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Romance फिर बाजी पाजेब

प्रेम ने गाड़ी कम्पाउंड के पार्किंग में रोकी और दौलतराम के ऑफिस में आ गया। सेठ दौलतराम के रूम के बाहर से उसने कहा

"मैं...अंदर आ सकता हूं सर ।'

"आइए...मिस्टर प्रेम...बैठिए।"

प्रेम ने थॅंक यू सर कहकर बैठते हुए कहा-"सर ! मैंने अपनी धर्मपत्नी को फोन कर दिया है कि

आज मैं उसके साथ नहीं जा सकूँगा। इसलिए कि आपके साथ विद्यादेवी से मिलना ज्यादा जरूरी है।"

सेठ दौलराम के चेहरे पर एक रंग आया और चला गया-उन्होंने नजरें चुराते हुए कहा-"नहीं, आज हम वहां नहीं जा रहे।"

"क्यों सर ?"

"अभी हम जगमोहन की शादी नहीं करना चाहते

"क्यों सर?"

"हम चाहते हैं कि वह ग्रेजुएशन करके कोई काम सीख ले फिर उसे शादी के बंधनों में बांधा जाए।"

"ठीक ख्याल है सर।" कहते-कहते उसके होंठों पर मुस्कराहट फैल गई और उसने सेठ दौलतराम को तीखी नजरों से देखकर कहा

"आपको और तो कोई काम नहीं मुझसे ?"

"नहीं...!"

"अच्छा, तो मैं चलता हूं और होंठों पर चतुर-सी मुस्कराहट लिए हुए बाहर चला गया। सेठ ने इन्टरकॉम का रिसीवर उठाकर बटन दबाया और रिसीवर कान से लगा लिया...दूसरी ओर से आवाज आई

"यस सर !

"क्या हुआ मिस्टर दयाल ?"

"सर ! कैश आ गया है-मैं लेकर आ रहा हूं।"

"जल्दी आ जाइए।' फिर सेठ ने रिसीवर रख दिया। थोड़ी देर बाद दयाल अंदर आने की इजाजत लेकर आया और उसने छोटा-सा ब्रीफकेस सामने रख दिया। सेठ ने दयाल से कहा-"पूरे दस लाख हैं न।"

"यस सर।"
 
"अच्छा ठीक है।"

.

दयाल के जाने के बाद दौलतराम ने चपरासी को बुलाया और एक ब्रीफकेस छोटा और बड़ा लेकर दोनों बाहर आ गए। कुछ देर बाद उनकी कार सड़क पर दौड़ रही थी.... आज सेठजी ने स्टाफ को छुट्टी दे दी थी।

कार उन्होंने एक शॉपिंग सेंटर के बार छोड़ दी पिछला दरवाजा लॉक नहीं किया-केवल बंद रहने दिया.... खुद उतर कर अंदर चले गए-उन्हें मालूम नहीं था कि काफी फासले से प्रेम की कार उनका पीछा कर रही है।

प्रेम की कार भी कुछ दूर रूक गई-वह कार से उतरा और दूसरी ओर से आड़ में होता हुआ सेठ की कार के पास आया...पिछली सीट से ब्रीफकेस उठाया और चला गया...उसके होंठों पर विजयी मुस्कराहट थी।

लगभग आधे घंटे बाद सेठ दौलतराम बाहर आए-अपनी कार में बैठकर उन्होंने पिछली सीट देखी जो खाली थी-अंदर से लॉक करके उन्होंने इंजन स्टार्ट किया और कार सड़क पर दौड़ने लगी-उनके माथे पर चिन्ता की लकीरें थीं।

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राजेश आखिरी पेपर देकर कॉलेज से निकला तो उसके चेहरे पर गहरा सन्तोष झलक रहा था-साथ में हल्की-सी खुशी भी थी, दिमाग को बोझ भी हल्का हो गया था।

मद्धिम सुरों में सीटी बजाता हुआ वह सड़क के एक तरफ फुटपाथ पर चल रहा था। अचानक उसने कछ भीड-सी देखी-एक एम्बेसडर कार भी पास ही खड़ी थी। राजेश ने एक लड़के से पूछा-"क्या मामला है ?"

"साहब छगन दादा।

"किसका दादा है ?"

"साहब, मवाली है बहुत बड़ा।"

"भाषण दे रहा है।"

"वह भाषण नहीं देता।"

"फिर क्या डुगडुगी बजा रहा है।"

"एक लड़की का किडनैप कर रहा है।"

राजेश हंस पड़ा....तो लड़के ने पूछा-'आप हंसे क्यों ?"

"यार ! लड़की का किडनैप भी कोई तमाशा है जो लोग आराम से खड़े देख रहे हैं...क्या किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि लड़की को बचा सके ?"

"साहब ! किसकी मौत आई है जो छगन से टक्कर ले सके।"

"अच्छा ! जिसकी मौत आ जाती वह ही छगन से टक्कर ले सकता है...तब तो मेरी ही मौत आई है-लड़की कितनी बड़ी है ?"

"जवान है साहब ।"

"धिक्कार है तुम लोगों पर...एक जवान लड़की को मवाली उठाए लिए जा रहा है और तुम सब तमाशा देख रहे हो।"

"फिर क्या करें ?"

"अगर वह तुम्हारी बहन होती तो क्या करते?"

लड़के के होंठ हिलकर रह गए। राजेश आगे बढ़ा....उसने भीड़ हटाई तो देखा, चार गुंडों ने एक लड़की को दबोचकर उसका मुंह बंद कर रखा था और छगन दादा रेस्टोरेंट के बाहर खड़ा कोके की बोतल मुंह से लगाकर पी रहा था।

चारों ओर भीड़...लड़की बिलबिला रही थी....लेकिन कोई आगे नहीं बढ़ रहा था रेस्टोरेंट वाले भी सहमे हुए थे-छगन ने बोतल खाली करके उछाली तो एक वेटर ने जल्दी से बोतल लपकी-छगन ने पूछा-'"पैसे मंगता ?"

"नहीं दादा, अख्खा रेस्टोरेंट तुम्हारा है।"

छगन मुड़ा और साथियों से बोला-"चलो बे....लड़की को अंदर डालो।"

अचानक राजेश आगे बढ़ा और बोला-"ठहरो दादा।"

छगन किसी खूखार भेड़िए की तरह गुर्राकर मुड़ा साथ ही उसके हाथ में चाकू भी नजर आया और सब हड़बड़ाकर पीछे हट गए। लड़की और भी सहम गई।

राजेश जल्दी से बोला-"अरे....अरे दादा....यह क्या करते हो ?"

"काहे को टोका अपुन को?"

"दादा! अपुन ने सोचा, एक कोक की बोतल मैं भी पीकर देख हूं-शायद मुझमें भी तुम्हारी तरह शक्ति

आ जाए।"

"चैलेंज करेला है ?"

