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“बेटा बेशक भैया भाभी भी राज़ी नही थे इस शादी के लिए पर शादी तो हुई ना और पूरे धर्मी रिती रिवाज से हुई. तुम जल्दबाज़ी में कोई फ़ैसला मत लो. ठंडे दिमाग़ से सोच लो. अवनी बहुत अच्छी लड़की है. जितनी सेवा उसने की है तुम्हारी उतनी कोई नही कर सकता. तुम्हारे बारे में पता चलते ही वो अपनी पढ़ाई-लिखाई सब कुछ छोड कर मुंबई आ गयी थी. उसने अपना पत्नी धरम निभाया, तुम नही देख पाए लेकिन हमने देखा है. उसे ठुकराने की भूल मत करना…बहुत प्यारी बच्ची है वो. तुम्हारी जोड़ी अच्छी रहेगी.”
“बस चाचा जी प्लीज़. रहने दीजिए ये सब. मैं इस बाल-विवाह को कभी स्वीकार नही करूँगा.”
“हां बेटा मैं कौन होता हूँ, जिसकी बात तुम मानोगे.”
“नही चाचा जी आपकी हर बात मानूँगा मगर ये नही मान सकता. ७ साल पहले शादी हुई…तब मुझे होश भी नही था. बहुत बुरा लगा था मुझे उस वक्त भी कि ये क्या मज़ाक हो रहा है. पर मेरी किसी ने नही सुनी. मैने इस शादी को कभी स्वीकार नही किया और ना ही करूँगा.”
“तुम्हारे स्वीकार करने या ना करने से क्या होता है. शादी पूरे समाज के सामने हुई थी और पूरे रीति रिवाज से हुई थी. और एक बात सुन लो तुम. अवनी मुंबई अपने घर वालो से लड़ कर आई थी. किसी को उम्मीद नही थी कि तुम कोमा से निकलोगे. मगर अवनी ने उम्मीद नही छोडी. वो इतना प्यार करती है तुम्हे, पत्नी के सारे फ़र्ज़ निभाए उसने और तुम ऐसी बाते कर रहे हो. जब उसे पता लगेगा ये सब तो वो तो मर ही जाएगी. क्या कमी है उसमे जो कि तुम ऐसी बाते कर रहे हो.”
“बात कमी की नही है. मैं उस से मिलूँगा और समझा दूँगा उसे.”
“बेटा अवनी के पेरेंट्स ने किसी विश्वास के साथ भेजा था उसे मुंबई. अवनी की ज़िद्द थी वरना वो उसे कभी ना भेजते, अब तुम ऐसा बर्ताव करोगे तो तूफान आ जाएगा. वो लोग चुप नही बैठेंगे.”
“चाचा जी मुझे किसी से गिला शिकवा नही है. अवनी से मैं कभी नही मिला. बस शादी के वक्त देखा था उसे. ना ही उसके परिवार वालो से मुलाक़ात हुई बाद में कभी. मैं उनसे माफी माँग लूँगा. रिश्ते ज़बरदस्ती नही जोड़े जाते. दादा जी ने ग़लत किया था ये बाल विवाह करवा कर और मैं इस ग़लती को जींदगी भर नही धो सकता.”
“ठीक है बेटा जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. मेरा फ़र्ज़ तो तुम्हे समझाना था. भैया भाभी जींदा होते तो वो भी यही समझाते.”
“मम्मी पापा को भी मैं यही जवाब देता. अब मैं बड़ा हो गया हूँ. २१ साल उमर है मेरी. बालिग हूँ मैं अब और अपने भले बुरे का फ़ैसला खुद कर सकता हूँ. ७ साल पहले मुझे बहला फुसला कर मंडप पर बैठाया गया था. असहाय था उस वक्त मैं पर आज नही हूँ. आज किसी के आगे नही झूकुंगा. ये मेरी जींदगी है और मैं अपने तरीके से जीने का हक़ रखता हूँ.”
“मैं चलता हूँ बेटा. खुश रहो सदा. फिर भी जाते-जाते यही कहूँगा कि एक बार सोच लेना फिर से. एक मासूम लड़की की जींदगी का सवाल है जिसने पूरा साल बिना किसी स्वार्थ के तुम्हारी सेवा की है.”
“मुझे अवनी से कोई शिकवा नही है. उसने मेरे लिए इतना कुछ किया उसके लिए आभारी हूँ. पर मैं मजबूर हूँ. मैं उस से मिलकर माफी माँग लूँगा. मुझे उम्मीद है कि वो मेरी बात समझेगी.”
“बेटा क्या तुम्हारी जींदगी में कोई और लड़की है जिसके कारण तुम अवनी को ठुकरा रहे हो. अगर ऐसा है तो जान लो..उस से बेहतर पत्नी नही मिल सकती तुम्हे. जो त्याग और समर्पण उसने दिखाया है वो हर किसी के बसकि बात नही है. सोचना दुबारा फिर से. फॅक्टरी संभाल लेना जाकर अब तुम. मेरे जो बस में था मैने किया. चलता हूँ अब.”
रामदास त्रिवेदी चेहरे पर निराशा के भाव लिए वहा से निकल गया.
रघुनाथ के जाने के बाद आलिया तुरंत भाग कर आई और बोली, “तुम शादी शुदा हो और मुझे बताया तक नही. एक महीना तुम्हारे साथ रही मैं इस घर में. अब भी लंबे सफ़र के बाद तुम्हारे साथ आई हूँ. क्या ये बात नही बता सकते थे मुझे.”
