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Romance स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

आगे-

लगभग 2 साल से मैं मीनल के लिए तड़प रहा था, गुस्सा भी था लेकिन चाहता था कि वो मिल जाये. आज मीनल मिली भी तो किस रूप में. जब मैं चाह कर भी उसे गले नहीं लगा सकता था; उस से दूर रहना मेरी मजबूरी भी थी. आखिर कैसे उसे किसी और के साथ देख लेता; उस से अच्छा अंधा होना पसंद करूँगा।

मैं कार ले कर आगे बढ़ गया. कार के शीशे में देखा तो मीनल वहीं खड़ी थी. जैसे मुझे देख कर सदमा लग गया हो; मुझे मीनल के साथ घूमने जाने वाली घटना याद आ गयी, जब मैंने मीनल को कार से उतारा था. कितनी ग्लानि हुई थी उस दिन मुझे; काश आज भी ऐसा होता मीनल मेरे साथ उसी तरह होती;

बहती आंखों के साथ कार चलाना मुश्किल हो रहा था तो रुमाल से आंख अच्छे से पोछी. थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि कौस्तुभ का फ़ोन आ गया;

फोन उठाने के साथ मैंने कार के शीशे में मीनल को अपने पती के पास जाकर कुछ बात करते देखा. फिर दोंनो को मेरी आगे बढ़ती हुई कार को देखते हुए पाया;

"कुछ पता चला. " कौस्तुभ ने बिना हाई हेलो के सीधा सवाल किया।

"मीनल की सोसाइटी के बाहर से ही गुज़र रहा हूँ.…. उस ने देख लिया मुझे.."

"क्या. !! क्या बोली वो फिर; शादी क्यों की उसने. माफी मांगी या नहीं. तुझे छोड़ के क्यों गई. कुछ पूछा या रोता ही रह मिल कर।"

"ऐसी बात नहीं कौस्तुभ" कह के मैने संक्षेप में उसे समझाया. धयान मेरा अब भी कार के शीशे पर था लेकिन अब मीनल दिखनी बंद हो गयी थी.

"तू उसे देख के ऐसे ही भाग आया. क्या ज़रूरत थी. उस से पूछता तो सही कि तेरे साथ ऐसा क्यों किया उसने आखिर. अच्छा खासा मौका गवां दिया तूने. " कौस्तुभ ने मुझे डांटा।

"क्या करूँ यार. उसका सामना करने की हिम्मत नहीं रही अब; उस के सामने मैं खुद को कमज़ोर नहीं दिखाना चाहता. मैं नहीं चाहता कि उसे भनक भी लगे कि ये 2 साल मैंने कैसे काटे ," मैं भरे हुए गले से बोला।

"एक बार वापस जा. मेरी बात मान. उस से एक जवाब मांग; अगर नहीं मांग सकता तो बिल्कुल सामान्य बन कर हाल चाल ही पूछ लें; बाकी बातें खुद ब खुद होने लगेंगी ,हो सकता है जो भी उसने किया उस के पीछे कोई मजबूरी रही हो. " कौस्तुभ ने मुझे समझाया।

"नहीं यार. मेरी हिम्मत नहीं. " मैं हारा हुआ बोला।

"तो ठीक है. मैं आ के पूछता हूँ उस से , तू कहीं कोने में पड़ के अपनी किस्मत का रोना रो. सिगरेट के साथ दारू भी शुरू कर दे ," कौस्तुभ चिल्लाया और मैं घबरा गया.

कौस्तुभ बहुत कम ही गुस्सा करता है, लेकिन जब भी करता है मैं भी चुप हो जाता हूँ। वो मेरी तरह नहीं कि हर दूसरे मिनट में गुस्सा हो जाये।

"अब भी ड्रामा करना है या कुछ और कि जा रहा है मीनल के पास. "

"ह्म्म्म. कार मोड़ रहा हूँ. " मैंने कहा।

कौस्तुभ ने बात होने के बाद उसे फ़ोन करने के लिए कहा और मैं घबराया हुआ मीनल के घर की तरफ चल दिया।

इस समय मेरे न जाने कितने मन पैदा हो गए थे और सारे ही अलग अलग सुझाव दे रहे थे. लेकिन मुझे कोई सुझाव जंच नहीं रह था. मैं तो बस कौस्तुभ का मान रखने के लिए जा रहा था;

जब उसकी सोसाइटी के गेट दिखना शुरू हुआ तो मेरे पेट मे अजीब सा दर्द उठने लगा. उसका पति अगर कुछ पूछे तो क्या कहूंगा, मीनल ने अगर पती के सामने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया तो? . ऐसे कैसे करेगी. मैं उसकी फोटो दिखा दूंगा. मैं खुद को खुद से समझा रहा था।

गेट के पास पहुँचा तो मीनल नहीं दिखी. मैं कार किनारे पे लगा कर उतरा.. और गेट की तरफ बढ़ने लगा; हर कदम के साथ धड़कने भी बढ़ रही थी. हिम्मत कर के मैंने गेट के अंदर देखा. मीनल का कहीं अता पता नहीं था.

"उसे क्या फर्क पड़ा. हुह!! . मैं वापस आ कर खोज रहा हूँ उसे लेकिन मीनल से मेरा दो मिनेट इंतेज़ार भी नहीं हुआ. होगा भी क्यों. अब मैं हूँ ही कौन उसका. " मैं बुदबुदा रहा था।

"ऐ!! कौन हो तुम??;कल से यहां चक्कर काट रहे हो. !!" मेरे कानों में आवाज़ पड़ी तो मैंने डर के इधर उधर देखा, एक गार्ड मेरी तरफ ही चला आ रहा था।

मुझे एक पल को ऐसा लगा कि मैंने बैंक लूटा हो और पुलिस ने मुझे उसी वक़्त पकड़ लिया हो; न रुपये हाथ लगे और न बच के भाग सका। घबराहट में मेरे पैर कांप रहे थे. कहीं मुझे चोर उचक्का समझ के पोलिस न बुला ली हो. मेरी सारी इज़्ज़त दांव पे लग गयी।

"वो मैं;" मैंने खांसते हुए शुरुआत की। " मैं मुम्बई घूमने आया हूँ तो बस ऐसे ही;" मैंने जो कहा उसका क्या मतलब था मुझे ही समझ नही आया तो गार्ड क्या समझता।

"घूमने आए हो तो घूमो. वो मेमसाब के पीछे क्यों आ रहे हो; चलो भागो यहां से. वर्ना ऐसी धुनाई होगी न. घूमना भूल जाओगे;"

आज मीनल के कारण मैं एक गार्ड से बेइज़्ज़त हो रहा था. जहां किसी की हिम्मत नहीं होती थी मुझसे ऊंची आवाज़ में बात करने की. वही आज मैं सड़क पे खड़े हो कर फटकार सुन रहा था।

"एई. जाता है या बुलाऊं पोलिस. !!" वो फिर चिल्लाया और मैं वापस कार में आ कर बैठ गया. कुछ देर बहुत रोया. । आज पापा की याद आयी।

"पापा आज देखा कितनी बेइजती हुई मेरी. लोग मुझे मवाली समझ रहे हैं. मैं कुछ नहीं कह पाया पापा. "

अब किस मुह से रुकता वहां. सच कहूँ तो कहीं जा के डूब मरने का मन होने लगा था। बहुत देर तक मैं कार में बैठा अपनी पिछली ज़िन्दगी के बारे में सोचता रहा; मैं क्या था और आज क्या हूँ. लड़कियों को कभी अपने आगे कुछ नहीं समझा. ऐसा नहीं कि मैं उनकी बेइज़्ज़त्ति करता था, मेरे संस्कार ऐसे नहीं थे. लेकिन उनकी भावनाओं को मैं शायद समझा नहीं; समझता भी कैसे. मैं ऐसा था भी नहीं कि लड़कियों को हमेशा अपने आस पास चाहूं।।

इन सब पचड़ों से परे मेरी एक नौकरी भी थी, जो मुझे प्यारी थी। मुझे पुणे वापस निकलना होगा अब. अब मुम्बई कभी नहीं आऊंगा;

"मीनल ये मेरा आखिरी प्रयास था. अब और नहीं, मैं अपने माता पिता , अपने दोस्तों और अपने साथ खिलवाड़ नहीं कर सकता;आज से तुम मुक्त;जहां चाहे रहो या जाओ।

तुम अपनी ज़िंदगी मे सुखी हो बहुत कुछ हासिल कर चुकी हो. तुम्हें भी अपने फैसले लेने का हक़ है;मैं होता कौन हूँ आखिर!!. "

मैंने कार स्टार्ट की और निकल पड़ा, अपनी उसी ज़िन्दगी को चुनने जिस से भागता रहा केवल मीनल के लिए।

मैंने रास्ते से ही कौस्तुभ को फ़ोन किया

"बोल जल्दी, हुई बात. क्या बोली वो. " मुझ से ज्यादा जल्दी तो कौस्तुभ को थी।

मैं झूठी हंसी हंसा;" अरे मोटू. कितना बेचैन रहता है तू. अच्छा सुन, मैं पहुँच जाऊंगा साढ़े 10 या 11 बजे तक,

तू मीरा से कहना कि इंतेज़ार करे, साथ ही खाएंगे. "

कौस्तुभ मेरी आवाज और बोलने के तरीके से असमंजस में पड़ गया "तू ठीक तो है ना??"

"अभी ही तो ठीक हुआ हूँ कौस्तुभ, जो मेरा नहीं, जो मेरी किस्मत में नहीं उसे पकड़ने के लिए दौड़ता रहा लेकिन आज सब समझ गया हूँ;अब मैं भी आगे बढ़ जाना चाहता हूँ"

मैं गंभीर हो कर बोला।

"तू जल्दी से घर आजा परफेक्ट. तेरी बहुत याद आ रही है. आज खूब मज़े करेंगे" कौस्तुभ भावुक हो कर बोला।

मैंने फ़ोन काट कर कार की गति बढ़ा ली।

जीवन में एक सितारा था,माना वह बेहद प्यारा था

वह डूब गया तो डूब गया

अम्बर के आनन को देखो,कितने इसके तारे टूटे

कितने इसके प्यारे छूटे,जो छूट गए फिर कहाँ मिले

पर बोलो टूटे तारों पर,कब अम्बर शोक मनाता है

जो बीत गई सो बात गई

कितनी सुंदर बात कही गयी है ना!! लेकिन कुछ बातें जो कहने में बेहद आसान होती हैं अमल करने में उतनी ही कठिन।

मीनल को मैं भूल जाऊंगा ये संभव नहीं था,लेकिन आने वाले वक्त को गले लगा कर आगे बढ़ने से कुछ समय में उसकी याद धुंधली ज़रूर हो जाएगी, प्यार खत्म नहीं होगा लेकिन उसकी तीव्रता ज़रूर कम हो जाएगी।

मैंने रास्ते मे वो सारे गाने सुने जो मीनल के साथ बिताए वक़्त में सुने थे। आज मैं ना रोया न ही मीनल को पाने की कोई चेष्टा की.

पुणे पहुँचते ही कौस्तुभ को फ़ोन किया कि खाने की तैयारी रखे। घर पहुँच के हम तीनों ने साथ खाया खूब हंसे बोले। कौस्तुभ और मीरा ने डांस दिखाया. मुझे मीनल की याद आयी लेकिन मैंने खुद को नियंत्रित कर लिया।

हम शायद रात भर वहीं बैठे रह जाते अगर मोटू अपनी बेसुरी आवाज़ में गाना न गाता।

मैं तो भागा ही साथ मे मीरा ने भी कान बंद कर लिए, मैं उन्ही के घर रहा रात को। सुबह अपने फ्लैट पे आ कर तैयार हुआ और ऑफिस निकल गया।

पिछले कुछ सालों की उठा पटक में मैं ज़िन्दगी से बहुत कुछ सीख चुका था।

दिन में खाने की लिए सीट से उठा तो अपनी ही धुन में जाता हुआ एक लड़की से टकरा गया।

"ओह्ह. सॉरी सॉरी. " मैंने हड़बड़ा के कहा लेकिन जब उसका चेहरा देखा तो मुस्कुरा उठा।

"व्हाट!! कभी सुंदर लड़की देखी नहीं क्या. " लड़की भी पूरे एटिट्यूड में थी. मुझे पुराना निशांत यानी कि मैं ही याद आ गया।

मैंने बत्तीसी दिखा दी और कहा "नहीं बिल्कुल नहीं.. और अपने आंखों से ले कर गाल तक काजल लगाने वाली सुंदर लड़की तो पहली ही बार देखी।"

"व्हाट डू यु मीन" वो तुनक कर बोली तो मैंने उसे मोबाइल के कैमरे में उसकि शकल दिखाई, मुझसे टकराने के कारण उसका काजल फैल गया था।

पहले वो घबरायी, फिर मेरे साथ हंसने लगी; मैंने हाथ आगे कर के कहा "हाई आई एम निशांत. "

"गकतफहमी में मत रहना, बॉयफ्रेंड है मेरा. " उसने भाव खाते हुए कहा.

न जाने क्यों उस से बात करते हुए लग रहा था कि खुद, से ही बात कर रहा हूँ।

"बॉयफ्रेंड तो मेरा भी है;तो तुम भी गकतफहमी में मत रहना.." मैंने हंसी रोकते हुए कहा।

वो खुले मुह से मुझे देखने लगी. " क्या हुआ.. अगर मेरे दोस्त एक लड़का है तो बॉय फ्रेंड ही हुआ न!!"

"व्हाटएवर.." उसने कहा और बाल झटक के चली गई।

मैं भी तो ऐसा था बिंदास बिल्कुल. कोई फिक्र नहीं, खुल के जीने वाला; और आज जैसे मेरे हंसने पर भी टैक्स लगता हो।

मैं आगे बढ़ना चाहता था लेकिन ज़िन्दगी ने मेरे लिए क्या संजो रखा था कोई भी नहीं जानता था।

खैर!! मैं भी खाने चला गया, बैठा ही था कि वो लड़की भी मेरे बगल में आ कर बैठ गयी तो मैं उसे देखने लगा.

" सीट नहीं मिली इएलिये यहां हूँ. ज्यादा खुश मत होना. " उसने कहा और मैं हंसने लगा तो उसने अपनी भौहें उचका के देखना शुरू कर दिया, मुझे मीनल याद आ गयी और मैं बिल्कुल गंभीर हो गया।

वो कुछ कहती उस के पहले ही मेरा फोन बज उठा कोई अनजान नंबर था तो मैंने उठाया नहीं; और अपने खाने पे ध्यान देने लगा। खाना आधा ही खाया था कि फ़ोन फिर बजा।

" उठा लो, गर्लफ्रैंड से बात करनी है तो मैं चली जाती हूं" उस लड़की ने कहा और मैं उसकी शक्ल देखने लगा।

"दिमाग है नहीं इतना या इस्तेमाल ही नहीं करती. " अब की मैंने उसे चिढ़ के देखा, इतने में फ़ोन भी कट गया।

"तुम लड़के तो जैसे दिमाग की फैक्ट्री लगा कि बैठे हो. तुम सब का दिमाग सिर्फ एक जगह होता है;बात ही करना बेकार है तुमसे तो;" वो बड़बड़ करते हुए वहां से चली गयी।

"मैं भी न बिना बात के गुस्सा हो गया" मैंने सोचा और कहा कर अपनी सीट पे आ गया।

मौका मिलते ही मैंने उस से सॉरी कहा " कुछ परेशान हूँ इसलिए ऐसा बोल दिया "

"इट्स ओके. मैंने भी ज्यादा गुस्सा कर लिया.." वो बोली

"बाई द वे. आई एम प्रिया;" वो मुस्कुरायी।

"हाई. मैं तुम्हारे पीछे नहीं हूँ. गलतफहमी में मत रहना.." मैंने भी मुअकुराया।

न जाने क्यों प्रिया से मिल कर मुझे अच्छा लगा. वो अल्हड़पन जो कहीं खो गया था, उसमे दिखा।

शाम को मैं सीधे अपने फ्लैट पे गया, दो दिन की थकान थी इस लिए लेट गया लेकिन मीनल पीछा नहीं छोड़ रही थी। मुम्बई में उस से मिलना, उसका अपने पती की तारीफ़ करना सब दिमाग मे घूम रहा था।

तभी मेरा फ़ोन बजा. फिर कोई अनजान नम्बर था, इस बार मैंने उठा लिया।

कई बार हेलो बोलने पर भी आवाज़ नहीं आयी तो मैंने फोन काट दिया। फिर 3-4 बार फोन आया और हर बार मैं हेलो ही करता राह गया, मुझे अब गुस्सा भी आने लगा था इतने में फ़ोन फिर बजा और मैं उठाते ही चिल्ला पड़ा।

"बोलना नहीं तो फ़ोन क्यों करते हो, मेरे पास फालतू वक़्त नही ऐसे मज़ाक के लिए समझे तुम. !!..आइंदा फ़ोन किया तो ठीक नहीं होगा. " इतना कह कर मैं फ़ोन काट ही रहा था कि आवाज़ आयी।

"भाई!! क्या हुआ..मैं जिग्नेश हूँ; आपने बोलने का मौका ही नहीं दिया;"

मैंने हैरानी से फ़ोन देखा तो जिगनेश का ही नंबर था गुस्से में मैंने आखिरी फ़ोन का नंबर देखा ही नहीं।

"सॉरी जिग्नेश. पता नहीं किस की कॉल आ रही थी बार बार. तो गुस्से में आ गया।" मैंने सफाई दी।

"कोई बात नहीं; अभी कहाँ हो?.."

"घर पे, क्यों क्या हुआ जिग्नेश. "

"भाई वो; दरअसल. " न जाने जिगनेश ऐसे घबराया हुआ, क्यों था।

"क्या बात है जिग्नेश. सब ठीक है ना.." मैंने चिंता जताई।

"भाई; मीनल आयी है. " मैंने इतना सुना ही था कि मोबाइल छूट कर नीचे गिर गया।

"हेलो भाई सुन रहे हो न.. हेलो हेलो. जिग्नेश बोल रहा था. " मैंने झट से फ़ोन उठाया और बोला "अब क्यों आयी है वो यहां. "

"आपसे मिलना चाहती है. "

"अच्छा,;लोन चुकाने;हुह!!;" मेरा खून खौल रहा था।

"नहीं भाई वो. "

लेकिन मैंने उसकी बात बीच मे काट दी " जितना भी ख़र्चा हमने उसपे किया है. फिर चाहे वो उसे मुम्बई प्रतियोगिता में ले जाने का ही क्यों न हो; सब जोड़ो और उस पर 8 प्रतिशत के हिसाब से ब्याज लगा कर उसे बता दो. "

"भाई आप कैसी बात कर रहे हो;एक बार;"

"और हांन जिग्नेश. " मैंने फिर उस की बात काट दी. " ये लोन का पैसा एक महीने के अंदर अंदर मुझे मिल जाना चाहिए; उसे ये बात अच्छे से समझा दो. " इतना कह कर मैंने फ़ोन काट दिया।

मैं जब भी सोचता हूँ कि अब नहीं रोऊंगा , मेरी ज़िंदगी नया तमाशा खड़ा कर देती है।

मैं अपने फ्लैट में चिल्ला कर मीनल से सवाल कर रहा था.