"अरे तौबा।" राजेश कान पकड़कर बोला-"मुझे तो सिर्फ अपनी शक्ति परखनी है।"

"तो परख ले।"

राजेश ने वेटर से कहा-"चल बे-एक कोला इधर देने का।"

वेटर ने छगन की तरफ देखा तो छगन ने कहा-"दे दे।"

वेटर ने कोला लाकर दी जिसकी डाट राजेश ने दांतों से खोली और एक चूंट भरकर मुस्कराकर छगन को आंख मारकर कहा

-

"मजा आ गएला दादा।"

"अब फूट इंधर से।"

"दी एण्ड तो लगा लूं।" राजेश ने कोला की बोतल के मुंह पर अंगूठा लगाकर जोर से शेक किया जब बोतल गैस से भर गई तो राजेश ने

अंगूठा निकालकर फुर्ती से उसकी धारें उन गुंडों के मुंह पर मारी जिन्होंने लड़की को पकड़ रखा था-चारों ने हड़बड़ाकर लड़की को छोड़ दिया। छगन ने भेड़िए की तरह गुर्राकर चाकू वाला हाथ उठाया ही था कि उसकी नाक पर पूरे जोर से कोला की बोतल लगी-उसके हाथ से चाकू नीचे गिर गया और वह बिलबिलाकर दोनों हाथों से नाक दबाए हुए पीछे हट गया-उसकी नाक से

खून का फव्वारा उबल पड़ा था-उधर लड़की के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं....वह झपटकर राजेश के पीछे आकर छुप गई।

"भगवान के लिए मुझे बचा लीजिए।"

"घबराइए मत....आपका अब कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"

छगन नाक दबाए हुए बोला-"मार डालो हरामजादे को।"

चारों गुंडे संभलकर राजेश पर झपटे तो राजेश ने छगन वाला चाकू हवा में लहराया-दूसरे ही क्षण वह हड़बड़ाकर पीछे हट गए। राजेश ने हंसकर चाकू बंद करके नाली में फेंक दिया और बोला-"आओ।"
 
वे चारों एक साथ राजेश पर झपटे....इस बार राजेश ने एक-एक करके उन सबके जबड़े हिला दिए। कुछ देर बाद वे चारों हांफ रहे थे। राजेश

छगन की ओर मुड़ा और मुस्कराकर बोला

"दादा! मजा आ गया..इधर का कोला तो सचमुच शक्तिवर्धक है।"

"चट्टान के।" छगन गुस्से से उसकी ओर झपटा, मगर राजेश ने पीछे हटकर उसके सीने पर टक्कर मारी और वह एम्बेसडर से जा टकराया। राजेश ने फिर हिलाते हुए उससे कहा

"आओ दादा....आ जाओ।"

इस बार छगन घबरा गया था, क्योंकि उसकी नाक का खून अभी तक बंद नहीं हुअस था-वह दरवाजा खोलता हुआ गुर्राया

"अच्छा....देख लूंगा।"

"ऐनक लगाकर देखना...बगैर ऐनक के मैं आधा ही नजर आया करता हूं लोगों को।"

-

पांचों एम्बेसडर में सवार हो गए-छगन इतने लोगों के सामने अपनी पिटाई पर हीनता महसूस कर रहा था-चंद मिनटों में उसका रूआब और दबदबा हवा हो गया था...दादापन की खिल्ली उड़ने लगी थी।

राजेश ने लड़की को देख जो अभी तक घबराई-सी नजर आ रही थी। राजेश ने कहा-"घबराइए मत....अब आप सुरक्षित हैं।"

"वो....वो...ल...लोग....।"

"वे कागज के शेर हैं....जरा-सी हवा चले, उड़ जाते है....आप अब आराम से घर जा सकती हैं।"

"म....म..मुझे डर लगता है।"

"बस में चले जाइए- भीड़ में किसी को हिम्मत नहीं पड़ेगी-आपको टोकने और रोकने की।"

"इतने भरे बाजार में तो इन्होंने पकड़कर खींच लिया।"

.

.

"चलिए, मैं आपको पहुंचाए देता हूं।"

"मैं आपका उपकार कभी नहीं भूलूंगी।"

"उपकार कैसा ? मैंने तो अपना फर्ज पूरा किया है।" फिर अचानक राजेश हंसने लगा तो लड़की ने पूछा

"आप हंसे क्यों ?"

राजेश ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोकते हुए कहा-"कुछ याद आ गया था कितना

घिसा-पिटा फिल्मी डायलॉग है-एक नौजवान ने एक लड़की को गुंडों से बचाया और लड़की ने यही उपकार की बात कही....और नौजवान ने यही 'फर्ज' वाला डायलॉग दोहराया जो मैंने आपसे कहा है।" और वह फिर हंस पड़ा-अबकी लड़की भी जरा-सा मुस्कराई। राजेश ने कहा-"चलिए-कहां जाना है-कौन-से नम्बर की बस जाती है ?"

"मैं बस से नहीं जाऊंगी।"

"आई एम सॉरी मिस! मैं तो कॉलेज भी पैदल ही आता-जाता हूं...गरीब आदमी हूं...मेरे पास टैक्सी का भी किराया नहीं है।"

"वह मैं दूंगी।"

.

"चलिए. मगर एक शर्त पर वापस मैं पैदल ही आऊंगा।"

"आप चलिए तो सही।"

दोनों टैक्सी में बैठ गए-लड़की ने पात बताया

और टैक्सी चल पड़ी तो राजेश ने कहा

"एक बात समझ में नहीं आती। सड़क पर इतनी लड़कियां आ-जा रही थीं तो छगन ने आपही को क्यों चुना किडनैपिंग के लिए भरी सड़क पर ?"

"छगन दादा को किराए पर हासिल किया गया है-अच्छी रकम पर।"

"तो आपका कोई ऐसा दुश्मन भी है।"

"एक ही है जो पिछले दस बरस से मेरे पीछे लगा हुआ है।"

"कौन है वह ?"

"शक्ति !"

"यह कौन-सी बला है?"

"वह कहता है कि मेरे बाबूजी ने बचपन ही से उसे मेरा मंगेतर मान लिया था...मगर मेरे बाबूजी ने ऐसा कुछ भी नहीं बताया...न मुझे और न मां को।"

"ओहो...शक्ति, मंगेतर, बाबूजी....क्या आप लोगों की कहानी में कोई और लड़का भी है ?"

"जी हां।" फिर लड़की चौंककर बोली-"आपको कैसे पता ?"

राजेश ने कहा-'आपका नाम सुनीता तो नहीं है?"

"जी हां।"

राजेश ने फिर ठहाका लगाया तो सुनीता ने उसे आश्चर्य से देखते हुए पूछा-"आप हंसे क्यों ?"

"इस सुन्दर संयोग पर।"

"मैं समझी नहीं।"

"पूरे दस बरस पहले आपने शक्ति से कहा था-मैंने राजेश को अपना ब्वॉय फ्रेंड माना है।"

"ओहो..!"

"और मैंने कहा था कि वयस्क होने तक फैसला बदला भी जा सकता है, क्योंकि हम दोनों को स्कूल पहुंचना था।"

अचानक सुनीता ने भी ठहाका लगाया और बोली

"सच है, संयोग भी कोई भगवान की ओर से मिलने-मिलाने का साधन बन जाता है। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि पूरे दस बरस बाद आपसे फिर इस तरह मुलाकात हो जाएगी।"

"मैंने भी नहीं सोचा था....मगर आपका मंगेतर है बड़ा सख्त जान ।"

कुछ भी हो....आपके सामने टिकने का साहस उसमें नहीं।"

"मुझे उसने अभी देखा ही कहां हैं"

"मगर छगन ने तो आपको देख भी लिया और जान भी लिया और उसे बताएगा कि मुझे आपने छुड़वाया है।"

राजेश हंसने लगा। कुछ देर बाद टैक्सी एक बंगले के सामने रूक गई।

सुनीता ने टैक्सी को किराया चुकारा तो राजेश ने पूछा

"आपका बंगला है यह ?"

"जी हां।"

"बहुत सुन्दर जगह है।

अचानक वही पुरानी फियेट कार लहराती हुई आई

और दोनों ठिठककर रूक गए। राजेश ने कहा-"यह तो आपके मंगेतर की कार है-मतलब यह कि छगन ने उसे खबर कर दी।"

.

.

.

