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Romance हरसिंगार/रानु

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__'ठीक है।' मार्तण्ड सिंह ने खड़े होते हुए सख्ती से कहा, तुम जा सकते हो उस लड़की के पास, जाकर अपना मुंह काला कर सकते हो, परन्तु एक बात याद रखना, तुम उसके पास जाने के बाद मेरा मुंह कभी नहीं देखोगे।' 'आपका ही नहीं, यह मेरा मुंह भी नहीं देखेगा।' 'मां धृणा से कह रही थी, डससे पहले कि आप पर कोई उंगली उठाए, कुल की मान-मर्यादा सदा के लिए मिट्टी में मिले, मैं जहर खा लूंगी।' मार्तण्ड सिह की पत्नी की बातों में दृढ़ निश्चय था।

'मां ... चंद्रभाल मां का निश्चय सुनकर कांप उठा। पिता की बात सुनकर उसे पहले ही झटका लग चुका था। 'मत ले अपने इन होंठों से मेरा नाम, जिन पर केवल उस पापिन कां ही नाम लिखा हुआ है।'

मां ने उसकी बात काटते हुए उसे टोक दिया, 'यदि मुझे मां कहना है तो मेरी ममता का भी पूरा-पूरा आदर करना होगा। तुझे रजनी को सदा के लिए अपने दिल से निकालना होगा।' मां की ममता ने अपने बेटे को मानो एक चुनौती दी थी। मार्तण्ड सिंह की पत्नी ने अपनी बात समाप्त की और कमरे से बाहर निकल गईं।

___ मार्तण्ड सिंह ने बेटे को क्रोध से देखा, जिसने अपनी मां को इतनी बड़ी चोट पहुंचाई थी। वह भी अपनी धर्मपत्नी के पीछे चले गए। चंद्रभाल सन्त रह गया। यह क्या हो गया, उसने तो कभी सोचा भी नहीं था कि उसके माता-पिता उसके सामने ऐसी भी शर्त रख देंगे।

नौकरों ने अपने छोटे मालिक को चिन्तामग्न देखा तो कमरे से बाहर निकल गए।

जानते थे कि छोटे मालिक को एकांत की आवश्यकता है। छोटे मालिक को ऐसी स्थिति में अकेले ही छोड़ देना अच्छा था।

चंद्रभाल के सिर का चक्कर बढ़ने लगा तो वह वहीं पलंग पर लेट गया। दूसरी ओर करवट लेकर वह अपनी मजबूरियों पर ध्यान देने लगा। वह रजनी को लेने नहीं गया तो क्या वह उसकी प्रतीक्षा में तड़प-तड़पकर अपनी जान नहीं दे देगी? चंद्रभाल के बिना क्या रजनी का जीवन सूना और अंधकारमय नहीं बन जाएगा? अपने चंद्रभाल के बिना उसका दामन क्या आंसुओं से तर नहीं होता रहेगा?

चंद्रभाल उसी प्रकार आंखें बंद किए पड़ा रहा और रजनी के लिए सोचता रहा, अपनी मजबूरियों पर आंसू बहाता रहा और अन्दर-ही-अन्दर तड़पता रहा। उसे इस प्रकार पड़े-पड़े काफी समय हो गया। शाम होने को आ गई। कमरे में अंधकार की हल्की धुंध फैल गई, परन्तु उसे किसी भी बात की खबर नहीं थी। उसके मन और मस्तिष्क पर केवल रजनी छाई हुई थी-जीवन का अंधकार बनकर। इस अंधकार में उसे कुछ भी नहीं दिखाई देता था। केवल रजनी ही थी-चारों ओर।

सहसा चंद्रभाल ने अपनी आंखें खोलीं। आखें खोले वह उसी प्रकार पड़ा रहा, परन्तु तभी वह चौंक गया। कमरे की धुंध में उसके सामने अंशु बैठी हुई थी-बहुत खामोश। जाने कब वह चली आई थी और उसे आहट तक नहीं मिली, अपने विचारों में चंद्रभाल इतना तल्लीन था कि उसे अंशु के आने का पता ही नहीं चला था।

मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी के चले जाने के कुछ देर बाद ही अंशु अस्पताल में पहुंची थी तो बरामदे में चिन्तित खड़े नौकरों ने उन्हें पहले ही बता दिया कि कुछ देर पहले कमरे के अंदर बड़े मालिक, मालकिन तथा छोटे मालिक के बीच क्या घटना घटी थी।

सारी बातें सुनने के बाद निर्भय सिंह ने ऐसी सांस ली थी, मानो उनके सिर पर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया था। वह जानते थे कि चंद्रभाल ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसके कारण उसके माता-पिता संसार को मुंह न दिखाने के लिए अपनी जान दे दें। अब ।

चंद्रभाल को अंशु का बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। चंद्रभाल रजनी से अलग रहकर कुछ दिन तड़पेगा, रोएगा, एकांत में आंसू भी बहाएगा, परन्तु धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।

मनुष्य को परिस्थितियों से मेल करना ही पड़ता है। न करे तो उसका जीवित रहना कठिन हो जाए। रजनी को भूलने के बाद चंद्रभाल को एक नया जीवन स्वीकारना ही पड़ेगा। तब उसे प्यार की आवश्यकता पड़ेगी और यह प्यार उसे केवल अंशु ही दे सकती हैं-उनकी बेटी! आखिर मार्मण्त सिंह ने अपना वचन निभाने में कोई कमी नहीं रखी। उनकी धर्मपत्नी ने भी अंशु के प्रति अपना प्यार सिद्ध कर दिखाया। अब रजनी को चंद्रभाल से दूर करने के लिए चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं थी। जिस काम को करने के लिए वह परेशान रहा करते थे, उसे चंद्रभाल के माता-पिता ने कर दिखाया था -अपना एक ही निर्णय देकर, एक ही शर्त रखकर। रजनी के अपहरण का जोखिम उठाने की अब उन्हें कोई आवश्यकता नहीं थी 1 रजनी का अपहरण चंद्रभाल के कुसुम्पटी पहुचने से पहले ही वह कैसे करते, वह स्वयं नहीं जानते थे। वह तो केवल अब तक उपाय ही सोच रहे थे। रजनी का अपहरण उसी के गांव जाकर करना आसान नहीं था, परन्तु अब उन्हें उसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। हां, उन्हें अफसोस अवश्य हुआ कि किसी बहाने रजनी का अपहरण हो जाता तो वह उसके द्वारा अपनी वासना की उस प्यारा को अवश्य बुझा लेते, जो उसे पहली ही बार देखने के बाद उनके अंदर उत्पन्न हो गई थी।
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
निर्भय सिंह ने इस समय चंद्रभाल के पास जाना उचित नहीं समझा था। कमरे में उन्होंने अंशु को भेज दिया था। चंद्रमाल के माता-पिता की शर्त सुनकर अंशु को अपने प्यार की सार्थकता की आशा बंध गई थी, परन्तु उसे इससे कोई प्रसन्नता नहीं हो सकी थी। प्रसन्नता तब होती, जब उसे चंद्रभाल स्वयं अपनाने को तैयार होता, अपनी इच्छा से, रजनी को भूलकर तब वह अपने निःस्वार्थ प्यार के कारण चंद्रभाल को क्षमा करते हुए उसका अतीत भूल सकती थी, भूलकर वह प्रसन्नता प्राप्त कर सकती थी तथा उस पर जी-जान से निछावर होकर उसे भी प्रसन्नता प्रदान कर सकती थी। अपने माता-पिता की इच्छा भी पूरी करते हुए तो चंद्रभाल अपना दिल नहीं, अपना शव उसके सुपुर्द करेगा।

