शुभम बहुत खुश था जाने अनजाने में उसने सास बहू दोनों को अपनी मर्दाना ताकत का परिचय करा दिया था.... और दोनों सास बहू की मुस्कुराहट से साफ जाहिर हो रहा था कि उसके मजबूत तगड़े लंड का एहसास उन दोनों को अंदर तक महसूस हो गया था। वह अपनी मस्ती में अपनी नई बाइक को चलाने का आनंद लेते हुए अपने घर पहुंच गया था और रुचि बाथरूम में दिखे अद्भुत नजारे की आगोश में अपने आप को खोता हुआ महसूस कर रही थी। उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि जो कुछ भी उसकी आंखों ने बाथरूम में देखा है वह सत्य है वह मन में यही सोचते हुए करवट बदल रही थी कि क्या किसी का लंड कितना मोटा तगड़ा और लंबा हो सकता है... अगर यह सच है कि उसकी आंखों में जो देखा हुआ बिल्कुल वास्तविक है शुभम का लैंड वाटर मोटा तगड़ा और मजबूत है तो उसके लंड के आगे तो उसके पति का लंड ना के बराबर है.. रुचि शुभम कै लंड के बारे में सोचते हुए रात को अपने बिस्तर पर करवट बदल रही थी। ना जाने क्यों आज उसके मन पर उसके खुद का नियंत्रण नहीं था वह बहकने लगी थी...बिस्तर पर करवट लेते हुए उसकी साड़ी अस्त-व्यस्त हो गई थी जिसकी वजह से घुटने को मोड़ने पर उसकी साड़ी सरक कर नीचे जांघो तक आ गई थी और उसकी मोटी तगड़ी चिकनी केले के सामान चमकती हुई जांघें नजर आने लगी थी.... ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में उसका खूबसूरत गोरा बदन और भी ज्यादा चमक रहा था... शुभम को याद करते हुए उसके तन बदन में शोला सा भड़क रहा था... अपनी भावनाओं पर उसे अब बिल्कुल भी भरोसा नहीं था शुभम को याद करते हुए हो वासना की रंगीन दुनिया में खोती चली जा रही थी... साड़ी कमर तक आने की वजह से उसकी नंगी टांगें उजागर हो गई थी शुभम को याद करते हुए उसके हाथ खुद-ब-खुद टांगों के बीच पहुंच गए जहां पर वह अपनी ब्लू रंग की पैंटी के ऊपर से ही अपनी रसीली बुर को दबाना शुरू कर दी थी.... वैसे तो अक्सर रात की तन्हाई में पति संसर्ग की कामना मैं जब हरलीन हो पर इस तरह की हरकत करती थी तो उसके जेहन में केवल उसका पति ही रहता था लेकिन आज उसके जेहन में पति की कल्पना तो कोसों दूर थी आज उसकी कल्पना में उसकी जिंदगी का नया हीरो आ गया था और वह था शुभम जिसकी टांगों के बीच झूलता हुआ उसका फौलादी औजार देखकर वह उसकी कल्पना के आधीन हो गई थी उसके बारे में ही सोचने लगी थी इस समय भी वह बिस्तर पर शुभम के बारे में खास करके उसके मोटे तगड़े लंड के बारे में सोच कर अपनी पैंटी के ऊपर से ही अपनी लगभग लगभग कोरी बुर को दबा रही थी वैसे भी रूचि की बुर को कोरी कहना ही उचित रहेगा क्योंकि उसके पति का कोई खास लंबाई और मोटाई लिए हुए नहीं था क्योंकि रुचि को अपनी बुर में अपने पति के लंड का एहसास अपनी तो उंगली डालने पर भी हो जाता था जबकि उसे एक मोटे तगड़े दमदार लंड की जरूरत थी जो कि उसकी बुर का पूरा सांचा ही बदल दे और वैसा लंड केवल शुभम के पास था इसलिए रुचि की बुर को कोरी बुर कहना उचित था....