"जरूर-मेरी ही राह देखता होगा।"
 
कार के ब्रेक चिरमिराए और वह रूक गई-सुनीता ने राजेश के हाथ में अपना हाथ डाल लिया और राजेश आराम से खड़ा रहा। शक्ति जल्दी से कार से उतरता हुआ बोला-"सुनीता तुम्हें कुछ हुआ तो

नहीं ?"

"बिल्कुल नहीं।"

"थैक्स गॉड ! मेरा तो दम ही निकल गया था।"

"मुझे होता क्या ?"

"कुछ भी हो सकता था।"

"तुम्हें पता कैसे चला ?"

"वो....वह मुझे किसी ने बताया था कि छगन दादा ने तुम्हें किडनैप करने की कोशिश की थी।"

"अच्छा !" राजेश ने कहा-'छगन दादा ने बताया

था जो चार गुंडे लेकर आया था।"

"जी हां....जी हां....।" फिर वह चौंककर बोला-"जी नहीं, जी नहीं....किसी पहचान वाले ने बताया था मेरा तो दम ही निकल गया था।"

"आश्चर्य है कि दम निकलने के बाद भी तुम अपने पैरों पर खड़े हो।"

शक्ति ने चौंककर उसका हाथ देखा जो सुनीता ने थाम रखा था।

शक्ति ने सुनीता से पूछा-"आप! क्या मैं जान सकता हूं?"

"आप वही हैं जिन्होंने मुझे छगन और उसके गुंडों से भरे बाजार में बचाया था।"



शक्ति ने राजेश की ओर हाथ बढ़ाकर कहा-"बड़ी खुशी हुई आपसे मिलकर।"

राजेश ने बायां हाथ मिलाने को बढ़ा दिया तो शक्ति ने अपना हाथ खीचते हुए कहा-"बायां हाथ दुश्मन से मिलाया जाता है।"

"क्या करूं ! मेरा दायां हाथ एंगेन्ड है।"

शक्ति ने सुनीता से कहा-"इनका हाथ छोड़ दो सुनीता।"



"क्यों ?"

"मैं इनका धन्यवाद करना चाहता हूं-इन्होंने तुम्हें गुण्डों से बचाकर मुझ पर उपकार किया है।"

"तुम्हारे ऊपर नहीं, खुद अपने ऊपर उपकार किया है।"

"कैसे ?"

"तुमने इन्हें पहचाना नहीं।'

"नहीं...!"

"यह मेरे ब्वॉय फ्रेंड हैं।"

"हाट ?"

"दस बरस पहले मैं इन्हें तुमसे मिला चुकी हूं। मैं इनसे मुहब्बत करती हूं।"

"पर तुम तो मेरी मंगेतर हो।"

"तुम्हें तो मैं पहले ही रिजैक्ट कर चुकी हूं-जब तुमने मेरी इज्जत लूटने के लिए मुझ पर हमला किया था।"

"मगर मैंने माफी तो मांग ली थी....उस नादानी की।

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"मैंने माफ भी कर दिया था।"

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"फिर भी यह तुम्हारे ाय फ्रेंड हैं ?"

"माफी तुमने मांगी थी-इनसे मैं मुहब्बत करती हूं-यह मुझे साथ ले जाना चाहें तो जबरदस्ती की जरूरत नहीं पड़ेगी।"

"क्या ! तुम मेरी मंगेतर हो या इसकी ?"

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"जबान संभालकर बात करो–मेरे ब्वॉय फ्रेंड के लिए तुम ऐसे अशिष्ट शब्द नहीं कह सकते।"

"और तुम मेरी मंगेतर होकर कहीं आ-जा सकती हो?"

"फिर तुमने बदतमीजी की?" फिर वह राजेश से बोली-"डार्लिंग, जरा इन्हें समझाओ तो सही।"

"अच्छी बात है।" शक्ति जल्दी से पीछे हटते हुए बोला-"देख लूंगा तुम्हें ।'

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"ऐनक लगाकर देखना।"

शक्ति कार में बैठा और कार लहरें लेती हुई चली गई।

राजेश ने धीरे से अपना हाथ सुनीता के हाथ से निकाल लिया और बोला-"सुनीता जी ! अब मुझे

आज्ञा दें।"

"हर्गिज नहीं...आप बंगले तक आएं और बाहर से लौट जाएं....कम से कम एक प्याली चाय तो पीकर जाइएगा।"

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राजेश ने हल्की सांस ली और बोला-"जैसे आपका आदेश।

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सुनीता उसे अंदर ले आई-इस समय केवल एक ही क्लास थी-कुछ लड़के-लड़कियां फर्श पर बिछी दरियों पर बैठे थे। सुनीता ने रूककर देखा

तो बच्चों ने कहा-"नमस्ते दीदी।"

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"नमस्ते!" सुनीता ने पूछा-"मां कहां हैं ?"

"रसोई में गई हैं-हम लोगों के लिए खाना बनाने।"

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"अच्छा....आज मैं लेट हो गई हूं....तुम लोग स्वयं पठन करो-मैं मां को भेजवाती हूं।''

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राजेश आश्चर्य से देख रहा था। सुनीता उसे आगे लाई और स्टाफ रूम की ओर इशरा करके बोली-"आप जरा यहां बैठिए-मैं अभी आई।"

"सुनिए...आप स्कूल चलाती हैं ?"

"नहीं...कोचिंग सेंअर समझिए....स्कूल तो अभी एक सपना है....यहां गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाया जाता है-किताबें भी हम देते हैं...दोपहर का खाना भी...परीक्षा के लिए प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में उनके फार्म भी भरते हैं। आठवीं क्लास तक ।"

"यह तो बहुत महान सोशल वर्क है।"

"यह तो हमारे बाबूजी और दादाजी को सपना है।"

"अच्छा-आप खाना बनाने में मांजी की मदद करें-तब तक मैं क्लास लेता हूं।"

"रहने दीजिए।"

"सुनीता जी ! विद्यादान महादान....विद्या ऐसा धन है जिसे जितना बांटा जाए उतना ही बढ़ती है।"

सुनीता मुस्कराई और बोली-'आपके विचार बहुत अच्छे हैं।" और किचन में चली गई।

विद्यादेवी खाना बना रही थीं....कदमों को आहटें

सुनकर वह मुड़ी और बोली-"आ गई-आज बहुत देर कर दी।"



"मां ! आप वापस आ गई, यही मरा सौभाग्य है।"

विद्यादेवी ने चौंककर कहा-"क्या कह रही हो बेटी
 
"सच कह रही हूं मां....वह लफंगा शक्ति।"

"फिर कोई बदतमीजी की थी उसने ?"

"आज उसने मुझे अगवा कराने के कोशिश की थी।"

"हाय राम !"

"भला हो राजेश बाबू का जो संयोग से मिल गए

और मुझे बचा लिया।"

"क्या यह नीचता शक्ति ने की ?"

"उसने मशहूर मवाली छगन दादा और चार खरीदे हुए गुण्डों द्वारा मुझे भरे बाजार में उठवाने की

कोशिश की...।"

"हे प्रभु ! और वह जिसने तुम्हें बचाया था ?"

-

"राजेश !"

"क्या वह अकेला ही भिड़ गया था उससे ?"

"हां, राजेश ने अकेले ही छगन की नाक तोड़ डाली और बाकी चार गुंडों को मार भगाया।"

"धन्य हो भगवान!"

"राजेश मेरे साथ आए हैं।"

"कहां है ?"

"क्लास ले रहे हैं बच्चों की।"

"अरे ! पढ़ाने भी लगा।"

"मैंने तो रोका, माने ही नहीं।"

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.

