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Romance मोल की एक औरत complete

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राणाजी उन लडको की बातों पर हस पड़े और बोले, "नही बेटा ये असली नोट है. ये सौ रूपये हैं. तुम इनको अपने पास ठीक से रख लो."

बदलू की बीबी की नजर अपनी लडकी की विदाई पर कम और उन लडकों के हाथ में लग रहे सौ के नोटों पर ज्यादा थी. जिन्हें वे इन लोगों के जाते ही बच्चों से छीन कर अपने पास घर खर्च के लिए रख लेने वाली थीं. ये गरीबी की घोर नजर की गलती थी. जिसमे सौ का नोट बहुत मायने रखता था.

गाँव के बाहर तक आ बदलू और बदलू की बीबी लौट कर जाने लगे. उनकी लडकी माला फिर से सिसक पड़ी. माँ ने एक बार फिर से गले लगाया और कान में बोली, "बेटा सम्हाल कर रहना और कभी यहाँ आने की जिद न करना. हमें घूमना होगा तो खुद आ जायेंगे लेकिन तुम यहाँ आने की एक भी बार अपने पति से न कहना. ठीक है?"

लडकी ने हाँ में सर हिला दिया. माँ से कसकर लिपटी लडकी को बदलू ने डपट कर अलग करा दिया. बोले, “बेटा तुम्हे देर हो जाएगी. जाओ अब.”

राणाजी और गुल्लन ने बदलू से दुआ सलाम की और लडकी को अपने साथ ले मुख्य रास्ते की तरफ चल दिए.

थोड़ी दूर बढ़ ऑटो में बैठे. उस ऑटों ने उन्हें रेल्वे स्टेशन पर उतार दिया. गुल्लन ने तीन टिकट ली और तीनों ट्रेन का इन्तजार करने लगे. ट्रेन भी समय से आ गयी. झटपट तीनों जा उसमें बैठ गये लेकिन ये लडकी जो राणाजी की दुल्हन बनकर आई थी ये आज पहली बार ट्रेन में बैठी थी. आज से पहले इसने कभी ट्रेन को पास से भी नही देखा था.

राणाजी के बगल में उनकी दुल्हन बनी ये लडकी माला बैठी थी और सामने की सीट पर गुल्लन रंगीला. गुल्लन बार बार राणाजी की तरफ देख मुस्कुरा उठते और राणाजी शरमा कर उनकी तरफ. ट्रेन जाकर स्टेशन पर रुकी.

राणाजी गुल्लन और अपनी दुल्हन सहित उतर गये.ये इनके गाँव का रेल्वे स्टेशन था. रात काफी हो चुकी थी. गुल्लन आगे आगे चल रहे थे और राणाजीअपनी दुल्हन के साथ पीछे पीछे. राणाजी की दुल्हन बनी इस लड़की ने ऐसी साड़ी पहली बार पहनी थी. इस कारण उसे चलने में बहुत परेशानी हो रही थी.

अचानक रास्ते में चलते चलते वो गिर पड़ी. राणाजी ने उसे अपना सहारा दे उठाया और उसका हाथ पकड़ चलने लगे. राणाजी का घर गाँव के इसी छोर पर पड़ता था. उन्होंने घर आते ही अपनी दुल्हन का हाथ छोड़ दिया.
 
घर पर पहुंच राणाजी ने गुल्लन से कहा, "गुल्लन दरबाजा खटखटा दो.” गुल्लन ने दरवाजा खटखटाया तो तुरंत सावित्री देवी अंदर से भागी आयीं और दरवाजा खोल दिया. दरवाजा खोलते ही उन्हें अपने पुत्र राणाजी और उनके दोस्त गुल्लन के साथ साथ नई दुल्हन भी दिखाई दे गयी.

सावित्री देवी ने अपनी आखों को मला. मानो जैसे वो किसी सपने से जागी हों. राणाजी ने माँ के पैर छुए तो माँ ने भी उन्हें गले से लगा लिया.

गुल्लन ने राणाजी की दुल्हन की तरफ इशारा कर कहा, “माताजी ये रही आपकी बहू. और बहू रानी ये तुम्हारी सास हैं इनके पैर छू लो.” राणाजी की दुल्हन ने तुरंत सावित्री देवी के पैर छू लिए.

सावित्रीदेवी ने उसे अपने गले से लगा लिया. उन्होंने खुशी में ये तक न पूंछा कि ये लडकी कौन है और कहाँ से आई है? बेटे की शादी का एक पल भी उन्होंने नही देखा लेकिन उसकी दुल्हन उनके सामने खड़ी हुई थी.

सावित्री देवी ने राणाजी से कहा, “बेटा थोड़ी देर यहीं रुको मैं अभी आई.” इतना कह वो अंदर भागी हुई गयी और थोड़ी ही देर में आरती की थाली और चावल का भरा लौटा ले बाहर आ गयी. राणाजी को यह सब देख ज्यादा हैरत न हुई. उन्हें पता था माता जी ये सब पहले ही तैयार कर चुकी होंगी.

सावित्री देवी ने बरवधू की आरती उतारी. चावल के लौटे में वहू से पैर लगवाया और घर के अंदर ले चली गयीं राणाजी गुल्लन के साथ अपने कमरे में चले गये. सावित्री देवी दुल्हन को ले अपने कमरे में. आधी रात से भी ज्यादा हो चुकी थी.

