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Guest
ऐसी ही कई छोटी, बड़ी, ख़ास, फ़ालतू अनगिनत बातें सोचते हुए कोई एक घंटा हो गया। टब का पानी भी लगभग ठंडा हो गया। पानी में पड़े पड़े उसके शरीर की थकावट काफ़ी कम हो गई थी, और वो पहले से अधिक तरोताज़ा महसूस कर रही थी। गुनगुना शावर ले कर उसने साबुन धोया, फिर बाथरूम से बाहर निकल आई। उसने एक तौलिया अपनी छाती पर बाँध रखा था, जिससे उसके जाँघ के ऊपरी हिस्से तक शरीर ढँका हुआ था।
जब वो कमरे में वापस आई तो उसने देखा कि समीर उनींदी आँखों से मुस्कुराते हुए उसी की तरफ देख रहा था। उसका लिंग वापस तना हुआ ऐसा दिख रहा था, जैसे कि वो फिर से काम-युद्ध के लिए तैयार हो।
‘फिर से रेडी! ये थकते नहीं हैं क्या! हे प्रभु, देर से ही सही, लेकिन तुमने मुझे ऐसा पति दिया जिसे पा कर मैं धन्य हो गई!’ मीनाक्षी ने मन ही मन सोचा।
“कहाँ से सीखी इतनी बदमाशी आपने?” मीनाक्षी ने बिस्तर पर बैठते हुए और मुस्कुराते हुए समीर से पूछा।
“कैसी बदमाशी?”
“ये.... आपका नुन्नू!” मीनाक्षी ने शिकायती लहज़े में कहा, “ये कभी आराम भी करता है, या बस हमेशा मुझे सताने के लिए तैयार रहता है?”
“नुन्नू!!? अरे जानेमन, तुमको इतने मज़े देता है ये बेचारा…. कम से कम जॉय स्टिक ही बोल दो इसको!”
“जी नहीं! मैं इसको नुन्नू ही बोलूँगी! मेरा प्यारा सा नुन्नू!”
“चलो जी! ये भी ठीक है! कम से कम आपको ये प्यारा तो लगता है। अब ये सोचिए कि पैदा होने के इक्कीस साल बाद जा कर इस बेचारे को अपनी सहेली मिली है। अब जब ये उससे हाय-हेलो बोलना चाहता है, तो आप क्यों नाराज़ होती हैं?”
“बहुत हाय-हेलो हो गई इसकी और इसकी सहेली की। इनके हाय-हेलो के चक्कर में इस बड़ी लड़की को सताना बंद करिए।” मीनाक्षी मुस्कुराते हुए बोली।
“आज की रात कुछ बंद करने की रात थोड़े न है!”
“अच्छा जी? फिर?”
“आज की रात तो खोलने की है....”
“अच्छा जी! फिर से बदमाशी....” मीनाक्षी शरमाती हुई इठलाई।
“इधर आओ,” कहते हुए समीर ने मीनाक्षी का हाथ पकड़ कर बिस्तर पर खींच लिया। वो पीठ के बल, चित्त हो कर बिस्तर पर गिर गई।
“मिनी?”
“जी?”
“आप हनीमून के लिए कहाँ जाना चाहोगी?”
“हनीमून? उम्म्म्म....!” मीनाक्षी ने कुछ देर सोचने का अभिनय किया और फिर थोड़ा गंभीरता से कहा,
“जानू, शादी के दिन से अभी तक मेरा हनीमून ही तो चल रहा है! और मुझे मालूम है कि आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा! आप सभी मुझको इतना प्यार करते हैं! और मैं भी आपको खूब प्यार करती हूँ! हमारा घर, प्यार का घर है। मुझे आपका प्यार पाने के लिए कहीं और जाने की कोई ज़रुरत नहीं है।”
समीर के चेहरे को प्यार से अपने दोनों हाथों में ले कर उसने आगे कहा, “वैसे आपको कहीं घूमने फिरने चलने का मन है तो ठीक है… वो जगह आप चूज़ करिए लेकिन। और.... प्लीज् यह मत सोचिए कि हनीमून कोई रस्म है, जिसको आपको निभाना है.... मुझको जो सुख इतने दिनों से मिल रहा है, वो किसी हनीमून का मोहताज नहीं..”
