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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

"यार मैं सच कह रही हू मुझे कुछ याद नही. तू भी जानती है ना मेरी प्राब्लम, तू अर्जुन को बता मैं ऐसी नही हू." अभी भी ऋतु दीदी अर्जुन की तरफ मूह करने से घबरा रही थी.

अर्जुन को लगा शायद अब ज़्यादा हो गया और उसने अपने हाथ से ऋतु दीदी को अपनी तरफ घुमाया और करीब करते हुए उनके माथे को चूमकर बोला, "अर्रे मेरी प्यारी दीदी. आपको लगता है के ऐसा कर सकती हो? नही ना. मैं तो खुद अभी 5-10 मिनिट पहले आया था और यहा आके लेटकर अलका दीदी से बात कर रहा था. और आप क्यो घबराती है जब मैं हू आपके साथ." और इतना बोलकर उसने एक छोटा सा किस जड़ दिया दीदी के गुलाबी होंठो पर. ऋतु भी प्यार और शरम से लिपट गयी अपने भाई से.

"वाह मतलब अब हमारी तो कदर ही नही.", अलका ने मुस्कुरा कर ये बात कही तो ऋतु भी बोली, "अर्जुन इस ग़रीब को भी थोड़ा प्यार दे ही दे. देख कैसे जल कर लाल हो चुकी है."

अर्जुन ने हंसते हुए अलका दीदी को पकड़ना चाहा तो वो भाग खड़ी हुई और दरवाजे पर पहुच के बोली, "मेरे हिस्से का मैं पहले ही ले चुकी हू. सुना नही था क्या अर्जुन 10 मिनिट से यहा था तेरे जागने से पहले." और हँसती हुई भाग गई बाहर. 5 मिनिट दोनो भाई बहन ऐसे ही लेटे रहे

फिर ऋतु दीदी ने एक और छोटा सा किस किया और खड़ी हो गई. यही पर अर्जुन की नज़र दीदी की टीशर्ट मे चोंच दिखा रहे खड़े निपल्स पे चली गई और ऋतु को भी पता चल गया की उसका छोटा भाई क्या देख रहा है. शरम से दोहरी होती वो मूड गई और अर्जुन भी हंसता हुआ बाहर आँगन मे आ गया.

"पागल है ये दोनो और मुझे भी कर दिया है." खुद से इतना बोला और सामने शीसे मे अपने ब्रेस्ट देख ऋतु मुस्कुरा उठी. "उसका ही तो है सब"

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"माधुरी नही दिख रही ललिता. कुछ काम कर रही है क्या?", कौशल्या देवी ने अपनी बहू से पूछा क्योंकि इस टाइम ज़्यादातर रसोईघर मे माधुरी दीदी ही काम करती दिखती थी. अर्जुन के भी कान खड़े हो गये जो वही बैठा खाना ही खा रहा था अपने ताऊ जी के साथ.

"वो मा जी उसको बुखार आया है आंड फिर रात को पानी पीने के लिए कमरे से निकली तो फिसल गई थी. पाव मे मोच भी आई हुई है." ललिता जी ने चिंतित स्वर मे ही कहा. अब अलका और ऋतु को भी पता चला के उनकी बड़ी दीदी क्यो गायब थी वहाँ से.

"मैं देखती हू मेरी बच्ची को. और बेटा कोमल अपनी मा को भी कमरे मे ही खाना दे आ. उसको भी आराम करने दे.", इतना बोलकर कौशल्या जी उठ गई

"मा को क्या हुआ है ताइजी?", खाना बीच मे छोड़ कर अर्जुन ने कोमल दीदी के हाथ से थाली ली और थोड़ा घबराया सा अपनी मा की तरफ चल दिया बिना अपनी ताइजी का जवाब लिए. अंदर आया तो रेखा जी बिस्तर पर लेटी थी. "मा, क्या हुआ आपको? और आप उठो खाना खा लो फिर मैं डॉक्टर को बुला लता हू."

अपने बेटे को इस तरह परेशान देख रेखा जी उठ गई और उसके सर पर हाथ फेरती बोली, "अर्रे मेरे राजा बेटे मुझे कुछ नही हुआ. वो मौसम बदल रहा है ना बस इसलिए थोड़ा बुखार आ गया था रात मे. लेकिन अब ठीक हू. तू परेशान मत हो कुछ नही हुआ मुझे. रात कोमल ने ध्यान रखा मेरा अच्छे से."

बात कह रही थी रेखा जी की कोमल और ऋतु भी अंदर चली आई. "यहा तो मुन्ना अभी भी मा से चिपका है. जाने कब बड़ा होगा ये?", ऋतु ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए सीरीयस चेहरा बनाते हुए ये कहा और फिर अर्जुन को छोड़ कर सब हंस पड़े.

"मा देखो ना दीदी को", अर्जुन ने भी झूठी शिकायत लगाई.

"अच्छा अच्छा तुम दोनो बाहर जा कर लड़ाई करो और मा को खाना खाने दो. फिर दवा भी देनी है.", कोमल ने दोनो को बाहर कर दिया.

कौशल्या जी भी माधुरी दीदी के कमरे से वापिस आ गई थी. "अभी ठीक है पहले से वो. बुखार तो उतर गया है शाम तक ठीक हो जाएगी."

उन्होने ललिता जी को बताया. ऐसे ही नाश्ता और रोज का काम ख़तम हुआ. सभी अपने रोज के काम कर रहे थे. 11 बजे के करीब संजीव भैया घर आए और सीधा अलका/ऋतु के कमरे के बाहर थपथपाया. अलका बाहर आई और भैया ने उसके हाथो मे 2 चाबिया रख दी और मुस्कुरा के वापिस बाहर की तरफ चल दिए.

"ऋतु, चल बाहर देख हमारी स्कूटी आ गई." वो लगभग चीखते हुए बोली तो ऋतु भी उसके साथ उछलती हुई निकल गई.

"वाउ. ये बेस्ट प्रेज़ेंट है भैया.", ऋतु ने संजीव भैया को स्कुटी पे बैठे देखा तो कहा.

"वैसे ये तो मेरा बर्तडे प्रेज़ेंट है ना?", अलका ने ऋतु से कहा

"याद कर अपनी खुद की कही बात", और उसके हाथ से चाबी लेकर स्कुटी के चारो तरफ गोल घूमने लगी

"हा.", और अलका छोटी बच्ची सी नाराज़गी दिखाने लगी..

"अले अले मेली बच्ची. तुझे टॉफी मिलेगी, स्कूटी नही.", ऋतु ने फिर चिढ़ाया

"और हा भैया इस अलका ने खुद ही कहा था के आप जो भी प्रेज़ेंट इसको लेकर दोगे वो मैं रखू.", अब ऋतु ने भैया को पूरी बात बताई

"फिर तो ठीक बात है. इसको ऋतु ही रखेगी.", भैया आज मज़ाक के मूड मे थे

"कोई बात नही. मुझे नही चाहिए कुछ भी." और वो जैसे सच मे रूठ गई

"अर्रे मेरी प्यारी दीदी. जो मेरा है वो आपका, और जो आपका वो मेरा. हम मे कॉन्सा बँटवारा है.", ये बात ऋतु ने आँख मारते हुए कही जिसको संजीव भैया नही देख पाए.

"वैसे भैया एक बात कहूँगा, आपने बंदर को अदरक लाकर दे दी है." अर्जुन अपने दादा जी के साथ बैठा ये ड्रामा देख रहा था और आख़िर मे बोल ही पड़ा. भैया और दादाजी तो हंस पड़े लेकिन ऋतु और अलका दीदी को बात समझ नही आई.

