S
StoryPublisher
Guest
"आगे से कोई कभी तुम्हे कुछ न्ही कहेगा. मैं साथ ही चलूँगा अब से तुम्हारे." अर्जुन वापिस स्कूटी स्टार्ट करता प्रीति को अपने साथ ले चल दिया
"बहनचोद पता नहीं क्या ख़ाता है साला. थोबड़ा ही हिला दिया."कुलविंदर स्कूटर चलाता पीछे बैठे राणा से बोला जो अपनी नाक पे रुमाल रखे था. दोनो की हालत सॉफ बता रही थी की तबियत से गाल लाल किए गये उनके.
"वो छोड़ भाई बस याद रखियो आगे से इस मोहल्ले मे आशिकी नहीं करनी. साला जानवर है रे ये लड़का. पता ना चला कब दीवार से चिपका दिया. हाथ भी बहनचोद तबियत से मारे." राणा की आवाज़ मे उसका दर्द सॉफ पता चल रहा था.
"भाई बंदी भी उसकी, पोलीस भी उसकी और हमारी सिर्फ़ ठुकाई. ऐसा बलात्कार तो कभी ना हुआ. आता ही नहीं इस तरफ तो मैं. झुग्गी वालीही देख लिया करेंगे."
दोनो दोस्त आज अपने से पिछली क्लास के लड़के से मार खा कर असहाए से अपने मोहल्ले मे निकल लिए थे.
"तुम चलो जब प्रॅक्टीस हो जाए तो मुझे बुला लेना. नही तो मैं पहले आया तो यही मिलूँगा." स्टॅंड पर स्कूटी लगाते अर्जुन ने प्रीति से कहा और एक बार उसके सर पे हाथ फेर कर आगे चल दिया.
"कोंन है ये हीरो, प्रीति?" एक चुलबुली सी गोरी लंबी लड़की प्रीति के कंधे पर हाथ रख उसके साथ चलती बोली.
"तुझे क्या लगता है, डिम्पी?" अपनी सहेली से ही हंसते हुए उसने सवाल कर दिया.
"तेरा भाई या रिश्तेदार ही होना चाहिए नही तो मेरा दिल टूट जाएगा." नौटंकी करती इस लड़की ने आँख मारते कहा तो प्रीति भी उसके लहजे मे ही बोली, "हाए मेरी बेस्ट फ्रेंड का आज दिल टूटही गया. हाहहाहा."
"कमीनी सच सच बता. तेरा इंटेरेस्ट नही है ना वो? लड़का एक नज़र मे पसंद आ गया है." डिम्पी अब भी पलट के देखने की कोशिश मे थी लेकिन अर्जुन तो जा चुका था.
"सच बोल रही हूँ तेरे से क्या छुपाना. मेरे दिल पर बस उसका ही नाम है जब से होश संभाला है." गहरे प्यार से कही बात सुनकर डिम्पी को भी अहसास हो गया था कि दोनो मे प्यार तो पक्का है.
"लेकिन वो तो कृशन कन्हैया दिखता है." छेड़ते हुए ये बात कही तो प्रीति ने वैसे ही कहा.
"हा तो वो तो है हे. अब मैने कॉन्सा उसपे नकेल डाल रखी है. गोपियाँ जितनी चाहे हो लेकिन राधा-रुक्मणी तो मैं ही हूँ." इतराते हुए बात कहकर दोनो अपना बैग खोल कर प्रॅक्टीस मे लग गई बाकी सभी के साथ.
……………..
"तेरे हाथ पे ये खून कैसा है?" बलबीर ने कपड़े बदलते समय अर्जुन के हाथ को देख कर कहा.
"कुछ नही भाई. वो सड़क पर किसी के चोट लग गई थी. उठाते समय मेरे हाथ पे वही लग गया." पास मे लगे नल से हाथ धोते उसने जवाब दिया.
दोनो जिम मे अभ्यास करके वापिस कोच के पास आए तो अर्जुन ने उनके पाव छुए. "आज कीट पर 1-2 की लय मे सीधे मुक्को का अभ्यास करना है. 2 मिनिट के बाद दोनो अपनी बारी लेंगे. बलबीर, 10 सेट होने के बाद तुम इसको घास पर उठक बैठक कारवाओगे साथ मे ही लचकता का अभ्यास भी." जोगिंदर जी ने अर्जुन के शरीर को देखते हुए सब बताया तो बलबीर भी सर हिलाता अर्जुन को ले गया.
