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Romance संयोग का सुहाग

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“सच में भाभी जी,” समीर के पिता जी पूरे रंग में थे, “सोचिए, अगर पत्नी उम्र में छोटी होगी तो बिना किसी चूं चपड़ के पति और उसके परिवार का सम्मान करती रहेगी। वहाँ का काम धंधा करती रहेगी। आप खुद ही देख लीजिए, किस तरह से लड़कियों को पति की इज़्ज़त करने पर मजबूर किया ही जाता रहा है। पति तुम्हारा देवता है! बताइए, कैसी कोरी बकवास है!”

“भाई साहब, बहन जी, आप लोग बहुत बड़े ख़यालात वाले लोग हैं! हम लोग धन्य है कि हमारी बेटी आपके यहाँ जाएगी!” आदेश की माँ बोलीं।

“भाभी जी, धन्य हम हैं जो ऐसी प्यारी बच्ची के पैर हमारे घर में पड़ेंगे!”

मीनाक्षी के पिता ने हाथ जोड़ कर पूछा, “और शादी?”

“आप कितनी जल्दी कर सकते हैं? मेरे बेचारे समीर से तो रहा नहीं जा रहा है, और आज ही करने पर ज़ोर दे रहा है! क्या करे बेचारा - उसकी पूरी लाइफ में आज पहली बार किसी लड़की ने उसको पसंद किया है! हा हा हा!!”

जिस तरह से समीर की माँ ने यह बात कही, वो सुन कर सभी लोग ठट्ठा मार कर हँसने लगे। मीनाक्षी बेचारी शर्म से गड़ गई।

समीर और मीनाक्षी की शादी उसी रात को एक संछिप्त से समारोह के साथ संपन्न हो गई। समारोह में समीर की तरफ से उसके माँ बाप, और उसके दोस्त लोग ही शामिल हो सके थे। जिस तरह से लोगो ने समीर की बढ़ाई करी और उसको सम्मान दिया, उससे दोनों ही परिवारों का सर गर्व से ऊंचा हो गया।

शादी के लिए कोई उचित कपड़ा नहीं था समीर के पास - बस एक टीशर्ट थी और जीन्स। ख़रीददारी का कोई मौका ही नहीं मिला।

वही पहन कर जब समीर आँगन में बने विवाह बेदी में आया तो उसका गठीला शरीर, और आत्मविश्वास से चमकते हुए चेहरे को देख कर वहाँ उपस्थित लोग निहाल हो गए। खुद आदेश भी अपने मित्र को देख कर अवाक् रह गया। एक कोने से आदेश की दादी दौड़ी दौड़ी आई और समीर के कान की जड़ में काजल लगा दिया कि कहीं उनके दामाद को किसी की नजर न लग जाए। उनके स्नेह पर सभी मुस्कुराए बिना नहीं रह सके।

ऐसी जल्दबाज़ी के बावज़ूद, समीर की माँ अपनी होने वाली बहू के लिए ज़ेवर, और साड़ियाँ लाना भूली नहीं थीं। ज़ेवर तो वही थे, जो उन्होंने अपनी होने वाली बहू के लिए पिछले पांच वर्षों से इकट्ठे किये थे। खैर, जब समीर मीनाक्षी के गले में मंगलसूत्र डाल रहा था, और उसकी मांग में सिन्दूर भर रहा था, तब मीनाक्षी को लगा कि अब उसका जीवन अब उसका अपना नहीं रहा। उस दिन से उसका और समीर का जीवन एक है।

विदाई के समय दहेज़ का तमाम सारा सामान (जैसे कि बेड, सोफ़ा सेट, डाइनिंग टेबल, ड्रेसिंग टेबल, रसोई का सामान, इत्यादि) उनके साथ लाद दिया गया।

समीर और उसके माँ बाप ने इस पर बहुत आपत्ति उठाई - लेकिन आदेश ने उनको समझाया कि यह सब सामान तो उन्होंने खरीद ही लिया है, और सब दीदी के लिए है। अगर उसको साथ नहीं ले गए, तो सब पड़े पड़े खराब हो जायेगा। वैसे भी समीर के घर रेफ्रिजरेटर के अलावा और कुछ तो है ही नहीं। घर बसाने के लिए वो इनको गिफ्ट मान ले और अपने साथ ले जाए। इससे वो बिना वजह के खर्चों से बच जाएगा, और दीदी भी सुख से रहेगी। अगर समीर ने दहेज़ का सामान लेने से मना कर दिया तो बिना वजह सभी का नुकसान होगा। इसी तर्ज पर दहेज़ वाली कार भी समीर को ही दे दी गई।

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विदाई के बाद नॉएडा आते आते दोपहर का लगभग एक बज गया। यह तय हुआ कि रिसेप्शन नॉएडा में ही करेंगे, लेकिन अगले महीने - अभी ऐसे आकस्मिक खर्चे के लिए पैसे नहीं थे। समीर के माँ बाप ने खर्चा अदा करने की पेशकश करी, लेकिन समीर ने मना कर दिया। वो अपने खर्चे पर रिसेप्शन समारोह करना चाहता था। लेकिन फिर उसके मम्मी डैडी ने समझाया कि इन कामों में देर नहीं करनी चाहिए। काफ़ी बहस और मनुहार के बाद तीन दिनों बाद नॉएडा में रिसेप्शन करने की रज़ामंदी हुई। चूँकि समीर और उसके माँ-बाप दोनों ही नॉएडा में ही रहते थे, इसलिए किसी भी तरह के समारोह के आयोजन में कोई खास दिक्कत नहीं आने वाली थी।

खैर, समीर के फ़्लैट पहुँच कर मीनाक्षी की पारम्परिक तरीके से ही द्वार पूजा करी गई। और समय होता तो मंगल गीत के साथ साथ बाजे भी बजवाए जाते! समीर की माँ हाथ में आरती का थाल लिए मीनाक्षी की आरती उतार रहीं थीं, और पड़ोस के घरों से कुछ औरतें वहीं दरवाज़े के बग़ल खड़ी हो कर समीर के ब्याह और नई बहू के विषय में चर्चा कर रही थीं। मीनाक्षी ‘अपने’ घर के दरवाजे पर आंखे झुकाए, सकुचाई सी अपने पति समीर के साथ खड़ी हुई थी। लाल रंग का लहँगा पहने और सोलह श्रृंगार किये मीनाक्षी का सौंदर्य मानों सब पर मोहिनी डाल रहा था... समीर तो उसकी ओर ही देखे जा रहा था। यह देखकर उसकी माँ की प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा। नवविवाहित दम्पति की आरती उतारने के बाद उन्होंने चावल से भरी चाँदी की लुटिया मीनाक्षी के आगे रख दिया। चावल की लुटिया को अपने दाहिने पैर से अंदर की ओर धकेलने के बाद मीनाक्षी समीर के साथ घर के अंदर एक कदम रखती है। उसी समय कामवाली महावर के घोल से भरी परात मीनाक्षी के आगे रख देती है। मीनाक्षी अपना पैर परात मे रखते हुए आगे बढ़ती है और फर्श पर अपने पैरों के लाल रंग के निशान बनाती हुई आगे बढ़ती है।