बंद कमरे के अंदर रुचि अपने बिस्तर पर ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में अपने अर्धनग्न बदन से खेलते हुए शुभम की कल्पना कर रही थी वह अपनी ब्लू रंग की पैंटी के ऊपर से ही अपनी रसीली बुर को दबा दबा कर उसे छेड़ रही थी... या यूं कह लो कि वह चिंगारी पर पेट्रोल छिड़कने का काम कर रही थी और उसकी यह हरकत वाकई में चिंगारी से शोला का रूप ले ली...धीरे-धीरे करके रोजी अपनी ब्लू रंग की पेंटी में अपनी नाजुक उंगलियों को सरकार ने लगी और तब तक सरकार ने लगी जब तक कि उसकी रसीली डेढ़ इंच की फूली हुई बुर उसकी हथेली के बीचोबीच ना आ गई .. और जैसे ही रुचि की बुर उसकी हथेलियों के बीच आई वह किसी शिकारी पक्षी की तरह नाजुक फुदकती हुई तितली पर अपने पंजे की पकड़ मजबूत कर ली और ऐसा करने के साथ ही उसके मुख से गर्म सिसकारी भरी आह छूट गई.... वह शुभम को याद करते हुए जोर जोर से अपनी गुलाबी पत्तियों को उंगलियों के बीच फंसा कर रगड़ना शुरू कर दी ऐसा करने से उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी पल भर में ही उसका गोरा मुखड़ा लाल टमाटर की तरह हो गया...उसके पूरे बन जाने में रक्त का प्रवाह बड़ी तेजी से हो रहा था और खास करके उसकी जांघों के इर्द-गिर्द रक्त का प्रभाव कुछ ज्यादा ही था उसकी रसीली बुर कचोरी की तरह फूल गई पूर्वा जोर-जोर से अपनी बुर को मसलना शुरू कर दी मानो की वह उसकी मालिश कर रही हो... रुचि की बचर से ढेर सारा रिसाव हो रहा था जिससे उसकी पूरी हथेली नमकीन रस में डूबने लगी.... रुचि आंखों को बंद किया इस अद्भुत पल का मजा ले रही थी लेकिन बिस्तर पर उसे एक कमी महसूस हो रही थी और वह थी किसी मर्द की जो कि उसकी कल्पना में केवल इस समय सुभम ही घूम रहा था... वह मन ही मन में इस कल्पना कर रही थी कि जो क्रिया को अपने हाथ से कर रहे हैं काश अगर शुभम उसके बिस्तर पर होता तो वह अपनी मजबूत हथेलियों में उसकी कोमल काया को लेकर रगड़ा डालता उसका सारा रस निचोड़ डालता।
उससे रहा नहीं जा रहा था उसकी आंखों के सामने बार-बार वही दृश्य नजर आ रहा था जब शुभम अपने हाथों में अपने लंड को लेकर उसे हिलाते हुए पेशाब कर रहा था जबकि यह जानते हुए भी कि दरवाजे पर रुचि खड़ी है वह रुका नहीं और जानबूझकर रुचि को अपने लंड के दर्शन कराते हुए पेशाब करता रहा...इस बात का एहसास होते हैं कि सुबह में यह सबकुछ जानबूझकर कर रहा था तो रुचि की उत्तेजना और अत्यधिक बढ़ने लगी और वह अपनी हथेली को अपनी पेंटिं में से निकाल कर दोनों हाथों की नरम नरम उंगलियों का सहारा देकर अपनी मदमस्त गोरी गोरी खरबूजे जैसी गोल गांव को हल्के से ऊपर उठाकर अपनी पेंटी को उतारने लगी... और अगले ही पल उसकी पैंटी बिस्तर के नीचे फर्श पर गिरी पड़ी थी... व कमर के नीचे से संपूर्ण रूप से नंगी हो चुकी थी... क्योंकि वह अच्छी तरह से जानती थी कि पेंटी पहने पहने वह अपनी कल्पना को तादृशय नहीं कर सकती थी....
