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संतुलन (बॅलेन्स)
(बड़ा ही छोटा सा एक शब्द है "संतुलन" जिसको इंग्लीश मे "बॅलेन्स" कहते है. जैसे की एक अच्छे शरीर के लिए अच्छा आहार, पर्याप्त नींद और कड़ी महंत ज़रूरी होती है उतना ही ज़रूरी है इंसान की ज़िंदगी मे संतुलन का होना. ज़्यादा भोजन, ज़रूरत से अधिक या कम नींद और बिना मेहनत किया शरीर रोगी हो जाता है वैसे ही ज़िंदगी बिना सही संतुलन के एक ऐसा पेंडुलम बन जाती है जिसकी कोई दिशा नही होती. कोई लक्ष्य हाँसिल नही होता और अगर कुछ होता है तो सिर्फ़ ज़िंदगी बर्बाद.)
दोपहर को दादाजी ने एक प्लेट मे कई फलों (फ्रूट्स) को काटकर अर्जुन के सामने रख दिया. "अब ये भी खाने ज़रूरी है तुम्हारे लिए. देखो एक अच्छी खुराक ही एक अच्छा शरीर देती है. और अधिक मेहनत मतलब ज़्यादा अच्छी खुराक और उतना ही आराम."
अर्जुन को भी उनकी बात सही लगी क्योंकि पिछले 3 दिन से वो कुछ ज़्यादा ही मेहनत कर रहा था. और उसको शाम को भी नींद गहरी आ जाती थी. फल खाते हुए उसने अपनी बात कुछ इस तरह रखी.
"दादा जी मैं कुछ पूछना चाहता हू."
"हा बेटा अगर मुझे पता होगा तो ज़रूर तुम्हारी बात का जवाब दूँगा."
"वो बात ऐसी है की मैं आजकल शाम को कुछ ज़्यादा ही सोने लगा हू. लेकिन फिर रात को मेरी नींद 4 घंटे मे ही पूरी हो जाती है. कही ये कुछ ग़लत तो नही."
रामेश्वर जी गोर से उसकी बात सुनकर बोले, "बेटा ये शरीर जो है ये कई बार खुद निर्णय लेता है. जैसे जब हम काम करते है तो ना चाहते हुए भी नींद जल्दी आ जाती है. लेकिन अगर वही काम हम 2 हिस्सो मे करे तो शरीर भी थोड़े समय मे इसके लिए तयार हो जाता है. फिर वो भी 2 छोटे हिस्सो मे इस नींद को पूरा कर देता है. हा बिना मेहनत ऐसा होना तो सिर्फ़ किसी रोग की निशानी होता है. तुम चिंता मत करो हम इसके बारे मे भी सोचेंगे."
उनकी बात सुनकर वो निश्चिंत होकर वापिस खाने मे लग गया और प्लेट खाली करने के बाद रसोईघर मे रख अपनी साइकल वाली बॉटल मे ग्लूकोस मिला पानी भर स्टेडियम चल दिया.
"सही टाइम से आए हो बेटे. चलो कल वाला ही सब आज भी दोहराओ. बलबीर, अर्जुन के साथ ट्रैनिंग शुरू करो." साइकल स्टॅंड मे खड़ी कर अर्जुन बस बॉक्सिंग अकॅडमी के अंदर आया ही था कि बिना किसी बातचीत के कोच जोगिंदर जी ने उसको बलबीर के साथ जिम भेज दिया. और वो भी चुपचाप चल दिया
"यही सोच रहे हो की सीधा कसरत करने आ गये?" बलबीर ने चलते हुए ही अर्जुन के मन की बात उसको बता दी.
"हा. पर उन्होने ऐसा क्यो किया?"
"देखो छोटे भाई जैसे तुम साइकल चला कर आए हो तो शरीर अभी गरम ही है. अब और दौड़ लगाने से कोई फायेदा नही. तो जितना ज़रूरी है उतना हो गया. अब चलो."
अर्जुन को बात समझ आ गई थी. वही जिम के बाहर विकास एक और पहलवान से बात कर रहा था. उसको देख कर बलबीर नज़र नीचे कर अंदर चल दिया
लेकिन अर्जुन ने विकास को अपनी तरफ देखते पाया तो हाथ हिला कर अभिवादन किया. "कैसे हो भैया?" विकास ने भी उसके सर पर हाथ फेर दिया. "दिल लगा के सिर्फ़ मेहनत कर. ऑल्वेज़ स्टे फोकस्ड." आख़िरी बात उसने इंग्लीश मे कही थी. मतलब ये तगड़ा गाँव का दिखने वाला पहलवान पढ़ा लिखा इंसान था.
