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Incest माँ हुई बेटे के लंड की दीवानी complete

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साधना सोफे से उठी और रसोई में घुसते हुए उसने अशोक से खाने के लिए पूछा। अशोक ने मना कर दिया और वो अपने कमरे में अन्दर चला गया। उधर साधना रसोई में खड़ी खड़ी सोच रही थी कि क्या अशोक ने उसको अर्धनग्न अवस्था में देख लिया होगा। अगर देख लिया होगा तो वो क्या सोच रहा होगा।

दूसरी तरफ अशोक भी अपने बेड पर लेटा अपनी माँ के बारे में ही सोच रहा था कि उसकी मम्मी इस उम्र में भी कितनी खूबसूरत और मस्त बदन की मालकिन है। सोचते सोचते उसका हाथ कब अपने लंड पर चला गया उसे खुद भी पता नहीं लगा।

वो अपनी माँ के बारे में सोच सोच कर मदहोश हुआ जा रहा था कि तभी साधना उसके लिए दूध का गिलास लेकर आ गई।

अशोक को साधना के आने का पता भी नहीं लगा, वो तो आँखें बंद किये अपने तन कर खड़े लंड को लोअर में हाथ डाल कर सहला रहा था।

साधना ने जब अशोक को ऐसा करते देखा तो उसकी चुत में भी खुजली सी होने लगी। ये सब रमिता की मेहरबानी थी जो एक माँ बेटा एक दूसरे के बारे में सोच सोच कर उत्तेजित हो रहे थे।

वो रात तो जैसे तैसे निकल गई। अगली सुबह ही रमिता का फ़ोन आ गया, उसने पहले अशोक से बात की। कुछ देर घर परिवार की बातें करने के बाद उसने अशोक से पूछा- और सुनाओ मेरी जान… कुछ बात बनी या नहीं रात को?

“मतलब?”

“अजी अब मतलब भी हम ही बतायें?”

“पहेली मत बुझाओ… साफ़ साफ़ कहो…क्या कहना चाहती हो?”

“मैं ये पूछना चाह रही थी कि रात को कुछ किया या नहीं… या फिर दोनों माँ बेटा अपने अपने कमरे में अपने हाथ से लगे रहे?”

“क्या यार रमिता… तुम इससे अलग कुछ सोचती भी हो या नहीं…”

“मैं तो सिर्फ अपने परिवार के बारे में सोचती हूँ जी… आपका और आपकी माँ का ध्यान रखना भी तो मेरा फर्ज है… और जब पता है कि माँ बेटा दोनों एक दूसरे को चाहते है तो उनको मिलवाने का जिम्मा भी तो मेरा ही बनता है.”

“ऐसा कुछ नहीं है.”

“मुझ से मत छुपाया करो… सब पता है मुझे कि कैसे तुम अपनी खूबसूरत माँ के दीवाने हो… और मुझे अच्छे से पता है कि मम्मी जी भी तुम्हारे लंड की दीवानी है… देख भी चुके हो तुम अपनी आँखों से और सुन भी चुके हो.”

“तुम चाहती क्या हो?”

“मैं चाहती हूँ कि तुम मम्मी जी की तड़पती जवानी को अपने लंड से शांत कर दो… मैं उन्हें तड़पते हुए नहीं देख सकती!”

“तुम पागल हो!”

“जो मर्जी समझो… सिर्फ तुम दोनों को एकान्त देने के लिए ही मैं अपने मायके आई हूँ… वैसे मेरे पापा बिल्कुल ठीक है और मेरी दिल्ली में ही उनसे इस बारे में बात हो गई थी… पर मैं तुम दोनों को कुछ करने का मौका देना चाहती थी तभी अकेली आई थी… समझे… अब मौका मत जाने दो… और चोद डालो अपनी माँ की चुत!”

अशोक से कुछ कहते नहीं बन रहा था क्योंकि वो खुद भी तो अपनी माँ की रसीली चुत का मजा लेना चाहता था।

रमिता ने मम्मी से बात करवाने को कहा तो अशोक ने रसोई में काम कर रही अपनी माँ को फ़ोन पकड़ा दिया और खुद अपने कमरे में चला गया।

“कैसे हो मम्मी जी?” रमिता ने पूछा।

“मैं तो ठीक हूँ… तुम अपने पिता जी की तबीयत का बताओ?”

