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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

"हाहाहा. तुम भी ना. मेरे दादाजी ज़्यादातर तो तुम्हारे दादाजी के साथ रहते है तो तुम्ही बताओ के क्या तुम्हारे घर मे पुलिस स्टेशन जैसा महॉल है."

अब अर्जुन के झेंपने की बारी थी. लेकिन बात को वही ख़तम कर उसने शिष्टाचार से उसको बाइ किया और जाने से पहले एक बार फिर उसकी आँखों को देखने की कोशिश सी की.

"बाइ. और तुम्हारे देखने से इनका रंग नही बदलेगा." वो अर्जुन को ऐसे ताकता देख खिलखिला कर गेट की तरफ बढ़ चली.

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" वो मा सुबह के लिए सॉरी. मुझे नही पता था कि ऐसा कुछ होगा लेकिन फिर पता नही मैं जैसे कही खो गया था." अपनी मा को रसोईघर मे चाय बनाते देख अर्जुन ने उनके पास जा कर क्षमा माँगी जो भी उसने सुबह देखा था उसके लिए.

"कोई बात नही बेटा. ग़लती मेरी भी थी. सावधानी नही रख पाई तो अंजाने मे हो गया. चल यहा बैठ मैं तुझे दूध देती हू." अपने बेटे की बात सुनकर रेखा जी को भी अच्छा लगा. वो काफ़ी देर से बस उस हादसे के बारे मे ही सोच रही थी. लेकिन अर्जुन की माफी ने बता दिया था की ग़लती तो रेखा की ही थी. बेटे को क्या पता था कि मा ऐसे बाहर आ जाएगी. लेकिन जो बात उन्हे खाए जा रही थी वो यही थी के अर्जुन ने उनको देख कर नज़र क्यो नही फेरी थी. उसका घूर्ना रेखा जी का सरदर्द सा कर गया था. लेकिन घर आते ही उसने दिल से माफी माँग कर उन्हे इस दर्द से निजात दिला दी थी.

"मुन्ना आज तू लेट कैसे आया रे?" ये ताईजी थी जो चाय पीने आई थी वहाँ. हल्के हरे रंग की सारी मे लिपटा उनका गदराया जिस्म और मेहन्दी रंग के ब्लाउस मे से बाहर निकलने को तड़प रहे मोटे बूब्स. ताईजी भी उसकी नज़र देख मुस्कुराइ और फिर कुर्सी पर बैठ गई.

मा वही थी तो अर्जुन भी शांति से थोड़ी दूर कुर्सी पर बैठ गया. "ले बेटा. आराम से पीना. जल्दी जल्दी पीने से दूध शरीर को सही से नही लगता." हिदायत देने के साथ उन्होने एक बड़ा गिलास दूध का जिसमे बादाम डालकर गरम किया था अर्जुन के सामने रख अपनी जेठानी को चाय का कप दिया. खुद भी वही बैठ गई.

एक बार अर्जुन ने फिर से दोनो को बारी बारी से देखा और फिर उपर कमरे मे चल दिया. नहाने के लिए घुसा तो अब गोर से प्रीति की बात पर ध्यान देने लगा. "अकेले भी दौड़ना पड़ता है ज़िंदगी मे. लेकिन कई बार मंज़िल से पहले ही बहुत लोग अपने बन जाते है और कई बार मंज़िल पर पहुचने के लिए कई लोग सफ़र मे पीछे रह जाते है. " उसको अब ये बात पूरी तरह से समझ आ गई थी. ज़रूरी नही के कोई ऐसा लक्ष्य बनाया जाए जहाँ अपने ही लोग ना हो साथ.

और अगर अपने लोग हमेशा साथ हो तो इंसान खुद ही इतना मजबूत होगा की वो किसी ऐसे लक्ष्य की तरफ़ देखेगा भी नही जिसके लिए सब से रिश्ता तोड़ कर जाना पड़े. नहा के बाहर आया तो बिल्कुल तरो ताज़ा था अब वो. नीचे अलका दीदी पता नही कब से इंतजार कर रही थी उसका. और जब अर्जुन ने उन्हे

खड़े देखा तो कान पकड़ लिए और उनके पीछे बाहर चल दिया.

"दीदी भूल गया था. गुस्सा नहीं होना प्लीज़."

"चुपचाप स्कूटी बाहर निकालो और चलो.", अलका दीदी थोड़ा गुस्से मे थी क्योंकि 30 मिनिट से अर्जुन नहा रहा था. वो भी हुकुम मानकर चल दिया ग्राउंड की तरफ. लेकिन उसने सीधा स्कूटी वहाँ रोकी जहाँ कॉलेज के बाद वो दीदी को लेकर आया था.

"मुझे चलाना सीखना है." ये बात सिर्फ़ उपर से ही अलका दीदी ने कही थी. जगह को याद करके उनका जिस्म रोमांच से भर उठा था.

"पहले मुझे अपनी प्यारी दीदी को गले लगा कर उनका गुस्सा कम करना है." इतना बोलकर उसने स्कूटी खड़ी करी और सीट पर बैठी अपनी गुस्से वाली दीदी को बाहो मे भरकर उपर उठा लिया.

"दीदी आप जानती नही की आप नाराज़ होती हो तो मुझे खुद पर कितना गुस्सा आता है. " उसने ये बात अलका दीदी को गले लगाए ही कही थी. इसमे कोई वासना या भूख नही थी. लेकिन एक प्रेमी का प्रेमिका के लिए प्यार ज़रूर था.

अलका दीदी ने भी उसको थोड़ा ज़ोर से कस लिया. "तू ना मुझे मिनिट मे बेवकूफ़ बना लेता है." और मुस्कुरा कर होंठो पर किस करके ज़मीन पर पाव टीका लिए. "चल अब सीखा."

फिर अर्जुन ने जैसे ऋतु दीदी को समझाया था वैसे वो अलका दीदी को समझाने लगा. पीछे बैठकर उसने वैसे ही उनको चलाने दिया. हर मोड़ पर वो खुद स्कूटी घुमाता. थोड़ी देर बाद अर्जुन ने शरारत शुरू कर दी. एक हाथ हॅंडल पर एक हाथ से दीदी की उभार का निचला हिस्सा सहलाने लगा.

"ऐसे मत कर वरना गिर जाएँगे." महसूस होते ही दीदी डरने लग गई. मज़ा भी आ रहा था और हॅंडल छूटने का डर भी था.

"नही गिरते दीदी. आप बस पकड़े रहो." इतना बोलकर वो अब थोड़ा उपर हाथ ले आया था.

"भाई तू वही रोक ले जहाँ पहले रोकी थी." और अर्जुन ने वापिस वही पेड़ो के झुंड के पास स्कूटी खड़ी करी और उनको साथ लेकर झुंड के बीच आ गया. उस से ज़्यादा उत्तेजित तो अलका दीदी थी जिन्होने रात को अर्जुन और माधुरी दीदी का अद्भुत संगम देखा था. वो उसके शरीर पर नागिन सी चिपकती होंठ चूसने मे लगी थी यहा अर्जुन ने हाथ सीधा सलवार के अंदर डाल दिया और कच्छी के उपर से ही उनकी चूत सहलाने लगा.

"भाई ये मत कर नही तो मैं सबर खो दूँगी. देख मेरे 4 पेपर बचे है फिर मैं चाहती हू खुद मेरे कपड़े उतार मेरे अंदर समा जाए. बस इतने दिन उपर से जो भी कर ले." हाथ हटाने की कोई कोशिश नही की थी दीदी ने.

