सरला चाची के वापस जाते ही निर्मला ने राहत की सांस ली लेकिन सरला चाची की बातों ने निर्मला को कशमकश में डालकर रख दिया था। क्योंकि एक मां होने के नाते निर्मला अच्छी तरह से जानती थी कि उसके बेटे को कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी... लेकिन सरला उसे अभी अभी बता कर गई थी कि उसके बेटे को कद्दू की सब्जी अच्छी लगती है और वह घर पर खाने का उसे आमंत्रण भी दे गई थी.. इसलिए निर्मला को कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वह कपड़ों को इकट्ठा करके नीचे कमरे में ले आई.. और शुभम का इंतजार करने लगी..
थोड़ी ही देर में डोर बेल की आवाज सुनते ही निर्मला जल्दी-जल्दी दरवाजा खोलने के लिए गई क्योंकि वह जानती थी कि शुभम वापस आ गया है।
दरवाजा खुलते ही शुभम मुस्कुराते हुए घर के अंदर आया और उसे मुस्कुराता हुआ देखकर जवाब में निर्मला भी मुस्कुरा दी और वह दरवाजा बंद कर दी।
क्या बात है आज बहुत खुश नजर आ रहा है। (निर्मला दरवाजा बंद करके अपने बेटे... की तरफ आगे बढ़ते हुए बोली...)
मैं तो हमेशा खुश रहता हूं मम्मी...
मैं इस खुशी की वजह जान सकती हूं (निर्मला अपने दोनों हाथ को बांधते हुए बोली।)
तुम ......हां तुम मेरी खुशी की वजह हो ..(शुभम आगे बढ़कर अपनी मां के गले में बाहें डालता हुआ बोला)
मैं .....लेकिन मैं कैसे...?
अरे मम्मी इतना भी नहीं जानती मेरी खुशी की वजह तुम हो क्योंकि तुम मुझे कितना खुश रखती हो मेरा इतना ख्याल रखती हो और तो और दूसरे तरीके से भी मेरा कितना ख्याल रखती हो......(शुभम अपनी मां की आंखों में आंखें डालता हुआ बोला)
दूसरे तरीके से मतलब मैं कुछ समझी नहीं....( निर्मला अनजान बनते हुए बोली)
अच्छा अब इतना भी अनजान मत बनो कि मेरे कहने का मतलब ना समझ रही हो मैं सब जानता हूं कि तुम अच्छी तरह से जानती हो कि मैं क्या कहना चाहता हूं।
नहीं मैं बिल्कुल नहीं समझी तू मुझे ठीक से समझ आएगा तब ना मैं समझूंगी कि तू क्या कहना चाहता है ।(नीम्रला जानबूझकर चुटकी लेते हुए बोली)
बताऊ किस तरह से....(शुभम बड़ी गहराई से अपनी मां की आंखों में जागता हुआ बोला निर्मला को अपने बेटे की आंख में कुमारी की चमक साफ नजर आ रही थी वह अच्छी तरह से समझ रही थी कि वह क्या करना चाह रहा है लेकिन निर्मला को भी अच्छा लग रहा था इसलिए वह भी शरारती अंदाज में बोली.)
बताना ....मैं तो जानना चाहती हूं कि दूसरे तरीके से मैं कैसे तुझे खुश रखती हूं।
रुको अभी बताता हूं....(बातों ही बातों में शुभम काफी उत्तेजित हो चुका था इस तरह से अपनी मां के गले में बाहें डाल कर खड़े रहने की वजह से और एकदम करीब रहने की वजह से निर्मला के बदन से आ रही माता खुशबू उसके बदन में उत्तेजना की लहर बढ़ा रहे थे और ब्लाउज में कैद निर्मला की दोनों बड़ी-बड़ी चूचियां उसके सीने से स्पर्श हो रही थी जिसकी वजह से उसके बदन में गर्माहट बढ़ती जा रही थी.... शुभम अपने होठों को अपनी मां के तपते हुए होठों के करीब ले जाने लगा घर में इस समय दोनों के सिवा तीसरा कोई भी नहीं था इसलिए दोनों जब चाहे तब एक दूसरे से छेड़खानी कर लेते थे और इस पल का भरपूर फायदा उठाते थे शुभम के होठ निर्मला के मदमस्त होठ के करीब होते जा रहे थे....एक बार फिर से निर्मला के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी तन बदन में उत्तेजना की चिंगारी भड़कने लगी थी। जैसे-जैसे शुभम के प्यासे होठ निर्मला के तपते हुए होठों के करीब आ रहे थे वैसे वैसे निर्मला उत्तेजना के मारे सूखे हुए पत्ते की तरह फड़फड़ा रही थी शुभम दोनों हाथों में अपनी मां के चेहरे को इस तरह से ले लिया था मानो गुलाब के फूल को अपनी हथेली में संभाल कर भर लिया हो।
दोनों के चेहरे इतने करीब हो गए थे कि दोनों की नसों में से निकल रही गर्म सांसों की हवा चेहरे पर पड़ते ही वाष्प की तरह घुल जा रही थी।
दोनों बैठक घर में खड़े थे । जबसे निर्मला को इस बात का आभास हुआ है कि उनकी पड़ोस की सरला चाची उन दोनों पर नजर रख रही है तब से वह घर की खिड़कियों के पर्दे हमेशा लगाकर रखते थे ताकि कुछ भी नजर ना आए इसलिए वह निश्चिंत थी। दोनों एक दूसरे की बाहों में थे शुभम धीरे-धीरे अपने होंठ को अपनी मां के होठों के एकदम करीब ले आया वह अपनी मां की खूबसूरत चेहरे को अपने दोनों हथेली से संभाले हुए था और देखते ही देखते शुभम ने अपने होंठ को अपनी मां की गुलाबी होंठ पर रखकर उन्हें पागलों की तरह चूसना शुरू कर दिया अपने बेटे की इस हरकत की वजह से निर्मला काफी उत्तेजित हो गई थी और वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए अपने होठों को खोल दी और उसके होठों को मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दी दोनों जितना हो सकता था एक दूसरे के होठों से चासनी चुस लेना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे को किसी इंग्लिश मूवी के हीरो हीरोइन की तरह चुंबन कर रहे थे पल भर में ही दोनों एकदम मदहोश हो गए अपनी मां के मदमस्त होंठों को चूसने से शुभम को ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वह अपनी मां के होठों को नहीं बल्कि किसी बेहतरीन इंग्लिश दारू की बोतल को मुंह से लगाया हो उसके बदन में नशा की खुमारी छाने लगी आंखों में मदहोशी का आलम इस कदर छाने लगा कि अपने आप ही उसकी आंखें बंद होने लगी और यही हाल निर्मला का भी हो रहा था उसकी भी आंखे मस्ती में बंद होने लगी वह अपनी बाजुओं में अपने बेटे को भरकर चुंबन का मजा ले रही थी और शुभम अपने दोनों हाथों को नीचे की तरफ ले जाकर अपनी मां की कमर के नीचे के उपहार को अपनी हथेली में भर कर दबाना शुरू कर दिया और लगातार अपनी मां के होठों को चूसता चला जा रहा था।
निर्मला चुदवासी होने लगी थी.. उसकी बुर चुदासपन से भरी जा रही थी जिसकी वजह से उसमें से लगातार नमकीन मधुर रस बहने लगा था और उसकी पेंटी उसके मधुर रस से गीली होने लगी थी।
शुभम का लंड पेंट के अंदर गदर मचाया हुआ था जो कि अब खड़क होने के बाद निर्मला की टांगों के बीच साड़ी के ऊपर से ही शिरकत कर रहा था लेकिन उसका कठोरपन इतना ज्यादा मजबूत था कि निर्मला को अपनी कचोरी जैसी फूली हुई बुर पर उसकी दस्तक बराबर महसूस हो रही थी।
दोनों दुनिया को भूल कर एक दूसरे के होठों की चुसाई करने में लगे थे। शुभम का मोटा तगड़ा लंड एक बार फिर से अपनी औकात में आ गया था जोकि पजामे के बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रहा था। शुभम अपनी मां के होठों को ऐसे चूस रहा था जैसे कि उस पर रसमलाई लगी हो वह लगातार अपनी मां के लाल लाल होंठों को चूसता चला जा रहा था। उत्तेजना के मारे निर्मला का खूबसूरत चेहरा सुर्ख हो चुका था उत्तेजना के मारे गला सूख रहा था।निर्मला को अपने बेटे की यही अदा तो बहुत अच्छी लगती है कि कभी भी वह मूड बना देता है और ऐसा अभी भी हो रहा था निर्मला की चुदवासी बुर किसी गुब्बारे के भांति फूल पिचक रही थी। पूरे घर में केवल दोनों के मुख से चुम्मा चाटी और गर्म सिसकारी की आवाज ही आ रही थी।
पल भर में माहौल पूरी तरह से बदल गया था दोनों पर मदहोशी का आलम अपना असर दिखा रहा था।
शुभम का लंड पूरी तरह से तैयार था निर्मला की रसीली बुर के अंदर जाने के लिए बस उसे रास्ता दिखाने की जरूरत थी। जो कि अभी तक साड़ी के ऊपर से ही दोनों टांगों के बीच खुली हुई बुर पर ठोकर मार रहा था। और इस ठोकर को खाकर निर्मला की बुर पेंटी के अंदर होने के बावजूद भी हल्की सी खुल गई थी जो कि उसकी तरफ से लंड को पूरी तरह से स्वीकृति थी कि वह अंदर आ सकता है। और बुर की आत्मसमर्पण को देखकर लंड का हौसला बढ़ने लगा था वह और जोर-जोर से बुर के ऊपर दस्तक दे रहा था ऐसा लग रहा था मानो कि वह निर्मला की बुर पर अपने नाम का सिक्का लगा रहा हो।
निर्मला भी अपने बेटे की मोटी तगड़ी लंड की ठोकर को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी वह उसे अपनी बुर की गहराई में लेने के लिए मचल रही थी। अपने बेटे के इस तरह के लाजवाब चुंबन का नशा उसके ऊपर पूरी तरह से छा चुका था आंखों में मदहोशी का आलम अपने अंदर समाने को बेकरार कर दिया था।
शुभम होंठों की चुसाई जारी रखते हुए अपना हाथ निर्मला के बदन पर चारों तरफ घुमा रहा था अब उससे बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हुआ जा रहा था वह अपने हाथ नीचे की तरफ ले जाकर अपने दोनों हाथों में साड़ी पकड़ कर ऊपर की तरफ उठाने लगा लेकिन जानबूझकर निर्मला उसे रोकने की कोशिश करते हुए उसके हाथ को पकड़ लिया और अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने लगी लेकिन अत्यधिक उत्तेजना का असर शुभम पर साफ नजर आ रहा था वह जबरदस्ती अपनी मां की साड़ी को ऊपर की तरफ उठा रहा था। निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को ऊपर उठा दे रहा था। इस तरह से दोनों तरफ से जोर-जबर्दस्ती हो रही थी और इस जोर-जबर्दस्ती में निर्मला को मजा आ रहा था। वह जानबूझकर शुभम को रोक रही थी ताकि वह देख सके कि सुभम उसके साथ क्या कर सकता है....हालांकि छेड़खानी में जोर जबरदस्ती में निर्मला को अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी.
