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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

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दर्द ही दवा है

"भाई.. मुझे बाथरूम ले चल." अर्जुन जिसकी शायद अभी आँख लगी थी, ने अपनी बहन को अपने सीने पर सर उठाए देखा. चेहरा बस उस हल्की नीली

रोशनी मे नुमाया हो रहा था.

"हा चलो दीदी." अर्जुन ने अपने उपर से दीदी को आराम से पलट दिया और खुद बिस्तर से नीचे उतार कर उन्हे किसी छोटी बच्ची की तरह अपने हाथो मे उठा लिया.

"आ.." दीदी की कराह सुनकर उसने रुक कर फिर से उनकी तरफ देखा.

"कुछ नही हुआ है भाई बस शरीर थोड़ा अकड़ गया है. तू चल" और अर्जुन उन्हे लेकर वापिस ड्रॉयिंग रूम के साथ अंदर ही बने बाथरूम मे लेकर आ गया. दीवार पर लगे लाइट के खटके को दबाया तो पूरा बाथरूम रोशनी से भर उठा.

उसकी बाहो मे पड़ी ऋतु दीदी नंगी बस अपने भाई को ही देख रही थी. नज़र दीदी के चेहरे से नीचे गई तो गोरे फक्क चुचो पर लाल निशान बने हुए थे और निपल अभी तक कड़े थे. श्याद सूज गये थे ज़्यादा चुसाइ से. गोरी पतली कमर बिल्कुल अंदर धसी सी लग रही थी और उसके नीचे जहा बालो की मौजूदगी का कोई आभास ना था, उनकी चूत के दोनो होंठ फूल कर सूजे हुए थे. चूत की दरार पर खून किसी पपड़ी सा जमा था और छेद शायद अभी भी हल्का नम था. जहा कभी वो गोरी चूत किसी कनक के दाने सी थी आज वही फट कर सूज गई थी

"मेरे पाव नीचे रख ज़रा." थोड़ी शरमाती सकुचती वो बोली तो अर्जुन ने अपनी बाहो मे लिए ही उनका सिर्फ़ ज़मीन तक पहुँचाया था. वो अभी भी दीदी का पूरा वजन अपने ही हाथो मे लिए खड़ा था, वैसे ही जैसे दीदी थी. एकदम वस्त्रहीन.

"मुझे कमोड तक ले चल ऐसे ही." ऋतु दीदी हिम्मत से अपने पाव बाथरूम के कोने मे बने कमोड तक बढ़ाते हुए बोली. हर कदम चूत में जैसे एक भयंकर दर्द उत्पन्न कर रहा था. अर्जुन ने भी उन्हे आराम से पकड़ा हुआ था, कमर के भाग से. उनकी पीठ पर भी सफेद पपड़ी सी जमी थी और बालो मे भी. गोरे गोल-मटोल कूल्हे अब थोड़ा लाली लिए हुए थे जो हर कदम पर थरथरा से जाते. सहारा दे कर अर्जुन ने उन्हे वहाँ बिठाया तो एक बार फिर जोरदार सिसकारी निकल गई.

"आपको ज़्यादा दर्द है तो खड़े खड़े ही कर लीजिए." अर्जुन ने देखा की दीदी से बैठा बैठ भी नही जा रहा तो उसने उन्हे यही सलाह दी.

"नही रे. पड़े पड़े तो दर्द जाने से रहा. हिलूंगी तभी तो फिर ठीक रहूंगी."

साथ मे ही अर्जुन ने गेयिज़र का बटन भी दबा दिया जिसको दीदी ने भी देखा. और फिर एक बार उनके चेहरे पर दुनिया जहा का दर्द इकट्ठा हो गया.

"आ भाई." चूत से पहले तो सिर्फ़ कुछ बूंदेही टप की फिर चार-चार की आवाज़ से रुक रुक कर पेशाब गिरने लगा. शुरू की बूंदे एकदम लाल ही थी जिन्हे दोनो ने ही देख लिया था.

"वो अंदरही जम गया था ना थोड़ा खून तो इसके साथ ही बाहर आ गया." बस नीचे देखती ऋतु दीदी ने इतना ही कहा और कुछ देर वही बैठी रही. उन्हे आज अपना पेशाब भी किसी तेज़ाब सा लग रहा था चूत को जलाता सा.

"आप बस 2 मिनिट रुकिये." इतना कहकर वो अपने कमरे से एक सूती सॉफ टीशर्ट लेकर आया और पास मे रखी प्लास्टिक की बाल्टी पर बाथरूम मे टंगा अपना पाजामा किसी गद्दी की तरह बिछा, दीदी को उसपे बिठा दिया. ऋतु दीदी बस अपने भाई की हरकतों को देख रही थी जिसके चेहरा गंभीर था.

"थोड़ा फैला लीजिए ना इनको." अर्जुन ने उनकी जाँघो की तरफ इशारा किया तो ऋतु दीदी ने दर्द मे भी मुस्कुराते हुए अपनी गोरी जांघें फैला ली. चूत का छेद पूरा नुमाया हो रहा था. गरम पानी से एक डब्बा अच्छे से भरकर उसने उंगली डूबाई देखने के लिए की कितना गरम है. फिर हल्का ताज़ा पानी मिला कर सॉफ टीशर्ट का बीच वाला भाग अच्छे से गीला करके उनकी टाँगो के सामने बैठ गया फर्श पर.

"अगर दर्द हो तो बता देना दीदी. बस एक बार अच्छे से सॉफ कर दूं फिर आपको आराम मिल जाएगा." थोड़ी चिंता अभी थी उसके चेहरे पर.

"मुझे ये दर्द ख़तम करना है भाई. अभी तू कर जो तू कर रहा है. फिर मैं करूँगी जो मैने करना है."

दीदी की ये बात अर्जुन को समझ तो नही आई लेकिन वो बिना कुछ पूछे उस गीली टी शर्ट से उनकी चूत के बाहर जमे खून को सॉफ करने लगा.

हल्के हाथो से उसने दोनो होंठ और उनपर लगे सूखे खून के निशान बिल्कुल सॉफ कर दिए.

चूत के छेद के नीचे की तरफ भी सूजन और एक छोटा

सा चीरा लग गया था, लेकिन वहाँ से अब खून तो नही बह रहा था.

एक बार फिर उसने टीशर्ट को गरम पानी मे भिगोया और अब चूत के मूह से भीड़ा दिया. "आइईइ.... भाई ये तरीका सिर्फ़ दर्द दे रहा है." अपने हाथ की उंगलियों से उन्होने अर्जुन की कलाई मजबूती से पकड़ ली थी. चूत में जैसे और आग लग गई हो अर्जुन की इस हरकत से. लेकिन वो जानता था की चूत के होंठ और छेद जितना सूजे हुए है सुबह तक तो दीदी टाँग भी नही खोल पाएगी.

"बस 5 मिनिट दीदी." उसने वापिस ये बात कही और अपना काम करता रहा.

"अर्जुन. ये शावर चला दे."

दीदी की बात सुनकर वो एक पल रुका फिर उसको लगा के क्या पता नहा के दीदी को आराम आ जाए. उसने शावर का हॅंडल खोल दिया. बाल्टी पे बैठी हुई ऋतु दीदी पर फुहार सीधी गिर रही थी. उनके गरम शरीर मे इस ठंडी फुहार से एक नई जान से आने लगी. अर्जुन भी पूरा भीगा गया था 2 मिनिट मे

ही.
 
"शेंपू लगा तो मेरे बालो मे और ज़रा ये साबुन भी पकड़ा दे मुझे." दीदी अब अपनी जगह खड़ी हो गई थी. पानी की धारा उनके चेहरे, चूंचो से होती चूत पर आकर फिर से दोनो जाँघो से होती नीचे फर्श तक आ रही थी. गीला भीगता बदन एक बार फिर चमक रहा था.

अर्जुन ने दृश्य देखते हुए उन्हे साबुन पकड़ाया और खुद उनेक पीछे खड़ा हो दोनो हाथो मे शेंपू लगा कर बालो मे मलने लगा. शावर ज़्यादा उचाई पर नही था, बस अर्जुन के सर से 6-8 इंच

हे उपर दीवार से जुड़ा था एक 1 फुट की अयस्क की पाइप से. दीदी ने फुहार का रुख़ बालो से हटा कर अपनी कमर की तरफ कर दिया त. बालो मे झाग बन रहा था जो थोड़ा गर्दन से होते हुए पीछे पीठ और पेट की तरफ भी जा रहा था.

"आ. ऐसा लग रहा है जैसे ये साबुन तेरे हाथो का काम कर रही है."

दीदी के उपर के बैग पर भी हल्का सफेद झाग साबुन ने बना दिया था. उन्होने अपने हाथो से अर्जुन के दोनो हाथ सर से हटाकर अपनी छातियों पर रख दिए.

"अच्छे से मसल इनको. मालिश कर ज़रा प्यार से इनकी मेरे भाई."

उनकी गान्ड से चिपका अर्जुन भी दीदी के खुमार को देख उनके साथ हो लिया. पूरे चिकने गीले शरीर पर उसके बड़े हाथ और उंगलिया रेंगने से लगे. शावर के दाहिनी तरफ दीवार पर लगे शीशे पर ऋतु दीदी की नज़र पड़ी तो वो बस वही देखती रही और अर्जुन उनके चुचे दबाता अपना लंड गान्ड पर रगड़ सा रहा था.

"ऐसे ही भाई, वहाँ पीछे भी सॉफ करता रह."

अपनी दीदी की नज़र का पीछा किया तो देखा का चेहरे से लेकर जाँघो के नीचे तक का हिस्सा शीशे मे नुमाया हो रहा था. उनकी आँखो मे एक नई चमक थी और अपने होंठ काट ती ऋतु वही से अपने छोटे भाई के अजगर को अपनी गान्ड की दरार मे रगड़ता देख कर उसके हाथ अपने हाथो से बूब्स और चूत पर दबा रही थी. अर्जुन दाहिने हाथ से उनका बड़ा चूचा दबा रहा था और अपने बाए हाथ की उंगली से छूट के होंठो को प्यार से घिस रहा था. ऋतु दीदी बस सिसकते हुए मचल रही थी

लेकिन नज़र वही थी. लंबा तगड़ा अर्जुन, जिसके खुद के शरीर पर बालो का अभाव था, उसकी गिरफ़्त मे एकदम गोरी, लंबी किसी अप्सरा सी ऋतु दीदी जकड़ी थी. गोरे चुचे जिनके चुचक अभी तीखे हो चुके थे, वो भी सर उठाए थे. एक दूध इतना बड़ा था कि पूरा पकड़ मे नही आ रहा था अर्जुन के बड़े हाथ मे.

शावर को वापिस सर की तरफ किया तो पूरा शरीर एक बार फिर शीशे सा चमक उठा. अर्जुन का सर अपने कंधे की तरफ कर ऋतु ने उसके दोनो होंठ मूह मे भर लिए थे. ऐसा लग रहा था कि ऋतुही सबकुछ निर्देशित कर रही है. पूरी तरह से उसकी तरफ घूम कर अपनी सख़्त छातिया भाई के सीने से रगड़ती ऋतु ने एक हाथ मे उसका लंड थाम लिया, जो पानी नीचे भी किसी गरम सलाख सा तप रहा था.

