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Romance एक एहसास complete

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“भ्रष्टाचार के खिलाफ ये लडाई कितनी कामयाब होगी, यह तो वक्त ही बताएगा और ये भी सही है कि सिस्टम के खिलाफ लड़ना बहुत मुश्किल होता है मगर ये भी याद रहे सिस्टम के खिलाफ जाकर तख्ता पलट करने वाला क्रान्तिवीर कहलाता है राधिका जी इस मुद्दे पर तो कितनी भी देर बहस की जा सकती है और इसका नतीजा जो भी होगा वह सबके सामने आ ही जाएगा इसलिये इसे यहीं विराम देते हुए अपने मुद्दे पर आते हैं आपको कैसी लाइफ पसन्द है|” किशन ने पूछा

“हम्म्म्म्म्म्म किशन जी बात तो आपकी एकदम सही है”राधिका ने सहमति जताते हुए कहा मै तो फिल्मी लाईफ जीना चाहती हू जैसी लाईफ फिल्मी हीरोइनो की होती है… जैसे देश-विदेश की खूबसूरत जगहों पर घुमना अपने हीरो के साथ रोमांटिक गीत गाना वगैरा-वगैरा…

“राधिका जी मेरे लिए तो ये पार्क ही इस दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह है क्योंकि यहां आप मेरे साथ हो और आप मेरा साथ दो तो मैं गाना भी गा सकता हूंं

“अरे मगर यहां वो बात कहां …” राधिका ने एक ठंड़ी आह भरते हुए कहा|

“क्यों क्या कमी है यहां… इस पार्क में भी तो चारों तरफ हरियाली है| हरे भरे पेड़ है यहां… क्या ये मौसम प्यारा नहीं है| चलो अब बहाने छोड़ो और गाना शुरू करो|

“किशन… पागल हो क्या… हम कैसे गा सकते है गाने ऐसे ही थोड़े न बन जाते है ”

“अजी मगर अपने मनोरंजन के लिए तो हर कोइ गुनगुनाता है हम भी वही करेंगें| वैसे ये इतना भी मुश्किल नहीं है जितना आप समझते हो| चलो मैं शुरू करता हूंं… आपके मन में उसके जवाब मे जो भी आये… वो आप बोलना… मगर उसमे थोड़ा सा प्यार का अंदाज मिला देना… गीत अपने किशन - भावनाओ में बह गया, जाने मैं कैसे कह गया,

ढ़ह गया सबर का बांध, हो गया मन बेकाबू ,राधिका - क्या

किशन - अरे ऐ छोरी, सुन आई लव यू

राधिका - मदहोशी में जो बोला, कभी होश में भी तो बोल दे,

चाहे मेरा दिल, तुने जो कहा, मैं भी अब वो बोल दू ,

किशन - क्या

राधिका - अरे ओ छोरे, सुन आई लव यू

किशन - क्या है तू जादुगरनी, जो यादों पे मेरी छा गई,

राधिका - बात ये तुने ऐसी की, जो मेरे दिल को भा गई,

किशन - जीने में मजा आने लगा, तुम संग लगा के यारी,

राधिका - छा गये तुम भी यारा, कर लिया ये दिल काबू ,

किशन - क्या

राधिका - अरे ओ छोरे, सुन आई लव यू

राधिका - क्या कहेगी दुनिया, करो होश अब कुछ तो,

किशन - क्या हुआ न जाने, कुछ समझ न आया मुझको,

राधिका - तुमसे डर सा लगता है, कर दोगे रुशवा मुझको,

किशन - अच्छा जी ना बोलूंगा, मगर इशारें में तो कह दूं ,

राधिका - क्या

किशन - अरे ऐ छोरी, सुन आई लव यू |

राधिका - अरे ओ छोरे, सुन आई लव यू|

अरे वाह किशन जी आपने तो कमाल कर दिया|

अजी कमाल क्या… आप मेरा साथ देते रहिए धमाल अभी बाकी है

मै जानी हूंं तू मैरी है,

मै तेरा हूंं तू मेरी है,

दो पल हों प्यार के तेरे संग,

बस जिन्दगी बथेरी है…|

राधिका जी … आप चुप क्यों हो गये… गाओ …

बस… बस… किशन… बहुत अच्छे… अब तो मुझे यकीन है आप एक दिन जरूर कामयाब होंगंे|

“शुक्रिया मैड़म… अब एक बात बताओ आप प्रदीप को कैसे जानते हो”|

“प्रदीप… आप किस प्रदीप की बात कर रहे हैं,”|

“वही जो पार्क के गेट के पास आपसे बात कर रहा था”|

“ओह प्रदीप जी… वह तो मेरे जीजा जी के दोस्त थे… मगर मेरे लिए तो वह भगवान जैसे है| जैसे मुश्किल वक्त में उन्होने हमारी मदद की, वह सब बस भगवान ही कर सकता है,”

“इसने कौन से मुश्किल वक्त में तुम्हारी मदद कर दी” किशन ने उखड़े स्वर में कहा|

“बीते दिनो में मेरे जीवन में जो मुसीबतें आयी थी मैं उन्हे याद करके उस बुरे वक्त को दोहराना नहीं चाहती… मगर आप क्यों पूछ रहे है… क्या आप भी उन्हे जानते हैं| ”

“नहीं… मैं उसे नहीं जानता”

“तो फिर क्यों पूछ रहे थे उनके बारे मे”

“मुझे लगा शायद वह आपको परेशान करता हो” किशन ने कुछ खीझकर कहा|

“अच्छा बाबा सॉरी… अब गुस्सा छोडो… आपने वादा किया था आज हम ड़ीनर साथ करेंगंे|

“हां… हां… मुझे याद है… “

“ये हुई न कुछ बात” राधिका ने ईठलाते हुए कहा और दोनों एक रेस्टोरेंट की तरफ चल पड़े|
 
“हाये री छम्मक छल्लो एक बार जरा ऐसी ही अगंड़ाइ लेकर हमारे साथ आजा… ड़िनर तो तुझे हम भी करा देंगें” राह चलते तीन लड़कों ने राधिका को छेड़ते हुए कहा|

“ये क्या बदतमिजी है,” किशन ने कहा|

“किशन चलो यहां से कुत्ते तो भौंकते ही रहते हैं,” राधिका ने कहा|

“अबे ओ चिकने चल फुट ले… अब ये छम्मीयां हमारे साथ जायेगी”

“जबान संभाल कर बात कर कुत्ते” कहते हुए राधिका ने उस बदमाश पर हाथ छोड़ दिया| लेकिन दूसरे लड़के ने उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी बाहों की गिरफत में ले लिया|

वाह री मेरी बुलबुल बहुत गर्मी है तुझमे… अब तू देख ये कुत्ते भौंकते ही नहीं बल्कि काटना भी जानते है|बाकी बचे दो लड़को ने किशन को पकड़ रखा था| किशन भी मन बना चुका था कि वह तीनो से एक साथ भिड़ने की बजाये एक-एक करके तीनो को तसल्ली सेकहते हैं इन्सान सारे जीवनकाल मे अपने आत्मबल का दस प्रतिशत भी इस्तेमाल नहीं करता| जब कभी इन्सान पर कोइ ऐसी परिस्तिथि आती है कि यदि वह नाकामयाब हो गया तो वह अपनी ही नजरों मे गिर जायेगा या यूं कहे कि इन्सान अपने मातापिता या किसी अन्य जान से ज्यादा अजीज को मुसीबत मे पाता है तब इन्सान अपने आत्मबल का सौ प्रतिशत इस्तेमाल करता है ऐसी स्तिथि मे वह नाखुनों से खरोंच कर किसी पर्वत में से भी रास्ता बना सकता है|