"क्या कहा इसने? मुझे बंदर कहा?", ऋतु ने तैश मे नखरे से कहा

"बेटा इसका मतलब है के तुम दोनो को साइकल चलानी तो आती नही इस स्कूटी को कैसे चलॉ ओगी.", दादा जी ने दोनो के चेहरे देखे.

"भैया, आप हमें सिख़ाओगे ना?", और दोनो संजीव भाई से निवेदन करने लगी

"गुड़िया मुझे तो कल से बिल्कुल भी टाइम नही मिलेगा. 3 शहर और मेरे अंडर आ गये है तो मैं तो घर भी रोज नही आ पौँगा."

"फिर तो एक ही काम करते है बेटा के ये स्कूटी हम अर्जुन को दे देते है.", दादा जी की बात सुनकर दोनो चौंक गई और अर्जुन दोनो को चिढ़ाने लगा.

"अब तो फिर ये यही हम दोनो को सिखाएगा नही तो मैं पापा को फोन लगा देती हू अभी.", ऋतु ने इतना कहा तो अब दादा जी ने भी बात ख़तम करने के हिसाब से कहा.

"दोनो एक दिन छोड़ कर बारी बारी से इसके साथ जाओगी रोज सुबह और ये एक घंटा तुम दोनो को ही स्कूटी सिखाएगा.",

फिर दोनो ने कुछ बात करी आपस मे और अलका बोली, "कल ऋतु जाएगी और परसो मैं. यही शेड्यूल रहेगा रोज सुबह 7 बजे."

"नही बेटा नही. कुछ पाने के लिए खोना पड़ता है. 7 बजे नही 6 बजे और जिस दिन जो 10 मिनिट लेट हुआ वो उस दिन घर ही रहेगा." रामेश्वर जी बोलकर उठ गये. उन्हे पता था के दोनो ही 7 बजे तक उठती है.
 
संजीव भैया वापिस काम पर चले गये और ऋतु/अलका पढ़ाई करने अपने कमरे मे. अर्जुन को बस आज की ही आज़ादी थी कल से उसको भी स्टेडियम जाना था बॉक्सिंग सीखने के लिए. एक बार माधुरी दीदी से मिलकर वो अपने कमरे मे बैठ गया. बाहर कही जाना नही था तो निक्कर और टीशर्ट पहन ली आराम करने के हिसाब से. टेलीविजन चलाया और गाने चला कर बड़े सोफे पर ही आँख बंद कर के लेट गया. थोड़ी देर बाद किसी फिल्म की आवाज़ से उसकी आँख खुली तो अपने पाव के पास अलका दीदी को बैठे पाया जो थोड़ी थोड़ी देर बाद उसके ही चेहरे को देख रही थी. उन्हे लगा की वो सो रहा है तो मन मार के बैठी रही.

"अपने बॉयफ्रेंड के बिना दिल नही लग रहा था ना.?", अर्जुन ने अलका दीदी को खींच कर अपने उपर लिटा लिया. हैरानी के साथ ही खुश होते हुए वो भी पूरी उसपे लेट गई.

"सही कहा भाई. पता नही नीचे मन नही लग रहा था. तेरी याद आई तो यहा चली आई लेकिन तू तो सो रहा था." कहते हुए खुद ही उन्होने के किस्सिंग स्टार्ट कर दी. अर्जुन ने बखूबी साथ देते हुए अपने हाथ उनके मटकी जैसे कुल्हो पर रख दिए. कुल्हो को मसलते हुए ही उसने दीदी के उपर के होंठ को पकड़ कर चूसना शुरू कर दिया. फिर हाथ उपर आए और एक

हाथ एलास्टिक वाली सलवार के अंदर से उनके नरम चूतड़ को मसलने लगा. दीदी अब अपनी जीभ चुस्वा रही थी अर्जुन से और उनके मूह का स्वाद अर्जुन को शहद सा मज़ा दे रहा था. साइड से उसने दूसरे पंजे मे उनका एक दूध पकड़ लिया. मज़े से दोनो पागल हो रहे थे लेकिन अर्जुन को ये नही पता था के अलका दीदी को ऋतु दीदी ने ही भेजा था और वो खिड़की से दोनो की रासलीला देख रही थी.

"दीदी आपका स्वाद तो फ्रूट्स जैसा है. मीठा और उर्जा से भरा. और आपके ये दोनो अंग कितने सॉफ्ट है. मेरा दिल ही नहीं करता आपको छोड़ने का."

अर्जुन का इशारा समझ अलका दीदी ने वापिस किस्सिंग पे ध्यान लगा लिया. मज़े मे उन्होने अपनी कमर अर्जुन के खड़े लंड पर रगड़नी शुरू कर दी.

"भाई ये क्या है? बड़ा गरम और गोल है. किसी मोटे डंडे जैसा." जब अलका से रहा ना गया तो कमर हिलाना रोक उन्होने पूछा

"दीदी खुद ही देख लो ना आप. मैं आपके किसी अंग को पूछ के थोड़ी पकड़ता हू. "

अलका ने झीजकते हुए बाहर से ही उसके लंड पर हाथ रखा और जब रहा नहीं गया तो निक्कर निकालने की कोशिश करने लगी. लंड फसा हुआ था खड़ा होने से और नीचे से निक्कर दबी हुई थी. अर्जुन ने कमर उचका कर दीदी का काम आसान कर दिया. किसी स्प्रिंग की तरह अर्जुन का 8 इंची लंड अलका दीदी क होंठ से जा लगा.

" हे भगवान. ये क्या है अर्जुन?", उसके आकार से हैरान होते हुए दीदी ने कहा. इधर बाहर खड़ी ऋतु दीदी की भी साँस अटक सी गई थी. उन्हे थोड़ा किताबी ज्ञान था और कुछ सहेलियों के मूह से सुना था क़ि लड़के का पेनिस ऐसा होता है वैसा होता है लेकिन ये तो उसकी हर कल्पना से परे थे.

"ये जाएगा कैसे?" अर्जुन के लंड को देख उन्हे अपनी चूत का ध्यान आया और वो हिल गई. अंदर भी अलका का यही हाल था.

"क्यो दीदी, क्या सबका ऐसा नही होता?", उसने भी गंभीर होकर ये बात कही, लेकिन ये उसकी चुहलबाजी थी

"वो बात नही है भाई. मैने अपनी फ्रेंड्स से सुना था लेकिन ये तो उनकी बात से बिल्कुल ही अलग है."

"दीदी सबका ऐसा ही होता है." अर्जुन वापिस दीदी के बूब्स मसलने लगा. इधर ऋतु ने कुछ इशारा किया तो अलका ने एक बार अर्जुन का लंड सहलाया और वापिस अंदर डाल कर उसको एक मीठी चुम्मि देती हुई फुर्र से निकल गई.

"आज तूने मरवा ही दिया ना ऋतु की बच्ची.", उखड़ती हुई साँसों को संभालते हुए अलका ने ऋतु से कहा. दोनो कमरे मे बैठी थी.

"अर्रे सच कह रही हू मर ही जाएगी तू अगर उसका तेरे अंदर गया. हे भगवान कितना बड़ा और मोटा है उसका." ऋतु अभी सदमे मे थी.

"यूष्यूयली 4.5-6.5 इंच के बीच ही पेनिस होते है लेकिन उसका तो कलाई जितना मोटा और एक फ़ीट का लग रहा था. अलका ग़लती से भी उसके नीचे ना आ जइओ."

