिया गया तो वो लोग भागके गान वालो को उनके नहेर से भागने का राज फ़ाश कर देंगे....अर्जुन के पास उस वक़्त कम था....वो बिना पलके झपकाए अपनी तरफ आते उस हमले से ठीक सर झुकाए बाल बाल बचा...लाठी की आवाज़ जैसे हवा में

घूमी हमला नाकाम रहा...अर्जुन ने अपने छुरे को एक ही बार में उसकी गर्दन के आर पार कर दिया....खाकच्छ आअहह......वो जो भी था

वहीं गिरके दम तोड़ चुका था.....अर्जुन पे जैसे ही उन्होने हावी होना शुरू कर दिया....अर्जुन पानी में कूद पड़ा...

अरुणा की नाव जैसे बेटे से दूर होती जा रही थी...वो तैरना जानती नही थी उपर से उसका बेटा भी बहती नहर के साथ बहने लगा....उसने मज़बूती से नाव की सिरे को पकड़ा माँ हाथ जैसे आगे बढ़ती तो तो पीछे से उसके बेटे पे किसी ने आहट भरा हमला किया....अर्जुन की

पकड़ इससे ढीली हुई और उसने तुरंत अपने दूसरे हाथ के छुरे को उसके चेहरे पे जैसे घोपप दिया...अरुणा ने नज़रें फेर ली अर्जुन ने उसके चेहरे से छुरे को बाहर जैसे ही खीचा उस आदमी की लाश पानी में लाहुलुहान बहती हुई आगे चली गयी....

 
अर्जुन न्‍ने कस कर नाव को पकड़ा और उस पर चढ़ गया....उसने देखा उसका पीछा जैसे अब भी हो रहा था....वो लोग कूदने की फिराक़ से नाव पे एक एक कदम नहेर के दोनो तरफ दौड़ते हुए कोशिशो पे कोशिश किए जा रहे थे एक ने किया तो सीधे बहते पानी के चोट खाए

उसका सर पत्थरो से जा टकराया और वहीं उसकी मौत हो गयी....इससे ख़ौफ्फ खाए गाँव के लोग कुछ कर ना सके...जो देख रहे थे वो

धीरे धीरे वहीं ठहरे दोनो को नाव पे बहते पानी के साथ दूर अपने से होते हुए देख रहे थे...

कुछ ही देर में अर्जुन की जैसे जान में जान आई...

."उफ्फ बेटा तू ठीक तो है ना"......

"हां माँ अब वो लोग हमारा पीछा ना कर पाएँगे".......

.."अफ मैने आज तुझे तो जैसे खो ही डाला था".......

"माँ जब तू मेरे साथ है तू मुझे कुछ नही हो सकता बस अब कैसे भी करके कोई रात ढल जाए और हम सुरक्षित किसी स्थान पे पहुच जाए

अरुणा बेटे के सीने पे सर रखके रोए जा रही थी....उनका सबकुछ जैसे छिन चुका था उनकी किस्मत उनका घर उनका चैन सबकुछ जैसे एक झटके में तबाह हो गया था....लेकिन अर्जुन उस कड़े वक़्त पर भी जैसे माँ को अपने पास पाए खुश था

दोनो की आँखे लग गयी और वो दोनो बाँस की लकड़ी की नाव पे ही सो गये....नाव धीरे धीरे बहते पानी पर तैरती हुई हिचकोले खाती सी हुई बढ़ते बहाव से आगे बढ़ती जा रही थी....अर्जुन को नाव के अचानक से हिलने पे नींद खुल गयी....उसने एक बार बाँस की नाव का जायेज़ा लिया....उसे महसूस हुआ की शाखाए जिससे उसने लकड़िया बाँधी थी वो पानी के बहाव जैसे टूट रही थी....

"ओह्ह नही ये खुल ना जाए"......अर्जुन ने किसी तरह उन्हें बाँधते हुए दिल ही दिल खुदा से दुआ किया

लेकिन जो किस्मत में लिखा हो उसको कौन बदल सकता है?...लहरे तेज़ होने लगी बहाव पानी का तेज़ हो गया तो अब नाव जैसे उठते गिरते पानी के उपर से नीचे होते हुए जैसे दोनो को डुबाने लगी..अरुणा नींद में थी उसकी आँख खुली और वो बेटे से जा लिपटी....अरुणा का हाथ कस कर अर्जुन ने थामा हुआ था...

 
"माँ बहाव तेज़ हो गया एक तो अंधेरा समझ नही आ रहा ये नाव किस दिशा की ओर जा रहा है".......

