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Romance मोल की एक औरत complete

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भाग - 11

मानिक ने देखा कि शाम के अँधेरे ने उसके राजगढ़ी गाँव को अपने आगोश में ले लिया है तो घर पर अपने पिता से विना कुछ कहे चुपचाप घर से निकल आया. उसने घर से दो सौ रूपये के करीब भी निकाल लिए थे. जिससे सफर में कोई दिक्कत न हो.

मानिक सीधा राणाजी के घर आकर रुका. राणाजी कमरे में इधर से उधर घूमते हुए उसी का इन्तजार कर रहे थे. उन्होंने जैसे ही मानिक को देखा वैसे ही अपने पास बुला कर बिठा लिया और बोले, “मानिक तुम तैयार हो जाने के लिए?" मानिक ने हाँ में सर हिला दिया.

राणाजी ने तुरंत माला को आवाज दी. माला लगभग भागती हुई राणाजी के कमरे में आ पहुंची. राणाजी ने माला को देखते ही कहा, "माला तुम फटाफट तैयार हो जाओ. एक बैग में अपने पहनने के जितने कपड़े रखना चाहो रख लो लेकिन ये काम बहुत जल्दी करो. रात होने पर सफर में खतरा रहेगा. जाओ अब जल्दी से.”

माला के कदम डगमगा रहे थे. मन बहक रहा था. दिमाग सुन्न था लेकिन राणाजी के कहे अनुसार करने लगी.

थोड़ी ही देर में माला ने रोज़ पहनने वाली साड़ियाँ और कपड़े एक बैग में रख लिए और राणाजी के कमरे में आ खड़ी हो गयी. आँखों में डर था लेकिन शरीर ठीक ठाक काम कर रहा था. राणाजी चेहरे से वेशक न दिखा रहे हों लेकिन दिल उनका फटा जा रहा था. मन करता था कि रोने लगें या कहीं जा चुपचाप बैठ जाए और सिर्फ अपनी माँ को याद करते रहें. माँ की याद बुरे वक्त में उन्हें सहारा देती थी.

राणाजी ने माला को दरवाजे पर खड़ा देखा तो थोड़े हिल गये लेकिन यह सब तो उन्हें करना ही था. माला के हाथ में लग रहे बैग में बहुत कम कपड़े थे. राणाजी ने अधीर हो माला से पूछा, “माला कितनी साड़ियाँ रखी तुमने इस बैग में?" ___

माला धीरे से बोली, “तीन साड़ियाँ.”

राणाजी उसकी तरफ आते हुए बोले, “लाओ बैग मुझे दो. तुम भी न जाने कब तक वावली रहोगी."

माला ने आश्चर्य के साथ बैग राणाजी की तरफ बढ़ा दिया. राणाजी बैग ले माला के कमरे की तरफ बढ़ गये. कमरे में बहुत बढ़िया बढिया साड़ियाँ रखी थीं. जो राणाजी की माँ ने अपनी बहू के लिए ले ले कर रख लीं थीं. जब राणाजी की शादी भी नही हुई थी तब से उनकी माँ अपनी होने वाली बहू के लिए साड़ियाँ ले ले कर रख लेती थीं. इससे उनके दिन में राणाजी की शादी न होने से हो रहा मलाल कम हो जाता था.

राणाजी ने बैग में चार पांच और साड़ियाँ रख दीं. इसके बाद अपने कमरे में आ पहुंचे जहाँ माला और मानिक खड़े गुए थे. माला को राणाजी का ये अजीब सा व्यवहार बड़ा अजीब महसूस हो रहा था. उसकी समझ न आता था कि राणाजी ये सब क्यों कर रहे हैं. बोली, "अरे इतनी साड़ियाँ क्यों रख रहे हैं? मुझसे इतनी पहनी भी नही जाएँगी.

राणाजी ने अपनी पथरायी आँखों से माला की तरफ देखा और बोले, "तो यहाँ ही कौन पहनेगा? ये सब तुम्हारे लिए ही तो थी और अब तुम्ही...अच्छा लो अपना बैग पकड़ो में अपने जानने वाले के लिए चिट्ठी लिख दूं."

इतना कह राणाजी ने माला को कपड़ों का बैग पकड़ा दिया. माला भौचक्की सी उनको देखती रह गयी. पता नही माला को क्यूँ राणाजी की इस साड़ी वाली बात में बहुत दर्द नजर आया था. राणाजी ने फटाफट एक पेन और कागज लिया और अपने परिचित के नाम चिट्ठी लिख दी. साथ ही उस पर उसका पता भी लिख दिया. राणाजी मानिक को वो चिट्ठी देते हुए बोले, "देखो मानिक इसे सम्हाल कर रखना. मैंने इस चिट्ठी पर उस आदमी का पता लिख दिया है. बस से मथुरा तक पहुंचना और वहां से टेम्पो या रिक्शा कर इस पते पर पहुंच जाना."

मानिक ने हाथ में चिट्ठी ले ली. राणाजी फिर से बोले, "अच्छा मानिक तुम लोगों को थोड़े रुपयों की भी जरूरत होगी तो मैं उसका भी इंतजाम किये देता हूँ.” यह कह राणाजी मुड़ने को हुए तो मानिक बोल पड़ा, "चाचा मेरे पास रूपये हैं थोड़े से."

राणाजी ने रुक कर उसे देख पूंछा, “कितने? कितने रूपये हैं तुम्हारे पास?"

मानिक आतुरता से बोला, “करीब दो सौ रूपये होंगे.”