होठ चुसाई का लगातार आनंद लेते हुए निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को पीछे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को पर उठा दे रहा था। शुभम पूरी तरह से न चुदवासा हो चुका था अपनी मां का इस तरह से रोकना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। वह उतावला हो चुका था अपनी मां की बुर में लंड डालने के लिए ... अपनी मां की हरकत देखकर उसे और कोई रास्ता नजर ना आता देखकर वह दोनों हाथों को अपनी मां की नितंबों के उभार के निचले हिस्से पर रखकर उसे उठा लिया कर जल्दी-जल्दी उसे चार पांच कदम चल कर दीवार से सटा दिया.... निर्मला तो अपने बेटे की भुजाओं की ताकत देखकर हैरान रह गई.. वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि उसका बेटा उसे इस तरह से उठा लेगा जैसे कि कपड़े का गट्ठर हो वह भली भांति जानती थी कि उसका वजन कुछ ज्यादा ही था लेकिन उसके बेटे ने अपनी ताकत दिखाते हुए उसे बड़े आराम से अपनी गोद में उठाकर उसे दीवार से सटा दिया था इस बात का एहसास उसे अंदर तक उत्तेजित कर गया था उसकी बुर से लगातार नमकीन पानी बह रहा था... दीवार से लगाते ही शुभम अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया और एक हाथ से उसकी पेंटी को नीचे की तरफ सरका ते हुए घुटनों तक ला दिया.... रास्ता एकदम साफ था दो टांगों के बीच उसे अपनी मंजिल नजर आ रही थी। वह बिना वक्त गवाएं एक हाथ से अपने पेंट की बटन खोलने लगा दो कि अभी भी निर्मला जानबूझकर अपनी साड़ी को नीचे करने की नाकाम कोशिश कर रही थी। और देखते ही देखते शुभम अपने हाथ में अपने खड़े लंड को पकड़ कर ही नाता हुआ उसे अपनी मां की दोनों टांगों के बीच लगा दिया जो कि इस समय निर्मला के बुर किसी भट्टी की तरह तप रही थी।
निर्मला निर्मला उसे बिना बोले उसे रोकने की कोशिश करती रही और शुभम अपनी मनमानी करते हुए अपने लंड को अपनी मां की बुर के अंदर धीरे-धीरे करके पूरा डाल दिया....
निर्मला अपने बेटे की हरकत की वजह से आनंद से सराबोर हो गई उसे अपने बेटे की जबरदस्ती बहुत अच्छी लग रही थी शुभम का लंड पूरा बुर में समाया हुआ था। जिसे शुभम धीरे धीरे अंदर बाहर करता हुआ चोदना शुरू कर दिया था।
आखिर कब तक निर्मला दिखावे का नाटक करके अपने मजे को किरकिरा कर दी वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए उसके कंधे पर हाथ रखकर और अपनी नजर को नीचे की तरफ करके अपने बेटे के खातिर लंड को अपनी बुर की गहराई में अंदर बाहर होता हुआ देखकर चुदाई का मजा लेने लगी। अब दोनों के बीच किसी भी प्रकार का संवाद नहीं हो रहा था क्योंकि अब दोनों के बीच वार्तालाप केवल उनके लंड और बुर कर रहे थे जिसमें से ठाप ठाप की आवाज लगातार गूंज रही थी। शुभम को बहुत मजा आ रहा था वह ब्लाउज के ऊपर से यह अपनी मां की बड़ी-बड़ी चुचियों को दबाता हुआ अपनी कमर को आगे पीछे करके चोद रहा था। निर्मला काफी उत्तेजित हो चुकी थी उसे आज एक नया अनुभव मिला था क्योंकि दोनों के बीच ड्राइंग रूम में ही एक अद्भुत संभोग का दृश्य रचा जा रहा था । जो कि दोनों को उम्मीद भी नहीं थी कि इस तरह से दोनों चुदाई का आनंद लूटेंगे। शुभम लगातार किसी मशीन की तरह अपनी कमर को हीला रहा था।
निर्मला अपने बेटे की आंखों में झांकते हुए उसके दमदार लंड की ठोकर को अपनी बुर की गहराई में महसूस कर रही थी उसकी आंखों में साफ नजर आ रहा था कि वह अपने बेटे से कहना चाह रही थी कि और जोर जोर से धक्के लगाए और जैसे शुभम एक अनुभवी मर्द की तरह अपनी मां की आंखों में उसके दिल के जज्बात को पढ़कर जोर जोर से अपनी कमर को हिलाने लगा। पूरे कमरे में निर्मला की सिसकारी की आवाज गुंजने लगी....
शुभम अपनी मां की कमर थामे हुए जोर जोर से धक्के लगा रहा था उसका हर एक प्रहार निर्मला के मुख से आह निकाल दे रही थी लेकिन इस आह में भी सुकून और आनंद छिपा हुआ था। शुभम कुछ देर तक ऐसे ही अपनी मां की चुदाई करता रहा उसकी रफ्तार एक पल के लिए भी कम नहीं हो रही थी वह एक हाथ से चूची दबा रहा था और दूसरे हाथ से कमर पकड़कर उसे मसल रहा था जिससे निर्मला को और ज्यादा मजा आ रहा था।
निर्मला पूरी तरह से भाव विभोर होकर अपने बेटे से चुदने का आनंद लूट रही थी। हालात पूरी तरह से कैसे बदल गए उसे खुद समझ में नहीं आया क्योंकि कुछ देर पहले अपने बेटे से सरला चाची के दिए गए आमंत्रण के बारे में पूछताछ करना चाहती थी लेकिन शुभम के घर में आते ही जिस तरह से एकाएक दोनों के बीच चुंबन की बौछार होने लगी और वह बौछार अब घमासान चुदाई में बदल चुकी थी और निर्मला अपनी बात भूल चुकी थी और जुदाई का आनंद ले रही थी।
निर्मला अपने बेटे की हर तबके के साथ अपनी कमर को पीछे की तरफ कर दे रही थी क्योंकि शुभम कुछ ज्यादा ही जोर लगाकर धक्के मार रहा था और यह बात शुभम को अच्छी तरह से पता चल रही थी लेकिन उसे बहुत मजा आ रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वह अपना लंड पूरी तरह से बाहर निकाल दिया जो कि अभी भी पानी निकला नहीं था जिसका मतलब साफ था कि शुभम का मन भरा नहीं था और ना ही निर्मला का मन कर रहा था कि अपने बेटे के लंड को अपनी बुर से बाहर निकाल ले लेकिन शुभम के मन में कुछ और चल रहा था वह अपनी मां की बुर से लंड बाहर निकाल कर उसके कंधों को पकड़कर घुमाने की कोशिश करने लगा और अपने बेटे का इशारा समझ कर निर्मला अपनी साड़ी को दोनों हाथों से कमर तक उठाए खड़ी होकर अपनी टांगों का सहारा लेकर घुटनों में फंसी पेंटी को पैरों से बाहर निकालने लगी और अगले ही पल उसकी गीली पैंटी फर्श पर पड़ी थी और वह दीवार की तरफ मुंह करके अपनी साड़ी को दोनों हाथों से उठा है अपनी मदमस्त गांड को किसी दुश्मन की तरफ लगाए जाने वाली तोप की तरह ऊपर की तरफ उठा दी.... शुभम को और क्या चाहिए था बिना बोले ही उसकी मां उसका इशारा समझ गई थी ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी भूखे के सामने स्वादिष्ट व्यंजन से भरी थाली रख दी गई हो वह अपनी भूख मिटाने के लिए उस थाली पर टूट पड़ा और शुभम अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड को पकड़कर एक बार फिर से उसके अंदर समा गया और जोर जोर से धक्के लगाते हुए उसे चोदना शुरु कर दिया पूरे कमरे में गर्म सिसकारी की आवाज किसी मधुर ध्वनि की तरह बज रही थी। तकरीबन 35 मिनट की घमासान चुदाई के बाद दोनों की सिसकारी की आवाज तेज हो गई और दोनों एक साथ झड़ गए।...