."हे भगवान अब तू ही हमारी रक्षा कर".......ख़ौफ़ जैसे दोनो के दिलो में सिमटा हुआ था मन ही मन सिर्फ़ भगवान से प्राथना के अलावा कोई चारा नही था दोनो के पास...

अचानक एक पत्थर से बाँस का नाव टकराके लगभग टूटने के कगार पे हो गया अरुणा चीखते हुए बेटे के जिस्म पे जैसे गिर पड़ी...अर्जुन ने जैसे तैसे बाँस के सिरो को पकड़ रखा था....उसने पूरी कोशिश की लेकिन बहाव इतना तेज़ हो गया कि अब उमीद छूटती नज़र आ रही

थी...अब दोनो माँ बेटे पानी की चोट से एकदुसरे से कुछ फ़ासले दूर जा गिर पड़े....वो दोनो जैसे एकदुसरे के नज़दीक आ ही रहे थे

कि चरमामते हुए बाँस की लकड़ी की बँधी शाखाए टूट गयी और बाँस की लकड़िया नदी में जैसे बिखर गयी..जिससे दोनो माँ-बेटे बाँस की लड़की के उपर महेज़ सिर्फ़ कमर तक चढ़े हुए थे....और उनका आधा बदन नदी के पानी में डूब रहा था....उठने का जैसे अर्जुन को मौका ना मिल पा रहा था....

"अर्रज़ुनन्ञन् आहह बचाअ बेटा मुझीई आहह".....अरुणा का हाथ बार बार फिसलता जा रहा था....वो फिसलते फिसलते बार किसी तरह बाँस

को थामें हुए बहते पानी में आगे बढ़ती जा रही थी

"मामा मामाआआअ"...अर्जुन ने पूरी ताक़त लगा ली लेकिन बाँस पे चढ़ते ही वो जैसे फिसल के पानी में डूब जाता....पानी का बहाव बेहद तेज़ था...अर्जुन न्‍ने पूरी कोशिश से उठते हुए जब सामने की ओर देखा तो उसकी माँ जिस बाँस की लकड़ियो पे सवार थी अब वहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ बाँस की लकड़िया ही तैरती हुई डूब रही थी....

अर्जुन इससे हताश चिल्ला उठा "मामाआआआ"......उसने चारो तरफ निगाह दौड़ाई पर पानी के बहते शोर में उसे कुछ सुनाई नही दे रहा था...अचानक उसने दूर अपनी माँ को डूबते और निकलते हुए चीखते चिल्लाते हुए देखा...वो अपना हाथ पानी से निकालके जैसे छटपटाते हुए अर्जुन को पुकारने का इशारा कर रही थी...

अर्जुन ने फुरती से पानी में छलाँग लगा दी....वो तैरता हुआ उस तक पहुच ना पाया....क्यूंकी एकदम से बहते पानी मे किसी पत्थर से उसके सर को चोट लगी और वो लाहुलुहान हो गया...वो उस ज़ख़्म की हालत में भी जैसे चारो तरफ अपनी दूर दूर तक निगाह दौड़ाए जा रहा था...

पानी में जैसे उसका जिस्म डूब रहा था उठ रहा था....उसके माथे से खून बहें जा रहा था जो आँखो पे पड़ रहा था..जिसे वो अपनी पलको पे हाथ रख रखके बार हटाने की नाकाम कोशिश कर रहा था.."माँ माँ माँ"......उसके बाद जैसे उसे बहते पानी के शोर में माँ कही नही दिखाई दे रही थी....

 
अचानक उसने पाया कि एक हाथ पानी के बहाव में अरुणा का दिख रहा है जो पानी के बहाव के साथ साथ तैरती हुई आगे बढ़ रही है...उस हाथो में हल्की हल्की सी हरकत हो रही थी....अर्जुन पूरी ताक़त लगाए बहाव में ही जैसे डूबते तैरते हुए उस हाथ तक अपने हाथो को ले जाने की नाकाम कोशिशें कर रहा था इस बीच वो कई पत्थरो की चपेट में भी आया पर उसे अपनी चोटों की परवाह जैसे नही हो रही थी...

"माँ माँ तूमम सुन रही हो उम्म"........पानी के बहाव जैसे उसके चेहरे पे लग रहे थे....अरुणा ने कोई आवाज़ ना दी बस उसका शरीर तैरता

हुआ बहे जा रहा था...

जब तक उसने उन हाथो को थामा और ठीक उसके करीब खीचते हुए उसके शरीर को अपने पास लाना चाहा तो पाया कि अरुणा के बदन पे कयि चोटो के निशान थे....वो उस डूबती हालत में बहते बहाव के साथ माँ के शरीर के चेहरे को थपथपा रहा था....लेकिन अरुणा ने आँखे नही खोली...