राणाजी मुस्कुराते हुए बोले, “बेटा इतने से तो हफ्ता भर भी काटना मुश्किल पड़ जाएगा. मैं थोड़े रूपये और दिए देता हूँ तुम्हें.”

राणाजी ने अपने सन्दूक से एक छोटा सा थैला निकाला और उसमे से सौ सौ के नोट गिनते हुए मानिक की तरफ बढ़ा दिए. बोले, “लो ये दो हजार रूपये हैं. अभी मेरे पास इतने ही हैं लेकिन जल्द ही मैं कुछ रूपये तुम्हें मनीआर्डर कर वहीं भिजवा दूंगा. शायद इन रुपयों के खत्म होने से पहले ही.”

मानिक ने दो हजार रूपये पहली बार अपने हाथ में पकड़े थे. उसने कांपते हाथों से रूपये जेब में रख लिए.

राणाजी का थैला रुपयों से खाली होता देख माला बीच में बोल पड़ी, “आप थोड़े से रूपये अपने पास भी रख लीजिये. यहाँ जरूरत पड़ी तो? वैसे कुछ रूपये पलंग के सिराहने रखे हुए हैं. अगर आपको जरूरत पड़े तो उन्हें भी निकाल लीजियेगा.”

राणाजी ने हैरत से पूंछा, “अरे पलंग के सिरहाने किसने रूपये रख दिए?"

माला थोडा झिझकते हुए बोली, “वो जब में यहाँ आई थी तब माँजी ने मुझे दिए थेन. पहली बार मुंह दिखाई के वक्त."

राणाजी ने अधीरता के साथ माला से कहा, "निकालो कहाँ रखे हैं वो रूपये?"

माला ने एक झटके में पलंग के सिरहाने गद्दे के नीचे हाथ डाला और सौ सौ के दो नोट बाहर निकाल लिए. साथ में एक एक रूपये का सिक्का भी था.

सावित्री देवी के दिए शगुन के दो सौ एक रूपये थे. ___ माला ने राणाजी की तरफ पैसों वाला हाथ बढ़ा दिया. राणाजी ने पैसों की तरफ देखा तक नही. बोले, “ये पैसे तुम अपने पास रखलो और हो सके तो इन्हें कभी खर्च न करना. इन्हें हमेशा अपने पास ही रखना. ये पैसे तुम्हें माँ ने दिए थे न. ये पैसे तुम्हारे लिए एक आशीर्वाद की तरह हैं. जो जिन्दगी भर तुम्हें मुसीबतों से बचायेंगे."

माला के साथ साथ मानिक और राणाजी भी भावुक हो उठे. सबकी आँखे नम हो गयीं.राणाजी इस वक्त किसी तरह की भावुकता नहीं चाहते थे. वो एक झटके के साथ उठ खड़े हुए और बोले, "अच्छा चलो तुम लोग अब वैसे ही देर हो रही है."

सब लोगों के शरीर में सिरहन दौड़ गयी. माला के पैर तो खड़े खड़े ही काँप रहे थे. तीनों लोग राणाजी के कमरे से बाहर आ गये. फिर घर से बाहर द्वार पर आ पहुंचे. राणाजी ने घर के बाहर लटक रहा ताला घर के मुख्य दरवाजे पर लगा दिया. आज पहली बार राणाजी अपने घर पर ताला लगा रहे थे. आज से पहले घर में कोई न कोई हरवक्त मौजूद रहता था.

फिर राणाजी मानिक और माला की तरफ मुड़ते हुए बोले, “देखो बहुत सावधानी से यहाँ से गाँव बाहर तक निकलना है. उसके बाद इतनी दिक्कत नही होगी. मुख्य सडक पर तो तांगा या कोई जीप बगैरह मिल जाएगी." राणाजी इतनी बात कह चुप भी न हो पाए थे कि उनकी नजर माला के चेहरे पर आकर रुक गयी. उन्हें माला के चेहरे से सारे गहने गायब मिले.
 
राणाजी ने हैरत के साथ माला को देखो और बोले, "अरे माला ये तुम्हारे गहने कहाँ गये? क्या उतार कर बैग में रख लिए हैं? चलो ठीक किया मैं भी यही कहने वाला था. रास्ते में गहनों का डर ही लगा रहता है. उपर से रात का सफर भी है." __

माला का गला रुंधा हुआ था. बोली, “वो गहने मैंने उतार कर उसी पिटारे में रख दिए हैं. जो कमरे में ही रखा है.”

राणाजी को माला की बात सुन बहुत हैरत हुई और बोले, "अरे वहां क्यों रख दिए? पगली हो पूरी,"

यह कहते हुए राणाजी ने मुख्य दरवाजे का ताला खोल दिया और अंदर चले गये. मानिक और माला ने एक दूसरे की तरफ देखा. दोनों की समझ में कुछ न आया लेकिन तभी राणाजी गहनों के पिटारे के साथ बाहर आ गये. घर का ताला फिर से लगाया और माला के पास आ पहुंचे. गहनों का पिटारा माला की तरफ बढ़ाते हुए बोले, “लो माला ये गहनों का पिटारा सावधानी के साथ अपने बैग में रख लो. रास्ते में इसका खयाल थोडा ज्यादा रखना. ये हमारे पुश्तैनी गहने हैं. ये समझो शाही गहने. इस पर इस खानदान की बहू का अधिकार होता है. लेकिन अब इस खानदान में कोई बहू नही है तो मैं अपनी ख़ुशी से तुम्हे देता हूँ. तुम अपने लडके की बहू को पहना देना. और माँ ने भी तो ये गहने तुम्हें ही दिए थे. इस हिसाब से इन पर तुम्हारा ही हक बनता है. लो रख लो इन्हें."