"एक ना एक दिन तो आना ही है. अब वो रुकेगा नही क्योंकि मैने तो खुद ही निकाला था उसका बाहर." अलका सोचते हुए बोली फिर ऋतु को देखते हुए कहा, "यार तेरा पाजामा उतार ज़रा."

"ये क्या कह रही है तू? नशे मे है?" ऋतु हंसते हुए बोली.

"अर्रे उतार तो सही एक बार कुछ देखना है." अलका ने विश्वास से कहा और अगले ही पल ऋतु का पाजामा नीचे पड़ा था. एक पतली सी सफेद कच्छी पहनी थी बस.

"तेरे तो बाल ही नहीं उगते यार. इधर आ ज़रा." ये कहते हुए अलका ने ऋतु को कच्छी से पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और वो

भी मुस्कुराती हुई आ गई उसके पास. अब ऋतु की कच्छी भी घुटने तक नीचे थी. "तेरी तो मेरे से भी छोटी लग रही है. ऋतु की चूत थी कमाल की. फक्क सफेद और तराशे हुए मोटे होंठ, कोई 3 इंच लंबा गुलाबी चीरा, बिल्कुल गेहूँ के दाने जैसी. कही कोई बाल का रोया तक ना था. ख़ास बात ये थी की उसकी जाँघ भी चूत के रंग जैसी ही थी. अलका का मूह कुछ 6-7 इंच ही दूर था.

"क्यो तेरी ऐसी नही है?" ऋतु ने मस्ती करते हुए कहा तो अलका ने भी अपनी सलवार कच्छी समेत नीचे कर दी. दोनो की चूत बिल्कुल एक समान थी

फरक था तो सिर्फ़ 2 बातो का. जहाँ ऋतु की चूत के बाहरी होंठ गोरे थे अलका के हल्के गुलाबी, बालो का निशान वहाँ भी नही था. लेकिन अलका की चूत के होंठ इतने फूले हुए थे की चीरा अंदर धसा हुआ था और करीब से देखने पर ही लकीर दिखती थी.

"वाह मेरी बन्नो तेरी तो मेरे से भी फूली हुई है." ऋतु ने आँख मारी और उसकी चूत पर उंगली फेर दी.

"कमिनी मत कर ये. मेरा चूत देखने का मतला कुछ और था. उसका लंड आगे से इतना मोटा है." अलका ने अपनी उंगली और अंगूठे से सी जैसा बनाया. "इतना बड़ा पेनिस और इतनी सी वेजाइना. सोच टांगे चौड़ी हो जाएँगी ना?" बोलते बोलते ऋतु की चूत को खोल कर देख भी लिया जो लगभग पूरी बंद ही थी.

"तू कहना क्या चाहती है?" ऋतु ने अब गंभीरता से पूछा.

"तुझे याद है 3 दिन पहले कोमल और माधुरी दीदी यहा कमरे मे तुझ से बातें कर रही थी. मैं भी बाहर से सुन रही थी सारी बात."

"ओह तेरी. याद आया अब. उन्होने कहा था के किसी का 8 इंच का हो सकता है? और ये सब कैसे होता है. दर्द, सेक्स एट्सेटरा." ऋतु की नज़रो मे अलका के लिए प्रशंसा थी.

"और आज दीदी को बुखार है. पाव मे मोच. वो कमरा मेरा भी है तो 12 बजे दीदी वहाँ नही थी. सुबह 4 बजे भी नही थी."

"मतलब कोई मोच वॉच नही है. उन्होने..." ऋतु ने बात बीच मे ही छोड़ दी. उसकी आँखे बड़ी हो चुकी थी

"एग्ज़ॅक्ट्ली मेरी जान. बस अब एक काम करना है के हम दोनो को थोड़ी नज़र रखनी है."

"क्यों? तुझे बुरा लगा क्या ये सोचकर की अर्जुन और दीदी के बीच कुछ है?"

"तू पागल है ऋतु. नज़र से मतलब है के बैठकर तो हुमको कुछ एक्सपीरियेन्स होने वाला नही. अगर दीदी ने उसका लिया है तो वो फिरसे करेंगे."

अब ऋतु की समझ मे आया तो उसने ख़ुसी से अलका को बाहों मे लेकर चूम लिया. दोनो की नंगी चूत टकराई तो करेंट सा लगा. अलका ने जल्दी से सलवार उपर करी और बिस्तर पर बैठ गई.

"कुछ भी बोल अगर तेरी सब बात सही है तो दीदी है बहुत जिगरवाली. इतना बड़ा झेल कर भी ज़िंदा है." ऋतु ने कहा

" झेल तो हम भी लेंगी. और उनसे भी जल्दी बस ये डर कम करना है. तेरी और मेरी हाइट ज़्यादा है उनसे. तो गुफा भी तो लंबी होगी."

अब दोनो हँसने लगी और आगे का प्लान बनाने लगी.
 
शाम हुई और फिर वही सब. खाने के बाद अर्जुन दादा जी के पाव दबा कर सीधा छत पर जाकर लेट गया. समय कुछ ज़्यादा नही हुआ था लेकिन उसका ध्यान किसी गहरी सोच मे था. संजीव भैया अपने कमरे मे जा चुके थे. अलका और ऋतु भी एक साथ पढ़ने बैठी थी. माधुरी दीदी के कमरे मे आज ताईजी थी. उनकी तबियत पहले से बहुत ठीक हो चुकी थी. फिर भी दादी जी के कहने पे आराम कर रही थी. रेखा जी भी अब बिल्कुल ठीक थी. इस तरह घर पूरी तरह से शांत था और वही उपर अकेला लेटा हुआ अर्जुन बस सितारो को देख कर कुछ सोच रहा था. 10:30 बजे तकरीबन कोमल दीदी अपना बिस्तर लेकर वही आ गई. उन्होने बिस्तर बिछा भी लिया लेकिन अर्जुन को कोई आभास नही था उनके होने का.

"क्या सोच रहा है मुन्ना?", उसके साथ ही लेट कर कोमल दीदी ने अर्जुन से पूछा

"दीदी कभी कभी सोचता हू के पहले कैसी जिंदगी थी मेरी. जैसे बचपन से ही फौज की तैयारी शुरू हो चुकी हो. घर से दूर, प्यार से दूर और सिर्फ़ हर साल कुछ नये लक्ष्य थे. कोई नही पूछता था के मैं कैसा हू, मुझे घर से दूर क्यो किया. और आज देखो इतना प्यार मिल रहा है के थोड़ा डर भी लगा रहता है. जैसे ये जल्दी फिर से ख़तम ना हो जाए. कही ये एक अवकाश तो नही अगली लड़ाई से पहले?"

उसकी बातों को गोर से सुनकर कोमल दीदी ने अपने छोटे भाई को अपने से लगा लिया. "कुछ भी सोचता रहता है. इतना मत सोचा कर भाई. हम सब है यहा तेरे साथ. तुझे हम से कोई दूर नही कर सकता." और अपनी उंगलिया उसके बालो मे चलाने लगी.

"एक और बात है दीदी जो परेशान भी कर रही है लेकिन उसमे कुछ खुशियाँ भी छुपी है. जब घर से दूर था तब ऐसा कुछ एहसास कभी नही हुआ था. लेकिन जब भी आप या ऋतु दीदी मेरे करीब होती हो मुझे ऐसे लगता है जैसे मैं पहले अधूरा था लेकिन आपने मुझे पूरा कर दिया.