"देख कर तो नही लगता की यही था जो मेरे अंदर चला गया. लेकिन कुछ भी कह अर्जुन तेरा पेनिस है बड़ा प्यारा. देख जैसे ज़ीरो का लाल बल्ब हो." ऋतु ने लंड की खाल पूरी पीछे कर दी थी और सुपाडे को गोर से निहार रही थी. यकी नही नही था कि किसी टमाटर सा मोटा ये भाग उसकी चार आने जितनी चौड़ी सुरंग मे चला गया हो. लेकिन चूत का हाल तो देखा ही था.

अर्जुन बस अपनी दीदी को ही देख रहा था. उसके चेहरे पर अब कोई चिंता या सोच नही थी. बस एक आनंद था. ऐसे ही हाथ चलाते हुए ऋतु झुकी और अपनी जीब उस

लाल दहकते हुए टमाटर पर फिरा दी और इधर अर्जुन के मूह से मज़े की सिसकी निकल गई. "ये क्या है दीदी? आ.. कहा से सीखा आपने?"

"किताबे सबकुछ सीखा देती है अगर होनहार और पढ़ने वाले बनो. कामसुत्र के इंग्लीश वर्षन मे ये भी था और मेरा दिल किया इसको चूमने का." मुखमैथून

की कला भी दुनिया की इस किताब मे हज़ारो वर्ष पहले ही वर्णित थी और इसका अँग्रेज़ी संस्करण ऋतु ने भी कॉलेज के पुस्तकालय मे पढ़ा था. वो

अपना प्रॅक्टिकल आज अंजाम दे रही थी. किसी ने सही कहा है के प्यार मे दर्द भी जैसे एक अलग नशा भर देता है. यहा ऋतु भी अपने छोटे भाई को शायद

कुछ नये पाठ पढ़ा रही थी जो खुद उसके लिए पहला अनुभव था. जितना भी मूह खोल सकती थी उतना खोलकर सुपाडा मूह मे लेने लगी वो. हल्का दांतो

की रगड़ अर्जुन को असीमित आनंद दे रही थी.

2 मिनिट बाद अपनी एक टाँग वही बाल्टी पर रख दी जिस से चूत खुलकर नुमाया हो रही थी.

अर्जुन ने एक बार उपर से नीचे तक उनकी कमनीय काया को देखा जहा पानी की बूंदे बहती, गायब होती दिख रही थी और फिर उनकी चूत को . जो हल्के हल्के तर्रा रही थी.

बिना किसी अनुभव के वो नीचे बैठ कर ध्यान से चूत को देखने लगा और अपने भीगे होंठ गीली-तपती चूत पर रख दिए.

ऋतु दीदी का सर खड़े हुए ही पीछे की तरफ हो गया, थोड़े दर्द और अधिक मज़े से. अपने भाई का सर वही अपनी चूत पर ज़ोर से सटा दिया. "आ आरू.. ससस्स. जान निकल रही है भाई मज़ीईए सीईई.."

इधर अर्जुन था तो नौसीखिया लेकिन उसने अपनी जीभ को उस बहते छेद मे भिड़ा दिया. कोई घृणा नही, कोई ग्लानि नही. सिर्फ़ प्यार से जैसे उसकी दीदी ने उसके लंड पर दिया था. हल्के हल्के चूत को वो कुरेदता दोनो चुतड़ों को मसल रहा था. दीदी ने उसको उपर की तरफ खींचा तो वो सीधा खड़ा हो गया. लंड नाभि के नीचे टक्कर मार रहा था जिसको ऋतु दीदी ने एक बार सहला कर चूत के छेद से मिला दिया. कामरस से बहती चूत को ये गरम अहसास एक बार फिर अंदर तक हिला गया.

"भाई बस डाल दे." इतना बोलकर लंड को वही जकड़े उन्होने अर्जुन का मूह अपनी तरफ खींच उसके होंठो मे दे दिया था.

इधर अर्जुन के घोड़े ने भी लगाम छुड़ा ली थी और झटके से उस चिकनी गरम और बेहद तंग सुरंग मे जा फँसा.

"भाईईईईई.. बस."

अर्जुन जो ऋतु दीदी की कमर थामे धक्का लगा चुका था वो जहा का तहा रुक्क गया. एक बार फिर पीड़ा से हल्के मोटी से निकल आए थे ऋतु दीदी की बड़ी गहरी आँखों से. 4 इंच

से ज़्यादा लंड वही कसा हुआ था. पाँव हल्का लरज रहा था. "दीदी ऐसे ज़्यादा दर्द होगा" अर्जुन ने उनको चिपकाए हुए ही कहा.

"पागल ऐसे दर्द सबसे कम ही होगा. जितना यहा से वेजाइना खुल रही है और पेनिस अंदर गया, तुझे पता नही चला क्या." खुद को काबू मे करती दीदी ने उसको समझाया

तो अर्जुन ने भी देखा के चूत अच्छे से दिख रही है. "वैसे दीदी वेजाइना को चूत बोलते है और इसको लंड." और फिर ऐसे ही उन्हे चूमता रगड़ता खड़ा रहा.

"हाँ.. भाई मुझे.. अया.. ऐसे..ही आ. प्यार कर.. अच्छा लग रहा है." बोलते हुए खुद ही अपनी गान्ड हल्की पीछे कर फिर से लंड पर मार दी. "ऊऊहह.." अपने होंठ खुद ही काट लिए चीख रोकने के लिए जिनपर 2 बूँद खून की उभर आई थी. "बस अब जितना.. आ.. गया..हाए.. इतने से कर.. आ..पहले धीरे.." आवाज़ हर पल लरज रही

थी.
 
अर्जुन ने देखा कि उनकी टाँग कांप रही है तो ज़मीन पर रखी टाँग के कूल्हे को पकड़ उन्हे वैसे ही दीवार से सटा दिया. और बाल्टी को भी. ऋतु दीदी की

पीठ दीवार से चिपकी थी और चौड़ी जाँघो के बीच भाई का मूसल चूत के होंठ बुरी तरफ से फैलाए 6 इंच से थोड़ा ज़्यादा ही किसी भैंस के खूते सा

गड़ा था. "दीदी बस अब मैं प्यार से करूँगा." इतना बोलकर एक बार फिर उनके दोनो होंठ चूस्ते हुए अर्जुन ने 2 इंच लंड पीछे कर उतनाही अंदर पेल दिया..

"ऊई.. आ... ससिईई.. " हर धीमे से पड़ते धक्के पर ऋतु दीदी की चूत मे आग और पानी दोनो का मिलन सा हो रहा था. और सिसकारिया दोनो की निकल रही थी.

"दीदी, आप जितनी खूबसूरत हो.. उतनीही आपकी ये प्यारी सी चूत है.. आ.. देखो मेरा लंड अभी तक जकड़ा सा जा रहा है."

"भाई मेरी वाग.. मतलब.. आ चूऊत की.. आ ग़लती नहियिइ.. है.. तेरा ये.. घोड़े जैसाआ.. तो हर चूओत का यही .. आ भाई... हाल कर देगा.. आ." ज़ोर से

कर भाई. ज़ीत्न ज़ोर .. आ से करेगा.. दर्द ख़तम हो जाएगा." लंड थोड़ा रफ़्तार से जाने लगा था और हर धक्के पर ऋतु दीदी की पीठ दीवार से जा लगती.

अर्जुन ने लंड फ़साए हुए ही उन्हे उठा लिया और धीमे धीमे वापिस बिस्तर पर पटक कर खुद नीचे खड़ा रहा. "अब सारा दर्द ख़तम कर दूँगा दीदी." थोड़े जोश से उसने ये कहा और सुपाडे तक लंड खींच वैसे ही धकेल दिया. उसने इतनी दूरी रखी थी चूत में की जड़ तक अंदर ना जाए. और ऐसे ही वो उनके दूध दबाता लगा रहा.

"मैं गई भाई.." चीखती सी ऋतु दीदी की टाँगें अर्जुन की गान्ड पर कस गई और चूत से बहते पानी मे एक तेज धक्के से लंड भी गहराई मे जाकर रुक गया. झड़ने की चीख के साथ ही दर्द भरी भी निकल गई. आधाही चरम महसूस किया था की ये खूँटा जड़ तक बैठ गया. अर्जुन यहा नही रुका. वो बस तूफ़ानी की गति से धक्के बरसाने लगा और एक बार फिर ऋतु दीदी के मुलायम चूतड़ थिरकने लगे. उन्होने उसको अपने उपर खींच लिया और किसी नाग नागिन की तरह बदन एक दूसरे पर लिपटे रेंग रहे थे. धक्के भी चूत की जड़ तक हिला रहे थे जैसे आज ही बच्चेदानी को भी खोलही देंगे.

"मेरा होने वाला है दीदी. " अपने होंठ हटा ते अर्जुन ने ये कहा तो ऋतु ने अपनी टांगे उसकी गान्ड पर कस ली. फव्वारा सा चूत से निकलता लंड और अंडकोष को भी भिगोने लगा. अर्जुन का लंड भी फूल चुका था और जैसे ही बाहर खीचा पहली धार सीधा ऋतु दीदी के होंठो और गाल पे गिरी और ऐसे ही चुचो और पेट को भिगोती अंतिम बूँद चूत के फैल चुके होंठो से उपर टपक गई. चूत तो किसी 2 रुपये के बड़े सिक्के सी खुल गई थी और अंदर से पूरी गहरी लाल.

"अभी नही सोना. चल एक बार मुझे सॉफ कर और नीचे छोड़ आ." दीदी 5 मिनिट बाद ही खड़े होते बोली. लेकिन बात पूरी करते ही दर्द भारी आ निकल गई.

"आपका बुरा हाल हो गया है." अर्जुन ने दवाई का डब्बा उठाते हुए कहा और एक दर्दनिवारक गोली और पानी की बॉटल फर्श से उठा कर उनके सामने कर दी.

"तूने मेरे अंदर क्यो नही किया?" दवाई लेती ऋतु दीदी ने के बार उसकी आँखो मे देखते हुए कहा और खुद नज़र नीचे कर ली.

"अभी अपने बच्चों को नाम देने लायक नही हूँ दीदी. जब ऐसा दिन आएगा तो मैं कुछ पूछूँगा थोड़ी ना. जैसे बाहर निकालते नही पूछा."

बच्चों की बात सुनकर इस पूरी रात मे शायद दूसरी बार दीदी शरमाई थी. फिर दवा खाने के बाद उस चद्दर को समेटा जिसपे दोनो के इस मिलन की कहानी किसी एक फुट के लाल दायरे मे फैली थी, अपनी वही झीनी सी मॅक्सी हाथो मे ले हल्का लडखडाती हुई अर्जुन के सहारे बाथरूम के बाहर तक आई.