अर्जुन : म्‍म्मा माँ माँ होश में आओ होस्सह में आओ म्मामा माँाआ (जवाब में अरुणा की कलाई को जब उसने थामा जो कुछ देर पहले पानी से बाहर निकली हुई थी तो वो बेजान हो चुकी थी)

अर्जुन को समझ आ चुका था कि उसकी माँ अब जीवित नही रही....वो एक क्षण को रो पड़ा और ठीक उसी पल पानी का तेज़ बहाव दोनो

को धकेल्ता हुआ झरने की चोटी पे ले आया...अर्जुन ने हड़बड़ाते हुए चोटी से सटे उस चट्टान को किसी तरह से पकड़ा और दूसरे हाथ को जैसे ही अरुणा की बेजान लाश को थामने के लिए बढ़ाया तो उसकी कलाई ही उसके हाथो में आ पाई...

अर्जुन पूरी ताक़त लगा रहा था उसकी माँ बहते पानी के साथ जारहने के चोटी पे जैसे लटक रही थी....अर्जुन एक ही हाथ से छोटी की पत्थर को कस कर जकड़े हुए था...उसके ज़ख़्म अब उसे दर्द दे रहे थे उसके हाथ जो चट्टान को मज़बूती से जकड़े हुए थे उसके छीलने से खून निकल रहा था..."आहह स"....वो और सहन ना कर पाया और उसने पलटके एक बार अपनी माँ की ओर देखा जिससे वचन लिया कि वो

ज़िंदगी भर उसे खुश रखेगा लेकिन आज वो अपना किया वादा जैसे पूरा ना कर सका....उसके हाथ कलाई को जैसे थामे हुए छूटने लगे थे...उसने पूरी ताक़त लगाई तो जैसे उसके शरीर के मांसो में खिंचाव होने लगी...

"माँ आहह स मुझे मांफ करना मैं ये वादा कभी पूरा ना कर सका....ना प्यार पाने के काबिल रह सका और ना ही अपने अधूरे सपनो को पूरा कर सका ससस्स जब तूने ही इस दुनिया को छोड़ दिया काश मुझे एक और अवसर मिल पाता काश मुझे और तुझे एक नया जनम मिल पाता काश हमारी मुहब्बत ऐसी अधूरी ना रह पाती काश अब तो मेरा अब ज़िंदगी में रहने का कोई फ़ायदा नही मेरी ग़लती के लिए मुझे

मांफ कर्र्ना"....एक बार जैसे अर्जुन मुस्कुराया उसने अपनी आँखे बंद कर ली....

पकड़ पत्थर से छूट गयी...हाथ कलाईयो को ही थामे रह गये....दो लाश जैसे गहरी खाई के झरनो से गिरते हुए कही डूब गये....

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जब आँखे खुली मेरी तो एक पल को जैसे काँप उठा मैं...अपनी सुर्ख गुलाबी आँखो को मलते हुए जैसे ऐसा लगा जैसे किसी दूसरी दुनिया से वापिस अपनी दुनिया में लौट आया....मुझे मेले का शोर बाहर से सुनाई दे रहा था...लोगो की आवा जाही गाड़ी की आवाज़ें गाने का शोर सब सुनाई दे रहा था....

मैं उस वक़्त खेमे में ही उस बाबा के सामने मज़ूद था मेरा हाथ उनके हाथो से कब अलग होके गिरा मुझे मालूम ही नही चला...मैने अपने पसीने को रुमाल से पोछते हुए अपने चेहरे का...एक बार बाबा की ओर देखा जो धीरे धीरे आँखो को खोलते हुए मेरी तरफ देख रहे थे....

बाबा : अब तो वाक़िफ़ हो गये हो ना

आदम : उफ्फ मेरा तो सर दर्द से फटा जा रहा है ऐसा लग रहा है किसी गहरी नींद में मैं चला गया था...पर ये कैसे मुमकिन हुआ ईज़ इट पासिबल? एक एक चीज़ एक एक वाक़्य जैसे मेरी सामने आखो के सामने जैसे गुज़रा हो मुझे अब भी याद है उफ्फ क्या ये सच भी हो सकता है? हालाकी वो अर्जुन मैं ही था वो मेरी माँ जैसी औरत अरुणा थी और वो लड़की वो हूबहू चंपा

बाबा : हाआँ बेटा यही तुम्हारी ज़िंदगी का सच है यही तुम्हारा वजूद है दो आत्माओ का जब मिलन अधूरा कहीं रह जाता है तो वो शक्सियत (उपर की तरफ इशारा किए) उसे फिर एकदुसरे से जोड़ देता है उसके लिए मौत ज़िंदगी जनम पिछला अगला कुछ नही वो हमे पैदा भी करता है और हमे मिटा भी देता है तुम जिसे सपना कह रहे हो जिस वाक़ये को सीन कह रहे हो वो तुम्हारी पिछली ज़िंदगी थी पिछला जनम था जिसके पन्नो को तुमने अपने आँखो देखी देखा कहो कि कहीं से मैने झूठ कहा हो

आदम ने सिर्फ़ इनकार में सर हिलाया...