चंद्रभाल ने अंशु को देखा तो उठकर बैठ गया।

अंशु ने चंद्रभाल से कोई बात नहीं। चंद्रभाल भी खामोश ही रहा। दोनों में मानो खामोश रहने का इकरार हो चुका था। दोनों ही एक-दूसरे के दिल की स्थिति समझते थे। चंद्रमाल अंशु का अपराधी था, रजनी से प्यार करने का अपराधी, उसकी याद में तड़पने का अपराधी, उसे कभी न भूल सकने का अपराधी, यही कारण था कि चंद्रभाल खामोश था। अंशु के खामोश रहने का कारण था उसकी हार-प्यार की दौड़ में वह हार रही थी-हार चुकी थी। फिर भी वह अनिच्छा से दौड़ रही थी-हारने के लिए-शायद हारकर जीतने के लिए। कैसा था उसका यह प्यार! कितना अनूठा, अनुपम और निःस्वार्थ।

परन्तु उस रात निर्भय सिंह ने जमकर खाना खाया। जमकर शराब पी। अपनी दावत आप करके मानो वह स्वयं में ही आनन्द उठा रहे थे। चंद्रभाल के सामने रखी मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी की शर्त ने उन्हें सारी चिन्ताओं से मुक्त करके संसार की सबसे बड़ी प्रसन्नता उपलब्ध करा दी थी।

उस दिन दोबारा मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी चंद्रभाल के पास अस्पताल नहीं गए। दोनों ने खाना भी नहीं खाया। अंशु ने अपनी कोठी पहुंचने के बाद फोन द्वारा चंद्रभाल की दर्दनाक स्थिति बता दी थी। यह भी बता दिया था कि चंद्रभाल ने कुछ नहीं खाया। यह सुनकर उनकी भूख मर गई थी। मार्तण्ड सिंह ने शराब का सहारा लिया और सो गए, परन्तु उनकी धर्मपत्नी को एक क्षण भी नींद नहीं आई। जोश में आकर उन्होंने बेटे की। प्रसन्नताएं, उसका सुख-चैन अपने कदमों तले रौंदते हुए जो शर्त रखी थी, अब वह शर्त स्वयं उनका सुख-चैन छीन बैठी थी। तीन दिन बीत गए। तीन के अंदर ही मानो चंद्रभाल का शरीर एक लाइलाज बीमारी का शिकार बन गया। स्वास्थ्य एकदम से गिर गया। गालों की हड्डीयां उभर आई। आंखें अंदर को धंस गइ। जीवन सदा के लिए नासूर बन गया था, क्योंकि अपने प्यार के स्वार्थ के लिए उसके अंदर माता-पिता की शर्त तोड़कर उनकी मृत्यु का जिम्मेदार बनने का साहस नहीं उत्पन्न हो सका था। उसने अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर माता-पिता की इच्छा के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था। उसने तय कर लिया था कि यदि रजनी से उसका विवाह नहीं होगा तो किसी के साथ नहीं होगा।

किसी बात का उसे अब होश नहीं रहता। कभी कुछ खाया, तो कभी कुछ भी नहीं। पहला सारा दिन बिना कुछ खाए-पिए ही निकल गया था। दाढ़ी बढ़ गई थी। उलझी लटों को कभी संवारा तो केवल उंगलियों से। तीन ही दिन में जीवन से मन उकता गया था। फिर भी वह जिए जा रहा था-एक शव के समान, क्योंकि उसके जीवन पर माता-पिता का जीवन निर्भर करता था। तीन दिन से उसके माता-पिता उसे देखने नहीं आए थे, परन्तु उसे उनके दिलों की स्थिति ज्ञात थी। उनकी तड़प का उसे अनुमान था। कोठी का कोई-न-कोई नौकर उसके पास दिन-रात अवश्य रहता था। नौकरों द्वारा ही उसे अपने माता-पिता के विषय में ज्ञात होता रहता था।



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परन्तु मार्तण्ड सिंह तथा उनकी धर्मपत्नी तीन दिन से अस्पताल नहीं आ रहे थे। बेटे के स्वास्थ्य की चिन्ता उन्हें भी थी। एक ही संतान है। कुछ हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। परन्तु जब निर्भय सिंह आते तथा बताते कि अंशु चंद्रभाल के पास घंटों बैठी रहती है, दोनों आपस में बैठे बातें करते रहते हैं तो उन्हें संतोष मिल जाता था। स्वास्थ्य के विषय में भी वह उन्हें समझा देते थे -घाव गहरा है, भरने में तो समय लगेगा ही। अंशु का चंद्रभाल के पास पहुंच जाना ही मार्तण्ड सिह तथा उनकी पत्नी के संतोष के लिए बहुत था।

अंशु भी मानो एक लाश थी। उसकी जान, उसकी आत्मा तो चंद्रभाल में अटकी हुई थी। शायद इसी संबंध के सहारे उसने अज्ञात तौर पर चंद्रभाल की समीपता प्राप्त करके उसका दिल जीतने की आशा कर ली थी। जिस शाम चंद्रभाल को उसके माता-पिता ने अपना निर्णय सुनाकर उसका दिल तोड़ दिया था, उस दिन तो अंशु ने चंद्रभाल से कोई बात नहीं की थी, परन्तु पिछले दो दिनों से उसकी बातें चंद्रभाल से थोड़ी बहुत होने लगी थी।

चौथी शाम चंद्रभाल अंशु से बातें करते-करते दीवानों के समाज रजनी का विषय ले आया। अंशु के दिल पर आरे चल गए। चंद्रभाल ने अपने होंठों से निकलती आहों के मध्य भावुकता में बहकर अंशु को बता दिया-वे सारी बातें, जो रजनी के साथ वह करता था, वे सारे ही क्षण जो उसने रजनी की संगति में बिताए थे-रजनी आरंभ से ही एक खामोश स्वभाव की लड़की थी, उसका प्यार बचपन का प्यार है, कैसे रजनी ने उसे लॉन का सबसे सुन्दर फूल तोड़कर भेंट करना आरंभ किया, किस प्रकार वह फूल स्वीकार करता था, फूल की सुगन्ध रजनी की सांसों की सुगन्ध बनाकर अपने दिल की गहराई में उतारता था तथा उनके जीवन में हरसिंगार का महत्व क्या था।

अंशु ने सुना तो उसे ऐसा लगा, मानो चंद्रभाल ने उसकी छाती चीरकर दिल बाहर निकाल लिया है। उसी की आंखों के सामने वह उसके दिल को छुरी द्वारा काटकर टुकड़े-टुकड़े कर रहा है।

