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स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)
इस बार दीवाली पर 2 साल बाद घर जा रहा हूँ, मम्मी अब शादी के लिए जोर देने लगी हैं, रोज़ फोन कर के " देख बेटा इन से कुंडली मैच हो रही है ये जॉब में भी है; बिल्कुल तेरे हिसाब से. " उफ़्फ़ उनके लिए हर दूसरी लड़की मेरे हिसाब की ही लगती है। कितनी बार समझ चुका हूँ कि कुंडली मैच नहीं सोच मैच होनी चाहिए। मुझे मेरे लेवल के हिसाब की लड़की चाहिए, पर मम्मी का शादी पुराण में पता नही अभी कितने अध्याय बाकी है।
पापा मेरे मस्तमौला. " शादी सोच समझ कर करना बेटा, कई बार जो दिखता है वो होता नहीं" शादी परख के करना न की अपना स्टैण्डर्ड मैच करा के" बात कहीं न कहीं सही भी है।
प्यार हो ही नहीं पाया किसी से , परखते परखते. कोई परफेक्ट लगा ही नहीं. कौस्तुभ ,मेरा यार, बोलता है " स्साले तू बड़ा परफेक्ट है जैसे; कमी सब मे होती है इतनी प्यारी लड़की का आफर ठुकरा दिया। मैं पर्सनली जनता था उसे, लड़की खुद से अप्रोच नहीं करती लेकिन उस बेचारी ने ये तक कर डाला. और तूने क्या कहा . हे डोंट माइंड बट आई वांट परफेक्ट पर्सन. आई डोंट लाइक योर जॉब एंड ड्रैसिंग सेंस!!" मैं क्या करता नही पसंद था कह दिया . कैसी बहनजी बन के घूमती थी वो।
हाँ लेकिन बाद में लगा कि बहुत रूड हो गया था मैं उस के साथ माफी भी मांग ली थी। लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया सिर्फ़ एक बात कही " मेरा जवाब तुम्हे वक़्त देगा"। मेरे पास कहने को कुछ नहीं था इस के बाद।
फ्लाइट अहमदाबाद लैंड होने की घोषणा हो चुकी, बस एक घंटे में मैं अपने घर। मैं गुजराती नहीं हूँ लेकिन पल बढ़ा यही, मेरे दादा पंजाब से यहां व्यापार के सिलसिले में आये और यही के हो गए। मेरा खून पंजाबी है तो रहन सहन भी थोड़ा दिखावे वाला है. सच कहूं तो मेरा थोड़ा ज्यादा है। दिखने में काफी अच्छा हूँ, 6फिट 2 इंच का कद है और हाँ जिम भी करता हूँ, 27 साल की उम्र में ही सैलरी पैकेज बहुत अच्छा है। कुल मिला के मेरे हिसाब से मैं परफेक्ट हूँ।
घर पहुँचते ही मम्मी का टेप रिकॉर्डर शुरू हो गया, " हाय मेरा बेटा कितना कमज़ोर हो गया, बंगलोर में सिर्फ़ डोसा इडली खाने को मिलता है; मैं तुझे खूब मक्खन वाले परांठे खिला के तगड़ा कर दूंगी।
" मम्मी मैं फिट हूँ.. और हाँ साउथ इंडिया में इडली डोसे के अलावा भी बहुत कुछ है खाने को"
"मम्मी की बात सुनोगे तो रात हो जाएगी, तुम जा के फ्रेश हो जाओ, आज आराम करो कल से 5 दिन धमाल होगा हमारी सोसाइटी में. जानते हो न!"