आदम : एनीवे आपने मुझे जो कुछ भी दिखाया और बताया मैं उसका शुक्रगुज़ार हूँ वरना ज़िंदगी भर शायद खुद को कोस्ता रहता कि मैने ही गुनाहगारी का काम किया आइ नेवेर थॉट टू बी एन इंसेस्टीओस

बाबा : ये व्यभचारी रिश्ते तुम्हारे पिछले जनम से तुम्हारे साथ जुड़े हुए है....तुम्हारी माँ अंजुम तुम्हारे मरते वक़्त के उसी वादें का नतीजा है जिसने तुम्हें पैदा किया और फिर तुम्हें ही अपना वर चुना उसने ज़िंदगी के बहुत सितम उठाए और अब उसके दामन में जैसे तुम खुशिया ले आई इसलिए आज इस जनम में तुम इतने खुश हो अपनी माँ का साथ पाकर

आदम ने पूछा कि अब तो कोई और विपदा (मुसीबत) नही आएगी ना बीच में..जैसे राज़ौल माँ का पुराना आशिक़ आया और फिर निशा नाम की औरत उसके बेटे की ज़िंदगी यानी उसके ज़िंदगी में आई बीवी के रूप में...बाबा ने सिर्फ़ मुस्कुरा कर कहा कि अब कोई बंदिशे तुम्हें और तुम्हारी माँ को जुदा नही कर सकती

आदम ने उनके पैर जैसे छू लिए तो उन्होने उसे आशीर्वाद दिया...आदम अपनी जेब से दक्षिणा देना चाह रहा था पर बाबा जैसे क्रोधित हो गये....आदम ने कहा कि आपने मुझे इतना कुछ बताया मुझे देना फ़र्ज़ बनता है आप ने मुझे जैसे एक नयी राह दिखाई है वरना मैं गुमरहीयात में ही फँसा रह जाता तो उन्होने कहा उनका मुझे अहसास कराना मुझे सबकुछ ब्यान करना उस विधाता का लिखा था और वहीं मेरी किस्मत थी....उसी किस्मत का वो एक हिस्सा थे...जो उन्होने उसे ग्यात करवाया...

आदम मुस्कुरा कर उठने लगा तो बाबा ने आवाज़ दी वो रुका उसने मूड कर एक बार मुस्कुराते हुए बाबा की तरफ देखा...."चंपा का जो वादा तुमसे था वो उसी रूप में तुम्हारे सामने आई एक वेश्या का रूप उसकी पिछले जनमो के करमो की सज़ा थी जिस रूप में तुम उससे मिले...और उससे फिर दिल लगाया".....

मैं सिर्फ़ सूबक पड़ा

आदम : लेकिन काश इस जनम में भी हमारा साथ होता

बाबा सिर्फ़ मुस्कुराए और उन्होने मुझे कहा कि सब किस्मत का खेल है अब मैं जाउ और किसी से कभी भी अपना भविश्य ना जानू अगर मैं चाहू तो ये सब बातें माँ को बता सकता हूँ पर अपने इस जनम के व्याबचार रिश्तो की बात उन्हें ना मालूम चले आदम सिर्फ़ मुस्कुराया....और उन्हें नमस्कार करते हुए वहाँ से निकल गया....

 
उसने एक बार मन ही मन सोचा कि काश चंपा से वो आख़िरत में उसको मिल पता काश...लेकिन अचानक वो ठहरा बाबा की मुस्कुराहट और किस्मत की रीत ये बात उसे कुछ समझ ना आ सकी....

उसने माँ की पसंद की चूड़ियाँ खरीदी और खुशी खुशी मन से कुछ खाने की चीज़ लेता हुआ घर लौटा.....

उस रात मेले से जब मैं घर लौटा...तो मन ही मन माँ को अपने और उसके पिछले जनम की बातें बताने के लिए जैसे मैं बहुत बेचैन था...खैर घर में दाखिल होते ही पाया कि माँ काम में व्यस्त थी तो मेरी उपस्थिति पाके अपना काम छोड़ मेरे पास आई...

मैने मुस्कुराया माँ के हाथो में हरे रंग की चूड़िया दी तो उनका चेहरा खिलखिलाए खुशी से भर गया....उसने उन चूड़ियों को अपनी कलाईयों में पहनके एक बार गौर किया..."ये तो बहुत सुंदर है".......