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'अंशु!' चंद्रभाल अपनी दीवानगी में अंशु के दिल की तड़प से अज्ञात कह रहा था, 'लंदन से लौटने के बाद हम हर रात ही मिलते थे। मैं रजनी को अपने कमरे में ले आता था। तब मेरे कमरे की बत्ती बुझी होती थी। कमरे में पहुंचकर ही हम दोनों एक-दूसरे की बांहों में समाकर..।' अशु से अब और अधिक सुना नहीं जा सका। उसने तुरंत अपने दोनों कानों पर अपनी हथेलियां रखकर बहुत सख्ती के साथ दबा दीं। चंद्रभाल का स्वर भुनभुनाहट में परिवर्तित हो गया। अंशु ने अपनी आखें भी बंद कर लीं। अपनी सांसों को भी उसने रोक लिया। आंसू थे कि बंद पलकों से बहते ही जा रहे थे। गला भी सूख चला था। चंद्रभाल की बातों ने उसके दिल के अंदर असहनीय तड़प उत्पन्न कर दी थी1 तड़प चीख-चीखकर कह रही थी-अब बस करो, अब बस करो, एक नारी के प्यार की इतनी बड़ी परीक्षा मत लो, वरना उसके सब्र का दामन फट जाएगा। कुछ भी नहीं बचेगा उसके पास, अपने निस्वार्थ प्यार के सहारे तुम्हें देने के लिए।

चंद्रभाल ने अंशु को अपने कानों पर हथेलियां रखे देखा तो अचानक उसे होश आया। अंशु की बंद पलकों के नीचे उसने आंसुओं की धारा देखी तो उसे अपने दीवानेपन का अहसास हुआ। वह यह क्या कर बैठा? अंशु से ऐसी बातें कहकर उसने क्यों उसका दिल जला दिया? क्या अब तक उस पर किए गए अत्याचार से उसका मन नहीं भरा है? उसे अपनी गलती का सख्त अफसोस हुआ। कुछ भी हो, अंशु उसे प्यार करती है। अंशु का प्यार निःस्वार्थ है। उसे उससे ऐसी बातें किसी भी स्थिति में नहीं करनी चाहिए थी। अपने किए पर वह लज्जित हुआ। अंशु के आंसू देखकर उसके मन में टीस उठी तो भावनाएं विकल होकर उसकी आंखें छलक गई।
 
चंद्रभाल ने अंशु को अपने कानों पर हथेलियां रखे देखा तो अचानक उसे होश आया। अंशु की बंद पलकों के नीचे उसने आंसुओं की धारा देखी तो उसे अपने दीवानेपन का अहसास हुआ। वह यह क्या कर बैठा? अंशु से ऐसी बातें कहकर उसने क्यों उसका दिल जला दिया? क्या अब तक उस पर किए गए अत्याचार से उसका मन नहीं भरा है? उसे अपनी गलती का सख्त अफसोस हुआ। कुछ भी हो, अंशु उसे प्यार करती है। अंशु का प्यार निःस्वार्थ है। उसे उससे ऐसी बातें किसी भी स्थिति में नहीं करनी चाहिए थी। अपने किए पर वह लज्जित हुआ। अंशु के आंसू देखकर उसके मन में टीस उठी तो भावनाएं विकल होकर उसकी आंखें छलक गई।

अंशु ने अपने कानों में चंद्रभाल के स्वर की भुनभुनाहट नहीं सुनी तो उसने अपनी पलकों को डरते-डरते खोल दिया। चंद्रभाल के होंठ स्थिर थे। वह उसी को देख रहा था-पश्चात्ताप की दृष्टि से। उसने अपने कानों पर से हथेलियां हटा लीं। रोकी हुई सांस छोड़ दी।

_ 'अंशु चंद्रभाल ने कहा। उसका स्वर भर्रा रहा था। उसने मानो दिल से हाथ जोड़कर विनती की। बोला, मुझे क्षमा कर दो। मुझे क्षमा कर दो अंशु, मुझे तुमसे ऐसी बातें हर्गिज नहीं करनी चाहिए थी। मैं दीवाना हूं ना! मैं बहक गया था।

अंशु को ऐसा लगा, मानो चंद्रभाल ने क्षमा मांगकर अपने अतीत को ठुकरा दिया है। उसके दिल का मलाल, उसके दिल का गुबार निकल चुका है। अब वह कभी अपने अतीत में नहीं डूबेगा। उसके दिल को एक शांति-सी । मिली। वह अपने आंसू पोंछती हुई मुस्करा दी। मुस्कराकर उसने आशा कर ली, शायद उसका प्यार चंद्रभाल को नया जीवन प्रदान कर दे। चंद्रभाल के नए जीवन में उसकी अपनी भी तो कितनी ढेर सारी अभिलाषाएं पूरी होने की प्रतीक्षा कर रही थीं।

अगले दिन सुबह अंशु चंद्रभाल के पास पहुंची तो कमरे का वातावरण परेशान था। डाक्टर चंद्रभाल को इंजेक्शन लगा रहा था। समीप ही नर्स खड़ी थी। कोठी का नौकर एक किनारे खड़ा आंसू बहा रहा था। अंशु ने देखा तो एक अज्ञात भय के कारण उसका दिल बहुत जोर से धड़क उठा। उसने चंद्रभाल को ध्यान से देखा। वह बेहोश पड़ा था। अंशु के दिल की धड़कन तेज हो गई। नौकर को वह तुरंत बाहर ले गई। चिन्तित होकर उसने पूछा, 'छोटे मालिक को क्या हो गया है?'

'बेहोश हो गए हैं मालकिन! नौकर ने एक सिसकी लेने के बाद कहा, 'रात भर करवटें बदलते रहे। कभी-कभी उठकर बैठ भी जाते। उठकर कमरे में टहलने भी लगते। अचानक एक कुर्सी पर बैठकर वह आंसूओ तथा हिचकियों के साथ रो पड़े। मालकिन, इस प्रकार किसी पुरुष को रोते मैंने आज तक नहीं देखा। मैंने डाक्टर को बुलाना चाहा तो मना कर दिया।'

अंशु ने अपनी स्थिति, पर काबू पाते हुए पूछा, 'तुमने कोठी पर फोन किया है या नहीं?'

वह तो मैंने पहले ही कर दिया है मालकिन! नौकर ने कहा, 'मालिक-मालकिन तो अब वहां पहुंचने ही वाले होंगे। डाक्टर साहब ने उन्हें तुरंत बुलाने की मुझे आज्ञा दी

थी।'

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सहसा कमरे से निकलकर डाक्टर वहां आ पहुंचा। उसने अंशु को देखा। अंशु की परेशानी को उसने समझने का प्रयत्न किया तो उसे दुःख हुआ। दुःख इसलिए हुआ, क्योंकि अपने रोगी के इलाज के लिए वह जो भी पग उठा रहा था, वह अंशु के पक्ष में जरा भी नहीं जाता था। उसने नौकर से कहा, 'मरीज के घर वाले जैसे ही आएं, उन्हें मेरे पास भेज देना।'

'जी साहब! नौकर ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा।

डाक्टर चला गया। जाते-जाते अंशु को असमंजस में डाल गया। डाक्टर क्यों चंद्रभाल के माता-पिता से मिलना चाहता है? क्या चंद्रभाल की स्थिति बहुत गंभीर है? उसने इस गंभीरता के विषय में अपने पिताजी को भी सूचित कर देना उचित समझा, परन्तु इससे पहले वह चंद्रभाल को देख लेना चाहती थी। वह कमरे की ओर बढ गई।

