• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Romance संयोग का सुहाग

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
ऐसा नहीं है जब पहली रात को ले कर मीनाक्षी के मन में कौतूहल नहीं था। जैसे जैसे वो समीर को और समझती जाती, वैसे वैसे वो यह भी सोचती जाती कि जल्दी ही दोनों का मिलन होगा। वो भी चाहती थी कि वो समीर को वैसा आनंद दे सके, जैसा उसकी इच्छा हो! इसलिए वो जानना चाहती थी कि पति पत्नी क्या क्या करते हैं जब वो साथ होते हैं। जब मीनाक्षी ने अलका से पूछा कि आखिर होता क्या है सुहागरात में तो अलका ने कहा,

‘प्यारी बहना, सुहागरात के उन क्षणों में पति शेर होता है और बेचारी पत्नी बकरी। और तेरा पति तो वैसे भी माशा-अल्लाह एकदम तगड़ा है - शेर के माफ़िक। ऐसे में तुझे कुछ करने, या न करने की क्या परवाह? बस, अपनी टांगें चौड़ी करके लेट जाना - वो जैसा चाहेगा, करेगा!’

‘छीः! कितनी गन्दी है अलका!’

कई जगह उसने पढ़ा है, और कई लोगों से सुना भी है कि स्त्री पुरुष का सच्चा यौन संबंध दो शरीरों का मिलन ही नहीं बल्कि दो आत्माओं का भी मिलन होता है। शादी की रीतियों से वो दोनों परिणय सूत्र में तो बंध ही गए हैं, और अब जीवन सूत्र में बंधना बाकी रहा है। भगवान की कृपा से वो दिन भी आ ही गया। मीनाक्षी के मन में बहुत दिनों से यही विचार आ रहे थे। और अब जब यह सभी विचार मूर्त रूप ले रहे हैं, तब उसको लज्जा आ रही थी।

एक संछिप्त से आलिंगन के बाद समीर उसका हाथ पकड़ कर बिस्तर पर ले गया। खुद बैठ कर उसने मीनाक्षी को अपने पैरों के बीच खड़ा कर लिया। इतने दिनों से खुद पर संयम रखने वाला समीर इस समय अधीर हो रहा था - लग रहा था कि उसको अब किसी भी चीज़ की परवाह नहीं है। मीनाक्षी के दोनों हाथ, अपने दोनों हाथ में लिए उसको कई पल निहारता रहा। मीनाक्षी समझ रही थी कि समीर के मन में क्या चल रहा है। उसको यह भी मालूम था कि आज उसके यौवन का उद्घाटन होने वाला है। फिर उसके मन में थोड़ी सी घबड़ाहठ उठी - कहीं समीर ने उसको पसंद न किया तो? कहीं उसको सम्भोग की मनोवाँछित संतुष्टि नहीं मिली तो?

समीर यह सब नहीं सोच रहा था। मीनाक्षी के सौंदर्य सागर में गोते लगाता हुआ वह वह उसे चूम लेना चाहता था। मीनाक्षी उसके होठों से बस हाथ भर की ही दूरी पर थी। इस समय समीर की मनःस्थिति ऐसी थी कि वो मीनाक्षी को चूमे बिना नहीं रह सकता। मीनाक्षी को चूमना, उसके रूप और मदमाते यौवन का जाम चखने जैसा है। समीर ने मीनाक्षी की ठोढ़ी पकड़ कर उसके होंठों को चूम लिया। मीनाक्षी ने चुम्बन के पूर्वानुमान में अपनी आँखें बंद कर ली थीं; जैसे ही उसके होंठ समीर के होंठों से छुए, दोनों के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई।

चुम्बन भी एक अद्भुत वस्तु है - चुम्बन की प्रक्रिया में आपका कुछ अंश दूसरे की त्वचा में समां जाता है, सदा के लिए। सदा के लिए इसलिए कहा क्योंकि आप चुम्बन समाप्त हो जाने के बाद भी उसको हमेशा महसूस कर सकते हैं। यह एक चमत्कारिक क्रिया है, जिसमें प्रेम के संकेतों का इतने अंतरंग प्रकार से आदान प्रदान होता है। संभव है कि इसी कारण बहुत सारे लोग चुम्बन करते समय अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। बस एक चुम्बन।

मीनाक्षी की आँखें खुलीं। समीर उसके हाथों को अपने हाथ में ले कर न जाने क्या निरीक्षण कर रहा था।

समीर ने कुछ देर उसके हाथों को देखा और फिर कहा, “नाइस!”

“क्या हुआ?” मीनाक्षी ने कौतूहलवश पूछ लिया।

“आप इसको देख रही हैं? इसको शुक्र पर्वत कहते हैं। माउंट ऑफ़ वीनस। इसका साइज सेक्स संबंधों की क्वालिटी और कैपेसिटी के बारे में बताता है। आपका देखिए - कितना उभरा हुआ है? इसका मतलब समझीं?”

मीनाक्षी ने ‘न’ में सर हिलाया।

“इसका मतलब है कि हमारी सेक्स लाइफ एकदम मज़ेदार, एकदम धमाकेदार होने वाली है!”

“धत्त!” मीनाक्षी शरमा गई।

“अरे! इसमें धत्त वाली क्या बात है? ये… मेरा भी देखिए! आप जैसा ही है! उभरा हुआ। एकदम बढ़िया मेल है हमारा!”

समीर की ऐसी निर्लज्ज बात का मीनाक्षी क्या जवाब दे? वो बस चुपचाप नज़रें झुकाए बैठी रही - अंदर ही अंदर मुस्कुराती रही। समीर ने आज तक किसी भी लड़की के साथ ऐसी बातचीत नहीं करी थी - इंजीनियरिंग कॉलेज में ज्यादा मौका नहीं मिला; और नौकरी लगने के लगभग साथ ही साथ उसकी शादी हो गई। अपनी उम्र के बाकी लड़कों के समान समीर भी मस्तराम जैसे साहित्य और नीले-फीते वाले चलचित्रों से प्रभावित रहा था। उन्ही से मिली सीख के कारण उसको लगता था कि प्रथम मिलन के खेल को देर तक चलाना है - तभी पत्नी उसकी मुरीद बनेगी। और अगर मिलन का खेल खेलना है तो बीवी को भी तो शीशे में उतारना ही पड़ेगा। इतनी अंतरंग बात समीर ने, मीनाक्षी से आज पहली बार करी थी। वैसे भी पति पत्नी में छुपाने जैसा कुछ होना भी नहीं चाहिए।

“लेट अस सेलिब्रेट?” समीर ने शेम्पेन की बोतल निकालते हुए पूछा।

“वाइन नहीं, चाय पियूँगी।”

“अरे! आज की रात चाय! न न न न न न! बिलकुल नहीं.. चाय तो नहीं मिलेगी आज! ये स्पार्कलिंग वाइन है। शेम्पेन! चाय से बढ़िया! बहुत बढ़िया। पी कर बताइए - बढ़िया है या नहीं?”

“अभी कुछ देर पहले ही तो पिया है मैंने! और मत पिलाइए।”

“हम्म.. ओके!”

समीर ने उठ कर संगीत की आवाज़ थोड़ी बढ़ाई। वाइन ग्लास में शेम्पेन भर कर चुस्कियाँ लेते हुए संगीत की ताल पर उसने मीनाक्षी की तरफ कदम बढ़ाए। मीनाक्षी मुस्कुराते हुए अपने पति को देख रही थी।

‘आज न जाने क्या क्या बदमाशियाँ करने वाले हैं!’

एक हाथ में वाइन लिए समीर से दुसरे हाथ से मीनाक्षी को बिस्तर पर लिटाया और धीरे धीरे उसके कुर्ते के बटन खोलने लगा। एक हाथ से बटन खोलना आसान है, लेकिन एक हाथ से कुर्ते को उतारना बहुत मुश्किल काम है। मीनाक्षी को समीर का मंतव्य समझ में आ रहा था। लेकिन वो अपने खुद के ही चीर-हरण में बढ़ चढ़ कर हिस्सा नहीं लेना चाहती थी। एक तो उसको शरम आ रही थी, और दूसरा वो इस बात से झिझक रही थी कि न जाने समीर क्या सोचे!
 
समीर स्टाइल मारने के चक्कर में वाइन ग्लास छोड़ नहीं रहा था। वैसे उसको समझ में आ गया था कि मीनाक्षी का कुर्ता ऐसे एक हाथ से ही तो उतरने वाला नहीं था। फिर उसको ख़याल आया कि अपनी बीवी को उसने ढंग से चूमा तक नहीं है। यह ख़याल आते ही उसने मीनाक्षी के अधरों पर एक बार और चुम्बन जड़ दिया। मीनाक्षी भी उसको चूमना चाहती थी, लेकिन झिझक के कारण वो पहल नहीं कर पा रही थी। समीर कभी उसके होंठों को चूमता, तो कभी चूसने लगता। कभी वो उसके गालों को चूमता, तो कभी गले को। प्रत्युत्तर में मीनाक्षी कसमसाती हुई बस उम्… उम्… ही कर रही थी। उससे जैसा बन पड़ रहा था, समीर को चूम रही थी।

उत्तेजना में समीर का खाली हाथ मीनाक्षी के स्तनों पर भी फिरने लगा। समीर की इस हरकत ने मीनाक्षी की कामेक्षा जगाने के लिए एक स्विच का काम किया - उसको अपनी जाँघों के बीच कुछ कसमसाहट सी, कुछ गीलापन सा महसूस होने लगा। जब समीर उसके स्तनों को दबा कर उनका जायज़ा ले चुका, तब वो नीचे झुक कर वक्ष-विदरण में अपना मुँह डाल कर चूमने लगा। यह सब मीनाक्षी के लिए बिलकुल अनूठा अनुभव था - उसको उम्मीद ही नहीं थी कि यह सब करने में इतना आनंद आ सकता है। मीनाक्षी के कंठ से मीठी सिसकियाँ निकलने लग गई।

फिर उसका हाथ मीनाक्षी की पीठ पर आ गया, और कुर्ते के अन्दर हाथ डाल कर उसकी पीठ को सहलाने लगा।

“मिनी?”