“वो ठीक है तुम अपनी बताओ… बात कुछ आगे बढ़ी या नहीं?”

“कमीनी तुझे इसके सिवा कुछ सूझता नहीं है क्या?”

“मम्मी जी आपको अच्छे से पता है कि मैं चंडीगढ़ क्यों आई हूँ… इस मौके को खराब मत करो… और ले लो अशोक के मोटे लंड से मजा!”

“हरामजादी… तुम पक्का मुझे मेरे बेटे से चुदवा कर ही मानेगी.”
 
अभी साधना यह बोल ही रही थी कि अचानक अशोक रसोई में आ गया। अशोक ने भी यह सुन लिया था। अब शक की कोई गुंजाईश नहीं रह गई थी कि साधना अशोक से चुदना चाहती है।

अशोक को देखते ही साधना की भी बोलती बंद हो गई। वो समझ चुकी थी कि अशोक ने सब सुन लिया है, उसने फोन काट कर अशोक की तरफ बढ़ा दिया।

अब अशोक आपने आप को रोक नहीं पाया और उसने फ़ोन की जगह साधना के बढ़े हुए हाथ को पकड़ लिया और साधना को अपनी तरफ खींचा। साधना के शरीर में झुरझरी सी फ़ैल गई। उसने अपना हाथ छुड़वाने की असफल सी कोशिश की।

अशोक ने आगे बढ़ कर साधना को अपनी बाहों में भर लिया।

“अशोक… ये क्या कर रहा है… छोड़ मुझे…” साधना ने गुस्सा दिखाते हुए कहा।

पर अशोक को तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया, उसने एक हाथ से नाईटी के ऊपर से ही साधना के कूल्हे को सहलाना शुरू कर दिया।

साधना छटपटाई और छूटने की कोशिश की। अशोक ने एक हाथ से साधना के सर को पकड़ लिया और इससे पहले की साधना कुछ समझ पाती अशोक ने अपने होंठ साधना के होंठों पर टिका दिए।

अशोक का लंड अब तक खड़ा होकर लोअर में तम्बू बना रहा था। साधना के होंठों को चूसते हुए जब अशोक ने उसके कूल्हे दबाते हुए उसको अपने से लिपटाया तो अशोक का लंड साधना को अपनी नाभि के पास चुभता हुआ महसूस हुआ।

लंड के स्पर्श के एहसास मात्र से साधना की कामवासना भड़क उठी और वो भी अशोक से लिपट गई। माँ बेटे के बीच की शर्म एकदम से ना जाने कहाँ गुम हो गई। दोनों कामाग्नि में जलने लगे और समाज की दृष्टि में वर्जित सम्बन्ध स्थापित करने में व्यस्त हो गए।

अशोक के हाथ अब अपनी माँ की नाईटी में घुस कर उसके मुलायम बदन का मुआयना कर रहे थे। फिर तो कब नाईटी ने साधना के बदन का साथ छोड़ा खुद साधना को भी पता नहीं चला। वो अब सिर्फ एक पैंटी में अपने सगे बेटे अशोक के सामने खड़ी थी। अशोक ने भी जब अपनी माँ के मस्त तने हुए बड़े बड़े मम्मे देखे तो वो अपने आप को रोक नहीं पाया और टूट पड़ा वो अपनी माँ के मम्मों पर… एक मम्मे को मुँह में लेकर चूसने लगा और दूसरे मम्मे को अपने हाथ में लेकर बेरहमी से मसलने लगा।

साधना को याद आया कि जब अशोक चार साल का था जब उसने उसके मम्मों से दूध पीना बंद किया था और आज बीस साल बाद वो उन्ही मम्मो को चूस और मसल रहा था। ये बात साधना को और ज्यादा उत्तेजित कर रही थी।

