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“सच में भाभी जी,” समीर के पिता जी पूरे रंग में थे, “सोचिए, अगर पत्नी उम्र में छोटी होगी तो बिना किसी चूं चपड़ के पति और उसके परिवार का सम्मान करती रहेगी। वहाँ का काम धंधा करती रहेगी। आप खुद ही देख लीजिए, किस तरह से लड़कियों को पति की इज़्ज़त करने पर मजबूर किया ही जाता रहा है। पति तुम्हारा देवता है! बताइए, कैसी कोरी बकवास है!”
“भाई साहब, बहन जी, आप लोग बहुत बड़े ख़यालात वाले लोग हैं! हम लोग धन्य है कि हमारी बेटी आपके यहाँ जाएगी!” आदेश की माँ बोलीं।
“भाभी जी, धन्य हम हैं जो ऐसी प्यारी बच्ची के पैर हमारे घर में पड़ेंगे!”
मीनाक्षी के पिता ने हाथ जोड़ कर पूछा, “और शादी?”
“आप कितनी जल्दी कर सकते हैं? मेरे बेचारे समीर से तो रहा नहीं जा रहा है, और आज ही करने पर ज़ोर दे रहा है! क्या करे बेचारा - उसकी पूरी लाइफ में आज पहली बार किसी लड़की ने उसको पसंद किया है! हा हा हा!!”
जिस तरह से समीर की माँ ने यह बात कही, वो सुन कर सभी लोग ठट्ठा मार कर हँसने लगे। मीनाक्षी बेचारी शर्म से गड़ गई।
समीर और मीनाक्षी की शादी उसी रात को एक संछिप्त से समारोह के साथ संपन्न हो गई। समारोह में समीर की तरफ से उसके माँ बाप, और उसके दोस्त लोग ही शामिल हो सके थे। जिस तरह से लोगो ने समीर की बढ़ाई करी और उसको सम्मान दिया, उससे दोनों ही परिवारों का सर गर्व से ऊंचा हो गया।
शादी के लिए कोई उचित कपड़ा नहीं था समीर के पास - बस एक टीशर्ट थी और जीन्स। ख़रीददारी का कोई मौका ही नहीं मिला।
वही पहन कर जब समीर आँगन में बने विवाह बेदी में आया तो उसका गठीला शरीर, और आत्मविश्वास से चमकते हुए चेहरे को देख कर वहाँ उपस्थित लोग निहाल हो गए। खुद आदेश भी अपने मित्र को देख कर अवाक् रह गया। एक कोने से आदेश की दादी दौड़ी दौड़ी आई और समीर के कान की जड़ में काजल लगा दिया कि कहीं उनके दामाद को किसी की नजर न लग जाए। उनके स्नेह पर सभी मुस्कुराए बिना नहीं रह सके।
ऐसी जल्दबाज़ी के बावज़ूद, समीर की माँ अपनी होने वाली बहू के लिए ज़ेवर, और साड़ियाँ लाना भूली नहीं थीं। ज़ेवर तो वही थे, जो उन्होंने अपनी होने वाली बहू के लिए पिछले पांच वर्षों से इकट्ठे किये थे। खैर, जब समीर मीनाक्षी के गले में मंगलसूत्र डाल रहा था, और उसकी मांग में सिन्दूर भर रहा था, तब मीनाक्षी को लगा कि अब उसका जीवन अब उसका अपना नहीं रहा। उस दिन से उसका और समीर का जीवन एक है।
विदाई के समय दहेज़ का तमाम सारा सामान (जैसे कि बेड, सोफ़ा सेट, डाइनिंग टेबल, ड्रेसिंग टेबल, रसोई का सामान, इत्यादि) उनके साथ लाद दिया गया।
समीर और उसके माँ बाप ने इस पर बहुत आपत्ति उठाई - लेकिन आदेश ने उनको समझाया कि यह सब सामान तो उन्होंने खरीद ही लिया है, और सब दीदी के लिए है। अगर उसको साथ नहीं ले गए, तो सब पड़े पड़े खराब हो जायेगा। वैसे भी समीर के घर रेफ्रिजरेटर के अलावा और कुछ तो है ही नहीं। घर बसाने के लिए वो इनको गिफ्ट मान ले और अपने साथ ले जाए। इससे वो बिना वजह के खर्चों से बच जाएगा, और दीदी भी सुख से रहेगी। अगर समीर ने दहेज़ का सामान लेने से मना कर दिया तो बिना वजह सभी का नुकसान होगा। इसी तर्ज पर दहेज़ वाली कार भी समीर को ही दे दी गई।
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“भाई साहब, बहन जी, आप लोग बहुत बड़े ख़यालात वाले लोग हैं! हम लोग धन्य है कि हमारी बेटी आपके यहाँ जाएगी!” आदेश की माँ बोलीं।
“भाभी जी, धन्य हम हैं जो ऐसी प्यारी बच्ची के पैर हमारे घर में पड़ेंगे!”