रस्में खत्म होने के बाद मीनाक्षी को उसके कमरे में ले जाया जाता है। कमरा साफ़ सुथरा, और एकदम चकाचक है। वहाँ शीशम का दीवान-नुमा बेड था। उस पर बोल्ड पैटर्न की चादर थी। कमरे में एयरकंडीशनर भी था। मीनाक्षी के मन में ख़याल आया कि प्रथम-दृष्टया रहन सहन में समीर उसके भाई जैसा नहीं है। इत्र की (रूम फ्रेशनर नहीं) सुगंध से कमरा महक रहा था। मीनाक्षी का निजी सामान उसी कमरे में ला कर रख दिया गया। समीर और उसकी माँ ने मीनाक्षी को आराम करने को कहा। कमरे का दरवाज़ा बंद कर उसने अपना घूंघट खोलकर चैन की सांस ली।

इस घर में आए हुए बस आधा घण्टा ही हुआ था, लेकिन मीनाक्षी को अभी से ही यहाँ अपना सा अहसास होने लगा था। यह उसका घर था... दो बड़े कमरे, दो बाथरूम, डाइनिंग हाल, ड्राइंग हाल, और दो बालकनी! और पूरा घर एक सादे कैनवास जैसा था। उसको जैसा मन करे, वैसा रंग वो भर सकती थी। यह एक ऐसी जगह थी, जहाँ प्रेम के इन्‍द्रधनुषी रंगों के शामियाने के नीचे उन दोनों की देहों के मिलन से सृष्‍टि सृजन को गति दी जा सकती थी।

यह सोच कर मीनाक्षी को झुरझुरी हो गई। समीर से सम्भोग.... यह तो उसने अभी तक सोचा भी नहीं था। लेकिन वो अभी कुछ सोचने की हालत में नहीं थी। विवाह और फिर यात्रा की थकान की वजह से कपड़े गहने उतारने की शक्ति अब उसमें नहीं बची थी। बिस्तर पर लेटते ही उसको नींद आ गई।

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“अच्छा, यह बताओ कि बहू को क्या पसंद है खाने में?” समीर की माँ ने उससे पूछा।

जवाब में वो सर खुजाने लगा।

“मतलब तुमको नहीं मालूम?”

“नहीं मम्मी।”

“उसके बारे में कुछ भी मालूम है? मतलब, नाम, शकलो-सूरत, और उसके घर के अलावा?”

जवाब में समीर की झेंपू मुस्कान निकल गई। उसकी माँ भी बिना हँसे न रह सकीं!

“बरखुरदार…. हमको तो लगा था कि तुमको वो पसंद है, तो कुछ तो जानकारी रखे होंगे! हा हा! तुम्हारी शादी! हा हहा! बढ़िया है। तुम्हारी मैरिड लाइफ मजेदार होने वाली है!”

“मुझे आदेश से जो मालूम हुआ, वो मालूम है।”

“अच्छा जी? क्या मालूम है?”

“मीनाक्षी को लिखना पसंद है। पोएट्री भी, और कहानियाँ भी। अखबार में अक्सर छपती है उसकी लिखी कहानियाँ!”

“हम्म्म! और क्या पसंद है?”

“हरा, पीला रंग! एक बार आदेश उसके लिए इसी रंग की ड्रेस खरीद रहा था।”

“गुड! मतलब पूरी तरह से भोंपू नहीं हो! और?”

“डांस करना।”

“अरे, खाने का कुछ मालूम है? या बहू को भूखे पेट ही नचवा दें?”

“खाने का नहीं मालूम! लेकिन आदेश को पुलाव, छोले, पराठे, पनीर की कोई भी डिश पसंद है।”

“मैगी पसंद है उसको?”

“किसको? आदेश को?” माँ ने हाँ में सर हिलाया।

“इसका मतलब तुमको मीनाक्षी को खाने में क्या पसंद है, नहीं पता। कोई बात नहीं, मैं अपनी ही पसंद का कुछ बना देती हूँ। और तू भी मेरी मदद कर दे। बहू जब सुनेगी कि तूने कुछ काम किया है, तो उसके मन में तेरे लिए कुछ प्रेम उमड़ आएगा।”

“क्या मम्मी!”

“क्या मम्मी वम्मी नहीं। तुम दोनों को ही मिल कर सम्हालनी है अपने जीवन की गाड़ी। कभी तुम उसकी, तो कभी वो तुम्हारी ऐसे ही सेवा कर दे, तो घिस नहीं जाओगे।”

“जो आज्ञा माते!” कह कर समीर ने जब माँ के सामने अपने दोनों हाथ जोड़े, तब दोनों ही खिलखिला कर हँसने लगे।

“तुम पायसम बनाओ। और मैं मलाई कोफ्ते, भिंडी दो प्याज़ा, पुलाव, रायता और पूरियाँ बना देती हूँ। बढ़िया रहेगा। हल्का भी, और फीस्ट भी! ठीक है?”

“मम्मी, मैं आपको इस बात के लिए क्या सलाह दूँ! सब बढ़िया है।”

“ठीक है फिर! रात का खाना बाहर खाएँगे। उसके लिए अभी से टेबल बुक कर लो।”

“जी!”

करीब तीन घंटे बाद जब खाना पक चुका, तब मीनाक्षी को उठाने के लिए समीर को भेजा गया।

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मीनाक्षी की नींद तब खुली जब दरवाज़े पर समीर ने हल्की सी दस्तक़ दी।

“मीनाक्षी, आप उठी हैं?”

समीर की आवाज़ सुन कर वो चौंकी और नींद से बाहर आई। पहले तो अपने आसपास के बदले हुए परिवेश को देख कर एक क्षण उसको घबराहट सी हुई, लेकिन अगले ही पल उसको याद आ गया कि वो कहाँ थी।

“जी” उसने लगभग चौंकते हुए जवाब दिया।

“खाने के लिए तैयार हो जाइए। लंच रेडी है!”

‘ओह्हो! कितनी देर सो गई मैं! बाप रे! साढ़े तीन घंटे!! ऐसे सोई जैसे सारे घोड़े बेच डाले हों! लंच भी इन लोगों से ही बनवा लिया! क्या सोचेंगे मेरे बारे में! बोलेंगे कि मैडम आई है ठाठ बैठाने!’ ऐसे कई ख़याल उसके मन में कौंध गए।

“जी ठीक है। मैं आती हूँ।” प्रत्यक्ष उसने कहा।

कितना भी जल्दी करने के बाद भी बाहर आते आते उसको कोई पंद्रह मिनट और लग गए। बहुत सोचा कि क्या पहने, लेकिन फिर उसने डिसाइड किया कि लहँगा पहनना ही ठीक रहेगा। लेकिन ज़ेवर अब कम थे। मेकअप भी इस समय हल्का सा ही था। नई नवेली दुल्हन सज-धज के ही अच्छी लगती है, उसको ऐसा माँ ने समझा दिया था।

बाहर आ कर उसने देखा कि बेड को छोड़ कर बाकी सारे फर्नीचर अपनी अपनी जगह व्यवस्थित कर दिए गए थे। समीर को अपनी नौकरी शुरू किये बस छः महीने ही हुए थे, इसलिए फर्नीचर तो बस नाम-मात्र ही था। उतना बड़ा घर, लेकिन खाली खाली! भूतिया सा माहौल रहता होगा रात में। अच्छा हुआ आदेश ने ज़ोर जबरदस्ती कर के सब सामान भिजवा दिया, नहीं तो समीर अपने आत्मसम्मान के चलते मीनाक्षी को ज़मीन पर ही बैठा देता! और अच्छी बात थी कि डाइनिंग टेबल भी दहेज़ में मिल गया था। इसलिए सभी को साथ बैठने में सहूलियत हो गई। नहीं तो ज़मीन पर बैठ कर खाना पड़ता।

