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Romance फिर बाजी पाजेब

राजेश मुस्कराया-"बड़ी मां-मुझे टैक्सी का किराया नहीं चाहिए—मैं स्कूल तक इतनी तेज दौड़ लगाऊंगा कि एक दिन दौड़ के मुकाबलों में भी हिस्सा ले सकूगा।"

"बेटा ! मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।" पारो ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

"बड़ी मां-आपका आशीग्रद ही हवाई जहाज के बराबर है।" और वह दौड़ता हुआ बाहर निकल आया।

कुछ देर बाद वह स्कूल का बैग संभाले बिजली की तेजी से सड़क पर दौड़ रहा था।

राजेश दौड़ता हुआ स्कूल जा रहा था। एक बस पास से गुजरी तो उसे किसी लड़की ने चिल्लाकर कहा-"अरे देखो...बस के साथ दौड़ रहा है।"

दूसरी ने हंसकर कहा-"पैसे बचा रहा होगा।"

एक और लड़की ने कहा-“पागल है टैक्सी के साथ दौड़ता तो ज्यादा पैसे बचते।"

बस में एक जोरदार ठहाका गूंजा।"

राजेश ने एक लटके हुए बैग पर झपट्टा मारा

और बैग उसके हाथ में आ गया और लड़की चिल्लाई-"मेरी किताबें ।'

"अब टैक्सी के साथ दौड़कर पहुंचा दूंगा।"

अचानक बस एक क्रासिंग पर रूक गई-वह लड़की सुनीता घबराई हुई जल्दी से नीचे उतर आई और बोली-"तुमने मेरी किताबों का बैग क्यों छीन लिया ?"

इतने में 'बस' चली गई और राजेश ने कहा

"लो...संभालो अपनी किताबें..अब तुम भी मेरे साथ दौड़ो...हम दोनों मिलकर टैक्सी का किराया बचा लेंगे।"

सुनीता ने कहा-"मैंने तुम्हारे बारे में यह थोड़े ही कहा था।"

"फिर किसने कहा था ?"

"वह लड़कियां तो चली गईं।"

"आई एम सॉरी।"

“मगर तुम क्यों इतनी तेज दौड़ रहे थे ?"

"स्कूल जाने के लिए।

"बस से नहीं गए ?"

"मेरे पास बस का किराया नहीं होता।"

-

-

"तो क्या रोज पैदल जाते हो ?"



"हां...वह भी दौड़कर।"

.

"ओ गॉड !"

"क्या है...मसल्स बनते हैं...तुम देख लेना..एक दिन मेरी बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपेंगी...टेलीविजन में आएगा कि मैंने 100 मीटर रेस में मिलखा सिंह का रिकार्ड तोड़ दिया है।"

सुनीता हंसकर बोली-"तुम तो कमाल के आदमी हो।"

"इतना ही कमाल का कि आज दो पीरियड मिस न करने पड़े-अगर मैंने आपका बैग न छीना होता अब तक दोनों स्कूल में होते।"

"खैर, आपने कोई गलती नहीं की-जैसे को तैसा होना ही चाहिए।"

इतने में एक आवाज सुनाई दी-“ऐ सुनीता।"

सुनीता चौंक पड़ी-राजेश ने देखा दूर खड़ी एक फीएट में से कोई हाथ बाहर निकालकर चिल्ला रहा था।

राजेश ने कहा-"आपका नाम सुनीता है ?"

"जी हां।"

"बड़ा सुन्दर नाम है।

फिर आवाज आई-"ऐ सुनीता !"

।।

राजेश ने कहा-"यह कौन बदतमीज है ?"

सुनीता ने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा-"यूं ही मेरे पीछे पड़ गया है।"

"तो इसे सजा मिलनी चाहिए।"

"मगर क्या सजा दूं ?"

"इसकी गाड़ी में स्कूल जाइए।"

"फिर तो वो मेरे मुंह लग जाएगा।"

"बाद में पीछा छुड़ा लीजिएगा...मैं भी लिफ्ट ले लूंगा।"

इतने में शक्ति पास आ गया और बोला-"सुनीता जी, क्या हुआ है ?"

राजेश ने कहा-"सुनीता जी...आपके भाई साहब क्या कह रहे हैं ?"

"अरे...खबरदार ! भाई होगा तू।"

सुनीता ने कहा-"भैया ! हमें स्कूल छोड़ दोगे।"

"हाय...तुम भी भइया कह रही हो।"

"तो क्या हुआ ?" राजेश ने कहा।

शक्ति ने पूछा-"आप कौन हैं ?"

"मेरे ब्वॉय फ्रेंड हैं। उत्तर सुनीता ने दिया ।

"हाट !" शक्ति उछल पड़ा-"मगर तुम तो मेरी मंगेतर हो।"

"मंगेतर होना अलग बात है और फ्रेंड होना अलग...अभी तो मैं फ्रेंड भी नहीं हुई-शादी की बात तो बरसों बार सोचूंगी।"

राजेश ने कहा-"अरे-फिर सोच लेना..बहुत वक्त है। इसी तू-तू मैं-मैं में स्कूल तो गया।"

"अरे ! यह तो मैं भूल ही गई थी। सुनीता ने कहा-“चलो ! दौड़ लगाते हैं। शायद समय पर पहुंच ही जाएं।"

शक्ति ने जल्दी से कहा-"नहीं नहीं...तुम लोग मेरी गाड़ी में लिफ्ट ले सकते हो।"

कुछ देर बाद वे लोग गाड़ी में थे और गाड़ी सड़क पर दौड़ रही थी । सुनीता और राजेश पिछली सीट पर और शक्ति ड्राइविंग सीट पर था लगभग पांच मिनट बाद एक जगह पर राजेश ने जल्दी से कहा-"बस, बस मेरा स्कूल आ गया।"

शक्ति ने जल्दी से बीच सड़क पर ही कार रोक दी-पीछे से एक कार ने टक्कर मारी और शक्ति की कार आगे सरक गई-शक्ति उतरकर पिछली कार वाले ड्राइवर से लड़ने लगा।

राजेश ने उतरकर कहा-"आपका स्कूल तो गया सुनीता जी.मैं तो पीरियड अटैंड कर लूं।" फिर राजेश अपने स्कूल की ओर दौड़ गया और सुनीता उतरकर एक बस स्टॉप पर जाकर लाइन में खड़ी हो गई।

राजेश स्कूल से निकला और पैदल ही चल पड़ा। अचानक पीछे से एक कार आकर रूकी जिसमें अगली सीट पर जगमोहन स्टेयरिंग संभाले बैठा था...उसके साथ दो लड़के और कुछ लड़कियां थीं-पिछली सीट भरी हुई थी। जगमोहन ने खुश होकर कहा

.

"अरे राजेश, तुम पैदल चल रहे हो।"

"नहीं यार ! हवाई जहाज से आ रहा था उसका पैट्रोल खत्म हो गया और हवाई जहाज कहीं रह गया-मुझे कूदकर नीचे आना पड़ा।"

"कहां है हवाई जहाज ?"