“आह… ऊईईईई मा… धीरे कर अशोक बेटा… धीरे… जान ही निकाल लेगा क्या…” साधना मस्ती भरे दर्द को सहते हुए आहें और सिसकारियां भर रही थी। उसके हाथ भी अपने आप ही अशोक के लोअर में कैद लंड को ढूँढ रहे थे। पहले तो वो लोअर के ऊपर से ही लंड को सहला कर उसकी लम्बाई मोटाई का अंदाज लेती रही फिर जब कण्ट्रोल नहीं हुआ तो उसने एक ही झटके में अशोक का लोअर और अंडरवियर नीचे खींच कर लंड को बाहर निकाल लिया।

अशोक के लम्बे और मोटे गर्म लंड को अपने हाथ में पकड़ते ही साधना की चुत से झरना फूट पड़ा था।

उधर अशोक ने भी जब अपने लंड पर अपनी सगी माँ के हाथ को महसूस किया तो वो सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसका लंड और भी जबरदस्त ढंग से अकड़ गया।

साधना ने अशोक के लंड को अपनी हथेली में भर लिया था और अब वो अपने मम्मे चुसवाते हुए अशोक के लंड को मसल रही थी। अशोक का हाथ भी अगले ही पल अपनी माँ की पैंटी में घुस गया। चिकनी और पनियाई हुई चुत गर्म होकर जैसे भांप छोड़ रही थी। उसने जैसे ही अपनी माँ के दाने को सहलाया तो साधना के शरीर में झुरझरी सी फ़ैल गई। आज बरसों बाद किसी मर्द ने उसकी चुत को और उसके दाने को छेड़ा या सहलाया था।

साधना मस्ती के मारे अपने बेटे से और जोर से लिपट गई। अशोक ने भी अपनी मम्मी को अपनी गोद में उठाया और अपने बेडरूम में ले गया।

साधना को बेड पर लेटा कर अशोक अपने कपड़े उतारने लगा और साधना बेड पर पड़े पड़े उसको देखती रही। चंद पलों में ही अशोक अपनी माँ के सामने उसी अवस्था में खड़ा था जिस अवस्था में वो 24 साल पहले पैदा हुआ था।

साधना मन ही मन बहुत खुश और उत्तेजित थी जैसे किसी बच्चे को कोई मनचाही चीज मिलने वाली हो। माँ बेटे के रिश्ते को तो जैसे कब का भूल चुकी थी। याद थी तो बस अपनी चुत की लंड के लिए प्यास। उसका मन बैचैन हो रहा था कि अशोक उसको चोदने में इतनी देर क्यों लगा रहा है, बस अशोक आये और अपने मोटे लंड से उसकी चुत की धज्जियाँ उड़ा दे… फाड़ डाले उसकी चुत।
 
अशोक भी जल्दी से अपनी माँ की चुत का मजा लेकर उसकी प्यास बुझाना चाहता था। तभी तो वो जल्दी से बेड पर चढ़ गया और एक झटके से अपनी माँ की पैंटी फाड़ कर उसके बदन से अलग कर दी।

एक पल के लिए अशोक अपनी माँ की चुत देखता रहा। एकदम चिकनी और क्लीन शेव चुत देख अपनी माँ की खूबसूरती पर मोहित हो गया था। उसने अपनी माँ की पनियाई चुत को अपनी उंगली से छू के देखा और फिर धीरे धीरे एक उंगली अपनी माँ की चुत में उतार दी।

साधना पहले तो थोड़ा कसमसाई पर अगले ही पल वो उसके बदन में मस्ती की लहर दौड़ गई, उसने कस कर सिर के नीचे लगे तकिये को कस कर पकड़ लिया। उसे लगने लगा था जैसे उसकी चुत से अभी सब कुछ बाहर निकल आएगा।

अशोक ने अपनी उंगली से कुछ देर अपनी माँ की चुत को सहलाया और फिर अपने होंठ चुत पर टिका दिए। वैसे तो रमिता साधना को बहुत बार अपनी जीभ से ये मजा दे चुकी थी पर अशोक की थोड़ी खुरदरी जीभ का मजा ही कुछ और था। लेस्बियन सेक्स और किसी मर्द के साथ सेक्स करने में सबसे बड़ा फर्क तो यही है। मर्द के कड़क हाथ खुरदरी जीभ और सबसे बड़ी बात मजबूती औरत को मदहोश करने में इन सब चीजों का बहुत योगदान रहता है।