निर्मला की सांस इतनी तेज चल रही थी कि मानो जैसे अभी रुक जाएगी... शुभम का भी यही हाल था घर में आने से पहले उसे उम्मीद नहीं थी कि इस वक्त उसे जबरदस्त चुदाई का सुख भोगने को मिलेगा... जिससे अनायास ही मिले इस सुख से वह पूरी तरह से तृप्त हो चुका था....
निर्मला अपने कपड़े व्यवस्थित करके फर्श पर से अपनी पूरी तरह से गिरी हुई पेंटी को उठाकर जाने लगी तो शुभम बोला...
पहनोगी नहीं क्या.....?
(इतना सुनकर वहां रुक गई और अपने बेटे की तरफ मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए उसके करीब आई और अपने दोनों हाथ में पेंटी को फैलाते हुए उसकी आंखों के सामने दिखाते हुए बोली।)
पहनने लायक तूने छोड़ा है क्या...
(शुभम साफ-साफ देख पा रहा था कि उसकी मां की पैंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी जो कि पहनने लायक बिल्कुल भी नहीं थी वह मुस्कुराता हुआ बोला...)
अब इसमें मेरी क्या गलती है तुम पानी इतना छोड़ती हो....
तुझसे तो भगवान बचाए....( इतना कहकर वो मुस्कुराते हुए जाने लगी लेकिन तभी उसे एकाएक सरला की बात याद आ गई और वह रुक कर बोली)
तुझे कद्दू की सब्जी कब से पसंद आने लगी ..
क्यों क्या हुआ ....?(शुभम अपने पेंट की बटन बंद करता हुआ बोला)
सरला चाची कह रही थी कि तुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और आज तुझे खाने पर बुलाई है।
क्या बात कर रही हो मम्मी सच्ची ...(शुभम चाहते हुए बोला)
बड़ा खुश हो रहा है कुछ और इरादा है क्या... जहां तक मैं जानती हूं कि तुझे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं है तो यह एकाएक तेरी फेवरेट सब्जी कैसे बन गई।
मम्मी इसमें बहुत बड़ा राज है।
राज ......कैसा राज .....
मम्मी तुम ही बता रही थी ना कि पड़ोस वाली सरला चाची को हम दोनों पर थोड़ा थोड़ा शक होने लगा है.... (निर्मला अपने बेटे की बात को बड़े ध्यान से सुन रही थी.. और वह अपने बेटे की बात सुनकर जवाब में हां में सिर हिला दी।)
तो मैं उनके इसी शक को दूर करने के लिए उनके छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा हूं।ऐसे ही उस दिन में बाजार से लौट रहा था तो सरला चाची को दो थैला उठाकर जाते हुए देखा तो उनकी मदद करने के बहाने में उनसे दोनों थे ना अपने हाथ में लेकर उनकी मदद करने लगा और बाती बाद में मुझे पता चला कि उन्होंने कद्दू भी खरीद रखी है और मेरे मुंह से निकल गया कि मुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और मैं अपने संस्कार का ऐसा असरदिखाया कि वह मेरे से पूरी तरह से इंप्रेस हो गई मैं आए दिन उनका छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा और वह उस दिन मुझे प्रॉमिस की थी कि जब भी वह कद्दू की सब्जी बनाएगी तो वह मुझे जरूर बनाएंगी....(निर्मला अभी भी अपनी बेटी की बात को गौर से सुन रही थी. और शुभम तो यही चाहता था कि शरदा चाची का ध्यान उन दोनों पर से हट जाए ताकि उन दोनों को किसी बात का डर ना रहे और उसके मन में सरला चाची और उनकी बहू दोनों को भौं डने का ख्याल मन में चल रहा था...और इस बात की भनक हो अपनी मां को नहीं होने देना चाहता था इसलिए अपनी बात को गोल-गोल घुमा कर समझा रहा था क्योंकि अच्छी तरह से जानता था किसी दल को लेकर उसके साथ कैसा बखेड़ा खड़ा हुआ था इसलिए वह नहीं चाहता था कि इन दोनों को लेकर भी उसकी मां का दिल टूटे और जो खिचड़ी उसने सरला चाची और उसकी बहू को लेकर पकाने की सोच रखा है वह कच्ची ही रह जाए।) और जिस तरह से हमें उनकी इज्जत करता हुआ उनके छोटे-मोटे में काम में मदद कर रहा हूं उसका ही नतीजा है कि आज वह मुझे खाने पर बुला रही है।
देखा मम्मी मैं अपनी बातों के जादू में उनको ऐसा फंसा लूंगा कि वह हम दोनों के ऊपर कभी शक भी नहीं कर पाएंगी की मैं उस तरह का लड़का हूं।
अपने बेटे की यह बात सुनकर निर्मला खुश हो गई क्योंकि वह किसी भी तरह से सरला चाची से पीछा छुड़ाना चाहती थी इसलिए अपने बेटे के गाल पर हल्के से हाथ रखते हुए बोली।
तो बहुत समझदार हो गया है बेटा और अब जल्दी से जा कर तैयार हो जा समय पर चले जाना... इतना कहकर निर्मला बाथरूम की तरफ चली गई हो शुभम उसे जाता हुआ देखता रहा और अपने अगले प्लान के बारे में सोचने लगा....