"वो..वो...रहा राजेश।

जगमोहन खिड़की से सिर निकालकर ऊपर देखने लगा तो सभी लड़के-लड़कियां हंसने लगे-राजेश भी हसने लगा। जगमोहन ने राजेश से पूछा-"ये लोग क्यों हंस रहे हैं ?"

"तेरा हवाई जहाज उड़ा रहे हैं।"

"मेरा हवाई जहाज।"

"तेरा मजाक-मजाक ही उड़ाया जाता है न।"

राजेश ने पूछा-"तेरे "फियेट छकड़े में यह सब कौन हैं ?"
 
.

"मेरे स्कूल के साथी हैं...पैदल या 'बसों' से आते-जाते थे..अब मैं इन्हें घरों से पिकअप करता हूं-फिर वापस पहुंचाता हूं।"

"अच्छा ! तो आप सोशल सर्विस कर रहे हैं।"

"यह क्या होती है ?"

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"अभी बताता हूं।" राजेश ने कहा। फिर उसने अगला दरवाजा खोलकर आगे वाले लड़के-लड़कियों से कहा-"चलो-नीचे उतरो तुम लोग।"

"हाई ?" एक लड़की ने इंगलिश स्टाइल में कहा।

"मिस साहिबा ! यह कार हे...स्कूल बस या एम. ई. एस. टी. की ट्रांसपोर्ट नहीं।"

"तुम कौन होते हो ?"

"मैं इस गधे का दोस्त हूं, जिसके सींग नहीं हैं।"

"शटअप ! तुम हमारी इन्सल्ट कर रहे हो।"

"तुम्हारी इन्सल्ट ! वरना एक-एक को खींच-खींचकर उतार के फेंक दूंगा।"

वह सब जल्दी-जल्दी नीचे उतर गईं-एक लड़की ने जगमोहन को खामोश देखकर कहा-"हमें आपसे यह उम्मीद नहीं थी, मिस्टर जगमोहन ।"

"मैं मजबूर हूं-मेरा दोस्त जो कुछ करता है उसमें मेरी कोई न कोई भलाई छुपी होती है।"

फिर राजेश ने जगमोहन की जगह संभाली और कार चल पडी....जगमोहन ने बडे भोलेपन से । राजेश से पूछा-"तुमने उन लोगों को क्यों उतार दिया?"

"अबे गधे...बे सींग के....अगर तेरी गाड़ी में इतनी भीड़ सेठ साहब देख लें तो क्या करेंगे?"

"क्या करेंगे ?"

"तुझे मुर्गा बनाकर मेरी पीठ पर गाड़ी रखवा देंगे।"

"अरे बाप रे!"

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"यह कार है....टैक्सी नहीं..तुझे इसलिए खरीदकर दी गई है कि तू अपने इस्तेमाल के लिए रखे-न कि तू सवारियां ढोता फिरे।"

"मगर वह लोग तो गरीब हैं बेचारे।"

"इस शहर में लाखों गरीब हैं....तू कितने गरीबों को कार में लिफ्ट दिया करेगा।"

जगमोहन नहीं बोला। बंगले से कुछ दूर राजेश ने कार रोककर कहा-"ले संभाल ! यहां से मैं पैदल जाऊंगा।"

"क्यों ?"

"अबे गधे...अबर मालिक संयोग से बंगले पर हुए और उन्होंने तुझे मेरे साथ देख लिया तो तुझे विदेश पढ़ने भेज देंगे और मुझे–मां के साथ निकाल देंगे।"

.

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"नहीं, नहीं..!'' जगमोहन झुरझुरी-सी लेकर लेकर बोला।

"चल....जा....जल्दी से।"

जगमोहन कार संभालकर बंगले में पहुंच गया तो पीछे से सेठ दौलतराम की कार अंदर दाखिल हो गई...उनकी कार को देखते ही जगमोहन की घिग्घी बंध गई। दोनों कारें आगे-पीछे आईं।

जगमोहन जल्दी से कार से उतर आया....उसके बाद दूसरी कार से दौलत राम उतरे तो जगमोहन ने जल्दी से उनके चरण स्पर्श किए।

"जीते रहो....जीते रहो।"

इतने में पारो बाहर आ गई और आश्चर्य से बोली-"अरे ! आज आप इतनी जल्दी कैसे आ गए ?"

"आज एक पार्टी से बंगले पर ही बात करनी है...और यह राजेश कहां है ? अभी तक कारें नहीं धोई उसने।"

"बाग की देखभाल कर रहा है पिछवाड़े में।"

अचानक राजेश सादा कपड़ों में आ गया और बोला-"मालिक ! उधर का काम कर दिया-अब कारें धोने जा रहा हूं।"

"ठीक है...ठीक है।"

वह अंदर मुड़े...राजेश ने जगमोहन को आंख मारी

और मुस्कराया-जगमोहन बहुत खुश था कि वह बच गया।
 
सेठ दौलतराम पार्टी से बातचीत करके डिनर के बाद रात के दो बजे फारिग हुए तो जगमोहन के कमरे में रोशनी देखकर पारो से बोले

"यह जगमोहन अभी तक जाग रहा है।"

"स्टडी करता है।"

"भई वाह ! जरा देखें तो।"

"आप उसे डिस्टर्ब करेंगे ?"

"हमारा बेटा है-जब चाहें डिस्टर्ब कर सकते हैं।"

"आपका बेटा अब बारह बरस का लड़का नहीं पन्द्रह बरस का नौजवान है।"

" तो क्या हुआ...फिर वे लोग कमरे की ओर चले तो पारो अंदर बातें करने लगी....उधर कमरे में पढ़ते हुए जगमोहन और राजेश चौंक पड़े....राजेश हड़बड़ाकर बोला-"बड़े मालिक आ रहे हैं तो वह छपाक से बैड के नीचे घुस गया। जगमोहन ने दरवाजा खोल दिया और पारो के साथ दौलतराम अंदर आ गए और बोले

"बहुत खूब....हमारा बेटा इतनी रात गए तक स्टडी कर रहा है।"

"डैडी..अबके में फर्स्ट डिवीजन में ग्यारवहीं में आऊंगा।"

"भगवान तुम्हारी जबान शुभ करें।" पारो ने कहा।

जब दोनों चले गए तो राजेश ने अंदर से दरवाजा बंद किया और बैड की ओर मुड़ा।

"चल आ जा...गए डैडी।"

बैड के नीचे से चौबीस बरस का नौजवान राजेश निकला और बोला-"यार। यह तो इन्कम टैक्स वालों की तरह किसी समय भी तेरे कमरे पर रेड डाल देते हैं।"

"मगर अभी मैं इन्कम टैक्स देता ही कहां हूं।"

राजेश ने ठंडी सांस ली बोला-"जग्गी !"

"हां।"

"तू गधा था, गधा है....और गधा रहेगा-तुझे तो घास के जंगलों में फ्री छोड़ देना चाहिए।"

"किसलिए ?"