अर्जुन ने अंदर से गीली टीशर्ट उठाकर उन्हे पूरा सॉफ किया और होंठो को चूमता बोला.

"आप ये पहन कर एक मिनिट सोफे पर बैठो." और उन्हे प्यार से बड़े सोफे पे लिटाता सा बाथरूम मे घूस कर सारा फर्श सॉफ कर, उनके प्यार के सबूत वहाँ से हटा अपना लंड सॉफ करता बाहर आया. पाजामा पहन कर एक बार घड़ी की तरफ़ निगाह फेरी. 3:40. दीदी उपर 11 बजे आई थी और बीच मे मुश्किल से 30 मिनिट ही आराम किया था. फिर सर झटकता वापिस आया और ऋतु दीदी को बाहों मे उठाए निचली मंज़िल पर आ गया.

"मैं यहा से चली जाउन्गी." धीरे से ये बात कही ऋतु दीदी ने तो अर्जुन ना मे सर हिलाता उनके कमरे का दरवाजा, जो सिर्फ़ ढलका हुआ ही था को खोलकर उन्हे प्यार से अलका दीदी की बगल मे लिटा दिया.

"आ. भाई." इतना बोलकर उन्होने अपने उपर झुके अर्जुन को फिर से चूम लिया जिसने खुद भी उनकी चुचियों को एक बार दबा दिया था. और दबे पाव वो बाहर निकल कमरे मे आ के नींद के घेरे मे जा लेटा.

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"अर्जुन. कब तक सोएगा? 7 बज गये है." अर्जुन की नज़र खुली तो सामने मा थी जो उसको उठा रही थी. हरी सारी और हरे टाइट ब्लाउस मे वो हरियाली से बेहद आकर्षक लग रही थी. ब्लाउस मे दिखती गहरी सफेद खाई और उसके बीच मे काले मनकों मे सोने का मंगलसूत्र किसी कामदेवी सा रूप. एक बार तो अर्जुन खो ही गया उस दृश्या मे. रेखा जी भी बेटे के उपर ही झुकी हुई थी.

"उठ गया मा. आप नीचे चलो मैं आया अभी बाथरूम से फारिग हो कर." एक बार उसने फिर से नज़र उन सफेद गोलो पर डाली जो किसी सख़्त गोल नारियल से थे.

एक पल तो रेखा जी मुस्कुराइ फिर उसके उपर से हट-ते हुए चद्दर पर बने तंबू को देख थोड़ा हैरान परेशान से ठिठक कर फिर बाहर निकल गई.

अर्जुन भी बाथरूम से हो कर 20 मिनिट बाद नीचे चला गया, नहा धोकर.

"मुन्ना आज तो शायद तू सुबह घूमने गया नही? तबीयत ठीक है तेरी?" कौशल्या जी ने अपने पोते की तरफ दूध का गिलास बढ़ाते हुए कहा

तो अर्जुन शांति से बोला, "दादी वो रात को किताब पढ़ते हुए टाइम का पता नही चला. फिर शायद ज़्यादाही सो गया आज." और दूध पीने लगा.

"कोई बात नही बेटा. पहले सेहत फिर मेहनत. चल तू दूध पीने के बाद एक बार अपने चाचा का फोन मिला कर दियो एक्सचेंज से. 2 महीने हुए बात नही की." कौशल जी वहाँ से उठते हुए बोली.

अर्जुन ने हा मे सर हिला दिया. माधुरी दीदी रसोईघर मे चूल्हे की सफाई कर रही थी. और रेखा जी आटा लगा रही थी नाश्ते के लिए. दोनो के खरबूजे अच्छे से हिल रहे थे. अर्जुन ने गहरी नज़र डालने के बाद ध्यान हटा लिया.

रेखा जी ने तिरछी नज़र से अपने बेटे की ये हरकत देख ली थी.

"दादी, लीजिए फोन लग गया. चाची जी है लाइन पर." अर्जुन ने अपने चाचा के घर फोन करने के अपनी चाची जी से हाल चाल पूछने के बाद कौशल जी को बुलाया. फिर काफ़ी देर तक दादीजी बातें करती रही और फोन रखने के बाद अर्जुन से बोली, "तेरी चाची अभी पहले से ठीक है लेकिन अभी ज़्यादा सफ़र नही कर सकती. वो तेरी दोनो बहनो के इम्तिहान शुक्रवार तक ख़तम हो जाएँगे तो नरेन्दर दोनो को यहा छोड़ जाएगा. महीने भर से ज़्यादा की छुट्टियाँ है उनकी."

"वाह प्रियंका और आरती दीदी आ रही है. आख़िरी बार तो उन्हे पता नही कब देखा था." अर्जुन ने चहकते हुए ये बात कही थी. पिछली दीवाली पर सिर्फ़ उसके चाचा ही आए थे क्योंकि चाची की तबीयत ठीक नही थी तो वो और उसकी दोनो लड़किया पंजाब मे रुकी थी.

"चल चल अब तू भी अपना खाना पीना कर फिर मेरे साथ पड़ोस मे भी चलना है." इतना बोलकर दादी भी खड़ी हो गई. बाहर आकर देखा तो अलका दीदी दादाजी से बात कर रही थी. वो अभी आई थी स्कूटी सीख कर.

"हा तो आज तू पूरी छुट्टी मना रहा है?" दादा जी ने बैठ ते हुए अर्जुन से कहा तो वो सिर्फ़ मुस्कुरा दिया.

कुछ देर उनकी बातें सुनता रहा फिर ऋतु दीदी का ध्यान आया. "वो अलका दीदी ऋतु दीदी कहाँ है? दिखाई नही दे रही."

अर्जुन की बात सुनकर अलका दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, "क्यो क्या कोई ज़रूरी काम था क्या ऋतु से?"

अर्जुन थोड़ा हिचकिचाया तो अलका दीदी बोल पड़ी, "वो प्रीति के घर है. उसके दादा जी आज काम से पास के गाँव गये है तो ऋतु उसके घर चली गई. शाम तक आ जाएगी."

अर्जुन तो सुनकर ही हैरान हो गया के ऋतु दीदी कब चली गई. और अभी तो खुद अलका दीदी स्कूटी सीख कर आ रही है तो प्रीति दीदी मतलब अकेले

उनके घर?"

उसको सोच मे उलझा देख अलका दीदी बस खामोशी से हँसती रही और फिर सब खाना खाने लगे. अर्जुन भी नाश्ता कर के दादी को पड़ोस के घर छोड़कर

सीधा कर्नल पुरी के घर चल दिया. उसको कुछ समझ नही आ रहा था. बेल बजाई तो पार्वती ने अंदर का दरवाजा खोल कर गेट पर अर्जुन को देखा. "दीदी अर्जुन भैया है." उसने अंदर की तरफ आवाज़ दी फिर जवाब सुनकर वही से बोली, "भैया अंदर ही आ जाओ."

अर्जुन अंदर गया तो पार्वती वापिस रसोईघर मे जाकर खाना बनाने मे लगी थी. ड्रॉयिंग रूम खाली था लेकिन साथ के कमरे से आवाज़ आ रही थी. अंदर गया तो ऋतु दीदी बेड से टेक लगाए एक तकिया पेट पर रख कर प्रीति से बातें कर रही थी. अर्जुन को देखते हुए सिर्फ़ मुस्कुराइ और वापिस बातें करती रही. दीदी का चेहरा अभी भी कुछ लाल था लेकिन चेहरे पे कही दर्द नही था.

प्रीति ने पीछे मुड़कर देखा तो अर्जुन को देख खुश होते हुए अपनी जगह से उठकर ऋतु दीदी की बगल मे बैठ गई. अर्जुन भी बेड पर बैठ गया.

"आज बड़े लोग हमारे घर पर कैसे?" प्रीति ने ऋतु दीदी के हाथ पर ताली देते हुए कहा

तो अर्जुन ने उसकी आँखों मे भरपूर प्यार से देखते कहा, "वो हमारे घर की रोशनी आज यहा आ गई तो फिर मैं वहाँ अंधेरे मे क्या करता."

अपने भाई का इस तरह उसकी तारीफ करना ऋतु दीदी के चेहरे पे एक बड़ी मुस्कुराहट ले आया.

"वैसे दीदी आप आई कब यहा? मैने तो आते देख भी नही आपको?"

"वो भाई तू सो रहा था और जब कॉल अंकल गये तो प्रीति आई थी घर पे तो मैं इसके साथ आ गई यहा थोड़ा सोने के लिए. वहाँ अलका डिस्टर्ब कर रही थी. अभी बस उठी थी की तू आ गया."

उनकी बात सुनकर अर्जुन को बात जच गई थी की दीदी अगर घर पर होती तो सब नहाने और खाने को बोलते फिर शायद वो सवाल भी करते अगर वो दर्द मे दिखती.

"अच्छा तुम दोनो बातें करो मैं नहा के आती हूँ." प्रीति उठते हुए बोली तो अर्जुन ने उसके टीशर्ट को देखा जो सीने पर कसी थी और कमर थोड़ी दिख रही थी.

"चल तू इधर आ के बैठ जा." अर्जुन ने देखा कि अब बेड पर प्रीति नही थी, वो गेट पर खड़ी उसको देख रही थी लेकिन ऋतु दीदी की उस तरफ पीठ थी.

ऋतु दीदी के पास बैठते हुए उसने पूछा, "अब कैसी है आप?"

अपने भाई को चिंता मे देख वो मुस्कुराइ, "अर्रे मैं बिल्कुल ठीक हूँ. पेनकिलर ने अपना काम कर दिया था. और फिर सुबह एक बार बर्फ से मालिश की थी अच्छे से. और यहा आराम करने के बाद तो बिल्कुल ठीक हूँ. बस अभी अगले इम्तिहान तक तू मेरे पास मत आना." सब बात वो दोनो बहुत ही धीमी आवाज़ मे कर रहे थे. दोनो एक दूसरे के बिल्कुल मूह के पासही थे.

ऋतु दीदी ने अपने भाई के होंठो को जल्दी से चूमा और सीधी हो गई.

अर्जुन हैरानी से देखता रहा.

"मैने कहा ना तू पास नही आएगा. मेरा जब दिल कर मैं आ सकती हूँ." ये बोलते हुए उन्होने बाहर भी नज़र मार ली थी.

पार्वती का ध्यान काम मे ही था. पार्वती ने आवाज़ दी खाने के लिए कुछ देर मे तो दीदी ने अर्जुन से कहा, "तू ड्रॉयिंग रूम मे बैठ मैं दूसरे

कमरे का बाथरूम यूज करके आती हूँ."

अंदर भी ये आवाज़ प्रीति ने सुनी थी जो अपने बदन को पोछने ही लगी थी. ऋतु दीदी उठकर चली गई लेकिन अर्जुन कुछ सोचता वही ख़यालो मे गुम था.