थोड़ी ही देर में डोर बेल की आवाज सुनते ही निर्मला जल्दी-जल्दी दरवाजा खोलने के लिए गई क्योंकि वह जानती थी कि शुभम वापस आ गया है।
दरवाजा खुलते ही शुभम मुस्कुराते हुए घर के अंदर आया और उसे मुस्कुराता हुआ देखकर जवाब में निर्मला भी मुस्कुरा दी और वह दरवाजा बंद कर दी।
क्या बात है आज बहुत खुश नजर आ रहा है। (निर्मला दरवाजा बंद करके अपने बेटे... की तरफ आगे बढ़ते हुए बोली...)
मैं तो हमेशा खुश रहता हूं मम्मी...
मैं इस खुशी की वजह जान सकती हूं (निर्मला अपने दोनों हाथ को बांधते हुए बोली।)
तुम ......हां तुम मेरी खुशी की वजह हो ..(शुभम आगे बढ़कर अपनी मां के गले में बाहें डालता हुआ बोला)
मैं .....लेकिन मैं कैसे...?
अरे मम्मी इतना भी नहीं जानती मेरी खुशी की वजह तुम हो क्योंकि तुम मुझे कितना खुश रखती हो मेरा इतना ख्याल रखती हो और तो और दूसरे तरीके से भी मेरा कितना ख्याल रखती हो......(शुभम अपनी मां की आंखों में आंखें डालता हुआ बोला)
दूसरे तरीके से मतलब मैं कुछ समझी नहीं....( निर्मला अनजान बनते हुए बोली)
अच्छा अब इतना भी अनजान मत बनो कि मेरे कहने का मतलब ना समझ रही हो मैं सब जानता हूं कि तुम अच्छी तरह से जानती हो कि मैं क्या कहना चाहता हूं।
नहीं मैं बिल्कुल नहीं समझी तू मुझे ठीक से समझ आएगा तब ना मैं समझूंगी कि तू क्या कहना चाहता है ।(नीम्रला जानबूझकर चुटकी लेते हुए बोली)
बताऊ किस तरह से....(शुभम बड़ी गहराई से अपनी मां की आंखों में जागता हुआ बोला निर्मला को अपने बेटे की आंख में कुमारी की चमक साफ नजर आ रही थी वह अच्छी तरह से समझ रही थी कि वह क्या करना चाह रहा है लेकिन निर्मला को भी अच्छा लग रहा था इसलिए वह भी शरारती अंदाज में बोली.)
बताना ....मैं तो जानना चाहती हूं कि दूसरे तरीके से मैं कैसे तुझे खुश रखती हूं।
रुको अभी बताता हूं....(बातों ही बातों में शुभम काफी उत्तेजित हो चुका था इस तरह से अपनी मां के गले में बाहें डाल कर खड़े रहने की वजह से और एकदम करीब रहने की वजह से निर्मला के बदन से आ रही माता खुशबू उसके बदन में उत्तेजना की लहर बढ़ा रहे थे और ब्लाउज में कैद निर्मला की दोनों बड़ी-बड़ी चूचियां उसके सीने से स्पर्श हो रही थी जिसकी वजह से उसके बदन में गर्माहट बढ़ती जा रही थी.... शुभम अपने होठों को अपनी मां के तपते हुए होठों के करीब ले जाने लगा घर में इस समय दोनों के सिवा तीसरा कोई भी नहीं था इसलिए दोनों जब चाहे तब एक दूसरे से छेड़खानी कर लेते थे और इस पल का भरपूर फायदा उठाते थे शुभम के होठ निर्मला के मदमस्त होठ के करीब होते जा रहे थे....एक बार फिर से निर्मला के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी तन बदन में उत्तेजना की चिंगारी भड़कने लगी थी। जैसे-जैसे शुभम के प्यासे होठ निर्मला के तपते हुए होठों के करीब आ रहे थे वैसे वैसे निर्मला उत्तेजना के मारे सूखे हुए पत्ते की तरह फड़फड़ा रही थी शुभम दोनों हाथों में अपनी मां के चेहरे को इस तरह से ले लिया था मानो गुलाब के फूल को अपनी हथेली में संभाल कर भर लिया हो।
दोनों के चेहरे इतने करीब हो गए थे कि दोनों की नसों में से निकल रही गर्म सांसों की हवा चेहरे पर पड़ते ही वाष्प की तरह घुल जा रही थी।
दोनों बैठक घर में खड़े थे । जबसे निर्मला को इस बात का आभास हुआ है कि उनकी पड़ोस की सरला चाची उन दोनों पर नजर रख रही है तब से वह घर की खिड़कियों के पर्दे हमेशा लगाकर रखते थे ताकि कुछ भी नजर ना आए इसलिए वह निश्चिंत थी। दोनों एक दूसरे की बाहों में थे शुभम धीरे-धीरे अपने होंठ को अपनी मां के होठों के एकदम करीब ले आया वह अपनी मां की खूबसूरत चेहरे को अपने दोनों हथेली से संभाले हुए था और देखते ही देखते शुभम ने अपने होंठ को अपनी मां की गुलाबी होंठ पर रखकर उन्हें पागलों की तरह चूसना शुरू कर दिया अपने बेटे की इस हरकत की वजह से निर्मला काफी उत्तेजित हो गई थी और वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए अपने होठों को खोल दी और उसके होठों को मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दी दोनों जितना हो सकता था एक दूसरे के होठों से चासनी चुस लेना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे को किसी इंग्लिश मूवी के हीरो