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Romance संयोग का सुहाग

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‘ओह! कितनी सुन्दर! अप्सराएँ भी पानी भरें मेरी मीनाक्षी के सामने! कैसे भरे भरे होंठ! कैसी स्निग्ध मुस्कान! कैसी सरल चितवन!’

यह लड़की नहीं थी। न कोई अप्सरा थी। ये साक्षात् कामदेव की पत्नी रति थी, जो धरती पर उतर आई थी! इधर रति उसके बाहों में थी, और उधर कहीं से छोड़ा गया कामदेव का पुष्पवाण सीधा समीर के ह्रदय में उतर गया। ऐसी इच्छा उसको पहले कभी न हुई। संगीत और गहरा और निशब्द होता जा रहा था। अब सिर्फ ड्रम जैसे वाद्य की ही आवाज़ आ रही थी। इसका प्रभाव सभा में उपस्थित अन्य लोगों पर भी पड़ रहा था। वो पूरे कौतूहल से अपने सामने होते घटनाक्रम का साक्षात्कार कर रहे थे।

डांस-फ्लोर पर चक्कर-घिन्नी कर के नाचने वाली विभिन्न बत्तियाँ अब धीमी हो चली थीं। अब उनमे से मीनाक्षी के लहँगे के रंग वाली लाइट निकल रही थी, और बस उन दोनों पर ही केंद्रित थी। बाकी के फ्लोर पर अब अँधेरा छा गया था। समीर के हाथ अनायास ही ऊपर उठते हुए मीनाक्षी के कोमल कपोलों पर आ गए। उसी की तर्ज़ पर मीनाक्षी के हाथ भी समीर के गालों पर आ गए।

‘आह! कितना कोमल स्पर्श!’ समीर के शरीर में एक रोमांचक तरंग दौड़ गई।

वो मीनाक्षी को चूमने के लिए उसकी ओर झुका और तत्क्षण ही उसके और मीनाक्षी के होंठ मिल गए। दरअसल, मीनाक्षी पर भी समीर की ही भाँति डांस, और संगीत का सकारात्मक प्रभाव पड़ा था। जब समीर उसकी तरफ झुका, तब वो भी अपना चेहरा उठा कर उसको चूमने को हुई। कोई दो सेकण्ड चले चुम्बन को वहाँ उपस्थित फोटोग्राफर्स ने बख़ूबी उतारा। एक तरफ़ जहाँ ईर्ष्यालु लड़के, लड़कियों की छाती पर साँप लोट गए, वहीं दूसरी तरह उनके मुँह से आहें और सीटियाँ निकल गईं। दोनों की तन्द्रा तब टूटी, जब सभा में उपस्थित मेहमानों की तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज उठा। तब उनको समझा कि दोनों का प्रथम चुम्बन अभी अभी हुआ है! शर्म से दोनों के ही गाल सुर्ख हो गए। उन दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर दर्शकों और शुभचिंतकों का अभिवादन किया। डीजे वाला वापस अपने पहले जैसे संगीत पर लौट आया। और ये दोनों वापस स्टेज पर अपने सोफे पर लौट आए।

समीर की माँ भागी भागी स्टेज पर आईं, और अपनी आँख के कोने से काजल निकाल कर मीनाक्षी के माथे के कोने में एक छोटा सा डिठौना (काला टीका) लगा दीं।

“हाय! मेरी प्यारी बिटिया को कहीं किसी की नज़र न लग जाए।” कह कर उन्होंने मीनाक्षी का माथा चूम लिया।

उसने सामने की तरफ देखा - उसकी माँ और पिता जी दोनों अपनी नम हो गई आँखों को रूमाल से पोंछ रहे थे। उसके ससुर एक चौड़ी मुस्कान लिए अपने बेटे को ‘थम्ब्स अप’ दिखा रहे थे। और आदेश भी उन्ही की ही तरह मुस्कुराते हुए अपनी हाथ की मुट्ठी बाँध कर वैसे दिखा रहा था जैसे जब कोई बल्लेबाज़ शतक बनता है, या कोई गेंदबाज़ विकेट चटकाता है।

आज की रात खुशियों वाली रात थी। रिसेप्शन के अंत में पूरे परिवार ने साथ में बैठ कर खाना खाया। और बड़ी फ़ुरसत में एक दूसरे से बात करी। फिर समीर के मम्मी डैडी के निमंत्रण पर मीनाक्षी में माँ बाप और आदेश उनके घर को चल दिए, और सारे उपहारों के साथ समीर और मीनाक्षी अपने घर को!

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घर आने पर समीर अपनी आदत अनुसार कमरे में आया, और पार्टी वाले कपड़े बदलने लगा। एक दो बार मीनाक्षी ने उसकी झलक देखी है बिना कपड़ों में! उसको देख कर वो न जाने क्यों लजा जाती। समीर के पीछे पीछे ही, धीरे धीरे चलते हुए वो भी कमरे में आती है। शर्त उतरने पर उसने पहली बार पीछे से उसका मर्दाना, कसरती जिस्म देखा। भुजाओं, कंधों और पीठ की माँस-पेशियाँ उसकी हर एक हरकत पर मछलियों के समान फिसल रही थी। अगले ही पल उसकी पतलून भी हट गई। ऊपरी शरीर के साथ साथ निचला शरीर भी गठा हुआ था।

“ओह! आई ऍम सॉरी! मैंने ध्यान नहीं दिया कि आप भी यहाँ हैं। सॉरी!” कहते हुए उसने जल्दी से अपना निक्कर पहन लिया और टी-शर्ट पहनने लगा।

मीनाक्षी मुस्कुरा दी। वही सौम्य, स्निग्ध मुस्कान, जिसने वहाँ डांस-फ्लोर पर समीर के प्रण को धराशाई कर दिया। चुनरी उतार कर वो एक पल तो ठिठकी। समीर अभी भी वहीं था। फिर उसने अपनी नज़रें झुका कर अपनी चोली का हुक खोलना शुरू कर दिया।

“ओह! लेट मी गिव यू योर प्राइवेसी!” कह कर समीर बाहर जाने लगा।

मीनाक्षी का मन हुआ कि वो उसे रोक ले। वो कुछ कहती, उसके पहले ही समीर ने कहा,

“आप कपड़े बदल लीजिए। फिर आता हूँ।” कह कर वो कमरे से बाहर निकल गया और जाते जाते दरवाज़ा भी भेड़ गया।

मीनाक्षी ने एक गहरी साँस छोड़ी, और मुस्कुरा दी। जब तक उसने कपड़े बदल कर सोने के लिए कपड़े पहने, और अन्य कपड़ों और ज़ेवरों को व्यवस्थित कर के समुचित स्थान पर रखा, तक तक समीर रसोई में जा कर दोनों के लिए चाय बना लाया। और उसने जब चाय का प्याला मीनाक्षी की तरफ बढ़ाया तो उसने शिकायत भरे लहज़े में कहा,

“अरे, आपने क्यों बना दी? मुझको कह देते!”

उसकी शिकायत को अनसुना करते हुए समीर बोला, “दो मिनट फुर्सत से आपके साथ बैठ कर बात करने का मौका ही नहीं मिला। इसलिए सोचा, चाय बना लाता हूँ। साथ में बैठ कर, चुस्कियाँ लेते हुए बातें करेंगे।”

“आपको चाय बनाना आता है,” मीनाक्षी ने पहली चुस्की ले कर कहा! स्वाद ऐसा था जैसे उसकी माँ ने बनाया हो। घर की याद दिलाने वाली चाय! “खाना पकाना आता है, डांस करना आता है…” बॉडीबिल्डिंग करना आता है, यह जान-बूझ कर नहीं कहा उसने, “क्या नहीं आता आपको?”

“पति की खूबियाँ धीरे धीरे पता चलनी चाहिए! उससे पत्नी के मन में पति के लिए प्रेम और आदर दोनों बना रहता है!” समीर ने ठिठोली करते हुए कहा।

‘प्रेम और आदर तो अभी भी है’ मीनाक्षी ने सोचा।

“वैसे डांस तो आपका लाजवाब है। देखा नहीं, कैसे सब मुँह बाए देख रहे थे!”

डांस की बात सुन कर, मीनाक्षी को उस चुम्बन की याद हो आई। और समीर को भी। दोनों की नज़रें कुछ पल के लिए मिलीं।

“थैंक यू फॉर द किस!” समीर ने बड़ी संजीदगी से कहा।

वो मुस्कुराई, “थैंक्स टू यू टू!”