गुल्लन अपने घर जाना चाहते थे लेकिन राणाजी ने उन्हें इस रात अपने घर में ही रोक लिया. कमरों की घर में कोई कमी नही थी. अपने बगल वाले कमरे में गुल्लन को सोने के लिए बोल दिया. सावित्री देवी ने बहू से खाने पीने के बारे में पूछा तो उसने मना कर दिया लेकिन उसे नींद आ रही थी.

सावित्री देवी उसे राणाजी के कमरे तक छोड़ गयी. गुल्लन बगल के कमरे में जा सो चुके थे लेकिन राणाजी अभी तक जाग रहे थे. इनकी तो आज सुहागरात थी. वो रात जिसका सपना वो आज से बीस पच्चीस साल पहले से देखते आ रहे थे लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आये रात नसीब हुई. राणाजी को तो इसकी भी उम्मीद नही रही थी लेकिन गुल्लन ने यह सब सच कर दिखाया.

कमरे में आई राणाजी की दुल्हन दीवार के किनारे सिमट कर खड़ी हो गयी. सावित्री देवी जाने को हुई तभी कुछ ध्यान आया और बहू से बोली, “अरे बेटा तुम्हारा नाम पूंछना तो भूल ही गयी. क्या नाम है तुम्हारा?"
 
लडकी सहमी सी आवाज में घरघराते गले से बोली, "माला कुमारी.”

सावित्री देवी खुश होते हुए बोली, "नाम तो बहुत सुंदर है लेकिन मैं तुम से सिर्फ माला कहा करूंगी."

माला नाम की ये लडकी चुपचाप खड़ी रही. सावित्री देवी वहां से चलीं गयी. राणाजी जी ने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और अपनी दुल्हन से बोले,"तुम लेट जाओ. इस बेड पर ही लेट लो.”

माला धीरे से आगे बढ़ी और पलंग पर एक तरफ लेट गयी. कमरे में जल रही लेंप को राणाजी ने बहुत मद्दम कर दिया और खुद भी बिस्तर लेट गये. पेरों के पास पड़ी हुई चादर उठाई और माला के ऊपर डाल दी.

दूसरी चादर ओढ़ खुद ओढ़ लेट गये. राणाजी बहुत थक गये थे. उन्हें माला की थकावट का भी अंदाज़ा था लेकिन ये उनकी सुहागरात थी. कम से कम दुल्हन से दो बातें तो कर ही सकते थे. उन्होंने अपनी दुल्हन को नाम ले आवाज दी, "माला. तुम्हें नींद आ रही है क्या?"

माला ने कोई भी आवाज न दी. राणाजी ने फिर से आवाज दी लेकिन कोई उत्तर नही आया. राणाजी ने उठकर माला के मुंह की तरफ देखा. वो मासूम नादान लडकी गहरी नींद में सो चुकी थी. सोते में वो लडकी बहुत खूबसूरत लग रही थी. लेकिन आज के दिन मासूमियत भरी नींद का क्या उपयोग था. आज तो रतजगा बनता था.

राणाजी उसे देख थोड़े मुस्कुराये और लेट गये. आखिर उस लडकी की उम्र ही कितनी थी. खेलने कूदने की उम्र में व्याह होना और फिर किलोमीटरों पैदल चलना. माला क्या जानती थी कि आज उसकी शादी हो जाएगी?

वो तो सुबह से काम करती रही थी और दोपहर के बाद उसकी शादी हो गयी फिर रात तक ससुराल आ पहुंची. मासूम लडकी और ये सांसारिक बोझ. आखिर कैसे इतनी जल्दी सम्हल जाती. ये तो वैसे ही था जैसे विना बताये किसी पर वार किया जाय?

राणाजी की आँखें भी नींद से भर चुकी थी. वो मन में सौ तरह के ख्याली पुलाव ले सो चुके थे. मन के अच्छे राणाजी ने माला को जगा अपना मन भरने की न सोची. सोचते थे अगर मेरी समय से शादी हो गयी होती तो आज इतनी बड़ी मेरी लडकी होती और वो भी इसी तरह किसी से व्याह दी जाती तो उसका भी यही हाल होता. कम से कम आज की रात तो चैन से सो लेगी ये लडकी और इस सुहागरात का क्या वो तो कल भी हो जाएगी.
 
भाग-2

सुबह हो चुकी थी. गुल्लन उठकर अपने घर जा चुके थे. सावित्रीदेवी ने राणाजी का दरवाजा खटखटाया. राणाजी की नींद खुली तो उन्होंने दरवाजा खोल दिया. माँ ने अपने बेटे से कहा, “बेटा चाय लायी थी तुम लोगों के लिए. और वो माला जगी अभी या नही?"

राणाजी ने मुड़कर देखा. माला अभी तक सो रही थी. माँ से बोले, “माँ तुम उसे जगाना चाहो तो जगा लो. वो अभी तक सो रही है. जागकर चाय भी पी लेगी. मैं तो शौचालय जा रहा हूँ." इतना कह राणाजी वहां से चले गये,

सावित्रीदेवी उनके कमरे में आ गयीं और माला के सिराहने बैठ उसे आवाज देने लगीं, "माला ओ माला. अरे उठो बहू सुबह हो गयी."

माला किसी की आवाज सुन उठकर बैठ गयी. जैसे ही सामने सावित्री देवी को देखा तो पलंग से उतर खड़ी हो गयी और घुघट कर लिया. ये घुघट करने की बात उसकी माँ ने उसे बता दी थी.