हीरोइन की तरह चुंबन कर रहे थे पल भर में ही दोनों एकदम मदहोश हो गए अपनी मां के मदमस्त होंठों को चूसने से शुभम को ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वह अपनी मां के होठों को नहीं बल्कि किसी बेहतरीन इंग्लिश दारू की बोतल को मुंह से लगाया हो उसके बदन में नशा की खुमारी छाने लगी आंखों में मदहोशी का आलम इस कदर छाने लगा कि अपने आप ही उसकी आंखें बंद होने लगी और यही हाल निर्मला का भी हो रहा था उसकी भी आंखे मस्ती में बंद होने लगी वह अपनी बाजुओं में अपने बेटे को भरकर चुंबन का मजा ले रही थी और शुभम अपने दोनों हाथों को नीचे की तरफ ले जाकर अपनी मां की कमर के नीचे के उपहार को अपनी हथेली में भर कर दबाना शुरू कर दिया और लगातार अपनी मां के होठों को चूसता चला जा रहा था।
निर्मला चुदवासी होने लगी थी.. उसकी बुर चुदासपन से भरी जा रही थी जिसकी वजह से उसमें से लगातार नमकीन मधुर रस बहने लगा था और उसकी पेंटी उसके मधुर रस से गीली होने लगी थी।
शुभम का लंड पेंट के अंदर गदर मचाया हुआ था जो कि अब खड़क होने के बाद निर्मला की टांगों के बीच साड़ी के ऊपर से ही शिरकत कर रहा था लेकिन उसका कठोरपन इतना ज्यादा मजबूत था कि निर्मला को अपनी कचोरी जैसी फूली हुई बुर पर उसकी दस्तक बराबर महसूस हो रही थी।
दोनों दुनिया को भूल कर एक दूसरे के होठों की चुसाई करने में लगे थे। शुभम का मोटा तगड़ा लंड एक बार फिर से अपनी औकात में आ गया था जोकि पजामे के बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रहा था। शुभम अपनी मां के होठों को ऐसे चूस रहा था जैसे कि उस पर रसमलाई लगी हो वह लगातार अपनी मां के लाल लाल होंठों को चूसता चला जा रहा था। उत्तेजना के मारे निर्मला का खूबसूरत चेहरा सुर्ख हो चुका था उत्तेजना के मारे गला सूख रहा था।निर्मला को अपने बेटे की यही अदा तो बहुत अच्छी लगती है कि कभी भी वह मूड बना देता है और ऐसा अभी भी हो रहा था निर्मला की चुदवासी बुर किसी गुब्बारे के भांति फूल पिचक रही थी। पूरे घर में केवल दोनों के मुख से चुम्मा चाटी और गर्म सिसकारी की आवाज ही आ रही थी।
पल भर में माहौल पूरी तरह से बदल गया था दोनों पर मदहोशी का आलम अपना असर दिखा रहा था।
शुभम का लंड पूरी तरह से तैयार था निर्मला की रसीली बुर के अंदर जाने के लिए बस उसे रास्ता दिखाने की जरूरत थी। जो कि अभी तक साड़ी के ऊपर से ही दोनों टांगों के बीच खुली हुई बुर पर ठोकर मार रहा था। और इस ठोकर को खाकर निर्मला की बुर पेंटी के अंदर होने के बावजूद भी हल्की सी खुल गई थी जो कि उसकी तरफ से लंड को पूरी तरह से स्वीकृति थी कि वह अंदर आ सकता है। और बुर की आत्मसमर्पण को देखकर लंड का हौसला बढ़ने लगा था वह और जोर-जोर से बुर के ऊपर दस्तक दे रहा था ऐसा लग रहा था मानो कि वह निर्मला की बुर पर अपने नाम का सिक्का लगा रहा हो।
निर्मला भी अपने बेटे की मोटी तगड़ी लंड की ठोकर को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी वह उसे अपनी बुर की गहराई में लेने के लिए मचल रही थी। अपने बेटे के इस तरह के लाजवाब चुंबन का नशा उसके ऊपर पूरी तरह से छा चुका था आंखों में मदहोशी का आलम अपने अंदर समाने को बेकरार कर दिया था।
शुभम होंठों की चुसाई जारी रखते हुए अपना हाथ निर्मला के बदन पर चारों तरफ घुमा रहा था अब उससे बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हुआ जा रहा था वह अपने हाथ नीचे की तरफ ले जाकर अपने दोनों हाथों में साड़ी पकड़ कर ऊपर की तरफ उठाने लगा लेकिन जानबूझकर निर्मला उसे रोकने की कोशिश करते हुए उसके हाथ को पकड़ लिया और अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने लगी लेकिन अत्यधिक उत्तेजना का असर शुभम पर साफ नजर आ रहा था वह जबरदस्ती अपनी मां की साड़ी को ऊपर की तरफ उठा रहा था। निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को ऊपर उठा दे रहा था। इस तरह से दोनों तरफ से जोर-जबर्दस्ती हो रही थी और इस जोर-जबर्दस्ती में निर्मला को मजा आ रहा था। वह जानबूझकर शुभम को रोक रही थी ताकि वह देख सके कि सुभम उसके साथ क्या कर सकता है....हालांकि छेड़खानी में जोर जबरदस्ती में निर्मला को अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी.