कमर के नीचे से नंगी होते ही जैसे उसकी वासना और ज्यादा भड़कने लगी वह अपने सिर पर डबल तकिया लगाकर अपनी बुर की तरफ देखते हुए उसके साथ अपनी नाजुक नाजुक उंगलियों से खेलने लगी.... आज उसे यह सब करने में कोई चाहता ही आनंद की अनुमति हो रही थी लेकिन ऐसा करने से उसकी प्यास पल-पल बढ़ती जा रही थी ...शादी के बादआज पहली बार वह किसी गैर मर्द की कल्पना करते हुए अपने नाजुक अंगों से खेल रही थी... हालांकि शुभम से मुलाकात के बाद सेवा रातों को थोड़ी थोड़ी बैठने लगी थी लेकिन आज वो खुलकर अपने मायके में अपनी रसीली बुर से खेलते हुए मजे लूट रही थी...
उससे रहा नहीं जा रहा था उसके मुख से लगातार शुभम को याद करते हुए गरम सिसकारी निकल रही थी बार-बार उसकी आंखों के सामने शुभम का मोटा खड़ा लंड झूलता हुआ नजर आ रहा था... वह अपने कचोरी जैसी फूली हुई पुर के साथ खेलते हुए ऐसी कल्पना कर रही थी कि जैसे वह नहीं शुभम उसकी अंगो से खेल रहा हो... उसकी उंगलियां मदन रस में पूरी तरह से गीली हो चुकी थी... गोरे गोरे गाल लाल टमाटर की तरह हो गए थे.... रुचि की कल्पना इतनी मजबूत थी कि उसे अब अपनी उंगली शुभम का लंड लगने लगी थी वह अपनी उंगलियों के पार से अपनी बुर की गुलाबी पत्तियों को छेड़ रही थी और ऐसा महसूस कर रही थी कि जैसे शुभम अपने हाथ में अपना मोटा तगड़ा लंड ले कर उसकी गुलाबी पत्तियों पर उसके सुपाड़े को रगड़ रहा हो... वह इस तरह की कल्पना करते हुए एकदम मदहोश लगी..धीरे-धीरे वह अपनी एक उंगली को अपनी बुर की गुलाब की पत्तियों के बीचो बीच रखकर उसे दबाना शुरू कर दी और साथ ही मदहोशी भरी आवाजें निकालने लगी जो कि पूरे कमरे को मादकता से भर दे रहा था।.... बहुत ही अद्भुत और काम उत्तेजना से भरपूर नजारा कमरे का बना हुआ था रुचि अर्धनग्न अवस्था में अस्तव्यस्त कपड़ों के साथ बिस्तर पर लेटी हुई थी ब्लाउज के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे जिससे उसके दोनों पहाड़ियों के बीच की खाईनुमा नहर नजर आ रही थी। और वह खुद काम देवी का रूप लेकर अपनी उंगली को धीरे-धीरे अपनी बुर के अंदर डाल रही थी और ऐसा महसूस करते हुए कल्पना कर रही थी कि जैसे शुभम उसकी कमर पकड़कर अपने मोटे तगड़े लगने को उसकी बुर की गहराई में उतारने की कोशिश कर रहा हो... वह लगातार गर्म सिसकारियां ले रही थी.. आखिरकार धीरे-धीरे करते हुए अपनी एक उंगली को पूरी तरह से अपनी बुर की गहराई में उतार दी... और अपनी एक उंगली से अपनी बुर की चुदाई करना शुरू कर दि... वह अपने नितंबों को बार-बार ऊपर की तरफ उछाल दे रही थी मानो कि जैसे कल्पना में ही शुभम का साथ देते हुए अपनी तरफ से भी एक दो धक्के लगा दे रही हो....शुभम की लंड की कल्पना करते हुए ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी बुर में अभी भी कोई कमी महसूस हो रही है इसलिए वह उस कमी को पूरा करने के लिए अपनी दूसरी उंगली पर अपनी बुर में डाल दी और ऐसा महसूस करने लगी कि जैसे शुभम उसकी दोनों टांगों को फैलाकर अपनी पोजीशन लेकर और शिद्दत से अपने लंड को उसकी बुर की गहराई में उतार रहा हो... कुछ ही सेकंड में रुचि की दोनों उंगलियां उसकी नाजुक कोमल गुलाबी बुर के अंदर घुसी हुई थी और वह मदहोशी के आलम में आंखों को बंद किए कल्पना की दुनिया में खोए हुए शुभम का नाम पुकारते हुए ... अपनी बुर के अंदर अपनी उंगली को जोर जोर से अंदर बाहर कर रही थी....
