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mastram kahani एक अधूरी प्यास.... 2

सरला चाची के वापस जाते ही निर्मला ने राहत की सांस ली लेकिन सरला चाची की बातों ने निर्मला को कशमकश में डालकर रख दिया था। क्योंकि एक मां होने के नाते निर्मला अच्छी तरह से जानती थी कि उसके बेटे को कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी... लेकिन सरला उसे अभी अभी बता कर गई थी कि उसके बेटे को कद्दू की सब्जी अच्छी लगती है और वह घर पर खाने का उसे आमंत्रण भी दे गई थी.. इसलिए निर्मला को कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वह कपड़ों को इकट्ठा करके नीचे कमरे में ले आई.. और शुभम का इंतजार करने लगी..
थोड़ी ही देर में डोर बेल की आवाज सुनते ही निर्मला जल्दी-जल्दी दरवाजा खोलने के लिए गई क्योंकि वह जानती थी कि शुभम वापस आ गया है।
दरवाजा खुलते ही शुभम मुस्कुराते हुए घर के अंदर आया और उसे मुस्कुराता हुआ देखकर जवाब में निर्मला भी मुस्कुरा दी और वह दरवाजा बंद कर दी।

क्या बात है आज बहुत खुश नजर आ रहा है। (निर्मला दरवाजा बंद करके अपने बेटे... की तरफ आगे बढ़ते हुए बोली...)

मैं तो हमेशा खुश रहता हूं मम्मी...

मैं इस खुशी की वजह जान सकती हूं (निर्मला अपने दोनों हाथ को बांधते हुए बोली।)

तुम ......हां तुम मेरी खुशी की वजह हो ..(शुभम आगे बढ़कर अपनी मां के गले में बाहें डालता हुआ बोला)

मैं .....लेकिन मैं कैसे...?

अरे मम्मी इतना भी नहीं जानती मेरी खुशी की वजह तुम हो क्योंकि तुम मुझे कितना खुश रखती हो मेरा इतना ख्याल रखती हो और तो और दूसरे तरीके से भी मेरा कितना ख्याल रखती हो......(शुभम अपनी मां की आंखों में आंखें डालता हुआ बोला)

दूसरे तरीके से मतलब मैं कुछ समझी नहीं....( निर्मला अनजान बनते हुए बोली)

अच्छा अब इतना भी अनजान मत बनो कि मेरे कहने का मतलब ना समझ रही हो मैं सब जानता हूं कि तुम अच्छी तरह से जानती हो कि मैं क्या कहना चाहता हूं।

नहीं मैं बिल्कुल नहीं समझी तू मुझे ठीक से समझ आएगा तब ना मैं समझूंगी कि तू क्या कहना चाहता है ।(नीम्रला जानबूझकर चुटकी लेते हुए बोली)

बताऊ किस तरह से....(शुभम बड़ी गहराई से अपनी मां की आंखों में जागता हुआ बोला निर्मला को अपने बेटे की आंख में कुमारी की चमक साफ नजर आ रही थी वह अच्छी तरह से समझ रही थी कि वह क्या करना चाह रहा है लेकिन निर्मला को भी अच्छा लग रहा था इसलिए वह भी शरारती अंदाज में बोली.)

बताना ....मैं तो जानना चाहती हूं कि दूसरे तरीके से मैं कैसे तुझे खुश रखती हूं।

रुको अभी बताता हूं....(बातों ही बातों में शुभम काफी उत्तेजित हो चुका था इस तरह से अपनी मां के गले में बाहें डाल कर खड़े रहने की वजह से और एकदम करीब रहने की वजह से निर्मला के बदन से आ रही माता खुशबू उसके बदन में उत्तेजना की लहर बढ़ा रहे थे और ब्लाउज में कैद निर्मला की दोनों बड़ी-बड़ी चूचियां उसके सीने से स्पर्श हो रही थी जिसकी वजह से उसके बदन में गर्माहट बढ़ती जा रही थी.... शुभम अपने होठों को अपनी मां के तपते हुए होठों के करीब ले जाने लगा घर में इस समय दोनों के सिवा तीसरा कोई भी नहीं था इसलिए दोनों जब चाहे तब एक दूसरे से छेड़खानी कर लेते थे और इस पल का भरपूर फायदा उठाते थे शुभम के होठ निर्मला के मदमस्त होठ के करीब होते जा रहे थे....एक बार फिर से निर्मला के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी तन बदन में उत्तेजना की चिंगारी भड़कने लगी थी। जैसे-जैसे शुभम के प्यासे होठ निर्मला के तपते हुए होठों के करीब आ रहे थे वैसे वैसे निर्मला उत्तेजना के मारे सूखे हुए पत्ते की तरह फड़फड़ा रही थी शुभम दोनों हाथों में अपनी मां के चेहरे को इस तरह से ले लिया था मानो गुलाब के फूल को अपनी हथेली में संभाल कर भर लिया हो।
दोनों के चेहरे इतने करीब हो गए थे कि दोनों की नसों में से निकल रही गर्म सांसों की हवा चेहरे पर पड़ते ही वाष्प की तरह घुल जा रही थी।
दोनों बैठक घर में खड़े थे । जबसे निर्मला को इस बात का आभास हुआ है कि उनकी पड़ोस की सरला चाची उन दोनों पर नजर रख रही है तब से वह घर की खिड़कियों के पर्दे हमेशा लगाकर रखते थे ताकि कुछ भी नजर ना आए इसलिए वह निश्चिंत थी। दोनों एक दूसरे की बाहों में थे शुभम धीरे-धीरे अपने होंठ को अपनी मां के होठों के एकदम करीब ले आया वह अपनी मां की खूबसूरत चेहरे को अपने दोनों हथेली से संभाले हुए था और देखते ही देखते शुभम ने अपने होंठ को अपनी मां की गुलाबी होंठ पर रखकर उन्हें पागलों की तरह चूसना शुरू कर दिया अपने बेटे की इस हरकत की वजह से निर्मला काफी उत्तेजित हो गई थी और वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए अपने होठों को खोल दी और उसके होठों को मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दी दोनों जितना हो सकता था एक दूसरे के होठों से चासनी चुस लेना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे को किसी इंग्लिश मूवी के हीरो हीरोइन की तरह चुंबन कर रहे थे पल भर में ही दोनों एकदम मदहोश हो गए अपनी मां के मदमस्त होंठों को चूसने से शुभम को ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वह अपनी मां के होठों को नहीं बल्कि किसी बेहतरीन इंग्लिश दारू की बोतल को मुंह से लगाया हो उसके बदन में नशा की खुमारी छाने लगी आंखों में मदहोशी का आलम इस कदर छाने लगा कि अपने आप ही उसकी आंखें बंद होने लगी और यही हाल निर्मला का भी हो रहा था उसकी भी आंखे मस्ती में बंद होने लगी वह अपनी बाजुओं में अपने बेटे को भरकर चुंबन का मजा ले रही थी और शुभम अपने दोनों हाथों को नीचे की तरफ ले जाकर अपनी मां की कमर के नीचे के उपहार को अपनी हथेली में भर कर दबाना शुरू कर दिया और लगातार अपनी मां के होठों को चूसता चला जा रहा था।
निर्मला चुदवासी होने लगी थी.. उसकी बुर चुदासपन से भरी जा रही थी जिसकी वजह से उसमें से लगातार नमकीन मधुर रस बहने लगा था और उसकी पेंटी उसके मधुर रस से गीली होने लगी थी।
शुभम का लंड पेंट के अंदर गदर मचाया हुआ था जो कि अब खड़क होने के बाद निर्मला की टांगों के बीच साड़ी के ऊपर से ही शिरकत कर रहा था लेकिन उसका कठोरपन इतना ज्यादा मजबूत था कि निर्मला को अपनी कचोरी जैसी फूली हुई बुर पर उसकी दस्तक बराबर महसूस हो रही थी।

दोनों दुनिया को भूल कर एक दूसरे के होठों की चुसाई करने में लगे थे। शुभम का मोटा तगड़ा लंड एक बार फिर से अपनी औकात में आ गया था जोकि पजामे के बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रहा था। शुभम अपनी मां के होठों को ऐसे चूस रहा था जैसे कि उस पर रसमलाई लगी हो वह लगातार अपनी मां के लाल लाल होंठों को चूसता चला जा रहा था। उत्तेजना के मारे निर्मला का खूबसूरत चेहरा सुर्ख हो चुका था उत्तेजना के मारे गला सूख रहा था।निर्मला को अपने बेटे की यही अदा तो बहुत अच्छी लगती है कि कभी भी वह मूड बना देता है और ऐसा अभी भी हो रहा था निर्मला की चुदवासी बुर किसी गुब्बारे के भांति फूल पिचक रही थी। पूरे घर में केवल दोनों के मुख से चुम्मा चाटी और गर्म सिसकारी की आवाज ही आ रही थी।
पल भर में माहौल पूरी तरह से बदल गया था दोनों पर मदहोशी का आलम अपना असर दिखा रहा था।
शुभम का लंड पूरी तरह से तैयार था निर्मला की रसीली बुर के अंदर जाने के लिए बस उसे रास्ता दिखाने की जरूरत थी। जो कि अभी तक साड़ी के ऊपर से ही दोनों टांगों के बीच खुली हुई बुर पर ठोकर मार रहा था। और इस ठोकर को खाकर निर्मला की बुर पेंटी के अंदर होने के बावजूद भी हल्की सी खुल गई थी जो कि उसकी तरफ से लंड को पूरी तरह से स्वीकृति थी कि वह अंदर आ सकता है। और बुर की आत्मसमर्पण को देखकर लंड का हौसला बढ़ने लगा था वह और जोर-जोर से बुर के ऊपर दस्तक दे रहा था ऐसा लग रहा था मानो कि वह निर्मला की बुर पर अपने नाम का सिक्का लगा रहा हो।

निर्मला भी अपने बेटे की मोटी तगड़ी लंड की ठोकर को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी वह उसे अपनी बुर की गहराई में लेने के लिए मचल रही थी। अपने बेटे के इस तरह के लाजवाब चुंबन का नशा उसके ऊपर पूरी तरह से छा चुका था आंखों में मदहोशी का आलम अपने अंदर समाने को बेकरार कर दिया था।

शुभम होंठों की चुसाई जारी रखते हुए अपना हाथ निर्मला के बदन पर चारों तरफ घुमा रहा था अब उससे बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हुआ जा रहा था वह अपने हाथ नीचे की तरफ ले जाकर अपने दोनों हाथों में साड़ी पकड़ कर ऊपर की तरफ उठाने लगा लेकिन जानबूझकर निर्मला उसे रोकने की कोशिश करते हुए उसके हाथ को पकड़ लिया और अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने लगी लेकिन अत्यधिक उत्तेजना का असर शुभम पर साफ नजर आ रहा था वह जबरदस्ती अपनी मां की साड़ी को ऊपर की तरफ उठा रहा था। निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को ऊपर उठा दे रहा था। इस तरह से दोनों तरफ से जोर-जबर्दस्ती हो रही थी और इस जोर-जबर्दस्ती में निर्मला को मजा आ रहा था। वह जानबूझकर शुभम को रोक रही थी ताकि वह देख सके कि सुभम उसके साथ क्या कर सकता है....हालांकि छेड़खानी में जोर जबरदस्ती में निर्मला को अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी.
होठ चुसाई का लगातार आनंद लेते हुए निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को पीछे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को पर उठा दे रहा था। शुभम पूरी तरह से न चुदवासा हो चुका था अपनी मां का इस तरह से रोकना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। वह उतावला हो चुका था अपनी मां की बुर में लंड डालने के लिए ... अपनी मां की हरकत देखकर उसे और कोई रास्ता नजर ना आता देखकर वह दोनों हाथों को अपनी मां की नितंबों के उभार के निचले हिस्से पर रखकर उसे उठा लिया कर जल्दी-जल्दी उसे चार पांच कदम चल कर दीवार से सटा दिया.... निर्मला तो अपने बेटे की भुजाओं की ताकत देखकर हैरान रह गई.. वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि उसका बेटा उसे इस तरह से उठा लेगा जैसे कि कपड़े का गट्ठर हो वह भली भांति जानती थी कि उसका वजन कुछ ज्यादा ही था लेकिन उसके बेटे ने अपनी ताकत दिखाते हुए उसे बड़े आराम से अपनी गोद में उठाकर उसे दीवार से सटा दिया था इस बात का एहसास उसे अंदर तक उत्तेजित कर गया था उसकी बुर से लगातार नमकीन पानी बह रहा था... दीवार से लगाते ही शुभम अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया और एक हाथ से उसकी पेंटी को नीचे की तरफ सरका ते हुए घुटनों तक ला दिया.... रास्ता एकदम साफ था दो टांगों के बीच उसे अपनी मंजिल नजर आ रही थी। वह बिना वक्त गवाएं एक हाथ से अपने पेंट की बटन खोलने लगा दो कि अभी भी निर्मला जानबूझकर अपनी साड़ी को नीचे करने की नाकाम कोशिश कर रही थी। और देखते ही देखते शुभम अपने हाथ में अपने खड़े लंड को पकड़ कर ही नाता हुआ उसे अपनी मां की दोनों टांगों के बीच लगा दिया जो कि इस समय निर्मला के बुर किसी भट्टी की तरह तप रही थी।
निर्मला निर्मला उसे बिना बोले उसे रोकने की कोशिश करती रही और शुभम अपनी मनमानी करते हुए अपने लंड को अपनी मां की बुर के अंदर धीरे-धीरे करके पूरा डाल दिया....
निर्मला अपने बेटे की हरकत की वजह से आनंद से सराबोर हो गई उसे अपने बेटे की जबरदस्ती बहुत अच्छी लग रही थी शुभम का लंड पूरा बुर में समाया हुआ था। जिसे शुभम धीरे धीरे अंदर बाहर करता हुआ चोदना शुरू कर दिया था।
आखिर कब तक निर्मला दिखावे का नाटक करके अपने मजे को किरकिरा कर दी वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए उसके कंधे पर हाथ रखकर और अपनी नजर को नीचे की तरफ करके अपने बेटे के खातिर लंड को अपनी बुर की गहराई में अंदर बाहर होता हुआ देखकर चुदाई का मजा लेने लगी। अब दोनों के बीच किसी भी प्रकार का संवाद नहीं हो रहा था क्योंकि अब दोनों के बीच वार्तालाप केवल उनके लंड और बुर कर रहे थे जिसमें से ठाप ठाप की आवाज लगातार गूंज रही थी। शुभम को बहुत मजा आ रहा था वह ब्लाउज के ऊपर से यह अपनी मां की बड़ी-बड़ी चुचियों को दबाता हुआ अपनी कमर को आगे पीछे करके चोद रहा था। निर्मला काफी उत्तेजित हो चुकी थी उसे आज एक नया अनुभव मिला था क्योंकि दोनों के बीच ड्राइंग रूम में ही एक अद्भुत संभोग का दृश्य रचा जा रहा था ‌। जो कि दोनों को उम्मीद भी नहीं थी कि इस तरह से दोनों चुदाई का आनंद लूटेंगे। शुभम लगातार किसी मशीन की तरह अपनी कमर को हीला रहा था।
निर्मला अपने बेटे की आंखों में झांकते हुए उसके दमदार लंड की ठोकर को अपनी बुर की गहराई में महसूस कर रही थी उसकी आंखों में साफ नजर आ रहा था कि वह अपने बेटे से कहना चाह रही थी कि और जोर जोर से धक्के लगाए और जैसे शुभम एक अनुभवी मर्द की तरह अपनी मां की आंखों में उसके दिल के जज्बात को पढ़कर जोर जोर से अपनी कमर को हिलाने लगा। पूरे कमरे में निर्मला की सिसकारी की आवाज गुंजने लगी....
शुभम अपनी मां की कमर थामे हुए जोर जोर से धक्के लगा रहा था उसका हर एक प्रहार निर्मला के मुख से आह निकाल दे रही थी लेकिन इस आह में भी सुकून और आनंद छिपा हुआ था। शुभम कुछ देर तक ऐसे ही अपनी मां की चुदाई करता रहा उसकी रफ्तार एक पल के लिए भी कम नहीं हो रही थी वह एक हाथ से चूची दबा रहा था और दूसरे हाथ से कमर पकड़कर उसे मसल रहा था जिससे निर्मला को और ज्यादा मजा आ रहा था।
निर्मला पूरी तरह से भाव विभोर होकर अपने बेटे से चुदने का आनंद लूट रही थी। हालात पूरी तरह से कैसे बदल गए उसे खुद समझ में नहीं आया क्योंकि कुछ देर पहले अपने बेटे से सरला चाची के दिए गए आमंत्रण के बारे में पूछताछ करना चाहती थी लेकिन शुभम के घर में आते ही जिस तरह से एकाएक दोनों के बीच चुंबन की बौछार होने लगी और वह बौछार अब घमासान चुदाई में बदल चुकी थी और निर्मला अपनी बात भूल चुकी थी और जुदाई का आनंद ले रही थी।
निर्मला अपने बेटे की हर तबके के साथ अपनी कमर को पीछे की तरफ कर दे रही थी क्योंकि शुभम कुछ ज्यादा ही जोर लगाकर धक्के मार रहा था और यह बात शुभम को अच्छी तरह से पता चल रही थी लेकिन उसे बहुत मजा आ रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वह अपना लंड पूरी तरह से बाहर निकाल दिया जो कि अभी भी पानी निकला नहीं था जिसका मतलब साफ था कि शुभम का मन भरा नहीं था और ना ही निर्मला का मन कर रहा था कि अपने बेटे के लंड को अपनी बुर से बाहर निकाल ले लेकिन शुभम के मन में कुछ और चल रहा था वह अपनी मां की बुर से लंड बाहर निकाल कर उसके कंधों को पकड़कर घुमाने की कोशिश करने लगा और अपने बेटे का इशारा समझ कर निर्मला अपनी साड़ी को दोनों हाथों से कमर तक उठाए खड़ी होकर अपनी टांगों का सहारा लेकर घुटनों में फंसी पेंटी को पैरों से बाहर निकालने लगी और अगले ही पल उसकी गीली पैंटी फर्श पर पड़ी थी और वह दीवार की तरफ मुंह करके अपनी साड़ी को दोनों हाथों से उठा है अपनी मदमस्त गांड को किसी दुश्मन की तरफ लगाए जाने वाली तोप की तरह ऊपर की तरफ उठा दी.... शुभम को और क्या चाहिए था बिना बोले ही उसकी मां उसका इशारा समझ गई थी ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी भूखे के सामने स्वादिष्ट व्यंजन से भरी थाली रख दी गई हो वह अपनी भूख मिटाने के लिए उस थाली पर टूट पड़ा और शुभम अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड को पकड़कर एक बार फिर से उसके अंदर समा गया और जोर जोर से धक्के लगाते हुए उसे चोदना शुरु कर दिया पूरे कमरे में गर्म सिसकारी की आवाज किसी मधुर ध्वनि की तरह बज रही थी। तकरीबन 35 मिनट की घमासान चुदाई के बाद दोनों की सिसकारी की आवाज तेज हो गई और दोनों एक साथ झड़ गए।...
निर्मला की सांस इतनी तेज चल रही थी कि मानो जैसे अभी रुक जाएगी... शुभम का भी यही हाल था घर में आने से पहले उसे उम्मीद नहीं थी कि इस वक्त उसे जबरदस्त चुदाई का सुख भोगने को मिलेगा... जिससे अनायास ही मिले इस सुख से वह पूरी तरह से तृप्त हो चुका था....

निर्मला अपने कपड़े व्यवस्थित करके फर्श पर से अपनी पूरी तरह से गिरी हुई पेंटी को उठाकर जाने लगी तो शुभम बोला...

पहनोगी नहीं क्या.....?
(इतना सुनकर वहां रुक गई और अपने बेटे की तरफ मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए उसके करीब आई और अपने दोनों हाथ में पेंटी को फैलाते हुए उसकी आंखों के सामने दिखाते हुए बोली।)

पहनने लायक तूने छोड़ा है क्या...
(शुभम साफ-साफ देख पा रहा था कि उसकी मां की पैंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी जो कि पहनने लायक बिल्कुल भी नहीं थी वह मुस्कुराता हुआ बोला...)

अब इसमें मेरी क्या गलती है तुम पानी इतना छोड़ती हो....

तुझसे तो भगवान बचाए....( इतना कहकर वो मुस्कुराते हुए जाने लगी लेकिन तभी उसे एकाएक सरला की बात याद आ गई और वह रुक कर बोली)

तुझे कद्दू की सब्जी कब से पसंद आने लगी ..

क्यों क्या हुआ ....?(शुभम अपने पेंट की बटन बंद करता हुआ बोला)

सरला चाची कह रही थी कि तुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और आज तुझे खाने पर बुलाई है।

क्या बात कर रही हो मम्मी सच्ची ...(शुभम चाहते हुए बोला)

बड़ा खुश हो रहा है कुछ और इरादा है क्या... जहां तक मैं जानती हूं कि तुझे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं है तो यह एकाएक तेरी फेवरेट सब्जी कैसे बन गई।

मम्मी इसमें बहुत बड़ा राज है।

राज ......कैसा राज .....

मम्मी तुम ही बता रही थी ना कि पड़ोस वाली सरला चाची को हम दोनों पर थोड़ा थोड़ा शक होने लगा है.... (निर्मला अपने बेटे की बात को बड़े ध्यान से सुन रही थी.. और वह अपने बेटे की बात सुनकर जवाब में हां में सिर हिला दी।)
तो मैं उनके इसी शक को दूर करने के लिए उनके छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा हूं।ऐसे ही उस दिन में बाजार से लौट रहा था तो सरला चाची को दो थैला उठाकर जाते हुए देखा तो उनकी मदद करने के बहाने में उनसे दोनों थे ना अपने हाथ में लेकर उनकी मदद करने लगा और बाती बाद में मुझे पता चला कि उन्होंने कद्दू भी खरीद रखी है और मेरे मुंह से निकल गया कि मुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और मैं अपने संस्कार का ऐसा असरदिखाया कि वह मेरे से पूरी तरह से इंप्रेस हो गई मैं आए दिन उनका छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा और वह उस दिन मुझे प्रॉमिस की थी कि जब भी वह कद्दू की सब्जी बनाएगी तो वह मुझे जरूर बनाएंगी....(निर्मला अभी भी अपनी बेटी की बात को गौर से सुन रही थी. और शुभम तो यही चाहता था कि शरदा चाची का ध्यान उन दोनों पर से हट जाए ताकि उन दोनों को किसी बात का डर ना रहे और उसके मन में सरला चाची और उनकी बहू दोनों को भौं डने का ख्याल मन में चल रहा था...और इस बात की भनक हो अपनी मां को नहीं होने देना चाहता था इसलिए अपनी बात को गोल-गोल घुमा कर समझा रहा था क्योंकि अच्छी तरह से जानता था किसी दल को लेकर उसके साथ कैसा बखेड़ा खड़ा हुआ था इसलिए वह नहीं चाहता था कि इन दोनों को लेकर भी उसकी मां का दिल टूटे और जो खिचड़ी उसने सरला चाची और उसकी बहू को लेकर पकाने की सोच रखा है वह कच्ची ही रह जाए।) और जिस तरह से हमें उनकी इज्जत करता हुआ उनके छोटे-मोटे में काम में मदद कर रहा हूं उसका ही नतीजा है कि आज वह मुझे खाने पर बुला रही है।
देखा मम्मी मैं अपनी बातों के जादू में उनको ऐसा फंसा लूंगा कि वह हम दोनों के ऊपर कभी शक भी नहीं कर पाएंगी की मैं उस तरह का लड़का हूं।

अपने बेटे की यह बात सुनकर निर्मला खुश हो गई क्योंकि वह किसी भी तरह से सरला चाची से पीछा छुड़ाना चाहती थी इसलिए अपने बेटे के गाल पर हल्के से हाथ रखते हुए बोली।

तो बहुत समझदार हो गया है बेटा और अब जल्दी से जा कर तैयार हो जा समय पर चले जाना... इतना कहकर निर्मला बाथरूम की तरफ चली गई हो शुभम उसे जाता हुआ देखता रहा और अपने अगले प्लान के बारे में सोचने लगा....
 
शुभम काफी खुश नजर आ रहा था आखिरकार निमंत्रण जो मिला था सरला चाची की तरफ से हालांकि उसे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी लेकिन सरला और उनकी बहू रुचि के करीब रहने का बहाना जो मिल गया था इसलिए अब उसे कद्दू की सब्जी खाने में कोई दिक्कत नहीं थी। .... वैसे भी निमंत्रण भले भोजन का मिला था लेकिन स्वाद उसे सरला चाची और उसकी बहू रुचि के खूबसूरत बदन का चखना था। उसे कद्दू की सब्जी की महकसे नहीं बल्कि दोनों औरतें के बदन से उठने वाली मादक खुशबू से आनंद लेना था उनकी बेहतरीन जवानी जो कि एक की तो ढलने को थी लेकिन फिर भी कसाव भरी जवानी से भरपूर उसके अंग अंग से टपक रहे मधुर रस का स्वाद किसी जवान औरत से कम नहीं था और दूसरी चौकी जवानी की दहलीज लांघ चुकी थी और अपनी बेहतरीन रुबाब पे थी। ... शुभम के लिए इस समय दोनों औरतें बहुत खूबसूरत और मदहोश कर देने वाली जवानी से भरी हुई थी जिसके नशे में वह अपने आप को भुलाना चाहता था।
शुभम इस तरह की पहली मुलाकात में दोनों को अपने आकर्षण में बांध लेना चाहता था अपने बातों के जादू मेंदोनों को सम्मोहित कर लेना चाहता था जिसमें वह किसी भी प्रकार की कसर बाकी रखना नहीं चाहता था इसलिए वह पूरी तैयारी के साथ जाना चाहता था इसलिए वह बाथरूम में जाकर अच्छे से नहा कर फ्रेश हो गया था और अच्छे कपड़े पहन कर... परफ्यूम का छिड़काव करके हुआ है अपने कमरे से निकल गया....
तैयार होते-होते तकरीबन 8:00 बज चुके थे। वह पड़ोस के घर में पहुंचकर डोर बेल बजाने लगा... दो-तीन बार बार जाने के बाद दरवाजा खुला तो सामने रुचि को देखकर उसका अंग-अंग कसरती अंदाज में अंगड़ाई लेने लगा। शुभम रुचि के खूबसूरत चेहरे को देखा तो देखता ही रह गया एक अजीब सा भोलापन और मदहोश कर देने वाला हर एक अदा रुचि के चेहरे में था। रुचि अच्छी तरह से जानती थी कि इस समय सुभम ही आने वाला है... इसलिए तो उसकी सास ने उसे कद्दू की सब्जी बनाने को बोली थी। शुभम एकटक रुचि कोई देखे जा रहा था जोकि रुचि इस तरह से देखे जाने पर शर्मा गई थी... और शरमाते हुए बोली।

ऐसे क्या देख रहा है ऐसे मत देखा कर मुझे शर्म आ रही है...

मैं देख रहा हूं कि आसमान से चांद उतरकर नीचे जमीन पर आ गया है और आया भी तो आया कहा मेरे पड़ोस में..(शुभम आराम से दरवाजे पर ही दीवार का टेका लेते हुए बड़े ही शांत स्वर में बोला..)

धत्त तू ऐसी बातें मत किया कर कोई सुन लेगा तो क्या सोचेगा...(रुचि उसी तरह से शरमाते हुए बोली)

कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा अरे मैं कौन सा तुम्हें भला बुरा कह रहा हूं मैं तो तुम्हारी तारीफ कर रहा हूं।

मैं जानती हूं कि तू मेरी तारीफ कर रहा है लेकिन इस तरह से तारीफ करने का हक हर किसी को नहीं होता।

तो किसे होता है बताओ? (शुभम रुचि के खूबसूरत चेहरे की तरफ देखते हुए बोला... जहां से उसकी नजर सीधे गर्दन के नीचे दोनों चुचियों के बीच बनी गहरी घाटी की तरफ जा रही थी जो कि बहुत ही मनमोहक लग रही थी...)