मुझे नही पता इस एहसास को क्या नाम दूँ लेकिन जब भी आप मेरे करीब होती हो दिल करता है आपको अपनी बाहों मे रख लू. अगर ऐसा मुमकिन होता के मैं किसी मे समा सकूँ या किसी को खुद मे समा लू तो वो आप होती. लेकिन ये है क्या? और क्या ये सब जो भी मेरे साथ हो रहा है वो सही है?"

"प्यार. यही तो प्यार है मेरे भाई जो किसी अधूरे को पूरा कर देता है. जिसमे कुछ सही ग़लत नही होता लेकिन एक दूसरे के लिए इज़्ज़त, समर्पण और कुछ भी कर गुजरने की चाहत होती है. और मैं जब भी तुझे देखती हू मेरा भी यही हाल होता है. लेकिन ज़रूरी तो नही के इसको सबके सामने आने दिया जाए. लोग हर रिश्ते को एक नाम दे देते है लेकिन ज़रूरी तो नही के उनको रिश्ता जाहिर किया जाए. दुनिया वैसी नही है अर्जुन जैसी दिखती है. लेकिन एक मासूम दिल से बढ़कर कुछ नही. मैं तेरे पास होती हू तो फिर वहाँ ये समाज नही होता सिर्फ़ हम दोनो होते है."

दीदी की बात सुनकर अर्जुन को उसके कई जवाब मिल गये थे. उसने दीदी की कमर पर हाथ रख खुद से सटा लिया था. उनकी आँखो को चूम कर वो शांति से लेटा रहा. और कोमल दीदी भी अपने भाई की धड़कन महसूस करती रही. कुछ पल के बाद दोनो एक दूसरे को देखने लगे. कोमल उसकी पीठ सहलाते हुए खुद ही उसका निचला होंठ पीने लगी. और फिर उसकी चौड़ी छाती पे अपना हाथ रख गले पे अपनी साँसें गिराने लगी.

अर्जुन भी दीदी की कमर को सहलाता हुआ उनकी नाभि पे हाथ रख उनके प्यार को महसूस करने लगा. जाने कितनी ही देर दोनो ऐसे प्यार के रंग भरते रहे. अर्जुन के हाथ जब दीदी की खुली कमीज़ मे पेट से होते हुए उनके चुचों पर गये तब एक पल के लिए कोमल दीदी ने किस करना रोका.

फिर वापिस वो अर्जुन के मूह मे अपनी जीभ डाल उसकी कूल्हे सहलाने लगी. किसी ठोस रब्बर की गेंद के जैसे उन्नत दूध को दबाते हुए अर्जुन भी नशे मे डूब चुका था. दीदी ने खुद से अपनी कमीज़ गले तक उपर कर दी थी. ब्रा तो पहले ही नहीं पहनी थी तो दोनो दूध बेपर्दा हो गये.

किसी छोटे बच्चे की तरह अर्जुन उनके दूध पी रहा था, हल्के हल्के निपल काट रहा था. कोमल दीदी भी आ ही भरती हुई बस अर्जुन को सहला रही थी. जब दोनो का खुद से काबू ख़तम होने लगा तो अर्जुन ने दीदी का पाजामा नीचे सरका दिया और कोमल दीदी अपनी चूत उसके कड़े लंड पर रगड़ने लगी. दीदी के एक दूध अब आगे पीछे हो रहे थे जिस से अर्जुन की पकड़ उनके नंगे चुतड़ों पर बढ़ गई. वो उन्हे आटे की तरह गूँथ रहा था और उनका लंड दीदी की चूत पे ज़ोर से रगड़ खा रहा था.
 
कोमल ने भाई का लंड पाजामे से आज़ाद कर दिया और अपनी गीली चूत का चीरा उसपर घिसने लगी. ऐसे लेटे हुए दोनो को परेशानी हो रही थी तो कोमल अपने भाई के उपर लेट कर चिपक गई. उसकी पूरी चूत अपने छोटे भाई के बड़े डंडे पर अब कस के फिसल रही थी और नीचे लेटा हुआ अर्जुन बस दीदी के लटक कर झूलते मोटे बूब्स को देख कर मज़े ले रहा था. पूरा लंड चूत की चिकनाई से गीला हो चुका था के तभी दीदी उसकी छाती पर गिर कर हाँफने लगी और उनकी चूत से ढेर सारा शहद अर्जुन के लंड पर टपकता रहा.

अभी तक दोनो चुप ही थे. अर्जुन ने दीदी को पलट कर अपने नीचे ले लिया और दीदी भी आ गई उसके लंड के नीचे. उनकी चूत के शहद से भीगा लंड अर्जुन ने वापिस चूत पर टीकाया और घिसने लगा. सुपाडा अब चूत के दोनो होंठ अच्छे से फैलाते हुए पेट की तरफ आ जा रहा था. कोमल दीदी की सिसकारी तेज हो चुकी थी और उन्हे शांत करने के लिए उन्होने अर्जुन का मूह अपने मूह मे भर लिया

अर्जुन अब उनके बड़े चूचे कुचलता हुआ तेज तेज घिसाई कर रहा था. एक समय पर उसका लंड अपनी दिशा से भटक कर चूत के छेद पर लगा तो कोमल अंदर तक हिल गई. अब उसको एहसास हुआ था अर्जुन के लंड की मोटाई का. लेकिन अर्जुन ने वापिस घिसाई करना ही ठीक समझा. माधुरी दीदी की हालत उसके दिमाग़ मे बस चुकी थी और अब वो कोमल दीदी को भी वो दर्द नही देना चाहता था. तकरीबन 25 मिनिट के बाद ही अर्जुन के लंड ने लावा उगला, जो दीदी के पेट, चुचों और चूत के उपर गिरा था. पास मे रखी अपनी टीशर्ट से उसने खुद दीदी को सॉफ किया और उनको नंगे बदन ही खुद से चिपका कर लेट गया. दोनो भाई बहन अब नींद के आगोश मे थे, जहाँ लंड चूत से चिपका था और चूचे भाई की छाती से.
 
ललिता जी एक खुली सी मॅक्सी पहन कर बाथरूम मे घुसी. अगले ही पल वो उस एक मात्र कपड़े से बाहर शावर के नीचे खड़ी अपने तपते शरीर पर ठंडा पानी गिरा रही थी. इस उमर मे भी उनके बड़े गुब्बारे ज़्यादा नही झुके थे, उपर से उनकी कहर ढाती बड़ी गान्ड जो उनके हिलने से और भी थिरक रही थी. इतने खूबसूरत शरीर वाली औरत के मूह पर उदासी घिरी थी. वो संस्कारी महिला थी लेकिन फिर भी हर शरीर की एक ज़रूरत और खुराक होती है. अगर वो ना मिले तो उसका हाल बुरा ही होता है. और यही आज उनके साथ एक बार फिर हुआ था. राजकुमार जी को 5 दिन के लिए बाहर जाना था तो उन्होने जाने से पहले अपनी गदराई बीवी को गरम करने के बाद अधूरा ही छोड़ दिया था. वो तो 4 बजे निकल गये दूसरे शहर और जाने से पहले अपनी बीवी की नींद खराब कर गये. पिछले 4-5 साल से उनका यही हाल था. राजकुमार जी खुद 2-3 मिनिट मे ख़तम हो जाते थे लेकिन ललिता जी तड़पति रह जाती थी. इस बात का असर उनके स्वाभाव पर काफ़ी गहरा हुआ था. वो ज़्यादा नही बोलती थी और ज़्यादातर गुमसूँम अकेली रहती थी अपने कमरे. सिर्फ़ घर के काम करते समय ही वो खुश रहने का मुखौटा ओढ़ लेती थी. आज भी हाल कुछ ऐसा ही था. पानी के नीचे खड़े होकर भी जब शरीर की गर्मी कम ना हुई तो उन्होने अपने हाथ से अपनी चूत रगड़नी शुरू कर दी और दूसरे हाथ से खुद ही अपने बूब दबा रही थी. उपर पानी बह रहा था नीचे पानी निकालने ने की कोशिश हो रही थी.

