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Romance संयोग का सुहाग

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ऐसी ही कई छोटी, बड़ी, ख़ास, फ़ालतू अनगिनत बातें सोचते हुए कोई एक घंटा हो गया। टब का पानी भी लगभग ठंडा हो गया। पानी में पड़े पड़े उसके शरीर की थकावट काफ़ी कम हो गई थी, और वो पहले से अधिक तरोताज़ा महसूस कर रही थी। गुनगुना शावर ले कर उसने साबुन धोया, फिर बाथरूम से बाहर निकल आई। उसने एक तौलिया अपनी छाती पर बाँध रखा था, जिससे उसके जाँघ के ऊपरी हिस्से तक शरीर ढँका हुआ था।

जब वो कमरे में वापस आई तो उसने देखा कि समीर उनींदी आँखों से मुस्कुराते हुए उसी की तरफ देख रहा था। उसका लिंग वापस तना हुआ ऐसा दिख रहा था, जैसे कि वो फिर से काम-युद्ध के लिए तैयार हो।

‘फिर से रेडी! ये थकते नहीं हैं क्या! हे प्रभु, देर से ही सही, लेकिन तुमने मुझे ऐसा पति दिया जिसे पा कर मैं धन्य हो गई!’ मीनाक्षी ने मन ही मन सोचा।

“कहाँ से सीखी इतनी बदमाशी आपने?” मीनाक्षी ने बिस्तर पर बैठते हुए और मुस्कुराते हुए समीर से पूछा।

“कैसी बदमाशी?”

“ये.... आपका नुन्नू!” मीनाक्षी ने शिकायती लहज़े में कहा, “ये कभी आराम भी करता है, या बस हमेशा मुझे सताने के लिए तैयार रहता है?”

“नुन्नू!!? अरे जानेमन, तुमको इतने मज़े देता है ये बेचारा…. कम से कम जॉय स्टिक ही बोल दो इसको!”

“जी नहीं! मैं इसको नुन्नू ही बोलूँगी! मेरा प्यारा सा नुन्नू!”

“चलो जी! ये भी ठीक है! कम से कम आपको ये प्यारा तो लगता है। अब ये सोचिए कि पैदा होने के इक्कीस साल बाद जा कर इस बेचारे को अपनी सहेली मिली है। अब जब ये उससे हाय-हेलो बोलना चाहता है, तो आप क्यों नाराज़ होती हैं?”

“बहुत हाय-हेलो हो गई इसकी और इसकी सहेली की। इनके हाय-हेलो के चक्कर में इस बड़ी लड़की को सताना बंद करिए।” मीनाक्षी मुस्कुराते हुए बोली।

“आज की रात कुछ बंद करने की रात थोड़े न है!”

“अच्छा जी? फिर?”

“आज की रात तो खोलने की है....”

“अच्छा जी! फिर से बदमाशी....” मीनाक्षी शरमाती हुई इठलाई।

“इधर आओ,” कहते हुए समीर ने मीनाक्षी का हाथ पकड़ कर बिस्तर पर खींच लिया। वो पीठ के बल, चित्त हो कर बिस्तर पर गिर गई।

“मिनी?”

“जी?”

“आप हनीमून के लिए कहाँ जाना चाहोगी?”

“हनीमून? उम्म्म्म....!” मीनाक्षी ने कुछ देर सोचने का अभिनय किया और फिर थोड़ा गंभीरता से कहा,

“जानू, शादी के दिन से अभी तक मेरा हनीमून ही तो चल रहा है! और मुझे मालूम है कि आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा! आप सभी मुझको इतना प्यार करते हैं! और मैं भी आपको खूब प्यार करती हूँ! हमारा घर, प्यार का घर है। मुझे आपका प्यार पाने के लिए कहीं और जाने की कोई ज़रुरत नहीं है।”

समीर के चेहरे को प्यार से अपने दोनों हाथों में ले कर उसने आगे कहा, “वैसे आपको कहीं घूमने फिरने चलने का मन है तो ठीक है… वो जगह आप चूज़ करिए लेकिन। और.... प्लीज् यह मत सोचिए कि हनीमून कोई रस्म है, जिसको आपको निभाना है.... मुझको जो सुख इतने दिनों से मिल रहा है, वो किसी हनीमून का मोहताज नहीं..”

समीर उसकी बात सुन कर मुस्कुराया। कुछ पल वो उसके भोले सौंदर्य को देखता रहा, और फिर वो मीनाक्षी का मुख चूमने के लिए उस पर झुक गया। मीनाक्षी भी सहर्ष समीर के होंठों को अपने होंठों में लेकर उसको चुम्बन में सहयोग देने लगी। यह कोई कामुक चुम्बन नहीं था, बल्कि एक स्नेहमय चुम्बन था। एक बहुत ही लम्बा स्नेहमय चुम्बन! दोनों को समय का कोई ध्यान नहीं रहा कि वो कब तक एक दूसरे को चूमते रहे। अंततः जब उनका चुम्बन टूटा, तो समीर ने कहा,

“ये तौलिया क्यों लगाया हुआ है?”