"खटक" हल्की आवाज़ से बाथरूम का दरवाजा खुला और हल्के भीगे बदन पर सफेद तौलिया लपेटे प्रीति बिना कुछ देखे सामने आधे खुले दरवाजे को बंद करने चल दी. दरवाजा बंद करते ही बिना कुछ देखे तौलिया बेड पर उछाल कर अलमारी के सामने जा खड़ी हुई. एक सफेद डिसिज्नेर कच्छि मे फसे उसके

दूध से सेफ गोल कूल्हे बाहर को उभर कर अपनी पुश्टता का आभास दिला रहे थे. अर्जुन का थूक उसके गले मे ही अटक गया और प्रीति ने जब अलमारी के शीशे को देखा तो वो भी वही जम्म गई. शीशे मे उसके नंगे गोल दूध, जो न्यूटन के ग्रॅविटी के सीधांत की अवहेलना करते दिख रहे थे उनके गुलाबी निपल तने हुए थे. फिर जैसे ही प्रीति को होश आया तो उसने अपना तौलिया ढूँढना शुरू किया अपनी छाती पर हाथ रख कर. उसकी फूली हुई चूत भी उस सफेद कच्छि मे अपनी लकीर दिखाती लगी.

अर्जुन ने नज़र फिराते हुए तौलिया उसकी तरफ उछाल दिया. "जब धक लो तो बता देना." और नज़र दीवार की तरफ कर ली.

प्रीति जो पहले सुन्न हो गई थी अब उसका चेहरा लाल पड़ गया था.

"सब देख लिया और अब नज़र हटा रहा है." खुद से मन मे बोलती वो तौलिया लपेट कर अर्जुन से बोली, "सॉरी. अब तुम थोड़ी देर बाहर बैठो मैं आती

हूँ." प्रीति वही खड़ी बोली.

उसकी तरफ एक बार फिर देखते हुए अर्जुन खड़ा हुआ और दरवाजे की तरफ चल दिया लेकिन थोड़ा पहले रुक कर फिर बोला, "सब मेरा है और

सब खूबसूरत भी है." और बाहर निकल गया हंसते हुए.

दरवाजा बंद करते प्रीति इतराती हुई बोल पड़ी खुद से ही , "हाथ तो रख कर देख फिर बताउन्गी किसका है."

और कपड़े पहनकर बाहर आ गई. अब तो उसकी हिम्मत नही हो रही थी अर्जुन को देखने की. उनको वही छोड़कर अर्जुन वहाँ से निकल कर संदीप के घर की तरफ चल दिया.

किस्मत से संदीप गेट पर ही मिल गया और दोनो हालचाल पूछ कर पिछली मार्केट की तरफ चल दिए.

"वो नितिन है ना वीडियो गेम वाला, शायद तुझे नाम नही पता लेकिन वही लड़का जिसकी दुकान पर हम गेम खेलते है. उसकी बहन पटा ली तेरे भाई ने." ये संदीप ने अपना राज अपने जिगरी को बताया

"वो लड़की जो कभी कभी दुकान पर होती थी?" हैरानी से अर्जुन ने पूछा

तो संदीप हंसते हुए बोला, "हा रे. बड़ी चालू चीज़ है वो. नितिन तो गाँव गया है अपनी मा को लेकर. सुबह-शाम उसका बाप देखता है दुकान लेकिन दोपहर को वो अकेली होती है वहाँ. चारू नाम है उसका. है तो 4 साल बड़ी लेकिन भाई क्या मूठ मारती है मज़ा आ जाता है."

उसकी बातें सुनकर अर्जुन तो जैसे आठवा अजूबा देख रहा था. "भाई लड़की तेरी मूठ मारती है?"

"हा नही तो अपनी खुद की मारेगी? और मैं भी उसके संतरे कस के दबाता हूँ. बस थोड़ा खर्चा करवा देती है वो. पिछली बार नयी ब्रा माँग रही थी तो आज

वही लेके जा रहा हूँ." संदीप ने अपनी कमीज़ की तरफ इशारा करते हुए हंसकर बताया.

"तो तूने सबकुछ कर लिया क्या उसके साथ?" अर्जुन को भी मज़ा आने लगा उसकी बात सुनकर.
 
चारू, 20-22 वर्ष की एक साँवली लेकिन किसी दुधारू गाए जैसी लड़की थी.

उसका बाप एक छोटी सी किराने की दुकान चलाता था जो घर के बाहर थी. घर के अंदर की तरफ से पहले कमरे मे उनके बेटे नितिन ने वीडियो गेम का धंधा कर रखा था जहा 4 गेम और टीवी लगे थे. उसका बाप अजीब आदमी था, पतला सा शरीर, हर समय हंसता सा चेहरा और सबसे ख़ास बात के दोपहर मे 12 बजते ही एक पव्वा लगाकर रोटी खा सो जाता था. फिर सीधा 5 बजे दुकान खोलता था.

दोनो दोस्त ऐसे ही बातें करते वहाँ पहुच गये. गेट खुल्ला था तो नितिन के नाम की आवाज़ लगा कर वीडियो गेम के कमरे मे आ गये, जो पूरी तरह से खाली था. वैसे भी यहा ज़्यादातर बच्चे शाम मे ही आते थे और अभी कुछ के इम्तिहान चल रहे थे या जिनकी छुट्टियाँ थी वो गाँव-रिश्तेदारी मे गये होते थे.

खुल्ले गले के एक पीले सूट मे उनकी तरफ आती चारू को देख कर अर्जुन भी उसके शरीर को निहारने मे लग गया.

"ये अर्जुन है मेरा जिगरी." संदीप ने चारू की तरफ अर्जुन का ध्यान करते कहा और कमीज़ के अंदर से एक पोलिथीन निकाल उसकी तरफ बढ़ा दिया. वो ये देख कर थोड़ा संकोच करने लगी तो संदीप फिर से बोला, "देख ये अपना सबसे अच्छा दोस्त है और ऐसा वैसा लड़का नही है."

अर्जुन ने हाथ जोड़कर चारू को नमस्ते की तो वो एकदम से हंस पड़ी. ब्रा की थैली लेते हुए बोली, "हा देख कर ही लगता है जैसे मा-बाप ने अच्छे संस्कार दिए है. तुम बैठो मे एक बार आई." इतना बोलकर वो पलटी तो संदीप ने उसकी गान्ड पर हाथ फेर दिया सलवार के ऊपर से ही .

"पहले देख कर आने दे ना." थोड़ा नाराज़गी से उसने कहा और फिर अंदर जाने के बाद 5 मिनिट बाद वापिस आई.

अर्जुन तो गेम चला कर कोई कार रेस खेल रहा था इधर उसने पीछे चारू एक प्लास्टिक के स्टूल पर संदीप के साथ बैठ गई. अर्जुन के कानो मे 5 मिनिट बाद सिसकियों की आवाज़ आई तो उसने पलट कर देखा संदीप का लंड चारू की मुट्ठी मे था और वो उसके कमीज़ मे हाथ डालकर बूबे दबा था था. फिर उसने अपना एक हाथ चारू की चूत पर रखा तो उसने हाथ हटा दिया.

"यहा नही. पिछली बार वाला काम कर देगा और मैं उंगली करती रहूंगी सारा दिन." और फिरसे उसका लंड हिलाने मे लग गई.

"एक बार करने दे सच कहता हूँ इस बार निराश नही करूँगा. तू जो बोलेगी वही दिलवाउन्गा तुझे." संदीप का लंड, जो चारू की मुट्ठी से एक इंचही बाहर था वो हल्की पानी की बूंदे निकालता दिख रहा था.

"पक्का? और अगर मुझे बीच मे छोड़ दिया तो फिर डबल तोहफा लूँगी तेरे से" चारू कैसी लड़की है ये तो अर्जुन को थोड़ा समझ मे आ चुका था. कामुक, गरम और लालची. अपनी सलवार नीचे करते हुए चारू का ध्यान अर्जुन की तरफ गया तो बोली, "देख ले शायद जिंदगी मे लड़की की चूत कभी देखने के मिले या ना."

उसका तंज़ सुनकर अर्जुन सिर्फ़ मुस्कुरा दिया लेकिन संदीप हल्का नाराज़गी मे बोला, "इसका देख लिया ना तो फिर किसी और का तेरी इसमे नही लेगी." चारू ने सलवार के नीचे कच्छी नही पहनी थी और उसके मोटे साँवले कूल्हे, भारी जांघें खूब मादक लग रही थी. चूत पर बाल भी थे जो शायद 15-20 दिन पहले काटे होंगे. वहाँ से चूत अच्छे से नज़र ना आ रही थी लेकिन अर्जुन वही बैठा रहा.

"ऐसा है क्या? कद-काठी देख कर तो लगता है तेरे से लंबा हो लेकिन जैसा तू कह रहा है मुझे नही लगता के ऐसा कुछ होगा." चारू ने संदीप की जीन्स भी

उतार दी थी. लकड़ी का 6 फुट लंबा बेंच पड़ा था जो खेलने वाले ज़्यादा हो तो बैठने के काम का था, चारू दोनो टांगे फैला उसके उपर लेट गई और संदीप

उसके सामने खड़ा हो गया.

"ये चढ़ा ले." एक गुलाबी कॉंडम जो उसने संदीप को दिया और संदीप ने भी लंड पर वो पहन लिया. कॉंडम भी थोड़ा सा खुला ही दिख रहा था लंड के हिसाब से लेकिन रब्बर की वजह से अटक सा गया था. चारू की कमीज़ उपर सरका कर दोनो बड़े चुन्चे बाहर निकाल संदीप ने अपना लंड उसकी

चूत पर रखा और एक धक्के मे पूरा अंदर.

"सीईइ.. आ." चारू ने सिसकी ली और फिर संदीप बिना देर किए धक्के लगाने लगा. 1 मिनिट के बाद वो चारू के उपर पसरा हुआ था.

"सच मे तू ना मुट्त्ही मरवाया कर. देख ले तेरा वादा." इतना बोलकर चारू ने संदीप को धकेल सा दिया और वो खिसियाता हुआ अपने लंड से कॉंडम उतारने लगा जिसमे 2 बूँद हल्का सफेद पानी था उसका. "तूने पहले ज़्यादा हिला दिया था ना तो उसका ही नतीजा है. नही तो मैं 10 मिनिट तेरी अच्छे से लेता."

इतना बोलकर वो पैंट बंद करने लगा और अर्जुन बस खामोशी से उनको देखता मुस्कुराता रहा.

"तू बड़ा हंस रहा है. तू भी इसके जैसाही होगा लिख के ले ले मेरे से." चारू चूत की गर्मी से गुस्साए हुए ही बोली. उसकी छातिया भी फडक रही थी.

"किसी को जाने बगैर उसके बारे मे बात नही करते चारू जी."

"तो वहाँ क्यो बैठा है. मैं भी देखु तेरे पास कितना दम है." लगता नही था कि कोई लड़की ऐसे भी काम मे अंधी हो सकती है जो लड़के को खुद बुलाने लगे.

अर्जुन उठकर उसके पास खड़ा हो गया. "ये जगह ठीक नही है. दिन का समय है और कोई आ गया तो दोनो बीच मे रह जाएँगे." अर्जुन सिर्फ़ उसपर तरस खा कर ही ये बोल रहा था. वो खुद भी उसके साथ कुछ करना नही चाहता था. बस उसको शांत करना था.