जिस जगह लोहे की रेलिंग और जंजीर से बॉक्सिंग कीट लटकी थी ये जगह खुले मे थी और सामने ही बॅस्केटबॉल और हॅंडबॉल के कोर्ट थे. बलबीर अर्जुन को सब समझा कर बस वहाँ खेल रही लड़कियों को देखता रहा. मुश्किल से उसने 3 सेटही किए थे और इधर अर्जुन की बाजू और छाती पर पसीने की बूंदे चमकने लगी थी. ये बनियान जैसी टीशर्ट ज़्यादा खुली थी तो उसकी मासपेशिया, छाती सब नज़र आ रहा था. शरीर के हिलने पर वहाँ फड़कती एक एक मांसपेशी अर्जुन के शरीर को निखार रही थी.
"भाई अब बस करो देखना ये सब. लौट आओ वर्तमान मे भी. उनमे से कोई इधर नही देख रही." अर्जुन ने मज़ाक करते हुए कहा तो बलबीर मूह लटकाए 2 रब्बर की दरियाँ वही बिछाने लगा.
"भाई देख भी रही होंगी तो वो तुझेही देखेंगी. मैं तो यहा बस अपनी आँखें ही ठंडी कर लेता हूँ. तू लेट यहा." इतना बोलकर वो फिर से अर्जुन को सब समझने लगा. कैसे पाव उठाने और घुटने मौडने है. कैसे दोनो हाथ सर के पीछे कर के कमर उपर उठानी है. फिर अर्जुन भी निर्देश अनुसार ये कसरत करता रहा.
"देख रही है उस चिकने को. उमर ज़्यादा नही लगती लेकिन शरीर और चेहरा देख. मेरा निशाना बस अब यही है." बॅस्केटबॉल कोर्ट पे खड़ी एक आधुनिक सी दिखती ये लड़की अर्जुन को देख कर आहे भर रही थी.
" नहीं आता हाथ तेरे वो भूल जा. ये मेडम भी आजकल उसके चक्कर मे है." ये सुमन थी जो मंजुला की और इशारा करते हुए उस लड़की से बोली जिसपर मंजू ने कोई प्रतिक्रिया ना दी.
"मंजू, मेरे को तो कोई ऐतराज नही है के तू इसको पटए या प्यार करे. लेकिन बस दिल मे एक इक्षा जाग गई है के इसके नीचे ज़रूर आउन्गी यार." ऐसे बोलते हुए इस लड़की ने मंजू को आँख मारते हुए कहा तो जहा पहले मंजू को थोड़ा गुस्सा आ रहा था अब थोड़ी हँसी आ गई थी.
"नीचे तो आ जाएगी पर ज़िंदा रहेगी या नही वो भगवानही बता सकता है चाँदनी." मंजू को याद आ गया था कि दिन मे कहा हाथ लगाया था.
"ऐसा क्या लगा रे इसके जो जान ही ले लेगा. और तूने कहा देखा?" तीनो अब कोर्ट पर ही बैठ गई थी.
"अर्रे ऐसा कुछ नही है. थोड़ी बहुत बात है मेरी इसके साथ. शरीफ लड़का है लेकिन वो बॉक्सिंग हाल के पीछे कपड़े बदल रहा था ये जब मैं इधर आई. बस
नज़र बाद गई तो मैं बिना रुके इधरही आई फिर."
"क्या बात कर रही है यार. तेरे अंदाज़ा तो बता फिर भी." चाँदनी थोड़े हैरानी वाले भाव से बोली तो सुमन भी मंजू को गोर से देखने लगी
"देख इतना तो पक्का है और क़स्सी के डंडे से मोटा." अपने हाथ को फैलाते हुए उसने कलाई से 2-3 इंच नीचे तक इशारा करते बताया तो वो दोनो भी सोच मे पड़ गई.
"मज़ाक?" चाँदनी ने के बात फिर से उसको कहा.