"जी भैया." और वो अंदर आ गया.
"छोटे भाई तू इनको कैसे जानता है.?" अब बलबीर ने बात छेड़ी जो विकास और अर्जुन की बात सुनकर हैरान सा था.
अर्जुन ने ज़मीन पर पुश-उप लगाते हुए ही जवाब दिया, "क्यो भैया वो कोई ग़लत इंसान है?"
"धीरे बोल मेरे भाई. कोई सुन ना ले. लेकिन विकास पूनिया य कोई ऐसा वैसा शख्स नही है और वो सिर्फ़ उन्हीं से बात करता है जो उसके साथ ट्रैनिंग लेते है. ना वो हंसता है और ना ज़्यादा बोलता है. लेकिन तेरे साथ दोनो किए."
"हा वो मुझे अच्छे इंसान लगे और उन्हे शायद मैं भी." अर्जुन ने सरलता से जवाब दिया और फिर दोनो मशीन की ओर चल दिए.
"ये कुश्ती मे 2 बार का नॅशनल गोल्ड है. और अब एशियन चॅंपियन्षिप के लिए तयार हो रहा है." बलबीर की बात सुनकर अब चौंकने की बारी अर्जुन की थी. बात को वही ख़तम कर दोनो कसरत करने लगे. बेंच पर रोड से वजन लगाते हुए फिर से वही कल वाली लड़किया दिखाई दी जो आज उनकी तरह कंधे की कसरत कर रही थी मशीन पर. थी तो कमाल की दोनो लेकिन अर्जुन के दिमाग़ मे वापिस विकास की बात आ गई. "फोकस" और वो सब नज़र अंदाज कर अपने 3 सेट पूरे कर बाहर आने लगा. ट्रकपंत से रुमाल निकल पसीना सॉफ कर वो बलबीर के साथ ही बॉक्सिंग एरिया मे आ गया.
जोगिंदर जी एक लड़के का हाथ पकड़ कर खड़े थे और वो थोड़ा दर्द मे था शायद. जिग्यासा से अर्जुन उनकी तरफ बढ़ गया.
"नज़र हटी और दुर्घटना घाटी" उन्होने ये बात अर्जुन की तरफ देख कर कही और वो लड़का चीख पड़ा.
"अब यहा अच्छे से गरम पट्टी बाँध ले सोमवीर और हमेशा याद रखना के हर काम का सही तरीका एक ही होता है. मुक्का ग़लत लगा तो खुदका ही नुकसान हो सकता है." और वो लड़का अपने साथी की तरफ चल गया पट्टी बंधवाने.
"देखो बच्चे. ये हाथ सिर्फ़ हवा मे नही चलाने. खुद को महसूस होना चाहिए के ये कितनी दूर जा रहे है और कितनी तेज. अभी देखा इस लड़के को? सीधा हाथ दे मारा कीट पर और इसका कंधा उतर गया. आज का तुम्हारा पहला लेसन यही है. " राइट एफर्ट्स इन राइट डाइरेक्षन". चलो जाओ."
अर्जुन फिर से बलबीर के साथ लग गया लेकिन अब थोड़ा जोश था और वो गोर से हर बात समझ रहा था बलबीर जो भी बता रहा था.
"हाथ इस से आगे नही. अपना पैर इतना आगे और फिर उसके दूसरी साइड वाला हाथ इस तरह." हर बारीक बात वो अर्जुन को समझा रहा था.
"देख छोटे भाई आज की प्रॅक्टीस तो हो गई. कोच साहब ने भी तुझे कुछ समझाया तो एक बात मेरी भी सुन ले. ज़ोर जो है वो सांड़ मे भी होता है लेकिन एक हल्का सा चीता उसको एक मिनिट मे ज़मीन पर लिटा लेता है. कैसे?
"अपने नुकेले दांतो से" अर्जुन ने फटाक से बात कही तो बलबीर हंस दिया. "वो उसकी सांस की नली, गर्दन के नीचे, पीठ पर या पेट पर वार करता है लेकिन समय, जगह और अपनी ताक़त और दिमाग़ से. तो मेरा कहने का मतलब है की ज़ोर कम भी हो तो चलता है लेकिन दिमाग़ सही जगह रहना चाहिए.