औहहहहहह शुभम आहहहहहहहह और जोर से शुभम और जोर से पूरी ताकत लगाकर मुझे छोड़ दो मेरी बुर को पानी पानी कर दो (ऐसा कहते हुए रुचि बेशर्म की तरह अपनी बुर के अंदर अपनी उंगली को पेल रही थी.... वह पूरी तरह से पसीने से तरबतर हो चुकी थी.... उसकी कल्पना में हकीकत का अंश नजर आ रहा था वह अपनी बुर में अपनी उंगली से ही क्रिया कर रही थी लेकिन उसकी कल्पना इतनी जबरदस्त थी कि उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे उसकी दोनों टांगों के बीच शुभम खुद आ गया हो और उसकी जगह से चुदाई कर रहा है ऐसी कल्पना करते हुए कुछ ही देर में उसकी बुर पानी पानी हो गई और वो झड़ गई... आज अपनी गलती पर उसे बिल्कुल भी पछतावा नहीं हो रहा था क्योंकि शुभम की कल्पना करने में जो सुकून उसे प्राप्त हुआ था ऐसा एहसास ऊसे कभी भी नहीं मिला था भले ही वह अपने पति से संभोग भी क्यों ना कर रही हो।
दूसरी तरफ घर में अकेले होते हुए भी ना जाने क्यों सरला को अच्छा लगने लगा ... खास करके तब से जब उसने अनजाने में ही बाइक के पीछे बैठे बैठे अपने आप को संभालने की कोशिश करते हुए पेंट में खड़े उसके लंड को पकड़ ली थी उस पल को महसूस करते ही ना जाने कि उसे घर में अकेले रहने की इच्छा होने लगी क्योंकि ऐसे में वह शुभम के साथ अच्छी तरह से बातें कर सकती थी इस उम्र के पड़ाव में भी उसके मन में अजीब अजीब से ख्याल आ रहे थे खास करके शुभम को लेकर वह अपनी आंखों से शुभम के मोटे तगड़े लंड का दीदार करना चाहती थी अपने एहसास को वास्तविकता में बदलना चाहती थी। इसलिए हर पल अब उसकी आंखें शुभम का ही इंतजार कर रही थी।
शुभम लगभग दोपहर के समय अपने घर पर पहुंच गया... निर्मला को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था किसी गैर औरत को इस तरह से अपनी बाइक पर बैठाकर उसके घर छोड़ना उसे ना जाने क्यों नागवार लग रहा था... उसे इस बात का डर भी था कि कहीं शुभम किसी दूसरी औरतों के चक्कर में ना पड़ जाए... इसलिए सुभम जैसे ही घर में आया वह बोली....
शुभम यह सब कुछ मुझे अच्छा नहीं लग रहा है जो तुम कर रहे हो (निर्मला बड़े ही शांत स्वर में कुर्सी पर बैठे-बैठे बोली।)
मैं क्या कर रहा हूं मम्मी... (की चैन लगी हुई बाइक की चाबी को वह उंगली से घुमाते हुए बोला)
यही औरतों को इधर ले जाना उधर ले जाना यहां छोड़ ना वहां छोड़ना....