"चल ! मैं मिल तो लूं उससे।"

"मैं चाय बना लूं उसके लिए।" सुनीता ने जल्दी-जल्दी चाय बनाते हुए कहा।

फिर पूछा

"खाना तो बन चुका है न।"

"हां बन गया है।"

"मुझे इसी की चिन्ता थी...तुम्हारी तबीयत वैसे भी ठीक नहीं....इलाज कोई हो नहीं रहा।"

"अब काहे का इलाज बेटी....बुढ़ापा तो वैसे भी एक बीमारी होता है आदमी के लिए।"

सुनीता ने चाय की प्याली एक थाली में रखी और जल्दी से बाहर आ गई।

राजेश बच्चों को किताब में से पढ़ा रहा था-"उ से उल्लू।" बच्चों ने मिलकर एक आवाज में दोहराया-'उ से उल्लू'

उसने पूछा-"तुममें से किसी ने उल्लू देखा है ?"

"हम लोगों ने उल्लू की तस्वीर देखी है मास्टर जी।"

राजेश ने कहा-"उल्लू का चेहरा चपटा होता है-दोनों आखें सामने, बड़ी तेज नजर-अंधेरे में बड़ी तेजी से अपने शिकार पर झपटता है-सारे पक्षियों से अकलमंद होता है....बड़ा सजग ।"

अचानक पीछे से सुनीता ने कहा-'अगर पाठ पूरा हो गया हो तो चाय पी लीजिए।"

"अरे....सुनीता जी।' राजेश कहता हुआ मुड़ा और चौंककर बोला-"ओह! मांजी!" उसने बढ़कर विद्यादेवी के चरण हुए....उन्होंने सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया-"जीते रहो, युगों-युगों भगवान तुम्हें सदा सुखी रखें।"

"बस मां जी...इतना ही आशीर्वाद काफी है-युगों जीकर आदमी क्या करेगा? इतने ही अधिक पाप करेगा।"

"बेटा ! तुम जैसे लोगों से पुण्य की आशा अधिक होती है-आज तुमने जो कुछ किया है यह तुम्हारी प्रकृति है-निर्मल, कोमल, सहानुभूति ।"

फिर वह तीनों कमरे में आ गए और चाय पीने लगे-थोड़ी देर बाद जब राजेश ने विदा ली तो सुनीता की आंखों में एक चमक भरी खुशी नजर आ रही थी।

राजेश ने जल्दी-जल्दी बोर्ड पर अपना नाम देखा फिर किसी दूसरे स्टूडेंट ने उसे जोर से पुकारा-"राजेश! तुम्हारा रिजल्ट यह रहा।"

"कया है ?" जल्दी बता ।"

"तुमने टॉप किया है पूरे राज्य में।"

"हुर्रे !' राजेश ने खुशी भरा नारा लगाया और दौड़ता हुआ बाहर आ गया।

सामने से आती एक कार की चपेट में आते-आते बचा....ऊंची छलांग लगाई तो कार नीचे से निकल गई।

.

………………….
 
राजेश तेजी से दौड़ता रहा....कभी फुटपाथ पर, कभी सड़क पर...कभी कार के बोनट पर चढ़कर दूसरी ओर उतर जाता। यही दौड़ते-दौड़ते वह जगमोहन के कॉलेज के पास आ गया।

उसी समय जगमोहन की कार निकली और राजेश चिल्लाया

"ओ जग्गी, रूक।"

जगमोहन ने फुर्ती से कार को ब्रेक लगाए जिसमें लड़के-लड़कियां इस तरह भरे हुए थे जैसे दरबे में मुर्गियां। जगमोहन जल्दी से उतरता हुआ चिल्लाया-"राजे! मैं पास हो गया।"

"जग्गी ! मैं भी पास हो गया हूं।" फिर दोनों एक-दूसरे से लिपट गए और देर तक हंसते रहे। राजेश ने कहा

"चल! आज मैं कार में तेरे साथ चलूंगा।"

"सच....!"

"बिल्कुल सच।"

"अरे! अब मैं सिविल इंजीनियर बन गया हूं-वह मुझसे काम ले सकते हैं...अपनी कम्पनी में।"

फिर वह कार के पास आया....खचाखच भरी कार में बैठे लड़के-लड़कियों को नम्रता से जगमोहन ने उतार दिया और एक बड़े लड़के को सौ रूपए को नोट थमाते हुए कहा-"इन सबको बस का टिकट ले देना।" दोनों कार में बैठ गए ड्राइविंग सीट राजेश ने संभाल ली और कार सड़क पर दौड़ने लगी। रास्ते में जगमोहन ने उससे पूछा-"कौन-सी डिवीजन में पास हुआ है तू ?"

"पूरी स्टेट में टॉप किया है।"

"वण्डरफुल ।"

"और तू ?"

"सैकेंड डिवीजन आई है।"

"अरे ! तू पास हो गया यही क्या कम है।"

कार फर्राटे भरती हुई बंगले तक पहुंच गई। सामने ही पारो नजर आई जो नौकर को कोई आदेश दे रही थी। राजेश कार से उतरकर चिल्लाया-"बड़ी मां।" और दूसरे ही क्षण वह

झपटकर उनके पास गया-उनके चरण स्पर्श किए

और सीधा होता हुआ बोला

"बड़ी मां, मैं और जग्गी दोनों पास हो गए हैं।"

"धन्य हो भगवान !"

पीछे से कमला की आवाज आई-"राजेश !"

राजेश मुड़ा तो कमला के पांव जगमोहन छूकर कह रहा था-"मौसी मैं भी पास हो गया हूं।"

"मैं जानती थी तुम दोनों पास हो जाओगे।"

अचानक सेठ दौलतराम की कड़कती आवाज आई-"यह क्या हो रहा है ?"

वे लोग हड़बड़ाकर मुड़े। जगमोहन जल्दी से हाथ बांधे सिर झुकाकर खड़ा हो गया। पारो के चेहरे पर एक रंग आकर चला गया। कमला का चेहरा पीला पड़ गया-उसके होंठ कांपते रह गए।

सेठजी ने गुस्से ने कहा-"यह क्या नाटक लगा रखा है ?"

पारो ने जल्दी से कहा-"सुनिए जी।"

.

"क्या सुनूं ?"

"आज दोनों बच्चे पास हो गए हैं, दोनों खुश हैं-आज इनकी खुशी को खंडित मत

कीजिए-नाराज मत होइए।"

"पारो ! हमारा बेटा, सेठ दौलतराम का बेटा एक ड्राइवर की पत्नी के पांव छू रहा है और ड्राइवर

का बेटा तुमसे आशीर्वाद ले रहा है और हम चुप रहें।"

" नाथ.!"

"मत बको ! ये लोग अपनी औकाल भूल गए हैं-मगर तुम्हें तो अपना रिश्ता नहीं भूलना चाहिए

मालिक मालिक रहेगा और नौकर नौकर ही रहेगा-ज्यादा मुंह लगाकर सिर चढ़ाने की जरूरत

नहीं।"

राजेश ने आगे बढ़कर कहा-"बस । बहुत हो चुका सेठजी-"हमें हमारी औकात का एहसास मत दिलाइए अब मैं सिविल इंजीनियर हूं-पूरी स्टेट में टॉप किया है-मामूली ड्राइवर का बेटा नहीं हूं...और मेरे पूज्य पिताजी जिन्हें आप मामूली ड्राइवर कह रहे हैं उन्होंने आपकी जान बचाने के लिए इतनी बड़ी कुर्बानी दे दी...और मुझे विश्वास है कि मास्टर जी को उन्होंने नहीं मारा....यह कोई साजिश है...आपका अपराध उन्होंने अपने सिर पर ले लिया है-अब मैं ड्राइवर बनकर नहीं रहूंगा।"

"फिर क्या करोगे ?" बिल्डर बनोगे ?"