"कुछ नहीं अब मैं चल रहा हूं।"

और राजेश खिड़की पर चढ़कर गायब हो गया।

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जगमोहन की कार बंगले से निकली और कुछ दूर चलकर एक जगह रूक गई। कार की डिक्की खुली-उसमें से राजेश निकला-उसके हाथ में कॉलेज की फाइल थी-उसने अपने कपड़े झाड़े और कार में अगली सीट पर बैठ गया...कार चल पड़ी।

कुछ दूर चलने के बाद जगमोहन ने उससे कहा-"यार राजेश ! एक बात बता-यह

आंख-मिचौली कब तक चलेगी ?"

"कैसी आंख-मिचौली ?"

"यही कि तू अकेला कॉलेज से निकलता है-एक मोड़ पर मेरा इन्तजार करता है-फिर मेरे साथ बैठता है-मैं तुझे तेरे कॉलेज के सामने छोड़कर चला जाता हूं-तू मेरे साथ एक कॉलेज में पढ़ भी नहीं सकता।"

राजेश धीरे से हंसा और बोला-"क्या तू परेशान हो गया है मुझसे?"

"हिश्त! कोई अपने आपसे भी परेशान होता है....मैं

और तू क्या अलग-अलग हैं ?"

"हम लोग दिल से और आत्मा से एक हैं केवल शरीरों से अलग हैं और इसका एक कारण यह भी है कि तू एक धनवान सेठ का बेटा है और मैं एक ड्राइवर का बेटा हूं।"

"यह अलगाव कब तक रहेगा ?"

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"जब तक मैं अपने कॉलेज से डिग्री लेकर न निकल आऊं।"

"उसके बाद क्या होगा ? क्या हम दोनों बराबर समझे भी जाएंगे। हम लोग एक-दूसरे के साथ खुले में आजादी से मिल सकेंगे।"

"बिल्कुल-हम दोनों दोस्त बनकर रहेंगे।"

"एक डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खा सकेंगे ?"

"हां।"

"अगर यह सब सपना ही रहा तो।"

"तो भी कोई परवाह नहीं।"

"क्या मतलब ?"

''मैं इंजीनियर तो बन ही जाऊंगा। किसी फर्म में

मुझे अच्छी नौकरी मिल जाएगी और फिर मैं भी किसी छोटे-मोटे बंगले में रहने लगूंगा-हम दोनों किसी क्लब या जिमखाने में साथ-साथ बैठा करेंगे।"

"अगर यह भी न हुआ तो..?"

"तब तेरी खोपड़ी को ऑपरेशन कराकर उसमें से गधे का भेजा निकलवाकर उल्लू का भेजा फिट करा दूंगा-अच्छा, अब कार रोक दे।"

"क्यों?"

"मेरा कॉलेज आ गया है।"

.

"अरे हां।" जगमोहन ने जल्दी से ब्रेक लगाए। कार रूकने पर राजेश ने कहा-"अब मैं चलता हूं

और हां-वापसी में मुझे पिकअप करने के लिए मत रूकना....आज से मैं 'बस' द्वारा ही आया-जाया करूंगा।"

"क्यों ?"

"इसलिए कि यह मेरा पढ़ाई का आखिरी साल है

और मैं नहीं चाहता किसी जरा-सी बात से मैं डिग्री से वंचित रह जाऊं और जीवनर भर पिताजी

के समान ड्राइवर बना रहूं।"
 
"मगर यार !"

"जा....तेरे कॉलेज में देर न हो जाए।"

"तो फिर अब हम दोनों मिल नहीं सकेंगे।"

"रात में....तेरे बैडरूम में ।'

"सच!"

"और क्या झूठ!" फिर उसने जगमोहन का हाथ दबाया और तेज-तेज चलता हुआ फाटक से । कॉलेज में घुस गया। जगमोहन ने बड़े अच्छे ढंग से मुस्कराकर कार आगे बढ़ा दी।

"मिस्टर जगमोहन !"

"यस सर!"

"क्या आप कम सुनते हैं ?"

"यस सर।"

क्लास रूम में एक जोरदार ठहाका गूंजा.... प्रोफेसर भी मुस्कराकर रह गया। जगमोहन बड़े

आराम से खड़ा रहा-फिर जब हंसी का शोर थमा

तो प्रोफेसर ने मुस्कराकर कहा-"आप किसी नशे में हैं मिस्टर जगमोहन।"



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"सर ! मैं सिर्फ काम की बातें सुनता हूं-बेकार बातें नहीं और इस दुनिया में लोग काम की बातें नहीं और इस दुनिया में लोग काम की बातें कम करते हैं और बेकार की ज्यादा।"

प्रोफेसर सन्नाटे में रह गया...और बोला-"यह ज्ञान दर्शन तुम्हें किसने दिया है ? अच्छा, अभी जो सवाल हमने किया, क्या वह बेकार था?"

"जी-मैंने सुना ही नहीं।"

"तो फिर एक सवाल और सुनिए...ताजमहज किसने बनाया था ?" जगमोहन चुप रहा तो प्रोफेसर ने सवाल दोहराया।

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"सर ! राज मजदूरों ने बनाया होगा....अब आप उनके नाम पूछेगे।"

इस पर क्लास में और ठहाका लगा।

"हमारा मतलब था किसने बनवाया था ?"

"सर ! मैंने तो ताजमहल देखा ही नहींहां, एक बार डैडी अपने साथ ताजमहल होटल जरूर ले गए थे।"

"ताजमहज तो दुनिया सातवां अजूबा (सेवेन्थ वन्डर) है।"

"बाकी छ: अजूबे कौन-से हैं?"

अचानक एक लड़की ने उठकर कहा–''एक्स्क्यू मी सर !'

"यस मिस सुनीता।"

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"सर! पहले सात अजूबे थे कभी और अब आठ हैं।"

"आठवां अजूबा कौन-सा है ?"

लड़की ने जगमोहन की और उंगली उठाकर कहा-"आपके सामने खड़ा है। इस पर सब हंस पड़े।

"मिस्टर जगमोहन आपको क्या 'सम्मान' दिया है-कैसे लगा?"

