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Romance जलती चट्टान/गुलशन नंदा

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जलती चट्टान

लेखक : गुलशन नंदा

रेलगाड़ी ने जब सीतापुर का स्टेशन छोड़ा तो राजन देर तक खड़ा उसे देखता रहा। जब अंतिम डिब्बा सिगनल के करीब पहुँचा तो उसने एक लंबी साँस ली। अपने मैले वस्त्रों को झाड़ा, सिर के बाल संवारे और गठरी उठाकर फाटक की ओर चल पड़ा।

जब वह स्टेशन के बाहर पहुँचा तो रिक्शे वालों ने घूमकर आशा भरे नेत्रों से उसका स्वागत किया। राजन ने लापरवाही से अपनी गठरी एक रिक्शा में रखी और बैठते हुए बोला-‘सीतलवादी’।

तुरंत ही रिक्शा एक छोटे से रास्ते पर हो लिया, जो नीचे घाटी की ओर उतरता था। चारों ओर हरी-भरी झाड़ियाँ ऊँची-ऊँची प्राचीर की भांति खड़ी थीं। पक्षियों के झुंड एक ओर से आते और दूसरी ओर पंख पसारे बढ़ जाते, जिस पर राजन की दृष्टि टिक भी न पाती थी। वह मन-ही-मन प्रसन्न हो रहा था कि वह स्थान ऐसा बुरा नहीं-जैसा वह समझे हुए था।

थोड़ी ही देर में रिक्शा काफी नीचे उतर गई। राजन ने देखा कि ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ रहा था-हरियाली आँखों से ओझल होती जा रही है। थोड़ी दूर जाने पर हरियाली बिलकुल ही दृष्टि से ओझल हो गई और स्याही जैसी धरती दिखाई देने लगी। कटे हुए मार्ग के दोनों ओर ऐसा प्रतीत हो रहा था-मानो काले देव खड़े हों।

थोड़ी दूर जाकर रिक्शे वाले ने चौराहे पर रिक्शा रोका। राजन धीरे से धरती पर पैर रखते हुए बोला-‘तो क्या यही सीतलवादी है?’

‘हाँ, बाबू.... ऊपर चढ़ते ही सीतलवादी आरंभ होती है।’

‘अच्छा!’ और जेब से एक रुपया निकालकर उसकी हथेली पर रख दिया।

‘लेकिन बाबू! छुट्टा नहीं है।’

‘कोई बात नहीं, फिर कभी ले लूँगा। तुम भी यहीं हो और शायद मुझे भी इन्हीं पर्वतों में रहना हो।’

‘अच्छा बाबू! नंबर चौबीस याद रखना।’

राजन उसकी सादगी पर मुस्कराया और गठरी उठाकर ऊपर की ओर चल दिया।

जब उसने सीतलवादी में प्रवेश किया तो सर्वप्रथम उसका स्वागत वहाँ के भौंकते हुए कुत्तों ने किया-जो शीघ्र ही राजन की स्नेह भरी दृष्टि से प्रभावित हो दुम हिलाने लगे और खामोशी से उसके साथ हो लिए। रास्ते में दोनों ओर छोटे-छोटे पत्थर के मकान थे-जिनके बाहर कुछ लोग बैठे किसी-न-किसी धंधे में संलग्न थे। राजन धीरे-धीरे पग बढ़ाता जा रहा था मानो सबके चेहरों को पढ़ता जा रहा हो।

वह किसी से कुछ पूछना चाहता था-किंतु उसे लगता था कि जैसे उसकी जीभ तालू से चिपक गई है। थोड़ी दूर चलकर वह एक प्रौढ़ व्यक्ति के पास जा खड़ा हुआ-जो एक टूटी सी खाट पर बैठा हुक्का पी रहा था। उस प्रौढ़ व्यक्ति ने राजन की ओर देखा। राजन बोला‒

‘मैं कलकत्ते से आ रहा हूँ। यहाँ बिलकुल नया हूँ।’

‘कहो, मैं क्या कर सकता हूँ?’