“पार्टी कैसी लगी?” समीर ने मुस्कुराते हुए पूछा, “जल्दबाज़ी में कुछ भी ठीक से प्लान नहीं हो पाया।”

“बहुत बढ़िया थी! बहुत बढ़िया! थैंक यू!”

“अरे! थैंक यू काहे का?”

“ऐसे यादगार पल देने के लिए! आज का दिन मैं कभी नहीं भूलूँगी!”

“थैंक्स! मम्मी पापा से आपको बात करने का मौका मिला?”

“जी!”

“वो लोग ठीक हैं? आज बात ही नहीं हो पाई।”

“बिलकुल ठीक हैं! बहुत खुश हैं। उनको मालूम है कि उनकी बेटी बहुत सुख से है।”

“गुड! मैं चाहता हूँ, कि आप अपने तरीके से, जैसा मन करे, वैसा रहिए। जो मन करे, वो करिए! ये आपका घर है। जैसा मन करे, रखिए। और, अगर जॉब करने का मन है, तो बताइए। बॉस की वाइफ डी पी एस में हैं। उनसे बात करवाई जा सकती है। वहाँ अच्छी सैलरी मिलती है। या जो भी कुछ करने का मन हो, बताइए!”

मीनाक्षी से रहा नहीं गया। उसने समीर के हाथ को अपने हाथ से दो तीन बार सहलाते हुए कहा, “थैंक यू!”

दोनों की चाय ख़तम हो गई थी। समीर उसकी और अपनी प्याली उठा कर ले जाने को हुआ तो मीनाक्षी ने उसको रोकते हुए कहा, “कम से कम ये तो कर लेने दीजिए मुझे!”

“अरे, मैं वैसे भी बगल वाले कमरे में जा रहा हूँ। उसके लिए उठना ही है।”

“आप .... यहीं सो जाइए न?” उसने हिचकिचाते हुए कहा, “वहाँ क्यों जाते हैं! इतनी गर्मी हो जाती है वहाँ!”

“आई नो! गर्मी तो होती है। और, सच कहूँ, मुझसे ज्यादा कौन चाहता होगा आपके साथ सोना?”

“तो फिर?”

“मैं अपने आपको रोक नहीं पाऊँगा!”

समीर के ऐसे स्पष्टीकरण को सुन कर मीनाक्षी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। फिर भी उसको अपनी बात तो कहनी ही थी,

“रोकने को किसने कहा।”
 
समीर कुछ देर के लिए चुप हो गया। उसके धड़कनें अचानक ही तेज़ हो गईं। फिर उसने खुद पर थोड़ा नियंत्रण लाते हुए कहा, “आई डू लव यू! डू यू नो दैट?”

उसने सर हिला कर हामी भरी।

“मैं आपको ‘मिनी’ बुला सकता हूँ?”

मीनाक्षी मुस्कुराई, “आप प्यार से मुझे जिस नाम से भी बुलाएँगे, वो ही मेरा नाम होगा।”

समीर मुस्कुराया, “मिनी, आई लव यू। और इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि हम एक दूसरे के बारे में बहुत अंजान हैं। पति-पत्‍नी के प्‍यार में .... शारीरिक संबंध ही पति-पत्‍नी का असली संबंध नहीं है। मैं आपको जानना चाहता हूँ। अपने बारे में बताना चाहता हूँ। कुछ मंत्र पढ़ लिए, रीति रिवाज पूरे कर लिए। वो कोई शादी थोड़े ही है! वो तो बस, सामजिक शादी है। वो शादी तो हो गई।

लेकिन हमारा क्या? हमारी भावनात्मक शादी का क्या? उसके लिए मैं आपकी पसंद, नापसंद जानना चाहता हूँ। मैं जानना चाहता हूँ कि आप किन बातों पर हँसती हैं। किन बातों पर नाराज़ होती हैं। मैं आपको जानना चाहता हूँ। इतना कि बिना आपके कुछ बोले मुझे समझ में आ जाए कि आप क्या सोच रही हैं। मैं आपका ऐसा ख्याल रखना चाहता हूँ कि आप आगे आने वाली जिंदगी दुःख क्या होता है, यह भूल जाएँ!

मैं यह नहीं चाहता कि आप किसी भी तरह का कोम्प्रोमाईज़ करें, या मैं किसी तरह का कोम्प्रोमाईज़ करूँ। हमें कोम्प्रोमाईज़ नहीं करना है, बल्कि तार-तम्य बैठाना है। तबला अलग है, बाँसुरी अलग। अगर कोम्प्रोमाईज़ करेंगे तो उनमे से कोई एक कम बजेगा, और दूसरा ज्यादा। लेकिन अगर दोनों ने तार-तम्य बैठेगा, तो दोनों बराबर बजेंगे। और एक बढ़िया सिम्फनी बनेगी।

सच कहूँ, मैं मरा जा रहा हूँ आपका सान्निध्य पाने के लिए। लेकिन मैं इंतज़ार कर लूँगा। मुझे मालूम है कि उस इंतज़ार का फल बहुत मीठा होगा।”

समीर की ऐसी गंभीर समझ को सुन कर मीनाक्षी कुछ पल समझ नहीं सकी कि वो क्या बोले। फिर कुछ सोचने के बाद बोली, “मम्मी डैडी ने लड़का नहीं, हीरा बनाया है आपको!”

“हा हा हा हा हा हा”

“एक बात पूछूँ आपसे?”

“हाँ?”

“मिनी क्यों?”

“हा हा…. आप उम्र में मुझसे बड़ी हैं, लेकिन न जाने क्यों छोटी सी लगती हैं मुझे!” कह कर समीर कमरे से बाहर चला गया।

जब वो वापस लौट रहा था, तब मीनाक्षी ने उसको पुकारा, “सुनिए?”

जब समीर कमरे में आ गया तो उसने कहा, “इधर आइए? मेरे पास!”

समीर उसके पास आ कर बिस्तर पर बैठ गया, तब मीनाक्षी ने प्रेम से उसके गले में गलबैयाँ डाल कर उसके होंठों को चूम लिया। और अपनी बड़ी बड़ी आखों से उसके मुस्कुराते चेहरे को देखने लगी।

“गुड नाइट!”

“गुड नाइट!” समीर ने कहा, और अनिच्छा से कमरे से बाहर निकल आया। उसका दिल बल्लियों उछल रहा था। सुनहरा भविष्य सन्निकट था।

रिसेप्शन के बाद के दिनों में दोनों की दिनचर्या बँध गई। मीनाक्षी जल्दी उठ जाती, जिससे वो समीर को नाश्ता खिला कर ऑफिस भेज सके। दिन में वो लिखने पढ़ने का काम करती। डांस करती। जिम जाती। आस पड़ोस में और महिलाओं से बात करती। शाम को समीर के आने के बाद उसके लिए नाश्ता रखती। डिनर पर से समीर का एकाधिकार ख़तम हो रहा था। डिनर दोनों मिल कर पकाते। सप्ताहांत में मम्मी डैडी आते, और उनके साथ गप्पें लड़ाने, और मज़े करने में निकल जाता।

मीनाक्षी धीरे धीरे करके समीर के साथ खुलने लगी। दोनों कोई बहुत बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते थे, बस, वो दैनिक छोटी-छोटी बातें - जैसे कि समीर का दिन कैसा रहा, उसका खुद का दिन कैसा रहा, क्या देखा, क्या पढ़ा, क्या किया, क्या खाया, ऑफिस में किसने क्या कहा, क्या सुना - बस ऐसी ही छोटी-छोटी बातें! मीनाक्षी ने समीर के साथ अपने किसी बड़े रहस्य को साझा नहीं किया। लेकिन उसने समीर से सहजता के साथ बात करना शुरू कर दिया।

एक बार समीर ने मीनाक्षी से अपने ऑफिस के काम से सम्बंधित किसी बात के सिलसिले में उससे कुछ महत्वपूर्ण सुझाव मांगे। मीनाक्षी को यकीन ही नहीं हुआ कि वो उससे इस विषय में सलाह मांग सकता है - उसने इंजीनियरिंग की कोई पढ़ाई नहीं करी थी, अब ऐसे में वो समीर को क्या सलाह देती? और तो और, क्या यह एक स्त्री का कोई स्थान है कि वो अपने पति को किसी तरह की कोई सलाह दे? उसको याद आया एक बार की बात जब उसके पापा ने उसकी माँ से इसी तरह अपने काम के सिलसिले में एक प्रश्न पूछ लिया। माँ ने सोचा कि शायद पापा उनसे वाकई कोई उत्तर या सलाह चाहते हैं। लेकिन जब उन्होंने जवाब दिया तो पापा झल्ला गए।

