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साधना सोफे से उठी और रसोई में घुसते हुए उसने अशोक से खाने के लिए पूछा। अशोक ने मना कर दिया और वो अपने कमरे में अन्दर चला गया। उधर साधना रसोई में खड़ी खड़ी सोच रही थी कि क्या अशोक ने उसको अर्धनग्न अवस्था में देख लिया होगा। अगर देख लिया होगा तो वो क्या सोच रहा होगा।
दूसरी तरफ अशोक भी अपने बेड पर लेटा अपनी माँ के बारे में ही सोच रहा था कि उसकी मम्मी इस उम्र में भी कितनी खूबसूरत और मस्त बदन की मालकिन है। सोचते सोचते उसका हाथ कब अपने लंड पर चला गया उसे खुद भी पता नहीं लगा।
वो अपनी माँ के बारे में सोच सोच कर मदहोश हुआ जा रहा था कि तभी साधना उसके लिए दूध का गिलास लेकर आ गई।
अशोक को साधना के आने का पता भी नहीं लगा, वो तो आँखें बंद किये अपने तन कर खड़े लंड को लोअर में हाथ डाल कर सहला रहा था।
साधना ने जब अशोक को ऐसा करते देखा तो उसकी चुत में भी खुजली सी होने लगी। ये सब रमिता की मेहरबानी थी जो एक माँ बेटा एक दूसरे के बारे में सोच सोच कर उत्तेजित हो रहे थे।
वो रात तो जैसे तैसे निकल गई। अगली सुबह ही रमिता का फ़ोन आ गया, उसने पहले अशोक से बात की। कुछ देर घर परिवार की बातें करने के बाद उसने अशोक से पूछा- और सुनाओ मेरी जान… कुछ बात बनी या नहीं रात को?
“मतलब?”
“अजी अब मतलब भी हम ही बतायें?”
“पहेली मत बुझाओ… साफ़ साफ़ कहो…क्या कहना चाहती हो?”
“मैं ये पूछना चाह रही थी कि रात को कुछ किया या नहीं… या फिर दोनों माँ बेटा अपने अपने कमरे में अपने हाथ से लगे रहे?”
“क्या यार रमिता… तुम इससे अलग कुछ सोचती भी हो या नहीं…”
“मैं तो सिर्फ अपने परिवार के बारे में सोचती हूँ जी… आपका और आपकी माँ का ध्यान रखना भी तो मेरा फर्ज है… और जब पता है कि माँ बेटा दोनों एक दूसरे को चाहते है तो उनको मिलवाने का जिम्मा भी तो मेरा ही बनता है.”
“ऐसा कुछ नहीं है.”
“मुझ से मत छुपाया करो… सब पता है मुझे कि कैसे तुम अपनी खूबसूरत माँ के दीवाने हो… और मुझे अच्छे से पता है कि मम्मी जी भी तुम्हारे लंड की दीवानी है… देख भी चुके हो तुम अपनी आँखों से और सुन भी चुके हो.”
“तुम चाहती क्या हो?”
“मैं चाहती हूँ कि तुम मम्मी जी की तड़पती जवानी को अपने लंड से शांत कर दो… मैं उन्हें तड़पते हुए नहीं देख सकती!”
“तुम पागल हो!”
“जो मर्जी समझो… सिर्फ तुम दोनों को एकान्त देने के लिए ही मैं अपने मायके आई हूँ… वैसे मेरे पापा बिल्कुल ठीक है और मेरी दिल्ली में ही उनसे इस बारे में बात हो गई थी… पर मैं तुम दोनों को कुछ करने का मौका देना चाहती थी तभी अकेली आई थी… समझे… अब मौका मत जाने दो… और चोद डालो अपनी माँ की चुत!”
अशोक से कुछ कहते नहीं बन रहा था क्योंकि वो खुद भी तो अपनी माँ की रसीली चुत का मजा लेना चाहता था।
रमिता ने मम्मी से बात करवाने को कहा तो अशोक ने रसोई में काम कर रही अपनी माँ को फ़ोन पकड़ा दिया और खुद अपने कमरे में चला गया।
“कैसे हो मम्मी जी?” रमिता ने पूछा।
“मैं तो ठीक हूँ… तुम अपने पिता जी की तबीयत का बताओ?”
“वो ठीक है तुम अपनी बताओ… बात कुछ आगे बढ़ी या नहीं?”
“कमीनी तुझे इसके सिवा कुछ सूझता नहीं है क्या?”
