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आशा:" ये सब कुछ आपकी मेहरबानी की वजह से हुआ हैं। मैैं तो आपको कॉल करने ही वाली थी मैडम आपने इतना कुछ किया और हम आपके लिए कुछ भी नहीं कर पाए। आप हमारी तरफ से वो एक छोटी सी भेंट होंडा सिटी गाड़ी स्वीकार कर लिजिएं"
आशा की बात खत्म होते ही रूबी का चेहरा खुशी से चमक उठा। दरसअल उसने आश को सिर्फ गाड़ी के लिए बोलने के लिए ही फोन किया था लेकिन अपने स्वाभिमान के चलते ऐसा नहीं बोल पा रही थी। वो अपने बेटे को कार गिफ्ट में देना चाहती थी और आशा ने खुद ही उसकी मुश्किल को आसान कर दिया।
आशा:" क्या सोचने लगी मैडम आप? प्लीज़ इस बार मना मत करना, मैं आपके घर के पते पर गाड़ी भेज रही हूं।
रूबी:"वैसे इसकी जरूरत तो नहीं थी लेकिन अगर आप नही मान रही हो तो ठीक हैं।
आशा:" ठीक है मैडम। अच्छा आपके लिए एक ऑफर था, लोग यहां आपसे जिम सीखने के लिए डिमांड कर रहे हैं। अगर आप शनिवार और रविवार सिर्फ दो दिन अा सके तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। आपके आने जाने का सारा खर्च और दिल्ली में जहां आप कहेगी आपको एक बंगला मिल जाएगा।
रूबी:" ठीक हैं मैं अपने परिवार में बात करके बता दूंगी आपको।
आशा:" ठीक हैं मैडम। मैं आपके जवाब का इंतजार करूंगी। और मुझे पूरी उम्मीद हैं कि आप मुझे निराश नहीं करोगी। बाय मैडम।
फोन कटने के बाद रूबी खुश हो गई कि आज वो अपने बेटे को कार गिफ्ट में दे देगी। सच में मेरे बेटे को कार देना मेरा फर्ज़ था क्योंकि रात जिस तरह से उसने अनूप की कार वापिस करी उसने मेरा दिल जीत लिया। रूबी उठी और ऑफिस बंद करने के बाद घर की तरफ चल पड़ी।
वहीं दूसरी तरफ लीमा होटल के एक कमरे में बंद होकर परेशान हो गई थी। ना कहीं अा रही थी और नहीं उसका मन कमरे में ही लग रहा था। सच पूछो तो उसे अब घुटन महसूस हो रही थी उसे लग रहा था मानो उसकी सारी आजादी छीन ली गई थी। वो आज भी उस मनहूस दिन को कोस रही थी जब उसके मा बाप बीमार लीमा के लिए इलाज के पैसे मांगने के लिए उसके बॉस के पास गए थे और उस कमीने ने उन्हें बंधक बना लिया।
लीमा का इलाज तो हुआ लेकिन उसके बदले में उसके मा बाप गिरवी रख लिए गए। लीमा मजबूर थी और इसलिए वो अपने बॉस का हर हुक्म मान रही थी। बस किसी तरह से एक बार मेरे मा बाप इसके चंगुल से निकल जाए फिर मैं इसका वो हाल करूंगी किट मेरे नाम से ही कांप उठेगा।
अनूप के साथ जो कुछ उसने किया उससे वो बहुत ज्यादा टूट गई थी और रूबी को देखने के बाद तो जैसे लीमा की रही सही हिम्मत भी जाती रही। उफ्फ मैंने एक औरत की सबसे बड़ी खुशी पर डाका डाला है।
भगवान एक दिन मुझे मेरे गुनाहों कि सजा जरूर देगा। ये सब सोचते सोचते आज फिर से लीमा की आंख भर आई और गहरी सोच में फिर से डूब गई।
अनूप बुरी तरह से बेइज्जत होकर घर से निकल गया। उसे समझ नहीं अा रहा था कि जो कुछ भी रात हुआ वो उसका जिम्मेदार किसे माने।
रूबी को तो वो जानता था कि वो उसके खिलाफ हैं लेकिन साहिल ने अपने बाप पर हाथ उठाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा। मुझ पर हाथ उठा दिया और अब गाड़ी भी वापिस कर दी। ये सब इस कमीनी रूबी का ही किया धरा हैं। मैं इसे देख लूंगा।
अपने विचारों में डूबा हुआ अनूप ऑफिस पहुंच गया तो देखा कि बैंक वाले आए हुए थे। उन्हें देखते ही अनूप का मूड खराब हो गया पूरी तरह से।
अनूप:" अरे मैनेजर साहब आपने यहां आने की तफ्लीफ क्यों करी मुझे ही बुला लिया होता।
मैनेजर:" मेरे बुलाने से आप आते ही कहां हो श्रीमान जी ? लॉन क्यों नहीं भर रहे हो आप ?
