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Romance जलती चट्टान/गुलशन नंदा

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राजन ने एक-दो बार इधर-उधर देखा और फिर कमरे की ओर बढ़ा। पार्वती अंदर पलंग पर बैठी शून्य दृष्टि से द्वार की ओर देख रही थी। राजन को देखते ही उसने मुँह फेर लिया।

राजन समझ गया कि पार्वती नाराज है-परंतु वह उसे समझाएगा, उसकी विवशता सुनकर वह रूठेगी-फिर वह उसे मनाएगा। बोला-‘अकेली बैठी क्या कर रही हो?’

‘नाव की सैर।’

‘वाह खूब, मुझे मालूम न था कि तुम हवा में भी नाव चला सकती हो।’

‘और मुझे क्या पता था कि तुम झूठे भी हो।’

राजन मुस्कराता हुआ उसके पास जा खड़ा हुआ और हाथ से उसकी ठोड़ी अपनी ओर फेरते हुए बोला-

‘पार्वती! मैंने आज जाना कि क्रोध के आवेश में तुम और भी सुंदर दिखाई देती हो।’

पार्वती थोड़ा मुस्कुराईं, फिर बोली-‘चलो हटो, बात तो यूँ बदलते हो कि कोई कुछ न कह सके।’

‘पार्वती सच मानो कल छुट्टी दो घंटे देर से हुई।’

‘भला वह क्यों?’

‘काम अधिक था, नहीं तो...।’

‘नहीं तो क्या? घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ी।’

‘जो प्रतीक्षा में आनंद है, वह मिलन में नहीं है।’

‘यह बेतुकी बातें तुम ही जानो-क्यों आज काम पर नहीं गए।’

‘छुट्टी है।’

‘काहे की?’

‘जब मुझे पता चला कि मेरे न जाने से तुम नाराज होकर चली गई हो तो मैंने आज सारा दिन तुम्हारे पास रहने के लिए ही सब कुछ किया।’

‘तुमने कैसे जाना कि मैं नाराज होकर चली आई।’

‘इसकी साक्षी, वह कलियाँ हैं, जो निराशा के आवेश में मसल दी गई थीं।’

और राजन ने जेब से मुरझाई हुई गुलाब की कलियाँ निकाल कर सामने रख दीं। पार्वती उनको देखकर बोली, ‘तो तुम मंदिर गए थे?’

‘इसी विचार से कि तुम मेरी राह देख रही होंगी।’

‘ओह! सच? और राजन मुझे भी बाबा का ध्यान न होता तो शायद सारी रात यूँ ही प्रतीक्षा में बिता देती।’

‘सच, एक बात कहूँ, मानोगी!’

‘क्या?’

‘मेरा विचार है कि आज सीतलवादी की घाटियों और आसपास के स्थानों में घूमा जाए-मेरे साथ चलोगी?’

‘परंतु बाबा...।’

‘उन्हें मैं मना लूँगा।’ यह कहता हुआ राजन बाबा के पास गया। वे अब तक बरामदे में बैठे हुए थे। पार्वती भी धीरे-धीरे आने लगी। बाबा राजन को देखते ही बोले-‘आज काम से छुट्टी ले रखी है क्या?’

‘नहीं तो, आज सरकारी छुट्टी है।’

‘तो फिर अभी से कहाँ चल दिए... क्यों पार्वती? राजन को क्षमा कर दिया?’

पार्वती उत्तर में मुस्करा दी और बाबा फिर राजन से बोले-

‘बेटा खाना खाकर चले जाना।’

‘आज क्षमा चाहता हूँ बाबा, मुझे बाहर जाना है।’

‘कहीं परदेस?’

‘परदेस तो नहीं... सोचा आज थोड़ी सीतलवादी की सैर की जाए। सुना है सामने की पहाड़ी में एक बडे़ महात्मा का आश्रम है।’

‘हाँ राजन मन तो मेरा भी करता है, परंतु अब इन बूढ़ी हड्डियों में वैसी शक्ति नहीं रही।’

‘तो बाबा मैं चली जाऊँ?’ पार्वती झट से बोल उठी।

‘तुम्हारे बस की बात नहीं। पहाड़ी यात्रा है।’ राजन ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।
 
पार्वती को इस उत्तर पर बहुत क्रोध आया, बिगड़कर बोली, ‘शायद तुम नहीं जानते हो कि मैं इन्हीं पहाड़ियों की गोद में पली हूँ।’

बाबा दोनों की बातें सुन रहे थे, बोले-‘झगड़ा काहे का राजन ठीक कहता है। तुम्हें साथ लिए वह कहाँ जाएगा?’

‘जाता ही कौन है!’ कहकर पार्वती क्रोधित हो अंदर चली गई।

बाबा ने राजन से पूछा-‘क्या अकेले जा रहे हो?’

‘जी!’

‘तो फिर तुम्हें पार्वती को ले जाने में क्या एतराज है?’