‘मुझे कंपनी के दफ्तर तक जाना है।’

‘क्या किसी काम से आए हो?’

‘जी! वर्क्स मैनेजर से मिलना है। एक पत्र।’

‘अच्छा तो ठहरो! मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।’ कहकर वह हुक्का छोड़ उठने लगा।

‘आप कष्ट न करिए-केवल रास्ता...।’

‘कष्ट कैसा... मुझे भी तो ड्यूटी पर जाना है। आधा घंटा पहले ही चल दूँगा।’ और वह कहते-कहते अंदर चला गया। तुरंत ही सरकारी वर्दी पहने वापस लौट आया। जब दोनों चलने लगे तो राजन से बोला-‘यह गठरी यहीं छोड़ जाओ। दफ्तर में ले जाना अच्छा नहीं लगता।’

‘ओह... मैं समझ गया।’

‘काकी!’ उस मनुष्य ने आवाज दी और एक बुढ़िया ने झरोखे से आकर झाँका-‘जरा यह अंदर रख दे।’ और दोनों दफ्तर की ओर चल दिए।
 
थोड़ी ही देर में वह मनुष्य राजन को साथ लिए मैनेजर के कमरे में पहुँचा। पत्र चपरासी को दे दोनों पास पड़े बेंच पर बैठकर उसकी प्रतीक्षा करने लगे।

चपरासी का संकेत पाते ही राजन उठा और पर्दा उठाकर उसने मैनेजर के कमरे में प्रवेश किया। मैनेजर ने अपनी दृष्टि पत्र से उठाई और मुस्कुराते हुए राजन के नमस्कार का उत्तर दिया।

‘कलकत्ता से कब आए?’

‘अभी सीधा ही आ रहा हूँ।’

‘तो वासुदेव तुम्हारे चाचा हैं?’

‘जी...!’

‘तुम्हारा मन यहाँ लग जाएगा क्या?’

‘क्यों नहीं! मनुष्य चाहे तो क्या नहीं हो सकता।’

‘हाँ यह तो ठीक है-परंतु तुम्हारे चाचा के पत्र से तो प्रतीत होता है कि आदमी जरा रंगीले हो। खैर... यह कोयले की चट्टानें शीघ्र ही तुम्हें कलकत्ता भुला देंगी।’

‘उसे भूल जाने को ही तो मैं यहाँ आया हूँ।’

‘अच्छा-यह तो तुम जानते ही हो कि वासुदेव ने मेरे साथ छः वर्ष काम किया है।’

‘जी...!’

‘और कभी भी मेरी आन और कर्तव्यों को नहीं भूला।’

‘आप मुझ पर विश्वास रखें-ऐसा ही होगा।’

‘मुझे भी तुमसे यही आशा थी। अच्छा अभी तुम विश्राम करो। कल सवेरे ही मेरे पास आ जाना।’

राजन ने धन्यवाद के पश्चात् दोनों हाथों से नमस्कार किया और बाहर जाने लगा।

‘परंतु रात्रि भर ठहरोगे कहाँ?’

‘यदि कोई स्थान...।’

‘मकान तो कोई खाली नहीं। कहो तो किसी के साथ प्रबंध कर दूँ।’

‘रहने दीजिए-अकेली जान है। कहीं पड़ा रहूँगा-किसी को कष्ट देने से क्या लाभ।’

मैनेजर राजन का उत्तर सुनकर मुस्कराया और बोला-‘तुम्हारी इच्छा!’

राजन नमस्कार करके बाहर चला गया।
 
उसका साथी अभी तक उसकी राह देख रहा था। राजन के मुख पर बिखरे उल्लास को देखते हुए बोला-

‘क्यों भैया! काम बन गया?’

‘जी-कल प्रातःकाल आने को कहा है।’

‘क्या किसी नौकरी के लिए आए थे?’

‘जी...!’

‘और वह पत्र?’

‘मेरे चाचा ने दिया था। वह कलकत्ता हैड ऑफिस में काफी समय इनके साथ काम करते रहे हैं।’

‘और ठहरोगे कहाँ?’