.मैने कुछ नही कहा और मुस्कुरा कर कपड़े माँ के सामने ही उतारते हुए अपने घर के कपड़ों को पहनने लगा...

अंजुम : आदम मेरे पास पहले ही इतनी चूड़ियाँ है तू और क्यूँ इतना ले आ रहा है?

आदम : बस माँ दिल किया

अंजुम : मानती हूँ कि तू मेरा बड़ा दिल रखता है लेकिन तू ने मुझे इतनी खुशिया दी है कि अब इन सब चीज़ो से मेरा दिल उब चुका है

आदम : ऐसा?

अंजुम : हां बाबू ऐसा जब तू नही था तो तेरे पिता जी ने तो एक झुमका तक ना दिलाया मुझे बस बद्शोकीन इंसानो की तरह ज़िंदगी व्यतीत करते रहे....लड़ाई झगड़ा और एक दूसरे को कौसने के अलावा हमारी ज़िंदगी में था क्या?.....पर अब सबकुछ कितना बदल चुका है

आदम : हाँ माँ सबकुछ बहुत बदल चुका वैसे तुझे कुछ बताना चाहता था मैं...

अंजुम : अभी ठहरा ज़रा रात ज़्यादा ना हो जाए चल पहले भोजन कर लेते है

आदम : ठीक माँ

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रात करीब 11:30 बज चुका था और हम दोनो खाने से फारिग हो चुके थे...माँ पलंग पे बैठी थी और मैं ठीक उसके घुटनो से पीठ सटाके नीचे फर्श पे बैठा हुआ था...वो मेरे बालों में तेल डालते हुए बालों की मांलीश जैसे कर रही थी....

अंजुम : अब बता क्या कहना चाह रहा था तू?

आदम : माँ मैं कहना चाह रहा था कि तू यकीन नही कर पाएगी कि आज मेरे साथ मेला में क्या हुआ? (माँ एक पल को ठहरी फिर उसने मेरे चेहरे की ओर सावली और बेचैनी दोनो निगाहो से देखा)

अंजुम : क्या हुआ था?

आदम : दरअसल माँ एक खेमा लगा हुआ था किसी बाबा का तू गयी नही थी तो वैसे ही मेरा दिल उतरा हुआ था सोचा था कि तेरे साथ घुमुन्गा फिरुन्गा लेकिन क्या करता इसलिए अकेला अकेला टेहल रहा था....

अंजुम : नही तू बाबा की बात कह रहा था

आदम : हां हां वहीं तो उसके शागिर्द ने मुझसे कहा कि वो बहुत पहुचे हुए है और कुछ दिनो के लिए इस शहर आए है आप चाहे तो पूछ ले कुछ...तो मैं क्यूरीयासिटी में वैसी ही थी मैने अंदर कदम रखा खेमे में तो देखता हूँ एक लाल पोशाक पहने लंबी दाढ़ी और बालों वाले ध्यान में एक बाबा सामने बैठे हुए है

अंजुम चुपचाप सुनती रही और आदम उसे बताता चला गया आगे का वाक़या...फिर उसके बाद उसने सारी कहानी को फिर दोहराया अंजुम इस बीच हैरत से चुपचाप जैसे अध्ययन में खोई उसकी बातें सुनें जा रही थी...

जब आदम ने अपनी बात पूरी कह डाली तो वो खामोश हुआ और साँस छोड़ते हुए माँ की ओर देखने लगा...माँ ने उसके सर पे हाथ फेरा और मुस्कुराया

अंजुम : काश मैं भी तेरे साथ चलती पिछला जनम तेरा और मेरा यानी इस जनम में ही नही बल्कि पिछले जनम में भी तू मेरा बेटा था और मैं तेरी माँ और हमारे बीच ऐसा ही कुछ रिश्ता था वाक़ई यानी इस जनम में हम दोनो की आत्माए जैसे फिर एक हुई है

आदम : हां माँ

अंजुम : पर बेटा जिस लड़की की तूने बात कही तपोती ? वो तुझे दिलो जान से चाहती थी मेरा मतलब अर्जुन को उसके बाद उसने मरते वक़्त कसम जो खाई तो क्या उसने इस जनम में भी जनम लिया है

 
मैने माँ को सिर्फ़ उतना कहा था जितना मुझे बाबा ने कहा था...मैं अपने इस जनम के ताहिरा मौसी और बाकी सब जिनके साथ भी मैने संबंध बनाए और जिनकी कोख मेरी वजह से हरी हुई उन लोगो का एक बार भी ज़िक्र ना किया सिवाय इस बात के कि हां उस जनम में तपोती की ही वजह से हम अलग हुए थे

माँ तो हैरत में पड़ी थी पर उसे यक़ीनन मेरी बातों पे भरोसा हो गया था लेकिन वो बार बार मुझसे यही कहे जा रही थी कि जब उसने वादा किया हम दोनो को मिलाने का या दूसरा जनम लेने का जिसका मतलब था तेरे साथ संबंध बनाने का इस जनम में और तू भी उसे दिल से मुहब्बत करता तो क्या सच में वो इस जनम में पैदा हुई थी? क्या मेरी ज़िंदगी में तपोती किसी रूप में आई थी?