होठ चुसाई का लगातार आनंद लेते हुए निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को पीछे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को पर उठा दे रहा था। शुभम पूरी तरह से न चुदवासा हो चुका था अपनी मां का इस तरह से रोकना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। वह उतावला हो चुका था अपनी मां की बुर में लंड डालने के लिए ... अपनी मां की हरकत देखकर उसे और कोई रास्ता नजर ना आता देखकर वह दोनों हाथों को अपनी मां की नितंबों के उभार के निचले हिस्से पर रखकर उसे उठा लिया कर जल्दी-जल्दी उसे चार पांच कदम चल कर दीवार से सटा दिया.... निर्मला तो अपने बेटे की भुजाओं की ताकत देखकर हैरान रह गई.. वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि उसका बेटा उसे इस तरह से उठा लेगा जैसे कि कपड़े का गट्ठर हो वह भली भांति जानती थी कि उसका वजन कुछ ज्यादा ही था लेकिन उसके बेटे ने अपनी ताकत दिखाते हुए उसे बड़े आराम से अपनी गोद में उठाकर उसे दीवार से सटा दिया था इस बात का एहसास उसे अंदर तक उत्तेजित कर गया था उसकी बुर से लगातार नमकीन पानी बह रहा था... दीवार से लगाते ही शुभम अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया और एक हाथ से उसकी पेंटी को नीचे की तरफ सरका ते हुए घुटनों तक ला दिया.... रास्ता एकदम साफ था दो टांगों के बीच उसे अपनी मंजिल नजर आ रही थी। वह बिना वक्त गवाएं एक हाथ से अपने पेंट की बटन खोलने लगा दो कि अभी भी निर्मला जानबूझकर अपनी साड़ी को नीचे करने की नाकाम कोशिश कर रही थी। और देखते ही देखते शुभम अपने हाथ में अपने खड़े लंड को पकड़ कर ही नाता हुआ उसे अपनी मां की दोनों टांगों के बीच लगा दिया जो कि इस समय निर्मला के बुर किसी भट्टी की तरह तप रही थी।
निर्मला निर्मला उसे बिना बोले उसे रोकने की कोशिश करती रही और शुभम अपनी मनमानी करते हुए अपने लंड को अपनी मां की बुर के अंदर धीरे-धीरे करके पूरा डाल दिया....
निर्मला अपने बेटे की हरकत की वजह से आनंद से सराबोर हो गई उसे अपने बेटे की जबरदस्ती बहुत अच्छी लग रही थी शुभम का लंड पूरा बुर में समाया हुआ था। जिसे शुभम धीरे धीरे अंदर बाहर करता हुआ चोदना शुरू कर दिया था।
आखिर कब तक निर्मला दिखावे का नाटक करके अपने मजे को किरकिरा कर दी वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए उसके कंधे पर हाथ रखकर और अपनी नजर को नीचे की तरफ करके अपने बेटे के खातिर लंड को अपनी बुर की गहराई में अंदर बाहर होता हुआ देखकर चुदाई का मजा लेने लगी। अब दोनों के बीच किसी भी प्रकार का संवाद नहीं हो रहा था क्योंकि अब दोनों के बीच वार्तालाप केवल उनके लंड और बुर कर रहे थे जिसमें से ठाप ठाप की आवाज लगातार गूंज रही थी। शुभम को बहुत मजा आ रहा था वह ब्लाउज के ऊपर से यह अपनी मां की बड़ी-बड़ी चुचियों को दबाता हुआ अपनी कमर को आगे पीछे करके चोद रहा था। निर्मला काफी उत्तेजित हो चुकी थी उसे आज एक नया अनुभव मिला था क्योंकि दोनों के बीच ड्राइंग रूम में ही एक अद्भुत संभोग का दृश्य रचा जा रहा था । जो कि दोनों को उम्मीद भी नहीं थी कि इस तरह से दोनों चुदाई का आनंद लूटेंगे। शुभम लगातार किसी मशीन की तरह अपनी कमर को हीला रहा था।
निर्मला अपने बेटे की आंखों में झांकते हुए उसके दमदार लंड की ठोकर को अपनी बुर की गहराई में महसूस कर रही थी उसकी आंखों में साफ नजर आ रहा था कि वह अपने बेटे से कहना चाह रही थी कि और जोर जोर से धक्के लगाए और जैसे शुभम एक अनुभवी मर्द की तरह अपनी मां की आंखों में उसके दिल के जज्बात को पढ़कर जोर जोर से अपनी कमर को हिलाने लगा। पूरे कमरे में निर्मला की सिसकारी की आवाज गुंजने लगी....
शुभम अपनी मां की कमर थामे हुए जोर जोर से धक्के लगा रहा था उसका हर एक प्रहार निर्मला के मुख से आह निकाल दे रही थी लेकिन इस आह में भी सुकून और आनंद छिपा हुआ था। शुभम कुछ देर तक ऐसे ही अपनी मां की चुदाई करता रहा उसकी रफ्तार एक पल के लिए भी कम नहीं हो रही थी वह एक हाथ से चूची दबा रहा था और दूसरे हाथ से कमर पकड़कर उसे मसल रहा था जिससे निर्मला को और ज्यादा मजा आ रहा था।
निर्मला पूरी तरह से भाव विभोर होकर अपने बेटे से चुदने का आनंद लूट रही थी। हालात पूरी तरह से कैसे बदल गए उसे खुद समझ में नहीं आया क्योंकि कुछ देर पहले अपने बेटे से सरला चाची के दिए गए आमंत्रण के बारे में पूछताछ करना चाहती थी लेकिन शुभम के घर में आते ही जिस तरह से एकाएक दोनों के बीच चुंबन की बौछार होने लगी और वह बौछार अब घमासान चुदाई में बदल चुकी थी और निर्मला अपनी बात भूल चुकी थी और जुदाई का आनंद ले रही थी।
निर्मला अपने बेटे की हर तबके के साथ अपनी कमर को पीछे की तरफ कर दे रही थी क्योंकि शुभम कुछ ज्यादा ही जोर लगाकर धक्के मार रहा था और यह बात शुभम को अच्छी तरह से पता चल रही थी लेकिन उसे बहुत मजा आ रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वह अपना लंड पूरी तरह से बाहर निकाल दिया जो कि अभी भी पानी निकला नहीं था जिसका मतलब साफ था कि शुभम का मन भरा नहीं था और ना ही निर्मला का मन कर रहा था कि अपने बेटे के लंड को अपनी बुर से बाहर निकाल ले लेकिन शुभम के मन में कुछ और चल रहा था वह अपनी मां की बुर से लंड बाहर निकाल कर उसके कंधों को पकड़कर घुमाने की कोशिश करने लगा और अपने बेटे का इशारा समझ कर निर्मला अपनी साड़ी को दोनों हाथों से कमर तक उठाए खड़ी होकर अपनी टांगों का सहारा लेकर घुटनों में फंसी पेंटी को पैरों से बाहर निकालने लगी और अगले ही पल उसकी गीली पैंटी फर्श पर पड़ी थी और वह दीवार की तरफ मुंह करके अपनी साड़ी को दोनों हाथों से उठा है अपनी मदमस्त गांड को किसी दुश्मन की तरफ लगाए जाने वाली तोप की तरह ऊपर की तरफ उठा दी.... शुभम को और क्या चाहिए था बिना बोले ही उसकी मां उसका इशारा समझ गई थी ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी भूखे के सामने स्वादिष्ट व्यंजन से भरी थाली रख दी गई हो वह अपनी भूख मिटाने के लिए उस थाली पर टूट पड़ा और शुभम अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड को पकड़कर एक बार फिर से उसके अंदर समा गया और जोर जोर से धक्के लगाते हुए उसे चोदना शुरु कर दिया पूरे कमरे में गर्म सिसकारी की आवाज किसी मधुर ध्वनि की तरह बज रही थी। तकरीबन 35 मिनट की घमासान चुदाई के बाद दोनों की सिसकारी की आवाज तेज हो गई और दोनों एक साथ झड़ गए।...