“आपके नुन्नू से उसकी सहेली को बचाने के लिए।” मीनाक्षी अपने कहे पर खुद ही शरमा गई।

“मिनी, एक बात बोलूँ?” समीर ने तौलिया उसके शरीर से हटाते हुए कहा।

“जी?”

“जब तुम मेरे सामने रहा करो, तो ऐसा नहीं हो सकता कि बिलकुल नंगी रहो?” उसने बिस्तर से उठते, और मीनाक्षी की जाँघें खोलते हुए कहा।

‘बाप रे! कुछ देर पहले ही तो मैं यही सोच रही थी। इनको कैसे सब मालूम पड़ जाता है? कोई टेलीपैथिक कनेक्शन है क्या!’

“हटो जी! ऐसे कैसे होगा?” मीनाक्षी ने नखरा दिखाया।

“कोशिश करो! कोशिश करने से तो सब कुछ हो जाता है।” वो उसकी योनि सहला रहा था। मीनाक्षी के शरीर में झुरझुरी होने लगी - एक तो समीर के इस तरह अंतरंग तरीके से छूने के कारण, और दूसरा इसलिए क्योंकि वो अभी अभी गरम पानी से नहा कर निकली थी, और कमरे में एसी के कारण ठंडक थी। समीर ने उसको पीठ के बल लिटा दिया, और अगले दौर के लिए खुद उसकी जाँघों के बीच में आ गया।

“ओह्ह्ह! जानू! मैं आपकी हर बात मानूँगी। लेकिन उन चार पाँच दिनों में यह करना मुश्किल है।”

समीर अपने लिंग का शिश्नाग्रच्छद पीछे खिसका चुका था।

“किन दिनों में?”

“पीरियड्स ..... आआह्ह्ह!”

समीर उसकी योनि को अपनी तर्जनी और अंगूठे से खोल कर अपने लिंग को फिर से भीतर इतनी ज़ोर से ठेला कि मीनाक्षी को एकदम से पीड़ा सी हुई और उसकी चीख निकल गई। इस हमले से आहत मीनाक्षी उसे गुस्से से देखने लगी। समीर भी शायद मीनाक्षी के दर्द से थोड़ा सहम गया, और सोचने लगा कि अब वो क्या करेगी। समीर को ऐसे भोलेपन से देखता देख कर मीनाक्षी को गुस्सा भी आ रहा था और हँसी भी।

मीनाक्षी को हँसते हुए देख कर समीर की जान में जान आई - उसने मीनाक्षी को अपने ऊपर बैठा लिया कुछ इस तरह कि जब वो अपनी पीठ के बल लेटा तो मीनाक्षी उसकी जाँघों पर उसके ऊपर अपने दोनों घुटने मोड़ कर इधर-उधर करके बैठी थी। इस नए आसन के कारण समीर का लिंग जबरदस्त रूप से कठोरता धारण किए हुए था।

“ये तुम्हारे अंदर रहता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है!”

मीनाक्षी ने शरारत से कहा, “ये तो अपनी सहेली के अंदर है.... आपको क्यूँ अच्छा लगता है?”

“क्योंकि मेरा काम कम हो जाता है।”

“काम? कौन सा काम?”

“जब ये ऐसे रहता है न, तो इसको हाथ से समझाना बुझाना पड़ता है।”

मीनाक्षी कुछ समझी नहीं। शायद उसको हस्तमैथुन के बारे में नहीं मालूम था। और समीर ने भी इस बात को आगे नहीं खींचा। उसने आगे कहना जारी रखा, “और मुझे ये मीठे मीठे राजपुरी आम चूसने को मिल जाता है!”

“हा हा हा! आप और आपका आम प्रेम!”

“ए मिनी, तुमको कैसा लगता है?”

“क्या?” वो सब समझती है कि समीर उससे क्या पूछ रहा था। लेकिन जान बूझ कर अनजान बनी हुई थी।

“जब ये तुम्हारे अंदर रहता है!”

उसकी बात सुन कर मीनाक्षी फिर से शरमा गई। वो समीर के लिंग की कठोरता को अपने भीतर महसूस कर रही थी। समीर धक्के नहीं लगा रहा था, लेकिन अपनी योनि के भीतर मीनाक्षी को समीर के उत्तेजित लिंग के झटके पर झटके महसूस हो रहे थे। समीर को कुछ भी न करते देख कर अंततः मीनाक्षी ने ही पहल करी - उसने बैठे बैठे ही अपने नितंबो को पीछे की ओर थोड़ा सा उठाया और फिर हल्का सा धक्का दिया। उसकी योनि भीतर से पहले से ही गीली थी। समीर का लिंग उसकी योनि के भीतर ऐसी मजबूती से गड़ा हुआ था जैसे कि लकड़ी में लोहे की कील ठुकी हुई हो! मीनाक्षी ने अपने नितम्बों को गति देनी शुरू की जैसे कि समीर ने किया था - आगे-पीछे!