यही हाल अब साधना का हो रहा था। रमिता ने बेशक उसके बदन को मसला हो उसकी चुत चाटी हो या उंगली की हो पर अशोक के साथ ये मजा रमिता की मुकाबले कई गुना ज्यादा आ रहा था।

जब अशोक साधना की चुत चाट रहा था तो साधना ने भी अशोक का लंड पकड़ लिया और मसलने लगी। अशोक थोड़ा सा साधना की तरफ सरक गया। अब अशोक का लंड साधना के चेहरे के बिल्कुल पास था। बरसों बाद आज साधना लंड को इतने नजदीक से देख रही थी। अशोक के लंड का लाल लाल सुपारा साधना को बहुत अच्छा लग रहा था। उसने जीभ निकाल कर अशोक के सुपारे को चख कर देखा। साधना को इसका स्वाद बहुत अच्छा लगा तो वो जीभ निकाल कर अच्छे से चाटने लगी और फिर कुछ ही देर में अशोक का लंड साधना के मुँह के अन्दर था और साधना मस्त होकर अशोक का लंड चाट और चूस रही थी।

अशोक तो जैसे जन्नत में था, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी सेक्सी माँ कभी उसका लंड इस तरह से चूसेगी। अब दोनों माँ बेटा 69 की अवस्था में आ गए थे और मस्त होकर एक दूसरे के लंड चुत को चाट और चूस रहे थे।

जब से ये सब शुरू हुआ था तब से अब तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई थी। इस चुप्पी को साधना ने ही तोड़ा- कमीने… कब तक तड़पाएगा अपनी माँ को… अब चोद भी दे… बहुत प्यासी है तेरी माँ की चुत!

इतना सुनना था कि अशोक ने अगले ही पल पोजीशन संभाली और अपना लंड टिका दिया साधना की आग उगलती चुत के मुहाने पर। जैसे ही सुपारा चुत के संपर्क में आया तो साधना ने अपनी गांड उछाल कर उसका स्वागत किया।

चुत पहले से ही पानी पानी हो रही थी, अशोक ने भी साधना का इशारा समझा और धक्का दिया अपना मोटा लौड़ा अपनी माँ की चुत में।

मम्मी की चुत सालों बाद चुद रही थी तो मोटे लंड के साथ फैलती चली गई और साथ ही दर्द के मारे साधना की आँखें भी फ़ैल गई। एक बारगी तो उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे आज ही उसकी सुहागरात हो और उसका पति उसकी चुत की सील खोल रहा है।

वो दर्द से कराही- अह्ह्ह… उईई… ओह्ह्ह माँ… धीरे डाल कमीने… फाड़ेगा क्या अपनी माँ की चुत!

अशोक का अभी सिर्फ सुपारा ही अन्दर गया था और साधना का ये हाल था, अभी तो पूरा लंड बाहर था। अशोक ने मन ही मन कुछ सोचा और लंड बाहर निकाल कर उस पर थोड़ा थूक लगाया और दुबारा से लंड को ठिकाने पर टिका कर बिना देर किये एक जोरदार धक्का लगा कर लगभग आधा लंड चुत में उतार दिया।

साधना दर्द में चिल्ला उठी… पर अशोक ने बेरहमी से साथ ही दूसरा धक्का लगा कर पूरा लंड साधना की चुत में पेल दिया।

“हाय्य्य य्य्य… मरर… गईई ईईई उईई याईईई आईईईई…” साधना दर्द से तड़प उठी।

“बहनचोद कुते… रण्डी की चुत नहीं है… तेरी माँ की चुत है कमीने…”

“सॉरी मम्मी… वो उत्तेजना में कुछ ज्यादा हो गया… बस अब आराम से करूँगा.” कह कर अशोक ने अपने होंठ अपनी माँ के होंठों से मिला दिए। अब अशोक साधना के होंठ चूस रहा था और दोनों हाथो से अपनी माँ की बड़ी बड़ी चुचियाँ मसल रहा था।

अशोक के रुक जाने से साधना को भी थोड़ा आराम मिला था, उसे भी अपनी चूत अब भरी भरी महसूस हो रही थी, उसका मन करने लगा था कि अब अशोक धक्के मारना शुरू करे।

“अब ऐसे ही पड़ा रहेगा या कुछ करेगा भी?”