" बताओ क्यों आयी हो. मैं बताता हूँ;इस लिए क्योंकि मैंने तुम्हें रंगे हाथों पकड़ लिया;है ना. !!"

"अगर कल तुम मुझे नहीं देखती तो अपने परिवार के साथ मज़े कर रही होती. नफरत करता हूँ मैं तुमसे मीनल;

सुना तुमने;"इतना कहते ही मैंने मीनल और अपनी दीवार में टंगी फ़ोटो उठा के ज़मीन पे फेंक दी;उसका कांच चूर चूर हो गए.

"ऐसे ही तुमने मेरे सारे सपनों, अरमानों को चूर चूर कर, दिया मीनल; कभी माफ नहीं करूंगा तुम्हे. " मैं रोते हुए चिल्ला रहा था।

जिग्नेश का फोन दो बार और आ चुका था तीसरी बार मे मैंने उठा ही लिया।

अपने आप को संयमित कर के मैंने हेलो कहा..

"मैं तुमसे मिलना चाहती हूं निशांत;" ये मीनल की आवाज़ थी. इतने वक़्त के बाद उसके मुँह से अपना नाम सुनते ही मेरे सीने में फिऱ वो ही टीस हुई जो शुरुआत में होती थी.

मैंने कोई जवाब नहीं दिया..मैं जानता था कि बोलूंगा तो ज़ुबान लड़खड़ा जाएगी, शायद मैं कमज़ोर पड़ जाऊं और मीनल के सामने मैं खुद को कमज़ोर साबित नहीं कर सकता था।

मेरे लिए उसका होना न होना अब कोई महत्व नहीं रखता, मैं केवल ये जताना चाहता था;

मैं कभी प्यार में आ जाता, कभी नाराज़ सा

मुँह बनाता तो कभी गुस्से में मुट्ठी भींच लेता; कुछ ही पलों में न जाने कितने भाव , कितने विचार में चेहरे और मस्तिष्क से गुज़र गए. मैं जड़वत खुद को सम्हाले खड़ा रहा।

"निशांत;!!" मीनल की घबरायी आवाज़ फिर आयी।

कितनी आसानी से ढोंग कर लेती है ये मासूमियत का; अभी की आवाज़ देखो और कल परसों की चहक देखो. कितना फर्क है. मेरे अंदर से आवाज़ आयी।

नही ऐसा नहीं इतने समय बाद तुझ से बात कर रही है इसलिए ऐसा होगा. मैंने मीनल का बचाव किया।

तभी मीनल ने फिर कहा.." प्लीज निशांत. !!" और मेरे सामने मीनल के साथ गुज़री आखिरी रात घूम गयी।

"सिर्फ एक बार मिल लो;" उस ने याचना की।

"मेरे पास मतलबी लोगों से मिलने का वक़्त नहीं. " कह कर मैंने फ़ोन काट दिया और बिस्तर पे फ़ोन फेंक दिया।

फ़ोन फिर आता रहा लेकिन मैंने नहीं उठाया, मैं चकनाचूर हुए कांच के पीछे से झांकती मीनल और अपनी तस्वीर देखता रहा।

थोड़ी ही देर में दरवाजे की घंटी बजी तो मैं डर गया. वो इस हालत में मुझे देखेगा तो नाराज़ होगा.. क्या करूँ.. मैं भाग के बाथरूम गया और हल्का सा मुह धोया ,फिर कमरे दरवाज़ा बंद कर के बाहर आया और दरवाज़ा खोला।

कौस्तुभ अंदर आ कर कुछ बोलता पूछता उस के पहले ही मैंने नाटक शुरू कर दिया।

"देख ना मोटू. मेरी आँख में कुछ चला गया है , अच्छा हुआ तू आ गया. चेक कर ज़रा;"

कौस्तुभ कुछ नहीं बोला तो मैंने हल्की आंख खोल कर देखा, वो मुझे देख रहा था।

"क्या हुआ. ! मैं थोड़ा डरा कि उसे मेरे रोने का अंदाज़ा तो नहीं हो गया। "देख न आंखों में जलन हो रही है;" मैंने फिर कोशिश की।

"कैसे कर लेता है तू ऐसा;" वो बोला।

"मतलब.." मेरा डर बढ़ रहा था।

"एक बार मिल ले. क्या पता सब सही हो जाये तेरी ज़िन्दगी में.. और ये नाटक करने की ज़रूरत ही न पड़ें;" वो भावुक हो कर बोला और मैं उस के गले लग के रोने लगा।

"कैसे मिलु ये जान कर कि वो मेरी नहीं; मुझसे नहीं होगा अब. अगर उसे सच मे मिलना होता तो पहले आती, लेकिन वो सिर्फ़ इएलिये आयी है क्योंकि कल उसने मुझे देख लिया;"

काश की वो पहले आयी होती तो मुझे इतनी तकलीफ न होती. मेरा मन कुछ भी समझने को तैयार नहीं था।

"एक बार मिल ले उस से. मैंने उसे बुला लिया है; मैं चाहता हूँ कि तू सच का सामना करे और आगे बढ़े;" कौस्तुभ मुझे ज्ञान दे रहा था।

"नहीँ;! ऐसे नहीं. मैं उसे इतनी आसानी से नहीं मिलूंगा. मैं भी देखूं मुझसे मिलने की कितनी बेताबी है उसे;"

इतना कह के मैं कौस्तुभ से अलग हो गया।

मेरे चेहरे पे दबी हुई खुशी के ऊपर पसरी हुई नफरत साफ झलक रही थी, कौस्तुभ ने मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।

अजीब कशमकश थी ये ज़िन्दगी की, एक तरफ मीनल के मिल जाने की खुशी, एक तरफ उस के शादीशुदा होने का दुःख और एक तरफ उसका मुझे धोखा देने की नफरत; इनमे से कोई भी कम या ज्यादा नहीं था;

मैं ना चाहते हुए भी फिर कौस्तुभ के सामने आँसूं बहाता खड़ा था. कौस्तुभ को किस ने बताया अचानक मेरे दिमाग मे ये सवाल कौंधा।

"जिग्नेश का फ़ोन तेरे पास भी आया था क्या. " मैंने धीमी आवाज़ में पूछा. वैसे भी इतना रोने चिल्लाने के बाद ताकत और आवाज़ दोनो ही मंद पड़ चुके थे।

"ह्म्म्म. तू बात नहीं कर रहा था. बताया उसने. " कौस्तुभ भी शांत ही था।

मेरे पास पूछने को बहुत कुछ था. लेकिन अब मन नहीं था. कौस्तुभ ने मुझे बिठाया और पानी पिलाया। अंदर के कमरे का बंद दरवाज़ा देख कर उसे शक हुआ. तो उसने खोल कर देखा.

मैं झेंप गया. भले ही वो फ़ोटो मेरी और मीनल की थी लेकिन गिफ्ट तो कौस्तुभ ने ही की थी। वो कुछ देर दरवाज़े से ही अंदर देखता रहा, फिर मुझे देखा तो मैंने नज़रें झुका ली।

वो वापस मेरे पास आया और मेरे कंधे पे हाथ रखा, "तेरे साथ बहुत बुरा हो चुका निशांत; अब सब सही होने का वक़्त है. मीनल से मिल कर सब क्लियर कर लेना;" और फ़िर सब पीछे छोड़ के आगे बढ़ना. "

मैंने कौस्तुभ के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख दिया; "तू सही कहता है. जब वो चली ही गयी तो मैं क्यों उसी जगह रुका रहूँ;"

"तू बैठ अभी यहां, मैं कमरे से कांच साफ कर दूं. " कौस्तुभ झाड़ू लेने जाते हुए बोला।

जब वो कमरे में गया तो मैं भी पीछे चला गया, कौस्तुभ मुस्कुराया;" तेरी मीनल की फ़ोटो खराब नहीं करूंगा. परेशान मत हो. "

मैं फिर झेंप गया; कौस्तुभ बहुत अच्छे से जानता था कि मेरी भावनाएं मीनल के लिए कभी खत्म नहीं हो सकती। उसने मुझे बिस्तर पे बिठा दिया; मैं किसी बच्चे की तरह पालथी मार के बैठ गया और उसे कांच साफ करता देखने लगा.

उसने बिना फ्रेम के ही फ़ोटो दीवार पे टांग दी , और मैं लाल हो चुकी आंखों से फिर से फ़ोटो निहारने लगा. हालांकि मेरी आँखें अब जलने लगी थी।

मैं उसी तरह बिस्तर पे झुक गया. थकान और और दर्द अब बहुत बढ़ गया था। कौस्तुभ ने सब साफ कर के,अपने घर से मेरे लिए खाना ले कर आया. और अपने हाथों से मुझे खिलाने लगा.

मैं उसी तरह लेटा हुआ खाने लगा, मन नहीं था लेकिन कौस्तुभ को नाराज़ नहीं कर सकता था. कौस्तुभ और मेरा रिश्ता भी अलग ही था , वो मां बन कर मेरा ख्याल रखता, दोस्त बन कर साथ निभाता, भाई बन कर लड़ता, पिता बन कर मुझे बिना जताए न जाने क्या क्या कर जाता. .

मेरी हालत समझ कर उसने मुझे दवा खिला दी.. और बहुत देर मेरे साथ बैठा स्कूल के दिनों की बातें याद कर के मुझे गुदगुदाता रहा।

"मोटू !!काश हम अब भी स्कूल में होते, कितना अच्छा होता न. मुझे सिर्फ़ टॉप करने की फिक्र होती. और तुझे मुझसे ज्यादा नंबर लाने की. "

कौस्तुभ मेरा सिर सहलाते हुए बोला " जिंदगी अपने ही हिसाब से चल ले तो दुनिया नहीं चल पाएगी मेरे दोस्त. "

फिर वो मुझे कुछ न कुछ बताता रहा और मैं किसी शून्य में खोए खोए वैसे ही सो गया।

दूर तक फैला रेगिस्तान है, मैं भटक रहा हूँ. गर्मी ही गर्मी है.

मैं तड़प के भागता हूँ लेकिन कोई रास्ता नहीं मिलता. लगता है अंतिम समय आ गया. मैं गिर जाता हूँ, आंखें बंद हो जाती है;सूखे होठों पर जमी पपड़ी के कारण कुछ बोल पाने मेंक भी असमर्थ हूँ ..

अचानक से कुछ पानी की बूंदें मेरे चेहरे पे गिरती हैं. मैं पूरी ताकत लगा के आंख खोल के देखता हूँ. मीनल मेरे सामने है, मुस्कुराती हुई; मेरी बेचैनी खत्म हो जाती है; तपती धूप में ठंडी बयार बहने लगती है, और मुझमे ऊर्जा का संचार सा होने लगता है।।

मीनल!! मैं लड़खड़ाते आवाज़ में कहता हूँ. "मेरा बहुत इंतेज़ार किया ना;" मीनल नीचे बैठ के मेरे करीब झुक के कहती है, मेरी आवाज नहीं निकलती आंखों के कोनो से दो बूंदे लुढ़क कर रेत में गिर जाती हैं।

मीनल कुछ नहीं कहती झुक के मेरे होंठो को अपने होठों से छू लेती है.

मैं घबरा के उठ गया. सच मे होठ सूखे थे प्यास लगी थी।बगल में ध्यान दिया तो कौस्तुभ बैठे बैठे सोया था. कितना प्यार करते हैं सब मुझे. और मैं मीनल के लिए सब भूल सा गया।

मैंने उसे ठीक से सुलाया और पानी पी के लेट गया. लेकिन अब नींद नदारद थी तो मोबाइल में मीनल की तस्वीर देखने लगा। मैं मीनल को चाह कर भी खुद से अलग नहीं कर पा रहा था।

वास्तव में देखा जाए तो बहुत ही काम वक़्त था जो हमने साथ बिताया था, दीवाली की 5, दिन की छुट्टियों में ही मीनल मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गयी, इस के पीछे क्या कारण है मैं खुद भी नहीं जानता।
 
हर पहलू, खुद से जुड़े हर इंसान के बारे में सोचते सोचते सुबह हो गयी तो उठ के चाय बनाई और कौस्तुभ को जगाया। अभी कम से कम मैं मुस्कुरा कर बात कर रहा था जिस से कौस्तुभ को चैन मिला. नाश्ता मीरा ने बना दिया था इस लिए वही जा कर नाश्ता किया और ऑफिस के लिए निकल गया।

ऑफिस में और कुछ हो न हो व्यस्तता के कारण मन में बुरे ख़याल नहीं आ पाते; आज प्रिया फिर दिख गयी और खुद से हेलो कहा तो मैं मुस्कुराये बिना न राह सका।

"लंच टाइम पे मिलना साथ खाएंगे..और किसी को जानती नहीं मैं, तुम थोड़े बहुत शरीफ़ दिखते हो. "

"थोड़े बहुत?? रियली?; और बाकी क्या हूँ?" मैं उसकी बात पे हंस पड़ा।

"लड़के कभी पूरी तरह शरीफ़ हो ही नहीं सकते. " वो पूरी अदा के साथ बोली।

"बातें बहुत अच्छी कर लेती हो; देखना कहीं बॉयफ्रेंड मेरे साथ देख के बखेड़ा न खड़ा कर दे;" मुझे बंगलोर में अपने साथ हुआ हादसा अचानक ही याद आ गया।

"हुह!!खुद जो 50 लड़कियों के पीछे भगता है वो??. तुम क्यों फिकर करते हो ,"

आखिर में सहमती बनी और मैं साथ लंच के लिए तैयार हो गया।

मैं अपने काम मे व्यस्त था कि पापा का फ़ोन आया, इस वक़्त क्यों फ़ोन किया पापा ने. मुझे शंका हुई।

"हेलो पापा.

"निशू बेटा, मीनल आयी थी सुबह;सब से मिली. बहुत अच्छी नौकरी भी करने लगी है, उसकी दादी भी उस से मिल कर खुश थी आज. " पापा बहुत खुश लग रहे थे।

"ह्म्म्म. " इस से ज्यादा मुझे कोई जवाब नहीं सूझा।

"मुम्बई में ही जॉब कर रही है. आज वापस जा रही है.. तू जा के मिल लेना वहां. "

मेरा कलेजा जल गया, मैं क्यों जाऊं उस से मिलने. उसने तो कभी भी मुझसे मिलने की कोशिश नहीं की; सोसाइटी में वापस आने का वादा किया था उसने जो पूरा कर लिया;

मुझसे कभी कोई वादा क्यों नहीं किया. मैं तो तुम्हारे लिए खिलौना था न मीनल.

"निशू. क्या हुआ बेटा. तू खुश नहीं सुन के??. "

"पापा मैं ज़रा ऑफिस में बिजी हूँ, फ्री हो कर फ़ोन करता हूँ" कह के मैंने फ़ोन काट दिया।

मन बेचैन हो गया एक बार फ़िर तो अपनी मेज़ पे दोनों कोहनियां टिका के अपनी आंखों को हथेलियों के ढक के बैठ गया।

"आज व्रत रखना है क्या. ?" प्रिया की आवाज़ पे मेरी तंद्रा टूटी।

" नहीं, चलो.." मैंने बिना भाव के कहा और उठ गया।

खाना खाते वक़्त मैने कोई बात नहीं की, न ही खाने से नज़रें हटाई लेकिन प्रिया मुझे ध्यान से देख रही है ये अन्दाज़ा था मुझे।

" तुम भी खा सकती हो, मुझे देख के पेट नहीं भर जाएगा. " मैंने बिना उसे देखे बोला।

"कुछ तो है;कोई तो बात है जो तुम्हें अलग करती है; तुम बहुत परेशान हो किसी बात के लिए इतना मैं समझ गयी।"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया; और जल्दी ही खाना खत्म करने में जुट गया.. और खत्म करते ही मैं चलता हूँ अब कह के उठ गया।

"रुको एक मिनट;बैठों. " प्रिया बोली तो मैं उसे देखने लगा उस ने फिर इशारा किया बैठने का तो मैं बैठ गया।

"जब ज़िन्दगी में कुछ समझ न आये तो सब वक़्त के हाथों छोड़ कर आगे बढ़ते रहना चाहिए, रुक गए तो खत्म हो जाओगे;"

"तुम इतनी बड़ी बड़ी बातें भी करती हो. " मैं हैरान हुआ।

"हम्म; जानते हो सबके 3 चेहरे होते हैं, एक जो वो सिर्फ खुद को दिखाता है, दूसरा जो उसके खास लोगों के लिए होता है और तीसरा दुनिया के लिए ,जानते हो मैं तुम्हे ये क्यों बता रही हूँ;"

मैंने न में गर्दन हिलायी.

"क्योंकि तुम्हारा केवल एक चेहरा है. " वो मुस्कुरा कर मुझे देखने लगी और मैं झेंप गया..

"चलता हूँ काम है" कह कर वहां से निकल गया.

प्रिया की बातों से मन मे एक बेचैनी सी होने लगी थी. मैं जल्द से जल्द काम मे व्यस्त हो जाना चाहता था. अभी काम शुरू किए लगभग एक घंटे ही हुए थे कि फ़ोन फिर बजा,देखा तो जिग्नेश का था।

मीनल अब भी उसी के पास है. मेरे मन मे ख़याल आया।

"हेलो. " मैंने कहा।

"भाई फोन मत काटना प्लीज. बात सुन लो एक बार. "

"हम्म;"

"मीनल सिर्फ़ एक बार मिलना चाहती है, माफी मांगना चाहती है. आपको सब बताना चाहती है एक बार. वो लोन भी चुका देगी जितना आप कहोगे"

"जिग्नेश मेरी जगह तुम होते तो क्या करते. " मैंने पूछा।

"भाई. " शायद जवाब उस के पास नहीं था.

"भाई वो अब भी आपसे. "

"चली गयी वो??" मैंने सवाल पूछ लिया.