मीनाक्षी अपनी आँखें बंद किए हुए समीर के सख्त लिंग के घर्षण का आनंद उठा ही रही थी, कि वैसे ही लेटे लेटे ही समीर ने एक ज़ोर का धक्का मारा। इस प्रहार से उसका लिंग मीनाक्षी की योनि में भीतर तक ठुक गया। मीनाक्षी को फिर से तीव्र पीड़ा का आघात लगा। मीनाक्षी उसको घूरने लगी, लेकिन समीर को जैसे कोई परवाह नहीं थी - उसने फिर से एक धक्का और मारा, और पुनः पूरा का पूरा मीनाक्षी की योनि में घुस गया। इस दूसरे आघात से मीनाक्षी लगभग गिरते गिरते बची। वो कुछ कर पाती, उसके पहले ही समीर ने उसको एक खिलौने की भाँति उठाया और अपनी गोदी में बैठा लिया और खुद भी बैठ गया। उस अवस्था में मीनाक्षी का पूरा भार उसकी योनि में घुसे हुए समीर के लिंग पर आ गया, और वो पूरा अंदर तक घुस गया - जैसे अगर कोई गुंजाईश रह गई हो, तो वो भी ख़तम हो गई।
 
मीनाक्षी को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि समीर उस पोजीशन में भी ऐसे बल पूर्वक धक्के मार सकता है। एक पल को उसके मन में विचार आया कि ‘हे भगवान्! समीर का लिंग इतना बड़ा क्यों है!’ खैर! अब जो भी होना था वो हो चुका था। मीनाक्षी समीर की गोद में उसी के लिंग को अपनी योनि में धारण करके बैठी हुई थी और भोगी जा रही थी। यह सब पहले से अलग तरह का था। उसकी आँखों से आँसू निकल आए। पीड़ा बर्दाश्त करते हुए वो सोच रही थी कि ये तो बढ़िया है.... चित भी मर्द की, और पट भी मर्द की।

“क्या हुआ मेरी जान! सब ठीक तो है?” उसके चेहरे के भाव देख कर समीर ने पूछा।

मीनाक्षी ने तल्खी से कहा, “इतनी ज़ोर से क्यों करते हो जानू! इतनी बेसब्री क्यों है आपको? मैं कहाँ भागी जा रही हूँ?”

उसकी आँखों के कोनों से आँसुंओं को पोंछते हुए वो बोला, “गलती हो गई! माफ़ कर दो, मेरी प्यारी मिनी!”

मीनाक्षी अभी भी अपनी योनि में ठुके हुए उस विशाल और कठोर लिंग के साथ सहज होने की कोशिश कर रही थी और सम्भोग क्रिया की ताल में अपना ताल बैठाने की कोशिश कर रही थी। इसलिए समीर की बात पर ध्यान नहीं दे रही थी। समीर फिर से बोला,

“ज़रा मुस्करा दो, मेरी मिनी! ये बदमाश नुन्नू अपनी सहेली को देख कर कंट्रोल नहीं कर पाया, और उसकी ज़ोर से चुम्मी ले बैठा!”

उसके मुँह से ये शब्द सुनकर मीनाक्षी की हँसी छूट गई और दर्द का अहसास कम हो गया।

“आप और आपका नुन्नू, दोनों एक समान ही बदमाश हैं!”

समीर ने उसको अपनी बाहों में भर लिया और पहले से धीरे धक्के लगाने लगा। उसके कठोर लिंग की गर्मी वो अपनी योनि के भीतर तक महसूस कर रही थी। सम्भोग की गति से होने वाली हलचल से उसके स्तन और चूचक समीर के सीने के बालों से रगड़ कर उसमें एक विद्युतीय आवेश पैदा कर रहे थे। उधर, उसके होंठ मीनाक्षी के होंठो को चूमने और चूसने में व्यस्त हो गए। अब सब सामान्य हो गया था और मीनाक्षी भी अपने पूरे शरीर में सम्भोग का आनंद महसूस कर रही थी। कभी कभी वो अपने नितम्बों को समीर के धक्के लगाने के जैसे ही आगे पीछे कर देती, और उसकी इस हरकत से उसका लिंग और अंदर तक चला जाता। कुछ क्षणों पहले जो अंग उसको इतनी पीड़ा दे रहा था, अब उसको आनंद दे रहा था।

“अभी ठीक लग रहा है?” समीर ने पूछा।

मीनाक्षी ने शरमाते हुए अपनी ‘हाँ’ में सर हिलाया। समीर ने उसको अपनी बाहों में भर लिया और वो निश्चिंत होकर, और अपना सर समीर के कंधे पर रख कर, उसकी गोद में बैठ कर इस अनूठे रमण का आनंद लेती रही। समीर की ही ताल में वो भी अपने नितम्ब चला रही थी। समीर अपनी हथेली से प्यार से उसका सर सहला रहा था होंठों को चूम रहा था।

“मिनी, तुम मेरी पत्नी भी हो, और मेरी प्रेमिका भी! आई लव यू!” समीर प्रेम से मुस्कुराया।

“और आप मेरा पहला प्यार हैं! मुझे नहीं पता था कि कोई मुझे इतना प्यार कर सकता है! आपने मुझसे सिर्फ प्यार किया है। मैं धन्य हो गई हूँ!”