मुझे नहीं पता....

मुझे नहीं पता अरे अभी तो तुम कह रही थी कि इस तरह की बातें करने का हक सबको नहीं होता तो किसको होता है वही तो पूछ रहा हूं।

मैं नहीं बताऊंगी.....

बता दो ना भाभी.....

मुझे देर हो रही है मुझे खाना बनाना है इसलिए तो तुझे यहां बुलाए हैं और कहींदेर हो गई तो मम्मी जी ने मुझ पर बिगड़ेगी मुझे खाना बनाने दे....

तो मैंने कहा तुम्हें रोका हूं... एक तो घर बुलाकर अंदर आने को भी नहीं कह रही हो और ऊपर से मुझे ही भला बुरा कह रही हो....

(शुभम की बातें सुनकर रुचि को इस बात का अहसास हुआ कि दोनों अभी तक दरवाजे पर ही खड़े थे और वह उसे अंदर आने के लिए बोली भी नहीं थी इसलिए अपनी गलती का एहसास होते ही वह बोली।)

सॉरी ......सॉरी में भूल ही गई तो बातें ही ऐसी करता है कि मैं सब कुछ भूल जाती हूं.... आप जालंधर आजा मुझे दरवाजा बंद करने दे...
(इतना सुनते ही शुभम घर में प्रवेश करने के लिए अंदर कदम बढ़ाया ... और रूचि दरवाजा बंद कर दी....दरवाजा बंद करने के बाद वह उसे बैठने के लिए बोली लेकिन तभी शुभम बोला...)

चाची नजर नहीं आ रही है कहां है?

वह ऊपर अपने कमरे में है मिलना चाहो तो मिल सकते हो....(इतना कहकर रूचि रसोई घर की तरफ जाने लगी और शुभम कुछ पल वहां खड़े होकर रुचि को जाते हुए देखता रहा और उसकी नजर रुचि की मटकती हुई गोल-गोल कांड पर टिकी हुई थी जो कि कसी हुई साड़ी पहनने की वजह से उसके नितंबों का घेराव साफ-साफ साड़ी के ऊपर झलक रहा था जब वह चल रही थी तो उसके दोनों नेता किसी पानी से भरे गुब्बारे की तरह लहरा रहे थे जिसकी वजह से नितंबों में उठने वाली नहर से शुभम के पजामे में तूफान हिलोरे मारने लगा था।
रुचि की मटकती हुई गांड के आकर्षण में शुभम पूरी तरह से सम्मोहित हो चुका था। क्योंकि साड़ी के ऊपर से ही देखने पर शुभम ने अंदाजा लगा लिया था कि साड़ी के अंदर उसकी नंगी गांड कितना गदर मचा रही होगी जब वह उसे अपने हाथों से उसके एक-एक वस्त्र उतारकर जब उसकी मत मस्त गांड को देखेगा तो उसकी खूबसूरत गोल गोल गांड उसके दिल पर छुरिया चलाएंगी...वह मन ही मन उस पल का इंतजार करने लगा जब वह अपने हाथों से रूचि के कपड़े उतार कर उसे नंगी करेगा वह मन में ठान लिया था कि जब कातिल इतना हुस्नो दार हो तो उसके हाथों से क़त्ल होने में कोई हर्ज नहीं है....

रुचि रसोई घर में चली गई थी और रूचि के बचाए अनुसार वह सीढ़ियों से ऊपर की तरफ जाने लगा हुआ सरना चाची से मिलना चाहता था कुछ दिनों में सरला चाची से उसका लगाव कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था आए दिन उससे मुलाकात हो ही जाती थी ..और सरला चाची जिस तरह से एकदम खुले मन से उससे बात करती थी शुभम को लगने लगा था कि उसका साथ उसे भी अच्छा लगने लगा है जो कि यह बात एकदम हकीकत थी क्योंकि शुभम को उसकी नजरें अब हमेशा ढूंढती रहती थी...
सीढ़ियों से चढ़कर शुभम ऊपर आ चुका था और वह सरला चाची के कमरे को ढूंढ रहा था ऊपर तीन कमरे बने हुए थे... वह धीरे-धीरे हर एक कमरे की तरफ आगे बढ़ रहा था... कमरे के पास पहुंच कर उसे इतना तो पता चली जा रहा था कि कमरे के अंदर कोई नहीं है क्योंकि दरवाजे के नीचे बिल्कुल भी रोशनी नहीं थी।.... लेकिन तीसरे कमरे के दरवाजे के नीचे से हल्की हल्की रोशनी आ रही थी शुभम को समझते देर नहीं लगी कि सरला चाची तीसरे कमरे में ही है... शुभम जैसे ही तीसरे कमरे के करीब पहुंचा तो देखा कि दरवाजा हल्का खुला हुआ था। दरवाजा खुला देखते ही शुभम के तन बदन में उत्सुकता बढ़ने लगी उसे ना जाने क्यों ऐसा एहसास होने लगा कि कमरे के अंदर जरूर कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जिससे उसके तन बदन को गर्मी और आंखों को राहत मिलेगी.... क्योंकि ऐसे ही हल्का खुले दरवाजे की ओर से वह कमरे में जाकर अपनी खूबसूरत मां की खूबसूरत नंगे बदन के दर्शन कर चुका था वही सोच करवा धीरे से दरवाजे को थोड़ा और खोलने के लिए हाथ बढ़ाया और जैसे ही थोड़ा सा और दरवाजा खोला तो अंदर का नजारा देखकर उसकी आंखें चौंधिया गई.... उसका मुंह खुला का खुला रह गया उसकी उत्सुकता उत्तेजना में बढ़ गई उसे मन में हिसाब तो हो रहा था कि अंदर जरूर उसे कुछ देखने को मिलेगा लेकिन उम्मीद से दोगुना देखने को मिलेगा इस बात की उम्मीद उसे बिल्कुल भी नहीं थी.... उसके दिल की धड़कन जोरों से धड़क रही थी सांसो की गति एकदम तेज हो गई वह कर भी क्या सकता था उसकी आंखों के सामने नजारा ही कुछ ऐसा था। सरला चाची की नंगी चिकनी मलाई जैसी गोरी पीठ दरवाजे की तरफ थी जिस पर नजर पड़ते ही शुभम की उत्तेजना बढ़ने लगी थी उनके बदन पर केवल पेटिकोट भर् थी.... सरला की नंगी चिकनी पीठ देखकर ही शुभम के लंड में तनाव आना शुरू हो गया था। बाल खुले हुए थे जो कि इस समय एकदम गीले थे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह अभी अभी नहा कर आई हो।
सरला चाची की अर्ध नग्न बदन को देखकर शुभम को ऐसा ही लग रहा था कि उसकी आंखों के सामने कोई कामदेवी खड़ी हो और सरला चाची के बदन का पीछे का भाग बहुत ही खूबसूरत लग रहा था इस उम्र के पड़ाव पर भी सरला चाची के बदन का कसाव लगभग लगभग बरकरार था। कमर से पेटीकोट कस के बाद ही होने की वजह से पेटीकोट की दूरी कमर में जैसे हल्का सा अंदर की तरफ धंस गई हो और उसकी वजह से पेटीकोट की डोरी के इर्द-गिर्द हल्का सा बदन का उठाव बदन को और ज्यादा मोहक बना रहा था.... शुभम का दिल जोरों से धड़क रहा था वह अलमारी में कुछ ढूंढ रही थी। उसका वहां ज्यादा देर तक खड़ा रहना उचित नहीं था लेकिन उसे सरला चाची के बदन का और ज्यादा हिस्सा देखने का मन कर रहा था... बदन पर केवल पेटिकोट पहने होने की वजह से शुभम अच्छी तरह से जानता था कि कमर के ऊपर का पूरा बदन निर्वस्त्र था जिससे उसकी चूची भी एकदम नंगी थी और वह उसे देखने के लिए आह भर रहा था...
सरला इस बात से बेखबर कि उसे अर्धनग्न अवस्था में दरवाजे पर खड़े होकर शुभम उसकी खूबसूरती के जाम को अपनी आंखों से पी रहा है वह अपने आप में ही खोए हुए अलमारी में से ब्रॉ ढुंढ रही थी।
वैसे तो काफी अरसा गुजर गया था सरला को ब्रा और पेंटी पहने लेकिन जिस दिन से शुभम ने उसकी खूबसूरती की तारीफ किया था तब से उसकी इच्छा ब्रा पेंटी पहनने के लिए करने लगी थी और वह उसे पहनना शुरू भी कर दी थी क्योंकि वह आईने के सामने नंगी होकर अपने बदन को निहारती रहती थी और अपनी चुचियों के कसाव को बरकरार रखने के लिए वह समझ गई थी कि उसे ब्रा पहनना बहुत जरूरी है वरना उसकी चूची दूसरी औरतों की तरह लटक जाएगी क्योंकि शीसे मैं से जिस तरह की खूबसूरती से भरे बदन को उसने अपनी आंखों से देखी थी तब से उसके मन की भी इच्छा अपने बदन की रखरखाव करने के लिए बढ़ने लगी थी।
इसलिए तोबा अलमारी में से ब्रा ढूंढ रही थी अब शुभम के लिए वहां ज्यादा देर तक खड़ा रहना ठीक नहीं था लेकिन उसके मन में सरला की बड़ी-बड़ी चुचियों को देखने की प्यास बढ़ती जा रही थी लेकिन कैसे देखना है यह उसे पता नहीं था क्योंकि इस तरह से कमरे के अंदर जाने में भलाई नहीं थी... और वहां खड़े रहकर सरला के घूमने का इंतजार करना बेवकूफी भरा था क्योंकि इससे सरला को शक हो सकता था कि वह काफी देर से दरवाजे पर खड़े होकर उसके नंगे बदन को देख रहा था जिससे हो सकता है सरला को यह बात खराब लगी ऐसा सोचकर शुभम कुछ तरकीब सोचने लगा और वापस अपने कदम को कमरे से बाहर कर लिया... कमरे से बाहर कदम खींचे अभी उसे 4 - 5 सेकंड का ही वक्त गुजरा था कि .. वह बिना वक्त गांव आए झटके से दरवाजे को खोलता हुआ अंदर आते हुए आवाज लगाया....

सरला चाची कहां हो.... मैं तुम्हारा कब से.....(इतना कहने के साथ ही सामने का नजारा देखकर शुभम के शब्द उसके गले में ही अटके रह गए... क्योंकि इस तरह से दरवाजा खुलने की वजह से सरला को इस बात का एहसास बिल्कुल भी नहीं हुआ कि दरवाजे पर शुभम है वह सोचा कि उसकी बहू रुचि ने दरवाजा खोला है इसलिए वह बिना सोचे समझे शुभम की तरफ घूम गई लेकिन सामने शुभम को कमरे में आता देखकर वह एकदम से चौंक गई...शुभम तो जानबूझकर चौक ने का नाटक कर रहा था क्योंकि यह उसकी युक्ति ही थी इस तरह से कमरे में प्रवेश करने की वजह जताना चाहता था कि वह कमरे में अनजाने में ही आया है जानबूझकर कुछ भी नहीं किया है इसलिए वह चौक ने का नाटक करने लगा लेकिन सरला तो वास्तव में चौक गई थी वजह से ही शुभम की तरफ घूमी थी उसकी नंगी चूचियां अपनी मदहोश जवानी का प्रदर्शन करते हुए शुभम की आंखों के सामने पानी भरे गुब्बारे की तरह लहराने लगी और उन्हें एकटक देखकर शुभम की आंखों में चमक आ गई उसकी आंखों में खुमारी जाने लगी उसे उम्मीद नहीं थी कि सरला चाची की चूचियां इतनी खूबसूरत होंगी... वह एकटक सरला चाची की गोल-गोल खरबूजे जैसी चूचियों को देखता ही रह गया जैसा उसने सोचा था कि सरला चाची की चुचियों में कसाव नहीं होगा ऐसा बिल्कुल भी नहीं था वह तो सरला चाची की चूचियों को देखा तो देखता ही रह गया लगभग लगभग सरला चाची की चूचियां उसकी मां की चुचियों जैसी जी हुबहू नजर आ रही थी बस थोड़ा सा फर्क था कि उसकी मां की चुचियों का कसाव कुछ ज्यादा ही था। लेकिन फिर भी सरला चाची की चूचियां किसी से कम नहीं थी एक बहू वाली होने के बावजूद भी सरला चाची कहीं से भी नहीं लगती थी कि वह सांस बन चुकी है... शुभम तो बस प्यासी नजरों से एक अटक सरला की भरपूर छातियों को देखे जा रहा था और सरला भी उसकी तरफ घूम कर अनजाने में ही अपनी मदमस्त चूचियों के दर्शन उसे करा रही थी ...दरअसल यह सब इतनी जल्दी हुआ कि सरला यह बात भूल गई की कमर के ऊपर उसने किसी भी प्रकार के वस्त्र नहीं पहने हुए हैं और उसकी चुचियां एकदम नंगी है। सरला भी कुछ सेकंड तक अपनी चुचियों को ढकने की जगह शुभम को ही देखती रह गई क्योंकि उसे भी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि कमरे में इस तरह से शुभम आ जाएगा.... लेकिन जब इस बात का एहसास सरला को हुआ कि उसकी आंखों के सामने एक गैर मर्द शुभम अब एक भरपूर जवानी से भरा हुआ मर्द ही था।जो कि उसकी चूचियों की तरफ देख रहा था इस बात का अहसास होते ही सरला के मुख से हल्की सी चीख निकल गई....
आअअअअअअअअ....... (इस तरह की चीख निकलने के साथ ही वह बिस्तर पर पड़ी टावेल को पकड़कर अपनी चुचियों को ढकने की कोशिश करने लगी लेकिन हड़बड़ाहट में उसके हाथ से टावल छुट कर नीचे गिर गई..टावल नीचे गिरने की वजह से वह अपने अंगों को ना छुपा पाने के कारण पूरी तरह से घबरा गई थी... और शुभम इतना डिठ हो चुका था किवह अपने मन में निश्चय कर लिया था कि जब तक सरला अपनी चुचियों को उसकी आंखों से नहीं दूर करेगी तब तक वह उसे जी भर कर देखता रहेगा...
और हड़बड़ाहट में कुछ हाथ ना आता देखकर सरला अपने दोनों हथेलियों में अपनी बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चुचियों को छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगी अब शुभम की बारी थी वह एकदम से चौंक ने का नाटक करते हुए बोला...

सससससस..... सॉरी सॉरी सॉरी सॉरी चाची सॉरी (इतना कहते हुए वह दरवाजे की तरफ घूम गया...लेकिन तब तक उसने सरला चाची की मदहोश जवानी के दोनों उड़ते हुए कबूतरों को देख लिया था शुभम अपने मन की कर लिया था।)
मुझे माफ करना चाची मुझे नहीं मालूम था कि आप ..... आप इस तरह से कमरे में होंगी मैं तो आपको ढूंढता ढूंढता यहां तक आ गया था मुझे मालूम नहीं था चाची मुझे माफ करना....(इतना कहते हुए वह जानबूझकर फिर से सरला की तरफ घुमा तो सरला की मासूमियत और जिस तरह से उसने अपनी दोनों हथेलियों में अपने दोनों खरबूजे को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए खड़ी थी उसे देखकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया और एक बार फिर से छूटने का नाटक करता हुआ फिर से दरवाजे की तरफ घूम गया और बोला...)

मुझे माफ करना चाहिए मुझे नहीं मालूम था।
(माफी मांगते हुए शुभम अपनी सभ्यता का परिचय दे रहा था जो कि वह लगभग सरला के दिलों दिमाग पर अपनी चालबाजी का मस्का लगा रहा था और उस मस्के का असर सरला पर बखूबी हो भी रहा था लेकिन जब दुबारा शुभम उसकी तरफ घुमा था तब सरला की नजर उसकी टांगों के बीच पेंट में बने तंबू की तरफ चली गई थी और उसे इस बात का अंदाजा लग गया था कि शुभम का लंड खड़ा हो रहा था...
शुभम के पेंट में बने तंबू को देखकर उसे इस बात का एहसास हो गया कि शुभम का लंड खड़ा हो गया था और इस बात को जानते हैं ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके दिल की धड़कने बढ़ने लगी हो उसके होश उड़ने लगे थे। वह शुभम से कुछ ज्यादा नहीं कह पाई बस उसे इतना कहीं....

कोई बात नहीं सुभम तुम जाओ मैं तैयार होकर आती हूं..
(इतना सुनकर वह सरला की तरफ देखे बिना ही जानबूझकर एक बार फिर सॉरी कहते हुए कमरे से बाहर चला गया उसका काम बन चुका था वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था उसकी आंखों के सामने जिस तरह का नजारा पैसा आया था उसे देखकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था उसकी आंखों ने उम्मीद से दुगुना नजारे का दर्शन जो कर लिया था सरला चाची की मदहोश जवानी के सबूत उसके दोनों फड़फड़ाते हुए कबूतर थे .... जोकि चिल्ला चिल्ला के कह रहे थे कि अभी भी वह जवान है...
शुभम अपनी उत्सुकता को उत्तेजना में बदल कर वापस सीढ़ियों से नीचे उतर गया...

सरला इस पल को लेकर काफी उत्साहित नजर आ रही थी वह मंद मंद मुस्कुराने लगी अभी भी वह अपने दोनों हथेलियों से अपनी दोनों चुचियों को छुपाए हुए थे उसे इस बात का एहसास तक नहीं हुआ कि शुभम वापस चला गया है वह काफी खुश नजर आ रही थी इसका एक कारण था कि उसकी आंखों ने शुभम के पेंट में बने तंबू को देख ली थी जो कि इस बात का प्रतीक था कि उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था और वह सिर्फ उसकी मदहोश कर देने वाली सूचियों की वजह से था जिसे सुबह एक टक तक खा जाने वाली प्यासी नजरों से देख रहा था इस बात से वह काफी खुश नजर आ रही थी क्योंकि उसे लगने लगा था कि अभी भी उसकी मदहोश जवानी और उसका खूबसूरत बदन किसी के भी सोए हुए लंड को जगाने में सक्षम है।
उसे इस बात की पूरी तरह से तसल्ली हो गई थी कि उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां देकर शुभम का लंड खड़ा हो गया था वह एक बार फिर से आईने में अपने आप को देखने लगी और उसे अपनी चुचियों पर गर्व होने लगा ....खामखा वह एक नीरस जिंदगी जी रही थी जो कि शुभम की वजह से बदलने लगी थी और आज वह शुभम को खाने पर निमंत्रण देकर अच्छे से तैयार होना चाहती थी ताकि वह उसकी खूबसूरती की तारीफ और अच्छे से कर सके।
उसका शुभम को घर पर खाने पर बुलाना लगभग लगभग सफल होता नजर आ रहा था कुछ इस तरह की खूबसूरती के दर्शन उसे कराना चाहती थी अनजाने में उससे कई ज्यादा वह अपने बदन की खूबसूरती का प्रदर्शन कर चुकी थी।
और उसके बदन की खूबसूरती का प्रदर्शन का जादू शुभम के ऊपर पूरी तरह से हो गया इस बात की तसल्ली उसे इस बात से मिल चुकी थी कि कमरे में आकर शुभम का लंड खड़ा हो गया था एक जवान होता लड़का जब उसकी बड़ी-बड़ी चुचियों को देखा कर उत्तेजित हो सकता है तो वह उसके साथ क्या क्या कर सकता है। इस बात का ख्याल उसे अनजाने में ही आ गया था और अपने इस बात पर गौर करके उसे अपने आप पर शर्म भी आ रहे थे कि वह यह कैसी बातें सोचने लगी शुभम उसके बेटे की उम्र का है भले ही छोटा क्यों ना हो वह उसको लेकर इतना ज्यादा उत्तेजित क्यों है उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन उसे संपूर्ण संतुष्टि का अहसास हुआ था और वह खुश होकर फिर से अलमारी खंगालने लगी थी वह अपनी पसंदीदा ब्रा पहनना चाहती थी।

और दूसरी तरफ सरला चाची के कमरे से निकलकर सीढ़ियों से नीचे जाकर सीधा वह रुचि से मिलने के लिए रसोई घर में चला गया...
 
सरला चाची के कमरे से एक अद्भुत और कामुकता से भरा हुआ नजारा देख कर शुभम रसोई घर में जा रहा था.... रसोई घर के बाहर खड़ा होकर शुभम रुचि को खाना बनाते हुए देख रहा था। खाना बनाते समय रुचि के बदन में हलन चलन की वजह से एक मादक भरी थिरकन हो रही थी... और वो थिरकन उसके कमर के नीचे के भाग में कुछ ज्यादा ही हो रही थी जोकि शुभम के दिल पर छुरिया चला रही थी.. वह नजर भर कर रूचि के मदमस्त गांड की धड़कन को देखने से अपने आप को रोक नहीं सका फिर कुछ देर तक वहीं खड़ा होकर रुचि की दहकती हुई मटकती गांड को देखता रहा..रुचि को इस बात का आभास तक नहीं हुआ कि उसके पीठ पीछे खड़े होकर शुभम उसके मदमस्त यौवन से भरे बदन का रस अपनी आंखों से पी रहा है .. जी मैं तो आ रहा था उसके कि वह किचन में घुसकर रुचि को पीछे से अपनी बाहों में पकड़ कर उसकी मदमस्त रुई जैसी नरम नरम गांड का एहसास अपने मोटे तगड़े लंड को कराए लेकिन इतनी जल्दी आगे बढ़ना ठीक नहीं था।
वह दरवाजे पर ही खड़े होकर रुचि से बोला..

भाभी एक गिलास पानी मिलेगा .
(शुभम की बात सुनते ही वह चौक ते हुए उसकी तरफ देखी और बोली...)

ओ मुझे माफ करना शुभम जल्दी खाना बनाने के चक्कर में मैं तुम्हें पानी पिलाना भूल ही गई..(इतना कहकर वह फ्रिज की तरफ मुड़ नहीं जा ही रही थी कि उसे रोकते हुए शुभम बोला।)

रहने दो भाभी मैं ले लेता हूं आप अपना काम करिए
(ऐसा कहते हुए शुभम किचन में प्रवेश करके फ्रिज की तरफ आगे बढ़ा लेकिन अपनी नजरों को रुचि की मद मस्त गांड से जुदा नहीं होने दिया। वह रुचि की हिलती हुई गांड को देखते हुए फ्रिज का दरवाजा खोला और उसमें से पानी की बोतल निकाल कर पीकर उसी तरह से रख दिया। शुभम डीठ बनता हुआ फ्रिज का टेका लेकर खड़े हो गया और रुचि की मदमस्त गांड की थिरकन को निहारने लगा... शुभम का मन जिस तरह से मयूर पंख फैलाकर सावन को देख कर नाचने लगता है उसी तरह से शुभम का मन भी रुचि की मदमस्त जवानी को देखकर उस जवानी में पूरी तरह से अपने आप को भिगोने का मन कर रहा था रुचि की मदमस्त गांड का घेराव सरला चाची और उसकी मां की गांड से कम था एकदम गोल जोकि खिलती हुई जवानी की परफेक्ट साइज था।
शुभम का शांति लंड एक बार फिर से उफान की तरफ आगे बढ़ने लगा जब शुभम ने बारी की नजर से रुचि की साड़ी की तरफ देखा जो कि नितंबों के घेरा ऊपर कुछ ज्यादा ही कस के बंधी हुई थी.. और कसी हुई साड़ी बांधने की वजह से रुचि की पेंटिं की लाइन साड़ी के ऊपरी सतह पर साफ-साफ उप्सी हुई झलक रही थी उस पेंटीलाइन को देखते ही शुभम के कल्पना का घोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ने लगा शुभम अपनी कल्पना में ही रुचि के अंदरूनी हिस्से को देख रहा था वह अपने मन मस्तिष्क में ही एक चित्र उपसा रहा था जो कि रुचि का था जोकि शुभम अपने मन में ऐसा सोच रहा था कि रुचि अपनी साड़ी के अंदर मरून रंग की पेंटी पहनी हुई है जो कि फुल साइज ना होकर साइड से कटी हुई थी... और यह कल्पना यूं ही नहीं था रुचि की पेंटी की साइज उसके मदमस्त गांव को छिपाने में नाकाम साबित हो रहे थे यह बात साड़ी के ऊपरी सतह पर झलक रही उसकी पेंटीलाइनर के द्वारा साफ हो जा रही थी.. वह मन ही मन में सोचने लगा कि कैसे उसकी छोटी सी पैंटी रुचि की मदमस्त बुर के छोटे से छेद को ढकी हुई होगी जिसमें से मादकता भरी खुशबू उसके पेटीकोट के अंदरूनी भाग को महका रहे होंगे उस खुशबू के बारे में सोचकर ही शुभम पूरी तरह से उत्तेजित हो गया उसके पेंट का उभार बढ़ने लगा।
और दूसरी तरफ रुचि को इस बात का ज्ञात होते ही कि शुभम काफी देर से फ्रिज के पास खड़ा है वह तुरंत पीछे मुड़कर देखी तो उसे अपने आपको ही देखता हूआ पाकर बोली।

ऐसे क्या देख रहा है। .?

मैं यह देख रहा हूं कि एक चांद खाना बनाते हुए और भी कितना ज्यादा खूबसूरत हो जाता है।

चल अब अपनी बकवास बंद कर (ऐसा कहते हुए वह वापस खाना बनाने लगी लेकिन मंद मंद मुस्कुरा रही थी। क्योंकि शुभम के द्वारा इस तरह की तारीफ करना उसे बहुत अच्छा लगने लगा था कई महीनों महीनों क्या बरसो बाद किसी ने उसकी खूबसूरती की तारीफ किया था अपने पति के द्वारा तो वह इस तरह की तारीफ के लिए तरस गई थी ना तो उससे उसे ठीक से प्यारी मिल पाता था ना उसके मुंह से मीठे शब्दों की इस तरह की बातें सुनने को मिलती थी बस वह अपने ही काम में लगा रहता था ऐसा बिल्कुल भी नहीं था कि वह रुचि से प्यार नहीं करता था वह प्यार तो बहुत करता था लेकिन एक औरत को एक पति से जिस तरह की उम्मीद होती है उस तरह की उम्मीद में उसका पति खरा नहीं उतर पा रहा था। इसलिए वहां शुभम के द्वारा इस तरह की तारीफ सुनकर गदगद हो जाती थी वह वापस अपने काम में लग गई . शुभम आगे कदम बढ़ाता हुआ उसके करीब गया ... और उसके बगल में खड़ा होकर उसके खूबसूरत चेहरे को निहारने लगा जो कि इस समय उसके चेहरे पर गर्मी की वजह से पसीने की बूंदे ऊपर आई थी जो कि खूबसूरत चेहरे पर किसी मोती के दाने की तरह ही चमक रही थी रुचि शुभम को अपने बेहद करीब और इस तरह से अपने चेहरे को देखता हुआ पाकर शर्म से पानी पानी होने लगी उससे कुछ कहा नहीं जा रहा था वह अपने काम में जानबूझकर अपना मन लगाने की कोशिश कर रही थी लेकिन शुभम जिस तरह से प्यासी नजरों से उसे देख रहा था उसकी नजरें रुचि को ऐसा महसूस हो रही थी कि उसके बदन को छेद कर उसके अंदर प्रवेश कर रही है उससे रहा नहीं किया और वह हिम्मत जुटाकर बोली...