"ओ के पापा"
हमारी सोसाइटी में सभी त्योहार बहुत धूम धाम से मनाए जाते हैं.. यहां लगभग सभी तरह के लोग हैं लेकिन ज्यादातर गुजराती ही हैं। यहां फ्लैट्स नहीं बल्कि सबके अपने घर है, गेट, पार्क, सिक्योरिटी सब कुछ फ्लैट्स सोसाइटी की तरह ही है लेकिन फ्लैट नहीं। बस यही एक कमी खलती है बैंगलोर में मुझे।
दिन भर सो के रात को थोड़ा बाहर घूमने गया, बाहर मतलब मेन गेट के बाहर अपने फेफड़ों में थोड़ा धूआँ भरने। कश लगाता हुआ जब टहल रहा था तो एक लडक़ी पे नज़र टिक गई, बहुत देर उसे देखता रहा। मैडम कुत्ते के पिल्ले को डांट लगा कर सड़क के किनारे कर रही थी। " दिमाग खराब है तेरा, किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो; चल यहां आ यहां खेल, अरे ये बिस्कुट तो खा ले, थक गया होगा।"
हद्द है !! पिल्ले को क्या समझ आ रहा है उसका अपदेश, हुह.. लड़कियां दिमाग की पैदल हरकतें क्यों करती है। ओह गॉड!! । पता नहीं मेरा क्या होगा शादी के बाद।
ध्यान फ़िर भटका, वो ही समाज सेविका हाथ झाड़ते हुए सोसाइटी के गेट की तरफ ही जा रही थी अपनी ही धुन में,मेरे बगल से निकली और मुझे देखा भी नहीं. मुझे आज तक किसी ने इग्नोर तो नहीं किया। खैर!! थोड़ी लाइट में चेहरा दिखा उसका. मैं भी देखूँ कौन सी हूर की परी है।
गोरा चेहरा, साधारण नैन नक्श वाली लड़की, कमर से थोरे ऊपर तक बालों की लंबाई जिन्हें ऐसे टाइट बंधा गया था कि कोई तूफान भी आ जाये तो बाल बांका न हो, शायद थोड़ा तेल भी चपोड़ा हुआ था। भौहों को देख के लगता था कि अपने जीवन काल मे ब्यूटी पार्लर के दर्शन ही नहीं किये। देखने मे 23, 24 की लग रही थी, इतनी उम्र में अपनी ऐसी दुर्दशा कौन रखता है? आज कल तो स्कूल जाने वाली भी महीने में दो बार क्लीन अप करा ही लेती हैं और एक ये है, ऐसा लग रहा था जैसे जी के भगवान पे एहसान कर रही हो, भगवान खुद ही आ के ही चेहरा ठीक करेंगे तो ठीक वर्ना इन तुच्छ मनुष्यों के लिए ईश्वर के दिये बालों का बलिदान वो क्यों दे भला।
और ये क्या?? जब वैक्स नहीं करा सकती तो कैप्री क्यों पहनी है. माना कि ज्यादा बाल नहीं हैं पैरों पर, लेकिन लड़कियों को तो एक भी बाल जंगल ही दिखता है।
उफ़्फ़ इतनी ध्यान से शायद मैं पहली बार किसी लड़की को देख रहा हूँ; मन करता है कि अभी इसका काया कल्प कर के कहूँ के नादान बालिके ईश्वर के दिये इस शरीर का ध्यान रखो।
खैर. मुँह की बदबू हटाने के लिये च्विंग गम चबाता हुआ मैं घर आ गया। खा पी के गप्पे मार के सो गया। सुबह नींद खुली तो दिमाग खराब हो चुका था, मुझे बुरा सपना आया था, बुरा नही बहुत बुरा; हे भगवान ऐसे सपने दुश्मन को भी न दिखाए। मैंने खुद को उसकि, वो ही जो रात में दिखी, आइब्रो बनाते हुए देखा। छी?
आज धनतेरस है तो शॉपिंग भी होगी और सोसाइटी में प्रोग्राम भी, जाना ही पड़ेगा।
इस बार दीवाली पर 2 साल बाद घर जा रहा हूँ, मम्मी अब शादी के लिए जोर देने लगी हैं, रोज़ फोन कर के " देख बेटा इन से कुंडली मैच हो रही है ये जॉब में भी है; बिल्कुल तेरे हिसाब से. " उफ़्फ़ उनके लिए हर दूसरी लड़की मेरे हिसाब की ही लगती है। कितनी बार समझ चुका हूँ कि कुंडली मैच नहीं सोच मैच होनी चाहिए। मुझे मेरे लेवल के हिसाब की लड़की चाहिए, पर मम्मी का शादी पुराण में पता नही अभी कितने अध्याय बाकी है।
पापा मेरे मस्तमौला. " शादी सोच समझ कर करना बेटा, कई बार जो दिखता है वो होता नहीं" शादी परख के करना न की अपना स्टैण्डर्ड मैच करा के" बात कहीं न कहीं सही भी है।
प्यार हो ही नहीं पाया किसी से , परखते परखते. कोई परफेक्ट लगा ही नहीं. कौस्तुभ ,मेरा यार, बोलता है " स्साले तू बड़ा परफेक्ट है जैसे; कमी सब मे होती है इतनी प्यारी लड़की का आफर ठुकरा दिया। मैं पर्सनली जनता था उसे, लड़की खुद से अप्रोच नहीं करती लेकिन उस बेचारी ने ये तक कर डाला. और तूने क्या कहा . हे डोंट माइंड बट आई वांट परफेक्ट पर्सन. आई डोंट लाइक योर जॉब एंड ड्रैसिंग सेंस!!" मैं क्या करता नही पसंद था कह दिया . कैसी बहनजी बन के घूमती थी वो।
हाँ लेकिन बाद में लगा कि बहुत रूड हो गया था मैं उस के साथ माफी भी मांग ली थी। लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया सिर्फ़ एक बात कही " मेरा जवाब तुम्हे वक़्त देगा"। मेरे पास कहने को कुछ नहीं था इस के बाद।
फ्लाइट अहमदाबाद लैंड होने की घोषणा हो चुकी, बस एक घंटे में मैं अपने घर। मैं गुजराती नहीं हूँ लेकिन पल बढ़ा यही, मेरे दादा पंजाब से यहां व्यापार के सिलसिले में आये और यही के हो गए। मेरा खून पंजाबी है तो रहन सहन भी थोड़ा दिखावे वाला है. सच कहूं तो मेरा थोड़ा ज्यादा है। दिखने में काफी अच्छा हूँ, 6फिट 2 इंच का कद है और हाँ जिम भी करता हूँ, 27 साल की उम्र में ही सैलरी पैकेज बहुत अच्छा है। कुल मिला के मेरे हिसाब से मैं परफेक्ट हूँ।
घर पहुँचते ही मम्मी का टेप रिकॉर्डर शुरू हो गया, " हाय मेरा बेटा कितना कमज़ोर हो गया, बंगलोर में सिर्फ़ डोसा इडली खाने को मिलता है; मैं तुझे खूब मक्खन वाले परांठे खिला के तगड़ा कर दूंगी।
" मम्मी मैं फिट हूँ.. और हाँ साउथ इंडिया में इडली डोसे के अलावा भी बहुत कुछ है खाने को"
"मम्मी की बात सुनोगे तो रात हो जाएगी, तुम जा के फ्रेश हो जाओ, आज आराम करो कल से 5 दिन धमाल होगा हमारी सोसाइटी में. जानते हो न!"