“आओ बेटा, बैठो बैठो!” समीर के पिता जी ने कुर्सी से उठते हुए कहा, और साथ ही में डाइनिंग टेबल की एक कुर्सी को मीनाक्षी के लिए खींच भी दिया।

“माँ, आपने क्यों नहीं जगाया मुझे? सब खुद से ही कर लिया!” उसने ग्लानि भरी आवाज़ में शिकायत करी।

“अरे वाह! अगर जगाना ही होता, तो सुलाते क्यों तुम्हे? लड़कों का क्या है? ये तो जीन्स पहन कर ही ब्याह लाया तुम्हे! असली मेहनत तो दुल्हन की होती है! कभी हल्दी, कभी चन्दन, कभी मेहँदी, तो कभी तेल! और फिर भारी भारी कपड़े! कितने घण्टे सोई हो पिछले तीन दिनों में?” माँ ने प्यार से उसको समझाया।

“वैसे, सारा मैंने नहीं बनाया। कुछ तो तुम्हारे समीर ने भी बनाया है। बताऊंगी नहीं कि क्या! वो मैं तुम पर छोड़ देती हूँ गेस करने के लिए। और देख कर बताना, तुम्हारी पसंद का है सब या नहीं! इस बुध्धू को तुम्हारी पसंद ही नहीं मालूम!”

जैसा मैंने पहले भी कहा है कि औरतों, और आंसुओं का एक एक अटूट रिश्ता है। चाहे ख़ुशी हो चाहे दुःख, जब भी इनको निकासी का कोई रास्ता मिलता है, ये बाहर आने शुरू हो जाते हैं। और मीनाक्षी तो कल से भावनाओं के बारूद के भंडार पर बैठी हुई थी। प्रेम के दो शब्दों को सुनते ही उस भण्डार में विस्फ़ोट हो गया। और वो बिलख बिलख कर रोने लगी। समीर और उसके पिता जी को समझ नहीं आया कि अचानक उसको क्या हो गया। माँ पास ही खड़ी थीं, तो उन्होंने ही सम्हाला,

“अरे! बेटा क्या हो गया? हां? क्या हो गया बच्चे? मम्मी पापा की याद आ रही है?” माँ ने मीनाक्षी को अपने सीने से लगाते और उसके आँसूं पोंछते हुए कहा।

“समीर, बहू के घर फ़ोन तो लगा! हम भी कितने उल्लू हैं, इतनी देर हो गई यहाँ आये हुए, और समधियाने कॉल भी नहीं किया! वो भी घबरा रहे होंगे। मत रो बेटा! बस कराते हैं बात।”

मीनाक्षी का गला रूँध गया, और उसकी आवाज़ ऐसी भीगी कि गले से बाहर न निकल सकी। अब तो माँ को कैसे समझाए की उसको रोना अपने मायके के बिछोह के कारण नहीं, बल्कि ससुराल में मिलने वाले प्रेम के कारण आ रहा था।

‘ऐसे निष्कपट, स्नेही और सरल लोग! क्या वो सचमुच इतनी लकी है!’

“अरे फ़ोन लगा कि नहीं? ट्रंक कॉल लगा रहे क्या!” माँ ने समीर को उलाहना दी, “इधर बिटिया का रो रो कर बुरा हाल हो रहा है, और तुझसे एक छोटा सा काम नहीं हो पा रहा। जल्दी लगा।”

“मम्मी! आप भी न! अब मैं उड़ कर थोड़े ही कनेक्ट हो जाऊँगा! ऍम टी एन एल है, बिजी हो जाता है। लीजिए, घण्टी जा रही है।”

“हाँ, ला इधर,” कह कर माँ ने फ़ोन ले लिया और मीनाक्षी को पकड़ा दिया, “ले बेटा”

फ़ोन पर उस तरफ मीनाक्षी की माँ थीं, “कैसी हो बेटा?”

वो बोलती भी तो कैसे! आवाज़ तो निकल ही नहीं रही थी। उधर से रोने की आवाज़ सुन कर उसकी माँ भी घबरा गईं।

“तू ठीक तो है न बिट्टो?”

“हूँ” रोते रोते मीनाक्षी इतना ही बोल पाई।

“वहाँ लोग अच्छे हैं बेटा?”

“हूँ”

“तुम्हारा मन तो लग रहा है न?”

“हूँ” फिर थोड़ा संयत हो कर, “हाँ माँ!”

“सच में बेटा?”

“हाँ माँ। सच में! बस यूँ ही रोना आ गया। और मम्मी ने आपको कॉल कर दिया।” मीनाक्षी ने रोते रोते ही इतना कह दिया। वह यह तो नहीं कह पाई कि घर की बहुत याद आ रही है। और यह भी नहीं कह पाई कि उसको इतनी देर में ही इतना प्यार मिल गया है कि शायद घर की ‘उतनी’ याद न आए।

लेकिन उसकी माँ समझ रही थी। लोगों को परखने में गलतियाँ तो होती हैं, लेकिन कोई ऐसे ही, बिना जाने, बिना देखे, बिना मांगे, बिना जांचे अपने एकलौते लड़के की शादी किसी भी लड़की से नहीं कर देता। खास तौर पर तब, जब वो लड़का समीर के जैसा हो।

“पापा कैसे हैं माँ? अभी तक रो रहे हैं?” पीछे से अपने पिता के सिसकने की आवाज़ सुन कर मीनाक्षी ने सुबकते हुए पूछा।

“सब लोग ठीक हैं बेटा! तुम यहाँ की चिंता मत करो। हम सब खुश हैं।” फिर कुछ सोचते हुए माँ ने कहा, “बेटा… देखो। वो बहुत अच्छे लोग हैं। तुझे बहू नहीं, बेटी बनाकर रखेंगे। बस तुम कोई गलती मत करना!”

“हाँ माँ!”

“एक बार अपनी मम्मी से भी बात करवा दे।”

मीनाक्षी ने फोन अपनी सास को पकड़ा दिया, और समीर का इशारा देख कर कुर्सी पर बैठ गई। समीर ने उसकी आँखों में दो क्षण देखा और पूछा, “क्या हो गया आपको?”
 
“कुछ नहीं,” उसने सुबकते हुए और आँसूं पोंछते हुए कहा, “कुछ भी नहीं।”

उधर समधियों और समधनों में कोई पांच मिनट और वार्तालाप हुआ। तब जा कर लंच शुरू हो पाया।

“अमाँ बरख़ुरदार, क्या खुद खाए ले रहे हो!” समीर जैसे ही पहला निवाला लेने को हुआ, उसके डैडी ने उसको टोंका, “इतने क्रान्तिकारी तरीके से बहू को ब्याह कर लाए हो, कम से कम अपने हाथ से पहला निवाला उसको खिलाओ! चलो चलो! शाबाश!”

“हाँ! लेकिन एक सेकंड! ज़रा खिलाते हुए तुम दोनों की एक फ़ोटो तो निकाल लूँ,” कह कर उसकी माँ लपक कर अपने पर्स से छोटा सा कैमरा निकाल लिया और उसको ‘ऑन’ कर के बोलीं, “हाँ, प्रोसीड!”