‘इसकी चिंता न करो-सब ठीक हो जाएगा।’

‘अच्छा-तुम्हारा नाम?’

‘राजन!’

‘मुझे कुंदन कहते हैं।’

‘आप भी यहीं।’

‘हाँ-इसी कंपनी में काम करता हूँ।’

‘कैसा काम?’

‘इतनी जल्दी क्या है? सब धीरे-धीरे मालूम हो जाएगा।’

‘अब जाओ-जाकर विश्राम करो। रास्ते की थकावट होगी।’

‘और आप।’

‘ड्यूटी!’

‘ओह... मेरी गठरी?’

‘जाकर काकी से ले लो- हाँ-हाँ वह तुम्हें पहचान लेंगी।’

‘अच्छा तो कल मिलूँगा।’

‘अवश्य! हाँ, देखो किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो कुंदन को मत भूलना।’
 
काकी से गठरी ली और एक ओर चल दिया। वह गाँव को इस दृष्टि से देखने लगा कि रात्रि व्यतीत करने के लिए कोई स्थान ढूँढ सके। चाहे पर्वत की कोई गुफा ही क्यों न हो। वह आज बहुत प्रसन्न था। इसलिए नहीं कि उसे नौकरी मिलने की आशा हो गई थी, बल्कि इन पर्वतों में रहकर शांति भी पा सकेगा और अपनी आयु के शेष दिन प्रकृति की गोद में हँसते-खेलते बिता देगा। वह कलकत्ता के जीवन से ऊब चुका था। अब वहाँ रखा भी क्या था! कौन-सा पहलू था, जो उसकी दृष्टि से बच गया हो। सब बनावट-ही-बनावट-झूठ व मक्कार की मंडी!

वह इन्हीं विचारों में डूबा ‘वादी’ से बाहर पहुँच गया। उसने देखा-थोड़ी दूर पर एक छोटी-सी नदी पहाड़ियों की गोद में बलखाती बह रही है। उसके मुख पर प्रसन्नता-सी छा गई। वह जल्दी-जल्दी पैर बढ़ा नदी के किनारे जा पहुँचा और कपड़े उतारकर जल में कूद पड़ा।

स्नान के पश्चात् उसने वस्त्र बदल डाले और मैले वस्त्रों को गठरी में बाँध, नदी के किनारे-किनारे हो लिया।

सूर्य देवता दिन भर के थके विश्राम करने संध्या की मटमैली चादर ओढ़े अंधकार की गोद में मुँह छिपाते जा रहे थे।

राजन की आँखों में नींद भर-भर आती थी। वह इतना थक चुका था कि उसकी दृष्टि चारों ओर विश्राम का स्थान खोज रही थी। दूर उसे कुछ सीढ़ियाँ दिखाई दीं। वह उस ओर शीघ्रता से बढ़ा।

वे सीढ़ियाँ एक मंदिर की थीं-जो पहाड़ियों को काटकर बनाया गया था और बहुत पुराना प्रतीत होता था। वह सीढ़ियों पर पग रखते हुए मंदिर की ओर बढ़ा- परंतु चार-छः सीढ़ियाँ बढ़ते ही अपना साहस खो बैठा। गठरी फेंक वहीं सीढ़ियों पर लेट गया, थकावट पहले ही थी- लेटते ही सपनों की दुनिया में खो गया।
 
डूबते हुए सूर्य की वे बुझती किरणें मंदिर की सीढ़ियों पर पड़ रही थीं। धीरे-धीरे सूर्य ने अपनी उन किरणों को समेट लिया। ‘सीतलवादी’ अंधकार में डूब गई-परंतु पूर्व में छिपे चंद्रमा से यह सब कुछ न देखा गया। उसने मुख से घूँघट उतारा और अपनी रजत किरणों से मंदिर की ऊँची दीवारों को फिर जगमगा दिया। ऐसे समय में नक्षत्रों ने भी उनका साथ दिया। मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं-परंतु राजन निद्रा में मग्न उन्हीं सीढ़ियों पर सो रहा था।

