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"यार मैं सच कह रही हू मुझे कुछ याद नही. तू भी जानती है ना मेरी प्राब्लम, तू अर्जुन को बता मैं ऐसी नही हू." अभी भी ऋतु दीदी अर्जुन की तरफ मूह करने से घबरा रही थी.
अर्जुन को लगा शायद अब ज़्यादा हो गया और उसने अपने हाथ से ऋतु दीदी को अपनी तरफ घुमाया और करीब करते हुए उनके माथे को चूमकर बोला, "अर्रे मेरी प्यारी दीदी. आपको लगता है के ऐसा कर सकती हो? नही ना. मैं तो खुद अभी 5-10 मिनिट पहले आया था और यहा आके लेटकर अलका दीदी से बात कर रहा था. और आप क्यो घबराती है जब मैं हू आपके साथ." और इतना बोलकर उसने एक छोटा सा किस जड़ दिया दीदी के गुलाबी होंठो पर. ऋतु भी प्यार और शरम से लिपट गयी अपने भाई से.
"वाह मतलब अब हमारी तो कदर ही नही.", अलका ने मुस्कुरा कर ये बात कही तो ऋतु भी बोली, "अर्जुन इस ग़रीब को भी थोड़ा प्यार दे ही दे. देख कैसे जल कर लाल हो चुकी है."
अर्जुन ने हंसते हुए अलका दीदी को पकड़ना चाहा तो वो भाग खड़ी हुई और दरवाजे पर पहुच के बोली, "मेरे हिस्से का मैं पहले ही ले चुकी हू. सुना नही था क्या अर्जुन 10 मिनिट से यहा था तेरे जागने से पहले." और हँसती हुई भाग गई बाहर. 5 मिनिट दोनो भाई बहन ऐसे ही लेटे रहे
फिर ऋतु दीदी ने एक और छोटा सा किस किया और खड़ी हो गई. यही पर अर्जुन की नज़र दीदी की टीशर्ट मे चोंच दिखा रहे खड़े निपल्स पे चली गई और ऋतु को भी पता चल गया की उसका छोटा भाई क्या देख रहा है. शरम से दोहरी होती वो मूड गई और अर्जुन भी हंसता हुआ बाहर आँगन मे आ गया.
"पागल है ये दोनो और मुझे भी कर दिया है." खुद से इतना बोला और सामने शीसे मे अपने ब्रेस्ट देख ऋतु मुस्कुरा उठी. "उसका ही तो है सब"
.
.
"माधुरी नही दिख रही ललिता. कुछ काम कर रही है क्या?", कौशल्या देवी ने अपनी बहू से पूछा क्योंकि इस टाइम ज़्यादातर रसोईघर मे माधुरी दीदी ही काम करती दिखती थी. अर्जुन के भी कान खड़े हो गये जो वही बैठा खाना ही खा रहा था अपने ताऊ जी के साथ.
"वो मा जी उसको बुखार आया है आंड फिर रात को पानी पीने के लिए कमरे से निकली तो फिसल गई थी. पाव मे मोच भी आई हुई है." ललिता जी ने चिंतित स्वर मे ही कहा. अब अलका और ऋतु को भी पता चला के उनकी बड़ी दीदी क्यो गायब थी वहाँ से.
"मैं देखती हू मेरी बच्ची को. और बेटा कोमल अपनी मा को भी कमरे मे ही खाना दे आ. उसको भी आराम करने दे.", इतना बोलकर कौशल्या जी उठ गई
"मा को क्या हुआ है ताइजी?", खाना बीच मे छोड़ कर अर्जुन ने कोमल दीदी के हाथ से थाली ली और थोड़ा घबराया सा अपनी मा की तरफ चल दिया बिना अपनी ताइजी का जवाब लिए. अंदर आया तो रेखा जी बिस्तर पर लेटी थी. "मा, क्या हुआ आपको? और आप उठो खाना खा लो फिर मैं डॉक्टर को बुला लता हू."
अपने बेटे को इस तरह परेशान देख रेखा जी उठ गई और उसके सर पर हाथ फेरती बोली, "अर्रे मेरे राजा बेटे मुझे कुछ नही हुआ. वो मौसम बदल रहा है ना बस इसलिए थोड़ा बुखार आ गया था रात मे. लेकिन अब ठीक हू. तू परेशान मत हो कुछ नही हुआ मुझे. रात कोमल ने ध्यान रखा मेरा अच्छे से."
बात कह रही थी रेखा जी की कोमल और ऋतु भी अंदर चली आई. "यहा तो मुन्ना अभी भी मा से चिपका है. जाने कब बड़ा होगा ये?", ऋतु ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए सीरीयस चेहरा बनाते हुए ये कहा और फिर अर्जुन को छोड़ कर सब हंस पड़े.