निर्मला की सांस इतनी तेज चल रही थी कि मानो जैसे अभी रुक जाएगी... शुभम का भी यही हाल था घर में आने से पहले उसे उम्मीद नहीं थी कि इस वक्त उसे जबरदस्त चुदाई का सुख भोगने को मिलेगा... जिससे अनायास ही मिले इस सुख से वह पूरी तरह से तृप्त हो चुका था....
निर्मला अपने कपड़े व्यवस्थित करके फर्श पर से अपनी पूरी तरह से गिरी हुई पेंटी को उठाकर जाने लगी तो शुभम बोला...
पहनोगी नहीं क्या.....?
(इतना सुनकर वहां रुक गई और अपने बेटे की तरफ मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए उसके करीब आई और अपने दोनों हाथ में पेंटी को फैलाते हुए उसकी आंखों के सामने दिखाते हुए बोली।)
पहनने लायक तूने छोड़ा है क्या...
(शुभम साफ-साफ देख पा रहा था कि उसकी मां की पैंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी जो कि पहनने लायक बिल्कुल भी नहीं थी वह मुस्कुराता हुआ बोला...)
अब इसमें मेरी क्या गलती है तुम पानी इतना छोड़ती हो....
तुझसे तो भगवान बचाए....( इतना कहकर वो मुस्कुराते हुए जाने लगी लेकिन तभी उसे एकाएक सरला की बात याद आ गई और वह रुक कर बोली)
तुझे कद्दू की सब्जी कब से पसंद आने लगी ..
क्यों क्या हुआ ....?(शुभम अपने पेंट की बटन बंद करता हुआ बोला)
सरला चाची कह रही थी कि तुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और आज तुझे खाने पर बुलाई है।
क्या बात कर रही हो मम्मी सच्ची ...(शुभम चाहते हुए बोला)
बड़ा खुश हो रहा है कुछ और इरादा है क्या... जहां तक मैं जानती हूं कि तुझे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं है तो यह एकाएक तेरी फेवरेट सब्जी कैसे बन गई।
मम्मी इसमें बहुत बड़ा राज है।
राज ......कैसा राज .....
मम्मी तुम ही बता रही थी ना कि पड़ोस वाली सरला चाची को हम दोनों पर थोड़ा थोड़ा शक होने लगा है.... (निर्मला अपने बेटे की बात को बड़े ध्यान से सुन रही थी.. और वह अपने बेटे की बात सुनकर जवाब में हां में सिर हिला दी।)
तो मैं उनके इसी शक को दूर करने के लिए उनके छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा हूं।ऐसे ही उस दिन में बाजार से लौट रहा था तो सरला चाची को दो थैला उठाकर जाते हुए देखा तो उनकी मदद करने के बहाने में उनसे दोनों थे ना अपने हाथ में लेकर उनकी मदद करने लगा और बाती बाद में मुझे पता चला कि उन्होंने कद्दू भी खरीद रखी है और मेरे मुंह से निकल गया कि मुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और मैं अपने संस्कार का ऐसा असरदिखाया कि वह मेरे से पूरी तरह से इंप्रेस हो गई मैं आए दिन उनका छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा और वह उस दिन मुझे प्रॉमिस की थी कि जब भी वह कद्दू की सब्जी बनाएगी तो वह मुझे जरूर बनाएंगी....(निर्मला अभी भी अपनी बेटी की बात को गौर से सुन रही थी. और शुभम तो यही चाहता था कि शरदा चाची का ध्यान उन दोनों पर से हट जाए ताकि उन दोनों को किसी बात का डर ना रहे और उसके मन में सरला चाची और उनकी बहू दोनों को भौं डने का ख्याल मन में चल रहा था...और इस बात की भनक हो अपनी मां को नहीं होने देना चाहता था इसलिए अपनी बात को गोल-गोल घुमा कर समझा रहा था क्योंकि अच्छी तरह से जानता था किसी दल को लेकर उसके साथ कैसा बखेड़ा खड़ा हुआ था इसलिए वह नहीं चाहता था कि इन दोनों को लेकर भी उसकी मां का दिल टूटे और जो खिचड़ी उसने सरला चाची और उसकी बहू को लेकर पकाने की सोच रखा है वह कच्ची ही रह जाए।) और जिस तरह से हमें उनकी इज्जत करता हुआ उनके छोटे-मोटे में काम में मदद कर रहा हूं उसका ही नतीजा है कि आज वह मुझे खाने पर बुला रही है।
देखा मम्मी मैं अपनी बातों के जादू में उनको ऐसा फंसा लूंगा कि वह हम दोनों के ऊपर कभी शक भी नहीं कर पाएंगी की मैं उस तरह का लड़का हूं।
अपने बेटे की यह बात सुनकर निर्मला खुश हो गई क्योंकि वह किसी भी तरह से सरला चाची से पीछा छुड़ाना चाहती थी इसलिए अपने बेटे के गाल पर हल्के से हाथ रखते हुए बोली।
तो बहुत समझदार हो गया है बेटा और अब जल्दी से जा कर तैयार हो जा समय पर चले जाना... इतना कहकर निर्मला बाथरूम की तरफ चली गई हो शुभम उसे जाता हुआ देखता रहा और अपने अगले प्लान के बारे में सोचने लगा....