इसलिए मीनाक्षी के मन में अज्ञात का भय था। वो नहीं चाहती थी कि उसकी किसी नादानी के कारण, ये जो हँसी ख़ुशी के दिन बीत रहे हैं, उनमे कोई विघ्न पड़े। लेकिन समीर ने पूछा था तो कुछ तो बताना ही चाहिए। विषय ज्ञान तो नहीं था। मीनाक्षी ने समीर की तरफ देखा; वो किसी उत्तर या सुझाव की उम्मीद में उसी की तरफ देख रहा था। थोड़ा अनिश्चय के साथ ही सही, लेकिन मीनाक्षी ने सुझाव देना शुरू किया, और समीर ने सुना। पूरा सुना। पूरी गंभीरता और पूरे आदर के साथ। सुझावों के कुछ बिंदुओं पर उसने मीनाक्षी के साथ कुछ देर तक प्रतिवाद भी किया।

जब वो पूरी तरह से संतुष्ट हो गया, तो मुस्कुराते हुए ‘थैंक यू … आई मैरिड एन इंटेलीजेंट गर्ल’ बोल कर कमरे से बाहर निकल गया। अपनी उपयोगिता और महत्ता पर आज मीनाक्षी को खूब गर्व महसूस हुआ। आज उसके अंदर एक अलग तरह का आत्मविश्वास पैदा होने लगा था।
 
नॉएडा में मीनाक्षी की कुछ सहेलियाँ रहती थीं, जो उसकी शादी में उपस्थित थीं। उनमे से कुछ रिसेप्शन में भी आई थीं। एक बार मीनाक्षी का मन हुआ कि वो उनसे मिल आए। इस बाबत उसने समीर से अपने दोस्तों से मिलने के बारे में आज्ञा चाही।

मीनाक्षी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “क्या मैं अपनी सहेलियों से मिलने जा सकती हूँ? वो एक शेयर्ड अपार्टमेंट में रहती हैं - शायद आज रात रुकना पड़ जाए। लेकिन मैं जल्दी आने की कोशिश करूँगी और कैसी भी बेवकूफी वाला काम नहीं करूँगी। आप चाहें तो मुझे फोन कर सकते हैं, या उनको फ़ोन कर सकते हैं। ये डायरी में उनका नंबर भी लिख दिया है। मैं जल्दी ही वापस आ जाऊंगी। जा सकती हूँ?”

जिस तरह की मीनाक्षी की परवरिश थी, उसमें उसको सिखाया गया था कि शादी के बाद स्त्री पर उसके पति का पूर्ण अधिकार होता है। बिना पति की आज्ञा के कोई कार्य नहीं करना।

लेकिन समीर की गुस्से से भरी शकल देख कर मीनाक्षी का दिल बैठ गया। आज तक समीर को गुस्से में उसने नहीं देखा था। कुछ देर समीर ने कुछ कहा नहीं - वाकई वह बहुत गुस्से में था। उसका यह रूप देख कर उसको डर लग गया। ज़रूर कोई गड़बड़ी हो गई है उससे! उसको लगा कि जैसे वो समीर के सामने नग्न खड़ी हुई है। शर्म के मारे उसकी आँखें जैसे ज़मीन में धंस गईं। आज समीर उसको एक और पाठ पढ़ाने वाला था।

समीर ने लगभग निराश होते हुए कहा, “मीनाक्षी,” (रोज़ के जैसे उसने उसको ‘मिनी’ कह के नहीं पुकारा) “मैंने आपको कितनी बार कहा है कि आप मेरी पत्नी हैं! कितनी बार? और अपनी सहेलियों से मिलने जाने के लिए आप मेरी परमिशन क्यों ले रही हैं? आप मेरी एम्प्लॉई हैं क्या? छुट्टी की एप्लीकेशन लगाओ अब से! ठीक है न?”

फिर कुछ ठहर कर, कम गुस्से में उसने आगे कहा, “आप मुझे बस बता दिया करें! जिससे मुझे मालूम रहे कि आप किसी परेशानी में तो नहीं हैं! बस! उतना काफी है। जाओ। लेकिन अब से ऐसे भीख मत माँगो! प्लीज़!” उसने कहा और वहाँ से चला गया। खुश तो बिलकुल ही नहीं था।

समीर की बातों और उसके बर्ताव से मीनाक्षी को धक्का लगा। सच में, पहले दिन से ही समीर ने उसको इतना आदर दिया था जितना की उसको अपने घर में नहीं मिला था। और यह बात तो उसने कम से कम दस हज़ार बार दोहराई होगी कि मीनाक्षी उसकी पत्नी है, और उसका समीर के जीवन में बराबर का अधिकार है। मीनाक्षी को लगा कि उसने वाकई समीर को निराश कर दिया। मीनाक्षी समीर के पीछे पीछे गई। वह बालकनी से नीचे सड़क को देख रहा था। मीनाक्षी भी उसके संग, उसके बराबर आ कर खड़ी हो गई और नीचे देखा।

“समीर (समीर का नाम अपने मुँह पर आते ही मीनाक्षी एक दो पल के लिए रुक गई - आज उसने पहली बार यह नाम बोला था), मैं सीख रही हूँ। प्लीज मेरे साथ थोड़ा धीरज रखिए।”

मीनाक्षी ने नीचे देखते हुए बोलना जारी रखा, “मेरी जैसी परवरिश रही है, अब मैं आपको कैसे समझाऊँ? अपने पति से बात करने के लिए मेरी माँ ने मुझे एक लम्बी चौड़ी लिस्ट दी हुई है, कि मैं क्या कर सकती हूँ और क्या नहीं! कैसे बिहेव करूँ और कैसे नहीं। लेकिन आपके साथ उस लिस्ट की एक भी बात फिट नहीं होती।”

“लेकिन मेरा यकीन मानिए कि मैं सीख रही हूँ। थोड़ा और बर्दाश्त कर लीजिए। प्लीज मुझसे निराश मत होईए।”

मीनाक्षी की बात पर समीर ठट्ठा मार कर हँसा - लेकिन उसकी हंसी में उपहास नहीं परिहास था।

“ओह आई ऍम सॉरी! आई ऍम सॉरी! मैं आप पर नहीं हँस रहा था। वो लिस्ट वाली बात पर हँस रहा था। आल्सो, आई ऍम सॉरी फॉर माय बिहेवियर। मैंने आपसे बदतमीज़ी से बात की, उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ। मैं आपकी बात याद रखूँगा। लेकिन आप भी वायदा करिए कि अब आप ‘अपने घर’ में हैं, अपने माँ बाप के घर में नहीं। हम दोनों आगे का सोचेंगे! अतीत का नहीं! है न?”

कहते हुए समीर ने एक क्षण के लिए मीनाक्षी की पीठ को छुआ। दिलासा देने के लिए। यह इतना जादुई स्पर्श था कि मीनाक्षी की आत्मा ने भी उसको महसूस किया। मीनाक्षी के मन में यह विचार आया कि काश समीर उसको चूम ले! उसने महसूस किया कि अगर समीर उसको इस समय चूम लेगा, तो उसको खुद को बहुत अच्छा लगेगा।

समीर ने उसकी तरफ प्यार से देखते हुए अपनी एक हथेली उसके गाल पर रखी और दूसरी से उसके चेहरे पर उतर आई उसकी लटों को पीछे की तरफ फेर दिया। और फिर उसने मीनाक्षी का मुख चूम लिया।

“किसी चीज़ की ज़रुरत हो, तो मुझे बता दीजिएगा। और वॉलेट से पैसे निकाल कर रख लीजिए। और….” इसके पहले समीर उसको और कोई हिदायद देता, मीनाक्षी ने उसके होंठों पर अपनी तर्जनी रख कर उसको चुप हो जाने का इशारा किया।

‘मैं आपको जानना चाहता हूँ। इतना कि बिना आपके कुछ बोले मुझे समझ में आ जाए कि आप क्या सोच रही हैं।’

मीनाक्षी के मन में समीर की कही हुई ये बात कौंध गई। उसकी आँखों के कोनों में आँसू उतर गए। उसने आँखें बंद कर समीर को आलिंगनबद्ध कर वापस उसके होंठ चूम लिए।