सावित्री देवी थोडा मुस्कुरायी और बोलीं, "बहू पहले चाय पीओगी या शौच को जाओगी?"

माला नही जानती थी कि वो क्या बोले. बस हाँ में सर हिला दिया. सावित्री देवी उसको इस तरह झिझकते देख हंस पड़ी और बोली, “अरे. चलो छोडो तुम पहले चाय पी लो फिर कमरे के बाहर बने शौचालय में शौच कर आना. ठीक है?"

माला ने उनकी इस बात पर हाँ में सर हिला दिया. सावित्री देवी एक कप चाय दे बाहर चली गयीं. माला ने इतने सुंदर कप में इतनी खूशबूदार चाय कभी नही पी थी. अपने घर तो उसे महीनों में एकाध बार ही चाय मिलती थी. वो भी उलटी सीधी. ___

माला ने देखा कि कमरे में कोई नहीं है. उसने झट से चाय का कप उठाया और मुंह से लगा लिया. चाय काफी गर्म थी. मुंह तो जला लेकिन स्वाद भी खूब आया. माला ने इतनी बढिया चाय अपने जीवन में कभी नही पी थी.

गर्म चाय से मुह जलता रहा और वो उस चाय को पीती रही. क्या करे गरीब लडकी. जो चीज कभी उसे ठीक से मिली ही नही उसके लिए इस तरह क्यों न तरसे? कप खाली हो चुका था लेकिन माला का मन करता था कि एकाध कप और चाय होती तो ज्यादा मजा आता. खाली कप को भी एक बार उलट कर बूंद बूंद चाय पी डाली. फिर जीभ से कप को चाट डाला. कप के आसपास चिपकी चाय भी बहुत स्वादिष्ट लग रही थी. इतनी स्वादिष्ट तो कप में भरी चाय भी नही लगी थी. इतने में राणाजी ने कमरे में प्रवेश किया. माला ने झट से कप को प्लेट में रख दिया और सहमी सी खड़ी हो गयी.
 
राणाजी उसकी तरफ देख मुस्कुरा दिए. वो वावली भी उनकी तरफ देख मुस्कुरा दी. उसे पता ही नहीं था कि वो उनकी पत्नी बनकर आई है. लगता था वो कोई मेहमान या नौकर के रूप में इस घर में आई है जिसे समझ ही नही आ रहा था कि वो करे तो क्या करे?

राणाजी ने उसकी तरफ देख कहा, “चाय पी ली माला? अच्छी लगी?"

माला ने हां में सर हिला दिया. राणाजी बाहर की तरफ इशारा करते हुए बोले, "देखो माला अगर तुम शौच करने जाओ तो बाहर पखाना बना हुआ है उसमें चली जाना. यहाँ औरतें खेत में ये सब करने नही जातीं."

माला ने तो हमेशा खुले में ही शौच की थी. उसने राणाजी की बात को समझ हाँ में सर हिला दिया और बाहर शौचालय की तरफ बढ़ गयी.

माला जब शौचालय से निकली तो उसने अपनी ससुराल के घर को निहारा, माला को ये घर किसी राजमहल से कम नही लग रहा था. उसके पिता का घर तो एक झोपडी मात्र था. जिसमें दरवाजे का नाम निशान ही नही था और यहाँ तो हर कमरे में दरवाजा था. पक्की छत थी. पक्की दीवारें, फर्श भी पक्का. घर में रंग बिरंगे पर्दे भी लगे हुए थे. माला घर को देख देख वावली हुई जा रही थी. उसे अपनी किस्मत पर नाज़ हो रहा था. सोचती थी अगर शादी का मतलब ये होता है तो वो हर रोज़ शादी करना चाहेगी.

माला राणाजी के कमरे में जा घुसी. राणाजी बैठे शायद उसी का इन्तजार कर रहे थे. उसके आते ही बोले, "माला तुम घर का काम करना जानती हो न?"

माला को समझ न आया ये घर का काम होता क्या है लेकिन वो इतना समझ गयी कि काम करने के लिए पूंछा जा रहा है. बोली, “मतलब झाडू बर्तन..?”

राणाजी थोडा मुस्कुराये और बोले, “और साथ ही खाना और सब्जी बनाना भी."

माला फटाक से बोली, “हाँ आता है. मैं बहुत बढिया मछली चावल पकाती हूँ. मेरे हाथ का मछली चावल..."

राणाजी ने माला को चुप रहने का इशारा किया और धीरे से बोले, “अरे हमारे यहाँ ये सब नही बनता है. माताजी के सामने इन सब चीजों का नाम भी मत लेना. वो शाकाहारी हैं. शाकाहारी समझती हो न? जो मॉस मछली नहीं खाते. क्या तुम्हें इस सब के अलावा कुछ और बनाना आता है?"
 
माला आश्चर्य में पड़ गयी. सोचती थी जब ये लोग मछली चावल नही खाते तो फिर क्या खाते हैं? क्योंकि माला के यहाँ तो यही सब चलता था. कुछ दिन ही ऐसे होते थे जिनमें कुछ और बनता हो. हरी सब्जी तो खेतों के किनारे उगने वाली तरह तरह की घास से कभी कभार बन जाती थी. अब वो राणाजी को क्या बताये कि आपके यहाँ का उसे कुछ भी बनाना नही आता है. बोली, "हम तो इसके अलावा कुछ बनाना नही जानते. हमारे घर तो लोग यही सब खाते हैं."