"हाँ थोड़ी देर पहले. कल ऑफिस है उसका. कह रही थी कि परसों शनिवार को पुणे आएगी।

"हाँ सही किया उसने; जॉब ज़रूरी है. मेरे जैसे फालतू लोगों से मिल के अपनी छुट्टी क्यों बर्बाद करनी जब के सप्ताहांत में मिल ही लेगी. " मैंने व्यंग किया जो जिग्नेश को अच्छे से समझ आ गया।

"बस इतना कहूंगा एक बार ही सही मिल लो..फिऱ जो चाहे फैसला कर लेना;" उसने फिर कोशिश की।

"रखता हूँ" कह के मैंने फोन काट दिया।

मैंने आज अपना काम खत्म किया, फिर अलग बगल वालों का भी कर दिया.. ताकि दिमाग शांत रहे।

घर पहुँच के आज जल्दी ही कहा के दावा ली और सो गया।

अगले दिन ऑफिस में जब मैंने एक मीटिंग के बाद अपना फोन देखा तो किसी अनजान नंबर से फोन था। मैंने सोचा कि फ़ोन मिला के पूछ लेता हूं लेकिन उस के पहले ही फ़ोन फिर बज उठा।

"हेलो. निशांत मल्होत्रा जी से बात करनी है.."

"बोल रहा हूँ, आप कौन. "

"जी मैं पवन वर्मा, मीनल जी का सेक्रेटरी. मैडम आप से मिलना चाहती हैं।"

वाह मीनल;आज तुम इतनी बड़ी हो गयी कि अपने सेक्रेटरी से फोन करवा रही हो;मैं पूरी तरह जल गया।

"मैडम मिलना चाहती हैं तो मैं क्या करूँ. " मैंने टेढ़ा जवाब दिया।

"सर आप टाइम बता दीजिए कब फ्री होंगे तो उस हिसाब से वो शेड्यूल कर लेंगी;"

बेशर्मी की पराकाष्ठा आज मुझे अच्छे से देखने को मिल रही थी, जहां मैं सोच रहा था मीनल मुझसे मिलने के लिए मिन्नतें करेगी, वहीं उसने नया रूप दिखा दिया।

" मेरे पास टाइम नहीं. "

"कब फ्री होंगे सर् आप. "

" इस साल कोई चांस नहीं;अगले साल फ़ोन करना" कह कर मैंने फ़ोन काट दिया।

ऑफिस था इसलिए फ़ोन फेंक नहीं सकता था, और सिगरेट भी कब का खत्म हो चुकी थी, तो पानी ही पी लिया।

आज मैंने प्रिया को भी नज़रअंदाज़ किया. न जाने क्यों कल की उसकि बात से घबराहट होने लगी थी।

जैसे तैसे काम निपटा के घर आया. मैं आज भी कौस्तुभ के घर नहीं गया. सिगरेट का पैकेट खरीद लाया था तो कलेजे को ठंडक देने लगा।

कौस्तुभ का फ़ोन आया तो उस के घर खाना खाने चला गया, मीरा की डांट के साथ खाना खा के मन थोड़ा हल्का हुआ, फिर नींद का बहाना कर के घर आ गया।

सच तो ये था कि मैं चाहता था मीनल फ़ोन कर के माफी मांगे, मिन्नते करे।

घर आ के एक सिगरेट और जला ली. मन मे मीनल की बातें, उसके सेक्रेटरी का फ़ोन घूमने लगे तो गुस्से में एक और सुलगा ली; ये अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि फ़ोन बजा. मैं पूरे भरोसे से फोन की तरफ लपका की मीनल का होगा लेकिन कौस्तुभ का फ़ोन था, मैं उदास हो गया और फ़ोन उठाया।

"ठीक है ना तू रो तो नहीं रह ना!" वो चिंता में बोला।

"नहीं यार सो गया था, तूने जगा दिया. " मैंने झूठ बोला।

अपना ख्याल रखने को कह कर उसने फ़ोन काट दिया और मैं चुप चाप बैठ गया।

फ़ोन फिर बजा. " ये मोटू भी ना..चैन से रोने भी नहीं देता.." मैंने चिढ़ कर फ़ोन उठाते हुए कहा।

देखा तो फिर अनजान नंबर. फिऱ से सेक्रेटरी का फ़ोन. हुह!! मैं बुरी तरह फूक गया. और फ़ोन नहीं उठाया, करते रहो फ़ोन. मैं फ़ोन नहीं उठाऊंगा. तुम्हे भी पता चले कैसा लगता है. मैं गुस्से में बड़बड़ाया।

घंटी दोबारा बजी और मैंने झट से फ़ोन उठा लिया, और उठाते ही खुद को कोसने लगा.." थोड़ा इंतेज़ार नहीं होता. क्या ज़रूरत थी फोन उठाने की।

"हेलो.."मैंने अकड़ते हुए कहा।

"निशांत. !! मीनल की आवाज़ आयी;और मैं सब भूल गया।

"मुझे एक मौका दे दो, फिर जो सज़ा दोगे मंज़ूर है;" मेरी तो आवाज़ ही गुल थी, जवाब क्या देता।

"बस एक बार मिल लो. कुछ तो बोलो. तुम्हारी आवाज़ सुनने को तरस गयी हूँ।" मैं उनकी आवाज़ के दर्द में भीग गया. और पिघलने लगा. लगा कि रो दूंगा. लेकिन फिर उसके शादीशुदा होने की चुभन मेरे बर्दाश्त से बाहर होने लगी।

"निशांत; मैं जानती हूँ तुम्हे बहुत तड़पाया है मैंने, बहुत गलत किया.. लेकिन मैं मजबूर थी. " मुझे ऐसा लग की वो अपनी शादी को ले कर सफाई दे रही है; जो कि मेरे मन मे ज़हर घोल गया और न चाहते हुए भी मैंने फोन काट दिया।

अब मैंने गौर किया तो अपने हाथों को बुरी तरह कांपता पाया, धड़कने तो ऐसे दौड़ रही थी जैसे राजधानी से प्रतियोगिता चल रही हो।

फ़ोन फिऱ आया. मैं अपने हाथों को न रोक सका और उठा लिया. " निशांत;सिर्फ़ एक बार; !! निशांत प्लीज;" इस निशांत प्लीज शब्द से फिर से मीनल के साथ बिताई आखिरी रात आंखों के सामने घूम गयी; ऐसे ही कह के उसने मुझसे मेरी सीमाओं को लांघने पर विवश कर दिया था।

मैं सिहर उठा जैसे अभी ही सब हुआ हो; फिर से तड़प जाग गयी मेरे अंदर. "मीनल..!!" मैं उसी तड़प में धीरे से बोल उठा।

"निशांत;!!" मीनल की भर्राई हुई आवाज़ आई।

लगा कि मेरे सीने से दिल बाहर आ जायेगा, काश इस वक़्त वो मेरे पाया होती उसे गले से लगा लिया होता. लेकिन अगले ही पल.." पति की चमची;यस ही इज़ द बेस्ट. " जैसे वाक्य दिमाग मे घूमने लगे।

मैं अपनी मीनल और श्रीमती मीनल के जाल में उलझ के रह गया और अंततः फ़ोन काट कर ऑफ कर दिया।

"मीनल कैसा खिलवाड़ कर रही हो तुम मेरे साथ. क्यों मीनल, क्या इतना बुरा था मैं. !!" मैं दर्द मे डूबा हुआ मीनल से सवाल कर रहा था।

रात मेरी सोचते हुए ही गुज़र गयी;कब नींद आयी कुछ याद नहीं. सुबह, तकरीबन साढ़े दस बजे दरवाज़े की घंटी बजी तो मैं जागा।

कौस्तुभ नाश्ता ले कर आया होगा. " आ रहा हूँ कह कर मैं दरवाज़े की तरफ भागा और लॉक खोल कर " तू नाश्ता लगा मैं ब्रश कर के आया " कहते हुए सीधे बाथरूम भागा।

फ़्रेश हो कर बाहर निकला तो मेरे कदम वहीं जम गए.
 
रात मेरी सोचते हुए ही गुज़र गयी;कब नींद आयी कुछ याद नहीं. सुबह, तकरीबन साढ़े दस बजे दरवाज़े की घंटी बजी तो मैं जागा।

कौस्तुभ नाश्ता ले कर आया होगा. " आ रहा हूँ कह कर मैं दरवाज़े की तरफ भागा और लॉक खोल कर " तू नाश्ता लगा मैं ब्रश कर के आया " कहते हुए सीधे बाथरूम भागा।

फ़्रेश हो कर बाहर निकला तो मेरे कदम वहीं जम गए.

सामने मीनल बैठी थी, उनके चहरे पे घबराहट और झिझक साफ झलक रही थी. वो अपने हाथों की अंगुलियों को कभी आपस मे मिला के झुक जाती तो कभी अपने हाथ आपस मे मसलने लगती; उसकि नज़रें जिस ओर थी मैंने भी उस तरफ गर्दन घुमायी तो उसी की बनाई पैटिंग दिखी।

मैं खुश था या नहीं इस का पता नहीं लेकिन मैं चिढ़ा ज़रूई था कि वो इतनी जल्दी घर तक कैसे आ गयी.

"तुम..!! हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी यहां आने की;" मैं वहीं से चिल्लाया तो मीनल घबरा के पलटी।

"निशांत तुमने अब तक ये पेंटिंग. !!" वो थोड़ा भावुकता में कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन मैं ना जाने क्यों बहुत भड़क गया था. शायद जितनी उम्मीद थी उस के कहीं पहले मीनल मुझ तक पहुच चुकी थी।

मैंने दीवार की पेंटिंग निकाल कर फेंक दी और चिल्लाया

" कितनी बार कहा है कौस्तुभ से कि कूड़ा घर के बाहर ही अच्छा लगता है;लेकिन उसे समझ नहीं आता. "

मेरे चिल्लाने से वो इतना घबरायी की खड़ी हो गयी. उसकि कंपन और डर साफ दिख रहा था; मैं खुद को संयमित करना चाहता था लेकिन; श्रीमती मीनल फिर मेरे दिमाग मे घूमने लगा।

मैं तेजी से उस के पास गया. मीनल मेरे इस रवैये से इतना घबरा गई के पीछे होने के चक्कर मे कुर्सी से टकरा कर गिरने लगी. मैंने झट से उसे सम्हाल लिया और चिल्लाया.

" ध्यान कहाँ रहता है तुम्हारा, अभी गिर जाती तो. !!"

"निशांत!!. " मीनल की आंखें भर आयी तो मैं होश में आया, खुद को मीनल को सम्हाले देख कर मुझे खुद पे ही क्रोध आने लगा और बिना जाने सोचे मैंने उसे उसी वक़्त छोड़ दिया।

मीनल को सम्हलने का मौका नहीं मिला तो वो कुर्सी पर गिर गयी, मेरा दिल फिऱ पसीझ गया।

"तुम ठीक तो हो;" मैं अब चिंता में बोला.

मीनल बिना कोई जवाब दिए फिर खड़े हो गयी; उसके चहरे पे खौफ साफ झलक रहा था।

"क्या हुआ मिसेज़ मीनल; डर लग रहा है आपको मुझसे. " मैंने हंसते हुए व्यंग किया तो उसकी आंख से आंसू गिर पड़ा।

"क्यों आयी हो यहाँ. "मेरी आवाज़ फिर बुलंद थी।

लेकिन मीनल की हालत बोल पाने की नहीं थी शायद. इतना डर में मैंने उसे पहली बार देखा था।

"त तुमसे;" जैसे तैसे दो शब्द निकले उस के मुह से.

और मैं शुरू हो गया. "अरे मीनल जी. आप जैसी बड़ी हस्ती मेरे जैसे दो कौड़ी के इंजीनियर के घर; शोभा नहीं देता. " इतना कहते ही मैने उसकी एक बाजू पकड़ ली और दूसरे हाथ से दरवाज़ा खोल दिया।

मीनल कुछ समझती या कहती. वो दरवाज़े के बाहर थी; मैंने आंखों से न जाने कितने सवाल पूछे. और बिना सवाल खोजे दरवाज़ा बंद कर दिया।

--0......

आगे की कहानी जानने के लिए अगले भाग का इंतेज़ार, करें।

धन्यवादस्वप्न सुंदरी-३०

दरवाज़ा बंद करते ही मैं पलट कर खड़ा हो गया और अपने काँपते हुए हाथ को देखने लगा जिस से मीनल को घर से बाहर किया था

"माफ कर दो मीनल. !!" मैंने आंखें बंद कर के धीरे से कहा।

जब आंखें खोल कर सामने देखा तो मीनल की बनाई पैटिंग पे नज़र गयी, मैं उस तरफ़ भागा और पेंटिंग उठा के सीने से लगा लिया. मेरा दिल जानता था कि वो मेरे लिए कितनी कीमती थी.

सच तो ये था कि मैं चाह कर भी मीनल से नफरत नहीं कर पाया था. अपने आप से झूठ कहता था।

आज अगर मीनल शादी शुदा न होती तो मेरा व्यवहार अलग होता. मीनल के लिए मेरे प्यार की हदें क्या थी मैं जानता ही नही था , उस से इतना प्यार था कि उसे गलत ढंग से छूने से भी डरता था. और इस के बाद जब पता चला कि मीनल ने शादी कर ली तो कैसे सह पाता आखिर.

मैं पेंटिंग को सीने से लगाये खड़ा रहा . ना आंखों में आंसूं थे न चेहरे पे कोई भाव. उस पेंटिंग को ऐसे गले लगाया था जैसे वो मेरी भावनाओ को समझ लेगी; लेकिन वो बेजान थी क्या , In pagerसमझती.

मुझे फिर मीनल की चिंता होने लगी. " चोट तो नहीं लगी होगी उसे, मैंने गलत ही व्यावहार कर दिया उस के साथ;उस ने कभी मेरे साथ गलत तरीके से बात नहीं कि थी; मैंने ऐसे बेइज़्ज़त कर के निकाल दिया कहाँ जाएगी; फिर एक घबराहट ने मेरे सीने में जन्म लिया और मैं दरवाज़े की तरफ भागा;

खोल के देखा तो मीनल कहीं नहीं थी. मैं गलियारे में भागा. लिफ्ट देखी. मीनल नहीं थी। कहाँ चली गयी; मैं परेशान होने लगा अब।

दरवाज़ा बंद किया और लिफ्ट से नीचे गया. सब तरफ भाग के देखा वो नहीं थी। मैं निराश हो गया. अब खुद पे गुस्सा आने लगा. " एक बार बात कर लेता. पहले तू ही तो कहता था ना कि मीनल मेरी जिंदगी में आये न आये उस की मर्ज़ी. तो आज जबरन उसे अपनी जिंदगी का हिस्सा क्यों साबित कर रहा है; मेरे अंदर से आवाज़ आयी।

मैंने कब उसे मजबूर किया;कब अपना हिस्सा बनाया. मैंने सफाई दी।

तो जो भी हुआ उसे स्वीकार कर ना;

मैं इसी तरह खुद से बात करते दरवाज़े तक आ गया. अंदर आते ही सिगरेट जला ली. मीनल को खुद से दूर करने का मलाल बहुत जोरों पर था, लेकिन मैं सच जानते हुए भी उसके करीब नहीं रह सकता था।

थोड़ी देर में कौस्तुभ आया और नाश्ता देते हुए पूछा " मीनल आयी थी. ?."

मैंने नज़रें चुराते हुए हामी भरी।

"फिर सिगरेट पी तूने;?" कौस्तुभ मुझे गुस्से में घूरते हुए बोला. मैं चोरी पकड़े जाने पर ज़मीन पे नज़रें गड़ा के खड़ा रहा।

"तुझे हुआ क्या है निशांत. 2 साल से उसके लिए तड़प रहा है अब वो आयी है तो उस से भाग रहा है;" कौस्तुभ भी मेरी हरकतों से तंग आ गया था।

"कौस्तुभ. !! मैं भाग रहा हूँ ताकि पहले वाली भावनाओं में न आ जाऊँ. वो अब शादीशुदा है. मेरी उस से दूरी ही ठीक है. वो ऐसे आएगी तो ये सही नहीं ना;" मैंने धीमी आवाज़ में ज़मीन को देखते हुए ही जवाब दिया;नज़रें मिला लेता तो फिर रो पड़ता. ये कहने में मेरी कितनी ताकत लगी थी मैं ही जनता हूँ।

कौस्तुभ मुस्कुराने लगा; "जैसी तेरी मर्ज़ी. अब तो वो चली भी गयी।"

"क्या!! चली गयी. इतनी जल्दी. " मैं चिल्लाया. और उसे अविश्वास से देखा।

कौस्तुभ मुस्कुराते हुए मुझे देखता रहा;"क्या" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं नाश्ता कर. फिर बाहर घूमने चलेंगे. "

"मेरा मन नहीं;" मैं उदास हो कर बोला।

"नाश्ता कर के आधे घंटे में तैयार मिल. समझा" वो धमकी दे के चला गया।

मैं तो मीनल की चिंता में था लेकिन उसे घूमने की पड़ी है, ये नहीं कि मीनल को एक बार वापस ही बुला लेता. मैं चिढ़ के बड़बड़ाया और खाने लगा।

मन न होते हुए भी मैं दोंनो के साथ गया, ऊपर से मीरा की शॉपिंग शुरू हो गयी; एक ड्रेस लेने के लिये 50 दुकाने घूमी.. हज़ारों कपड़े पहन के देखे.

एक तरफ़ हम लड़के होते हैं 2 दुकान जाएंगे और साल भर के कपड़े ले जाएंगे. इन लड़कियों के नखरे ही नहीं जाते।

"इसका रंग अच्छा है लेकिन प्रिंट. बेकार।

" इसकी बाजू ठीक नहीं. "

"अच्छी है लेकिन पहन के मज़ा नहीं आया. "

"सेम प्रिंट मेरे ऑफिस में एक लड़की के पास है. "

सारी महारानी विक्टोरिया ही हैं।

मैं उबल चुके खून के साथ मीरा की शॉपिंग में मदद कर रहा था, कौस्तुभ ने पहले ही हाथ खड़े कर दिये थे।

"आज के बाद मुझे अपनी शॉपिंग के लिए साथ मत लाना.." मैं मीरा से चिढ़ के बोल।

"सही कह रहे हो, तुम लड़कों को कुछ खरीदना नहीं आता . मेरा टाइम भी बर्बाद कर दिया. " मैं हैरानी से उसका मुह देखने लगा और कौस्तुभ हंसने लगा।

मैं बहस करने की हालत में वैसे भी नही था, और मीरा से जीत ही कौन सका है भला।

मौका देखते ही कौस्तुभ से बोला " वो. मोटू एक बार पूछ लें, वो ठीक से पहुँच गयी न. "

"कौन वो?" कौस्तुभ जान बूझ के मेरे मज़े ले रहा था।

मैं उसे घूरने लगा;

" छोड़ न, हमे क्या करना जब पहुँचे. वैसे भी जॉब क्या लगी घमंड में आ गयी है. " कौस्तुभ बोला।

मुझे उस की बात इतनी चुभ गयी कि मैं वहां से चला गया "पार्किंग में मिलूंगा कह कर।

"बात हो गयी, सेफ है तेरी मीनल; " कौस्तुभ पीछे से आ के बोला और मेरे दिल को सुकून मिल गया।

फिर हम दोनों कार से सटे खड़े हो गए. चुपचाप. मोटू भी जानता था इएलिये कोई जिक्र नहीं किया; लेकिन इतने में हम मीरा को भूल गए थे।

थोड़ी देर में वो कई सारे थैलों के साथ तमतमाती हुई चली आ रही थी, हालांकि उसे चलने में दिक्कत भी हो रही थी; उसे देखते ही न जाने क्यों हम दोनों को हंसी आ गयी लेकिन ज़ोर से हंसते तो न जाने कितने दिनों का दाना पानी बंद हो जाता तो हमने एक दूसरे को देख के मुस्कुराया और उसकी तरफ भागे।

उसके पास पहुँचते उस के पहले ही उसने हमें देखते ही सारे थैले गुस्से में ज़मीन पे पटक दिए, हम दोनों ने चुप चाप वो थैले उठाये और सॉरी कहा।

मीरा रास्ते भर हमे कोसती हुई घर आई, इतना तो मेरी मम्मी भी नहीं बड़बड़ाती जितना आज वो चिल्ला रही थी।

कौस्तुभ ने अपने फ्लैट पे चलने को कहा तो मैंने मीरा को देख कर बहाना बना दिया और अपने फ्लैट पे आ गया, वैसे भी मुझे मीनल की फिक्र थी. आज उसे इस तरह भेजने पर पछतावा हो रहा था।
 
दूसरा मन समझाने लगा कि अगर उसे मुझसे सच मे बात करनी होती तो फिर आती । अब तक तो अपने पति के पास होगी, मैं हूँ कि कौन जो मेरे लिए रुकती। मेरे अंदर अंतर्द्वंद छिड़ा हुआ था. कभी मीनल पर क्रोध आता, कभी तरस और कभी प्यार तो कभी जलन होने लगती.