माला सजल आँखों से राणाजी के चेहरे को देखे जा रही थी. वो समझ नही पा रही थी कि वो जिस आदमी का घर छोड़ कर किसी और के साथ जा रही है वही आदमी उसे इतनी इज्जत दिए जा रहा है. मानो ये उसका कर्तव्य हो. जबकि उसे तो इतना गुस्सा होना चाहिए था कि अगर वो माला को मार भी डालता तो कम न था.

राणाजी की आत्मीयता देख माला बर्फ की मानिंद पिघलती जा रही थी. मन करता था कि वो फिर से राणाजी के पास ही रुक जाय लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी. वो मानिक के साथ जाने के लिए तैयार खड़ी थी. इस वक्त वो चाहकर भी रुकने की हिम्मत नही कर पा रही थी. सोच में डूबी माला को राणाजी की आवाज ने झकझोर दिया,"माला. अरे रखो न इस पिटारे को बैग में."

माला के आंसू गालों पर वह रहे थे लेकिन शुक्र था इस रात के अंधेरे का. जिसमे किसी ने माला के आंसुओं को न देख पाया. माला ने न चाहते हुए भी राणाजी के हाथ से गहनों का पिटारा ले बैग में रख लिया. माला के मन के अनुसार इस पिटारे में इतना गहना था जितना किसी राजकुमारी के पास होता है.

माला के बैग में पिटारा रखते ही राणाजी ने उसके हाथ से वो बैग ले लिया. बोले, "लाओ ये बैग में लिए चलता हूँ. वैसे भी तुम को इस हालत में वजन उठाने का काम नही करना चाहिए. तुम जल्दी ही माँ बन जाओगी और मानिक इसे वहां पर ठीक से रखना. कोई भी परेशानी आई तो मैं तेरे कान खीचूँगा. समझा?”

मानिक ने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिला दिया. माला और ज्यादा भावुक हो उठी. समझ नही आता था किराणाजी उसके लिए इतना सब क्यों सोच रहे हैं?

राणाजी बैग ले आगे आगे चल दिए. मानिक और माला उनके पीछे पीछे. मानिक तो मन में खुश था लेकिन माला का मन कभी दुखी तो कभी हल्का खुश हो जाता था. उसने वेशक राणाजी से मोहब्बत नही की थी लेकिन जितनी इज्जत राणाजी के लिए उसके दिल में थी वो लोगो के दिल में सिर्फ भगवान के लिए होती है. परन्तु आज माला को लग रहा था कि उसे राणाजी से मोहब्बत हो गयी है.

राणाजी से दूर जाने से दिल डर रहा था. आँखें झरने की मानिंद वह रहीं थी.

राणाजी अपने घर की सडक को पार कर मुख्य सडक पर आ चुके थे. पीछे चल रहे इन दोनों प्रेमियों से बोले, “अरे भाई थोडा जल्दी चलो. देर हो रही है. माला तुम्हें कोई परेशानी तो नही हो रही?"

माला का गला भरा हुआ था. भर्राए हुए गले से ही बोल पड़ी, “न..नही .ठीक हूँ.” सब लोग चलते चले उस जगह आ पहुंचे जहाँ से बस अड्डे के लिए तांगे और टेम्पो मिलते थे. इन लोगों के पहुंचते ही एक खाली तांगा आ पहुंचा. राणाजी ने आवाज दे उस तांगे को अपनी तरफ बुला लिया. __

तांगा घूम कर इन लोगों के पास आ पहुंचा. राणाजी मानिक को समझाते हुए बोले, “देखो मानिक परदेश में बहुत सावधानी से रहना. विशेषकर माला को कहीं भी अकेले न छोड़ना. इस बेचारी ने अभी बाहर की दुनिया नही देखी है. तुम तो समझदार हो इसलिए माला का खयाल भी तुम्हें ही रखना पड़ेगा. मेरे परिचित के पास तुम्हे कोई परेशानी नही होगी. कुछ सामान की जरूरत पड़े तो पैसा खर्चने में सकुचाना मत.मैं बहुत जल्दी और थोड़े पैसों का इंतजाम कर तुम्हें भेज दूंगा और देखों अगर बाज़ार में माला का मन जिस भी चीज का करे इसे खिला देना. जहाँ तक हो सके इसके लिए किसी चीज की कमी न होने देना. ठीक है. जब माला माँ बनने को हो तब मुझे खबर कर देना. जिससे मैं वहां पर आ इसे किसी अस्पताल में भर्ती करवा दूंगा. अस्पताल में बच्चा होने से कोई परेशानी नही होगी."
 
मानिक अच्छे बच्चे की तरह हाँ में सर हिलाता रहा. इसके बाद राणाजी माला से मुखातिब हो गये. बोले, “माला तुम वहां आराम से रहना. जो भी मन करे मानिक से कह मंगवा लेना और बाज़ार में कभी अकेले मत जाना. आज कल का जमाना ठीक नही है. अपने इस आने वाले बच्चे का खयाल रखना और हो सके तो मुझ पर एक एहसान करना कि इस बच्चे को मुझे दे देना. अगर तुमसे हो सके तो. नही तो को बात नही. क्योंकि मैं जानता हूँ किसी माँ के लिए ये सब करना इतना आसान नही होता. वैसे मैं कभी कभार तुम्हारे पास आ सकता हूँ लेकिन विश्वास से नही कह सकता. हाँ एक बात और ध्यान से सुनो. मैं अपनी बची खुची जायदाद और हवेली की वसीयत तुम्हारे और तुम्हारे पैदा होने वाले इस बच्चे के नाम कर दूंगा. अगर मुझे कुछ हो जाए तो तुम यहाँ की ये सारी चीजे आकर अपने कब्जे में कर लेना. मैं नहीं चाहता कि मेरे मरने के बाद पंचायत के लोग मुझे निरवंशी समझ मेरी जमीन को पंचायत घर बना उस पर झूठे फैसले सुनाये. और तुम्हें जब भी कोई दुःख हो तो मुझे एक बार खबर जरुर कर देना. साथ ही मेरा कहा सुना सब माफ़ करना. मुझसे कोई गलती हुई हो तो मैं माफ़ी के काबिल हूँ.”