मीनाक्षी के पिता ने हाथ जोड़ कर पूछा, “और शादी?”
“आप कितनी जल्दी कर सकते हैं? मेरे बेचारे समीर से तो रहा नहीं जा रहा है, और आज ही करने पर ज़ोर दे रहा है! क्या करे बेचारा - उसकी पूरी लाइफ में आज पहली बार किसी लड़की ने उसको पसंद किया है! हा हा हा!!”
जिस तरह से समीर की माँ ने यह बात कही, वो सुन कर सभी लोग ठट्ठा मार कर हँसने लगे। मीनाक्षी बेचारी शर्म से गड़ गई।
समीर और मीनाक्षी की शादी उसी रात को एक संछिप्त से समारोह के साथ संपन्न हो गई। समारोह में समीर की तरफ से उसके माँ बाप, और उसके दोस्त लोग ही शामिल हो सके थे। जिस तरह से लोगो ने समीर की बढ़ाई करी और उसको सम्मान दिया, उससे दोनों ही परिवारों का सर गर्व से ऊंचा हो गया।
शादी के लिए कोई उचित कपड़ा नहीं था समीर के पास - बस एक टीशर्ट थी और जीन्स। ख़रीददारी का कोई मौका ही नहीं मिला।
वही पहन कर जब समीर आँगन में बने विवाह बेदी में आया तो उसका गठीला शरीर, और आत्मविश्वास से चमकते हुए चेहरे को देख कर वहाँ उपस्थित लोग निहाल हो गए। खुद आदेश भी अपने मित्र को देख कर अवाक् रह गया। एक कोने से आदेश की दादी दौड़ी दौड़ी आई और समीर के कान की जड़ में काजल लगा दिया कि कहीं उनके दामाद को किसी की नजर न लग जाए। उनके स्नेह पर सभी मुस्कुराए बिना नहीं रह सके।
ऐसी जल्दबाज़ी के बावज़ूद, समीर की माँ अपनी होने वाली बहू के लिए ज़ेवर, और साड़ियाँ लाना भूली नहीं थीं। ज़ेवर तो वही थे, जो उन्होंने अपनी होने वाली बहू के लिए पिछले पांच वर्षों से इकट्ठे किये थे। खैर, जब समीर मीनाक्षी के गले में मंगलसूत्र डाल रहा था, और उसकी मांग में सिन्दूर भर रहा था, तब मीनाक्षी को लगा कि अब उसका जीवन अब उसका अपना नहीं रहा। उस दिन से उसका और समीर का जीवन एक है।
विदाई के समय दहेज़ का तमाम सारा सामान (जैसे कि बेड, सोफ़ा सेट, डाइनिंग टेबल, ड्रेसिंग टेबल, रसोई का सामान, इत्यादि) उनके साथ लाद दिया गया।
समीर और उसके माँ बाप ने इस पर बहुत आपत्ति उठाई - लेकिन आदेश ने उनको समझाया कि यह सब सामान तो उन्होंने खरीद ही लिया है, और सब दीदी के लिए है। अगर उसको साथ नहीं ले गए, तो सब पड़े पड़े खराब हो जायेगा। वैसे भी समीर के घर रेफ्रिजरेटर के अलावा और कुछ तो है ही नहीं। घर बसाने के लिए वो इनको गिफ्ट मान ले और अपने साथ ले जाए। इससे वो बिना वजह के खर्चों से बच जाएगा, और दीदी भी सुख से रहेगी। अगर समीर ने दहेज़ का सामान लेने से मना कर दिया तो बिना वजह सभी का नुकसान होगा। इसी तर्ज पर दहेज़ वाली कार भी समीर को ही दे दी गई।
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