राणाजी ने थोडा सोचा. उन्हें पता था माला के घर की हालत कैसी थी लेकिन सहृदय राणाजी ने इसका भी तोड़ निकाल दिया. बोले, “अच्छा माला अगर तुम्हें माता जी यह सब बनाना सिखाएं तो सीखना चाहोगी?"

माला थोड़ी खुश होती हुई बोली, "हाँ हमे ये सब बनाना अच्छा लगेगा. क्या वो हमको सिखा देंगी?"

राणाजी ने हां में सर हिलाया और बोले, “अच्छा तुम अभी यहीं बैठो. हम माता जी से बात करके अभी आते हैं. फिर तुमको बताते हैं.

इतना कह राणाजी कमरे से बाहर निकल गये. माला ने कमरे में इधर उधर नजर दौडाई. कमरा उसे फिल्मों वाले घरों की तरह लग रहा था. माला ने एक बार फिल्म देखी थी जिसमें इसी तरह का घर दिखाया गया था.

पलंग पर तो माला कल रात पहली बार सोयी थी. वो तो बचपन से जमीन पर या दिन में कभी कभार टूटी चारपाई पर लेट लेती थी. क्योंकि चारपाई तो सिर्फ उसके पिता या मेहमानों के लिए होती थी. घर की औरतें तो सर्दी से गर्मी तक जमीन पर ही सोती थी.

राणाजी अपनी माँ सावित्री देवी के कमरे में पहुंचे. उनकी माँ अपने बक्सों को उल्ट पुल्ट रहीं थीं. राणाजी ने पहुंचते ही अपनी माँ से कहा, "अरे माँ. अगर तुम चाहो तो ये माला काम में तुम्हारा हाथ बंटा देगी लेकिन खाना बनाना इसे तुमको ही सिखाना पड़ेगा. वो सब इस पर नही आता. हाँ झाडू वगैरह लगा देगी."

माताजी ने वेफिक्र हो कहा, "नही बेटा एकाध दिन उसे आराम कर लेने दे. मैं अभी इतनी बूढी भी नही हुई हूँ और इसे में सब सिखा दूंगी तू चिंता मत कर.”

राणाजी ने आश्वस्त हो हाँ में सर हिलाया और बोले, "लेकिन माँ अगर वो काम नहीं करेगी तो उसका मन भी नही लगेगा. काम के बहाने तुम से झिझक भी खुल जाएगी."

सावित्री देवी सहमत होती हुईं बोली, "ठीक है तो तू उसे भेज दे लेकिन बेटा ये है कहाँ की और कौन है कुछ मुझे भी तो पता पड़े? इसके माँ बाप सब कहाँ है? इतनी जल्दी शादी करने के पीछे कारण क्या था?"

राणाजी को वैसे तो माँ को बताने का मन नही होता था लेकिन माँ से कोई बात छुपाना भी उन्हें अच्छा नही लगता था. बोले, "माँ ये बिहार की है. और इसके माँ बाप बहुत गरीब हैं. बेचारों को ठीक से रहने खाने का भी कोई ठीक जरिया नही. बस यही इसका परिचय है.” ।

सावित्री देवी की आँखें हैरत से फटी रह गयीं. बोली, “बिहार से शादी करके लाये हो? अरे इसकी जाति बिरादरी पता कि या नही या वैसे ही शादी कर लाये?"

राणाजी को माँ की बात थोड़ी अखरी लेकिन शांति से बोले, "माँ मैंने ये सब कुछ नही पूंछा लेकिन ये हमारी बिरादरी की नहीं है. इतना मैं जानता हूँ.”

सावित्री देवी ने मुंह पर हाथ रख लिया और बोली, "हाय राम! क्या कहते हो बेटा? अरे तुमने ये भी न सोची की इस घर में किसी और जाति..."
 
राणाजी ने माँ की बात बीच में काट दी और बोले, "माँ अपनी जाति बिरादरी में तो आप पहले ही कह कह कर थक गयी थीं. आपको हर जगह से दो टूक जबाब मिला था. अब शादी हो गयी तो आप...और माँ क्या फर्क पड़ता है कि वो कौन जाति की है? बस इन्सान अच्छा होना चाहिए और कुछ नही. हमारी बिरादरी की कौन सी हम पर इतनी मोहब्बत रही है? हर कोई तो काट खाने को दौड़ता है. हर आदमी चाहता है कि हम बर्बाद हो जाय और आप फिर भी...?"

सावित्री देवी दृढ़ता से बोली, "बेटा तुम कुछ भी कहो लेकिन हम इस चौका चूल्हें में इस लडकी को न घुसने देंगे, न ही इसके हाथ का खायेंगे. अगर तुम चाहते हो कि हम काम न करें तो एक महरी रख लो. वो चौका चूल्हा करती रहेगी बस."

राणाजी माँ से बहस नही करना चाहते थे. आखिर वो उनकी माँ थीं. वो नही चाहते थे कि बुढापे में उन्हें कोई भी तकलीफ पहुंचे. बोले, "ठीक है माँ में आज ही एक महरी को इस काम के लिए कहे देता हूँ." इतना कह राणाजी अपने कमरे की तरफ चले गये.