कब, कहा और कैसे सबसे ज़रूरी है. कब करना है, कहा करना है कैसे और कितना करना है ये मायने रखता है." बलबीर की बातें समझ मे आई तो अर्जुन का दिमाग़ बाहर निकलते हुए एक बात की तरफ गया.
"बेटा यहा, बेटा बस इतना, बेटा धीरे, बेटा ज़ोर से..." उसको ताईजी की बात याद आ गई चुदाई के वक्त की.
फिर सुबह कभी प्रभाकर जी की भी और स्टेडियम आने से पहले कही दादाजी की बात भी. कोच साहब ने और विकास भाई ने भी तो इस से जुड़ी बात ही कही थी. एक ने कहा था फोकस मतलब 'ध्यान बनाए रखना' और दूसरे ने कहा था 'सही मेहनत सही दिशा मे' इन सब बातों का मूल मंत्र एक ही तो था संतुलन (बॅलेन्स).
"आए हीरो ऐसे हंसता हुआ क्यू घूम रहा है? कंपनी बाग मे घूम रहा है क्या तू?", इस जोरदार जनाना आवाज़ को सुनकर अर्जुन के पैर रुक गये.
"गुड ईव्निंग मिस. वो बस कोच साहब ने कुछ समझाया था लेकिन समझ मे अभी आया तो ख़ुसी हुई थी की समझ मे आ गया. सॉरी अगर ये ग़लत लगा आपको."
"नीरा ही चिकना घड़ा है ये लड़का तो." मंजुला ने मन मे सोच फिर थोड़ा नर्मी से बोली, "कोई बात नही. तू कौनसा खेल खेल रहा यहा?
"जी बोक्षींग मे हू."
"अच्छा. और तू रहता कहा है? हॉस्टिल का तो तू है नही."
"जी यही इसी शहर के #### सेक्टर मे." ऐसे ही सवाल जवाब हो रहे थे के एक टेन्निस बाल उनकी तरफ आकर अर्जुन के पैरो मे रुक गई.
"आए हेल्लो. जस्ट पास दिस बॉल इफ़ यू डॉन’ट माइंड." बड़ी मीठी आवाज़ आई दोनो के कान मे तो अर्जुन और मंजुला दोनो ने आवाज़ की तरफ देखा तो ये एक बेहद आकर्षक सी लड़की थी लगभग अलका दीदी जितनी लंबाई, घुटनो से उपर हारे रंग की स्कर्ट, टाइट कसी हुई सफेद टीशर्ट और गोरे-गुलाबी चेहरे पे दिलकश सी मुस्कान. टीशर्ट और चेहरे पर पसीना आया हुआ था. जहाँ मंजू उस लड़की की तरफ गुस्से मे देख ही रही थी के अर्जुन ने बॉल उसकी तरफ उछालते ही कहा, "इट'स ऑलराइट मिस." और वहाँ से जवाब आया, 'थॅंक्स, सीया."
थोड़ा आगे जाकर एक बार फिर पीछे मुड़कर अर्जुन को देख मुस्काई और वापिस खेलने मे लग गई.
"ये रांड़ ने मूड की ऐसी तैसी फेर दी.", गुस्से मे मंजुला लाल हो गई थी "चल लड़के अब निकल यहा से." उसने थोड़ी बेरूख़ी से बोला लेकिन अर्जुन ने उसकी तरफ छोटी सी मुस्कान से देखते हुए कहा, "बाइ, कल बात करेंगे मिस."
"वाह मंजू तू इसके चक्कर मे थी और ये तेरा ही चक्कर काट के निकल लिया." पास आती हुई सुमन जो इन दोनो पर ही नज़र गड़ाए थी बोली
"कुछ भी बोल सुमन लड़का ना शरीफ भी है और पक्का भी. आज तो वो विकास भी इसके सर पे हाथ फेर रहा था. और ये टेन्निस वाली अँग्रेज़ भी इस्पे लाइन मारने लगी है." उस लड़की की इंग्लीश के चक्कर मे मंजू ने उसका नाम अँग्रेज़ रख दिया था. दोनो हँसने लगी और इधर अर्जुन साइकल निकल चल दिया गाते की तरफ. तकरीबन एक किमी आगे आया था, जोकि आज थोड़ी स्पीड से साइकल चला रहा था इतने मे उसके बराबर मे एक स्कूटी साथ चलने लगी.
"तो बाइसिकल से रोज आते हो स्टेडियम?" ये वही टेन्निस वाली थी. पीछे कंधे पर टेन्निस रेकेट टंगा था बॅग मे और माथे पे बालो को आगे आने से रोकने के लिए एक सफेद हीरबॅंड. कंधे तक भूरे बालो की एक चोटी बना रखी थी.