“जान…मेरे लिए उस शादी का कोई मतलब नही था. मैने कभी उस शादी को शादी नही माना. बल्कि मैं तो भूल ही गया था गुड्डे-गुड्डी के उस मज़ाक को.”
“अब क्या होगा मुझे बहुत डर लग रहा है. अवनी तुम्हारी पत्नी कैसे हो सकती है. तुम पर तो सिर्फ़ मेरा अधिकार है ना राज.” आलिया रोते हुवे बोली.
“हां मुझ पर और मेरी आत्मा पर सिर्फ़ तुम्हारा अधिकार है.”
“उसने बहुत सेवा की तुम्हारी. कही तुम्हारा दिल उसके लिए पिघल तो नही जाएगा.” आलिया सुबक्ते हुवे बोली.
“पागल हो क्या. तुम्हारे सिवा मेरी जींदगी में कोई नही आ सकता. तुमने सुनी ना सारी बाते. फिर क्यों परेशान हो रही हो.”
“अवनी से मिलने मत जाना…कही वो तुम्हे मुझसे छीन ले. वादा करो कि नही मिलोगे तुम अवनी से.”
“पागल मत बनो. उस से मिलना बहुत ज़रूरी है. उसकी क्या ग़लती है. उस से मिल कर अपना पक्ष रखूँगा तभी बात बनेगी वरना तो वो मुझे ग़लत समझेगी”
“क्या वो सुंदर है?” आलिया ने आँखो से आँसू पोंछते हुवे कहा.
“मैं मिला ही कहा हूँ उस से. बस शादी के वक्त देखा था. तब बहुत छोटी थी वो. रो रही थी मंडप में आते हुवे. जैसे मुझे ज़बरदस्ती लाया गया था मंडप में वैसे ही उसे भी ला रहे थे उसके पेरेंट्स. और सुंदर हुई भी तो क्या फरक पड़ता है, मेरी आलिया का मुक़ाबला कोई नही कर सकता.”
“मिल लेना उस से मगर देखना मत उसे बिल्कुल भी, ठीक है, वरना तुम्हारा खून पी जाऊंगी मैं….. मेरे अल्लाह ये सब हमारे साथ ही क्यों हो रहा है.” आलिया ने कहा.
आलिया सोफे पर बैठ गयी सर पकड़ कर. राज ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला, “क्या हुवा जान तुम परेशान क्यों हो रही हो. मैं हूँ ना तुम्हारे साथ. तुम घबराओ मत सब ठीक है.”
“क्या ठीक है, अब जब तक तुम्हारी पहली शादी का मामला नही निपट जाता हम शादी नही कर सकते.” आलिया ने भावुक हो कर कहा.
“क्यों तुम्हे चुंबन की जल्दी पड़ी है क्या?” राज मुस्कुरा कर बोला.
“राज मज़ाक मत करो…क्या ये सब मज़ाक लग रहा है तुम्हे. किस हक़ से रहूंगी मैं अब यहा तुम्हारे साथ बताओ. अब मुझे जाना पड़ेगा ना अपने ही घर से.”
“कैसी बात कर रही हो तुम…क्यों जाना पड़ेगा तुम्हे. शादी के बिना भी ये घर तुम्हारा ही है.”
“ये तुम जानते हो, मैं जानती हूँ पर ये समाज नही जानता. तुम्हे लोग कुछ नही कहेंगे पर मेरे चरित्र की धज्जिया उड़ाई जाएँगी. लोग मुझे ग़लत नज़रो से देखेंगे. अभी तो ये भी नही पता कि धरम के ठेकेदार हमारे रिश्ते को कैसे लेंगे, उपर से ये बालविवाह का लफडा भी आ गया.राज मैं कैसे रह पाउंगी यहा…नही रह पाउंगी. तुम खुद सोच कर देखो.”
आलिया की बात बिल्कुल सही थी. उसका ऐसा सोचना स्वाभाविक था. समाज के सामने शादी किए बिना उनका साथ रहना आलिया के चरित्र को कलंकित ही करेगा. ये बात आलिया समझ रही थी मगर राज नही समझ पा रहा था.
“तो तुम मुझे और इस घर को छोड कर चली जाओगी. बहुत बढ़िया…क्या इतनी जल्दी हार मान लोगि तुम”
“एक साल तक इंतेज़ार किया मैने तुम्हारा…पूरा एक साल. हार ना कभी मानी है और ना मानूँगी. मगर मैं नही चाहती कि मैं अपने संस्कारों की धज्जियाँ उडाऊ. मेरे अम्मी-अब्बा की रूह भटकेगी अगर मैने ऐसा किया तो. मेरी परवरिश इस बात की इज़ाज़त नही देती कि मैं यहा बिना शादी किए बिना रहूं. और शादी में तो अब रुकावट आ गयी है. जब तक पहली शादी रफ़ा दफ़ा नही करते तुम तब तक दूसरी शादी कैसे करोगे.”
“आलिया किसी ने तुम्हे देखा नही है यहा आते हुवे. तुम चुपचाप यहा रह सकती हो. क्यों इतना कुछ सोच रही हो.” राज ने कहा.
“राज मैं जाना नही चाहती हूँ यहा से…पर यहा रुकना भी बहुत अजीब लग रहा है.” आलिया सुबक्ते हुवे बोली.