किशन ने अपनी पूरी ताकत लगाकर दोनों लड़को की गिरफत से खुद को आजाद कराया| वह शेर के सी दहाड के साथ तीसरे लड़के पर टूट पड़ा और उसका कान काट खाया| किशन इतने जोर से चीखा था कि तीनो लड़के कुछ पल के लिय सहम गए थे| इस बीच राधिका भी खुद को आजाद करा चुकी थी| किशन ने अब तक लड़के का कान नहीं छोड़ा था जबकि लड़का दर्द के मारे तडप रहा था| अपने साथी की चीखें सुनकर दोनों लड़को ने उसे छुड़ाने की जोरदार कोशिश की| किशन की पकड़ इतनी मजबुत थी, कि दोनों के पसीने छूट गये| कड़ी मश्क्कत के बाद आखिर दोनों ने अपने दोस्त को छुड़ा लिया|

अब दोनों लड़को ने मिलकर किशन को मारना शुरू कर दिया तथा कान कटे लड़के ने राधिका को पकड़ लिया| एक जोरदार घंूसे के प्रहार से किशन लड़खड़ाकर सड़क पर गिरा जहां उसे एक आधी इंट पड़ी हुई दिखी| किशन ने इसे उठाया और अपनी पूरी ताकत के साथ उस कान कटे लड़के की तरफ फेंकी, जो इस वक्त राधिका के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था| इंट सीधे जाकर कान कटे लड़के के कूल्हे पर लगी और वह हाय माँ मर गया री माँ… की हॄदयविदारक चीख के साथ कूल्हे पर हाथ रखकर वहीं सड़क पर लेट गया| अपने कान कटे दोस्त को इस तरह कराहते हुए देखकर दोनों लड़कों ने पागलों की तरह किशन को मारना शुरू कर दिया| कुछ ही देर में उन्होने किशन को लहूलुहान कर दिया| किशन को कमजोर पडता देख, राधिका ने सहायता के लिए पुकारना शुरू किया|

देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ हो गई|

भीड़ में से एक नौजवान उनकी मदद के लिए आगे आया और तीनो लड़को को मार भगाया|

किशन ने उस नौजवान को देखा तो वह हैरान रह गया| वह नौजवान प्रदीप था|

“मुझे समझ नहीं आता, मैं तुम्हारा शुक्रिया कैसे अदा करूं | … मुझे विश्वास नहीं होता कि तुमने मेरी मदद की” किशन ने कहा|

“तुम्हारा ऐसा सोचना गलत नहीं है, क्योंकिं मैने मदद करने से पहले ये नहीं देखा था कि मैं किसकी मदद कर रहा हूंं| सहायता के लिए आवाज किसी लड़की ने लगाई थी, इसलिए मैने मदद की थी मगर इसका मतलब ये कतई नहीं है, कि मैं तुमको देख लेता तो तुम्हारी मदद न करता| अरे भई मेरी तुमसे कोइ जाति दुश्मनी तो नहीं है जो मैं तुम्हारी मदद न करूं|

किशन व राधिका दोनों ही ने प्रदीप को धन्यवाद दिया|

किशन एक अजबसी उलझन में था कि जिस प्रदीप को आज तक वह एक बुरा लड़का व अपना दुश्मन समझता था| आज उसी प्रदीप ने उसके प्यार की इज्जत बचाने में उसकी मदद की| वह मन ही मन खुद को प्रदीप के अहसान तले दबा महसूस कर रहा था|

“बाबू जी अगर किसी का दुश्मन उसकी कोइ मदद कर दे तो उसे क्या करना चाहिए” किशन ने श्रीहरिनारायण से पूछा|

“बेटा ऐसे में उसे उस दुश्मन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा देना चाहिए”|

“मगर बाबूअहसान से दुश्मनी दोस्ती में बदल जाती है…, लेकिन तुम ये सब क्यों पूछ रहे हो”

“बस ऐसे ही ख्याल आया था बाबू जी…”|

किशन ने अगली ही मुलकात में प्रदीप की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया|

“बिना सोचे समझे या किसी के बारे में जाने बिना की हुई दोस्ती ज्यादा दिन नहीं रहती इसलिए मैं पहले ही आपको एक बात बता देना चाहता हूँ” प्रदीप ने कहा|

“कहो… क्या बात है| ”

”मै सीमा से प्यार करता हूँ और चाहे जो हो जाए मैं उसे नहीं भूल सकता इसलिए सोच लो|”

“अब इसमे मुझे क्या सोचना है… अगर आपका प्यार सच्चा है और सीमा की भी यही मर्जी हुई तो ये किशन का वादा है मैं तुम दोनों को मिलाने की कोशिश करूगा… एक बार फिर उसने प्रदीप की तरफ हाथ बढ़ा दिया|

इस बार प्रदीप ने किशन की दोस्ती स्वीकार करते हुए हाथ मिला लिया|

कुछ महीनों तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा|

राधिका व किशन दोनों साथ-साथ इतना वक्त गुज़ारते थे कि शुरुआती दोस्ती के बाद दोनोंं के बीच गहरे आत्मीय रिश्ते बन गए थे|
 
बरसात का मौसम अपनी पूरी रवानगी पर था| पल भर के लिए आसमान साफ होता फिर सारा गगन भूरे काले मेघों से आच्छादित हो जाता, और फिर वे अपनी रसधार से पूरी सॄष्टी को नहलाते चले जाते| जड, चेतन सब ओस में नहाये कमल का रूप अख्तियार कर लेते थे|

ऐसे ही मौसम की खूबसूरत शाम थी, जब किशन व राधिका जवाहरलाल नेहरू पार्क में मिले|

“राधिका जी आज तो आप बहुत खूबसूरत लग रहे हो| खासकर आपकी ये टी-सर्ट तो आप पर खूब जंच रही है इस पर कढ़ाई किया हुआ यह टेड़ी बियर कितना मुलायम और सुन्दर दिखता है,” टी-सर्ट पर हाथ फिराते हुए मनुहार भरे शब्दों में किशन ने कहा|

“हां-हां मैं खूब समझ रही हूँ आप मेरी तारीफ करते हुए जरा अपने हाथों को कंट्रोल में रखो”

“वो मैं तो… वो आपका वो तिल दिख रहा था इसलिए मैने तो टी-सर्ट ठीक करने के लिए…”

“अरे वाह- बड़ी तेज व पारखी नजर है आपकी - क्या कहने - मैं तो आपको भोंदू समझती थी लेकिन आप तो इधर-उधर नजर मारना भी जानते हो” राधिका ने आँख नचाते हुए कहा|

“मेरा भरोसा करो यार… सच में तुम्हे उस तरह से छुने का अभी मेरा कोइ इरादा नहीं था”|

“अभी… ये अभी का क्या मतलब है| ”|

“वो म्म्म मै… मेरा मतलब… कोइ ईरादा नहीं था यार”|

“अच्छा बाबा इसमे इतना घबराने की क्या जरूरत थी” राधिका के पतले–पतले होंठ विचित्र अंदाज में भिंचकर मुस्कुराये|