अचानक वह नींद में चौंक उठा। उसे ऐसा लगा-मानो उसके वक्षस्थल पर किसी ने वज्रपात किया हो। अभी वह उठ भी न पाया था कि उसके कानों में किसी के शब्द सुनाई पड़े-‘क्षमा करिए-गलती मेरी है। मैं शीघ्रता में यह न देख सकी कि कोई सीढ़ियों पर सो रहा है। मेरा पाँव आपके वक्षस्थल पर पड़ गया।’

राजन ने पलटकर देखा-उसके सम्मुख एक सौंदर्य की प्रतिमा खड़ी थी। उस सुंदरी के हाथों में फूल थे-जो शायद मंदिर के देवता के चरणों को सुशोभित करने वाले थे। ऐसा ज्ञात होता था-मानो चंद्रमा अपना यौवन लिए हुए धरती पर उतर आया हो।

राजन ने नेत्र झपकाते हुए सोचा-कहीं वह स्वप्न तो नहीं देख रहा। परंतु यह एक वास्तविकता थी।

राजन अब भी मोहाछन्न-सा उसी की ओर देखे जा रहा था। सुंदरता ने मर्म भेदी दृष्टि से राजन की ओर देखा और सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते मंदिर की ओर चल दी। उसके पांवों में बंधी पाजेब की झंकार अभी तक उसके कानों में गूँज रही थी और फूलों की सुगंध वायु के धीमे-धीमे झोंके से अभी तक उसे सुगंधित कर रही थी।

न जाने वह कितनी देर तक इन्हीं मीठी कल्पनाओं में डूबा सीढ़ियों पर बैठा रहा। अचानक वही रुन-झुन उसे फिर सुनाई पड़ी। शायद वह पूजा के पश्चात् लौट रही थी। राजन झट से सीढ़ियों पर लेट गया। धीरे-धीरे पाजेब की झंकार समीप आती गई। अब वह सीढ़ियों से उतर रही थी तो न जाने राजन को क्या सूझी कि उसने सीढ़ियों पर आंचल पकड़ लिया। लड़की ने आंचल खींचते-खींचते मुँह बनाकर कहा-‘यह क्या है?’
 
राजन कुछ देर उसे चुपचाप देखता रहा, फिर बोला‒

‘शायद पाँवों से ठोकर तुम्हीं ने लगाई थी।’

‘हाँ, यह गलती मेरी ही थी।’

‘केवल गलती मानने से क्या होता है।’

‘तो क्या कोई दण्ड देना है?’

‘दण्ड, नहीं तो... एक प्रार्थना है।’

‘क्या?’

‘जिस प्रकार तुमने मंदिर जाते समय अपना पाँव मेरे वक्षस्थल पर रखा था-उसी प्रकार पाँव रखते हुए सीढ़ियाँ उतर जाओ।’

‘भला क्यों?’

‘मेरी दादी कहती थी कि यदि कोई ऊपर से फाँद जाए तो आयु कम हो जाती है।’

‘ओह! तो यह बात है-परंतु इतने बड़े संसार में एक-आध मनुष्य समय से पहले चला भी जाए तो हानि क्या है?’

इतना कहकर वह हँसते-हँसते सीढ़ियाँ उतर गई-राजन देखता-का-देखता रह गया-पाजेब की झंकार और वह हँसी देर तक उसके कानों में गूँजती रही।

**

प्रातःकाल होते ही राजन मैनेजर के पास पहुँच गया-
 
प्रातःकाल होते ही राजन मैनेजर के पास पहुँच गया-

वह पहले से ही उसकी प्रतीक्षा में बैठा हुआ था-उसे देखते ही बोला-‘आओ राजन! मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था।’

फिर सामने खड़े एक पुरुष से बोला-

‘माधो! यही है वह युवक, जिसकी बात अभी मैं कर रहा था।’ और राजन की ओर मुख फेरते हुए बोला-‘राजन इनके साथ जाओ-ये तुम्हें सब काम समझा देंगे। आज से तुम इस कंपनी में एक सौ रुपये वेतन पर रख लिए गए हो।’

‘मैं किस प्रकार आपका धन्यवाद करूँ?’