" हाई मेरा नाम प्रीति है और इस साल ही अंडर 19 टेन्निस मे आई हू. 2 साल पहले की अंडर 16 की रन्नर- अप."
अब अर्जुन ने भी गर्दन हिलाई हल्लो . "मेरा नाम अर्जुन शर्मा है और यहा स्टेडियम मे मेरा दूसरा दिन था, बॉक्सिंग."
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"वैसे लगते नही हो के बॉक्सिंग टाइप वाले होगे." ये बात कह कर जो उसकी खिलखिलात देखी अर्जुन ने वो बस उसके मोती जैसे दाँत और गुलाबी होंठ देखता रह गया.
"आगे देखो ऐसे तो तुम घर की जगह हॉस्पिटल पहुच जाओगे."
"हः. सॉरी. वो ऐसा है की मैं ये सब प्रोफेशनल नही कर रहा. सिर्फ़ कोचैंग ले रहा हू वो भी मेरे दादा जी के कहने पर. गेम तो मुझे सिर्फ़ 2 ही पसंद है. एक बॅडमिंटन और एक क्रिकेट. लेकिन यहा नया हू और अब तो खेले हुए भी एक साल होने को आया. बोरडिंग मे 5 साल मैं स्कूल टीम मे था." उसने अब ध्यान सड़क पर रखते हुए कहा. दोनो मध्यम गति से चला रहे थे.
"तो बोरडिंग से वापिस घर आए हो. अगर बुरा ना मानो तो रहते कहाँ हो तुम?"
"जी #### सेक्टर मे."
"कमाल की बात है. वही मेरा घर है." प्रीति ने थोड़ा हैरानी से कहा. ये सेक्टर ज़्यादातर बड़े सरकारी लोगो या फिर रईस लोगो से भरा था.
"इसमे कमाल की क्या बात हुई. एक शहर है तो कही तो रहेंगे ही. कमाल तो तब होता है जब आपका घर पास मे होता."ये बात अर्जुन ने वैसे ही कही थी.
"अच्छा तो हाउस नंबर बताओ." जब प्रीति ने इतनी बात कही तो अर्जुन थोड़ी देर चुप कर गया.
"अर्रे यही सोच रहे हो ना के पहली बार ही इस लड़की को देखा और आज ही घर का अड्रेस पूछने लगी." और हँसने लगी..
"नही वो बात नही है. मेरा घर का नंबर है 7-8." झेन्पते हुए अर्जुन ने कहा क्योंकि वो वही सोच रहा था जो प्रीति ने बोला था.
"तुम पंडित अंकल की फमिलि से हो?" दोनो अब अपने ही सेक्टर की खाली सड़क पर आ चुके थे.
"आप दादाजी को कैसे जानती हो.?" अर्जुन ने ब्रेक लगा कर साइकल वही रोक दी तो प्रीति ने थोड़ा सा आगे.
"5 नंबर घर है हमारा. कॉल पूरी मेरे दादा जी है. और 12त चंडीगढ़ से करने के बाद अभी मैं यही आ गई हू."
फिर अर्जुन को छेड़ते हुए बोली
"मतलब ये हुआ के ये तो फिर कमाल ही हो गया." और अर्जुन ये बात सुनते ही शर्मा कर वापिस साइकल चला आगे बढ़ा. प्रीति ने उनके घर के सामने ब्रेक लगा लिए तो अर्जुन भी संकोचवश रुक गया की ऐसी कैसे अपने घर के अंदर चला जाऊ एक लड़की को बाहर छोड़ कर.
"आप भी आइए घर मे."औपचारिकता से उसने पूछा
"नही अभी नही लेकिन जल्दी ही आउन्गी." इतना ही कहा था कि बगीचे से रामेश्वर जी के साथ कॉल पूरी बाहर आते दिखे.
"चले दादू."
"चलो बेटी मैं बस आ रहा हू पंडित जी के साथ."
अर्जुन ने उन्हे प्रणाम किया तो कॉल पूरी रामेश्वर जी से बोले. " पट्ठा तो मजबूत होता जा रहा है. फौज की तैयारी तो नही."
रामेश्वर जी मुस्कुरा दिए और बोले,"फौज मे 8 घंटे की नींद नही मिलती इसलिए मेरा पोता नई जाएगा." दोनो दोस्त हंस दिए और अर्जुन खिसिया कर
अंदर चला गया.