अर्जुन ने भी बिना कुछ बोले अपने हाथ पीछे कुल्हो पर रख दबाने शुरू कर दिए और उनको अच्छे से चूमने लगा. कोई 10 मिनिट बाद दोनो खुद को दुरुस्त कर वापिस घर की तरफ चल दिए. इस बार अलका दीदी का हाथ बड़े प्यार से भाई की कमर मे था.

"ले लिए मज़े?" घर के अंदर अभी आए ही थे की ऋतु ने अलका को देखते ही कहा.

"कोन्से मज़े लेकर आ रही हो?" माधुरी दीदी की आवाज़ सुनकर तो तीनो एक बार ठिठक गये. ऋतु तो बोलने लगी थी की दीदी हमारे मज़े तो आप वाले मज़े के सामने कुछ भी नही. लेकिन अलका ने आराम से कहा , "दीदी स्कूटी चलाने मे भी मज़ा आता है. बस वही बात हो रही थी."

माधुरी दीदी गहरी निगाहो से देखती मशीन की तरफ चली गई जहाँ कोमल दीदी कपड़े भिगो रही थी.

"किसी दिन पक्का मरवाएगी तू ऋतु की बच्ची.", अलका दीदी ऋतु को खींचती हुई अंदर ले चली.

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सभी काम से फारिग हो कर अर्जुन उपर ड्रॉयिंग रूम मे बैठ कुछ सोच रहा था. टेलीविजन पर कोई कार्टून चल रहा था और अभी तकरीबन 10 बजे थे.

"ये प्रीति को देख कर ऐसा क्यो लगता है के मैं शायद पहले से जानता हू. लेकिन वो तो कभी हमारे घर भी नही आई. दादा जी के इतने अच्छे दोस्त है पुरी अंकल और दादाजी भी उनके पास जाते रहते है. फिर ऐसा क्यो है के वो घर मे अकेली होते हुए भी कभी हमारे घर नही आई?" अर्जुन हर बात पर गोर कर रहा था. प्रीति की उन नीली-हरी आँखों को पता नही उसने कब देखा था. लेकिन वो उसको बड़ी जानी पहचानी लग रही थी. जैसे उनको उसने पहले बहुत करीब से देखा है, महसूस किया है.
 
"छोटे तू यहा बैठा है और नीचे तुझे दादाजी बुला रहे है.", संजीव भैया ने उसको हिलाते हुए कहा

"भैया ... आप कब आए और अब तो नही जाओगे ना बाहर?" अपने भैया को इस टाइम घर अचानक आया देख वो खुश हो उठा.

"अर्रे नही जा रहा कही अभी. 2 दिन से 4-5 शहरो मे कॅंप लगाए थे और मीटिंग्स थी. बस अभी उपर आया हू नहाने फिर थोड़ा आराम करूँगा. शाम को दोनो बाहर चलेंगे." भैया की बात सुनकर अर्जुन किसी नन्हे बचे की तरह चहक उठा. "हा और आज पूरी शाम मेरे साथ रहेंगे."

अपने छोटे भाई की खुशी देख संजीव भैया भी मुस्कुरा के बोले, "अर्रे तू एक बार बोल कर देख हर शाम तेरे नाम. और जल्दी जा कही ज़्यादा देर हो गई तो फिर यहा थानेदार साहब खुद आ जाएँगे." अपने दादा जी को दोनो कई बार इस नाम से आपस मे बुलाते थे.

"हंजी दादा जी. कहिए क्या काम है?" वो अगले ही पल बैठक मे खड़ा था जहाँ बोलने के बाद देखा तो कर्नल पुरी और मल्होत्रा अंकल भी साइड सोफा पर बैठे थे. उसने आदर से उन्हे नमस्कार किया.

"हा बेटा वो ऐसा है के आज मल्होत्रा जी के घर संगीत का कार्यक्रम है तो मार्केट से कुछ समान लेके आना था." उन्होने बात करते हुए अपने दोस्त की तरफ इशारा भी किया. "खैर मैं तो भूल गया की ये बात किस से कर रहा हू. तुझे तो पता ही नहीं होगा की कल पलक बिटिया की शादी है क्योंकि घर की बातों मे कभी पहले बैठा हो तो पता होगा कोंन आस पास रहता है या कहा क्या हो रहा है." थोड़ी तल्खी से बात करी रामेश्वर जी जो वो कभी करते नही थे.

"क्या पंडित जी अभी बच्चा है और आप काम की बजाय इसको ऐसे डाँटने लगे. अच्छा अर्जुन बेटा, वो ऐसा है ना की शादी का घर है तो सभी लोग काम मे लगे है और जो काम नही करना चाहते वो सजने सवरने मे." थोड़ी मुस्कुराहट से ये बात कही और आगे बोले, "सारे काम लगभग हो चुके है लेकिन

वो तेरी दीदी (पलक मल्होत्रा) का एक लहंगा फिटिंग के लिए बड़ी मार्केट मे दिया था "शिगार घर" वाले को, उसने संदेश भेजा की लहंगा तयार है ले जाओ क्योंकि उनके घर मे भी कोई कार्यक्रम है तो दुकान 12 बजे बंद कर देगा. और ये कुछ समान लाना था वही मार्केट से जो यहा नही मिला." मल्होत्रा अंकल ने अर्जुन की तरफ एक छोटी सी स्लिप बढ़ाई.

"ये तो शायद लड़कियो का समान है?" अर्जुन ने सरसरी नज़र डाली जिसमे फेशियल क्रीम वग़ैरह लिखा था.

"इसलिए तो तुम्हारे साथ प्रीति को भेज रहा हूँ बर्खुरदार. और उसने भी रात को फंक्षन मे पहन ने के लिए कुछ लेना है. अकेले इतनी बड़ी मार्केट तो वो जाने से रही." ये कड़क आवाज़ पुरी अंकल की थी.

"ये बेटा पैसे पकड़ लो. बाकी पैसे और पर्ची घर आने के बाद अपनी आंटी को दे देना." मल्होत्रा अंकल ने एक दस हज़ार की गड्डी उसे थमा दी.

"तू ऐसे ही जाएगा क्या?" रामेश्वर जी ने थोड़ा नर्मी से पूछा.

"वो दादा जी फंक्षन तो रात का है. मैं संजीव भैया के साथ जा कर ले आउन्गा कुछ."

अर्जुन ने इतना कहा तो अब दादा जी उठ खड़े हुए. "बेटा दुनिया मे पाजामे की सिवा भी और कपड़े होते है. और मार्केट जाना हो तो कम से कम खुद की नही लेकिन तेरे दादा की तो पर्सनॅलिटी की इज़्ज़त रख. " अपने दोस्तो की तरफ मुड़कर हँसे और तकिये के नीचे से 3000/- निकाल कर उसको थमा दिए.

"पहले उपर जा कर जीन्स और कोई अच्छी सी शर्ट पहन. और भैया के साथ नही अभी अपनी खुद की मर्ज़ी से कपड़े लेना. वही पहनकर देख कर. और पैसे कम पड़े तो मल्होत्रा जी के पैसो से प्रयोग कर लिओ. मैं दे दूँगा इनको."

उनकी बात सुनकर पैसे जेब मे डाल वो मुड़े ही थे के फिर आवाज़ आई. "कुछ भूल रहे हो? तैयार होने के बाद घर से प्रीति को लेके जाना है?" कर्नल पुरी ने फिर याद दिलाया उसको क्योंकि इतनी बातों के बीच वो ये सच मे भूल गया था..