राज आगे बढ़ा. वो आलिया को गले लगाना चाहता था. मगर आलिया पीछे हट गयी और भाग कर अपने कमरे में आ गयी और दरवाजा बंद कर लिया.
राज भाग कर आया उसके पीछे, “जान दरवाजा खोलो यू परेशान होने से कुछ हाँसिल नही होगा. और तुम ये घर छोड कर नही जाओगी. अगर गयी तो मैं मर जाऊंगा.”
आलिया ने दरवाजा खोला और चिल्ला कर बोली, “चुप करो ऐसी बाते नही करते. मैं नही जा रही हूँ कही. मैं बस अपने परेशानी बता रही थी. तुम एक औरत की मजबूरी नही समझ सकते.”
“समझ रहा हूँ जान मगर तुम ये घर छोड कर नही जाओगी. ऐसा करते हैं, तुम यहा किरायदार बन जाओ. मैं उपर वाला कमरा झूठ मूट में दुनिया को दीखाने के लिए तुम्हे दे देता हूँ. रहोगी तुम यही नीचे हर वक्त. किसी को क्या पता चलेगा. बस बाहर से सीढ़ियाँ डलवा देता हूँ. बाहर की सीढ़ियों से उपर जाना और पीछे की सीढ़ियों से नीचे आ जाना. मैं इस बाल-विवाह के झंझट को जल्द से जल्द ख़तम करने की कोशिश करूँगा. चाहे कुछ हो जाए तुम रहोगी यही. बस मुझे रेंट देती रहना.”
“हां ये ठीक है. इस से हम साथ भी रहेंगे और दुनिया मुझे ग़लत भी नही समझेगी. पर ये रेंट का क्या चक्कर है.” आलिया अपने आँसू पोंछते हुवे बोली.
“रेंट तो भाई तुम्हे देना ही पड़ेगा.”
“हां पर कैसा रेंट.”
“रोज इस ग़रीब को अच्छा-अच्छा खाना बना कर दे देना यही रेंट है.”
“वो तो वैसे भी मैं दूँगी ही. मैं नही बनाऊंगी तो कौन बनाएगा खाना यहा” आलिया ने कहा.
“अच्छा जान तुम आराम करो मैं मार्केट से राशन ले आता हूँ. और बाहर से सीढ़ियाँ डलवाने का काम भी कल से शुरू करवा दूँगा. एक दिन में ही हो जाएगा सारा काम. फिर ४-५ दिन उसे मजबूत होने में लगेंगे फिर तुम दुनिया की नज़रो में किरायदार बन जाना. तब तक छुप कर रहो.”
“ठीक है…क्या कुछ लाओगे”
“तुम लिस्ट बना दो मैं तब तक फ्रेश हो लेता हूँ.”
“ओके…” आलिया मुस्कुरा कर बोली.
रामदास त्रिवेदी निराश-हताश घर पहुँच गया मुंबई. उनकी बीवी उन्हे देखते ही भाग कर आई उनके पास, “क्या हुवा कुछ पता चला की राज कहा है.”
“हां पता चला…” रघुनाथ बोलते-बोलते रुक गया क्योंकि उन्हे अवनी आती दीखाई दी उसकी ओर.
“चाचा जी क्या हुवा सब ठीक तो है?” अवनी ने कहा
“हां बेटा सब ठीक है. राज बिल्कुल ठीक है. आएगा तुझसे मिलने वो जल्दी ही.”
“कहा हैं वो?” अवनी ने पूछा.
“गुजरात में ही है बेटा. कुछ बहुत ज़रूरी काम था उसे जिसके कारण उसे जाना पड़ा बिना बताए.”
ये सुनते ही अवनी के चेहरे पर मुस्कान बिखर गयी. उसने मन ही मन कहा, “शुक्र है सब ठीक है.”
“चाचा जी पापा उनसे मिलने को बोल रहे थे. उन्हे मैने बताया नही है अभी की वो यहा नही हैं. आपने मना किया था ना अभी बताने से इसलिये उन्हे कुछ नही बताया, बस यही बताया है कि उन्हे होश आ गया है. अब बतायें कि क्या कहूँ पापा को. वो तो कल ही मुंबई आने को बोल रहे हैं और वो यहा नही हैं.”
“बेटा थोड़ा बैठते हैं पहले. आराम से सोचते हैं कि क्या करना है.”
“ठीक है चाचा जी. आप बैठिए आराम से, मैं चाय लाती हूँ आपके लिए… इलायची वाली.” अवनी ने कहा और कह कर चली गयी.
“कैसे बताऊंगा इस मासूम को कि जिसके लिए तुम इतना परेशान हो, जिसकी तुमने दिन रात सेवा की वो तुम्हे अपनाना ही नही चाहता. नही बता पाऊंगा इसे कुछ भी. ये काम राज को ही करना होगा.इस फूल सी बच्ची को मैं ये सब अपने मूह से नही बता सकता.” रामदास त्रिवेदी ने मन ही मन कहा.