मम्मी तुम यह सब जानती हो कि मैं यह किस लिए कर रहा हूं मैं इसलिए कर रहा हूं ताकि सरला चाची के दिमाग से हम दोनों के बीच के अनैतिक संबंध को लेकर उनका सब दूर हो सके इसलिए उनके सामने संस्कारी लड़का बना हुआ हुं।.....
(शुभम की बात सुनकर निर्मला कुछ सोचने लगी अच्छी तरह से जानती थी कि शुभम इसीलिए यह सब कर रहा है लेकिन उसके मन के कोने में पराई औरतों को लेकर एक डर सा बना हुआ था...वह बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि शुभम किसी भी दूसरी औरतों के चक्कर में पड़े...)
मैं अच्छी तरह से जानती हूं शुभम कि तू यही सब के लिए यह सब कर रहा है लेकिन मुझे डर लगता है कि कहीं तो दूसरी औरतों के चक्कर में ना पड़ जाए..
(शुभम अपनी मां की बात सुनकर अच्छी तरह से समझता था कि उसकी मां का यूं परेशान होना जायज था क्योंकि कोई भी औरत एक मर्द को दूसरी औरत से बात नहीं सकती... इसलिए वह अपनी मां को समझाते हुए बोला. ।)
किसी बात कर रही हो मम्मी भला तुमसे सुंदर इस दुनिया में कोई है जो मैं दूसरी औरत के पीछे पड़ जाऊं... नहीं कभी भी किसी औरत के बारे में सोचता भी नहीं हूं यह तो बस उन लोग का ध्यान हम लोगों से हटाने के लिए ही है सब कुछ कर रहा हूं बस तुम निश्चिंत होकर रहो मेरी तरफ से किसी भी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है....
(शुभम की बात सुनकर कुछ हद तक निर्मला निश्चिंत हो गई लेकिन बेफिक्र बिल्कुल भी नहीं हुई क्योंकि वह मर्दों की जात को अच्छी तरह से जानती है इसलिए उसके मन के कोने में दूसरी औरतों को लेकर डर बना हुआ था।)
बंद कमरे के अंदर रुचि अपने बिस्तर पर ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में अपने अर्धनग्न बदन से खेलते हुए शुभम की कल्पना कर रही थी वह अपनी ब्लू रंग की पैंटी के ऊपर से ही अपनी रसीली बुर को दबा दबा कर उसे छेड़ रही थी... या यूं कह लो कि वह चिंगारी पर पेट्रोल छिड़कने का काम कर रही थी और उसकी यह हरकत वाकई में चिंगारी से शोला का रूप ले ली...धीरे-धीरे करके रोजी अपनी ब्लू रंग की पेंटी में अपनी नाजुक उंगलियों को सरकार ने लगी और तब तक सरकार ने लगी जब तक कि उसकी रसीली डेढ़ इंच की फूली हुई बुर उसकी हथेली के बीचोबीच ना आ गई .. और जैसे ही रुचि की बुर उसकी हथेलियों के बीच आई वह किसी शिकारी पक्षी की तरह नाजुक फुदकती हुई तितली पर अपने पंजे की पकड़ मजबूत कर ली और ऐसा करने के साथ ही उसके मुख से गर्म सिसकारी भरी आह छूट गई.... वह शुभम को याद करते हुए जोर जोर से अपनी गुलाबी पत्तियों को उंगलियों के बीच फंसा कर रगड़ना शुरू कर दी ऐसा करने से उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी पल भर में ही उसका गोरा मुखड़ा लाल टमाटर की तरह हो गया...