अनूप:" बस सर कुछ ही दिन की बात हैं मुझे टेंडर मिल गया है, एक दो दिन में काम शुरू हो जाएगा। फिर सारा लॉन एक साथ फाइनल कर दूंगा।
मैनेजर:" आप पिछले छह महीनों से हमे गोली दे रहे हो, एक बार साफ साफ़ बोल दो तो हम कानून का सहारा ले लेंगे।
अनूप:" बस सिर्फ कुछ दिनों की मोहलत और दे दीजिए। फिर आपको शिकायत का मोका नहीं दूंगा।
मैनेजर:" लेकिन ध्यान रखना, ये आखिरी मौका होगा, उसके बाद सीधे कानून के हिसाब से होगा सब कुछ।
अनूप ने अपने दोनो हाथ बैंक मैनेजर के आगे जोड़ दिए और बोला:"
" आप निश्चिन्त रहे। मैं इस बार आपको निराश नहीं करूंगा।
अनूप की बात पूरी होते ही बैंक मैनेजर उठा और चला गया जबकि अनूप आज और ज्यादा दुखी हो गया। चारो तरफ से उस पर मुसीबत अा रही थी और ये तो बस एक नीरज ही था जो उसके साथ खड़ा हुआ था।
आशा की बात खत्म होते ही रूबी का चेहरा खुशी से चमक उठा। दरसअल उसने आश को सिर्फ गाड़ी के लिए बोलने के लिए ही फोन किया था लेकिन अपने स्वाभिमान के चलते ऐसा नहीं बोल पा रही थी। वो अपने बेटे को कार गिफ्ट में देना चाहती थी और आशा ने खुद ही उसकी मुश्किल को आसान कर दिया।
आशा:" क्या सोचने लगी मैडम आप? प्लीज़ इस बार मना मत करना, मैं आपके घर के पते पर गाड़ी भेज रही हूं।
रूबी:"वैसे इसकी जरूरत तो नहीं थी लेकिन अगर आप नही मान रही हो तो ठीक हैं।
आशा:" ठीक है मैडम। अच्छा आपके लिए एक ऑफर था, लोग यहां आपसे जिम सीखने के लिए डिमांड कर रहे हैं। अगर आप शनिवार और रविवार सिर्फ दो दिन अा सके तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। आपके आने जाने का सारा खर्च और दिल्ली में जहां आप कहेगी आपको एक बंगला मिल जाएगा।
रूबी:" ठीक हैं मैं अपने परिवार में बात करके बता दूंगी आपको।
आशा:" ठीक हैं मैडम। मैं आपके जवाब का इंतजार करूंगी। और मुझे पूरी उम्मीद हैं कि आप मुझे निराश नहीं करोगी। बाय मैडम।
फोन कटने के बाद रूबी खुश हो गई कि आज वो अपने बेटे को कार गिफ्ट में दे देगी। सच में मेरे बेटे को कार देना मेरा फर्ज़ था क्योंकि रात जिस तरह से उसने अनूप की कार वापिस करी उसने मेरा दिल जीत लिया। रूबी उठी और ऑफिस बंद करने के बाद घर की तरफ चल पड़ी।
वहीं दूसरी तरफ लीमा होटल के एक कमरे में बंद होकर परेशान हो गई थी। ना कहीं अा रही थी और नहीं उसका मन कमरे में ही लग रहा था। सच पूछो तो उसे अब घुटन महसूस हो रही थी उसे लग रहा था मानो उसकी सारी आजादी छीन ली गई थी। वो आज भी उस मनहूस दिन को कोस रही थी जब उसके मा बाप बीमार लीमा के लिए इलाज के पैसे मांगने के लिए उसके बॉस के पास गए थे और उस कमीने ने उन्हें बंधक बना लिया।