"कम से कम इंजीनिरयर तो बन ही सकता हूं-और अब मेरी मां भी रसोई में काम नहीं करेगी...मैं अभी लिए जा रहा हूं इन्हें ।" फिर वह मां से बोला-"चलो मां....अभी चलो यहां से।"

"तड़ाका...तड़ाक।" अचानक राजेश के दोनों गालों पर कई चांटे पड़े...राजेश हड़बड़ाकर कहा-"मां।"

.
 
"कमीने...नमकहराम, जिस खानदान का नमक खून बनकर तेरी रगों में दौड़ रहा है....उसी खानदान के

मालिक के साथ जबान लड़ा रहा है... भूल गया, क्या उपेदश दिया था जेल जाते समय तेरे पिता ने...हमारे पुरखों की आत्माओं को मत शर्मिंदा होने देना। बड़ा आया इंजीनियरा बनने वाला। अरे यह डिग्री मिली है तो किसकी दया से....देवी जैसी मालकिन की दया से जिनके पति यह देवता.... मालिक हैं।"

"मा....!"

.

"दूर हो जा मेरी आंखों से कर ले नौकरी कहीं इंजीनियर की मगर मैं तेरी कमाई से एक ग्रास तक नहीं खाऊंगी। मैंने तेरे पिता को वचन दिया था इस खानदान की सेवा का उनकी वापसी से पहले मैं एक कदम भी यहां से बाहर नहीं निकालूंगी।"

राजेश के चेहरे पर कई रंग आए और गए-फिर उसने धीरे से कहा-"मां! मुझे क्षमा कर दो।"

-

"कदापि नहीं...तुझ जैसे नालायक की तो मैं सूरत तक नहीं देखना चाहती।"

अचानक पारो ने आगे बढ़कर कहा-"जाने दो कमला ! बच्चा ही तो है...जोश में कह गया-फिर सारे राज्य में अव्वल नम्बर पर आया है-कितनी मेहनत की है-इसे गले से लगाकर बधाई दो।"

"मैं इसे तब तक क्षमा नहीं करूंगी जब तक इसे बड़े मालिक क्षमा न कर दें।"

पारो ने राजेश ने कहा-"जा, राजे बेटा, मालिक

से माफी मांग ले।"

राजेश सेठ दौलतराम जी के पास गया और बोला-"बड़े मालिक-मुझे क्षमा करे दें-भावुकता में न जाने मैं क्या-क्या बक गया-अब मैं कभी ऐसी हरकत नहीं करूंगा-आप हमोर अन्नदाता हैं।"



सेठजी बोले-"हमने तुम्हें माफ किया।" फिर वह मुड़कर चलने लगे तो पारो से बोले-"जब तुम लोग आपस में मिल लो तो राजेश को हमारे आफिस में नीचे ही भेज देना।"

"जी मालिक ! मैं हाजिर हो जाऊगा।"

"हां पारो।" सेठ पारो से बोले-"इन दोनों के पास होने की खुशी में पार्टी का इन्तजाम करो जिसमें...इनके सब दोस्तों और साथियों को निमंत्रण पत्र भिजवा दो। हमें बहुत खुशी हुई है।"

यह कहकर सेठ दौलतराम अंदर चले गए। राजेश अनायास जगमोहन से लिपट गया-पारो ने भी उसे लिपटा लिया-उनकी आंखों में भी आंसू छलक रहे थे।

"मैं अंदर आ सकता हूं मालिक ?"

.

"हां राजेश....आ जाओ।"

राजेश ऑफिस में दाखिल हुआ तो सेठ ने कहा-"बैठो।"

राजेश में आश्चर्य से कहा-"मैं....आपके सामने ?'

"हां ! अब तुम हमारे ड्राइवर के बेटे नहीं हो बल्कि दौलत बिल्डर्स के एक इंजीनियर हो।"

राजेश बैठ गया....दौलतराम ने कहा–''पहले तुम हमें वचन दो कि इस कमरे में हम जो बातें तुमसे करेंगे वह हम दोनों के सिवा किसी तीसरे को नहीं मालूम होनी चाहिए–चाहे वह तुम्हारी मां हों या बड़ी मां।"

"मालिक ! मैं आपको वचन देता हूं। यह सब मुझ तक ही रहेगा।"

"दूसरी बात...अब तुम हमें मालिक नहीं, सेठ जी कहा करोगे।"

.

"जी, सेठजी।"

सेठ जी ने कुर्सी की बैक रेस्ट से पीठ लगा लगाकर कहा-"यह समझ लो, हमने तुम्हें आज ही से अपनी कम्पनी में नौकर रख लिया है।"

"मालिक ! मैंने आपके साथ इतनी उद्दण्डता की, फिर भी आप मुझे यह सम्मान दे रहे हैं।"

"मालिक नहीं.सेठ जी।"

"जी....सेठजी।"

.

.

.

.

-

"राजेश ! तुम्हारी इस उद्दण्डता ने हमारी आंखें

खोल दी हैं.....हमें याद आ गया है....हमें ज्ञान हुआ कि अब वह समय नहीं रहा जब नौकर मालिक सदा के लिए नौकर मालिक ही रहते थे। आज का नौकर अपनी सन्तान को पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना चाहता है ताकि वह नौकरों की भीड़ से अलग हो सके....ऊंचा उठ सके....स्वयं अपना भविष्य निर्माण कर सके।

.

.

.

तुम्हारे पिताजी पुराने विचारों के हैं....यूं भी जो उपेदश उन्होंने तुम्हें दिया था, वह दस बरस पहले की बात थी-दस बरसों में जमाना कहां से कहां जा पहुंचा है...फिर तुम जैसा पढ़ा-लिखा योग्य नौजवान जो सिविल इंजीनियर में स्टेट भर में अव्वल आया है-क्या वह ड्राइवर या माली बनना पसंद करेगा ?"

चंद क्षण रूककर उन्होंने कहा-"इसलिए हमने फैसला कर लिया है कि तुम हमारे खानदानी नौकर नहीं हमारी कम्पनी में इंजीनियर बनकर रहोगे...कमला बहन भी अब सर्बेन्ट क्वार्टर में नहीं रहेंगा।"

"सेठ जी! आप सचमुच देवता हैं।"

"नहीं राजेश, हम एक मामूली आदमी हैं...आम आदमियों की तरह जिनसे भूले भी होती हैं हमसे भी एक बहुत बड़ी भूल हुई है। जिसका सुधार अब तुम ही कर सकते हों"

"हुक्म दीजिए सेठजी।"

"तुम जानते होगे कि हमने मास्टर देवीदयाल का बंगला खरीदना चाहा था...उनसे बात भी तय हो

चुकी थी-मगर मास्टर देवीदयाल जैसे महात्मा की नीयत में खोट आ गई और उन्होंने हमारा दस लाख रूपया एडवांस में दिया हजम कर लिया।"

"ओहो!"

"तुम दिमाग से सोचो-"आदमी चाहे करोड़पति हो अगर उसकी जेब, कटकर दस हजार रूपए भी निकल जाएं तो कितना दुःख होता है।"

"बेशक....सेठजी!

"हमें भी दुःख हुआ था और हमने फैसला किया था कि उन्हें इसकी सजा जरूर देंगे।"

"स्वाभाविक है।"

"हमने मास्टर देवीदयाल को मामला निबटाने के बहाने बुलाया मगर हमें नहीं मालूम था कि दूसरे नेताओं के सामन वह भी दिखावे के नेता हैं...वह मामला निबटाने आए तो मगर भरा रिवाल्वर साथ लेकर आ गए थे।"

"ओहो !"

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"मामलात प्रेम द्वारा तय होने थे-मास्टर देवीदयाल तो आ गए, मगर उस समय प्रेम नहीं आया था-देवीदयाल ने हमारे साथ हिस्की का पैग भी लिया था।

"अच्छा !"