"मा देखो ना दीदी को", अर्जुन ने भी झूठी शिकायत लगाई.
"अच्छा अच्छा तुम दोनो बाहर जा कर लड़ाई करो और मा को खाना खाने दो. फिर दवा भी देनी है.", कोमल ने दोनो को बाहर कर दिया.
कौशल्या जी भी माधुरी दीदी के कमरे से वापिस आ गई थी. "अभी ठीक है पहले से वो. बुखार तो उतर गया है शाम तक ठीक हो जाएगी."
उन्होने ललिता जी को बताया. ऐसे ही नाश्ता और रोज का काम ख़तम हुआ. सभी अपने रोज के काम कर रहे थे. 11 बजे के करीब संजीव भैया घर आए और सीधा अलका/ऋतु के कमरे के बाहर थपथपाया. अलका बाहर आई और भैया ने उसके हाथो मे 2 चाबिया रख दी और मुस्कुरा के वापिस बाहर की तरफ चल दिए.
"ऋतु, चल बाहर देख हमारी स्कूटी आ गई." वो लगभग चीखते हुए बोली तो ऋतु भी उसके साथ उछलती हुई निकल गई.
"वाउ. ये बेस्ट प्रेज़ेंट है भैया.", ऋतु ने संजीव भैया को स्कुटी पे बैठे देखा तो कहा.
"वैसे ये तो मेरा बर्तडे प्रेज़ेंट है ना?", अलका ने ऋतु से कहा
"याद कर अपनी खुद की कही बात", और उसके हाथ से चाबी लेकर स्कुटी के चारो तरफ गोल घूमने लगी
"हा.", और अलका छोटी बच्ची सी नाराज़गी दिखाने लगी..
"अले अले मेली बच्ची. तुझे टॉफी मिलेगी, स्कूटी नही.", ऋतु ने फिर चिढ़ाया
"और हा भैया इस अलका ने खुद ही कहा था के आप जो भी प्रेज़ेंट इसको लेकर दोगे वो मैं रखू.", अब ऋतु ने भैया को पूरी बात बताई
"फिर तो ठीक बात है. इसको ऋतु ही रखेगी.", भैया आज मज़ाक के मूड मे थे
"कोई बात नही. मुझे नही चाहिए कुछ भी." और वो जैसे सच मे रूठ गई
"अर्रे मेरी प्यारी दीदी. जो मेरा है वो आपका, और जो आपका वो मेरा. हम मे कॉन्सा बँटवारा है.", ये बात ऋतु ने आँख मारते हुए कही जिसको संजीव भैया नही देख पाए.
"वैसे भैया एक बात कहूँगा, आपने बंदर को अदरक लाकर दे दी है." अर्जुन अपने दादा जी के साथ बैठा ये ड्रामा देख रहा था और आख़िर मे बोल ही पड़ा. भैया और दादाजी तो हंस पड़े लेकिन ऋतु और अलका दीदी को बात समझ नही आई.
"क्या कहा इसने? मुझे बंदर कहा?", ऋतु ने तैश मे नखरे से कहा
"बेटा इसका मतलब है के तुम दोनो को साइकल चलानी तो आती नही इस स्कूटी को कैसे चलॉ ओगी.", दादा जी ने दोनो के चेहरे देखे.
"भैया, आप हमें सिख़ाओगे ना?", और दोनो संजीव भाई से निवेदन करने लगी
"गुड़िया मुझे तो कल से बिल्कुल भी टाइम नही मिलेगा. 3 शहर और मेरे अंडर आ गये है तो मैं तो घर भी रोज नही आ पौँगा."
"फिर तो एक ही काम करते है बेटा के ये स्कूटी हम अर्जुन को दे देते है.", दादा जी की बात सुनकर दोनो चौंक गई और अर्जुन दोनो को चिढ़ाने लगा.
"अब तो फिर ये यही हम दोनो को सिखाएगा नही तो मैं पापा को फोन लगा देती हू अभी.", ऋतु ने इतना कहा तो अब दादा जी ने भी बात ख़तम करने के हिसाब से कहा.
"दोनो एक दिन छोड़ कर बारी बारी से इसके साथ जाओगी रोज सुबह और ये एक घंटा तुम दोनो को ही स्कूटी सिखाएगा.",
फिर दोनो ने कुछ बात करी आपस मे और अलका बोली, "कल ऋतु जाएगी और परसो मैं. यही शेड्यूल रहेगा रोज सुबह 7 बजे."
"नही बेटा नही. कुछ पाने के लिए खोना पड़ता है. 7 बजे नही 6 बजे और जिस दिन जो 10 मिनिट लेट हुआ वो उस दिन घर ही रहेगा." रामेश्वर जी बोलकर उठ गये. उन्हे पता था के दोनो ही 7 बजे तक उठती है.