उसकी हँसी के अंदाज को देखकर किशन का मन मयूर सा नाच उठा| खुशी के मारे उछलकर वह राधिका के सामने आ बैठा और उसका गोरा गोल मुखड़ा हथेलियों में भर लिया|

“राधिका हड़बड़ाइ„ चेहरे पर घबराहट के भाव छा गये|

किशन अपलक उसे देखता ही रहा|

राधिका को ऐसा लगा जैसे किशन की नजर का वह तीखा अंदाज किसी कटार की भांति उसके कलेजे में उतर गया हो|

दोनों दुनिया को भूलकर एक दूसरे में खो गये|

“वो… वो किशन जी मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी थी” राधिका ने संभलते हुए कहा

“जरूरी बात… प्यार से बढ़कर कौन सी जरूरी बात होती है यार| ”

“सही कहा जी प्यार से बढ़कर कोइ जरूरी बात नहीं होती… मगर जनाब मैने भी आपसे सच ही कहा था मैं आपसे जरूरी बात ही करना चाहती हूंं|

“मतलब…”

“मतलब ये है किशन कन्हैया जी मुझे आपसे किसी के प्यार के बारे में ही बात करनी है,”

“किसी के… किसके प्यार के बारे मे”|

“प्रदीप के प्यार के बारे मे”

“प्रदीप का प्यार… मगर तुम्हे कैसे पता उसके प्यार के बारे मे” किशन ने गंभीरता से पूछा

“खुद प्रदीप जी ने ही बताया| वह कह रहा था वह सीमा से सच्चा प्रेम करता है, और उससे शादी करना चाहता है,”

“वो सब तो मुझे भी पता है मगर प्रदीप तुमसे क्या चाहता है…| ”

“प्रदीप चाहता है कि मैं उसके मन की बात सीमा तक पहंुचाऊं ं”|

“ओके … तो ये बात है … फिर परेशानी कहां है| ”

“मै इस उलझन में हूंं कि उसकी मदद करू या नहीं”|

“मगर आप उलझन में क्यों हो… क्या तुम्हे उसकी बाते झूठ लगती हैं| ”

“उसकी बातों से तो ऐसा कुछ नहीं लगता मगर एक तरफ जहां उसने हमारी मदद की थी दूसरी तरफ आपके साथ झगड़ा हुआ था…, मैं कोइ निर्णय नहीं ले पा रही हूंं”

“अरे इसमे ऊल्झन की क्या बात है, तुम एक बार सीमा से बात करके देख लो… सीमा जो फैसला करेगी वही सही होगा| रही बात मेरी तो मैने तो प्रदीप को कब का माफ कर दिया है बल्कि अब तो हम दोनों में दोस्ती भी हो गई है| यह बात तुम सीमा को भी बता देना|
 
“अगर ऐसी बात है तब क्यों न हम परसों नव–वर्ष की पार्टी में उन दोनों की मुलाकात करा दें| फिर उनको जो ठीक लगे वो जाने”|

“ख्याल बुरा नहीं है… सब मिलकर नव वर्ष का जश्न मनायेंगे” किशन ने खुश होते हुए कहा|

“ये ख्याल मेरा नहीं बल्कि प्रदीप का है और पार्टी भी उसी की तरफ से है … मगर पता नहीं सीमा हमारे साथ आने के लिए तैयार होगी भी या नहीं”|

“तुम उसकी फिक्र मत करो सीमा को पार्टी में लाने की जिम्मेदारी मेरी” किशन ने कहा|

“तो फिर ठीक है मैं प्रदीप को इस बारे में बता दूंगी”

पार्टी की सारी तैयारियां हो गई थी| ऊपर खुली छत पर एक तरफ ड़ी. जे. तो उसके ठीक सामने दीवार के सहारे फर्श पर मुलायम गददे बिछा दिये गए| अपनी परिकल्पना के अनुसार प्रदीप ने मेहमानों के बैठने की ऐसी व्यवस्था करवाई कि आने वाले को पहली नजर में लगे वह सचमुच किसी रईश की पार्टी में आया है|

प्रदीप ने महफिल में जान ड़ालने के लिए रश्मी, श्रुति, बिन्नी, हिमानी, शिवानी और ज्योति के साथ-साथ नितिका को विशेष रूप से बुलाया था, तथा इनको ऐसा निर्देश दिया जा चुका था कि महफिल में ऐसा रंग जमना चाहिए कि आने वाले मेहमान बरसों तक याद रखें| बावजूद इसके प्रदीप का जी ठिकाने नहींं है| सीमा उसकी पार्टी में आयेगी या नहीं इस बारे में सोचकर वह बेचैन हैं|

आमन्त्रित अतिथि आ चुके है| ड़ांस फ्लोर पर बच्चों (साहिल, सागर, अनिकेत, कमल, रिजूल, गुरविन्द्र आदि) की उछलकूद शुरू हो चुकी हैं, मगर किशन और राधिका का अब तक कहीं अता-पता नहीं है| उनके इन्तजार में प्रदीप की हालत यह हो गई कि दूर-दूर तक पसरी रोशनी में भीगा हर साया उसे उनके होने का भ्रम देने लगा है|

प्रदीप को जैसे ही किशन के आने की सूचना मिली, वह तेज़ी से दरवाजे की ओर लपका और सीमा को भी उसके साथ देखकर उसका मन एक शीतलता से भीग गया| वह सीमा को देखता ही रह गया| उसकी एक झलक ने ही प्रदीप को भीतर तक आश्वस्थ कर दिया|

"अबे यार कहा मर गया था| " किशन को देखते ही आत्मीय ड़ाट मारते हुए प्रदीप ने पूछा|

“बस यार ऐसे ही जरा सी देर हो गई थी” किशन ने जवाब दिया|

“सीमा जी, कैसी हो| " मुस्कान के साथ सीमा का स्वागत करते हुए प्रदीप ने पूछा|

"जी अच्छी हूं " सीमा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया|

इस बीच राधिका भी आ चुकी है|

"प्रदीप, सब ठीक तो है| " राधिका ने पूछा|

"वैसे तो ठीक है पर न जाने क्यों मेरा जी घबरा रहा है कहीं सीमा को बुरा न लग जाए|"

"तू बेफिक्र रह… मैं सब सभाल लूंगी”

राधिका ने अपनी ओर अपलक निहारती सीमा का अभिवादन किया|

सीमा ने भी हल्की मुस्कान के साथ राधिका का अभिवादन स्वीकार किया|

“यार किशन तुम जरा मेरे साथ आओ …” आंख दबाकर इशारे से बुलाते हुए प्रदीप ने कहा|

किशन प्रदीप के साथ चला गया|

खुली छत से आकाश में झूलती तारों की झीनी चादर से टिमटिमाते हुए तारे ऐसे दिखाई दे रहे है, मानो सितारों से जडी ओढ़नी पर ओस की बूदें चमक रही हैं|

दस बजते-बजते पूरी छत भर गई| अब कुछ रंगीन बल्बों को छोड़कर सारी बत्तिया बुझा दी गइं, और जैसे ही ड़ी• जे• पर “कार्तिक कॉलिंग कार्तिक" फिल्म ऊफ तेरी अदा, आई लाइक दा वे यु मुव,