इस बात पर समीर ने जब उसके होंठो पर चुम्बन किया तो मीनाक्षी के पूरे शरीर में रोमांच की लहर दौड़ गई। उसकी योनि के भीतर तक उतरा हुआ समीर का तपता हुआ उत्तेजित लिंग, मीनाक्षी के शरीर की गर्मी भी बढ़ा रहा था। दोनों की ही साँसे गहरी और गरम हो चलीं थीं। इस समय उन दोनों का पूरा शरीर ही घर्षण कर रहा था।

“तो फिर तुम हमेशा मेरी प्रेमिका ही बनी रहना।”

“आप मुझे जिस भी रूप में चाहेंगे, मैं वही रूप ले कर आपको सुख दूँगी! यह मेरा सौभाग्य होगा!”

यह कह कर मीनाक्षी ने अपने होंठ समीर के होंठो पर रख दिए और प्रसन्नतापूर्वक दोनों ने एक दूसरे के होंठो का रस पान करना शुरू कर दिया। उधर नीचे मीनाक्षी की योनि से इतना रस निकल रहा था कि समीर की जांघें और साथ ही बिस्तर भी गीला होने लगा। आज की रात पाँचवी बार मीनाक्षी ने यौन-क्रीड़ा में चरमोत्कर्ष प्राप्त कर लिया था और अभी तक उसको इस बात की महत्ता का पता ही चला।

दुनिया भर में कितनी ही स्त्रियाँ होंगी, जो इस सुख से वंचित होंगी। उनके पति बस अपना काम निकाल लेते हैं। उनकी पत्नियों की क्या इच्छा है, इससे उनको शायद ही कोई सरोकार हो। इस कारण वो स्त्रियाँ सम्भोग की उन संभावनाओं को कभी प्राप्त ही नहीं कर पातीं। और उनका सम्पूर्ण जीवन बस गृहस्थी और बच्चों के फेर में स्वाहा हो जाता है। और यहाँ मीनाक्षी पाँचवी बार इस महत्वपूर्ण सुख का आनंद ले रही थी - पहली ही रात में। और बेचारी को मालूम भी नहीं है कि यह सुख कहलाता क्या है।

उधर समीर उसकी योनि के अंदर की मांस पेशियो में जकड़े हुए अपने लिंग के घर्षण और दोहन से लगातार आनंदित हो रहा था और उसको खुद के चर्मोत्कर्ष की तरफ ले जा रहा था। समीर को स्थिति में थोड़ी असहजता महसूस होने लगी थी, इसलिए वो अब यह पोजीशन बदलना चाहता था। समीर ने मीनाक्षी को थोड़ा सा ऊपर उठाया, और उसको अपने घुटनों पर सम्हालते हुए पीठ के बल बिस्तर पर लिटा दिया, और खुद उसके ऊपर आ गया। यह करते समय समीर ने उसको इस प्रकार पकड़ रखा था कि उसका लिंग योनि से बाहर नहीं निकल पाया। अब दोनों के ही पाँव स्वतंत्र थे। मीनाक्षी का चेहरा अपनी हथेलियों में थाम कर, समीर किसी भूखे बच्चे की भांति उसके होंठो को बेतहाशा चूमने लगा। उसके स्तन समीर की छाती में गड़ रहे थे। समीर अब उन्मुक्त हो कर धक्के लगा रहा था। और अब मीनाक्षी को और भी आनंद आ रहा था।

मीनाक्षी ने महसूस किया कि इस बार दोनों बहुत देर से यह क्रीड़ा खेल रहे थे। समीर का तरीका भी थोड़ा बदल गया था - कभी वो अचानक ही धक्कों की गति तेज कर देता, तो कभी धीमी।

‘उफ़्फ़ ऐसी शरारत! यह सब कहाँ से सीखा है इन्होने!’

समीर के सम्भोग के कौशल को देख कर मीनाक्षी निहाल हुई जा रही थी। कुछ समय पहले आनंद की जो अनुभूति उसको हुई थी, अब पुनः उसकी शुरुआत होती महसूस हो रही थी। इस बीच उसके होंठो ने मीनाक्षी के होंठों को चूसना और चूमना बंद नहीं किया था। उसको भोगते समय समीर एक पल को रुका और साथ ही मीनाक्षी के होंठो को भी पल भर को छोड़ा। तब जा कर मीनाक्षी ने हाँफते हुए साँस ली और बोली,

“बस जानू, बस! अब बस! बाद में कर लेना।” मीनाक्षी के होंठ इतना चूसे जाने से सूज गए थे।
 
समीर उसकी तरफ देख कर मुस्कराते हुए, और उसके गाल सहलाते हुए बोला, “बस थोड़ा और! थोड़ी देर और बर्दाश्त कर लो, मेरी प्यारी। ज्यादा नहीं सताऊंगा!”

“नहीं जानू! सताने जैसा कुछ नहीं है। आप कर लीजिए अच्छे से।” वो हाँफते हुए बोली। मीनाक्षी की हालत चरमरा गई थी, लेकिन किसी भी हालत में वो अपने प्रेमी को निराश नहीं करना चाहती थी।

समीर ने जल्दी जल्दी बीस पच्चीस धक्के और लगाए और ताज़ा ताज़ा बना हुआ वीर्य मीनाक्षी की कोख में भर दिया। कार्य संपन्न होने के बाद समीर ने बेहद संतुष्टि भरी आवाज़ निकाली। चूँकि यह आवाज़ पहले के दोनों संसर्गों निकली उसकी आवाज़ से अलग थी, इसलिए मीनाक्षी को चिंता हुई,

“क्या हुआ?” उसने पूछा।

“अरे कुछ नहीं! तृप्त हो गया!” समीर हँसते हुए बोला।

“ओह”

“मिनी?”