ऐसे क्या देख रहा है तुझे शर्म नहीं आती इस तरह से किसी औरत को इतने करीब से देखते हुए..
(रुचि यह बात कह तो गई थी लेकिन उसकी बातों में शर्म का अहसास साफ झलक रहा था...)

भाभी तुम पागल हो गई होआसमान में जब चांद निकलता है तो उसे देखने वाला हर कोई और होता है लेकिन उसे रोकता कोई नहीं है और मेरे तो बेहद करीब खूबसूरत चांद निकला हुआ है भला मैं अपने आप को उसे देखने से कैसे रोक पाऊंगा। ...

चल अब फिल्मों के रोमांटिक हीरो बनने की कोशिश मत कर। .

तुम अगर हीरोइन बनने को तैयार हो तो मैं तुम्हारा हीरो बनने को एकदम तैयार हूं।

क्या रे तू एकदम पागल हो गया है इस तरह की बातें करता है अगर कोई सुन लेगा तो क्या समझेगा...(रुचि हैरानी से शुभम की तरफ देखते हुए बोली क्यों कि उसे उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी कि कोई लड़का इस तरह से तेज होगा कि 12 मुलाकात में ही इस तरह की बातें करने लगेगा ...)

इसमें बुरा क्या है भाभी अपने आपको आईने में तो देखती होगी क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम किसी हीरोइन की तरह लगती हो और मुझे देखो ( दो कदम पीछे दोनों हाथों को फैलाकर जाते हुए) मैं क्या तुम्हें हीरो जैसा हैंडसम नहीं लगता।

(शुभम की यह अदा देखने के बाद रुचि उसके ऊपर एकदम मोहित होने लगी थी वह कुछ सेकंड तक उसे ध्यान से देखने के बाद हंसने लगी और बोली ‌।)

तू सच में पागल है तुझे इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि जिस तरह की तो बातें करता है अगर ऐसे में मम्मी जी सुन भी तो कितनी बड़ी आफत आ जाएगी।

कुछ आफत नहीं आएगी भाभी जी मैं हमेशा सच कहता हूं और सच कहने में मैं किसी से नहीं डरता ‌

तू नहीं डरता ना लेकिन तेरे सच में मेरे गले में फांसी लग जाएगी इस बात का अंदाजा तुझे नहीं है चलो मुझे काम करने दे वैसे भी बहुत काम बचा है।

(शुभम को रुचि भाभी से इस तरह से फ्लर्ट करने में बहुत मजा आ रहा था लेकिन वह ज्यादा परेशान नहीं करना चाहता था क्योंकि वह जानता था कि किसी भी वक्त सरला चाची अपने कमरे से बाहर आ सकती है इसलिए वह बात को आगे बढ़ाते हुए बोला ‌‌)

भाभी जी लेकिन यह अच्छी बात नहीं है। .(रुचि कद्दू की सब्जी को कड़ाही में चलाते हुए बोली।)

क्या अच्छी बात नहीं है?

यही कि मुझे खाने पर बुलाकर अभी तक मुझे भूखा रखी हो (भूखा शब्द कहते हुए शुभम की नजर रुचि की गांड के ऊपर पर चली गई।)

मैं इसीलिए तो तुझ से माफी मांग रही हूं अगर मम्मी जी आ गई तो मुझे बहुत डांटेगी क्योंकि काफी देर हो चुकी है खाना बनाने में .(रुचि की बातों में खाना देर से बनने का डर साफ झलक रहा था इसलिए शुभम बोला।)

क्यों भाभी अभी तक खाना नहीं बना है क्या...?

बन गया है बस थोड़ा सा रह गया है.. लेकिन फिर भी काफी देर हो चुकी है मम्मी जी मुझे कब से कही थी खाना तैयार करने के लिए लेकिन मुझे सब काम खत्म करते-करते काफी टाइम हो गया है..(यह कहते हुए रूचि के चेहरे पर चिंता साफ नजर आ रही थी...)

कोई बात नहीं बाकी में कौन सा बहुत दूर से आया हूं पड़ोस में से तो आया हूं और वैसे भी मुझे कोई दिक्कत नहीं है...(शुभम रुचि के खूबसूरत चेहरे को निहारते हुए बोला)

तू ऐसे मत देखा कर मुझे....

क्यो......?

अच्छे लड़के इस तरह से नहीं देखते. ‌‌।

किसने कह दिया कि मैं अच्छा लड़का हूं मैं बहुत ही खराब लड़का हूं। .. ‌

चलो बातें बनाने को रहने दे अब खाना एकदम तैयार हो गया है। तू चल कर बैठ मैं खाना लगा देती हूं तब तक मम्मी जी आती होंगी.....

ओके भाभी जी आपका हुकुम सर आंखों पर....
(इतना कहकर शुभम किचन से बाहर चला गया और डाइनिंग टेबल पर जाकर बैठ गया... कुर्सी पर बैठते ही एक गरम आह छोड़ी... वह पूरी तरह से घर में आ चुका था एक तो पहले से ही वह सरला चाची के भरे हुए अर्ध नग्न बदन को देखकर पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था और दूसरे किचन में कसी हुई साड़ी में कैद गांड को देखकर मदहोश हो गया था . ‌इस समय उसे कसी हुई पुर की बेहद आवश्यकता जान पड़ रही थी... जो कि ऐसी बुर उसे रुचि के पास होगी इस बात का अंदाजा उसे लग चुका था.... वह टेबल पर अपने हाथों की दोनों कोहनी को टिका कर यही सब सोच रहा था कि तभी उसे सीढ़ियों से सरला चाची नीचे उतरती हुई नजर आई उस पर नजर पड़ते ही शुभम तो घायल होता होता बचा क्योंकि सरला इस समय जवानी से भरी हुई औरत लग रही थी... शुभम तो देखता ही रह गया साड़ी भी उसने ट्रांसपेरेंट पहन रखी थी जिसमें से उसका खूबसूरत गोरा बदन साफ़ झलक रहा था.. ‌ वह सीढ़ियों से उतरती हुई शुभम की तरफ देख कर मुस्कुरा रही थी। .... उसकी मदमस्त जवानी देखकर शुभम का लंड एक बार फिर से टांगों के बीच ठोकर मारने लगा....
सरला बहुत ही अच्छे से तैयार होकर आई थी अपनी हल्की सी लटकती हुई चूचियों को कसी हुई दिखाने के उद्देश्य से उसने अपना मनपसंद ब्रा पहनी हुई थी जोकि हल्की पारदर्शी ब्लाउज में से साफ नजर आ रही थी कि उसने पीले रंग की ब्रा पहनी हुई है। और ब्रा सरला की मदहोश जवानी के फल पढ़ाते हुए दोनों कबूतरों को अपने बस में कर पाने में सक्षम नहीं थे इसलिए सरला की मदहोश जवानी ब्रा से बाहर छलकने को तैयार थी‌ । और उसे ना पकने के लिए शुभम भी पूरी तरह से तैयार था लेकिन यह मौका उसे इतनी जल्दी कहां मिलने वाला था। कुर्सी को व्यवस्थित करके उस पर बैठते हुए सरला बोली।

शुभम आज तो तुम और ज्यादा अच्छे लग रहे हो...

आप भी बहुत अच्छी लग रही हैं। (शुभम ट्रांसपेरेंट साड़ी में से सरला की ब्लाउज से बाहर झांक रहे दोनों कबूतर को देखते हुए बोला...)

चल झूठा कहीं का...(शुभम की तीर जैसी नजरों का निशाना बात कर अपना पल्लू सही करते हुए बोली...)

क्या चाची .....मैं सच कह रहा हूं आप आज और भी ज्यादा खूबसूरत लग रही हो... (शुभम एकटक तक सरला की आंखों में झांकता हुआ बोला और उसे इस तरह से अपनी तरफ देखता हुआ पाकर सरला शर्मा गई.....)

चल तू तो हमेशा सच ही कहता है झूठ कहना तुझे तो आता ही नहीं ... अरे बहु खाना तैयार हुआ कि नहीं....?

हां मम्मी जी तैयार हो गया बस 2 मिनट....

चाची आप तो कह रही थी कद्दू की सब्जी खाने का निमंत्रण तुझे भी हो लेकिन मुझे तो लग रहा है मैंगी बन रही है।

क्या ...(सरला आश्चर्य से बोली)

भाभी जी कह रही है ना कि बस 2 मिनट....

(शुभम के कहने का मतलब समझते ही सरला जोर जोर से हंसने लगी...)

तू बहुत मजाक करता है....

आप हंसते हुए कितनी खूबसूरत लगती हैं चाची..(शुभम फ्लर्ट करने के उद्देश्य से एकटक सरला की तरफ देखते हुए बोला ।)

तो फिर शुरू हो गया अब ज्यादा शाहरुख खान बनने की जरूरत नहीं है....

मैं जानता हूं चाची कि मुझे शाहरुख खान बनने की जरूरत नहीं है लेकिन जब सामने काजोल जैसी खूबसूरत औरत बैठी हो तो शाहरुख तो बनना ही पड़ता है।...
(सरला शुभम की बात सुनकर इस बार कुछ बोल नहीं पाई बस उसे देख कर मुस्कुरा दी क्योंकि शुभम कि इस तरह की रोमांटिक बातें सुनना को बहुत ही ज्यादा रोमांचित कर रही थी उसे भी अपनी जवानी के दिन याद आ रहे थे जब ऐसे ही कॉलेज आते जाते उसकी तारीफ के शब्द उसके कानों में पड़ ही जाते थे। . एक तरह से शुभम ने सरला को उसके जवानी के दिन याद दिला दिया था... शुभम की रोमांटिक बातों ने सरला को काफी हद तक उत्तेजना का अनुभव करा दिया था जिसका असर उसकी टांगों के बीच बहुत ही अच्छी तरह से हो रहा था सरला को अपनी पेंटी गीली होती नजर आ रही थी जो किस बात का सबूत था कि शुभम की कही बातों से उसका मन डोल रहा था।
थोड़ी ही देर में टेबल पर खाना लग चुका था। शुभम को कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी लेकिन यह मुलाकात कद्दू की सब्जी की ही वजह से हो रही थी.... सरला चाची और शुभम दोनों आमने सामने कुर्सी पर बैठे हुए थे डाइनिंग टेबल पर पूरी कद्दू की सब्जी और खीर रखी हुई थी। जिसमें से बेहतरीन स्वादिष्ट खुशबू आ रही थी और उससे भी माधव खुशबू आ रही थी सरला चाची के बदन से और रुचि भाभी के अंग अंग से ..

वाह भाभी खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है...

इतनी मेहनत से बनाई हूं तो खुशबू तो आएगी ही रुचि दोनों के प्लेट में एक-एक करके खीर और कद्दू की सब्जी रख रही थी.... थोड़ी देर में दोनों की प्लेट तैयार हो चुकी थी.... तो शुभम तीसरी खाली प्लेट देखकर बोला...

तुम भी बैठ जाओ भाभी साथ में खाओगी तो अच्छा रहेगा...

नहीं नहीं मैं बाद में खा लूंगी.....

खालो रुचि बेटा इसलिए तो मैं कहती हूं कि साथ में खाया करो तुम्हें बाद में खाती हो यह तो मुझे भी नहीं अच्छा लगता....(सरला की बात सुनकर रुचि फिर से ना नुकुर करते हुए बोली...)

मम्मी जी मे बाद में खा लूंगी.... (इतना कहकर वो चलने को हुई थी कि शुभम हाथ आगे बढ़ा कर उसकी कलाई पकड़ लिया और उसे जबरदस्ती कुर्सी पर बैठाते हुए बोला...)

आज भाभी तुम साथ में खाओगी...(इतना कहकर वह खाली प्लेट आगे रखकर खुद उसमें कद्दू की सब्जी पूरी रखने लगा यह देख कर सरला शुभम के संस्कार पर बहुत खुश हो रही थी और रुचि शुभम के द्वारा इस तरह से खाना खिलाने पर अंदर ही अंदर... टूटती जा रही थी क्योंकि वह इस तरह की उम्मीद अपने पति से रखती थी लेकिन पति हमेशा काम में ही बिजी रहता था और आज शुभम के द्वारा इस तरह से जबरदस्ती खाना खिलाने पर उसके मन में अजीब सी उलझन होने लगी थी। आखिरकार तीनों खाना खाना शुरु कर दिए थे। रुचि शर्मा शर्मा के धीरे-धीरे खा रही थी...शुभम को कद्दू की सब्जी कभी भी अच्छी नहीं लगी थी लेकिन आज ना जाने क्यों उसे कद्दू की सब्जी खाने में बहुत ही ज्यादा मजा आ रहा था वह बड़े मजे लेकर कद्दू की सब्जी खा रहा था। खाना खाते खाते वह बातों का दौर शुरू करते हुए बोला।

चाची भैया क्या बात है उन्हें मैं कभी देखा नहीं हूं...

क्या सच में तुमने कभी भी नहीं देखे....

नहीं चाहती मैं सच कह रहा हूं पढ़ाई से फुर्सत ही नहीं मिलती आज मैं पहली बार किसी के घर खाना खाने आया हूं और वह भी आपके....
(सरला शुभम की बातें सुनकर खुश हो रही थी कि कितना अच्छा लड़का है जो इधर-उधर की बातों में बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता और उसके संस्कार देख कर मन ही मन सोचने लगी कि वो कैसे उसके ऊपर शक करने लगी कि वह खुद अपनी मां के साथ गंदे संबंध रखता है हो सकता है उससे आंखों का धोखा हुआ हो... लेकिन फिर मन में सोचने लगी किया कर सुबह मैं ऐसा लड़का नहीं है तो निर्मला सही औरत नहीं है क्योंकि उसे जिस हालात में उसने देखी थी उसे झूठ लाया नहीं जा सकता था और जो परछाई उसने सीढ़ियों से ऊपर की तरफ जाते हुए देखी थी वह अशोक की तो बिल्कुल भी नहीं थी तो इतना साफ था कि शुभम की मां का किसी और लड़के के साथ चक्कर चल रहा है खैर जो भी हो उसे शुभम के संस्कार अच्छे लग रहे थे इसलिए वह बोली...)

शुभम बेटा अक्सर मेरा बेटा शहर से बाहर ही रहता है घर पर बहुत कम रहता है काम ही कुछ ऐसा है कि उसे हमेशा बाहर जाना पड़ता है इसलिए शायद तुम्हारी नजर उस पर कभी नहीं पडी होगी....
(सरला खाना खाते हुए बोली।)

सरला चाची भाभी तो घर में अकेले एकदम बोर हो जाती होंगी आप ऐसा क्यों नहीं करती कि इन्हें कुछ काम वगैरह कराया करो जैसे कि कंप्यूटर क्लास वगैरा-वगैरा....(शुभम रुचि की तरफ देखते हुए बोला और रुचि शुभम की बात सुनकर तिरछी नजरों से शुभम की तरफ देख रही थी।)

मैं तो इसे कहती हूं कि बेटा थोड़ा बाहर निकला करो अकेले घर में बैठे-बैठे एक दम बोर हो जाती हो कहीं निकलोगी घुमोगी तो तुम्हारा भी मन लगा रहेगा....
(सरला की बात खत्म होती है इससे पहले ही शुभम बोला।)

ऐसा क्यों नहीं करती भाभी की आप बच्चों को कंप्यूटर सिखाया करो।

मुझे कंप्यूटर चलाना नहीं आता (रुचि अपनी नजरों को नीचे करते हुए बोली)

तो इसमें क्या हुआ मैं सिखा दूंगा कंप्यूटर चलाने में कौन सी बड़ी बात है।

हां शुभम बेटा यह ठीक रहेगा तो इसे अच्छे से कंप्यूटर चलाना सिखा दे मैं भी यही चाहती हूं कि बाहर इसी बहाने थोड़ा निकलेगी तो इसका भी मन बहन जाएगा।....

अब आप बिल्कुल भी चिंता मत करिए चाची मैं भाभी को कंप्यूटर अच्छी तरह से सिखा दूंगा...

भगवान तो जैसा बेटा सबको दे मेरी तो बस इतनी ख्वाहिश है कि बस इसका गोद भर जाए मैं भी अपने पोते पोती को अपने हाथों में खिला सकूं उनके साथ खेल सकूं....

चाची शादी हुई है तो बच्चे भी हो जाएंगे इसमें कौन सी दिक्कत है...
(शुभम की बातें सुनकर रुचि और सरला एक दूसरे को देखने लगे मानो इशारों ही इशारों में एक दूसरे से कुछ बोल रहे हो...दोनों अच्छी तरह से जानते थे कि 3 साल हो गए रे शादी को लेकिन अभी तक रूचि के पांव भारी नहीं हुए थे जिसके लिए वह अपने बेटे और बहू को अस्पताल में जांच कराने के लिए बोल रही थी रुचि तो तैयार थी लेकिन रुचि का पत्नी आनाकानी कर रहा था... लेकिन इस बारे में दोनों कुछ बोल नहीं पाए थोड़ी ही देर में तीनों खाना खा चुके थे ...)

भाभी तुम्हारे हाथों में तो जादू है क्या स्वादिष्ट खाना बनाती हो..(इतना कहकर व कुर्सी पर से उठने लगा और रूचि अपने बनाए खाने की तारीफ सुनकर मुस्कुरा दी... शुभम अपने हाथ धोना चाहता था और सरला को भी अपना हाथ धोना था इसलिए सरला भी कुर्सी पर से उठते हुए बोली ‌)

चल मैं तेरा हाथ धुल आती हूं ...(इतना कहकर सरला आगे आगे बाथरूम की तरफ जाने लगी... हाथ धोने के लिए वाशबेसिन वहीं पर बना हुआ था। सरला नल चालू करके शुभम को हाथ धोने के लिए पूरी शुभम सरला की तरफ देखते हुए हाथों में लगा और मुस्कुरा रहा था उसे मुस्कुराता हुआ देखकर सरला बोली...!

ऐसे क्यों मुस्कुरा रहा है। .

कुछ नहीं ऐसे ही (इतना कहकर वह हाथ धो लिया और हेंगर पर टंगी हुई टावल से अपने हाथों को पोंछने लगा....)

नहीं जरूर कुछ बात है। (इतना के करवा भी थोड़ा सा झुक कर अपने हाथ को धोने लगी लेकिन ऐसा करते हुए उसके कंधे से पल्लू सरक कर नीचे गिर गया जिससे उसकी मदमस्त चोडी छातियां शुभम की आंखों के सामने झूलने लगी वह तो अच्छा हुआ कि ब्लाउज के मजबूत बनाने सरला की बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चुचियों का वजन संभाल लिया वरना बटन चरमरा कर टूट जाता और शुभम की आंखों के सामने सरला की मदमस्त चूचियां झुलने लगती. ।सरला को इस बात से राहत हुई थी कि आज उसने ब्रा पहन रखी थी वरना जिस तरह से वह नीचे झुकी थी उसे तो ऐसा ही लग रहा था कि उसके ब्लाउज के सारे बटन टूट जाएंगे... लेकिन ब्लाउज के बटन ने उसकी इज्जत बचा रखी थी लेकिन फिर भी शुभम की आंख से एक ने के लिए काफी कुछ मंजर नजर आ रहा था शुभम बेशर्म की तरह सरला के ब्लाउज में झांक रहा था जिसमें से उसके दोनों खरबूजे एकदम साफ नजर आ रहे थे। सरला के लटकते हुए दोनों खरबूजे को देखकर शुभम के मुंह में पानी आने लगा अभी अभी खाना खा कर पेट भरा था लेकिन ऐसा लग रहा था कि उसे एक बार फिर से भूख लग चुकी है। लेकिन यह भूख नहीं थी बल्कि प्यास थी नजरों की प्यास सरला के दोनों चूचियों को मुंह में भरकर उसे पीने की प्यास.... लेकिन इससे ज्यादा वह कर क्या सकता था बस वैसे ही नजरों से सरला के खूबसूरत चूचियों को देख रहा था... लेकिन अपनी स्थिति से सरला काफी असमंजस में पड़ गई थी। हाथ उसके झुठे थे और ऐसे में कंधे से पल्लू गिर गया था वह साड़ी को झुठे हाथों से पकड़ भी नहीं सकती थी क्योंकि दाग लगने का डर था।... वह शुभम को देखी तो शुभम प्यासी नजरों से आंख फाड़े उसकी चूचियों की तरफ ही देख रहा था जो कि आधे से ज्यादा नजर आ रही थी शुभम की ऐसी नजरों को देखकर वह शर्मिंदा होने लगी उसे शर्म आ रही थी।.... शुभम की ऐसी नजरों से उसके बदन में कुछ-कुछ हो रहा था और ज्यादातर उसकी टांगों के बीच की उस पतली दरार में जो काफी वर्षों से सुन्न पड़ी थी... उसे साफ तौर पर उसमें हलचल होती हुई महसूस हो रही थी दिल की धड़कने तेज दौड़ रही थी सांसो की गति तेज होने लगी थी। आखिरकार वाह शुभम को टोकते हुए बोली।)

अब आंख फाड़ कर इसे देखता ही रहेगा की साड़ी ठीक करेगा...
(सरला की बात सुनकर वह हड़बड़ा गया उसे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे उसके ऊपर किसी ने ठंडा पानी फेंक दिया हो और वह हड़बड़ाते हुए बोला...)

कककककक.....करता हूं चाची इतना कहने के साथ ही वह अपने दोनों हाथ को आगे बढ़ाया और उत्तेजना के मारे उसका हाथ कांपने लगा अपने कांपते हाथों से वह सरला के कंधे से गिरे हुए पल्लू को पकड़कर उसे ठीक करने लगा ।।। वह पल्लू उठा कर सरला के कंधों पर इस तरह से रख दिया कि उसकी बड़ी बड़ी छातियां दिखना बंद हो गई....मानो एक अद्भुत और कामुकता से भरे दृश्य पर पर्दा पड़ गया हो.... शुभम काफी देर से अपनी उत्तेजना को दबाए हुए था इतनी बड़ी-बड़ी कौन सूचियों को देखकर उसकी हालत पतली होने लगी थी। उसके पेंट का उभार कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। अपनी उत्तेजना को दबाकर वह सरला की बात मानते हुए कंधे से गिरे पल्लू को उठाकर उसे व्यवस्थित कर दिया था.... लेकिन पल्लू को ठीक करते करते वह आखिरकार अपनी उत्तेजना के अधीन होकर बोला।

चाची आज तुम सच में बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही हो।

क्यों तुझे यह (अपनी चूचियों की तरफ नजरों से इशारा करते हुए) दिख गया इसलिए..(सरला काबिल से अपने गीले हाथों को साफ करते हुए बोली।)

नहीं चाची. ऐसी बात नहीं है बस यूं ही कह रहा हूं कि आज आप सच में बहुत खूबसूरत लग रही हो।

नहीं ऐसे तो नहीं कह रहा है मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि मर्दों की नजर कहां पर रहती है।... मैं हाथ तो रही थी तब देख रही थी कि तू इन्हीं (एक बार फिर से नजरों से चूचियों की तरफ इशारा करते हुए) को देख रहा था...

क्या चाची आप भी कैसी बातें कर रही हैं.

नहीं मैं अच्छी तरह से समझती हूं तुझे मैं आज कुछ ज्यादा ही खूबसूरत इसीलिए लग रही हूं कि तूने मुझे कमरे में कुछ नंग धड़ंग हालत में देख लिया था इसलिए। सच कही ना मैं ...(सरला यह बात दरवाजे की तरफ देखते हुए बोली... क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी यह बात उसकी बहू सुनें इसलिए वह पढ़े एहतियात के साथ बात करते हुए दरवाजे की तरफ देख ले रही थी।)

नहीं चाहती ऐसी कौन सी भी बात नहीं है दरअसल मुझे इस बात का अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि आप कमरे में कपड़े बदल रही होंगी। (शुभम जानबूझकर इधर-उधर देखते हुए शर्माने का नाटक करते हुए बोला।)

लेकिन फिर भी तूने कुछ तो देखा था ‌(सरला फिर से दरवाजे की तरफ देखते हुए बोली... ऐसा लग रहा था कि वह शुभम के मुंह से कुछ सुनना चाह रही थी। इसलिए तो कोई बात ना होने के बावजूद भी वह उसी तरह की बातें कर रही थी शुभम इतनी जल्दी कैसे बोल दे कि हां मैंने तुम्हारी चुचियों को देखा था क्योंकि अब तक वह सरला के सामने एक संस्कारी लड़के की तरह पेश होता आ रहा था ताकि उसको कभी यह शक ना हो कि उसके संबंध उसकी मां के साथ गलत है। लेकिन फिर भी बार-बार जिस तरह से चला पूछ रही थी उससे शुभम का धैर्य टूटता जा रहा था उसकी बातों से उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ रही थी वह अच्छी तरह से समझ गया था कि सरला चाची क्या सुनना चाहती है लेकिन फिर भी अपने आप को बचाए हुए था इसलिए बात को घुमाते हुए बोला।)

जाने दो ना चाची मैंने कोई जानबूझकर तो कमरे में गया नहीं था । इसलिए जो कुछ भी हुआ सब अनजाने में ही हुआ है।

तो साफ-साफ क्यों नहीं कह देता कि तूने मेरी चूचियों को देखा है तभी तो आंखें फाड़ कर उन्हें देख रहा था।
(सरला फिर से दरवाजे की तरफ देखती वह बोली...
साला की बातों को सुनकर शुभम अच्छी तरह से समझ गया कि वह क्या सुनना चाहती है लेकिन वह खुले शब्दों में नहीं कहना चाहता था क्योंकि अभी तक वह एक बेहद संस्कारी लड़के के रूप में उसके सामने आया है और इस तरह की बातें करके वहां उसके मन में उसे शंका को तेज नहीं होने देना चाहता था कि वास्तव में उसका संबंध उसकी मां के साथ गलत है इसलिए वह बोला कुछ नहीं बल्कि उसके सवाल का जवाब देते हुए मुस्कुरा भर दिया उसकी मुस्कुराहट बहुत कुछ बयां कर रही थी सरला को इस तरह की बातें करने में बहुत ही ज्यादा आनंद की अनुभूति हो रही थी और उत्तेजना का असर कुछ ज्यादा है उसके तन बदन में अपनी चिंगारी भड़का रहा था।सरला के बदन में हलचल मची हुई थी खास करके उसकी टांगों के बीच की उस पतली दरार में कुछ ज्यादा ही सुरसुरा हर्ट हो रही थी ..काफी वर्षों के बाद उसकी सूखी पड़ी बुर में जब से शुभम मिला था तब से उसमें नमी महसूस होने लगी थी ‌। सरला को साफ तौर पर उसकी पेंटी गीली होती महसूस हो रही थी शुभम के साथ इस तरह की बातें करने में उसे मजा आ रहा था और वह और भी ज्यादा बातें करना चाहती थी कि तभी दरवाजे पर पैरों की आहट होते ही वह सतर्क हो गई तब तक रूचि अंदर प्रवेश करते हुए बोली।

मम्मी जी आप आराम करिए मैं बर्तन साफ कर देती हूं ‌‌ ।(ना जाने क्यों शुभम को रुचिका इस तरह से अंदर आना अच्छा नहीं लगा क्योंकि उसे भी मज़ा आ रहा था सरला के साथ बात करने में लेकिन रुचि के आ जाने से दोनों को बाहर जाना पड़ा।... वैसे भी काफी समय हो गया था इसलिए शुभम को जाना जरूरी था इसलिए वह सरला से इजाजत मांगते हुए बोला ।।।)

अच्छा चाची मैं चलता हूं (हाथ जोड़ते हुए)कद्दू की सब्जी खिलाने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया...