‘एतराज तो कुछ नहीं... यही सोचा कि...।’

‘वह इतनी कोमल नहीं, जितनी तुम समझ बैठे हो। बेटा उसका है भी कौन, जो उसे साथ ले जाए। फिर कोई सखी-सहेली भी नहीं, जिससे दो घड़ी हँस-खेल ले।’

‘जैसी आपकी आज्ञा।’

राजन पार्वती के कमरे में गया। वह क्रोध में तनी बैठी थी। राजन ने उसकी बाँह पकड़ी और कहने लगा-‘चलो न देर हो रही है।’

‘मुझे नहीं जाना।’

‘तुम तो कुछ नहीं समझतीं। यदि बाबा के सामने यूँ न कहता तो जानती हो वे क्या समझते?’

‘अच्छा जी, हो बड़े समझदार! बात बनाना तो कोई तुम से सीखे। अच्छा तो तुम बाबा से बातें करो, मैं कपड़े बदलकर आई।’

थोड़ी ही देर में पार्वती एक सुंदर सी साड़ी पहने आँगन में आ खड़ी हुई। उसे देख दोनों मुस्करा दिए। जब बाबा ने भोजन को कहा तो दोनों ने कह दिया-‘भूख नहीं है।’ बाबा भली-भांति जानते थे कि दोनों को प्रसन्नता के मारे भूख नहीं लग रही। अतः उन्होंने आलू के परांठे जबरदस्ती साथ झोले में डाल दिए, दोनों हँसते-कूदते पहाड़ियों की ओर चल पड़े। रास्ते में राजन ने अपने घर से ‘मिंटो वायलन’ भी साथ ले ली। इस साज को देख पार्वती का मन प्रसन्नता से नाच उठा।

राजन पार्वती को पहले उस स्थान पर ले गया, जहाँ वह काम करता था। मैनेजर व माधो वहाँ खड़े काम करवा रहे थे। आज तार पर नया टब लटक रहा था। कुछ बाहर से आए हुए लोग बिजली की तारे आदि लगा रहे थे। राजन नई मशीन को देख प्रसन्न हुआ और एक ओर खड़ा होकर सब कुछ पार्वती को समझाने लगा। पार्वती सुन तो कुछ न रही थी, केवल टकटकी बाँधे उसके चेहरे की ओर देख रही थी। राजन कुछ रुककर कहने लगा-

‘कुछ समझी भी कि यूँ ही बोले जा रहा हूँ।’

‘हाँ राजन, सब सुन रही हूँ।’

‘बोलो, भला क्या समझी?’

‘क्या... समझी, यही कि तुम अच्छा बोल लेते हो। बोलने लगते हो तो माथे से पसीने की बूँदें गिरने लगती हैं।’ कहते-कहते पार्वती चुप हो गई, परंतु राजन हँस पड़ा, पार्वती ने भी उसका साथ दिया।

अचानक दोनों चुप हो गए। राजन ने देखा, मैनेजर व माधो सामने खड़े हैं और इनकी बिना मतलब की हँसी सुन दोनों असमंजस में हैं। राजन ने दोनों को प्रणाम किया और उसके साथ पार्वती ने भी हाथ जोड़ दिए। मैनेजर पार्वती के समीप होकर नमस्कार का उत्तर देते हुए बोला-‘शायद पूजा के दिन इन्हें देखा है?’

‘जी ठाकुर बाबा के साथ।’

‘ओह अब समझा!’ मैनेजर ने राजन की बात को काटते हुए कहा।

पार्वती मुस्करा दी।

‘शायद आज पहली ही बार इस ओर आई हो?’

‘जी... बाबा से कई बार कहा, परंतु वह टाल देते थे। आज राजन इस ओर आ रहा था, सोचा-मैं यह सब कुछ देखती ही आऊँ।’

‘अवश्य... बाबा ने मुझे ही कहला भेजा होता... खैर मैं तो आज काम में हूँ, कहो तो माधो को साथ भेज दूँ।’

‘आप कष्ट न करें-राजन जो साथ है।’

‘इसमें कष्ट काहे का और फिर राजन भी तो नया है।’

राजन पहले ही जला हुआ था, तुरंत बोल उठा-

‘मैनेजर साहब! जो आनंद खोज में है वह शायद प्राप्ति में नहीं।’ और फिर मैनेजर साहब से आज्ञा ले पार्वती के साथ ऊपर की ओर बढ़ गया।
 
मैनेजर और माधो खड़े ही देखते रह गए। जब वे दोनों दूर निकल गए तो मैनेजर माधो से बोला-‘न जाने ठाकुर बाबा को क्या सूझी कि उन्हें अकेले में यूँ भेज दिया-फिर दोनों का मेल ही क्या?’

‘मुझे भी दाल में कुछ काला मालूम होता है-देखने वाले अंधे नहीं। दोनों मिलकर दूसरों की आँखों में धूल झोंकना चाहते हैं।’

मैनेजर चुप रहा-अब तक उसकी आँखें उन्हीं की ओर लगी हुई थीं और पार्वती का सुंदर चेहरा उसके सामने घूम रहा था।

राजन और पार्वती चट्टान के पास जाकर रुके, जहाँ कुंदन की ड्यूटी थी। कुंदन दोनों को देख बहुत प्रसन्न हुआ।

राजन ने कुंदन से पूछा-

‘भैया आज्ञा हो तो चट्टानों को अंदर से देख लूँ।’

‘वहाँ क्या रखा है... अंधेरा-ही-अंधेरा... परंतु... तुम आज इधर कैसे आ निकले?’