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अर्जुन की आँख आज फिर टाइम से पहले ही खुल गई थी. उसने देखा उसका लंड दीदी की चूत से चिपका खड़ा हुआ था लेकिन वो नज़रअंदाज कर खड़ा हुआ. अपनी दीदी को हिला कर कपड़े पहन ने के लिए बोल नीचे आ गया. कोमल जैसे तैसे कपड़े पहन वापिस सो गई. इधर जूते पहन कर अर्जुन पिछली सीडीया पकड़ रसोईघर मे पानी पीने लगा और उधर ललिता जी को उंगली से भी आराम ना मिला तो वो बदहवास सी नंगी ही अपने कमरे की तरफ चल दी. यहा वो बाहर निकली उधर अर्जुन, और दोनो ही अब एक दूसरे के सामने खड़े थे. ललिता जी तो पत्थर हो गई थी और उनके इस भरे हुए शरीर को देख अर्जुन उसमे ही डूब गया था. ज़्यादा रोशनी नही थी लेकिन इतनी थी की दोनो को एक दूसरे का भरपूर नज़ारा हो रहा था. किसी कमरे मे अलार्म बजने से दोनो होश मे आए तो अर्जुन अपने रास्ते चल दिया और ललिता जी अपने. दोनो मे कोई संवाद नही हुआ था. लेकिन ललिता जी ने अपने भतीजे की आँखों की चमक अच्छे से पढ़ ली थी.

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6 बजे तक वही हुआ जो बाकी दिन रहता था लेकिन आज अर्जुन को ढूंढती ऋतु दीदी बगीचे मे आ खड़ी हुई थी. यहा दादा पोता दोनो मिलकर पेड़- पौधो को पानी दे रहे थे.

"चलो माली अब अपनी मेंमसाब् को स्कूटी सिखाने का टाइम हो गया है. नही तो दादा जी से कह कर पगार कटवा दूँगी.",

दादाजी ने ऋतु की बात सुन अर्जुन को बाहर किया.

"चलिए मेंमसाब्", और अर्जुन स्कूटी को किकस्टार्ट कर गेट से बाहर लाकर ऋतु को पीछे बिठाया.

"दीदी हम अगले सेक्टर चलते है वहाँ बड़ा ग्राउंड है और पूरा खाली."

"ठीक है चलो फिर. और कोई शॉर्टकट नही, अच्छे से सिखाना."

"वादा करता हू आपको एक्सपर्ट बना कर ही दम लूँगा." अर्जुन ने बात तो सीधी की थी लेकिन ऋतु जानबूझ कर उसका ग़लत मतलब सोचने लगी.

"हा अब तो एक्सपर्ट बन ही जाउन्गी अगर तू प्यार से सिखाएगा."

ऐसे ही दोनो उस ग्राउंड मे पहुच गये. ये जगह पूरी वीरान थी और ज़मीन भी समतल सॉफ थी.

"दीदी देखो ये रेस है. अपने हाथ से इसको पीछे करोगी तो स्कूटी आगे चलने लगेगी. लेकिन ध्यान रहे की इसको ज़्यादा नही खींचना. बिल्कुल आराम से. इसके आगे जो ये रोड है ये अगले टाइयर के ब्रेक है. सिर्फ़ एमर्जेन्सी मे ही दबाना. ये लेफ्ट साइड वाला पिछला ब्रेक है.

स्कूटी को इस से रोकना बेहतर है. जब भी ब्रेक लगाना हो तो रेस नही देना. आज मैं आपको बॅलेन्स बनाना सिखाऊंगा और कुछ नही."

ऋतु सब ध्यान से देख सुन रही थी और फिर अर्जुन सीट पर पीछे सरक गया. ऋतु दीदी आगे बैठी तब अर्जुन ने उनके हाथ हॅंडल पर रख अपने हाथ उनके उपर रखे. धीमी रेस दी तो स्कूटी आगे बढ़ने लगी.

"दीदी बिल्कुल घबराना नही. ये हॅंडल बस सीधा रखना और जितना रेस अभी है उतने पे रहने देना. मैं आपके साथ हू." अर्जुन ऋतु दीदी से बिल्कुल चिपक कर बैठा था और हॅंडल पे उसके हाथ बस हल्के से ही रखे थे. ऋतु को साइकल चलानी आती थी तो काफ़ी हद तक वो ठीक कर रही थी. जब भी घूमना होता तो अर्जुन उनके हाथ पकड़ कर खुद स्कूटी मोड़ देता. ऐसे टाइम पर ऋतु के मुलायम दूध उसकी बाजू से दब जाते और ऋतु को अच्छा लगता ये नया एहसास. कुछ 15 मिनिट बाद वो बस अपनी गान्ड पर अर्जुन के लंड की गर्मी और बूब्स पर उसकी बाहो क स्पर्श का मज़ा ले रही थी. अर्जुन तो जब से उठा था तभी से उत्तेजित था और अब इस गर्मी को ऋतु दीदी ने और भड़का दिया था. कुछ टाइम बाद उसने ग्राउंड के आख़िरी कोने मे स्कूटी रोक दी. उसके दोनो पैर ज़मीन पर लगे थे और उसने दीदी के कंधे पर अपना सर टीका उनके दोनो अनार पीछे से ही हाथो मे थाम लिए.

"मैं यही तो चाहती हू भाई. नही तो स्कूटी के लिए कोंन इतनी सुबह उठेगा."

अपने भाई द्वारा बूब्स दबाए जाने पर ऋतु ने मन मे यही बोला और बाहर एक हल्की सिसकी निकल गई. उस मज़े की आवाज़ को सुनकर अर्जुन उनकी गर्दन पर चूमने लगा. अपने पैर से उसने साइड स्टॅंड लगा दिया था. ऋतु ने भी अपनी कमर पीछे धकेल दी जिसके नीचे अर्जुन का खड़ा लंड दब गया. अपनी गान्ड पर अर्जुन के मोटे लंड को एहसास होते ही ऋतु ने गर्दन घुमाई और भाई को चूमने लगी. टीशर्ट खुली थी तो अब अर्जुन के हाथ ब्रा पर पहुच गये थे. वो उस नरम कपड़े के उपर से ही उनके बूब्स मसल रहा था. पाजामी की अंदर कच्छी नही थी तो नरम गान्ड पर गरम लंड का भी असर होने लगा था. वो दोनो बस ऐसे ही उपर उपर से एक दूसरे को खुश करने मे लगे थे और ऋतु को अपनी चूत मे दबाव सा बनता महसूस हुआ. अर्जुन ने अपने लंड को और आगे किया तो वो ऋतु की चूत के होंठो के निचले हिस्से पर चुभने लगा. इसके साथ ही वो बुरी तरह से अकड़ गई और दीदी की चूत के पानी को अर्जुन ने अपने लंड पर भी महसूस किया. उसने हाथो की हरकत रोक दी बस बूब्स पकड़े रखे.

जब 2 मिनिट बाद ऋतु नॉर्मल हुई तो अर्जुन पीछे से उठकर आगे आकर बैठा, स्कूटी ओंन करी और वापिस घर की तरफ

चल दिया. दोनो चुप थे लेकिन मुस्कान गहरी थी उनके चेहरे पे. ऋतु को तो आज पता लगा था क़ि"ऑर्गॅज़म" क्या होता है.