उसके पूरे बन जाने में रक्त का प्रवाह बड़ी तेजी से हो रहा था और खास करके उसकी जांघों के इर्द-गिर्द रक्त का प्रभाव कुछ ज्यादा ही था उसकी रसीली बुर कचोरी की तरह फूल गई पूर्वा जोर-जोर से अपनी बुर को मसलना शुरू कर दी मानो की वह उसकी मालिश कर रही हो... रुचि की बचर से ढेर सारा रिसाव हो रहा था जिससे उसकी पूरी हथेली नमकीन रस में डूबने लगी.... रुचि आंखों को बंद किया इस अद्भुत पल का मजा ले रही थी लेकिन बिस्तर पर उसे एक कमी महसूस हो रही थी और वह थी किसी मर्द की जो कि उसकी कल्पना में केवल इस समय सुभम ही घूम रहा था... वह मन ही मन में इस कल्पना कर रही थी कि जो क्रिया को अपने हाथ से कर रहे हैं काश अगर शुभम उसके बिस्तर पर होता तो वह अपनी मजबूत हथेलियों में उसकी कोमल काया को लेकर रगड़ा डालता उसका सारा रस निचोड़ डालता।
उससे रहा नहीं जा रहा था उसकी आंखों के सामने बार-बार वही दृश्य नजर आ रहा था जब शुभम अपने हाथों में अपने लंड को लेकर उसे हिलाते हुए पेशाब कर रहा था जबकि यह जानते हुए भी कि दरवाजे पर रुचि खड़ी है वह रुका नहीं और जानबूझकर रुचि को अपने लंड के दर्शन कराते हुए पेशाब करता रहा...इस बात का एहसास होते हैं कि सुबह में यह सबकुछ जानबूझकर कर रहा था तो रुचि की उत्तेजना और अत्यधिक बढ़ने लगी और वह अपनी हथेली को अपनी पेंटिं में से निकाल कर दोनों हाथों की नरम नरम उंगलियों का सहारा देकर अपनी मदमस्त गोरी गोरी खरबूजे जैसी गोल गांव को हल्के से ऊपर उठाकर अपनी पेंटी को उतारने लगी... और अगले ही पल उसकी पैंटी बिस्तर के नीचे फर्श पर गिरी पड़ी थी... व कमर के नीचे से संपूर्ण रूप से नंगी हो चुकी थी... क्योंकि वह अच्छी तरह से जानती थी कि पेंटी पहने पहने वह अपनी कल्पना को तादृशय नहीं कर सकती थी....
कमर के नीचे से नंगी होते ही जैसे उसकी वासना और ज्यादा भड़कने लगी वह अपने सिर पर डबल तकिया लगाकर अपनी बुर की तरफ देखते हुए उसके साथ अपनी नाजुक नाजुक उंगलियों से खेलने लगी.... आज उसे यह सब करने में कोई चाहता ही आनंद की अनुमति हो रही थी लेकिन ऐसा करने से उसकी प्यास पल-पल बढ़ती जा रही थी ...शादी के बादआज पहली बार वह किसी गैर मर्द की कल्पना करते हुए अपने नाजुक अंगों से खेल रही थी... हालांकि शुभम से मुलाकात के बाद सेवा रातों को थोड़ी थोड़ी बैठने लगी थी लेकिन आज वो खुलकर अपने मायके में अपनी रसीली बुर से खेलते हुए मजे लूट रही थी...