मैंने इस विचार में डूबे हुए चाय और मैग्गी बनाई, मन नहीं था लेकिन थकान से भूख लग गयी थी, आज का मेरा डिनर यही था। अभी खाना शुरू भी नहीं किया था कि दरवाज़े की घंटी बजी;" मीनल. !!" सहसा मेरे मुह से आवाज़ निकली लेकिन वो तो जा चुकी ये ख़याल आते ही मेरा दिल भर आया।

दरवाज़ा खोल के देखा तो सामने सच मे मेरी दुनिया खड़ी थी. मीनल!! मैंने फिर कहा।

वो नीचे देखते हुए अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस मे फंसा के खड़ी थी।

एक पल को मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ, उसे अंदर बुलाऊं या मना कर दू; वो अगर वापस नहीं गयी थी तो कहां रही दिन भर, उसके चेहरे पे थकान दिख रही थी.

कुछ पल ऐसे ही सोचते हुए मैंने आखिर दरवाज़ा पूरा खोल दिया और एक किनारे खड़ा हो गया और वो अंदर आ के खड़ी हो गयी तो मैंने दरवाज़ा बंद करते हुए पूछा " वापस क्यों नहीं गयी. "

सच कहूं तो अजीब दशा थी मेरी मन करता था उसे गले लगा लू. लेकिन खुद को उस से जुदा भी जताना था. मीनल मेरी बहुत इज़्ज़त करती थी, ये मैं समझता था. लेकिन जब वो आगे बढ़ चुकी थी तो उसे असमंजस में डाल नहीं सकता था।

"तुमसे मिलना चाहती थी. "

"अब क्या करोगी मिल कर मीनल; अब कुछ नहीं बचा.. तुम हम दोनों का वक़्त बर्बाद कर रही हो।"

मीनल पे मैंने वक नज़र डाली तो वो सकुचाई सी खड़ी थी, मुझे मेरी पुरानी मीनल याद आ गयी।

मुझसे नज़रें मिलते ही उसने आंखें नीची कर ली. " तुम्हें बहुत याद किया निशांत. "

उसका इतना कहना था कि मेरा पारा फिर चढ़ने लगा. और मैं गुस्से में उसे घूरने लगा. उसे भी इस बात का अंदाज़ा था।

अब मैंने उसे ऊपर से नीचे अच्छी तरह से देखा; बनी हुई बौहें, आंखों में हल्का काजल, रंगे होठ. वैक्स किये हुए हाथ. केवल एक ही चीज़ नहीं बदली थी उसकी टाइट चोटी।

मुझे उसे देख कर बिल्कुल अच्छा नहीं लगा मुझे तो मेरी झल्ली, पागल सी मीनल से प्यार था।

मैं उसे पकड़ने के लिए एक कदम, आगे बढ़ा लेकिन अब अपनी सीमाएं याद कर के रुक गया।

"तुम्हे पहले भी फ़ोन किया था लेकिन आवाज़ नहीं आयी. जब तुम मुम्बई. " इसके आगे बोलने से पहले ही मुझे देख कर उसकी सांसें अटक गई और मेरा गुस्सा भी बढ़ गया।

"हाँ!! जब मुम्बई में मैंने देख लिया था उस दिन तुम्हें तो कॉल करना ही था न. नहीं नहीं तुम तो बहुत बड़ी हस्ती हो, अपने सेक्रेटरी से करवाई होगी सारी कॉल. मेरे जैसे इंसान के लिए अपना कीमती वक़्त क्यों बर्बाद करना. "

"तुम मुझे गलत समझ रहे हो निशांत. " कह कर उसने कदम आगे बढ़ाना चाहा लेकिन मैंने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया।

मेरा दिमाग अब वापस से गरम होने लगा था तो सिगरेट निकाल ली ये जानते हुए की उसे पसंद नहीं आएगा।

मेरी इस हरकत पे वो बोल पड़ी.." निशांत तुमने फिर से;"

"हाँ फिर से;कोई दिक्कत. " मैंने कहा और उसके चेहरे की तरफ धुआं छोड़ दिया।

मीनल को इसकी उम्मीद भी नहीं थी , वो खांसने लगी और एक कदम पीछे हो गयी।

मैं धूआँ छोड़ता उसे देखता रहा, मैं इतना निष्ठुर क्यों और कब हुआ कुछ नहीं पता।

"बस करो निशांत. क्यों खुद को सज़ा दे रहे हो. गुस्सा निकालना है तो मुझ पे निकालो, खुद के साथ ऐसा मत करो;" मीनल गिड़गिड़ाई।

" तुम्हे पागलों की तरह खोजता रहा था उस दिन मैं मीनल. ! हर ट्रेन में झांका, चिल्ला कर आवाज़ भी दी; लेकिन तुम बिन मेरे बारे में सोचे चली गयी. " मैं अचानक ही रोने लगा।

"तब तुमने सोचा कि मेरे साथ गलत हो रहा है??;आज याद आ रहा है. " मैं फीका मुस्कुराया।

"वैसे गयी कहाँ थी तुम??. " मैंने पूछ ही लिया।

"तुम्हारे घर से निकल के सब स्व पहले प्रवीण से मिली. उस से. " मीनल प्रवीण के पास गई थी सुन कर मैं जल गया; उसकि मदद ले ली लेकिन मेरे साथ आत्मसम्मान पे आंच आने लगी थी।

"देखो 10 बजने वाले हैं तुम जाओ यहाँ से अब; किसी पराए मर्द के घर इतनी देर रुकेंगी आप तो आपके चरित्र पे सवाल उठेंगे;मिसेज़ मीनल. "

"निशांत;!!"

"वो रहा दरवाज़ा; चली जाओ मीनल इस के पहले की मैं अपना आपा खो दूं,; " ये कहते हुए मेरा गला भर आया, मीनल देख, समझ न ले इस लिए दरवाज़ा खोल दिया।

"जाओ मीनल;तुम मेरी तरफ से आज़ाद हो. किसी माफी की ज़रूरत नही. ये तुम्हारी ज़िन्दगी है;"इस बार मैं अपनी आंखों को सम्हाल न सका. "

मीनल ने भी अपनी आंखें पोछी और बाहर निकल गयी, मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया. और फिर ख़याल आया कि इतनी रात को कहां और कैसे जाएगी;

जहां भी जाये तुझे क्या. दूसरा मन बोला।

कुछ देर सोच कर मीनल से पूछने का फैसला किया, इस बार भी गायब न हो जाये सोच कर जल्दी से दरवाज़ा खोला;देखा तो वो सामने उसी तरह खड़ी थी. मैं खुश भी हुआ और हैरान भी।

"कहाँ जाना है बताओ मैं छोड़ देता हूँ; इतनी रात को अकेले जाना ठीक नहीं. मैंने अंदर से ही सवाल किया।

"निशांत कहते हुए मीनल तेजी से आ के मेरे गले लग गयी, मेरी उस वक़्त क्या हालत थी शब्दों में बयान नहीं कर सकता. बाहर का कोई देख न ले इस डर से दरवाज़ा बंद कर दिया मैंने.

मीनल की धड़कने सुन सकता था मैं उस वक़्त. ये समझ नहीं आ रहा था कि दोनों में से किसकी धड़कन ज्यादा तेज चल रही है;

"मीनल मुझे छोड़ो , मैं उसे बोला. " मुझे डर था कि मैं भी उसे न पकड़ लू कहीं. "

"मुझे माफ़ कर दो निशांत;" मीनल रोते हुए बोली।

"माफी किस बात की मीनल , तुमने वो किया जो सही लगा. मैं तुम्हारे लिए कुछ था ही नहीं . मेरी भावनाएं जो थी वो अलग थी. कहाँ जाना है जल्दी बताओ. ऐसे यहां मत रुको. अब पहले वाले हालात नहीं;" मैं अब उसके गले लगे रहने से घबरा रहा था।

"जहां जाना था;वहीं हूँ मैं. वो मुझे देखते हुए बोली. इतनी करीब से उसका मुझे देखना मुझे उद्वेलित कर गया, लेकिन जब उसके चेहरे के मेक अप पे ध्यान गया तो मैंने उसे खुद से अलग कर दिया।

मीनल को कुछ समझ नहीं आया "जाओ पहले अपना ये चेहरा धो के आओ;" मैं चिढ़ से उसे बाथरूम दिखाते हुए बोला।

मीनल स्तब्ध हो कर मुझे देखने लगी फिर बाथरूम की तरफ चली गयी; उतनी देर में मैं लंबी लंबी सांसें ले कर खुद को संयमित करने का प्रयास करता रहा।

जब वो बाहर आई तो मुझे उसे देख के सुकून मिला और मैं हल्का मुस्कुराया तो मीनल बुरी तरह झेंप गयी।

"अब बताओ. सीधे मुम्बई जाओगी या कहीं होटल में रुकी हो;"

"कहीं नहीं. मैं कहीं नहीं रुकी. यही थी. "वो नज़रें झुका के बोली।

"क्या मतलब?" मैं इस वक़्त हद से ज्यादा हैरान था।

"कुछ खाया पिया या. अब समझ आया कि इतनी थकी सी क्यों दिख रही थी वो.."

अचानक ही पुराना निशांत जाग उठा और बेचैन हो गया. "मीनल!! हद करती हो तुम. चलो बैठो यहां. " कहते हुए मैंने उसे बिठा दिया. वो हतप्रभ सी हो गयी।

मैं किचन में भाग के गया और पहले वाली मैग्गी गर्म की साथ ही और मैग्गी, चाय बनाया और ट्रे में सज़ा के मीनल के सामने रख दिया।

"खा लो मीनल. " मैंने कहाँ तो उसने भीगी आंखों से मुझे देखा,फिऱ नीचे देखने लगी. मैं तड़प गया उसका रोना देख कर और घुटनों के बल उसके पास नीचे बैठ गया. फिर अपने हाथों से उसे खिलाने लगा. वो अपनी आंखें पोछती और खा लेती;" कुछ देर खाने के बाद जब मैंने उसकी तरफ चम्मच बढ़ाया तो उसने उसे मेरी तरफ कर दिया.

" तुम भी तो भूखे हो बोली. " मेरी आँखों से आंसू गिर गया।

उसने अब मुझे खिलाना शुरू किया. दोनों एक दूसरे को खिलाते रहे. मेरे दिल मे एक सुकून भर गया।

खाने के बाद जब मैं प्लेट रख के आया तो वो आ के फिर मेरे गले लग गयी; मैं जड़वत खड़ा रह गया. जितना संभव हो वो मुझे कसती रही. मैं हाथ नीचे किये खुद को रोके सोचता रहा. "निशांत कह कर उसने चेहरा ऊपर किया और मैं सब भूल गया. मेरे हाथ उठ गए और मीनल को जकड़ लिया।

वो शादी शुदा है जान कर भी अब मेरा दिमाग काम नहीं कर पा रहा था. मैं उसकि आंखों में देखता रहा. और मेरे हाथ उसकि चोटी की तरफ बढ़ गए. कुछ ही क्षणों में उसके बाल खुल गए थे और मैं उन्हें संवार के ठीक कर रहा था.… इतनी देर में मेरी नज़रें उसकि नज़रों से जुड़ी रहीं।

जब वो असहज हुई तो मेरे सीने में सिर छुपा लिया. काफी देर तक हम एक दूसरे की बढ़ी हुई धड़कने, और तेज़ साँसों की आवाज़ को महसूस करते रहे।

कुछ देर बाद में मैं होश में आया तो उसे खुद से अलग कर के माफी मांगी और अंदर वाले कमरे में सोने को कहा;

"कल सुबह चली जाना मीनल. हमारा साथ रहना ठीक नहीं;" कह कर मैं उसे कमरे में छोड़ आया।

बाहर कुर्सी पे बैठ कर मैंने मेज़ पे अपने पैर रख दिये और सिगरेट जला ली. और न जाने क्या क्या सोचता रहा; मीनल के गले लगने का एहसास बेचैन करने लगा तो एक और सिगरेट जला ली। इस के पहले मैं उसे पी पाता मीनल ने आकर फेंक दी।

"ये क्या किया. मैं धीरे से बोला;"

" तुमने अंकल से वादा किया था याद है??;" मैं शर्मिंदा हो गया ,पापा से किया वादा याद आ गया।

"मीनल जाओ सो जाओ; " मीनल का पास होना मुझे बहका रहा था।

वो मेरे पैरों के पास बैठ गयी और मेरी गोदी में सिर रख लिया, मैं हमेशा की तरह असहज हो गया।

"मीनल हट जाओ प्लीज. " मैं गिड़गिड़ाया।

"निशांत; मुझे अपने साथ रहने दो; मैंने तुम्हें हर पल याद किया है. " उसने कहा।

हां इस लिए लिए शादी कर ली, मेरे दिल से आवाज़ आयी।

वो ऐसे ही बैठी रही और मैं असहज होता रहा। कुछ देर में मुझे वो सोई हुई लगी, आवाज़ देने पर भी नहीं उठी. और मेरा पापी मन बेचैन हो गया। मैंने झुक के उसके गाल चूम लिए और उसी पल मीनल ने आंख खोल दी।

चोरी पकड़े जाने पर मैं बुरी तरह घबरा गया; शरम से मैं गड़ा जा रहा था. मीनल उठ के खड़ी हो गयी और मैं शर्मिंदा सा बैठा रहा।

फिर कुछ समझ नहीं आया तो खड़े हो कर माफी मांगने लगा. मीनल का कोई जवाब नहीं आया. तो हिम्मत कर के एक बार उसकी तरफ देखा. वो मुझे मुस्कुरा कर देख रही थी।

मैं हैरान रह गया. आखिर मीनल खुश क्यों है, ये गलत है मेरे अंदर से आवाज़ आयी. मैं और कुछ कहता इस के पहले ही मीनल मेरे करीब हो गयी; मैं उसके इरादे समझ गया तो उसे रोक लिया. फिर हाथ जोड़ कर बोला. " मीनल मुझे मेरी नज़रों में और मत गिराओ. " इतना कह कर मैंने आंखें पोछ ली जो शरम से भर आयी थी।

मीनल कुछ देर खड़ी रही फिर अंदर के कमरे में चली गयी।

अगली सुबह मैंने उसके कमरे का दरवाज़ा खटखटा के उसे जगाया और नहा धो के तैयार होने के लिए कहा; कुछ देर में हम तैयार थे.. मैंने नाश्ता बना दिया था।

इस बार हमने साथ ही खाया लेकिन एक, दूसरे को नहीं खिलाया. एक अजीबोगरीब शांति पसरी थी दोनो के बीच;

"तुम्हारे लिए कैब बुक कर देता हूँ. " मैंने कहा.." तुम वापस लौट जाओ तो वो बोली कि बुक कर ली है, मैं चुप हो गया।

जैसे जैसे वक़्त नज़दीक आ रहा था, मैं मीनल के बिछड़ने की बात पे घबरा रहा था; खुद को सम्हालते हुए मैंने घर का दरवाज़ा बंद किया और मीनल के साथ लिफ्ट से नीचे आ गया।

जैसे जैसे हम आगे बढ़ते मेरा दिल रोने लगता, मन करता कह दूं कि रुक जाओ मीनल, सब छोड़ कर आ जाओ. लेकिन मैं मजबूर था।

कार के पास पहुँचते ही मैंने कहा. " कितनी देर में आएगी कैब..?" मैं रुकूँ।"

"आती ही होगी. तुम परेशान मत हो निशांत. " मीनल बहुत शांत थी. और मैं उतना ही बेचैन।

कुछ देर हम एक दूसरे को ऐसे ही देखते रहे. फिर मैं बोला " जाओ मीनल खुश रहो; अब यहां कुछ नहीं तुम्हारा. " फिर अपनी बहती आखों को पोछा और कार में बैठ गया। उसे देखते हुए ही कार स्टार्ट की और चल दिया। कार के शीशे मे वो खड़ी दिखती रही और फिर ओझल हो गयी।

पूरे दिन मैं ऑफिस में परेशान रहा. लंच भी नहीं किया. अब सब खत्म हो गया. मैंने मीनल को मुक्त कर दिया. जहां चाहे खुश रहे वो।

शाम को थका हारा वापस आया, कार पार्किंग में गया तो वहां मीनल खड़ी दिखी।

इस लड़की का दिमाग खराब है कहता हुआ मैं कार रोक के उतरा.

"तुम चाहती क्या हो मीनल. ?"