जगमोहन ने कहा-"आई एम एट्थ वण्डर और मेरे कारण सबको हंसने का मौका मिला....मुझसे बढ़कर खुशनसीब कौन हो सकता है।"

थोड़ी देर क्लास में सन्नाटा रहा–फिर शक्ति ने खड़े होकर कहा

"सर ! यह आदमी एक नम्बर का बेवकूफ मालूम होता है।"

जगमोहन ने वैसे ही खड़े-खड़े कहा-"नो सर! मुझे दूसरे नम्बर पर ही रहने दें पहले नम्बर का गौरव इन्हें ही मुबारक हो।"

इस बार सारी क्लास शक्ति पर हंस पड़ी। शक्ति गुस्से से लाल-पीला होकर जगमोहन पर झपट पड़ा और उसके पास आकर घूसा जड़ दिया–मगर जगमोहन ऐसे चुपचाप शांत खड़ा रहा जैसे कुछ हुआ ही न हो...प्रोफेसर ने ऊंची आवाज से कहा

"होल्ड युअर सैल्फ शक्ति ।"

फिर कई लड़कों ने शक्ति को पकड़ लिया और

खींचकर सीट पर बिठा दिया। शक्ति हांफता हुआ बैठ गया...और जगमोहन हो गुस्से से घूरता हुआ बोला-"अच्छी बात है....बाहर निकलोगे तो देखूगा।"

जगमोहन ने ठहरे हुए स्वर में कहा-"देख लेना भाई।"

सुनीता जगमोहन को देखती हुए एक साथी लड़की से बोली-“एकदम कावर्ड लगता है।

यह पूरा पीरियड स्टूडेंट्स और टीचर के बीच छोटे-मोटे डायलाग में बीत गया....यह जनरल नॉलेज का पीरियड था। आखिर में प्रोफेसर ने जगमोहन को बताया

"ताजमहल आगरा में है उसे शाहजहां ने बनवाया था अपनी बेगम मुमताज महल की याद में...उसे अपनी बेगम से बहुत मुहब्बत था-वह चाहता था कि यह मुहब्बत अमर रहे।

अचानक छुट्टी का घंटा बजा और लड़के-लड़कियां टोलियों में बाहर निकलने लगे....लड़कियोंके झुंड में से अचानक शक्ति ने सुनीता का हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा-"आओ सुनीता।"

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सुनीता ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और गुस्से से बोली-"यह क्या बदतमीजी है ?"

"कमाल है-तुम मेरी होने वाली....!"

"बकवास मत करो....मेरा तुमसे कोई रिश्ता नहीं।"

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"नाराज क्यों होती हो सबके समाने...चलो तुम्हें तमाश दिखाऊंगा ।"

"कैसा तमाशा ?"

"वह उल्लू का पट्ठा जगमोहन क्लास रूम में बच गया-उसे बाहर मजा चखाऊंगा।"

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"तुम्हीं ने तो छेड़ा था उसे बेवकूफ कहकर।"

"उसने मेरी इन्सल्ट कैसी ! उसने यही कहा था न कि उसे नम्बर दो पर ही रहने दिया जाए।"

"इसका मतलब तो यही हुआ न कि नम्बर एक बेवकूफ मैं हूं।"

"इसमें शक ही क्या है ?" जब देखते हो, बकवास शुरू कर देते हो... मैं तुम्हारा हाने वाला....कभी मुंह देखा है आईने में।"

तभी जगमोहन ने कार में बैठकर हार्न बजाया और कई लड़के और लड़कियां उसकी कार में बैठ गए। फिर जगमोहन ने कार बढ़ाई ही थी कि शक्ति की खटारा कार ने उसका रास्ता रोक लिया और ब्रेक लगाते-लगाते भी शक्ति की कार में धक्का लगकर शक्ति की कार का एक बम्पर पिचक गया।

शक्ति चिल्लाया-"बास्टर्ड ! नजर नहीं आता।"

जगमोहन ने नरमी से कहा-" अरे भाई! कार तो तुम्हीं ने आगे रोकी थी।"

"नीचे उतरकर आ....बताता हूं।"

दोनों अपनी-अपनी कार से नीचे उतर आए... शक्ति ने उसे घूरते हुए कहा-"उल्लू के पट्टे ! तूने मुझे बेवकूफ नम्बर वन क्यों कहा था ?"

"मैंने नहीं, तुमने कहा था।"

"और तूने मेरी कार डैमेज कर दी है।"

"वह भी तुम ही सामने लाए थे...तुम लड़ने के मूड में लगते हो।"

-

शक्ति ने आव देखा न ताव, लगातार दो-तीन चूंसे जगमोहन पर जड़ दिए और जगमोहन चुचचाप पहाड़ की तरह हिला तक नहीं-न उसने हाथ ही उठाया। शक्ति हांफने लगा तो जगमोहन ने कहा

"भाई ! थोड़ी देर सांस ले लो।"

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सुनीता आश्चर्य से देख रही थी...उसने पास खड़ी सहेली से कहा-"अजीब लड़का है यह।"

"एकदम अनोखा-अभी तुमने देखा ही क्या है ?"

शक्ति की सांसें ठीक हुई तो उसने अपने सिर की एक जोरदार टक्कर जगमोहन के सीने पर मारी....मगर जगमोहन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा....और दूसरी ओर....शक्ति की गर्दन हिली-आंखें भीगी हो गईं और वह लड़खड़ाकर चारों खाने चित्त गिरा। जगमोहन ने जल्दी से कहा-"अरे भाई क्या हो गया ?"

लेकिन शक्ति ने कोई जवाब नहीं दिया। कार में से किसी ने कहा-"वह तो बेहोश हो गया है....या अपनी झेंप मिटा रहा है....चलो इसे हटाओ....देर हो रही है।"

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जगमोहन ने उसे एक बच्चे की तरह उठाया और उसकी कार का दरवाजा खोलने लगा तो सारा दरवाजा ही हाथ में आ गया। सबने ठहाके लगाए-सुनीता अचम्भे से देखे जा रही थी। जगमोहन ने कहा

"अच्छी....कागज की कार बनाई है।" फिर उसने दरवाजा छत पर रख दिया और शक्ति को कार के अंदर लिटा दिया-कार बीच सड़क पर खड़ी थी....जगमोहन ने उसे बच्चों की खिलौना कार की तरह सरकाकर साइड में कर दिया। सुनीता हैरान-सी खड़ी देखती रही...जगमोहन अपनी कार में आकार बैठ गया।

कुछ देर बाद कार सड़क पर दौड़ रही थी।

जब भीड़ छंट गई तो शक्ति उठकर बैठ गया और अपने आप बड़बड़ाया-'उल्लू का पट्ठा!'

फिर ड्राइविंग सीट पर आ बैठा..कार स्टार्ट की तो हो गई-उसने गियर डाला तो कार चल पड़ी....और छत पर रखा दरवाजा नीचे गिरा तो शक्ति हड़बड़ा गया। उसने कार रोककर दरवाजा उठाया और किसी तरह उसे डिक्की में ढूंसा..फिर कार लेकर चला तो एक स्टॉप पर सुनीता खड़ी नजर आई....कार थोड़ा आगे निकल गई थी...वह कार रोककर रिवर्स में कार लाया। सुनीता चौंककर देखने लगी। शक्ति ने कहा

"आओ सुनीता....बैठ जाओ....मैं तुम्हें ड्रॉप कर दूंगा।"

सुनीता ने हंसकर कहा-"इस कार में ?"

शक्ति भारी आवाज में बोला-"मेरा मजाक मत उड़ाओ....आज मैं बहुत दुखी हूं...मेरा भरपूर अपमान हुआ है-इसने मुझे तोड़ दिया है।"

सुनीता को उस पर दया आ गई-वह कार में बैठ गई-कार चल पड़ी तो सुनीता ने कहा-"तुम उससे उलझे ही क्यों थे ?"

