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Romance हरसिंगार/रानु

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चंद्रभाल का दिल अचानक कांप गया। रजनी के इरादे भयानक हैं। उसने रजनी की ओर लपकते हुए पुकारा, 'रजनी!'

हीरालाल ने रजनी का नाम सुना तो चौंक गया। उसने चंद्रभाल को रजनी के पीछे जाते देखा तो चिन्तित होकर वह भी उसके पीछे भागा। जोश में आकर उसने रजनी पर यह भेद क्यों खोल दिया? वह बहुत पछताया। 'रजनी!' चंद्रभाल और तेजी के साथ रजनी की ओर बढ़ा। उसके पीछे हीरालाल के भी कदम तेज हो गए। परन्तु रजनी अपने इरादे पर अटल रही।

'रजनी।' चंद्रभाल दरवाजे पर पहुचंकर दरवाजा पीटने लगा, 'रजनी, दरवाजा खोलो! रजनी!' चंद्रभाल का दिल बहुत तेजी के साथ धड़कने लगा। वह चीख पड़ा, 'रजनी ! रजनी! रजनी बिटिया !' तभी वहां हीरालाल भी आ पहुंचा। उसने भी द्वार पीटना आरंभ कर दिया-कहीं उसकी रजनी बिटिया कुछ कर न ले।

परन्तु रजनी अंदर से द्वार लॉक करने के बाद सीढियां चढ़ चुकी थी। वह दूसरी मंजिल पर पहुंची तो वहां उसे तीसरी मंजिल पर जाने वाली सीढ़ियां मिल गईं। वह छत पर आ गई तो रात का भयानक अंधकार उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रह था। छत पर उसे अपने बाप तथा चंद्रभाल के चीखने-पुकारने के स्वर सुनाई दिए। वे लोग दूसरे रास्ते से ऊपर आ रहे थे। रजनी छत के किनारे पहुंच गई। मृत्यु के अंधकार ने उसके लिए बांहें फैला दीं। रजनी ने तुरंत छलांग लगा दी और मृत्यु की बांहों में जा समाई। अंतिम क्षण भी उसके कानों में चंद्रभाल का ही स्वर सुनाई पड़ रहा था, 'रजनी...रजनी...रजनी...।'

चंद्रभाल रो रहा था, तड़प रहा था, परन्तु रजनी ऐसे अंधकार में डूब चुकी थी जहां चंद्रभाल की पहुंच नहीं थी। अपनी रजनी के पीछे दौड़ते हुए दीवानगी की स्थिति में चंद्रभाल ने भी छलांग लगा देनी चाही, शायद छलांग लगा भी देता, छत के वह बिल्कुल किनारे आ चुका था, रेलिंग पर एक पैर रख भी चुका था कि तभी हीरालाल ने लपककर उसे पकड़ लिया। चंद्रभाल को पूरी शक्ति से अपनी ओर खींचता हुआ वह चीख पड़ा, 'नहीं छोटे मालिक, नहीं..नहीं।'

चंद्रभाल ने अपने को छुड़ाने के लिए पूरी शक्ति लगा दी तो हीरालाल तड़पकर रो पड़ा। रोते हुए विनती करने लगा, नहीं मालिक नहीं! ऐसा मत कीजिए, ऐसा मत कीजिए!'

चंद्रभाल का शरीर अस्वस्थ था। उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया और फूट-फूटकर रो पड़ा।

हीरालाल भी फूट-फूटकर रो रहा था। उसका मन भी करता था कि वह यहां से छलांग लगाकर अपनी जान दे दे परन्तु वह चंद्रभाल को संभालने पर विवश था। उसकी एक गलती के कारण रजनी की जान चली गई थी। अब वह चंद्रभाल की मृत्यु का भी जिम्मेदार नहीं बनना चाहता था। चंद्रभाल को अपनी सुरक्षा में लेकर वह कोठी की सीढ़ियां उतरने लगा। शायद हां, शायद उसकी रजनी में जीवन की हल्की-सी आशा बची हो, परन्तु ऐसी बात सिद्ध नहीं हो सकी। रजनी ने सदा के लिए मृत्यु के अंधकार को अपने लगा लिय था।

अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में अंशु बेहोश पड़ी थी। उसके समीप चंद्रभाल तथा उसके माता-पिता बैठे हुए थे। सभी को उसकी चिन्ता थी। इस चिन्ता में हीरालाल भी सम्मिलित था।

हरसिंगार रजनी की लाश पोस्टमार्टम के लिए पुलिस ने अपनी सुरक्षा में ले ली। पुलिस की हिरासत में निर्भय भी थे। रजनी का भेद खुलने के बाद जैसे उनके अंदर कोई होश ही नहीं रह गया था। होश उन्हें तब आया था, जब रजनी की आत्महत्या के बाद निर्भय सिंह को तहखाना छोड़ना पड़ गया था। होश में आने के बाद उनके मस्तिष्क का संतुलन बिगड़ गया था। वह पागल हो गए थे। पागलों के समान अपने बाल नोंचने लगे थे, स्वयं को दांतों से काटकर घायल करने लगे थे। तब तुरन्त ही मार्तण्ड सिंह ने पुलिस को फोन कर दिया था। अंशु की निर्दोषता उन पर सिद्ध हो चुकी थी। अंशु ने भी आत्महत्या करने का प्रयत्न किया था। मार्तण्ड सिंह ही उसे अस्पताल लेकर आए थे। डाक्टर ने स्पष्ट कह दिया था कि अंशु के बचने का अवसर निकल चुका है, केवल आशा ही रखी जा सकती है। उधर गंगू चालक भी हत्या हुई थी, उधर आत्महत्या कर और अब अंशु के बचने की भी कोई आशा नहीं थी। मार्तण्ड सिंह के घर में तो जैसे हाहाकार मच गया