"तुम्हे सब सच बताना;" उसने कहा और मैं उसे देखने लगा।

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आगे की कहानी जानने के लिए अगले भाग का इंतेज़ार, करें।

धन्यवादस्वप्न सुंदरी-31, , heading 1अब तक आपने पढ़ा

मीनल पुणे आ गया मेरे घर, मैंने उसे निकाल दिया.. लेकिन शाम को वो फिर आयी , वो भूखी थी और सिन भर वहीं थी इस लिए मैंने उसे अपने घर पे रुकने दिया, अगले सिन सुबह वो मुम्बई जाने के लिए निकल गयी और मैं ऑफिस। जब घर वापस आया तो उसे पार्किंग में पाया।

अब आगे

क्या परिस्थिति थी, मीनल सामने थी; लेकिन जैसे सदियों की दूरी थी. मेरे साथ होकर भी वो साथ नहीं थी; मैं कुछ देर उसे देख कर उसे पढ़ने की कोशिश करता रहा. लेकिन वो जैसे रहस्यों का खजाना थी;

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और चलो कह कर अपने फ्लैट पे ले आया।
 
अंदर आते ही सब से पहले अपना और उसका बैग ले कर साइड रखा फिर उसे कुर्सी पे बिठाया; उसे देख के ये अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था कि भूखी प्यासी थी; खाना पीना तो आज मेरा भी नहीं हुआ था लेकिन मीनल की तकलीफ से में विचलित हो उठता था हमेशा से ही.

उसकी उदासी, उसकि बेचैनी और साथ ही साथ मेरे बुरे रवैये के बाद भी मेरे पास आने की लालसा ने मेरे मन मे उसके लिए प्यार के अलावा एक सांत्वना भी भर दी थी।

वो अब भी मुझसे नज़रें नहीं मिला रही थी, ऐसा लगा जैसे मेरी पुरानी मीनल थी. आज उसने कोई मेक अप नहीं किया था तो मुझे उसमे आज वो ही छोटे बच्चों जैसी मासूमियत दिखाई दी. बालों का उसने जुड़ा बना लिया था. मुझे पसंद नहीं था लेकिन दिन भर ऐसे रहने से कोई भी बना लेता।

मैं उसके सामने मेज़ पे बैठ गया तो न जाने वो क्यों सिकुड़ गयी; "मीनल!!" कह के मैंने अपने हाथ से उसका चेहरा ऊपर किया. " तुम्हे नहीं जाना था तो बता देती. तुम पे भले मेरा हक़ नहीं मीनल; लेकिन मेरी हर चीज़ पे तुम्हारा हक़ है;ये तुम जानती हो न. "

मीनल ने पलकें झुका के हामी भरी;"तो क्या एक बार कह नहीं सकती थी मीनल..!!. चलो तुम बैठो..मैं चाय बनाता हूँ..पियोगी ना;" मैंने मुस्कुरा के कहा।

और उसने हांन में गर्दन घुमा दी.. पहले मैंने उसे पानी दिया, फिर चाय बनाने लगा. साथ ही खाने के लिए बाहर से आर्डर कर दिया. मीनल खाने की शौकीन थी तो खूब सारी चीज़ें मंगा ली.. चाय ले कर बाहर आया तब तक मीनल मुँह धो के बाथरूम से बाहर निकली;

मुझे लोनावला का दिन याद आ गया. मैं खुद से ही अंजान मीनल के पास पहुँच गया; वो मुझे ऐसे देख के जब शरमाई तो मेरे दिल मे उथल पुथल हो गयी, मैं कुछ सेकंड्स अपने होश खो बैठा।

"निशांत चाय;" मीनल बोली और मैं झेंप कर वापस आ के बैठ गया. उसने अपनी कुर्ती की बाज़ुओं से ही अपना चेहरा पोछते हुए आ के बैठ गई।

चाय पीते समय अचानक ही कौस्तुभ आ गया. और मीनल को देख कर हैरान हो गया " तुम गई नहीं अभी तक?।.. आज सुबह ही जाने वाली थी न;!!"

"आज सुबह. ? अब मैंने हैरानी से कौस्तुभ को देखा. तूने कल झूठ कहा मुझसे;" तो दोनों एक दूसरे को देखने लगे।

"वो; मैं कल ही जा रही थी; रात को मैंने कौस्तुभ को बता दिया कि यहीं हूँ;आज जाउंगी" ये सुनते ही कौस्तुभ के चेहरे पे सुकून दिखा।

मैं इतना भी बेवकूफ नहीं था कि समझ न पाता. कि कुछ तो खिचड़ी पक रही थी लेकिन मैं चुप रहा।

"मैं तो तुझे खाने के लिए बुलाने आया था. अब बता. क्या करना है. "

"मैंने खाना मंगाया है ,आता ही होगा फिर साथ चलते हैं.." मैंने कहा।

थोड़ी देर में हम सब कौस्तुभ के घर पे थे, आज मैं बहुत शांत था. कौस्तुभ की बातों से सब हंस रहे थे सिवाए मेरे.. मैं तो सबके साथ मीनल को हंसता देख मुस्कुरा देता।

खाने के बाद मैं चलने को हुआ तो कौस्तुभ ने रोक लिया "कुछ देर साथ रहते हैं. अच्छा लगेगा, मीनल के जाने के पहले थोड़ा हंस बोल ले. "

मैं मीनल की जाने की बात से गंभीर हो गया. "चल एक गाना सुनाता हूँ.." कौस्तुभ बोला

"बिल्कुल नहीं. मैं घबरा के बोला तो सब हंसने लगें; मेरी नज़र मीनल पे टिक गई. कितनी अच्छी लग रही थी हंसते हुए।

उधर मीरा मीनल से न जाने क्या क्या बातें करने लगी तो कौस्तुभ मेरे साथ आ कर बैठ गया।मैं नज़रें चुरा कर सिर्फ मीनल को देख रहा था ये बात हर कोई जानता था;

कितने वक़्त तुम मेरे साथ हो मीनल, आखिर तुम्हें जाना ही होगा. मुझे याद है जब मैंने कहा था कि जिस दिन तुम खुद मेरे पास आओगी तुम्हे कहीं जाने नहीं दूंगा. और आज जब तुम, खुद आयी हो तो मैं चाहता हूँ कि तुम चली जाओ;

मीनल को देखते हुए सोचता रहा;

कौस्तुभ खुद में गुम ग़ज़ल खोज रहा था;और फ़िर.

कोई फरियाद तेरे दिल में दबी हो जैसे

तूने आँखों से कोई बात कही हो जैसे

जागते जागते एक उम्र कटी हो जैसे

जान बाकी है मगर साँस रुकी हो जैसे

एक लम्हे में सिमट आया है सदियों का सफ़र

ज़िंदगी तेज़ बहुत तेज़ चली हो जैसे।

इस तरह पहरों तुझे सोचता रहता हूँ मैं

मेरी हर साँस तेरे नाम लिखी हो जैसे।

उस माहौल में मोटू की ये ग़ज़ल जैसे मेरे हालतों को बयान करने लगी. क्या जिंदगी हो गयी मेरी; जिस के साथ हूँ वो मेरा नहीं. फिर भी साथ हूँ.

जानता हूँ वो चली जायेगी, फिर भी उस के साथ जीना चाहता हूँ; वो अपनी सफाई देने आयी है लेकिन मैं कुछ जानना ही नहीं चाहता; जान गया तो कहीं कोई मलाल न रह जाये. इतनी बेचैनी, इतनी तड़प. क्या यही प्यार होता है?

मेरे दिल मे मीनल से बिछड़ जाने की टीस जग गयी और मैं बेचैन हो कर उठा;" मैं जा रहा हूँ मोटू; थोड़ा आराम चाहता हूँ, तुम लोग बातें करो." मेरी बेचैनी सब समझ रहे थे।

मीरा ने मीनल को आंखों से इशारा किया तो वो भी खड़ी हो कर मेरे पीछे आ गई।

मैं तेज़ी से घर मे घुसा और मीनल के अंदर आते ही दरवाज़ा बंद कर दिया, अपने सिर पे हाथ रखे मैं तेज़ी से चहलकदमी करने लग गया और मीनल वहीं खड़े मुझे देखती रही।

" जाओ सो जाओ मीनल. " मैं थोड़ा कड़क नदाज़ में बोला।

"निशांत, मैं तुम्हे सब बताना चाहती हूं;" मीनल का फिर वही पुराना राग शुरु हो गया।

"कहा न जा के सो जाओ;" मैं उसे घूरते हुए बोला ," और कल तुम्हे मैं छोड़ के आऊंगा. बहुत हो गया अब. "

"नहीं मैं तुम्हारे साथ रहूंगी;" मीनल ने भी ज़िद की सीमाएं पार की थी, वो समझती भी नहीं थी कि उसका मेरे बहुत पास होना मुझे बेचैन कर देता था।

मैं खड़ा हो कि कुछ पल उसे घूरता रहा; इस लड़की ने अपनी जिद से सब तहस नहस किया हुआ है. और वो डर छुपाने की नाकाम कोशिश करती रही; उस के मेरे सामने डर के रहने से मुझे और चिढ़ होने लगी।

मैं अपनी ज़िंदगी की उठा पटक से अब कुंठित हो गया था, मीनल का मेरे सामने डर के बावजूद न झुकना बरदास्त न हुए तो मैंने उसके हाथ पकड़ के अपनी तरफ खींच लिया;वो कुछ समझती उसके पहले उसका हाथ उसके पीछे की तरफ कमर में मुड़ गया था, मेरी पकड़ इतनी बुलंद थी कि उसकी आह निकल गयी; दूसरे हाथ को पीछे कर वो मेरे हाथ की पकड़ को हटाने की कोशिश करने लगी तो मैंने अपनी ताकत से उसे अपने से सटा लिया; और गुस्से में पूछा.. " मेरे साथ रहना है ना. रहो अब;"उसका डर बढ़ गया था. "मेरे साथ रहोगी तुम;?? क्यों. क्या करना है मेरे साथ रह कर बोलो;"

"निशांत;"मीनल दर्द में कराहते हुए बोली.

लेकिन मैं कुछ सुनना नहीं चाहता था तो उसे अंदर कमरे में खींच के ले गया.. यही रहो कह कर उसे छोड़ दिया. " चुप चाप सो जाओ. मुझे कुछ नहीं जानना ;" मैंने सीधे सपाट शब्दों में कहा और मुड़ गया. बाहर आता उस के पहले मीनल ने मेरा हाथ पकड़ लिया;" ऐसे मत जाओ निशांत. " मेरी नज़र उसकि कलाईयों पर गयी जो लाल- नीली सी हो गयी थी।

ये मेरी ही करतूत थी. जो हर बार मुझे किसी ना किसी रूप में शर्मिंदा करती थी. इतने में मीनल मेरे सामने आ के खड़ी हो गयी. "मुझे कोई भी सज़ा मंज़ूर है निशांत. लेकिन ऐसे नाराज़ रह के खुद से अलग मत करो. मैंने भी तुम्हे हर वक़्त याद किया. आज मैं जो भी हूँ वो सिर्फ तुम्हारे कारण और तुम्हारे लिए हूँ निशांत. "

मैं उसे देखने लगा;" मैं तुमसे सब कुछ बताना चाहती हूं; तुम भी तो जानना चाहते हो न निशांत;बोलो.."

मैंने उसके हाथ को अपने हाथ मे लिया और उसके निशान को सहलाते हुए बोला. " जानना चाहता था मीनल. लेकिन अब इसका कोई औचित्य नहीं रह गया.. मैं कुछ जानू और फिर उसका दुःख और मलाल ले कर आगे बढ़ जाऊँ.. ऐसा अब सम्भव नहीं, मेरे मेरी सीमा से ज्यादा परेशान रह चुका हूँ मीनल. तुम गयी और मेरे अंदर से निशांत को भी ले गयी; बोलो तुम? क्या मैं वो हूँ जिस से तुम मिली थी;"

मीनल के साथ साथ खुद को खो देने की पीड़ा से मेरा गला भर आया।

"मुझे माफ़ कर दो निशांत3 Full, stop उस वक़्त मेरी जो परिस्थिति थी, उसमे मुझे यही सही लगा; मुझे लगा था कि मेरी सफलता के बाद मिल कर तुम खुश होंगे;"

"खुश हूं मीनल. लेकिन क्या मैं साथ रहता तो तुम्हे रोकता??; मैं तो तुम्हारा साथ दे रहा था. लेकिन तुम्हे जब मेरे साथ देने का वक़्त आया तुम मुझे छोड़ कर चली गयी. क्यों मीनल;" इतना कहते ही अब मैं रोने लगा था।

मीनल भी रोते हुए मेरे गले लग गयी. लेकिन मैंने उसे अलग कर दिया. " नहीं मीनल, मुझे और मेरी भावनाओ को काबू में रहने दो;" रुको मैं आता हूँ कह के मैने मलहम ला के उस के हाथों में लगाया और माफी माँगी।

फिर उसके सिर पे हाथ फेरा. " सो जाओ मीनल. जहां भी हो खुश रहना. कभी कभी मेरा हाल पूछ लेना. " मैं फीका से मुस्कुराया और कमरे से निकल गया।

बाहर आ के कुर्सी पे बैठ गया और पीछे टिक के आंखें बंद कर ली. जब ज़िन्दगी खाली सी लगने लगे तब नींद भी नहीं आती तो मैं पड़ा रहा।

कुछ देर में पैरों पे कुछ महसूस हुआ देखा तो मीनल मेरे पैर छू रही थी, मैं झटके से उठ गया "क्या कर रही हो मीनल" कह के मैंने उसे उठाया. " तुम्हारी जगह मेरे पैरों में नहीं मीनल;"मैं घबरा के बोला तो मीनल मेरे सीने से लग के रोने लगी. अब कि बार मे उसे अलग न कर सका.

निशांत, निशांत कह कर वो रोती रही और मैंने भी उसे रो लेने दिया. मैं वैसे ही बुत बन के खड़ा रहा और खुद को रोने से रोकने की कोशिश करता रहा।

जब मीनल थोड़ी शांत हुई तो मैंने उसका सिर सहलाया और आंखें पोछी. फिर उसे बिठा के पानी पिलाया।

"बोलो मीनल क्या चाहती हो;" मैं बहुत शांत रह के बोला "आखिरी बार है, बोलो;" मैंने उस के सिर पर हाथ रख के कहा।

" निशांत मेरे साथ मेरे घर चलो, तुम्हें सुनने में तकलीफ होगी न!! तो मैं तुम्हे सब दिखाउंगी; मेरी ज़िंदगी की हर चीज़ अब भी तुमसे जुड़ी है निशांत. मेरा विश्वास करो. "

मेरे सीने में दर्द हो उठा. कैसे मिलूंगा उस शक्श से जो आज मेरी जगह पे है।।

"मीनल. ? . "

"ये आखिरी बार है निशांत !!;" आखिरी शब्द सुन कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए, मैं बुत की तरह खड़ा उसे देखता रहा।

मैं मीनल की तत्परता और जिद के आगे हार गया, उसकि खुशी के लिए ये आखिरी दर्द भी झेल लूंगा मैंने सोचा।

मेरे साथ अंदर चलो निशांत.. मीनल बोली और मैं घबरा गया. " न ..नहीं मीनल. " मैं हकलाया ।

"क्यों निशांत !! तुम्हें खुद पर भरोसा नहीं. " मीनल ने पूछा और मैंने पिछली रात की घटना याद करते हुए न में सिर हिला दिया।

मेरे इस अनअपेक्षित जवाब से मीनल मुस्कुरा उठी और बोली "लेकिन मुझे है, खुद से भी ज्यादा;" मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे घाव पे मरहम लगा दिया हो और मैं उसके साथ चल पड़ा।

"आराम से लेट जाओ निशांत. " वो बोली तो मैं उसे देखने लगा. "निशांत. लेटो. " मीनल का आदेश आया और मैं असहज से कोने में लेट गया।

मीनल के दिमाग मे क्या चल रहा था मैं अनजान था लेक़िन सच कहूं में मेरी घबराहट चरम सीमा पर थी।

खैर मीनल ज़मीन पर मेरे सिर के पास बैठ गयी और अपना हाथ मेरे सिर पे रख दिया, ऐसा लगा कि जैसे बरसों की थकान किसी ने एक क्षण में खींच ली हो. मैंने आंखें बंद कर ली और मीनल मेरा सिर सहलाती रही; मैं जन्मों से इस पल के लिए प्यासा था जैसे.

मैं कब सोया मुझे पता भी नहीं चला; सुबह जब आंख खुली तो मीनल का चेहरा अपने चेहरे से लगभग सटा हुआ पाया, उस का हाथ अब भी मेरे सिर पे था. लेकिन वो गहरी नींद में थी.

मैं उसे देख कर अपना दिल भरता रहा. जाने फिर इस जिंदगी में वो दिखे या न दिखे. मेरा हक़ तो कब का उस से खत्म हो चला था. और वो न जाने किस हक़ से मेरे पास चली आयी थी।

मीनल की जब आंख खुली तो मुझे खुद को देखता पाया, वो मुस्कुरा उठी. और मैं भी मुस्कुराये बिना न रह सका।

वो उठने को हुई तो मैंने उसका हाथ पकड़ लिया औऱ वो फिर उसी तरह लेट गयी; एक आखिरी बार अपना समझ के मैंने उसका जूड़ा खोल दिया और उसके बाल सवारने लगा. मीनल उसी तरह से मुस्कुराते हुए मुझे देखती रही।

"मैं तुम्हे बहुत मिस करूँगा मीनल. " मैं उसी तरह उसके बाल सवारते हुए बोला। मीनल ने कुछ नहीं कहा. "अपना ख्याल रखना, हमेशा खुश रहना मीनल;" अब कि मैं ज़रा भावुक, हो गया. मीनल ने अपना हाथ जो मेरे सिर पे था उस से मेरे बाल पीछे किये, फिर माथे को सहलाया; मैं उसे देखता रहा..अगले ही पल मीनल के हाथ मेरी आँखों को ढक चुके थे. मैं कुछ कह पाता उसके पहले ही मीनल ने मेरे गाल पे अपने होठ रख दिये; मैं अंदर तक सिहर के रह गया; " निशान तुम मेरी ज़िंदगी का सब से अहम हिस्सा हो. तुम कितने प्यारे हो ये तुम खुद नहीं जानते. "

मीनल की बातें मेरी साँसें, धड़कने सब बढ़ाने लगी थी;" मीनल!! उठ जाओ अब; " मैं अपनी हदों को पहचानते हुए बोला।
 
मीनल एक बार फिऱ मेरे सिर को सहलाते हुए उठ गई और चाय बनाने लगी। मैं बैठा अभी की इस घटना के बारे में सोचता रहा; मीनल का इस तरह मेरे साथ मेरे करीब रहना मुझे पसंद था, लेकिन जब वो शादी कर चुकी थी तो उस हिसाब से ये बहुत गलत था. मैं मीनल को चाह कर भी समझ नहीं पा रहा था; उसका व्यवहार, ये खुलापन कभी कभी मुझे कचोट रहा था;

खैर मैं भी उठा और तैयार हुआ फिर कौस्तुभ को फ़ोन कर के मीनल को छोड़ने जाने की जानकारी दी।

मीरा और कौस्तुभ दोनो ही हमे नीचे तक छोडने आये. आज मीनल के चेहरे पे एक सुकून था, शायद मैं उस के परिवार से मिलने के लिए राजी हुए इस लिए;

थोड़ी देर में हम मुम्बई के लिए निकल गए. रास्ते मे मीनल ने कहीं फोन किया " हेलो राकेश जी. "

"हां.. दो घंटे में पहुँच जाएंगे;आप घर ठीक करवा दीजिएगा प्लीज.