समीर ने पूरी का पहला निवाला मीनाक्षी के थोड़े से खुले मुँह में डाल दिया।

“बिटिया, इस घर में सब दबा के खाते हैं! खाने में संकोच मत करना!” ये उसके पिता जी की टिपण्णी थी। उनकी बात पर मीनाक्षी बिना मुस्कुराए नहीं रह सकी।

जब लेन-दारी होती है, तब देन-दारी भी होती है। मीनाक्षी ने भी पूरी का एक टुकड़ा कोफ़्ते में अच्छी तरह डुबा कर समीर की तरफ बढ़ा दिया। समीर ने बड़ा सा मुँह खोल कर निवाला तो ले ही लिया, साथ में उसके हाथ को भी काट लिया।

फोटो खींचते हुए उसकी माँ ने कहा, “देखा बेटा? सब दबा के खाते हैं! तुमने इतना बड़ा निवाला दिया, फिर भी तुम्हारे पति को तुम्हारा हाथ भी खाने को चाहिए!”

इस बात पर मीनाक्षी की मुस्कान और चौड़ी हो गई।

“तू रहने दे इसको खिलाने को! पता चला, इस लंच में ही तेरा हाथ खा गया! हा हा हा हा!”

जब मीनाक्षी ने सारे पकवान एक एक बार चख लिए, तो माँ ने पूछा, “गेस कर सकती हो कि तुम्हारे समीर ने क्या क्या बनाया है इसमें से?”

“जी, खीर?” मीनाक्षी से शर्माते, सकुचाते अंदाज़ा लगाया। उसने सोचा मीठा पकवान है। तो शायद यही हो।

“अरे! बिलकुल ठीक! ज़िद कर रहा था कि मम्मी, अपनी बीवी के लिए मीठा तो मैं ही बनाऊँगा!” माँ ने अपनी तरफ़ से बढ़िया मसाला लगा कर कहानी बना दी, “और ये पुलाव और रायता भी इसी ने तैयार किया है। तुम घबराना नहीं! मेरा बेटा जानता है खाना पकाना। तुमको सब अकेले करने की ज़रुरत नहीं है।”

मीनाक्षी हैरान थी। सचमुच हैरान!

‘हे प्रभु! ऐसे लड़के होते हैं क्या! ऐसे परिवार होते हैं क्या! बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा! हे प्रभु, बस ऐसी ही दया बनाए रखना!’

उसने मुस्कुराते हुए अपनी बड़ी बड़ी आँखें उठा कर समीर को प्रेम से देखा।

पहली बार उसके मन में लाचारी के भाव नहीं थे। पहली बार उसके मन में दुःख के भाव नहीं थे। पहली बार उसके मन में हीनता के भाव नहीं थे। पहली बार उसके मन में अज्ञात को ले कर भय के भाव नहीं थे। पहली बार उसके मन में समीर के लिए आभार का भाव था। पहली बार उसके मन में समीर के लिए प्रशंसा का भाव था। पहली बार उसके मन में समीर के लिए गर्व का भाव था। पहली बार उसके मन में समीर के लिए प्रेम का भाव था।

जब भोजन हो गया, तब माँ ने उससे पूछा, “बेटा, तुमने इतना भारी भरकम कपड़े क्यों पहने हुए हैं? मुझको गलत मत समझ - प्यारी तो तू खूब है ही, और प्यारी तो खूब लग भी रही है। लेकिन अब ये तेरा घर है। यहाँ तुझे पूरी स्वतंत्रता है। तुझे जो पहनना है पहन, जैसे रहना है रह। हमारी परवाह न करना। हमको तो गुड़िया चाहिए थी, वो मिल गई।”

“जी मम्मी।”

“क्या पहनती है तू अक्सर?”

“जी शलवार सूट!”

“लाई है साथ में?”

उसने ‘न’ में सर हिलाया।

“अरे! तो फिर?”

“जी, बस साड़ियां ही हैं! ‘वहाँ’ कह रहे थे कि बहुएँ साड़ी में ही अच्छी लगती हैं।” वहाँ की बात सोच कर मीनाक्षी के मन में फिर से टीस उठ गई।

“बेटा, समझ सकती हूँ! लेकिन तुम ‘वहाँ’ नहीं, ‘यहाँ’ हो अब! हमारे यहाँ साड़ी पहन कर, सर ढक कर रहने की ज़रुरत नहीं। और सब काम खुद करने की जरूरत नहीं। तुमको शलवार सूट में सहूलियत होती है, तुम वही पहनो।”

‘एक और ख़ुशी की बात! हे प्रभु, यह सब कोई सपना तो नहीं है?’ मीनाक्षी को मन ही मन बहुत खुशी हुई।

“देख, अभी करीब तीन बज रहे हैं। चल, तुझे शॉपिंग करवा लाती हूँ। यहाँ घर में बैठे बैठे क्या करोगी?’

“पर माँ!”

“अरे, पर वर कुछ नहीं! ऐसे आप धापी में आना पड़ा। न तेरे लिए कुछ ला पाए, न कुछ दे पाए। अभी रिसेप्शन में तेरे मायके से सभी आएँगे, तो उनके लिए भी गिफ्ट्स ले लेंगे! और मैं भी जरा अपने लिए कुछ… समझा कर यार!” माँ ने फुसफुसाते हुए, जैसे वो मीनाक्षी से कोई सीक्रेट प्लान शेयर कर रही हों, वैसे कहा।

इस बार मीनाक्षी से रोका नहीं गया, और उसके गले से हल्की सी हँसी छूट गई।

“हाँ! ऐसे ही हँसती खेलती रह! तू बहू है हमारी… नहीं, बहू नहीं, बेटी है। तेरे मन का ख्याल रखना हमारा फ़र्ज़ है। आज हम तेरा ख्याल रखेंगे, तुझे समझेंगे, तो कल को शायद तू भी हमें समझ कर हमारा ख्याल रखेगी। रिश्ते ऐसे ही तो बनते हैं!”

“माँ” कह कर मीनाक्षी उनसे लिपट गई, “मैंने कुछ बहुत अच्छा किया है पिछले जनम में, तो आप मुझे मिल गईं!”

“मैंने भी!” कह कर उन्होंने उसको लिपटा लिया और उसके सर पर प्रेम से हाथ फेरने लगीं।

“चल, अब ये लहँगा चेंज कर ले, और कोई हल्की साड़ी पहन ले। यहाँ पैदल चल कर शॉपिंग करने में बहुत मज़ा आता है।”

जब दोनों बाहर जाने को तैयार हो गईं तो समीर के डैडी ने कहा, “अरे! किधर को चली सवारी?”

“अट्ठारह! ज़रूरी शॉपिंग करनी है। आप लोग बियर के मज़े लीजिए। और आज के डिनर, और परसों के रिसेप्शन के इंतजाम की जिम्मेदारी आपकी।”

“यस मैडम!” कह कर डैडी ने सल्यूट मारा।

रास्ते में उन्होंने मीनाक्षी को अपनी शादी, समीर के जनम और बचपन की कहानियाँ सुनाईं। उन्होंने मीनाक्षी को यह भी बताया कि रहते वो पास में ही हैं, लेकिन समीर अपने तरीके से रह पाए, इसलिए वो अलग रहते हैं। इसी चलते उसको ज़िम्मेदारी और स्वाभिमान का इतना भाव है। और सबसे अच्छी बात यह है कि अब मीनाक्षी भी उसके साथ रहेगी। उनका मानना था कि शादी होने के साथ, लड़का लड़की साथ में, अकेले रहने चाहिए। बिना किसी भी तरफ के परिवार के किसी भी तरह के प्रभाव के! तब एक दूसरे के लिए समझ, आदर और पारस्परिक अंतर्ज्ञान - यानि इंटिमेसी आती है, जो सफ़ल और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए बहुत ज़रूरी है। फिर उन्होंने उसको बताया कि समीर के डैडी एक सरकारी कंपनी के लिए सप्लायर हैं, और भगवान की कृपा से अच्छी आय हो रही है। वो स्वयं भी एक बैंक में मैनेजर हैं।