अरे इसमें शुक्रिया किस बात की मैं तो चाहती हूं कि तू ऐसे ही खाने के ही बहाने मेरे घर आया करें....
(इतना कहते-कहते दोनों दरवाजे तक आ गए शुभम अपने हाथ से दरवाजा खोल कर जाने को हुआ कि तभी वह बोला....)

वैसे चाची एक बात कहूं आप बुरा तो नहीं मानोगी...

नहीं.....

ऐसे नहीं मुझे पहले प्रॉमिस करो...

अच्छा बाबा प्रॉमिस तू ऐसे नहीं मानने वाला....

तुम्हारे दोनों वह बहुत खूबसूरत है...(शुभम हिम्मत जुटाकर अपनी उंगलियों का निर्देश सरला की चूचियों की तरफ करते हुए बोला... सरला तो शुभम के मुंह से यह सुनकर एकदम से चौंक गई....सरला कुछ समझ पाती या उससे कुछ कह पाती इससे पहले ही शुभम वहां से निकल गया.... उसे इस बात का अहसास होते ही वह मुस्कुराती क्योंकि भले ही इस तरह से शुभम ने उसकी खूबसूरती की तारीफ ही किया था। वह शुभम को जाते देखती रही तब तक देखती रहेगी जब तक वह अपने घर नहीं चला गया।
 
सुभम काफी खुश नजर आ रहा था क्योंकि आज का आमंत्रण उसकी जिंदगी में कुछ और स्वादिष्ट फल लेकर आने वाला था। वह काफी खुश था कि उसने अपने आप को सरला चाची और उसी के सामने अच्छी तरह से पेश किया था। शुभम को इस बात का कि आप तो हो ही चुका था कि उसका साला के घर पर जाकर भोजन करना उन दोनों को बहुत अच्छा लगा था। धीरे-धीरे वह अपनी मंजिल के करीब बढ़ता चला जा रहा था उसे अपनी मंजिल आंखों के सामने नजर आ रही थी उसे लगने लगा था कि वह जिस इरादे से अपने पड़ोस के घर में प्रवेश किया है एक दिन वह उन दोनों के बिस्तर तक जरूर पहुंच जाएगा।
शुभम पूरी तरह से गरमा चुका था जिस तरह का नजारा और दोनों औरतों के बेहद करीब उनके खूबसूरत बदन से उठती हुई मादक खुशबू को अपने सीने में भर कर वह पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था वह एकदम से चुदवासा हो चुका था... मन तो उसका उसी समय चुदाई का हो रहा था जब वह सरला के कमरे पर पहुंच कर दरवाजे से अंदर की तरफ का नजारा देखा था उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह बेहद उत्तेजना से भरा हुआ नजारा देख लेगा और उसे इस बात की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी कि इस उम्र में सरला चाची के बदन का कसाव जवान औरतों की तरह होगा सरला की लटकती हुई परंतु लचीली नहीं बल्कि पापाया के आकार की चूचियों को देख कर शुभम का मन उन्हें दोनों हाथों में पकड़ कर उस पर झूलने को हो रहा था। भरी हुई मदमस्त कमर को दोनों हाथों में पकड़ कर सरला की बड़ी बड़ी गांड से खेलने की इच्छा हो रही थी। वह अपना मन खड़ा करके अपनी भावनाओं पर काबू कर पाया था वरना कब से कमरे में दाखिल होकर सरला चाची की अर्ध नग्न बदन को पीछे से अपनी बाहों में भर कर उसकी बड़ी-बड़ी मत मस्त गांड की गर्माहट को अपने लंड पर महसूस कर लेता लेकिन अफसोस कि अभी बातचीत कुछ इतनी ज्यादा आगे नहीं बढ़ चुकी थी कि शुभम इस तरह की हरकत करता। वह अपने आप पर संयम रखे हुए था सरला का मदमस्त बदन और रुचि की मदमस्त जवानी दोनों.. शुभम के बदन में आग लगाई हुई थी। रुचि से फ्लैट वाली बातें करके उसे बेहद उत्तेजना का अनुभव हो जाता था। और घर से निकलते निकलते जिस तरह से उसने हिम्मत दिखाते हुए सरला को यह बात कही थी कि... उसके दोनों को बहुत खूबसूरत है यह बात कहते हो गए शुभम के बदन में इतनी ज्यादा अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था कि उसे लगने लगा था कि उसका लंड पानी फेंक देगा.... बड़ी मुश्किल से वह अपने आप को संभाले हुए अपने घर पहुंचा था ... और घर पहुंचते ही वह अपनी मां को चोदना चाहता था लेकिन दरवाजा खोलता इससे पहले ही उसे अपने पापा की कार खड़ी मिल गई उसके सारे अरमान पर पानी फिर गया....उसे उम्मीद थी कि उसकी मां घर पर अकेली में एक ही और वह अपने खड़े लंड की गर्मी अपनी मां की बुर के अंदर उतार सकेगा लेकिन ऐसा हो नहीं सका... वह दरवाजे पर बेल बजाया तो दरवाजा उसके पापा खोलें और उसे देख कर मुस्कुरा दिए जवाब में शुभम भी औपचारिकता बस मुस्कुरा दिया उसे तो अंदर ही अंदर अपने पापा पर बहुत गुस्सा आ रहा था। अशोक सेवन से कुछ पूछा था इससे पहले ही डाइनिंग टेबल पर बैठी हुई निर्मला बोली।

आज पड़ोस की सरला आंटी ने इसे निमंत्रण पर बुलाई थी और जानते हो क्या खिलाने के लिए कद्दू की सब्जी....

क्या ...?(अशोक चौकते हुए बोला क्योंकि वह भी अच्छी तरह से जानता था कि उसके बेटे को कद्दू की सब्जी कतई पसंद नहीं थी. । )

बेटा तुम्हें तो कद्दू की सब्जी पसंद नहीं थी फिर निमंत्रण पर उसे खाने के लिए कैसे पहुंच गए।

क्या करूं पापा सरला आंटी ने बड़े प्यार से बुलाई थी इसलिए जाना पड़ा...( उतरा हुआ मूंह लेकर वह जवाब दिया।)

चलो कोई बात नहीं बड़ों का सम्मान करना चाहिए वैसे कद्दू की सब्जी कैसी थी।

बहुत अच्छी थी...

क्या कहा तुमने बहुत अच्छी थी क्या तुम्हें कद्दू की सब्जी अच्छी लगी ..

पता नहीं पापा लेकिन मुझे आज कद्दू की सब्जी खाने में बहुत अच्छा लगा.... (निर्मला अपनी बेटे के उतरे हुए चेहरे को देखकर समझ गई कि उसका बेटा उदास क्यों है. लेकिन उसे बोल कुछ नहीं पाई . वह भी समझ गया था कि आज कुछ होने वाला नहीं है इसलिए वह सीढ़ियां चढ़ते हुए बोला ।)

मुझे बहुत नींद आ रही है गुड नाइट पापा गुड नाइट मम्मी ... (इतना कहते हुए वह अपने कमरे की तरफ चला गया ‌.. वह कमरे में जाते ही बिस्तर पर लेट गया और लेटे-लेटे ही अपने सारे कपड़े उतार कर एकदम नंगा हो गया... लेकिन अपने पापा को घर पर देख कर उसके सारे अरमान पर पानी फिर गया था उसका मूड खराब हो गया था जिसकी वजह से पहले की तरह उसके लंड में तनाव नहीं था। लेकिन फिर भी सरला की खूबसूरत गोल गोल पपैया जैसे चुचियों से वह इतना ज्यादा आकर्षित और उत्तेजित हो चुका था कि उन्हें याद करते ही एक बार फिर से उसके लंड में तनाव आना शुरू हो गया।वह बड़ी मजबूती के साथ अपने खड़े मोटे लंड को पकड़ कर लेना शुरू कर दिया और आंखें बंद करके कल्पना करने लगा कि वह अपने लंड को सरला चाची की बड़ी-बड़ी चुचियों के बीच अंदर बाहर कर रहा है और चाची मस्त होकर अपनी चुचियों को उसके लंड से चुदवा रही है.... शुभम के कल्पना का घोड़ा इतना तेज और सटीक दौड़ता था कि जिस तरह का वह कल्पना करता था वह उसे एकदम से महसूस होने लगता था अगले ही पल हुआ महसूस करने लगा कि जैसे सरला चाहिए अपनी बड़ी बड़ी गांड लेकर अपने पैरों को फैला कर उसके मोटे खड़े लंड पर बैठ रही हैं और धीरे-धीरे उसके लंड का गुलाबी सुपाड़ा सरला चाची के गुलाबी छेद के अंदर प्रवेश करता चला जा रहा है....कल्पना उसे हकीकत में बदलती नजर आ रही थी वह आंखें बंद करके अपनी कल्पना में मशगुल चुका था और अपने हाथ से अपने लंड को हिलाते हुए ऐसा सोच रहा था कि जैसे सरला जोर जोर से अपनी बड़ी बड़ी गांड को ऊपर नीचे करते हुए उसके अंदर अपनी बुर के अंदर अंदर बाहर कर रही है.... शुभम पूरी तरह से गरमा चुका था.. कल्पना में भी सरला की गरम शिसकारियों की आवाज उसे साफ महसूस हो रही थी उसके कानों में जैसे मधुर संगीत बज रही हो...
उसका हाथ अपने लंड पर और ज्यादा तेज गति से चलने लगा...और देखते ही देखते हल्की चीख के साथ शुभम के लंड से तेज पानी का फव्वारा छत की तरफ फूट पड़ा जो कि उसके पेट के ऊपर ही गिरा वह पूरी तरह से संतुष्ट हो चुका था कल्पना में भी सरला को चोदने का एहसास उसे एकदम मस्त कर गया था आखिरकार वह अपने लंड की गर्मी को शांत करके नंगा ही लेट गया...

दूसरी तरफ जो हाल शुभम का था वही हाल सरला का भी था बरसों के बाद अनजाने में ही सही किसी गैर मर्द की आंखों में उसकी मदमस्त नंगी चूचियों देखने की चमक ऊसे नजर आई थी। और बरसों के बाद ऐसा हुआ भी था कि किसी गैर मर्द ने उसके नंगे गोल गोल संतरे को देखा हो... उस पल का एहसास उसके बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ आ रहा था वह रह रहे कर उस पल को याद करके एकदम रोमांचित हो जा रही थी उसे बिल्कुल भी यकीन नहीं हो रहा था कि शुभम ने उसकी नंगी चूचियों को देखा है जो कि यह भी एकदम हकीकत ही था कि सरला अनजाने में ही उसकी तरफ घूम गई थी अगर उसे पता होता कि दरवाजे पर शुभम खड़ा है तो वह ऐसी गलती कभी नहीं करती लेकिन फिर भी उसे अपनी एक गलती पर पछतावा होने की जगह एक अजीब सा अहसास हो रहा था ऐसा लग रहा था कि उसके बदन में एक बार फिर से जवानी चिकोटि काट रही है.... बल्कि उसे इस बात का रंज रह गया था कि वह केवल उसे अपनी चुचियों के ही दर्शन क्यों कराई अगर वह हिम्मत दिखाते हुए अपनी साड़ी उठाकर उसे अपनी बड़ी बड़ी गांड भी दिखा दी होती तो मजा आ जाता...
सरला तैयार होने के बाद।


सरला इस तरह से अपने साड़ी उठाकर शुभम को अपनी मदमस्त बड़ी बड़ी गांड के दर्शन भी कराना चाहती थी।



यह बात सोचकर वह अपने आप पर ही गुस्सा कर रही थी और जिस तरह से शुभम ने जाते जाते बेखौफ होकर उसे उसके संतरों को लेकर खुले शब्दों में उसकी तारीफ के दो बोल बोल कर चला गया था उससे सरला एकदम उत्तेजित हो गई थी और टांगों के बीच की उत्पत्ति दरार में इसका असर गदर मचा रहा था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो भट्टी बरसों से ठंडी पड़ी थी जिसमें बरसों से एक चिंगारी भी नहीं फूटी थी आज उसमें आग लगी हुई थी।.... सरला कल्पनाओं में खोई हुई थी उसे साफ साफ महसूस हो रहा था कि जो जमीन जेठ और वैषाख की तपती गर्मी में सुखी पड़ी थी आज वह सावन की बूंदों के लिए तरस रही थी।उसे अपने बदन में हलचल महसूस हो रही थी और यह हलचल कोई सामान्य नहीं थी यह वही हलचल थी जो जवानी के दिनों में उसे महसूस होती थी और उस हलचल के असर में वह रात रात भर जागा करती थी।
ऐसा लग रहा था कि जैसे शुभम ने एक बार फिर से उसकी जवानी के दिनों को वापस लौटा दिया हो ... उसे अपने बदन में उत्तेजना महसूस हो रही थी और इस बात से वह काफी खुश नजर आ रही थी। इसलिए तो वह शुभम को याद करके अपने बिस्तर पर एकदम नंगी लेटी हुई थी और अपने दोनों हाथों से अपने बड़े-बड़े पपैया को पकड़ कर मसल रही थी... उसे यकीन नहीं हो रहा था कि बरसों के बाद उसकी जिंदगी में ऐसा पल आया था कि वह अपने बिस्तर पर एकदम नंगी लेटी हुई थी और वह भी मदहोश कामातुर होकर... जिस तरह से वह जोर जोर से अपनी चूचियों को मसल रही थी...एकदम मदहोश होने लगी उसके अंग अंग में उत्तेजना चिकोटि काट रही थी खास करके उसकी टांगों के बीच जिसमें से मधुर रस किसी गुलाब जामुन के रस की तरह बह रहा था वह एक हाथ नीचे की तरफ ले जाकर अपनी बुर की गुलाबी पत्तियों को मसल ना शुरू कर दी जिस पर अंगुलियों का दबाव पड़ते ही वह सिहर उठी... देखते ही देखते मदहोशी के आलम में खुमारी का नशा ऐसा छाया कि वह अपनी आंखों को बंद करके शुभम के बारे में सोचने लगी...उसे ऐसा महसूस होने लगा कि जैसे उसकी चुचियों को वह खुद नहीं बल्कि शुभम हम इतनी मजबूत हथेलियों में लेकर जोर जोर से दबा रहा है और उसे मुंह में लेकर पी रहा है वह इस तरह की कल्पना करते हुए मस्त होने लगी... देखते ही देखते अपनी दोनों टांगे फैला कर अपनी बुर के अंदर अपनी दो उंगलियां डालकर उसे चोदना शुरू कर दी और ऐसा सोचने लगी कि जैसे अपने हाथों से शुभम उसकी दोनों टांगों को फैला कर अपने मोटे तगड़े लंड को उसकी बुर में डालकर उसे चोद रहा है...
देखते ही देखते हैं उसके मुख्य से गर्म शिसकारियों की आवाज उसके कमरे में गूंजने लगी....
औहहहहहह सुभम.... आहहहहहहहह यह क्या कर रहा है रे तू मुझे पागल कर रहा है बस ऐसे ही जोर जोर से धक्के लगा और जोर से धक्के लगा मेरी बुर में अपना लंड डालकर मेरी बुर का कचुंबर बना दे मेरी बुर तेरे लंड के लिए तरस रही है और जोर जोर से चोद.. ‌आहहहहहह आहहहहहहहह

वह इस तरह की आवाज निकालते हुए कल्पना हमें शुभम के द्वारा चुदाई का आनंद लेते हुए पागल हुए जा रहे थे उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे उसकी दोनों टांगों के बीच शुभम अपना मोटा लंड उसकी बुर में डालकर उसे चोद रहा है जबकि वह जोर-जोर से अपनी उंगली को अपनी बुर के अंदर बाहर कर रही थी और देखते ही देखते शुभम का नाम लेकर वो झड़ गई जब आंख खुली तो शुभम को वहां ना पाकर वह अपने पागलपन पर मुस्कुराने लगी और वह भी बिना कपड़े पहने उसी तरह से नंगी सो गई...

रुचि भी अपने कमरे में गाउन पहनकरबिस्तर पर करवटें बदल रही थी और करवटें बदलने से बिस्तर पर बिछी चादर पर सिलवटें पड़ चुकी थी उन सिल्वर टो को देखकर हुआ अपनी किस्मत को कोस रही थी क्योंकि वह सोच रही थी कि बिस्तर पर इस तरह की सिलवटें तभी पड़ती है जब को औरत मर्द के साथ जमकर चुदाई करवाती है .. लेकिन वह अपनी किस्मत पर रो रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे चादर पर पड़ी सिलवटें उसका मजाक उड़ा रही हो वह अपने पति की कमी बिस्तर पर साफ तौर पर महसूस कर रही थी लेकिन फिर मन में सोचती कि अगर उसका पति उसके पास होता भी तो क्या करता बस बिना बताए उसके ऊपर चढ़ जाता है और 2 4 धक्कों के साथ ही पानी निकाल कर फिर से करवट लेकर सो जाता... अपने पति के इस व्यवहार से वह एकदम दुखी हो चुकी थी जिस तरह की कल्पना का शादी से पहले अपने पति को लेकर करती थी उस कल्पना से भी परे थी उसकी जिंदगी चल रही थी शुभम को इस तरह से अपने से फ्लर्ट करता हुआ देखकर उसे शुभम उसकी कल्पनाओं का फिल्मी हीरो लगने लगा था शुभम की बातें उसे अंदर तक मस्त कर जाती थी जिस तरह का फ्लर्ट वाह करता था । उसकी बातें सुनकर उसे अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव होता था उसे साफ-साफ महसूस हो रहा था कि जब वह किचन में आकर उससे फ्लर्ट भरी बातें कर रहा था उन बातों को सुनकर हुआ काफी हद तक उत्तेजित हो गई थी और उसे अपनी टांगों के बीच उसकी बुर में से नमकीन पानी निकलता हुआ साफ महसूस हो रहा था और वह इतनी ज्यादा गीली हो चुकी थी कि वह खाना परोसने से पहले बाथरूम में जाकर अपनी पैंटी को उतार आई थी।
लेकिन इस समय वह बिस्तर पर करवटें बदल रही थी और अपनी किस्मत को कोस रही थी एक तो वैसे भी उसका पति उससे दूर ही रहता था और घर में अकेले रहकर अपनी जवानी के दिनों को गिन गिन कर बीतता हुआ देखकर वह आंखों से आंसू बहा रही थी।

सच कहा जाए तो इस समय उसकी बुर में खुजली मची हुई थी... मजबूरन वह अपनी बुर की खुजली को अपनी उंगली से तो कभी बैगन केला जैसे फलों से मिटाने के लिए मजबूर हो जाती थी... वह चाहती तो आज भी वह अपनी बुर की खुजली को अपने हाथों से मिटा सकते थे लेकिन वह सिर्फ बिस्तर पर करवटें बदलती रही.. करवटें बदलते बदलते कब उसकी आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला ‌‌।
 
रात को निर्मला की मदमस्त जवानी देखकर अशोक से रहा नहीं गया और वह बिस्तर पर लेटी हुई निर्मला की गाउन में से झांकती आर्ट की गांड को देखकर उत्तेजित हो गया और उत्तेजना वश वह अपना हाथ आगे बढ़ा कर निर्मला की गोल-गोल कहां पर रखते हुए उसके बेहद करीब होकर उसके कान में बोला।

तुम बहुत खूबसूरत हो निर्मला.....(लेकिन निर्मला उसकी बात को अनसुना करके आंख बंद करके लेटी रही.. ‌निर्मला की गोरी गोरी गांड उसे पागल बना रही थी वह अपनी हथेली उस पर फिरा रहा था... नितंबों का मखमली एहसास उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर बढ़ा रहा था। महीनों गुजर गए थे अशोक ने निर्मला के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाया था। अशोक तो अपनी बहन के साथ मस्ती भरे पल बिता कर अपनी वासना शांत कर लेता था। क्योंकि जिस तरह की हरकत अशोक चाहता था उस तरह की हरकत निर्मला उसके साथ बिल्कुल भी नहीं करती थी इसलिए वह निर्मला के साथ कभी भी शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा नहीं रखता था लेकिन आज बिस्तर पर अपनी बीवी की अधनंगी गांड देखकर उसकी टांगों के बीच हलचल होने लगी। उससे रहा नहीं गया और वह अपनी बीवी की गोल-गोल गांड को से लाते हुए उसे अपने साथ संबंध बनाने के लिए प्रेरित करने लगा। लेकिन वह अच्छी तरह से जानती थी कि अशोक के साथ चुदवाने में उसे जरा भी मजा नहीं आएगा।... जहां पर तलवार से जंग जीतना जरूरी होता है वहां पर सुई से लड़ना बेवकूफी होती है यह बात निर्मला को अच्छी तरह से समझ में आ गई थी वह अच्छी तरह से जानती थी कि उसके पति का लंड छोटा और ज्यादा मोटा नहीं था उसके मुकाबले उसके बेटे का लंड उसके पति की अपेक्षा काफी मोटा और काफी लंबा था जिससे वह चुदकर संतुष्टि भरा एहसास महसूस करती थी.. और वैसे भी अशोक का व्यवहार उसके प्रति कुछ कुछ नहीं बल्कि बहुत ही ज्यादा अच्छा नहीं था इसलिए उसकी इच्छा नहीं हो रही थी कि वह अशोक का साथ दें इसलिए वह उसका हाथ हटाते हुए बोली।

हटिए मुझे सोने दीजिए मुझे नींद आ रही है....

क्या कर रही हो जान मेरी नींद उड़ा कर तुम खुद चैन से सोना चाहती हो। (इतना कहते हुए वह निर्मला की गाउन को थोड़ा और ऊपर उठाकर उसकी मस्त गोरी गांड को सहलाने लगा जिस पर लाल रंग की पेंटी बहुत ही ज्यादा फब रही थी। इस बार फिर से निर्मला उसका हाथ पकड़कर दूर हटा दी. ‌)

क्या कर रही हो निर्मला मैं तुम्हारा पति हूं और मुझे पूरा हक है तुम्हारे साथ कुछ भी करने के लिए।....

पति ......आज तुम्हें यह ख्याल आया कि आप मेरे पति हो आप मेरे साथ कुछ भी कर सकते हो और तभी जब तुम्हारे बदन में आग लगी हो और उस आग बुझाने के लिए आप मेरे साथ कुछ भी कर सकते हो...(निर्मला गुस्से में अपनी पति की तरफ देखते हुए बोली...) बरसों से मैं आप से तिरस्कृत का एहसास करते आ रही हूं... मुझे तो अब अहसास ही नहीं होता कि आप मेरे पति हैं मुझे ऐसा लगने लगा कि जैसे मैं इस घर में नौकर हूं....

यह क्या कह रही हो निर्मला तुम अच्छी तरह से जानती हो कि मैं काम में व्यस्त रहता हूं मुझे टाइम ही नहीं मिलता कि मैं तुम्हारे साथ बैठकर प्यार की बातें कर सकूं....

अब रहने दो बातें बनाने को मैं अच्छी तरह से जानती हूं मैं आपको पहले से ही पसंद नहीं हूं क्योंकि मैं दूसरी औरतों की तरह तुम्हारे साथ खुलकर प्यार नहीं कर सकती इसलिए तुम मुझसे प्यार नहीं करते....

(निर्मला की बातें सुनकर अशोक का मन थोड़ा पिघल रहा था उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि वह निर्मला के साथ अब तक पहुंच ज्यादा ज्यादती करता आ रहा था... वह अपने मन में यह सोच रहा था कि उसे मिला के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए था क्योंकि इंसान भटक कर थक हार कर आखिरकार अपने घर पर ही वापस लौटता है जहां पर उसे सुकून मिलता है इस बात का एहसास उसे भी अच्छी तरह से ताकि देवला बेहद खूबसूरत औरत थी जो कि उसकी हर जरूरत को पूरा कर सकती है लेकिन वही उसकी तरफ से किसी भी प्रकार की हरकत ना देखकर उससे मुंह मोड़ लिया था और इस समय उसके बदन में आग लगी हुई थी उसे बुर की जरूरत है जो कि निर्मला के पास बेहद खूबसूरत बुर थी। वैसे भी लगभग लगभग 7 दिन तक उसे चोदने के लिए कोई बुर मिलने वाली नहीं थी क्योंकि उसकी बहन की पीरियड चालू थे और ऐसे में शारीरिक संबंध बनाना ठीक नहीं था इसलिए वह आज अपने बदन की प्यास बुझाने के लिए अपनी पत्नी का सहारा लेना चाहता था जो कि उसके व्यवहार की वजह से ही आज वह उसे हाथ लगाने नहीं दे रही थी वह मन में सोचने लगा कि अगर वह अपनी पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार रखता तो बिना किसी झिझक के वह उससे प्यार करती है या तो उसे प्यार करने देती लेकिन अब उसे मनाना जरूरी था इसलिए वह बोला।)

मैं जानता हूं निर्मला कि मैंने तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया हूं लेकिन मैं दिन-रात काम करता हूं किसके लिए सिर्फ तुम्हारे लिए तुम्हारी खुशियों के लिए कि तुम्हें और शुभम को किसी बात की तकलीफ ना हो तुम दोनों अच्छे से रहो इसलिए तो मैं दिन रात मेहनत कर रहा हूं....

सिर्फ ऑफिस में ही काम करते रहना कभी इस बात की खबर मत लेना कि घर में तुम्हारी बीवी भी है जो कि तुम्हारा इंतजार करती रहती है तुम्हारे तरफ से दो प्यार के बोल सुनने के लिए तड़पती रहती है।...

ओफ्फौ.... निर्मला किसने कहा कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।... चलो कोई बात नहीं अब से मैं तुम्हें रोज प्यार करूंगा मैं तुमसे वादा करता हूं...