ऊफ तेरा बदन, आई वान्ट टू सी यु ग्रुव,

ऊफ तेरी नजर, इट सेज आई वाना ड़ांस विद यू…
 
तब ड़ांस फ्लोर पर जो धमाल मचा, वह देर तक नहींं थमा| इसके बाद फिल्म “दबंग” के “मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये…” और फिल्म “तीस मार खां” के माई नेम ईज शीला… शीला की जवानी… सुपरहिट गीतों के बजने पर तो मानो ड़ांस फ्लोर पर लरज़ती, बलखाती देहों से ड़ांस फ्लोर पर नॄत्य यज्ञ शुरू हो गया| जिसमें सब लोग ठुमकों के रूप में दो-चार चुटकी समिधा होम रहे थे| रश्मी, बिन्नी, हिमानी और ज्योति तो नाचीं ही, बीच-बीच में किसी न किसी के आग्रह पर नितिका भी एकाध ठुमका मार लेती| महफिल में शोखिया और शोखियों में गहराती रात का शबाब घुलने लगा| सही कहा था नितिका ने प्रदीप हम ऐसा आइटम तैयार करके लाई हैं, कि सब देखते रह जाएगे| इसके बाद एक के बाद एक बिन्नी नितिका और ज्योति तीनों ने ड़ी• जे• पर जो ड़ांस किया, उस पर अन्य मेहमान भी खुद को नहींं रोक पाए| अलसाए से पडी जिस्मों में ताकत लौट आई| सुप्त शिराओं में खून दौड़ने लगा और मेहमानों के खाली गिलास फिर से भर उठे| शराब व चाय-काफी के साथ-साथ ब्रेड-पनीर और जूस के दौर भी खूब चल रहे थे| किशन ने पास बैठे प्रदीप को इशारे से अपने पास बुलाया और लगभग फुसफुसाते हुए कहा, यार प्रदीप, वोººº वो पहला तोड़ कहाँ है|

प्रदीप तुरन्त उठा और एक लड़के को बुलाया|

"ये हूइ न कुछ बात" पहले तोड़ से भरते जा रहे गिलास को देख किशन की बाछें खिल उठीं|

जैसे-जैसे रात बीतने लगी हल्की ठंड़ के चलते आकाश से ओस गिरने लगी, वैसे-वैसे महफिल पर और रंग चढ़ने लगा| ज्योति ने तो जैसे आज क़सम खा ली थी, कि जब तक महफिल खत्म नहीं होगी, तब तक वह ड़ांस करती रहेगी, चाहे दिन निकल आए|

ग्यारह कब बज गए पता ही नहींं चला| इधर राधिका ने प्रदीप और सीमा की मुलाकात कराने का बंदोबस्त कर दिया और चार कुर्सियां अलग से छत के एक कोने में बिछ गई| जहां किशन और राधिका तथा सीमा और प्रदीप आमने सामने बैठ गये|

कुछ देर तक चारों खामोश बैठे रहे तब हारकर राधिका को ही कहना पडा“ प्रदीप मज़ा आ गया क्या शानदार पार्टी दी है तुमने"|

"सीमा जी, आपको अच्छा लगा या नहींं " राधिका ने पूछा|

"बस, एक कमी रह गई|"

"कºººकौन सी| " कलेजा धक्क से रह गया प्रदीप का| शब्द हलक में फसकर रह गए|

"यही कि महफिल खत्म होने को है मगर किशन के होते हुए भी कोइ शायरी-वायरी नहीं हुई|"

"अरे … अब कहा याद है शायरी-वायरी" टालते हुए किशन बोला|

"किशन, ऐसे बात न बनाओ|" राधिका ने नाराज होते हुए कहा|

"यार किशन, ये दोनों सही कह रही हैं… मुद्दत हो गई है सुने हुए" पास आकर प्रदीप ने कहा|

प्रदीप ने जिस तरह आग्रह किया, उस पर किशन से न कहते नहींं बना|

“वह कुछ सोचने लगा और बोला" ठीक है राधिका जी मैं याद करके देखता हूँ… तब तक आप प्रदीप को आदेश करो कुछ सुनाने के लिए"

"हाँ यार प्रदीप को तो मैं भूल ही गई थी|" राधिका ने चटकारा लेते हुए कहा|

"मैंºººमैं क्या सुनाऊ" अकबका गया प्रदीप अचानक सिर पर आ पडी इस बला को देख|

"कोइ भजन-वजन ही गा दो अगर शायरी नहीं आती हो तो"|

“अच्छी बात है मैं कोशिश करता हूँ” प्रदीप ने कहा|

खुमारी में ड़ूबी पलकें अपने आप खुल गई| शिराओं में घुल चुके अल्कोहल से अचेत पडी जिस्मों में भी हल्र्की हल्की जुम्बिश होने लगी| राधिका धीरे से उठकर प्रदीप के पास आ गई| किशन, सीमा और राधिका के कानों के परदे ढ़ीले हो गए| प्रदीप ने हल्र्के से पूरी महफिल पर नज़र दौड़ाई और पता नहींं कब सबसे नज़रें बचाकर, सीमा को देख पहले उसने गहरी साँस ली, फिर किशन को सम्बोधित करते हुए बोला, "किशन जी मै शायरी के नियमो को नहीं जानता इसलिए कोइ गलती हहाए रे महोब्बत तू क्युं , हमे बदनाम कर गई,

जीवन बिताने का यूं , अच्छा इन्तजाम कर गई|

हाए रे महोब्बत तू क्युं …

तेरे मारे दिल से हारे,

कहांं जाएं हम बेचारे,

हर तमन्ना इस दिल की,

तू कत्ले आम कर गई,

हाए रे महोब्बत तू क्युं , हमे बदनाम कर गई,

जीवन बिताने का यूं , अच्छा इन्तजाम कर गई|

जिन आखों में भारीपन उतर आया था, वे भी अब पूरी तरह खुल गइं|

"वाह, क्या बात है यार... जीता रह|" किशन की अधमुंदी आखें झिलमिलाने लगीं|

"किशन, अब तो याद आ गया होगा, या अभी कुछ और सुनवाया जाए" प्रदीप ने कहा

कुछ-कुछ याद आया है भाई लेकिन जब तक मुझे ठीक से याद आये राधिका जी …
 
“मैं… मै क्या… अच्छा ठीक है मगर इसके बाद आपका भी कोइ बहाना नहीं चलेगा” राधिका ने किशन की ओर देखते हुए नजाकत से कहा|

“हमे मंजूर है…” किशन ने कहा

राधिका -

दुआ करना हो सके तो, रे मिल जाए मुझको, वो है भगवान मेरा जो,

क्या आएगा दिन कोइ, अरे ऐसा भी, जब साथ मेरे दिलदार मेरा हो,

है ना परवाह मुझे जमाने की, बस एक साथ मेरे, अगर साथ तेरा हो,

दुआ करना हो सके तो, रे मिल जाए मुझको, वो है भगवान मेरा जो,

कभी हम निकले घुमने, और हो हाथों में एक दूजे का हाथ,

तेरी आंखों में ड़ाल के आंखें, मैं कह दूं अपने दिल की बात,कैसे कहूंं मुझे कब से है इन्तजार अपने मिलन की रात का,