‘आज जरा सामने पहाड़ों में उस आश्रम को देखने जा रहे हैं, जिसके बारे में तुम कहा करते थे।’

‘परंतु इतनी दूर जाओगे कैसे?’

‘इसीलिए तो कहा था कि चट्टानों से जाने दो। यहाँ से करीब भी है।’

‘तुम समझते नहीं, वह रास्ता बहुत भयानक है। उसके पीछे बारूद भरा पड़ा है, यहाँ से जाने की किसी को भी आज्ञा नहीं।’

‘अच्छा भाई चार कदम और चल लेंगे।’

‘देखो एक तरकीब मुझे सूझी है।’

‘क्या?’

‘ठहरो...’ और थोड़ी दूर खड़े एक मनुष्य को कुछ समझाने लगा, फिर दोनों को पास बुला उस मनुष्य को संग कर दिया। दोनों उसके पीछे-पीछे जाने लगे। तीनों एक ढलान उतर, रेल की पटरी के पास पहुँचकर रुक गए। छोटे-छोटे गाड़ी के डिब्बे पटरी पर चल रहे थे। राजन जो कोयला नीचे स्टेशन तक भेजता था, वह इन्हीं डिब्बों द्वारा अंदर की खानों से स्टेशन तक पहुँचाया जाता था। उस मनुष्य ने उन्हें उन डिब्बों में बैठ जाने को कहा, जो कोयला छोड़ खाली वापस लौट रहे थे। उसकी बात सुन दोनों असमंजस में पड़ गए और उसकी ओर देखने लगे।

‘हाँ-हाँ, घबराओ नहीं-इस रास्ते से तुम थोड़ी ही देर में पहाड़ी पार कर लोगे।’

पार्वती ने राजन की ओर देखा और फिर बोली-

‘परंतु...।’

‘शायद तुम डरने लगीं-अंधेरा अवश्य है, पर डर की कोई बात नहीं-हमारा तो प्रतिदिन का काम यही है।’

‘और फिर मैं भी तो साथ हूँ।’ राजन ने उस मनुष्य की बात को पूरा करते हुए कहा।

‘तो क्या तुम मुझे डरपोक समझते हो?’ पार्वती बोली और उछलकर खाली डिब्बे में जा बैठी।

उसकी पहल देख राजन हैरान हुआ और -मिंटो वायलन उसे पकड़ा कर आप भी डिब्बे में जा बैठा। पार्वती डिब्बे में बेधड़क बैठ गई पर उसका मन बैठा जाता था। धीरे-से उस आदमी से पूछने लगी-‘तो अंदर काफी अंधेरा होगा!’

‘यूँ जानो एक अंधेरी रात।’

राजन पार्वती का यह प्रश्न सुन हँसने लगा और हँसी को रोकते हुए बोला-‘काश! अंधेरी रात के बदले चाँदनी रात होती।’

उस मनुष्य ने कहा-‘तो चाँद ला दूँ।’

पार्वती यह सुन झट से बोली-‘वह कैसे?’

‘लैंप से, हमारे पास अंदर ले जाने वाले लैंप भी हैं।’

राजन बोला-‘उसकी क्या आवश्यकता है?’

‘क्यों नहीं।’ पार्वती ने उत्तर में कहा और फिर उस आदमी से बोली-‘भाई यदि कष्ट न हो तो...।’

‘मैं समझ गया, अभी लाया’ और वह लैंप के लिए एक ओर को भागा। लैंप का नाम सुन पार्वती को ढाढस बंधा और वह उसकी प्रतीक्षा करने लगी। परंतु उसके लौटने से पहले डिब्बे चल पड़े। ये देख उसका चेहरा फिर उतरने लगा, परंतु राजन उसकी इस हार पर प्रसन्न था, बोला-

‘क्यों चाँद नहीं मिला?’

‘इसमें मजाक कैसा? क्या तुम्हें लैंप की कोई आवश्यकता ही नहीं?’

‘बिलकुल नहीं, मैं तो उजाले की अपेक्षा अंधेरे को अधिक चाहता हूँ।’

‘वह क्यों?’

‘इसलिए कि चाँद हम दोनों को साथ देखकर जलता है।’

‘और अंधेरा...?’

‘हमें यूँ देखकर अपनी काली चादर में हमें छिपा लेता है, ताकि किसी की बुरी दृष्टि हम दोनों पर न पड़ जाए।’

‘फिर भी चाँदनी अंधेरे से अच्छी है।’

‘सो कैसे?’

‘अंधेरे में मनुष्य जलता है, परंतु चाँदनी सदा ही शीतलता और चैन पहुँचाती है।’

‘जलन मनुष्य को ऊपर उठाने में सहारा देती है, परंतु ठंडक तथा चैन मनुष्य को कायर बनाते हैं।’

‘तो फिर खूब जलों, तुम्हें भी ऊपर उठने का अवसर मिल जाएगा।’

‘और तुम...?’