जी थैंक यू कह कर उसने फ़ोन रख दिया. मैंने सुना सब लेकिन कहा कुछ नहीं।

हम आज चुप ही थे, रास्ते में मैंने एक जगह गाड़ी रोकी और मीनल के लिए खाना मंगाया, उसे आज खाते हुए भी देखना चाहता था।

आखिरकार हम मुम्बई पहुँचे, मीनल की सोसाइटी के थोड़ा पहले ही मैंने कार रोक दी. मुझे गार्ड द्वारा अपनी बेइजती याद आ गयी. और मन खराब हो गया।

"क्या हुआ निशांत चलो. !!"मीनल ने मेरे हाथ पे अपना हाथ रखा.

"नहीं मीनल. वो. " मैं घबराया.. वैसे भी उसे उस बारे में बताना नहीं चाहता था.

"निशांत मैं हूँ न. चलो.."

मैं घबरा के आगे बढ़ने लगा. दूर से अब गार्ड भी दिख रहा था और अपनी बेइज़्ज़त्ति का मंजर भी घूम रहा था. मेरे डर के मुताबिक गार्ड ने कार पहचान ली और चिल्ला के रुकवा दी, उसने मीनल को नहीं देखा था।

"एई!! वही हो न तुम;!! अभी मन नहीं भरा.. रुको तुम कह के वो और गार्ड को बुलाने लगा;मैं चुपचाप मुँह नीचे किये सुनता रहा।

इधर मीनल कार से उतरी मुझे ध्यान ही नहीं रहा।

"क्या बदतमीज़ी है ये?? हिम्मत कैसे हुई साहब से ऐसे बात करने की. !!" मीनल के इस रूप पे मैं हैरान हो गया।

"माफी मांगो चलो. वरना कंप्लेन करूँगी तुम्हारी. "

गार्ड सफाई देता रहा मीनल उसे हड़काती रही और मैं बेवकूफों की तरह देखता रहा।

अंत मे गार्ड ने माफी मांगी और मुझे अंदर जाने का सुभाग्य मिला।

लेकिन मैं अब कांप रहा था. सच का सामना करने की हिम्मत नहीं थी, मीनल ने मेरा हाथ पकड़ के आश्वस्त किया और अपने साथ ले जाने लगी।

जब लिफ्ट से होते हुए उसके घर के दरवाज़े पे पहुँचे तो वो खुला था। उसका पति अंदर होगा सोच कर ही मेरा कलेजा मुँह को आने लगा, मैंने मीनल से हाथ छुड़ाना चाहा लेकिन आज उसकी पकड़ बहुत मजबूत थी।

अंदर जाते ही वो इंसान दिखा जो उस दिन मीनल के साथ था. ओह!! यही है इस का पति. मैंने सोचा और मेरे दुख और जलन के भाव मेरे चेहरे और मंडराने लगे।

"राकेश जी इनसे मिलिए. ये हैं निशांत. "

राकेश जी!! इसी को तो फ़ोन किया था..तो ये पति नहीं इसका, हो भी सकता है. उफ़्फ़ दिमाग खराब होने लगा था।

राकेश ने आ कर मुझे गले लगा लिया.. आइये स्वागत है आपका. मीनल से आपके बारे में बहुत सुना है.

मैं फीका से मुस्कुरा दिया.

ये तो पति हो ही नहीं सकता. पति होता तो मुझे देख भी नहीं सकता..जैसे मैं जल रहा हूँ।

"बैठिए आप लोग.. चाय नाश्ते के इंतेज़ाम कर दिया है मैंने.."

वो बोला।

"जी नहीं मुझे निकलना है, मैंने टाला. " मुझे घुटन हो रही थी, भाग जाना चाहता था मैं।

बैठो निशांत अभी कह कर मीनल ने मुझे बैठने पे मजबूर कर दिया।

" तुम्हारा. आई मीन. वो. मैं पूछने में हकलाया।

"मेरे पति;अभी आये नहीं यहां.."

तुम चाय पियो मैं फ़ोटो लाती हूँ उनकी. कह के उसने मेरे हाथ मे चाय का प्याला थमा दिया।

मेरा सिर चकराने लगा था अब, और मीनल पे गुस्सा भी आ रहा था। राकेश भी आप चाय पीजे मैं बाद में आता हूँ कह के खिसक लिया।

मैं काँपने लगा. दिल रो रहा था, लगता था कि काश ये सब सपना हो. लेकिन आज मैं हकीकत के बीचों बीच था.. कहीं भाग नहीं सकता था।

सामने से मीनल एक फोटो फ्रेम लाती हुई दिखी और मेरे चेहरा घबराहट से काला पड़ गया. "तुम ठीक हो ना!!" वो बोली। मैं हम्म कह के रह गया.

निशांत.. सच कहूं तो मेरे पति ही मेरी दुनियां हैं मैं उन्हें बहूत प्यार करती हूँ वो बोली और मेरा खून जल गया, मैं चुपचाप हाथ मे चाय का प्याला लिए बैठा रहा।

देखो निशांत ये हैं मेरे पति कह के उसने उल्टी फ़ोटो फ्रेम मुझे थमा दी. मेरे हाथ काँपने लगे तो चाय नीचे रख दी.. उसे पलटने की हिम्मत अब नहीं थी मेरे पास.. मैं उसी तरह बैठा रहा।

"देखो निशांत. आज मेरे सच से सामना करने का वक़्त है; उस के बाद तुम आज़ाद हो जाओगे।।।।"

मीनल की बातें चुभने लगी तो हिम्मत कर के फ्रेम पलट दिया. मेरी धड़कने उस वक़्त ऐसी थी कि शायद मीनल भी सुन रही हो.. पसीने की बूंदे मेरी कनपट्टी से नीचे की तरफ आने लगी थी।

आखिरकार मैंने फ़ोटो देख ली;"मीनल;!!" मेरे शब्द गले मे अटक गए. और आंखों के आंसू तेज़ी से नीचे गिरने लगे।

"हाँ निशान्त; ये ही हैं मेरे पति; मिस्टर निशान्त मल्होत्रा.."

--00......

आगे की कहानी जानने के लिए अगले भाग का इंतेज़ार, करें।

इतने कष्ट के बाद सुकून मिला भी तो ऐसे कि सम्हालना मुश्किल था. आज सालों के दर्द, मीनल से दूरी की तड़प, मेरे अंदर के बदलाव का मलाल. सब कुछ बहता जा रहा था; ऐसा लगता था कि मैंने इस सब दर्दों को आंखों के कोने में छुपाया हुआ था.

चाह कर भी मैं चुप नहीं हो पा रहा था.. अपने चेहरे को हाथों से ढक कर मैं रोया. आज बहुत रोया. आज रोने में भी आराम था; मुझे ये भी एहसास था कि लड़कियों की तरह रो रहा था लेकिन मेरा खुद पे कोई बस नहीं था;

मीनल के हाथ अपने कंधे पे महसूस हुए तो उन्हें पकड़ के रोने लगा. मेरे आँसूं मीनल के हाथ भिगो रहे थे.

दिल का बोझ भी कम होता जा रहा था. मीनल सिर्फ़ मेरी है, ऐसा लगता था जैसे कोई सपना हो।

मेरे जैसा इंसान जो प्यार को सम्पूर्ण प्रवीणता में खोजता हो, जो किसी को पर्फेक्ट न मानता हो. उसे किसी से इतना प्यार हो जाएगा ये की कल्पना भी अजीब लगती है।

मीनल और मैं हमेशा से एक दूसरे से बिल्कुल अलग थे. लेकिन आज मैं उसके लिए जो भावनाएं रखता हूँ , वो शायद प्यार से भी बढ़ कर हैं।

आखिर मैं रो कर भी थक गया, मीनल के हाथ अब भी मेरे हाथों में थे. इतनी देर में एक बार भी मीनल की तरफ देख नहीं पाया था; अपनी जेब से रुमाल निकाल कर मीनल के हाथ पोछे फिर अपना चेहरा पोछा और मुँह नीचे किये ही बैठ गया.

सच कहूं तो कहने को कुछ था ही नहीं, मुझे कुछ समझ भी नहीं आ रहा था. अब मीनल मेरे सामने मेज़ पर बैठी थी लेकिन मैं नज़रें नहीं मिला सका, नीचे ही देखता रहा।

मेरी आँखों से बाहर निकली कुछ और बूंदों को उसने अपने हाथों से साफ किया और मेरे चेहरे को अपने हाथों से थाम लिया।

"निशान्त एक बार मेरी तरफ देखो;" मैं देख न सका. चाह कर भी, कोशिश कर के भी.

मीनल मुस्कुरायी इसका आभास मुझे ज़रूर हुआ. "तो वो ऐसे ही बोलने लगी " मैं सपने में भी तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में नहीं सोच सकती निशान्त. मैंने तो उसी दिन तुम्हे पति मान लिया था जिस दिन तुमसे ज़िद की थी; तुम क्या हो निशांत? ; कोई ऐसा भी हो सकता है; मैंने तुमसे कितनी ज़िद की थी, फिर भी तुम अपनी मर्यादा में रहे; तुम्हारे जैसे कोई नहीं निशांत. कोई भी नहीं. और तुम्हे लगा कि मैं किसी और से शादी कर लुंगी. क्या तुम्हें मैं इतनी पागल लगती हूँ;"

मैं अब भी वैसे बैठा रहा ,मींनल फिर बोली "निशान्त हम ने कभी एक दूसरे से नहीं कहा कि हमारे दिल मे क्या है, न ही प्यार का इज़हार किया; कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी;लेकिन आज मैं तुमसे कुछ पूछना चाहती हूं. जवाब दोगे न. "मैं चुपचाप सुनता रहा।

"सो मिस्टर निशान्त मल्होत्रा; क्या आप मुझे मिसेज़ मीनल निशान्त मल्होत्रा बनाना पसंद करेंगे??"

मैं बुरी तरह शरमा गया.. ये सब मुझे पूछना चाहिए था और मींनल को शरमाना चाहिए था लेकिन यहां उल्टी गंगा बह रही थी;

मींनल को जवाब पता था, वो आगे झुकी और मेरा माथा चूम लिया, ये पहली बार था कि जब मींनल ने ऐसा किया हो; "मीनल!! "कहते हुए मैं कांप उठा लेकिन वो नहीं रुकी. मैं अपने चेहरे के हर हिस्से पे उसके होठों की कोमलता महसूस करने लगा. इतने में मेरी साँसे उखड़ने लगीं थी; हाथ पैर कांप रहे थे।

अंततः मैंने मीनल के हाथों पे अपने हाथ रख दिये और धीरे से उस से अलग हुआ. मीनल मुस्कुराती हुई मुझे देखने लगी लेकिन मैं मुस्कुरा न सका. उसकि आंखों में अपने लिए अथाह प्रेम की अनुभूति करता रहा।

"चाय पियोगे??" वो बोल पड़ी तो मेरी नज़र चाय के प्याले पे चली गयी. अपने डर और वहम के चलते एक घूँट भी नहीं पी थी।

तुम बैठो मैं चाय और कुछ खाने के लिए लाती हूँ. मैंने फीकी सी हंसी दी और वो किचन में चली गयी, मैं उसे जाता हुआ देखता रहा; जो जा रही थी वो मेरी मींनल थी, मेरी पत्नि. और एक सुकून भरी मुस्कान मेरे चेहरे पे छा गयी।

मैं फिर से फ़ोटो फ्रेम में अपनी और मींनल की फ़ोटो देखने लगा. उसने दीवाली के दिन वाली सेल्फी ही फ्रेम कराई थी।

मैं खो के रह गया. " पानी पियोगे.." मींनल ने अचानक से पूछा और मेरे हाथ से फ़ोटो फ्रेम छूट गया.. वो नीचे गिरता उसके पहले मैंने सम्हाल भी लिया।

मैंने घबरा के मींनल को देखा तो मुस्कुराता हुआ पाया, उसने मुझे पानी दिया और फिर किचन में चली गयी. न जाने मुझे क्या हुआ मैं उठ के उस के पीछे चला गया. मैं खोया खोया सा था और परिस्थिति ऐसी थी कि मींनल के बिल्कुल पास रहना चाहता था और पास रहने पे घबराहट हो रही थी।

खैर मैं उसके बगल में कुछ दूरी बना के खड़ा हो गया; कुछ चाहिए निशांत, वो बोली तो मैंने न में सिर हिला दिया और उबलती चाय देखने लगा।

चाय बन गयी तो मींनल के पीछे पीछे ही बाहर आ गया. आज मींनल बहुत खुश और आत्मविभवास से भरी थी जब कि मैं शरमाया, घबराया सा था।

मींनल खाने में व्यस्त हो गयी.. मैं उसे देखने लगा. तो उसने एक बिस्कुट मुझे भी खिला दिया.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, बहुत हल्का महसूस हो रहा था।

खाने के बाद हाथ धोने के लिए मींनल को देखता हुआ उठा तो मेज़ से पैर टकरा गया; "सम्हल के निशान्त. " मींनल बोली और मैं झेंप गया।
 
मींनल खाने में व्यस्त हो गयी.. मैं उसे देखने लगा. तो उसने एक बिस्कुट मुझे भी खिला दिया.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, बहुत हल्का महसूस हो रहा था।

खाने के बाद हाथ धोने के लिए मींनल को देखता हुआ उठा तो मेज़ से पैर टकरा गया; "सम्हल के निशान्त. " मींनल बोली और मैं झेंप गया।

बाहर आया तो वो बोली कि कुछ देर चाहो तो आराम कर लो निशान्त. फिर बैठ के सब बातें करेंगे. अब तो सुनोगे ना. मैंने हाँ में गर्दन घुमा दी; मुझे क्या बोलना चाहिए कुछ समझ नहीं आ रहा था।

उसने मुझे दूसरे कमरे में बिस्तर दिखाया और मैं वहां जा कर चुप चाप बैठ गया; मींनल बाहर चली गयी. मैं बैठा रहा. ये सपना नहीं है ऐसा खुद को विश्वास दिलाता रहा।

मन नहीं माना तो दरवाज़े की ओट से छिप के मींनल को देखने लगा जो लैपटॉप पे कुछ काम कर रही थी।

"निशान्त नींद नहीं आ रही.. तो मेरे साथ आ जाओ. वहां ऐसे मत खड़े रहो;" मींनल ने बिना मुझे देखे ही बोला.

और मैं वापस पीछे हो कि बिस्तर पे बैठ गया. मेरी चोरी पकड़ी गई थी.. उतने में मींनल खुद ही अंदर आ गयी तो मैं घबरा के खड़ा होने लगा और लड़खड़ा गया.. इस बार मींनल ने मुझे सम्हाल लिया।

"एक बात बताओ निशान्त. ?" वो मुझे वापस बिठाते हुए बोली।

मैं उसे देखने लगा. " ये गिरने गिराने का प्रोग्राम पुराना है या मेरे साथ होने पर स्पेशल परफॉरमेंस चल रही है;"

ये तो लगभग मेरा ही डायलॉग था. मतलब मींनल मुझे छेड़ रही थी;

इस बार मैं मुस्कुरा उठा; और मींनल ने मेरे डिंपल पे अपने होठ रख दिये. " बोला था न तुम डिंपल में ही अच्छे लगते हो, रोते हुए बहुत बुरे;"

इतना सुनना ही था कि मैंने मींनल को गले लगा लिया; और बहुत जोरों से कस लिया;" अब तो मुझे छोड़ कर नहीं जाओगी न;"

"जाना तो पड़ेगा ही निशान्त;मुझे जाना पड़ेगा.." मींनल बोली और मेरी धड़कने रुक गयी।

"अरे बुद्धु. जाउंगी तभी तो तुम बारात ले कर आओगे. " वो मेरे बाल बिखेरते हुए बोली, मेरे पूरे शरीर मे बिजली कौंध गयी और मैंने उसे खुद में जकड़ लिया।

हम वैसे ही खड़े रहे जब तक दरवाज़े पे दस्तक नहीं हुई. मींनल मुझसे अलग हो कि दरवाज़ा खोलने चली गयी, मैं वहीं खड़ा रहा।

"मम्मा;मम्मा. " की आवाज़ आयी तो मैंने अंदर से झांका, ये एयरपोर्ट वाली बच्ची थी. मैं मुस्कुराने लगा।

" मम्मा;पापा कह रहे थे भगवान जी आये हैं. "

पापा!! ये शब्द दिमाग मे खटकने लगा. मींनल ने बच्ची गोद नहीं ली तो वो माँ कैसे;मैं फिर गंभीर हो गया।

"हाँ बेटू आये हैं, मिलोगी. ?"

" ये!! भगवान जी से मिलेंगे. " वो कूद कर बोली फिर मींनल का हाथ पकड़ के अंदर आ गयी।

मुझे देखते ही वो पहचान गयी, आप भगवान जी के दोस्त हो न. " चहकते हुए कितनी प्यारी लग रही थी वो, मैं भी मुस्कुरा उठा।

"मम्मा ये अंकल थे एयरपोर्ट पे. लेकिन भगवान जी कहाँ हैं. " क्या भगवान जी कर रही थी वो, मैं समझ नहीं पा रहा था।

इधर मींनल हैरान थी..तुम मिले थे निशि से. ? मैंने हामी भरी. " तुम इतना पास थे निशान्त और मैं देख भी नाहीं पायी. वो उदास हो गयी।

"मम्मा. भगवान जी से मिलाओ न. " इतने में निशि बोली।

मींनल ने उसे गोद मे उठा कर मेरी तरफ इशारा किया तो मैं स्तब्ध रह गया।

"बट इनकी तो दाढ़ी है. " ये सुन के मैं भी हंस पड़ा. और थोड़ा थोड़ा समझने भी लगा।

"तुमसे मिला नहीं था न..इस लिए दाढ़ी आ गयी. अब गायब हो जाएगी. " मैं उसके चेहरे पे हाथ फेर के बोला।

मींनल ने निशि को खाना खिला कर अपनी गोद मे सुला दिया, और मैं अचंभित सा उसे देखता रहा।

" जानना चाहते हो न.." मींनल ने पूछा।

मैने हामी भरी तो मींनल ने बोलना शुरू किया।

तुम्हारे घर से निकल के मैं प्रवीण के पास गई, मैं जानती थी तुम मुझे खोजने ज़रूर आओगे तो यही एक रास्ता था।

प्रवीण से मैंने अपना डिप्लोमा और बाकी सर्टिफिकेट कॉलेज से ले कर अपने पास रखने को कहा और चली गयी।

मुम्बई आ कर जे पी सर से मिली. मेरी अच्छी किस्मत थी कि उन्होंने मुझे पहचान लिया.. और ट्रेनी की जॉब दे दी..मेरे काम से प्रभावित हो कर जल्दी ही मुझे परमानेंट कर दिया. मैं तभी तुम्हारे पास आने की सोच रही थी कि जे पी सर् ने तत्काल ही मुझे अमेरिका भेज दिया;8 महीनों की ट्रेनिंग के लिए. वहां से आई तो किड्स शो में व्यस्त हो गयी. तब सोचा कि इस शो की सफ़लता के बाद तुम्हारे पास आऊंगी।

इसके बाद एक बार और अमेरिका गयी कुछ दिनों के लिए, वहीं लौटते समय तुम निशी से मिले।

और जब तुमसे मिलने की बारी आयी तब तक तुम मुझे देख चुके थे और मुझे गलत समझ लिया. इतना कह, कर मींनल चुप हो गयी; मैं उसे देखता रहा।

उसने फिर कहना शुरू किया. जब मुम्बई आयी तो बहुत डरी और घबरायी हुई थी, इतने बड़े शहर में पहली बार कदम जो रखा था; तुम्हें याद कर के बहुत रोई, लेकिन खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया.