इतना कहते कहते राणाजी का गला भर्रा गया. आखें आंसू वहाए जा रही थी लेकिन माला के सिवाय किसी और न देख पाए. राणाजी की बातों को माला सिर्फ सुन रही थी लेकिन उसने न तो हाँ ही की और न न ही की. वो किसी और दुनिया में खो गयी थी. तांगे वाले ने चिल्लाकर कहा, "चलो भईय्या चलना है या नहीं?"

राणाजी गला खंखार कर बोले, “बस भैय्या चलते हैं."

इतना कह राणाजी ने माला के सर पर हाथ फिराया और बोले, "मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि तुम हमेशा खुश रहो. तुम्हें कभी दुःख से भेंटा न हो. अच्छा चलो अब देर हो रही है. मानिक तुम बैग पकड़ो और देखो माला को सम्हाल कर ले जाना.” राणाजी ने माला के सर से अपना हाथ हटा लिया. दूसरे हाथ में लगा बैग मानिक को थमा दिया, मानिक तांगे पर बैग रख उस पर चढ़ गया. जिससे माला का हाथ पकड़ उसे चढ़ा सके.

अब माला के बैठने की बारी थी लेकिन माला के पांव तो वही के वही जम गये थे. राणाजी ने माला को टस से मस न होते देख कहा, "अरे माला, जल्दी करो भई. देर हुई जा रही है.”

माला एक दम के साथ राणाजी के पैरों में गिर पड़ी. मानिक और राणाजी उसे देखते ही रह गये.

राणाजी ने माला को अपने पैरों से उठा कर अलग किया. वो सिसक रही थी. राणाजी उसे समझाते हुए बोले, "पगली रोती क्यों हो? चलो अब जल्दी से तांगे में बैठ जाओ. अब तुम ऐसे रोओगी तो कैसे काम चलेगा. तुम्हें तो इस वक्त बहुत बहादुरी से काम लेना पड़ेगा. चलो जल्दी से आंसू पोंछो और तांगे में बैठ जाओ."

माला राणाजी के पास से जाने की हिम्मत नही कर पा रही थी लेकिन वो इस वक्त रुक भी नही सकती थी. राणाजी हाथ पकड कर माला को तांगे तक ले गये. मानिक ने तांगे से माला को सहारा दे ऊपर चढ़ा लिया. माला तांगे में बैठ गयी लेकिन आँखें अभी भी नम होती जा रही थी. इतना तो दुःख उसे अपने माँ बाप के घर से आते वक्त नही हुआ था. क्योंकि उन्होंने राणाजी की तरह उसे विदा नही किया था. राणाजी तो उसके माँ बाप से भी ज्यादा स्नेह दिखा रहे

___ राणाजी का सीना छलनी हो गया था. माला थोड़ी देर और उनके सामने रूकती तो उन्हें रोना आने लगता. वो तांगे वाले से भर्राए हुए गले से बोले, “चलो भैय्या. ले जाओ तांगा और इन लोगों को बस अड्डे पर छोड़ देना." तांगे वाले ने अपने घोड़े को हांक लगा दी.

तांगा घोड़े के पैरों की टप टप की आवाज करता चल पड़ा. राणाजी का दिल भी उस टप टप से ताल मिलाने लगा. माला का तो हाल ही बहुत बुरा हो रहा था. थोड़ी ही देर में तांगा राणाजी की आँखों से ओझल हो गया.

राणाजी वही खड़े खड़े सिसक पड़े. आँखों से आंसुओं की धार वह निकली. दिल फटने की कगार पर लगने लगा. शरीर किसी बूढ़े आदमी सा जर्जर महसूस हो रहा था. उन्होंने अपने कदमों को धीरे धीरे उठाया और अपने गाँव की तरफ चल पड़े. चलते में कदम लडखडा रहे थे. लगता था कि वे किसी भी समय गिर पड़ेंगे. उनका मन संतुलित नही था. शरीर बस चल रहा था लेकिन रामभरोसे. उनका दिल ही जानता था कि माला को अपने घर से विदा करना उनके लिए कितना मुश्किलों से भरा था. जो राणाजी ने जो किया गाँव का कोई और आदमी शायद ही कर पाता. उन्हें वो सब दिन याद आने लगे जब वो माला को ब्याह कर अपने घर लाये थे. माँ और वो कितने खुश थे माला के घर में आने से. माला ने घर में आकर इस खंडहर हवेली को फिर से आबाद करने की लौ जला दी थी. सब कुछ कितना बदल गया था माला के घर में आने से. उनकी माँ ने वेशक माला के हाथ का न खाया था लेकिन जिस दिन उन्हें माला के गर्भवती होने की खबर मिली उस दिन वो सब उंच नीच भूल गयी थीं.