“आई लव यू!” मीनाक्षी ने कहा।

उस दिन के बाद समीर और मीनाक्षी का अपने दोस्तों के घर आना जाना शुरू हो गया।
 
मीनाक्षी अपने दोस्तों को डिनर के लिए घर बुलाने लगी। जाहिर सी बात है कि उसकी सहेलियाँ भी उसके ही समान समीर से आठ से दस बड़ी थी। लेकिन मीनाक्षी से समीर के बारे में जान कर उनके मन में भी उसके लिए आदर भाव हो गए थे। वो सभी समीर को ‘जीजू’ या ‘जीजा जी’ कह कर बुलाती थीं। वो इस सम्बोधन पर बहुत हँसता, और उसकी सहेलियों को अक्सर कहता कि उसको उसके नाम से बुलाया करें। लेकिन वो मानती नहीं थीं। सालियों का काम ही है अपने जीजा को तंग करना। मीनाक्षी की सहेलियाँ उसकी अच्छी किस्मत पर जहाँ एक तरफ बहुत खुश थीं, वहीं दूसरी तरफ कहीं न कहीं उनको थोड़ी ईर्ष्या भी थी। वो उसको अक्सर कहतीं कि वो बहुत लकी है कि उसको समीर जैसा हस्बैंड मिला।

दूसरी तरफ समीर के दोस्त भी उसकी ख़ुशकिस्मती पर ईर्ष्यालु हुए बिना नहीं रह सके। अक्सर वो मीनाक्षी से कहते कि ‘भाभी, अपनी ही जैसी कोई हमारे लिए भी ढूंढ दो’। मीनाक्षी बढ़िया पढ़ी-लिखी, समझदार, कार्य-दक्ष, मृदुभाषी, स्नेही और सरल लड़की थी। और उसकी सुंदरता के तो क्या कहने! छोटी छोटी उसकी इच्छाएँ थीं। और जो सबसे बड़ी बात थी वो यह कि भगवान् की उस पर कृपा थी। वरना कैसे उसका जीवन यूँ ही चुटकी बजाते बदल जाता? ऐसी सौभाग्यवती लड़की कौन अपने घर में नहीं लाना चाहेगा?

समीर के साथ रहते हुए मीनाक्षी के ज्ञान, अधिकार और मनोबल की सीमा काफ़ी बढ़ी। अब वो ऐसे काम कर सकती थी, जो उसने पहले सोचे भी नहीं थे। उसके साथ समीर ने उसके परिवेश का दायरा भी बढ़ाने का काम किया। उसको वो क्लब ले जाता, म्यूजिकल कॉन्सर्ट में ले जाता, उसको मिनी-ड्रेस पहनने के लिए प्रोत्साहित करता, उसके साथ जिम जा कर व्यायाम करता, कभी कभी मीठी शराब (डिजर्ट वाइन) भी लाता जिसे दोनों साथ में बैठ कर पीते। घर का हो, या बाहर का कोई सामाजिक काम, वो किसी भी काम में वो मीनाक्षी के विचारों को अधिक अहमियत देता। उसके लिए हमेशा कुछ न कुछ नया कर के उसको सरप्राइज करता। उसको आर्थिक स्वावलम्बन प्राप्त करने के लिए भी प्रोत्साहित करता। उसके प्रोत्साहन के चलते और मीनाक्षी के प्रयत्न से, उसको एक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी भी मिल गई।

इन सब बातों के चलते मीनाक्षी को अक्सर लगता कि बिना उसकी मर्ज़ी के ही सही, लेकिन समीर उसके माता-पिता और भाई का दिया हुआ सबसे बड़ा, और सबसे क़ीमती उपहार था। एक अजनबी से शादी करके जैसे उसको दूसरा जन्म मिल गया था।

पिछले कुछ वर्षों से मीनाक्षी में मन में लेखिका बनने की इच्छा बलवती हो गई थी। उसके चलते वो कई बार अख़बारों और मैगज़ीनों में छोटी छोटी कहानियाँ लिख कर भेजती रहती थी, जो छपा भी करतीं थीं। उसको लगता था कि वो यह काम अच्छा कर पाती है। अब, जब उसके जीवन में स्थिरता और मजबूती आ गई थी, तो वो लेखन के काम को गंभीरता से लेना चाहती थी। एक रात, मीनाक्षी और समीर बालकनी में साथ में बैठ कर वाइन पी रहे थे और रिमझिम बारिश का आनंद उठा रहे थे। मीनाक्षी के मन में हुआ कि समीर से वो अपने मन की बात बोल दे। उसने संकोच करते हुए, फुसफुसाते हुए कहा,

“मैं… लिखना चाहती हूँ!”

“क्या?”

“मेरा मतलब है, मैं राइटर बनना चाहती हूँ! मेरे मन में यह इच्छा बहुत दिनों से है। लेकिन अब लगता है कि मैं इस इच्छा को पूरा कर सकती हूँ!”

मीनाक्षी की इस बात पर समीर के चेहरे पर जो भाव उठे, उनको मीनाक्षी कभी भुला नहीं सकती। मीनाक्षी ने समीर को इतना खुश होते हुए पहले कभी नहीं देखा था, और उसको एक पल को लगा कि समीर की आँखों में आँसू झिलमिला रहे थे।

“यह तो बहुत बढ़िया बात है। सही में, नौकरी के फेर में पड़ने की कोई ज़रुरत नहीं। अगर आपको लगता है कि आप बढ़िया लिख सकती हैं, तो बिलकुल लिखिए! कभी साहित्य अकादमी अवार्ड मिलेगा तो मैं भी कहूंगा, कि देखो - मेरी बीवी है!”

मीनाक्षी को समीर की यही बात बहुत पसंद है। इतना आशावादी! उसी कारण से समीर ने उससे शादी करी। वो हर काम में इतनी सम्भावनाएँ देखता है कि उसके लिए कुछ भी असंभव सा नहीं लगता। देखो, उसने लिखने की बस इच्छा ही जाहिर करी थी, और वो कहाँ साहित्य अकादमी अवार्ड तक पहुँच गया। ऐसे पुरुष के साथ रहते रहते कोई कैसे न खुद भी आशावादी हो जाए! अगले घण्टे तक समीर उससे क्या लिखना है, कैसे लिखना है, कौन कौन से साधन चाहिए, कैसे उपकरण चाहिए, इन सब बातों को डिसकस करता रहा। उसका उत्साह देखने वाला था।

उस रात मीनाक्षी जिस तरह रोई, वैसे वो पहले कभी नहीं रोई। आज वो रो कर अपने सारे दुःख अपने आँसुओं के साथ बहा देना चाहती थी। ‘बस अब! अब मेरी लाइफ में दुःख की कोई जगह नहीं’। कहीं समीर सुन न ले, यह सोच कर उसने अपना चेहरा तकिये में छुपा लिया। और खूब रोई! उसका मन हुआ कि वो चीख़ भी ले! नैराश्य की भावनाएँ जो पिछले पाँच छः वर्षों से उसके दिमाग में घर कर के बैठ गईं थीं, अब सब बाहर थीं।

जब वो अच्छी तरह रो ली, तब उसने अपना चेहरा धोया। फिर मम्मी ने जो उससे ब्राइडल लॉन्जेरे के दो सेट ज़बरदस्ती खरीदवाए थे, उनमे से एक पहन कर कमरे से बाहर आ गई और समीर के कमरे की तरफ चली। जुलाई बीत चुकी थी, और बढ़िया बारिश होने लगी थी। अब इस कमरे में भी वैसी गर्मी नहीं होती थी।

वो कमरे में आई, और आ कर सीधा समीर के बगल उस बेड पर लेट गई। समीर करवट पर लेटा हुआ था। शायद उसकी ऐसी आदत थी। इस समय उसकी पीठ मीनाक्षी के सामने थी। तो मीनाक्षी भी करवट ले कर उससे चिपक कर लेट गई, और अपना एक हाथ उसने समीर पर डालते हुए उसके सीने पर रख दिया। अपने बिस्तर पर हलचल महसूस कर के वो थोड़ा कुनमुनाया लेकिन मीनाक्षी ने ‘श्श्श ...’ कह कर उसको शांत कर दिया।

आज वो पहली बार समीर के इतने करीब थी। इतने करीब कि समीर के शरीर की महक उसको आ रही थी। यह एक अलग तरह की अंतरंगता थी। अभी तक मर्दों की गंध के नाम पर उसने जो भी महसूस किया था वो ज्यादातर दुर्गन्ध की श्रेणी में आता था। लेकिन समीर के शरीर की गंध उसको खराब नहीं लगी - उल्टे उसको उसकी महक अच्छी ही लगी। मीनाक्षी ने पीछे से ही उसके गर्दन के नीचे चूमा - जहाँ गर्दन और कन्धा मिलते हैं। ऐसा करते ही समीर के उस साइड वाले हिस्से पर रोंगटे खड़े हो गए। उसकी नींद कुछ कुछ खुलने लगी,

“मिनी?” गहरी नींद में उसने कहा।

“श्श्श ... सो जाओ!”