"बाहर का गेट बंद करके कमरे के बाहर नज़र रख." चारू ने ये बात संदीप से कही थी और उसने वही किया भी.

"तू यहा बैठ." उसको बेंच पर बिठातेहुए चारू ने अर्जुन की पैंट पर हाथ रख दिया.

"पहले कितनी बार किया है?" अर्जुन इसलिए पूछ रहा था कि कोई मसला ना हो जाए.

"मैं ऐसी वैसी लड़की नही हूँ. एक से प्यार करती थी उसने 6-7 बार किया था फिर वो यहा से दूसरे शहर चले गये. तेरे दोस्त से पहले बस उसके साथ ही किया था. अब लगा कर दोनो किसी काम के नही रहे." और फिर उसकी चैन के उपर से सहलाने लगी.

"सोच लो एक बार फिर से बाद मे पछतावा ना हो क्योंकि मैं तुम्हे प्यार नही करता." अर्जुन को ठीक नही लग रहा था ऐसे उसके साथ ये सब करना लेकिन वो तो खुद अड़ी हुई थी.

"निकाल इसको बाहर." इतना बोला तो अर्जुन ने पैंट नीचे कर दी और स्प्रिंग की तरह उछलता उसका लंड बाहर निकल आया. 8 इंच से भी कुछ लंबा, गुलाबी और किसी लकड़ी सा सख़्त. लंड देख कर ही चारू की चूत ने पसीने बहा दिए.

"ये .. ये सच मे ऐसा है?" वो घबराई से बोली.

"मैने तो पहले ही कहा था तेरे को की मेरे दोस्त का देख कर तेरा क्या हाल होगा." संदीप ने चारू की हालत देखते हुए कहा, वो प्लास्टिक का स्टूल गेट की तरफ करके बैठा था और गेम चला रखी थी.
 
"मुझे ये लेना है." चारू ने इतना बोलते हुए अपनी कमीज़ भी पूरी उतार दी और अर्जुन के लंड को सहलाने लगी. एक थैली जैसे पर्स से एक और कॉंडम निकाल कर उसने अर्जुन के लंड पर चढ़ाना शुरू किया तो वो फसा हुआचढ़ रहा था. अर्जुन ने उसको दोनो लटकते चुन्चे पकड़ लिए और मसलने लगा. एक तो पहले ही संदीप ने उसको बीच मे छोड़ कर आग भड़का दी थी दूसरा इतना तगड़ा लंड उसके हाथ मे, चूत तो वापिस गीली होने लगी. वो वापिस बेंच पर लेट गई और अर्जुन को उपर खींचने लगी. दोनो चुचे हाथ मे जकड़े अर्जुन उसके उपर आ गया, पैर ज़मीन पर ही टीके थे. एक काले निपल को चूस्ते हुए उसने एक बार फिर से चारू की आँखो मे देखा जिसमे विनती थी की घुसा दे जल्दी से. अपना विकराल लंड उसने चारू की फैली टाँगों के बीच चूत पर फिराया तो कॉंडम पर भी पानी चिपक गया. चूत उसके लंड के सामने ढक सी गई थी और निपल कड़े हो चुके थे.

"ये मूह मे रखो." लेटे हुए ही अर्जुन ने ज़मीन से उसकी कमीज़ उठा कर दी.

कुछ सोचते हुए चारू ने कमीज़ एक जगह से तह लगा के मूह मे दबा ली और इधर अर्जुन ने निशाना लगा दिया उसकी फैली हुई टाँगो के बीच मे. सारे अवरोध पार करता उसका लंड सुपाडे से आगे तक चूत के अंदर जा बैठा. चारू तो हाथ पैर हिलाने लगी पहले ही धक्के से. अर्जुन वही रुक झुके हुए ही उसके गाल सहलाता दूसरे हाथ से एक दूध मसलता रहा. 2-3 बूँद खून चूत के किनारों से बाहर आ चुका था. जब साँस बराबर हुई तो अर्जुन ने उसके मूह से कपड़ा निकाल दिया

"मुझे नही लेना ये. बाहर निकाल लो." दर्द भारी आवाज़ मे चारू ने ये बात कही तो अर्जुन लंड को बाहर खींचने ही लगा था कि चारू ने वापिस हाथ पकड़ लिए उसके. "कुछ करो मेरा. प्लीज़. एक बार खाली कर दो, चाहे जितना गया है उतने से ही . पूरा तो मैं लेकर मर जाउन्गी." अपनीही बात से पलट ते हुए उसने वापिस अर्जुन को खींचा.

कॉंडम चिकना था तो अर्जुन ने हल्के से लंड थोड़ा बाहर किया और उतनाही अंदर. वो ऐसे ही 5 मिनिट तक करता रहा अपने 3-4 इंच लंड के भाग से. अब चूत भी थोड़ी तयार थी तो दर्द के साथ चारू की सिसकिया भी निकलने लगी.. "आ. ऐसे ही करता रह. मेरा होने वाला है." और फिर 2 मिनिट बाद वो

झड़ने लगी. आधे से कम लंड ने ही उसको झाड़ दिया था. 10 मिनिट की इस चुदाई से ही वो बेसूध होने लगी थी.

"हो गया तुम्हारा?" अर्जुन ने इतना पूछा तो दर्द के साथ चारू के चेहरे पे एक मुस्कान भी आ गई. आँखे झपकाते हुए उसने हा कहा तो अर्जुन ने लंड बाहर खींच लिया. उसपर चूत का खून और पानी दोनो लगे थे. कॉंडम वही फेंक उसने पैंट उपर की और संदीप को बोला, "चले भाई?"

चारू और संदीप हैरानी से देख रहे थे उसको. "तुम्हारा अभी हुआ भी नही?" चारू ने कहा जो खड़ी होने लगी तो फिर दर्द की वजह से लेट गई.

"कहा था ना ये जगह सही नही है ना इतना समय है. अभी खड़ा नही हुआ जा रहा तुमसे. और मैने ये सिर्फ़ तुम्हारी गर्मी शांत करने के लिए किया है." इतना बोलकर वापिस चारू की तरफ जा कर उसने कमीज़ सीधी कर उसके हाथो मे दी और नीचे बैठ कर उसके पैरों मे सलवार पहनाने लगा.

"पहन कर आराम कर लेना. बिना कपड़ो के किसी ने देख लिया तो बदनामी हो जाएगी."

चारू तो बस चुपचाप उसको घूर रही थी. कहाँ तो वो जिस्म की आग मे रंडी जैसे व्यवहार कर रही थी और दोनो को बुरा भला कह दिया था. और अब उसको पछतावा हो रहा था. आँखों से आँसू तो तब भी निकले थे जब उसका लंड चूत में गया था लेकिन अब पछतावे के आँसू बहने लगे.

"तुम अच्छी लड़की हो. किसी ने प्यार के नाम पर सिर्फ़ तुम्हारे बदन से प्यार किया. वही तुम मेरे दोस्त के साथ करने लगी. बेहतर होगा अगर किसी अच्छे लड़के से प्यार करो या फिर शादी. अगर संदीप पसंद है तो तुम दोनो ही ये सब करो. और ग़लती मेरी भी है कही ना कही. अपना ध्यान रखो और आराम करो." इतना बोलकर वो तो संदीप के साथ निकल लिया लेकिन चारू सिर्फ़ यही सोचती रही की कैसा लड़का था. सामने नंगी लड़की पड़ी थी और खुद का काम किए बिना वो बस मेरी गर्मी जला के चला गया. एक बार मेरे होंठ तक नही चूमे. फिर लंगड़ाती हुई अंदर चल दी.

…………………….
 
"भाई क्या वो लड़की पसंद नहीं आई थी तुझे?" संदीप ने ये बात घर की तरफ चलते हुए अर्जुन से कही.

"वो बात नही है दोस्त. देखा तूने उसको के वो कैसे तड़प रही थी. वो अपना चरित्र और मर्यादा भी भूल गई थी जिस्म की आग मे. लेकिन कोई बाजारू लड़की तो नही थी ना?" अर्जुन उसके बारे मे बातें करता मालती को भी सोच रहा था. जो पक्की बेशर्म थी लेकिन चारू मजबूर थी.

"लेकिन तू अपना काम तो कर लेता." संदीप ने फिर कहा.

"उसका दिल ये बात किसी ऐसे पल मे ये बात कहता जब हम दोनो अकेले होते और अच्छे से जान-पहचान, दोस्ती या प्यार होता तो भाई मैं ज़रूर करता. बुरी लड़की नही है, हो सके तो तू इसका ग़लत फायदा मत उठाइयो आगे से. या फिर अगर ठीक लगे तो दोस्ती कर ले उस से." संदीप अर्जुन की बात ध्यान से सुन-समझ रहा था. उसको घर के बाहर ही छोड़ कर वो अपने घर की तरफ चल दिया. ज्योति आस भरी नज़रो से बस घर के अंदर से उसको जाते देखती रह गई.

घर आने के बाद कुछ देर आराम करने के बाद फलाहार किया और स्टेडियम चल दिया वो.

स्टेडियम के प्रवेश द्वार मे घुसा ही था कि प्रीति भी स्कूटी से बराबर आ गई. लेकिन आज उसने स्पोर्ट्स वाला पाजामा पहना था, पहले की तरह स्कर्ट नही.

"आज अलग ड्रेस मे हो?" उसने बस इतना ही कहा

प्रीति से साइकल खड़ी करते हुए. "अब दिल नई करता यहा स्कर्ट मे आने को. वैसे भी ये ज़्यादा ठीक है." थोड़ा शरमाते से उसने कहा.

दोनो साथ चलते हुए आगे तक आए फिर प्रीति हाथ हिलाकर अपने अभ्यास कोर्ट की तरफ चल दी जहा पहले ही कुछ लड़किया उसकी तरफ़ देख रही थी. शायद रोज ही वो लोग आपस मे अभ्यास करती थी.

"कौन थी वो छोटे भाई?" पास से आती इस भारी आवाज़ को सुनकर अर्जुन मुस्कुराता हुआ पलटा विकास पूनिया की तरफ जो पीछे ही चलता आ रहा था. एक नीली निक्कर और लाल बनियान जैसी टीशर्ट मे.

"भैया मेरे बचपन से बस एक वही मेरी बेस्ट फ्रेंड है. घर भी साथ है दोनो का. " उसने हाथ मिलाते हुए कहा तो विकास ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी बाह

उसके कंध पर रख दी प्यार से. "देख छोटे भाई लड़की अच्छी है और जिस तरह एक दूसरे को देख रहे थे तो हो तो तुम प्रेमी जोड़े लेकिन चल छोड़ ये सब. दिल ना तोडियो उसका और मेहनत कर जम्म के." वो ऐसे ही चलते जा रहे थे कुछ लोग हैरानी से उन दोनों की तरफ देख रहे थे लेकिन विकास पहलवान के सामने कोई नहीं बोलता था. कोच साहब थोड़ी दूर उस चलने वाली पट्टी पर ही खड़े उनकी तरफ देख रहे थे. विकास ने उनके पास जा कर पहले तो उनके पाव छुए फिर संधु जी ने उसको गले से लगाया. "मेरे बच्चे. तुझ पे बड़ा नाज़ है मुझे. देखते देखते बड़ा भी हो गया और इस बार तो उज़बेकिस्तान जा रहा है एशिया खेलने."