‘हम कायर या डरपोक ही भले।’
 
डिब्बे अब पूरी रफ्तार पकड़ चुके थे। कटी हुई पहाड़ियों के बीच वह तेजी से जा रहे थे। थोड़ी-थोड़ी देर के बाद राजन और पार्वती उछलकर एक-दूसरे से टकरा जाते और फिर दृढ़तापूर्वक डिब्बे के किनारों को पकड़ लेते। पार्वती ने थोड़ी दूर पर एक अंधेरी सुरंग को अपनी ओर बढ़ते देखा तो भय के मारे उसका हृदय काँपने लगा। उसने राजन की ओर देखा तो उसके मुख से यह प्रतीत होता था, जैसे आने वाली अंधेरी गुफा की उसे कोई चिंता ही नहीं। ज्यों-ज्यों सुरंग समीप आती गई-पार्वती सरककर राजन के पास हो गई। जब गाड़ी ने सुरंग में प्रवेश किया तो चारों ओर अंधेरा छा गया।

पार्वती चिल्ला उठी और डर के मारे राजन की गर्दन में दोनों बांहें डालकर उससे जोर से लिपट गई।

बंद पहाड़ी में पटरी पर चलते डिब्बों का शोर जोर से गूँज रहा था। राजन ने उसे सीने से लगा लिया, दोनों के श्वास तेजी से चल रहे थे। दोनों चुपचाप थे, परंतु गाड़ी का स्वर दोनों के दिल की धड़कनों से ताल मिला रहा था।

जब डिब्बे सुरंग से बाहर निकले तो दोनों चुपचाप एक-दूसरे से दूर बैठे हुए थे। राजन के होठों पर एक शरारत भरी मुस्कुराहट थी, परंतु पार्वती सिर झुकाए बैठी थी। शायद यही प्रकाश उसे खाए जा रहा था और वह यही चाह रही थी कि अंधेरा फिर उसे अपनी काली चादर में छिपा ले, परंतु एक उजाला था, जो उसकी दृष्टि को ऊपर उठने ही न दे रहा था। पार्वती के चेहरे को हाथों से राजन ने अपनी ओर किया और कहने लगा-‘क्यों चाँद मिला?’

‘मिला तो...!’ पार्वती ने राजन की ओर देखते हुए कहा और उसकी सजल आँखों से आँसू छलक पड़े।

‘कहाँ था?’

‘मेरे पास।’ पार्वती ने स्नेह भरी दृष्टि से राजन को देखा और उसे खींचकर उसका सिर अपनी गोद में रख लिया, न जाने कितनी देर यौवन फूलों की गोद में सोया रहा। अचानक दोनों चौंक उठे। गाड़ी के डिब्बे रुक गए, यहाँ ही उन डिब्बों की मंजिल का अंत था, परंतु राजन और पार्वती की मंजिल अभी दूर थी।

राजन पार्वती के साथ सामने सीमेंट के बने जंगल तक पहुँचा और वहाँ खड़े मनुष्य को कंपनी का पास दिखाया। पार्वती को देख उसने अधिक पूछताछ करना ठीक न समझा और लिफ्ट में चढ़ने की आज्ञा दे दी। इसी ‘लिफ्ट’ से मनुष्यों को पहाड़ी की चोटियों तक पहुँचाया और लाया जाता था।

बिजली के बटन दबाते ही लिफ्ट गहरी और भयानक घाटियों को पार करने लगी। दोनों सलाखों के कमरे में बंद हवा में उड़ने लगे। थोड़ी देर में इतनी बुलंदी पर पहुँच गए कि सचमुच बादलों के टुकड़ों से खेलने लगे। दोनों ने जीवन में पहली बार अनोखी वस्तु देखी थी, जिसे देख-देखकर दोनों के मन प्रसन्नता से भर उठते थे। बादलों की नमी के कारण दोनों के शरीर ठण्डे हो रहे थे। राजन ने पार्वती को अपने बाहुपाश में लिया। पार्वती ने अपनी बांहों को उसके गले में डालते हुए कहा-

‘आखिर मुझे लिए कहाँ जा रहे हो?’
 
‘इस संसार से दूर।’

‘क्यों?’

‘ताकि तुम्हारे देवता तुम्हारा पीछा न कर सकें।’

‘वह तो सब स्थानों में पहुँच सकते हैं और इतनी दूर ले जा सकते हैं, जो मनुष्य की शक्ति से बाहर है।’

‘हाँ, मनुष्य उतनी दूर लेकर तो नहीं जा सकता, परंतु एक बार हाथ पकड़कर राह भी नहीं छोड़ता।’

‘क्या मालूम छोड़ ही दे।’

‘तो वह मनुष्य न होकर शैतान होता है।’