"भैया, दादा जी मुझे मार्केट भेज रहे है और तैयार होकर जाने को बोल रहे." लाचारी से उसने उपर आने के बाद भैया की तरफ़ देखा.

"हा तो क्या बड़ी बात है. सबको पता है की दिन मे तू 3 बार पाजामा बदल कर पाजामा ही पहन लेता है. तुझे नये साल पर जो जीन्स की पैंट दिलाई थी कभी खोली भी तूने? या फिर कोई शर्ट पहनी है?" वो सोफे से उठ गये और अर्जुन की अलमारी खोल कर अंदर उसके कपड़े देखने लगे. अंदर पाइप पर 8-9 शर्ट प्रेस की हुई जाने कब से टन्गी थी. 4 जीन्स थी वहाँ जिन मे से 2 के उपर अभी भी कीमत वाली पट्टी चिपकी थी. नीचे हर तरफ़ा सिर्फ़ टीशर्ट/लोवर का बड़ा से ढेर लगा था.

"तेरा कुछ नही हो सकता भाई. चल ये पहने हुए कपड़े उतार और जो दे रहा हू वो पहन." उन्होने पहले एक सॉफ बनियान उठाई जो अर्जुन ने टीशर्ट उतार कर पहन ली. फिर एक सफेद सूती लेकिन कड़क प्रेस करी हुई कमीज़ जिसके साथ उन्होने हल्के नीले रंग की जीन्स पैंट उसको दी. अर्जुन बस चुपचाप पहन रहा था.

"इधर हा. तू सच मे ही बच्चा है." उन्होने अर्जुन की कमीज़ जो वो जीन्स पैंट के अंदर डालने लगा था वही पकड़ ली."ये कोई फॉर्मल शर्ट नही है और ना ये पतलूर है. बाहर रख इसको. दिख नही रहा सिर्फ़ बेल्ट की पट्टी से एक इंच ही नीचे है. और ये जूते अंदर रख और तेरे सफेद वाले आक्षन के जूते डब्बे से बाहर निकाल. दीवाली का तोहफा अभी तक डब्बे मे है."

अर्जुन जब जूते पहन रहा था तो संजीव भैया बाथरूम से थोड़ा पानी नहाने के डब्बे मे लेकर आए. अपने हाथ मे थोड़ा पानी ले कर उन्होने अच्छे से उसके घुंघराले बालो को गीला किया और फिर थोड़ा खुसबु वाला तेल लगाया. उसके बाल अच्छे दिख रहे थे.

"चल अब ज़रा खुद को आईने मे देख ले एक बार." उन्होने हंसते हुए कहा और अलमारी का दरवाजा बंद किया जीके बाहर की तरफ कोई 4 फीट का शीशा लगा था.

"मेरा तो काया कल्प ही कर दिया भैया आपने?" अर्जुन ने भी काबी खुदको ऐसा नही पाया था जैसे वो आज दिख रहा था. गोरा सख़्त चेहरा, चौड़े कंधो पर फिटिंग की सफेद शर्ट, टाँगो के उपर हल्की टाइट जीन्स की पैंट और दोनो से मेल खाते उसके जूते. वो रविवार के अख़बार मे कपड़ो के प्रचार करते किसी मॉडेल जैसा लग रहा था.

"थॅंक यू भैया." अपने इस रूप से खुश होकर उसने अपने भैया को गले ही लगा लिया.

"बस कर रे तेरी कमीज़ पर सिलवट पड जाएँगी. चल जा और ध्यान रखना."

दिए हुए पैसे अपनी जेब मे डालने के बाद अर्जुन ने अपना बटुआ भी पिछली जेब मे डाल लिया. थोड़े और पैसे उसने बटुए मे भर लिए थे. कोई 2 मिनिट बाद अब वो कर्नल पुरी के गेट पर था. स्कूटर को स्टॅंड पर लगा कर घंटी बजाई.

"जी कहिए." ये पार्वती थी, घर की कामवाली.

"वो प्रीति जी को बोलना के अर्जुन आया है." संदेशा लेकर पार्वती अंदर गई और वापिस आते ही गेट खोलकर बोली, "वो आप अंदर बैठ जाइए, दीदी को 2 मिनिट लगेंगे, ऐसा उन्होने कहा है. चलिए."

अर्जुन मना करना चाहता था लेकिन कुछ सोचता हुआ अंदर चल दिया.
 
ड्रॉयिंग रूम काफ़ी अच्छे से सज़ा हुआ था. सोफे पर बैठा तो पार्वती ट्रे मे पानी का गिलास लेकर खड़ी हो गई.

"जी शुक्रिया. मैं सीधा घर से आया हू. यही 2 घर छोड़कर मेरा घर है."

पार्वती ने एक बार अर्जुन को गोर से देखा और गिलास लेकर चली गई.

5 मिनिट बाद ही दरवाजा खुला और अपने बालो को एक रब्बर से बाँधती प्रीति बाहर निकली.

"क़यामत" अर्जुन के दिल ने सिर्फ़ इतना ही कहा.

सफेद और काली पट्टी वाला टॉप और गहरे नीले रंग की टाइट जीन्स पैंट पहन कर किसी अप्सरा सी वो अर्जुन को देख कर बोली, "तो चले जनाब अगर आप चाहें तो."

"हः. . हा चलो." अर्जुन बस उस पल मे ही खोया सा प्रीति के पीछे चल दिया. गलियारे मे आकर प्रीति एकदम से रुकी शायद कुछ भूल गई थी और पलट गई.

"तड्द" सीधा अर्जुन के सीने से टकराई, जो अभी भी खोया सा ही चल रहा था. "सॉरी. आपको लगी तो नही. वो मेरा ध्यान नही था." अर्जुन झेंप गया लेकिन प्रीति बिना कुछ बोले अंदर चली गई. अर्जुन अब शांत सा स्कूटर को स्टॅंड से उतार किक लगा था की वो एक लड़कियों वाला हॅंडबॅग अपने दाएँ कंधे पर डाल बाहर आ गई. स्कूटर पर प्रीति कुछ दूरी पर बैठी थी, दोनो हाथ उसने अपनी गोद मे रखे था. ऐसे ही चुपचाप दोनो मुख्य सड़क तक आ गये.

"आज मौन व्रत है क्या?" प्रीति ने पहली बार उसकी पीठ को छुआ था.

"नही वो कुछ देर पहले जो भी हुआ उसके लिए मैं शर्मिंदा हू. अंजाने मे सब हुआ"

"वो बात वही ख़तम हो गई थी. लेकिन आगे से टक्कर देख कर मारना. बिल्कुल पत्थर हो." फिर आगे बोली, "वैसे अच्छे लग रहे हो आज. कुछ खास है क्या."

"नही तो ऐसा तो कुछ नही है. बस मार्केट आ रहे थे तो दादाजी ने बोला के तयार होकर जाओ." अर्जुन ने संकोच से कहा. उसके मन मे कुछ चल रहा था लेकिन शायद झिझक या कुछ और था कि अभी वो ज़्यादा बोल नही पा रहा था.

"स्कूटर अच्छा चला लेते हो तो स्टेडियम साइकल से क्यो जाते हो.?" प्रीति शायद अर्जुन की इस झिझक को समझ गई थी लेकिन वो चाहती थी की दोनो बातें करे.