“हम्म?”

“मेरे पास आपके लिए कुछ है।”

कह कर समीर मीनाक्षी के ऊपर से हट गया। सच कहें तो मीनाक्षी का मन समीर से अलग होने को बिलकुल भी नहीं हुआ। लेकिन उसने धीरज रखा और समीर क्या दिखाने वाला था, उसका इंतज़ार लगी। समीर ने कमरे की अलमारी में रखी सेफ खोली, और उसमे से एक सुनहरे रंग का मखमली बटुआ निकाला। प्लान के मुताबिक समीर ने यह पहले ही होटल के सुपुर्द कर दिया था। बिस्तर पर वापस आ कर उसने उस बटुए में से सोने की एक लम्बी जंजीर निकाली - साधारण सा डिजाइन था - लम्बी जंजीर और उसके बीच में पतली जंजीरों की तीन लड़ियाँ। उसकी बनावट देख कर लग रहा था कि वो एक करधन है।

समीर ने मीनाक्षी के कुर्ते को थोड़ा ऊपर करके उसकी कमर पर वो करधन बांध दी। फिर उसकी नाभि के नीचे वाले हिस्से पर एक चुम्बन लेते हुए बोला, “अगर आप यह (कुर्ते को पकड़ कर) निकाल दें, तो आपकी कमर से इस करधन की लटकन बहुत सुन्दर लगेगी।”

मीनाक्षी अच्छी तरह समझ रही थी कि समीर क्या चाहता था। वो चाहता तो खुद ही मीनाक्षी के कपड़े उतार सकता था, और वो उसको मना न करती। बिलकुल भी मना न करती। लेकिन समीर चाहता था कि इस खेल में मीनाक्षी की भी बराबरी की हिस्सेदारी हो। लेकिन मीनाक्षी तो आज शर्मीली दुल्हन जैसा ही बर्ताव करना चाहती थी। वो चाहती थी कि पहली बार समीर ही उसको निर्वस्त्र करे। मीनाक्षी बहुत हलके से मुस्कुराई और फिर उसने अपने हाथ ऊपर उठा दिए। इशारा समझते हुए समीर ने बिना कोई देर किये उसके कुर्ते को निकाल फेंका।

मीनाक्षी वैसे तो रोज़मर्रा पहनने वाली कॉटन की सफ़ेद ब्रा पहनती थी, लेकिन आज उसने न जाने क्या सोच कर काले रंग की लेस वाली ब्रा पहनी हुई थी। उसके शरीर के रंग और आकार पर वो काले रंग का छोटा सा वस्त्र वाकई कामुक लग रहा था। मीनाक्षी को लगा कि समीर की तवज्जो पा कर उसके स्तन थोड़े भारी से हो गए थे। शर्म से उसने अपनी आँखें बंद कर ली। स्तनों के बीच फँसा हुआ उसका मंगलसूत्र उसकी नग्नता को और भी कामुक बना रहा था।

स्वयं रति का रूप इस समय धीरे धीरे अनावृत हो रही थी, और समीर पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था। कामावेश से अधीर हो कर समीर ने मीनाक्षी को अपने सीने से लगा लिया। वो कभी उसको चूमता, तो कभी चूसता और साथ ही साथ उसकी पीठ को सहलाता। मीनाक्षी का शरीर एक अनूठे रोमांच में डूबने लगा।

“मिनी, मेरी जान! अपनी आँखें खोलो ना।” समीर ने उसकी ठोड़ी छूते हुए कहा।
 
मीनाक्षी क्या विरोध करती? और क्यों करती? उसने अपनी आँखें खोल दीं। समीर के आलिंगन में वो पहले ही समाई हुई थी। इसी कारण मीनाक्षी को पता ही नहीं चला कि उसकी ब्रा का हुक कब खुल गया। मालूम पड़ता भी, तो भी वो क्या करती? आज की रात, और अब आगे आने वाली अनेक रातों में विरोध करने जैसा कुछ नहीं। जैसे ही आलिंगन थोड़ा ढीला हुआ, समीर ने मीनाक्षी की ब्रा खींच कर उसके शरीर से अलग कर दी। नग्नता का प्रदर्शन होने से पहले ही मीनाक्षी ने मारे शर्म के अपने स्तनों को अपनी बाहों में भींच लिया। उसका दिल जोर जोर से धड़कने लगा।

‘बदमाश कहीं के!’

समीर ने उसकी हथेलियां हटाने का कोई प्रयास भी नहीं किया। बस, उसके स्तनों के खुले हुए गोलार्धों को बारी बारी से चूमने लगा। उसके चुम्बनों से मीनाक्षी के निप्पल कड़े हो कर उसकी हथेलियों में चुभने लगे। मीनाक्षी को लगता था कि उसको अपने शरीर के बारे में सब मालूम है। लेकिन समीर की हरकतों से उसको अपना एक अलग, एक नया ही रूप देखने और महसूस करने को मिल रहा था। उसकी योनि में आग सी लग गई।

‘ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ।’

इन विचारों में खोई हुई मीनाक्षी के हाथ कब अपने स्तनों से हट गए, उसको पता ही नहीं चला। समीर ने आज पहली बार किसी लड़की के स्तन वास्तविकता में देखे थे। एक बात उसने तुरंत देखी और वो यह कि मीनाक्षी के शरीर में यौवन की समुचित कसावट थी - वो न तो पतली थी, और न ही मोटी। एक सुन्दर, स्वस्थ शरीर! कसावट के साथ साथ उसके शरीर में स्त्र्योचित कोमलता भी थी। समीर ने मन भर कर मीनाक्षी के नग्न स्तनों को देखा - उसके अनुमान में मीनाक्षी के स्तन 34C साइज के होंगे। सुन्दर गहरे, लाल-भूरे रंग (टेरा रोज़ा रंग) के निप्पल मीनाक्षी के स्तनों की शोभा बढ़ा रहे थे। उनका इस समय बस एक ही उपयोग हो सकता था - उनको चूसना!

मीनाक्षी को अपने स्तनों की नितांत नग्नता का पता तब चला जब समीर उसका दाहिना निप्पल अपने मुँह में ले कर चूसने लगा। मीनाक्षी की एक मीठी किलकारी निकल गई। मीनाक्षी ने अपनी सुहागरात की परिकल्पना करी थी; लेकिन जो यह सब हो रहा था वैसे तो उसने कभी सोचा ही नहीं था। समीर मग्न हो कर बारी बारी से उसके दोनों स्तनों को पी रहा था। चूचकों से रोमाँच की ऐसी तरंगें निकल रही थीं जो मीनाक्षी के पूरे अस्तित्व को कम्पित कर दे रही थीं। इतने में ही मीनाक्षी की पूरी देह लहरा कर काँपने लगी। उसकी योनि में से रति-निष्पत्ति का मधु बह निकला। लेकिन समीर इस बात से पूरी तरह से अनजान था। मीनाक्षी भी नहीं समझ सकी कि उसको क्या हो गया - उसको एक अद्भुत आनंद की अनुभूति तो अवश्य हुई, लेकिन वो अनुभूति क्या थी और क्यों थी, उसको कुछ समझ नहीं आई। उधर समीर का सारा ध्यान स्तनपान के आनंद पर केंद्रित था। मीनाक्षी भी आज समीर को अपना सर्वस्व देने को तत्पर थी। समीर तभी रुका, जब उसका मन भर गया।

मीनाक्षी ने देखा कि उसके स्तनों का रंग और रूप दोनों ही बदल गया था। दोनों स्तनों पर चूसने, चूमने और काटने के निशान स्पष्ट दिख रहे थे। चूचकों का रंग गहरा हो गया था और दोनों चूचक उत्तेजनावश एक एक इंच लम्बे हो चले थे। लेकिन फिलहाल इस बात की शिकायत करने का कोई मतलब नहीं था। सम्भोग तो होना अभी बाकी ही था।

मीनाक्षी ने चूड़ीदार शलवार पहना हुआ था। जाहिर सी बात थी कि अगली बारी शलवार की थी। मीनाक्षी को इस बात पर अधिक आश्चर्य हो रहा था कि वो समीर के सामने समुचित नग्नावस्था को प्राप्त थी, लेकिन उसको जितनी शर्म आनी चाहिए थी, उतनी आ नहीं रही थी। खैर, समीर ने बिना देर लगाए उसकी शलवार का नाड़ा ढीला कर के शलवार को नीचे की तरफ खिसका दिया - ऐसा लगा कि वो मीनाक्षी को किसी भी तरह का विरोध करने का मौका नहीं देना चाहता हो।

शादी को ले कर मीनाक्षी ने नए नए वस्त्र खरीदे थे - जाहिर है कि उसके अन्तः वस्त्र भी नए ही थे। मीनाक्षी की पैंटी थी तो कॉटन की, लेकिन बहुत पतले कपड़े की थी। अलका ने ज़बरदस्ती कर के ख़रीदवाई थी ऐसी ही तीन जोड़ी पैंटी। बोली कि मीनाक्षी ‘माल’ लगेगी उसको पहने हुए। कैसा संयोग है, शादी के बाद आज ही पहली बार उसने उन अधोवस्त्रों को पहना, और आज ही उसका पति उसको निर्वस्त्र कर रहा है! समीर ने कुछ सोचा नहीं - उसका एक हाथ मीनाक्षी की जाँघों के बीच में योनि को छेड़ने लगा। इतनी पतली पैंटी में दिक्कत यह है कि वो हमेशा पारदर्शी ही रहती है - चाहे सूखी हो, चाहे गीली। और अगर एक बार काम-रस निकल गया हो, जैसा कि मीनाक्षी के साथ हुआ, तो योनि की सारी बनावट दिखने लगती है। उस समय भी यही हो रहा था - मीनाक्षी की योनि के दोनों होंठ साफ़ दिखाई दे रहे थे। पैंटी होने या होने का क्या फायदा जब उसकी सामने वाली पट्टी, उन दोनों होंठों के बीच धंस जाए!