काश के जल्द आए वो रात, और फिर कभी ना सवेरा हो,

दुआ करना हो सके तो, रे मिल जाए मुझको, वो है भगवान मेरा जो,

मै ना सुनुं किसी की जमाने में, जब आया मुझको, ख्याल तेरा हो|

दुआ करना हो सके तो, रे मिल जाए मुझको, वो है भगवान मेरा जो,

क्या आएगा दिन कोइ, अरे ऐसा भी, जब साथ मेरे दिलदार मेरा हो,

"किशन, अब कोइ बहाना बनाया तो बहुत मार पड़ेगी बेटा…"प्रदीप ने कहा

“उसकी नौबत नहीं आयेगी भाई…मेरे दिल पे बिजली गिराके, रे उसे क्या मिलता है,

मेरी धड़कन को बढ़ाके, रे उसे क्या मिलता हैमुड़ के भी ना देखे, बस चल देती है मुस्कुरा के,मेरे दिल पे छुर्रियां चलाके, रे उसे क्या मिलता है|

हर आशिक का मन मन्दिर, सनम भगवान है इसका,

लेके अरमानों की थाली, बस करते रहो इसकी पूजा,

मन्दिरों में रे घंटी बजाके, किसी को क्या मिलता है

मेरे दिल को धड़काके, रे उसे क्या मिलता है,मेरे दिल पे छुर्रियां चलाके, रे उसे क्या मिलता है|

मेरी धड़कन को बढ़ा के, रे उसे क्या मिलता हैमेरे दिल पे बिजली गिराके, रे उसे क्या मिलता है,

वाह… किशन प्यारे…

ऐ कुडिये हिमाचल

ना धड़का यूं मेरा दिल

ये हरियाणे का छौरा

हो ना जाये पागल

तू कितनी ब्यूटीफुल

कैसे करूं तारीफ मै

हाय एक अजूबा

ये तेरी भूरी आखें हैं

उस पे तेरी मीठी बोली

जिसका मै कायल

ऐ मिस हिमाचल

ना धड़का यूं मेरा दिल

सुन्दर् नगर की

सुन रे सुन्दरी

अब तो बस ये ही

ख्वाहिश है मेरी

मेरे आंगन मे

छनके तेरी पायल

ऐ मिस हिमाचल

ना धड़का यूं मेरा दिल

ऐ कुडिये हिमाचल

ना धड़का यूं मेरा दिल

ये हरियाणे का छोरा

हो ना जाये पागल....

वाह… प्यारे जीते रहो…

“प्रदीप जी अब जब तक राधिका जी चाहें ये महफिल ऐसे ही चलती रहेगी…”

“भला मेरे चाहने से कैसे… मै कुछ समझी नहीं”|

“राधिका जी आप एक कविता सुनाइयें… और मै आपकी हर एक कविता के बदले मे दो कवितायें सुनऊंगा… इस तरह जब तक आप चाहें ये सिलसिला जारी रहेगा|

“अगर ऐसी बात है तो ठीक है आप याद करना शुरू कर दीजिये… और जरा गौर फर्माइये…

लग जा गले यारा, रखा है क्या बहानों मे,

नाम तेरा पहला है, मेरे अरमानों मे,

छुपाने से न बात छुपेगी,

बदनामी तो होके रहेगी,

चर्चा तेरा मेरा है,

आजकल दीवानों में,

नाम तेरा पहला है, मेरे अरमानों मे…

कुछ भी कर ले तू, कुछ भी बन जा,

दीवाने को ना तूने समझा,

तुझसे ज्यादा पाएगा तुझे,

ये जग मेरे अफसानों में,

नाम तेरा पहला है, मेरे अरमानो मे…

प्यार करे जो, जिसे प्यार मिला हो,

दिल मे रहा जो दिल मे बसा हो,

खुश वो रहे कैसे,

मिट्टी के मकानों मेंं,

नाम तेरा पहला है, मेरे अरमानों मे|

“वाह क्या बात है…” संयोग से सीमा व प्रदीप ने एकसाथ कहा|

“बहुत अच्छे राधिका जी मगर अब जरा ध्यान दीजिये…

गुजर जायेगी जिन्दगी,

हो जायेगा अब गुजारा,

जीने को जो मिल गया,

तेरी यादों का सहारा|

मजे में गुजरते हैं दिन अब,

मिलने को तुमसे सो जाते हैं,

जब–जब याद आयी आपकी,

तन्हाई ने भी बस यही पुकारा,

गुजर जायेगी जिन्दगी,

हो जायेगा अब गुजारा,

जीने को जो मिल गया,

तेरी यादों का सहारा|

वाह किशन जी… आपने तो इस शाम को और भी यादगार बना दिया…

अजी एक ओर सुनिये इस हसीन शाम के नाम…

मुस्कुरा के, दिल धडका के

वो तो चैन चुराके, चली गई

प्रीत बढा के, लगन लगा के

वो तो प्यार सिखा के, चली गई

हा मुझे प्यार सिखा के, वो तो चली गई

हा मुझे अपना बना के, वो तो चली गई

यारो वो हसीना मेरे दिल का नगीना

आए रातों को अब नींद भी ना

सपने सजा के, अरमां जगा के

वो मन का मीत बना के, चली गई

हा मुझे प्यार सिखा के, वो तो चली गई

ख्यालों मे आज फिर वो आई थी

मेरे मन की नगरी फिर महकाई थी

कलम उठा के, कुछ गुनगुना के

वो प्रेम का गीत लिखा के, चली गई

हा मुझे प्यार सिखा के, वो तो चली गई

हा मुझे अपना बना के, वो तो चली गई

इस गीत को किशन ने जिस अंदाज़ में गाया, उसने सभी का मन मोह लिया|

आकाश से झरती ओस की बूदें भी थोडी देर के लिए जहा थीं, वहीं ठहर गइं|
 
इससे पहले कि राधिका कोइ टिप्पणी करती प्रदीप ने महफिल को समापन की ओर धकियाते हुए कहा “दोस्तों नया साल हम सबका इंतज़ार कर रहा हैººº मैं आप सब का शुक्रगुजार हूँ जो आप सब यहां आए और इस महफिल को इतना बेहतरीन बना दिया… मैं कामना करता हूंं कि आने वाला समय हम सबके लिए गरिमा और गौरव बढ़ाने वाला हो… आज की ये रात मेरी जिन्दगी की सबसे हसीन रात है| इसके लिए विशेषकर मैं अपने दोस्त किशन का शुक्रिया अदा करता हू , क्योंकिं इस रात को यादगार बनाने में उसका अहम योगदान है,” अब इससे ज्यादा मुझ जैसा ना चीज़ क्या कहेगा| मेरे पास शब्द ही कहां है जो मैं आप लोगो का मनोरंजन करने के लिए अपनी इस छोटी सी जुबान से बाहर उंड़ेल दूं|

तो दोस्तो, बातें बहुत हो गई बारह बजने को आए हैं| नया साल आने ही वाला हैººº अब मैं अपनी बात को समेटता हूँ और आप सब को नव-वर्ष की शुभकामनाएं देता हूँ|

ठीक बारह बजते ही बम-पटाखे बजाए गए| सभी ने एक दूसरे को नव-वर्ष की बधाई दी और ऐसे ही कुछ अवसर से जुडी वाक्यों का आदान-प्रदान हुआ| मगर किशन तो शराब के नशे में इस तरह धुत था| वैसे तो नशे में सभी थे लेकिन वह तो ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था| उसकी इस हालत को देखते हुए कुछ मेहमानों ने उसे वही सो जाने की सलाह दी मगर सीमा के मना करने पर वह सीमा के साथ अपने घर के लिए चल दिया|

“सॉरी… सीमा आज मैनंे थोड़ी ज्यादा पी ली” सफाई देते हुए किशन ने कहा|

“थोड़ी ज्यादा… बहुत ज्यादा पी है,”