जे पी सर की मदद से कुछ दिन एक होस्टल में रहने को मिल गया. लेकिन वहां के माहौल और महंगाई में मेरा गुज़ारा हो पाना मुश्किल था. इस लिए मैंने किराए का घर देखना शुरू किया. ।

मुम्बई में मेरे जैसे कुवारों को आसानी से कोई किराए पे घर नहीं देता तो मुझे कैसे मिलता. बहुत भटकने के बाद राकेश जी के परिवार से मिली; मुझे देख कर इन को तरस आ गया. लेकिन बात वो ही शादीशुदा न होने पे अटक गई क्यों कि आज पास के लोग परेशान करते; तब मैंने उन्हें तुम्हारे बारे में बताया.. और सहमति से तुम्हे अपना पति बता के मैं यहां रहने लगी. सब ये जानते हैं कि तुम बाहर हो और मैं मिलने जाती रहती हूँ;

सच्चाई केवल राकेश जी और उनकी पत्नी जानती थीं जो अब नहीं रहीं. "

मींनल ने लंबी सांस ली. फिर बोली. निशी राकेश जी की बेटी है, जब मैं यहां आयी तब ये डेढ़ साल की थी.. कुछ ही महीनों में उसकी माँ चल बसी तो निशी का खयाल मैं रखने लगी. जब से उसे होश आया उसने मुझे ही मम्मा बुलाना शुरू कर दिया।

बोलो निशान्त क्या मैंने कुछ गलत किया? मींनल का सवाल आया तो मैंने उसके हाथ पे अपना हाथ रख के "बिल्कुल भी नहीं कहा. "

"निशान्त; इस अनजान जगह में राकेश जी मेरे साथ परिवार की तरह खड़े रहे. मैं उनका एहसान कैसे भूल जाती.

निशि को मैं अपने साथ ऑफिस भी ले जाती रही हूँ. रात को जब वो नहीं सोती तो तुम्हारी कहानियां सुनाती. वो यही जानती है कि तुम भगवान हो जिसने मुझे यहां भेजा ताकि मैं उसके साथ रह सकूं।"

मींनल का एक ये भी रूप है मैं नहीं जानता था. मींनल मेरी ज़िंदगी मे है. इस से बड़ी खुशकिस्मती क्या थी मेरे लिए।

."सोसाइटी में मेरे और राकेश जी के लिए पीठ पीछे बातें बनाई जाती हैं; लेकिन मुझे अब इस से फर्क ही नहीं पड़ता निशान्त; मैं जानती हूँ मैं गलत नहीं, और ये भी जानती हूँ कि तुम मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगे. नहीं छोड़ोगे न निशान्त;"

मैं उसे देखता रह गया. मुझे दूर रह के भी इतना अटूट विश्वास मुझ पे. और मैं एक झटके में उस पे शक कर बैठा. " मुझे माफ़ कर दो मींनल" मैं शर्मिंदगी से बोला।

और उसके गले लगा गया।

"कहने बताने को तो बहुत कुछ है निशान्त. लेकिन 2 साल की बातें बताने में उतना ही वक़्त लग जायेगा।"

"मुझे और कुछ नहीं जानना मींनल. मींनल!! मुझे यकीन नहीं होता कि तुम मेरी हो. क्या मैं तुम्हारे लायक हूँ;"

मींनल ये सुन कर मुझसे अलग हुई और मेरा माथा चूम कर बोली.." ये सवाल तो मुझे पूछना चाहिए तुमसे;"

"मींनल. गुजरात चलोगी??. मैं तुमसे जल्द से जल्द शादी करना चाहता हूँ. " मैं बेसब्री में बोल।

मींनल शरमाते हुए बोली. कल पहले तुम मेरे साथ मेरे शो की सक्सेस पार्टी में जाओगे मेरे पति बन के;" जब तक निशि सोई रही तब तक हम एक दूसरे से सट के बैठे रहे, और बातें करते रहे।
 
रात को राकेश जी निशी को अपने साथ ले गए3 Full, stopवो भी जानते थे कि हमे अकेले एक दूसरे का साथ चाहिए।

मींनल खाना बनाने जाने लगी तो मैंने रोक लिया. और बाहर से मंगाया।

खाने के बाद मैं बैठा था तो मींनल मेरी गोद मे सिर रख के लेट गयी औऱ मैं उसका सिर सहलाने लगा। मीनल उसी तरह सो गयी और मैं बैठा रहा.

मेरी ज़िंदगी मे न जाने कितने वक़्त बाद वक ठहराव आया था, मन बहुत शांत था. और दिल को तसल्ली भी।

अगले दिन मींनल पहले मुझे अपने साथ बाजार ले गयी और मेरे लिए कपड़े ख़रीदवाये. मैं तो रुकने का सोच कर ही नहीं आया था तो मजबूरी में खरीदने पड़े।

घर आ के मींनल जब तैयार हुई तो मैं अपने होश खो बैठा;मींनल ने लाल रंग की साड़ी पहनी थी, बाल मेरी खुशी के हिसाब से खुले थे. साड़ी में उसके लंबे बाल जब लहराते तो मैं देखता रह जाता.. होंठो में लिपस्टिक और माथे पे छोटी सी लाल बिंदी.. . मैं मुँह खोले उसे देखता रहा. " चलें निशान्त वो बोली तो मैं सुन न सका.

"निशान्त चलो.. वो करीब आ कर बोली तो मैं जैसे जागा; और उस के साथ चल दिया; उसके ऑफिस की कार आयी थी तो हम दोनों साथ मे पीछे बैठे के चल दिये।

ऑफिस की पार्टी में न जाने क्यों मैं घबरा रहा था, मींनल सब से मुझे पति बता कर मिलवाती और मैं शरमा के अभिवादन करता।

पार्टी के अंत मे मींनल के एक नए शो को लांच किया जाना था जिसकी सारी डिज़ायनिंग मीनल ने ही की थी. इसके लिए.. शो से जुड़े सभी कार्टून को एक फ्रेम में मढ़वा कर पर्दे से ढका गया था. साथ ही एके स्क्रीन पर कुछ सेकंड की वीडियो दिखाई जानी थी।

मींनल मुझे एक जगह बैठने के लिए कह के आगे चली गयी, मैं असहज सा बैठा रहा, मींनल के बिना मन नहीं लग रहा था।

लॉन्चिंग के समय जे पी सर आये और बोलना शुरू किया।

"आज की सक्सेस पार्टी का श्रेय हम सब को जाता है; सब ने जी तोड़ मेहनत की. "

सब के लिए तालियां बजायी गयीं. और कुछ बोलने के बाद और डिज़ाइन टीम को स्टेज पर सम्मानित किया. जिसमे मींनल भी थी. मैं खुशी से ताली बजाता रहा।

आखिर में वो बोले " अब बारी है हमारे नए शो की, जिसकी सूत्रधार हमारे सामने है.." उन्होंने मींनल की तरफ इशारा करते हुए कहा. मैं चाहता था कि ये शो मींनल के हाथों ही लांच हो लेकिन मींनल की इच्छा कुछ और ही है. तो देर न करते हुए मैं उस हस्ती को बुलाऊंगा जिसे मींनल अपनी सफलता का श्रेय देती हैं. "

ये सुनते ही मैं काँपने लगा।

"मिस्टर निशान्त मल्होत्रा. मींनल के हस्बैंड प्लीज स्टेज पे आइये. " मैंने अपना नाम सुना और वहीं जम गया. आगे बढ़ पाने की हिम्मत नहीं थी घबराहट में. तभी मींनल का हाथ अपने हाथ मे महसूस किया.. ..तो हिम्मत आयी।

मीनल मुझे देख के मुस्कुरायी और हम साथ आगे बढ़े; मैंने और मींनल ने साथ ही फ्रेम से पर्दा हटाया.. और उसके बाद वीडियो क्लिप चलायी।

मैं घबराया सा खड़ा था कि तभी मींनल ने स्टेज पे ही मेरे पैर छू लिए. " नहीं मींनल कहते हुए मैंने उसे उठाया.." और मेरी आँखें भर आयी, देखा तो मींनल भी रो रही थी।

इसी वक्त के लिए तो शायद वो मुझसे अलग हुई थी, उसने मेरा सपना पूरा कर दिखाया था।

आज मींनल सफल थी, उसका नाम था. अपनी मेहनत, अपनी सफलता उसने मेरे नाम कर दी जब कि मैं कहीं से भी उसका हकदार नहीं था।

आज मेरी जिंदगी बदल चुकी थी, मींनल मेरे साथ थी वो भी पूरे आत्मविश्वास के साथ। मैं अब किसी भी हाल में उस से दूर नहीं रहना चाहता था. मुझे उस से शादी करनी थी , जल्द से जल्द;

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आगे की कहानी के लिए अगले भाग का इंतेज़ार करें धन्यवादस्वप्न सुंदरी-33, , heading 1अंतिम भाग-

मुझे मेरी मींनल मिल गयी थी, मींनल को वो सफलता जिसकी वो हकदार थी. और वो खुशी जो बचपन से ही उस से छीन ली गयी थी.

पार्टी खत्म होने के बाद मैं मींनल का हाथ पकड़े ही बाहर आया; मैं तो जानता भी नहीं था कि उसके ऑफिस में सब मुझे पहचानते हैं. मेरे साथ न होने और भी मींनल ने मुझे अपना ही जताया।

कार में मींनल मेरी बाज़ुओं को पकड़ के मेरे कंधे पे सिर टिका के बैठ गयी; तो मैंने उसके कंधों को अपने हाथों से पकड़ के खुद से सटा लिया।

जैसे ही हम सोसाइटी में पहुँचे, मींनल के पड़ोस की कुछ औरतों को खुसुर पुसुर करता पाया. मुझे ये सब बहुत अजीब लग रहा था. उन्हें देख कर मींनल मुझसे और चिपक के चलने लगी..जिस से मैं असहज हो गया।

"ये हैं तुम्हारे हस्बैंड ?" एक नए दांत निपोर के पूछा. पूछा क्या ताना मारा कि अब तक मैं कहाँ था।

"जी, और जल्दी ही हम साथ रहने वाले हैं;" मींनल ने मुस्कुरा के जवाब दिया।

" अच्छा तो राकेश को भी ले जाओगी न साथ. " कितनी घटिया सोच थी उनकी. मेरा खून खौल के रह गया।

"हाँ क्यों नहीं. इतने अच्छे इंसान हैं . मेरे और निशान्त के दोस्त हैं; वो चाहेंगे तो हमारे साथ रह सकते हैं. क्यों निशान्त. " मीनल ने जलने वालों को मुस्कुराते हुए और जला दिया।

मींनल को लोगो से निपटना अच्छे से आ गया था, मैं उस के लिए खुश था।

"बिल्कुल सही. इनफैक्ट मैं तो बात करने वाला हूँ राकेश जी से कि वो साथ रहें हमारे. " मैंने मींनल का साथ दिया।

सारी औरतें सड़े हुए मुह बनाने लगी. और मींनल बात बदल के एक दो औरतों से बात करने लगी। मैं चुप हो कर खड़ा रहा।

" हां, जब पति नहीं होगा तो राकेश ही काम आएगा न. कैसा बेवकूफ आदमी है. "

"अरे इसकी भी होगी कोई न कोई….. इनकी जोड़ी ही देख लो. ऐसा लड़का मीनल जैसी को क्यों पसंद करेगा।।"

हालांकि ये बातें धीरे से कही गयी थी. लेकिन मैंने सुन ली;लोगों की सोच किस हद तक घटिया हो सकती है आज पता चला. मुझे मींनल पे भी गुस्सा आने लगा फिर से;कि क्यों गयी मुझे छोड़ के;

"असल बात ये हैं ना आंटी जी; मैंने जान बूझ कर उसे आंटी कहा. आप लोगों को तो कोई अच्छा मिला नही. मिलेगा भी कैसे, उसके लिए अच्छा इन्सान बनना पड़ता है. अब मींनल के जैसी बनने की आपकी औकात तो है नहीं. तो यही सब बातें कहेंगे आप लोग न. "

"कैसे बात कर रहे हो तुम. तुम्हे मैनर्स नहीं क्या. "

एक चिल्लाई तो मींनल का भी ध्यान हम पे गया. " मैनर्स की बात आप लोग करते हैं. मैनर्स होते तो एक लड़की के बारे में बिना जाने ये सब न कहते; और मेरी मींनल को तुम जैसी चरित्रहीन औरतों से करैक्टर सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं;"

" आइंदा मेरे सामने मत आना. वर्ना मैं भूल जाऊंगा की औरतों के सामने हूँ; समझी;" ये आखिरी लाइन मैंने गुस्से में चील्ला कर कही यो सारी सहम गयी।

निशान्त चलो यहाँ से कहते हुए मींनल मुझे खींच के ले गयी।

घर के अंदर पहुँचते ही मैंने मींनल का हाथ झटक दिया और चील्ला पड़ा;" क्या ज़रूरत थी तुम्हें ऐसे मुम्बई आ के रहने की. मिल गयी ठंडक अपने लिए ऐसी बातें सुन के. "

"निशान्त. !" मींनल ने कुछ कहना चाहा. "शट अप.. जस्ट शट अप मीनल; जो तुम यहाँ मुझे अपना झूठा पति बनाती फिर रही हो, अगर अगर भागी नहीं होती तो ये ड्रामा नहीं करना पड़ता. शायद मैं सच मे तुम्हारा पति होता; लेकिन तुम्हें तो. " मैं मींनल से नज़रें हटा के दूसरी तरफ देखने लगा.

सच तो ये था कि मींनल के लिए कही गयी बातें बर्दाश्त नहीं हो रही थी; मैं ये समझ गया था कि मींनल और राकेश रोज़ न जाने कितनी प्रताड़ना सहते होंगे; इन सब का असर उस छोटी सी बच्ची पे होगा।

मेरी बातें मींनल को चुभ गयी और उसकी आंखें भर आयी;

"सही कह रहे हो निशान्त; मैं गलत हूँ. लेकिन क्या तुम ये जानते हो कि गुजरात मे भी मेरे बारे में ऐसी बातें आम थी. जब से तुम से मैं मिली.. मुझ पे कीचड़ उछाले जाने लगे थे;"

मैं ये सुन के सन्न रह गया; "क्या!!"

"निशान्त तुम दिखने में इतने अच्छे हो, मैं तुमसे वहीं मात खा जाती हूँ. लोगों को कैसे बर्दाश्त, होता कि मेरे जैसी को तुम जैसा इतना प्यार सम्मान दे.."

" मींनल तुमने मुझे बताया क्यों नहीं;"मैं तड़प के बोला।

"क्या बताती. तुम तो वहां भी लड़ने चले जाते. निशान्त जब तुम मुझे अपने घर लाये तब मैं बहुत असमंजस में थी.. सच कहूं तो तुमसे नाराज़ भी. लेकिन तुम तो लोगों की बातों से अनजान थे. निश्छल थे. मेरे जाने के बाद भी लोगों ने तुम्हें सुनाया होगा. लेकिन मैं वहां उस हाल में तुम्हारे घर रुकती या पुणे चली जाती तो सोचो, क्या लोग तुम्हारे माता पिता को चैन से जीने देते;
 
मैंने तुमसे सब छुपाया;क्यों कि तुम मेरे लिए मेरी ज़िंदगी से भी बढ़ के हो;मुझे आदत है निशान्त; अब मैंने ऐसे जीना सीख लिया है. "

मैं उसकी बातों से सच जान के धराशायी हो गया. इतना सब उसने सह लिया सिर्फ इस लिए के मेरे परिवार वे अंगुली न उठे।

मींनल कहते हुए मैंने उसे गले लगा लिया. माफी भी कितनी बार मांगता. हर बार मेरी नासमझी मुझे मीनल के आगे बहुत छोटा कर देती थी।

"तुम मेरे लिए परेशान थे निशान्त मैं जानती हूँ. " मींनल मेरे बाल सहलाती हुई बोली. तो मैंने उसे और कस लिया।

"अब मत जाना छोड़ के मीनल..अब नहीं सह पाउँगा.." मैं भावुक हो के बोला।

"कभी भी नहीं . अपने पति को छोड़ के एक पत्नी कहाँ जाएगी. " मीनल ने सिर उपर कर के मुस्कुराते हुए कहा और मैं शरमा गया।

"गुजरात कब चलोगी; ?"

"जब तुम कहो. "

"कल?

"चलो. "

मैं इतना खुश हुआ कि मीनल को उठा के गोल घूमने लगा. और इस हरकत से वो खिलखिला उठी।

जब मैं रुका तो मींनल बोली " शादी के पहले मुझे तुम्हारे साथ खूब घूमना है. प्रेमी प्रेमिका की तरह. " मेरा बहुत मन है।" मैं ये सुन के हंस पड़ा "ऐसे भी शौक रखती हो तुम. " और फिर हंसने लगा. मींनल मुस्कुराते हुए मेरे डिम्पल देखने लगी;

"क्या हुआ..? मैं बोला. तो उसने न में गर्दन हिलायी और उचक के मेरे डिम्पल को चूम लिया; मींनल का एहसास मुझे पागल कर गया और मैं उसे पकड़ के देखने लगा; कितनी सुंदर लग रही थी आज वो. मेरा बस चले तो शादी के बाद रोज़ लाल साड़ी ही पहनाऊँ उसे.

मींनल ने नज़रें झुका ली और मैंने उसका माथा चूम लिया. दुनिया की सब से खूबसूरत लड़की मेरी बाहों में थी;मुझसे ज्यादा खुशनसीब भला कौन होगा।

" चलो डांस करते हैं. " मींनल बोली और मैं मुस्कुरा उठा.