“हम्म?”

“सो जाओ! आज मैं यहीं सोऊँगी!”

“हम्म”

समीर वापस सो गया। गहरी नींद में। मीनाक्षी कुछ इस तरह लेटी हुई थी, कि उसके शरीर का हर अंग इस समय समीर की किसी न किसी अंग से चिपका हुआ था। कोई घण्टा ऐसे ही लेटे रहने से उसका करवट के साइड में दर्द होने लगा। वो खुद भी चित्त लेट गई, और समीर को भी हल्का सा अपनी तरफ खींच कर चित्त लिटा दी। यह बेड दो लोगों के एक साथ सोने के लिए बहुत छोटा था - सिंगल बेड! इसकी चौड़ाई लगभग कोई तीन फ़ीट ही होती है। इसलिए इसमें बिना आपस में चिपके लेटना मुश्किल था।

जब उसका दर्द कम हो गया, तब उसने फिर से समीर की तरफ करवट ली। आँखें अँधेरे में देखने में अभ्यस्त हो गईं थीं अब तक। वो उसको संतुष्टि वाले भाव लिए सोते देख कर मुस्कुरा दी। वो थोड़ा झुकी, और बहुत हलके से उसके गाल को चूमा। वो उसकी प्रतिक्रिया देखने के लिए रुकी, और कुछ न देख कर उसने फिर से चूमा।

“हम्म” समीर गहरी नींद में ही बोला।

समीर की ऐसी प्रतिक्रिया देख कर वो स्नेह से मुस्कुरा दी, ‘ऐसे तो हमेशा मैच्योर बातें करते हैं, लेकिन अभी देखो! बिलकुल नन्हे बच्चों के जैसे सो रहे हैं’

“सुनो?” उसने बहुत प्यार से, लेकिन बहुत धीमे से पुकारा।

“हम्म?”

“तुम हमेशा मेरे ही रहना” उतने ही धीरे मीनाक्षी ने कहा।

“हम्म”

इस मासूमियत भरे वार्तालाप पर मीनाक्षी को हँसी आ गई, लेकिन समीर जाग न जाए, इसलिए उसने अपनी हँसी दबा ली। लेकिन उसके मन में समीर के लिए जो प्यार उमड़ रहा था, उसकी अभिव्यक्ति भी ज़रूरी थी। मीनाक्षी ने नीचे झुक कर समीर के होंठों को चूम लिया। वैसे ही। हलके से। कोमलता से।

“हम्म!”

मीनाक्षी मुस्कुराई, और फिर कुछ सोचते हुए उसने अपनी नाइटी का एक कप कंधे से नीचे ढलका दिया। उसका एक स्तन अनावृत हो गया। अपनी खुद की ही इस हरक़त से उसके दिल की धड़कने तेज़ हो गयीं। उसने समीर का वो हाथ, जो उसके शरीर के संपर्क में नहीं था, उसको हौले से पकड़ कर अपने अनावृत स्तन पर रख दिया और उसको अपने हाथों से सहारा दे कर स्तन पर रखा रहने दिया। ऐसा साहस / दुस्साहस उसने अपने जीवन में पहली बार किया था। उसका चूचक उत्तेजना से तन गया था और बहुत कठोर हो गया था। अपने शरीर में ऐसा परिवर्तन होते देख कर वो खुद ही घबरा गई। उसने पूरी सतर्कता से समीर का हाथ वापस उसकी जगह पर रख दिया और फिर अपने कपड़े व्यवस्थित कर के बेड से उठी, और अपने कमरे में आ गई।

वो मुस्कुराते हुए लेटी और अगली सुबह मुस्कुराते हुए ही उठी। उसका बदला हुआ व्यवहार देख कर समीर बहुत खुश हुआ। उसको लगा कि शायद अपने लेखन के कार्य को लेकर मीनाक्षी उत्साहित है, इसलिए। लेकिन उसको यह नहीं मालूम था कि मीनाक्षी, जितना वो सोचता था, उससे ज्यादा उसके करीब आ चुकी थी। और उसकी ख़ुशी का भी यही कारण था।

...............................
 
इस घटना के कोई दस दिन बाद स्वतंत्रता दिवस था। और उस कारण तीन दिनों की छुट्टी मिलती। समीर ने सुझाया कि कहीं घूमने चला जाए। लेकिन मीनाक्षी ने कहा कि पूरे परिवार के साथ कुछ दिन बिताते हैं। ठीक बात थी, सभी से मिले कुछ समय भी हो गया था। समीर ने कॉल कर के अपने सास ससुर और आदेश को घर आने का न्योता दिया। इसको सभी ने सहर्ष स्वीकार भी कर लिया। सभी लोग पंद्रह अगस्त की शाम को आने वाले थे, इसलिए मीनाक्षी ने सोचा कि घर की थोड़ी सफाई कर ली जाए। कामवाली कुछ दिनों की छुट्टी पर थी, इसलिए घर की सफाई थोड़ा उपेक्षित हो गई थी।

लगभग दस बज रहा था।

नाश्ता और साफ़ सफ़ाई वगैरह निबटा कर मीनाक्षी नहाने के लिए बाथरूम गई। काम काज और गर्मी ने पूरे बदन को पसीने से तर बतर कर दिया था; और ऊपर से ऊमस। ऐसे में चैन नहीं मिलता। जैसे ही नहाते हुए उसने पहला मग पानी का डाला, उसका मन हुआ कि बस कुछ इसी तरह वो पानी में पड़ी रहे। काफी देर तक बाहर निकलने को उसका मन ही नहीं हो रहा था। लेकिन आखिरकार बाहर आना ही पड़ा। बाहर आते हुए उसने अपना बदन एक पतले सूती अंगौछे में लपेट लिया। ऐसी सड़ी हुई गर्मी में तौलिया लपेटने में तो गर्मी के मारे जान निकल जाती।

बाथरूम से निकलकर उसने जैसे ही पहला कदम रखा तो देखा समीर उसके सामने खड़ा है। इतने दिनों में वो आज पहली बार इतनी देर से सो कर उठा था। वो इस समय सिर्फ अपने अंडरवियर को पहने था। समीर का मर्दाना चौकोर चेहरा, छोटे बाल, उनींदी लेकिन चमकती आँखें, होठों पर सहज मुस्कुराहट, लंबी काठी और कसा हुआ शरीर .... अपने पति को ऐसे देख कर मीनाक्षी के दिल में एक धमक सी हुई।

‘ओह! कैसा मॉडल जैसा लगता है!’

वह ठगी सी उसको देखती रह गई। दोनों के इस संछिप्त विवाहित जीवन में अंतरंगता के यह प्रथम क्षण थे। मीनाक्षी समीर को देख तो रही थी, लेकिन समीर क्या देख रहा था? छाती से जाँघ तक के शरीर को सूती अंगौछे से ढकी एक युवती। उसका यौवन जैसे अभी-अभी ही अपने शिखर तक पहुँचा हो। कितनी सुन्दर… मीनाक्षी... मछली के आकार की आँखों वाली! मीनाक्षी को उस हाल में आज तक किसी भी पुरूष ने नहीं देखा था। गीले बालों से टपकते हुए पानी से उसका पतला, सफ़ेद अंगौछा पूरी तरह से भीग चुका था। अब वह वस्त्र मीनाक्षी के शरीर को जितना छुपा रहा था, उससे अधिक उसकी नुमाइश लगा रहा था। उसके स्तनों की गोलाइयाँ, चूचकों का गहरा रंग, शरीर का कटाव, कमर का लोच, नितंब का आकार - कुछ भी नहीं छुप रहा था।

समीर हतप्रभ सा अपनी पत्नी को देख रहा था। उसको लगा जैसे उसके दिल की धड़कनें रुक जायेंगीं।

‘हे प्रभु! ये लड़की जब सजती सँवरती है, तब भी रति का रूप लगती है, और जब नहीं भी सजती सँवरती है, तब भी! कैसी आश्चर्यजनक बात है!’