जी भरकर माला को प्यार किया था उन्होंने. जब तक जीवित थीं तब तक माला की हरएक बात का कितना ख्याल रखतीं थीं. उन्हें अपने घर का नन्हा चिराग देखने की कितनी लालसा थी. अच्छा था कि आज वो जिन्दा नही थीं. वरना इस घटना से उनको कितना धक्का लगता. शायद इस को सहना उनके लिए बहुत मुश्किल होता. राणाजी दुःख भरे आवेश में अपने घर पहुंच चुके थे. उन्हें पता ही न चला कि कब वो अपने घर आ पहुंचे.

हिम्मत नही होती थी कि घर का ताला खोल अंदर घुस जाएँ. आज पहली बार घर किसी स्त्री वाला हो गया था. पहले घर में माँ रहती थीं. बाद में माला भी आ गयी. जब माँ गुजरी तो माला घर में रहती थी लेकिन आज तो माला भी चली गयी थी. राणाजी बचपन से सुनते आये थे कि विना स्त्री के घर नरक होता है. उन्हें पहले इस बात पर भरोसा नही होता था लेकिन आज घर को विना किसी स्त्री के देख वो सब सच लगने लगा था. उन्हें इस वक्त का माहौल देख लगता था कि वे इस घर में एक दिन भी चैन से न रह सकेंगे. काट खाने को दौड़ता था सूना और शांत घर. वो घर ही क्या जिसमें चूड़ियों की खनखनाहट न हो? जिसमें पायल के धुंघरुओं की छन्न छन्न न हो? लानत है ऐसे घर पर,

राणाजी ने यह सोचते हुए हिम्मत कर घर का ताला खोल दिया. पैरों में खड़े होने की हिम्मत नही थी. सुबह से खाना भी नही खाया था. उपर से सुबह से घोर निराशा और चिंता थी वो अलग से. राणाजी अंदर पहुंच अपने कमरे के पलंग पर गिर पड़े. गिरते ही फूट फूट कर रो दिए. फिर अपना बिस्तर ले छत पर जा लेटे. वहां भी माला को याद कर देर तक रोये. फिर न जाने रोते रोते उन्हें कब नींद आ गयी.

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माला तांगे में मानिक के साथ बैठी जा रही थी. मानिक ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया था लेकिन माला को ये सब कतई आनंदित नही करता था. उसकी सोच तो उस समय की सूई पर जा अटकी थी जब वो ब्याह कर राणाजी के घर आई थी. सावित्रीदेवी ने कितने सम्मान से उसे घर में घुसाया था.

राणाजी भी कितना ख्याल रखते थे उसका? जब वो गर्भवती थी तब सावित्रीदेवी ने कितनी खातिर की थी उसकी? राणाजी तो मन चाही चीज देने की बात कहते थे. पूरा घर वावला हो गया था माला के लिए. जबकि इस तरह से खरीद कर लायी गयी लडकियों को घरों में रखैल बनाकर रखा जाता था. नौकरानियों की तरह काम करवाया जाता था. बच्चे पैदा करने की मशीन समझा जाता था. दिन भर ताने और गालियाँ मिलती थीं. उनको लोग अनपढ, गंवार और नीच बोलते थे लेकिन जब से माला राणाजी के घर आई थी तब से आज तक किसी ने उसे डांटा तक न था.

किसी ने तेज आवाज में दो अपशब्द तक न कहे थे उससे. बल्कि उसे घर की मालकिन की तरह सम्मान मिलता था. राणाजी और सावित्री देवी के कहने पर महरी उससे पूंछ कर मन का खाना बनाती थी. सावित्री देवी के गुजर जाने पर तो राणाजी ने उसको पूरा घर सौप दिया था. भला इतना भी कोई करता है किसी के लिए? जिस दिन राणाजी को उसका और मानिक का चक्कर होना पता पड़ा तो कुछ भी न कह सके. बल्कि दोनों को मिलाने की सोच ली. अन्य कोई होता तो पता नही इस की जगह क्या सिला देता. आज जब वो घर से मानिक के साथ चलने लगी तो नई साड़ियाँ साथ रख दी. खानदानी कीमती गहनों का पिटारा रख दिया.

साथ में रूपये भी दिए. माला को राणाजी के इस व्यवहार ने बिदुषी बना दिया था. आज जो कुछ भी वो सोच रही थी वो उसके आज से पहले की सोच का हिस्सा नही

था. आज तो पता नही उसका दिमाग कितना विकसित हो चुका था. माला हरएक क्षण बिखरती जा रही थी. उसे लगता था कि जल्द ही वो राणाजी के लिए सोचते सोचते जलकर राख हो जाएगी.
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
भाग -12

सुबह हो गयी थी. संतराम सुबह जल्दी से उठ तैयार हो गया. सुन्दरी तो रात में ही अपने गाँव जाने तैयारी कर सोयी थी और सुबह उठते ही फिर से तैयारियां करने लगी. लेकिन जब संतराम के घर में कुछ था ही नही तो सुन्दरी तैयारी किस बात की कर रही थी?

सुन्दरी के पास आज से दस साल पहले तक के कुछ सामान रखे थे. एकाध साड़ी भी तभी की रखी थी. लोगो द्वारा जो भी सामान या कपड़ा मिलता था सुन्दरी उसे सहेज कर रख लेती थी. उसने संतराम के साथ बिताये इतने सालों में सिर्फ एक या दो साड़ियों का ही उपयोग किया था. बाकी जो साड़ियाँ थी सब ज्यों के त्यों रखी रही.

कुछ माचिस की डब्बी भी उसके पास सम्हाल कर रखी हुईं थीं जिन्हें वो भूत के डर से अपने पास हमेशा रखे रहती थी. आज भी माचिस अपने साथ रख ले जा रही थी. दीवाली के दीये से बनाया काजल भी उसने अपने साथ रख लिया था. जिसे वो अपने साथ अपने छोटे भाई के लिए रख ले जाना चाहती थी.