आदम ने मशीनी अंदाज़ में ना में ही इनकार किया और मुस्कुरा कर कहा "अगर होती तो तुझे क्यूँ ना बताता?".......मन ही मन मैने इस बात को दबा लिया था कि तपोती का जनम इस जनम में भी हुआ था और वो उस वेश्या के रूप में हुई थी जो हरपल मेरे संग थी और मुझे उसकी अहमियत का वजूद भी ना मालूम था और मुहब्बत भी तब हुई जब उसे खो डाला चंपा उर्फ तंज़िमा यही नाम तो बताया था उस काकी ने उसका जब आखरी बार उसके लाल्पाडा वाले किराए के रूम में पहुचा था....

माँ ने फिर एकदम से मेरी सोच तोड़ी...."जो भी हो लेकिन मैं वादा करती हूँ कि मैं तुझे छोड़के कही नही जाउन्गी मुझे तो इस बात का शुक्रियादा करना चाहिए खुदा का कि तुझ जैसा बेटा उसने मेरे झोली में हर बार डाला

हाहाहा".......मैं हंस के फिर खामोश हो गया

अंजुम ने आगे बढ़ कर मेरे होंठो से होंठ सटाये हम दोनो ने एक लंबा चुम्मा लिया...फिर एकदुसरे के होंठो से होंठ अलग किए...."वाक़ई ये कहानी नही हो सकती मुझे पूरा यकीन है"..........

."यानी तू यकीन करती है कि ये सच है"...........

."जो इंसान इतना कुछ बता सकता है तो उन बातों में झूठ नही हो सकता और तूने ही तो कहा कि ये सब तूने अपनी आँखो से देखा है"...........

."अभी तक मुझे हमारे पिछले जनम के चेहरे तक याद है .......माँ हंस पड़ी

अंजुम : चलो अच्छा हुआ कि अब हम आज़ादी एक नये सिरे से अपनी ज़िंदगी जी रहे है पर बेटा मुझे दुख है कि तपोती की ये इक्षा पूरी ना हो सकी (मैं एक पल को खामोश हो गया)

आदम : माँ जाने दो ना अब क्या रखा है बार बार उस बात को निकालने में ?

अंजुम : फिर भी जैसा तूने ब्यान किया उसकी दीवानगी उसकी मुहब्बत उसके मरते वक़्त वो बातें काश उसकी तमन्ना पूरी होती

आदम : तो इसका मतलब तुम चाहती हो कि तुम मुझे और उसे एक कर दो

अंजुम : हाहाहा नही तू मुझसे अलग कभी नही होगा और ना मैं कर सकती हूँ...लेकिन जितना तुझपे मेरा हक़ बनता उसका भी बनता उसे उसका हक़ मिलना चाहिए था तूने ही तो कहा कि अर्जुन को फिर उसके लिए दिल ही दिल में मुहब्बत हो जाती है

आदम : जाने दो माँ ये सब बातें छोड़ो

मैने माँ का ध्यान तोड़ने के लिए उसके स्तनों पे जैसे कमीज़ के उपर से ही हाथ रख दिया...माँ ने मेरी कलाई पे अपना हाथ रखा और मुझे जैसे इनकार किया

 
अंजुम : मांसिक आया हुआ है बेटा अभी नही

आदम : क्यूँ माँ?

अंजुम : समझा कर दर्द भी होगा और ऐसे हालत में करना ठीक नही होता

आदम : अच्छा माँ जैसी तेरी इच्छा

हम दोनो ने फिर एकदुसरे के होंठो से होंठ सटा के एक लंबा सा चुंबन लिया और फिर एकदुसरे से अलग हुए