उससे रहा नहीं जा रहा था उसके मुख से लगातार शुभम को याद करते हुए गरम सिसकारी निकल रही थी बार-बार उसकी आंखों के सामने शुभम का मोटा खड़ा लंड झूलता हुआ नजर आ रहा था... वह अपने कचोरी जैसी फूली हुई पुर के साथ खेलते हुए ऐसी कल्पना कर रही थी कि जैसे वह नहीं शुभम उसकी अंगो से खेल रहा हो... उसकी उंगलियां मदन रस में पूरी तरह से गीली हो चुकी थी... गोरे गोरे गाल लाल टमाटर की तरह हो गए थे.... रुचि की कल्पना इतनी मजबूत थी कि उसे अब अपनी उंगली शुभम का लंड लगने लगी थी वह अपनी उंगलियों के पार से अपनी बुर की गुलाबी पत्तियों को छेड़ रही थी और ऐसा महसूस कर रही थी कि जैसे शुभम अपने हाथ में अपना मोटा तगड़ा लंड ले कर उसकी गुलाबी पत्तियों पर उसके सुपाड़े को रगड़ रहा हो... वह इस तरह की कल्पना करते हुए एकदम मदहोश लगी..धीरे-धीरे वह अपनी एक उंगली को अपनी बुर की गुलाब की पत्तियों के बीचो बीच रखकर उसे दबाना शुरू कर दी और साथ ही मदहोशी भरी आवाजें निकालने लगी जो कि पूरे कमरे को मादकता से भर दे रहा था।.... बहुत ही अद्भुत और काम उत्तेजना से भरपूर नजारा कमरे का बना हुआ था रुचि अर्धनग्न अवस्था में अस्तव्यस्त कपड़ों के साथ बिस्तर पर लेटी हुई थी ब्लाउज के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे जिससे उसके दोनों पहाड़ियों के बीच की खाईनुमा नहर नजर आ रही थी। और वह खुद काम देवी का रूप लेकर अपनी उंगली को धीरे-धीरे अपनी बुर के अंदर डाल रही थी और ऐसा महसूस करते हुए कल्पना कर रही थी कि जैसे शुभम उसकी कमर पकड़कर अपने मोटे तगड़े लगने को उसकी बुर की गहराई में उतारने की कोशिश कर रहा हो... वह लगातार गर्म सिसकारियां ले रही थी.. आखिरकार धीरे-धीरे करते हुए अपनी एक उंगली को पूरी तरह से अपनी बुर की गहराई में उतार दी... और अपनी एक उंगली से अपनी बुर की चुदाई करना शुरू कर दि... वह अपने नितंबों को बार-बार ऊपर की तरफ उछाल दे रही थी मानो कि जैसे कल्पना में ही शुभम का साथ देते हुए अपनी तरफ से भी एक दो धक्के लगा दे रही हो....शुभम की लंड की कल्पना करते हुए ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी बुर में अभी भी कोई कमी महसूस हो रही है इसलिए वह उस कमी को पूरा करने के लिए अपनी दूसरी उंगली पर अपनी बुर में डाल दी और ऐसा महसूस करने लगी कि जैसे शुभम उसकी दोनों टांगों को फैलाकर अपनी पोजीशन लेकर और शिद्दत से अपने लंड को उसकी बुर की गहराई में उतार रहा हो... कुछ ही सेकंड में रुचि की दोनों उंगलियां उसकी नाजुक कोमल गुलाबी बुर के अंदर घुसी हुई थी और वह मदहोशी के आलम में आंखों को बंद किए कल्पना की दुनिया में खोए हुए शुभम का नाम पुकारते हुए ... अपनी बुर के अंदर अपनी उंगली को जोर जोर से अंदर बाहर कर रही थी....
औहहहहहह शुभम आहहहहहहहह और जोर से शुभम और जोर से पूरी ताकत लगाकर मुझे छोड़ दो मेरी बुर को पानी पानी कर दो (ऐसा कहते हुए रुचि बेशर्म की तरह अपनी बुर के अंदर अपनी उंगली को पेल रही थी.... वह पूरी तरह से पसीने से तरबतर हो चुकी थी.... उसकी कल्पना में हकीकत का अंश नजर आ रहा था वह अपनी बुर में अपनी उंगली से ही क्रिया कर रही थी लेकिन उसकी कल्पना इतनी जबरदस्त थी कि उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे उसकी दोनों टांगों के बीच शुभम खुद आ गया हो और उसकी जगह से चुदाई कर रहा है ऐसी कल्पना करते हुए कुछ ही देर में उसकी बुर पानी पानी हो गई और वो झड़ गई... आज अपनी गलती पर उसे बिल्कुल भी पछतावा नहीं हो रहा था क्योंकि शुभम की कल्पना करने में जो सुकून उसे प्राप्त हुआ था ऐसा एहसास ऊसे कभी भी नहीं मिला था भले ही वह अपने पति से संभोग भी क्यों ना कर रही हो।