पूरा गाँव घरों से बाहर निकल गली. नुक्कड़ और छज्जों पर आ खडा हुआ. गाँव का हर शख्स सुन्दरी की विदाई होते देखना चाहता था. गाँव की महिलाएं तो खासी उत्साहित थीं. लेकिन पुरुषों और बच्चों में भी कम उत्साह नही था.

सुन्दरी से सबसे ज्यादा मसखरी पुरुष और बच्चे ही करते थे. थोडी देर में ही सुन्दरी एक ठीकठाक सी साडी पहने संतराम के साथ घर से निकल आई.ठीक ठाक सी इसलिए क्योकि आज से पहले कभी किसी ने उसे इतनी साफ़ साड़ी पहने हुए नहीं देखा था. संतराम ने घर से ताला लगाया और सुन्दरी के पीछे पीछे चलने लगा.

गाँव के हर आदमी के दिल में हूँक उठ रही थी. सुन्दरी को गाँव से हमेशा के लिए जाते देख सब लोगों की आँखें नम थीं. परन्तु सुन्दरी आज बहुत खुश थी. चेहरा और दिन से अलग सा तेज लिये हुए था. सुन्दरी ने गाँव के इतने लोगों को अपनी विदाई करते देखा तो फूली न समाई. वेशक लोग उसे पागल समझते थे लेकिन पागल आदमी भी प्यार से अच्छा हो सकता है. सुन्दरी ने गाँव की हर औरत के बारी बारी से पैर छुए. सबसे आशीर्वाद ले अपने रास्ते को चल दी.

सारे गाँव के लोग भावुक हो आंसू बहा उठे लेकिन सुन्दरी रत्ती भर भी दुखी नही हुई. उसका मन तो आज सालों बाद अपने घर जाने की खुशी में झूम रहा था. वो अपनी माँ और भाई बहिनों के पास जा रही थी. अपने गाँव अपने घर जा रही थी. फिर दुखी क्यों होती? दुखी हो उसके दुश्मन.

आज तो गाँव के मसखरे लोग भी रोने की कगार पर थे. उन्हें नही मालूम था कि आज से वे किस के दरवाजे पर अपने पैर पटपटा कर मजा लेंगे? कौन उनके ऊपर चिमटा, फूंकनी, बेलन और करछली फेंक कर मरेगा? कौन उन्हें माँ बहिन की गालियाँ सुनाएगा? छोटू भी सुन्दरी को जाते हुए देख अपने मन में ग्लानी अनुभव कर रहा था. सोचता था न मैं सुन्दरी का चूल्हा और चिमनी फुड़वाता और न सुन्दरी यहाँ से जाती.

लेकिन सुन्दरी का भी तो मन ये बात भूल गया था कि उसकी माँ ने उसे दोबारा बापिस न आने के लिए कहा था. भाई ने भी चिट्ठी लिख उसे वहां आने से इनकार किया था लेकिन सुन्दरी ने इन सब बातों को दरकिनार कर दिया. वो ये नही जानना चाहती थी कि वहां जाकर क्या खाएगी? कैसे उस अथाह गरीबी में जियेगी?

माँ ने उसे घर में ज्यादा दिन न रखा तो? तो क्या होगा? कही और उसकी माँ ने फिर किसी से उसकी शादी कर दी तो? फिर किसी संतराम जैसे आदमी के हाथ पैसे लेकर बेच दिया गया तो? तब क्या होगा? वो तो फिर किसी के घर जा इसी हालत में हो जाएगी. सुन्दरी संतराम के साथ गाँव के लोगों की आँखों से ओझल हो चुकी थी. सब लोग नम आँखों से अपने अपने घरों में घुस गये. वैसे भी लोग किसी बात को ज्यादा देर तक ध्यान नही रखते.
 
भाग -13

राणाजी सुबह की धूप देख उठ गये. छत से उतर कर नीचे कमरे में आये. पूरा घर सूना लग रहा था. लगता था जैसे माला अपने साथ घर का सारा आनंद भी ले गयी हो. रात राणाजी रोते रोते ही सो गये थे. पैसे से खरीद कर लायी गयी गैर बिरादरी की लडकी के लिए इतने बड़े खानदान का आदमीरात भर रोया था. राणाजी सुबह उठे तो फिर से उसी दुःख में खो गये. कमरे में लगी उनकी माँ तस्वीर ने उन्हें फिर से भावुक कर दिया. राणाजी माँ की तस्वीर से लिपट सिसक सिसक कर रो पड़े.

माँ के द्वारा किया गया सारा प्यार याद आने लगा. राणाजी फूट फूट कर रोते हुए अपनी माँ की तस्वीर से कह रहे थे, “माँ. मुझे माफ़ करना. मैं वो न कर सका जो तुम चाहतीं थी. मैं इस खानदान के बारिस को अपने घर में पैदा न कर सका. माँ माला को घर के बाहर भेज मैने गलती की है लेकिन उस लडकी का भी तो कुछ मन है. वो एक ऐसे घर में पली जिसमें खाने तक को ठीक से नही था. लोग वहां अपनी लडकी को पैसों के लिए बेच देते हैं. माँ ये उनकी मजबूरी भी और मुश्किल भी. पता नही वहां के लोग कैसे जीते हैं? माँ मैं चाहता तो माला को घर में हमेशा के लिए भी रख सकता था लेकिन किसी अबला औरत को जबरदस्ती अपने पास रखने से बड़ा कोई पाप नही होता. और मैं इस उम्र में कोई पाप नही करना चाहता था.