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उस रात आँखो में जैसे नींद नही थी....मैं बाहर ब्रांडे में खड़ा हवाओं को महसूस कर रहा था....दूर सड़क पे गाड़ियाँ चल रही थी तो आस पास की उची उची इमारतो के इक्‍के दुक्के खिड़कियो से रोशनी जल रहे थे...रास्ता एकदम सुनसान था....मेरे ज़हन में बस यही बात कौंध (उठ) रही थी कि कैसे कहूँ माँ को? कि चंपा ही तो तपोती थी जिसने मुझे तुझसे मिलवाया तुझसे संबंध बनाने को कहा....लेकिन यूँ उसका मेरे ज़िंदगी से दूर जाना लिखा था सोचा नही था....दो जनमो में भी उसे मैं ना पा पाया...बस इस जनम में मेरे दिल में उसके लिए फीलिंग्स उठी भी लेकिन जब तक हुया तब तक वो ये दुनिया फिर से एक बार छोड़ चुकी थी

कशमकश में घिरा एक बार मैने पलटके देखा तो माँ करवट बदले सो रही थी.....मन ही मन जैसे मैने खुद को कहा कि अब और मत सोच जो हुआ सो हुआ...जिसके लिए तूने दिन रात दुआ माँगी आज वो तेरे पास है तेरे साथ है....और तेरी बीवी है....अगर चंपा ज़िंदा भी होती तो माँ क्यूँ मान लेती? वो तो एक पेशे से वेश्या थी अगर उसके चाहने के बावजूद चंपा ही उसकी ज़िंदगी ना तबाह अपने वजह से होने देती...कह देती की आप कहाँ और मैं कहाँ?

वो अपने किए वादे के मुताबिक सज़ा काटके इस दुनिया को फिर छोड़े जा चुकी थी....लेकिन माँ का बार बार उसे याद करना काश उसे कह पाता....लेकिन कैसे कह पाता? कि मैने एक वेश्या के संबंध बनाए क्या वो एक वेश्या को अपने घर की बहू स्वीकार करती? नही शादी एक बार होती है बार बार नही मेरे दिल ने मुझसे कहा निशा की बेवफ़ाई अब भी मेरे ज़हन से उतरी ना थी....रूपाली भाभी ताहिरा मौसी और जीतनो के साथ मैने व्यभिचारी रिश्ते बनाए उन्हें मैं अब तक ना भुला था....मेरे दिए हुए प्यार को रूपाली भाभी अब भी अपने गोद में लिए घूम रही थी राहिल को लिए....तबस्सुम दीदी भी तो !

"उफ्फ ये मैं क्या सोचने लगा? मुझे अपना दिमाग़ डाइवर्ट करना होगा इन सब चीज़ से वरना मैं पागल हो जाउन्गा भूल जा अब सबकुछ भूल जा ये भी भूल जा की चंपा नाम की कोई तेरे ज़िंदगी में भी थी"...........मैने इतना कुछ जैसे मन में बड़बड़ाये बिस्तर पे वापिस लौटा और माँ के बगल में लेट गया....

माँ मुझसे लिपटके सोने लगी....तो मैने भी उसे वैसे ही रहने दिया....और धीरे धीरे नींद की आगोश में डूबता चला गया...

ऐसे ही वक़्त कंटता जा रहा था....आदम की ज़िंदगी में उसकी माँ की अहमियत एक पत्नी के रूप में इस कदर ज़्यादा थी...कि वो अपना भुला कल ना चाहते हुए भी भुला चुका था...उसने माँ की हर छोटी मोटी कमीयो को ना ही सिर्फ़ पूरा किया बल्कि उसे ज़िंदगी की हर वो खुशी दी जो उसके पति ने उसे कभी नही उसके पूरे लाइफ में दिया था...

बाबा की बात जैसे उसके ज़हन में घर कर गयी थी....वो हर रात जब भी सोता उसे वहीं अर्जुन वहीं अरुणा वहीं तपोती वहीं गाओं सबकुछ जैसे फिर उसके ख्वाबो में जैसे तस्वीर की तरह दिखने लगती....उसे यकीन हो चुका था कि उसका व्याबचारी रिश्ता माँ के प्रति अनमोल है जब से उसके ज़हन में ऐसे व्याबचारी रिश्ते पनपने लगे तबसे ही उसका नज़रिया एक माँ और बेटे के संबंध में काफ़ी हद्तक बदल चुका था...उसे ऐसा ही अहसास होता कि ज़रूर किसी की माँ भी अपने बेटे से कुछ इस क़दर ही मुहब्बत करती होगी....या बेटा ऐसे ही हसरतें अपने दिल में दबाए रखता होगा.....लेकिन उसे ये भी मालूम था कि समीर और उसके जैसी स्टोरी हर किसी की नही हो सकती...ना ही ऐसे व्यभाचरी रिश्ते का कोई आहमेयद हो सकता है....