माला अभी तक खड़ी खड़ी वावलों की तरह कमरे के हर सामान को बारीकी से देखे जा रही थी. राणाजी के कमरे में पहुंचते ही सहम कर खड़ी हो गयी. राणाजी उसके पास पहुंच मुस्कुराये और बोले, "देखो माला माताजी बोल रहीं हैं कि अभी कुछ दिन तुम ऐसे ही रहो फिर तुमको सिखा देंगी. तब तक के लिए एक महरी खाना बनाने के लिए रख लेंगे. अगर तुम्हारा मन काम करने के लिए किया करे तो तुम इस कमरे में सफाई और झाडू लगाने का काम कर लिया करो. ठीक है?"

माला ने बिना कुछ कहे हाँ में सर हिला दिया. थोड़ी देर राणाजी माला की तरफ देखते रहे. माला थोड़ी शरमा जाती थी लेकिन उसके अंदर नई दुल्हन जैसा कोई भाव ही नही था. उसकी साड़ी बड़े सलीके से बंधी हुई थी. कल का लगाया गया काजल अभी तक आँखों में से ठीक से छूटा नही था. चेहरे पर सच्ची मासूमियत थी और आँखों में हर चीज को छू कर देखने की ललक. मानो यहाँ की हर चीज उसके लिए नई हो या उसने ये सब चीजें कभी देखी हो न हों.

राणाजी इसके बाद उठकर बाहर चले गये.उन्हें अपने खेतों पर शायद कुछ काम था. साथ ही महरी को भी खाना बनाने के लिए कहकर आना था. माला पलंग के पास धरती पर बैठ गयी. उसे पलंग पर बैठने से डर लगता था और धरती पर बैठने की उसकी रोज़ की आदत भी थी. रात जब पलंग पर सोयी थी तो ठीक से उसे नींद भी नही आई थी. पत्थरों पर सोने वाला आदमी अचानक से फूलों पर सोने लगे तो उसे सच में नींद नही आती.

राणाजी अपने कमरे में आये तो उन्होंने देखा कि माला पलंग से टिके बैठी ही सो गयी है. राणाजी मुस्कुरा कर उसे देखने लगे. कितनी मासूम लग रही थी ये नादान लडकी. राणाजी का चाहकर भी मन नही करता था कि उसे छू भी लें. पता नहीं उनका मन उसे छूने का क्यों नही करता था? अंदर से वो भाव ही नही आता था कि उसे छू लें. शायद ये सब इसलिए था क्योंकि उन्हें वो लडकी जब मिली तो वे उस उम्र से बहुत आगे निकल गये थे.

लेकिन राणाजी ने जमीन पर बैठी सो रही माला को पलंग पर लिटा देना उचित समझा. राणाजी ने डरते डरते माला को अपनी बाहों में भरा और पलंग पर लिटाने लगे.

अपने शरीर को हिलते देख माला की आँख खुल गयी. राणाजी जैसे उसे बेड पर लिटा कर हटे तो वो एकदम से हडबडाई और पलंग से उतर कर खड़ी हो गयी. आँखों में थोडा सा डर था. राणाजी उसकी तरफ देख थोडा मुस्कुराये और बोले, "अरे नींद आ रही है तो सो जाओ. ऐसे क्यों डर गयीं? क्या मुझ से डर लगता है तुमको?"

माला ने झिझक कर कहा, “नही मैं तो ऐसे ही उठ गयी थी. माँ बोली आपके सामने पलंग पर न बैलूं.”

राणाजी ने चेहरा सिकोडा और थोड़े मुस्कुराते से बोले, “अच्छा और क्या क्या बोला तुम्हारी माँ ने?"

माला बच्चो की तरह बताने लगी, "माँ बोली कि अपने ससुराल वालों को कभी कुछ नही कहना. वो लोग अमीर हैं कभी उनके घर पर कोई काम मत बिगाड़ना. और कभी अपने घर जाने की जिद न करना और वो लोग कहें भी तो भी घर न आना. अगर जरूरत होगी तो हम खुद तेरे पास आ जायेंगे."

राणाजी अभी कुछ कहते उससे पहले ही उन्हें बाहर से एक औरत की आवाज सुनाई दी. राणाजी कमरे से बाहर निकल कर चले गये. ये महरी ही थी. राणाजी से उसकी बातें हुईं. तीन सौ रूपये महीने में महरी खाना बनाने के लिए राजी हो गयी. जिसमें वो खाना बनाने के साथ चौका बर्तन भी करने वाली थी. महरी आज से ही काम पर लग गयी. सावित्री देवी को अब से आराम मिलने जा रहा था. महरी रसोई में घुसी और खाना बनाना शुरू कर दिया. इतने में गुल्लन अपनी बीबी बच्चो के साथ राणाजी के घर आ पहुंचे. राणाजी गुल्लन के साथ द्वार पर बैठ गये और गुल्लन की बीबी माला के साथ कमरे में.

सावित्री देवी वैसे तो माला के पास जाने में सकुचा रहीं थी लेकिन गुल्लन की बीबी की वजह से आकर बैठ गयीं. गल्लन की बीबी जमना बातों में बडी मीठी थी और स्वभाव की भी बहुत अच्छी. माला को बहुत सारी बातें उसने समझा दी थीं. रहने का तौर तरीका. सास के साथ व्यवहार करने का लहजा. पति के साथ कैसे रहना चाहिए. वगैरह वगैरह.