अर्जुन को लगा शायद अब ज़्यादा हो गया और उसने अपने हाथ से ऋतु दीदी को अपनी तरफ घुमाया और करीब करते हुए उनके माथे को चूमकर बोला, "अर्रे मेरी प्यारी दीदी. आपको लगता है के ऐसा कर सकती हो? नही ना. मैं तो खुद अभी 5-10 मिनिट पहले आया था और यहा आके लेटकर अलका दीदी से बात कर रहा था. और आप क्यो घबराती है जब मैं हू आपके साथ." और इतना बोलकर उसने एक छोटा सा किस जड़ दिया दीदी के गुलाबी होंठो पर. ऋतु भी प्यार और शरम से लिपट गयी अपने भाई से.
"वाह मतलब अब हमारी तो कदर ही नही.", अलका ने मुस्कुरा कर ये बात कही तो ऋतु भी बोली, "अर्जुन इस ग़रीब को भी थोड़ा प्यार दे ही दे. देख कैसे जल कर लाल हो चुकी है."
अर्जुन ने हंसते हुए अलका दीदी को पकड़ना चाहा तो वो भाग खड़ी हुई और दरवाजे पर पहुच के बोली, "मेरे हिस्से का मैं पहले ही ले चुकी हू. सुना नही था क्या अर्जुन 10 मिनिट से यहा था तेरे जागने से पहले." और हँसती हुई भाग गई बाहर. 5 मिनिट दोनो भाई बहन ऐसे ही लेटे रहे
फिर ऋतु दीदी ने एक और छोटा सा किस किया और खड़ी हो गई. यही पर अर्जुन की नज़र दीदी की टीशर्ट मे चोंच दिखा रहे खड़े निपल्स पे चली गई और ऋतु को भी पता चल गया की उसका छोटा भाई क्या देख रहा है. शरम से दोहरी होती वो मूड गई और अर्जुन भी हंसता हुआ बाहर आँगन मे आ गया.
"पागल है ये दोनो और मुझे भी कर दिया है." खुद से इतना बोला और सामने शीसे मे अपने ब्रेस्ट देख ऋतु मुस्कुरा उठी. "उसका ही तो है सब"
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"माधुरी नही दिख रही ललिता. कुछ काम कर रही है क्या?", कौशल्या देवी ने अपनी बहू से पूछा क्योंकि इस टाइम ज़्यादातर रसोईघर मे माधुरी दीदी ही काम करती दिखती थी. अर्जुन के भी कान खड़े हो गये जो वही बैठा खाना ही खा रहा था अपने ताऊ जी के साथ.
"वो मा जी उसको बुखार आया है आंड फिर रात को पानी पीने के लिए कमरे से निकली तो फिसल गई थी. पाव मे मोच भी आई हुई है." ललिता जी ने चिंतित स्वर मे ही कहा. अब अलका और ऋतु को भी पता चला के उनकी बड़ी दीदी क्यो गायब थी वहाँ से.
"मैं देखती हू मेरी बच्ची को. और बेटा कोमल अपनी मा को भी कमरे मे ही खाना दे आ. उसको भी आराम करने दे.", इतना बोलकर कौशल्या जी उठ गई
"मा को क्या हुआ है ताइजी?", खाना बीच मे छोड़ कर अर्जुन ने कोमल दीदी के हाथ से थाली ली और थोड़ा घबराया सा अपनी मा की तरफ चल दिया बिना अपनी ताइजी का जवाब लिए. अंदर आया तो रेखा जी बिस्तर पर लेटी थी. "मा, क्या हुआ आपको? और आप उठो खाना खा लो फिर मैं डॉक्टर को बुला लता हू."
अपने बेटे को इस तरह परेशान देख रेखा जी उठ गई और उसके सर पर हाथ फेरती बोली, "अर्रे मेरे राजा बेटे मुझे कुछ नही हुआ. वो मौसम बदल रहा है ना बस इसलिए थोड़ा बुखार आ गया था रात मे. लेकिन अब ठीक हू. तू परेशान मत हो कुछ नही हुआ मुझे. रात कोमल ने ध्यान रखा मेरा अच्छे से."
बात कह रही थी रेखा जी की कोमल और ऋतु भी अंदर चली आई. "यहा तो मुन्ना अभी भी मा से चिपका है. जाने कब बड़ा होगा ये?", ऋतु ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए सीरीयस चेहरा बनाते हुए ये कहा और फिर अर्जुन को छोड़ कर सब हंस पड़े.
"मा देखो ना दीदी को", अर्जुन ने भी झूठी शिकायत लगाई.