समीर अपनी प्रतिज्ञा अपनी प्रतिज्ञा के कारण रास्ता बदल देना चाहता है! लेकिन वो ऐसा करे भी तो कैसे? ईश्वर-प्रदत्त इस अवसर को भला कैसे ठुकरा दे? वह चरित्रवान तो है, लेकिन इतना भी नहीं कि कामदेव के इस अद्वितीय उपहार से दृष्टि बचा कर निकल जाए। वह शर्मीला भी है, लेकिन इतना नहीं कि अपने ऐसे सौभाग्य से शरमा जाए। ऐसी ही अवस्था में जब राजा पाण्डु ने अपनी रानी माद्री को देखा, तब वो कामाग्नि से भस्म हो गए। ऐसी ही अवस्था में जब ऋषि विश्रवा ने कैकसी को देखा तो उनके संयोग से रावण का जन्म हुआ।

‘कुछ दिन और सब्र कर लो। जल्दबाज़ी से कुछ भी सार्थक नहीं निकलता है।’

कामदेव का जादू कुछ क्षण यूँ ही चलता रहा, और जब वो जादुई पल समाप्त हुए, तो दोनों यूँ ही शर्मसार हो गए। समीर पलट कर लौट गया, और मीनाक्षी शरमा कर खुद में ही सिमट गई। आज उसको लगा कि उसका सर्वस्व समीर लेता गया। यदि लज्जा ने मीनाक्षी की दृष्टि को रोक न लिया होता, और उसने अपने पति के शरीर पर उस एकमात्र वस्त्र की ओर देख लिया होता, तो उसको पता चल जाता कि कामदेव के जादू का समीर पर क्या असर हुआ है।

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शाम को दोनों परिवार मीनाक्षी और समीर के घर पर इकठ्ठा हुए।

मीनाक्षी ने पहले से ही समीर को सख़्त हिदायत दे रखी थी कि वो आज रसोई में न आएँ, और उसको ही सारा काम करने दें। इसलिए उसकी इच्छा का मान रखते हुए समीर ने उसको सारा काम तो नहीं, लेकिन ज्यादातर काम करने को दिया। मीनाक्षी ने पूरे उत्साह से विभिन्न पकवान बनाए और सभी के आने की राह देखने लगी।

सबसे पहले मीनाक्षी के माता पिता ही आए। समीर ने दोनों के पैर छू कर दोनों का अभिनन्दन किया। मिसेज़ वर्मा अपने बांके दामाद को चूमे बिना न रह सकीं। वर्मा जी उनके जितना एक्सप्रेसिव तो नहीं थे, लेकिन उन्होंने भी समीर के कंधों पर हाथ रख कर उसकी कुशल क्षेम पूछी। अपनी बेटी को देख कर दोनों ही बहुत खुश हुए - वो बहुत खुश और स्वस्थ दिख रही थी। उसके चेहरे पर वैसी मुस्कराहट थी, जैसी कई वर्षों पहले होती थी। मिसेज़ वर्मा तो मीनाक्षी के साथ रसोई चलीं गईं उसका हाथ बँटाने और साथ ही एकांत में उसका हाल चाल लेने। समीर और वर्मा जी अकेले ड्राइंग रूम में रह गए।

वो समीर से बात करने में थोड़ा हिचकिचा रहे थे। ज्यादातर इधर उधर की ही बातें कर रहे थे। असहज थे। ‘काम कैसा चल रहा है’, ‘ऑफिस में सब ठीक है’, ‘बढ़िया घर है’, ‘कॉलोनी की अच्छी लोकेशन है’ वगैरह वगैरह। कुछ देर के बाद उनकी बातें घूम फिर कर राजनीति की चर्चा पर आ गई। जब पुरुषों के बीच में उतनी जान पहचान नहीं होती, तब उनके लिए कारगिल, पार्लियामेंट पर आतंकवादियों का हमला, गोधरा - यह सब डिसकस करना ज्यादा आसान होता है। यह सब टॉपिक्स एक न्यूट्रल ग्राउंड पर होते हैं - इसलिए यहाँ व्यक्तिगत ठेस लगने की के कम चान्सेस होते हैं।

वर्मा जी भी क्या करें! उनके मन में एक दुविधा सी थी - समीर उनके बेटे का मित्र है और समीर उनकी बेटी का पति भी है। अब वो किस वाले समीर से बात करें, उनको समझ ही नहीं आती। एकलौती पुत्री के पिता होने के नाते वो शुरुवात में ही चाहते थे कि समीर से पूरी निर्लज्जता से पूछ लें, कि तुम जैसे विवाह वाले दिन थे वैसे ही हो अभी तक, या अभी अपना रंग बदल दिया? समाज का सताया हुआ पुरुष और करे भी तो क्या करे?

लेकिन जब वो अपनी बेटी के मुखारविंद पर प्रसन्नता और आत्मविश्वास की चमक देखते हैं, तो यह प्रश्न ही उनके लिए बेमानी हो जाता है। उनके मन में एक ग्लानि का भाव भी आ जाता है। यह लड़का जिसने उनकी पगड़ी उछलने से बचा लिया, जिसने उनका समाजिक और आत्म सम्मान दोनों ही न सिर्फ बचा लिया, बल्कि बढ़ा भी दिया, उस लड़के बारे में वो अभी भी ऐसा सोचते हैं यह सोच कर उनको ग्लानि हुई।

वो कमरे की दीवारों पर समीर और मीनाक्षी की अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों के साथ 2 - 3 मढ़ी हुई तस्वीरें लगी देखते हैं। मीनाक्षी ने उन तस्वीरों में पाश्चात्य परिधान पहना हुआ है। ‘कैसी प्यारी सी लगती है वो!’ उसकी मुस्कान देख कर वर्मा जी को अच्छा लगता है। उसकी यह मुस्कान देखे तो एक मुद्दत हो गई है। उनको याद था कि जब उसकी शादी तय हुई थी, तब भी वो ऐसी खुश नहीं थी। बिटिया सब देख रही थी - कैसे उसके पिता का संचित धन उसकी शादी के व्यर्थ के इंतजाम में जाया हो रहा था। वो कैसे खुश होती?

बेटी से जब वो एकांत में पूछते हैं तो बेटी उनके दामाद का ऐसा बखान करती है की मानों मायके में उसको पिंजरे में बंद कर के रखा गया था। फिर उनको लगा कि शायद यह बात सही ही हो - उन्होंने मीनाक्षी को पारम्परिक तरीके से पाल पास कर बड़ा किया है। बस जो बात उन्होंने बाकियों से भिन्न करी वो यह थी कि उन्होंने उसको पढ़ाने लिखाने में कोई कोताही नहीं करी। बाकी संस्कार तो पूरे दिए। खैर, उनकी बिटिया प्रसन्न है! और क्या चाहिए।

समीर की सास के लिए उससे बात करना, वर्मा जी की अपेक्षा ज्यादा आसान साबित हुआ। ‘बेटा तुम अच्छे से हो?’, ‘मेरी बेटी तुम्हारा ख़याल रखती है ठीक से?’, ‘हर काम में दक्ष है। इसलिए निःसंकोच जो चाहिए, उसको बोल दिया करो’, ‘थोड़ा ढंग से खाया पिया करो…. कमज़ोर से लग रहे हो’ वगैरह।

वो स्त्री हैं। उनको समझ आता है अपनी बेटी का हाव भाव। जब मीनाक्षी रह रह कर मुस्कुराते हुए समीर को देखती है, तो वो समझ जाती हैं कि अंततः उनकी बेटी को एक सुखी घर मिल गया है। जब वो समीर को मीनाक्षी का हाथ बँटाते देखती हैं, तो वो समझ जाती हैं कि समीर उनकी बेटी को प्रेम से रखता है। वो देख लेती हैं कि उनकी बेटी स्वस्थ है। उसके चेहरे पर एक नई लालिमा है।

कुछ देर में उनके समधी भी आ जाते हैं।

“माफ़ कीजिएगा भाई साहब! आने में ज़रा देर हो गई। दरअसल पंद्रह अगस्त, दिवाली, और छब्बीस जनवरी को मेरे ऑफिस में मैं दावत का इंतजाम रखता हूँ। बेटे के की शादी के कारण इस बार की दावत थोड़ा ज्यादा हो गई। हा हा हा हा!”