लीमा का इलाज तो हुआ लेकिन उसके बदले में उसके मा बाप गिरवी रख लिए गए। लीमा मजबूर थी और इसलिए वो अपने बॉस का हर हुक्म मान रही थी। बस किसी तरह से एक बार मेरे मा बाप इसके चंगुल से निकल जाए फिर मैं इसका वो हाल करूंगी किट मेरे नाम से ही कांप उठेगा।
अनूप के साथ जो कुछ उसने किया उससे वो बहुत ज्यादा टूट गई थी और रूबी को देखने के बाद तो जैसे लीमा की रही सही हिम्मत भी जाती रही। उफ्फ मैंने एक औरत की सबसे बड़ी खुशी पर डाका डाला है।
भगवान एक दिन मुझे मेरे गुनाहों कि सजा जरूर देगा। ये सब सोचते सोचते आज फिर से लीमा की आंख भर आई और गहरी सोच में फिर से डूब गई।
अनूप बुरी तरह से बेइज्जत होकर घर से निकल गया। उसे समझ नहीं अा रहा था कि जो कुछ भी रात हुआ वो उसका जिम्मेदार किसे माने।
रूबी को तो वो जानता था कि वो उसके खिलाफ हैं लेकिन साहिल ने अपने बाप पर हाथ उठाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा। मुझ पर हाथ उठा दिया और अब गाड़ी भी वापिस कर दी। ये सब इस कमीनी रूबी का ही किया धरा हैं। मैं इसे देख लूंगा।
अपने विचारों में डूबा हुआ अनूप ऑफिस पहुंच गया तो देखा कि बैंक वाले आए हुए थे। उन्हें देखते ही अनूप का मूड खराब हो गया पूरी तरह से।
अनूप:" अरे मैनेजर साहब आपने यहां आने की तफ्लीफ क्यों करी मुझे ही बुला लिया होता।
मैनेजर:" मेरे बुलाने से आप आते ही कहां हो श्रीमान जी ? लॉन क्यों नहीं भर रहे हो आप ?
अनूप:" बस सर कुछ ही दिन की बात हैं मुझे टेंडर मिल गया है, एक दो दिन में काम शुरू हो जाएगा। फिर सारा लॉन एक साथ फाइनल कर दूंगा।
मैनेजर:" आप पिछले छह महीनों से हमे गोली दे रहे हो, एक बार साफ साफ़ बोल दो तो हम कानून का सहारा ले लेंगे।
अनूप:" बस सिर्फ कुछ दिनों की मोहलत और दे दीजिए। फिर आपको शिकायत का मोका नहीं दूंगा।
मैनेजर:" लेकिन ध्यान रखना, ये आखिरी मौका होगा, उसके बाद सीधे कानून के हिसाब से होगा सब कुछ।
अनूप ने अपने दोनो हाथ बैंक मैनेजर के आगे जोड़ दिए और बोला:"
" आप निश्चिन्त रहे। मैं इस बार आपको निराश नहीं करूंगा।
अनूप की बात पूरी होते ही बैंक मैनेजर उठा और चला गया जबकि अनूप आज और ज्यादा दुखी हो गया। चारो तरफ से उस पर मुसीबत अा रही थी और ये तो बस एक नीरज ही था जो उसके साथ खड़ा हुआ था।