साधना का बस इतना कहना था कि अशोक को भी जैसे इसी बात का इंतजार था, उसने धीरे धीरे लंड साधना की चुत में अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया। शुरू के दस बीस धक्कों में तो साधना को थोड़ा दर्द हुआ पर फिर तो जैसे जन्नत के दरवाजे खुलते चले गए, हर धक्के के साथ साधना का बदन मस्ती से झूम उठा और साथ ही अशोक के धक्कों की भी स्पीड अब बढ़ती चली गई और बेड पर जैसे भूचाल आ गया।

“चोद दे रे… चोद अपनी माँ की चुत… बहुत प्यासी है तेरी माँ… मिटा दे उसकी प्यास… क्या मस्त लंड है तेरा… मजा आ गया… आह्ह्ह… चोद मेरे बच्चे… चोद… जोर जोर से चोद!” साधना मस्ती में बड़बड़ाती जा रही थी।

उधर अशोक भी जैसे जन्नत में था, रमिता की चुत में भी शायद इतना मजा नहीं था जितना उसको अपनी माँ की चुत चोदने में आ रहा था। इसका एक मुख्य कारण तो अपनी सगी माँ की चुत को चोदने का एहसास भी था।
 
“ओह्ह… माँ… तू क्यों तड़पती रही इतने दिन… मुझे बताया क्यों नहीं… क्या चुत है तुम्हारी… तुम्हें तो मैं दिन रात चोदना चाहूँगा… एक पल के लिए भी तड़पने नहीं दूंगा अपनी प्यारी माँ को…”

“उम्म्मम्म… चोद… मेरे बेटा… आज से ये चुत मेरे मर्द बेटे के लिए तोहफा… जब चाहे चोद लेना… क्योंकि इसमें तेरी बीवी को भी ऐतराज नहीं होगा… अब तो जब भी दिल करेगा, खूब चुदवाया करुँगी… प्यासी नहीं रहना है अब मुझे…”

इसी मस्ती की धुन में दोनों माँ बेटा लगभग पंद्रह बीस मिनट तक चुदाई का आनन्द लेते रहे। इस बीच साधना दो बार झड़ चुकी थी और अब अशोक भी झड़ने को तैयार था। अब वो तूफानी गति से अपनी माँ की चुत में लंड पेल रहा था। साधना भी गांड उछाल उछाल कर अशोक को लंड को अपनी चुत में अन्दर तक महसूस कर रही थी।

और फिर अशोक के लंड ने गर्म गर्म वीर्य की पिचकारी छोड़ दी अपनी माँ की चुत में। साधना की चुत भी गर्मी से बह उठी और तीसरी बार झड़ने लगी। चुत की पकड़ लंड पर बढ़ गई थी और वो लंड से वीर्य का कतरा कतरा निचोड़ने को बेचैन कर लग रही थी।

झड़ने के बाद दोनों ही काफी देर तक ऐसे ही लेटे रहे।

जब अशोक के फ़ोन की घंटी बजी तो जैसे दोनों जन्नत से जमीन पर आये। फ़ोन अशोक के बॉस का था, अशोक को जरूरी मीटिंग के लिए पहुँचना था पर साधना को चोदने के चक्कर में उसे कुछ याद ही नहीं रहा।

उसने तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाया और फिर मात्र दस मिनट में ही नहा धोकर वो ऑफिस के लिए निकल गया।

साधना अभी भी नंगधड़ंग बेड पर पड़ी थी, उसे अब नींद आने लगी थी और वो कब सो गई उसे खुद भी पता नहीं लगा।

अशोक ऑफिस तो पहुँचा पर उसका दिल अभी भी साधना पर ही अटका हुआ था। जैसे तैसे दोपहर तक ऑफिस में बिताया और फिर तबीयत का बहाना बना कर वापिस घर के लिए निकल पड़ा।