"मैं मज़ाक क्यो करने लगी. अब तो मुझे डर लगने लगा है. नही तो खुद सोच मेरी चीज़ पे कोई हाथ रखे और मैं चुप रहूं. ये लड़का पसंद है मुझे लेकिन इसकी और भी पसंद है. सिंपल सी बात है अगर दिल करे तो ट्राइ कर लिओ मैं तो बातों से काम चला लूँगी." और एक बार फिर हंस पड़ी.
"देख तू तो जानती ही है यार. वो रमण तो किसी काम का नही और मैने उसको भगा भी दिया. पैसे वाला था लेकिन वो मेरे पास भी बहुत है. लेकिन जैसा तू कह रही है ऐसी चीज़ एक बार देखनी बनती है. रमण का इतना था." दोनो की तरफ अपनी हथेली के बीच उंगली रख वो बोली तो तीनो हँसने लगी.
"यार तेरा तो मतलब कौमार्य भी अच्छी तरह नही खुला." सुमन, जो शायद खेली खाई थी उसने ये बात कही तो चाँदनी ने हा मे सर हिला दिया. "3 बार तो उपर रखते खाली हो गया था वो. और बाकी 4-5 बार मतलब 2 मिनिट ज़्यादा से ज़्यादा. उस से अच्छा तो तेरे केशव और जग्गी है." ये बात चाँदनी ने सुमन से कही थी.
"अब तो वो भी किसी काम के नही लेकिन हा तेरे वाले से ठीक ही है 5 मिनिट साथ देते है." मंजुला इन दोनो की बातें सुनती वहाँ अर्जुन को निहार रही थी. कैसे आज उसने मंजू के जिस्म मे आग भरी थी. सिर्फ़ दूध दबा के ही उसका स्खलन करवा दिया था. है तो खिलाड़ी.
"कहा खो गई? तेरी भी ओपनिंग करवा दूं किसी को बोलकर?" चाँदनी ने हिलाते हुए मंजू से कहा तो वो मस्ती से उसकी गान्ड पर चपत लगती बोली, "मेरी बंदही ठीक है तू तेरा सोच. ग़लती से उसके हाथ लग गई तो फिर टांगे 3 दिन तो खुली रहेंगी."
"बहनचोद पता नहीं क्या ख़ाता है साला. थोबड़ा ही हिला दिया."कुलविंदर स्कूटर चलाता पीछे बैठे राणा से बोला जो अपनी नाक पे रुमाल रखे था. दोनो की हालत सॉफ बता रही थी की तबियत से गाल लाल किए गये उनके.
"वो छोड़ भाई बस याद रखियो आगे से इस मोहल्ले मे आशिकी नहीं करनी. साला जानवर है रे ये लड़का. पता ना चला कब दीवार से चिपका दिया. हाथ भी बहनचोद तबियत से मारे." राणा की आवाज़ मे उसका दर्द सॉफ पता चल रहा था.
"भाई बंदी भी उसकी, पोलीस भी उसकी और हमारी सिर्फ़ ठुकाई. ऐसा बलात्कार तो कभी ना हुआ. आता ही नहीं इस तरफ तो मैं. झुग्गी वालीही देख लिया करेंगे."
दोनो दोस्त आज अपने से पिछली क्लास के लड़के से मार खा कर असहाए से अपने मोहल्ले मे निकल लिए थे.
"तुम चलो जब प्रॅक्टीस हो जाए तो मुझे बुला लेना. नही तो मैं पहले आया तो यही मिलूँगा." स्टॅंड पर स्कूटी लगाते अर्जुन ने प्रीति से कहा और एक बार उसके सर पे हाथ फेर कर आगे चल दिया.
"कोंन है ये हीरो, प्रीति?" एक चुलबुली सी गोरी लंबी लड़की प्रीति के कंधे पर हाथ रख उसके साथ चलती बोली.
"तुझे क्या लगता है, डिम्पी?" अपनी सहेली से ही हंसते हुए उसने सवाल कर दिया.