“हम्म”

“तुमने बताया नहीं कि तुमको कैसा लगता है जब ये तुम्हारे अंदर रहता है?”

“आप भी न!” मीनाक्षी हँसती हुई बोली, “अगर अच्छा न लगता तो ऐसे मैं आपके नुन्नू को उसकी सहेली की चुम्मी लेने देती?”

“हा हा हा! तुम ऐसे बोलते हुए बड़ी सेक्सी लगती हो!”

“हा हा! आपको भी न जाने क्या क्या सेक्सी लगता है!” फिर थोड़ा ठहर कर, “जानू, आपसे एक बात कहूँ?”

“हम्म?”

“आपका ‘ये’ बहुत बड़ा है। थोड़ा आहिस्ता, थोड़ा आराम से किया करिए! नहीं तो दर्द होने लगता है।”

“सॉरी मेरी जान! आगे से ख़याल रखूँगा.... अरे! देख तो... तुम्हारे तो ऊपर के होंठ, और नीचे के होंठ - दोनों ही सूज गए हैं!”

“आप इतना सताएँगे तो ये सब नहीं होगा? जाओ मुझे बात नहीं करनी आप से।” मीनाक्षी झूठ-मूठ ठुनकते हुए बोली।

“बात न करो... पर कम से कम मेरे पास आ जाओ... मेरी बाहों में आ जाओ!”

“रहने दीजिए - नहीं तो आपका नुन्नू फिर से अपनी सहेली की चुम्मी लेने को आतुर हो जाएगा, और मेरी हालत खराब हो जाएगी उस चक्कर में।”

“नहीं नहीं... अभी हम सिर्फ बात करेंगे”

“पक्का?”

“पक्का।”

दोनों कुछ देर आलिंगनबद्ध हो कर लेटे रहे। उसने घड़ी में देखा - रात के ढाई बज रहे थे। इसका मतलब पिछले पाँच घण्टे से उनका यह प्रेम मिलन चल रहा था।

वो समीर के सीने पर हाथ रखे हुई थी। उसके मन में समीर को छेड़ने की इच्छा हुई,

“आदेश के दोस्त?” मीनाक्षी उसको छेड़ती हुई बोली।

“आएं! ये क्या हुआ तुमको?” समीर हैरानी से बोला।

“ये सब बदमाशियाँ आपको इंजीनियरिंग में सिखाते थे?”

“कैसी बदमाशियाँ?”

“वही सब, जो कर कर के आप मुझको सताते हैं?”

“ओह! वो! हम्म्म... उसके पीछे एक कहानी है!”

“अच्छा जी? उसके पीछे भी एक कहानी है?”

“हाँ! वो ऐसा हुआ कि एक दिन मुझे एक अप्सरा मिली। प्यारी सी। सुन्दर सी। भोली सी। वो इतनी सुन्दर सी थी कि मुझसे रहा नहीं गया, और एक दिन मैंने उसको चूम लिया। उस दिन से वो मेरे साथ है।”

“अच्छा जी? अभी भी साथ है?”

“हाँ! एक दिन हम दोनों साथ में थे। और कोई नहीं था। वो बिस्तर पर अपने पेट के बल लेटी हुई थी। मैंने देखा कि उसके दाहिने चूतड़ पर एक सुन्दर सा, उसके ही जैसा प्यारा सा तिल है। उसी तिल ने तिलिस्म डाल दिया मुझ पर। और सारी बदमाशियाँ सिखा दीं।”

मीनाक्षी ज़ोर से मुस्कुराने लगी थी, “अच्छा जी! तो आपकी बदमाशियों का ज़िम्मा भी उस बेचारी अप्सरा पर है!”

“और नहीं तो क्या! वरना मैं तो एक सीधा, सादा, निहायत ही शरीफ़ लड़का था।”

“जो अब आप नहीं रहे?”

समीर ने ‘न’ में सर हिलाया।

“बातें बनाना कोई आप से सीखे।” वो हँसे बिना नहीं रह सकी।

“मिनी?”

“जी?”

“एक और गाना सुनाइए न! आपकी आवाज़ में एक गाना सुन लूँगा.... तो आत्मा की तृप्ति में जो ज़रा सी कसर बची है, वो पूरी हो जाएगी!” समीर ने अनुरोध किया।

“गाना सुनाऊँ? अच्छा ठीक है। कौन सा गाना सुनाऊँ?”