राजन ने अपने होंठ उसके गालों पर रख दिए। पार्वती ने हाथ खींच लिया और पलटकर राजन की ओर एकटक देखने लगी, अचानक एक बादल के टुकड़े ने दोनों को घेर लिया। पार्वती अवसर देख शीघ्रता से नीचे बैठ परे हो गई। राजन धुँध में पार्वती को टटोलने लगा। पार्वती लिफ्ट की सलाखों से लगी जोर-जोर से हँस रही थी। जब धुँध ने पार्वती को घेर लिया तो राजन ने शीघ्रता से उसे पकड़ लिया। उसके प्यासे होंठ पार्वती के मुख तक पहुँच ही गए। परंतु पार्वती को यह अच्छा न लगा। बोली-‘राजन, इतना अल्हड़पन अच्छा नहीं।’ और यह कहते हुए जहाँ पार्वती की आँखों में कृत्रिम क्रोध था-वहाँ स्नेह भी। एकबारगी राजन को देखा और आँखें झुका लीं।

‘शायद तुम मुझे डाँटना चाहती हो।’

‘हाँ, परंतु अब विचार बदल दिया है।’

‘वह क्यों?’

‘तरस आ गया।’

‘तरस और मुझ पर।’

‘तुम पर नहीं, तुम्हारे स्नेह पर।’ लजाते हुए पार्वती ने मुँह फेर लिया। राजन पास आकर धीरे से उसके कान तक मुँह ले जाकर बोला-

‘तो मान लूँ कि तुम मुझसे प्रेम करती हो।’

पार्वती नीचे घाटियों की ओर संकेत करते हुए बोली-‘वह गहराइयाँ देख रहे हो?’

‘हाँ।’ ‘यदि तुम जानना चाहते हो कि गहराइयों में क्या-क्या है तो कैसे जानोगे?’

‘नीचे उतर जाऊँगा।’

‘इस प्रकार यदि तुम मेरे दिल की गहराइयों में उतर जाओ तो सब जान जाओगे।’

‘उतर तो जाऊँ, परंतु बाहर से तुमने दिल का द्वार बंद कर लिया तो।’

‘तो क्या हुआ, अंधेरे में पड़े जला करना। शायद तुम्हें ऊपर उठने का मौका मिल सके।’

और एक शरारत भरी मुस्कान पार्वती के होंठों पर खेल गई।
 
इतने में लिफ्ट एक सीमेंट के चबूतरे पर आकर रुक गई। दोनों ने संतोष की साँस ली। एक ओर ऊँची-ऊँची भयानक चोटियाँ और दूसरी ओर उतनी ही नीची घाटियाँ। सीतलवादी के पथरीले मकान दूर से ऐसे प्रतीत हो रहे थे, जैसे एक कतार में छोटे-छोटे खिलौने रखे हों। मंदिर के ऊँचे गुम्बद और उसके साथ बलखाती नदी साफ दिखाई दे रही थी। बादल के टुकड़े इकट्ठे हो शायद आकाश को ढँक लेना चाहते थे, अद्भुत दृश्य था, जिसमें भय और सुंदरता दोनों छिपे हुए थे।

आश्रम आदि देखने के बाद जब दोनों महात्मा के दर्शन के लिए चले तो महात्मा के चेलों ने उन्हें रोक दिया। महात्मा उस समय पूजा कर रहे थे। उस समय उन्हें कोई भी नहीं मिल सकता था।

दोनों अपना-सा मुँह लिए आश्रम से बाहर आ गए, सामने चौड़ी-चौड़ी चट्टानों की कतार देख वहाँ चलने का निश्चय किया। सफेद चट्टानें ऐसी लग रही थीं जैसे संगमरमर का फर्श। पार्वती उछलती हुई वहाँ जा पहुँची और चप्पल उतारकर उन पर चलने लगी, ठण्डे पत्थरों पर चलते हुए वह एक अलौकिक आनंद अनुभव कर रही थी।

सामने खड़े राजन से बोली-

‘आओ देखो कैसा आनंद आ रहा है।’

‘तुम आनंद लो, मैं खाना खाता हूँ। मुझे तो भूख लगी है।’

‘तो क्या हम पत्थर खाएँगे!’

‘नहीं आलू के परांठे।’

पार्वती यह सुनते ही राजन की ओर आई और डिब्बे से निकाले हुए परांठे उसके हाथ से छीन लिए। ‘हाँ, आलू के परांठे...!’ और इतना कह राजन के पास जा बैठी।

दोनों मिलकर खाने लगे। भूख तो पहले ही दोनों को खूब लगी थी-फिर पार्वती के हाथ के परांठे... राजन उन पर टूट पड़ा। जब वह प्रशंसा करता तो पार्वती मन-ही-मन मुस्कराती और उसके चेहरे की ओर मंत्र-मुग्ध होकर देखने लगती। जब डिब्बा खाली हो गया तो राजन ने ऊपर देखा तो देखता रह गया।

पार्वती अभी पहला ही कौर लिए उसकी ओर देख रही थी।

राजन बोला-‘तुम तो...!’