“सॉरी…”

“नहीं सॉरी बोलने की जरूरत नहीं है मगर आपको उतनी ही पीनी चाहिए थी जितनी में आपका शरीर और आपका दिमाग आपके कट्रोंल में रहे”|

“सच कह रही हो सीमा … मैं आज के बाद कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाऊगा… लेकिन अगर फिर भी कभी कही किसी शादी या पार्टी वगैराह में पीऊगा तो बहुत थोड़ी सी……”

“अच्छा - अच्छा… अब चुप हो जाओ लगता है तुमको चढ़ गई…” टोकते हुए सीमा बोली|

कुछ देर दोनों चुपचाप चलते रहे फिर सीमा बोली “भैया सच कहूंं तो शायद मैने भी ज्यादा पी ली| मैं भी अपने कदमों को कंट्रोल नहीं कर पा रही हूंं मेरे कदम भी कहीं के कहीं पड़ रहे हैं,”

“तुमने कितने पैग लगाये थे”

“एक बियर… ”

“बस एक बियर में…”

इस तरह दोनों आपस में बातें करते हुए चले जा रहे थे| कुछ देर चलने के पश्चात् किशन पर नशा इतना हावी हो चुका था कि अब उसके लिए चलना भी मुश्किल हो गया व उसे उल्टीयां शुरू हो गई| कुछ देर आराम करने के इरादे से वह वहीं सड़क पर पसर गया|

सीमा उसे जगाने का प्रयत्न कर ही रही थी कि एक कार उनके पास आकर रूकी|

कुछ देर के लिए वह सहम सी गई|

गाड़ी का दरवाजा खुला और प्रदीप गाड़ी से बाहर निकला| उसके पास आकर वह नाराजगी सी जाहिर करते हुए बोला “सीमा जी इतनी भी जिद अच्छी नहीं होती किशन की हालत को देखते हुए ही हमने आप दोनों को रूकने को कहा था मगर आप … ”|

“मुझे क्या पता था ऐसा होगा” सीमा ने किशन की तरफ देखते हुए कहा

“ओके-ओके… कोइ बात नहीं…आप चलकर गाड़ी में बैठो मैं आप दोनों को घर छोड़ देता हूँ|

“सीमा मन ही मन भगवान के साथ-साथ प्रदीप का भी शुक्रिया अदा कर रही थी| प्रदीप ने सुप्त अवस्था में ही किशन को उठाकर अपने साथ आगे वाली सीट पर बिठाया और सीमा गाड़ी की पीछली सीट पर बैठ गई| नशा सीमा पर भी कुछ इस कदर हावी था कि कुछ देर में वह भी गाड़ी में ही ढ़ेर हो गई|

सुबह जब सीमा नींद से जागी तो उसे अपना शरीर दर्द से टूटा हुआ सा महसूस हुआ| वह कमरे की दीवारों को हैरानी से देखने लगी| ये उसके घर की दीवार नहीं थी| वह झटके के साथ बैड़ से उतर गई मगर उसे चलने में भी दर्द महसूस हुआ| एकाएक सीमा ने पीछे से प्रदीपक्युं बिखरे-बिखरे हैं बाल, क्युं उड़ा है यूं रंग चेहरे का,अरे कुछ तो बता, ऐसी भी बीती तुझपे एक रात में क्या|

प्रदीप की आवाज सुनकर वह सहम गई| कुछ पल के लिए तो जैसे वह जड़ हो गई| वह समझ चुकी थी कि वह प्रदीप की हव्स का शिकार बन चुकी है| पीछे मुड़कर उसकी नजर प्रदीप पर पड़ी तो वह अंगारे बरसाने वाली नजरों से उसे घूरने लगी|

“आप मुझे क्यों घूर रही हैं… मैने आपके साथ कोइ धोखा नहीं किया मैने तो आपके साथ एक रात गुजारने के गिनकर पैसे दिए हैं किशन को… शायद आपको मेरी बात पर यकीन न हो मगर सीमा इतिहास गवाह है जो पैसे का हो जाता है फिर वो किसी का नहीं हो सकता… ये किशन उन्ही में से है|

“कुत्ते बंद कर अपनी बकवास… तू हैवान है या दरिंदा” सीमा उबल पड़ी थी|

अगर आपको मेरी बात पर भरोसा नहीं है तो ये देखो कहते हुए प्रदीप ने उसे उसकी कुछ अश्लील तस्वीरें दिखाई|
 
सीमा को एक बड़ा आघात लगा| उसकी हालत ऐसी थी कि धरती फट जाती तो वह उसमें समा जाती|स्त्रिया स्वभाव से लज्जावती होती हैं| उनमें आत्माभिमान की मात्रा अधिक होती है| निन्दा और अपमान उनसे सहन नहींं होता|एक आबरू ही तो होती है औरत के पास, चाहे मर्द उसे ताकत से हासिल कर ले या औरत अपनी मर्जी से उसे उसके हवाले कर दे… औरत तो कंगाल हो ही जाती है,

सिर झुकाये हुए और रोती हुई सीमा वहीं घुटनो पर बैठ गई|

"मगर आप परेशान किसलिए है" इतना कहने के बाद कुटिल मुस्कान उछालते हुए वह बोला, "देखो सीमा जी, मैं नहीं पड़ता इस प्यार-व्यार के झमेले में… अपना तो साफ कहना है गलत काम भी ईमानदारी से करना चाहिए| अब देखिये न आपने अपनी आबरू मेरे हवाले की है तो बदले में मैंने भी रूपये दिये हैं, किसी ने किसी पर अहसान नहींं किया है|"

प्रदीप ने फिर उस पर जहरीले शब्दों का वार करते हुए कहा सीमा जी धन और धोखे में बड़ा गहरा संबंध होता है| दोनोंं की राशि एक ही है| धन की प्राप्ति होने से अक्ल की धार तीखी हो जाती है| अब देखो न आप किशन पर कितना भरोसा करते थे, मगर उसे धन मिला तो उसने आपके साथ ही धोखा कर दिया|

सीमा निरूत्तर खड़ी रही उसे लगने लगा जैसे उसके पाव किसी दलदल पर टिके हुए हैं| जहाँ उसे अपना होना न होना संदिग्ध दिखाई देने लगा| आँखों के आगे धुधलका सा छा गया और रोती बिलखती हुइ वह वहीं फर्श पर ढ़ह गई|