आप झूठ कह रहे हैं सुबह होते ही सब कुछ भूल जाएंगे...(निर्मला कोई ऐसा बच्चा तो नहीं लग रहा था लेकिन पत्नी धर्म निभाना भी बहुत जरूरी था इसलिए वह ऊपरी मन से यह सब बातें कर रही थी।)

निर्मला यह कैसी बातें कर रही हो मैं दिल से वादा कर रहा हूं चलो मैं तुम्हें कल घुमाने ले चलूंगा और ढेर सारी शॉपिंग भी कराऊंगा...बहुत दिनों से तुम्हारे लिए किसी भी तरह की मैंने ज्वेलरी नहीं खरीदा हूं चलो कल तुम्हें अच्छा सा हार दिला देता हूं..
(हार के बारे में सुनते ही निर्मला अंदर ही अंदर खुश होने लगी क्योंकि उसे भी ज्वेलरी का बहुत शौक था लेकिन बहुत सालों से उसने यह शौक भी अपने अंदर दबाकर दफन कर दी थी... अशोक निर्मला से वादा करते हुए अपने होठ आगे बढ़ा कर उसके होठों पर रखकर उसे चूमना शुरू कर दिया... और उसे चूमते हुए उसका गाउन पकड़ कर ऊपर की तरफ उठा दिया जो कि उसकी बांहों से होता हुआ उसे निकालकर निर्मला को लगभग लगभग नंगी कर दिया उसके बदन पर केवल लाल रंग की पेंटी और लाल रंग की ब्रा ही रह गई थी उसे भी अशोक उतारने में जरा भी समय नहीं लिया। बिस्तर पर निर्मला एकदम नंगी बैठी हुई थी..
निर्मला की बड़ी-बड़ी गोल चुचियों को देखकर अशोक के मुंह में पानी आ गया काफी समय के बाद अशोक अपनी बीवी को नंगी देख रहा था और उसकी कसी हुई चूची को देखकर वह एकदम पागल हो गया वह दोनों चूचियों को हाथ में लेकर उसे बारी-बारी से अपने मुंह में लेकर पीना शुरु कर दिया...निर्मला की इच्छा बिल्कुल भी नहीं हो रही थी कि वह बिस्तर पर अशोक का साथ दें लेकिन एक औरत होने की वजह से एक मर्द के द्वारा इस तरह की हरकत पाकर हुआ भी गर्म होने लगी...लेकिन जैसा कि वह पहले थी उसी तरह से वह कोई भी हरकत नहीं कर रही थी क्योंकि वह जानबूझकर ऐसा नहीं कर रही थी वह जानबूझकर अशोक के सामने ठंडी औरत बने रहना चाहती थी क्योंकि उसकी कोई भी ऐसी हरकत अशोक को शक करने पर मजबूर कर सकती थी क्योंकि अच्छी तरह से जानता था कि निर्मला की तरफ से उसे किसी भी प्रकार की हरकत की उम्मीद नहीं थी। इसलिए वह उसी तरह से बैठी रही और अशोक की हरकतों का आनंद लेने लगी.... अपनी बीवी की गोरी गोरी बाहों में बाहें डाल कर उसके मदमस्त जवानी का रस पी रहा था अशोक पागल में जा रहा था धीरे-धीरे वह उसे बिस्तर पर पीठ के बल लेटा दिया और अपने कपड़े उतारने लगा देखते ही देखते वह भी पूरी तरह से नंगा हो गया उसका लंड ऊतेजना के मारे खड़ा था लेकिन शुभम के लंड के आगे आधा ही लग रहा था। अपने पति के लंड पर नजर पड़ते ही निर्मला मन ही मन उसे गाली देने लगी लेकिन क्या करते हैं एक वफादार और शरीफ पत्नी होने के नाते अपना पत्नी धर्म निभा रही थी। देखते ही देखते अशोक की आंखों में उत्तेजना और मादकता की खुमारी छाने लगी.... निर्मला के अंगों के मादक उठाव और कटाव को देखकर वह मदहोश होने लगा ... अशोक निर्मला की टांगों को खोल कर उसकी बुर के दर्शन करके मस्त हो गया क्योंकि उस पर हल्के हल्के बाल उगे हुए थे जो कि अशोक की हरकतों की वजह से उसके बदन में भी उत्तेजना का असर देखने को मिल रहा था जिसकी वजह से उसकी बुर कचोरी की तरह फूल गई थी....
इस समय ऐसा लग रहा था कि निर्मला की रसभरी बुर मदन रस से भरा हुई कुंवा हो और अशोक प्यासा... वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था... निर्मला बिस्तर पर एकदम नंगी लेटी हुई थी और उसका दूधिया गोरा बदन ट्यूबलाइट की रोशनी में और ज्यादा चमक रहा था उसकी उन्नत तनी हुई चूचियां अशोक के होश उड़ा रही थी .. वास्तव में निर्मला की मदहोश अंगड़ाई लेती हुई बेलगाम जवानी को संभाल पाना अशोक के बस में बिल्कुल भी नहीं था.... देखा जाए तो अशोक को खामखा निर्मला की जवानी से उलझ रहा था क्योंकि यह तय था कि उसके कमजोर लंड से उसकी मदहोश जवानी पानी फेंकने वाली बिल्कुल भी नहीं थी निर्मला की मदहोश जवानी जोकि शुभम की संगत में बेलगाम हो चुकी थी और उस बेलगाम जवानी को बस में करने के लिए केवल शुभम के बस की बात थी...
अशोक नऎ खिलाड़ी की तरह मैदान में अपना करतब दिखाने के लिए डंटा हुआ था। उसे काफी समय हो चुका था इस नए मैदान को समझने के लिए इसलिए तरह से कहा जाए तो यह मैदान अशोक के लिए बिल्कुल नया हो चुका था क्योंकि इस मैदान पर कोई मंजा हुआ खिलाड़ी रोज बल्लेबाजी करता था।
और उस खिलाड़ी ने इस मैदान के हवामान को अच्छी तरह से समझ लिया था ‌।
देखते ही देखते अशोक निर्मला की टांगों को फैला कर उसकी टांगों के बीच आ गया और अपनी बीवी की फूली हुई कचोरी जैसी बुर देखकर अपनी लालच को रोक नहीं पाया और अपना मुंह आगे बढ़ाकर किसी कुत्ते की तरह दूध से भरे हुए कटोरी नुमा जीभ से चाटना शुरु कर दिया.... निर्मला के बदन में भी उत्तेजना अपना असर दिखा रही थी लेकिन जिस तरह की सनसनाहट उसे अपनी बुर में उसके बेटे के चाटने से होती थी उस तरह की सनसनाहट अपने पति के चाटने से बिल्कुल भी नहीं हो रही थी वह केवल शून्य मनष्क आंखों से अशोक की तरफ देख रही थी जो कि लपालप उसकी बुर के मदन रस को जीभ से चाट रहा था। उसी अपनी बुर का मदन रस बेहद स्वादिष्ट लग रहा था... देखते ही देखते एक औरत होने के नाते अपने बदन में बदलते भाव को देखकर उसे भी मजा आने लगा जीतो कर रहा था कि वह अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा कर अशोक के बालों को मुट्ठी में भींचकर उसे अपनी बुर से सटा दें...लेकिन वह अपनी तरफ से इस तरह की कोई भी हरकत नहीं करना चाहती थी क्योंकि अशोक के साथ उसने अभी तक इतना खुलापन कभी भी नहीं दिखाई थी इसलिए वह इस तरह की हरकत करने से डर रही थी कि कहीं ऐसा करने से उसके पति को शक ना हो जाए कि कहीं उसकी पत्नी किसी गैर मर्द के साथ संबंध नहीं बनाती है क्योंकि काफी दिनों से अशोक के मुताबिक वह शारीरिक संबंध नहीं बनाई थी ।

अशोक को मजा आ रहा था वह जितना हो सकता था उतनी चीप अपनी बुर के अंदर डालकर जा रहा था और एक हाथ से अपने लंड को लगातार हिला रहा था क्योंकि बुर चटाई पर ध्यान देने पर उसका लंड ढीला पड़ जा रहा था और वह ऐसे नहीं होने देना चाह रहा था। थोड़ी देर तक बुर से उलझने के बाद वह फिर से टांगों के बीच आ गया और इस बार वह निर्मला की दोनों टांगों को पकड़कर अपनी जांघों पर चढ़ा लिया.. ‌ निर्मला से ज्यादा तेज गति से अशोक की सांसे चल रही थी। निर्मला अपनी गर्दन उठाकर अपने पति के लेने की तरफ देखी तो उसमें जवानी से भरा हुआ कड़क पन बिल्कुल भी नहीं था बार-बार ढीला पड़ जा रहा था। उसे देखते ही वह समझ गए कि रात भर उसे करवट बदल कर रात काटनी पड़ेगी और इससे ज्यादा उसके पास जुगाड़ भी नहीं था देखते ही देखते अशोक अपनी ढीले लंड को निर्मला की कसी हुई बुर में डालने की कोशिश करने लगा जैसे तैसे करके वह बुर की गहराई में अपना लंड डाल कर कामयाब हुआ लेकिन निर्मला को कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था ‌। इसमें उसका दोष बिल्कुल भी नहीं था जहां पर वहां घोड़े जैसे मजबूत लंबे मोटे तगड़े लंड से चुदाई का रोजाना दिल लूट रही थी वही उसी गुलाबी छेद में पतले से छोटे लंड से कहां पता चलने वाला था हालांकि पत्नी धर्म निभाते हुए वह उसी तरह से बिस्तर पर पड़ी रही और अशोक पागलों की तरह अपनी कमर को ऊपर नीचे करके हिलाना शुरू कर दिया।
लेकिन ऐसा लग रहा था कि जैसे अशोक इस मैदान पर बार-बार फिसल जा रहा हो.... ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके सामने हर एक बोल बाउंस फेंकी जा रही हो और वह कोशिश तो भरपूर कर रहा था लेकिन एक भी गेंद उसके बल्ले पर आ नहीं रही थी। वह काफी ताकत लगाकर धक्के पर धक्के लगा रहा था लेकिन उसका हर एक धक्का निर्मला को महसूस ही नहीं हो रहा था और जैसा कि उसने अपने पति से उम्मीद बांध रखी थी ठीक वैसा ही हुआ 10:12 धक्को मे ही उसकी विकेट उखड़ गई।
उसके लंड में पानी फेंक दिया निराशा तो अशोक को भी हुई क्योंकि वह कुछ देर तक अपनी बीवी के बदन से खेलना चाहता था लेकिन ऐसा हो नहीं पाया जैसे ही उसके लंड ने पानी फेंका हुआ निढाल होकर उसके ऊपर ही गिर गया ऐसा लग रहा था कि जैसे शरीर में से जान चली गई हो और दूसरी तरफ निर्मला का दिमाग खराब हो गया था अच्छी तरह से समझ गई थी कि अशोक से कुछ भी होने वाला नहीं है बेवजह पहले अशोक से शारीरिक सुख की इच्छा रखती थी जब से अपने बेटे से उसके लंड से चुदने लगी तब से अशोक को वह लगभग भूल ही चुकी थी।
खेल थोड़ा ही सही लेकिन अशोक को मजा आ गया था वह निढाल होकर सो गया और निर्मला कुछ देर तक अपने हाथों से अपने बुर रगड़ती हुई सो गई...
दूसरे दिन शुभम नहा धोकर तैयार हो गया था स्कूल जाने का समय हो गया था। वह अपनी मम्मी से स्कूल जाने के लिए कहा था वह इंकार कर दी...
निर्मला अशोक से कह चुकी थी कि शुभम को भी ले चलते हैं लेकिन वह यह कहकर इंकार कर दिया कि सिर्फ मैं और तुम चलेंगे बस शुभम को स्कूल जाने दो इसलिए निर्मला शुभम से बोली।

बेटा आज तुम अकेले चले जाओ मुझे शॉपिंग करने जाना है और मैं तुम्हारे लिए भी अच्छे अच्छे कपड़े खरीद कर ले आऊंगी।....

लेकिन मैं जाऊंगा कैसे...

बेटा आज ऑटो से चले जाओ...

क्या पापा....?

देखो बेटा आज तुम औरतों से स्कूल चले जाओ और आज शाम को तुम्हें तुम्हारी नई बाइक मिल जाएगी।
(नहीं भाई के बारे में सुनते ही शुभम खुशी से झूम उठा और खुशी के मारे वह अपने पापा के गले लगते हुए बोला।)

ओ पापा तुम बहुत अच्छे हो..... ठीक है मैं ऑटो से चला जाता हूं लेकिन अपना वादा मत भूलना शाम को मुझे नई बाइक चाहिए।

प्रॉमिस शाम को तुम्हें तुम्हारी नई बाइक मिल जाएगी.
(अपने पापा की बात सुनकर शुभम बहुत खुश हुआ और जाते-जाते बोला था।)

बाय मम्मी बाय पापा शाम को भूलना मत मेरी नई बाइक (और इतना क्या करवा चला गया..... निर्मला नई ज्वेलरी और शॉपिंग को लेकर काफी उत्साहित ही काफी समय हो गया था उसे इस तरह से शॉपिंग किए हुए अपने पति के साथ वाह शॉपिंग करना लगभग भूल ही गई थी... उसके पति ने नवी जवेरी और शॉपिंग का वादा देकर रात को उसके साथ चुदाई सुख प्राप्त किया था हालांकि इस जुदाई में निर्मला को जरा भी फर्क नहीं पड़ा था लेकिन फिर भी वह खुशी अपनी पत्नी धर्म निभा कर उसके एवज में उसे महंगे गहने खरीदने का मौका मिल रहा था लेकिन उसे अंदर ही अंदर ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वह कोई रंडी हो जिसे लालच देकर उसकी बुर हासिल कर लिया गया हो...
फिर भी वह उत्सुक थी खरीदारी के लिए शुभम के जाने के बाद थोड़ी ही देर बाद दोनों कार में निकल गए शॉपिंग करने के लिए...

स्कूल में शीतल अपनी स्कूटी पार्क कर रही थी कि तभी ऑटो से शुभम को अकेला उतरता हुआ देखकर उसके दिल की धड़कन बढ़ गई उसके मन में उत्सुकता होने लगी क्योंकि निर्मला उसके साथ नहीं थी इसलिए वह खुद आगे बढ़कर उसके पास जाने लगी और शीतल को अपने करीब आता देखकर शुभम भी काफी खुश नजर आ रहा था।

क्या बात है आज तुम अकेले आए हो तुम्हारी मम्मी कहां है।

मम्मी आज शॉपिंग करने गई है मैं अकेला ही आया हूं। (अकेला आने की बात सुनते ही सीतल की बुर कुलबुलाने लगी। . इस बात को लेकर उसके चेहरे की चमक बढ़ गई थी और होठों पर मुस्कान आ गई थी। शुभम भी कहां पीछे रहने वाला था उसकी प्यासी नजरें शीतल की दोनों घाटियों के बीच फंसी हुई थी वह नजर भर कर उन घाटियों में खो जाना चाह रहा था। इस पल का फायदा उठाते हुए शीतल जानबूझकर लंबी सांस लेकर छोड़ने लगी क्योंकि ऐसा करने से उसकी उन्नत चुचीयां और ज्यादा उभार लेकर ऊपर नीचे हो रही थी... यह देखकर शुभम का लंड अंगड़ाई लेने लगा... वह दोनों कुछ और बातें कर पाते इससे पहले ही स्कूल के शुरू होने की घंटी बज गई और शीतल सिर्फ इतना ही कह पाए कि रिसेस में मुझसे मिलना इतना कह कर चली गई शुभम भी शीतल को जाते हुए कुछ पल तक देखता रहा वह शीतल को नहीं बल्कि शीतल के कमर के नीचे भाग को देख रहा था जो कि इस समय से इधर कुछ ज्यादा ही अपनी गांड को मटका कर चल रही थी वह जानती थी कि शुभम की नजर उसके नितंबों पर होगी और वह यही देखने के लिए एक बार पीछे मुड़कर देखी तो वास्तव में शुभम उसकी मधभरी गांड को ही देख रहा था और यह देखकर वो हंसती हुई चली गई शुभम भी अपने क्लास में जाकर बैठ गया। और रिशेष होने का इंतजार करने लगा।
 
शुभम क्लास में बैठकर बेसब्री से रिसेस की घंटी बजने का इंतजार कर रहा था क्योंकि आज उसके मन में जरा सा भी डर नहीं था क्योंकि वह जानता था कि उसकी मां आज स्कूल नहीं आई है और अपनी मां की ही वजह से वह शीतल से मिलना जुलना बंद कर दिया था हालांकि उसके मन में उत्सुकता बहुत होती थी शीतल जैसी खूबसूरत औरत से मिलने के लिए लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था बहुत दिनों बाद आज मौका हाथ लगा था कि वह शीतल से मिल पाएगा इसलिए उसके मन में घंटी बज रही थी।.... यही हाल शीतल का भी हो रहा था निर्मला की स्कूल आने की वजह से उसके तन बदन में रोमांच की लहर उठ रही थी क्योंकि काफी दिनों बाद वह आज शुभम से मिलने वाली थी उसके तन बदन में हलचल मचने लगी खास करके उसकी दोनों चिकनी जांघों के बीच की उस पतली दरार के अंदर जिसमें शुभम के मोटे लंड को अंदर लेने के लिए वह मचल रही थी....... क्लास में पढ़ाते पढ़ाते उसे अपनी पेंटी गीली होती हुई महसूस हो रही थी....
उत्तेजना की वजह से उसे बहुत जोरों की पेशाब लगी हुई थी जो कि वह बहुत देर से रोके हुए थी.. वह रिसेस होने का इंतजार कर रही थी। ऐसा नहीं था कि स्कूल के सारे लड़के केवल निर्मला को ही ताड़ने में लगे रहते थे। शीतल के साथ भी बिल्कुल वैसा ही होता था जब भी शीतल खड़ी होकर ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिखती थी तो सारे मनचले लड़कों की प्यासी आंखें शीतल की थीरकती हुई मदमस्त गांड पर ही टिकी रहती थी। सारे लड़कों की एक ही ख्वाहिश होती थी कि वह शीतल की मदमस्त नंगी गांड को अपनी आंखों से देख सकें... लड़कों को इतना तो पता ही था कि शीतल की मदमस्त गांड जब कसी हुई साड़ी में इतना कर जाती है तब साड़ी के अंदर कैसा जलवा बिखेरती होगी... हालांकि जिस तरह से स्कूल के मनचले लड़के बाथरूम में बने छोटे से छेद से झांककर निर्मला की मदमस्त अद्भुत और अतुल्य गांड के दर्शन करते थे उस तरह का मौका उन्हें शीतल की गांड देखने को नहीं मिल पाती थी क्योंकि शीतल बाथरूम का उपयोग बिल्कुल भी नहीं करती थी... वह घर से ही पेशाब करके आती थी और घर पर जाकर ही करती थी कभी कबार ऐसा हो जाता था जब उसे महसूस होने लगता था कि अब उसे से पेशाब रोक पाना नियंत्रण के बाहर है तब वह स्कूल में बने बाथरूम का उपयोग जरूर कर लेती थी लेकिन वह भी चालू क्लास में ना कि रिसेस में लेकिन आज वह रीशेष होने का इंतजार कर रही थी।....

आखिरकार इंतजार की घड़ियां खत्म हुई और दीवार घड़ी में जैसे ही रितेश का समय हुआ वैसे ही तुरंत शीतल के कानों में घंटी की मधुर ध्वनि सुनाई देने लगी।इस घंटी की आवाज के साथ ही स्कूल में बहुत लोगों की उत्सुकता खत्म होने लगी क्योंकि बहुत से लोगों को घंटी बजने का इंतजार था उनमें से क्लास के कुछ मनचले लड़के और शुभम भी था।
दूसरी क्लास के लड़कों को क्लास में निर्मला की के हाजिरी से इतना तो पता चल ही गया था कि आज उनकी सपनों की रानी निर्मला स्कूल नहीं आई थी इसलिए उन लोगों में निराशा फैल गई थी क्योंकि उनकी सुबह का तो पता नहीं लेकिन दिन की शुरुआत निर्मला की मदमस्त गोरी गोरी बड़ी बड़ी गांड के दर्शन करके ही होती थी लेकिन आज का दिन शायद उन लोगों के लिए कुछ खास गुजरने वाला नहीं था लेकिन फिर भी अपने मन की तसल्ली के लिए वह लोग भी बाथरूम की तरफ जाने लगे जहां पर शीतल गई हुई थी शीतल को इतने जोरो की प्रेशर के साथ पेशाब लगी हुई थी कि वह लगभग दौड़ने के अंदाज में बाथरूम की तरफ जा रही थी ... शीतल को बाथरूम की तरफ जाता हुआ देखकर मनचले लड़कों में रोमांच की लहर दौड़ने लगी उन्हें आशा की किरण नजर आने लगी जहां कुछ नहीं वहां तिनके का सहारा ही सब कुछ होता है लेकिन यह तिनका भी कोई ऐसा वैसा तिनका नहीं था यह भी एक पहाड़ जैसा ही सहारा था। उनके धड़कते दिल की तसल्ली के लिए शीतल ही काफी थी। जैसे ही सीतल बाथरूम का दरवाजा खोलकर बाथरूम में प्रवेश की वैसे ही उसके ठीक बगल वाले बाथरूम में मनचले लड़कों की फौज सटासट अंदर की तरफ घुस गई ‌।

यार आज तो शीतल मैडम की गांड देखने को मिल जाती तो भी दिन सुधर जाता।

हां यार तू सच कह रहा है लेकिन जो बात निर्मला मैडम की गांड के दर्शन करने में है वह किसी मैडम की गांड में नहीं. ।

लेकिन आज निर्मला मैडम आई क्यों नहीं...

अरे आज दोनों टांगे फैला कर ले रही होंगी किसी का।...

नहीं नहीं ऐसा मत बोल मेरा दिल बैठा जाता है निर्मला मैडम ऐसी बिल्कुल भी नहीं है देखता नहीं उनके चेहरे से कितना नूर टपकता है।

साले चेहरे से तो नूर टपकता ही है उनकी बुर से भी नुर टपकता है...

काश निर्मला मैडम हमें मौका देती तो सच कहता हूं मैं तो उनकी बुर पर मुंह लगाकर उनका पैसाब कोका कोला समझकर गटक जाता।

सालों तुम लोग बस इतना ही सोच सकते हो निर्मला रानी की गांड देखकर जिस तरह से मेरा लंड खड़ा होता है कसम से अगर मुझे मौका मिल जाए तो उनकी बुर का कचुंबर बना दुं....

बस बस अब बिल्कुल भी बात मत करो आवाज नहीं आना चाहिए ..
(उन सभी लड़कों को आपस में इस तरह की गंदी बातें करते हुए उन्हें रोकते हुए एक लड़का बोला और सबको छोटे से छेद में नजर गड़ाने के लिए इशारा किया... सभी लड़के एकदम खामोश हो गए क्योंकि वह लोग अच्छी तरह से जानते थे कि जरा सी भी आहट से बाजू वाले बाथरूम में आवाज साफ से नहीं देती है इसलिए सब लोग शांत हो गए और उत्सुकता के साथ अपने खड़े लंड को ठंडा करने के लिए छोटे से छेद पर नजर रख दिए...... वह लोग उस छोटे से छेद पर नजर गड़ाए हुए थे और तभी धीरे से दरवाजा खोलकर शुभम अंदर प्रवेश किया और उसकी हाजिरी का उन लड़कों को आभास तक नहीं हुआ। शुभम को समझ में नहीं आया कि आखिरकार इतने सारे लड़के छोटे से छेद से क्या देखने की कोशिश कर रहे हैं वह भी उत्सुकता वश देखने लगा तो अंदर दूसरी तरफ के बाथरूम का नजारा देखकर एकदम दंग रह गया उसे साफ नजर आ रहा था कि दूसरी तरफ के बाथरूम में शीतल थी ...
Sheetal kuch is tarah se apni saree Lamar tak utha li jisse uski madmast gaand dikhne lagi



Sheetal ki badi badi Gori gaand dekhkar ladke paagal huye kaha Rahe the


Sheetal is tarah se apni gaand dikhate huye pesaab kar rahi thi


जोकि...धीरे-धीरे अपनी साड़ी ऊपर की तरफ उठा रही थी यह देखकर उसके साथ-साथ सारे लड़कों की दिल की धड़कन बढ़ने लगी और देखते ही देखते शीतल ने जल्दबाजी दिखाते हुए अपनी साड़ी को एकदम कमर तक उठा दी और ऐसा करने से उसकी लाल रंग की पेंटी जो कि जालीदार थी एकदम साफ नजर आने लगी...

यार शीतल मैडम भी क्या जोरदार माल है।

हां यार तू सच कह रहा है देख तो सही शाली पेंटी कितनी जालीदार पहनती है...

पहनती खुद होगी लेकिन उतारता कोई और होगा...

काश मुझे मौका मिलता इसकी पैंटी उतारने का तो जिंदगी सफल हो जाती है...
(शुभम दूसरी तरफ के बाथरूम के अंदर का नजारा देखते हुए उन लड़कों की गंदी बातें सुनकर मस्त हुए जा रहा था। उसे एक ही नहीं हो रहा था कि वह अपनी आंखों से जो देख रहा है वह हकीकत है शीतल को इस बात का आभास तक नहीं था कि उसे इस तरह से पेशाब करते हुए उसके ही उस स्कूल के मनचले लड़के देखकर गंदी गंदी बातें कर रहे हैं। देखते ही देखते शीतल अपनी लाल रंग की पेंटी को उतारने लगी ‌ जैसे-जैसे पेंटी नीचे की तरफ आ रही थी वैसे वैसे ऐसा लग रहा था कि जैसे बहुत ही खूबसूरत दृश्य के ऊपर से पर्दा उठ रहा हो ..और अगले ही पल शीतल की नंगी गोल-गोल बड़ी गांड सारे मनचले लड़कों की आंखों के सामने थी ऐसा लग रहा था कि जैसे ठंडी के मौसम में शीतल की मद भरी गरम गरम जवानी से वह लोग अपना हाथ सेक रहे हैं।
शीतल की नंगी गोरी गोरी गांड देखकर सभी लड़कों के मुंह से सिसकारी छूटने लगी शुभम को तब और ज्यादा हैरानी होने लगी जब एक साथ सभी लड़के अपने पेंट में से अपना लंड बाहर निकालकर उसे हीलाना शुरू कर दीए... यह नजारा देखकर तो शुभम के होश उड़े जा रहे थे...

हाय कातिल जवानी मेरे सपनों की रानी क्या गांड है यार इसकी... शादी दोनों टांगे फैला कर जब लंड पर बैठती होगी तो सामने वाले को कुदरत का हसीन तोहफा मिलता होगा..

हां यार सच कह रहा है तू कितना किस्मत वाला होगा इसका पति जो हर रात इसकी लेता होगा।।

अरे ना जाने कितने लोग इसकी लेते होंगे हमें क्या पता कितने लोगों को यह अपनी दोनों टांगे फैलाकर देती होगी।

साला अपना नंबर भी लग जाता तो मजा आ जाता...(शुभम को उन लोगों की गंदी बातें बेहद उत्तेजित कर रही थी और उन लोगों की बातें सुनते सुनते शुभम अंदर का नजारा देख रहा था और अगले ही पल शीतल अपने प्रेशर को रोक नहीं पाए और नीचे बैठकर पेशाब करना शुरू कर दें वह इतनी जोर से पेशाब कर रही थी कि उसकी बुर से आ रही सीटी की आवाज बाथरूम के बीच की दीवार के छेद को पार करके उन लड़कों के कानों तक सुनाई दे रही थी और पेशाब से आ रही सीटी की आवाज सुनते ही सभी लड़के एक साथ गर्म आहहह भरने लगे....

ससहहहहहहहहह.....आहहहहहहह..... क्या मधुर संगीत है यार कसम से ऊपर वाले ने बड़ी फुर्सत से शीतल मैडम को बनाया है....

लेकिन सच कहूं यार जो बात अपनी निर्मला मैडम की मदमस्त गार्ड और उनकी बुर में है वैसा मजा शीतल मैडम की गांड से नहीं आ रहा है लेकिन फिर भी मस्त कर दे रही है।

यार तुम सच कह रहा है अपनी निर्मला मैडम की बात ही कुछ और है जब वह अपनी साड़ी उठाकर अपनी बड़ी बड़ी गांड दिखाते हुए नीचे बैठकर पेशाब करती है तो समझ लो ऐसा लगता है कि सारी दुनिया वही थम सी गई हो और कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी सांस रुक जाए।

हां यार सच कह रहा है तू अपनी निर्मला मैडम की बात ही कुछ और है दिन भर में ना जाने कितनी बार निर्मलामैडमकीमत मस्त गांड के बारे में सोच सोच कर और उन्हें अपनी कल्पना में ना जाने कितनी बार चोद कर अपना पानी निकाल देता हूं।
(शुभम तो उन लोगों के मुंह से अपनी मां का जिक्र सुनते ही एकदम सन्न रह गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह सब लड़के उसकी मां के बारे में बात कर रहे हैं लेकिन यह हकीकत है कि वह लड़के सभी निर्मला के बारे में ही बातें कर रहे थे उसे गुस्सा तो आ रहा था लेकिन जिस तरह से वह लोग उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रहे थे उसे सुनकर शुभम की उत्तेजना और ज्यादा बढ़ने लगी थी अभी तक उन लड़कों को इस बात का आभास तक नहीं हुआ था कि वह जिस औरत के बारे में बातें कर रहे थे उसका बेटा उनके पीछे खड़ा होकर वह भी अंदर के नजारे का मजा ले रहा था....)