‘इसकी कोई आवश्यकता नहीं- परन्तु देखो- कार्य काफी जिम्मेदारी का है।’

‘इसके कहने की कोई आवश्यकता नहीं-मैं अच्छी प्रकार समझता हूँ।’ कहते हुए राजन माधो के साथ बाहर निकल गया।

थोड़ी दूर दोनों एक टीले पर जाकर रुक गए-माधो बोला-

‘राजन! यह वह स्थान है-जहाँ तुम्हें दिन भर काम करना है।’

‘और काम क्या होगा-माधो?’

‘यह सामने देखते हो-क्या है?’

‘मजदूर... सन की थैलियों में कोयला भर रहे हैं।’

‘और वह नीचे!’ माधो ने टीले के नीचे संकेत करते हुए पूछा।

राजन ने नीचे झुककर देखा-एक गहरी घाटी थी-उसके संगम में रेल की पटरियों का जाल बिछा पड़ा था।

‘शायद कोई रेलवे स्टेशन है।’

‘ठीक है-और यह लोहे की मजबूत तार, जो इस स्थान और स्टेशन को आपस में मिलाती है, जानते हो क्या है?’

‘टेलीफोन!’

माधो ने हँसते हुए कहा-‘नहीं साहबजादे! देखो मैं समझाता हूँ।’

माधो ने एक मजदूर से कोयले की थैली मंगवाईं और उसे तार से लपेटते हुए भारी लोहे के कुण्डों से लटका दिया-ज्यों ही माधो ने हाथ छोड़ा थैली तार पर यों भागने लगी-मानो कोई वस्तु हवा में उड़ती जा रही हो-पल भर में वह नीचे पहुँच गई-राजन मुस्कुराते हुए बोला-‘सब समझ गया-यह कोयला थैलियों में भर-भरकर तार द्वारा स्टेशन तक पहुँचाना है।’

‘केवल पहुँचाना ही नहीं-बल्कि सब हिसाब भी रखना है और सांझ को नीचे जाकर मुझे बताना है-मैं यह कोयला मालगाड़ियों में भरवाता हूँ।’

‘ओह! समझा! और वापसी पर थैलियाँ मुझे ही लानी होंगी।’

‘नहीं इस कार्य के लिए गधे मौजूद हैं।’
 
राजन यह उत्तर सुनते ही मुँह फेरकर हँसने लगा और नाक सिकोड़ता हुआ नीचे को चल दिया।

माधो के कहने के अनुसार राजन अपने काम में लग गया। उसके लिए यह थैलियों का तार के द्वारा नीचे जाना-मानो एक तमाशा था-जब थैली नीचे जाती तो राजन यों महसूस करता-जैसे कुण्डे के साथ लटका हुआ हृदय घाटियों को पार करता जा रहा हो, वह यह सब कुछ देख मन-ही-मन मुस्करा उठा-परंतु काम करते-करते जब कभी उसके सम्मुख रात्रि वाली वह सौंदर्य प्रतिमा आ जाती तो वह गंभीर हो जाता-फिर यह सोचकर कि उसने कोई स्वप्न देखा है- भला इन अंधेरी घाटियों में ऐसी सुंदरता का क्या काम? सोचते-सोचते वह अपने काम में लग जाता।

काम करते-करते चार बज गए-छुट्टी की घंटी बजी-मजदूरों ने काम छोड़ दिया और अपने-अपने वस्त्र उठा दफ्तर की ओर बढ़े।

‘तो क्या छुट्टी हो गई?’ राजन ने एक से पूछा।

‘जी बाबूजी-परंतु आपकी नहीं।’

‘वह क्यों?’