"तेरा भाई या रिश्तेदार ही होना चाहिए नही तो मेरा दिल टूट जाएगा." नौटंकी करती इस लड़की ने आँख मारते कहा तो प्रीति भी उसके लहजे मे ही बोली, "हाए मेरी बेस्ट फ्रेंड का आज दिल टूटही गया. हाहहाहा."
"कमीनी सच सच बता. तेरा इंटेरेस्ट नही है ना वो? लड़का एक नज़र मे पसंद आ गया है." डिम्पी अब भी पलट के देखने की कोशिश मे थी लेकिन अर्जुन तो जा चुका था.
"सच बोल रही हूँ तेरे से क्या छुपाना. मेरे दिल पर बस उसका ही नाम है जब से होश संभाला है." गहरे प्यार से कही बात सुनकर डिम्पी को भी अहसास हो गया था कि दोनो मे प्यार तो पक्का है.
"लेकिन वो तो कृशन कन्हैया दिखता है." छेड़ते हुए ये बात कही तो प्रीति ने वैसे ही कहा.
"हा तो वो तो है हे. अब मैने कॉन्सा उसपे नकेल डाल रखी है. गोपियाँ जितनी चाहे हो लेकिन राधा-रुक्मणी तो मैं ही हूँ." इतराते हुए बात कहकर दोनो अपना बैग खोल कर प्रॅक्टीस मे लग गई बाकी सभी के साथ.
……………..
"तेरे हाथ पे ये खून कैसा है?" बलबीर ने कपड़े बदलते समय अर्जुन के हाथ को देख कर कहा.
"कुछ नही भाई. वो सड़क पर किसी के चोट लग गई थी. उठाते समय मेरे हाथ पे वही लग गया." पास मे लगे नल से हाथ धोते उसने जवाब दिया.
दोनो जिम मे अभ्यास करके वापिस कोच के पास आए तो अर्जुन ने उनके पाव छुए. "आज कीट पर 1-2 की लय मे सीधे मुक्को का अभ्यास करना है. 2 मिनिट के बाद दोनो अपनी बारी लेंगे. बलबीर, 10 सेट होने के बाद तुम इसको घास पर उठक बैठक कारवाओगे साथ मे ही लचकता का अभ्यास भी." जोगिंदर जी ने अर्जुन के शरीर को देखते हुए सब बताया तो बलबीर भी सर हिलाता अर्जुन को ले गया.
जिस जगह लोहे की रेलिंग और जंजीर से बॉक्सिंग कीट लटकी थी ये जगह खुले मे थी और सामने ही बॅस्केटबॉल और हॅंडबॉल के कोर्ट थे. बलबीर अर्जुन को सब समझा कर बस वहाँ खेल रही लड़कियों को देखता रहा. मुश्किल से उसने 3 सेटही किए थे और इधर अर्जुन की बाजू और छाती पर पसीने की बूंदे चमकने लगी थी. ये बनियान जैसी टीशर्ट ज़्यादा खुली थी तो उसकी मासपेशिया, छाती सब नज़र आ रहा था. शरीर के हिलने पर वहाँ फड़कती एक एक मांसपेशी अर्जुन के शरीर को निखार रही थी.
"भाई अब बस करो देखना ये सब. लौट आओ वर्तमान मे भी. उनमे से कोई इधर नही देख रही." अर्जुन ने मज़ाक करते हुए कहा तो बलबीर मूह लटकाए 2 रब्बर की दरियाँ वही बिछाने लगा.
"भाई देख भी रही होंगी तो वो तुझेही देखेंगी. मैं तो यहा बस अपनी आँखें ही ठंडी कर लेता हूँ. तू लेट यहा." इतना बोलकर वो फिर से अर्जुन को सब समझने लगा. कैसे पाव उठाने और घुटने मौडने है. कैसे दोनो हाथ सर के पीछे कर के कमर उपर उठानी है. फिर अर्जुन भी निर्देश अनुसार ये कसरत करता रहा.
"देख रही है उस चिकने को. उमर ज़्यादा नही लगती लेकिन शरीर और चेहरा देख. मेरा निशाना बस अब यही है." बॅस्केटबॉल कोर्ट पे खड़ी एक आधुनिक सी दिखती ये लड़की अर्जुन को देख कर आहे भर रही थी.