"भाई बस ऐसे ही सिखाता रह मुझे. एग्ज़ॅम ख़तम होते ही तेरा पूरा ना ले गई तो मैं ऋतु शर्मा नही.", उसने मन मे ये बात कही और फिर खुद ही अपनी बात पे हँसने लगी.

"दीदी उतरो, घर पहुच गये.", ये बात सुनते ही ऋतु बिना मुड़े स्कूटी से उतर कर तेज़ी से अंदर दौड़ गई. उसकी चूत गीली थी और सलवार भी. अर्जुन को ये पता था तो वो बस मुस्कुरा भर दिया. "दीदी भी ना, कमाल ही है." और अंदर आ गया.

"मज़ा आया तुझे आज?", अर्जुन जब खाने की मज़े पर बैठा तो बारबर मे ही बैठी अलका ऋतु से पूछ रही थी

"इतना के बता नही सकती. तू खुद ही पता कर ले." दोनो धीमी आवाज़ मे बात कर रही थी लेकिन अर्जुन के कान वही लगे थे.

"ओये होय. पहले ही दिन तू बारिश मे भीग आई."

"कल तू अपने बादल बरसा लेना. कौन रोक रहा है." ऋतु ने मस्ती मे जवाब दिया.

"आरू, चल भाई खाना शुरू कर. ठंडा हो रहा है." माधुरी दीदी ने ये कहा तो अर्जुन उन्हे उपर से नीचे तक निहारने लगा.

"आप ठीक हो?" अर्जुन ने सिर्फ़ इतना कहा और माधुरी दीदी ने हाँ मे गर्दन हिलाई
 
ऋतु और अलका ने सब देख लिया था और फिर वो भी खाना खाने लगी.

"ताऊ जी नज़र नही आ रहे. ना ही भैया." खाने के दौरान ही अर्जुन ने ये बात कही तो ताई जी ने झिझकते हुए जवाब दिया

"बेटा वो तो सुबह 4 बजे चले गये थे पंजाब , 5-6 दिन तक आएँगे. और तेरा भाई भी अब रविवार तक ही वापिस आएगा."

आज तो गुरुवार है. मतलब आज मुझे भी स्टेडियम जाना है." अर्जुन को याद आ गया था के आज से उसका भी टाइम्टेबल बदल रहा है.

"भाई कल मेरा एग्ज़ॅम है तो तू ध्यान राखियो ." अलका ने ऋतु के साथ अपने कमरे मे जाते समय कहा. कोमल और माधुरी दीदी भी अब उनकी जगह बैठ कर नाश्ता कर रही थी. अर्जुन दोनो ही बहनो को देख रहा था. "भगवान ने भी बिल्कुल सही जोड़ी बनाई है. माधुरी दीदी और कोमल दीदी दोनो कितनी भारी भारी और गदराई हुई है. ऋतु दीदी और अलका दीदी गोरी, लंबी और मस्ती से लबरेज है." वो मन ही मन तुलना कर रहा था. "लेकिन सभी को भगवान ने फ़ुर्सत से ही बनाया है. दिल भरता ही नहीं."

अपने भाई को यू मंद मंद मुस्कुराते देख कोमल और माधुरी दीदी भी खुश हो गई.

"वो उपर मेरी अलमारी सेट कर देना मा अगर आपको समय हो जब भी. मेरे कपड़े शायद अभी नीचे ही है. और भैया के कमरे को भी देख लेना."

इतना बोलकर अर्जुन दूसरी मंज़िल पर ड्रॉयिंग रूम मे बैठ गया. एक किताब उसको दादाजी ने दी थी, सामान्य ज्ञान की तो वो उसको ही पढ़ने लगा.

एक घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई तो देखा ताईजी खड़ी थी बाहर. उनके हाथ मे झाड़ू था और पौचे की बाल्टी उन्होने बाहर ही रख दी थी.

"ताई जी मुझे आवाज़ दे देते मैं उपर ले आता. आपने कष्ट क्यो किया उपर तक बाल्टी लेके आने का.?" उसने अपनी ताईजी की फिकर करते हुए कहा

"बेटा इतना भी कोई खास वजन नही है. चल तू पंखे बंद कर पहले मैं झाड़ू दे देती हू.."

"ठीक है ताईजी . आप आओ अंदर."
 
maaf karna dosto update bahut samay baad aa raha hai kya karun samay hi nahi mil pa raha tha
 
अर्जुन ने ड्रॉयिंग रूम का पंखा बंद कर दिया. बाकी दोनो पंखे बंद ही थे. ताईजी पहले भैया के कमरे मे गई. अपनी सारी जो अभी तक सर पे पल्लू सी लपेटी थी उन्होने अपनी कमर मे ठूंस ली. और नीचे झुक कर सफाई करने लगी. अर्जुन बाहर सोफे पर ही बैठा था.

"बेटा ज़रा पलंग सरकवा दे." ताईजी की आवाज़ से वो वहाँ गया तो ताईजी झुक कर पलंग हिलाने की कोशिश कर रही थी. उनका ब्लाउस उनके

भारी खजाने को समेट नही पा रहा था. वो बाहर निकालने को जैसे मचल रहे थे. अर्जुन ने नज़ारा लेने के बाड़ा पलंग सरका दिया.

"यहा से सॉफ कर दूँ फिर वापिस वही कर देंगे इसको." और ताईजी फिर झाड़ू लगाने लगी. जब सामने होती तो उनके गोरे पपीता दिखने लगते

और जब घूम जाती तो उनकी बड़ी गान्ड नज़र आने लगती. अर्जुन का तो बुरा हाल हो चुका था. पंखे बंद थे और हवा ना चलने से ताईजी

को पसीना भी आ रहा था. उनकी चुचियो की खाई के बीच मे पसीने के बूंदे समा रही थी. ये दृश्य इतना कामुक था के अब लंड पाजामे

से बाहर नज़र आने लगा था. ताईजी कनखि से अपने मुन्ने की हरकत देख रही थी लेकिन वो चुप थी. शायद उनके संस्कार रोक रहे थे.

"चल अब तेरे कमरे मे आजा." वहाँ का कूड़ा ड्रॉयिंग रूम की तरफ कर वो अर्जुन की कमरे मे सफाई करने लगी. मैले कपड़े समेट कर बाहर

सोफे पर रखे और गद्दा दीवार के साथ सटा के खड़ा कर दिया. इस दौरान भी अर्जुन बस उनको आगे पीछे से देख कर ही उत्तेजित हो रहा था.

कुछ ही पल मे वो कमरा भी सॉफ हो गया. ताईजी ने अगले 5 मिनिट मे ड्रॉयिंग रूम भी सॉफ कर सारा कूड़ा बाहर कर दिया.

फिर बाहर झाड़ू रख पौंच्छा बाल्टी उठा अंदर आ गई. अर्जुन ने भी तीनो पंखे चला दिए. बाल्टी ड्रॉयिंग रूम मे रख ताईजी पौंच्छा गीला

कर भैया के कमरे मे चली गई. अर्जुन ने खुद को कंट्रोल करने के लिए सोफे पर ही बैठना ठीक समझा. थोड़ी देर बाद जैसे ही उसकी नज़र

भैया के कमरे की तरफ गई जो हिस्सा ड्रॉयिंग रूम से दिखता था, अर्जुन की खोई उत्तेजना झटके से वापिस लौट आई. ताई जी की गोरी पिंडलिया

चमक रही थी. और बैठकर हिलने से साड़ी के अंदर उनकी जाँघ तक नज़र आ जाती थी.