"सब मजाक कर रहे थे-मैंने भी कर लिया।"

"मगर तुम सीरियस हो गए।"

"तुम तो जानती हो, मेरा टेम्परामेंट थोड़ा लूज है।"

"अपने मिजाज को काबू में रखा करो तो उससे ज्यादा ताकतवर से जीत सकते हो।"

"उसे गुस्सा आता ही कब है।"

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"यही तो कमाल की बात है।"

"मर्दो को गुस्सा आना ही चाहिए।"

"शक्ति! तुम अपनी हार को छुपाने का प्रयास मत करो।"

सुनीता सामने देख रही थी....अचानक शक्ति ने उसकी कनपटी पर चूंसा मार दिया और सुनीता बिना आवाज निकले सीट पर लुढ़क गई।
 
शक्ति गाड़ी चलाता हुआ बड़बड़ाया

"उल्लू की पट्ठी....उस हाथी का पक्ष ले रही है-मेरी मंगेतर होकर दूसरे मर्दो की प्रशंसा करती है...आज मैं तुझे इस योग्य नहीं छोडूंगा कि दूसरे

मों की ओर देख भी सके।"

कार दौड़ती रही और सुनीता बेहोश पड़ी रही-शक्ति की आंखों में शैतान नाचने लगा।

जगमोहन ने आखिरी स्टूडेंट को सान्ताक्रूज की एक दूर की बस्ती में उतारा, जहां एक ओर एक उजड़ा-सा पार्क था-उतरने वाली लड़की ने कहा-"धन्यवाद जगमोहन भाई। आइए, चाय पीकर जाइए।"

"नहीं, मिस्टर! मुझे जल्दी जाना है।"

"आप बहुत अच्छे हैं...जगमोहन भाई।"

"तुम अच्छी हो इसलिए तुम्हें मैं अच्छा लगता हूं-मेरा दोस्त कहता है....आप भले से जग भला।"

फिर वह कार लेकर चल पड़ा-जब कार पार्क के पास से गुजर रही थी तो उसके कानों से किसी लड़की की चीख की आवाज सुनाई दी-"बचाओ।"

....

जगमोहन ने जल्दी से ब्रेक लगाए-"यह आवाज तो पार्क में से आ रही है। लगता है जरूर किसी लड़की की इज्जत खतरे में है।"

आवाज फिर आई-"बचाओ....!"

जगमोहन जल्दी से कार में से उतर आया। पार्क में घुसा तो एक कोने में उसे शक्ति की टूटी-फूटी

कार नजर आई। वह सिर खुजाकर बड़बड़ाया-'यह कार तो पहचानी हुई-सी मालूम होती है....किसी अकेली लड़की को किसी ने घेर लिया है।'

वह आगे बढ़ा तो देखा-कार के पीछे जमीन पर पड़ी हुई सुनीता का मुंह शक्ति ने देवा रखा था....और उसके दोनों हाथों को घुटनों से दबाए हुए था। सुनीता बेबस हालत में अपने पैरों को पटक रही थी। जिससे उनमें पहनी हुई पाजबें मधुर संगीता वातावरण में बिखेर ही थीं। जगमोहन कुछ देर मंत्रमुग्ध-सा मधुर आवाज को सुनता रहा। फिर उसके कानों में शक्ति की आवाज सुनाई पड़ी जो कानाफूसी में कह रहा था-"आज मुझे भगवान भी नहीं बचा सकता है।"

सुनीता बिलबिलाई.शक्ति ने कहा-'कुतिया ! मेरी मंगेतर होकर मेरी परवाह नहीं करती....आज के बाद तू खुद कहेगी कि मेरी मांग भर दो।"

अचानक सुनीता ने झटके से अपना मुंह छुड़ाया तो जबमोहन उसे सामने खड़ा दिखाई दे गया वह जोर से चिल्लाई-"जगमोहन ! मुझे बचाओ !



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शक्ति ने फिर जल्दी से उसका मुंह बंद कर दिया, लेकिन जगमोहन चौंक पड़ा था-वह बड़बड़ाया-"यह तो आवाज भी पहचानी हुई है। फिर आगे बढ़कर कार के दूसरी ओर देखकर वह चौंक पड़ा-"अरे! यह तो सुनीता जी हैं।"

शक्ति ने गुर्राकर कहा-"भाग जाओ यहां से।"

"अपनी मंगेतर के साथ सुहागरात मना रहा हूं।"

"इस वीराने में? सुहागरात तो बैडरूम सजाकर मनाई जाती है....हमने कई फिल्मों में देखा है।"

"मैं कहता हूं-भाग जाओ यहां से।"

"देखिए ! आज सुनीता जी को घर से जाकर सुहागरात मनाइए।"

"अरे, उल्लू के पट्टे... भाग यहां से।"

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"देखो भाई! गाली मत बको....हमें गुस्सा आ जाता है।"

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.

"मैं तेरा पेट फाड़ दूंगा।"

"कुछ भी करो, मगर गाली मत बकना।"

अचानक सुनीता का मुंह खुल गया और उसने गिड़गिड़ाकर कहा-"मुझे बचा तो जगमोहन। यह मेरी इज्जत लूटना चाहता है...अभी हमारी शादी नहीं हुई।"

जगमोहन ने शक्ति से कहा-"अब तो आप सुहागरात नहीं मना सकते....शक्ति भाई....इसे छोड़ दें।"

"अबे जाता है कि नहीं तेरे बाप का माल है।

"अब तुम बाप तक पहुंचे....बस, बहुत हो गया....अब हमें गुस्सा आ गया। और फिर उसने एक उचटता हुआ थप्पड़ हाथ घुमाकर शक्ति के गाल पर मारा और शक्ति सुनीता को छोड़कर लुढ़कियां खाता हुआ दीवार से जा टकराया। सुनीता हड़बड़ाकर उठी और जगमोहन से लिपट गई-उसकी आंखें छलक रही थीं।

जगमोहन ने कहा-"आप घबराइए मत.वह आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"

सुनीता से सिसककर कहा-"मैं....मैं....आपका यह उपकार कभी नहीं भूल सकती।"
 
.