‘अभी तो आपको नीचे जाकर माधो दादा को हिसाब बतलाना है।’

और राजन शीघ्रता से रजिस्टर उठा घाटियों में उतरती हुई पगडंडी पर हो लिया-जब वह स्टेशन पहुँचा तो माधो पहले से ही उसकी राह देख रहा था-राजन को यह जानकर प्रसन्नता हुई कि पहले ही दिन हिसाब माधो से मिल गया-हिसाब देखने के बाद माधो बोला-

‘राजन, आशा है कि तुम इस कार्य को शीघ्र ही समझ लोगे।’

‘उम्मीद पर तो दुनिया कायम है दादा!’ राजन ने सामने रखे चाय के प्याले पर दृष्टि फेंकते हुए उत्तर दिया और फिर बोला-‘दादा इसकी क्या आवश्यकता थी? तुमने तो बेकार कष्ट उठाया।’ कहते हुए चाय का प्याला उठाकर फटाफट पी गया।

माधो को पहले तो बड़ा क्रोध आया, पर बनावटी मुस्कान होठों पर लाते हुए बोला-‘कष्ट काहे का-आखिर दिन भर के काम के पश्चात् एक प्याला चाय ही तो है।’

‘दादा! अब तो कल प्रातः तक की छुट्टी?’ राजन ने खाली प्याला वापस रखते हुए पूछा।

‘क्यों नहीं-हाँ, देखो यह सरकारी वर्दी रखी है और यह रहा तुम्हारा गेट पास-इसका हर समय तुम्हारे पास होना आवश्यक है।’

‘यह तो अच्छा किया-वरना सोच रहा था कि प्रतिदिन कोयले से रंगे काले मेरे वस्त्रों को धोएगा कौन?’

एक हाथ से ‘गेट पास’ और दूसरे से वस्त्र उठाते हुए वह दफ्तर की ओर चल पड़ा-कंपनी के गेट से बाहर निकलते ही राजन सीधा कुंदन के घर पहुँचा-कुंदन उसे देखते ही बोला-

‘क्यों राजन! आते ही झूठ बोलना आरंभ कर दिया?’

‘झूठ-कैसा झूठ?’

‘अच्छा बताओ रात कहाँ सोए थे?’

‘रात? स्वर्ग की सीढ़ियों पर?’

‘स्वर्ग की सीढ़ियों पर!’

‘हाँ भाई! वह पहाड़ी वाले मंदिर की सीढ़ियों पर।’

‘तो यों कहो न।’

यह सुनते ही कुंदन जोर-जोर से हँसने लगा और राजन के और समीप होते हुए बोला-‘स्वर्ग की सीढ़ियों से ही लौट आए या भीतर जाकर देवताओं के दर्शन भी किए।’

‘देवताओं के तो नहीं-परंतु एक सुंदर फूल के अवश्य ही।’

‘किसी पुजारी के हाथ से सीढ़ियों पर गिर पड़ा होगा।’

‘यों ही समझ लो-अच्छा काकी कहाँ हैं?’

‘तुम्हारे लिए खाना बना रही हैं।’

‘परंतु...।’

‘राजन! अब यों न चलेगा, जब तक तुम्हारा ठीक प्रबंध नहीं होता-तुम्हें भोजन यहीं करना होगा और रहना भी यहीं।’

‘नहीं कुंदन! ऐसा नहीं हो सकता।’

‘तो क्या तुम मुझे पराया समझते हो?’

‘पराया नहीं-बल्कि तुम्हारे और समीप आने के लिए मैं यह बोझ तुम पर डालकर तुमसे दूर नहीं होना चाहता-मैं चाहता हूँ कि अपने मित्र से दिल खोलकर कह भी सकूँ और सुन भी सकूँ।’

‘अच्छा तुम्हारी इच्छा-परंतु आज तो...!’

‘हाँ-हाँ क्यों नहीं, वैसे तो अपना घर समझ जब चाहूँ आ टपकूँ।’

‘सिर-आँखों पर... काकी भोजन शीघ्र लाओ।’ कुंदन ने आवाज दी और थोड़े ही समय में काकी भोजन ले आई-दोनों ने भरपेट भोजन किया और शुद्ध वायु सेवन के लिए बाहर खाट पर आ बैठे-इतने में मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं-राजन फिर से मौन हो गया-मानों घंटियों के शब्द ने उस पर जादू कर दिया हो-उसके मुख की आकृति बदली देख कुंदन बोला-‘क्यों राजन, क्या हुआ?’
 