दुकानों पर जा कर उन्होंने मीनाक्षी के लिए रोज़मर्रा के, और खास अवसरों के लिए शलवार कुर्ते खरीदे। फिर मॉल में जा कर ज़िद कर के उसके लिए जीन्स, टी-शर्ट्स, और शॉर्ट्स और ख़ास नाइटियाँ भी ख़रीदीं। फिर अधोवस्त्रों की एक स्पेशिलिटी स्टोर में जा कर ब्राइडल लॉन्जेरे के दो सेट भी ज़बरदस्ती खरीदवाए। मीनाक्षी शर्म के मारे खुद कुछ नहीं पसंद कर रही थी, इसलिए उन्होंने खुद ही उसके लिए सेलेक्ट कर लिया। उन्होंने कहा की नई नई शादी में सेक्सी दिखना बहुत ज़रूरी है।

यह खरीददारी करने के बाद उन्होंने मीनाक्षी को आज रात की डिनर पार्टी के लिए खरीदे गए ख़ास शलवार कुर्ते को पहनने को कहा। मीनाक्षी के न-नुकुर करने पर उन्होंने समझाया कि वो दोनों वापस घर नहीं जा रहे हैं। यहीं ख़रीद फ़रोख़्त करने के बाद वो बगल रैडिसन ब्लू में डिनर करने वाले हैं परिवार के साथ, और फिर वहाँ से वो और डैडी अपने घर चले जाएँगे। उनके आज ही चले जाने की बात सुन कर मीनाक्षी थोड़ा उदास हो गई, लेकिन उसने माँ से वायदा लिया कि हर रोज़, कम से कम डिनर के लिए वो इधर आते रहेंगे। सबसे अंत में एक पारंपरिक दुकान में जा कर उन्होंने समधियों के लिए कपड़े लत्ते खरीदे। माँ ने खुद के लिए कुछ भी नहीं लिया। कहने लगीं कि अगर वो यह बहाना न करतीं, तो मीनाक्षी न आती। जो शायद सही भी था।
 
इतनी ख़रीददारी करने में अच्छा खासा समय लग गया। रात के कोई साढ़े आठ बजे वो दोनों रैडिसन ब्लू पहुँचे। वहाँ जा कर देखा तो बाप बेटे काजू के साथ एक राऊण्ड पहले ही मार चुके थे, और दूसरा शुरू कर रहे थे।

“बेटी,” माँ ने सफाई दी, “अगर शराब पीने को बुराई मानती हो, तो बस यही बुराई है समीर में। और कोई नहीं।”

“नहीं माँ! बस पी कर लुढ़क न जाते हों,” मीनाक्षी ने मुस्कुराते हुए समीर को छेड़ा।

“हा हा हा हा!” डैडी ठहाके मार कर हँसने लगे, “जवाब दो बरखुरदार! कितनी बार लुढ़के?”

“अब नहीं लुढ़कूंगा! पक्का वायदा!” समीर ने कान पकड़ते हुए कहा।

डिनर शानदार था। समीर और उसके पिता जी ने शर्ट, जीन्स और ब्लेज़र पहना हुआ था। दोनों ही बहुत स्मार्ट और हैंडसम दिख रहे थे। मीनाक्षी ने अपनी सास को कनखियों से देखा तो उनको अपने पति को प्रेम से देखता हुआ पाया। शादी के इतने वर्षों बाद भी ऐसी प्रगाढ़ता, ऐसा प्रेम देख कर वो मुस्कुरा उठी। उसके मन में वैसे ही रहने की तमन्ना हो आई। वेटर को बुला कर चारों की एक साथ कई सारी तस्वीरें खिचाई गईं। डिनर समाप्त होने पर समीर के माँ बाप दोनों वापस अपने घर को चल दिए, जिससे नव-विवाहितों को थोड़ी प्राइवेसी मिल सके। जाते समय मीनाक्षी ने उन दोनों के पैर छुए।

“सीख कुछ,” उसके पिता जी ने कहा, “बहू से कुछ सीख!”

“डैडी! आप भी न, मेरी फजीहत करते रहते हैं!” समीर ने उनके और माँ के पैर छूते हुए कहा, “वो तो बीवी के सामने इम्प्रैशन झाड़ने के लिए कर रहा हूँ, लेकिन रोज़ रोज़ नहीं करूँगा!”

“पता है! बेटी, तुमको भी इतनी फॉर्मेलिटी करने की ज़रुरत नहीं। हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। हमेशा। अच्छा, शुभ रात्रि!”

जब तक मीनाक्षी और समीर घर वापस आए, रात के साढ़े दस बज गए थे।

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घर आकर मीनाक्षी ने देखा कि पूरा घर अच्छी तरह से व्यवस्थित हो गया था। दहेज़ का बेड अब उनके बेडरूम में था, और वहां का बेड दूसरे, छोटे बेडरूम में। अलमारी भी वहीँ व्यवस्थित कर दी गई थी, और उसके सूटकेस को एक ओर जमा दिया गया था। समीर ने आज खरीदा हुआ सामान नई अलमारी में ला कर रख दिया, और फ्रेश होने बाथरूम चला गया। वो क्या करे, उसे कुछ समझ नहीं आया। इसलिए वो नए बिस्तर पर आ कर बैठ गई।

मीनाक्षी बिस्तर पर बैठी हुई अपने आसन्न भविष्य के बारे में सोच रही थी। वो थोड़ा भयभीत भी थी - समीर को लेकर उसके मन में उठने वाले विचार वैसे तो सकारात्मक थे, लेकिन उसके व्यवहार को लेकर वो पूरी तरह से अनिश्चित थी। न जाने क्या करेगा वो! एक पूर्ण अपरिचित आदमी से शादी! यह सोच कर उसको वापस सिहरन होने लगी।

‘क्या करूँ मैं!’ यह एक ऐसा प्रश्न था, जिसका उत्तर उसके पास नहीं था। शायद किसी के पास भी नहीं था। कुछ समय आप ऐसी परिस्थितियों में पड़ जाते हैं, जिनका कोई हल आपके पास नहीं होता। मीनाक्षी के लिए यह वैसी ही परिस्थिति थी। उसके दिमाग में एक बात बार बार कौंध रही थी,

‘इतना तो तय था कि समीर इस विवाह को पूर्ण करना चाहेगा। सुहागरात और किसलिए कहते हैं इस रात को? सुहाग की रात! हुंह! जैसे बीवी की कोई रात ही नहीं! खैर, सामाजिक बातों के बारे में क्या टिप्पणी करी जाए। अभी तो मेरी हालत ओखली में पड़े अनाज जैसी है, जिस पर मूसल पड़ने ही वाला है। क्या मैं उसको आज कुछ भी करने से मना कर दूँ? बोल दूँ कि सर में दर्द है? लेकिन, अगर वो नाराज़ हो गया तो? सुना है कि लड़के अपनी शादी की पहली रात में खुद को रोक नहीं पाते। ओह्ह भगवान मैं क्या करूँ? शादी की शुरुआत खट्टे मन से तो नहीं कर सकते न!’