‘तुमने खा लिया तो समझो मैं भी खा चुकी।’

‘नहीं पार्वती! मुझसे भूल हो गई-तुम्हारे हाथ के बने परांठों ने मुझे इतना होश में भी न रखा कि तुम भूखी हो।’

‘सच कहती हूँ मुझे भूख नहीं है।’

‘यह कैसे हो सकता है, तुम मुझसे छिपा रही हो।’

‘यदि हो भी तो तुम क्या कर सकते हो?’

‘अभी घाटी जाकर तुम्हारे लिए खाना ले आऊँ।’

‘सच?’

‘क्यों नहीं, यदि तुम कहो तो आकाश के तारे भी तोड़ लाऊँ।’

‘तो एक बात कहूँ?’

‘क्या?’

‘मिंटो वायलन बजाओ।’

‘परंतु साथ में तुम्हें नाचना होगा।’

‘इन पहाड़ों पर।’

‘हाँ, प्रकृति ने तुम्हारे आने से पहले ही चट्टानों का फर्श बिछा रखा है।’
 
पार्वती ने एक दृष्टि उन सफेद चट्टानों पर डाली और राजन ने ‘मिंटो वायलन’ के तार छेड़ दिए। पार्वती नंगे पाँव उन चट्टानों की ओर बढ़ी। उसे ऐसा लगा, जैसे स्वयं देवता बादलों पर आरूढ़ हो उसका नृत्य देखने आ रहे हों। ज्यों ही उसने पथरीली फर्श पर पैर रखा-मानो पाजेब की झंकार गूँज उठी।

वह वायलन की धुन के साथ-साथ नृत्य करने लगी।

आज वह मंदिर के बंद देवताओं को छोड़ प्रकृति की गोद में नाच रही थी। राजन भी मिंटो वायलन बजाता उसके साथ-साथ जाने लगा। अंतिम चट्टान पर वह रुक गई और तेजी से नाचने लगी। राजन की उंगलियाँ भी वायलन के तारों पर तेजी से थिरक रही थीं। दोनों एक-दूसरे की ताल में खो गए।

अचानक वायलन का तार टूट गया। तार के टूटते ही पार्वती का पाँव फिसला और वह नीचे जा गिरी। राजन चिल्लाया-‘पार्वती... पार्वती’, परंतु पार्वती की एक चीख सुनाई दी और सन्नाटा छा गया। राजन तेजी से नीचे पहुँचा, पार्वती पत्थरों पर पड़ी कराह रही थी। सिर से रक्त बह रहा था।

राजन के पाँव तले की धरती निकल गई। वह बहुत घबराया। फिर शीघ्रता से उसे अपनी बांहों में उठा लिया, पार्वती मूर्छित हो गई थी। चारों ओर बादलों की धुंध छा रही थी। राजन पथरीली चट्टानों से पग बढ़ाता आश्रम की ओर चल दिया। ज्यों ही वह आश्रम के करीब पहुँचा, लोगों के गाने का शब्द उसे जोरों से सुनाई पड़ने लगा। जब उसने आश्रम में प्रवेश किया तो महात्मा के चेले भजन गा रहे थे। किसी ने भी उनकी ओर नहीं देखा। मूर्छित पार्वती अब भी उसकी बांहों में थी।

उसने थोड़ी दूर बैठे आदमी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर पुकारा। परंतु उसने भी कोई उत्तर नहीं दिया जैसे उसने देखा ही नहीं और सुनी-अनसुनी कर दी। राजन के क्रोध का पारावार न रहा, वह जोर से चिल्लाया-‘महात्मा जी!’

सब मौन हो गए। चकित हो उसे देखने लगे। राजन यह कहते हुए ‘कहाँ हैं तुम्हारे गुरु? कहाँ हैं तुम्हारे महात्मा?’ अंदर की ओर बढ़ने लगा। एक मनुष्य आगे बढ़कर उसे रोकते हुए बोला-

‘कल प्रातःकाल तक वह किसी से नहीं मिल सकते।’

‘परंतु मुझे अभी मिलना है। मैं एक पल भी प्रतीक्षा नहीं कर सकता। किसी के जीवन का प्रश्न है।’

राजन झट से उसे हटाकर आगे बढ़ गया, सब चिल्लाए-‘ऐसा मत करो।’ परंतु राजन न माना और सामने गुफा की ओर बढ़ता ही गया। गुफा के अंदर से प्रकाश बाहर आ रहा था। राजन ने सीधा अंदर ही प्रवेश किया। सामने एक पत्थर के आसन पर महात्मा आँखें मूँदे बैठे थे। राजन ने धीरे-धीरे तीन-चार बार पुकारा-‘गुरुदेव... गुरुदेव’, परन्तु कोई उत्तर न पाया। वह कुछ और समीप हो गया और जोर से चिल्लाया, ‘महात्माजी...।’

महात्मा ने नेत्र खोले और एक कड़ी दृष्टि से राजन को देखा। फिर दृष्टि पार्वती के चेहरे पर जाकर जम गई। राजन लड़खड़ाते हुए बोला-

‘मजबूरी थी गुरुदेव! आपकी पुजारिन के जीवन का प्रश्न था। आप इसे शीघ्र ही जीवन प्रदान करें। देखिए यह मूर्छित पड़ी है।’
 