‘यह शब्द सुन रहे हो कुंदन!’

‘मंदिर में पूजा हो रही है।’

‘मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है-जैसे यह शब्द मेरे कानों में बार-बार आकर कह रहे हों-इतने संसार में यदि एक-आध मनुष्य समय से पहले चला भी जाए तो हानि क्या है?’

‘अजीब बात है।’

‘तुम नहीं समझोगे कुंदन! अच्छा तो मैं चला।’

‘कहाँ?’

‘घूमने-मेरे वस्त्र यहीं रखे हैं।’

‘और लौटेंगे कब तक?’

‘यह तो नहीं जानता। मौजी मनुष्य हूँ। न जाने कहाँ खो जाऊँ?’

कहते-कहते राजन मंदिर की ओर चल पड़ा और उन्हीं सीढ़ियों पर बैठ ‘सुंदरता’ की राह देखने लगा। जरा सी आहट होती तो उसकी दृष्टि चारों ओर दौड़ जाती थी।

और वह एक थी कि जिसका कहीं चिह्न नहीं था, बैठे-बैठे रात्रि के नौ बज गए। मंदिर की घंटियों के शब्द धीरे-धीरे रात्रि की नीरसता में विलीन हो गए। उसके साथ ही थके हुए राजन की आँखें भी झपक गईं।

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दूसरे दिन जब राजन काम पर गया तो सारा दिन यह सोचकर आश्चर्य में खोया रहा कि वह पुजारिन एक स्वप्न थी या सत्य।

आखिर वह कौन है? शायद उस रात्रि की घटना से उसने सायंकाल की पूजा पर आना छोड़ दिया हो। तरह-तरह के विचार उसके मस्तिष्क में घूमने लगे। वह सोच रहा था, कब छुट्टी की घंटी बजे और वह उन्हीं सीढ़ियों पर जा बैठे। उसे पूरा विश्वास था कि वह यदि कोई वास्तविकता है तो अवश्य ही पूजा के लिए आएगी।

अचानक ही किसी शब्द ने उसे चौंका दिया, ‘राजन, क्या हो रहा है?’

यह कुंदन का कण्ठ स्वर था।

‘कोयलें की दलाली में मुँह काला।’

‘बस एक ही दिन में घबरा गए।’

‘नहीं कुंदन घबराहट कैसी? परंतु तुम आज...।’

‘जरा सिर में पीड़ा थी। दफ्तर से छुट्टी ले आया।’

‘परंतु तुमने अभी तक यह नहीं बतलाया कि क्या काम करते हो?’

‘काम लो सुनो। यह सामने जो ऊँची चट्टान एक गुफा-सी बना रही है।’

‘हाँ।’

‘बस उन्हीं के बाहर सारे दिन बैठा रहता हूँ।’

‘क्या पहरा देने के लिए?’

‘तुम्हारा अनुमान गलत नहीं।’

‘क्या भीतर कोई सोने या हीरों का खजाना है?’

‘सोने, हीरों का नहीं बल्कि विषैली गैसों का, जिन्हें अग्नि से बचाने के लिए बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है। दियासलाई, सिगरेट इत्यादि किसी भी वस्तु को भीतर नहीं ले जाने दिया जाता। यदि चाहूँ तो मैनेजर तक की तलाशी ले सकता हूँ।’

‘फिर तो तुम्हारी पदवी मैनेजर से बड़ी है।’

‘पदवी तो बड़ी है भैया, परंतु आयु छोटी।’
 
‘पदवी तो बड़ी है भैया, परंतु आयु छोटी।’

और दोनों जोर-जोर से हँसने लगे। कुंदन हँसी रोककर बोला-‘क्यों राजन आज की रात भी स्वर्ग की सीढ़ियों पर बीतेगी?’