"दादा जी ने कहा के साइकल से जाना ठीक रहेगा. वो कसरत भी हो जाती है इसीलिए." अर्जुन ने फिर से छोटा सा जवाब दिया.

"क्या सोच रहे हो? देखो अगर तुम मुझे दोस्त या कुछ भी समझते हो तो बता सकते हो."\

"ऐसा कुछ नही है लेकिन एक बात मैं काफ़ी देर से सोच रहा हू. लेकिन लगता है के शायद वहाँ हो. बस ऐसा ही कुछ."

प्रीति ने अब अपना हाथ पीछे से उसके कंधे पर रखा. "तुम मुझसे बात कर सकते हो."

"क्या हम एक दूसरे को जानते है.?" अर्जुन का सवाल प्रीति के दिमाग़ के साथ दिल पर भी किसी सूई की तरह चुभा.
 
अहसास- कुछ नये (2)

"क्या हम एक दूसरे को जानते है.?" अर्जुन का सवाल प्रीति के दिमाग़ के साथ दिल पर भी किसी सूई की तरह चुभा.

"देखा ना मैने कहा था कि ये मेरा वहाँ है. लेकिन क्या करू पता नही ऐसा लगता है के जैसे तुम्हारी आँखें मैं पहले भी बहुत बार देख चुका हू.

बहुत करीब से. लेकिन याद कुछ नही आ रहा. शायद किसी और को होंगी या फिर कोई सपना भी हो सकता है." अर्जुन अब निरंतर अपनी बात बोलता रहा.

"सॉरी वो बस ऐसे ही कह दिया. मैं तो कोई 8 साल से हॉस्टिल था. और फिर घर भी साल मे एक बार आता था. तुम भी अभी आई हो यहा तो ये मेरे वहाँ से ज़्यादा कुछ नही है." अर्जुन ये बात कह कर चुप सा हो गया और इधर दोनो मुख्य बाजार मे आ गये थे. ये काफ़ी ज़्यादा बड़ी मार्केट थी जो पास के 2-3 शहरो मे भी प्रचलित थी. हर तरह का समान यहा मिलता था. कपड़े, गहने, घर का समान, ऑफीस का समान, खाने पीने के कई रेस्तरा और होटेल भी थे. कही बड़ी दुकाने तो कही रेहडी मार्केट. अंदर स्कूटर पर जाना ठीक नही था तो अर्जुन ने प्रवेश करते ही स्कूटर को वही गाड़ी-दोपहिया के लिए बनाए एक प्लॉट पर खड़ा किया और वापिस बाहर प्रीति के पास आ गया था. प्रीति चुप थी लेकिन अब उसके चेहरे पे चिंता नही थी.

"ये दुकान ज़रा पूछ ले किसी से? थोड़ा ही टाइम है नही तो बंद हो जाएगी." अर्जुन ने फिर एक बार कोशिश की प्रीति से बात करने की. उसकी चुप्पी अर्जुन को बुरी लग रही थी.

"ठीक है."

पास मे ही एक ठेले वाले से उसने पूछा, 'भैया ये शृंगार घर किधर है.?"

"साहब ये सीधी सड़क पर चले जाओ.सामने गोल चक्कर के उस तरफ 2 मनीला दुकान है. दिख जाएगी वही से." वो आदमी जो चाट-पापडी बेच रहा था बोला.

"शुक्रिया भैया." बोलकर दोनो ठेले वाले की बताई दिशा मे चलने लगे. फुटपाथ पर चलते हुए प्रीति नीचे देखती चल रही थी और अर्जुन कभी उसको तो कभी सामने. शनिवार था तो भीड़ भी बहुत थी. हर जगह कही बाहर लोग समान बेच रहे थे और कही दुकानो पर सस्ते दाम के चार्ट चिपके थे.

गोल चक्कर को पार करते समय भी प्रीति का ध्यान नीचे ही था. अर्जुन सड़क को तेज़ी से पार करने के चक्कर मे थोड़ा आगे हुआ तो पीछे मुड़ा. एक गाय उसकी तरफ ही भागती आ रही थी. अर्जुन ने तेज़ी से प्रीति की और बढ़कर उसको अपनी तरफ खींच. और उतनी ही देर मे गाय उसकी पीठ के पीछे से निकल गई.

"मेरी बात से नाराज़ हो तो मत बात करो लेकिन सड़क पर नज़र तो रख लो. अभी कुछ हो जाता तो मैं कॉल अंकल को क्या जवाब देता?" उसने पहली बार सख्ती से किसी से बात कही थी. यहा प्रीति उसके सीने से जा लगी थी. दोनो वापिस अलग हो कर चल दिए.

इस बार अर्जुन आगे चल रहा था लेकिन उसने प्रीति का हाथ ऐसे थाम रखा था कि जैसे कोई बाप अपनी ज़िद्दी औलाद को उस दुकान से दूर ले जा रहा हो जहाँ खिलोने टाँगे हो. वो कभी अर्जुन की तरफ देखती तो कभी आसपास. किसी को उनकी परवाह नही थी और ऐसे ही वो उस दुकान पर आ गये. यहा अर्जुन ने हाथ छोड़ दिया था और शायद प्रीति को ये अच्छा नही लगा

"जी कहिए?" दुकान काफ़ी बड़ी थी लेकिन अभी वहाँ सिर्फ़ 2 ही लोग थे. एक लड़का जो अंदर समान पॅक कर रहा और एक ये अंकल जो मुख्य काउंटर पर बैठे पैसे गिन रहे थे.

"जी मुझे मल्होत्रा अंकल ने भेजा है.", इतना ही कहा था कि सामने वाले ने एक बड़ा सा बॅग अर्जुन की तरफ बढ़ते हुए कहा, "बेटा तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था. ये लो बेटा जैसा कहा था सब वैसा कर दिया है."

"जी शुक्रिया. और पैसे कितने हुए?" अर्जुन ने जब पूछा तो उन्होने बॅग पर लगी पर्ची पर निगाह डाली.

"बेटा 3500 हुए है. ये एक्सट्रा काम था. लहंगे की कीमत पहले ही मल्होत्रा जी दे चुके है."

अर्जुन ने नोटो की गद्दी से 35 नोट उनको दिए और बाकी वैसे ही वापिस रब्बर से बाँध जेब मे रख लिए. फिर प्रीति की तरफ देख शीशे के दरवाजे को खोला. दोनो बॅग लेकर बाहर आ गये.

"तुम्हे भी कुछ लेना था ना? तुम्हारे दादाजी ने बताया था." अर्जुन की बात सुनकर प्रीति ने उसकी तरफ देखा तो अर्जुन को उसकी वो आँखे अब किसी हीरे सी चमकती दिखी. शायद सूरज की रोशनी से.

"हा वो मुझे भी कुछ कपड़े लेने है. लेकिन मुझे ज़्यादा कुछ पता नही मार्केट मे की कहाँ से अच्छे कपड़े मिल सकते है."

प्रीति की बात सुनकर अर्जुन ने उसको रुकने का इशारा किया और वापिस उस दुकान मे घुस गया जिस से लहंगा लिया था. अब वहाँ वो लड़का था जो पहले अंदर की तरफ था.

"भैया यहा लड़कियो के अच्छे कपड़े कहा मिलते है. किसी ख़ास दिन के लिए?"