‘क्या हुआ?’ महात्मा गंभीर स्वर में बोले।

‘चट्टान से पाँव फिसल गया और गिर पड़ी।’

‘आज की तपस्या शायद किसी का जीवन बचाने को ही है।’

‘जी... इसी आशा से तो आपके पास आया हूँ।’

महात्मा अपने आसन से उठे। राजन ने उनका संकेत पाते ही नीचे बिछी चटाई पर पार्वती को लिटा दिया। महात्मा ने एक वस्त्र से बहते हुए रक्त को साफ किया... थैली से कोई दवाई निकाल उसकी चोट पर लगा दी, रक्त बहना तुरंत बंद हो गया। उसके पश्चात् उन्होंने एक जड़ी बूटी निकाली और पार्वती को सुँघाई, फिर वापस अपने आसन पर बैठते हुए बोले-‘अभी थोड़ी देर में होश आ जाएगा।’

‘मैं आपका अनुग्रह जीवन भर न भूलूँगा। यदि आप सहायता न करते तो मैं ठाकुर बाबा को जीवन भर मुँह नहीं दिखा पाता...।’

‘कौन हैं ठाकुर बाबा?’

‘पार्वती के दादा-यह उनकी अमानत है।’

‘मालूम होता है तुम दोनों का आपस में प्रेम है।’

‘प्रेम! गुरुदेव यह तो मेरे प्राण हैं।’

‘परन्तु छाया के पीछे दौड़ने से क्या लाभ?’

‘मैं समझा नहीं गुरुदेव!’

‘तुम दोनों का संबंध असंभव है।’

‘यह आप क्या कह रहे हैं?’

‘मैं नहीं... बल्कि तुम्हारे मस्तिष्क की रेखाएँ यह बता रही हैं।’

‘गुरुदेव!’

‘तुम्हारे प्रेम का परिणाम।’

‘क्या गुरुदेव?’

‘निराशा, जलन और तड़प।’

‘तो क्या मेरे प्रेम का यही अंजाम होगा।’

‘तुम्हारी आँखों की पुतलियाँ यही बता रही हैं कि यह जलन और तड़प, तुम्हारे प्रेम की निशानी छोड़ जाएगी, सारा संसार उसमें जलेगा-बस यही होगा तुम्हारे प्रेम का परिणाम।’

‘परंतु मैं अपने प्रेम को भाग्य की इन रेखाओं से ऊपर मानता हूँ।’

इतने में अपने प्रेम की ‘उफ’ सुनाई दी और दोनों ने उसकी ओर घूमकर देखा। वह चैतन्य हो चुकी थी। दोनों उसके पास गए, राजन ने महात्मा को प्रणाम किया और तुरंत ही पार्वती को सहारा देते हुए गुफा से बाहर ले आया। सब लोग दोनों को देख चकित रह गए।

राजन आश्रम से निकलते ही लिफ्ट की ओर बढ़ा, थोड़ी दूर एक बालक खड़ा उनकी ओर हाथ बढ़ा रहा था। उसके हाथ में कोई वस्तु थी, जो बादलों की धुंध के कारण दिखाई नहीं दे रही थी। दोनों उसकी ओर बढ़े।
 
बालक के हाथ में ‘मिंटो वायलन’ था, जिसे झट से राजन ने लिया और नीचे फेंकने को बढ़ा, पार्वती ने उसकी बाँह पकड़ते हुए कहा-‘यह क्या कर रहे हो राजन?’

‘यदि आज यह न होता तो तुम्हें यह चोट न लगती।’

‘तुम मुझे बहुत चाहते हो न?’

‘हाँ।’

‘फिर मेरी चोट की दवा-दारू का प्रबंध भी तुम्हीं ने किया।’

‘हाँ तो।’

‘इसी प्रकार तार टूटने से ‘मिंटो वायलन’ को चोट लगी है, तो क्या इसे फेंक दोगे। ठीक नहीं करवाओगे। इसे भी तुम बहुत चाहते हो न?’

‘परंतु तुम्हारे से अधिक नहीं।’ यह कह राजन पार्वती को सहारा देेते हुए ‘लिफ्ट’ की ओर बढ़ा।

थोड़ी ही देर में दोनों लिफ्ट में बैठ सीतलवादी की ओर उड़ने लगे। बादलों ने चारों ओर से उन्हें एक बार फिर घेर लिया। पार्वती अपना सिर राजन की गोद में रखकर लेट गई। जब बादलों की गर्जन तथा बिजली की चमक दिखाई पड़ती तो अपना मुँह उसकी गोद में छिपा लेती, परंतु राजन चुपचाप बैठा सीतलवादी की ओर देख रहा था। पार्वती उसके मुरझाए चेहरे को देख सोचने लगी, शायद बाबा से डर लग रहा है कि यह क्या कहेंगे? उसने अपना हाथ राजन की ठोड़ी तक ले जाते हुए उसे बुलाया। राजन ने मुँह नीचे कर गोद में पड़ी उन दो आँखों को देखा और बोला-

‘क्यों-क्या है?’

‘किस चिंता में हो?’

‘चिंता, चिंता कैसी?’