सावित्री देवी ने माला से नहाने के लिए कह दिया. माला को समझ न आया की किधर नहाने जाए. अपने घर तो वो तालाब में नहा कर आती थी. जहाँ बस्ती की सारी औरतें नहा कर आतीं थी. माला की सकुच देख गुल्लन की बीबी जमुना समझ गयी. बोली, “माला चलो हम तुम्हें गुशलखाने तक छोड़ देते हैं. अच्छा कौन से कपड़े पहनोगी वो ही ले चलो.”

माला को तो पता ही न था कि उसे कौन से कपड़े पहनने हैं. जमुना ने वो भी समझ लिया और कमरे में रखी साड़ियों में से एक बढिया सी साड़ी पसंद कर माला को दे दी.
 
तालाब में नहाने वाली माला को गुशलखाने में नहाना थोडा अजीब तो लगा लेकिन अच्छा भी खूब लगा. ताज़ा साफ पानी और खुसबूदार साबुन. ऐसा साबुन माला ने आज तक देखा ही नही था. देर तक तो उस साबुन की खुसबू ही सूंघती रही. तब जाकर नहाई. नहाकर जैसे ही कमरे में लौटी तो जमुना ने उसको ठीक से सजा संवार दिया. बालों में लगाने का तेल भी माला को बहुत अच्छा और खुसबूदार लगा. अपने घर से तो यहाँ की हर चीज निराली और अच्छी लग रही थी.

सज संवर कर माला बहुत खूबसूरत लग रही थी. शायद अच्छे कपड़ों और साज सुंगार के विना एक औरत की सुन्दरता अधूरी ही रहती है. अब माला को देख कोई नही कह सकता था कि ये वही माला है जो आज से एक दिन पहले थी. शायद गरीब लडकियों की सुन्दरता मैले कपड़ों में दब कर रह जाती है. शायद वो ठीक से नहा धो नही पाती इसलिए उनका रंग भी उतना नही निखरता जितना अच्छे घरों की लडकियों का होता है. सावित्री देवी भी माला को देखती ही रह गयीं.

वो अगर उसकी जाति को भूल जाएँ तो माला में अपनी बहू के हिसाब से उन्हें रत्ती भर भी कमी नही दिखती थी. अगर वे दीया लेकर भी ढूंढने लगतीं तो भी अपने लडके के लिए इतनी संदर और कम उम्र की लडकी उन्हें न मिलती.

थोड़ी देर में गुल्लन और जमुना घर से विदा हो चले गये. राणाजी अपने कमरे में आये तो माला को देख देखते ही रह गये. माला की खूबसूरती उन्हें आकर्षित किये जा रही थी. मन करता था उसे अपने गले से लगा लें.

इतने में सावित्री देवी कमरे में आ पहुंची और राणाजी से बोली, “बेटा खाना तैयार हो चुका है. अब तुम यहीं खाओगे या दूसरे कमरे में?"

राणाजी ने माला की तरफ देखा फिर माँ से बोले, "माँ मैं यही खा लूँगा.”

सावित्री देवी ने माला की तरफ देख कहा, “बहू तुम मेरे साथ आओ."

माला विना कुछ कहे सावित्री देवी के साथ बाहर चली गयी. थोड़ी देर में ही दोनों वापस आ पहुँची. माला के साथ साथ सावित्री देवी के हाथ में खाने की थाली लग रही थी. माला अपनी थाली ले खड़ी थी. सावित्री देवी ने अपने हाथों वाली थाली अपने बेटे के आगे रख दी और माला से बोली, “बहू तुम भी खाना खा लो.” __

माला कल दोपहर से खाली पेट थी. उसने एक बार भी न नही कहा. थाली ले जमीन पर बैठ गयी. राणाजी ने उसे टोक कर कहा, "माला. देखो वो आसन ले लो उसपर बैठ आराम से खा लो." माला ने बगल में पड़ा आसन लिया और बैठ गयी. उसने एक भी बार सावित्री देवी या राणाजी की तरफ न देखा. बस बैठते ही खाना खाने लग गयी. गोभी आलू की सब्जी, परांठा, आम का आचार और पुदीने का रायता. माला ने आज तक ऐसा सब्जी और भोजन नही खाया था. वो तब तक खाती रही जब तक उसका पेट पूरी तरह से भर न गया.

राणाजी खाना खाते समय बार बार उसे देखते और माँ की तरफ देख मुस्कुरा देते. सावित्री देवी भी अपनी नई बहू को देख अचरज करतीं थीं. पूरा खाना खत्म कर माला ने अपने आसपास देखा. माला के मुंह पर भी खाना में लग गया था.

मुंह पर थोड़ी सब्जी अब भी चिपक रही थी. जिसे देख राणाजी को जोरदार हंसी आ गयी. सावित्री देवी ने भी अपना मुंह पल्लू से छिपा लिया. शायद उन्हें भी उस लडकी पर हंसी आ रही थी लेकिन माला वावलों की तरह दोनों के मुंह की तरफ देखती रह गयी.

इसके बाद सावित्री देवी माला को प्लेट सहित अपने साथ ले गयीं और उसके हाथ मुंह धुलवा वापस कमरे में भेज दिया. उसके पहुंचते ही राणाजी ने मुस्कुराते हुए पूंछा, “यहाँ का खाना अच्छा लगा माला या तुम्हारे यहाँ का अच्छा होता था?"