समीर उसकी बात सुन कर मुस्कुराया। कुछ पल वो उसके भोले सौंदर्य को देखता रहा, और फिर वो मीनाक्षी का मुख चूमने के लिए उस पर झुक गया। मीनाक्षी भी सहर्ष समीर के होंठों को अपने होंठों में लेकर उसको चुम्बन में सहयोग देने लगी। यह कोई कामुक चुम्बन नहीं था, बल्कि एक स्नेहमय चुम्बन था। एक बहुत ही लम्बा स्नेहमय चुम्बन! दोनों को समय का कोई ध्यान नहीं रहा कि वो कब तक एक दूसरे को चूमते रहे। अंततः जब उनका चुम्बन टूटा, तो समीर ने कहा,
“ये तौलिया क्यों लगाया हुआ है?”
“आपके नुन्नू से उसकी सहेली को बचाने के लिए।” मीनाक्षी अपने कहे पर खुद ही शरमा गई।
“मिनी, एक बात बोलूँ?” समीर ने तौलिया उसके शरीर से हटाते हुए कहा।
“जी?”
“जब तुम मेरे सामने रहा करो, तो ऐसा नहीं हो सकता कि बिलकुल नंगी रहो?” उसने बिस्तर से उठते, और मीनाक्षी की जाँघें खोलते हुए कहा।
‘बाप रे! कुछ देर पहले ही तो मैं यही सोच रही थी। इनको कैसे सब मालूम पड़ जाता है? कोई टेलीपैथिक कनेक्शन है क्या!’
“हटो जी! ऐसे कैसे होगा?” मीनाक्षी ने नखरा दिखाया।
“कोशिश करो! कोशिश करने से तो सब कुछ हो जाता है।” वो उसकी योनि सहला रहा था। मीनाक्षी के शरीर में झुरझुरी होने लगी - एक तो समीर के इस तरह अंतरंग तरीके से छूने के कारण, और दूसरा इसलिए क्योंकि वो अभी अभी गरम पानी से नहा कर निकली थी, और कमरे में एसी के कारण ठंडक थी। समीर ने उसको पीठ के बल लिटा दिया, और अगले दौर के लिए खुद उसकी जाँघों के बीच में आ गया।
“ओह्ह्ह! जानू! मैं आपकी हर बात मानूँगी। लेकिन उन चार पाँच दिनों में यह करना मुश्किल है।”
समीर अपने लिंग का शिश्नाग्रच्छद पीछे खिसका चुका था।
“किन दिनों में?”
“पीरियड्स ..... आआह्ह्ह!”
समीर उसकी योनि को अपनी तर्जनी और अंगूठे से खोल कर अपने लिंग को फिर से भीतर इतनी ज़ोर से ठेला कि मीनाक्षी को एकदम से पीड़ा सी हुई और उसकी चीख निकल गई। इस हमले से आहत मीनाक्षी उसे गुस्से से देखने लगी। समीर भी शायद मीनाक्षी के दर्द से थोड़ा सहम गया, और सोचने लगा कि अब वो क्या करेगी। समीर को ऐसे भोलेपन से देखता देख कर मीनाक्षी को गुस्सा भी आ रहा था और हँसी भी।
मीनाक्षी को हँसते हुए देख कर समीर की जान में जान आई - उसने मीनाक्षी को अपने ऊपर बैठा लिया कुछ इस तरह कि जब वो अपनी पीठ के बल लेटा तो मीनाक्षी उसकी जाँघों पर उसके ऊपर अपने दोनों घुटने मोड़ कर इधर-उधर करके बैठी थी। इस नए आसन के कारण समीर का लिंग जबरदस्त रूप से कठोरता धारण किए हुए था।
“ये तुम्हारे अंदर रहता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है!”
मीनाक्षी ने शरारत से कहा, “ये तो अपनी सहेली के अंदर है.... आपको क्यूँ अच्छा लगता है?”
“क्योंकि मेरा काम कम हो जाता है।”
“काम? कौन सा काम?”
“जब ये ऐसे रहता है न, तो इसको हाथ से समझाना बुझाना पड़ता है।”
मीनाक्षी कुछ समझी नहीं। शायद उसको हस्तमैथुन के बारे में नहीं मालूम था। और समीर ने भी इस बात को आगे नहीं खींचा। उसने आगे कहना जारी रखा, “और मुझे ये मीठे मीठे राजपुरी आम चूसने को मिल जाता है!”