“आपको जो भी पसंद हो।”

“जो भी मुझे पसंद हो? उम्म्म्म। ..... कुछ देर सोचने के बाद वो मुस्कुराई - उसकी आँखों में चंचलता और स्नेह दोनों के भाव दिख रहे थे।

“आप पहले ठीक से बैठिए।” कह कर उसने समीर को पहले बिस्तर के सिरहाने (head-rest) पर कई सारे तकिए लगा कर अधलेटा बिठाया, और फिर गाना शुरू किया।

“जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

हो मेरे रँग गए सांझ सकारे

मीनाक्षी सिर्फ गा ही नहीं रही थी... वो अपने हाथों और चेहरे से नृत्य की भावभंगिमा भी बना रही थी। मीनाक्षी की गाने वाली आवाज़, उसकी बोलने वाली आवाज़ से भी कहीं अधिक मीठी थी! समीर सोच रहा था कि क्यों उसको मिनी के इस टैलेंट के बारे में कुछ पता ही नहीं था!

तू तो अँखियों से जाने जी की बतियाँ

तोसे मिलना ही जुल्म भया रे
 
“जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

हो मेरे रँग गए सांझ सकारे

मीनाक्षी सिर्फ गा ही नहीं रही थी... वो अपने हाथों और चेहरे से नृत्य की भावभंगिमा भी बना रही थी। मीनाक्षी की गाने वाली आवाज़, उसकी बोलने वाली आवाज़ से भी कहीं अधिक मीठी थी! समीर सोच रहा था कि क्यों उसको मिनी के इस टैलेंट के बारे में कुछ पता ही नहीं था!

तू तो अँखियों से जाने जी की बतियाँ

तोसे मिलना ही जुल्म भया रे

पाँचों उँगलियाँ एक साथ मिला कर उसने अपने माथे के कोने से न जाने क्या उठाया, और फिर समीर की दिशा में कलाई मोड़ कर उस इमेजिनरी काल्पनिक वस्तु को फेंक दिया। समीर उसकी इस अदा पर ज़ोर से मुस्कुराया।

हे जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

मीनाक्षी गाने के ताल पर अपने सर को हल्के हल्के झुमा कर गा रही थी। मीठा गीत! पहले शब्दों से ही प्रेम रुपी शहद टपकने लगा। कौन न झूमने लगे? समीर का खुद का सर मीनाक्षी की ताल पर हिलने लगा।

देखी साँवली सूरत ये नैना जुड़ाए

देखी साँवली सूरत

गाते हुए मीनाक्षी ने समीर के दोनों गालों को अपने दोनों हाथों से प्यार से छुआ।

तेरी छब देखी जबसे रे

तेरी छब देखी जबसे रे नैना जुड़ाए

भए बिन कजरा ये कजरारे

मीनाक्षी ने हाथों से समीर की बलैयाँ उतारीं, और अपनी कनपटियों पर ला कर उँगलियों को फोड़ लिया.... मतलब उसने समीर के सर की बलाएँ अपने सर उतार लीं।

हे जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

हो मेरे रँग गए सांझ सकारे

समीर ने उसका हाथ पकड़ कर अपने पास आने का इशारा किया। मीनाक्षी गाते हुए समीर के सीने पर टेक लगा कर बैठ जाती है।

जाके पनघट पे बैठूँ मैं, राधा दीवानी

जाके पनघट पे बैठूँ

समीर ने उसकी बाँह को चूम लिया।

बिन जल लिए चली आऊँ

उसने एक हाथ से अपने सर के निकट एक कलश का आकार बनाया। समीर उसके गाने, उसकी अदा, और उसके चेहरे की भाव-भंगिमा पर मुस्कुरा दिया।

बिन जल लिए चली आऊँ राधा दीवानी

मोहे अजब ये रोग लगा रे

कह कर मीनाक्षी ने समीर का हाथ अपने दोनों हाथों में पकड़ कर अपने चेहरे के एक तरफ लगाया, और आँखें बंद कर झूमने लगी।

हे जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

हो मेरे रँग गए सांझ सकारे

समीर ने उसको पीछे से आलिंगनबद्ध कर लिया और उसके कंधे के नीचे चूम लिया।

मीठी मीठी अगन ये, सह न सकूँगी

मीनाक्षी ने मुस्कुराते हुए धीरे से अपना सर ‘न’ में हिलाया।

मीठी मीठी अगन

मैं तो छुई-मुई अबला रे

कह कर उसने दोनों हाथ अपने सीने से लगा कर खुद को हलके से सिमटा लिया।

मैं तो छुई-मुई अबला रे सह न सकूँगी

“अए हय”, समीर उसके ‘छुई मुई’ बोलने की अदा पर बोल पड़ा।

मेरे और निकट मत आ रे

“अरे!” कह कर समीर ने मीनाक्षी को और कस के अपने बाहुपाश में बाँध लिया।

ओ जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

हो मेरे रँग गए सांझ सकारे

तू तो अँखियों में जाने जी की बतियाँ

तोसे मिलना ही जुल्म भया रे

गाते हुए मीनाक्षी ने आँखें और नाक प्यार से मिचका दिए.... मीनाक्षी की उस अदा पर समीर के दिल पर जैसे सैकड़ों खंजर चल गए हों।

ओ जोगी जबसे तू आया मेरे द्वारे

[गाना बंदिनी (1963) फिल्म से है; गीतकार हैं शैलेन्द्र; संगीतकार हैं सचिन देव बर्मन; गायिका हैं लता मंगेशकर! बहुत मीठा गीत है। कुछ नहीं तो ऐसे ही सुन लीजिए]
 
“वा वाह! अमेजिंग! अमेजिंग! सुभानअल्लाह! जज़ाकल्लाह! सच में मिनी, आत्मा तृप्त हो गई।”

मीनाक्षी प्रेम से मुस्कुराई। यह गीत उसने इसीलिए गाया जिससे वो समीर को बता सके कि वो उसके कारण क्या महसूस करती है! अगर गाना सुन कर समीर की आत्मा तृप्त हो गई, तो उसकी भी आत्मा तृप्त हो गई।

“इसका मतलब क्या है?” समीर के बगल लेटते हुए उसने पूछा।

“किसका?”