कमरे में प्रविष्ट हुई तो नर्स एक ओर खड़ी अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख रही थी। शायद उसे किसी बात की प्रतीक्षा थी। अंशु ने चंद्रभाल के मस्तक पर अपनी हथेली रखी। उफ्! चंद्रभाल का शरीर अता-समान तप रहा था। ऐसा लगता था, मानो चंद्रभाल अपनी ही आग में जलकर भस्म हो जाएगा। अंशु ने अपनी हथेली हटा ली। चंद्रभाल के प्रति उसका दिल सहानुभूति से भर गया। उसने नर्स से पूछना चाहा कि चंद्रभाल को कब तक होश आएगा, परन्तु तभी द्वार का पर्दा हटाकर कमरे में मार्तण्ड सिंह तथा उनकी पत्नी प्रविष्ट हो गए।

वे दोनों बेटे की गंभीर स्थिति की सूचना मिलते ही आगे चले आए थे। दोनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थीं। बेटे को देखा तो दंग रह गए। ऐसा लगता था, मानो तीन ही दिन में बेटे के शरीर को धुन लग गया हो। उनके सामने हड़ियों का एक ढांचा पड़ा था। मां का कलेजा मुंह को आ गया। मार्तण्ड सिंह को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनके अत्याचार का शिकार होकर बेटे की स्थिति यहां तक पहुंच जाएगी। उनकी धर्मपत्नी ने बेटे की छाती से लिपट जाना चाहा, परन्तु तभी नर्स ने उन्हें मना कर दिया। अंशु ने भी उन्हें सहारा देने के लिए तुरंत पकड़ लिया। उन्हें वहीं कुर्सी पर बिठाया तो वह अपने मस्तक पर मुट्ठी मारती हुई सिसक पड़ी। वह क्यों इतनी कठोर बन गई थीं? क्यों अपने बेटे को इतने दिन तक देखने नहीं आई? क्यों उसे उसके प्यार की इतनी बड़ी सजा दी? यही करना था तो उन्होंने उसके उत्पन्न होते ही क्यों नहीं उसका गला घोंट दिया? कभी कोई मां भी इतनी निष्ठुर होती हे?

'डाक्टर ने कहा है कि आप जैसे ही आएं उनसे तुरंत जाकर मिल लें। अंशु ने सहसा दबे स्वर में मार्तण्ड सिंह से कहा।

'ओह !' मार्तण्ड सिंह ने कहा, 'जाऊं, मिल लूं। पता नहीं क्या बात हो!' मार्तण्ड सिंह पलटे और कमरे से बाहर निकल गए।

अंशु ने मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी के समीप एक कुर्सी सरकाई और उस पर बैठ गई। स्वयं तसल्ली की भूखी थी, परन्तु उन्हें तसल्ली देने लगी। गमों की ऐसी भी एक रीति है, जब मनुष्य को दूसरों के आंसू पी लेने पड़ते

कुछ ही देर में मार्तण्ड सिंह लौट आए। अंशु खड़ी हो गई। मार्तण्ड सिंह को उनकी पत्नी तथा अंशु ने इस प्रकार देखा, मानो डाक्टर के बुलाए जाने का कारण पूछ रही हों। मार्तण्ड सिंह एक कुर्सी पर बैठते हुए मद्धिम स्वर में बोले, डॉक्टर एक इमरजेंसी केस अटेण्ड करने चले गए हैं, इसलिए भेंट नहीं हो सकी। थोड़ी देर बाद फिर जाऊंगा।' सहसा चंद्रभाल ने एक गहरी सांस ली, इस प्रकार मानो एक लम्बी नींद के बाद वह जाग रहा हो। उसने अपने होंठों को खोला-बंद किया-सूखे-सूखे होत-पपड़ियां जमी हुई थीं। मां तुरंत उठ खड़ी हुई। मार्तण्ड सिंह तथा अंशु भी खड़े होकर चंद्रभाल के समीप आ गए। चंद्रभाल ने मां को देखा। मां के आंसुओं में उसी के प्रति तड़प थी। दृष्टि में उसी के प्रति ममता थी।
 
कुछ ही देर में मार्तण्ड सिंह लौट आए। अंशु खड़ी हो गई। मार्तण्ड सिंह को उनकी पत्नी तथा अंशु ने इस प्रकार देखा, मानो डाक्टर के बुलाए जाने का कारण पूछ रही हों। मार्तण्ड सिंह एक कुर्सी पर बैठते हुए मद्धिम स्वर में बोले, डॉक्टर एक इमरजेंसी केस अटेण्ड करने चले गए हैं, इसलिए भेंट नहीं हो सकी। थोड़ी देर बाद फिर जाऊंगा।' सहसा चंद्रभाल ने एक गहरी सांस ली, इस प्रकार मानो एक लम्बी नींद के बाद वह जाग रहा हो। उसने अपने होंठों को खोला-बंद किया-सूखे-सूखे होत-पपड़ियां जमी हुई थीं। मां तुरंत उठ खड़ी हुई। मार्तण्ड सिंह तथा अंशु भी खड़े होकर चंद्रभाल के समीप आ गए। चंद्रभाल ने मां को देखा। मां के आंसुओं में उसी के प्रति तड़प थी। दृष्टि में उसी के प्रति ममता थी।

चंद्रभाल ने अपने पिताजी को देखा। वह भी तो उसके प्रति कितना अधिक चिन्तित थे। अपनी पत्नी की तड़प देखकर उनकी पलकों के कोने भी भीग गए थे। उन्होंने चंद्रभाल के सिर पर प्यार से हाथ रखा, इस प्रकार मानो दिल-ही-दिल में उसे आशीर्वाद दे रहे हों, फिर उन्होंने हां के संकेत पर सिर हिलाया, इस प्रकार मानो अपने बेटे को धैर्य रखने के लिए सांत्वना दे रहे हों। उन्हें अपने बेटे के दिल की तड़प का पूरा अनुमान था।

अपने माता-पिता की चिन्ता देखकर चंद्रभाल की आखें छलक आइं। उनका प्यार देखकर उसका दिल भर आया। उनके दिल में

अपने प्रति तड़प देखकर वह स्वयं तड़प उठा। उसने क्यों अपने माता-पिता को इतना सताया। क्यों रुलाया? कितने प्यार से उन्होंने उसे पाला था, उसकी सभी इच्छाएं तो पूरी की थी। फिर क्यो नहीं वह भी उनकी एक इच्छा पूरी करता? केवल एक ही तो उन्होंने इच्छा की थी और वह उसे भी पूरा नहीं कर सका? उसने तय कर लिया, अपने माता-पिता की इच्छा के आगे झुकते हुए वह उनकी एक नहीं सारी ही इच्छाएं पूरी करता रहेगा।

वह रजनी को कभी नहीं भूल सकता, फिर भी उसे भूलने का प्रयत्न करते हुए वह एक नया जीवन आरंभ करेगा। नये जीवन के सहारे के लिए उसने अंशु को देखा। वह भी तो उसके लिए बहुत चिन्तित रहती है। जानती है कि वह रजनी को प्यार करता है, फिर भी उसे प्यार किए जा रही है, अपने भविष्य से निश्चिन्त

परिणाम की कोई परवाह किए बिना। क्या उसे अपने जीवन में ऐसी महान लड़की मिल सकती है? क्या एक नारी का रूप इतना महान भी हो सकता है? पिछले दिन के समान इस समय वह फिर पछताया। वह क्यों इस लड़की का दिल दुखाता रहता है? क्यों अपनी दीवानी हरकतों द्वारा यह सिद्ध करता रहता है कि वह रजनी के बिना जीवित नहीं रह सकता?