"और फिर मामले की बात हुई तो वह भड़क गए....दस लाख वाले एडवांस के लिए उन्होंने साफ शब्दों में इंकार कर दिया और तैश में आ गए। खून हमारे हाथों अपने बचाव में हुआ, लेकिन इसका आरोप अपने सिर तुम्हारे पिता ने ले लिया...यह बहुत बड़ा आत्म बलिदान है उनका जिसे हम स्वीकार करते हैं।"

"नहीं...।" राजेश सन्नाटे में रह गया।

सेठ ने कहा-"अगर तुम विश्वास ने करो तो हम जगमोहन की सौगंध खा सकते हैं। हमने कैलाश को बहुत रोका था, मगर कैलाश भगवान को दूसरा रूप है, वह देवता है.... हम उसके चरण छूने के भी योग्य नहीं-उसने कहा था-'मालिक, हमारे पुरखों ने आपका नमक खाया है, वह हलाल करने का यही तो अवसर है' ।"

राजेश अब भी सन्नाटे में बैठा था-सेठ उसे ध्यान से देखते हुए बोले-"राजेश ! तुम मुझे गलत तो नहीं समझ रहे ?"

"बिल्कुल नहीं सेठ जी–मैं तो यह सोच रहा हूं कि मेरे पिताजी ने इतना बड़ा बलिदान देकर अपनी वफादारी का प्रमाण दिया है और मैं उन्हीं का बेटा आपके साथ इस उद्दण्डता से बकवास कर गया।"

सेठ से चेहरे पर सन्तोष की प्रतिक्रिया नजर आई-उन्होंने कहा-"भूल जाओ....मुझे भी याद नहीं रखना....भगवान जो कुछ करता है ठीक ही करता है अगर तुम जोश और गुस्से में नहीं आते तो ड्राइवर और नौकर ही बनकर रहते-तुम्हारी मां को गुस्सा न आता....वह तुम्हें न मारतीं तो तुम उन्हें लेकर चले जाते...और मेरे गले में भी हड्डी अटकी रहती और तुम्हारे पिताजी के माथे से कलंक भी न मिटता ।"

"आपके गले में कैसी हड्डी ?"

"जब मास्टर देवीदयाल ने मेरे ऊपर हमला किया था और मैं अपना बचाव कर रहा था तब उनके हाथ से रिवाल्वर गिरकर मेरे हाथ में आगया-उस वक्त मास्टरजा पर जुनून सवार था अगर मैं उन्हें ने मारता तो वह मुझे मार देते-मैं इस बात से भयभीत था और मैंने न चाहते हुए भी उन पर गोली चला दी। जब मुझे होश आया तब मेरे हाथ से रिवाल्वर छुटकर गिर गया।"

"फिर-?"

"इस घटना की कोई आदमी फोटो उतारता रहा था।"

"नहीं...!"

"हां राजेश ! वह आदमी पिछले दस साल से अब तक मुझे ब्लैकमेल कर रहा है।"

"ओ गॉड !"

"राजेश, मैं कई करोड़ का नुकसान सहन कर चुका हूं...अभी चंद दिन पहले ही दस लाख ठगे गए हैं।"

"आपने पुलिस को खबर की ?"

"नहीं....पुलिस को खबर करने का नतीजा होगा कि मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊंगा और मास्टर

जी के खून के अपराध में मुझे सजा मिलेगी और यह राज खुलने पर शायद कैलाश की सजा भी बढ़ जाए।"

"क्यों ?"

"क्योंकि उसने झूठा अपराध अपने सिर ले लिया है-कानून को गुमराह किया है।"

"ओहो...फिर..?"

"तुम्हारे पिताजी की सजा खत्म होने में कुछ ही समय रह गया है...हो सकता है, जेल में अच्छे चाल-चलन के कारण आखिरी दो साल आजादी के जश्न पर माफ भी कर दिए जाएं। अगर ब्लैकमेलर का पता लग जाए तो मेरा नुकसान बच

सकता है।"

"और कोई दूसरी बात ?"

"मास्टर जी ने उस बंगले पर दस लाख रुपए लिए थे जो दस बरस में करोड़ों हो जाते.वैसे भी मास्टर जी ने बेइमानी की थी....इस सारे फसाद की जड़ वही बंगला है।"

"फिर..?"

.

.

"वह बंगला दरअसल मेरा है...मगर मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है और वह बंगला मेरे दिल में कांटे की तरह खटकता है, क्योंकि उसके कारण मेरा दस लाख ब्लाक हो गया.ब्लैकमेलर के करोड़ो बन गए और कैलाश जैसा वफदार पुरखों से सेवा करता भला आदमी लम्बी सजा काट रहा है-मेरी खातिर-इसका मुझे बहुत दुःख है।"

"ठीक है सेठजी-वह बंगला भी आपकी मिल्कियता होगा और वह ब्लैकमेलर भी पकड़ा जाएगा।"

"मुझे तुमसे यही आशा थी।"

-

"मगर आपको किसी पर सन्देह...।"

"किस पर सन्देह करूं?"

"इस मामले के बारे में आप मास्टर जी के अलावा

और भी कोई था?"

" सिर्फ प्रेम था जो असिस्टैंट मैनेजर था.अब मैनेजर है।

"आपको उन पर सन्देह नहीं ?"

"नहीं। क्योंकि जितनी रकत अब तक अनजाना ब्लैकमेलर हासिल कर चुका है, उतनी रकत से तो प्रेम अब तक बहुत बड़ा बिल्डर बन चुका होता-मगर आज भी वह फ्लैट में रहता है...बस एक पुरानी फियेट कार उसकी अपनी है।"

"अच्छी बात है, सेठ साहब पहले ब्लैकमेलर ही का पता लगाना है-मगर उसके लिए आपको एक 'नाटक' करना पड़ेगा।"



"कैसा नाटक?"

“मैं बताता हूं।"

सेठजी आगे झुक गए...राजेश उनके कान में कुछ कहता रहा।

प्रेम के कान खड़े हो गए-उसने कुछ देर सुना-फिर घंटी बजाई-और चपरासी अंदर आ गया।
 
प्रेम के कान खड़े हो गए-उसने कुछ देर सुना-फिर घंटी बजाई-और चपरासी अंदर आ गया।

"यह ऊंची आवाजें कैसी हैं?"

"मालिक के केबिन से आ रही हैं।"

"कौन है उनके साथ?"

"कोई नया नौजवान है।

"जी हां।"

"कौन हो सकता है?"

प्रेम ने कमरा छोड़ दिया और बाहर आ गया...

ऑफिस के दूसरे लोग भी सुन रहे थे और केबिन से आवाजे आ रहीं थीं

"अपनी सीमा से आगे मत बढ़ो।"

"सीमा तो बहुत पीछे रह गई है, सेठ दौलतराम।"

"बकवास मत करो...तुम भूल रहे हो कि तुम हमारे ड्राइवर के बेटे हो। एक मामूली नौकर।"

"आप भूल रहे हैं कि मेरे बाप ने आपके दुश्मन को मारकर अपनी बाकी उम्र जेल में काट दी।"

"उन्होंने वफादारी निभाई है-पुरखों से हमारे खानदान का नमक खाया है।"

"भाड़ में गई ऐसी नमकहलाली...यह वफा-दारी...क्या दनाम मिला इस वफदारी

का...बाहर बरस की कड़ी कैद...मगर मैं उनकी तरह मूर्ख नहीं हूं।"

"राजेश...!"