अवनी किचन में चाय बनाती हुई बस राज को ही सोच रही थी, “आपको नींद में ही देखा मैने पूरा साल. रोज आपके चरण छू कर दिन की शुरूवात करती थी. यही दुवा करती थी मैं कि आप इस गहरी नींद से उठ जायें और आपकी गहरी नींद मुझे लग जाए. देखना चाहती थी आपको उठे हुवे. पर आप नींद से जाग कर चले भी गये यहा से और मुझे पता भी नही चला. इस से बुरा नही कर सकते थे भगवान मेरे साथ. काश दिल्ली नही जाती तो आपको देख पाती और आपके चर्नो में बैठ कर कहती की मुझे बहुत खुशी हुई आपको जागे हुवे देख कर. पता नही आप मेरे बारे में सोचते हैं कि नही पर मैं आपको बहुत प्यार करती हूँ. बचपन से ही बस आपको ही बैठा रखा है दिल में.”
“अरे अवनी चाय उबल गयी बेटा कहा खोई हो” चाची ने आवाज़ दी.
अवनी अपने विचारो से बाहर आई और तुरंत गॅस ऑफ किया, “ओह सॉरी चाची जी, ध्यान भटक गया था.”
“कोई बात नही बेटा होता है कभी-कभी. वैसे क्या सोच रही थी तुम. ज़रूर राज के बारे में ही सोच रही होगी.”
अवनी का चेहरा शरम से लाल हो गया ये सुन कर. उसने बात को टालते हुवे कहा, “आप चलिए मैं चाय लाती हूँ.”
“इतनी सुंदर और सुशील बहू हमें ढूँढे नही मिलती. अच्छा हुवा जो कि तुम बचपन में ही हमारे राज की बीवी बन गयी.” चाची ने कहा.
“चलिए ना चाची जी मैं चाय ला रही हूँ.” अवनी शरमाते हुवे बोली.
“हां ले आओ बेटा…” चाची ने कहा और चली गयी
चाची के साथ ही आरजु खड़ी थी. वो राज के चाचा, चाची की, इक-लौति संतान थी. चाची के जाने के बाद वो अवनी के पास आई और बोली, “भाभी बड़ी खुश लग रही हो. खुशी-खुशी में चाय खराब तो नही कर दी.”
“चल भाग यहा से…तुझे कौन सा चाय पीनी होती है. खराब भी हुई तो तुझे क्या फरक पड़ेगा.” अवनी ने कहा.
“वैसे भैया को ना आप देख पाई उठने के बाद और ना मैं. आप दिल्ली चली गयी और मुझे अपने कॉलेज की ट्रिप पे जाना पड़ा.” आरजु ने कहा.
“अच्छी बात ये है कि वो ठीक हैं, इन बातों से कोई फरक नही पड़ता है.” अवनी ने कहा.
“हां ये तो है…भाभी तुमने कितनी सेवा की है भैया की. कोई और इतना नही कर सकता था.”
“बस-बस…चल ये बिस्कट ले कर जा मैं चाय की ट्रे लाती हूँ.” अवनी ने कहा.
अवनी चाय लेकर आई ड्रॉयिंग रूम में तो रघुनाथ ने कहा, “बेटा मैं सोच रहा हूँ कि पहले तुम राज से मिल लो. दोनो मिल कर डिसाइड कर लो कि गोना कब करना है. फिर अपने पापा को बुला लेना.”
“नही चाचा जी कैसी बात कर रहे हैं आप. मैं कुछ डिसाइड नही कर सकती. सब कुछ मम्मी,पापा ही डिसाइड करेंगे.” अवनी ने कहा.
“वो तो ठीक है बेटा. पर वक्त बदल गया है अब. तुम दोनो एक दूसरे से मिल कर सब कुछ तैय करोगे तो अच्छा रहेगा.”
अवनी कुछ परेशान सी हो गयी ये सुन कर और चाय रख कर चली गयी वहा से.
“आप भी ना. वो कैसे करेगी बात राज से, वो भी अपने गोने के बारे में. क्या देखा नही आपने कि वो कितना शरमाती है. ज़्यादा बाते करनी आती भी नही उसे. ये बातें तो आपको ही करनी होंगी अवनी के घर वालो से. ये बच्चे क्या डिसाइड करेंगे.” चाची ने कहा
“तुम्हे नही पता भाग्यवान. आजकल के बच्चे बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. हम जो डिसाइड करेंगे शायद वो इन्हे अच्छा ना लगे.” रघुनाथ ने धीरे से कहा.
“ऐसा क्यों बोल रहे हैं आप.” चाची ने पूछा.
रघुनाथ ने पूरी बात बता दी अपनी बीवी को.
“हे भगवान! ऐसा सोच भी कैसे सकता है राज. ऐसा हुवा तो अनर्थ हो जाएगा. मैं बात करूँगी उस से. दिमाग़ खराब हो गया है उसका जो कि ऐसी बाते कर रहा है.”
“बहुत समझाया मैने उसे मगर उसने मेरी एक नही सुनी” रघुनाथ ने कहा.
“अच्छा तभी आप दोनो को मिलने को बोल रहे थे.”
“हां मैं चाहता हूँ कि जो भी बात करनी है राज खुद करे अवनी से. मैं अपने मूह से उसे ये सब नही बता सकता.”
“राज को समझाऊंगी मैं. वो मेरी बात ज़रूर मानेगा. और अवनी को देखा नही है उसने अब तक. एक बार मिल लेगा तो पता चलेगा उसे कि वो किसे ठुकराने की सोच रहा है.”
“भगवान से यही दुवा है की अवनी के साथ कोई अनर्थ ना हो. राज का कुछ नही बिगड़ेगा… वो लड़का है, सब कुछ अवनी का ही बिगड़ेगा.”