उसने इरादा कर लिया-पक्का इरादा-कि रजनी को उसके भाग्य पर छोड़कर वह अंशु को अपनी चंद्राशु बना लेगा। शायद इस प्रकार उसका जीवन एक नई डगर पर पग रखकर आगे बढ़ने में सफल हो जाएगा। उसने अंशु की आखों में झांका बहुत प्यार से, उसके दिल की गहराई में डूबते हुए। अंशु का स्वागत करने के लिए मानो उसकी प्रसन्नताओं ने आगे हाथ फैला दिया1 अंशु के होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान कांप गई। उसने अपनी पलकें झुका लीं।

कुछ देर बाद मार्तण्ड सिंह डाक्टर से मिलने उसके कमरे में गए तो उनके साथ निर्भय सिंह भी चिपके हुए थे। डाक्टर अपने कमरे में उपस्थित था। अभी-अभी ही वह एक इमरजेंसी केस अटेण्ड करके लौटा था। निर्भय सिंह को देखकर वह कुछ सकुचाया, परन्तु फिर स्पष्टता से काम लेने का बिचार करके उसने उन दोनों को कुर्सियों पर बिठाया। फिर अपनी कुर्सी पर बैठते हुए उसने मार्तण्ड सिंह से कहा, देखिए, आपके लड़के को कोई रोग नहीं है। आप उसे अब अस्पताल से ले जा सकते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपका लड़का स्वस्थ हो तो आपको उसकी वह इच्छा पूरी करनी पड़ेगी, जिस पर उसके जीवन का सबसे बड़ा संतोष निर्भर कर रहा है। मैं नहीं जानता कि रोगी का व्यक्तिगत जीवन क्या है या आप लोगों की निजी परिस्थितियां क्या हैं? मैं एक डाक्टर हूं और डाक्टर होने के नाते

आपको अपने रोगी का सही-सही इलाज बता रहा हूं। यदि आपने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया तो संभवत: आपको पछताना पड़ेगा।'

डाक्टर को मार्तण्ड सिंह की निजी परिस्थितियों का पूरा अनुमान था। रजनी का नाम वह अपने रोगी के होंठों से सुन चुका था। फिर भी अनजान बनकर मार्तण्ड सिह को हर बात से सावधान करना उसका कर्तव्य था।

मार्तण्ड सिंह ने सुना तो सोच में डूब गए। बेटे के स्वास्थ्य की चिन्ता उन्हें अधिक हो गई। जीवन ही तो संसार है। परन्तु निर्भय सिंह को ऐसा लगा मानो हाथ आई सम्पत्ति के चले जाने का भय उत्पन्न हो गया है। मन-ही-मन दांत पीसकर उन्होंने डाक्टर को देखा। फिर दिल पर पत्थर रखकर कहा, ठीक है डाक्टर, हम अपने बच्चे को आज ही अस्पताल से ले जाएंगे और उसकी इच्छाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखेंगे।' निर्भय सिंह नहीं चाहते थे कि ऐसी राय देने वाले की सुरक्षा में चंद्रभाल अब एक क्षण भी रहे। 'सिर्फ ध्यान ही नहीं रखेंगे।' डाक्टर ने एक बार फिर सावधान किया, 'उसकी इच्छाओं को पूरा करेंगे, वरना रोगी को कुछ हो गया तो आप लोग मुझे या इस अस्पताल को दोष मत दीजिएगा।'

निर्भय सिंह डाक्टर पर मन-ही-मन झल्लाकर रह गए। उन्होंने व्यर्थ ही डाक्टर को एक बार और सावधान करने का अवसर दिया। उन्होंने मार्तण्ड सिंह को देखा। मार्तण्ड सिंह चिन्ता में डूबे हुए थे। वह भी उठ खड़े हुए और फिर दोनों डाक्टर के कमरे से बाहर निकल गए।

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'शाम का समय था। चंद्रभाल कोठी के अंदर अपने कमरे में लेटा हुआ था। निर्भय सिंह की राय पर मार्तण्ड सिंह अपने बेटे को दोपहर में ही अस्पताल से कोठी ले आए थे। निर्भय सिंह नहीं चाहते थे कि चंद्रभाल ऐसे डाक्टर की सुरक्षा में रहे, जो उनकी योजनाओं में बांधा डाले। अस्पताल में ही मार्तण्ड सिंह ने अपनी पत्नी को डाक्टर वाली बात बता दी थी। उस समय अंशु चंद्रभाल के लिए किचन में अपने हाथों से दूध गर्म कर रही थी। तब निर्भय सिंह ने तुरंत बात बदल दी थी। अंशु सुन लेती तो उसकी चिन्ताएं बढ जातीं। दिल टूट जाता। मंझधार पार करने के बाद जीवन की नाव किनारे आकर कैसे डूब गई? परन्तु अपने पति की बात सुनकर चंद्रभाल की मांजी तुरन्त ही दिल के अंदर इरादा कर बैठी थी कि अब और अधिक वह अपने बेटे के जीवन का जोखिम मोल नहीं लेंगी, उसकी हर इच्छा पूरी कर देंगी। रजनी को अपनी बहू स्वीकार लेंगी। उसे सभ्य बनाकर अपने स्तर तक ले आएंगी। यही कारण था कि जब अवसर निकालकर उन्होंने अपने दिल की बात चुपचाप अपने बेटे पर प्रकट की तो चंद्रभाल को ऐसा लगा, मानो उसकी सारी चिन्ताएं तुरन्त समाप्त हो गई हों। चिन्ताएं समाप्त होती भी क्यों नहीं? उसे रजनी के अतिरिक्त संसार में चाहिए भी क्या था? उसके अंदर तुरन्त ही उसकी खोई ताकत वापस आ गई थी। मुखड़े की रौनक तथा आंखों की चमक बढ़ गई थी। परन्तु मां ने उसे सावधान कर दिया था कि यह बात यह अभी किसी पर भी प्रकट नहीं करे।

कोठी की बैठक में मार्तण्ड सिंह के साथ निर्भय सिंह भी बैठे हुए थे। मार्तण्ड सिंह की धर्मपत्नी अंदर के कमरे में थीं। निर्भय सिंह के आने पर उन्होंने कोई प्रसन्नता प्रकट नहीं की थी। अंशु में भी उन्होंने कोई रुचि नहीं ली थी, इसलिए निर्भय सिह का वह भय, जो डाक्टर की बात ने उत्पन्न किया था, विश्वास में परिवर्तित हो गया था। वे समझ गए थे कि अपने बेटे की इच्छा पर मां की ममता झुक चुकी है। मार्तण्ड सिंह की बातचीत तथा खामोशी उनके लिए भेद भरी सिद्ध हो रही थी। अपने बेटे का जीवन बचाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हो चुके थे। परन्तु इस समय अपने दिल की बात निर्भय सिंह से कहते-कहते सकुचाकर वह रुक जाते थे।