"भाई मिल तो यहा भी जाते लेकिन अभी दुकान बढ़ा दी है बस. लेकिन वहाँ सामने नटराज होटेल है. उसके साथ जो गली अंदर जा रही है वो सिर्फ़ लॅडीस के कपड़ो और समान की दुकानो से भरी है. हर तरह का कपड़ा वहाँ मिल जाएगा. और कुछ कमी होती है तो ज़्यादातर दुकानो मे दर्जी भी बैठे है." इतना कहकर उसने चाबियों का गुछा उठाए हुए ही अंदर से दरवाजा खोला और दोनो बाहर आ गये.

"शुक्रिया भाई." फिर से अब दोनो लोग चल पड़े. आगे अर्जुन और उस से एक कदम पीछे प्रीति. "अब ध्यान से पार करना."

अर्जुन ने ये बात कही तो प्रीति जो अब तक चुप थी बोली, "मुझे कुछ हो जाता तो क्या तुम्हे बुरा नही लगता?".

अर्जुन ने उसकी बात सुनी और फिर गली मे घुसते हुए ही बोला. "अभी तुम मेरी ज़िम्मेदारी हो और अगर तुम्हे कुछ हो जाता तो मुझे बिल्कुल भी नही पता के मैं क्या करता. क्योंकि मेरे पास इसका कोई जवाब नही होता."

"मतलब अगर मुझे चोट लग जाती तो तुम्हे फरक नही पड़ता?", प्रीति की बात सुनकर अर्जुन के पैर वही रुक गये.

"मैं खुद को माफ़ नही कर पाता. बस इतना कहूँगा." और फिर अपना पुरानी बात दोहराई, "बताओ क्या तुम मुझे जानती हो?"

"हा तुम्हे जानती हू तभी तो यहा आ गई तुम्हारे साथ. " प्रीति इतना बोलकर एक बड़ी दुकान मे चली गई जहाँ बड़े शीशे से अंदर लगी कई खूबसूरत पोशाक दिख रही थी. अर्जुन भी पीछे हो लिया. अंदर से तो ये दुकान और भी बड़ी थी. कोई 5 काउंटर थे यहा भीड़ ठीक ठाक ही थी. अर्जुन गोर से हर तरफ देखने लगा.
 
"भैया वो स्टॅच्यू पर लगा ब्लॅक वाला सूट अवलेबल है.?" प्रीति शायद उस सूट को देख कर ही अंदर आई थी. था भी वो बेहद ही उम्दा कलाकारी वाला

"जी मेडम. ये रेडी टू स्टिच सूट है और काफ़ी पॉपुलर भी हो रहा है." दुकानदार ने और भी बहुत तारीफ की उस सूट की जिसमे रेशमी कपड़े पे काँच की कारीगरी की हुई थी.

"आप कितना वक़्त लेंगे इसको तैयार करवाने मे? हमें थोड़ी जल्दी है." बिना दाम पूछे ही प्रीति किसी छोटी बच्ची की तरह बार बार उसको देख रही थी.

"जी आप माप दीजिए हमारी मेडम इसको 2 घंटे मे ही तयार कर देंगी. सलवार सिर्फ़ चूड़ीदार ही तयार होगा. मैं ये पहले बता देता हूँ. पूरा सूट 4300 का लगेगा. जिसमे हमने 300 ही सिर्फ़ सिलाई के जोड़े है." दुकानदार ने एक ही बार मे अपनी बात कह दी.

प्रीति ने अर्जुन की तरफ देखा जैसे पूछ रही हो के क्या करे

"जी अंकल आप सूट तयार कीजिए. अभी 12 बजने वाले है हम 2 बजे आ कर ले जाएँगे." अर्जुन ने ही प्रीति की जगह जवाब दिया तो प्रीति नीचे देख कर मुस्कुराने लगी. अर्जुन ने पैसे देने के लिए अपना बटुआ निकाला तो प्रीति हैरान होती उसकी तरफ देखने लगी लेकिन थोड़ी फुर्ती से उसने अपने हॅंडबॅग से 500 के 9 नोट दुकानदार के सामने रख दिए. दुकानदार भी दोनो की तरफ देख मुस्कुरा दिया.

अर्जुन ने झेन्पते हुए बटुआ वापिस पिछली जेब मे रख लिया.

"पूनम ये सूट ज़रा जल्दी तैयार करना है पहले आकर यहा माप ले लो." दुकानदार ने आवाज़ लगाई तो चस्मा पहने एक औरत अंदर बने एक कमरे से बाहर निकल कर काउंटर की तरफ आई. उसके हाथ मे एक पेन्सिल और फीता था.

"आइए आपे मेरे साथ चलिए. और छोटू जो सूट इन्होने पसंद किया है उसका नया पीस अंदर भिजवा दो."

उन्होने इतना कहा तो प्रीति अंदर चली गई और एक लड़का पीछे के काउंटर से सूट निकालने लगा.

"चलो यहा से तो फारिग हो गये बस अभी एक और ड्रेस लेनी है." प्रीति ने ना जाने कैसे काउंटर पर आते ही अर्जुन की बाह थाम ली और उसको बाहर ले चल दी. अर्जुन स्तब्ध सा बाहर आ गया.

"वहाँ तुम पैसे क्यो दे रहे थे?" उसने अब मुस्कुरा कर पूछा तो अर्जुन से जवाब देते ना बना. बस एक शर्मीली सी मुस्कान के साथ सर झुका लिया.

"दादा जी ने मुझे पहले ही काफ़ी पैसे देकर भेजा है. और तुम तो मुझे कुछ समझते नही फिर तुम्हारे पैसे तो मैं वैसे भी नही लेने वाली थी." थोड़ा प्यार से किया तंज़ काम कर गया.

"क्यो? मेरे पैसे नकली है क्या? और तुम्हारे पास पैसे नही भी होते तो भी मैं बिना कहे देने वाला था. मुझे भी सूट पसंद आया था और जिस तरह तुम उसको देख रही थी, मेरे दिल ने कहा के मैं खुद ही तुम्हे दिलवा दूँ." फिर से गड़बड़ कर दी थी अर्जुन ने . यही तो कमी थी उसकी की शब्दो को नापतोल नही रख पाता था.

"चलो मुझे कल के लिए भी एक ड्रेस लेनी है.", और वो उसको लेकर सभी दुकानो को बाहर से ही देखने लगी. कही एक पल रुकती फिर चल देती.

अर्जुन भी घर से बाहर आज पहली बार इस तरह घूम रहा था. उसको भी अच्छा लग रहा था ऐसे प्रीति के साथ घूमना.

"यहा चलो मेरे साथ." अर्जुन ने देखा तो ये एक बहुत ही शानदार और बड़ी सी दुकान थी. पहले वाली से कही तीन गुणी बड़ी और बहुत तड़क भड़क वाली. दोनो अंदर गये तो दुकान की पूरी छत पर बहुत सी लाइट लगी थी. हर तरफ एक से बढ़कर एक पोशाक टाँगे थे या आदमकद महिला रूपी प्लास्टिक की मूरतो पर पहनाए गये थे.

अर्जुन के मूह से बस इतना ही निकला. "वाह." कही शादी के जोड़े, तो कही साड़ियाँ और सूट. खूबसूरत लहंगे और लंबी स्कर्ट भी वहाँ टन्गी थी.

"सही जगह है ना ये? अब तुम बताओ मुझे क्या लेना चाहिए?" प्रीति अर्जुन से कह रही थी और अर्जुन एक पोशाक को घूर रहा था.