"अच्छा अच्छा तुम दोनो बाहर जा कर लड़ाई करो और मा को खाना खाने दो. फिर दवा भी देनी है.", कोमल ने दोनो को बाहर कर दिया.
कौशल्या जी भी माधुरी दीदी के कमरे से वापिस आ गई थी. "अभी ठीक है पहले से वो. बुखार तो उतर गया है शाम तक ठीक हो जाएगी."
उन्होने ललिता जी को बताया. ऐसे ही नाश्ता और रोज का काम ख़तम हुआ. सभी अपने रोज के काम कर रहे थे. 11 बजे के करीब संजीव भैया घर आए और सीधा अलका/ऋतु के कमरे के बाहर थपथपाया. अलका बाहर आई और भैया ने उसके हाथो मे 2 चाबिया रख दी और मुस्कुरा के वापिस बाहर की तरफ चल दिए.
"ऋतु, चल बाहर देख हमारी स्कूटी आ गई." वो लगभग चीखते हुए बोली तो ऋतु भी उसके साथ उछलती हुई निकल गई.
"वाउ. ये बेस्ट प्रेज़ेंट है भैया.", ऋतु ने संजीव भैया को स्कुटी पे बैठे देखा तो कहा.
"वैसे ये तो मेरा बर्तडे प्रेज़ेंट है ना?", अलका ने ऋतु से कहा
"याद कर अपनी खुद की कही बात", और उसके हाथ से चाबी लेकर स्कुटी के चारो तरफ गोल घूमने लगी
"हा.", और अलका छोटी बच्ची सी नाराज़गी दिखाने लगी..
"अले अले मेली बच्ची. तुझे टॉफी मिलेगी, स्कूटी नही.", ऋतु ने फिर चिढ़ाया
"और हा भैया इस अलका ने खुद ही कहा था के आप जो भी प्रेज़ेंट इसको लेकर दोगे वो मैं रखू.", अब ऋतु ने भैया को पूरी बात बताई
"फिर तो ठीक बात है. इसको ऋतु ही रखेगी.", भैया आज मज़ाक के मूड मे थे
"कोई बात नही. मुझे नही चाहिए कुछ भी." और वो जैसे सच मे रूठ गई
"अर्रे मेरी प्यारी दीदी. जो मेरा है वो आपका, और जो आपका वो मेरा. हम मे कॉन्सा बँटवारा है.", ये बात ऋतु ने आँख मारते हुए कही जिसको संजीव भैया नही देख पाए.
"वैसे भैया एक बात कहूँगा, आपने बंदर को अदरक लाकर दे दी है." अर्जुन अपने दादा जी के साथ बैठा ये ड्रामा देख रहा था और आख़िर मे बोल ही पड़ा. भैया और दादाजी तो हंस पड़े लेकिन ऋतु और अलका दीदी को बात समझ नही आई.
"क्या कहा इसने? मुझे बंदर कहा?", ऋतु ने तैश मे नखरे से कहा
"बेटा इसका मतलब है के तुम दोनो को साइकल चलानी तो आती नही इस स्कूटी को कैसे चलॉ ओगी.", दादा जी ने दोनो के चेहरे देखे.
"भैया, आप हमें सिख़ाओगे ना?", और दोनो संजीव भाई से निवेदन करने लगी
"गुड़िया मुझे तो कल से बिल्कुल भी टाइम नही मिलेगा. 3 शहर और मेरे अंडर आ गये है तो मैं तो घर भी रोज नही आ पौँगा."
"फिर तो एक ही काम करते है बेटा के ये स्कूटी हम अर्जुन को दे देते है.", दादा जी की बात सुनकर दोनो चौंक गई और अर्जुन दोनो को चिढ़ाने लगा.
"अब तो फिर ये यही हम दोनो को सिखाएगा नही तो मैं पापा को फोन लगा देती हू अभी.", ऋतु ने इतना कहा तो अब दादा जी ने भी बात ख़तम करने के हिसाब से कहा.
"दोनो एक दिन छोड़ कर बारी बारी से इसके साथ जाओगी रोज सुबह और ये एक घंटा तुम दोनो को ही स्कूटी सिखाएगा.",
फिर दोनो ने कुछ बात करी आपस मे और अलका बोली, "कल ऋतु जाएगी और परसो मैं. यही शेड्यूल रहेगा रोज सुबह 7 बजे."
"नही बेटा नही. कुछ पाने के लिए खोना पड़ता है. 7 बजे नही 6 बजे और जिस दिन जो 10 मिनिट लेट हुआ वो उस दिन घर ही रहेगा." रामेश्वर जी बोलकर उठ गये. उन्हे पता था के दोनो ही 7 बजे तक उठती है.