(बड़ा ही छोटा सा एक शब्द है "संतुलन" जिसको इंग्लीश मे "बॅलेन्स" कहते है. जैसे की एक अच्छे शरीर के लिए अच्छा आहार, पर्याप्त नींद और कड़ी महंत ज़रूरी होती है उतना ही ज़रूरी है इंसान की ज़िंदगी मे संतुलन का होना. ज़्यादा भोजन, ज़रूरत से अधिक या कम नींद और बिना मेहनत किया शरीर रोगी हो जाता है वैसे ही ज़िंदगी बिना सही संतुलन के एक ऐसा पेंडुलम बन जाती है जिसकी कोई दिशा नही होती. कोई लक्ष्य हाँसिल नही होता और अगर कुछ होता है तो सिर्फ़ ज़िंदगी बर्बाद.)
दोपहर को दादाजी ने एक प्लेट मे कई फलों (फ्रूट्स) को काटकर अर्जुन के सामने रख दिया. "अब ये भी खाने ज़रूरी है तुम्हारे लिए. देखो एक अच्छी खुराक ही एक अच्छा शरीर देती है. और अधिक मेहनत मतलब ज़्यादा अच्छी खुराक और उतना ही आराम."
अर्जुन को भी उनकी बात सही लगी क्योंकि पिछले 3 दिन से वो कुछ ज़्यादा ही मेहनत कर रहा था. और उसको शाम को भी नींद गहरी आ जाती थी. फल खाते हुए उसने अपनी बात कुछ इस तरह रखी.
"दादा जी मैं कुछ पूछना चाहता हू."
"हा बेटा अगर मुझे पता होगा तो ज़रूर तुम्हारी बात का जवाब दूँगा."
"वो बात ऐसी है की मैं आजकल शाम को कुछ ज़्यादा ही सोने लगा हू. लेकिन फिर रात को मेरी नींद 4 घंटे मे ही पूरी हो जाती है. कही ये कुछ ग़लत तो नही."
रामेश्वर जी गोर से उसकी बात सुनकर बोले, "बेटा ये शरीर जो है ये कई बार खुद निर्णय लेता है. जैसे जब हम काम करते है तो ना चाहते हुए भी नींद जल्दी आ जाती है. लेकिन अगर वही काम हम 2 हिस्सो मे करे तो शरीर भी थोड़े समय मे इसके लिए तयार हो जाता है. फिर वो भी 2 छोटे हिस्सो मे इस नींद को पूरा कर देता है. हा बिना मेहनत ऐसा होना तो सिर्फ़ किसी रोग की निशानी होता है. तुम चिंता मत करो हम इसके बारे मे भी सोचेंगे."
उनकी बात सुनकर वो निश्चिंत होकर वापिस खाने मे लग गया और प्लेट खाली करने के बाद रसोईघर मे रख अपनी साइकल वाली बॉटल मे ग्लूकोस मिला पानी भर स्टेडियम चल दिया.
"सही टाइम से आए हो बेटे. चलो कल वाला ही सब आज भी दोहराओ. बलबीर, अर्जुन के साथ ट्रैनिंग शुरू करो." साइकल स्टॅंड मे खड़ी कर अर्जुन बस बॉक्सिंग अकॅडमी के अंदर आया ही था कि बिना किसी बातचीत के कोच जोगिंदर जी ने उसको बलबीर के साथ जिम भेज दिया. और वो भी चुपचाप चल दिया
"यही सोच रहे हो की सीधा कसरत करने आ गये?" बलबीर ने चलते हुए ही अर्जुन के मन की बात उसको बता दी.
"हा. पर उन्होने ऐसा क्यो किया?"
"देखो छोटे भाई जैसे तुम साइकल चला कर आए हो तो शरीर अभी गरम ही है. अब और दौड़ लगाने से कोई फायेदा नही. तो जितना ज़रूरी है उतना हो गया. अब चलो."
अर्जुन को बात समझ आ गई थी. वही जिम के बाहर विकास एक और पहलवान से बात कर रहा था. उसको देख कर बलबीर नज़र नीचे कर अंदर चल दिया
लेकिन अर्जुन ने विकास को अपनी तरफ देखते पाया तो हाथ हिला कर अभिवादन किया. "कैसे हो भैया?" विकास ने भी उसके सर पर हाथ फेर दिया. "दिल लगा के सिर्फ़ मेहनत कर. ऑल्वेज़ स्टे फोकस्ड." आख़िरी बात उसने इंग्लीश मे कही थी. मतलब ये तगड़ा गाँव का दिखने वाला पहलवान पढ़ा लिखा इंसान था.