मीनाक्षी इन्ही सब उधेड़बुन में हुई थी, कि कमरे का दरवाज़ा खुला। इसके साथ ही मीनाक्षी का कलेजा मुँह में आ गया। उसकी साँसें तेज हो गयीं। समीर के क़दमों की आहट से मीनाक्षी के रोंगटे खड़े हो गए। मीनाक्षी ने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं और शांत और संयत होने का दिखावा करने लगी। मीनाक्षी कनखियों से देख रही थी - समीर दरवाज़े के समीप आ कर रुक गया था। फिर भी उसकी हिम्मत नहीं पड़ी कि समीर की तरफ देखे।

“मीनाक्षी? सुनिए?” समीर की आवाज़ बहुत ही संयत थी। मीनाक्षी ने अभी भी उसकी तरफ नहीं देखा। वो जैसे बिस्तर में ही गड़ी जा रही थी।

“मैं बगल वाले कमरे में सोने जा रहा हूँ।”

समीर कुछ देर तक मीनाक्षी की किसी भी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करता रहा।

‘अगर तुम्हारा पति तुम्हारे साथ न सोना चाहे, तो तुम पत्नी के कर्तव्य निभाने में फेल हो गई समझो।’ माँ की कही यह बात मीनाक्षी के जेहन में गूँज उठी। फिर भी उसने ऊपर नहीं देखा; बस चुपचाप बिस्तर में गड़ी बैठी रही।

“आप पूछेंगी नहीं कि क्यों?” समीर ने कहा।

इस बार उसकी आवाज़ में थोड़ा सा चुलबुलापन था। थोड़ी सी अधीरता थी। शायद वो मीनाक्षी को प्रसन्न चित्त करना चाहता था। इसका मीनाक्षी पर सकारात्मक प्रभाव हुआ। उसने समीर को देखा - तीन चार सेकंड। बस। उसके बाद फिर से गर्दन नीचे!

“आप मेरी पत्नी हैं। माई बेटर हाफ!” उसने कहा, “कोई प्रॉस्टिट्यूट नहीं।”

मीनाक्षी को समझ नहीं आया कि समीर क्या कह रहा है। उसका दिमाग पहले ही इतनी सारी अप्रत्याशित घटनाओं के जल्दी जल्दी घट जाने से भ्रमित था। ऊपर से सुहागरात का डर! उसको समीर की बात समझ नहीं आई, और इसलिए उसने खामोश रहना ही मुनासिब समझा। मीनाक्षी की मुश्किल समीर ने ही सुलझा दी।

“मीनाक्षी, हम एक दूसरे को जानते तक नहीं हैं। अब ऐसे में अगर हम बाकी शादी-शुदा लोगों के जैसे बिहेव करेंगे तो हमारा क्या नाता रहेगा? उसके (क्लाइंट और प्रॉस्टिट्यूट के नाते के) अलावा? लेकिन यह सब हमेशा ऐसे नहीं रहेगा - एक दिन हम भी साथ में होंगे, और वो सब कुछ करेंगे जो शादी-शुदा जोड़े करते हैं। लेकिन उस दिन मैं अपनी पत्नी से प्यार करूँगा - सेक्स नहीं - प्यार! और उस दिन आप अपने पति से प्यार करेंगी!” अपनी बात का प्रभाव देखने के लिए समीर थोड़ा रुका, फिर आगे बोला, “एक अजनबी से सेक्स… न बाबा, मुझसे नहीं हो पाएगा!”

इतना कह कर समीर वापस जाने के लिए मुड़ गया। फिर एक क्षण के लिए ठिठका। अपने मज़ाकिया लहज़े में वो फिर बोला, “बाई दी वे, मैं कोई गे नहीं हूँ! सोचा कि क्लैरिफाई कर दूँ!”

और जाते जाते बोला, “और मुझे ख़र्राटे भी आते हैं!”

इतने तनाव और भय से त्रस्त होने के बाद भी मीनाक्षी को इस बात पर हंसी आ गई। समीर के चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कराहट थी; उसने एक दो क्षण मीनाक्षी की तरफ देखा, और फिर दूसरे कमरे में चला गया। मीनाक्षी बिस्तर पर लेट गई - उसने न तो अपने कपड़े बदले, न ज़ेवर उतारे और न ही अपना मेक-अप ही साफ़ किया। जब उसने अपना सर तकिए पर रखा तो उसकी आँखों से आँसू आ गए।
 
अक्सर लोगों को हैरानी होती है कि औरतें जब खुश होती हैं, तो भी कैसे रोने लगती हैं? लोगों से मेरा मतलब है आदमी लोग। सच में आदमियों को औरतों का ऐसा व्यवहार नहीं समझ आया; लेकिन औरतों को समझ में आता है। जब औरतें अपने अंदर कुछ ऐसा महसूस करती हैं, जिसको अपने अंदर बाँध कर नहीं रख सकती हैं, तो ऐसा हो सकता है। उसी तर्ज पर, अगर ख़ुशी बहुत अधिक हो जाए, तो बहुत सी महिलाओं के लिए आँसू बहाना ज्यादा बलवती अभिव्यक्ति हो जाती है।

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नींद नहीं आई उसको। बहुत देर तक। कान की टकटकी बाँधे हुए वो बहुत देर तक बगल वाले कमरे से कोई आवाज़, कोई आहट सुनने की कोशिश करती रही। लेकिन कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी। जब घड़ी देखी, तो रात के पौने दो बज रहे थे। अभी भी नींद नदारद। आख़िरकार उससे रहा नहीं गया, और वो उठ कर, अपने कमरे का दरवाज़ा खोल कर, बगल वाले कमरे में चली आई।

इस कमरे में एसी नहीं लगा हुआ था। एक पंखा था, जो फुल स्पीड पर चल रहा था। खिड़की भी खुली थी, और दरवाज़ा भी। लेकिन फिर भी मई की गर्मी पर कोई असर नहीं था। वो दबे पाँव चलते हुए समीर के बेड तक आई। आँखों पर अधिक ज़ोर नहीं डालना पड़ा - कमरे भी बाहर से हल्की रौशनी आ रही थी। समीर एक करवट में लेटा हुआ था। उसने एक निक्कर पहना हुआ था। उसकी पीठ पर पसीने की बूँदें साफ़ दिख रहीं थीं। गहरी नींद में सांस भरने की जैसी आवाज़ें आती हैं, वैसी ही आवाज़ें आ रही थीं। ख़र्राटे तो बिलकुल भी नहीं भर रहा था वो।

‘झूठी कहानी’ मीनाक्षी ने मुस्कुराते हुए सोचा, लेकिन अगले ही क्षण उसको ग्लानि भी महसूस होने लगी, ‘मुझको एसी में सुला कर, यहाँ गर्मी में सो रहे हैं।’

वो उधेड़बुन में पड़ गई, कि वो क्या करे! समीर को जगा ले, और अपने साथ सोने को कह दे? साथ सोने का मतलब सम्भोग करना तो नहीं होता। कम से कम वो आराम से सो तो सकेंगे! मन में बहुत हुआ कि वो उसको उठा ले, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई। न जाने क्या सोच रही थी। कई बार आपको मालूम होता है कि क्या करना चाहिए, लेकिन फिर भी आप वो काम करते नहीं। कई कारण होते हैं - झिझक, डर, शर्म इत्यादि! बस, वैसी ही हालत मीनाक्षी की भी थी। बहुत सोचने के बाद वो वापस अपने कमरे में आ गई और बिस्तर पर लेट गई। रोने का मन तो हुआ, लेकिन रो न सकी। और इसी उधेड़बुन में आँख कब लग गई, पता ही नहीं चला।

सुबह हुई तो मीनाक्षी की आँख खुली - भूख लगी थी। उसने दैनिक नित्यकर्म किये और रसोई की तरफ चली की कुछ बना लिया जाए। लेकिन अंदर का नज़ारा देख कर वो आश्चर्यचकित हो गई - रसोई के अंदर समीर पहले से ही मौजूद था, और ब्रेकफास्ट के लिए सैंडविच और चाय उसने लगभग बना ही ली थी। मीनाक्षी के चेहरे पर न जाने कैसे एक्सप्रेशन्स थे कि समीर घबरा सा गया।

“आप ठीक हैं?” उसकी बात में मीनाक्षी के लिए चिंता साफ़ सुनाई दे रही थी।

‘अरे बिलकुल ठीक हूँ.. लेकिन खाना पकाने का काम तो मेरा है’ मीनाक्षी ने मन में सोचा।

“आप क्यों नाश्ता बना रहे हैं?” प्रत्यक्ष में उसने कहा।

“मतलब?” समीर को जैसे कुछ समझ नहीं आया।

“मतलब मुझे उठा लेते। आप क्यों करने लगे? यह तो मेरा काम है!”