दूसरी तरफ सवेरे जब किशन को होश आया तो उसने सिर में दर्द महसूस किया| आस-पास कोइ न था| एका-एक उसे सीमा का ध्यान आया| वह तेजी से उठ बैठा मगर सामने का दॄश्य देखकर उसकी आंखे फट गई यह एक पुराना लाल छत वाला घर था जो थोडी सी समतल जमीन में अकेला खड़ा है| जिसके आसपास गन्दगी का ढ़ेर नजर आ रहा था| कहीं कोइ आवाज नहीं| एक गन्दे कोने में एक टूटा बेंच था| बायीं ओर देखा तो किशन धक से रह गया उसकी दॄष्टि फर्श पर पड़ी| वहा खून ही खून बिखरा हुआ था निकट ही एक तेज धार वाला चाकू पड़ा हुआ था| किशन की कांपती दॄष्टि कमरे में दौड़ गई| इसके बाद का दॄश्य देखकर तो मानो उसके पावों तले से जमीन ही खिस्क गई| एक ओर सीमा का कटा हुआ सिर रखा था| निकट ही कोहनियों से कटी हुई कलाइयां रखी थीं| कमरे के बीचो-बीच फर्श पर सीमा की हड़िडयों का ढ़ांचा पड़ा था| खाल पूरी तरह जल चुकी थी| हड़िड़यां बिल्कुल काली पड़ चुकी थी| कमरे में देह जलने की एक तीव्र गंध फैली हुइ थी| किशन ने यह गंध महसूस की उसे लगा जैसे वह किसी श्मशान में चिता के पास बैठा हों| उसके भीतर इस गंध ने एक हाहाकार मचा दिया| उसका दिमाग चकरा गया वह टूटे बैंच पर बैठते हुए सिर पकड़कर रो पड़ा| ये सब कैसे हो गया … किसने किया होगा… हे भगवान अब मैं क्या करूं … अचानक उसके दिमाग में आया कि सबसे पहले इस बात की सूचना पुलिस को देनी चाहिए|

वह लगभग भागता हुआ पुलिस चौंकी की ओर बढ़ गया| यहां के इन्चारज इस्पैक्टर ओ• पी• गुप्ता थे जो इस समय अपने केबिन में बैठे हुए किसी फाइल का अध्यन कर रहे थे उनका कद करीब छह फुट का था| वह हॄष्ट-पुष्ट शरीर के मालिक थे और कतॄव्य परायण इस्पैक्टर थे|

अपने केबिन के बाहर किसी के पैरों की चाप सुनकर वह चौक गये और सोचने लगे सवेरे-सवेरे कौन आ टपका| उन्होंने अपनी दॄष्टि थोड़, ऊपर उठाकर दरवाजे पर ड़ाली| दरवाजे पर हवलदार के साथ कोइ अपरिचित युवक खडा था जो कुछ हड़बड़या सा लग रहा था| उसके चेहरे से हवाइयां उड़ रही थी| कुछ देर तक उस युवक को एकटक घूरते रहे| फिर अपनी कड़कदार आवाज में इस्पैक्टर गुप्ता बोले “कहिये कैसे आना हुआ’’

“ज… ज… जी मेरा नाम किशन है’’ किशन ने इस्पैक्टर गुप्ता के समीप आते हुए कहा

फिर उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया और बोला “मैं शान्ति नगर का रहने वाला हूंं ”|

“आप करते क्या हैं’’ इस्पैक्टर ओ• पी• गुप्ता ने अपना पहला प्रश्न किया|

ज… ज… जी मैं अभी पढ़ता हूँ’’ किशन ने अपनी उखडी हुई सांस को नियंत्रित करते हुए कहा “आज सवेरे यानि अब से कुछ देर पहले जब म सोकर उठा तो मेरे सामने एक मुसीबत खडी हो गई उस मुसीबत ने मुझे परेशान कर दिया है इस्पैक्टर साहब मैं कुछ समझ नहींं पा रहा हूंं कि क्या करूं | ’’

“ऐसी कौन सी मुसीबत आ पडी जरा हम भी तो सुनें ’’इंस्पेक्टर ओ• पी• गुप्ता ने अपनापन व्यकत करते हुए बडी प्यार से पूछा|

किशन ने साहस करके सब कुछ सच सच बता दिया|

पूरी बात सुनकर ओ• पी• गुप्ता को एक झटका सा लगा उनका चेहरा कठोर हो गया वह हवलदार को गाड़ी निकालने का इशारा करके कुछ सोचते हुए बोले इसका मतलब जिस कमरे में लड़की का कत्ल हुआ आप भी उसी कमरे में उपस्थित थे|

“जी इंस्पेक्टर साहब’’

“चलो अब मैं उस जगह को देखना चाहता हूँ”

“इस्पैक्टर साहब परन्तु आप मेरी रिपोर्ट तो दर्ज कर लीजिये|’’

“मिस्टर मैं किसी को सबुत नष्ट करने का वक्त नहीं दिया करता घटनास्थल के निरीक्षण के पश्चात् तुम्हारी रिपोर्ट लिख ली जायेगी, फिलहाल तुम मुझे मौका-ए-वारदात पर लेकर चलो|

चार हवलदारों व किशन को साथ लेकर इंस्पेक्टर गुप्ता घटनास्थल पर पहुंचे| कमरे की तलाशी ली हर चीज का निरीक्षण किया व फोरेंसिक लैब के एक्सपर्टस को बुलाया गया|
 
किशन को पुलिस हिरासत में लेकर वापिस पुलिस चौंकी ले जाया गया|

“इस्पैक्टर साहब अब तो आप मेरी रिपोर्ट तो दर्ज कर लीजिये|’’

“मिस्टर किशन अब आप अपने घर का पता व अपनी रिपार्ट दर्ज करवा दीजिये|

“मैं आपकी बात से सहमत हूं मुझे कागज और पैन दीजिये ’’ किशन ने हाथ बढ़ते हुए कहा|

“आप उसकी चिन्ता न कीजिये मैं अभी लिखता हूँ|’’ इंस्पेक्टर गुप्ता का ईशारा पाकर हवलदार ने एक बड़ा सा कोरा कागज निकालकर रिपोर्ट दर्ज कर ली|

“यह लीजिये’’ हवलदार ने कागज और पैन दोनोंं चीजें किशन की ओर बढ़ा दी|

किशन ने अपने घर का पता लिखकर कागज और पैन हवलदार की ओर बढ़ा दिया|’’

“अब तुम ये बताओ तुमने ये खून क्यों किया” इंस्पेक्टर गुप्ता ने घूर्राकर पूछा|

“मैने खून नहीं किया सर”

लेकिन ऐसा हरगिज नहींं हो सकता किसी की उपस्थिति में उसी के कमरे में खून हो जाये और उसे पता भी न चले… मुझे लगता है तू झूठ बोल रहा हैं तूने खुद उस लड़की का कत्ल किया है और अब आप सजा से बचने के लिए रिपोर्ट लिखवाने यहां आया हैं लेकिन तू बच नहींं पायेगा| कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं मिस्टर अब भी समय है तू बता दे तूने उस लड़की को क्यों मार ड़ाला| मैं तेरी सजा कम करा दूंगा|’’

मैने उसे नहीं मारा इंस्पेक्टर साहब, अगर मैं उसे मारता तो आपके पास रिपोर्ट लिखवाने कभी नहींं आता, मैं इतना मूर्ख नहींं हूँ बल्कि मैं तो पढा लिखा हूंं और एक सभ्य परिवार से ताल्लुक रखता हूंं|

लेकिन यह कैसे हो सकता है किसी की उपस्थिति में यह सब … मैं तेरी बात पर कैसे भरोसा करू, जरा सोच अगर मेरी मौजूदगी में ऐसा कुछ हो रहा हो तो क्या मैं उसे रोकूंगा नहींं|

अवश्य रोकते सर, और मैं भी अवश्य रोकता परन्तु जिस समय यह घटना हुइ उस समय मैं शराब के नशे में बहोश पडा था इसलिए मुझे इसके बारे में बिल्कुल भी पता नहींं चला| सवेरे जब होश आया तब खून हो चुका था|

“हैलो कैथल पुलिस स्टेशन हैलो’’

“हैलो हम ! शान्ति नगर पुलिस चौंकी से बोल रहे हैं ’’ दूसरी ओर से आवाज उभरी

“क्या खूनी के बारे में कुछ पता चला’’