उधर जब साधना की आँख खुली तो उसने अपने आप को अभी भी बेड पर नंगी पड़े पाया और एकदम से सब कुछ फिल्म की तरह उसकी आँखों के सामने घूम गया। तब उसको एहसास हुआ कि उसने कामाग्नि में यह क्या कर दिया है। उसे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि वो कैसे अपने सगे बेटे के साथ ये सब कर सकती है। कहीं ना कहीं ग्लानि के भाव साधना के मन में उठ रहे थे।

वो बेड से उठ कर बाथरूम की तरफ चली तो उसकी चुत में एक टीस सी उठी और उसे वो मजा याद आने लगा जो अशोक से चुदवाते हुए उसे आ रहा था। वो दुविधा में थी कि उसने गलत किया या सही।

वो कुछ समझ नहीं पा रही थी।

बाथरूम में फ्रेश हो, नहा धोकर वो बाहर निकली और रसोई में घुस गई। भूख भी लगने लगी थी, नाश्ता बना कर खाया पीया और फिर कमरे में अपने बेड पर लेटे लेटे वो सुबह की अशोक के साथ बीते पलों को याद कर कभी परेशान हो जाती तो कभी चुदाई के एहसास से दिल की धड़कनें बढ़ जाती उसकी!

तभी दरवाजे पर आहट हुई, इस समय कौन आया होगा, यह सोचते हुए साधना दरवाजे की तरफ बढ़ी। दरवाजा खोलते ही उसकी धड़कनें बढ़ गई।

दरवाजे पर अशोक खड़ा था।

“इतनी जल्दी कैसे आ गया तू…”

“कुछ नहीं बस थोड़ा सिर में दर्द था तो वापिस आ गया!” कहकर अशोक अपने कमरे में चला गया।
 
कुछ देर बाद साधना अशोक के कमरे में चाय पूछने के लिए गई तो अशोक उसी समय बाथरूम से फ्रेश होकर निकला था और उसने उस समय बनियान और अंडरवियर ही पहना हुआ था।

ना चाहते हुए भी साधना की नजर उसके अंडरवियर में लंड और अंडकोष से बने उभार पर गई, उसके दिल की धड़कन एक बार से फिर बढ़ने लगी। वो अशोक को बिना चाय पूछे ही बाहर आ गई और रसोई में जाकर चाय बनाने लगी।

वो चाय बनाने में मशरूफ थी कि अशोक रसोई में आया और उसने साधना को पीछे से पकड़ कर अपने से चिपका लिया।

साधना ने छूटने की कोशिश की पर अशोक ने उसको कस के पकड़े रखा और अपने होंठ साधना की गर्दन पर रख दिए। वो साधना की गर्दन और कान की लटकन को चूमने लगा। अशोक का इतना करना था कि साधना भी बहकने लगी और अशोक से लिपट गई।

गैस बंद कर अशोक साधना को एक बार फिर अपने बेडरूम में ले गया और कुछ ही देर बाद दोनों माँ बेटा फिर से नंगे बदन एक दूसरे से उलझे हुए अपनी कामाग्नि को शान्त करने में व्यस्त हो गए।

कमरे में से अब सिर्फ आहे और सिसकारियाँ ही सुनाई दे रही थी या फिर सुनाई दे रही थी बेड की चूं चूं!

दोपहर को शुरू हुआ यह तूफ़ान शाम के नौ बजे तक चला, दोनों ने तीन बार चुदाई का भरपूर मजा लिया, उसके बाद अशोक बाजार से खाने पीने का सामान ले आया और खा पीकर दोनों फिर से बेडरूम में घुस गए और फिर सारी रात बेडरूम में भूचाल आया रहा।

कमाल की बात यह थी कि दोनों माँ बेटे ने आपस में चुदाई के सिवा कोई बात नहीं की थी। अगर कुछ किया था वो बस चुदाई वो भी आसन बदल बदल कर। कभी अशोक ऊपर साधना नीचे तो कभी साधना ऊपर तो अशोक नीचे। कभी घोड़ी बन कर तो कभी टेबल पर उल्टा लेटा कर।