निर्भय सिंह उनके दिल की बात समझ रहे थे, परन्तु अपनी बेटी को नकारे जाने के बारे में अब वह एक भी बात सुनने को तैयार नहीं थे। अपने लिए मार्तण्ड सिंह की सम्पत्ति तथा बेटी के लिए चंद्रभाल को प्राप्त करने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थे और यह तभी हो सकता था, जब रजनी सदा के लिए उनके रास्ते से हट जाए। मनुष्य जब चारों ओर से निराश हो जाता है तो उसकी बुद्धि मारी जाती है। फिर वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। निर्भय सिंह ने अपनी हारी हुई बाजी को अपना सब-कुछ दांव पर लगाकर जीत लेना चाहा। उन्होंने अंदाजा लगाया कि किस नौकर का संबंध बाबा या रजनी से अधिक रहा होगा। उन्हें इसका हल ढूंढते हुए देर नहीं लगी। कोठी का ड्राइवर पुराना था। कोठी के क्वार्टर में वह सपरिवार रहता था। इतने दिनों से वह कोठी में आ-जा रहे थे, इसलिए कोठी के क्वार्टरों में रहने वाले सभी नौकरों को वह जानते थे। उन्होंने कुछ सोचा, फिर अपनी कलाई पर बंधी घडी देखते हुए उठ खड़े हुए। बोले, 'अच्छा भई, मैं चलूं। घर प मेंने किसी को समय दे रखा है।'

'ओह!' मार्तण्ड सिंह भी उठ खड़े हुए। उन्हें भी मानो अपनी परेशानियों का हल ढूंढने? के लिए एकांत की आवश्यकता थी। उन्होंने निर्भय सिंह को नहीं रोका। निर्भय सिंह के साथ वह बरामदे तक बाहर आए।

निर्भय सिह ने अपनी कार स्टार्ट की। फिर मुख्यद्वार पार करने के बाद कुछ दूर पर उन्होंने कार रोक दी। बोनट खोलकर कार के कुछ तार ढीले किए और कार खराब कर दी। फिर उसे लॉक करने के बाद मार्तण्ड सिंह की कोठी लौट पड़े। वह कोठी के बरामदे पर चढ़कर बैठक के द्वार पर पहुंचे ही थे कि उन्हें देखकर मार्तण्ड सिंह चौंक गए। उनकी ओर बढ़ते हुए बोले, 'अरे! वापस कैसे आ गए?'



___ 'तुम्हारे गेट के पास मेरी गाड़ी खराब हो गई है।' निर्भय सिंह ने कलाई पर बंधी घड़ी देखते हुए ऐसा प्रकट किया, मानो उन्हें देर हो रही है। उन्होंने कहा, 'अपने ड्राइवर से कह दो कि मुझे छोड़ आए। मैं रास्ते में किसी मिस्तरी से गाड़ी ठीक कराके यहां पहुंचाने को कह दूंगा तो उस गाड़ी से अंशु आ जाएगी।'

___ 'ओह!' मार्तण्ड सिंह ने निर्भय सिंह की मजबूरी समझी। गंगू को तुरन्त आज्ञा दी कि उनको छोड़ आए। गंगू जब मार्तण्ड सिंह की कार लेकर चला तो निर्भय सिंह ने उसके द्वारा सबसे पहले मोटर मिस्तरी का प्रबंध किया। उसे कार की चाबी देते हुए कार ठीक करके मार्तण्ड सिंह की कोठी पर पहुंचाने को कहा। फिर जब उससे छुट्टी पाने के बाद गंगू ने कार खुली सड़क पर छोड़ी तो निर्भय सिंह ने अपनी योजनानुसार कहा, 'क्या तुम्हें अपने मालिक की स्थिति पर जरा भी दया नहीं आती?' 'मालिक! गंगू ने सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा, 'अपना वश चले तो हम छोटे मालिक के लिए अपनी जान दे दें। जरा सोचिए, छोटे मालिक को कुछ हो गया तो कुल का क्या होगा?'

'तुम ठीक कहते हो।' निर्भय सिंह ने एक गहरी सांस लेकर सहानुभूति प्रकट की। बोले, 'चंद्रभाल की स्थिति देखकर मेरा दिल फट जाता है। आज डाक्टर ने भी स्पष्ट कह दिया कि यदि चंद्रभाल को स्वस्थ करना है तो उसकी मनोकामना पूरी करनी होगी।'

'यह तो हम सभी नौकर जानते हैं।' गंगू ने एक मोड़ पर कार मोड़ी। बोला, 'आखिर उनकी बीमारी का कारण भी क्या हो सकता

'तो फिर तुम लोग छोटे मालिक की सहायता क्यों नहीं करते?' निर्भय सिंह ने पूछा।

'सहायता!' गंगू चौंका। उसने पूछा, 'परन्तु हम इसमें क्या कर सकते हैं ?'

__'तुम इसमें बहुत कुछ कर सकते हो।' निर्भय सिंह ने कहा, 'रजनी के बाबा से तुम्हारा संबंध अच्छा है कि नहीं?' 'वाह, संबंध क्यों । नहीं अच्छा होगा?, गंगू ने कहा, 'मेरे पड़ोसी ही तो थे वह। रजनी तो मुझे गंगू चाचा पुकारती है। इतनी-सी थी, जब वह इस कोठी में आई थी।' गंगू ने कार के अंदर हाथ द्वारा कद का संकेत किया।

'तुम उसके घर का पता जानते हो?' निर्भय सिंह को अपनी योजना पूरी होती दिखाई पड़ी।

'पता जानता हूं परन्तु कभी उसके घर जाने का अवसर नहीं मिला।

'नहीं मिला तो अब चले जाओ, तुरन्त।'

'जी!' गंगू चौंक गया। वह कुछ समझा नहीं।

'हां।' निर्भय सिंह ने मानो उसे भेद की बात बताई। बोले, 'दरअसल बात यह है कि अपने बेटे की जान बचाने के लिए तुम्हारे मालिक-मालकिन रजनी को अपनी बहू बनाने को तैयार हो गए हैं। तुम्हारी मालकिन ने मुझसे स्वयं एकांत में कहा है कि यदि इस समय रजनी आ जाए तो वह अपने पति को उसे स्वीकार करने पर विवश कर देंगी।' 'अच्छा!' गंगू को विश्वास ही नहीं हुआ। रजनी के भाग्य जागते देखकर उसने अपने दुर्भाग्य के विषय में भी सोचा।

'हां।' निर्भय सिंह ने उसे विश्वास दिलाया। बोले, इसीलिए मैं चाहता हूं कि तुम रजनी को लेने निकल जाओ-इसी समय।'

'इसी समय?'

'हां।' निर्भय सिंह ने कहा, 'नेक काम में देर कैसी? कौन जाने तुम्हारे छोटे मालिक इस बार बेहोश पड़े तो फिर कभी होश में नहीं आएं!'