“सुभानअल्लाह के बाद जो बोला!”

“ओह, जज़ाकल्लाह… इसका मतलब है, ‘भगवान तुम्हारा कल्याण करें, भगवान तुमको खुश रखें’!”

मीनाक्षी उसकी बात सुन कर उसको ज़ोर से खुद में भींच लेती है।

“वैसे, मुझे भी गाने में कुछ कुछ समझ में नहीं आया।”

“क्या क्या? पूछिए? बताती हूँ।”

पति पत्नी एक दूसरे के आलिंगन में बंधे रह कर, ऐसी निरर्थक बातों में भी कितना रस निकाल लेते हैं!

“‘नैना जुड़ाए’ मतलब? आँखों से आँखें मिल गईं?”

“हा हा! इसका मतलब है, कि तुम्हारी मोहनी सूरत देख कर मेरी आँखों में ठंडक आ गई! मतलब, मेरी आत्मा भी तृप्त हो गई। समझे जानू हमरे?”

“हम्म्म.... और, सकारे मतलब?”

“सकारे मतलब सुबह!” मीनाक्षी अपने पति के अंगों को प्रेम से सहलाती हुई समझा रही थी, “जैसे जब शाम ढलती है तो कितने सारे रंग आकाश में घुल जाते हैं, वैसे ही सवेरा होने पर भी आकाश उतना ही सुन्दर, और रंग-बिरंगा हो जाता है। तुम्हारे आने से ऐसे सुन्दर दृश्य भी और सुन्दर हो गए हैं।”

समीर ने सुना - मीनाक्षी ने उसको दो बार ‘तुम’ कह कर सम्बोधित किया था। दोनों ही बार उसकी बोली प्रेम से सराबोर थी। समीर को सुन कर बहुत अच्छा लगा। मीनाक्षी उसको ‘आप’ क्यों कहती है, उसको नहीं मालूम था।

“मिनी?”

“जी?” वो इस समय उसके लिंग को सहला रही थी।

“मुझे ऐसे ही ‘तुम’ कह कर बुलाया करो न?”

“मेरे साजन,” मीनाक्षी इठलाती हुई बोली, “कहूँगी तो मैं हमेशा ‘आप’ ही आपको। ये ‘तुम’ का प्रयोग कभी कभी होगा - स्पेशल मौकों पर!”

“जैसे अभी?”

“जैसे अभी,” मीनाक्षी का हाथ समीर को सहलाते सहलाते उसके वृषण पर चला गया। उसको भी सहलाते हुए बोली, “इसको क्या कहते हैं?”

“टेस्टिकल्स! इसी में स्पर्म्स बनते हैं। ज़ोर से मत दबाना।”

“दर्द होगा?”

“हाँ! दर्द भी होगा, और हमारे आने वाले बच्चे भी, ....वेल, वो नहीं आएँगे! हा हा!”

“बाप रे!” कह कर उसने वहाँ से हाथ हटा लिया।

“अरे! मज़ाक किया! दर्द होगा बस। जो कर रही हो, वो करती रहो।”

“हम्म! ..... जानू?”

“हाँ?”

“आपको ‘वहाँ’ पर बाल अच्छे नहीं लगते न?”

“कहाँ पर?” समीर जानता था कि मीनाक्षी क्या बोल रही है।

“वहाँ पर।” फिर थोड़ा शरमाते, थोड़ा सकुचाते, थोड़ा फुसफुसाते, “चूत पर!”

समीर मुस्कुराया, “आप पर मुझे कुछ भी खराब नहीं लगता।”

“लेकिन वो अगर चिकनी रहे तो आपको ज्यादा अच्छी लगेगी?”

समीर ने ‘हाँ’ में सर हिलाया।

“ठीक है।”

“क्या करने वाली हो?” समीर ने उत्सुकतावश पूछा।

“बताऊँगी.... नहीं, बताऊँगी नहीं, दिखाऊँगी! ही ही”, फिर थोड़ा सोचती हुई, “जानू, अगर हम ऐसे ही... अह... ‘ये’ करते रहे, तो मैं जल्दी ही माँ बन जाऊँगी!” मीनाक्षी ने समीर के सीने कर उँगली से गोदते हुए कहा।

“हाँ! वो तो है। आप चाहती हैं माँ बनना?”

“आप क्या चाहते हैं?”

“मिनी, मेरे चाहने की इसमें थोड़ी कम वैल्यू है। ऑफ़ कोर्स, हर आदमी चाहता है अपनी संतान! लेकिन मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ, नौ महीने तक बच्चे को अपने अंदर रखना तो आपको ही पड़ेगा। उससे मैं आपको बचा नहीं पाऊँगा!”