"ओ के पापा"
हमारी सोसाइटी में सभी त्योहार बहुत धूम धाम से मनाए जाते हैं.. यहां लगभग सभी तरह के लोग हैं लेकिन ज्यादातर गुजराती ही हैं। यहां फ्लैट्स नहीं बल्कि सबके अपने घर है, गेट, पार्क, सिक्योरिटी सब कुछ फ्लैट्स सोसाइटी की तरह ही है लेकिन फ्लैट नहीं। बस यही एक कमी खलती है बैंगलोर में मुझे।
दिन भर सो के रात को थोड़ा बाहर घूमने गया, बाहर मतलब मेन गेट के बाहर अपने फेफड़ों में थोड़ा धूआँ भरने। कश लगाता हुआ जब टहल रहा था तो एक लडक़ी पे नज़र टिक गई, बहुत देर उसे देखता रहा। मैडम कुत्ते के पिल्ले को डांट लगा कर सड़क के किनारे कर रही थी। " दिमाग खराब है तेरा, किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो; चल यहां आ यहां खेल, अरे ये बिस्कुट तो खा ले, थक गया होगा।"
हद्द है !! पिल्ले को क्या समझ आ रहा है उसका अपदेश, हुह.. लड़कियां दिमाग की पैदल हरकतें क्यों करती है। ओह गॉड!! । पता नहीं मेरा क्या होगा शादी के बाद।
ध्यान फ़िर भटका, वो ही समाज सेविका हाथ झाड़ते हुए सोसाइटी के गेट की तरफ ही जा रही थी अपनी ही धुन में,मेरे बगल से निकली और मुझे देखा भी नहीं. मुझे आज तक किसी ने इग्नोर तो नहीं किया। खैर!! थोड़ी लाइट में चेहरा दिखा उसका. मैं भी देखूँ कौन सी हूर की परी है।
गोरा चेहरा, साधारण नैन नक्श वाली लड़की, कमर से थोरे ऊपर तक बालों की लंबाई जिन्हें ऐसे टाइट बंधा गया था कि कोई तूफान भी आ जाये तो बाल बांका न हो, शायद थोड़ा तेल भी चपोड़ा हुआ था। भौहों को देख के लगता था कि अपने जीवन काल मे ब्यूटी पार्लर के दर्शन ही नहीं किये। देखने मे 23, 24 की लग रही थी, इतनी उम्र में अपनी ऐसी दुर्दशा कौन रखता है? आज कल तो स्कूल जाने वाली भी महीने में दो बार क्लीन अप करा ही लेती हैं और एक ये है, ऐसा लग रहा था जैसे जी के भगवान पे एहसान कर रही हो, भगवान खुद ही आ के ही चेहरा ठीक करेंगे तो ठीक वर्ना इन तुच्छ मनुष्यों के लिए ईश्वर के दिये बालों का बलिदान वो क्यों दे भला।
और ये क्या?? जब वैक्स नहीं करा सकती तो कैप्री क्यों पहनी है. माना कि ज्यादा बाल नहीं हैं पैरों पर, लेकिन लड़कियों को तो एक भी बाल जंगल ही दिखता है।
उफ़्फ़ इतनी ध्यान से शायद मैं पहली बार किसी लड़की को देख रहा हूँ; मन करता है कि अभी इसका काया कल्प कर के कहूँ के नादान बालिके ईश्वर के दिये इस शरीर का ध्यान रखो।
खैर. मुँह की बदबू हटाने के लिये च्विंग गम चबाता हुआ मैं घर आ गया। खा पी के गप्पे मार के सो गया। सुबह नींद खुली तो दिमाग खराब हो चुका था, मुझे बुरा सपना आया था, बुरा नही बहुत बुरा; हे भगवान ऐसे सपने दुश्मन को भी न दिखाए। मैंने खुद को उसकि, वो ही जो रात में दिखी, आइब्रो बनाते हुए देखा। छी?
आज धनतेरस है तो शॉपिंग भी होगी और सोसाइटी में प्रोग्राम भी, जाना ही पड़ेगा।