समीर की छेड़खानी बढ़ती जा रही थी - उसके होंठ मीनाक्षी को चूमने में, एक हाथ उसके स्तन को दबाने कुचलने में, और दूसरा हाथ उसकी योनि को छेड़ रहा था। बीच बीच में कभी वो एक निप्पल मुँह में भर लेता, तो कभी दूसरा मुँह में लेकर चूसने लग जाता। उसके हाथों की छेड़खानी से ना सोचते हुए भी मीनाक्षी की जांघें खुद ब खुद खुलने लगी। जब समीर का हाथ उसकी योनि के चीरे पर पड़ा, तब जा कर मीनाक्षी को समझा कि वो अब समीर के सामने पूरी तरह से नंगी पड़ी है।

उसने थोड़ा चैतन्य हो कर अपने चारों तरफ का जायज़ा लिया - वो बिस्तर पर पीठ के बल लेटी थी; पूर्णतया नग्न थी; उसके सारे कपड़े कमरे में इधर उधर इस प्रकार फैले हुए थे जैसे वो कोई फ़ालतू चीज़ हों।

‘आज सचमुच में मेरा ‘मिस’ वाला स्टेटस गया’ यह सोच कर मीनाक्षी ने खुद को थोड़ा संयत करते हुए, खुद को अपने निकट भविष्य के लिए तैयार कर लिया। समीर उसके होंठो पर लम्बा लम्बा चुबन देते हुए चूसने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे वो मीनाक्षी के होंठों को ही नहीं, बल्कि उनकी लालिमा को भी चूस लेना चाहता हो।

इस फोरप्ले के दौरान न जाने क्यों, मीनाक्षी को अपने और समीर के बीच के उम्र के फासले का ध्यान हो आया। समीर उससे कोई नौ साल छोटा था; और आदेश आठ साल! मीनाक्षी को याद हो आया कि वो आदेश के बचपन में उसकी देखभाल ऐसे करती थी जैसे कि वो खुद उसकी माँ हो। और आदेश भी उसको अक्सर माँ जैसा ही मान और प्यार देता था। उसके छुटपन में मीनाक्षी ने न जाने कितनी ही बार उसकी तेल-मालिश करी, और उसको नहलाया, धुलाया। उस समय की बात याद आ गई - कैसे वो आदेश के नन्हे से छुन्नू से खेलती थी, उसको चुम्मियाँ देती थी। समीर का छुन्नू कैसा होगा? समीर तो आदेश से भी एक साल छोटा है। लेकिन देखो, कैसे उस पर अपना अधिकार जता रहा है! न उसकी उम्र का लिहाज़, और न ही कोई वर्जना। और समीर यह सब सोचे भी क्यों? आख़िर उसका पति जो ठहरा!
 
उसके होंठों पर अपने होंठ रखे हुए समीर ने अपने दोनों हाथ उसके स्तनों पर जमा लिए। मीनाक्षी को पुरुषों में मन में स्तनों के लिए होने वाली आसक्ति का ज्ञान था। घर के बाहर वो जब भी निकलती थी, वो देखती थी कि कैसे पुरुषों की आँखें उसकी छातियों पर चिपकी हुई रहती थीं। कैसे राह चलने वाले जवान, अधेड़ और बूढ़े लोग या तो चोरी छुपे, या पूरी निर्लज्जता से उसके और अन्य लड़कियों और महिलाओं के शरीरों की वक्रताओं की नाप-जोख करते रहते थे। उनकी नज़रें अपने शरीर पर चिपकी महसूस करके मीनाक्षी को बहुत घिनौना लगता था - लेकिन समीर इस समय जो कुछ भी कर रहा था, उसको बहुत अच्छा लग रहा था। अच्छा ही नहीं, वह चाहती थी कि समीर उसको ऐसे देखे, और यही सब करे। प्रेम और गन्दी वासना में शायद यही अंतर है।

मीनाक्षी ने शर्म से अपनी आँखें बंद कर लीं, और खुद को चादर से ढक लिया। समीर ने उस चादर को हटा दिया। लेकिन लज्जा के मारे मीनाक्षी ने अपनी छाती पर अपने हाथ आड़े तिरछे रख लिए। समीर उसके दोनों हाथों को हटा कर मन्त्र-मुग्ध होकर उसके शरीर को देखने लगा।

जब समीर अपनी सुहागरात की कल्पना करता, तो उसमे उसकी पत्नी पूर्ण नग्न अवस्था में होती - न तो वस्त्र का एक भी धागा होता, और न ही कोई आभूषण। और तो और वो तो अपनी पत्नी की योनि भी पूरी तरह से क्लीन-शेव्ड हुई सोचता था। लेकिन मीनाक्षी की वैसी अवस्था नहीं थी। उसके शरीर पर कपड़े तो खैर नहीं थे, लेकिन आभूषण थे - उसने मंगलसूत्र पहना हुआ था, छोटी सी बिंदी लगाई हुई थी (जो अपनी जगह से खिसक गई थी), उसने नाक की कील और कानों में बालियाँ पहनी हुई थीं। सुहाग की लाल चूड़ियाँ उसकी कलाइयों की शोभा बढ़ा रही थीं, उँगलियों में अँगूठी, और पैरों में पायल, और उनकी उँगलियों में बिछिया। अभी अभी समीर ने जो करधन पहनाई वो भी थी। और उसकी योनि पर बाल भी थे। कल्पना से इतनी भिन्न अवस्था के बाद भी मीनाक्षी इस समय जैसे साक्षात् रति का ही अवतार लग रही थी।

कुछ देर ऐसे ही मीनाक्षी को देखने के बाद वो कांपते हुए स्वर में बोला,

“तुम कितनी खूबसूरत हो, मीनाक्षी!”

पहले ही वो शर्मसार हो रखी थी, लेकिन अपने सौंदर्य की बढ़ाई सुन कर उसके पूरे शरीर में लज्जा की एक और लालिमा चढ़ गई। मीनाक्षी ने करवट बदलकर खुद को छुपाते हुए कहा, “क्या सुन्दर है मुझमें?”

“तुम्हारा रंग…” समीर की आवाज़ में अब उत्तेजना सुनाई देने लगी थी।

“ऐसा कोई गोरा रंग तो नहीं है…” वो बोली।

“इसीलिए तो सुन्दर है..” फिर कुछ रुक कर वो आगे बोला, “तुम्हारा पूरा शरीर ही गज़ब का है! कैसी सुन्दर, कैसी चिकनी स्किन... कैसे मुलायम और चमकीले बाल.. कैसे काले काले हैं! … और कितने सुन्दर स्तन हैं तुम्हारे (वो बूब्स कहना चाहता था)! बहुत सुन्दर! गोल गोल और… सॉफ्ट! और ये निप्पल तो देखो! आह! इतने सुन्दर मैंने पहले कभी नहीं देखे! तुम मुझे पागल कर दोगी!”

कहते हुए उसने मीनाक्षी के स्तनों को बारी बारी चूम लिया। फिर उसने वाइन ग्लास से बूँद बूँद कर मीनाक्षी के स्तनों पर वाइन डाल दी, और जीभ से चाटने लगा। उसके इस खेल पर मीनाक्षी को हंसी आ गई,

“इससे वाइन का स्वाद बढ़ गया क्या?”

“हाँ..”

“ह्म्म्म..”

उसके बाद समीर वाइन को मीनाक्षी के पूरे शरीर - स्तनों, पेट, पेडू, पर डाल कर चाटने लगा। सच में, मीनाक्षी के सौंदर्य में घुल कर वाइन और भी शराबी हो गई और समीर पर उन्मादक मदहोशी सी छाने लगी। उधर मीनाक्षी समीर के बालों में उंगलियाँ डाले आनंद लेने लगी। समीर ने अपनी उंगली से उसके चूचकों को कोमलता से स्पर्श किया, फिर उनको अपनी नाक की नोक से किसी पक्षी की चोंच के समान सहलाया और सूंघा। फिर उसके दोनों चूचकों को अपने मुँह में लेकर जी भर चूसा। मीनाक्षी के दोनों निप्पल इस समय सतर्क द्वारपालों जैसे सावधान मुद्रा में खड़े हुए थे।

“तुमको मालूम है कि वाइन पीने के बाद ‘चेरी’ खानी चाहिए?”

“अच्छा? मुझे नहीं मालूम... लेकिन यहाँ ‘चेरी’ तो नहीं है…” मीनाक्षी समझ रही थी कि वो शरारत कर रहा था।

“अरे है तो! ये (उसने मीनाक्षी के निप्पलों की तरफ इशारा करते हुए कहा) तो हैं!”

“हा हा! आप तो इनको बहुत देर से खा रहे हैं!”

“हाँ! इतने स्वादिष्ट जो हैं! अब से ये मेरे! वादा करो - जब इनसे दूध निकलेगा न, तब तुम मुझे जी भर के पीने दोगी?”

“धत!” मीनाक्षी इस बात पर बुरी तरह शरमा गई।

“अरे! धत क्यों?”

“दूध तो बच्चे पीते हैं”

“दूध बच्चे पीते हैं, तभी तो वो तगड़े आदमी बनते हैं! और आदमी इसलिए पीते हैं, कि वो तगड़े बने रहें!”

“हा हा! ठीक है बाबा - मेरे तगड़े आदमी - आपका जब मन करे, जितना मन करे, पी लीजिएगा।”

..................

समीर ने कुछ देर मीनाक्षी के स्तनों को पिया, और फिर धीरे धीरे स्तनों और पेट का चुम्बन करते हुए धीरे धीरे नीचे की ओर उसके नाज़ुक यौनांगों तक आ गया। मीनाक्षी ने सख्ती से अपनी दोनों जांघें जोड़ी हुई थीं। उनको समीर ने अपने दोनों हाथों से अलग करते हुए कहा,

“अपना स्वाद लेने दो!”

“छी! नहीं..!” मीनाक्षी ने वापस अपनी जांघें आपस में भींच लीं।

“क्यों?”

“अरे! कितना गन्दा काम है!”

“गन्दा काम! अरे देखो तो! कितनें सुन्दर हैं तुम्हारी चूत के होंठ! इनके अन्दर अमृत भरा हुआ है… प्लीज़ मुझे पीने दो!”