“हा हा हा! आप और आपका आम प्रेम!”
“ए मिनी, तुमको कैसा लगता है?”
“क्या?” वो सब समझती है कि समीर उससे क्या पूछ रहा था। लेकिन जान बूझ कर अनजान बनी हुई थी।
“जब ये तुम्हारे अंदर रहता है!”
उसकी बात सुन कर मीनाक्षी फिर से शरमा गई। वो समीर के लिंग की कठोरता को अपने भीतर महसूस कर रही थी। समीर धक्के नहीं लगा रहा था, लेकिन अपनी योनि के भीतर मीनाक्षी को समीर के उत्तेजित लिंग के झटके पर झटके महसूस हो रहे थे। समीर को कुछ भी न करते देख कर अंततः मीनाक्षी ने ही पहल करी - उसने बैठे बैठे ही अपने नितंबो को पीछे की ओर थोड़ा सा उठाया और फिर हल्का सा धक्का दिया। उसकी योनि भीतर से पहले से ही गीली थी। समीर का लिंग उसकी योनि के भीतर ऐसी मजबूती से गड़ा हुआ था जैसे कि लकड़ी में लोहे की कील ठुकी हुई हो! मीनाक्षी ने अपने नितम्बों को गति देनी शुरू की जैसे कि समीर ने किया था - आगे-पीछे!
मीनाक्षी अपनी आँखें बंद किए हुए समीर के सख्त लिंग के घर्षण का आनंद उठा ही रही थी, कि वैसे ही लेटे लेटे ही समीर ने एक ज़ोर का धक्का मारा। इस प्रहार से उसका लिंग मीनाक्षी की योनि में भीतर तक ठुक गया। मीनाक्षी को फिर से तीव्र पीड़ा का आघात लगा। मीनाक्षी उसको घूरने लगी, लेकिन समीर को जैसे कोई परवाह नहीं थी - उसने फिर से एक धक्का और मारा, और पुनः पूरा का पूरा मीनाक्षी की योनि में घुस गया। इस दूसरे आघात से मीनाक्षी लगभग गिरते गिरते बची। वो कुछ कर पाती, उसके पहले ही समीर ने उसको एक खिलौने की भाँति उठाया और अपनी गोदी में बैठा लिया और खुद भी बैठ गया। उस अवस्था में मीनाक्षी का पूरा भार उसकी योनि में घुसे हुए समीर के लिंग पर आ गया, और वो पूरा अंदर तक घुस गया - जैसे अगर कोई गुंजाईश रह गई हो, तो वो भी ख़तम हो गई।
जब वो कमरे में वापस आई तो उसने देखा कि समीर उनींदी आँखों से मुस्कुराते हुए उसी की तरफ देख रहा था। उसका लिंग वापस तना हुआ ऐसा दिख रहा था, जैसे कि वो फिर से काम-युद्ध के लिए तैयार हो।
‘फिर से रेडी! ये थकते नहीं हैं क्या! हे प्रभु, देर से ही सही, लेकिन तुमने मुझे ऐसा पति दिया जिसे पा कर मैं धन्य हो गई!’ मीनाक्षी ने मन ही मन सोचा।
“कहाँ से सीखी इतनी बदमाशी आपने?” मीनाक्षी ने बिस्तर पर बैठते हुए और मुस्कुराते हुए समीर से पूछा।
“कैसी बदमाशी?”
“ये.... आपका नुन्नू!” मीनाक्षी ने शिकायती लहज़े में कहा, “ये कभी आराम भी करता है, या बस हमेशा मुझे सताने के लिए तैयार रहता है?”
“नुन्नू!!? अरे जानेमन, तुमको इतने मज़े देता है ये बेचारा…. कम से कम जॉय स्टिक ही बोल दो इसको!”
“जी नहीं! मैं इसको नुन्नू ही बोलूँगी! मेरा प्यारा सा नुन्नू!”
“चलो जी! ये भी ठीक है! कम से कम आपको ये प्यारा तो लगता है। अब ये सोचिए कि पैदा होने के इक्कीस साल बाद जा कर इस बेचारे को अपनी सहेली मिली है। अब जब ये उससे हाय-हेलो बोलना चाहता है, तो आप क्यों नाराज़ होती हैं?”