‘आशा तो यही है।’

‘देखो... कहीं पूजा करते-करते देवता बन बैठे तो हम गरीब इंसानों को न भुला देना।’ वह मुस्कुराता हुआ फाटक की ओर बढ़ गया। राजन अपने काम की ओर लपका और फिर से कोयले की थैलियों को नीचे भेजना आरंभ कर दिया।

आखिर छुट्टी की घंटी हुई। प्रतिदिन की तरह माधो से छुट्टी पाकर राजन सीधा कुंदन के यहाँ पहुँचा। कपड़े बदलकर होटल का रास्ता लिया। उसने अपने भोजन का प्रबंध वहाँ के सराय के होटल में कर लिया था। वहाँ उसके कई साथी भी भोजन करते थे।

आज वह समय से पहले ही मंदिर पहुँच गया और सीढ़ियों पर बैठा उस पुजारिन की राह देखने लगा। पूजा का समय होते ही मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं। हर छोटी-से-छोटी आहट पर राजन के कान सतर्क हो उठते थे। परंतु उसके हृदय में बसने वाली वह पुजारिन लौटकर न आई! न आई!!

पर उस मन का क्या करे? कैसे समझाए उसे?

वह प्रतिदिन साँझ के धुँधले प्रकाश में पूजा के समय प्रतिदिन सीढ़ियों पर जा बैठता था। इसी प्रकार पुजारिन की राह देखते-देखते चार दिन बीत गए। वह न लौटी। धीरे-धीरे राजन का भ्रम एक विश्वास-सा बन गया कि वह स्वप्न था, जो उसने उस रात्रि में उन सीढ़ियों पर देखा था।

एक दिन संध्या के समय जब वह सीढ़ियों पर लेटा आकाश में बिखरे घन खंडों को देख रहा था तो आपस में मिलकर भांति-भांति की आकृतियां बनाते और फिर बिखर जाते थे, तो फिर उसके कानों में वही रुन-झुन सुनाई पड़ी। आहट हुई और स्वयं पुजारिन धीरे-धीरे पग रखती हुई सीढ़ियों पर चढ़ने लगी।

आज भी उसके हाथ में फूल थे। उसने तिरछी दृष्टि से राजन की ओर देखा और मुस्कुराती हुई मंदिर की ओर बढ़ गई।

वह सोचने लगा, यह तो भ्रम नहीं सत्य है।

यह जाँचकर वह ऐसा अनुभव करने लगा, मानो उसने अपनी खोई संपत्ति पा ली हो और बेचैनी से उसके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा। उसकी दृष्टि ऊपर वाली सीढ़ी पर टिकी हुई थी और कान पायल की झंकार को सुनने को उतावले हो रहे थे। आज वह उसे अवश्य रोककर पूछेगा। परंतु क्या?

वह सोच रहा था कि उसके कानों में वह रुन-झुन गूँज उठी, पुजारिन राजन के समीप पहुँचते ही एक पल के लिए रुक गई। एक बार पलटकर देखा और फिर सीढ़ियाँ उतरने लगी। राजन की जिह्वा तालू से चिपक गई थी, परंतु जब उसने इस प्रकार जाते देखा तो बोल उठा, ‘सुनिए!’

वह रुक गई। राजन शीघ्रता से सीढ़ियाँ उतरते हुए उसके निकट जा पहुँचा। वह चुपचाप खड़ी राजन के मुख की ओर अचल नयनों से देख रही थी।

‘क्या तुम यहाँ पूजा के लिए प्रतिदिन आती हो?’

‘क्या तुम प्रतिदिन यहाँ बैठकर मेरी राह देखते हो?’

‘राह? नहीं तो, परंतु यह तुमने कैसे जाना?’

‘ठीक वैसे ही जिस तरह तुम यह जान गए कि मैं यहाँ प्रतिदिन आती हूँ।’

‘परंतु तुम तो चार दिन से यहाँ नहीं आयीं।’

‘तुम मेरी राह नहीं देखते तो यह सब कैसे जान गए?’

‘प्रतिदिन इधर घूमने आता हूँ। कभी देखा नहीं तो सोचा कि तुमने आना छोड़ दिया और वह भी शायद मेरे कारण।’

‘भला वह क्यों?’

‘आँचल जो पकड़ लिया था।’

‘तुम समझते हो कि मैं डर गई।’ कहकर वह दबी हँसी हँसने लगी।
 
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