माला बड़ी ख़ुशी से बोली, "नही यहाँ का खाना बहुत अच्छा था. मैने आज तक ऐसा खाना खाया ही नहीं था. आज पहली बार इतना स्वादिष्ट खाना खाया. क्या रोज ऐसा ही खाना बनता है आपके यहाँ?"

राणाजी माला के बावलेपन पर थोडा मुस्कुराये और बोले, “हां. यहाँ लगभग रोज ऐसा ही खाना बनता है. और न भी बने तब भी तुम्हें जो अच्छा लगे तो यही बनबा लिया करना."

माला ने खुश हो हां में सर हिला दिया और बोली, “आप लोग कितने अच्छे हैं. मेरे माँ बाप से बहुत अच्छे.”
 
माला की इस बात से राणाजी थोड़े मुस्कुराये और बोले, “और मैं कैसा लगता हूँ तुम्हें? अच्छा या बुरा?" __

माला तनिक भी न सकुचाई. बोली, “आप भी बहुत अच्छे हैं. मेरे पापा से भी बहत अच्छे."

राणाजी माला की तुलना से थोडा सिटपिटा गये लेकिन वो उसकी नादानी को जानते थे. सम्हलते हुए बोले, “अच्छा तुम जब मुझे पानी देने आयीं थी तब तुमने मेरे बारे मैं क्या सोचा था? क्या तुम्हें पता था कि तुम्हारी शादी मुझसे हो जाएगी?" ___

माला ने थोडा सोचा फिर बोली, “तब हम आपको ऐसा नही समझ रहे थे और शादी का तो हमें पता ही नही था. हमारे यहाँ ऐसा ही होता है लडकी को तब पता चलता है जब उसकी शादी तय हो चुकी होती है."

राणाजी को थोडा थोडा समझ आ गया था कि माला की बस्ती में लडकियों की शादी किस तरह होती होगी. जहाँ खाने को ठीक से खाना नही होता वहां इस तरह की शादी होना कोई अचरज की बात नही होती. राणाजी इस बात को अलग करते हुए खुश हो बोले, “अच्छा तुमको पता है ये शादी क्यों होती है? मतलब इसके बाद क्या होता है? लडकी को क्या करना पड़ता है? क्या किसी ने ये सब तुमको बताया या नही?"

माला सहज भाव से बोली, “बो सब तो हमें पता है. शादी करके अपनी ससुराल जाते हैं फिर जिन्दगी भर वही रह जाते हैं. और क्या? फिर बच्चे हो जाते हैं.”

राणाजी माला की उम्र को देखते हुए उसके मन की बात समझ गये.

वो जानते थे इस उम्र में लडकी को ये सब पता नही होता. बोले, "माला शादी का मतलब इससे आगे भी कुछ होता है. तुम घर में अपनी माँ को रहते देखती थी न? कैसे वो तुम्हारे पापा से बात करतीं थी? कैसे हर बात को समझती थीं? हर काम को अपनी समझ से करती थीं. है न? ऐसे ही तुमको भी करना पड़ेगा. तुम अभी धीरे धीरे सब सीख जाओगी."

माला राणाजी को बातों को बड़े गौर से सुन रही थी. माला में काम को समझ कर ठीक से करने की गजब की क्षमता थी. राणाजी की बातों को भी उसने बड़ी गहराई से समझा. उसे ध्यान आ गया कि उसकी माँ किस तरह से हर काम को बड़ी जिम्मेदारी से करती थी.

बोली, “आप बहुत प्यार से समझाते हैं. आज से जो भी आप कहेंगे हम वही करेंगे लेकिन आप हमको बताते रहियेगा क्योंकि हमें यहाँ के बारे में कुछ भी पता नही है. हम बहुत जल्दी सीखने की कोशिश करेंगे. फिर आपको हमसे कोई भी परेशानी नही होगी."

राणाजी ने मुस्कुराकर हाँ में सर हिला दिया और उठकर बाहर चले गये. दिन भर सब ऐसे ही चलता रहा. माला अकेली कमरे में बैठी बैठी अपने घरवालों की भी याद करती रही लेकिन उसे बार बार माँ की कही बात भी ध्यान आ जाती थी. जिसमें माँ ने कहा था कि दोबारा लौट आने की जिद न करना. अब चाहे माँ की याद आये या न आये इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. लडकी अपनी मर्यदा को बहुत अच्छी तरह से ध्यान रखती है.

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राजगढ़ी गाँव से दो किलोमीटर दूर एक गाँव था बलरामपुर. इस गाँव में एक संतराम नाम का एक आदमी रहता था. उम्र भी खूब हो चुकी थी. इसके बड़े भाई की शादी हो तो चुकी थी लेकिन संतराम की शादी होने का नाम नही लेती थी. कारण था उसका बहरापन. उसकी जाति कहार थी और उस जाति में कोई भी ऐसी लडकी नही मिली जो संतराम से शादी करने को तैयार हो जाती. संतराम का बड़ा भाई बाहर शहर में रहता था. उसके एक लड़का भी था. बड़े भाई वाली बात. उसने ठान ली कि अपने छोटे भाई की शादी कराकर छोड़ेगा.

लेकिन कोई शादी करे तो संतराम की शादी हो. परन्तु संतराम के बड़े भाई ने एक जगह जुगाड़ लगा ही ली. कोई ऐसा व्यक्ति उसे मिला जिसने संतराम को बिना देखे ही उसकी शादी के लिए हामी भर दी. संतराम को शादी की ज्यादा ख़ुशी तो न थी लेकिन अपने खाने पीने का प्रबंध करने वाली औरत का उसे सच में इन्तजार था. संतराम और उसका बड़ा भाई उस शादी कराने वाले आदमी के साथ गये और दूसरे ही दिन बलरामपुर में संतराम की दुल्हन आ खड़ी हुई.