‘चूत? ये तो गाली होती है!’ मीनाक्षी ने सोचा। उसको थोड़ा बुरा सा लगा, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं करी।

समीर ने इस बार धीरे धीरे उसकी जाँघों को अलग किया। मीनाक्षी ने इस बार विरोध नहीं किया, लेकिन उसने शर्म से अपनी आँखें बंद कर ली। उत्तेजनावश उसकी योनि में से पहले ही काम-रस रिस रहा था। समीर ने मीनाक्षी की योनि में अपने मुँह को पूरी तरह से अन्दर डाल दिया और मन भर कर उसका रस पीने लगा। कुछ देर में उसने मीनाक्षी का सारा अमृत पी लिया..

‘ओह कैसी प्यास!’

मीनाक्षी आँखें बंद किये इस अनोखे अनुभव को जी रही थी.. उसको नहीं मालूम हुआ कि उसका योनि रस-पान करते हुए समीर ने खुद को पूरी तरह से अनावृत कर लिया।

“आँखें खोलो मिनी.. मुझे देखो!”

मीनाक्षी ने आँखें खोलीं। सामने का दृश्य देख कर वो एक पल को डर गई। उसने सुना तो था कि मर्दों का पुरुषांग, बच्चों के अंग से बड़ा होता है, लेकिन ऐसा…? उसको आदेश के छोटे से लिंग की याद आ गई।

‘कितना मुलायम सा, कितना छोटा सा था आदेश का छुन्नू! लेकिन ये? यह तो जैसे राक्षस की प्रजाति का है!’

लगभग सात इंच लम्बा, और कोई दो इंच मोटा! पूरी तरह उन्नत।

‘और उसकी नसें! बाप रे! कैसा डरावना अंग!’

और यह अंग उसके भीतर जाने वाला था। इसको वो अपने भीतर महसूस करने वाली थी। समीर इसके द्वारा उसको भोगने वाला था। भय और लज्जा से उसने फिर से अपनी आँखें मूँद लीं। समीर ने उसका हाथ पकड़ कर अपने लिंग पर रख दिया।
 
“डरो मत! इसको मन भर कर महसूस करो.. आज से यह तुम्हारा है!”

स्वतः प्रेरणा से मीनाक्षी ने अपनी हथेली समीर के लिंग पर लिपटा ली। उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे।

“क्या हुआ मिनी?”

“हे भगवान! कितना बड़ा है यह!” मीनाक्षी मंत्रमुग्ध सी और डरी हुई समीर के लिंग को स्पर्श कर रही थी... “मेरे अंदर तो यह बिलकुल भी फिट नहीं हो सकता।” वह बेसुध सी हो कर कुछ भी बोल रही थी – संभवतः उसको ध्यान भी न हो।

“ऐसे मत कहो! इसको ठीक से देखो और महसूस करो... इतना डर नहीं लगेगा! आँखें खोलो... ये देखो..” कह कर समीर ने उसका हाथ पकड़ कर अपने लिंग की पूरी लम्बाई पर फिराया।

“ठीक से महसूस करो... इसको ऐसे दबाओ (समीर ने मीनाक्षी की हथेली से अपने लिंग को दबाया).. अपने गालों से लगाओ (उसने लिंग को मीनाक्षी के गाल पर फिराया).. सीने से लगाओ (उसने मीनाक्षी के दोनों स्तनों के बीच में अपने लिंग को टिकाया और स्तनों से ही दबाया)... मुँह में लो.. (उसने लिंग को उसके होंठों पर फिराया) आनंद लो!”

मीनाक्षी के चेहरे पर घबराहट और संकोच साफ़ दिख रहे थे, लेकिन इस समय वह उत्सुकता के वशीभूत थी। अपने पति को अपना सर्वस्व सौंपने की इच्छा उसमें बलवती थी। उसकी उँगलियों ने समीर के लिंग को पहले हल्के से छुआ और फिर दबाया,

“कितना कड़ा है, लेकिन फिर भी कितना सॉफ्ट!” उसने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, “और कितना गरम भी” यह सब मीनाक्षी के लिए एकदम नया था। कामुक कौतूहल ने उसकी वर्जनाओं का बाँध तोड़ दिया था।

समीर ने प्यार से मीनाक्षी के सीने पर हाथ फिराया। उसकी इस हरकत पर मीनाक्षी की आँख फिर से बंद हो गई... समीर ने उसकी बंद आँखों पर चूम लिया, फिर उसके गालों पर.. मीनाक्षी अब पूरी तरह से तैयार थी, इतना तो दोनों को ही मालूम था। वैसे दोनों ही इस रात के आरम्भ से ही सम्भोग के लिए पूरी तरह से तैयार थे। वो तो समीर ने इतनी देर तक अपने आप पर संयम बनाए हुए रखा था। लेकिन अब उससे भी रहा नहीं जा रहा था। उसने अपने लिंग की त्वचा को पीछे की तरफ खींच कर लिंग का शिश्नमुण्ड खोल दिया, और उसको मीनाक्षी के योनि-द्वार पर छेड़ते हुए चलाने लगा। कामोन्माद के मारे मीनाक्षी छटपटा रही थी। वासना की ज्वाला अब उसको कष्ट देने लगी थी। उसने आँखें खोल कर समीर को देखा.. और वो, बस मुस्कुराया।

फिर आगे जो हुआ वो बहुत अप्रत्याशित था! उसने दोनों हाथों से मीनाक्षी की कमर पकड़ कर अपनी तरफ खींचा।

“बोलो.. क्या चाहती हो?” उसने मीनाक्षी को छेड़ा।

कामोद्दीपन के चरम पर पहुँच कर मीनाक्षी बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। उसका पूरा शरीर वासना के अधीन हो कर कांप रहा था। एक सुन्दर सी लालिमा उसके पूरे शरीर पर फ़ैल गई थी। वो चाह रही थी कि कह दे समीर से कि वो उसको भोगना शुरू करे। आखिर कितनी देर वो इंतज़ार करे? लेकिन वो कुछ कह नहीं पाई।

“बताओ.. क्या चाहती हो?” समीर ने फिर कुरेदा।

मीनाक्षी अभी भी कुछ नहीं कह रही थी। बस अपने सर को धीरे धीरे, दाएँ बाएँ हिला रही थी। उसकी योनि ऐसी तरंगें छोड़ रही थी कि अब वो बेबस हुई जा रही थी। उसको मालूम ही नहीं था कि उसका शरीर ऐसे अजायब हरकतें कर सकता है।

"देर सही नहीं जा रही है क्या?" समीर ने कुछ और छेड़ा।

‘अरे इसको मेरे मन की बात कैसे पता चली?’

इस पूरे दरम्यान समीर उसकी योनि को छेड़ता रहा।

वाकई मीनाक्षी से देर सही नहीं जा रही थी। लेकिन, कैसे कह दे मीनाक्षी समीर से कि देर नहीं सही जा रही है! यह सब कहना तो उसने कभी सीखा ही नहीं। उसको तो सच कहो तो अभी भी समझ नहीं आ रहा था कि उसका अपना शरीर इस समय उसके अधीन क्यों नहीं है। क्यों वो समीर की ताल पर नाच रही है? समीर, जो उसके सामने बच्चा है! समीर, जो उसका पति है! समीर, जो उसका सबसे अच्छा दोस्त है! समीर, जो उसका अंतरंग प्रेमी है! समीर, जो उसकी होने वाली सन्तानो का पिता भी है! दाम्पत्य की सीढ़ी के इस पहले पायदान पर पैर रखने में समीर ने कितना धैर्य रखा! उसकी सहेलियाँ मीनाक्षी को कहतीं कि वो बहुत लकी है। उनके पतियों ने तो पहली रात में ही उनको भोग लिया था - न उनकी मर्ज़ी की परवाह करी और न ही उनके दर्द की!

और समीर! उसने पति बनने से पहला उसका दोस्त बनना ठीक समझा। वो उसका सहारा बना। उम्र में इतना फासला होते हुए भी वो उसका गार्जियन है! और आज जब वो मीनाक्षी को पूरी तरह से अपनी बना लेना चाहता है, तो वो भी तो यही चाहती है! अब समीर के प्रश्न पर वो क्या बोले? लड़कियाँ यह सब कैसे कहें! लज्जा की चादर ने उसको पूरी तरह से ढँक लिया था। वो देख रही थी.. समीर की आँखों में अपने लिए प्यास! उसके होंठों पर अपने लिए प्यास!

समीर ने अपना लिंग मीनाक्षी की योनि पर टिकाया - वो इतना कड़ा था कि मीनाक्षी को समीर का लिंग चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था। दोनों की ही साँसें बहुत तेज़ हो रही थी। दोनों ही जानते थे कि पूर्ण मिलन के क्षण आने ही वाले थे। आदि काल से चली आ रही इस क्रिया के शुरू होने में अब देर नहीं थी।

“मीनाक्षी…?”

“हम्म?”

“कुछ बोलो?”

मीनाक्षी का मन हुआ कि वो ज़ोर से हँसे। वो समझ रही थी कि समीर चाहता था कि वो अपने मुँह से उसको अपने से सम्भोग करने को कहे। चाहती तो वो भी थी यह कहना, लेकिन चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाई। उसके होंठ कांप रहे थे, आँखें बंद हो रही थीं, और दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। वो कुछ कह तो नहीं सकी, लेकिन उसने समीर को अपनी बाहों में ज़ोर से कस लिया। समीर को संकेत मिल गया था।

“शायद थोड़ा सा दर्द होगा... लेकिन तुम सह लेना?”