--

"मुझे सिविल इंजीनियर की डिग्री मिल चुकी हैं..और मैंने स्टेट में टाप किया है...मुझे आपकी ड्राइवरी नहीं करनी, अगर आपने मुझे अपनी कम्पनी में अच्छी जाब मेरी क्वालिफिकेशन के अनुसार न दी तो...।"

"तो...क्या कर लोगे तुम मेरा?"

"इसका जवाब मैं तब दूंगा जब आपके खिलाफ पूरी तफ्तीश नहीं करवा लूंगा...मेरे पास कई प्रमाण

“निकल जाओ यहां से...तुम्हे इंजीनियर तो क्या चपरासी की नौकरी भी नहीं मिल सकती-तुम हो तो ड्राइवर ही के बेटे।"

"अच्छी बात है सेठजी...आपकी कम्पनी का काम न डुबोया तो मेरा नाम राजेश नहीं।"

"राजेश-!"

"आपके ऑफिस के सामने ऑफिस खड़ा करूंगा और आपकी कम्पनी का दीवाला निकलवा

दूंगा..पिताजी के जेल जाने के बाद मैंने यह प्रतिज्ञा की थी।

"गैट आउट ।"

राजेश तेज-तेज बाहर निकल आया-उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था-प्रेम उसे ध्यान से देख रहा था

राजेश दौड़ाकर जा रहा था..थोड़ी दूर ही गया था कि प्रेम की कार उसके पास आकर रूक गई-अंदर बैठ ही उसने कहा-"हैलो राजेश!"

"हैलो! क्षमा कीजिए-मैने पहचाना नहीं आपको।"

"आओ बैठो...पहचाना होगी तो खुश हो जाओगे।" राजेश बैठ गया और कार चल पड़ी-फिर प्रेम बोला-"तुम दौलत बिल्डर्स की टक्कर पर कम्पनी खड़ी करना चाहते हो?"

"हां, मगर आप कैसे जानते हैं?"

“मैं दौलत बिल्डर्स का मैनेजर हूं-प्रेम।"

"ओह, बड़ी खुशी हुई आपसे मिलकर ।"

"और मुझे तुमसे भी बढ़कर खुशी हुई।"

"क्यों?"

क्योंकि तुम्हारे अंदर जोश है-आत्मा सम्मान का भाव है...तुम्हारे पिताजी के साथ जो कुछ हुआ है...तुम उसका बदला लेना चाहते हो?"

राजेश ने उसे ध्यान से देखा और बोला-"गाड़ी रोकिए।

"क्यों ?"

"मुझे उतरना है।"

.

"मगर क्यों?"

"आप दौलत बिल्डर्स के मैनेजर हैं न?"

"निःसंदेह ।"

"और आप अपने मालिक के विरूद्ध बातें कर रहे हैं।"

"ते क्या हुआ ?"

"आपको शायद सेठजी ने टोह लगाने के लिए भेजा है मेरे पीछे ।"

प्रेम ने ठहाका लगाया और बोला-" नौजवान होने का यही नुकसान है कि सोचे-समझे बगैर जोश में आ जाते हैं।

J



" इसमें सोचने की क्या बात है?"

"अगर मुझे सेठजी ने भेजा होता तो मैं तुम्हें अपना पूरा परिचय क्यों देता ।"

"फिर आपको अपने मालिक से किस बात की दुश्मनी ?"

"तुम भी तो उन्हीं सेठजी के नौकर के बेटे हो-तुम उनके दुश्मन क्यों बन गए?"

"आपका मतलब यह है कि आपके साथ कोई बड़ी ज्यादती हुई है?"

.

"हां...लेकिन मैं तुम्हें एक ऐसा राज कैसे बता दूं जो मैं लम्बे समय से सीने में छुपाए बैठा हूं और सेठजी से बदला लेने का अवसर ढूंढ़ रहा हूं।"

राजेश बड़े ध्यान से उसे देखता रहा..प्रेम ने कहा

"मैंने सोचा, दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त और एक और एक ग्यारह होते हैं हम दोनों मिलकर सेठ दौलतराम को बर्बाद कर सकते हैं लेकिन तुम अगर नहीं चाहते तो उतर सकते हो।"

" हम दोनों मिलकर सेठ को कैसे बर्बाद कर सकते हैं?"

"तुम्हारे पास नौजवानी का जोश और शक्ति है और मेरे पास सेठजी की कई कमजोरियां और दौलत है।"

" तो आप खुद खुलकर सामने क्यों नहीं आते?"

"मौका। किसी कारण मेरा खुलकर आना उचित नहीं।"
 
"देखिए मिस्टर प्रेम-जब तक मुझे सच्चाई मालूम नहीं होती , मैं कोई फैसला नहीं कर सकता ।"

"मगर इस बात की क्या गारंटी है कि मैं जो कुछ तुम्हें बताऊंगा...उसे तुम अपने मन ही में रखोगे।"

"देखिए.मैंने तो आपको एप्रोच नहीं किया, न मुझे आपकी मदद की जरूरत है...मुझमें इतनी शक्ति

और लगल है कि सेठजी की कमर तोड़ दूं..अब आप गाड़ी रोक सकते हैं।"



"शाबाश! मुझे यही जवाब चाहिए था।"

"क्या मतलब?"

"तुम जैसा खरा आदमी ही मुझे अपना साथी चाहिए है।"

"आप अपनी इच्छा के मालिक हैं।"

"चलिए! मैं आपको सब कुछ विस्तार से बताऊंगा।"

राजेश कुछ नहीं बोला।

कार एक कॉटेज के सामने रूक गई और प्रेम ने कहा-"जरा फाटक खोलने का कष्ट करेंगे।"

राजेश ने उतरकर फाटक खोला। कार अंदर आ गई और राजेश ने फाटक बंद कर दिया। कुछ देर बाद दोनों एयरकंडीशंड फाटक में थे। प्रेम ने राजेश को एक सोफे पर बिठाकर कहा

"तुम क्या लेना पसंद करोगे?"

"सिर्फ ठंडा पानी।"

"क्या ड्रिंक नहीं करते ?"

"जी नहीं-मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है कि जिस दिन मेरे पास अपनी कार और फ्लैट होंगे, उस दिन पहला चूंट भरूंगा।"

.

"तुम उसूलों के बहुत पक्के हो।"

"जी उसूल और उन पर मन से अमल ही आदमी को कुछ बनाते हैं वरना आदमी बिना पेंदे का लोटा हुआ।"

"सच कहते हो।"

प्रेम ने अपने लिए पैग बनाकर कहा-“मै चाहूं तो अभी सेठ दौलतराम के सामने अपना ऑफिस खोल सकता हूं, मगर मेरा लक्ष्य है उस कुर्सी पर बैठना जिस पर सेठ दौलतराम बैठते हैं।"

"क्यों?"

"क्योंकि कभी उनकी कुर्सी के बराबर एक कुर्सी

और होती थी, उस समय मेरे पिता और सेठ दौलतराम के पिता बराबर-बराबर कुर्सियों पर बैठा करते थे।"

"ओहो ! आपका मतलब है कि आप दोनों के पिता पार्टनर थे।"

"पिफ्टी परसेंट के।"

"फिर क्या हुआ ?"

“सेठजी ने मेरे पिता के विश्वास का नाजायज फायदा उठाया...उनसे कागजात पर हस्ताक्षर लेते रहे और एक दिन सारे कारोबार के पूरे मालिक बन बैठे। मेरे पिताजी का हार्टफेल हो गया और हमारा परिवार फुटपाथ पर आ गया।"

"माई गॉड!"