मीनाक्षी मन ही मन सोचने लगी कि समीर को उसका कितना ख़याल है!

“बॉडी चेंज हो जाती है। आपके मूड्स चेंज हो जाएँगे, और आपको समझ ही नहीं आएगा कि क्यों हो रहा है। ये एक बड़ा डीसीजन है, और बहुत बड़ा कमिटमेंट भी! आप को ये डीसीजन लेना चाहिए। और आपका कोई भी डीसीजन होगा, मैं हूँ न! साथ में हमेशा!”

“जानू, मैं कोई काँच की गुड़िया थोड़े ही हूँ जो आपका संतान अपनी कोख में रखने से टूट जाऊँगी! बच्चा तो औरतें ही पैदा कर सकती हैं! मैं कोई अलग थोड़े ही हूँ!”

“आई नो! मैंने वैसे नहीं कहा।”

“हम्म... आपको बच्चे चाहिए?”

“हाँ! ये भी कोई पूछने की बात है?”

“कितने?”

“दो!” कुछ सोच कर, “एक भी ठीक है। पहली अगर लड़की हुई तो मेरे लिए एक भी ठीक है।”

“आपको लड़कियाँ ज़्यादा पसंद हैं?”

“आपको देखने के बाद से, हाँ! मुझे आपके जैसी एक बेटी चाहिए!”

“और मुझे आपके जैसा एक बेटा!”

“मतलब दो बच्चे?”

“मतलब दो बच्चे।”

“हम्म्म! इंटेरेस्टिंग!”

“लेकिन मैं सोच रही थी कि अभी आप अभी भी उम्र में बहुत छोटे हैं।”

“हम्म म्मम?”
 
“तो मैं सोच रही थी कि हम दो साल रुक जाते हैं.... फिर उसके बाद करते हैं?”

“जानू, मैंने तुमको पहले ही कहा है, कि ये तुम्हारा डीसीजन होना चाहिए! मैं पूरा सपोर्ट करूँगा!”

“ओके! तो अगर मेरा यह डीसीजन हो तो?”

“दो साल रुकने का?”

“हाँ!”

“मतलब, एक साल बाद दूसरे साल में बेबी, या दो साल के बाद तीसरे साल में बेबी?”

“एक साल बाद दूसरे साल में बेबी।” मीनाक्षी अब खिलखिला कर हँसने लगी।

“और उसके पहले हो गया अगर?”

“तो मेरे प्यारे साजन, मैं आपको वो सब सुख कैसे दे पाऊँगी, जो देना चाहती हूँ।”

“क्यों, बच्चा होने पर ऐसा क्या हो जाएगा?”

“क्योंकि बच्चा होने के बाद, मेरे भोले साजन, बच्चों के डायपर बदलने का काम तो आपका हो जाएगा! अब आप ही बताइए, जब एक तरफ मेरा बच्चा रोएगा और दूसरी तरफ मेरा जानू - तो मैं किसको सम्हालूँगी?

“मुझको!”

“हा हा हा!”

“हा हा! मज़ाक कर रहा हूँ! चलो, डायपर बदलने का काम मेरा! लेकिन मुझे उस काम का मेहनताना क्या मिलेगा?”

“मेहनताना? हम्म्म... मैं आपको वो अमृत दूँगी, जिसकी खोज आप पिछले तेरह चौदह साल से कर रहे हैं! सीधा... डेरी से!” मीनाक्षी खिलखिलाती, शरमाती हुई बोली!

“पक्का?” समीर खींसे निपोरते हुए बोला।

“पक्का मेरी जान!”

“वायदा किया है तुमने! पीछे तो नहीं हट जाओगी?”

“बिलकुल भी नहीं मेरे जानू!”

“अरे तो भाड़ में गया दो साल का वेट!” कह कर समीर बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा।

“जानू... जानू...” मीनाक्षी उसको वापस बिस्तर पर लिटाती बोली।

“क्या?”

“क्या कर रहे हैं आप?”

“ट्राइंग टू पुट ए बेबी इन यू! और क्या?”

“जानू, आपको इतनी जल्दी पापा बनने में कोई ऐतराज़ तो नहीं?”

“मेरी ऐज के कारण आप वेट करना चाहती थीं?”

“हाँ?”

“लेकिन वैसे आप माँ बनना चाहती हैं?”

मीनाक्षी ने ‘हाँ’ में सर हिलाया और शरम से अपना चेहरा अपनी हथेलियों से ढँक लिया।

“तो मेरी जान, अपनी आमरस की प्याली खोलो, जिससे मेरा नुन्नू अपनी सहेली को चुम्मी दे सके!”

[समाप्त]

तो लीजिए भाइयों और बहनों, "संयोग का सुहाग" समाप्त हुई।

पढ़ के बताइए कैसी लगी पूरी कहानी?

(दोबारा पढ़ने से कोई पाप नहीं लगेगा)

पुनश्च, सभी पाठकों को धन्यवाद! उम्मीद है कि कुछ लोग इस कहानी में बताई हुई बातों का अनुसरण करेंगे!
 

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