मीनाक्षी ने उसके होंठों पर एक चुम्बन ले लिया और प्रहार के लिए तैयार हो कर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। समीर ने भी बिना और देर किये अपने लिंग को मीनाक्षी की योनि में ठेल दिया। मीनाक्षी को समीर का मोटा सा लिंग अपने अंदर धंसता हुआ महसूस हुआ - उसको लगा जैसे उसकी योनि-छल्ले के ऊतक फट गए हों - जैसे अनगिनत चीटियों ने एक साथ ही उसकी योनि को काट खाया हो। तीस वर्षों तक अभेद्य रहे मीनाक्षी के कौमार्य को समीर ने अब जीत लिया था। सरसराता हुआ उसका लिंग मीनाक्षी की चिकनी, संकरी सुरंग को रौंदता हुआ योनि के अंदर तक समां गया। मीनाक्षी के गले से चीख निकल गई।

उसकी जैसे साँसें ही जम गई थी; वो दर्द से बिलबिला उठी और समीर की बाहों में कसमसाने लगी। उसको अनुमान था कि दर्द होगा, लेकिन इतना होगा- इस बात का अंदाजा नहीं था। शरीर के भीतर तो कुछ अंदाजा लगता भी नहीं। मीनाक्षी को लगा कि समीर का लिंग उसकी नाभि तक आ गया है। उसका सात इंच लम्बा लिंग पूरी तरह से मीनाक्षी के अंदर तक पैवस्त था। दरअसल मीनाक्षी को जो दर्द हो रहा था वो मन के नहीं, बल्कि शरीर के विरोध के कारण था। उसकी आँखों से आँसू की कुछ बूँदें उसके गालों पर लुढ़क आई।
 
अलका ने बताया था कि कौमार्य भेदन के बाद ही सम्भोग का असली आनंद आता है। मतलब, जो बुरा होना था, वो हो चुका। अब वो इस क्षणिक दुःख दर्द को भूल कर उन्मुक्त भाव से सम्भोग के सुख को भोगना चाहती थी। समीर उसको चूमते सहलाते हुए कह रहा था,

“बस बस… हो गया… हो गया… शायद अब और दर्द नहीं होगा।”

यह कह कर समीर ने धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ मीनाक्षी की जाँघें और खुलती जातीं और अंततः उतनी खुल गईं, जितना कि वो खोल सकती थी। कुछ देर के बाद, समीर ने धक्कों की गति कुछ और बढ़ा दी। मीनाक्षी का दर्द पूरी तरह ख़त्म तो नहीं हुआ, लेकिन कम ज़रूर हो गया था। समीर मीनाक्षी को पूरी तरह भोग रहा था - उसके स्तनों को अपने हाथों से; उसके होंठों को अपने होंठों से; और उसकी योनि को अपने लिंग से। मीनाक्षी पुनः रति-निष्पत्ति के चरम पर पहुँच गई थी और उसकी देह कांपने लगी।

“आह….”

उधर समीर लयबद्ध तरीके से धक्के लगाए जा रहा था। साथ ही साथ मीनाक्षी को चूमता भी जा रहा था। उसने महसूस किया कि मीनाक्षी की साँसे उखड़ने लगी और देह थिरकने लगी। मीनाक्षी ने महसूस किया कि पहले जैसा ही, लेकिन अधिक तीव्रता से उसकी योनि में उबाल आने लगा। कामोद्दीपन के शिखर पर पहुँच कर कैसा महसूस होता है, आज उसको पहली बार महसूस हुआ था। वो छटपटाने लगी और उसकी योनि से कामरस छूट गया। मीनाक्षी ने समीर के होंठों को अपने मुँह में ले लिया, और उसकी कमर को अपनी टांगों में कस लिया। स्खलन के साथ ही मीनाक्षी की आहें निकलने लगी - आज अपने जीवन में पहली बार वो इस निर्लज्जता से आनंद ले रही थी। मीनाक्षी ने महसूस किया कि सम्भोग में वाकई पर्याप्त और अलौकिक सुख है। विवाहित जीवन अगर ऐसा होता है, तो वो सदा विवाहित रहना चाहेगी!

उधर समीर भी कमोवेश इसी हालत में था। वो जल्दी जल्दी धक्के लगा रहा था। उसकी साँसें और दिल की धड़कन भी बढ़ने लगी थी। आवेश के कारण उसके चेहरे पर लालिमा आ गई थी। उसने भी महसूस कर लिया था कि उसका स्खलन होने वाला है; और वो अब मीनाक्षी को जोर जोर से चूम रहा था और उसके स्तनों को कुचल मसल रहा था। उसी समय समीर के लिंग ने भी अपना वीर्य मीनाक्षी की योनि में छोड़ना शुरू कर दिया। आश्चर्य है कि मीनाक्षी की योनि स्वतः संकुचन करने लगी कि जैसे समीर के लिंग से निकलने वाले प्रेम-रस का हर बूँद निचोड़ लेगी। समीर ने सात आठ आखिरी धक्के और लगाए, और मीनाक्षी के ऊपर ही गिर गया। उसने मीनाक्षी को अपने आलिंगन में कस कर भर लिया, और कुछ देर उस पर ही लेटा रहा।

वो दोनों ही कोई दो तीन मिनट तक बिना कुछ बोले इसी तरह पड़े रहे। यह भावनाओं का ज्वार था, जो अपने शिखर पर पहुँच कर अब शिथिल पड़ रहा था। सम्भोग की यह आखिरी अभिव्यक्ति है - जिन क्षणों में दो शरीर जुड़ गए हों, उनके रसायन मिल गए हों, और दो आत्माएँ जुड़ गयी हों, उन क्षणों में कुछ कहने सुनने को क्या रह जाता है? यह एक अनूठा अनुभव है, जिसका आस्वादन बस चुप चाप रह कर किया जा सकता है।

मीनाक्षी ने महसूस किया कि समीर का लिंग बड़ी तेजी से आकार में घट रहा था। और कुछ देर में वो फिसल कर उसकी योनि से खुद ब खुद बाहर आ गया। फिर भी समीर ने मीनाक्षी को अपने आलिंगन में ही पकड़े रहा। मीनाक्षी को लगा कि उसकी योनि से कुछ गर्म सा द्रव बह कर बाहर आने लगा। मीनाक्षी के लिए यह बिलकुल अशुद्ध भावना थी। बिस्तर तो उसने अपनी याद में कभी गीला नहीं किया था, और तीस की उम्र में वो यह काम शुरू नहीं करने वाली थी। उसने अपनी योनि को हाथ से ढँका और बिस्तर से उठने लगी। वो जैसे ही उठने को हुई, समीर ने उसे रोक दिया।

“अरे यार! थोड़ा रुको!”

“जाने दीजिए प्लीज! इसमें से कुछ निकल रहा है!”

“किसमें से क्या निकल रहा है?” समीर ने उसको छेड़ा।

“इसमें से!” मीनाक्षी थोड़ा अधीर होते हुए, आँखों से नीचे की ओर इशारा करते हुए बोली।

“इसको क्या कहते हैं?”

“जाने दीजिए न!”

“नहीं - पहले बताइए!”

“देखिए - बिस्तर गीला हो जाएगा!”

“छीः छीः! इतनी बड़ी लड़की हो कर बिस्तर गीला करती हो! हा हा!”

“धत्त!”

“अरे बोलो न! मुझसे क्या शर्माना?”

“क्या बोलूँ?”

“इसको क्या कहते हैं?”

“ओह्हो! आप भी न! बस एक ही रट लगा कर बैठ गए!”

“तुम भी ज़िद्दी हो!”

“हम्म - इसको वजाइना बोलते हैं! अब खुश? चलिए छोड़िए, अब जाने दीजिए!”

“आओ - साथ साथ ही चलते हैं!” समीर ने शरारती अंदाज़ कहा।

“नहीं! अभी जाने दीजिए मुझे! मैं इसको धो लूँ!”
 
मीनाक्षी ने विनती करते हुए कहा और बाथरूम की ओर जाने लगी। बिना एक भी कपड़े के बाथरूम जाने में उसको संकोच भी हो रहा था, और शर्म भी आ रही थी। शरीर पर कुछ ओढ़ने के लिए नहीं था, इसलिए मीनाक्षी अपनी योनि पर हाथ लगाए हुए, वैसी ही नग्न अवस्था में ही लगभग दौड़ कर बाथरूम में चली गई। उसको यह नहीं मालूम था कि उसके ऐसा करने से समीर को उसके उछलते कूदते स्तनों का मजेदार दर्शन हुआ। बाथरूम में जा कर मीनाक्षी ने अपनी योनि का हाल देखा। उसकी योनि-पुष्प की पंखुड़ियाँ बढे हुए रक्त प्रवाह, और प्रथम सम्भोग के घर्षण के कारण सूजी हुई लग रही थीं। योनि की झिर्री खुल गई थी। उसी खुले हुए मुँह से उसके और समीर के काम रस का सम्मिश्रण बह रहा था।

‘ओ गॉड! कैसी हालत करी है इसकी बदमाश ने! छुन्नू है कि मूसल!’ सोच कर मीनाक्षी हल्का सा मुस्कुराई और प्रत्यक्ष में दबी हुई आवाज़ में खुद से कहा, “कॉन्ग्रैचुलेशन्स मिसेज़ मीनाक्षी सिंह!”

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

साफ़ सफ़ाई कर के जब मीनाक्षी बाथरूम से बाहर आई तो उसने देखा कि समीर उसी की दिशा में देख रहा था। तौलिए से अपना तन ढँकना वो भूल गई थी। समीर ने भी खुद को ढँकने की कोई कोशिश नहीं करी थी। वो वैसे ही नंगा बिस्तर पर लेटा हुआ था। जब वो बिस्तर के पास आई तो समीर ने प्यार से उसका हाथ पकड़ कर अपने बगल बैठा लिया और उसकी गोद में अपना सर रख कर लेट गया। उसके लेटने का तरीका ऐसा था कि उसका चेहरा मीनाक्षी की योनि की तरफ था।

“मिनी?”

“हम्म”

“तुम बहुत सुन्दर हो!”

मीनाक्षी ने देखा कि यह कहते हुए समीर उसकी योनि को देख रहा था।

‘एक नंबर का बदमाश है!’

“तुम बहुत सुन्दर हो! जैसा सोचा था, उससे भी कहीं अधिक!”

‘समझ आ रहा है कि साहब को क्या सुन्दर लग रहा है!’ उसने मन में सोचा।

“क्या सुन्दर लगा आपको?” और प्रत्यक्ष में कहा।

“तुम्हारा कुछ! कोई एक ही चीज़ हो तो बताऊँ! अब इसको ही ले लो.... तुम्हारी चूत.... इसकी बनावट - जैसे दो पल्लों का दरवाज़ा कस कर भेड़ लिया गया हो! और अभी, जब तुम ऐसे बैठी हो, तो इसको देखने पर ये गुलाब के फूल की पंखुड़ियों जैसी लग रही हैं। सच में, अंदर जा कर मज़ा आ गया!”