अब एक बात और हुई के ताईजी के ब्लाउस का एक बटन खुल चुका था. जैसे ही वो झुकती उनके बड़े दूध के साथ अंदर पहनी सफेद ब्रा के कप भी नज़र आ जाते. मोटे चुचों के बीच सोने का मंगलसूत्र तो उन्हे काम की देवी बना रहा था. ललिता जी को पता था के अर्जुन क्या देख रहा है बस वो धीमे धीमे उसके सामने ही काम

करती रही. फिर अर्जुन के कमरे मे भी पौंच्छा दिया और आ गई ड्रॉयिंग रूम मे. "ज़रा ये सोफे थोड़े हिला दे यहा से" उन्होने बोला और अर्जुन ने

हटा दिए. वो उसके सामने जब इस बार झुकी तो उनके मूह से कराह निकल गई. "आई माआ.." अर्जुन ने भी ये सुना और जब देखा तो अपनी ताईजी

के चेहरे पे दर्द दिखाई दिया.

"क्या हुआ ताईजी .? आप यहा बैठो.", और अर्जुन ने उनको सहारा देकर सोफे पे बिठाया.

"बेटा लगता है की कमर मे मोच आ गई है या कोई नस चढ़ गई है." और एक कराह निकल गई

"आप कहो तो मैं मा को बुलाता हू?"

"नही बेटा अपनी मा को क्यू परेशान करता है. बस 2 मिनिट मे ठीक हो जाएगा ये दर्द." वो पसर सी गई थी सोफे पर. उनकी साँस के साथ उनके

दूध भी हिल रहे थे.

सारी अब साइड मे लटक रही थी उपर से. ऐसे ही थोड़ी देर बाद वो उठी ओर नीचे चल दी धीमी चाल से. कुछ देर बाद

कोमल दीदी ने बाकी सफाई करी और वो भी चली गई.
 
सोफे अपनी जगह वापिस सेट किए और गद्दा ठीक कर वो वही लेट गया. 3 दिन से ठीक से सो नही पा रहा था रात को तो वो कुछ ही देर मे ढेर हो गया.

दोपहर के समय कोमल और माधुरी दीदी ने बाहर वाले आँगन मे कपड़े ढोने की मशीन लगा रखी थी. माधुरी दीदी मैइले कपड़े मशीन मे डाल कर सॉफ कर रही थी और कोमल कपड़ो को निचोड़ आँगन मे लगी रस्सी पर सूखने के लिए डाल रही थी.

"कोमल तू यहा मशीन पे नज़र रख मैं ज़रा बाथरूम होकर आई." माधुरी दीदी को पेशाब लगी थी.

"हा दीदी मैं यही हू."

माधुरी दीदी ने वही बाहर वाले बाथरूम के कमोड पर बैठते हुए अपनी सलवार-कच्छी नीचे करी और बैठ गई. छररर की आवाज़ से धार निकालने लगी.

"कमीने ने एक ही बार करके सीटी की आवाज़ ही बदल दी.", माधुरी दीदी अपनी ही पेशाब की बदली हुई आवाज़ सुनकर शर्मा गई थी. उनको फिर अर्जुन के लंड की याद आ गई. अपनी चूत को पानी से सॉफ करते हुए उन्होने ध्यान से देखा तो वो अब उसके होंठ और मोटे हो गये थे और बीच का चीरा हल्का खुल गया था जो पहले हर वक्त चिपका रहता है. इतने मे उनकी चूत मे खुजली होनी शुरू हो गई.

"हाए राम लगता है अब चैन ऐसे नही आएगा."

"दीदी, आपको ताईजी बुला रही है.", कोमल की आवाज़ सुनकर माधुर दीदी ने अपनी कच्छी और सलवार उपर करी और घर के अंदर चल दी.

"बेटा दिन का खाना आज तू अपनी चाची के साथ बना लेना. तेरी मा की कमर और जाँघ मे नस्स खींच गई है." कौशल्या जी माधुरी की मा के पास बैठी थी और अपनी बहू की पीठ पर तिल के तेल से मालिश कर रही थी.

"हा तो दादी इसमे क्या बड़ी बात है. मैं कर लूँगी."

"मेरी सबसे प्यारी बच्ची है ये. घर का सारा काम खुद ही संभाल लिया. जब ये चली जाएगी तो पता नही ऋतु/अलका क्या हाल करेंगी." दादी ने लाड से ये बात बोली तो माधुरी दीदी बाहर को निकल चली बोलती हुई,

"दादी मैं कही नही जाने वाली. यही रहूंगी.", हँसती हुई रेखा जी के

पास बैठ गई जो सब्जी काट रही थी. हल्के पीले रंग की काली पट्टी वाली सारी और काले ब्लाउस मे रेखा जी किसी नई ब्याही युवती लग रही थी.

उनका सफेद सपाट पेट काले तंग ब्लाउज के नीचे और आकर्षक लग रहा था.

"चाची क्या लगती हो आप.? 3 बच्चे होने के बाद भी मेरी हम उम्र लगती हो", माधुरी ने आटा छानते हुए चाची को गोर से देखते हुए पूछा.

वो खुदकी तुलना चाची जी से कर रही थी.

इस उमर मे भी चाची कमाल की है. बड़े गुलाबी होंठ, लंबे काले घुंघराले बाल जो ज़्यादातर बँधे रहते थे, भारी कूल्हे जो किसी भी हाल मे

उसके कुल्हो से कम ना थे, चूचे शायद एक साइज़ कम थे लेकिन फिर भी आकड़े हुए रहते थे.

"कभी तो अपनी चुहलबाजी बंद कर दिया कर. मेरी उमर ज़्यादा हो चली है तो अब मज़ाक उड़ाने लगी?", रेखा जी ने ये बात उपर उपर से ही कही थी. उनको भी माधुरी की बात सुनकर अच्छा लगा था.

"अब आपने नही बताना तो रहने दीजिए. लेकिन जो सच है वही कहा मैने. खुद ही देख लीजिए वो ज्योति की मा आपकी उमर की है लेकिन कहा वो 50 की लगती है और आप अभी भी 25 की."

"अररी पागल कुछ भी नही है बस जो मेरा रुटीन है वही है. और तेरे चाचा जी भी मेरा अच्छे से ख़याल रखते है. तेरी शादी हो जाने दे तुझे खुद पता चल जाएगा." रेखा जी ने बात तो कह दी कहने को लेकिन माधुरी की आँखों के सामने उस रात वाला मंज़र आ गया. चाचा क्या मज़े से चाची की चुदाई कर रहे थे और चाची भी कुछ कम नही थी. उसको अब समझ आया के चाची की सुंदरता का राज क्या है.

"चल ला ये आटा मुझे दे और सब्जी चढ़ा दे चूल्हे पर."

"हा लीजिए."

"कोमल तू जा अपने भाई को जगा दे. उसने फिर जाना भी है.", रेखा जी ने गलियारे मे आती कोमल को आवाज़ दी.

"जी मा."
 
खाने से फ्री होने के बाद अर्जुन ने कपड़े बदले. ट्रॅक पाजामा और टीशर्ट पहन कर अपने जूते कस वो दादा जी के कमरे मे आया.

"वो कोच सर ने कोई ज़रूरी समान तो नही बताया था दादा जी साथ लाने को?", रामेश्वर जी ने अख़बार नीचे रख अपने पोते को समय से पहले ही तयार देखा और उन्हे नाज़ हुआ उसके अनुशाशण को देख.