 
वक़्त के साथ साथ आदम सबकुछ भूल अपनी ज़िंदगी हँसी खुशी बीता रहा था...और इसी बीच उसकी मुलाक़ात एक बहुत ही राइज़ शख्सियत से हुई जिसने उसके लिए नये नये मुकामो को हासिल का ज़रिया उसे दे डाला

उस शाम ऑफीस में आदम को उसके हेड ने बुलाया और मिस्टर जमशेद से उसका परिचय कराया जो कि बांग्लादेश की कोल्ड ड्रिंक इंडस्ट्री के सीईओ थे...

मिस्टर जमशेद : हेलो मिस्टर.आदम नाइस टू मीट यू

आदम : ओह हेलो सर प्लेषर टू मीट यू टू सर (हाथ मिलाते हुए जमशेद से)

मिस्टर जमशेद : ह्म वैसे आपकी मेहनत और लगन का मुझे मिस्टर दत्ता ने सबकुछ क्लियर्ली बताया आपने कितनी ईमानदारी से अपनी पोस्ट को बखूबी और उसकी ज़िम्मेदारिया निभाई है मैं आपसे बस यही चाहता हूँ कि आप हमारी कंपनी को जाय्न करे

आदम : प..पर्र सर उम्म मा...मैं कैसे ? आइ मीन मैं कभी बंगलादेश गया नही

मिस्टर जमशेद : नो नो मैं तुम्हें बांग्लादेश में जॉब ऑफर नही कर रहा...असल में मेरा माल यहाँ डिसट्रिब्यूट होयगा और जैसा तुम जानते ही हो हमारी प्रॉडक्ट्स यहाँ ऑलरेडी काफ़ी लॉंच हो चुकी है तो अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें एक बिज़्नेस ऑपर्चुनिटी दे सकता हूँ तुम इंडिया में हमारे प्रॉडक्ट्स को सेल करोगे दट'स ऑल

आदम : पर सर मेरे पास तो कोई दुकान नही है और मैं ऐसा कैसे कर पाउन्गा

मिस्टर जमशेद :== डरो नही इसमें काफ़ी मेहनत है बाकी तुम जैसा होनहार लड़का इस काम के लिए पर्फेक्ट है उपर से तुम्हारी इंडियन गूव्ट ने अप्रूव्ड किया है हमारे प्रॉडक्ट्स को यहाँ पे

मिस्टर दत्ता : हां आदम दिस ईज़ आ गोलडेन ऑपर्चुनिटी ऐसे मौके बार बार हासिल नही होते...वैसे तो ये कोई अफीशियल प्रमोशन ऑफ युवर जॉब नही है पर इससे तुम्हें साइड बिज़्नेस का मालूमत चलेगा वैसे भी तुम इस शहर से काफ़ी वाक़िफ़ हो अगर यहाँ इस शहर में हमारे प्रॉडक्ट्स इतने सेल हो सकते है तुम उन्हें ऑनलाइन भी इंडिया के किसी भी स्टेट में भेज सकते हो इट'स गॉना बी लाइक ए-बिज़्नेस टू

आदम : ओ..क्क् सिर्र आइ विल कन्सिडर अबाउट

आदम ने काफ़ी सोच विचार किया फिर जमशेद ने उसे इतना हौसला दे दिया कि उसने ना नही किया.....उसने तुरंत ही मिस्टर जमशेद की प्रोवाइडिंग ऑफीस को संभाल लिया जो शहर में थी....फिर वो उस ऑफीस का मॅनेजर बन गया...उसके अंडर काफ़ी वर्कर्स थे....मार्केटिंग का ये बिज़्नेस उसे अच्छा लगा...और जल्द ही आदम के कदम धीरे धीरे शौहरत और कामयाबी की तरफ बढ़ने लगे

उसने अपने फर्स्ट कमामी से माँ के लिए कीमती महेंगी साड़ी खरीद के उसे तोहफे में दी थी.....उसकी माँ का पहनावा उसकी बदलती रंगत से और भी निखार गया अब ऐसा लगता था जैसे कोई हाइ-प्रोफाइल मॉडर्न लेडी हो....आदम उसे ऐसा बना दिया था....वो अपनी ये खुशी राजीव दा के साथ भी सेलेब्रेट कर चुका था...लेकिन बाद में उसे मालूम हुआ कि राजीव दा की पोस्टिंग वापिस बुर्ड़वन में हो गयी है क्यूंकी उनके माता-पिता अब उन्हें बहुत रिक्वेस्ट करके बुला रहे है....आदम को बुरा लगा कि उन दोनो ने उनका कितना साथ दिया? पर राजीव दा ने विश्वास दिलाया कि दूरिया चाहे जितनी भी हो साथ दिल से दिल का जुड़ा ही रहता है.......राजीव दा और ज्योति भाभी चले गये....

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