जिस तरह समीर ने यह सब कहा, मीनाक्षी हँसे बिना न रह सकी।

“आप इसको चूत क्यों कहते हैं? चूत तो गाली होती है न?”

“ओहहह! अच्छा वो? वो तो देहाती और आवारा लोगों के लिए गाली होती है। असल में चूत तो फल होता है। संस्कृत में ‘चूतफल’ मतलब आम! मैं तो इसको आम कह रहा हूँ! ऐसी प्यारी सी चीज़ को मैं गाली क्यों दूँगा भला?”

“बातें बनाना कोई आपसे सीखे!”

“अरे! अब किसकी कसम लूँ मैं! आम जैसी ही रसदार है ये!”

“हा हा बदमाश! लोग तो ब्रेस्ट्स को आम कहते हैं।”

“क्या बात है! इसका मतलब यह है कि मेरी बीवी आम की टोकरी है पूरी - एक जोड़ी राजापुरी आम ऊपर, और दशहरी आम के रस की प्याली नीचे!”

“धत्त गंदे!”

“मिनी, आज तुमने मुझे कम्पलीट कर दिया! थैंक यू!” कह कर समीर ने उसकी योनि को चूम लिया।

“आप ने भी तो मुझे कम्पलीट कर दिया!”

मीनाक्षी की बात पर समीर मुस्कुराया, और उसने मीनाक्षी के सर को थोड़ा सा नीचे करने की कोशिश की। मीनाक्षी ने भी अपना सर थोड़ा नीचे कर, उसको चूमने में सहयोग किया। जब चुम्बन टूटा, तो उसके स्तन समीर के चेहरे से जा लगे। उसने झट से मीनाक्षी का एक निप्पल अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा।

मीनाक्षी समीर को मना करने की स्थिति में नहीं थी। समीर के प्रेम करने के तरीके की वो अब मुरीद बन चुकी थी। समीर जहाँ चाहता, जैसे चाहता, और जो भी चाहता, मीनाक्षी उसको वो सब करने से मना नहीं कर सकती थी। अलका ने एक बार मीनाक्षी को कहा था कि उन पुरुषों को अपनी पत्नियों के स्तनपान में ख़ास रूचि होती है, जिन्होंने अपनी माँ का या तो बहुत ही कम, या बहुत ही अधिक स्तनपान किया हो।
 
‘समीर ने कितना किया है?’ मीनाक्षी के मन में यह सवाल उठा, ‘कम या ज्यादा? शरीर देख कर तो लगता है कि साहब ने अपनी माँ का दूध खूब पिया है! और अब अपनी बीवी का भी!’

“आपसे एक बात पूछूँ?”

“एक नहीं, सौ बात पूछो!”

“आपने मम्मी का दूध कब तक पिया है?”

“उम्म्म, यही कोई छः सात साल तक!”

“अरे वाह। मम्मी आपको बहुत प्यार करती हैं इसका मतलब।”

“हाँ! बहुत प्यार करती हैं! मैं भी उनको बहुत प्यार करता हूँ। वो अभी भी मेरा बचपन याद कर के बताती हैं कि मैं उनके दूध को कभी छोड़ना ही नहीं चाहता था। उनका दूध पीना मुझे सबसे ज्यादा सुख देता था। पर अफ़सोस, उम्र बढ़ी और मैं मम्मी के दूध से वंचित हो गया। हर औरत के स्तन माँ के प्रेम की याद दिलाते तो हैं, लेकिन हर औरत प्रेममयी हो, ये ज़रूरी नहीं।”

समीर ने देखा की मीनाक्षी बहुत इंटरेस्ट ले कर उसकी बात सुन रही थी। वो मुस्कुराया और फिर बोला,

“लेकिन इनमें (उसने बारी बारी से मीनाक्षी के दोनों चूचक चूमे) से मेरे लिए प्रेम की मीठी धारा बहती है।”

मीनाक्षी मुस्कुरा दी। उसका ध्यान समीर के लिंग पर गया - सम्भोग के बाद वो विकराल अंग अब मात्र दो-ढाई इंच जितना ही रह गया था। सिकुड़ा हुआ, कोमल, निर्जीव! जैसे सो गया हो! अलका कहती है कि इसे मुँह में लेकर चूसने में बहुत मज़ा आता है! और यह कि उसके पति को इस काम में बहुत मज़ा आता है। कभी कभी अलका तो चूस चूस कर उसका वीर्य भी पी लेती है!

“छीः! गन्दी” ख्यालों में डूबी मीनाक्षी के मुँह से निकल गया।

“हम्म?” उसके स्तनों को पीने में मगन समीर उसकी आवाज़ सुन कर चौंक गया।

“कुछ नहीं” तन्द्रा में डूबी मीनाक्षी धरातल पर वापस आई, “वो… वो मैं कह रही थी कि आप पी लीजिए!”

“पी ही तो रहा हूँ!”

“ओहो! आहहह! आप ऐसे चूस चूस कर इनका दम निकाल देंगे!”

“अरे दम कहाँ निकला - ये देखो? तुम्हारी चेरियाँ कैसी कड़क हो गई हैं!” समीर ने शरारती अंदाज़ में कहा।

“अब बस जानू! दर्द होने लगता है!”

“ओह! ठीक है!” कह कर समीर उसके स्तन से अलग हो गया।

मीनाक्षी को लगा कि समीर का मन बुझ गया। उसको मनाने के अंदाज़ में उसने कहा, “मेरी आदत नहीं है न! और आप पीते भी इतने जोश में हैं! अच्छा ठीक है, इनको मुँह में ले कर दुलारते रहिए… फिर कुछ देर बाद पी लीजिएगा! मैं कहीं भागी थोड़े न जा रही हूँ! है न?”

“हम्म्म” कह कर समीर फिर से उसको अपनी बाहों में भरने की कोशिश करने लगा।

“ओहो! समीर… छोड़िए ना… अभी मन नहीं भरा क्या?”

“तुम्हारे जैसी खूबसूरत बीवी हो तो किसी का मन भरेगा क्या? ये देखो!” कह कर समीर ने उसका हाथ अपने लिंग पर रख दिया। जो लिंग अभी बस कुछ क्षणों पहले मुरझाया हुआ था, न जाने कब वापस अपने विकराल रूप में आ गया था। मीनाक्षी को बहुत आश्चर्य हुआ।

“मिनी, तुम बहुत सुन्दर हो! प्लीज, मुझे अपने से दूर मत करो!” कह कर उसने एक साथ कई चुम्बन मीनाक्षी के चेहरे पर जड़ दिए।

मीनाक्षी भी कहाँ उसको मना करने वाली थी? लेकिन मिलन की रात में थोड़ा ठुनकना तो बनता है न? लड़की थोड़ी शोख़ी न दिखाए, चंचलता न दिखाए, मान मनुहार न करवाए, तो क्या मज़ा? उसके कुछ कहने से पहले ही समीर उससे गुत्थम-गुत्था हो गया। वो पेट के बल होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। और समीर उसके ऊपर आ कर चढ़ बैठा। पहली बार मीनाक्षी को अपने मुकाबले समीर के शरीर के आकार का अनुमान हुआ - समीर वाकई बड़े कद काठी का नौजवान था। पूरा मर्द!

उसने पीछे से ही मीनाक्षी के स्तनों को पकड़ लिया, और उसकी पीठ, गर्दन, कानों पर चुम्बन देने लगा। उसके नितम्बो के बीच में समीर का कड़क लिंग चुभने लगा। थोड़ी ही देर पहले जो कुछ हुआ था, उसके फिर से होने की सोच कर मीनाक्षी की देह काँप गई। बीच बीच में समीर कभी उसके कान, तो कभी गाल, तो कभी गर्दन तो कभी पीठ को चूमता। बीच बीच में वो उसके स्तनों को अपने हाथों में पकड़ कर दबाता और मसलता, तो उसकी साँसे फूल जातीं।

कुछ देर के बाद समीर ने कहा, “तुमको मालूम है?”

“क्या?” मीनाक्षी ने हाँफते हुए पूछा।

“तुम्हारी दाहिने चूतड़ पर एक प्यारा सा तिल है! यहाँ।” कह कर उसने जहाँ तिल था, वहाँ अपनी तर्जनी से छुआ।

“धत्त बत्तमीज़!”

“अरे क्यूँ?”

“कैसे कैसे गन्दा गन्दा बोलते हो आप!”

“अरे! गन्दा क्या है? चूतड़ ही तो हैं - सुन्दर, गोल गोल!” उसके मीनाक्षी ने नितम्बों को सहलाते हुए कहा, “और उनके बीच में ये तुम्हारी प्यारी सी चूत!” उसने उसकी योनि पर हाथ फिराया, “और ये, वाह वाह… क्या बढ़िया सी गाँड़!” उसने मीनाक्षी के नितम्बों को फ़ैलाते हुए उसकी गुदा को अनावृत कर दिया।

मीनाक्षी चिहुँक गई। उसने अपनी पुट्ठे की पेशियाँ सिकोड़ लीं, और पलट गई।
 
मीनाक्षी चिहुँक गई। उसने अपनी पुट्ठे की पेशियाँ सिकोड़ लीं, और पलट गई।

“धत्त! थप्पड़ पड़ेगा!” एक स्वतः प्रेरणा से मीनाक्षी ने समीर की हरकतों का विरोध किया। लेकिन ऐसा करते ही उसको अपनी गलती का एहसास हो गया। आज की रात तो वर्जनाएँ तोड़ने की है, परदे गिराने की है! आज से तो समीर का उस पर पूरा अधिकार है!

“सॉरी जानू! मेरा वो मतलब नहीं था!” उसने कहा। लेकिन समीर ने बुरा माना ही नहीं।

“थप्पड़ मार लेना, लेकिन एक बार चूमने दो न”

“जानू, गन्दा है वो” मीनाक्षी ने मिन्नत करी।

“होगा गन्दा। लेकिन मैं तुम्हारे हर अंग को चूमना चाहता हूँ। हर अंग पर अपने प्यार की मुहर लगाना चाहता हूँ।”

मीनाक्षी ने अविश्वास से समीर को देखा और फिर वापस सीने के बल लेट गई।

‘मेरे कहने से ये थोड़े न मानेंगे’

“जो करना है कीजिए। लेकिन उसके बाद मुँह धो लीजिएगा! नहीं तो लिप्स पे नो किस्सी!”