___ 'अरे राम-राम!' गंगू का दिल कांप उठा। उसने कहा, ऐसी अशुभ बात मत कीजिए।

'इसीलिए तो कह रहा हूं कि तुम तुरंत कुसुम्पटी जाकर रजनी को ले आओ। कल शाम तक जब तुम रजनी को लेकर अपने मालिक की कोठी पहुंचोगे तो वहां मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करता मिलूंगा। रजनी को कोठी पर देखकर वहां सब एक बार तो अवश्य ही चौंक उठेंगे, परन्तु जब मैं और तुम्हारी मालकिन तुम्हारे मालिक को समझाएंगे तो उन्हें बेटे की गंभीर स्थिति देखकर रजनी को स्वीकारने में आसानी हो जाएगी।

गंगू सोच में पड़ गया।

'देखो!' निर्भय सिंह ने उसे लालच देना आवश्यक समझा, बोले, 'यदि तुम अपने मालिकों की कठिनाई आसान कर दोगे तो बहुत बड़ा पुण्य कमाओगे। छोटे मालिक का जीवन बच जाएगा तो मार्तण्ड सिंह तुम्हारा घर इनाम से भर देंगे। चंद्रभाल को अपना सुख-चैन मिल जाएगा तो वह अलग तुम्हें रुपये-पैसों से निहाल कर देगा, बल्कि मैं तो उसे राय दूंगा कि तुम्हारे इतने बड़े उपकार के बदले वह तुम्हें अपनी एक कार देकर ड्राइवर से मालिक बना दे ताकि तुम आत्मनिर्भर होकर टैक्सी चलाते हुए अपनी रोजी कमा सको।'

'क्या...?' अपने भाग्य का तारा इतना ऊंचा देखकर गंगू की जुबान लड़खड़ा गई। प्रसन्नता से उसकी आखें चमक उठीं। स्वयं पर काबू पाते हुए उसने पूछा, 'यह संभव है मालिक?

__ 'क्यों नहीं?' निर्भय सिंह ने अपनी योजनानुसार बात बनती देखी तो कहा, 'पहले तुम पुण्य कमाओ, फिर पुण्य का परिणाम देखो और फिर मैं जो तुम्हारे साथ हूं।'

'मालिक! गंगू ने साहस कर पूछा, 'यदि रजनी को मालिक ने अपनी बहू बना लिया तो क्या आपको कष्ट नहीं होगा?'

'कभी नहीं।' निर्भय सिंह मानो इस प्रश्न को सुनने के लिए तैयार बैठे थे। उन्होंने कहा, 'बल्कि प्रसन्नता होगी। तुम्हीं सोचो, क्या ऐसे पति के साथ कोई स्त्री सुखी रह सकती है, जिसके होंठों पर किसी दूसरी स्त्री का नाम हो?'

'नहीं मालिक!' गंगू निर्भय सिंह की बात से सहमत हुआ।

'बस, यह समझ लो कि रजनी को चंद्रभाल की बनाकर मैं अपनी बेटी को उस घर में देने से बचाना चाहता हूं। उधर चंद्रभाल खुश, इधर हम खुश।'

'ओ...।' गंगू ने बात समझने का प्रयत्न किया।मार्तण्ड सिह से घनिष्ठ मित्रता है, इसलिए अपनी बेटी के लिए स्पष्ट शब्दों में इंकार भी नहीं किया जाता। उधर चंद्रभाल की स्थिति भी नहीं देखी जाती। तुम्हारी मालकिन का मेरे लिए क्या यही इशारा बहुत नहीं है कि यदि इस समय रजनी होती तो वह उसे स्वीकार कर लेती?'

'हां, वह बात तो ठीक है।' गंगू मानो कुछ न समझते हुए भी बोला। परन्तु एक बात उसके मन में बैठ गई। रजनी का विवाह छोटे मालिक से अवश्य होना चाहिए, तभी उनका जीवन सुरक्षित रहेगा। उनकी दया होगी तो जागीरदार साहब के कहने पर कह उसे एक कार अवश्य दे देंगे। निर्भय सिंह अपनी सफलता पर मुस्करा दिए। रजनी का मुखड़ा उनकी आंखों के सामने आया तो कल की प्रतीक्षा में उन पर अभी से ही खुमार चढ़ने लगा।
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
गंगू जब रजनी को कुसुम्पटी से लाने को तैयार हो गया तो निर्भय सिंह ने उसे समझा दिया कि वह रजनी से क्या कहेगा और क्या नहीं। बाबा तथा उसका बापू कुछ पूछे तो उन्हें क्या और कैसे उत्तर देना है। गंगू को उन्होंने और भी आवश्यक बातें समझाई। वह जानते थे कि रजनी चंद्रभाल का नाम सुनते ही अपने गंगू चाचा के साथ भागी चली जाएगी।

कोठी आ गई तो निर्भय सिंह ड्राइवर को रोककर कोठी के अंदर गए। अपने एक विशेष व्यक्ति को फोन किया। उसे कुछ आदेश दिया। फिर घड़ी देखते हुए निश्चित समय की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ देर बाद जब निश्चित समय समीप आने लगा तो वह बाहर निकले। गंगू उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। उन्होंने कहा, 'मुझे एक बार फिर मार्तण्ड सिंह की कोठी जाना पड़ेगा। कुछ काम ही ऐसा आ पड़ा है।' निर्भय सिंह ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। कुछ सोचते रहे। तभी मुख्यद्वार में एक कार प्रविष्ट हुई। निर्भय सिंह इसी कार की प्रतीक्षा कर रहे थे। फोन पर उन्होंने कार के चालक से ही बातें की थीं। चालक उनके गुंडों का एक व्यक्ति था। फिर भी निर्भय सिंह ने अनजान बनकर जैसे स्वयं से कहा, 'अरे! यह कौन आ गया?'

कार लॉन में रुकी। चालक ने उन्हें सलाम किया तो उसे पहचानने का नाटक करते हुए निर्भय सिंह ने कहा, 'अच्छा-अच्छा, तुम हो!

कैसे आना हुआ?

'हुजूर को सलाम करने चला आया।' कार चालक ने कहा।

'कोई काम है क्या?' निर्भय ने पूछा।

'हुजूर...।' चालक ने कहा, 'यह गाड़ी तो आपने इनाम में दिलवा दी, परन्तु इसे टैक्सी का रंग देने तथा लाइसेंस लेने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं।' चालक ने अपनी कार की ओर संकेत किया।

गंगू ने सुना तो चौंक गया। क्या यह कार जागीरदार साहब ने इस व्यक्ति को इनाम में दिलाई है?

"ठीक है, जब चाहो आकर मुनीम से तीन हजार रुपये ले जाना। मैं मुनीम से कह दूंगा।' निर्भय सिंह ने गंगू पर अपनी दरियादिली का प्रभाव डाला।

___ गंगू वास्तव में स्तब्ध रह गया। निर्भय सिह ने गंगू के मुखड़े के भाव पढ़े। फिर चलने को तैयार हुए। अचानक रुक गए। गंगू से बोले, 'अरे हां गंगू तुम कुसुम्पटी इसी की कार में बैठकर चले जाओ-अभी बारी-बारी कार चला लेना। मैं कोठी जा रहा हूं। गाड़ी वापस कर दूंगा।

'लेकिन मेरी घरवाली...।' गंगू ने निर्भय सिंह की बात किसी आज्ञा से कम नहीं समझी, क्योंकि निर्भय उसके मालिक के सर्वप्रिय मित्र थे, फिर भी उसने पूछने का साहस कर लिया था।

__ 'मैं तुम्हारी घरवाली को सूचना भेज दूंगा कि तुम कल शाम तक लौटोगे।' निर्भय सिंह ने उसकी ओर सौ-सौ के तीन नोट बढ़ाए। बोले, 'ये लो रास्ते में खाने-पीने तथा पैट्रोल का खर्च। रजनी को लेने जितनी जल्दी जाओगे, उतनी ही जल्दी वापस भी आओगे। गंगू...।' उन्होंने चालक की कार की ओर संकेत करते हुए कहा, 'यह कार मेरे ही कहने से इस व्यक्ति को इनाम में मिली है, इसलिए कि इस व्यक्ति ने अपने मालिक के साथ एक छोटी-सी भलाई की थी।'