"नहीं....बार-बार शर्मिंदा मत कीजिए-यह तो कर्तव्य था मेरा।" जगमोहन बोला-'अच्छा अब मैं चलता हूं।"

सुनीता जल्दी से बोली-''ठहरिए...वह कमीना होश में आकर मेरा पीछा करेगा....भगवान के लिए मुझे किसी बस स्टॉप तक पहुंचा दीजिए।

"आइए...कार बाहर खड़ी है।"

सुनीता जगमोहन के साथ कार में आ गई-कार चल पड़ी। जगमोहन ने बस का नम्बर पूछा और कार बस स्टॉप पर जाकर रूक गई....और जगमोहन ने क कार बढा ली-उसने यह नहीं देखा था कि सेठ दौलतराम ने पीछे से जगमोहन की कार से सुनीता को उतरते देख लिया था। सेठ की आंखे गुस्से से लाल हो गईं...उन्होंने साथ बैठे मुंशी से पूछा-"तुमने भी कुछ देखा।"

"जी, छोटे मालिक अपनी कार में थे।"

"और वह उसके साथ।

"वह लड़की थी जो स्टॉप पर खड़ी थी।"

"मतलब सेठ दौलतराम का इकलौता बेटा टटपूंजिया लड़कियों के साथ दिल बहलाने लगा है।"

"मालिक! लड़की बहुत खूबसूरत है।"

"खूबसूरत है तो क्या हुआ? है तो सड़क छाप ।'

"मालिक, शायद छोटे मालिक इस लड़की को पसंद करने लगे हैं।"

"ऐसी लड़की को पसंद करता है जो बसों में यात्रा करती है।"

'मालिक, बहू बन जाएगी तो कारों में घूमेगी।"

"हाट नानसेंस ! वह टटपूंजिया लड़की हमारे घर

की बहू बनेगी।"

"छोटे मालिक को पसंद है तो बनाना ही पड़ेगा।"

"हगिंज नहीं।"

.

"बड़े मालिक....आजकल के नौजवान विद्रोह पर उतर आते हैं।"

"पता लगाओ.....यह लड़की है कौन ?'

.

.

.

"वह तो....मालिक ! मैं पहले ही जानता हूं कि कौन है। स्वर्गीय मास्टर देवीदयाल की इकलौती बेटी है।"

सेठजी एकाएक उछल पड़े और बोले

"वह मास्टर जी....स्वतंत्रता सेनानी।"

"हां।"

"आपने इतनी देर से क्यों नहीं बताया?"

"आपने पूछा ही कब था-शायद आप उन्हें कोई महत्व न देते हों।"

“विद्यादेवी..उसकी मां जिन्दा है।"

"जी हां।"

.

.

"वह बंगला भी अभी नहीं बिका....स्कूल भी नहीं बना ?"

"जी नहीं।"

-

"तब तो यह लड़की... हमारे घर की बहू बन सकती है।"

"बस में सफर करने वाली।"

"बहू बनकर आएगी तो नई से नई कार में घूमेगी। मास्टर देवीदयाल की इकलौती लड़की जब बहू बनकर आएगी तो बंगला भी तो लेकर आएगी।"

"मालिक ! बंगला कैसे दौडत्रकर आ जाएगा ?"

"अब गधे...बंगला दहेज में मिलेगा न।'

.

"वह तो है।"

"बस तो, वहां एक शानदार पन्द्रह माले की बिल्डिंग बन सकती है और नीचे एक शानदार शॉपिंग कम्पलैक्स....बाजार..रेस्टोरेंट इत्यादि भी बन सकते हैं।

"बिल्कुल मालिक।"

"बस तो फिर यह भाग्यशाली लड़की हमारे घर की जरूर बहू बनेगी।"

"सच मालिक !"

"तुम तो ऐसे खुश हो रहे हो जैसे वह तुम्हारी बेटी है।"

"मालिक ! मेरी बेटी का इतना सौभाग्य कहां।"

राजेश कार का हार्न सुनकर उछल पड़ा और रूक गया-जगमोहन की कार उसके पास ही रूक गई तो राजेश ने ठंडी सांस ली और खिड़की के पास आकर बोला

"तू फिर आ गया ?"

"तो क्या न आता ?"

"मैंने तो आज ही सुबह मना किया था इसलिए कि मेरा आखिरी साल है पढ़ाई का।"

"तो क्या हुआ ?"

"सेठ साहब ने देख लिया तो गजब हो जाएगा।"

"आज बैठ जा...मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूं।"
 
राजेश कार में बैठ गया और बोला-"पूछ, क्या पूछना है ?"

.

"ठहर, याद कर लूं।" फिर अचानक बोला-"हां, याद आ गया....तुझे मालूम है, ताजमहल होटल किसने बनवाया था ?"

"अबे ताजमहल होटल तेरे डैडी ने नहीं बनवाया, बहुत पुराना बना हुआ है। मगर किसने पूछा था

"प्रोफेसर ने।

"ताजमहल होटल नहीं-खाली ताजमहल पूछा होगा-वो ताजमहल जो आगरा में है.पर्यटकों के लिए है-संसार का सातवां बड़ा अजूबा है जो मुगल शहनशाह शाहजहां ने अपनी बेगम की याद में बनवाया था...वह उससे बहुत मुहब्बत करता था।"

"हां, बाद में प्रोफेसर ने बताया था.. तो मैं क्या आठवां अजूबा हूं ?"

"यह किसने कहा था तुझे?' राजेश हंसकर बोला।

"मेरे जवाब न देने पर एक लड़की ने खड़ी होकर कहा था।"

"किस लड़की ने ?"

"शायद सुनीता नाम था उसका। मेरी क्लासमेट है।"

"अरे ! तू लड़कियों से मजाक उड़वाता है।"

"छोड़ यार ! कोई मजाक उड़ाए तो क्या बिगड़ता है ?"

"अच्छा आगे बोल।"

"आज ही संयोग से मैंने उसी लड़की की इज्जत बचाई है।"

राजशे संभलकर बैठ गया और बोला-"कब ?"

"बस थोड़ी देर पहले।"

"किससे ?"

"अरे ! अपने ही कॉलेज का एक लड़का है।"

"क्या तूने उसे मारा भी ?"

"बस एक थप्पड़ हाथ घुमाकर-गाल पर जड़ दिया-तुमने ही यह गुर सिखाया था।"

"काफी था मगर तूने आज मार कैसे लिया ? तू तो किसी पर हाथ नहीं उठाता।"

"डैडी की शान और सम्मान का ख्याल आ गया।"

"फिर क्या हुआ ?"

"वह लड़की बच गई....और सिसककर मुझसे लिपट गई... कहने लगी-आपने मेरी इज्जत लुटने

से बचा ली–में आपका यह उपकार कभी नहीं भूलूंगी।"

"तूने क्या कहा?"

"मुझे एक फिल्म का डायलॉग याद आ गया-'मेरा फर्ज था'- बस वही दोहरा दिया।"

"फिर क्या हुआ ?"

"उसने कहा-यह बदमाश होश में आकर मेरे पीछे न लग जाए..आप मुझे बस स्टॉप तक छोड़ दीजिए...और मैंने उसे बस स्टॉप पर छोड़ दिया।"

.

राजेश ने उसे एक धप्प मारी और कहा-"गधा है तू....उसे घर तक पहुंचाना चाहिए था।"

"अपने घर तक ?"

"नहीं...उसके घर तक।"

"इससे क्या होता ?"

"अरे तू फिल्में देखता है-ऐसे ही दृश्यों से हीरो हीरोइन की मुलाकात शुरू होती है। जब वह । तुझसे लिपट गई थी तो तुझे कुछ नहीं हुआ था

.

"क्या होता ?"

"अरे हाड़-मांस के पहाड़! तेरे शरीर में दिल नहीं, भाव नहीं। कोई नौजवान सुन्दर लड़की तेरे जैसे नौजवान शरीर से लिपट जाए तो क्या होना चाहिए ? तुझे यह भी नहीं मालूम ।'

.