माँ अगर मैने सही किया है तो भगवान मुझे इसका फल भी देगा. हो सकता है माला अपने पहले बच्चे को मुझे दे दे. अगर नही भी देगी तब भी अपने घर का बारिश तो हमें मिल ही गया न माँ. माँ मैं भी जल्दी ही इस दुनिया को छोड़ तुम्हारे..."

राणाजी सिसक सिसक कर अपनी बात को पूरा करते उससे पहले ही दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी. राणाजी चुप हो गये. दरवाजा फिर से खटखटाया गया. राणाजी ने अपने आंसू पोंछे और अपने कमरे से निकल दरवाजे पर पहुंच गये. उन्होंने धीरे से दरवाजा खोल दिया. बाहर के उजाले की किरन के साथ उन्हें एक मनभावनी लडकी हाथ में बैग लिए खड़ी दिखाई दी. उसका चेहरा आंसुओं से लदा हुआ लेकिन पाश्चाताप से भी भरा हुआ था.

राणाजी को सामने खड़ी माला को देख अपनी आँखों पर यकीन नही हो रहा था. उन्हें लगता था कि वो अभी रात में सोते हुए सपना देख रहे हैं लेकिन माला अपना बैग एक तरफ रख उनके पैरों में गिर पड़ी. माला के ठंडे कोमल हाथों का स्पर्श उन्हें यकीन दे गया कि माला सच में उनके पास है. वो फिर से लौट कर आ गयी है. माला राणाजी के पैरों में अपना सर रखे सिसक रही थी और राणाजी अपने सोच विचारों में खोये हुए थे. मानो उन्हें माला की कोई खबर ही न हो.

फिर जैसे ही राणाजी को माला के पैरों में पड़े होने की खबर हुई वैसे ही उन्होंने माला को उठा अपने कलेजे से लगा लिया. मानो माला उनसे बर्षों की बिछड़ी हुई थी और आज आ मिली. माला ने भी अपने देवता पुरुष को कसकर सीने से लगा लिया.

दोनों हिल्की भर भर कर रोने लगे. जैसे दोनों छोटे बच्चे हों. न राणाजी ने माला से रोने का कारण पूंछा और न माला ने राणाजी से. दोनों खूब फूट फूट कर रोये लेकिन आदमी रोये भी तो कब तक? राणाजी ने माला को धीरे से अपने सीने से अलग किया.

उसके मासूम चेहरे पर जो आंसू वह रहे थे उन्हें अपनी हथेलियों से पोंछा और बोले, "चुप हो जाओ माला. ऐसे रोते नही वावली.तुम रोओगी तो मैं भी और ज्यादा रोऊंगा. क्या तुम चाहती हो कि मैं और ज्यादा रोऊँ?"

माला ने अपना रोना कम कर ना में सर हिला दिया. जैसे कहती हो कि मैं नहीं चाहती आप और ज्यादा रोयें.

दोनों का रोना बंद हुआ तो राणाजी का दिमाग भी बिजली के करंट सा हिल गया. उन्हें ध्यान आया कि माला को तो वो मानिक के साथ तांगे में बिठाकर आये थे. फिर माला उनके पास कैसे...बोले, "अरे माला तुम तो रात मानिक के साथ गयीं थीं. फिर यहाँ कैसे और मानिक कहाँ गया? तुम लोग लौट क्यों आये? क्या कोई बात हो गयी क्या?"
 
माला ने अपना रोना कम कर ना में सर हिला दिया. जैसे कहती हो कि मैं नहीं चाहती आप और ज्यादा रोयें.

दोनों का रोना बंद हुआ तो राणाजी का दिमाग भी बिजली के करंट सा हिल गया. उन्हें ध्यान आया कि माला को तो वो मानिक के साथ तांगे में बिठाकर आये थे. फिर माला उनके पास कैसे...बोले, "अरे माला तुम तो रात मानिक के साथ गयीं थीं. फिर यहाँ कैसे और मानिक कहाँ गया? तुम लोग लौट क्यों आये? क्या कोई बात हो गयी क्या?"

राणाजी अधीर हो सवाल पर सवाल किये जा रहे थे और माला शांत और गम्भीर हो खड़ी थी. माला भारी गले से बोली, "मैं अब कहीं नहीं जाना चाहती इसलिए मैं लौट आई. मैं इसी घर में आपके साथ रहना चाहती हूँ. आप चाहो तो रख लो. मानिक मुझे यहाँ छोड़ता हुआ अपने घर चला गया है. मैं अब कही नही जाना चाहती हूँ."

राणाजी की समझ में कुछ भी न आया. उन्हें माला के घर लौटने की खुशी से ज्यादा आश्चर्य था. बोले, "लेकिन माला बात क्या हुई? तुम लौट क्यों आई? कुछ बताओ तो सही?"