समीर ने वापस उसके दोनों नितम्बों को फैला कर उसकी गुदा फिर से अनावृत करी और उसकी बनावट का जायज़ा लेने लगा। वह ऐसा कोई आकर्षक अंग तो खैर नहीं था, लेकिन मीनाक्षी का था, इसलिए उसको आकर्षक लगा।

“ज़रा अपने चूतड़ तो उठाओ मेरी जान! तभी तो चूमूँगा!”

न चाहते हुए भी मीनाक्षी ने अपने नितम्ब बिस्तर से ऊपर उठा दिए। और अगले ही पल उसने समीर की साँस और उसका चुम्बन अपने ‘वहाँ’ महसूस किया। उस एहसास से उसकी आँखें बंद हो गईं।

“मुँह धो कर आता हूँ! ऐसे ही रहना!” कह कर समीर बिस्तर से उठा। उसने जाते हुए देखा कि समीर का लिंग ज़मीन के समतल से कोई साठ अंश का कोण बनाए तना हुआ था, और चलने के कारण झूल रहा था।

‘बाप रे’

समीर कुछ देर बाद वापस आया। उसके लिंग में उत्तेजना थोड़ी कम हो गई थी। बिस्तर पर बैठ कर उसने कहा,

“अब मन करे, तो थप्पड़ मार लो।”

“मैं आपको थप्पड़ मारूँगी क्या भला!”

“नहीं… बोला था, तो करना पड़ेगा। चलो, लगाओ थप्पड़ मुझे! चलो...”

समीर की ज़िद पर मीनाक्षी ने बारी बारी से उसके दोनों गालों को प्यार से सहला दिया। समीर को हँसी आ गई,

“ये तुम्हारा थप्पड़ है?! इसकी धौंस मिल रही थी मुझे?” कहते हुए वो मीनाक्षी के सामने अपने घुटनों के बल खड़ा हुआ।

“मिनी, मुँह खोलो!” उसने कहा।

मीनाक्षी समझ गई कि समीर क्या चाहता है। जब समीर ने उसकी योनि को प्यार किया था, तो उसको बहुत आनंद आया था। उसने मुँह खोला। समीर ने लिंग का शिश्नाग्रच्छद पीछे किया और चमकता हुआ शिश्नमुंड मीनाक्षी के मुँह में डाल दिया। समीर ने मीनाक्षी की जीभ अपने शिश्नमुण्ड पर फिरती महसूस करी। उसको यह अनुभव बहुत अच्छा लगा। जीभ फिराने के साथ साथ, वो लिंग को चूस भी लेती। उत्तेजना-वश समीर के शरीर में कंपकंपी दौड़ गई। कुछ देर के चूषण के बाद उसने महसूस किया कि उसका वीर्य निकलने को हो गया।

“बस बस! अब छोड़ दो।”

मीनाक्षी ने सवालिया दृष्टि से समीर को देखा।

उसने कहा, “मेरी जान, अब छोड़ दो। नहीं तो मेरा वीर्य निकल जाएगा तुम्हारे मुँह में ही।”

तब जा कर मीनाक्षी को समझ आया और उसके चूसना बंद किया और अलग हो कर गहरी साँस भरने लगी। ऐसे बड़े, फूलते हुए अंग को मुँह में रखना आसान बात नहीं है।

समीर ने उसको वापस पेट के बल लिटाया और उसकी पीठ पर चुम्बन जड़ने लगा। कुछ देर में मीनाक्षी वापस उत्तेजना के सागर में हिचकोले खाने लगी। वो आनंद से जैसे मरी जा रही थी, जब समीर के हाथ उसके नंगे पुट्ठों को छू रहे थे। उसको आनंद में आते देख समीर ने अपना हाथ उसके चूतड़ों की दरार के और अंदर डाला। मीनाक्षी से रहा नहीं गया और उसने भी अपने हाथ पीछे किए और समीर को नितम्ब से पकड़ कर अपनी तरफ दबाने लगी। समीर इस समय मीनाक्षी के एकदम नज़दीक था और उसने अपना हाथ उसके कूल्हों से हटाया, और अपना लिंग वहाँ स्थापित कर दिया। मीनाक्षी के दबाव से उसका लिंग मीनाक्षी के नितम्ब में दब गया था। और जब मीनाक्षी को इस बात का एहसास हुआ तो वो धीरे धीरे अपने नितम्ब चलाने लगी।

समीर ने अपने लिंग को पकड़ कर उसकी दरार की पूरी लम्बाई में चलाया। अलका ने एक बार उसको कहा था कि मीनाक्षी का पिछवाड़ा बढ़िया गोल मटोल है, और समीर उसको नंगा देख कर मतवाला हो जाएगा।

‘बच के रहना, प्यारी बहना! नहीं तो वो तुम्हारी गाँड भी मार लेगा! हा हा।’ उसने मीनाक्षी को छेड़ा था।

वो ख़याल आते ही मीनाक्षी सकते में आ गई - बाप रे, ये मूसल तो उसकी योनि में ठीक से तो जाता नहीं, और कहीं इन्होने उसको ‘उधर’ घुसाने की कोशिश करी तो वो मर ही जाएगी। यह सोच कर मीनाक्षी काँप उठी।

“आहहहह, आप क्या कर रहे हैं?” मीनाक्षी आह भरती हुई बोली। ठीक उसी समय समीर की उंगलियों ने उसके फिर से गीली हो चली योनिद्वार को छुआ।

“देखो… तुम्हारी आमरस की प्याली से फिर से रस निकल रहा है।” समीर ने अपनी उंगलियों को ऊपर की तरफ ले जाते हुये कहा।

‘नहीं नहीं… ऐसा कैसे? इतनी जल्दी?’

“जानेमन! मैंने कहा था न कि हम दोनों की सेक्सुअल कम्पैटिबिलिटी अमेजिंग है?” कहते हुए उसने लिंग को फिर से मीनाक्षी की योनि में घुसा दिया।

“इईईईईईईईईई”

“क्या हुआ?”

“ओहहहह”

“कैसा लग रहा है?”

“ओह… आ… आप..... ओह… थकते …. ओह…. न…. ओह…. नहीं?”

मीनाक्षी पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी। समीर ने पूरी गति से धक्के लगाने शुरू किए थे; उसके हर प्रहार पर मीनाक्षी की योनि कामरस छोड़ रही थी। उसका शरीर थरथरा रहा था।

“आज तो मैं तुमको पूरी रात भर चोदूँगा मेरी जान!”

जैसा दर्द उसको पहली बार हुआ था, वैसा इस बार नहीं हुआ। इस बार के सम्भोग में वाकई आनंद आ रहा था। वो खुद भी जैसा उससे हो पा रहा था, अपने नितम्ब हिलाते हुए समीर का साथ दे रही थी, और सम्भोग का पूरा-पूरा आनंद उठा रही थी। उसकी सिसकियाँ फूट पड़ीं,

“ओह्ह्ह... आहिस्ता ... आह.. अम्मा.. मर गई मैं.... धीरे जानू...!”

समीर उसकी बात को नज़रअंदाज़ करते हुए ज़ोरदार धक्के मारता जा रहा था। कोई दस मिनट तक चले इस खेल के अंत में मीनाक्षी को फिर से रति-निष्पत्ति हो गई, और उसके थोड़ी ही देर बाद समीर ने भी फिर से मीनाक्षी की कोख में अपना वीर्य छोड़ दिया।

कुछ देर तक दोनों ही खामोश पड़े रहे। मीनाक्षी नीचे, समीर उसके ऊपर। फिर वो वो मीनाक्षी को आलिंगनबद्ध कर के उसकी बगल में लेट गया। उसके हाथ फिर से मीनाक्षी के नितम्बों से खेल रहे थे। उधर मीनाक्षी बिलकुल बेजान हुई अपने नग्न शरीर पर अपने पति के स्पर्श का आनंद ले रही थी। समीर की उँगलियाँ उसकी योनि को छेड़ती रहीं। मीनाक्षी अब चाहती ही थी कि जब भी वो और समीर साथ में हों, तो उसके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं हो। और यह कि उसका पति मन भरने तक उसके निर्वस्त्र शरीर से खेलता रहे।

“मेरी जान,” समीर ने कहा, “बिस्तर गीला हो रहा है!”

वो मुस्कुराई, “होने दीजिए! मेरे अंदर अब ताक़त नहीं है बाथरूम तक जाने की।”

“इतनी बड़ी लड़की हो कर बिस्तर गीला करती हो!”

“इतनी बड़ी लड़की को कोई ऐसे सताता है?”

“तो कैसे सताता है?”

“कैसे भी नहीं!” कह कर वो समीर का सीना सहलाने लगी। काफी देर दोनों चुप रहे, फिर मीनाक्षी ने ही बोला, “आई लव यू।”

“आई लव यू, टू!”