"हमसे पहले कभी कोई लड़की नहीं लिपटी।"

"अरे तुझे कोई सनसनी महसूस नहीं हुई-खून में कोई गरमी नहीं आई...कोई जोश नहीं आया ?"

"क्या ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है ?"

"अरे ! यहीं से तो मुहब्बत की शुरूआत होती है।"

"तौ क्या वह लड़की हमसे मुहब्बत शुरू कर देगी

"सेंट-परसेंट....तूने उसकी इज्जत बचाई है न।"



उसने एकदम गाड़ी रोक ली तो राजेश ने पूछा-"क्या हुआ ?"

.
 
.

"शायद वह लड़की अभी स्टॉप पर खड़ी हो।"

"तुमसे मुहब्बत जाहिर करने का इन्तजार कर रही हो। कल कॉलेज में मिल लेना।"

"तो क्या उसी सीन की सेम रिहर्सल-शक्ति उसकी इज्जत पर हमला करे और मैं उसे मजा चखऊं?"

"नहीं-उस लड़की को कार में लिफ्ट देना और रास्ते में धीरे से उसके कान में कहना-मैं तुमसे प्यार करता हूं।"

"अरे, बाप रे बाप-!"

जगमोहन ने स्टेयरिंग छोडनकर दिल थाम लिया और राजेश ने जल्दी से स्टेयरिंग संभाल लिया।

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सेठ दौलतराम के चेहरे से खुशी फूटी पड़ रही थी। उन्होंने किसी का टेलीफोन रिसीव किया...फिर रिसीवर रखकर इन्टरकॉम का बटन दबाया। दूसरी ओर से आवाज आई-"यस सर ।"

सेठ दौलतराम ने रिसीवर रख दिया। कुछ देर बाद ही दरवाजे के पास से आवाज आई

"मैं...मैं..अंदर आ सकता हूं सर।"

"आ जाइए।"

प्रेम अंदर आकर शिष्टता से बोला-"यस सर ।"

"बैठिए !" प्रेम बैठ गया तो सेठ दौलतराम ने मुस्कराकर कुर्सी की पीठ से टेक लगाते हुए कहा-"मिस्टर प्रेम....हमारा एक ही बेटा है जगमोहन-अगर हम उसकी शादी करें तो कम से कम कितना दहेज मिलना चाहिए?"

"सर ! कम से कम दस-पन्द्रह करोड़ तो मिलना ही चाहिए।"

"अगर हम कहें, एक अरब तक मिल रहे हों तो....।"

"फिर....सर, देर नहीं करनी चाहिए, तुरन्त ही छोटे सेठजी का रिश्ता पक्का कर दें।"

"हां, आपसे यही सलाह लेनी थी।"

"तो क्या छोटे सेठजी का रिश्ता लगा दिया है ?"

"नहीं ! हमारा बेटा एक अरबपति आसामी की बेटी से मुहब्बत करने लगा है।"

.



"अच्छा !'' प्रेम खुश होकर बोला।

"हां-आज हमने अपनी आंखों से देखा था।'

"कहां?"

"सांताक्रूज में एक बस स्टॉप के पास।"

"अच्छा! वह लड़की बस स्टॉप पर गई थी ?"

"नहीं, वहां वह कार से उतरी थी....बस में बैठने के लिए।

प्रेम ने आंखें फाड़कर कहा-"अरबपति की बेटी

और बस से सफर।"

"मामला कुछ ऐसा ही है।"

"क्या किसी कंजूस सेठ की बेटी है?"

"नहीं...एक ऐसे आदमी की इकलौती बेटी जिसके पास पुराना बंगला है।"

"ओहो !"

"और बंगला भी ऐसी जगह जहां पन्द्रह माले तक की बिल्डिंग और नीचे शॉपिंग कम्पलैक्स बनाए जा सकते हैं।"

"वैरी गुड ! फिर देर किस बात की है ?"

"बस..आज हम रिश्ता पक्का करने जा रहे हैं।"

"बात करने तो उन्हें आना चाहिए।"

"बेचारी का बाप अब इस दुनिया में नहीं रहा।"

"ओह ! क्या स्वर्गवासी हो गया है ?"

"खून हो गया था बेचारे का।"

"कब?"

"दस बरस पहले।"

प्रेम चौंका-"किसके हाथों ?"

"हमारे हाथों।"

प्रेम के मस्तिष्क में एक छनाका हुआ-उसने संभलकर बैठते हुए आश्चर्य से कहा

"आप मास्टर जी की बात कर रहे हैं। मगर सुना है उस लड़की की तो सगाई हो गई है।"

"वह गलत सुना है आपने वह आज ही जगमोहन के साथ कार में घूम रही थी।"

"तो फिर क्या देरी है।" प्रेम ने थूक निगलकर कहा-"इस शुभ काम में।"

"हम आज की विद्यादेवी से मिलने जाएंगे-आप भी हमारे साथ चलिएगा।"

.

.

"म..म..मुझे आज काम था सर !"

"क्या काम ?"

"वो...आज मेरी पत्नी के रिश्ते के भाई के मुंडन है....और आप जानते ही हैं कि इस दुनिया में

आदमी का पहला काम धर्मपत्नी को खुश रखना होता है।"

सेठ दौलत राम हंसकर रह गए और बोले-"ठीक है, हम अकेले ही चले जाएंगे।"

प्रेम उठकर अपने केबिन में आ गया। उसके मस्तिष्क में खलबली-सी मची हुई थी। अपनी कुर्सी पर बैठकर उसने सबसे पहले अपना मोबाइल निकाला और नम्बरों के बटन दबाए-फिर रिसीवर कान से लगा लिया...कुछ देर बाद दूसरी

ओर से आवाज आई-"हैलो!"

आवाज कुछ कराहती हुई थी। प्रेम ने चौंककर रिसीवर कान से हटाकर माउथपीस में बोला-"किसके पास है तेरा मोबाइल ?"

दूसरी ओर से आवाज आई-"मेरे ही पास है..मैं ही बोल रहा हूं डैडी।"

.

"अबे-तेरी आवाज को क्या हो गया?"

"आवाज को छोड़िए...आप काम बताइए।"

"अरे ! तू क्या खाक काम करेगा..तूने तो काम बिगाड़ने पर कमर कस ली है अपनी।"

"जले पर नमक मत छिड़किए डैडी।"

"मैंने तुझे क्या काम सौंपा था ?"

"खाना-पीना....कॉलेज जाना।"

"और सुनीता...!"

"उकसी तो मैं पिछले दस बरस से पटा रहा हूं।"

"आज सुनीता तेरे साथ कॉलेज गई थी ?"

"नहीं...वह बस से गई थी।"

"वापसी में तूने उसे लिफ्ट नहीं दी।"

"वह तो खुद मुझे लिफ्ट नहीं देती....मैं उसे क्या लिफ्ट दूं ?