__ माला की आँखें फिर से नम हो गयी. गला बोलने में उसका साथ नहीं दे रहा था. मुंह रोने के लिए बार बार काँप जाता था. बोली, “मैं जाने को तो यहाँ से चली गयी लेकिन आपका स्नेह देख मुझे जाने का मन नही करता था. बस अड्डे तक सिर्फ आपका खयाल आता रहा. रह रह कर मेरा दिल मुझे धिक्कारता रहा कि मैं क्यों ऐसा कर रही हूँ? एक आदमी अपना सबकुछ मुझे देने को तैयार है और मैं उसे ही छोड़ किसी और के साथ जा रही हूँ. आपके एहसानों ने मेरे दिल में आपके लिए मोहब्बत पैदा कर दी. आप तो मेरे माँ बाप को पैसा दे मुझे लेकर आये लेकिन मुझे कभी ये एहसास न होने दिया कि मैं किसी और जाति की हूँ और मुझे खरीदकर लाया गया है. मेरी किस्मत से ज्यादा खुशियाँ आपने मुझे दीं और जब मैं आपकी पत्नी रहते किसी और से दिल लगा बैठी तो आपने अपने जुबान से एक भी बुरा शब्द मुझसे न बोला. साथ ही मेरे लिए सारे गाँव के ताने आप सहते रहे. मेरे कारण आप के यहाँ से जाने तक की नौबत आ गयी. मुझे घर से विदा करते हुए भी आप मेरा ऐसा खयाल रख रहे थे जैसे मैं अब भी आपकी सगी होऊ. आपने अपने पुश्तैनी गहने भी मुझी को दे दिए. अपनी सारी जमीन जायदाद भी आप मेरे और बच्चे के नाम करने जा रहे थे. सारी जिन्दगी आप ने दुखों में काटी और आज फिर उसकी फ़िक्र न कर मुझे सुखी कर दिया. यह सब सोच मेरा मन परिवर्तन हो गया. मैंने कसम खायी कि अब आपके कदमों में ही मेरी जान निकलेगी. मैं जब तक जिउंगी तब तक आपके लिए ही जिउंगी. बस यही सोच फिर से आपके पास आ गयी. अब आप मुझे धक्के मार कर भी घर से निकालने तो भी मैं न जाउंगी."

राणाजी तो माला की इस बात यकीन ही नही कर रहे थे. उन्हें समझ न आ रहा था कि वो इसे सच माने या झूठ. भगवान का शुक्रिया अदा करते भी मन न थक रहा था क्योंकि ये विन मांगी मन की मुराद थी. जिसे भगवान ने सिर्फ मन में होने पर ही पूरी कर दिया था.

राणाजी खड़े खड़े उस वावली लडकी का सोणा मुखड़ा देख रहे थे. जो शाम की भूली सुबह घर आ पहुंची थी. मानो आज उसकी नई जिन्दगी हुई थी. मानो आज फिर से वो दुल्हन बन इस घर में आ गयी थी. राणाजी ने माला को अपने सीने से चिपका लिया.

राणाजी सावन और माला सावन की बदली हो गयी. दोनों किसी माला की तरह टूटकर फिर से एक हो गये लेकिन इस मिलने में कोई गांठ नही पड़ी थी. ये तो गाठों का अंत हुआ था जो दोनों के मनों में पहले से पड़ चुकी थी.

राणाजी ने माला को खुद से अलग किया. दरवाजे पर पड़ा बैग उठाया और माला का हाथ पकड़ उसे अंदर अपने कमरे में ले गये. पलंग पर माला को ठीक अपने सामने बिठा लिया और उसे जी भर के देखा. लेकिन राणाजी के मन में अब भी कुछ सवाल थे. बोले, "माला तुमने मानिक से क्या कहा? क्या इस तरह लौटने पर उसने तुमसे कुछ नही कहा?"

माला अब मन से हल्की हो गयी थी. बोली, “मैने अपने मन की बात उसे कह सुनाई. उसने थोडा सोचा फिर बोला कि मैं अभी भी अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हूँ. वो खुद भी आपका इतना स्नेह देख भावुक हो गया था. मानिक और मैंने फिर कभी न मिलने की कसम खायी और घर लौट आये. उसने आप के दिए पैसे भी मुझे लौटा दिए और अपने पिता के जागने से पहले घर चला गया."

राणाजी ने सोचते हुए हाँ में सर हिला दिया और बोले, "चलो जो भी हुआ ठीक हुआ लेकिन तुमने ऐसा क्यों सोचा? मैं तुमसे दोगुनी से भी ज्यादा उम्र का हूँ. कल को मुझे कुछ हो गया तो ये पहाड़ सी जिन्दगी कैसे काटोगी?" __

माला ने तडप कर उत्तर दिया, “ऐसा अशुभ न कहिये. लेकिन अगर भगवान ने ऐसा कर भी दिया तो मैं आपकी विधवा बन अपनी जिन्दगी गुजार दूंगी. मुझे इस काम में ज्यादा स्वाभिमान मिलेगा. लेकिन मुझे अब एक ही चिंता है कि अब पंचायत के लोग क्या करेंगे? न हो तो हम लोग यहाँ से कही दूर चलें?"

राणाजी की आँखों में बीस साल पहले सी आग जल उठी. शरीर फिर से जवान हो उठा. सीना फिर से जवानी की तरह फूल उठा. बोले, “तबसे मैं इस कारण किसी से कुछ नही कहना चाहता था कि तुम खुद मेरे साथ नहीं थीं लेकिन आज तुम मेरे साथ हो. आज से किसी की इतनी हिम्मत नही जो मेरे द्वार पर भी चढ़ सके. मुझे भी कानून की समझ है. मैं बीस साल पहले वाली गलती नही करूँगा. आज तो मैं सिर्फ क़ानून से सबका सामना करूँगा. कानून पंचायत को नही मानता और न ही उसके फैसलों को. तुम निश्चिंत हो रहो. मैं आज ही थाने में शिकायत दर्ज करा दो सिपाही मंगवा लेता हूँ फिर देखू किसकी हिम्मत होती है कि मेरे आसपास भी भटक जाए?" ।
 
साथ बने रहने के लिए धन्यवाद दोस्तो
 
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