"गुरु जी आपने ही तो बॉक्सिंग से हटा के कुश्ती मे लगाया था. और इतनी मेहनत तो हमारे कोच ने भी नही की जितनी आप करते आ रहे हो. मा-बाप की हालत ना थी उस टाइम मेरी डाइट की. अब सब आपका दिया हुआ तो आप ही तो हो मेरे गुरु, मा-बाप." हाथ जोड़े

तो कोच साहब ने भी उसके हाथ पकड़ कर सर सहलाते हुए कहा, "तेरी मेहनत और तपस्या है ये सब. मैने कुछ नहीं किया मेरे बेटे सब तूही कर रहा है और भगवान." फिर अलग होने से पहले विकास ने अर्जुन का कान खेंचते हुए गुरुजी से कहा, "इसकी भी जून सुधार दो गुरुजी. घोड़े जैसा शरीर है इसका थोड़ा सा लोहा ठोको इसके भी."

"और छोटे भाई, ये जो भी करते है भले के लिए करते है."

"विकास तुम दोनो अच्छे से जानते नही शायद एक दूसरे को. यही मिले हो ना?" अर्जुन तो चुपचाप खड़ा उन दोनो की तरफ देख रहा था.

" डॉक्टर शंकर जी सुपुत्र है ये" संधु जी की बात सुनकर एक बार तो विकास बस ध्यान से देखता रहा अर्जुन की तरफ फिर ज़ोर से चिपका लिया अपने से.

"मैं भी बोलू गुरुजी ये लड़का ही क्यो खास दिखा मुझे. आँखों और शरीर को ध्यान से ना देखा मैने. छोटे भाई तेरे पिताजी भी एक बड़ी वजह है मेरी सफलता के पीछे."

"चल फिर कभी गुणगान कर लिओ. जा अपनी प्रॅक्टीस कर और इसको मेरे साथ चलने दे." संधु साहब ले गये खींच कर अर्जुन को कुछ समझ नही आया. और जब विकास कुछ बोलने लगा तो दोनो को अलग कर दिया.

"बलबीर.. ओये बलबीर. चल कल वाली प्रॅक्टीस करवा इसको. कसरत आज 40 मिनिट करनी है, 25 नही." और फिर वही दोनो जिम की तरफ चल दिए. भुजाओ, कंधे, छाती की माचीनो पर 3-3 सेट कर के कल की तरह दोनो किनारे पर मुक्केबाज़ी का चलते चलते अभ्यास करने लगे.
 
"वो तू उस लड़की को कैसे जानता है भाई? बॅस्केटबॉल वाली" बलबीर ने बात शुरू की.

"ऐसे ही. बस यही मुलाकात हुई थी. क्यो कोई बात है क्या?"

"भाई थोड़ी ख़तरनाक है दूर रहियो. थप्पड़ खा चुका हूँ एक साल पहले उस से और उसकी 2 सहेलियो से." गाल सहलाता हुआ वो याद ही करने लग पड़ा था.

"वो दोस्त है मेरी." थप्पड़ तो अर्जुन ने भी खाया था लेकिन उसको पता था कि वजह क्या थी.

"दोस्त है तो भी ध्यान रखियो. टेढ़ी लड़की है कब दिमाग़ घूम जाए जाटनी का पता नही. कुश्ती वाले खिलाड़ी भी पेल चुकी वो और उसकी सहेलिया." बलबीर के स्वर मे चेतावनी जाहिर थी. लेकिन उसकी आँखे अब फैल गई जब सामने से वही चलती उनकी तरफ आ रही थी, मंजुला.

"भाई ये तो इधर आ रही है." बलबीर को लगा जैसे कल लड़कियो की टांगे ताड़ते देख लिया होगा.

"सुन एक बार." बलबीर की परवाह किए बिना मंजू ने बहुत धीमे से अर्जुन को देखते कहा फिर नज़र नीचे कर के बोली, "सॉरी. प्रॅक्टीस के बाद एक बार मिलके जइओ काम है कुछ." और बिना कुछ कहे वहाँ से वापिस चली गई.

"ये इसको क्या हो गया? और सॉरी बोली या कुछ और? भाई चल क्या रहा है तेरा इसके साथ?" बलबीर थोड़ा थक गया था तो आराम करता खड़ा सा पूछने लगा

"कुछ नही भाई. कल मेरे हाथ से बॉटल छूट कर इसपर गिर गई थी. पानी गिरने की वजह से थोड़ा गुस्सा हो गई थी. बस इतनी सी बात थी." वही खड़ा वो अपने मुक्के और पैर चला रहा था. शरीर से पसीना पानी की तरह बह रहा था और बाजू थोड़े फूल से गये थे.

दोनो वापिस अपनी जगह पहुच गये तो पहली बार जोगिंदर जी ने अपने हाथ मे लिए छोटे तौलिए से अर्जुन का चेहरा सॉफ करते हुए अपने बेंच पर बिठाया.

"2 दिन और यही प्रॅक्टीस करनी है. फिर मैं तुझे कीट पर हाथ चलाने बताउन्गा. हो सके तो अपनी डाइट बढ़ा और एक निक्केर और संडो ले लिओ. यहा आने के बाद बदल लिया कारिओ."

"जी सर." उसने इतना ही बोला तो कोच ने एक मिनिट उसको देखा फिर बोले, "तू सवाल नही पूछता कभी कोई. मैं जैसे बोलता हूँ तू करने लग जाता है. कभी दर्द हो या मन ना हो तो बता सकता है. मैं फ़ौजी नही के हर बात किसी पक्के निर्देश की तरह माने चाहे दर्द हो."

सर पहली बात तो दादाजी ने ये सिखाई की शिक्षा के समय कभी संदेह नही करना क्योंकि जो गुरु है वो ग़लत नही होता. दूसरी बात के अभी तक तो आपने खुद मेरी देखभाल के लिए बलबीर भैया को लगाया हुआ है, ग़लती कैसे होगी. और जिस दिन आप मेरी क्षमता से अधिक काम लेंगे तभी पता लगेगा की मैं सहकर सोना बनूंगा या टूटकर राख. "

उसकी बात और समझदारी देख उन्होने हाथ फेरा उसकी पीठ पर और बोले, "अच्छी बात है. वो विकास है ना उसकी बात शायद पूरी नही हुई तू ये भी जान-ना चाहता है. सुन, तेरे पिताजी अपनी कुछ कमाई यहा भी भिजवाते है. अंडर 16 के समय विकास के पास देल्ही टूर्नमेंट के लिए ना पैसे थे, ना उचित खेल का समान. डाइट भी बस साधारण सी थी. फिर तेरे पिताजी से मैने बताया था इसके बारे मे की अच्छा लड़का है, प्रतिभाशाली है. उन्होने 10 हज़ार खुद आ कर दिए थे इसको. उनकी लगभग पूरी तनख़्वाह. और अगले 3 साल तक हर महीने 2 हज़ार दिए बस बदले मे एक वादा लिया था कि खेल को ज़िंदगी बना के रखना है."

अर्जुन चुपचाप सुन रहा था. उसको अच्छा लगा था कि उसके पिताजी ये भी सब करते है.

"चल अच्छा अब तू निकल और एक बात याद रखनी है, शरीर का ज़ोर ग़लत काम मे कभी नही लगाना." उनके लफ्ज़ मे गंभीरता थी.

पहली बार अर्जुन ने झुक कर उनका आशीर्वाद लिया और वहाँ से निकल लिया. जोगिंदर जी भी थोड़े जोश से बाकी

खिलाड़ियो के साथ लग गये.

"अर्जुन." मंजुला की आवाज़ सुनकर अर्जुन साइकल स्टॅंड पर ही रुक गया. एक सिंपल ट्रॅक सूट पहने वो उसकी और ही आ रही थी.

" बताइये मिस." अर्जुन ने शरारत से कहा तो वो एक पल को चुप सी हो गई और उसके चेहरे की तरफ देखती रही. फिर बोली, "कल के लिए सॉरी. वो जो भी हुआ उसमे दोनो की ग़लती थी. मुझे तुम्हे मारना नही चाहिए था." बोलते हुए मंजू की नज़र थोड़ी नीची हो गई कहते हुए.

अर्जुन उसके बिल्कुल पास चला गया.

"वो क्या है ना जिसको आपने ग़लती कही ना मिस, वो शायद एक अच्छा अहसास था. और कई बार हम जिस चीज़ की कल्पना करते है और वो एकदम से हो जाए तो बर्दाश्त भी नही होता. क्यू? यही हुआ था ना? लेकिन इतना खेलने के बाद भी हाथ बड़े नाज़ुक है." गाल सहलाते हुए अर्जुन ने कहा तो मंजू ने अपनी आँखें उपर करी.

लंबी पलके और स्याह काली आँखें. तीखे नक्श और छरहरा लंबा शरीर. होंठ थोड़े पतले लेकिन बड़े काटीले थे. उसको अपनी तरफ ऐसे देखते हुए गरम मिज़ाज मंजू की साँसें तेज हो गई. उसको ऐसे लगा जैसे आज तो दिलही बाहर निकल जाएगा शरीर से.

"बस करो. ऐसे मत देखो ना." आख़िरी मे सिर्फ़ इतना कहा तो अर्जुन ने नखरे से कहा. "ठीक है अगर मेरा पास खड़ा होना पसंद नही तो फिर चलता हूँ."

"रूको. एक बात कहनी थी. वो कल मेरी सुबह की प्रॅक्टीस नही है और कॉलेज भी बंद है कल. तुम मेरे साथ फिल्म चलोगे? 2 साल पहले सिनिमा गई थी.." और फिर हल्के से उसको देखने के बाद नीचे सर कर लिया.

"9-12 के समय?" अर्जुन ने सिर्फ़ इतना कहा.

"नही कॉलेज रोड के सिनिमा का समय तो 10-1 है. मैं यही स्टेडियम के बाहर 9:30 आ जाउन्गी."

"फिर से अगर चाँटा मारा तो देखना. कभी आवाज़ नही सुनूँगा." नखरे से अर्जुन ने कहा

तो मंजुला थोड़ा जीझकते हुए बोली, "माफी तो माँग ली मैने, वो भी 2 बार. अगर कोई सज़ा देनी है तो दे सकते हो. लेकिन फिर कभी मैं ऐसा नही करूँगी."

"अच्छा ठीक है. मज़ाक कर रहा था. वैसे भी ऐसे तो तुम जितना बार मेरा गाल सहला लिया करो." उसने हँसके इतना कहा तो दूर से ही प्रीति आवाज़ देती आ रही थी.