“ऐसा कुछ नही होगा आप शांत रहें. आपको अवनी की बहुत चिंता हो रही है…बिल्कुल अपनी आरजु की तरह मानते हैं आप उसे.”
“हां मेरी बेटी ही है अवनी. देख नही पाऊंगा उसके साथ ये अनर्थ होते हुवे.” रघुनाथ ने कहा.
“बस चाचा जी प्लीज़. रहने दीजिए ये सब. मैं इस बाल-विवाह को कभी स्वीकार नही करूँगा.”
“हां बेटा मैं कौन होता हूँ, जिसकी बात तुम मानोगे.”
“नही चाचा जी आपकी हर बात मानूँगा मगर ये नही मान सकता. ७ साल पहले शादी हुई…तब मुझे होश भी नही था. बहुत बुरा लगा था मुझे उस वक्त भी कि ये क्या मज़ाक हो रहा है. पर मेरी किसी ने नही सुनी. मैने इस शादी को कभी स्वीकार नही किया और ना ही करूँगा.”
“तुम्हारे स्वीकार करने या ना करने से क्या होता है. शादी पूरे समाज के सामने हुई थी और पूरे रीति रिवाज से हुई थी. और एक बात सुन लो तुम. अवनी मुंबई अपने घर वालो से लड़ कर आई थी. किसी को उम्मीद नही थी कि तुम कोमा से निकलोगे. मगर अवनी ने उम्मीद नही छोडी. वो इतना प्यार करती है तुम्हे, पत्नी के सारे फ़र्ज़ निभाए उसने और तुम ऐसी बाते कर रहे हो. जब उसे पता लगेगा ये सब तो वो तो मर ही जाएगी. क्या कमी है उसमे जो कि तुम ऐसी बाते कर रहे हो.”
“बात कमी की नही है. मैं उस से मिलूँगा और समझा दूँगा उसे.”
“बेटा अवनी के पेरेंट्स ने किसी विश्वास के साथ भेजा था उसे मुंबई. अवनी की ज़िद्द थी वरना वो उसे कभी ना भेजते, अब तुम ऐसा बर्ताव करोगे तो तूफान आ जाएगा. वो लोग चुप नही बैठेंगे.”
“चाचा जी मुझे किसी से गिला शिकवा नही है. अवनी से मैं कभी नही मिला. बस शादी के वक्त देखा था उसे. ना ही उसके परिवार वालो से मुलाक़ात हुई बाद में कभी. मैं उनसे माफी माँग लूँगा. रिश्ते ज़बरदस्ती नही जोड़े जाते. दादा जी ने ग़लत किया था ये बाल विवाह करवा कर और मैं इस ग़लती को जींदगी भर नही धो सकता.”
“ठीक है बेटा जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. मेरा फ़र्ज़ तो तुम्हे समझाना था. भैया भाभी जींदा होते तो वो भी यही समझाते.”
“मम्मी पापा को भी मैं यही जवाब देता. अब मैं बड़ा हो गया हूँ. २१ साल उमर है मेरी. बालिग हूँ मैं अब और अपने भले बुरे का फ़ैसला खुद कर सकता हूँ. ७ साल पहले मुझे बहला फुसला कर मंडप पर बैठाया गया था. असहाय था उस वक्त मैं पर आज नही हूँ. आज किसी के आगे नही झूकुंगा. ये मेरी जींदगी है और मैं अपने तरीके से जीने का हक़ रखता हूँ.”
“मैं चलता हूँ बेटा. खुश रहो सदा. फिर भी जाते-जाते यही कहूँगा कि एक बार सोच लेना फिर से. एक मासूम लड़की की जींदगी का सवाल है जिसने पूरा साल बिना किसी स्वार्थ के तुम्हारी सेवा की है.”
“मुझे अवनी से कोई शिकवा नही है. उसने मेरे लिए इतना कुछ किया उसके लिए आभारी हूँ. पर मैं मजबूर हूँ. मैं उस से मिलकर माफी माँग लूँगा. मुझे उम्मीद है कि वो मेरी बात समझेगी.”
“बेटा क्या तुम्हारी जींदगी में कोई और लड़की है जिसके कारण तुम अवनी को ठुकरा रहे हो. अगर ऐसा है तो जान लो..उस से बेहतर पत्नी नही मिल सकती तुम्हे. जो त्याग और समर्पण उसने दिखाया है वो हर किसी के बसकि बात नही है. सोचना दुबारा फिर से. फॅक्टरी संभाल लेना जाकर अब तुम. मेरे जो बस में था मैने किया. चलता हूँ अब.”
रामदास त्रिवेदी चेहरे पर निराशा के भाव लिए वहा से निकल गया.
रघुनाथ के जाने के बाद आलिया तुरंत भाग कर आई और बोली, “तुम शादी शुदा हो और मुझे बताया तक नही. एक महीना तुम्हारे साथ रही मैं इस घर में. अब भी लंबे सफ़र के बाद तुम्हारे साथ आई हूँ. क्या ये बात नही बता सकते थे मुझे.”
“जान…मेरे लिए उस शादी का कोई मतलब नही था. मैने कभी उस शादी को शादी नही माना. बल्कि मैं तो भूल ही गया था गुड्डे-गुड्डी के उस मज़ाक को.”