"वो हमारे काम की नही है. उसको दुल्हन पहनती है." प्रीति की बात सुनकर अर्जुन अपनी बगले झाँकने लगा.

एक मूरत पर लाल चूड़े, घूँगत, चोली और लहंगा पहनाया हुआ था. बेहद ही खूबसूरत थी वो. लेकिन अर्जुन को ये सब नही पता था. "अच्छा ये देखो ये कैसी ड्रेस है.?"

प्रीति ने उसका ध्यान एक पश्चिमी पोशाक की तरफ किया. ये एक बहुरंगी फुलो वाली शर्ट और घुटनो से थोड़ी नीचे तक की लाल स्कर्ट थी.

"मुझे ये ज़रा भी पसंद नही आई. एक बार इसको देखो." उसने काउंटर के पीछे टाँगे हुए एक हल्के गुलाबी लहंगा-चोली की तरफ इशारा किया. जिसपे सुनेहरी और चाँदी के रंग की कारीगरी की गई थी. ये कोई ज़्यादा तड़क भड़क वाला लहंगा नही था जैसा आँटोर पर दिखाई देता है.

उस काउंटर पर खड़े नवयुवक ने अर्जुन की बात सुनकर कहा, "हमारे पास इसमे 2 और भी रंग है. इधर आइए मैं दिखाता हूँ आप." दोनो उस काउंटर की तरफ चल दिए जहाँ वो युवक काउंटर के नीचे से अलग लहंगे निकाल रहा था. "ये देखिए भाई. ये रंग भी थोड़ा अलग है और आँखों मे चुभता नही." उसने एक महरूण रंग का लहंगा दिखाया जो बिल्कुल वैसा ही था जैसा दीवार पर लगा था. और फिर दूसरा दिखाया जो हल्का नारंगी और लाल था.

अर्जुन ने दोनो को मना कर दिया. "एक बार वही उतार दीजिए." अर्जुन ने इशारा किया तो युवक ने एक गोल लकड़ी की मदद से लहंगा नीचे उतार दिया.

"इसको लगा कर देखो ज़रा खुद पर." अर्जुन के बोलते ही प्रीति ने हॅंडबॅग काउंटर पर रखा और लहंगे को दोनो हाथो मे पकड़ कमर के सामने लगाया.
 
काउंटर वाले लड़के ने उसके साथ की तारो से बुनी हुई गुलाबी किनारों की चुन्नी अर्जुन की और की तो अर्जुन ने नासमझी से वो प्रीति के सर पर कर दी.

"हाहाहा. इसको गले मे लेते है यहा सर पर नही. लगता है अभी भी तुम्हारा ध्यान उस दुल्हन की ड्रेस मे है."

उनकी हरकत देख कर आसपास 3-4 लोग और वो काउंटर पे खड़ा लड़का भी मुस्कुरा दिया.

"मैं कोई लड़की तो नही. ऐसे ही हो गया." अर्जुन ने सफाई दी फिर काउंटर की तरफ सर घुमा के दाम पूछा. "ये सेट कितने का है भाई? और क्या इसमे भी दर्जी की ज़रूरत पड़ेगी?"

"ज़रूरत तो रहेगी भाई. चोली को माप के हिसाब से तैयार करना और लहंगे की लंबाई भी पहन ने वाले के हिसाब से करनी पड़ती है. इसमे 2 दिन का टाइम लगेगा. और जैसे की अभी ये ऑफ टाइम है तो इसकी कीमत भी 50% कम है. अभी ये 6000/- का लगेगा तयार करने के बाद."

"क्या हमें ये कल तक मिल सकता है.?" प्रीति पर्स से पैसे निकालती हुई बोली और ग्राहक को तयार देख कर युवक बोला. "आप एक मिनिट रुकिये." इतना बोलकर वो मुख्य काउंटर की तरफ गया और इधर एक लड़का ट्रे मे 2 गिलास पानी लेकर उन दोनो के पास आया. पानी पीने के बाद दोनो ने उसका धन्यवाद किया.

"जी मेडम, ये कल 3 बजे तक आपको मिल जाएगा. आप अड्वान्स काउंटर पर जमा करवा दीजिए और अगर कोई और ये लेने आए तो उनको ये पर्ची ज़रूर साथ देकर भेजना."

पूरे पैसे जमा करवा कर एक रसीद लेकर दोनो चल दिए वापिस जिस तरफ से आए थे.

"मुझे अभी कुछ और भी लेना है. तुमने वो ड्रेस दिलवाई तो अब मेरे पास कोई चूड़ियाँ या पायल तो है नही."

अर्जुन प्रीति की बात सुनकर मुस्कुरा उठा. "उसके बाद तो कुछ नही लेना.?" उसने प्रीति को थोड़ा मज़ाक मे ये बात कही तो प्रीति सोचने के अंदाज मे बोली, "हा सही कहा. मुझे अब कुछ और भी लेना पड़ेगा."

दोनो चल रहे थे तो एक दुकान के बाहर सौंदर्य प्रसाधन और चूड़ियों का बोर्ड लगा था. इस बड़ी दुकान मे अच्छी ख़ासी भीड़ थी और ज़्यादातर कॉलेज जाने वाली लड़किया अपनी मा के साथ थी और कुछ सहेलियों के.

एक काउंटर पर अर्जुन ने कहा, "चूड़ियाँ और पायल दिखा दीजिए."

वो लड़की तकरीबन 22-23 साल की थी. उसने दोनो को देखा और कहा, "आपको किस

तरह की चूड़ियाँ चाहिए?"

"एक तो ब्लॅक सूट के साथ मैचिंग की और एक गुलाबी लहंगे के साथ." प्रीति ने जवाब दिया. उनके साथ वाले काउंटर पर भी एक लड़की खाली खड़ी थी

तो उसको देख कर अर्जुन ने अपनी जेब से मल्होत्रा अंकल की दी हुई पर्ची निकाल कर उसकी तरफ बढ़ा दी. "ये समान यहा मिल जाएगा?"

लड़की ने सरसरी निगाह डाली और हा मे गर्दन हिला कर वो पर्ची ले ली. "आप इतने चूड़ियाँ पसंद कीजिए मैं ये समान निकालती हूँ."

अर्जुन थोड़ा निश्चिंत हो कर वापिस पहले वाली लड़की की और देखने लगा. प्रीति अलग अलग तरह की चूड़ियाँ देख रही थी की अर्जुन बीच मे बोल पड़ा, "क्या आप काली और सफेद चूड़ियों का सेट दिखा सकती है.?"

हंसकर उस लड़की ने हा कहा और फुर्ती से 12-12 चूड़ियों के 2 सेट तयार कर उनके सामने रख दिए. 2 सफेद 2 काली के हिसाब से वो बने थे.

"कमाल है यार. तुमने तो प्राब्लम एक चुटकी मे सॉल्व कर दी." प्रीति प्रशंसा के भाव से बोली.

"वो सूट भी कुछ ऐसा ही था तो मुझे लगा कि ये सही रहेंगी."

"ठीक है आप इन्हे पॅक कर दीजिए. और कोई गोल्डन गुलाबी चूड़ियों का सेट हो तो वो भी दिखा दीजिए." इतना बोलकर वो आसपास देखने लगी.

"लीजिए ये थोड़ी भारी है और लहंगे के साथ ठीक रहेंगी. दोनो हाथो मे 6 ठीक रहेंगी." लड़की अपने काम मे दक्ष थी. अर्जुन को भी वो पसंद आई.