पूरे गाँव की मजदूरी संतराम करता था. लोग उसकी मदद भी बहुत करते थे और जब संतराम की दुल्हन आई तो पूरे गाँव ने उसको हाथों हाथ लिया. संतराम की बीबी का नाम सुन्दरी था. नाम वेशक सुन्दरी था लेकिन ज्यादा सुंदर न थी. कद काठी भी औसत ही था. पतली कमजोर सी दिखती थी. आँखें देखकर लगता था कि किसी डरावनी फिल्म में चुडैल का रोल करती होगी. चेहरा भी बुझा हुआ सा दिखता था. बातें भी करती तब भी डरावनी सी ही लगती थी. आवाज में हल्का भारीपन था.

पूरे गाँव ने संतराम की बीबी को देखा और मुंह दिखाई में काफी सामान भी दिया. संतराम ज्यादा गरीब भी नही था. क्योंकि अकेले आदमी ने मजदूरी कर कर के भी थोडा पैसा जोड लिया था. लेकिन आर्थिक स्थिति भी ज्यादा बढिया न थी. उसे बीडी पीने का शौक था. जो मजदूरी करने की वजह से पड़ गया था, मजदूरी करने वाले लोग अक्सर बीडी पीना शुरू कर देते हैं. इसके पीछे कारण है उनकी थकावट. कहते हैं कि बीडी के बहाने वो थोडा आराम कर लेते हैं और मालिक बीडी पीते देख कुछ कहता भी नहीं है लेकिन उन बेचारों को बीडी से होने वाले नुकसान की तनिक भी खबर नही रहती. खाने पीने में सूखी रोटी और करने में मजदूरी जैसा भारीभरकम काम. साथ में फेफड़ों में भरता बीडी का जहरीला धुंआ..

सुन्दरी बिहार के किसी बहुत गरीब घर से आई थी लेकिन सुन्दरी की कुछ हरकतें उसे पागल करार देती थीं. शुरू शुरू में जब लोग सुन्दरी से मजाक किया करते थे तो सुन्दरी चिढ जाती थी. लोगों को गालियाँ देने लगती थी.

लेकिन बाद में इस हरकत ने विकराल रूप धारण कर लिया. अब सुन्दरी किसी के चिढाने पर कुछ भी कह देती थी.बुरी बुरीगालियाँ देती थी.यहाँ तक की जो सामान हाथ में लग रहा होता था उसे फेंक कर भी मार देती थी.

लोग संतराम के घर के सामने पैर पिटपिटा कर निकल जाते तो सुन्दरी बिना बात उन लोगों को गालियाँ देने लगती थी. अगर घर से बाहर कोई जोर से हँस देता तो अंदर से चिमटा फूंकनी या करछली कुछ भी फेंक कर मार देती थी.

जब संतराम से कोई शिकायत करता तो वो सुन्दरी को बुरी तरह से मारता था. तब मोहल्ले की कुछ औरतें उसे आकर सन्तराम से बचाती थीं और कुछ दिनों बाद सुन्दरी फिर से वही हरकतें करने लग जाती. भूल जाती कि दो दिन पहले उसे संतराम ने इसी बात के कारण मारा पीटा था.

काफी सालों तक संतराम और सुन्दरी के कोई बच्चा न हुआ. कोई सुन्दरी को बाँझ बताता था तो कोई संतराम को नपुंसकलेकिन किसी को हकीकत बात का अंदाज़ा ही नही था. ये राज़ या तो सुन्दरी जानती थी या संतराम का मन. इसके पीछे कारण था सुन्दरी का पुरुषों के प्रति घृणा होना. जब वह छोटी थी तब एक बड़ी उम्र के पुरुष ने उसके साथ दरिंदगी कर दी थी. तालाब के किनारे नहाने गयी गयी सुन्दरी को हवस का शिकार बनाने वाला एक समाज का रक्षक पुलिस वाला था. जिससे हर स्त्री को अपनी रक्षा की उम्मीद होती है.

वो दिन था और आज का दिन. सुन्दरी किसी भी मर्द को अपना शरीर न छूने देती थी. संतराम ने शुरुआत में कई बार सुन्दरी के नजदीक आने की कोशिश की लेकिन सुन्दरी या तो रोने लगती या चीखने लग जाती. संतराम के पैरों में गिर खुद को न छूने की अपील करती. एक दिन उसने रो रो कर संतराम को अपनी कहानी सुना दी. संतराम ने विवश हो सुन्दरी को छूना ही बंद कर दिया. इस कारण आज तक सुन्दरी माँ नही बन सकी.

संतराम ने कभी भी चाय के लिए दूधिया से दूध नही लिया था लेकिन सुन्दरी चाय की बहुत शौकीन थी. संतराम के काम पर जाने के बाद सुन्दरी पडोस के एक घर में चली जाती थी. उस घर की मालकिन कौशल्या देवी को पता था सुन्दरी चाय की शौक़ीन है. वो सुन्दरी के पहुंचते ही उसे चाय का कप थमा देतीं और सुन्दरी छोटे बच्चों की तरह 'सुडर सुडर' कर चाय को पी जाती थी.
 
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