"अरे! इतना बड़ा सांड हो गया तुझसे एक लौंडिया नही पटती।"

"आप ही पटा लें।"

"अबे! मैं उसके बाप के बराबर हूं।"

"मेरे भी तो बाप हैं आप।

"उल्लू के पट्टे !"

-

"बिल्कुल ठीक कहा....डैडी।"

"आज सुनीता सेठजी के बेटे जगमोहन के साथ कार में देखी गई थी।"

"तो मैं क्या करूं?"

"अबे ! तू नहीं कुछ करेगा तो क्या मैं करूंगा ?"

"डैडी ! वह लड़की मेरे बस में आने वाली नहीं है।"

"मेरा बेटा होकर हथियार डाल रहा है। मैंने तेरी मां जैसी औरत को अपने बस में कर लिया था।"
 
"इतनी उमर की तो कई औरतें ऐसी हैं जिन्हें जब चाहं मैं अपने बस में करके आपकी बहू बना दूं।"

"उल्लू के पट्टे ! मुझे बहू नहीं, मास्टरजी का बंगला चाहिए।"

"हम फ्लैट में रहते हैं वही ठीक है।"

"गधे ! हमें वह बंगला रहने के लिए नहीं..मैं उस बंगले से बिल्डर का कारोबार शुरू करने वाला

"सपने देखना छोड़िए डैडी, वरना जगमोहन आपकी भी पिटाई कर देगा।"

.

"तो क्या जगमोहन ने तेरी पिटाई की है?"

"इसी कारण तो मेरी आवाज बदली हुई है।"

"अरे, तूने उस पहाड़ को देखा नही था-काहे को टक्कर मारी।"

"देखता तो रोज हूं, लेकिन टक्कर आज हो गई...मैं सुनीता को आपकी बहू बना रहा था।"

"हाट ?"

"आज मैं उसका तिया-पांचा कर देता....पर वह जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने लगी।"

"और जगमोहन ने उसे बचा लिया।"

"वह न आता और दस-बीस भी आ जाते तो वह नहीं बच सकती थी-मैंने इस तरह उसे दबोच रखा था कि....।"

"अबे गधे....अब तू उसकी नजरों में विलेन बन गया और वह हीरो।"

"मैं क्या करूं? जिस चक्की का आटा सेठजी ने जगमोहन को खिलाया था-आपने मुझे क्यों नहीं खिलाया।"

"मुझे क्या मालूम था तू इतना नकारा निकलेगा

"वरना किराये का बेटा ले लेते ।"

"शटअप!"

"ओके।"

"एक बात कान खोलकर सुन ले-सुनीता अगर बहू बनेगी तो हमारे ही घर की-मुझे किसी भी कीमत पर वह बंगला चाहिए।"

"तो फिर एक काम कीजिए-मुझे एक रोड रोलर दिलवा दें।"

"क्या मतलब ?"

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"जगमोहन को सड़क पर लिटाकर उस पर रोड रोलर चढ़ा दूंगा-जब उसकी हड्डियां तक सुरमा बन जाएंगी...सुनीता स्वयं आपकी बहू बन जाएगी।"

"बकवास मत करो-सुनीता से जाकर माफी मांग

लो।"

"कहां जाकर ?"

"उसके बंगले पर।"

"यह काम तो नौ दिन से पहले नहीं हो सकता....तब तक मुझे टूटी-फूटी हड्डियों की सिकाई करानी है।"

"तेरी मां...."

गंदी गाली पूरी किए बगैर उसने बटन दबाकर फोन बंद कर दिया....कुछ देर गुस्से से झुंझलाहट में बड़बड़ाता रहा और कार में बैठकर जन्नाटे से निकल आया-एक एस. टी. डी. केबिन के अंदर

पहुंचकर उसने रिसीवर संभाला और सेठ दौलतराम के पर्सनल फोन के नम्बर मिलाकर रिसीवर कान से लगा लिया-हैलो की आवाज

आने पर प्रेम ने अपनी आवाज बदलकर गुर्राकर कहा

"सेठ दौलतराम !"

दूसरी ओर से घबराई हुई आवाज आई-"ओह ! कहिए!"

"पहचानी मेरी आवाज ?"

"ज...ज....जी हां।"

"आज क्या तारीख है ?"

"प...प...पन्द्रह ।'

"मगर मेरा टैक्स अभी तक नहीं मिला।"

"वो...वो...देखिए....।"

"इस बार मुझे दस लाख पूरे कैश चाहिए।"

"द....द...दस लाख ।"

"हार्ड कैश।"

"सुनिए आजकल कारोबार कुछ...।''

"पन्द्रह लाख ।"

"स..........सुनिए तो सही।"

"दूसरा कदम, क्या तुम भूल गए कि मेरे पास वह फोटो हैं जिनमें तुम मास्टर जी को गोली मार रहे हो ?"

"न... न..नहीं..!"

"और वह फाइल भी जिस द्वारा तुम मास्टर जी

का बंगला मुफ्त हड़प करना चाहते थे।"

.

.

"ज...ज...जी....!"

"उस फाइल पर मास्टर जी के खून के छींटे भी हैं...मैं जब चाहूं तुम्हें फांसी के तख्ते तक पहुंचा

सकता हूं।"

"नहीं..नहीं...!"

"तो फिर दस लाख नकद....आज की रात को।"



.

"जी....!"

"तरीका तुम्हें मालूम है।"

"जी हां।"

.

.

.

.

"एक बात और....तुम्हारा बेटा आजकल मास्टर जी की बेटी के साथ घूमता हुआ देखा गया है।"

"ज...ज..जी...दोनों मुहब्बत करते हैं।'

"तुमने जगमोहन को सुनीता के पीछे लगाया है।"

-

"नहीं.!"

"इसलिए कि उस बंगले की अकेली वारिस सुनीता है-अगर वह तुम्हारी बहू बन जाए तो तुम्हें बंगला मुफ्त में मिल जाएगा और यह बात कान खोलकर सुन लो-सुनीता को बहू बनाने का ख्याल दिल से निकाल दो-वह जिसकी बहू बनेगी बंगला उसी

का होगा।"

"त....त....तो आपका...?"

.

.

"नहीं..जिसका भी बनेगा तुम देख लोगे।"

"आपका क्या लालच है ?"

"हमें उस पार्टी से रकम मिलेगी। वैसे भी विद्यादेवी आपके यहां सुनीता का रिश्ता नहीं

करेंगी, क्योंकि आप मास्टर देवीदयाल के कातिल के मालिक हैं।"

"ज..ज...जी...!"

"अगर आप नहीं माने तो आपकी असलियत विद्यादेवी को भिजवा दी जाएगी।"

"नहीं-आप ऐसा नहीं करेंगे।"

"एक ही शर्त पर।"

"मुझे आपकी हर शर्त स्वीकार है।"

"तुम सुनीता को बहू बनाने को ख्याल दिल से निकाल दोगे....और आज रात को रकम भेज दोगे।"

"जी....!"

फिर प्रेम ने डिस्कनेक्ट करके डायल घुमा दिया

और बूथ से बाहर निकल आया।
 
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