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गंगू ने नोटों को देखा। फिर कार की ओर देखा। उसकी आंखों में एक सपना-सा जागा। ऐसी ही कार का वह भी मालिक बन जाएगा-मालिक! गंगू की आंखें चमक उठीं। वह तुरंत नोट थामकर कार में जा बैठा।

गंगू के जाने के बाद निर्भय सिंह ने एक व्यक्ति को फोन द्वारा फिर बुलाया। उसे अगले दिन की सारी योजना समझाई। फिर उसे मार्तण्ड सिंह की कार सौंपते हुए बताया कि अंधकार होने के बाद वह इस कार को उनकी कोठी में छोड़ दे। कार छोड़ने के बाद वहां से छिपकर या किसी से मिले बिना ही चला जाए। किसी से भेंट हो जाए, कोई गंगू के लिए कुछ पूछे तो कह दे कि गंगू ने ही गाड़ी भेजी है, गंगू बाद में आएगा। गंगू कहां चला गया? पता नहीं। कब आएगा? पता नहीं। वह गंगू का परिचित है? हां, नहीं होता तो गंगू गाड़ी क्यों भेजता?

अपने व्यक्ति को अच्छी तरह समझाने के बाद वह निश्चित हो गए थे। गंगू की घरवाली को कुछ भी सूचित करने की उन्होंने आवश्यकता नहीं समझी थी। अपने भेद पर किसी प्रकार का जोखिम न लेने के लिए उन्होंने अपनी योजना में रजनी को प्राप्त करने के बाद गंगू की हत्या का प्रबंध किया था। निर्भय सिंह के शरीर में जो रक्त दौड़ रहा था, वह समय के साथ परिवर्तित नहीं हुआ था। अपनी जागीरदारी में कुमारियों को लूटना तथा अपने विरुद्ध आवाज उठाने वालों की हत्याएं कराना उनके लिए एक साधारण-सी बात थी। गंगू जीवित रहता तो कभी न कभी उनके विरुद्ध आवाज उठाकर उनका भेद खोल सकता था। रजनी के साथ उसके बापू या । बाबा के आने की भी संभावना थी, इसलिए उन्होंने गंगू के साथ उनकी हत्या का भी आदेश दे दिया था।
 
घंटे भर बाद उन्हें फोन द्वारा अपने व्यक्ति से पता चला कि मार्तण्ड सिंह की गाड़ी उनकी कोठी में पहुंचा दी है। पहुंचाने वाले पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और न ही किसी ने उससे बात की। जब सारी बातों से निर्भय सिंह को फुर्सत मिल गई तो उन्होंने शराब पीना आरंभ किया। वह शराब पीते रहे और सोचते रहे, एक युग के बाद उनकी बांहें एक सुन्दरी के संगमरमरी शरीर से गरम होंगी, सांसों में सुगन्ध रचेगी, वासना की प्यास बुझेगी। ऐसी सुन्दरी तो उन्होंने आज तक कभी देखी भी नहीं। उन्हें अपनी जागीरदारी का समय याद आ गया। क्या जमाना था! उनके एक इशारे पर गांव की सुन्दरियां उठाकर उनके कदमों में बिछा दी जाती थीं, परन्तु रजनी जैसी लड़की आज तक उनके जीवन में नहीं आई थी।

अचानक जाम पीते-पीते मदिरा में बेला का मुखड़ा झलक गया। निर्भय सिंह का हाथ कांप गया। जाम छूटते-छूटते बचा। बेला जिस असहाय दृष्टि से उन्हें देख रही थी, उसने उनका अतीत याद दिलाकर उन्हें कंपा दिया। उसकी आत्मा को मानो अब भी भगवान से न्याय की आशा थी। निर्भय सिंह ने दांत पीसते हुए जाम कमरे की दीवार पर दे मारा। एक छनाका हुआ। छनाके में मानो उन अबलाओं की चीखें थीं जो उनके अत्याचार का शिकार होकर उनकी वासना के कदमों तले रौंदी जा चुकी थीं। कमरे में सुर्ख कालीन बिछा था। कालीन के रेशों पर शराब की बूंदें अटककर चमक उठीं। हर बूंद में उनकी जागीर में रहने वाली कुमारियों की छवि थी। किसी को भी तो उन्होंने नहीं छोड़ा था। हर छवि की आखों में उनके प्रति असीम घृणा थी। भगवान से दुहाई थी। कभी तो भगवान उनकी आत्मा की पुकार सुनेगा ही।

निर्भय सिंह शराब पीते ही गए-पीतें ही गए, जब तक कि वह अपना होश नहीं गंवा बैठे।

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सुबह के लगभग सात बजना चाहते थे। रजनी दातुन करने के बाद कुल्ला कर रही थी। अपने कुंवर साहब के वियोग में उसका मुखड़ा मुरझा गया था, इस प्रकार जैसे हरसिंगार का फूल रात भर खिलने तथा सुबह टहनी से टूटकर गिरने के बाद सूर्य की पहली किरण देखते ही मुरझा जाता है। फिर भी उसकी आस नहीं टूटी थी। उसे पूरा विश्वास था कि कुंवर साहब स्वस्थ होते ही उसे लेने आएंगे। उसके प्यार का गला उन्होंने नहीं, उनके घरवालों ने घोंटा था। यही कारण था कि जब अचानक उसने अपने घर के सामने इतने दिनों बाद कार रुकने का स्वर सुना तो वह चौंक गई। दिल धड़क उठा। वह सब कुछ छोड़कर घर के बाहर जाने वाले रास्ते पर लपकी। उसे लपकता देखकर उसके पीछे उसका बाबा तथा हीरालाल भी दौड़ पड़े। जब से रजनी का दिल टूटा था, वह खोई-खोई-सी रहने लगी थी। बिल्कुल बावली बन गई थी। उसको गुम-सुम देखकर उनके मन में डर समाया रहता था कि कहीं वह आत्महत्या न कर ले। बाबा तथा हीरालाल बाहर लपके तो कम्भो भी चली आई। तब गंगू कार से बाहर निकल रहा था। बाबा तथा हीरालाल चौंक गए। रजनी भी चौंक पड़ी थी। दिल एक अज्ञात आशा बांधकर धड़क गया था। शायद पिया ने कोई संदेश भेजा है। सभी गंगू के पास जा पहुंचे।

'तुम?' बाबा ने गंगू को देखा तो आश्चर्य से पूछा। 'हां।, गंगू ने कहा, 'रजनी को मै लेने आया हूं। मालकिन ने मुझे भेजा है! गंगू ने रजनी को देखने के बाद कहा।

'क्या?' बाबा को विश्वास ही नहीं हुआ। बाबा के अतिरिक्त और सब भी चौंक गए। रजनी ने तो मानो कोई अनहोनी बात सुन ली थी।

'हां।' गंगू ने कहा, कुंवर साहब की तबियत बहुत खराब है। डाक्टर का कहना है कि जब तक उन्हें रजनी नहीं मिलेगी, वह स्वस्थ नहीं हो सकेंगे।'

'क्या?' रजनी का कलेजा मुंह को आ गया। उसके कुंवर साहब बीमार हैं? अपने कुंवर साहब से मिलने के लिए उसका दिल तड़प उठा।
 
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