"जी भैया." और वो अंदर आ गया.
"छोटे भाई तू इनको कैसे जानता है.?" अब बलबीर ने बात छेड़ी जो विकास और अर्जुन की बात सुनकर हैरान सा था.
अर्जुन ने ज़मीन पर पुश-उप लगाते हुए ही जवाब दिया, "क्यो भैया वो कोई ग़लत इंसान है?"
"धीरे बोल मेरे भाई. कोई सुन ना ले. लेकिन विकास पूनिया य कोई ऐसा वैसा शख्स नही है और वो सिर्फ़ उन्हीं से बात करता है जो उसके साथ ट्रैनिंग लेते है. ना वो हंसता है और ना ज़्यादा बोलता है. लेकिन तेरे साथ दोनो किए."
"हा वो मुझे अच्छे इंसान लगे और उन्हे शायद मैं भी." अर्जुन ने सरलता से जवाब दिया और फिर दोनो मशीन की ओर चल दिए.
"ये कुश्ती मे 2 बार का नॅशनल गोल्ड है. और अब एशियन चॅंपियन्षिप के लिए तयार हो रहा है." बलबीर की बात सुनकर अब चौंकने की बारी अर्जुन की थी. बात को वही ख़तम कर दोनो कसरत करने लगे. बेंच पर रोड से वजन लगाते हुए फिर से वही कल वाली लड़किया दिखाई दी जो आज उनकी तरह कंधे की कसरत कर रही थी मशीन पर. थी तो कमाल की दोनो लेकिन अर्जुन के दिमाग़ मे वापिस विकास की बात आ गई. "फोकस" और वो सब नज़र अंदाज कर अपने 3 सेट पूरे कर बाहर आने लगा. ट्रकपंत से रुमाल निकल पसीना सॉफ कर वो बलबीर के साथ ही बॉक्सिंग एरिया मे आ गया.
जोगिंदर जी एक लड़के का हाथ पकड़ कर खड़े थे और वो थोड़ा दर्द मे था शायद. जिग्यासा से अर्जुन उनकी तरफ बढ़ गया.
"नज़र हटी और दुर्घटना घाटी" उन्होने ये बात अर्जुन की तरफ देख कर कही और वो लड़का चीख पड़ा.
"अब यहा अच्छे से गरम पट्टी बाँध ले सोमवीर और हमेशा याद रखना के हर काम का सही तरीका एक ही होता है. मुक्का ग़लत लगा तो खुदका ही नुकसान हो सकता है." और वो लड़का अपने साथी की तरफ चल गया पट्टी बंधवाने.
"देखो बच्चे. ये हाथ सिर्फ़ हवा मे नही चलाने. खुद को महसूस होना चाहिए के ये कितनी दूर जा रहे है और कितनी तेज. अभी देखा इस लड़के को? सीधा हाथ दे मारा कीट पर और इसका कंधा उतर गया. आज का तुम्हारा पहला लेसन यही है. " राइट एफर्ट्स इन राइट डाइरेक्षन". चलो जाओ."
अर्जुन फिर से बलबीर के साथ लग गया लेकिन अब थोड़ा जोश था और वो गोर से हर बात समझ रहा था बलबीर जो भी बता रहा था.
"हाथ इस से आगे नही. अपना पैर इतना आगे और फिर उसके दूसरी साइड वाला हाथ इस तरह." हर बारीक बात वो अर्जुन को समझा रहा था.
"देख छोटे भाई आज की प्रॅक्टीस तो हो गई. कोच साहब ने भी तुझे कुछ समझाया तो एक बात मेरी भी सुन ले. ज़ोर जो है वो सांड़ मे भी होता है लेकिन एक हल्का सा चीता उसको एक मिनिट मे ज़मीन पर लिटा लेता है. कैसे?
"अपने नुकेले दांतो से" अर्जुन ने फटाक से बात कही तो बलबीर हंस दिया. "वो उसकी सांस की नली, गर्दन के नीचे, पीठ पर या पेट पर वार करता है लेकिन समय, जगह और अपनी ताक़त और दिमाग़ से. तो मेरा कहने का मतलब है की ज़ोर कम भी हो तो चलता है लेकिन दिमाग़ सही जगह रहना चाहिए.