दोनों ने ही अपने अपने फ़ोन बंद किये हुए थे। रमिता ने दोनों का फ़ोन बहुत बार मिलाया पर फ़ोन तो बंद थे। अगली सुबह अशोक छुट्टी लेना चाहता था पर साधना ने मना कर दिया क्योंकि पिछली दोपहर से आठ बार चुदवा चुकी थी और उसकी चुत सूज कर डबल रोटी हुई पड़ी थी, उसमें अब और चुदवाने की ताकत नहीं बची थी।

अशोक ने नाश्ता किया और वो अपने ऑफिस के लिए निकल गया। उसके जाते ही साधना ने अपना फ़ोन खोला ही था कि रमिता का फ़ोन आ गया। उसने साधना से बार बार पूछा कि कुछ हुआ या नहीं पर साधना ने मना कर दिया।

रमिता ने साधना को कहा कि उनके पास आज आज की रात और है, या तो वो अशोक से चुद कर मजा ले ले नहीं तो वो आते ही उनको अशोक के सामने नंगी करके चुदने को डाल देगी। अब उसे क्या पता था कि उसकी सास और पति तो पहली पारी में ही शतक जमा कर पारी घोषित कर चुके हैं।

अशोक उस दिन भी जल्दी आ गया और शाम होते होते उसने और साधना ने दो बार चुदाई कर ली थी। फिर रात का खाना दोनों बाहर करने गए। अशोक ने अपनी माँ के लिए 3-4 जोड़ी फैंसी अंडरगारमेंट्स ख़रीदे। साधना के कहने पर 2 जोड़ी रमिता के लिए भी लिए और फिर रात को करीब 11 बजे घर पहुँचे।

घर में अन्दर घुसते ही जैसे ही साधना ने दरवाजा बंद किया अशोक ने उसे अपनी गोद में उठा लिया और सीधा अपने बेडरूम में लेकर घुस गया और अगले कुछ ही पलों में दोनों के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था। अशोक ने साधना को नए ब्रा-पैंटी डाल कर दिखाने को कहा तो साधना ने भी ख़ुशी ख़ुशी सब एक एक बार पहन कर अशोक को दिखाए। साधना दो दिन की चुदाई से ही खिल उठी थी। जो साधना पिछले तेरह साल से चुदाई के लिए तरस रही थी वो आज उसे छप्पर फाड़ कर मिल रही थी।

कपड़े उतर चुके थे और अशोक साधना की चुत पर अपनी जीभ टिका चुका था और साधना ने भी अपने बेटे का लंड अपने मुँह में भर लिया था। फिर सारी रात घपाघप घपाघप होती रही। साधना चुदती रही और अशोक चोदता रहा।

साधना ने अशोक को बता दिया था कि अगले दिन रमिता आने वाली है और वो रमिता के सामने यह जाहिर नहीं होने देना चाहती है कि वो अशोक से चुद चुकी है तो बस आज रात जम के चोद दो फिर दो तीन दिन रमिता के सामने शराफत का नाटक करने के बाद ही चुदाई होगी दोनों के बीच। ताकि रमिता को लगे कि उसने ही साधना को अशोक से चुदवाया है।

सुबह तक पाँच बार चुदाई हुई और फिर दोनों सो गए।

दस बजे अशोक अपनी ड्यूटी पर चला गया और करीब बारह बजे रमिता आ गई। वो साधना से बहुत नाराज हुई कि उसने अशोक को और साधना को मौका दिया पर फिर भी दोनों ने कुछ नहीं किया। साधना की मन ही मन हँसी छुट रही थी पर उसने रमिता को एक बार भी ये बात जाहिर नहीं होने दी।
 
शाम को अशोक आ गया और खाना खाने के बाद जब रमिता और अशोक अपने बेडरूम में मिले तो अशोक रमिता से ऐसे लिपटा जैसे तड़प रहा हो रमिता को चोदने के लिए। जैसे पिछले तीन दिन से चुत देखी ही ना हो।

रमिता अशोक पर भी नाराज हुई कि उसने कहने के बाद भी अपनी मम्मी को नहीं चोदा. पर अशोक ने बोल दिया कि उसे शर्म आती है अपनी माँ के साथ ये सब करने में।

यह सुन रमिता बोली- तुम दोनों ही लुल्ल हो… मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।

अगले दिन से रमिता ने साधना और अशोक दोनों पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वो चुदाई करें।

रमिता साधना को बोली- मम्मी जी, जब चुत में आग लगी है और अशोक चोदने को भी तैयार है तो आप चुदवा क्यों नहीं लेती?