चंद्रभाल की पलकें भीगी हुई थीं। होठों पर सिसकियां थीं। रजनी का साथ सदा के लिए छूट गया था। अब अंशु भी उसे छोड़कर जा रही थी। क्यों उसने अंशु पर बिना सोचे-समझे संदेह किया? क्यों उसे घृणा से धिक्कारा? उसने तो अंशु पर हाथ भी उठा दिया था। अंशु के कपोल पर चंद्रभाल की उंगलियों के निशान अब भी शेष थे। कपोल पर उंगलियों की नीली छाप-सी पड़ गई थी। चंद्रभाल का मन कह रहा था, अपने हाथ को वह काटकर रख दे, परन्तु शायद उसने ऐसा इसलिए नहीं किया था, क्योंकि अंशु के अन्दर जीवन की एक हल्की-सी आशा अब भी शेष थी। अपने हाथों को जोड़कर मानो वह उससे क्षमा मांगने का इच्छुक था।

सहसा अंशु के शरीर में एक हल्की-सी हरकत उत्पन्न हुई। उसने एक गहरी सांस ली तो उसके नन्हे-नन्हे नथुने फूल उठे। चंद्रभाल अंशु के और समीप सरक आया। उसके मुखड़े पर वह कुछ झुक-सा गया। अंशु ने अपनी पलकें खोलीं-बहुत धीमे-धीमे, इस प्रकार, मानो दो नन्हे-नन्हे तारों पर से काली बदली की परत हट रही हो। अंशु की आंखों के नन्हे-नन्हे तारे टिमटिमा उठे। उसके मुखड़े पर चंद्रभाल झुका हुआ था। अंशु ने चंद्रभाल को देखा। उस पर अब भी अर्द्ध बेहोशी छाई हुई थी।

चंद्रभाल ने अंशु का हाथ अपनी दोनों हथेलियों के बीच थाम लिया। विनती करते कहा उसने, 'अंशु-अंशु, मुझे क्षमा कर दो! मुझे छोड़कर मत जाओ अंशु...मुझे छोड़कर मत जाओ! मैं...मैं...।' चंद्रभाल ने अंशु के जीवन की भीख मांगी तो उसका गला भर आया। होंठ थरथरा उठे। उसने फिर भी कहा, 'मैं बिल्कुल अकेला रह गया हूं अंशु, मुझसे इस संसार में अकेले नहीं रहा जाएगा। अंशु...अंशु मुझे छोड़कर मत जाओ, मत जाओ !' चंद्रभाल की आंखों से आंसू छलककर गालों पर बहने लगे।

अंशु की पलकें फिर बंद होने लगीं, इस प्रकार मानो उसका दम निकल रहा हो, सांस टूट रही हो। चंद्रभाल का दिल तड़प उठा। गला सूखने लगा। उसने चीखते हुए अंशु को पुकारकर रोक लेना चाहा, परन्तु तभी दोनों हथेलियों के मध्य रखी अंशु की बेजान उंगलियां चंद्रभाल के एक हाथ की उंगलियों में समाकर लिपट गईं। अंशु ने मानो स्वयं को रोकने के लिए चंद्रभाल का सहारा थाम लिया था। उसकी उंगलियों की पकड़ मजबूत और मजबूत होती गई। उसके अंदर जीने की शक्ति आती गई।

कुछ दिनों के अंदर ही मार्तण्ड सिंह ने अंशु तथा चंद्रभाल का विवाह कर दिया, केवल इसीलिए कि दोनों को एक-दूसरे का साथ हर क्षण के लिए प्राप्त हो जाए। दोनों को ही जीवित रहने के लिए एकदूसरे की सख्त जरूरत थी। दोनों ही एक-दूसरे के गमो के साथी थे। दोनों ही एक-दूसरे का सहारा थे।

निर्भय सिंह इस समय पागलखाने में हैं। कोई उन्हें देखने नहीं जाता। संसार वालों के लिए यह मर चुके हैं। कोई याद करता है उन्हें तो बहुत धृणा के साथ। अंशु भी उन्हें घृणा से याद करती है। तब भी अंशु की आंखों में आंसू छलक आते हैं। उसने क्यों निर्भय सिंह के कुल में जन्म लिया? चंद्रभाल उसके दिल का दर्द समझता है। वह मुस्कराता है तो अंशु भी उसकी मुस्कान में सम्मिलित हो जाती है-सम्मिलित होकर सब-कुछ भूल जाती है, क्योंकि उसे भी तो चंद्रभाल के लिए मुस्कराना था, ताकि चंद्रभाल भी अपना अतीत भूल जाए। दोनों के ही मन की शांति तथा प्रसन्नताएं एक-दूसरे पर निर्भर थीं।

सुबह आती है, दिन निकलता है और ढल जाता है, शाम भी डूब जाती है, परन्तु जाने क्यों, रात नहीं टलती! रात मानो आकर ठहर जाती है।

समाप्त
 
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