“ओह! अच्छा अच्छा! अरे, आप सो रही थीं, इसलिए डिस्टर्ब नहीं किया। मैं वैसे भी काफ़ी जल्दी उठ जाता हूँ। और, मुझे कुकिंग करना बहुत पसंद है! इसलिए आप ऐसे मत सोचिये कि यह काम आपका है, और वो काम मेरा। डिवीज़न ऑफ़ लेबर जैसा कुछ नहीं है यहाँ! हा हा हा। जब भी आपका मन हो, आप बना लीजिए। जब भी मन हो, मैं बना लूँगा। अच्छा लगे, तो साथ में!” कह थोड़ा सा मुस्कुराया और फिर आगे बोला, “वैसे डिनर तो आज मैं ही बनाऊँगा - शाही पनीर और आलू पराठा! आदेश ने बताया है… आपका फेवरेट! साथ में मेरी माँ के हाथ का बना सिरके वाला आम का आचार। खूब मज़ा आएगा।”

मीनाक्षी फिर भी अनिश्चित सी खड़ी रही - वो कुछ कहना चाहती थी, लेकिन कह नहीं पा रही थी।

समीर ने आधिकार भरी आवाज़ में कहा, “आप मेरी गुलाम नहीं, बल्कि मेरी पत्नी हैं!” उसने प्यार से एक दो क्षण मीनाक्षी की तरफ देखा और कहा, “चलिए, नाश्ता कर लेते हैं! केचप मुझे पसंद नहीं। आम, धनिया और पुदीने की खट्टी-मीठी चटनी बनाई है। अगर टेस्टी न लगे, तो आगे से केचप रखा करूँगा।”

हतप्रभ सी मीनाक्षी रसोई से बाहर निकल आई। बहुत मुश्किल से उसने आँसुओं को बाहर आने से रोका।

‘क्या क्या सोच रही थी मैं!’

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नाश्ते करते समय मीनाक्षी बहुत चुप सी थी।

उसको अपनी ही सोच पर ग्लानि हो रही थी - ‘कैसी छोटी छोटी बातों को लेकर मैं चिंतित थी! कैसा छोटा मन है मेरा! मम्मी डैडी तो इतना चाहते है मुझे कि मेरे खुद के माँ बाप भी शायद हार मान लें! इतना प्रेम! सच में, इस घर में मैं बहू नहीं, बेटी के जैसे हूँ। प्रभु ने कुछ सोच कर ही मुझे इस घर में भेजा होगा। वो कहते हैं न, ‘जोड़ियाँ तो भगवान् ही बनाते हैं’... और जब भगवान् ने मेरे लिए समीर को चुना है, तो फिर मुझे शंका क्यों होनी चाहिए? ऐसा भाग्य!

और इनको देखो - मेरी हर बात की फ़िक्र है इनको। मुझे आराम मिले, इसलिए मुझे एसी वाले कमरे में सुलाते हैं, और खुद गर्मी में सो जाते हैं! ज़रा सोच! कल वो चाहते, तो कुछ भी करते। मैं क्या कर पाती? उनको मना तो न कर पाती। अब तो मेरे पूरे अस्तित्व पर उनका ही अधिकार है। लेकिन देखो! कैसी मर्यादा! कैसा आत्म-नियंत्रण! और मुझे देखो! जूते मोज़े जैसी निरर्थक बातों को सोच कर परेशान हो रही थी। ऐसा पति तो प्रभु मेरे दुश्मनों को भी देना। उनकी संगत में आ कर दुश्मनों की दुष्टता भी ख़तम हो जाएगी।’

“क्या हो गया आपको? इतनी चुप-चाप? क्या गड़बड़ बना है? सैंडविच या चाय?”

“कुछ भी गड़बड़ नहीं है! दोनों बहुत स्वादिष्ट बने हैं!” मीनाक्षी विचारों के भँवर से निकल कर समीर की तरफ़ मुखातिब होती है।

“घर की याद आ रही है?”

मीनाक्षी ने ‘न’ में सर हिलाया। फिर से उसकी आँखों में आँसू भरने लगे।

समीर को एक पल समझ नहीं आया कि वो क्या करे, या क्या कहे।

“एक काम करते हैं, आपके लिए एक फ़ोन और नया नंबर ले लेते हैं। आज ही। कम से कम घर बात करने में सहूलियत रहेगी। ठीक है?”

जिस समय की यह बात है, उस समय मोबाइल फोन का चलन बहुत कम था। अभी अभी सर्विस प्रोवाइडर्स ने इनकमिंग कॉल्स पर से चार्ज लेना बंद किया था। मीनाक्षी ने कुछ कहा नहीं। वो उसको कैसे समझाए कि इन में से किसी भी बात को लेकर वो दुःखी नहीं है। वो अपनी सोच, और अपने व्यवहार से दुःखी है।

“शाम को मम्मी डैडी भी आ जाएँगे।”

उनका जिक्र आते ही मीनाक्षी मुस्कुरा उठी, “वो जाते ही क्यों हैं? यही क्यों नहीं रुक जाते!”

“अरे, उनका घर है अपना। दोनों बहुत इंडिपेंडेंट हैं। और मुझे भी कहते हैं कि इंडिपेंडेंट रहो। ऐसा नहीं है कि वो मुझे सपोर्ट नहीं करते, लेकिन फाइनल डिसीजन मेरा ही रहता है। और वो मेरी हर डिसीजन को सपोर्ट करते हैं।”

“आप लकी हैं बहुत! ऐसे माता पिता बहुत भाग्य वालों को मिलते हैं।”

“आपके माँ बाप भी तो अच्छे हैं!”

“हाँ! अच्छे हैं। लेकिन लड़की के माँ बाप होने का बोझ रहा है उन पर। हमेशा से। और हम लोग ट्रेडिशनल भी बहुत हैं। इस कारण से आदेश और मुझमे बहुत अंतर है।”

“हाँ! वो तो है! आप आदेश से बहुत अधिक अच्छी हैं!”

“मुझे पता नहीं आप मुझे कितना अच्छा समझते हैं। लेकिन मैं कोशिश करूँगी कि मैं जितना पॉसिबल है उतनी अच्छी बन सकूँ!”