इन तीन छोटे से शब्दों का अर्थ बहुत गहरा होता है। इनको सतही तौर पर भी बोला जा सकता है और बहुत गहरे भी जा कर बोला सकता है। दोनों ही स्थितियों में इन शब्दों का अर्थ अलग अलग निकलता है। मीनाक्षी सिर्फ भावनाओं से वशीभूत हो कर समीर को आई लव यू नहीं बोल रही थी। यह पिछले कई दिनों से जो वो समीर के लिए महसूस कर रही थी, ये उसकी भावनाओं की परिणति (culmination) थी। वो समीर को बताना चाहती थी कि वो अब सिर्फ उसकी थी - उसकी सहचरी, उसके सुख-दुःख की बराबर की हिस्सेदार, उसकी प्रेमिका, उसकी सखी, उसकी अर्धांगिनी! वो बताना चाहती थी कि वो समीर को वैसा प्रेम करती है, जैसा प्रेम उसने समीर के पहले न किसी पुरुष से किया, और न ही उसके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष से करेगी। वो उसको प्रेम करने के लिए कोई भी रूप ले सकती है। वो बताना चाहती थी कि अब वो दोनों एक हैं। उनके शरीर अलग हो सकते हैं, लेकिन उनकी आत्माएँ अब एक हैं। और समीर तो खैर उसको बहुत पहले से ही चाहता था। मीनाक्षी उसकी पत्नी तो तत्क्षण बन गई थी, लेकिन उसको अपनी प्रेमिका बनाने में उसने जो जतन किए हैं, वो निष्छल प्रेम के बिना नहीं हो सकता।
 
समीर की तरफ करवट लिए मीनाक्षी ने उसको आलिंगनबद्ध कर रखा था। कुछ देर दोनों को कुछ नहीं बोले, फिर समीर के सर को स्नेह से सहलाते हुए मीनाक्षी ने गुनगुनाना शुरू किया,

‘तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं… जहाँ भी ले जाएं राहें, हम संग हैं’

समीर सुखद आश्चर्य वाले भाव लिए मीनाक्षी को देख रहा था। उसको मालूम नहीं था कि वो गाती भी है।

‘मेरे तेरे दिल का, तय था इक दिन मिलना, जैसे बहार आने पर, तय है फूल का खिलना

ओ मेरे जीवन साथी....’

समीर को मालूम नहीं था कि वो गाती भी है, और इतना अच्छा गाती है। मीठी, सुरीली और जादुई आवाज़! उसके थके हुए शरीर पर मानों शीतल जल की बूँदें गिर रही थीं। मीनाक्षी ने ममता और स्नेह के साथ समीर को सहलाना और थपकियाँ देना शुरू कर दिया।

‘तेरे दुख अब मेरे, मेरे सुख अब तेरे, तेरे ये दो नैना, चाँद और सूरज मेरे’

ओ मेरे जीवन साथी....’

मीनाक्षी गाना नहीं गा रही थी, बल्कि समीर से अपनी भावनाओं का हाल बयान कर रही थी।

‘तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं.... जहाँ भी ले जाएं राहें, हम संग हैं’

“आप कितना अच्छा गाती हैं!” समीर में मंत्रमुग्ध हो कर कहा।

“पत्नी की खूबियाँ, उसके गुण, पति को धीरे धीरे मालूम पड़ने चाहिए! इससे पति की नज़र में उसके लिए प्रेम और रेस्पेक्ट बनी रहती है!”

समीर ने कुछ कहा नहीं, बस उसके होंठों को चूम लिया।

“टेक सम रेस्ट, जानू!” मीनाक्षी की आवाज़, उसके स्पर्श, और उसकी आँखों में समीर के लिए इस समय इतना प्रेम उमड़ रहा था कि उसके सागर उत्प्लवन करते करते समीर की आँख लग गई। अंततः उसको शांत पा कर मीनाक्षी मुस्कुराई, और उसकी जान में जान भी आई। समीर को सहलाते, चूमते हुए वो बहुत देर तक आज तक के अपने विवाहित जीवन का जायज़ा लेने लगी।

...........

क्या क्या सोचा था उसने अपनी शादी की रात को! क्या कुछ घट गया था उस दिन। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रभु अभी भी समीर जैसे लोग बनाते हैं! दी नाईट इन शाइनिंग आर्मर - हाँ, मीनाक्षी के लिए समीर बिकुल वैसा ही था। उससे उम्र के कितना छोटा है, लेकिन जिस प्रकार की गंभीरता, सामाजिकता, आदर, आत्मविश्वास उसके अंदर है, वैसा मीनाक्षी ने किसी अन्य पुरुष में नहीं देखा। जब कभी आदेश समीर को ‘जीजा जी’ कह कर बुलाता है, तो मीनाक्षी को कितना अच्छा लगता है, वो बता नहीं सकती। जब उसकी सहेलियाँ समीर को ‘जीजा जी’ कह कर बुलाती हैं, तो वो घमण्ड से फूली नहीं समाती। उसको समीर की पत्नी होने पर कितना घमण्ड होता है, वो बता नहीं सकती। समीर की तरह ही उसने भी आज की रात के लिए न जाने कैसे कैसे सपने सँजोये थे - लेकिन जो कुछ समीर ने उसके साथ किया, वो वैसा सोच भी नहीं सकती थी। कितना बल है उसमें, और कितना स्टैमिना! बाप रे! जोड़ जोड़ हिला दिया!

कोई घंटे भर आराम करने के बाद अलसाते हुए वो उठी और लंगड़ाते हुए बाथरूम की तरफ़ चली। इस समय उसको अपने हर अंग में मीठी मीठी चुभन महसूस हो रही थी, और उसका हर अंग किसी अनोखे उन्माद में डूबा था। बाथरूम के दर्पण में उसने अपने आप को देखा - उसके शरीर के हर हिस्से पर लाल और नीले निशान पड़ गए थे। उसके शरीर के हर हिस्से पर समीर के प्रेम की मोहर लगी हुई थी। उसकी आँखें नशीली सी लग रही थी। सच में, आज से मीनाक्षी समीर की दासी बन गई थी। आज उसका सब कुछ समीर का हो गया था, और इस बात पर उसको गर्व था।

बाथरूम में बाथटब था। उसने सोचा कि अगर गरम गरम पानी में वो लेट जाए, तो यह थकावट और सुरूर थोड़ा कम हो जाएगा। तो उसने वही किया। बाथटब में उसने थोड़ा अधिक गरम पानी भरा, और फिर उसमें बबल-बाथ डाल कर वो पानी की नरम नरम गर्माहट में लेट गई। पानी में लेटे हुए भी वो भूतकाल की बातों का विश्लेषण, और भविष्य की कोमल कल्पनाओं के बारे में सोचने लगी।

कितने ही लोगों को कहते सूना है कि शादी के बाद स्त्री, और पुरुष दोनों को समझौता करना पड़ता है। लेकिन उसके साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। और अगर उसको समझौता करना भी हुआ, तो वो ख़ुशी ख़ुशी कर लेगी। समीर भगवान का दिया अनमोल उपहार है। उसके लिए वो कुछ भी सह लेगी।

उसकी ज्यादातर सहेलियाँ शादी के बाद हुए बदलावों का हवाला देती हैं अपनी इच्छाएँ न पूरी कर पाने के लिए -

‘अरे, घर-गृहस्थी के चक्कर में ये सब कहाँ हो पाएगा?’

‘मेरे हस्बैंड को ये सब पसंद नहीं है, इसलिए नहीं करती’

‘माँ जी कहती हैं की डांस करना फालतू काम है’

‘उनको मेरा नौकरी करना पसंद नहीं’

और उसके समीर ने उसको उड़ने के लिए पंख दे रखे हैं। वो हमेशा उसको अपने मन का करने के लिए प्रोत्साहित करता रहता है। लेखिका बनने की उसकी इच्छा समीर के कारण ही मूर्त रूप ले रही है। समीर ने उसको स्वतन्त्र छोड़ रखा है। और इस स्वतंत्रता में समीर उसको स्थायित्व देता है। वो उसका घर है। लौट कर उसको हमेशा समीर के पास ही आना है।

शादी से पहले जब वो माँ पापा को उसकी शादी के लिए चिंतित देखती थी, तो वो उनको उनसे कहती थी कि क्यों वो अकेली खुश नहीं रह सकती। नौकरी तो वो करती ही है। अच्छा कमा भी लेती है। उसका गुजारा हो जाएगा उतने से। वो किसी पुरुष के साथ की मोहताज नहीं। लेकिन अब समीर का साथ पा कर उसको लगता है कि अकेले जीने से कहीं बेहतर उसके साथ जीना है। वो उसको खुश रखता है। बहुत खुश! ‘और मम्मी डैडी की तो बिटिया हूँ मैं!’

उसने मन ही मन भगवान् को धन्यवाद किया, ‘हे प्रभु, आपके आशीर्वाद से ही सब कुछ हुआ है। अपनी अनुकंपा हम पर बनाए रखिए - बस यही विनती है। मेरे ह्रदय में प्रेम का, स्नेह का जो पौधा आपने लगाया है, उसको फल-दार वृक्ष बना कर अपनी कृपा का प्रसाद मुझे दीजिए!’

फ़ल से उसको अगला विचार आया, ‘अब जब हम दोनों का मिलन हो गया है, तो जल्दी ही हम दोनों भी मम्मी-पापा बन जाएँगे! समीर से इस बारे में बात करनी होगी कि वो बच्चों के बारे में क्या सोचते हैं। अगर वो अभी रेडी नहीं हैं, तो कॉन्ट्रासेप्टिव्स के बारे में डॉक्टर्स से मिलना पड़ेगा।’

‘वैसे बच्चों की जिम्मेदारी उठाने के लिए वो अभी छोटे ही हैं! लेकिन.... जैसी उनकी मच्योरिटी है, क्या पता, हो सकता है कि वो पापा बनना चाहें जल्दी ही! हाँ, अगर वो नहीं चाहते, तो मैं भी वेट कर लूंगी।’

‘लेकिन फिर भी! मैं भी बहुत वेट तो नहीं कर सकती। तीस की तो हो ही गई हूँ। बहुत हुआ तो दो या तीन साल! इससे अधिक तो वेट नहीं कर सकती हूँ। पता नहीं, आगे कोई कम्प्लीकेशन हो जाए, और बच्चे ही न हों!’

‘वो मेरा दूध पीना चाहते हैं! बच्चे होंगे तभी तो दूध आएगा! सच में, मैं भी चाहती हूँ कि इन ब्रेस्ट्स में से उनके लिए प्रेम की मीठी धारा बहती रहे। मम्मी से इनके बचपन के बारे में पूछूँगी सब बातें।’

‘इनसे पूछूँगी, कि इनको मेरे ‘वहाँ’ पर बाल अगर नापसंद हों, तो हेयर रिमूवल ट्रीटमेंट करवा लूंगी। अलका ने भी तो करवाया है। कह रही थी कि ‘ओरल’ करते समय उसके पति को वहाँ पर बाल बिलकुल अच्छे नहीं लगते।’

....................
 

Similar threads

Back
Top