"तुम्हारे जाने के बाद कभी डांस नहीं किया मैंने मींनल. "

"जानती हूँ. चलो अब गाना सेट करो. " वो मेरी बांहों में ही बोली।

"साड़ी में कैसे डांस करोगी. ?"

"ऐसे. " कहते हुए वो मुझसे अलग हुई और अपना पल्लू अपनी कमर में खोंस लिया, मेरी नज़र उसकि कमर पे न चाहते हुए भी टिक गयी।

"चलो मैं लगाती हूँ आज गाना मींनल मेरी नज़रों पे बिना ध्यान दिए कहा।

रातों के जागे सुबह मिले हैं

रेशम के धागे ये सिलसिले हैं

लाज़मी सी लगने लगी है

दो दिलों की अब नज़दीकियां.

मींनल मेरे करीब आयी औऱ हमने डांस शुरू किया;साड़ी के कारण मेरा हाथ मींनल को छू गया और मैं बेचैन हो गया. .. मैं डर गया, अपने आप से डर गया और रुक के मींनल को खुद से अलग कर लिया. मींनल को बुरा लगा

"क्या हुआ निशान्त अब भी नाराज़ हो;??"

मैं क्या जवाब देता. " मुझसे नहीं होगा मींनल. " मैं नज़रें चुराते हुए बोला.

"निशान्त;क्यों भागते हो मुझसे तुम;" मींनल की जगह कोई भी होती तो शायद दुखी ही होती।

मैं कुछ बोल न सका चुप चाप खड़ा रहा.

"मैंने पहले भी कहा था अब भी कहती हूँ निशान्त, ये पल सिर्फ हमारे हैं, हम दोनों के. इन्हें जियो;तुम गलत नहीं, ना तुम्हारी सोच गलत है. तुम्हारा हक़ है मुझ पे निशान्त;क्यों नहीं समझते. "

"मींनल. !! मैं डरता हूँ. मींनल।"

"किस से निशान्त;मुझ से??. अपने आप से??;मेरे करीब रहने से??. या मुझे छू लेने से??;"

मैं बहूत असहज हो गया, मींनल का खुल के बात करना मेरे मन मे घबराहट बढ़ा रहा था, जैसे वो जानती हो. मेरे दिल न चाहते हुए भी उमड़ आने वाले एहसासों को;

"डरता हूँ. कहीं अपनी ही नज़रों से गिर न जाऊं. तुम्हारे साथ, कुछ;" मैं हकलाने लगा और पलट के खड़ा हो गया. आज फिर हार रहा था मैं.

मींनल फिर मेरे सामने आ के खड़ी हो गयी. तो मैं नीचे देखने लगा. उसने पास आ के मेरे हाथ पकड़ लिए. मेरी तरफ देखो निशान्त वो बोली लेकिन मैं ना देख सका. मींनल आगे बढ़ी और मेरे हाथों को अपनी कमर पे रख दिया;मैं सिहर उठा, धड़कने बढ़ गयी. मींनल ने हाथ हटाने भी नहीं दिए। मेरा मन फिर बेचैनी से भर गया. चाह कर भी मैं मींनल पे कभी अपना हक नहीं जता सका;

मींनल खुद भी पहल करती थी तो मैं पीछे हट जाता था. मैं ये नहीं कहता भी अपनी हदों को पार करना चाहिए. अपनी मर्यादा बहुत ज़रूरी है लेकिन जिंदगी के जिस मोड़ पर हम आ के मिले थे. हम में इतना भरोसा खुद पे ज़रूरी था.

"ठीक है निशान्त. जब तुम्हे खुद पे भरोसा नहीं, मेरे प्यार की कदर नहीं. मेरी भावनाओं ,मेरी इच्छाओं की परवाह ही नहीं तो क्या फायदा. कल को हम शादिबकर लेंगे और तुम ऐसे ही भागते फिरोगे मुझसे. ये मैं नहीं चाहती; इस से अच्छा हम अलग;"

"नहीं मींनल. " मैंने गिड़गिड़ाते हुए उसकी बात काटी.. "नहीं;मींनल.. ऐसा फिर मत कहना. " मैं उसकि इस बात से बहुत डर गया था।

"तो ठीक है ; मेरे साथ खुल के रहो निशान्त. मेरे बन के. अभी कुछ पल सब भूल जाओ. " मींनल मेरे और करीब आ के मुझे देखते हुए बोली और उसकि साँसे फिर मेरी गर्दन को छू गयी. मेरे होश तो खोने ही थे. मेरे बिना जाने ही मींनल को अपने और करीब कर लिया मैंने.

"मेरी आँखों मे देखो. " मींनल आ आदेश आया.. और मैंने उस से नज़रें मिला ली. डर पीछे होता चला गया और मीनल के लिए प्यार आगे बढ़ने लगा8 Full stop

"अब करोगे न डांस. " वो मुस्कुरायी तो मैंने हामी भर दी।

उसने आगे गाना चलाया और मेरी तरफ हाथ बढ़ाया. मैं उसका हाथ थामे आगे बढ़ा.

हम्म ;दिखती नहीं है, पर हो रही हैं महसूस नज़दीकियां10 Full stop

दो दिल ही जाने लगती हैं कितनी, मेहफ़ूज़ नज़दीकियां।

ज़रिया हैं ये आखें ज़रिया ,

छलकता है जिनसे एक अरमानों का दरिया

आदतें है इनकी पुरानी अनकही सी कह दे कहानी

परछाइयाँ दो जुड़ने लगी हैं देखो हवा में उड़ने लगी हैं

पंख जैसी लगने लगी है दो दिलों की अब नज़दीकियां.

हम एक दूसरे में गम. साथ झूमते रहे. मेरा डर कम हो चला. मींनल मेरी है , ये जान रहा था. उसपे मेरा हक़ है, ये मींनल मुझे समझा रही थी.

मैं खुश होने लगा. अपराधबोध न जाने कहाँ खो गया. रह गया तो सिर्फ़ प्यार. मेरा और मेरी मींनल का प्यार. सब से अनोखा, मेरे लिए दुनिया मे सब से प्यारा.

गाना खत्म होते ही हम गले लग गए;" थैंक यू मींनल; मुझे समझने के लिए मेरा साथ देने के लिए;"

"तुम मेरे लिए बहुत ज्यादा संरक्षात्मक हो गए थे निशान्त. और यही वजह तुम्हे मेरे करीब आने से रोकती भी रही. तुम गलत नहीं, तुम सही हो; बस अब हमारा आने वाला वक़्त हमे और करीब ले आएगा. "

अब मेरी एक और इच्छा पूरी करो. वो बोली.

" हुकुम कीजिये देवी;" मैं हंसा. ।।

" वत्स हमे अपनी गोद मे सुला लो.. और फिर कल अहमदाबाद जाने के पहले हमारे साथ मुम्बई भ्रमण करो. "

उसकी इस बात पे मैं बहुत हंसा; कितने वक़्त बाद मेरी हंसी लौटी थी।

मैंने बिना पल गवाएं उसे अपनी गोद मे उठा लिया और कमरे में ले गया. अब मैं अहसज नहीं था. हम दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हुए लेट गए; मींनल ने अपना सिर मेरे सीने से लगा लिया और मैं उसका सिर सहलाता रहा. बाल संवारता रहा।

मैं जब तक जगा रहा तब तक भगवान से दुआ मांगता रहा कि अब हम अलग न हो. अब कोई मुसीबत न आये.

अगले दिन हम तैयार हुए और जाने लगे तब तक निशि आ गयी; निशी मींनल की बेटी थी इस लिए मेरी प्यारी थी. मींनल से कह के मैंने राकेश जी को भी घूमने के लिए मना लिया.

सुबह से ले के शाम तक हम घूमे. निशी को मैंने खुद को पापा बोलना सिखाया. वरना वो मुझे भगवान जी ही बुलाती रहती।

मैं बिना शादी के एक पति और एक पिता बन चुका था, सोचता तो पेट मे तितलियां उड़ने लगती।

रात को राकेश जी से विदा ले के हम एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए.

वहां जा के मुझे याद आया कि मेरे दो दोस्त भी हैं जिन्हें बताना जरूरी है, तो कौस्तुभ को फ़ोन किया।

"हेलो मोटू. " मेरी आवाज ही मेरी खुशी बता रही थी।

"अच्छा बेटा आ गयी याद. शादी के बाद करता फोन. "

"तुझे पता है..??" मैं आश्चर्य से बोला।

.हांन. सब को पता है..अंकल आंटी को भी;"

"क्या. मैं मींनल के घर हूँ ये भी?? मींनल ने बताया?. "

"भाई मींनल के नए शो की लांचिंग के बारे में न्यूज में आया था. तेरी मींनल कोई छोटी हस्ती है क्या. और मींनल शादीशुदा नहीं ये बात जिग्नेश ने बताई थी. तुझे भी फ़ोन किया था लेकिन तू सुनता तब न;"

"सॉरी यार,मैं घर जा रहा हूँ मींनल के साथ..तू ऑफिस में मेरी इमरजेंसी मेडिकल लीव डाल देना।" मैं चहक रहा था।

"तू आराम से जा बाकी चिंता यही छोड़;जा जी ले अपनी ज़िंदगी.." वो हंसते हुए बोला।

फिऱ मैंने जिग्नेश को फ़ोन किया. और माफी मांगी..

"भाई जल्दी आओ. मेरी बहन से जल्दी से शादि करो.. अब ये बोझ सहन नहीं होता. " मैं ये सुन के शरमा गया।

पापा मम्मी को नहीं बताया. सरप्राइज जो देना था।

खुशी ज्यादा थी तो डर भी था, मीनल समझ भी रही थी. एयरपोर्ट पर जब मैं सब से बात कर रहा था तब तक उसने 2-3 कपड़े मेरे लिए खरीद के मेरे बैग में डाल दिये, वहां ऐसे ही जाओगे क्या.. बात सही थी उसकी.. मैंने ज़रूरतों के हिसाब से कुछ कपडे और सामान भी लिया और फ़िर बोर्डिंग के लिए चल दिये।

मीनल ने अपने घर जाने की बात कही तो मैं डर गया. " निशान्त अब सब ठीक है.. दादी को अब मुझसे कोई शिकायत नहीं"

"हम्म, तुम चली गयी तो रूपयों की कमी हो गयी तो बदलना ही था उन्हें.." मैं चिढ़ के बोला।

"मैं तब भी उन्हें रुपये भेजती थी निशान्त; दादी बुरी नहीं ,जो उनके साथ हुआ, उन हालातों ने उन्हें ऐसा बना दिया था;लेकिन अब सब ठीक है."

मैं मींनल के आगे नतमस्तक हो गया, कोई ऐसा भी हो सकता है ये सोच कर आश्चर्य हो रहा था।

खैर!! मींनल अपने घर गयी और मैं अपने घर. घर के माहौल से लगता था सब, दुःखी हैं. मम्मी उदास बैठी थीं और पापा उल्टा न्यूज़ पेपर पढ़ रहे थे।

"क्या हुआ सब ऐसे उदास क्यों है मैने पूछा;"

"अरे क्या बताएं. हमारे नीशू ने बिना बताए ही शादी कर ली. " मम्मी बिना मुझे देखे बोली और पापा न्यूज़ पेपर के पीछे से मुझे देख के हैरान रह गए।

"किस ने कहा. " मैंने पापा से चुप रहने का इशारा करते मम्मी से पूछा;टीवी पे आया था. " अब तक उन्हें ध्यान नहीं था कि वो किस से बात कर रही है, सदमा गहरा था।

"आप को कैसे भरोसा कि बिना आपकी मर्जी के मैं किसी से भी शादी कर लूंगा.. " मैं झुक के उनके पैर छूते हुए बोला तो मम्मी ने हड़बड़ा के मुझे देखा और मेरे लग के रोने लगी।

"मम्मी मैंने और मींनल ने शादी नहीं की है, मैं यहां आप से इसी लिए बात करने आया हूँ. मैं उस से शादी करना चाहता हूँ अगर आपकी मर्जी हो तो!!"

"तूने सच मे शादी नहीं की न;!!"

"आपको अपनी परवरिश पे भरोसा नहीं मम्मी. मैं उन्हें गले लगता हुए बोला, फिर सारी बातें संक्षेप में बतायी।

आखिरकार मेरे घर से शादी की बात पे मुहर लग चुकी थी, मुझसे कहीं ज्यादा पापा खुश थे।
 
रात को मींनल से बात हुई तो वो बोली कि दादी तैयार हैं लेकिन शादी गुजराती रिवाज़ से होगी। मुझे कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन मम्मी बरस पड़ी.." एक ही बेटा है मेरा. मेरे भी अरमान हैं. पंजाबी रिवाज़ से शादी होगी बस!!. "

मम्मी और दादी की बहस में मैं बिचारा पिस रहा था.

अरे कैसे भी कर दो न..कोर्ट मैरिज ही करवा दो. मेरे अंदर से चीख चीख के आवाज़ें आ रही थीं।

जब बात बनने के बदले बिगड़ने लगी तब पंडित ने रास्ता खोज निकाला.

पहले दिन गुजराती ढंग से और अगले दिन पंजाबी रिवाज़ से शादी होगी; सब इस बात पे खुश हो गए सिवाय मेरे , क्यों कि शादी की डेट 2 महीने बाद की थी।

मैं अगले दिन ही शादी की ज़िद कर बैठा. मेरी बेशर्मी के कारण मींनल अपने घर भाग गई और सब की गालियां मैंने अकेले सुनी।

मैं वापस पुणे आ गया और मींनल मुम्बई. हम हर हफ्ते मिलते और घूमते;मीरा और मींनल दोस्त बन चुकी थी.

2 महीने बाद हमारी शादी हुई 2-2 बार.. ..और इस शादी में हमारी बेटी भी हमारे साथ थी. मैं खुश था, बहुत खुश!!

. पहली शादी के दिन मीनल को जब मैंने देखा तो देखता रह गया.. सच मे मौसी ने उसे आज अप्सरा बना दिया था. मेरी मदहोशी का ये आलम था कि मैं उसे जयमाला पहनाना भी भूल गया और स्टेज पे सब के सामने बेइज़्ज़त्ति का पात्र बन।

मींनल भी छुप के खूब हंसी।

अगले दिन पंजाबी रिवाज़ के दौरान मींनल ने फिर लाल लहंगा पहन लिया. लाल रंग कितना जंचता था उस पे. लेकिन पहले दिन की बेइज़्ज़त्ति मुझे याद थी, इस लिए कोई गड़बड़ नहीं की; ऐसा नहीं कि मैं अच्छे से तैयार नहीं हुआ था, मैं भी पूरे टशन में था।

दुनिया मे मेरे जैसा किस्मत वाला उस वक़्त कोई नहीं था. जिस से प्यार करता था उस से शादी हुई वो भी दो दो बार. मेरी बत्तीसी इन दो दिनों में शायद ही छुप सकी हो..

शादी के दो दिन बाद हमे वापस पुणे जाना था तो मींनल घर के रीति रिवाज निभा के दो दिन के लिए अपनी दादी के घर चली गयी।

और आखिरकार वो वक़्त भी आया जब मींनल मेरी पत्नी के रूप में विदा हो रही थी. मेरे पेट मे न जाने कितनी तितलियां उड़ रही थी। खुद को चिंगोटी भी काट ली कि कहीं सपना तो नहीं. लेकिन सब कुछ सच था. सपने से सुंदर सच।

जब पुणे आये तो मोटू और मीरा ने मेरा पूरा फ्लैट सजाया था, मीरा ने मींनल का गृह प्रवेश भी करवाया.

हम दोनों ने पति पत्नी के रूप में साथ ही अंदर कदम रखे.

अब जब हमें अकेले छोड़ने का वक़्त आया तो कौस्तुभ ने ड्रामा शुरु कर दिया।

"आज मैं तुझसे बदला लूंगा परफेक्ट. याद है ना वो दिन!!" ये सुन के मैं हंस पड़ा।

"ये क्या हरकत है कौशू. " मीरा बोली।

"क्या हरकत क्या!! उस दिन तुमने मुझे घर से निकाल दिया था याद है??"

आएगा तो तब ना!! जब चाभी होगी तेरे पास..मैंने कौस्तुभ के सेट वाली चाबी जेब से निकलते हुए कहा।

"स्साले, तुझे पता था न. वापस कर अभी के अभी. "वो चिल्लाया

" चल ले ले, तू भी क्या याद करेगा. मैं चाभी का गुच्छा उस की तरफ फेंकते हुए बोला.."

मींनल को कुछ समझ नहीं आ रहा था. आखिरकार कौस्तुभ किसी तरह से गया।

अब मैं और मींनल साथ थे, मैं उसके पास गया और उसके हाथ पकड़ के उसका माथा चूम लिया, मींनल कांप उठी ये मैंने महसूस किया। आज मैं किसी डर में नहीं था तो मींनल शरमाई थी। मैं उसके और करीब होने लगा तो वो डर गई. "कौस्तुभ आ जायेगा.."

"आने दो.." मैंने और आगे हुआ।

" निशान्त उस के पास चाभी है.."

"कोई बात नहीं.." उसकी बाज़ू को पकड़ते हुए मैं बोला।

" न. निशान्त;" इस के आगे मैंने उसे कुछ कहने का मौका नहीं दिया. मींनल की कंपन भी मुझे अच्छी लग रही थी लेकिन कौस्तुभ आ चुका था और मुझे गालियां दे रहा था।

"स्साले गलत चाभियाँ दी तूने मुझे. ! कमीने. छोडूंगा नहीं तुझे मैं.."

मैं और मीनल हंस पड़े. " ये कब किया तुमने. "

"गुजरात मे ही,..मैं जानता था कि वो ऐसा करेगा;" मैंने बत्तीसी दिखाई, फिर मींनल ने दरवाज़ा खोला..और कौस्तुभ ने मुझसे बहुत लड़ाई की; और आखिरकार मीनल पे तरस खा के चला गया।

उसके जाने के बाद मैंने बैग से एक लाल साड़ी निकाल के मींनल को दी. "मींनल ये मैं तुम्हारे लिए लाया था. मैं शरमाते हुए बोला तो वो भी शरमा गयी. "

"आती हूँ पहन के वो बोली. और कुछ देर में मींनल मेरे सामने थी. उसी लाल साड़ी में. मैं उसके गले लग गया " थैंक यू मीनल. "

"थैंक यू निशान्त. "

फिऱ न वो बोली न मैं बोला. मैंने उसे अपनी गोद मे उठा लिया और ले चला एक नई जिंदगी की ओर.. सपनो को सच करने के लिए. मींनल के साथ ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए एक हो जाने के लिए;

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समाप्त।
 
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