“बहुत हाय-हेलो हो गई इसकी और इसकी सहेली की। इनके हाय-हेलो के चक्कर में इस बड़ी लड़की को सताना बंद करिए।” मीनाक्षी मुस्कुराते हुए बोली।
“आज की रात कुछ बंद करने की रात थोड़े न है!”
“अच्छा जी? फिर?”
“आज की रात तो खोलने की है....”
“अच्छा जी! फिर से बदमाशी....” मीनाक्षी शरमाती हुई इठलाई।
“इधर आओ,” कहते हुए समीर ने मीनाक्षी का हाथ पकड़ कर बिस्तर पर खींच लिया। वो पीठ के बल, चित्त हो कर बिस्तर पर गिर गई।
“मिनी?”
“जी?”
“आप हनीमून के लिए कहाँ जाना चाहोगी?”
“हनीमून? उम्म्म्म....!” मीनाक्षी ने कुछ देर सोचने का अभिनय किया और फिर थोड़ा गंभीरता से कहा,
“जानू, शादी के दिन से अभी तक मेरा हनीमून ही तो चल रहा है! और मुझे मालूम है कि आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा! आप सभी मुझको इतना प्यार करते हैं! और मैं भी आपको खूब प्यार करती हूँ! हमारा घर, प्यार का घर है। मुझे आपका प्यार पाने के लिए कहीं और जाने की कोई ज़रुरत नहीं है।”
समीर के चेहरे को प्यार से अपने दोनों हाथों में ले कर उसने आगे कहा, “वैसे आपको कहीं घूमने फिरने चलने का मन है तो ठीक है… वो जगह आप चूज़ करिए लेकिन। और.... प्लीज् यह मत सोचिए कि हनीमून कोई रस्म है, जिसको आपको निभाना है.... मुझको जो सुख इतने दिनों से मिल रहा है, वो किसी हनीमून का मोहताज नहीं..”
समीर उसकी बात सुन कर मुस्कुराया। कुछ पल वो उसके भोले सौंदर्य को देखता रहा, और फिर वो मीनाक्षी का मुख चूमने के लिए उस पर झुक गया। मीनाक्षी भी सहर्ष समीर के होंठों को अपने होंठों में लेकर उसको चुम्बन में सहयोग देने लगी। यह कोई कामुक चुम्बन नहीं था, बल्कि एक स्नेहमय चुम्बन था। एक बहुत ही लम्बा स्नेहमय चुम्बन! दोनों को समय का कोई ध्यान नहीं रहा कि वो कब तक एक दूसरे को चूमते रहे। अंततः जब उनका चुम्बन टूटा, तो समीर ने कहा,
“ये तौलिया क्यों लगाया हुआ है?”
“आपके नुन्नू से उसकी सहेली को बचाने के लिए।” मीनाक्षी अपने कहे पर खुद ही शरमा गई।
“मिनी, एक बात बोलूँ?” समीर ने तौलिया उसके शरीर से हटाते हुए कहा।
“जी?”
“जब तुम मेरे सामने रहा करो, तो ऐसा नहीं हो सकता कि बिलकुल नंगी रहो?” उसने बिस्तर से उठते, और मीनाक्षी की जाँघें खोलते हुए कहा।
‘बाप रे! कुछ देर पहले ही तो मैं यही सोच रही थी। इनको कैसे सब मालूम पड़ जाता है? कोई टेलीपैथिक कनेक्शन है क्या!’
“हटो जी! ऐसे कैसे होगा?” मीनाक्षी ने नखरा दिखाया।
“कोशिश करो! कोशिश करने से तो सब कुछ हो जाता है।” वो उसकी योनि सहला रहा था। मीनाक्षी के शरीर में झुरझुरी होने लगी - एक तो समीर के इस तरह अंतरंग तरीके से छूने के कारण, और दूसरा इसलिए क्योंकि वो अभी अभी गरम पानी से नहा कर निकली थी, और कमरे में एसी के कारण ठंडक थी। समीर ने उसको पीठ के बल लिटा दिया, और अगले दौर के लिए खुद उसकी जाँघों के बीच में आ गया।
“ओह्ह्ह! जानू! मैं आपकी हर बात मानूँगी। लेकिन उन चार पाँच दिनों में यह करना मुश्किल है।”
समीर अपने लिंग का शिश्नाग्रच्छद पीछे खिसका चुका था।
“किन दिनों में?”
“पीरियड्स ..... आआह्ह्ह!”