“हा हा हा हा हा!” वर्मा जी समझ गए कि कैसी पार्टी हुई थी।

मीनाक्षी की माँ सब देख रही हैं।

समीर की माँ उनसे मिलने से पहले मीनाक्षी से मिलती हैं। वो उसको गले लगाती हैं, और उसको चूमती हैं। उसके कान में सहेलियों की तरह खुसुर पुसुर करती हैं। मीनाक्षी भी दाँत निकाले अपनी सास की बातों पर अल्हड़ता से हंसती है। यह सब करने के बाद फिर आ कर वो उनसे और उनके पति से मिलती हैं। मीनाक्षी की माँ बिलकुल भी बुरा नहीं मानतीं अगर समीर की माँ उनसे न भी मिलतीं! क्योंकि उनको एक बात का पक्का विश्वास हो गया था -

‘सच में, उनकी बेटी इस घर में बहू नहीं, बेटी ही बन कर आई है!’

थोड़ी ही देर बाद आदेश भी आ जाता है। और घर में हंसी ठहाकों का दौर चलने लगता है।
 
रात्रिभोज के बाद वर्मा जी, समीर के पिता से बोले, “भाई साहब, हमारी इच्छा है कि बिटिया को घर लिवा लाएँ। शादी के बाद से आई नहीं।”

“भाई साहब, अब ये तो आप मीनाक्षी बिटिया से ही पूछ लीजिए। वो जैसा चाहेगीं वही होगा। हमारी तरफ से कोई रोक-टोक थोड़े ही है!”

“बोलो बिटिया!”

“पापा, वो मैं.... अभी नहीं।” मीनाक्षी ने तपाक से बोला, “मैं अभी नहीं आ सकती। अभी तो यहाँ का ही सब सेटअप करना है। और नई नई जॉब है।”

पिता के चेहरे पर निराशा देख कर वो आगे बोलती है, “दशहरा या दिवाली पर प्लान करते हैं।”

कह कर उसने समीर की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक नटखटपन था। मिसेज़ वर्मा से वो नटखटपन छुप न पाया। वर्मा जी यह सब नहीं देख पाते। आदेश अपने दोस्त से बतियाने में व्यस्त था। वर्मा जी कुछ बोलने वाले हुए ही थे, कि मिसेज़ वर्मा ने उनको रोक दिया।

“ठीक है बेटा! हाँ, सही बात है अभी कैसे आओगी! जब भी फुर्सत मिले आ जाना। समीर बेटे के साथ।”

वर्मा जी को आश्चर्य हुआ। उनकी ही तरह उनकी पत्नी भी चाहती थीं की मीनाक्षी घर आ जाए, और कुछ समय साथ में बिताए। लेकिन यहाँ तो उसका सुर ही पलट गया।

बाद में जब उन दोनों को कुछ क्षणों का एकांत मिला, तो वो अपने पति से मुस्कुराते हुए बोलीं, “बिटिया को लिवा लाने की बात छोड़ दीजिए। वो बहुत खुश है यहाँ। मैं बताऊंगी आपको बाद में। लेकिन यकीन मानिए मेरा, मीनाक्षी बहुत खुश है।”

खाने के बाद दोनों समधी लोग समीर के पिता जी के यहाँ चले गए। आदेश यहीं रह गया। दोस्त और दीदी के साथ समय बिताने के लिए। तीनों ने कुछ देर तक गप्पें लड़ाईं, लेकिन फिर मीनाक्षी उनींदी हो कर चली गई,

“मैं सोने जा रही हूँ। जब आप दोनों की बातें ख़तम हो जाएँ, तो आ जाइएगा। आदेश, तेरे सोने का इंतजाम बगल वाले कमरे में हैं। किसी चीज़ की ज़रुरत हो तो बता देना। ठीक है?” जाते जाते वो कहती गई।

“जी दीदी”

आदेश और समीर देर रात तक दोनों बियर की चुस्कियाँ लेते हुए बतियाते रहे।

“भाई, और सुना..” जब आदेश को लगा कि दीदी दो गई होगी, तब उसने समीर से पूछा।

“सब बढ़िया है यार!”

“हाँ! बढ़िया तो लग रहा है। दीदी तो बहुत बढ़िया लग रही है।”

“अरे यार! तेरी बहन को क्या मैं कोई दुःख दूँगा?”

“बिलकुल भी नहीं! ऐसा मैंने कब कहा? यह तो मैं सोच भी नहीं सकता हूँ! अगर मुझे ऐसा कोई भी अंदेशा होता, तो क्या अपनी दीदी की शादी तुमसे कहने को कहता? मैं तो तुम्हारे बारे में पूछ रहा था… कि कहीं दीदी तुमको तंग तो नहीं करती।”

उत्तर में समीर मुस्कुराया।

“हम्म.. लगता है कि नहीं करती। मुझको तो बहुत परेशान करती थी, बाबा! अच्छा खैर... एक बात तो बता... तूने यार कुछ... सेक्स वेक्स किया या नहीं?” आदेश ने दबी आवाज़ में समीर से पूछा।

“अबे तू क्या पूछ रहा है? कुछ प्राइवेसी तो रहने दे!”

“अरे..! तू मेरा भाई है!”

“हाँ.. और मेरी बीवी तेरी बहन है.. वो भी बड़ी!”

“ये तो और भी अच्छी बात है! और इसीलिए तो पूछ रहा हूँ। तू मेरा भाई है.. दोस्त नहीं! इसलिए दीदी के साथ साथ मुझे तेरी ख़ुशी की भी फ़िक्र है!”

“हा हा”

“सच बता यार... तुम दोनों ने अभी तक कुछ किया या नहीं?”
 
“नहीं यार.. अभी तक... नहीं। इतना आसान नहीं है यह सब!”

“देख भाई.. तूने उससे शादी करी है। तो...”

आदेश की बात को बीच में ही काटते हुए समीर बोला, “हाँ.. हाँ हमने शादी करी है। लेकिन टाइम चाहिए इन सब बातों के लिए! देखो न, किन हालात में हमारी शादी हुई थी!”

“हम्म। समझता हूँ भाई। सब समझता हूँ। बस पूछ लिया!”

“यार, मैं उसको जानना समझना चाहता हूँ। मैं पहले उसका दोस्त बन जाऊँ, मेरे लिए ये ज़रूरी है। सेक्स तो होता रहेगा।”

“तुझे वो पसंद तो आती है न?”

“न पसंद आती तो शादी करता?”

“नहीं नहीं, मेरा मतलब वैसा पसंद आने से नहीं है। दीदी तुझे सेक्सी तो लगती है?”

“ओह गॉड! मैंने कैसे खुद को रोका हुआ है, मैं ही जानता हूँ!”

“बस भाई तसल्ली हो गई मुझे!” फिर कुछ देर रुक कर, “सोच यार, इंजीनियरिंग के टाइम में हम लोग कैसे सेक्स की बातें कर लेते थे। कितने हल्केपन से... जैसे, कुछ होता ही नहीं! जैसे वो सिर्फ मसाला हो। याद है तुमको? मैं तुझे कहता रहता था, कि मेरा छोटा है.... तो तेरी बीवी की मैं पहले ड्रिलिंग कर दूँगा, मेरे बाद तू बोरिंग कर लियो। लेकिन अब देखो - मेरी अपनी ही दीदी तुमसे ब्याही है। अब लगता है कि ऐसी छिछोरी बातें नहीं करनी चाहिए! नहीं करनी चाहिए थीं।”

समीर मुस्कुराया, “अरे यार, तू भी क्या सोचने में लग गया! इतना मत सोच। वो हमारे लड़कपन के दिन थे। उन दिनों की बातें सोच कर इतना इमोशनल नहीं बनना चाहिए।”

“थैंक यू यार! तू सच्चा दोस्त है! भाई है मेरा! भाई से बढ़कर! आई लव यू!”

“लव यू टू!” समीर मुस्कुराते हुए बोला।

“भाई देख... एक रिक्वेस्ट है। थोड़ा आराम से करना, जब भी करना। तेरा लण्ड बड़ा सा है, और दीदी..... वो भले ही उम्र में बड़ी हैं, लेकिन हैं तो कुँआरी ही न!”

“अबे यार!”

“अबे यार नहीं! समझा कर! और हाँ, अब जल्दी कर लेना। बहुत वेट मत करना। आखिर पति पत्नी हो!”

“साले, अब तू पिटेगा।”

“हा हा.... अरे साला ही तो हूँ मैं तेरा!”

“हा हा.... अरे मेरी बात बहुत हो गई। तू बता, तुझे कोई लड़की मिली अभी तक या अभी तक ऐसे ही है?”

........
 