"सुनो. मैं साथ चलूंगी." और पास आ गई. आते ही उसने बिना हिल-हुज्जत के मंजू का हाथ पकड़ के खुद से मिला लिया.

"हेलो, बड़ी अच्छी गेम है यार बॅस्केटबॉल की. कंग्रॅजुलेशन्स फॉर नॅशनल एंट्री. मेरा नाम प्रीति पूरी है." इतना बोलकर वो दोनो की तरफ देखने लगी.

"हेलो, मैं मंजुला नैन. वैसे गेम तो तुम्हारी भी बड़ी अच्छी है. चर्चे है पूरे स्टेडियम मे लेकिन सुना के अपना नाम वापिस ले लिया तुमने अगले टूर्नमेंट से." मंजुला बड़े प्यार से बात कर रही थी जो खुद उसको हैरान कर रहा था क्योंकि उसकी आवाज़ से सख्ती गायबही हो चुकी थी जैसे.

"यार क्या ये बिस्कट कंपनी वाले टूर्नमेंट. अगले महीने ट्राइयल है स्टेट के, देखते है वहाँ क्या होता है. वैसे घर मे सभी लंबाई इतनी ही है क्या?" थोड़ा

गंभीर बात के बात प्रीति ने हंसते हुए महॉल ठीक करना चाहा.

"हाहाहा. हा मेरे पापा 6'3" के है बाकी तो फिर मा ही है."

"अब तुम दोनो ने ठान लिया है के रात करनी है तो मैं तो चलता हूँ मेरे घर मे एक थानेदार साहब है जो इंतजार कर रहे होंगे." अर्जुन ने देख लिया था कि

दोनो लड़किया भूलही गई जैसे उसको.

"अर्रे चलते है बस. कल मिलते है मंजू." इतना कहकर वो स्टॅंड की तरफ बढ़ गई. स्कूटी थोड़ी पीछे खड़ी थी.

"लड़की तो एक नंबर है तेरी दोस्त." मंजू ने ये बात कही तो अर्जुन ने पलट के कहा, "तुम्हारी भी तो है अब. चलो कल मिलता हूँ."

हाथ हिलाते हुए दोनो की तरफ देख मंजू भी हॉस्टिल की तरफ चल दी और ये दोनो बाहर आ गये.

"हा तो कुछ बोल रही थी. मेरे साथ चलना है. कुछ ज़रूरी काम है क्या?" अर्जुन थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा.

"वो अकेले दिल नही था जाने का." प्रीति ने आगे देखते हुए कहा तो अर्जुन ने पलट कर जवाब दिया, "कल से मेरी साइकल पर आ सकती हो अगर चाहो तो." और हँसने लगा.

"अच्छा कहाँ बिठाओगे. पीछे सीट तो है नही." प्रीति शरमाती सी बात को बढ़ाते बोली

"यहा." आगे की तरफ इशारा करके बोला तो प्रीति को सुबह की बात याद आ गई और वो चुप हो गई. उसके चेहरे पे छाई लाली सब बया कर रही थी.

"गंदे हो तुम. पूरे गंदे." स्कूटी को बराबर बनाए वो सिर्फ़ इतना ही बोली.

"वैसे तुम बहुत सुंदर हो. और ये गंदा तो आज जैसे सुबह जन्नत मे पहुच गया था तुम्हारी वजह से."

स्कूटी के ब्रेक लग गये थे तो अर्जुन साइकल घुमा कर वापिस आया और बराबर लगा दी प्रीति के. दोनो तरफ सिर्फ़ पेड़ थे और सेक्टर की तरफ जाती सड़क खाली थी यहा. प्रीति की आँखों मे हल्के आँसू थे और उन्हे देख कर अर्जुन साइकल खड़ी कर अपने हाथ से उसका चेहरा थाम देखने लगा.

"अगर तुम्हे बुरा लगा हो तो मैं कभी कोई मज़ाक नही करूँगा. और रही बात सुबह की तो समझ लो की मैने कुछ नही देखा." उसके आँसू हटाते हुए उसने इतना कहा.

"पागल - बेवकूफ़. ये आँसू इस वजह से है की मैं तुम्हारे इतने पास होकर भी दूर रहती हूँ. मेरा दिल करता है तुम्हे गले लगाने का और प्यार करने का. लेकिन क्या तुम प्यार को बरकरार रख पाओगे या कही मेरे से कोई ग़लती हो गई तो? बस कई बार दिल भर जाता है की काश तुम मेरे साथ रहो. चाहे कुछ ही पल लेकिन सिर्फ़ तब तुम मेरे साथ रहो." और अब आँसू पूरी रफ़्तार से निकलने लगे थे.

"तुम मेरी हो प्रीति, और हमेशा मेरीही रहोगी. इस दिल मे सिर्फ़ तीन लोग है ऋतु दीदी, अलका दीदी और तुम. वो दोनो एक दिन शायद पराए घर चली भी जाए लेकिन इस बार तुम्हे मेरे से अलग कोई नही कर सकता." और अर्जुन का धैर्य जवाब दे गया. सड़क के किनारे खड़ेही उसने प्रीति का चेहरा थाम रखा था वही उसने उसके होंठ प्यार से चूम लिए. फिर आँखों पर प्यार करते उसका हाथ अपने हाथ मे लेकर बात जारी करते कहा, "मेरे लिए ये परी आई थी तो मेरीही रहेगी."

अब प्रीति के चेहरे पे बस खुशी थी, आँखें नम्म थी लेकिन एक मुस्कुराहट के साथ अर्जुन को देख रही थी. जिसने किसी की परवाह ना करते आज बीच सड़क अपना प्यार जता दिया था. चाहे सड़क खाली ही थी.

"अब यहा से चले. वो मैं थोड़ी देर बाद घर आउन्गी, ऋतु दीदी मेरे घर ही पढ़ाई कर रही होंगी उनको लेकर."

"ये नाराज़गी अच्छे से दूर करता हूँ तुम्हारी फिर." हंसते हुए वो दोनो फिर घर चल दिए.
 
रेखा जी आँगन मे ही थी. अर्जुन को टीशर्ट उतार अंदर आते देख उनकी नज़र अपने बेटे के शरीर पर ही जम्म गई. साइकल की वजह से पसीना आया हुआ था और लंबा तगड़ा वो था ही . फिर खुद को संभाल कर उन्होने उसको तौलिया देते कहा, "पहले पसीना पोंछ ले मैं तेरे लिए कपड़े निकाल कर लाती हूँ."

वो मूडी तो अर्जुन ने भी एक बार जाती अपनी मा को देखा. इस उमर मे किसी नवयॉवना सा आकर्षण था उनमे और उनकी चाल मे. फिर वो पसीना पोछता वही कुर्सी पर बैठ गया. रेखा जी ने एक सॉफ टीशर्ट और पाजामा आज धुले कपड़ो से लाकर उसको दिए और सामने खड़े हो कर उसके बाल सहलाने लगी. ये नई बात नही थी कोई लेकिन जैसे ही आज अर्जुन के चेहरे के सामने मा का खुला हुआ पेट और उठा ब्लाउस आया, उसने उनकी महक सूंघने की कोशिस सी की. नाक हल्की सी उनके नंगे पेट के उपर छू सी गई. मन मे ही एक आनंद से भरा झटका लगा रेखा जी की अपने बेटे के इस स्पर्श से. सुखद.

अर्जुन उठकर सीधा बाथरूम मे घुस गया और आँगन मे ऋतु दीदी और प्रीति की आवाज़ आई. "वो अर्जुन अभी आया नही क्या.?" ऋतु ने अपनी मा से पूछा तो बिना कुछ बोले बाथरूम की और इशारा करती वो अपने कमरे मे चली गई.

"मा को क्या हुआ है?" ऋतु दीदी ने प्रीति की तरफ देखते खुद से ही कहा.

"हुआ तो दीदी आपको भी बहुत कुछ है. सुबह चलने मे कुछ फरक दिख रहा था लेकिन अब शायद ठीक हो"

प्रीति की बात सुनकर उसको गले से लगते बोली, "यार इतना बेध्यानी मे थी जब उठी की पाव फिंसल गया. चल आजा मेरे कमरे मे ज़रा."

प्रीति उनके साथ खीची सी चलती बस बाथरूम की तरफ देखती रह गई.

"वो भी आ जाएगा क्यो मचल रही है?" उसको छेड़ते हुए कमरे मे आई जहा बिस्तर पर किताबें फैलाए अलका दीदी सोई पड़ी थी.

"महारानी जैसे सारा कोर्स ख़तम करके पड़ी है" उँची आवाज़ मे ऋतु दीदी ने कहा तो अलका आवाज़ पहचान बिना देखेही बोल गई, "हा तूने तो कोर्स रात मे किया वो तो मेरे बस से बाहर है. सोचा यही कर लू."

एक बार तो ऋतु दीदी की साँस अटक गई लेकिन बदलते हुए उन्होने कहा, "ओये प्रीति आई है तुझसे मिलने."

अलका झटके मे उठ खड़ी हुई, हमेशा की तरह उसकी टीशर्ट अस्त-व्यस्त सी थी.

"कभी तेरे संतरो पर छिलका भी रख लिया कर. मान लिया सुंदर है लेकिन ऐसे प्रीति तो तुझे पता है कितनी कमजोर दिल है." मसखरी करती ऋतु दीदी ने प्रीति की कमर पर चुटकी काट ली और वो उचकने के बाद शर्मा गई उनकी बात सुनकर.

"इसके पास भी है ये और मेरे से ज़्यादा ही आकर्षक लग रहे उपर से देखने पर. इजाज़त तो देख लू ज़रा सहलाकर."

अलका दीदी की बात सुनकर प्रीति हड़बड़ाती सी अलग होने लगी.

"अर्रे मज़ाक कर रही है वो. तू बैठ ज़रा मेरे साथ. अलका यार कॉफी बना ले अपने लिए." ऋतु दीदी अलका दीदी के खड़े होतेही पसर गई

और सिसकी निकल गई चूत पे तकिये की रगड़ से. "ऋतु, यहा भी मज़े ले रही है क्या?" अलका ने छेड़ते हुए कहा और बाहर निकल गई.

"आपको हुआ क्या है दीदी.? बताओ ना. चेहरे कुछ अलग बता रहा है और चमक भी रहा है. लेकिन शरीर सुबह से बिल्कुल विपरीत इशारे कर रहा है."

प्रीति बिस्तर से टेक लगाती बोली. "अर्रे इशारे विशारे छोड़ ये बता चेहरा तेरा भी अलग चमक रहा है. अर्जुन ने पकड़ तो नही लिया था तेरे बरफ के गोलो को."

खिलखिलाती ऋतु दीदी ने ये बात कही तो प्रीति शरमाती ना मे सर हिलाने लगी. "मतलब उसने नही पकड़े लेकिन तेरा दिल है उसको पकड़वाने का?"

"दीदी, बस करो ना यार. आप ना मेरी सभी अच्छी दोस्त भी हो और मेरे मज़े भी लेती रहती हो." प्रीति ने मायूसी से कहा.