समीर उसकी योनि को अपनी तर्जनी और अंगूठे से खोल कर अपने लिंग को फिर से भीतर इतनी ज़ोर से ठेला कि मीनाक्षी को एकदम से पीड़ा सी हुई और उसकी चीख निकल गई। इस हमले से आहत मीनाक्षी उसे गुस्से से देखने लगी। समीर भी शायद मीनाक्षी के दर्द से थोड़ा सहम गया, और सोचने लगा कि अब वो क्या करेगी। समीर को ऐसे भोलेपन से देखता देख कर मीनाक्षी को गुस्सा भी आ रहा था और हँसी भी।
मीनाक्षी को हँसते हुए देख कर समीर की जान में जान आई - उसने मीनाक्षी को अपने ऊपर बैठा लिया कुछ इस तरह कि जब वो अपनी पीठ के बल लेटा तो मीनाक्षी उसकी जाँघों पर उसके ऊपर अपने दोनों घुटने मोड़ कर इधर-उधर करके बैठी थी। इस नए आसन के कारण समीर का लिंग जबरदस्त रूप से कठोरता धारण किए हुए था।
“ये तुम्हारे अंदर रहता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है!”
मीनाक्षी ने शरारत से कहा, “ये तो अपनी सहेली के अंदर है.... आपको क्यूँ अच्छा लगता है?”
“क्योंकि मेरा काम कम हो जाता है।”
“काम? कौन सा काम?”
“जब ये ऐसे रहता है न, तो इसको हाथ से समझाना बुझाना पड़ता है।”
मीनाक्षी कुछ समझी नहीं। शायद उसको हस्तमैथुन के बारे में नहीं मालूम था। और समीर ने भी इस बात को आगे नहीं खींचा। उसने आगे कहना जारी रखा, “और मुझे ये मीठे मीठे राजपुरी आम चूसने को मिल जाता है!”
“हा हा हा! आप और आपका आम प्रेम!”
“ए मिनी, तुमको कैसा लगता है?”
“क्या?” वो सब समझती है कि समीर उससे क्या पूछ रहा था। लेकिन जान बूझ कर अनजान बनी हुई थी।
“जब ये तुम्हारे अंदर रहता है!”
उसकी बात सुन कर मीनाक्षी फिर से शरमा गई। वो समीर के लिंग की कठोरता को अपने भीतर महसूस कर रही थी। समीर धक्के नहीं लगा रहा था, लेकिन अपनी योनि के भीतर मीनाक्षी को समीर के उत्तेजित लिंग के झटके पर झटके महसूस हो रहे थे। समीर को कुछ भी न करते देख कर अंततः मीनाक्षी ने ही पहल करी - उसने बैठे बैठे ही अपने नितंबो को पीछे की ओर थोड़ा सा उठाया और फिर हल्का सा धक्का दिया। उसकी योनि भीतर से पहले से ही गीली थी। समीर का लिंग उसकी योनि के भीतर ऐसी मजबूती से गड़ा हुआ था जैसे कि लकड़ी में लोहे की कील ठुकी हुई हो! मीनाक्षी ने अपने नितम्बों को गति देनी शुरू की जैसे कि समीर ने किया था - आगे-पीछे!
मीनाक्षी अपनी आँखें बंद किए हुए समीर के सख्त लिंग के घर्षण का आनंद उठा ही रही थी, कि वैसे ही लेटे लेटे ही समीर ने एक ज़ोर का धक्का मारा। इस प्रहार से उसका लिंग मीनाक्षी की योनि में भीतर तक ठुक गया। मीनाक्षी को फिर से तीव्र पीड़ा का आघात लगा। मीनाक्षी उसको घूरने लगी, लेकिन समीर को जैसे कोई परवाह नहीं थी - उसने फिर से एक धक्का और मारा, और पुनः पूरा का पूरा मीनाक्षी की योनि में घुस गया। इस दूसरे आघात से मीनाक्षी लगभग गिरते गिरते बची। वो कुछ कर पाती, उसके पहले ही समीर ने उसको एक खिलौने की भाँति उठाया और अपनी गोदी में बैठा लिया और खुद भी बैठ गया। उस अवस्था में मीनाक्षी का पूरा भार उसकी योनि में घुसे हुए समीर के लिंग पर आ गया, और वो पूरा अंदर तक घुस गया - जैसे अगर कोई गुंजाईश रह गई हो, तो वो भी ख़तम हो गई।