समीर मीनाक्षी से सम्भोग करने के लिए हमेशा से आतुर था। लेकिन सैद्धांतिक तौर पर वो तैयार नहीं था - पहले प्रेम होता है, फिर संसर्ग! उसका बस यही मानना था। और आज वो मौका आ गया था - इस अवसर के लिए तीन महीने से ऊपर तक उसने इंतज़ार किया था। मन ही मन समीर को कई प्रश्न सता रहे थे.... जैसे कि, क्या मीनाक्षी भी तैयार होगी? क्या वो भी उससे उतना ही प्रेम करती है? क्या वो मेरा लिंग ले सकेगी? उसका शरीर कैसा होगा? उसके स्तन कैसे होंगे? उसके निप्पल मुँह में लेने में कैसे लगेंगे? उसकी योनि कैसी होगी? उसके होंठों का स्वाद कैसा होगा? उसकी योनि का स्वाद कैसा होगा? इत्यादि।

समीर ने इस सुहागरात को ख़ास बनाने के लिए रैडिसन ब्लू में कमरा बुक किया था। होटल स्टाफ को उसने यह ख़ास निर्देश दिया कि डिनर के बाद, रात में साढ़े आठ या नौ बजे, उनको सुहागरात के अनुकूल एक सुसज्जित कमरे में शिफ्ट कर दिया जाए। उसने कह रखा था कि आज उसकी और उसकी पत्नी की पहली रात है। लिहाज़ा यह रात यादगार होनी चाहिए। इसलिए स्पेशल इंतजाम में कोई कोताही न हो।

समीर मीनाक्षी को वो वहां डिनर कराने के बहाने से लाया था। पहले से बता के रखने से संभव था कि वो ना-नुकुर करने लगती। इसलिए आज का प्लान अगर सरप्राइज ही रहे तो बढ़िया था। मीनाक्षी पहले ही थोड़ा ना-नुकुर कर रही थी, ‘फाइव स्टार में जा कर खाना क्यों खाना है? बिना वजह का खर्च! और आज कोई ओकेशन भी तो नहीं है!’ वगैरह वगैरह! बड़ी मुश्किल से समीर ने उसको भरोसा दिलाया कि उसका आज यहाँ डिनर करने का मन था।

होटल की ही अनुशंसा पर उसने डिनर मेनू पहले से ही तय कर के रखा था। उधर मीनाक्षी इस बात पर आश्चर्य कर रही थी कि वो दोनों इतनी देर से टेबल पर बैठे हैं, और अभी तक कोई आर्डर लेने भी नहीं आया! और इधर बिना कोई आर्डर दिए ही एक मल्टी-कोर्स स्प्रेड उसकी टेबल पर सर्व कर दिया जाता है, एक उम्दा वाइन के साथ!

मीनाक्षी समझ जाती है कि यह डिनर उसको सरप्राइज करने के लिए ही समीर ने प्लान किया हुआ था। वो खुश हो जाती है। समीर की यह अदा उसको पसंद है। खाना एकदम लाजवाब था।

डिनर ख़तम होने पर एक वेटर ने समीर से कहा, “सर, योर गिफ्ट इस रेडी! वी होप यू विल लाइक इट वैरी मच!”

मीनाक्षी समझी नहीं कि डिनर के लिए कोई होटल गिफ्ट क्यों देने लगा!

खैर, होटल का अशर समीर और मीनाक्षी को होटल के ऊपरी मंजिल पर बने एक कमरे में ले आया। और दरवाज़ा खोल कर कमरे की पास-की समीर को थमा दी, और ‘शुभ रात्रि’ बोल कर वहाँ से चला गया। होटल स्टाफ ने उनके शयनकक्ष को बहुत शानदार तरीके से सजाया था - पूरे कमरे में फूल ही फूल। बिस्तर पर गुलाब के फूलों की पंखुड़ियाँ। पूरे कमरे में फूलों की ही महक! टी-स्टैंड पर स्पार्कलिंग वाइन की बोतल एक कूलिंग बकेट में रखी थी, और उसके साथ दो वाइन ग्लास रखे हुए थे। दूसरे टी-स्टैंड पर बेल्जियन चॉकलेट का डब्बा रखा हुआ था। कमरे में मूड लाइट्स थीं, और कमरे में पहले से ही एक धीमा, रोमांटिक संगीत बज रहा था। स्टाफ की शरारत थी या कि दूर की सोच, लेकिन वहाँ पर कामसूत्र का एक पैकेट भी रखा हुआ था।

मीनाक्षी जब कमरे में आई तो इस पूरे बंदोबस्त को देख कर दंग रह गई। पहले तो उसको यह सोच कर हैरानी हुई कि वो दोनों एक कमरे में क्यों जा रहे हैं, लेकिन उसने जैसे ही उसने अंदर का नज़ारा देखा, उसको तुरंत सब कुछ समझ आ गया। वो समझ गई कि मिलन के इंतज़ार की घड़ियाँ अब ख़त्म हो गई थीं। वो समझ रही थी कि उसके कौमार्य के दिन में अब बस मिनट ही शेष रह गए थे। लेकिन यह सब देख कर उसको बहुत सुकून हुआ और उसका शरीर रोमांच से भर गया - समीर ने उसके मिलन के इन पलों को यादगार बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। समीर खुद भी अपने प्लान में होटल स्टाफ के सहयोग को देख कर आश्चर्यचकित था। उसको उम्मीद नहीं थी कि वो लोग इतना उम्दा काम करेंगे।

मीनाक्षी ने एक हल्की मुस्कान के साथ समीर को देखा।

“मिनी, मुझे लगता है कि अब हम एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं। शायद यह सही समय है कि हम एक दूसरे को पूरी तरह जान लेने की कोशिश करें!”

समीर की बात सुन कर मीनाक्षी की आँखें शर्म से झुक गईं। वो समझ रही थी कि समीर क्या कह रहा था।

“लेकिन मुझे ख़र्राटे अभी भी आते हैं!”

समीर की बात पर मीनाक्षी की मुस्कान और चौड़ी हो गई।

“नहीं आते हैं! मुझे मालूम है!” मीनाक्षी ने मुस्कुराते हुए, शरारत भरी आवाज़ में कहा।

फिर न जाने उसके मन में क्या आया कि वो अचानक ही समीर के पैरों में गिर पड़ी। एक पल को उसको लगा कि मीनाक्षी को शायद चक्कर आ गया। लेकिन जब उसके मीनाक्षी को अपने पैर छूते महसूस किया, तो उसने मीनाक्षी को कंधों से पकड़ कर उठा लिया और कहा,

“अरे! आप यह क्यों कर रही हैं?”

“इसलिए कि मैंने मन से आपको अपना पति माना है!”

“अरे पगली, तो फिर उसके लिए पैर पड़ने की क्या ज़रुरत है? आप तो मेरे दिल की रानी हैं! आपकी जगह मेरे दिल में है! पैर में नहीं! और... वैसे भी आप मुझसे उम्र में बड़ी हैं। उल्टा तो मुझे आपके पैर पड़ने चाहिए।”

इतना सुनते ही मीनाक्षी समीर से लिपट गई।

अलका मीनाक्षी की अनन्य सहेली है, और उसको पता है कि मीनाक्षी शादी होने के तीन महीने बाद भी वो कुँवारी है। यह जान कर अलका को आश्चर्य भी हुआ, और अच्छा भी लगा। आश्चर्य इस बात पर कि मीनाक्षी जैसी सुन्दर लड़की को उसके पति ने तुरंत ही नहीं भोगा। उसमें कितना आत्मनियंत्रण होगा! और अच्छा इस बात पर लगा कि अभी भी समीर जैसे लोग हैं दुनिया में, जो अपनी पत्नी को सिर्फ भोग्या ही नहीं समझते। उसके खुद के पति ने तो उसके साथ अकेलेपन के पहले क्षणों में ही मैथुन कर लिया था। अलका को सम्भोग के वो पल बलात्कार जैसे ही लगे थे। उसकी अपने पति से पहले से कोई जान पहचान तो थी नहीं, और न ही कोई बात चीत। ऐसे में उन दोनों का पहला संपर्क, पहली पारस्परिक क्रिया अगर सम्भोग हो, तो उसको और क्या नाम दिया जाए? वह उस घटना को बस इसलिए बर्दाश्त कर सकी क्योंकि वो दोनों पति-पत्नी थे। नहीं तो न जाने उसके मानस पटल पर कैसा प्रभाव पड़ता! इसलिए वो मीनाक्षी के लिए खुश थी। उसको ऐसा पति मिला था, जो पहले उसका दोस्त, हमराज़, और प्रेमी बनने की कोशिश कर रहा था.... और उसके बाद में उसका पति!
 

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