“सर हमने शक के बिनाह पर एक युवक को गिरफ्तार किया है जिसका नाम किशन है जो ! शान्ति नगर की रहने वाला है अभी उससे पूछताछ जारी है वैसे हमने पूरी छानबीन कर ली है मरने वाली लड़की का नाम सीमा था तथा वह भी ! शान्ति नगर की रहने वाली थी जहांं वह

अपनी माँ के साथ रहती थी| दोनों के घरवालों को सुचना भेज दी गई है, हमने वारदात की जगह को अपने कब्जे में लेकर छानबीन शुरू कर दी है’’ दूसरी ओर से आवाज आयी|

“ओ के… ओ के आप इस केस की अच्छी तरह से छानबीन करें” इतना कहने के बाद लाइन कट कर दी गई|

फोन रखते ही इस्पैक्टर गुप्ता अपनी कुर्सी से उठ गये तथा मेज पर रखी कैप सिर पर लगाते हुए बोले तुमने सूचना रजिस्टर में दर्ज कर ली|

“हां सर ’’दीवान अदब के साथ बोला|

तो फिर मैं श्रीहरिनारायण घी वालों के पास जा रहा हूँ इस केस की छानबीन करने|’’ कहकर इंस्पेक्टर गुप्ता उस और चल दिये जहां उनकी मोटरसाइकिल खडी थी|

मोटरसाइकिल के समीप पहुंचकर उन्होंने उसे किक लगाकर स्टार्ट किया फिर उस पर बैठकर श्रीहरिनारायण घी वालों की दुकान की ओर चल पडी |

इंस्पेक्टर गुप्ता ने अपनी मोटरसाइकिल उनकी दुकान के सामने जाकर रोक दी| पुलिस हमारी दुकान पर … कुलदीप अभी इतना सोच ही पाया था कि इंस्पेक्टर गुप्ता ने मोटरसाइकिल स्टैण्ड़ पर खड़ी की फिर काउन्टर के समीप आकर बोले सेठ जी मुझे आपसे कुछ बातें करनी है|

“तशरीफ रखिये इंस्पेक्टर साहब” कुलदीप ने काउन्टर के सामने पडी बैंच की ओर इशारा करते हुए कहा फिर स्वयं भी काउन्टर के अन्दर पडी कुर्सी पर बैठ गया|

“क्या आप किशन को जानते हंै’’ इंस्पेक्टर गुप्ता ने बैंच पर बैठते हुए कहा |

“किशन तो मेरा छोटा भाई…क्यों क्या हुआ उसें”

उसे एक लड़की के कत्ल के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है

“क… क… क्या’’ कुलदीप चौंकते हुए बोला यह आप क्या कह रहे हैं इंस्पेक्टर साहब… मेरा भाई ऐसा नहींं हैं जरूर कुछ गड़बड़ है… किशन तो किसी चींटीं को भी नहीं मार सकता… वो तो किसी को कत्ल कर ही नहीं सकता ’’

“मैं बिल्कुल सही कह रहा हूँ सेठ जी बल्कि यह तो “रेयरेस्ट आफ दा रेयर” केस है क्योंकि कत्ल करने के बाद लड़की के हाथ और सिर को काटकर जिस्म से अलग कर दिया है| इस कत्ल के लिए कम से कम सजा “सजा-ए-मौत” होगी”

“नहीं ये झूठ है… या तो कोइ ओर होगा या मेरे भाई को किसी षड्यंत्र मे फंसाया जा रहा है|”

“मुझे आपको मामले से अवगत कराना था… अच्छा अब मैं चलता हूँ यदि आपको अपने भाई के सम्बन्ध में कोइ कानूनी कार्यवाही करानी हो तो शीघ्र पुलिस स्टेशन आ जाइये| इंस्पेक्टर गुप्ता ने इतना कहा फिर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ कर चल पडी |
 
कुलदीप ने जल्दी से दुकान बंद की तथा घर पहूंचकर अपने पिता श्रीहरिनारायण को पूरे मामले से अवगत कराया|

यह सोच कर श्रीहरिनारायण का सिर शर्म से झुकता चला गया कि उनके अपने बेटे ने ही उनके खान्दान के नाम पर धब्बा लगा दिया| श्रीहरिनारायण ने सबके सामने घोषणा करते हुए किशन को मन और आत्मा से त्याग दिया|

यह एक ऐसी शर्मनाक खबर थी जो अभी तक परिवार और मौहल्ले तक सीमित थी मगर जल्द ही जंगल की आग की तरह इसकी लपटें हर तरफ उठने लगेंगी|

एक घर के सामने जाकर इंस्पेक्टर गुप्ता ने अपनी मोटरसाइकिल रोक दी|

इंस्पेक्टर गुप्ता ने ड़ोर बैल बजाई मगर कोइ उत्तर न मिला| उन्होने फिर ड़ोर-बैल बजाई|

इस बार सीमा की माता निर्मला देवी ने दरवाजा खोला| वह पलिस को देखकर चौंक गई थी

“आप सीमा की माता हैं…”|

“जी कहिये” हड़बड़ाहट भरे लहजे में निर्मला देवी ने कहा|

“जी मुझे बड़े दु:ख के साथ आपको सूचित करना पड़ रहा है कि आपकी बेटी सीमा का कत्ल हो गया है|

“क… क… क्या’’ निर्मला देवी की आंखों में सारा संसार अंधेरा हो गया था|

“मगर वो तो … किशन भी तो उसके साथ था इंस्पेक्टर साहब फिर कैसे…| “

“जी आप सही कह रही हैं, हमने किशन को सीमा के कत्ल के जुर्म में गिरफ्तार किया है,”|

“मगर किशन… कैसे … नहीं… नहीं इंस्पेक्टर साहब किशन ऐसा लड़का नहीं है,”|

“मैड़म हमने उस पार्टी में उपस्थित लोगों से पूछताछ की है और सबका यही कहना है सीमा उसके साथ ही वहां से निकली थी”|

बस मुझे आपको यही सुचित करना था, यदि आपको अपनी ओर से कोइ रिपोर्ट करानी हो तो शीघ्र पुलिस स्टेशन आ जाइये| अच्छा अब मैं चलता हूँ इंस्पेक्टर गुप्ता ने इतना कहा फिर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ कर चल पडा |

निर्मला देवी की आखों के सामने उसके बीते वर्ष गुजरने लगे| जब उसके पति की मॄत्यु हो गई थी| घर में कोइ सम्पत्ति न थी| उनका तीन कमरों का वह घर जिसे उन्होंने घर के खर्चे और बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के बाद थोडी–थोडी बचत करके तीन–चार किश्तों में पूरा करवाया था| उस निर्धन घर में वह अकेली पड़ी रोती थी और कोइ आंसू पोंछने वाला न था| उसने न जाने किन तकलीफों से अपने बच्चे को पाल-पोस कर बड़ा किया था| मगर बच्चे पढ़ने में होशियार थे, इसलिए उनकी चिंता उसे नहींं थी| पढाई के साथ–साथ उनका आचरण भी ऐसा था कि कभी उन्हें किसी कठिनाई का सामना नहींं करना पडा| स्कूल की पढाई समाप्त कर वह कालिज में चले गए तब भी निर्मला देवी ने घर का खर्च चाहे कम कर दिया लेकिन बच्चों की पढाई में उसने कोइ कमी नहींं छोडी |
 
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