साधना बोली- रमिता… मुझे एक दो दिन का टाइम दे… मैं सोचती हूँ इस बारे में!

“कोई एक दो दिन का टाइम नहीं… जो होगा आज रात को होगा… बस आप अपनी चुत चमका कर रखना ताकि आपका बेटा आपकी चुत देखते ही चोदने को टूट पड़े!”

“तू मुझे चुदवा कर ही मानेगी कमीनी…”

शाम को अशोक आया, सबने खाना खाया और फिर जब सब सोने की तैयारी करने लगे तो रमिता ने साधना को अपने साथ उनके बेडरूम में चलने को कहा। साधना ऊपर से मना करती रही पर सच तो ये था कि उसने पिछली रात भी बड़ी मुश्किल से काटी थी अशोक से चुदे बिना… थोड़ी ना-नुकर के बाद साधना रमिता के साथ उसके कमरे में चली गई।

अशोक सिर्फ अंडरवियर में बैठा रमिता का इंतज़ार कर रहा था। साधना को देख उसने भी चौंकने का ड्रामा किया। रमिता कुछ नहीं बोली बस उसने साधना की साड़ी खींच दी। साधना ब्लाउज और पेटीकोट में अशोक के सामने खड़ी थी। अशोक या साधना कुछ बोलते इससे पहले ही रमिता ने पेटीकोट का कमरबन्द खींच दिया। पेटीकोट साधना के बदन से अलग हो उसके कदम चूमने लगा। साधना ने नीचे पैंटी नहीं पहनी थी।

“अब सब कुछ मैं ही करूँ या आप भी खड़े होकर कुछ करोगे?” रमिता ने अशोक की तरफ देखते हुए कहा।

“क्या कर रही हो रमिता… माँ है वो मेरी… कैसे चोद सकता हूँ मैं उन्हें?” अशोक का ड्रामा अभी भी चालू था।

“अब खड़े होकर कुछ करते हो या पड़ोसी को बुलाऊं तुम्हारी माँ चुदवाने के लिए!” रमिता पर तो जैसे भूत सवार था साधना को अशोक से चुदवाने का।

तभी साधना ने अशोक को आँख मारी और आने का इशारा किया तो अशोक शर्माने का नाटक करते हुए साधना के पास गया और एक हाथ साधना की चूची पर रख दिया।

रमिता यह देख पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गई और एक डायरेक्टर की तरह दोनों को बताने लगी कि क्या करना है। उसे क्या पता था कि ये दोनों तो पहले ही इस काम की पीएचडी कर चुके है।

“जल्दी से अपनी माँ का ब्लाउज भी उतार दो… और मम्मी जी आप भी जल्दी से अशोक का अंडरवियर उतार कर लंड पकड़ कर देखो अपने हाथ में!”

अशोक और साधना दोनों रमिता की ये बातें सुन कर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। अब उन दोनों ने भी नाटक बंद कर मजे लेने का सोचा और फिर तो दोनों लिपट गए एक दूसरे से। कुछ ही देर में दोनों के नंगे बदन बेड पर एक दूसरे से उलझे हुए थे।

रमिता भी अपने कपड़े उतार चुकी थी और बेड के कोने पर बैठ माँ बेटे की चुदाई का लाइव शो देख रही थी। साधना ने अशोक का लंड चूसा और अशोक ने भी दिल से साधना की चुत चाटी और फिर एक ही झटके में अशोक ने अपना लंड साधना की चुत में उतार दिया।

अगले बीस मिनट तक दोनों चुदाई का मजा लेते रहे और रमिता ये सोच सोच कर खुश होती रही कि आखिर उसने अपनी सासू माँ की प्यास बुझाने का प्रबन्ध कर दिया था। बेशक इस काम के लिए उसे अपना पति अपनी सास के साथ साँझा करना पड़ रहा था।

उस दिन से चुदाई का जो सिलसिला शुरू हुआ वो शायद आज भी जारी है।

कहानी पसंद आई या नहीं, जरूर बतायें।
 
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