“अब क्या होगा मुझे बहुत डर लग रहा है. अवनी तुम्हारी पत्नी कैसे हो सकती है. तुम पर तो सिर्फ़ मेरा अधिकार है ना राज.” आलिया रोते हुवे बोली.
“हां मुझ पर और मेरी आत्मा पर सिर्फ़ तुम्हारा अधिकार है.”
“उसने बहुत सेवा की तुम्हारी. कही तुम्हारा दिल उसके लिए पिघल तो नही जाएगा.” आलिया सुबक्ते हुवे बोली.
“पागल हो क्या. तुम्हारे सिवा मेरी जींदगी में कोई नही आ सकता. तुमने सुनी ना सारी बाते. फिर क्यों परेशान हो रही हो.”
“अवनी से मिलने मत जाना…कही वो तुम्हे मुझसे छीन ले. वादा करो कि नही मिलोगे तुम अवनी से.”
“पागल मत बनो. उस से मिलना बहुत ज़रूरी है. उसकी क्या ग़लती है. उस से मिल कर अपना पक्ष रखूँगा तभी बात बनेगी वरना तो वो मुझे ग़लत समझेगी”
“क्या वो सुंदर है?” आलिया ने आँखो से आँसू पोंछते हुवे कहा.
“मैं मिला ही कहा हूँ उस से. बस शादी के वक्त देखा था. तब बहुत छोटी थी वो. रो रही थी मंडप में आते हुवे. जैसे मुझे ज़बरदस्ती लाया गया था मंडप में वैसे ही उसे भी ला रहे थे उसके पेरेंट्स. और सुंदर हुई भी तो क्या फरक पड़ता है, मेरी आलिया का मुक़ाबला कोई नही कर सकता.”
“मिल लेना उस से मगर देखना मत उसे बिल्कुल भी, ठीक है, वरना तुम्हारा खून पी जाऊंगी मैं….. मेरे अल्लाह ये सब हमारे साथ ही क्यों हो रहा है.” आलिया ने कहा.
आलिया सोफे पर बैठ गयी सर पकड़ कर. राज ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोला, “क्या हुवा जान तुम परेशान क्यों हो रही हो. मैं हूँ ना तुम्हारे साथ. तुम घबराओ मत सब ठीक है.”
“क्या ठीक है, अब जब तक तुम्हारी पहली शादी का मामला नही निपट जाता हम शादी नही कर सकते.” आलिया ने भावुक हो कर कहा.
“क्यों तुम्हे चुंबन की जल्दी पड़ी है क्या?” राज मुस्कुरा कर बोला.
“राज मज़ाक मत करो…क्या ये सब मज़ाक लग रहा है तुम्हे. किस हक़ से रहूंगी मैं अब यहा तुम्हारे साथ बताओ. अब मुझे जाना पड़ेगा ना अपने ही घर से.”
“कैसी बात कर रही हो तुम…क्यों जाना पड़ेगा तुम्हे. शादी के बिना भी ये घर तुम्हारा ही है.”
“ये तुम जानते हो, मैं जानती हूँ पर ये समाज नही जानता. तुम्हे लोग कुछ नही कहेंगे पर मेरे चरित्र की धज्जिया उड़ाई जाएँगी. लोग मुझे ग़लत नज़रो से देखेंगे. अभी तो ये भी नही पता कि धरम के ठेकेदार हमारे रिश्ते को कैसे लेंगे, उपर से ये बालविवाह का लफडा भी आ गया.राज मैं कैसे रह पाउंगी यहा…नही रह पाउंगी. तुम खुद सोच कर देखो.”
आलिया की बात बिल्कुल सही थी. उसका ऐसा सोचना स्वाभाविक था. समाज के सामने शादी किए बिना उनका साथ रहना आलिया के चरित्र को कलंकित ही करेगा. ये बात आलिया समझ रही थी मगर राज नही समझ पा रहा था.
“तो तुम मुझे और इस घर को छोड कर चली जाओगी. बहुत बढ़िया…क्या इतनी जल्दी हार मान लोगि तुम”
“एक साल तक इंतेज़ार किया मैने तुम्हारा…पूरा एक साल. हार ना कभी मानी है और ना मानूँगी. मगर मैं नही चाहती कि मैं अपने संस्कारों की धज्जियाँ उडाऊ. मेरे अम्मी-अब्बा की रूह भटकेगी अगर मैने ऐसा किया तो. मेरी परवरिश इस बात की इज़ाज़त नही देती कि मैं यहा बिना शादी किए बिना रहूं. और शादी में तो अब रुकावट आ गयी है. जब तक पहली शादी रफ़ा दफ़ा नही करते तुम तब तक दूसरी शादी कैसे करोगे.”
“आलिया किसी ने तुम्हे देखा नही है यहा आते हुवे. तुम चुपचाप यहा रह सकती हो. क्यों इतना कुछ सोच रही हो.” राज ने कहा.
“राज मैं जाना नही चाहती हूँ यहा से…पर यहा रुकना भी बहुत अजीब लग रहा है.” आलिया सुबक्ते हुवे बोली.
राज आगे बढ़ा. वो आलिया को गले लगाना चाहता था. मगर आलिया पीछे हट गयी और भाग कर अपने कमरे में आ गयी और दरवाजा बंद कर लिया.
राज भाग कर आया उसके पीछे, “जान दरवाजा खोलो यू परेशान होने से कुछ हाँसिल नही होगा. और तुम ये घर छोड कर नही जाओगी. अगर गयी तो मैं मर जाऊंगा.”