"नही बेटा. वो क्या है के अभी तो आज और कल ऐसे ही जाना है. फिर सोमवार को क्या करना है वोही तुझे बता देंगे. जो भी लेना हो मुझे बता देना या अपनी दादी को. और सिर्फ़ अपने काम मे ध्यान लगाना." उन्होने ने नसीहत भी दे ही दी. थोड़ी चिंता रहती थी उनको क्योंकि अर्जुन अंजान जगह ज़्यादा कभी गया नही था.

"हा दादा जी आप निश्चिंत रहिए. अच्छा अब चलता हू. पहला दिन है तो थोड़ा जल्दी जाना ठीक रहेगा."

ये स्टेडियम राष्ट्रीय स्टेर का था और लगभग हर खेल की कोचैंग यहा होती थी जहाँ पूरे देश के कोने कोने से प्रतिभाशाली बच्चे और खिलाड़ी आते थे. क्रिकेट, जूडो, होकी, तईनिस, बॅडमिंटन, कुश्ती, बॉक्सिंग और आत्लेटिक्स के तो राष्ट्रीय/अंतर राष्ट्रीय मॅच और प्रतियोगिता यहा होती रहती थी. लंबी चौड़ी लिस्ट थी यहा कोचैंग देने वाले बड़े बड़े खिलाड़ी रह चुके व्यक्तियो की. हर खेल का उच्च स्तरीय समान और सहूलियत थी. अर्जुन को सिर्फ़ पहचान की वजह से आसानी से दाखिला मिल गया था.

"वाह. ये तो पूरा ही शहर है गेट के भीतर." अर्जुन लाजवाब हो गया जैसे ही अंदर आया.

अपनी साइकल लगा कर बॉक्सिंग प्रॅक्टीस एरिया की पूछताछ करने के लिए वो किसी खाली इंसान को ढूंड रहा था. सब तरफ तो खिलाड़ी प्रॅक्टीस ही कर रहे थे. जहाँ वो खड़ा था वहाँ पर बास्केटबाल और टेन्निस के लगभग एक डज़न कोर्ट थे जहाँ सब पूरी मेहनत से लगे हुए थे. लड़के और लड़किया सभी. बस उनके कोर्ट अलग अलग थे. तभी उसकी नज़र एक हट्टे कट्टे लड़के पर गई जो सिर्फ़ निक्कर और बनियान पहने था. देख कर ही पहलवान लग रहा था और शायद गाँव से था.

"सर, ये बॉक्सिंग विभाग किस तरफ है.?", अर्जुन ने उसके पास जात हुए पूछा. वो लड़का रुक कर पहले तो अर्जुन को गोर से देखने लगा फिर थोड़ा मस्ती से बोला, "क्यू भाई तेरा कोई रिश्तेदार है वहाँ.?"

"नही सर वो मुझे कोच जोगिंदर जी से मिलना था."

"देख भाई पहली बात तो मैं कोई सर नही हू. और दूसरी मेरा नाम है विकास पुण्य. और तेरे काम की बात ये के मैं भी उधर जा रहा हू. चल."

अर्जुन भी विकास के साथ ही चल दिया. "मेरा नाम अर्जुन शर्मा है और आज से ही मैं अपनी कोचैंग शुरू करूँगा."

बातचीत की शुरुआत करनी चाही उसने तो देखा की विकास अपने दोनो हाथो पर गरम पट्टी बाँध रहा था चलते चलते.

"देख छोटे भाई तेरा पहला दिन है तो कोच साहब से पहले मैं ही एक ज्ञान की बात बता दूँ. गाँठ बाँध लिओ. यहा पर सिर्फ़ अपने काम से काम रखियो और किसी से ज़्यादा बातचीत ना कारिओ. खास कर किस छोरी से. और तू शरीफ लड़का है उमर भी कच्छी है तेरी. ज़्यादातर खिलाड़ी या तो पागल होते है या फिर बदमाश. बच के रहियो. आ गया तेरा बॉक्सिंग ज़ोन."

"थॅंक यू विकास भैया." जाते हुए अर्जुन ने जब भैया कहा तो पहलवान भी मुस्कुरा के चल दिया. उसका प्रॅक्टीस पॉइंट आगे था.

"सर, मुझे श्री रामेश्वर जी ने यहा भेजा है और श्री जोगिंदर जी से मिलना है." अर्जुन ने एक दाढ़ी वाले 50 साल के आदमी से ये बात कही जो अकेला कुर्सी पर बैठा था. कुछ ही दूरी पर 15-16 लड़के बॉक्सिंग के प्रॅक्टीस कर रहे थे.

"अर्जुन. यही नाम है बेटा? मैं ही हू जोगिंदर सिंग. आओ मेरे साथ." अर्जुन ने हाथ जोड़े जब उन्होने खुद ही अपना परिचय दिया. कुछ देर वो अर्जुन बॉक्सिंग की साधारण सी बातें समझाते रहे और जो भी बच्चे /खिलाड़ी प्रॅक्टीस कर रहे थे उनके बारे मे बताते रहे.

"देख बेटा पंडित जी ने बहुत कुछ बताया है तेरे बारे मे और देखकर ही पता चलता है के तू अनुशाशित भी है और फिट भी है. तुझे बस अपनी फुर्ती और कंधे की मजबूती पर काम करना है. ये टीले वाली सड़क देख. ये यहा से गोलाई मे जाती हुई वापिस आती है. तू एक चक्कर लगा

कर शरीर गरम कर. फिर आगे की बात करते है."

"जी सर." कहते ही अर्जुन चल दिया उस सीमेंट की 6 फीट चौड़ी पट्टी पर. 50 कदम बाद ही वो गति से भागने लगा जैसा सुबह करता था.

" पट्ठा बाप से भी तगड़ा है." जोगिंदर जी ने अर्जुन की तुलना अपने दोस्त और उसके बाप शंकर जी से की थी. ये बात अर्जुन को नही पता थी की कोच उसके पिता जी के बचपन के दोस्त है.

पट्टी के दोनो ही तरफ अलग अलग खेलो के प्रशिक्षण हो रहे थे. ज़्यादातर अर्जुन से बड़ी उमर के ही थे. ये पट्टी भी एक किमी से उपर ही थी लंबाई मे

आगे होकी का मैदान भी था जहाँ पर कुछ 20 लड़किया स्कर्ट पहन कर प्रॅक्टीस कर रही थी. उन्होने अर्जुन को देख सीटी बजाई तो अर्जुन और तेज भाग लिया.

"बाप रे. पहली बार देखा की लड़किया भी लड़को के मज़े लेती है." वो मन मे सोचता हुआ वापिस वही पहुच गया जहाँ शुरू हुआ था.

"बलबीर, इसको अपने साथ लेजा और मशीन और रोड लगवा." जोगिंदर जी ने वही से अर्जुन को एक 20-22 साल के लड़के जिसका नाम बलबीर था के साथ भेजा.

.

.

"भाई तू चिकना लड़का बॉक्सिंग मे कहाँ से आ गया?" बलबीर ने ये बात कही तो अर्जुन को अजीब सा लगा.

"जी दादाजी कोच साहब को जानते है."

बलबीर ने अगले ही पल तमीज़ की चादर ओढ़ ली.

"भाई मेरा मतलब था के तेरे जैसे लड़के को क्रिकेट, फूटबाल खेलना चाहिए. ये तो खेल ही शकल बिगड़ देगा. ले आ गये जिम मे."
 
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