समीर ने ‘न’ में कई बार सर हिलाया, “आप जैसी हैं, वैसी रहना! कुछ मत बदलना।” और कह कर मुस्कुरा दिया। थोड़ी देर सोचने के बाद वो बोला,

“सोच रहा हूँ, एक बार ऑफिस हो आता हूँ। वहाँ किसी को ख़बर नहीं है कि मैं दो दिन से क्यों नहीं आ रहा हूँ।”

“जी, ठीक है।”

“सोच रहा था कि आप भी चलिए! सबसे आपका परिचय भी करवा दूँगा और रिसेप्शन के लिए इनवाइट भी कर लूँगा।”

“जी” वो कम से कम समीर की इच्छाओं का पालन तो कर ही सकती थी।

“बहुत बढ़िया! मैं जल्दी से तैयार हो जाता हूँ! कार से चलेंगे! हा हा हा हा!” समीर ने ऐसे कहा जैसे वो अपने दोस्तों को दहेज़ की कार दिखाना चाहता हो। लेकिन मीनाक्षी जानती थी कि दरअसल वो उसके खुद के आराम के लिए उसको कार में ले जाना चाहता था।

“क्या भाई समीर, सब ठीक तो है?”

“यस सर! सब ठीक है।”

“दो दिनों से कोई खबर नहीं मिली तुम्हारी तो चिंता हुई। आज तक कोई छुट्टी ली नहीं न तुमने। इसलिए।”

“सर, एक बात कहनी थी आपसे।”

“हाँ, बोलो। क्या हो गया?”

“सर, मैंने शादी कर ली है।”
 
“क्या? बहन**! और बताया भी नहीं! ऐसे चुपके चुपके कोई शादी करता है क्या!” समीर के बॉस ने नाराज़गी दिखाते हुए कहा।

“अरे सर, गया तो था एक फ्रेंड की सिस्टर की शादी में, लेकिन मैं खुद ही उसको ब्याह कर ले आया!” समीर ने हँसते हुए बताया।

“क्या! क्या कह रहे हो! बेन**! साला, ये तो बहुत इंटरेस्टिंग स्टोरी बनती जा रही है। रुक, कांफ्रेंस रूम में बैठ कर आराम से बात करते हैं।”

“अरे रामसिंह,” बॉस ने ऑफिस के अर्दली को आवाज़ लगाई, “दो बढ़िया चाय मँगाओ। ज़रूरी मीटिंग है।”

अगले डेढ़ घण्टे तक समीर अपने बॉस को अपनी शादी का अनूठा किस्सा सुनाता चला गया। बॉस भी किंकर्तव्यविमूढ़ हो, सब सुनता चला गया। उसको यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई ऐसा कुछ कर सकता है। बीच बीच में वो समीर से ढेर सारे सवाल भी पूछता जा रहा था। जब उसकी यह जिरह पूरी हुई तो उसने समीर से कहा,

“यार, तू गज़ब है! सच में! मेरी नज़र में तुम्हारे लिए आज रेस्पेक्ट बढ़ गई है! बहुत अच्छा काम किया! उम्मीद है कि तुम दोनों सुखी रहो!”

“थैंक यू सर! मीनाक्षी को लाया हूँ साथ में!”

“अरे! तू उसको अकेले छोड़ कर यहाँ मेरे साथ गप्पें लड़ा रहा है? वो बेचारी ऐसे ही नीचे बैठी हुई है! अजीब चू** हो! अरे, बुलाओ उसको।”

अगला एक और घण्टा ऑफिस में लोगों से मिलने, बधाइयाँ लेने, उनको रिसेप्शन के लिए आमंत्रित करने और चाय पीने में बीत गया। कितने ही लोगों ने मीनाक्षी को ‘कितनी प्यारी है’ कर के सराहा। जाते जाते बॉस ने उसको बोला कि वो अटेंडेंस की चिंता न करे। रिसेप्शन के दिन तक फुल अटेंडेंस लगा दी जाएगी। और समीर का जब मन करे वापस आए। ऑफिस से जैसा हो सकेगा, उसको सपोर्ट किया जाएगा। समीर ने उसको कहा कि फिलहाल तो उसको छुट्टी की ज़रुरत नहीं, लेकिन जब एकमुश्त छुट्टी की ज़रुरत होगी, तो वो पहले ही बता देगा।

शादी का रिसेप्शन दिखावे में भले ही कम रहा हो, लेकिन मौज मस्ती में अव्वल नंबर था।

मीनाक्षी ने एक रानी कलर का नया, हल्का लहँगा पहना हुआ था, और समीर ने सूट। दोनों को देख कर वहां उपस्थित कई लोगों को ईर्ष्या हो उठी। लड़के और अन्य आदमी इस बात से जल भुने कि ऐसी ख़ूबसूरत लड़की मिल गई इस मुए को, और अविवाहित लड़कियाँ इस बात से जल फुंकी कि जो शायद उनके हिस्से में आता, वो ये लड़की ले उड़ी। मैंने यह देखा है कि गैर-शादीशुदा लड़के को भले ही लड़कियाँ घास न डालती हों, जैसे ही वो शादी-शुदा हो जाते हैं, अचानक ही उनकी सेक्स अपील बढ़ जाती है। मेरा यह ऑब्जरवेशन गलत भी हो सकता है, क्योंकि उतनी दुनिया नहीं देखी है मैंने। लेकिन जितना देखा है, उससे तो यही समझा है। खैर, इस बात का इस कहानी से कोई लेना देना नहीं है।

आज मीनाक्षी को बहुत अच्छा लग रहा था। पिछले दिनों के मानसिक और भावनात्मक तनाव कहीं दूर जा छुपे थे और वो खुल कर अपने नए परिवेश, अपने नए स्टेटस का आनंद ले रही थी। डीजे एक से एक नाचने वाले संगीत बजा रहा था। और मेहमानों के उकसाने पर समीर और मीनाक्षी डांस-फ्लोर पर आए और थिरकने लगे। डांस करना तो उसके लिए वैसे भी सबसे पसंदीदा काम था। जब डांस-फ्लोर पर आए तो फालतू भीड़ वहां से हट गई। कहने को उनका डांस सबके सामने हो रहा था, लेकिन उन दोनों के लिए यह एक निहायत ही अंतरंग क्षण थे। शादी के बाद पहली बार दोनों एक दूसरे को इस तरह से स्पर्श कर रहे थे। इस समय दोनों को किसी की परवाह नहीं थी।

एक दूसरे के चेहरे पर उठने वाले ख़ुशी के भाव पढ़ कर, उन दोनों की ख़ुशी और बढ़ रही थी। और इसका प्रभाव कुछ ऐसा हुआ कि दोनों की नज़र एक दूसरे के चेहरे से हट ही नहीं रही थी। सच में, इस समय दोनों को किसी की परवाह नहीं थी। डीजे वाला यह सब देख रहा था, और समझ रहा था। उसने अपनी चालाकी दिखाते हुए संगीत को जारी रखा। उधर दोनों का डांस अपने पूरे शबाब पर पहुँच गया था। शुरुआती झिझक जाती रही थी। दोनों सिद्धहस्त कलाकारों के जैसे नाच रहे थे, और उनको देख कर सभी दर्शक-गण दाँतों तले उँगलियाँ दबा रहे थे।

मीनाक्षी की कमर को समीर ने दोनों हाथों से थाम रखा था, और मीनाक्षी के हाथ समीर के गले में माला बने झूल रहे थे। संगीत की लय और धुन अब गहरी होती जा रही थी। झंकार लगभग समाप्त थी, और सिर्फ ड्रम जैसे वाद्य की ही आवाज़ आ रही थी। मदहोश करने वाला संगीत!

समीर ने मीनाक्षी को देखा। वो मुस्कुरा रही थी। कैसी उन्मुक्त मुस्कान! साफ़! जब आप वर्तमान का आनंद उठाते हैं - अपना मनपसंद काम करते हैं - न भूतकाल में जीते हैं, और न ही भविष्य में, तब ऐसी उन्मुक्तता आती है।
 

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