हां सच कह रहा है तू मैं तो उसको लाने से पहले बाथरूम में जाकर निर्मला का नाम ले लेकर उनकी याद में अपना लंड हिला कर पानी निकाल देता हूं।
(उन लोगों की चर्चा के बीच शीतल कुछ देर तक वहीं बैठ कर पेशाब करती रही...उसकी पुर से आ रही सीटी की आवाज से यह साफ पता चल रहा था कि वह कितने प्रेशर के साथ अपनी बुर से पैसाब फेंक रही थी। और उस सीटी की आवाज सुनकर शुभम का लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था।)

लेकिन यार आज पता नहीं चल रहा है कि निर्मला मैडम आई क्यों नहीं....

ले रही होगी शाली किसी का दोनों टांगे फैलाकर वैसे भी इस तरह की खूबसूरत औरतों के दीवाने हजार होते हैं..
(उस लड़के की बात सुनकर शुभम को बहुत गुस्सा आ रहा था वह कुछ बोलना चाह रहा था लेकिन अपने आप को संभाले हुए था‌)

तो क्या यार आज शीतल मैडम दोनों टांगे फैला कर अपनी बुर किसी को दे रही होंगी।

हां तो दे ही रही होंगी ना इतनी खूबसूरत बुर को कौन नहीं लेना चाहेगा अरे उनका पति नहीं लेता होगा तो दूसरा कोई लेता होगा।

यार मुझे तो शुभम पर तरस आता है कितना भोला भाला है कसम से अगर मैं उसकी जगह होता तो अब तक कितनी बार निर्मला रानी की चुदाई कर चुका होता...भले ही वह रिश्ते में मेरी मां लगती तो क्या हुआ ऐसी खूबसूरत औरत को भला कौन चोदना नहीं चाहेगा...

साले तू क्या अगर मैं भी उसका बेटा होता तो अब तक न जाने कितनी बार चढ़ गया होता....

साला सुभम में एकदम बेकार है इतनी खूबसूरत मम्मी होने के बावजूद बेकार की जिंदगी जी रहा है। साला हम लोग निर्मला मैडम की टांगों के बीच झांकने के लिए तरसते रहते हैं और मौका ढूंढते रहते हैं कि कब ऐसा सुनहरा मौका मिले की निर्मला मैडम की बुर के साथ-साथ उसे चोदने का मौका मिल जाए और शुभम साला भोला बना बैठा...यहां पर वह पौधा पढ़ने के लिए आ गया और घर पर कोई और उसकी मां की चुदाई कर रहा होगा ।
(शुभम को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन अंदर ही अंदर कहीं ना कहीं उन लोगों की बातें और वह भी उसकी मां की गंदी बातें सुनकर उसके मन में उत्सुकता के साथ साथ उत्तेजना भी बढ़ती जा रही थी... सामने दूसरी तरफ के बाथरूम में दृश्य पर पर्दा पढ़ने वाला था क्योंकि शीतल मैडम मुत चुकी थी... और वह खड़ी होने जा रही थी वह कपड़े पहन कर वह बाथरूम से बाहर निकलती इससे पहले ही शुभम दबे पांव से बाथरूम से बाहर निकल गया और दो कदम पीछे हट कर दीवाल की ओट से खड़े होकर शीतल के निकलकर जाने का इंतजार करने लगा और कुछ ही सेकेंड बाद शीतल अपने कपड़े ठीक करते हुए बाथरूम से बाहर निकली और अपनी क्लास रूम की तरफ जाने लगी और थोड़ी ही सेकेंड बाद सारे के सारे मनचले लड़के अपना पानी निकाल कर बाहर निकल आए...
अपनी मां के बारे में और शीतल मैडम की मदमस्त गांड को देखकर और उसे पेशाब करता हुआ देखकर शुभम काफी उत्तेजित हो गया था और वहां भी शीतल की क्लास रूम की तरफ जाने लगा।.....
 
बाथरूम में शीतल के खूबसूरत नंगे बदन के दर्शन करके और अपने सहपाठियों के द्वारा खुद अपनी ही मां के बारे में गंदी गंदी बातें सुनकर पूरी तरह से गर्मा चुका था... पजामे में लंड लोहे के रोड की तरह हो गया था जिसे वह सब की नजरों से छुपा कर निर्मला के क्लास रूम की तरफ आगे बढ़ रहा था।
क्लासरूम के करीब पहुंचा तो क्लास का दरवाजा हल्का खुला हुआ था वह धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर की तरफ देखा तो कुर्सी पर शीतल बैठी हुई थी जो कि उसी का ही इंतजार कर रही थी शुभम को देखते ही बोली।
Shubham ka damdar lund


आओ सुभम मैं तुम्हारा इंतजार कर रही हुं...(इतना कहकर वो खुद कुर्सी पर से उठकर उसकी तरफ आगे बढ़ी.... शुभम क्लास में प्रवेश कर चुका कि तभी आगे बढ़कर शीतल क्लास रूम का दरवाजा बंद करके सीटकिनी लगा दी.. दरवाजे को इस तरह से बंद करना एक तरह से शुभम के लिए इशारा था कि वह उससे प्यार करना चाहती है...शुभम के मन में लड्डू फूटने लगे जब वह इस तरह से शीतल को दरवाजा बंद करते हुए देखा तो.... दरवाजा बंद होते ही सीतल अपने आप पर काबू नहीं कर पाई और तुरंत शुभम की तरफ घूम कर उसे अपनी बाहों में भरते हुए बोली ....)

औहहहहहह शुभम तुम्हारे बिना में कितना तड़प रही हूं तुम नहीं जानते.... महीना गुजर गया लेकिन ऐसा लग रहा है कि तुम से मिले मुझे बरसों हो गया है....निर्मला नहीं आई है तब जाकर मुझे मौका मिला है तुम्हें इस तरह से अपनी बाहों में भरने का... क्या शुभम तुम्हें मेरे बिना अच्छा लगता है जो मुझसे बात तक नहीं करता.....

नहीं मैडम...

मैडम नहीं शीतल बोलो ...(शुभम की आंखों में देखते हुए बोली।)

शीतल सच कहूं तो तुम्हारे बिना मुझे एक पल भी अच्छा नहीं लगता लेकिन क्या करूं मजबूरी है ना तो हम दोनों उस दिन पकड़े जाते....

उस दिन की बात मत करो शुभम....

क्यों ना करूं शीतल सच कहूं तो मुझे उस दिन बहुत मजा आ रहा था जब तुम मेरा लंड मुंह में लेकर चूस रही थी मुझे तो ऐसा लग रहा था कि मैं हवा में उड़ रहा हूं...(शुभम जानबूझकर शीतल को उस दिन वाली बात और भाभी लंड चूसने वाली बात याद दिला रहा था क्योंकि उसका मन आज बहुत कर रहा था किसी पर उसका लंड मुंह में लेकर चूसने क्योंकि वैसे भी बाथरूम में शीतल की नंगी बड़ी बड़ी गांड देखकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था जो कि भेजा में में ठोकर मार रहा था बाहर निकलने के लिए....)

क्या सच में तुम्हें शुभम अच्छा लग रहा था उस दिन .

बहुत अच्छा लग रहा था शीतल बल्कि मुझे मम्मी पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि वह एन मौके पर आ गई थी। ...(शुभम थोड़ी हिम्मत दिखाते हुए अपने दोनों हाथों को शीतल की मखमली कमर पर रखते हुए धीरे-धीरे नीचे की तरफ बढ़ाया और शीतल की मदमस्त बड़ी-बड़ी कसी हुई गांड को अपनी हथेली में लेकर दबाते हुए उसे अपनी तरफ खींच लिया जिससे शुभम का मोटा तगड़ा लंड पजामी मिल होने के बावजूद भी अपनी ठोकर का एहसास शीतल की बुर की दिवारी के ऊपरी भाग पर करा गया ...

आहहहहहहहह .. शुभम धीरे तुम्हारा यह लंड बहुत चुभता है ....(शीतल कुछ भी छुपाना नहीं चाहती थी इसलिए सीधे-सीधे लंड शब्द का उपयोग कर गई क्योंकि वह सब कुछ जल्दी जल्दी करना चाहती थी इसलिए कोई झिझक मन में नहीं रखना चाहती थी शीतल के मुंह से लंड शब्द सुनकर शुभम की उत्तेजना बढ़ गई और वह और जोर से शीतल की गांड को मसलते हुए अपने लंड की तरफ दबाव देने लगा)

क्या करूं शीतल तुम्हें देखकर इसका बुरा हाल हो जाता है।

इसका बुरा हाल हो जाता है पागल हो गए हो बल्कि यह तुम्हारा यह लंड किसी औरत की बुर में चला जाए तो उसका बुरा हाल कर दे...(शीतल एकदम अश्लील गंदी शब्दों का प्रयोग करते हुए बोली जो कि शुभम को निरंतर उत्तेजना में वृद्धि कर रहा था शीतल के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर उसे मज़ा आ रहा था वह शीतल की बात का जवाब देते हुए बोला....)
Shubham k lund se khelti huyi sheetal

क्यों शीतल ऐसा कह रही हो मुझे तो नहीं लगता कि मेरे लंड में कुछ दम है कि जिस तरह का तुम कह रही हो उस तरह का हाल हो जाएगा....

तुम पागल हो शुभम मैं एक औरत हूं और एक औरत होने के नाते अच्छी तरह से जानती हूं कि औरतों की बुर को किस तरह का लंड चाहिए रहता है। सच कहूं तो हम मरते तुम्हारे जैसे मर्द के साथ-साथ तुम्हारे जैसे मोटे तगड़े लंड की कल्पना करते रहते हैं और शायद ही किसी को ऐसा लंड नसीब होता है....(शीतल पजामे के ऊपर से शुभम के तने हुए लंड को मसलते हुए बोली।)

तो क्या शीतल तुम्हारी मतलब कि तुम्हारी...(शुभम जानबूझकर अपनी बात कहते हुए डरने का नाटक करते हुए बोला...)

क्या तुम्हारी अरे जो कहना है साफ साफ कहो मुझसे क्यों शर्मा रहे हो...

मैं क्या कहना चाह रहा था शीतल की क्या मेरा लंड का तुम्हारी बुर में जाएगा तो क्या तुम्हें अच्छा लगेगा...(शुभम के मुंह से इस तरह से खुली बातें सुनकर और वह भी सीधे-सीधे उसकी चुदाई की बात सुनकर वह खुश होते हुए बोली ।)

तू पागल है मैं तो तड़प रही हूं तेरे लंड को अपने बुर में लेने के लिए बस मौका नहीं मिल रहा....

मौका तो है....(खाली क्लास रूम की तरफ देखते हुए बोला।)

नहीं नहीं यहां मौका बिल्कुल भी नहीं है..... हां लेकिन इतना कर सकती हूं....(इतना कहते हुए सीता एक बार फिर से शुभम के सामने अपने घुटनों के बल बैठ गई शुभम को समझते देर नहीं लगी कि आप वहां क्या करने वाली है अभी भी उन लोगों के पास 10 मिनट जैसा समय था.... शीतल एक पल भी गवांए बिना तुरंत शुभम के पेंट की बटन खोल कर तुरंत पेंट को घुटनों तक नीचे सरका दी... अंडरवियर में ऐसा लग रहा था कि जैसे खूंटा गड़ा हो जिसे देखते ही शीतल की बुर कुल बुलाने लगी और अपनी स्वीकृति दिखाने हेतु उसमें से मदन रस की दो-तीन बूंदे टपक गई जो कि पेंटी को गीला करने लगी। शीतल फुर्ती दिखाते हुए तुरंत शुभम की अंडरवियर को पकड़कर नीचे खींच दी अंडरवियर के नीचे आते हैं शुभम का मोटा तगड़ा लंड हवा में लहराने लगा और बड़ा ही भयानक लग रहा था लेकिन शुभम के भयानक मोटे तगड़े लंड को देखकर शीतल को जरा भी भय नहीं लग रहा था बल्कि उसकी आंखों में उसे पाने की उसे निकल जाने की चमक साफ नजर आ रही थी। शीतल शुभम की आंखों में आंखें डाल कर देखते हुए शुभम के लंड को पकड़ कर उसे अपने मुंह में भर कर तुरंत चूसना शुरू कर दी मानो कि जैसे वह लंड ना हो कोई आइसक्रीम कौन हो... देखते ही देखते शीतल इंच दर इंच शुभम के लंड को अपने मुंह में गले तक उतार कर उसे चूसने का आनंद लेने लगी शुभम का लंड इतना ज्यादा मोटा था कि ऐसा लग रहा था कि शीतल के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया गले तक उतार कर चूसने में शीतल को तकलीफ हो रही थी लेकिन शुभम के मोटे तगड़े लंड को इस तरह से चूसने की लालच वह रोक नहीं पाई और लगातार चूसना शुरू कर दी...शुभम तो जैसे हवा में उड़ रहा हूं ऐसा लग रहा था कि कोई जादुई उड़न खटोला उसे उड़ाए लिए चला जा रहा है।
Sheetal is tarah se Shubham k note tagde lund Ko muh me lekar Chus rahi thi..



PURA gale tak lekar Chus rahi thi


सब कुछ भूल कर व शीतल के द्वारा लंड चुसाई का आनंद लूट रहा था शीतल की मदमस्त

Shubham k muh me leti huyi sheetAl


जवानी के खुमारी में उसकी आंखें बंद होने लगी थी.... शीतल पागलों की तरह लंड का मजा ले रही थी.... टेबल पर घर से लाया हुआ टिफिन पड़ा हुआ था जिसमें खाना ज्यों का त्यों पड़ा हुआ था शीतल एक निवाला भी अपने मुंह में नहीं डाली थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे अपनी भूख मिटाने के लिए व शुभम के लंड को ही खा जाएगी.... शुभम भी पागलों की तरह अपने दोनों हाथों से शीतल का खूबसूरत चेहरा पकड़ कर अपनी कमर को आगे-पीछे करते हुए हिलाने लगा ऐसा लग रहा था मानो वह शीतल की बुर में लंड पेल रहा हो....
एक शिक्षिका होने के नाते शीतल को यह गंदा काम बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए था और वह भी क्लास रूम में लेकिन वह एक शिक्षिका होने से पहले एक खूबसूरत लेकिन प्यासी औरत थे जिसके लिए सब कुछ जायज था। वह अपनी प्यास बुझाने के लिए शुभम के मोटे तगड़े लंड का स्वाद ले रही थी उसकी बहुत इच्छा हो रही थी कि मुंह से निकालकर शुभम के लंड को अपनी बुर में पेलवा ले ... लेकिन समय का अभाव था और महीनों बाद मिले इस मौके को वह ऐसे ही जाने नहीं देना चाहती थी इसलिए दोनों टांगे फैला कर मुंह में लेने से अच्छा था कि समय का सही उपयोग करने के लिए वह घुटनों के बल बैठकर शुभम के लंड को मुंह में लेकर चूस रही थी।
और वैसे भी शीतल इस तरह से जल्दबाजी में शुभम से नहीं सुनना चाहती थी वह शुभम से चुदवाना तो चाहती थी लेकिन इतने महीनो से बरसो से दबी चिंगारी को इस तरह से दो चार बुंदो में शांत नहीं होने देना चाहती थी बल्कि उसे सावन की फुहार की प्यास थी जोकि उसके लिए शायद समय नहीं आया था।
शीतल की बुर में आग लगी हुई थी क्योंकि एक बेहद तगड़े मोटे लंड को हाथ में लेने के बावजूद भी वह इतनी मजबूर थी कि उसे अपनी बुर का रास्ता नहीं दिखा पा रही थी इसलिए वह एक हाथ से साड़ी के ऊपर से अपना फूली हुई बुर को दबा दबा कर उसे शांत करने की कोशिश कर रही थी ‌ दूसरी तरफ शुभम पागलों की तरह शीतल के मुंह में अपना लंड पेल रहा था।

शीतल की मदहोश कर देने वाली जवानी के नशे में हुआ इस कदर खो गया कि उसे इस बात का भी अहसास नहीं हुआ कि वह इस समय क्लासरूम में शीतल के मुंह में अपना लंड पेल रहा है। वह भी क्या कर सकता था हाथ में आए इतनी सुनहरे मौके को वह हांथ से गवाना नहीं देना चाहता था।
शुभम का लंड ईतना मोटा था कि वह पूरा मुंह खोल कर भी आराम से उसके लंड को अपने गले तक नहीं उतार पा रही थी लंड की मोटाई की वजह से उसे अपने होंठों पर उसकी रगड़ साफ महसूस हो रही थी....आज दूसरी बार शुभम के लंड को इस कदर मुंह में लेकर उसे इस बात का एहसास हो गया था कि जब शुभम का मोटा तगड़ा लंड मुंह में इतना मजा दे रहा है तो जब उसका लंड उसकी कसी हुई बुर में जाएगा तो कितना मजा देगा इस बात का एहसास उसे और ज्यादा उत्तेजित कर गया और वह जोर-जोर से साड़ी के ऊपर से अपनी बुर को मसलना शुरू कर दी.....
दोनों की सांसें चल रही थी दोनों अपनी-अपनी तरह से मजा ले रहे थे शुभम शीतल के मुंह में ही धक्के पर धक्के लगा रहा था उसका पानी निकलने वाला था इस बात का अहसास उसे हो गया और वह हकलाते स्वर में बोला...

शशशशशशीतल . ‌ मुंह में से निकालो मेरा निकलने वाला है.... (इतना कहते हुए शुभम अपनी कमर को पीछे की तरफ ले रहा था कि तभी शीतल एक हाथ पीछे की तरफ ले जाकर शुभम की गांड को पकड़ कर अपनी तरफ खींच कर और जोर से उसका लंड चूसने लगी... जो कि यह शीतल की तरफ से शुभम के लिए इशारा था कि वह उसके लंड को अपने मुंह में ही झाड़ना चाहती है.... शुभम भी शीतल का इशारा पाकर और ज्यादा उत्तेजित होते हुए दुगनी रफ़्तार से अपनी कमर चलाने लगा और अगले ही पल उसके लंड में से पानी की पिचकारी भल भलाकर निकलने लगी जो कि देखते ही देखते शीतल के मुंह को भर दे लेकिन शीतल इतनी ज्यादा कामाग्नि की तपन में तप रही थी कि शुभम के लंड से निकले पानी की एक-एक बूंद को अपने गले से नीचे उतार ले गई.....
दोनों शांत हो चुके थे शुभम अपने कपड़े ठीक करते हुए बोला...

शीतल तुमने तो आज मुझे एकदम खाओ खुश कर दी मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि इतनी खूबसूरत औरत के साथ मैंने यह काम किया हूं...(शीतल अपने बालों को ठीक कर रही थी और उसकी बात सुनकर मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि वह उसकी तारीफ ही कर रहा था...) लेकिन पता नहीं है मौका आप कब मिलेगा लेकिन जाते-जाते शीतल मैं तुम्हारी मैं तुम्हारी.... अब कैसे कहूं मुझे समझ में नहीं आ रहा है....

बेझिझक कह दो मेरे सामने शर्माने की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है।(शीतल पर्स में से अपना रुमाल निकाल कर मुंह साफ करते हुए बोली)

मैं तुम्हारी एक बार बुर देखना चाहता हूं....

बस इतनी सी बात (शीतल मुस्कुराते हुए बोली।.. इतना कहने के साथ ही सीतल रुमाल को टेबल पर रख कर अपने दोनों हाथों से अपनी साड़ी को कमर तक उठा दी.... एक बार फिर से शीतल की नंगी मांसल टांगें नजर आने लगी लेकिन अभी भी उसके बदन पर लाल रंग की पेंटी चढ़ी हुई थी जिस पर उसकी नजर पड़ते ही वह कुछ बोल पाता इससे पहले ही सीतल बोली ‌।)

ले अपने हाथों से पेंटी उतार कर देख ले..... (शीतल की यह बात सुनकर शुभम मन ही मन खुश होने लगा उसके मन में लड्डू फूटने लगे... वैसे तो उसने बेहद हसीन और खूबसूरत और कई ज्यादा रसीली बुर के दर्शन के साथ साथ उनका स्वाद भी चख चुका था लेकिन उसे नई-नई बुर के दर्शन करने का जैसे शौख सा हो गया था... इसलिए वह शीतल की बुर को बेहद करीब से देखना चाहता था उसे स्पर्श करना चाहता था वैसे तो वह शीतल की मदमस्त गोरी गोरी नंगी गांड को बाथरूम में देख ही चुका था... शीतल की तरफ से स्वीकृति पाकर वह अपना कदम आगे बढ़ाया ही था कि शीतल अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली।)

वैसे तुमने अब तक बुर् के दर्शन किए हो कि नहीं..?
(शीतल अपनी काम इच्छाओ के अधीन होकर और
शुभम की संगत में एकदम निर्लज्ज होती जा रही थी उसके मुंह से गंदी गंदी बातें ही निकल रही थी। और शीतल किस तरह की गंदी बातें सुनकर जो की एक शिक्षिका थी इस वजह से शुभम के तन बदन में और अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था। .. शीतल की बात सुनकर वह जवाब देते हुए बोला..)

सच कहूं तो मैंने आज तक औरत की बुर क्या उनके नंगे बदन को नहीं देखा हूं इसलिए सोचता हूं कि औरत के अंग कैसा होगा इसलिए मैं तुम्हारी बुर देखना चाहता हूं... उसकी बनावट देखना चाहता हूं उसे छूकर देखना चाहता हूं...
(शुभम जानबूझकर झूठ बोल रहा था वह यह जताना चाह रहा था कि उसकी जिंदगी में आने वाली वह पहली औरत है और अब तक वह औरत के भूगोल बारे में बिल्कुल अज्ञान है इसलिए तो शुभम की बात सुनते ही शीतल मन ही मन मुस्कुराने लगी... और मुस्कुराते हुए बोली ...)

कोई बात नहीं सुबह मैं आ गई हूं ना तुम्हारी जिंदगी में एक-एक अंग को अच्छी तरह से दिखा दूंगी औरत के भूगोल के बारे में तुम्हें अच्छी तरह से ज्ञान दे दूंगी.... (शीतल उसी तरह से अपनी साड़ी को कमर तक उठाए हुए बोली उसकी लाल रंग की पेंटी के बीचो बीच बना पानी जैसा धब्बा साफ नजर आ रहा था जो कि उसकी बुर से निकला हुआ मदन रस था।... शुभम तो शीतल की गीली पैंटी को देखकर पागल हुए जा रहा था उसकी आंखों में चमक के साथ-साथ एक अजब सा नशा था खुमारी थी जोकि शीतल के मदहोश बदन की गर्माहट का असर था ‌।)

जल्दी करो शुभम विशेष पूरी होने वाली है....
(शीतल की बात सुनते ही शुभम आगे बढ़ा और अपने हाथ आगे बढ़ा कर पेंटी को अपने दोनों हाथों की उंगलियों में थाम लिया.....लेकिन उसे उतारने का समय बिल्कुल भी नहीं था वह अच्छी तरह से समझ गया था इसलिए वह एक हाथ से पेंटिं पकड़ कर थोड़ा सा खींच लिया जिससे कि शीतल की पेंटी के अंदर उसकी कचोरी जैसी फूली हुई बुर साफ नजर आने लगी अंदर का नजारा देखकर शुभम की आंखें फटी की फटी रह गई....शीतल की बुर कचोरी जैसे फुली हुई थी और एकदम चिकनी थी बस हल्के हल्के रोएदार बाल नजर आ रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे दो-तीन दिन के अंदर ही वह क्रीम लगाकर साफ की हो....
शीतल की मदमस्त बुर देखकर शुभम के मुंह में पानी आ रहा था क्योंकि पतली सी दरार जैसी नजर आने वाली बुर् के बीचोबीच गुलाब की पंखुड़ियों जैसी दो पत्तियां हल्की सी बाहर निकली हुई थी और मदन रस में भीगे होने की वजह से उस की बूंदे मोती की तरह चमक रही थी। शुभम का जी ललच रहा था शीतल की बुर पर अपने होंठ को रखकर उसके रस को पीने के लिए.... जिस तरह से फटी आंखों से शुभम शीतल की पेटी के अंदर झांक उसकी बुर के दर्शन कर रहा था यह देखकर शीतल मन ही मन प्रसन्न हो रही थी और उत्तेजित भी हुए जा रही थी।

सच में तू लगता है पहली बार ही औरत की बुर को देख रहा है छू कर देख ले....
(इतना सुनते ही शुभम से रहा नहीं गया और वह एक हाथ से पेंटी पकड़कर दूसरा हाथ पेंटी के अंदर डालकर शीतल की मदमस्त मखमली नरम नरम बुर को अपने हाथ की उंगलियों से स्पर्श करके छूने लगा .. मदहोशी से भरी हुई शीतल की बुर गरम तवे की तरह तप रही थी और ऐसी ही गरमपुर शुभम को पसंद थी.... शुभम से रहा नहीं जा रहा था वह जोश में आकर अपनी उंगलियों का हल्के हल्के शीतल की बुर पर रगड़ने लगा शीतल मदहोश होने लगी.... वह जिस तरह से अपनी उंगली का दबाव बनाते हुए बुर को रगड़ रहा था शीतल के मुख से गर्म सिसकारी फूट पड़ी.... शीतल के बदलते हुए हाव भाव को देखकर शुभम से रहा नहीं गया और वह तुरंत अपनी बीच वाली उंगली को सीधे शीतल की मखमली बुर की गुलाबी पत्तियों के बीचो-बीच सरका दिया... शीतल शुभम की इस कार्रवाई के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी इसलिए एकाएक अपनी पुर के अंदर उंगली जाने की वजह से वह उछल पड़ी ‌... लेकिन काफी उत्तेजित हो चुकी थी शुभम भी एकदम पागल हुए जा रहा था उसे इस बात का अहसास तक नहीं था कि किसी भी वक्त रिसेस पूरी होने की घंटी बज सकती है और ना ही यह एहसास शीतल को था वह भी शुभम की हरकतों की वजह से एकदम गर्म होने लगी थी...
शुभम अपनी हरकत जारी रखते हुए अपनी उंगली को शीतल की बुर की गहराई में उतारते हुए बस एक-दो बार ही अंदर बाहर किया था कि रिशेष पूरी होने की घंटी बज गई। घंटी की आवाज सुनते ही सीतल एकदम से चौंक गई और वह तुरंत अपनी कमर को पीछे की तरफ करते हुए शुभम को अपनी उंगली बाहर निकालने का इशारा कर दी . शुभम भी मौके की नजाकत को समझते हुए तुरंत अपनी उंगली को बुर से बाहर खींच लिया और शीतल अपने कपड़े को व्यवस्थित करने लगी...... शुभम की उंगली पर अभी भी शीतल की बुर् का मदन रस लगा हुआ था। शीतल के मदन रस में शुभम की उंगली पूरी तरह से भीगी हुई थी... वह शीतल की तरफ देखते हुए एक हाथ से दरवाजे की कड़ी खोलने लगा और दूसरे हाथ की उंगली को शीतल को दिखाते हुए अपने मुंह में भर कर उसे चाटने लगा मानो कि उस पर कोई सहद लगा हो... शीतल शुभम को इस तरह से अपनी बुर के रस में सनी हुई उंगली को इस तरह से मुंह में भरकर चाटता हुआ देखकर एकदम रोमांचित हो उठी इतनी ज्यादा उत्तेजित हो गई कि उसकी बुर से फिर से एक बार मदन रस बह निकला...
कोई कमरे की तरफ आता इससे पहले ही शुभम कमरे से बाहर निकल कर अपनी क्लास की तरफ चला गया।
 
शुभम का आज का दिन बेहद ही अद्भुत और आनंद में गुजरा था उसे अपनी किस्मत पर यकीन नहीं हो रहा था कि आज वह अपने लंड का पानी है शीतल मैडम के मुंह में निकाल कर आया था।वह मन में यही सोच कर परेशान हो रहा था कि अच्छा ही हुआ कि आज उसकी मां उसके साथ स्कूल नहीं गई वरना ऐसा मौका उसे ना जाने कब हाथ लगने वाला था।
धीरे-धीरे करके शुभम इस खेल में एक मजा हुआ खिलाड़ी बनता जा रहा था। वह शीतल के साथ इस खेल में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था उसे अपनी किस्मत पर पूरा यकीन था कि आज उसके मुंह में लंड डालकर जो सुख मिला है एक न एक दिन जरूर अपने मोटे तगड़े लंड को उसकी बुर में डालकर उसकी चुदाई से अपने आप को तृप्त कर पाएगा और वह उस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था।
स्कूल से छूटने के बाद जब वह अपने घर पहुंचा तो घर के बाहर उसकी एकदम नई बाइक इंतजार कर रही थी जिसे देखकर वह फूला नहीं समा रहा था...
वह बहुत खुश हुआ और अपनी बाइक को उसके चारों तरफ घूम कर उसे नजर भर कर देखने लगा उसे बाइक चलाने का बहुत शौक था लेकिन अपने इस शौक के बारे में वह कभी अपने मम्मी पापा को बोल नहीं पाया था लेकिन आज उसके पापा ने उसे बाइक दिलाने का वादा पूरा करके मानो उसे सारे जहां की खुशियां उसकी झोली में डाल दी हो वह बहुत खुश था और जल्दी से डोरबेल बजाकर...घर में प्रवेश करना चाहता था वह अपने पापा को नई बाइक के लिए धन्यवाद देना चाहता था डोर बेन की आवाज सुनते ही निर्मला समझ गई कि शुभम आ गया है इसलिए वह भी जल्दी से दरवाजा खोल दे दरवाजा खुलते ही वह तुरंत अपनी मां के गले लग गया... और वह उसे एकदम खुशी के जोश में निर्मला को उसकी कमर के नीचे से पकड़ कर उसे अपनी गोद में उठा लिया ...