आलिया ने दरवाजा खोला और चिल्ला कर बोली, “चुप करो ऐसी बाते नही करते. मैं नही जा रही हूँ कही. मैं बस अपने परेशानी बता रही थी. तुम एक औरत की मजबूरी नही समझ सकते.”
“समझ रहा हूँ जान मगर तुम ये घर छोड कर नही जाओगी. ऐसा करते हैं, तुम यहा किरायदार बन जाओ. मैं उपर वाला कमरा झूठ मूट में दुनिया को दीखाने के लिए तुम्हे दे देता हूँ. रहोगी तुम यही नीचे हर वक्त. किसी को क्या पता चलेगा. बस बाहर से सीढ़ियाँ डलवा देता हूँ. बाहर की सीढ़ियों से उपर जाना और पीछे की सीढ़ियों से नीचे आ जाना. मैं इस बाल-विवाह के झंझट को जल्द से जल्द ख़तम करने की कोशिश करूँगा. चाहे कुछ हो जाए तुम रहोगी यही. बस मुझे रेंट देती रहना.”
“हां ये ठीक है. इस से हम साथ भी रहेंगे और दुनिया मुझे ग़लत भी नही समझेगी. पर ये रेंट का क्या चक्कर है.” आलिया अपने आँसू पोंछते हुवे बोली.
“रेंट तो भाई तुम्हे देना ही पड़ेगा.”
“हां पर कैसा रेंट.”
“रोज इस ग़रीब को अच्छा-अच्छा खाना बना कर दे देना यही रेंट है.”
“वो तो वैसे भी मैं दूँगी ही. मैं नही बनाऊंगी तो कौन बनाएगा खाना यहा” आलिया ने कहा.
“अच्छा जान तुम आराम करो मैं मार्केट से राशन ले आता हूँ. और बाहर से सीढ़ियाँ डलवाने का काम भी कल से शुरू करवा दूँगा. एक दिन में ही हो जाएगा सारा काम. फिर ४-५ दिन उसे मजबूत होने में लगेंगे फिर तुम दुनिया की नज़रो में किरायदार बन जाना. तब तक छुप कर रहो.”
“ठीक है…क्या कुछ लाओगे”
“तुम लिस्ट बना दो मैं तब तक फ्रेश हो लेता हूँ.”
“ओके…” आलिया मुस्कुरा कर बोली.
रामदास त्रिवेदी निराश-हताश घर पहुँच गया मुंबई. उनकी बीवी उन्हे देखते ही भाग कर आई उनके पास, “क्या हुवा कुछ पता चला की राज कहा है.”
“हां पता चला…” रघुनाथ बोलते-बोलते रुक गया क्योंकि उन्हे अवनी आती दीखाई दी उसकी ओर.
“चाचा जी क्या हुवा सब ठीक तो है?” अवनी ने कहा
“हां बेटा सब ठीक है. राज बिल्कुल ठीक है. आएगा तुझसे मिलने वो जल्दी ही.”
“कहा हैं वो?” अवनी ने पूछा.
“गुजरात में ही है बेटा. कुछ बहुत ज़रूरी काम था उसे जिसके कारण उसे जाना पड़ा बिना बताए.”
ये सुनते ही अवनी के चेहरे पर मुस्कान बिखर गयी. उसने मन ही मन कहा, “शुक्र है सब ठीक है.”
“चाचा जी पापा उनसे मिलने को बोल रहे थे. उन्हे मैने बताया नही है अभी की वो यहा नही हैं. आपने मना किया था ना अभी बताने से इसलिये उन्हे कुछ नही बताया, बस यही बताया है कि उन्हे होश आ गया है. अब बतायें कि क्या कहूँ पापा को. वो तो कल ही मुंबई आने को बोल रहे हैं और वो यहा नही हैं.”
“बेटा थोड़ा बैठते हैं पहले. आराम से सोचते हैं कि क्या करना है.”
“ठीक है चाचा जी. आप बैठिए आराम से, मैं चाय लाती हूँ आपके लिए… इलायची वाली.” अवनी ने कहा और कह कर चली गयी.
“कैसे बताऊंगा इस मासूम को कि जिसके लिए तुम इतना परेशान हो, जिसकी तुमने दिन रात सेवा की वो तुम्हे अपनाना ही नही चाहता. नही बता पाऊंगा इसे कुछ भी. ये काम राज को ही करना होगा.इस फूल सी बच्ची को मैं ये सब अपने मूह से नही बता सकता.” रामदास त्रिवेदी ने मन ही मन कहा.
अवनी किचन में चाय बनाती हुई बस राज को ही सोच रही थी, “आपको नींद में ही देखा मैने पूरा साल. रोज आपके चरण छू कर दिन की शुरूवात करती थी. यही दुवा करती थी मैं कि आप इस गहरी नींद से उठ जायें और आपकी गहरी नींद मुझे लग जाए. देखना चाहती थी आपको उठे हुवे. पर आप नींद से जाग कर चले भी गये यहा से और मुझे पता भी नही चला. इस से बुरा नही कर सकते थे भगवान मेरे साथ. काश दिल्ली नही जाती तो आपको देख पाती और आपके चर्नो में बैठ कर कहती की मुझे बहुत खुशी हुई आपको जागे हुवे देख कर. पता नही आप मेरे बारे में सोचते हैं कि नही पर मैं आपको बहुत प्यार करती हूँ. बचपन से ही बस आपको ही बैठा रखा है दिल में.”