कब, कहा और कैसे सबसे ज़रूरी है. कब करना है, कहा करना है कैसे और कितना करना है ये मायने रखता है." बलबीर की बातें समझ मे आई तो अर्जुन का दिमाग़ बाहर निकलते हुए एक बात की तरफ गया.
"बेटा यहा, बेटा बस इतना, बेटा धीरे, बेटा ज़ोर से..." उसको ताईजी की बात याद आ गई चुदाई के वक्त की.
फिर सुबह कभी प्रभाकर जी की भी और स्टेडियम आने से पहले कही दादाजी की बात भी. कोच साहब ने और विकास भाई ने भी तो इस से जुड़ी बात ही कही थी. एक ने कहा था फोकस मतलब 'ध्यान बनाए रखना' और दूसरे ने कहा था 'सही मेहनत सही दिशा मे' इन सब बातों का मूल मंत्र एक ही तो था संतुलन (बॅलेन्स).
"आए हीरो ऐसे हंसता हुआ क्यू घूम रहा है? कंपनी बाग मे घूम रहा है क्या तू?", इस जोरदार जनाना आवाज़ को सुनकर अर्जुन के पैर रुक गये.
"गुड ईव्निंग मिस. वो बस कोच साहब ने कुछ समझाया था लेकिन समझ मे अभी आया तो ख़ुसी हुई थी की समझ मे आ गया. सॉरी अगर ये ग़लत लगा आपको."
"नीरा ही चिकना घड़ा है ये लड़का तो." मंजुला ने मन मे सोच फिर थोड़ा नर्मी से बोली, "कोई बात नही. तू कौनसा खेल खेल रहा यहा?
"जी बोक्षींग मे हू."
"अच्छा. और तू रहता कहा है? हॉस्टिल का तो तू है नही."
"जी यही इसी शहर के #### सेक्टर मे." ऐसे ही सवाल जवाब हो रहे थे के एक टेन्निस बाल उनकी तरफ आकर अर्जुन के पैरो मे रुक गई.
"आए हेल्लो. जस्ट पास दिस बॉल इफ़ यू डॉन’ट माइंड." बड़ी मीठी आवाज़ आई दोनो के कान मे तो अर्जुन और मंजुला दोनो ने आवाज़ की तरफ देखा तो ये एक बेहद आकर्षक सी लड़की थी लगभग अलका दीदी जितनी लंबाई, घुटनो से उपर हारे रंग की स्कर्ट, टाइट कसी हुई सफेद टीशर्ट और गोरे-गुलाबी चेहरे पे दिलकश सी मुस्कान. टीशर्ट और चेहरे पर पसीना आया हुआ था. जहाँ मंजू उस लड़की की तरफ गुस्से मे देख ही रही थी के अर्जुन ने बॉल उसकी तरफ उछालते ही कहा, "इट'स ऑलराइट मिस." और वहाँ से जवाब आया, 'थॅंक्स, सीया."
थोड़ा आगे जाकर एक बार फिर पीछे मुड़कर अर्जुन को देख मुस्काई और वापिस खेलने मे लग गई.
"ये रांड़ ने मूड की ऐसी तैसी फेर दी.", गुस्से मे मंजुला लाल हो गई थी "चल लड़के अब निकल यहा से." उसने थोड़ी बेरूख़ी से बोला लेकिन अर्जुन ने उसकी तरफ छोटी सी मुस्कान से देखते हुए कहा, "बाइ, कल बात करेंगे मिस."
"वाह मंजू तू इसके चक्कर मे थी और ये तेरा ही चक्कर काट के निकल लिया." पास आती हुई सुमन जो इन दोनो पर ही नज़र गड़ाए थी बोली
"कुछ भी बोल सुमन लड़का ना शरीफ भी है और पक्का भी. आज तो वो विकास भी इसके सर पे हाथ फेर रहा था. और ये टेन्निस वाली अँग्रेज़ भी इस्पे लाइन मारने लगी है." उस लड़की की इंग्लीश के चक्कर मे मंजू ने उसका नाम अँग्रेज़ रख दिया था. दोनो हँसने लगी और इधर अर्जुन साइकल निकल चल दिया गाते की तरफ. तकरीबन एक किमी आगे आया था, जोकि आज थोड़ी स्पीड से साइकल चला रहा था इतने मे उसके बराबर मे एक स्कूटी साथ चलने लगी.
"तो बाइसिकल से रोज आते हो स्टेडियम?" ये वही टेन्निस वाली थी. पीछे कंधे पर टेन्निस रेकेट टंगा था बॅग मे और माथे पे बालो को आगे आने से रोकने के लिए एक सफेद हीरबॅंड. कंधे तक भूरे बालो की एक चोटी बना रखी थी.