"अच्छा अच्छा अब सुन मेरी बात ज़रा. देख प्यार वो भी तेरे को बहुत करता है लेकिन तू खुद ही भागती रहती है. अब उपर जाएगा तो पकड़ ले अकेले मे वो बैल बुद्धि तो कुछ कहने से रहा अपनी तरफ से." ऋतु दीदी प्रीति की तड़प को अच्छे से समझ रही थी.

"आपने भी पकड़ा है क्या उसको?" प्रीति ने नहले पर दहला मारा. "क्योंकि प्यार तो आपका भी वही है."

"चल तू भी तो मेरा अक्स ही है, तुझसे क्या छुपाना. मैने कई बार किस किया है उसको और उसने भी लेकिन तू जानती है हम दोनो की सिचुयेशन मे फरक है. तुझे उसके साथ किसी ने देखा तो तुम दोनो की शादी पक्की और मेरे अर्जुन के प्यार का कोई भविष्य नही है. तो मुझे जितना मिलता है मैं अभी ले लेती हूँ." ऋतु दीदी की इस प्यार भरी सच्चाई मे एक विरह का दुख भी था. फिर वो प्रीति का सर सहलाने लगी. "वो ना अभी उतना समझदार नही है दिन-दुनिया के लिए. बस तू अपने प्यार से उसका सब दिखा लेकिन हमेशा उसका साथ देना."

और अलका कॉफी के 3 कप लेकर अंदर आ गई. "ये ननद-जेठानी का हो गया हो तो कॉफी पी ली जाए." अलका भी मज़े लेने के ही मूड मे थी.

"अच्छा दीदी, अलका दीदी का भी तो सेम सिचुयेशन है." थोड़ा जीझकते हुए प्रीति ने कहा तो दोनो हँसने लगी.

"इसको कम मत समझ तू, अपने हिस्से का ये भी लेही लेती है. कॉलेज मे तो सब अर्जुन को ही इसका बॉयफ्रेंड समझते है अब." ऋतु दीदी ने अलका को भी लपेटे मे लेते कहा.

"हा तो देख इसको अपने बहन के बॉयफ्रेंड को अपना भी बता दिया इसने कॉलेज मे. अब सोच सब क्या कहेंगे ऐसे?" इतराते हुए अलका दीदी ने ये बात कही तो दोनो हंस दी

प्रीति की तरफ देख कर. "चल तू भाग यहा से वो चला गया उपर. देखे आज तेरी हिम्मत भी ज़रा." ऋतु दीदी ने प्रीति को धकेलते से कहा और उनकी इतनी

देर से ऐसी बातें सुनकर वो थोड़ी हिम्मत से बाहर निकल कर उपर चल दी.

इन सब चीज़ो से बेख़बर अर्जुन बस पाजामा पहने बालो मे हाथ फेर रहा था और पीठ दरवाजे की तरफ थी. यहा आते ही अर्जुन को ऐसे देख प्रीति की तो हिम्मत एकदम से जवाब दे गई. कमरे के दरवाजे पर ही वो अर्जुन को देखती खड़ी रह गई

"अर्जुन." बेह ध्यानी मे उसने इतना ही कहा था का अर्जुन ऐसे ही नंगी छाती उसकी तरफ आ गया. "आओ बैठो यहा. मेरा कमरा ऐसा ही है अकेला रहता हूँ तो कही भी कुछ भी रख देता हूँ." उसने बोलते हुए सिंगल बेड से सारे कपड़े उठा कर नीचे गिरा दिए और जगह बनाई. धीमे कदमो से प्रीति एक किनारे पर बैठ कर बस अर्जुन के शरीर को देख रही थी. वो अपने गीले बाल सही कर रहा था. फिर वापिस खड़ी होकर उसने एकदम से सभी गिरे हुए कपड़े समेटने शुरू कर दिए.

"क्या कर रही हो?" अर्जुन ये देख कर रुक गया लेकिन प्रीति सभी कपड़ो को समेट कर वही पड़ी एक कुर्सी पर रखने लगी. अर्जुन ने ऐसे ही उसको पीछे से पकड़ लिया.

"अभी से आदत डाल रही हो क्या? अभी बहुत टाइम है. कमरे से ज़्यादा मुझपर ध्यान देना चाहिए तुम्हे." अपनी गर्दन प्रीति के कंधे पर रख उसके गाल चूमते कहा तो वो सिमट सी गई लेकिन अर्जुन को अलग ना किया. उसको अपनी कमर पर अर्जुन के हाथो का घेरा अच्छा लग रहा था. लेकिन खुद के झुक जाने से प्रीति के दूध वही बाहो पर टिक से गये थे.

"छोड़ो ना प्लीज़. फिर कोई आ जाएगा."

"उपर कौन आएगा?" प्रीति को अपनी तरफ घुमाते अर्जुन ने कहा और उसके चमकते चेहरे को थाम कर होंठो को मूह मे भर लिया. प्रीति की आँखें बंद हो गई थी और हाथ अर्जुन की पीठ पर कस गये थे. कितने दिन और रात वो इस सबके बारे मे सोचती तड़पति रहती थी लेकिन अर्जुन के इस एक स्पर्श से उसका पूरा शरीर महक गया था. थोड़ीही देर मे उसने भी अपने होंठ चलाने शुरू कर दिए. दोनो के हाथ एक दूसरे के पीछे थे. बस अर्जुन के हाथ प्रीति की पीठ से फिसलते उसकी कमर पर रुके और उसने प्रीति को खुद से चिपका लिया. ऐसे ही जकड़े दोनो इस मधुर चुंबन मे तब तक डूबे रहे जब तक साँस लेनाही मुहाल ना हो गया हो. फिर अलग हुए तो अर्जुन प्रीति के चेहरे को प्यार से देखने लगा लेकिन प्रीति ने उसकी छाती पर हाथ रखते हुए बिस्तर पर धकेल दिया.

"बस लेटे रहो." नीली-हरी आँखों के डोरे लाल हो गये थे और दोनो पैर अलग दिशा मे करती वो उसके उपर बैठ कर वापिस उसके होंठ चूमने लगी. दोनो हाथ अर्जुन की छातियों पर फिर रहे थे. होंठ छोड़कर जैसे ही अर्जुन की कमर पर बैठी वापिस उछल गई.

"तंग कर रहे हो." उसको लगा की अर्जुन ने जान बूझकर उसकी वेजाइना को सलवार पर से ही टच किया.

"मैने क्या किया.." दोनो हाथ दिखाते कहा तो प्रीति वापिस बैठी और फिर अपने कुल्हो के बीच उस दहकति मोटी रोड को फील करने लगी. बिना कुछ कहे उसके माथे पर शिकन सी आ गई.

"तुम अबनॉर्मल हो?" प्रीति ने ऐसे ही कहा तो अर्जुन ने प्यार से उसके गाल पर हाथ रखते वैसे ही जवाब दिया, "गिफ्टेड. बट वी आर नोट गोयिंग देट वे." और उसको अपने सीना पर लिटा लिया. ऐसे ही उसकी पीठ सहलाता वो बोलने लगा, "मेरा दिल बस यही करता है. तुम्हारा धड़कता दिल मेरे सीने से लगा रहे."

प्रीति भी देख रही थी की अर्जुन ने ना उसके हिप्स पर हाथ रखा था, ना किस करते हुए ब्रेस्ट्स पर. बस वो उस से दिल से प्यार कर रहा था.

"तुम्हे बुरा लग रहा होगा ना की मैं इस से आगे कुछ नही कर रही?" प्रीति ने ये बात कही तो अर्जुन मुस्कुराते हुए बोला, "तुम्हारा दिल है आगे बढ़ने का? लेकिन मैं तो चाहता हूँ बस ऐसे ही तुम्हे देखता रहूं और चूमता रहूं. एक बार आगे बढ़े तो जो दर्द तुम्हे होगा उसकी कल्पना मैं नही कर सकता." फिर से उसका चेहरा अर्जुन ने चूम लिया.
 
"तुम्हे बुरा लग रहा होगा ना की मैं इस से आगे कुछ नही कर रही?" प्रीति ने ये बात कही तो अर्जुन मुस्कुराते हुए बोला, "तुम्हारा दिल है आगे बढ़ने का? लेकिन मैं तो चाहता हूँ बस ऐसे ही तुम्हे देखता रहूं और चूमता रहूं. एक बार आगे बढ़े तो जो दर्द तुम्हे होगा उसकी कल्पना मैं नही कर सकता." फिर से उसका चेहरा अर्जुन ने चूम लिया.

"मेरा दिल है लेकिन. सिर्फ़ इतना की तुम मुझे यहा से पकड़ के एक किस करो. एक हॉलीवुड मूवी मे देखा था मैने. फील करना चाहती हूँ." प्रीति ने अपने कुल्हो की तरफ

इशारा करते कहा तो अर्जुन बैठ गया उसको अपनी तरफ मूह किए हे, गोद मे लिए. एक होंठ को अपने दोनो होंठो मे दबाए वो प्रीति के दोनो गुदाज कूल्हे दबाने लगा.

फिर जीब को चूस्ते हुए कुल्हो की दरार को हल्के अलग करता गर्दन पर जीब फिराने लगा था. उसका अजगर अब प्रीति के खजाने पर रगड़ खा रहा था और कूल्हे दबाए जाने से प्रीति भी अपनी कमर अर्जुन के लंड पर घिसने सी लगी थी. सख़्त गुब्बारो पर आने से पहले ही उसने अपना चेहरा दूर कर लिया. और मज़े से आँखे बंद करके बैठी प्रीति को देखने लगा. उसकी कमर चलते चलतेही रुक गई और अपनी बड़ी बड़ी आँखो से अर्जुन को देखती जैसे पूछ रही हो, रुक क्यो गये.

"अगर इस से आगे गये तो फिर घर नही जा पाओगी. और फिर 2 दिन बिस्तर पर रहने का क्या जवाब दोगि?"

अर्जुन की बात का मतलब समझ शर्मा कर उसकी नंगी छाती पर हल्के मुक्के चलाती बोली, "उपर उपर से भी तो.."

"कुछ भी उपर से नही होगा अगर मुझे वो नज़ारा दिखा फिर से जो सुबह दिखा था. मुझ मे संयम है लेकिन तुम्हे एक बार फिर से वैसे देखा तो नही रहेगा." और चूमतहुए प्रीति को बाहों मे लिए उठ गया. प्रीति का शरीर हल्का नही था लेकिन अर्जुन ऐसे उठाए हुए ही नीचे खड़ा हो गया.

"खाने का समय हो गया है. अब ज़रूर माधुरी या कोमल दीदी आएँगी उपर. चलो खुद ही चलते है. एक बार बाहों मे भर के फिर दोनो नीचे आ गये.

अर्जुन हाथ धोने बाथरूम मे गया तो ऋतु दीदी ने प्रीति को पकड़ लिया. "आ गई मानो मलाई खा कर?"

"पूछ लेना आप ही खुद." और अपने घर की तरफ दौड़ सी गई.
 
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