" नहीं आता हाथ तेरे वो भूल जा. ये मेडम भी आजकल उसके चक्कर मे है." ये सुमन थी जो मंजुला की और इशारा करते हुए उस लड़की से बोली जिसपर मंजू ने कोई प्रतिक्रिया ना दी.
"मंजू, मेरे को तो कोई ऐतराज नही है के तू इसको पटए या प्यार करे. लेकिन बस दिल मे एक इक्षा जाग गई है के इसके नीचे ज़रूर आउन्गी यार." ऐसे बोलते हुए इस लड़की ने मंजू को आँख मारते हुए कहा तो जहा पहले मंजू को थोड़ा गुस्सा आ रहा था अब थोड़ी हँसी आ गई थी.
"नीचे तो आ जाएगी पर ज़िंदा रहेगी या नही वो भगवानही बता सकता है चाँदनी." मंजू को याद आ गया था कि दिन मे कहा हाथ लगाया था.
"ऐसा क्या लगा रे इसके जो जान ही ले लेगा. और तूने कहा देखा?" तीनो अब कोर्ट पर ही बैठ गई थी.
"अर्रे ऐसा कुछ नही है. थोड़ी बहुत बात है मेरी इसके साथ. शरीफ लड़का है लेकिन वो बॉक्सिंग हाल के पीछे कपड़े बदल रहा था ये जब मैं इधर आई. बस
नज़र बाद गई तो मैं बिना रुके इधरही आई फिर."
"क्या बात कर रही है यार. तेरे अंदाज़ा तो बता फिर भी." चाँदनी थोड़े हैरानी वाले भाव से बोली तो सुमन भी मंजू को गोर से देखने लगी
"देख इतना तो पक्का है और क़स्सी के डंडे से मोटा." अपने हाथ को फैलाते हुए उसने कलाई से 2-3 इंच नीचे तक इशारा करते बताया तो वो दोनो भी सोच मे पड़ गई.
"मज़ाक?" चाँदनी ने के बात फिर से उसको कहा.
"मैं मज़ाक क्यो करने लगी. अब तो मुझे डर लगने लगा है. नही तो खुद सोच मेरी चीज़ पे कोई हाथ रखे और मैं चुप रहूं. ये लड़का पसंद है मुझे लेकिन इसकी और भी पसंद है. सिंपल सी बात है अगर दिल करे तो ट्राइ कर लिओ मैं तो बातों से काम चला लूँगी." और एक बार फिर हंस पड़ी.
"देख तू तो जानती ही है यार. वो रमण तो किसी काम का नही और मैने उसको भगा भी दिया. पैसे वाला था लेकिन वो मेरे पास भी बहुत है. लेकिन जैसा तू कह रही है ऐसी चीज़ एक बार देखनी बनती है. रमण का इतना था." दोनो की तरफ अपनी हथेली के बीच उंगली रख वो बोली तो तीनो हँसने लगी.
"यार तेरा तो मतलब कौमार्य भी अच्छी तरह नही खुला." सुमन, जो शायद खेली खाई थी उसने ये बात कही तो चाँदनी ने हा मे सर हिला दिया. "3 बार तो उपर रखते खाली हो गया था वो. और बाकी 4-5 बार मतलब 2 मिनिट ज़्यादा से ज़्यादा. उस से अच्छा तो तेरे केशव और जग्गी है." ये बात चाँदनी ने सुमन से कही थी.
"अब तो वो भी किसी काम के नही लेकिन हा तेरे वाले से ठीक ही है 5 मिनिट साथ देते है." मंजुला इन दोनो की बातें सुनती वहाँ अर्जुन को निहार रही थी. कैसे आज उसने मंजू के जिस्म मे आग भरी थी. सिर्फ़ दूध दबा के ही उसका स्खलन करवा दिया था. है तो खिलाड़ी.
"कहा खो गई? तेरी भी ओपनिंग करवा दूं किसी को बोलकर?" चाँदनी ने हिलाते हुए मंजू से कहा तो वो मस्ती से उसकी गान्ड पर चपत लगती बोली, "मेरी बंदही ठीक है तू तेरा सोच. ग़लती से उसके हाथ लग गई तो फिर टांगे 3 दिन तो खुली रहेंगी."