‘देखो, छिपाओ नहीं। कोई बात अवश्य है-क्या बाबा से डर रहे हो?’

‘नहीं तो।’

‘फिर क्या है? क्या सोच रहे हो इतनी गंभीरता से?’

‘अपने भाग्य की रेखाओं को पढ़ रहा हूँ।’

‘कैसे?’

‘वह आश्रम वाले महात्मा कहते थे... कि तुम्हारे प्रेम में सिवाय तड़प और जलन के अलावा कुछ नहीं है और जलन भी ऐसी कि एक दिन वह जलन सारे संसार को जलाएगी।’

‘तुम्हें तो सुनकर प्रसन्न होना चाहिए। जब जलोगे नहीं तो ऊपर उठोगे कैसे?’

‘पगली!’ और राजन ने अपने हाथ उसकी आँखों पर रख दिए और फिर से ‘सीतलवादी’ की ओर देखने लगा।

जब दोनों घर पहुँचे तो राजन का दिल डर के मारे बैठा जा रहा था। पार्वती की दशा देख बाबा क्या कहेंगे? क्या फिर भी उसके साथ आने देंगे उसे? यह सोचते हुए राजन ने भीतर प्रवेश किया और पार्वती को ले धीरे-धीरे कमरे की ओर बढ़ने लगा।
 
बाबा ने जब पार्वती को देखा तो पहले घबराए और दोनों को खूब डाँटा, परंतु जब वृत्तांत सुना तो उन्हें कुछ धीरज हुआ। जब उन्होंने यह सुना कि गुरुदेव ने स्वयं अपने हाथों से दवा-दारू किया तो प्रसन्न हुए कि चलो इसी बहाने पार्वती ने एक महापुरुष से सेवा का दान लिया।

बाबा ने गर्म दूध मंगवाकर पार्वती को पिलाया और उसके पास बैठ उसे प्यार से सुलाने लगे। बाहर बादलों की गड़गड़ाहट ने राजन को चौंका दिया। अब तक वह सामने खड़ा पार्वती की ओर देख रहा था। उसने अपना ‘मिंटो वायलन’ उठाया और बाबा को नमस्कार कर एक दृष्टि पार्वती पर फेरता हुआ कमरे से बाहर हो लिया। सफेद बादलों ने अब काली का रूप धारण कर लिया था और धीमी-धीमी बूँदें पड़ रही थीं। राजन जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता अपने घर की ओर जा रहा था, परंतु उसकी आँखों के सामने अब भी पार्वती की मुस्कुराती सूरत घूम रही थी।

चार

आज छुट्टी का अलार्म समय से पहले ही बज गया, कंपनी का गेट खुलते ही मजदूर अपने-अपने घरों की ओर जल्दी-जल्दी जाने लगे। आज ठंड अधिक थी। ‘सीतलवादी’ की ऊँची-ऊँची चट्टानें बर्फ से ढकी हुई थीं। सुबह की सुनहरी किरणें सफेद बर्फ को मानो चूम रही थीं और इस चुंबन के प्रभाव से बर्फ हुई जा रही थीं। धूप निकलने से हवा और ठण्डी लगती थी, जो सीतलवादियों को कंपाए जा रही थी। सर्दी से बचने के लिए लोगों ने मोटे-मोटे गर्म कोट पहन रखे थे।

मजदूरों की भीड़ को चीरता हुआ राजन भी शीघ्रता से अपने घर की ओर जा रहा था। परंतु लगता था, जैसे वह सबसे कुछ भिन्न है। प्रतिदिन की तरह आज भी वह एक कमीज में था, मानो सर्दी का कोई भी प्रभाव उस पर न हो रहा हो। समाधिस्थ-सा वह चला जा रहा था।

जब राजन ने अपने घर का द्वार खोला तो सामने खाट पर माधो को देख आश्चर्य में पड़ गया। आज माधो पहली बार उसके घर पर आया था। उसे चुप तथा आश्चर्य में देख माधो खाट से उठा और कहने लगा-‘क्यों राजन जाड़ा कैसा है?’

‘मजेदार, यह बर्फीली चट्टान, यह सुंदर दृश्य। परंतु आप इस समय।’

‘मैंने सोचा... आज खुली हवा की बजाए बंद कमरे में ही हिसाब हो जाए तो कैसा रहे।’

‘अच्छा-परंतु काम तो आज कुछ हुआ ही नहीं-फिर हिसाब कैसा?’

‘बस घबरा उठे-मैं तो मज़ाक में कह रहा था। परंतु यह समझ में नहीं आता कि तुम काम से इस प्रकार घबराते क्यों हो?’

‘मैं और काम से-नहीं दादा, मैं काम से घबराने वाला नहीं।’

‘बस, छुट्टी के बाद जब हिसाब के लिए जाना होता है-तभी तुम्हें जल्दी मचती है-क्यों कहीं जाना होता है?’

‘हाँ दादा! हर साँझ, मेरा मतलब साँझ की सैर मेरे जीवन का ऐसा अंग है, जिसे मैं सहज ही छोड़ नहीं पाता।’
 
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