दूसरी तरफ घर में अकेले होते हुए भी ना जाने क्यों सरला को अच्छा लगने लगा ... खास करके तब से जब उसने अनजाने में ही बाइक के पीछे बैठे बैठे अपने आप को संभालने की कोशिश करते हुए पेंट में खड़े उसके लंड को पकड़ ली थी उस पल को महसूस करते ही ना जाने कि उसे घर में अकेले रहने की इच्छा होने लगी क्योंकि ऐसे में वह शुभम के साथ अच्छी तरह से बातें कर सकती थी इस उम्र के पड़ाव में भी उसके मन में अजीब अजीब से ख्याल आ रहे थे खास करके शुभम को लेकर वह अपनी आंखों से शुभम के मोटे तगड़े लंड का दीदार करना चाहती थी अपने एहसास को वास्तविकता में बदलना चाहती थी। इसलिए हर पल अब उसकी आंखें शुभम का ही इंतजार कर रही थी।
शुभम लगभग दोपहर के समय अपने घर पर पहुंच गया... निर्मला को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था किसी गैर औरत को इस तरह से अपनी बाइक पर बैठाकर उसके घर छोड़ना उसे ना जाने क्यों नागवार लग रहा था... उसे इस बात का डर भी था कि कहीं शुभम किसी दूसरी औरतों के चक्कर में ना पड़ जाए... इसलिए सुभम जैसे ही घर में आया वह बोली....
शुभम यह सब कुछ मुझे अच्छा नहीं लग रहा है जो तुम कर रहे हो (निर्मला बड़े ही शांत स्वर में कुर्सी पर बैठे-बैठे बोली।)
मैं क्या कर रहा हूं मम्मी... (की चैन लगी हुई बाइक की चाबी को वह उंगली से घुमाते हुए बोला)
यही औरतों को इधर ले जाना उधर ले जाना यहां छोड़ ना वहां छोड़ना....
मम्मी तुम यह सब जानती हो कि मैं यह किस लिए कर रहा हूं मैं इसलिए कर रहा हूं ताकि सरला चाची के दिमाग से हम दोनों के बीच के अनैतिक संबंध को लेकर उनका सब दूर हो सके इसलिए उनके सामने संस्कारी लड़का बना हुआ हुं।.....
(शुभम की बात सुनकर निर्मला कुछ सोचने लगी अच्छी तरह से जानती थी कि शुभम इसीलिए यह सब कर रहा है लेकिन उसके मन के कोने में पराई औरतों को लेकर एक डर सा बना हुआ था...वह बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि शुभम किसी भी दूसरी औरतों के चक्कर में पड़े...)
मैं अच्छी तरह से जानती हूं शुभम कि तू यही सब के लिए यह सब कर रहा है लेकिन मुझे डर लगता है कि कहीं तो दूसरी औरतों के चक्कर में ना पड़ जाए..
(शुभम अपनी मां की बात सुनकर अच्छी तरह से समझता था कि उसकी मां का यूं परेशान होना जायज था क्योंकि कोई भी औरत एक मर्द को दूसरी औरत से बात नहीं सकती... इसलिए वह अपनी मां को समझाते हुए बोला. ।)
किसी बात कर रही हो मम्मी भला तुमसे सुंदर इस दुनिया में कोई है जो मैं दूसरी औरत के पीछे पड़ जाऊं... नहीं कभी भी किसी औरत के बारे में सोचता भी नहीं हूं यह तो बस उन लोग का ध्यान हम लोगों से हटाने के लिए ही है सब कुछ कर रहा हूं बस तुम निश्चिंत होकर रहो मेरी तरफ से किसी भी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है....
(शुभम की बात सुनकर कुछ हद तक निर्मला निश्चिंत हो गई लेकिन बेफिक्र बिल्कुल भी नहीं हुई क्योंकि वह मर्दों की जात को अच्छी तरह से जानती है इसलिए उसके मन के कोने में दूसरी औरतों को लेकर डर बना हुआ था।)




