"अब आप सोचिए कि मेरे सीने में कैसी ज्वाला भड़क रही होगी अपनी बर्बादी का बदला लेने के लिए।"

"बेशक बेशक।"

"मगर मैं बड़े धीरज से काम लेता रहा हूं-पहले अपनी जड़े मजबूत करता रहा हूं। इस समय मेरे पास काफी दौलत है जिससे मैं सेठजी के आफिस के सामने एक नया आफिस खोल सकता हूं-मगर अपना लक्ष्य तो मैं तुम्हें बता ही चुका हूं।"

"मगर आपने इमनी दौलत कैसे और कहां से प्राप्त की?"

"अपने दिमाग का प्रयोग करके।"

"क्या मतलब?"

"मैं एक अजनबी की तरह सेठ दौलतराम के यहां किसी सिफारिश से मैनेजर बनने की ताक में रहा-वह अवसर मुझे मिला मास्टर देवीदयाल के

खून की घटना के बाद।

राजेश का दिल धड़क उठा। उसने पूछा-"किस तरह?"

प्रेम ने एक अल्मारी के गुप्त खाने से कुछ फोटो निकाले और राजेश की ओर बढ़ाता हुआ बोला-"इन तस्वीरों द्वारा।"

राजेश ने फोटो देखे तो उसका दिल और जोर से धड़क उठा।

तस्वीरों में सेठ दौलतराम के हाथों देवीदयाल शर्मा की मौत के पूरे प्रमाण थे-रिवाल्वर और फाइल सब कुछ था।

राजेश ने कांपती आवाज में कहा-"इन फोटूओं का क्या मतलब है?"

"इसका मतलब है जो खून तुम्हारे पिता ने अपने सिर ले लिया है, वह खून दरअसल खूद सेठ ने किया था।

"ओ गॉड! तो मेरे पिता निर्दोष हैं।"

"बिल्कुल।"

"वह निर्दोष होकर जेल काट रहे हैं...दूसरी तरफ असल खूनी आजाद फिर रहा है।"

.
 
.

"तुम्हारे पिता की मूर्खतापूर्ण वफदारी के कारण।"

"माई गॉड! मैं यह फोटो भी पुलिस को दिखाकर उनको रिहा कराकर सेठ को पकड़वा दूंगा।"

"नहीं...तुम्हारे पिता छूट तो जाएगे खून के अपराध से–मगर उनके ऊपर नया आरोप लग जाएगा, झूठा आरोप अपने सिर पर लेकर एक कत्ल के अपराधी को बचाने का जिसकी सजा लम्बी हो सकती है।"

"नहीं...!"

.

"इसीलिए कह रहा हूं, जोश से नहीं होश से काम

लो-वैसे भी अब कैलाशनाथ की सजा केवल दो बरस रह गई है।"

"मगर फिर..?"

"रास्ता मैं बताऊंगा...तुम्हें फाइनैंस भी करूंगा–मगर जैसा मैं कहूं तुम्हें वैसा ही करना पड़ेगा।"

"मैं तैयार हूं-मगर मुझे भी कोई गारंटी चाहिए कि मेरे साथ कोई फ्राड नहीं होगा।"

"क्या गारंटी चाहिए?"



"सेठ दौलतराम की गर्दन मेरे हाथों में दे दीजिए, क्योंकि वह मेरे पिताजी के खास दुश्मन हैं।

"तुम्हारा मतलब उन फोटोज से है?"

"सिर्फ फोटोज ही नहीं नैगेटिव भी।"

"और तुमने मुझे डबल क्रास किया तो...?"

राजेश ने उठते हुए रूखे स्वर में कहा-"आपकी खुशी..मदद आपने मांगी थी मैंने नहीं।"

"तुम बार-बार उठ क्यों जाते हो?" प्रेम ने कहा।

"मेरे पास समय नहीं है...फालतू बातों के लिए।"

"चलो..तुम्हें फोटोज और नैगेटिव दोनों मिल जाएंगे, क्योंकि अब वह मेरे किसी काम के हैं भी नहीं...मैं अपनी जरूरत के लिए दौलत भी हासिल कर चुका हूं-अगर वह पुलिस तक पहुंच भी गए तो मेरा कोई नुकसान नहीं होगा।"

राजेश चुप रहा...प्रेम ने गिलास खाली करकि फोटो और नैगेटिव निकालकर राजेश को देते हुए कहा-"लो! अब तो मुझ पर भरोसा है?"

राजेश ने लिफाफा लेकर पास ही मेज पर ऐसे रख लया जैसे वह उसे कोई बड़ा महत्व नहीं देता...फिर प्रेम से बोला-"हां...अब बताइए।"

प्रेम ने नया पैग बनाते हुए कहा-"तुम्हें सबसे पहला काम करना है-स्वर्गीय देवीदयाल के बंगले पर किसी भी तरह कब्जा करना है।"

"किसलिए?"

"तुम्हारी नई कन्स्ट्रशन कम्पनी की शुरूआत धूमधाम से होनी चाहिए..और उस बंगले से ज्यादा शानदार जगह सिचुएशन के लिहाज से कोई नहीं...जिस पर तुम एक पन्द्रह माले की बिल्डिंग खड़ी कर सकते हो-नीचे शॉपिंग कम्पलैक्स भी बन सकता है।"

"मगर उसके लिए तो करोड़ों रूपए चाहिए।"

"इसकी चिन्ता मत करो. इंनीशयल रकम मैं दूंगा...फिर तुम्हें बताऊंगा कि बिल्डर्स किसी तरह कारोबार चलाते हैं।"

"ठीक है. मगर वह बंगला?"

"बड़ी आसानी से मिल जाएगा।"

'

"वह कैसे?"

"मास्टर देवीदयाल की मिल्कियत था..अब विद्यादेवी उसकी पत्नी की मिल्कियत है और

उसकी अकेली वारिस उनकी बेटी सुनीता है।"

-

"ओहो...!"

"तुम भी सुन्दर हो और नौजवान हो...सुनीता भी सुन्दर है, पढ़ी-लिखी है...तुम सुनीता को शीशे में उतार सको तो बंगला तुम्हारा है।"

"मगर मैं ही क्यों? आपका भी शायद एक जवान बेटा है।"

"उसे मैंने इसी बंगले के लिए दस बरस पहले ही सुनीता से लगाव बढ़ाने के लिए लगाया था मगर

...लडकी का दिल जीतने में कामयाब नहीं हुआ।"

"मगर इस बात की भी क्या गांरटी है कि मैं उस लड़की का दिल जीत ही लूंगा।"

“यही तो तुम्हारी परीक्षा है।"

"ठीक है प्रेम साहब... मैं इस परीक्षा से गुजरने के लिए तैयार हूं।"

"बस...तो फिर मिलाओ हाथ।"

राजेश ने हाथ मिलाया और बोला-"यह फोटो और इनके नैगेटिव अब मैं आपके पास छोड़ सकता हूं।"

"नहीं...तुम अब इन्हें अपने पास रखो-मुझे तुम पर पूरा विश्वास है कि तुम मेरे लिए काम के आदमी

हो।"

"धन्यवाद!" कहकर राजेश ने फोटो वाल लिफाफा जेब में रखा और उठाता हुआ बोला-"अच्छा, अब मैं आना चाहता हूं।"

"ठीक है..मगर तुमसे कान्टैक्ट कैसे हुआ करेगा?"

"अपना मोबाइल नम्बर दीजिए. मैं आपको कहीं से फोन कर लिया करूंगा।"



"तुम फोन करने कहां आया-जाया करोगे।" कहते हुए प्रेम ने एक छोटा-सा मोबाइल उसे देकर कहा-" यह इंस्ट्रूमेंट पतलून की जेब में भी रख सकते हो...इस द्वारा तुम कहीं से भी मुझसे बात कर सकते हो।"

राजेश ने इंस्ट्रूमेंट लेकर धन्यवाद कहा और प्रेम का नम्बर लेकर नोट किया और इजाजत लेकर बाहर निकल आया।
 
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