अरे क्या कर रहा है पागल हो गया क्या दरवाजा खुला है अगर कोई देख लिया तो....

देख लेने दो मम्मी मुझे किसी का डर नहीं है आज पापा ने मुझे बाइक गिफ्ट देकर मुझे एकदम खुश कर दिए हैं....(शुभम यह कहते हुए अपनी मां को अपनी मजबूत भुजाओं में उठाए हुए इधर से उधर घूम रहा था...शुभम को शायद खुशी के इस पल में इस बात का अहसास नहीं था कि वह अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड को अपनी भुजाओं में दबाकर उसे उठाए हुए था लेकिन इस बात का एहसास निर्मला को अंदर तक उत्तेजित कर गया अपने बेटे की मजबूत भुजाओं में अपने आपको पाकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी.. और खास करके अपने बेटे की भुजाओं की शक्ति पन का एहसास अपनी गोल गोल नितंबों पर पाकर बाल एकदम मदहोश होने लगी थी... शुभम का उत्साह देखकर ऐसा लग रहा था कि वह उसे नीचे जमीन पर उतारने वाला नहीं है वह उसी तरह से अपनी मां को अपने हाथों में उठाए हुए इधर से उधर भाग रहा था और अपने पापा के बारे में पूछ रहा था....)

तेरे पापा घर में नहीं है वह ऑफिस गए हैं....(निर्मला उत्तेजित स्वर में बोली ऐसा लग रहा था कि मानो वह जानबूझकर उसे इस बात का एहसास दिला रही थी कि घर पर उन दोनों के सिवा कोई तीसरा नहीं है...)

क्या पापा घर पर नहीं है. ! (ऐसा कहकर मानो वह कुछ सोचने लगा...जैसे उसे अब इस बात का एहसास होने लगा था कि घर में उन दोनों के सिवा तीसरा कोई नहीं है.... वह जब यह बात सोच रहा था तो निर्मला उसे बड़े गौर से देख कर मुस्कुरा रही थी... अपनी मां के लाल लाल होठों पर चमक रही लिपस्टिक को देखकर उसकी आंखों में खुमारी छाने लगी...वह भी बड़े उत्साहित नजरों से अपनी मां के खूबसूरत चेहरे को देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था मानो इशारों ही इशारों में कह रहा हो कि ऐसी खुशी के मौके पर जश्न तो बनता है ।. ... इसलिए वह एकदम चहकते हुए बोला।)

मतलब मम्मी घर में केवल मैं और तुम हो...

हां तो इतनी देर से मैं तुझे क्या कह रही हो। ...(निर्मला अपने बेटे की हरकत की वजह से काफी उत्तेजित हो रही थी उसकी टांगों के बीच की पत्नी दरार में से नमकीन रस का झरना बहने लगा था जो कि उसकी पेंटी को गीला कर रहा था... और जिस तरह से शुभम उसे उठाए हुए था निर्मला की दोनों बड़ी-बड़ी चूचियां शुभम के चेहरे को अपने दोनों घाटियों के बीच छुपाए हुए थे इस बात का एहसास शुभम को बहुत जल्द ही हो गया क्योंकि निर्मला जानबूझकर बहुत गहरी गहरी सांस ले रही थी जिससे दोनों चुचियों के बीच का दबाव शुभम के चेहरे पर बराबर बन रहा था...)

अब उतारेगा मुझे या ऐसे ही लटकाए रहेगा....

नहीं मैं तुम्हें ऐसे ही उठाए रहूंगा...(इतना कहते हुए सदन दरवाजे की तरफ जाने लगा..)

यह क्या पागलपन है सुभम मुझे नीचे उतार....(हालांकि यह बात निर्मला ऊपरी मन से कह रही थी और अंदर ही अंदर वह यही चाह रहे थे कि उसका बेटा उसे ऐसे ही अपनी मजबूत भुजाओं उठाए रहे...देखते ही देखते शुभम दरवाजे तक पहुंच गया और बिना अपनी मां को नीचे जमीन पर उतारे एक हाथ से दरवाजा बंद करके उसे लॉक कर दिया....)

यह क्या कर रहा है शुभम...?

वही जो एक मर्द को एक खूबसूरत औरत के साथ करना चाहिए...(इतना कहते हुए शुभम अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अपनी मां को नीचे उतारे बिना ही उसे दीवार से सटा दिया... और अपने मुंह से ब्लाउज के ऊपर से ही अपनी मां की दोनों चुचियों को बारी-बारी से दांतो से दबाना शुरू कर दिया अपने बेटे की इस हरकत की वजह से निर्मला एकदम उत्तेजित होने लगी उसकी बुर कुलबुलाने लगी... और देखते ही देखते उत्तेजित अवस्था में उसकी दोनों चूचियों की दोनों निप्पल एकदम कड़क हो गई मानो कि जैसे कैडबरी की छोटी चॉकलेट हो और शुभम उसे अपने दांतो में भरकर हल्के-हल्के काट रहा था जिससे निर्मला के बदन में सुरूर चढ़ रहा था।
निर्मला के सांसो की गति तेज होती जा रही थी वह अपने आप पर नियंत्रण नहीं कर पा रही थी जिस तरह से शुभम उसे अपनी दोनों हाथों से उठाकर दीवार से सटाए हुए था .. वह निर्मला की नजर में काबिले तारीफ था अपने बेटे की ताकत को देखकर उसे बहुत गर्व महसूस हो रहा था क्योंकि वह अच्छी तरह से जानती थी कि वह वजन में काफी भारी थी लेकिन जिस शिद्दत से वह दोनों हाथों में उसे उठाकर कई मिनटों तक बिना थके उसके बदन से खेल रहा था यह देखकर निर्मला और भी ज्यादा उत्तेजित होने लगी...अपनी बेटी को ब्लाउज के ऊपर से ही अपनी निप्पल काटता हुआ देखकर निर्मला से रहा नहीं गया और वह अपने हाथों से अपने ब्लाउज के बटन खोल कर अपनी चूची को बारी-बारी से सुकून के मुंह में डालकर उससे चूस वाना शुरू कर दी..
शुभम विजय से छोटे बच्चे की तरह दूध की बोतल समझ कर अपनी मां की दोनों चुचियों को बारी-बारी से मुंह में भर कर पीना शुरू कर दिया यह सब काफी उत्तेजनात्मक था। इसका असर शुभम की दोनों टांगों के बीच बहुत ही बुरी तरह से हो रहा था उसके लंड की नसे रक्त के प्रवाह को नियंत्रण कर सकने में असमर्थ साबित हो रही थी जिससे शुभम को उसके खड़े लंड में हल्का हल्का दर्द महसूस हो रहा था। निर्मला लगातार गर्म शिकारियों के साथ अपने बेटे को उसकी चूची पिला रही थी।
दोनों काफी गर्म हो चुके थे शुभम अच्छी तरह से समझ गया था कि ज्यादा देर तक वह अपनी मां को इस तरह से उठाकर दीवार से सटाए नहीं रख सकता है इसलिए उसे जो करना था बहुत ही जल्द करना था... वह तुरंत एक हाथ से अपने पेंट की बटन खोल कर तुरंत उसे नीचे घुटनों तक गिरा दिया...और वैसा ही अपनी अंडरवियर के साथ भी किया देखते ही देखते उसका मोटा खड़ा लंड हवा में लहराने लगा....
निर्मला को वैसे तो कुछ नजर नहीं आ रहा था कि शुभम के नीचे क्या हो रहा है लेकिन जिस तरह से वह उसे एक हाथ से संभाल कर उठाए हुए था और दूसरे हाथ से अपने नीचे कुछ हरकत कर रहा था वह समझ गई कि अब वह उसे चोदने की तैयारी कर रहा है जिससे काफी उत्साहित हो गई। वह जल्द से जल्द अपनी रसीली बुर के ऊपर अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड के मोटे सुपाड़े का स्पर्श महसूस करना चाहती थी।वह काफी उत्साहित होकर अपनी चूचियों को अपने बेटे के मुंह में ठूंस कर उसे जबरदस्ती पिला रही थी....

ले पी मेरे बेटे जी भर कर पी आहहहहहहहह ..बहुत मस्त छोकरा है रे तू मैंने आज तक तेरे जैसा छोकरा नहीं देखी... अच्छा हुआ कि तू मेरा बेटा है वरना अगर तू किसी और का छोकरा होता और मुझे इस बात का एहसास होता कि तेरे पास बेहद मोटा तगड़ा दर्द है तो कसम से मैं अपनी सारी मर्यादा लांघ कर तेरे मोटे तगड़े लंड पर खुद चढ़ जाती है और तुझसे चुदवाने का मजा लूटती...

तो अभी क्या कर रही है अभी भी तो वही कर रही है मेरी रानी सच कहूं तो जब तक मेरा लंड तेरे बुर मे नहीं जाता तब तक मुझे इस बात का अहसास ही नहीं होता कि चुदाई किसे कहते हैं...(शुभम अपने हाथ में अपना मोटा तगड़ा लंड पकड़ कर उसे हिलाते हुए बोला. ।)

तू साला बहुत हारामी है तब मादरचोद हो गया है मौका मिलता नहीं की चोदना शुरू कर देता है ‌

तू चीज ही ऐसी है मेरी जान कि तुझे देखते ही लंड खड़ा हो जाता है।

अपने लंड को जरा काबू में रखा कर यह मुझे भी बेकाबू कर देता है....

सच कहूं तो मेरी जान तू बेलगाम घोड़ी है और तुझे लगाम मैं कसने के लिए इसी हथियार का उपयोग करना पड़ता है।

साला तू भी तो खुला सांड है जब देखो तब अपना लहराता हुआ लंड लेकर घूमता रहता है इसी ताक में कि कब बुर में डाल दु....

अब सांड कह रही है तो मादरचोद देख ये सांड क्या करता है...(इतना कहते हुए शुभम थोड़ा सा अपनी मां के बदन को नीचे की तरफ लाकर उसे अपने लंड के सामने उसकी बुर की स्थिति मे लाने लगा... अब निर्मला की बुर और उसके बेटे के लंड के एकदम करीब आ चुकी थी। जिसकी गर्मी का एहसास सुभमको अपना लंड पर बराबर हो रहा था...)

दिखाना मादरचोद में भी देखना चाहती हूं कि तू क्या करता है देखो तो सही तेरे लंड में कितना दम है...

अच्छा साली मेरा दम देखेगी मिलेंड में इतना दम है कि तेरी बुर में डालकर तुझे अपने लंड के सहारे दीवार पर खड़ा कर सकता हूं।

तो करना खड़ा कि सिर्फ बातें बनाता रहेगा।
(दोनों मां-बेटे की मर्यादा को भूलकर एक मर्द और औरत बन चुके थे और दोनों अश्लील भाषा में बात करते हुए आनंद से भाव विभोर होते जा रहे थे दोनों की उत्तेजना की पराकाष्ठा परम शिखर पर थे अपनी मां की बात सुनकर शुभम एकदम जोश में आ गया था और तुरंत एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर अपनी मां की रसीली बुर से लगाता हुआ एक जोरदार धक्का मारा जो कि इस धक्के के साथ है शुभम का मोटा तगड़ा लंड अपनी मां की बुर की चिकनाई पाकर सरसराता हुआ अंदर घुस गया....

आहहहहहहह मादरचोद भोसड़ी के इतना जोर से धक्का क्यों मार रहा है।

क्यों मेरी जान मुझे सांड बोल रही थी ना तो देख ले 1 सांड से चुदवाने मे कितना मजा आता है।
(इतना कहते हो शुभम बिना रुके अपनी कमर को आगे पीछे करके लाना शुरू कर दिया शुभम का मोटा तगड़ा लंड अपनी मां की रसीली बुर की चिकनाई पाकर एकदम जोश से भर चुका था... और धक्के पर धक्का लगाना शुरू कर दिया निर्मला को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि शुभम उसे इस तरह से उठाए हुए चोदेगा।

निर्मला अपने बेटे की इस ताकत से एकदम उसके ऊपर वारी वारी जा रही थी।उसे यह सब महसूस होता था कि जब भी वह उसके साथ रहती थी तो ऐसा लगता था कि उसके बेटे की ताकत चार गुनी और ज्यादा बढ़ गई है। वह लगातार अपनी बुर की गहराई में अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड की ठोकर को साफ महसूस कर रही थी और उसकी रफ्तार एक बराबर थी फच फच की आवाज से पूरा कमरा गूंज रहा था।शुभम अभी भी अपनी मां को अपने दोनों हाथों से उठाए हुए अपनी कमर आगे पीछे करते हुए जोरदार चुदाई कर रहा था।
Shubham apni ma ki chudai karta hua


एक तो बाइक मिलने की खुशी और दूसरी निर्मला की मदमस्त जवानी दोनों पाकर शुभम निहाल हुए जा रहा था। उसका लंड किसी पिस्टन की तरह चल रहा था। लगातार निर्मला की बुर से नमकीन पानी का झरना बह रहा था।

शुभम लगभग ऐसे ही 20:25 मिनट तक अपनी मां को अपनी भुजाओं के दम पर उठाए हुए उसकी बुर में अपना लंड चलता रहा और वह भला भला कर झड़ गया। दोनों एकदम तृप्त हो चुके थे।

शाम को शुभम नई बाइक लेकर बाजार टहलने निकल गया और उसे बाजार में सरला चाची मिल गई।
 
शुभम की नजर जैसे ही सरला चाची पर पड़ी वह खुश हो गया... उसके मन में सरला चाची को बाइक पर अपने पीछे बैठाने की इच्छा जागरूक हो गई.. क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता था कि बाइक पर औरतों का पीछे बैठने का मतलब था कि उनके बदन का स्पर्श और वह भी खास करके उनके मन कोमल अंगों का स्पर्श जिसे वह हमेशा वस्त्रों में ढक कर रखती हैं.. वैसे भी शुभम का मन सरला की बड़ी-बड़ी चुचियों को छुने का करता रहता है।
क्योंकि ब्लाउज के ऊपर से और उस दिन जब वह भोजन का आमंत्रण स्वीकार करके सरला के घर गया था तब अनजाने में ही उसके कमरे में पहुंचकर जिस तरह का नजारा उसने अपनी आंखों से देखा था खास करके उसकी नग्न बड़ी-बड़ी चुचियों को देखकर जिस तरह की प्यास उसके मन में उन्हें छूने को बढ़ने लगी थी आज उसी प्यास को थोड़ा बहुत वह उसकी रगड़ को अपनी पीठ पर महसूस करके थोड़ा बहुत तृप्त होना चाहता था इसलिए वह सरला को अपनी बाइक पर पीछे बैठाने के लिए एकदम लालायित हो गया था ‌. ।
सरला सब्जी ले चुकी थी और वह तुरंत उसके पास जाकर अपनी बाइक खड़ी कर दिया...

क्या करता है तू मैं तो डर गई. (इस तरह से एकाएक अपने करीब बाइक खड़ी होती देख वह घबराते हुए बोली.)

डरने की कोई जरूरत नहीं है चाची मैं आपकी मदद करने के लिए आया हूं ...

अरे वाह शुभम एकदम नई गाड़ी कब खरीदा। (बाइक पर नजर पड़ते ही सरला बोली)

मेरे पापा ने मुझे गिफ्ट दिए हैं इसलिए तो आज मैं पहली बारी से चला रहा हूं और पहली बार ही किसी को अपनी बाइक पर बिठा रहा हूं ‌...

कहां तेरी बाइक पर तो कोई भी बैठा हुआ नहीं है...

आप होना चाची मैं आपकी बात कर रहा हूं . मैं चाहता हूं कि आप अपने पैर रखकर मेरी बाइक को पवित्र कर दीजिए .. (शुभम सरला के सामने बोल तो यह रहा था लेकिन उसका मन यह कह रहा था कि आप मेरी गाड़ी पर अपनी बड़ी बड़ी गांड रखकर इसका शुभारंभ कर दीजिए ‌ और शुभम की बात और अभी इस तरह की शालीनता भरी बात सुनकर सरला खुशी से गदगद हुए जा रही थी मन ही मन में उसे भी शुभम की बाइक पर उसके पीछे बैठने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी ‌)

नहीं नहीं मैं नहीं बैठूंगी मैं आज तक कभी भी किसी की बाइक के पीछे नहीं बैठी हूं मुझे डर लगता है।

अरे इसमें डरने की क्या बात है मैं हूं ना.... बस आप एक बार बैठ जाइए बाकी मैं सब संभाल लूंगा लाइए यह सब्जियों वाला थैला मुझे दीजिए ..(इतना कहते हुए शुभम खुद ही सरला के हाथों से सब्जी वाला थैला लेकर उसे बाइक पर टंगा दिया और उसे बैठने के लिए बोला... यह बात सच है कि सरला आज तक कभी भी बाइक के पीछे नहीं बैठी थी ‌‌... उसे थोड़ी घबराहट हो रही थी लेकिन जैसे तैसे करके वह बाइक पर बैठ गई आज शुभम के पीछे इस तरह से बाइक पर बैठने पर उसे काफी उत्सुकता के साथ साथ प्रसन्नता हो रही थी लेकिन इससे भी ज्यादा ना जाने कि उसके बदन में उत्तेजना की सुइयां चुभ रही थी क्योंकि शुभम ही था जिसकी वजह से वह जिंदगी में पहली बार अपने आप को आईने के सामने अपने कपड़े उतार कर संपूर्ण नग्ना अवस्था में अपने नाजुक अंगों से खेल रही थी.
और पति के देहांत के बाद पहली बार वह चरम सुख का अनुभव महसूस की थी तब से शुभम जब भी उसकी आंखों के सामने आता था या तो उसके करीब होता था उसके तन बदन में ना जाने क्यों उत्तेजना का अनुभव अपने आप होने लगता था उसका तन- बदन खास करके उसकी टांगों के बीच की उस पतली सी दरार में उत्तेजना का अनुभव को ज्यादा ही होता था। और इस समय भी उसकी टांगों के बीच के उस गुलाबी छेद में हलचल मची हुई थी...
सरला बाईक पर बैठ गई थी और शुभम गियर बदलकर एक्सीलेटर देते हुए बाइक को आगे बढ़ा रहा था। हालांकि पहली बार बैठने की वजह से सर अल्लाह अपने आप को बाइक पर नियंत्रित नहीं कर पा रही थी।इसलिए वह कभी आगे तो कभी पीछे झटके खा रही थी लेकिन इस झटको के साथ ही उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां शुभम की पीठ पर रगड़ खाने लगी जिसका अनुभव उसका एहसास शुभम के तन बदन को गर्म करने लगा... वह अब जानबूझकर बीच-बीच में ब्रेक लगाने लगा क्योंकि ऐसा करने से सरला आगे को सरक आती थी और जिसकी वजह से उसकी बड़ी बड़ी चुचीयां शुभम की पीठ पर रगड़ खा जाती थी और दब जाती थी जिसका एहसास शुभम को अंदर तक रोमांचित कर जाता था इस बात का एहसास सरला को भी था ना चाहते हुए भी ना जाने क्यों जिस तरह से उसकी चूची शुभम की पीठ पर स्पर्श हो रही थी उसका एहसास उसे भी अंदर तक उत्तेजित कर जा रहा था।
वह भी इस पल के एहसास से अंदर ही अंदर सिहर उठती थी।
कुछ देर के बाद उसे इस बात का एहसास होने लगा कि उत्तेजना की वजह से उसकी पेंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी जो कि बड़ी ही ताज्जुब वाली बात थी।क्योंकि सलाह अच्छी तरह से जानती थी जब तक कि वह शुभम से मिली नहीं थी तब तक उसके बदन में इस तरह के बदलाव और रिसाव बिल्कुल भी नहीं होता था लेकिन शुभम के मिलने के बाद अब रोज-रोज यह सिलसिला होने लगा था ऐसा नहीं था कि सरला को इसमें मजा नहीं आता था बल्कि उसे तो ऐसा लगता था कि उसे एक नई जिंदगी मिल गई है। वरना दोनों टांगों के बीच की पट्टी हमेशा सूखी पड़ी रहती थी शुभम नाम के सावन के वजह से वह भट्टी अब हरी भरी हो रही है इस बात का एहसास उसे अच्छी तरह से हो गया था। शुभम के साथ मोटरसाइकिल की सवारी करने में उसे बेहद आनंद की अनुभूति हो रही थी और शुभम को भी बहुत मजा आ रहा था सरला लगभग लगभग उसकी मां की उम्र से ५ 7 साल बड़ी ही थी लेकिन फिर भी जवानी और वासना के जोश में वह सरला के खूबसूरत अंगों का उसके रगड़ का मजा ले रहा था। बातों ही बातों में सरला इस बात का जिक्र करने लगी कि उसकी बहु रुचि अपने घर जाने वाली है। इसलिए वह शुभम से बोली. ..

शुभम तेरे पास अब मोटरसाइकिल आ गई है तू मेरा एक काम कर दे...

बोलिए चाची कैसा काम मैं तो आपको पहले ही कहा हूं कि कोई भी काम हो आप मुझसे कहिए...(बार-बार सरला की चूचियों की रगड़ से शुभम पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था और उसका लंड पैंट के अंदर अपनी पूरी तैयारी में था.. जिसे वह बार-बार हाथ लगाकर व्यवस्थित कर दे रहा था..)

कल मेरी रुचि बहू अपने मायके जाने वाली है उसके पिताजी की तबीयत थोड़ी खराब है मैं तो अभी जा नहीं सकती इसलिए तू अगर उसे अपनी मोटरसाइकिल से छोड़ आता तो अच्छा ही होता...
(रुचि को छोड़ने वाली बात सुनकर शुभम बनी मन प्रसन्न होने लगा भला ऐसा मौका रूचि जैसी खूबसूरत और वह भी अंदर ही अंदर प्याज से भरी हुई औरत के करीब रहने का कहां मिलने वाला था वह अपने आप को पूरी तरह से तैयार कर चुका था रोजी के साथ जाने के लिए लेकिन फिर भी आपत्ति जताते हुए बोला।)

मैं कैसे छोड़ सकता हूं चाची क्या मेरे साथ रुचि भाभी जाएंगी। .

अरे हां जाएंगी क्यों नहीं जरूर जाएगी बस तुम मुझसे ले जाने के लिए तैयार हो जाओ बस...