“अरे अवनी चाय उबल गयी बेटा कहा खोई हो” चाची ने आवाज़ दी.
अवनी अपने विचारो से बाहर आई और तुरंत गॅस ऑफ किया, “ओह सॉरी चाची जी, ध्यान भटक गया था.”
“कोई बात नही बेटा होता है कभी-कभी. वैसे क्या सोच रही थी तुम. ज़रूर राज के बारे में ही सोच रही होगी.”
अवनी का चेहरा शरम से लाल हो गया ये सुन कर. उसने बात को टालते हुवे कहा, “आप चलिए मैं चाय लाती हूँ.”
“इतनी सुंदर और सुशील बहू हमें ढूँढे नही मिलती. अच्छा हुवा जो कि तुम बचपन में ही हमारे राज की बीवी बन गयी.” चाची ने कहा.
“चलिए ना चाची जी मैं चाय ला रही हूँ.” अवनी शरमाते हुवे बोली.
“हां ले आओ बेटा…” चाची ने कहा और चली गयी
चाची के साथ ही आरजु खड़ी थी. वो राज के चाचा, चाची की, इक-लौति संतान थी. चाची के जाने के बाद वो अवनी के पास आई और बोली, “भाभी बड़ी खुश लग रही हो. खुशी-खुशी में चाय खराब तो नही कर दी.”
“चल भाग यहा से…तुझे कौन सा चाय पीनी होती है. खराब भी हुई तो तुझे क्या फरक पड़ेगा.” अवनी ने कहा.
“वैसे भैया को ना आप देख पाई उठने के बाद और ना मैं. आप दिल्ली चली गयी और मुझे अपने कॉलेज की ट्रिप पे जाना पड़ा.” आरजु ने कहा.
“अच्छी बात ये है कि वो ठीक हैं, इन बातों से कोई फरक नही पड़ता है.” अवनी ने कहा.
“हां ये तो है…भाभी तुमने कितनी सेवा की है भैया की. कोई और इतना नही कर सकता था.”
“बस-बस…चल ये बिस्कट ले कर जा मैं चाय की ट्रे लाती हूँ.” अवनी ने कहा.
अवनी चाय लेकर आई ड्रॉयिंग रूम में तो रघुनाथ ने कहा, “बेटा मैं सोच रहा हूँ कि पहले तुम राज से मिल लो. दोनो मिल कर डिसाइड कर लो कि गोना कब करना है. फिर अपने पापा को बुला लेना.”
“नही चाचा जी कैसी बात कर रहे हैं आप. मैं कुछ डिसाइड नही कर सकती. सब कुछ मम्मी,पापा ही डिसाइड करेंगे.” अवनी ने कहा.
“वो तो ठीक है बेटा. पर वक्त बदल गया है अब. तुम दोनो एक दूसरे से मिल कर सब कुछ तैय करोगे तो अच्छा रहेगा.”
अवनी कुछ परेशान सी हो गयी ये सुन कर और चाय रख कर चली गयी वहा से.
“आप भी ना. वो कैसे करेगी बात राज से, वो भी अपने गोने के बारे में. क्या देखा नही आपने कि वो कितना शरमाती है. ज़्यादा बाते करनी आती भी नही उसे. ये बातें तो आपको ही करनी होंगी अवनी के घर वालो से. ये बच्चे क्या डिसाइड करेंगे.” चाची ने कहा
“तुम्हे नही पता भाग्यवान. आजकल के बच्चे बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. हम जो डिसाइड करेंगे शायद वो इन्हे अच्छा ना लगे.” रघुनाथ ने धीरे से कहा.
“ऐसा क्यों बोल रहे हैं आप.” चाची ने पूछा.
रघुनाथ ने पूरी बात बता दी अपनी बीवी को.
“हे भगवान! ऐसा सोच भी कैसे सकता है राज. ऐसा हुवा तो अनर्थ हो जाएगा. मैं बात करूँगी उस से. दिमाग़ खराब हो गया है उसका जो कि ऐसी बाते कर रहा है.”
“बहुत समझाया मैने उसे मगर उसने मेरी एक नही सुनी” रघुनाथ ने कहा.
“अच्छा तभी आप दोनो को मिलने को बोल रहे थे.”
“हां मैं चाहता हूँ कि जो भी बात करनी है राज खुद करे अवनी से. मैं अपने मूह से उसे ये सब नही बता सकता.”
“राज को समझाऊंगी मैं. वो मेरी बात ज़रूर मानेगा. और अवनी को देखा नही है उसने अब तक. एक बार मिल लेगा तो पता चलेगा उसे कि वो किसे ठुकराने की सोच रहा है.”
“भगवान से यही दुवा है की अवनी के साथ कोई अनर्थ ना हो. राज का कुछ नही बिगड़ेगा… वो लड़का है, सब कुछ अवनी का ही बिगड़ेगा.”
“ऐसा कुछ नही होगा आप शांत रहें. आपको अवनी की बहुत चिंता हो रही है…बिल्कुल अपनी आरजु की तरह मानते हैं आप उसे.”
“हां मेरी बेटी ही है अवनी. देख नही पाऊंगा उसके साथ ये अनर्थ होते हुवे.” रघुनाथ ने कहा.