" हाई मेरा नाम प्रीति है और इस साल ही अंडर 19 टेन्निस मे आई हू. 2 साल पहले की अंडर 16 की रन्नर- अप."
अब अर्जुन ने भी गर्दन हिलाई हल्लो . "मेरा नाम अर्जुन शर्मा है और यहा स्टेडियम मे मेरा दूसरा दिन था, बॉक्सिंग."
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"वैसे लगते नही हो के बॉक्सिंग टाइप वाले होगे." ये बात कह कर जो उसकी खिलखिलात देखी अर्जुन ने वो बस उसके मोती जैसे दाँत और गुलाबी होंठ देखता रह गया.
"आगे देखो ऐसे तो तुम घर की जगह हॉस्पिटल पहुच जाओगे."
"हः. सॉरी. वो ऐसा है की मैं ये सब प्रोफेशनल नही कर रहा. सिर्फ़ कोचैंग ले रहा हू वो भी मेरे दादा जी के कहने पर. गेम तो मुझे सिर्फ़ 2 ही पसंद है. एक बॅडमिंटन और एक क्रिकेट. लेकिन यहा नया हू और अब तो खेले हुए भी एक साल होने को आया. बोरडिंग मे 5 साल मैं स्कूल टीम मे था." उसने अब ध्यान सड़क पर रखते हुए कहा. दोनो मध्यम गति से चला रहे थे.
"तो बोरडिंग से वापिस घर आए हो. अगर बुरा ना मानो तो रहते कहाँ हो तुम?"
"जी #### सेक्टर मे."
"कमाल की बात है. वही मेरा घर है." प्रीति ने थोड़ा हैरानी से कहा. ये सेक्टर ज़्यादातर बड़े सरकारी लोगो या फिर रईस लोगो से भरा था.
"इसमे कमाल की क्या बात हुई. एक शहर है तो कही तो रहेंगे ही. कमाल तो तब होता है जब आपका घर पास मे होता."ये बात अर्जुन ने वैसे ही कही थी.
"अच्छा तो हाउस नंबर बताओ." जब प्रीति ने इतनी बात कही तो अर्जुन थोड़ी देर चुप कर गया.
"अर्रे यही सोच रहे हो ना के पहली बार ही इस लड़की को देखा और आज ही घर का अड्रेस पूछने लगी." और हँसने लगी..
"नही वो बात नही है. मेरा घर का नंबर है 7-8." झेन्पते हुए अर्जुन ने कहा क्योंकि वो वही सोच रहा था जो प्रीति ने बोला था.
"तुम पंडित अंकल की फमिलि से हो?" दोनो अब अपने ही सेक्टर की खाली सड़क पर आ चुके थे.
"आप दादाजी को कैसे जानती हो.?" अर्जुन ने ब्रेक लगा कर साइकल वही रोक दी तो प्रीति ने थोड़ा सा आगे.
"5 नंबर घर है हमारा. कॉल पूरी मेरे दादा जी है. और 12त चंडीगढ़ से करने के बाद अभी मैं यही आ गई हू."
फिर अर्जुन को छेड़ते हुए बोली
"मतलब ये हुआ के ये तो फिर कमाल ही हो गया." और अर्जुन ये बात सुनते ही शर्मा कर वापिस साइकल चला आगे बढ़ा. प्रीति ने उनके घर के सामने ब्रेक लगा लिए तो अर्जुन भी संकोचवश रुक गया की ऐसी कैसे अपने घर के अंदर चला जाऊ एक लड़की को बाहर छोड़ कर.
"आप भी आइए घर मे."औपचारिकता से उसने पूछा
"नही अभी नही लेकिन जल्दी ही आउन्गी." इतना ही कहा था कि बगीचे से रामेश्वर जी के साथ कॉल पूरी बाहर आते दिखे.
"चले दादू."
"चलो बेटी मैं बस आ रहा हू पंडित जी के साथ."
अर्जुन ने उन्हे प्रणाम किया तो कॉल पूरी रामेश्वर जी से बोले. " पट्ठा तो मजबूत होता जा रहा है. फौज की तैयारी तो नही."
रामेश्वर जी मुस्कुरा दिए और बोले,"फौज मे 8 घंटे की नींद नही मिलती इसलिए मेरा पोता नई जाएगा." दोनो दोस्त हंस दिए और अर्जुन खिसिया कर
अंदर चला गया.