"एक जोड़ी पायल भी दिखा दीजिए." बिना ही प्रीति की तरफ देखे उसने अगला हुकुम दिया जैसे. लड़की काउंटर से निकल कर अंदर चली गई.

अब प्रीति ने कहा, "मैने तो वैसे ही बोला था पायल के लिए."

"ड्रेस पूरी ही अच्छी लगती है. कुछ भी कम हो जाए तो वो अधूरापन एक कमी का अहसास करा ही देता है. ग़लत तो नही कहा." अर्जुन अपनी बात पर अडिग था.

"देखिए मेडम, ये सिंगल लाइन की छोटे घूंघुरू वाली पायल है. एक जो थोड़ी चौड़ी पट्टी की है और नीचे घुँगरू है. और एक ये वाली है जिसके नीचे चैन का डिज़ाइन है." जैसे ही उस लड़की ने वो सब पायल शीशे के काउंटर पर रखे अर्जुन ने छोटी छोटी चैन लगी वो पायल उठा ली. उसपर बिल्कुल ही महीन मोरपंख से बने थी जिनके नीचे जंजीर जुड़ी थी और पूरी गोलाई तक ये डिज़ाइन था.

"ये वाली पॅक कर दीजिए." उसने वो पायल लड़की की तरफ बढ़ा दी.

प्रीति बस प्यार से अर्जुन की तरफ देख रही थी. "लगता नही की किस्मत ऐसे मेहरबान होती होगी हर किसी पर." बस उसने मन मे यही सोचा.

इधर भी सारा समान पॅक कर दिया था दूसरी लड़की ने और सब जोड़कर एक पर्ची दरवाजे वाले काउंटर की तरफ बढ़ा दी समान के साथ.

"आपका सब समान का हुआ 3750/-" जो आंटी वहाँ बैठी थी उन्होने अर्जुन से कहा तो उसने उनसे 2 पर्ची बनाने को कहा.

"देखिए ये समान की अलग पर्ची बना दीजिए." उसने मल्होत्रा अंकल वाली पर्ची उनके सामने कर दी.

उसकी बात सुनकर प्रीति को थोड़ी हैरानी हुई और उसका हाथ फिर पर्स की तरफ चला गया जिसको अर्जुन ने देख लिया था. उसने अपना हाथ वही प्रीति के हाथ पर रख कर हल्के से दबा दिया. मतलब नही.

"ये सब हुआ 2800/-" अर्जुन ने वो पर्ची ले ली और उनको मल्होत्रा अंकल के पैसो से 2800 दिए और फिर अपने बटुए से 950/-. सारा समान खुद उठा लिया और

प्रीति से कहा, "मेडम चले."

वो भी हँसती हुई बाहर आ गई.

"अब अगर कहो तो मैं भी कुछ खरीद लू?" अर्जुन ने विनती ही कर दी थी अब प्रीति से.

"पहले कुछ खिलाओ फिर हम तुम्हारे लिए कुछ लेंगे." प्रीति की बात सुनकर वो सर पर हाथ रख कर चल दिया. सामने ही नटराज रेस्टा/होटल देख दोनो वहाँ चल दिए.

प्रीति ने मेनू उठा के एक पल के लिए देख फिर बोली, "मेरे लिए एक मसाला डोसा और लेमनेड. और तुम्हे क्या खाना है"
 
अर्जुन ने एक बार प्रीति को देख और फिर मेनू पर नज़र डाली. "मेरे लिए मिल्क बादाम. बस और कुछ नही." बैरा उनका ऑर्डर लेकर चल दिया 10 मिनिट का बोल कर.

"कैसा लगा यहा आकर?" प्रीति ने ये सवाल किया.

"पहले तो लगा था कि मल्होत्रा अंकल ने कहा फँसा दिया. फिर तुम पर बिनवाजह थोड़ा गुस्सा आया था.

लेकिन अब सोच रहा हूँ तो अच्छा लग रहा है. आज पहली बार मैं थोड़ा आज़ादी से घूम रहा हूँ."

"तुम्हे शायद खुद की आदत हो गई है. मेरा मतलब ये था की मेरे साथ आकर कैसा लगा." नौटंकी करने लगी थी प्रीति अब अर्जुन के साथ

और उसने भी बखूबी कहा, "कॉल अंकल ने कभी कोई सही काम किया है क्या? आज तुम्हारे साथ भेज दिया समान उठाने के लिए." और हँसने लगा.

"कितना सॉफ दिल है ये. आज भी वैसा ही है. दुनिया बदल गई लेकिन शायद इसका वक्त आज भी वही रुका हुआ है. बच्चों की तरह सॉफ, सीधा और निर्मल."

उसको हंसता देख वो लड़ने की जगह बस एकटक देखती रही.

"लीजिए आपका ऑर्डर."

प्रीति खाने लगी और अर्जुन आराम से अपना मिल्क बादाम पीने लगा. प्रीति ने उस से भी पूछा की वो उसके साथ खा ले. लेकिन उसका मन नही था. वहाँ से फारिग होकर उन्होने अर्जुन के लिए 2 जोड़ी कपड़े लिए जो प्रीति ने पसंद किए. अर्जुन ने भी खुद से उसको एक अच्छी सी हाफ पैंट जो जीन्स के कपड़े से बनी थी दिलवाई.

प्रीति ने सिर्फ़ एक बार उसको देखा था की अर्जुन ने अगले ही पल सिर्फ़ इतना पूछा था, "तुम्हारी वेस्ट कितनी है?"

"28" और उसने दुकान के अंदर जा कर वो गर्ल'स डेनिम शॉर्ट ले लिया था. अब तकरीबन 3 बज चुके थे और अर्जुन दोनो कंधो पर समान लादे प्रीति के साथ सबसे पहली दुकान की ओर चल दिया. वहाँ सूट तैयार और पॅक था. उसको लेकर दोनो जिस दिशा से आए थे उधर चल दिए.

"ये सब आएगा कैसे?" अर्जुन ने जब इतना समान देखा तो खुद से ही कहा.

"एक काम करो, ये समान और चूड़ियों वाला बैग तुम सामने स्कूटर के बॉक्स मे रख दो. तुम्हारे ड्रेस वाला बैग मेरे बैग के साथ आगे हुक के डाल दो और ये शादी वाला लहंगा मैं पकड़ कर बैठ जाउन्गी."

नारी सर्वोपरि.. मतलब औरत के पास सब समस्या का हाल होता है. और अर्जुन ने ठीक वैसा ही किया.

अब स्कूटर पर प्रीति पहले से अलग तरह से बैठी थी. उसका हाथ अब अर्जुन की कमर पर था और दूसरे हाथ मे लहंगे वाला पॅकेट. दोनो निकल पड़े

वापिस घर की तरफ. कुछ ख्वाब अनकहे से ले कर.
 
यहा मल्होत्रा जी घर अच्छी ख़ासी भीड़ लगी थी. हर तरफ चहल पहल थी और शोर हो रहा था. अर्जुन और प्रीति अंदर आए तो इधर उधर देखने लगे. आँगन मे घर की औरते गीत गा रही थी और लकड़ी के फटटे पर बैठी पलक दीदी के हल्दी रसम कर रही थी. एक फोटोग्राफर वहाँ फोटो खींच रहा था. घर मल्होत्रा जी का भी अच्छा ख़ासा था और उनका परिवार भी काफ़ी बड़ा था, जैसा आमतौर पर पंजाबी परिवार होते है.