“मम्मी जी आपको अच्छे से पता है कि मैं चंडीगढ़ क्यों आई हूँ… इस मौके को खराब मत करो… और ले लो अशोक के मोटे लंड से मजा!”
“हरामजादी… तुम पक्का मुझे मेरे बेटे से चुदवा कर ही मानेगी.”
दूसरी तरफ अशोक भी अपने बेड पर लेटा अपनी माँ के बारे में ही सोच रहा था कि उसकी मम्मी इस उम्र में भी कितनी खूबसूरत और मस्त बदन की मालकिन है। सोचते सोचते उसका हाथ कब अपने लंड पर चला गया उसे खुद भी पता नहीं लगा।
वो अपनी माँ के बारे में सोच सोच कर मदहोश हुआ जा रहा था कि तभी साधना उसके लिए दूध का गिलास लेकर आ गई।
अशोक को साधना के आने का पता भी नहीं लगा, वो तो आँखें बंद किये अपने तन कर खड़े लंड को लोअर में हाथ डाल कर सहला रहा था।
साधना ने जब अशोक को ऐसा करते देखा तो उसकी चुत में भी खुजली सी होने लगी। ये सब रमिता की मेहरबानी थी जो एक माँ बेटा एक दूसरे के बारे में सोच सोच कर उत्तेजित हो रहे थे।
वो रात तो जैसे तैसे निकल गई। अगली सुबह ही रमिता का फ़ोन आ गया, उसने पहले अशोक से बात की। कुछ देर घर परिवार की बातें करने के बाद उसने अशोक से पूछा- और सुनाओ मेरी जान… कुछ बात बनी या नहीं रात को?
“मतलब?”
“अजी अब मतलब भी हम ही बतायें?”
“पहेली मत बुझाओ… साफ़ साफ़ कहो…क्या कहना चाहती हो?”
“मैं ये पूछना चाह रही थी कि रात को कुछ किया या नहीं… या फिर दोनों माँ बेटा अपने अपने कमरे में अपने हाथ से लगे रहे?”
“क्या यार रमिता… तुम इससे अलग कुछ सोचती भी हो या नहीं…”
“मैं तो सिर्फ अपने परिवार के बारे में सोचती हूँ जी… आपका और आपकी माँ का ध्यान रखना भी तो मेरा फर्ज है… और जब पता है कि माँ बेटा दोनों एक दूसरे को चाहते है तो उनको मिलवाने का जिम्मा भी तो मेरा ही बनता है.”
“ऐसा कुछ नहीं है.”
“मुझ से मत छुपाया करो… सब पता है मुझे कि कैसे तुम अपनी खूबसूरत माँ के दीवाने हो… और मुझे अच्छे से पता है कि मम्मी जी भी तुम्हारे लंड की दीवानी है… देख भी चुके हो तुम अपनी आँखों से और सुन भी चुके हो.”
“तुम चाहती क्या हो?”
“मैं चाहती हूँ कि तुम मम्मी जी की तड़पती जवानी को अपने लंड से शांत कर दो… मैं उन्हें तड़पते हुए नहीं देख सकती!”
“तुम पागल हो!”
“जो मर्जी समझो… सिर्फ तुम दोनों को एकान्त देने के लिए ही मैं अपने मायके आई हूँ… वैसे मेरे पापा बिल्कुल ठीक है और मेरी दिल्ली में ही उनसे इस बारे में बात हो गई थी… पर मैं तुम दोनों को कुछ करने का मौका देना चाहती थी तभी अकेली आई थी… समझे… अब मौका मत जाने दो… और चोद डालो अपनी माँ की चुत!”
अशोक से कुछ कहते नहीं बन रहा था क्योंकि वो खुद भी तो अपनी माँ की रसीली चुत का मजा लेना चाहता था।
रमिता ने मम्मी से बात करवाने को कहा तो अशोक ने रसोई में काम कर रही अपनी माँ को फ़ोन पकड़ा दिया और खुद अपने कमरे में चला गया।
“कैसे हो मम्मी जी?” रमिता ने पूछा।
“मैं तो ठीक हूँ… तुम अपने पिता जी की तबीयत का बताओ?”
“वो ठीक है तुम अपनी बताओ… बात कुछ आगे बढ़ी या नहीं?”
“कमीनी तुझे इसके सिवा कुछ सूझता नहीं है क्या?”
“मम्मी जी आपको अच्छे से पता है कि मैं चंडीगढ़ क्यों आई हूँ… इस मौके को खराब मत करो… और ले लो अशोक के मोटे लंड से मजा!”
“हरामजादी… तुम पक्का मुझे मेरे बेटे से चुदवा कर ही मानेगी.”