ठीक है मुझ में इसमें कोई आपत्ति नहीं है मैं जरूर छोड़ आऊंगा.. ‌(इतना कह रहा था कि गाड़ी के आगे एक का एक छोटा सा खड्डा आने की वजह से वह गाड़ी को नियंत्रण करने में गाड़ी का हैंडल इधर-उधर घुमाने लगा जिससे गाड़ी का पिछला पहिया खड्डे से होता हुआ बाहर की ओर निकला जिससे गाड़ी लड़खड़ा गई और सरला अपने आप पर नियंत्रण ना कर पाए और अपने आप को संभालने में उसका हाथ शुभम की छातियों से होता हुआ नीचे की तरफ आने लगा और वह फिर भी ना संभाल पाई जिससे उसके हाथ में जो कुछ भी आया उससे अपने आप को संभालने की कोशिश करने लगी और इसी आपाधापी में उसका हाथ सीधे शुभम के पेंट में बने तंबू पर आ गया और वह उसे कस के पकड़ ली... जब तक यह सब हुआ तब तक शुभम अपनी बाइक पर फिर से नियंत्रण पा चुका था लेकिन अपने लंड पर सरला के हथेली की मजबूत पकड़ को महसूस करते हैं उसके तन बदन में उत्तेजना की चिंगारी भड़क उठी एक अद्भुत अहसास एक अजब सुख की लहर उसके तनबदन को झकझोर ने लगी...
जब तक सरला को इस बात का एहसास होता कि उसकी हथेली में शुभम का कपड़ा नहीं बल्कि कपड़े के अंदर छुपा हुआ उसका मजबूत खड़ा हुआ लंड हाथ में आ गया था। अपने आप को संभालने के उद्देश्य से सरला ने अपने हथेली की पकड़ शुभम कैलेंडर पर कुछ ज्यादा ही जोर से कर दी थी जिससे हल्की दर्द की कराह शुभम के मुंह से निकल गई थी।
लेकिन जब इस बात का एहसास सरला को हुआ तो वह शर्म से पानी पानी हो गई और तुरंत शुभम कै लंड पर से अपना हाथ हटा ली... लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी इस क्षण भर मात्र में ही शुभम को अद्भुत सुख का एहसास मिल गया था और सरला को एक मर्द का लंड क्या होता है उसकी मजबूती क्या होती है उसका कड़क पन उसकी लंबाई क्या होती है इस बात का एहसास उसे भी अच्छी तरह से हो गया था। उसका तन बदन एकदम से सिहर उठा था। इस पल का सबसे ज्यादा असर उसे अपनी दोनों टांगों के बीच छोटी सी बुर में हो रहा था जिसमें इस समय आग लगी हुई थी।
अब दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी क्योंकि दोनों ने इस क्षण को अपने अपने तरीके से महसूस किया था इस पल को जी लिया था।

थोड़ी ही देर में सरला का घर आ गया और सरला नीचे उतर कर सब्जियों का थैला हाथ में थाम कर बस उसे इतना ही बोली कि।

याद रखना कल जरूर आना... मेरी बहू को उसके घर पहुंचाना है...(इतना क्या करवा मुस्कुराने लगी है उसकी मुस्कुराहट में एक रात छिपा हुआ था उसकी मुस्कुराहट इस बात का सबूत था कि जो गलती उसी अनजाने में हुई थी उस गलती का उसमें बिलकुल भी पछतावा नहीं बल्कि उसे अच्छा ही लग रहा था. सरला चाची की मुस्कुराहट देखकर शुभम को भी यकीन हो गया था कि जो कुछ भी हो रहा सरला को अच्छा नहीं लग रहा था जिसमें शुभम का ही फायदा था वह सरला की बात का जवाब देते हुए बोला।)

ठीक है चाची मैं कल आ जाऊंगा ... (और इतना कहने के साथ ही शुभम अपने घर की तरफ चला गया... सरला के बदन में अभी भी रोमांच जागरूक था उसकी पैंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वह घर में प्रवेश करके सब्जी का ठेला किचन में रखने के बाद तुरंत बाथरूम में चली गई और एक-एक करके फिर से अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी हो गई। उसकी पूरी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और एक बार फिर से उसने खुद ही अपनी बुर के अंदर अपनी दो उंगली डालकर अपनी प्यास बुझाने के उद्देश्य से उंगली को अंदर बाहर करते हुए गरम सिसकारी भरने लगी... थोड़ी ही देर में सरला चरम सुख को प्राप्त कर ली ‌।
 
सरला कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि उसकी जिंदगी इस तरह से बदलाव लेगी उससे अपनी इस तरह की हरकत पर विश्वास ही नहीं हो रहा था लेकिन जो कुछ भी वह अपने साथ कर रही थी या उसके साथ हो रहा था वह एकदम हकीकत था अपने संयम और अपनी शारीरिक जरूरत के अधीन होकर वह भी वासना की हवा में खुद को घोलती जा रही थी... जिस तरह से मोटर बाइक पर बैठकर वह शुभम के बेहद करीब थी और उसकी मर्दाना खुशबू में खोकर अपनी उत्तेजना पर काबू नहीं कर पाई और जिस तरह से अनजाने में ही उसका हाथ उसके मर्दाना ताकत के जड़ पर पहुंचकर उसे अपनी हथेली में लेकर दबोची थी. वह एहसास उसे यह सब करने के लिए विवश कर रहा था क्योंकि उम्र के इस पड़ाव पर आकर वासना में चिंगारी में अपने आप को झूठ देने में ना जाने कि उसे भी बेहद आनंद की अनुभूति हो रही थी। वह बाथरूम में जाकर अपने कपड़े उतार कर संपूर्ण इतना अवस्था में जिस तरह से अपनी उंगली को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की आग को बुझाने की कोशिश कर रही थी उस समय उसके जेहन में केवल अनजाने में उसके हाथ में आए शुभम के मोटे तगड़े लंड के बारे में ही सोच रही थी पेंट के ऊपर से ही उसे पकड़कर उसकी मोटाई और लंबाई का अंदाजा वह मन ही मन लगा चुकी थी क्योंकि इस उम्र के पड़ाव में आते आते हैं अब तक उसकी जिंदगी में भी कई मर्द आ चुके थे. ‌ और सर लाने उन सभी के लिए अपनी दोनों टांगों को खोल चुकी थी और उन सभी के लंड की मोटाई चौड़ाई और लंबाई के बारे में पूरी तरह से अवगत थी.... लेकिन शुभम के लंड के आकार को लेकर वह पूरी तरह से उत्सुक और निश्चय ही थी कि शुभम के लंड में बहुत जान है उसका लंड मर्दाना ताकत से भरा हुआ है इसलिए वह अपने मन पर काबू नहीं कर पाई थी और अपनी गीली पैंटी को उतार कर अपनी गुलाबी पंखुड़ियों से युक्त बुर में अपनी उंगली डालकर अपनी जवानी की आग ठंडी करने में लगी हुई थी... अपनी जवानी की आग को बुझाने मैं लगी होने के बावजूद अब उसके मन में शुभम के लंड को देखने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी..वह मन ही मन सोच रही थी कि ना जाने क्या बात है उस लड़के ने की अपने बेटे से भी कम उम्र का होने के बावजूद भी उसके प्रति शारीरिक आकर्षण में बंधी जा रही है.... लेकिन यह सब से उसकी अंतरात्मा बेहद खुश नजर आ रही थी...
कभी-कभार उसके मन की अंतरात्मा उसे धिक्कार दी थी उसे भला-बुरा कहती थी और उसे भी यह सब अच्छा नहीं लगता था वह भी आत्मग्लानि से भर जाती थी अपने आप पर शर्म महसूस होती थी लेकिन यह शर्मसार पल गुजरने के बाद जब भी वह शुभम के बारे में सोचती थी तो उससे जुड़ी हर चीज उसे अच्छी लगने लगती थी सही गलत का फैसला कर सकना उसके लिए दूभर होता जा रहा था।शुभम के ख्यालों के साथ ही जब उसकी रसीली बुर मेरी सा होना शुरू होता था तब उसकी आंखों के सामने बस एक ही लक्ष्य रहता था कि किसी भी तरह से अपनी बुर की आग को शांत करें और ऐसा करने के बाद ही वह शांत होती थी। कुछ भी हो अब उसे इस खेल में मजा आने लगा था. ‌ और सही मायने में उसे भी अपनी बहू का उसके मायके जाने का इंतजार बड़ी बेसब्री से था इसके बारे में वह किसी भी प्लान के तहत तो नहीं चल रही थी लेकिन फिर भी वह घर में अकेली रहने के लिए उत्सुक थी।

और समय बीतने के साथ ही उसकी उत्सुकता की घड़ी खत्म होने लगी। सही समय पर शुभम अपनी मोटर बाइक के साथ सरला के घर के द्वार पर खड़ा हो गया जहां पर सरला रुचि के साथ खड़ी थी रुचि सादगी में भी बेहद क़यामत लग रही थी। रुचि पर नजर पड़ते ही उसकी मदहोश कर देने वाली जवानी को शुभम के पेंट में अंगड़ाई लेते लंड ने उसे अपने ही तरीके से सलामी दिया।

तैयार हो गई भाभी चलने के लिए ...

हां मैं तैयार हूं...( रुचि मुस्कुराते हुए जवाब दी... यह सब के बीच सरला की नजर अनजाने में ही शुभम के पेंट के बीचो बीच चली गई जो कि इस समय वहां पर पूरी तरह से शांति फैली हुई थी किसी भी प्रकार का तूफान पेंट के अंदर नजर नहीं आ रहा था... तब अचानक ही उसे इस बात का ज्ञात हुआ कि उसके पीछे बैठे होने की वजह से ही शुभम का लंड खड़ा था इसका मतलब साफ था कि इस उम्र में थी वह ऐसे जवान लड़कों का लंड खड़ा कर सकती है...इस बात का एहसास सरला को होते ही वह प्रसन्नता से भर गई और इसी बीच फिर से उसकी टांगों के बीच की उस कोमल पत्तियों से युक्त नाजुक अंग कांपने लगा उसमें से रीसाव होने लगी और उसमें से मधुर रस की बूंदे चुने लगी जो की पेंटी को गीला कर रही थी।)

शुभम अपनी भाभी को संभाल कर ले जाना. ‌‌(ऐसा कहते हुए वह शुभम को देख कर मुस्कुरा दी और जवाब में शुभम भी मुस्कुरा दिया..)

आप बिल्कुल भी चिंता मत करिए चाची में एकदम आराम से ले जाऊंगा ...


रुचि अपनी सास के पैरों को छूकर उनसे इजाजत लेकर बाइक पर शुभम के पीछे उसके कंधे का सहारा लेकर बैठ गई... जैसे ही रुचि के खूबसूरत बदन का स्पर्श शुभम को अपनी पीठ पर महसूस हुआ उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी एक अद्भुत सुख से उसका संपूर्ण वजूद प्रसन्नता से भर गया... उसे एक जवानी से भरपूर प्यासी औरत का सुखद स्पर्श उसके अंदर तक खलबली मचा गया। वह अपनी बाइक को एक्सीलेटर देकर आगे बढ़ा गया....

क्यों भाभी क्या ख्याल है इस सफर के बारे में...

मेरा क्या ख्याल है मुझे तो अपने घर पहुंचना है बस ..

मैं जानता हूं कि तुम्हें अपने घर पहुंचना है लेकिन मेरे लिए तो यह पल जिंदगी में बेहद हसीन उन लम्हों में से है जिसे में कभी कल्पना में भी सोच नहीं सकता था। ..

ऐसा क्यों भला?

ऐसा ही है भाभी एक खूबसूरत औरत को अपनी बाइक पर इस तरह से पीछे बिठाकर घुमाने का जो मजा मिलता है वह केवल में ही समझ सकता हूं क्योंकि जिंदगी में पहली बार किसी खूबसूरत औरत को इस तरह से अपनी पीछे बिठाकर कहीं घुमाने ले जा रहा हूं.

ओ हेलो घुमाने नहीं ले जा रहे मुझे मेरे मायके छोड़ने जा रहे हो।

तुम्हें ऐसा लगता है ना भाभी लेकिन मैं तो तुम्हें घुमाने ही ले जा रहा हूं। तुम ही सोचो आने जाने वाले लोग अगर देखेंगे कि एक मेरे जैसा खूबसूरत हैंडसम लड़का है खूबसूरत औरत को बाइक पर बिठा कर ले जा रहा है तो घुमाने ले जाता होगा ना यही तो सब सोचेंगे।

लोग क्या सोचते हैं यह मैं नहीं जानती उन लोगों को जो सोचना ही सोचने दो तुम सिर्फ गाड़ी चलाओ।

गाड़ी ही तो चला रहा हूं भाभी .. (शुभम ऐसा कहता हुआ तुरंत जानबूझकर हल्के से ब्रेक लगाया जिससे रोजी का खूबसूरत बदन शुभम की पीठ से टकरा गया और उसके दोनों कबूतर शुभम की पीठ पर रगड़ खाने लगे जिसका एहसास शुभम को उत्तेजित कर गया। रुचि को भी इस बात का एहसास हो गया कि उसकी दोनों चूचियां उसकी पीठ से दब गई हैं इसलिए वह बोली।)

क्या करते हो आराम से चलाओ।

मैं तो आराम से ही चला रहा हूं भाभी लेकिन छोटे छोटे खड्डे परेशान कर देते हैं. ‌‌...

आगे से खडों का ध्यान रखकर चलाओ.....(रुचि अपने आप पर नियंत्रण करते हुए शुभम के कंधे पर हाथ का सहारा लेते हुए बोली जो कि शुभम को रुचिका इस तरह से उसके कंधे पर हाथ रखना बेहद सुखद लग रहा था ‌‌... एक खूबसूरत औरत का इस तरह से स्पर्श करना शुभम को काफी उत्तेजना का अनुभव करा रहा था उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया था.... उसे कल का दिन याद आ गया जब सरला अनजाने में ही पेंट के ऊपर से ही उसकी खबर को जोर से पकड़ ली थी पहले तो शुभम डर गया था लेकिन उस पल का एहसास उसे अंदर तक आनंद की अनुभूति कर आ गया था और जिस तरह सेवा उसके दरवाजे पर सरला को छोड़ा था और सरला मुस्कुराकर उसका अभिवादन की थी उसे देखते हुए शुभम अच्छी तरह से समझ गया था कि सरला को उसका पकड़ना बहुत अच्छा लगा था और यही उम्मीद हुआ रुचि से भी लगा कर रखा था कि काश रूचि भी अनजाने में ही सही उसके खड़े लंड को पकड़ कर उसके मर्दाना ताकत को भाप ले क्योंकि अच्छी तरह से जानता था कि रुचि बेहद प्यासी औरत है भले ही वह ऊपर से संस्कारी होने का ढोंग रचाती हो अंदर से वह बेहद प्यासी है... क्योंकि इसका भी एक कारण था इस उम्र में जवानी के नए दौर पर उसे अपने पति के साथ होना चाहिए था ऐसे में उसका पति साल में लगभग आठ 10 महीना बाहर ही रहता था और इस वजह से वह अपनी जवानी के शुरुआती दिनों को पति के संसर्ग में भोग नहीं पा रही थी जिसके कारण अंदर ही अंदर उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी बस उस प्यास को कुआं दिखाने की जरूरत थी उसके बाद शुभम का काम खुद-ब-खुद हो जाने वाला था यह उसे पूरा विश्वास था क्योंकि ऐसा ही उसके साथ अब तक होता चला आ रहा था। वह बात का दौर आगे बढ़ाते हुए बोला।

वैसे भाभी आपके घर में किस की तबीयत खराब है?

किसी की भी तो नहीं...( रुचि एकदम ठंडे स्वर में बोली।)

लेकिन मुझे तो चाची बता रही थी कि तुम्हारे पापा की तबीयत खराब है।

अगर मैं कहूं कि मैं झूठ कह रही थी तो .
(शुभम को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि रुचि क्या कह रही है इसलिए वह आश्चर्य जताते हुए बोला।)

तुम क्या कहना चाह रही हो मैं कुछ समझा नहीं ...

समझ जाओगे मैं बस इतना कहना चाह रही हूं कि अकेले घर में रहते रहते मैं एकदम बोर हो गई थी इसलिए वहां से छुट्टी पाने के लिए मुझे पिताजी की तबीयत खराब होने का बहाना बनाना पड़ा।

क्या कह रही हो भाभी ..(शुभम लगभग चौक ते हुए बोला..)

मैं एकदम सच कह रही हूं शुभम अकेले रहते रहते मैं बोर हो चुकी थी.. एक तो तुम्हारे भैया घर पर रहते नहीं है ऐसे में मुझे अकेले घर पर रहना पड़ता है ऐसा नहीं है कि काम करने के बहाने से मैं अपने मायके जा रहे हो बल्कि सच कहूं तो ऐसी उम्र में जब पति के साथ रहना चाहिए तो हमें उनके बिना घर में अकेले रहती हूं... इसलिए मेरा मन हमेशा उदास रहता है और इसीलिए मैं तरोताजा होने के लिए अपने मायके जा रही है वहां कुछ दिन रहुंगी तो मन हल्का हो जाएगा...

वैसे सच कहूं भाभी तो जैसी तुम दिखती हो वैसी हो नहीं....

क्या मतलब है तुम्हारा...(हवा के झोंके से बालों की लट को अपने गाल पर से अपनी उंगलियों का सहारा देकर हटाते हुए बोली..)

मतलब कि तुम एकदम सीधी-सादी एकदम सरल स्वभाव की लगती हो लेकिन तुम्हारी हरकतें कर मुझे लगता है कि तुम बहुत ही शरारती और नटखट हो।

(शुभम की यह बात सुनकर रुचि खिलखिला कर हंसने लगे वह रुचि का खेल खिलाता हुआ चेहरा बाइक के शीशे में अच्छी तरह से देख रहा था और रूचि का यह रूप से बेहद मनमोहक लग रहा था इस समय रुचि शुभम के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन और खूबसूरत औरत लग रही थी। रुचि को हंसता हुआ देखकर वह बोला।)

हंस क्यों रही हो भाभी।

बस ऐसे ही तुम्हारी बात सुनकर हंसी आ गई....

चलो कोई बात नहीं मेरी बात सुनकर तुम्हारी खूबसूरत चेहरे पर हंसी तो आई....

तुम बातें ही ऐसी करते हो कि हंसी आ जाती है।

(शुभम को ईस सफर में मजा आने लगा था .. खूबसूरत औरत का साथ पाकर शुभम का मन हवा में उड़ रहा था उसका पूरा वजूद अपने नियंत्रण में बिल्कुल भी नहीं था बार-बार वह रह रहे कर ब्रेक लगा दे रहा था जिससे ना चाहते हुए भी रुचि की दोनों चूचियां शुभम की पीठ पर रगड़ जा रही थी जिसका एहसास रुचि को अच्छी तरह से हो रहा था लेकिन वह अपने आप को रोक पाने में असमर्थ थी क्योंकि काफी हद तक उसे भी यह सब अच्छा लगने लगा था कई महीने बीत चुके थे दोनों कबूतर को किसी मर्द का स्पर्श हुए... वैसे भी इस समय उन दोनों कबूतरों को छूने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ उसके पति का भी था जो कि रुचि के दोनों कबूतरों को दाना तक नहीं डालता था इसलिए आज शुभम की पीठ पर अपनी चूचियों की रगड़ को महसूस करके वह भी उत्तेजित होने लगी थी और जब भी वह पर एक मारता था तो अपने आप को नियंत्रित करने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं करती थी। शुभम एक्सीलेटर देकर अपनी भाई को भगाए ले जा रहा था.... अपनी बाइक पर पीछे एक खूबसूरत औरत को बैठा कर उसे काफी हद तक गर्व का अनुभव हो रहा था कभी-कभी तो यह साल लगने लगता था कि जैसे वह अपने पीछे अपनी पत्नी को बिठाया हुआ है और वैसे भी रुचि जिस कदर खूबसूरत थी... शुभम यही सोचता था कि रुचि उसकी पत्नी बनने लायक है। शुभम बातों का दौर आगे बढ़ाते हुए बोला।

वैसे भाभी मैं कहना तो नहीं चाहता हूं लेकिन फिर भी आपकी इजाजत हो तो कुछ कहुं लेकिन बुरा बिल्कुल भी मत लगाना....

नहीं मैं बुरा नहीं लगाऊंगी तुम कहो क्या कहना चाहते हो।

मैं यह कहना चाहता हूं कि आप भले हंसती हो मुस्कुराती हो. ‌लेकिन ना जाने मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारी हंसी के पीछे दर्द छुपा हुआ है....
(शुभम की यह बात सुनकर रुचि उदास हो गई क्योंकि वह जानती थी कि शुभम जो कह रहा है वह बिल्कुल सच है वह कुछ देर तक ऐसे ही खामोश रही तो शुभम फिर से जोर देते हुए बोला...)

क्या हुआ भाभी तुम खामोश की हो गई मैं पहले ही कहा था कि अगर मेरी बात तुम्हें अच्छी ना लगे तो बुरा मत मानना मैं तो बस अपने मन की बात कह रहा था मैं तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहता था।

नहीं ऐसी कोई भी बात नहीं है लेकिन जो तुम कह रहे हो वह बिल्कुल सच है....(कुछ देर खामोश रहने के बाद) मैं आगे पढ़ना चाहती थी मैं कुछ बनना चाहती थी मैं हमेशा अपने दोस्तों में सबसे आगे रहती थी चंचल हंसमुख हमेशा हंसती रहती थी मुस्कुराती रहती थी और अपनी सभी दोस्तों को रिश्तेदारों को यही कहती रहती थी कि मुस्कुराते रहो हंसते रहो जिंदगी कब करवट ले लेगी पता भी नहीं चलेगा और शायद ऐसा ही मेरे साथ हो गया...।

ऐसा क्या हो गया भाभी.....
(शुभम की यह बात सुनकर फिर से रुचि खामोश हो गई और उसकी खामोशी को तोड़ते हुए सुभम बोला)

बोलो ना भाभी ऐसा क्या हो गया कि एक हमेशा हस्ती रहने वाली लड़की एकदम शांत हो गई...
(शुभम की बात सुनकर रुचि को लगने लगा कि शुभम उसका हमदर्द बन सकता है जिससे अपने मन की सारी बातें कह सकती है... इसलिए वह अपने मन की बात बताने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गई और वह बोली. ‌)

मैं सच कहूं तो सुभम में यह शादी करना ही नहीं चाहती थी।
(यह सुनते ही शुभम के मन के कोने में खुशी की लहर दौड़ने लगी क्योंकि रुचि कि कहीं यह बात उसका रास्ता तय करने के लिए काफी था शुभम को रुचि में अपनी मंजिल नजर आने लगी थी लेकिन उसकी बात सुनकर वहां आश्चर्य जताते हुए बोला।)

क्या कह रही हो भाभी लेकिन ऐसा क्यों...?

मुझे वह बिल्कुल भी पसंद नहीं थे...
(रुचि की बातें सुनकर शुभम मन ही मन प्रसन्न हुआ जा रहा था ‌।)

मुझे तो भाभी बिल्कुल भी यकीन नहीं हो रहा है की जो तुम कह रही है वह सच है...

मैं जो भी कह रही हूं वह बिल्कुल सच है मुझे मेरे पति बिल्कुल भी पसंद नहीं है और मैं यह बात अपनी मम्मी पापा को बता चुकी थी लेकिन....

लेकिन क्या....?

लेकिन मेरे पापा मुझ पर बहुत ज्यादा दबाव देकर मुझसे यह शादी करने के लिए हामी भरवाए हैं...

अगर ऐसा है तो सच में अंकल जी ने बहुत गलत कीए है. उन्हें अपनी बेटी की पसंद का तो ख्याल रखना था आखिरकार ए गुड्डा गुड्डी का खेल तो है नहीं जिंदगी भर का साथ है।

लेकिन मेरे मम्मी पापा नहीं माने मम्मी तो मान भी गई थी लेकिन मेरे पापा पुरानी दोस्ती की वजह से बिल्कुल भी मानने को तैयार नहीं थे वह कहते थे कि वहां रहोगी तो एकदम खुश रहोगी सुख सुविधा पैसे से एकदम संपन्न... लेकिन ऐसी सुख सुविधा पैसे से संपन्न होकर क्या फायदा जब पति का प्यार ना मिले. ।‌(रुचि के मुंह से आखरी शब्द अचानक ही अनायास निकल गए थे वह यह बात कहना नहीं चाहती थी। रुचि के मुंह से निकले आखिरी शब्द सुनकर शुभम तुरंत बोला...)

पति का प्यार..... मैं कुछ समझा नहीं भाभी क्या तुम्हारे पति तुमसे प्यार नहीं करते...

कुछ नहीं तुम गाड़ी चला ओ....

(इतना सुनकर शुभम आगे कुछ भी नहीं कहा...लेकिन रुचि कि कहीं आखरी बात ने उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर को धोखा दिया था वह से पक्के तौर पर विश्वास हो गया था कि रोज ही बेहद प्यासी औरत है तभी हो पति के प्यार के बारे में जिक्र छेड़ दी थी। उसे लगने लगा था कि उसका काम अब बन जाएगा बस थोड़ी बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। दोनों करीब करीब पहुंचने ही वाले थे.... तभी सुरुचि आगे की सड़क बताते हुए उसे दूसरी तरफ मोड़ने के लिए बोली और शुभम ने वैसा ही किया मुख्य सड़क से उतरने के बाद तकरीबन 5 मिनट की ही दूरी पर रुचि का मायका आ गया.... शुभम बाई क खड़ी करके रुचि के बैग को हाथ में ले लिया जिसे रुचि खुद अपने हाथ में लेकर प्रसन्नता के साथ घर के दरवाजे पर दस्तक देने लगी... थोड़ी ही देर में दरवाजा खुला और रुचि की मां रुचि को दरवाजे पर खड़ी देखकर एकदम खुश हो गई और उसे गले लगा ली ... फिर उसी घर में प्रवेश की और रुचि की मां शुभम को भी घर में आने के लिए बोली.. शुभम भी अपने संस्कार का प्रसारण करते हुए रुचि की मम्मी के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया रुचि की मम्मी ने उसे आशीर्वाद देकर अंदर आने के लिए अभिवादन कि... रुचि भी शुभम को अंदर आने के लिए बोल कर अपने पापा के रूम में उनसे मिलने चली गई शुभम वहीं बैठ कर इधर-उधर देखने लगा घर काफी अच्छी तरह से सजा हुआ था ...
सोफे पर बैठकर वह अपनी थकान दूर कर रहा था... रुचि के साथ का यह सफर उसे बेहद हसीन लग रहा था साथ ही बेहद उत्तेजना आत्मक क्योंकि अभी भी उस सफर की उत्तेजना उसकी पैंट के अंदर बरकरार थी जिसकी वजह से उसे जोड़ों की पेशाब लगी हुई थी अब वह बाथरूम के लिए इधर उधर नजर दौड़ाने लगा... कि तभी उसे घर के बाहर बाथरूम नजर आया जोकि घर से सटा ही हुआ था।
वह इधर-उधर देखकर तुरंत बाथरूम में घुस गया उसे चोरों की पेशाब लगी हुई थी और इस अफरातफरी में वह दरवाजे की कड़ी लगाना भूल गया और पेंट का बटन खोल कर वह अपने मोटे खड़े लंड को हाथ में लेकर उसे झुलाते हुए पेशाब करने लगा... वहीं दूसरी तरफ सफर के दरमियान उत्तेजित अवस्था में रुचि को भी बहुत जोरों की पेशाब लगी हुई थी इसलिए वह अपने पापा से मिलने के तुरंत बाद वह भी बाथरूम की तरफ आने लगी... वह इस बात से बिल्कुल अनजान की बाथरूम में से कौन है वह बिना सोचे समझे दरवाजे को खोल दी और उसकी आंखों के सामने जो नजारा आया उसे देखकर रूचि की आंखें फटी की फटी रह गई. ‌... क्योंकि जैसे ही उसने दरवाजा खोली थी उसकी आंखों के सामने शुभम अपनी मोटी तगड़ी खड़े लंड को हाथ में हिलाते हुए मुत रहा था... रुचि को तो अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ कि जो देख रही है वह सही है क्योंकि जिंदगी में उसने इतना मोटा तगड़ा लंबा लंड नहीं देखी थी जो कि पूरे शबाब में था पूरा खड़ा अपनी औकात दिखाता हुआ... जब तक कि दोनों समझ पाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी अनजाने में ही शुभम अपने मोटे तगड़े लंड की नुमाइश रुचि के सामने कर चुका था और अनजाने में ही रुचि भी इस मनोरम में अद्भुत कामोत्तेजना से भरपूर मादक दृश्य को देख रही थी वह शर्मा की अपनी नजरें घुमा दी तब तक उसकी आंखों में शुभम के मोटे तगड़े लंड की छवि बस चुकी थी... रुचि पल भर में एकदम उत्तेजित हो गई थी एक तो पैसा आपका पैसा रुक पर से इस तरह का अद्भुत दृश्य दोनों का मिला जुला असर उसके चेहरे पर नजर आ रहा था जो कि शर्म के मारे उसके गाल लाल टमाटर की तरह हो गए थे और टांगों के बीच की पतली दरार सावन के बौछार से भर चुकी थी...
इस नजारे पर से रूचि का मन तो नहीं हो रहा था कि अपनी नजर को हटा ले लेकिन वह काफी अपने आप को शर्मिंदा महसूस कर रही थी क्योंकि वह दरवाजे पर दस्तक नहीं की थी और एक झटके से दरवाजा खोल दी थी जिसमें गलती उसी की ही थी उसे ऐसा लग रहा था इसलिए वह शर्म से अपनी नजरे दूसरी तरफ घुमा ली थी लेकिन बाथरूम से बाहर नहीं आई थी। लेकिन दूसरी तरफ अनजाने में ही ऐसा मौका हाथ आया देखकर शुभम बेशर्म की तरह ना तो दूसरी तरफ घूमने की चेस्ट आई किया ना तो अपने लंड को पेंट में वापस डालने की जरूरत को समझा वह जानबूझकर अभी भी अपने लैंड को हिलाते हुए मुत रहा था. ।मौत क्या रहा था अब वह जानबूझकर रुचि को अपनी मर्दाना ताकत से भरे हुए लंड की नुमाइश कर रहा था उसे दिखा रहा था। और जब उसे लगने लगा कि जो उसे दिखाना चाहिए था उस नजारे को रुचि ने भरपूर देख ली है तो खुद ही वह अपने लंड को पेंट में भरकर बाथरूम से मुस्कुराता हुआ बाहर निकल गया. ‌‌ थोड़ी देर बाद पेशाब करने के बाद रुचि भी बाथरूम से बाहर आ गई तब तक शुभम जाने के लिए तैयार हो गया था वह ज्यादा देर तक अब उसके घर रुकना नहीं चाहता था क्योंकि उसका काम हो गया था। ..शुभम को जाता देखकर रुचि की मम्मी और उसके पापा उसे रोकने की कोशिश करने लगे लेकिन काम का बहाना करके वह जाने को तैयार हो गया.. रुचि भी मुस्कुराते हुए उसे रोकने की कोशिश की लेकिन शुभम मुस्कुरा कर उसकी बात को टाल दिया और वह एक्सीलेटर देकर अपनी बाइक को आगे बढ़ा दिया जाते-जाते वह रुचि के कोमल और प्यासे मन पर अपने लंड की मुहर लगा गया था।
 
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