"आओ बेटा खड़े क्यो हो वहाँ? चलो इधर आकर कुछ चाय नाश्ता करो पहले."ये मल्होत्रा जी की श्रीमती कामिनी जी थी. खूब बन- ठन कर ये बस यहा वहाँ सब काम देख रही थी तो आँगन के पास चुपचाप खड़े अर्जुन और प्रीति को देखा तो उन्होने प्यार से उन्हे अपनी तरफ बुलाया.

"नही आंटी जी पहले ही बहुत टाइम हो गया है. बस ये समान देना था आपको. वैसे भी रात को तो फिर मिलना ही है.", प्रीति ने लहंगे के पॅकेट को उन्हे देते हुए कहा. साथ ही अर्जुन ने वो मेकप के समान वाला थैला और पैसे उनके और बढ़ा दिए.

"शुक्रिया बेटा जो तुमने मेरा काम आसान कर दिया. घर मे कोई भी आदमी फ्री नही था तो तुम्हे कष्ट दिया." उन्होने समान लेते हुए अपने साथ खड़ी एक लड़की को थमाया और पैसे अपने पर्स मे रख लिए.

"कैसी बात करती हो आंटी जी आप. क्या हमारा कोई हक़ नही इतना सा काम करने का भी?" प्रीति ही

बोल रही थी. "चलो अर्जुन अब मुझे घर छोड़ दो. वहाँ भी काफ़ी काम है अभी." उसने अर्जुन को बोलते हुए ही इशारा किया बाहर चलने का.

एक बार फिर आंटी के पैर छू कर अर्जुन वही से बाहर की तरफ चल दिया.

"ये सब क्या था? वो सब लॅडीस दीदी के वो रंग और तेल क्यो लगा रहे थे?" अर्जुन ने कौतूल वश पूछ ही लिया

और स्कूटर पर उसके पीछे बैठती प्रीति ने भी मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हे लगे गी जब पता कर लेना. रस्मे होती है घर मे बहुत सारी लेकिन तुमने कभी घर मे समय बिताया हो तो ना"

दोनो अब कॉल अंकल के गेट के बाहर थे. "अच्छा एक बार अपना वाला बैग देना ज़रा." प्रीति ने अर्जुन से अपना शॉपिंग बैग लिया और अर्जुन ने स्कूटर के बॉक्स को खोल कर बाकी समान भी उसकी तरफ बढ़ाया.

"मेरे बैग मे अब क्या रह गया देखना? उसमे तो मेरा ही समान है ना?" ये बात थोड़ी हंसते हुए कही तो प्रीति को भी समझ आ गया के अर्जुन अब उस से मस्ती कर रहा है.

"अब नही देना तो ठीक है. लोग शायद तोहफा खरीद कर अपने पास ही रख लेते है." इतना कह कर वो स्कूटर के सामने से होकर जाने लगी

तो अर्जुन ने समझा के गुस्सा हो गई. जल्दबाज़ी मे उसने प्रीति का हाथ पकड़ लिया. "मेरा मतलब ये नही था. वो तो बस मैं मज़ाक कर रहा था." थोड़ा सीरियस हो कर उसने ये कहा और प्रीति पलट कर हँसने लगी..

"शकल देखो ज़रा तुम्हारी कैसे एकदम 12 बज गये है. मज़ाक सिर्फ़ तुम कर सकते हो."

और फिर उसके हाथ से बैग लेकर सबसे ऊपर वाले पॅकेट को निकल अंदर चल दी बिना फिर वापिस मुड़े.

…………………………………..
 
"आ गया बेटा?" रामेश्वर जी कौशल्या देवी के साथ आँगन मे कुर्सी डाल कर बैठे थे. वही पर 3 और लोग थे लेकिन अर्जुन उनको नही जानता था. उसने बस शिष्टाचार से उनको नमस्कार कर दिया.

"जी दादा जी. और सब समान मैने उनके घर दे दिया है. थोड़ा थक गया हूँ तो उपर आराम करने जा रहा हूँ." सामने वाली सीढ़ियो से वो उपर चल दिया. सारा समान अपनी अलमारी मे अच्छे से रखा और फिर कपड़े बदल कर बिस्तर पर लेट गया.

"मल्होत्रा अंकल के घर आज संगीत है तो फिर तो घर के सभी लोग भी जा रहे होंगे." उसने यही सोचा तो अपने आप वापिस उसके कदम पिछले आँगन की तरफ बढ़ गये. नीचे उतर कर देखा तो सिर्फ़ ललिता जी ही रसोईघर मे थी और उन्होने उसको बस प्यार से देखा. उनकी आँखों और चेहरे पर चमक थी लेकिन अर्जुन इस सब बदलाव को कहा समझता.

"वो ताइजी सब लोग कहा है.?" उसने इतना ही पूछा की कोमल दीदी के कमरे से हँसने की आवाज़ आई. ताईजी ने भी इशारा वही कर दिया और फिर वापिस काम मे लग गई.

वो शायद बाहर आए हुए मेहमानो के लिए चाय पानी का इंतज़ाम कर रही थी.

"दरवाजा तो खोलो. बंद क्यो किया है?" अर्जुन ने दरवाजा थपथपाया तो अंदर से आवाज़ आई, "कुछ ज़रूरी काम है क्या तुझे?"

ये तो माधुरी दीदी है ये भी अंदर है?" उसने मन मे सोचा और कहा, 'हा ज़रा दरवाजा तो खोलिए एक बार."

कुछ देर मे ऋतु दीदी ने दरवाजा खोला. उन्होने अपने बाल बाँधे हुए थे और एक बिना बाह की पुरानी टीशर्ट और एक ढीला पाजामा पहना था. "हा बोल क्या काम है तुझे?" अपनी कमर पर हाथ रख उन्होने ये बात कही. दोनो हाथ उनकी कमर पर थे जैसे वो दरवाजे के अंदर का कोई राज छुपा रही हो.

"ये सब लोग अंदर क्या कर रहे है? और मा भी अंदर है शायद." उसने अंदर की झलक देखी तो उसको पूरा बिस्तर 4-5 लोगो से भरा दिखा लेकिन इतना भी कुछ सॉफ ना था. फिर ऋतु दीदी के पीछे कमरे की ज़मीन पर कुछ कपड़े की कतरन सी पड़ी थी जिनपर कुछ लगा था, ऋतु ने उसकी नज़ारो का पीछा किया तो हंसते हुए दरवाजा बंद किया और बोली, "चल भाग यहा से बड़ा आया व्यॉमुकेश बक्शी. कोई काम वाँ नही है बस ये देखना है की कमरे मे हो क्या रहा है. "

दीदी की बात सुनकर कुछ सोचता हुआ वो चलने लगा तो अब ताईजी ने आवाज़ दी, "बेटा ये ज़रा बाहर पकड़ा दे तो."

अब अर्जुन रसोईघर मे दाखिल हो कर ट्रे लेने लगा तो देखा की ताईजी के हाथ पर हल्की सी लाली चाय थी और वो जगह बिल्कुल बेदाग सी थी, लेकिन दूसरा हाथ पर अभी कुछ हल्के बाल से थे.

"आपके हाथ पर कुछ गरम गिरा है क्या?" अर्जुन की बात का आशय समझ ललिता जी ने उसके सर पर चपत लगाई और उसको हैरान छोड़ कर वो भी दीदी वाले कमरे मे चली गई. बेचारा समझ कुछ ना पाया था तो ट्रे लेकर बाहर चल दिया.

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