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Thriller एक खून और

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गोली चलने की आवाज इतनी तेज हुई थी कि वो दूर—दूर तक प्रतिध्वनि हुई।

जो गलियारा अभी तक बिल्कुल सुनसान पड़ा हुआ था, एकाएक उस गलियारे की तरफ कई सारे कदमों के दौड़कर आने की आवाज सुनाई पड़ी।

मैं तब तक तिलक राजकोटिया के पास पहुंच चुकी थी।

मैंने देखा- गोली उसके कंधे में लगी थी और वहां से बुरी तरह खून रिस रहा था। दर्द से उसका बुरा हाल था।

“तिलक!” मैंने तिलक राजकोटिया को बुरी तरह झंझोड़ा—”तिलक!”

“म... मैं ठीक हूं।” तिलक अपना कंधा पकड़े—पकड़े कंपकंपाये स्वर में बोला—”म... मुझे कुछ नहीं हुआ।”

तभी तीन आदमी दौड़ते हुए गलियारे में आ पहुंचे।

उनमें से एक होटल का मैनेजर था और बाकी दो बैल ब्वॉय थे।

तिलक राजकोटिया की हालत देखकर उन तीनों की आंखें भी आतंक से फैल गयीं।

“किसने चलाई गोली?” होटल का मैनेजर चिल्लाकर बोला—”किसने किया यह सब?”

“म... मालूम नहीं, कौन था।” तिलक अपना कंधा पकड़े—पकड़े खड़ा हुआ—”मैं जैसे ही लिफ्ट से बाहर निकला- ब... बस फौरन धांय से गोली आकर लगी।”

“मैंने देखा था- जिसने गोली चलायी।” एकाएक मैं शुष्क स्वर में बोली।

तुरन्त मैनेजर की गर्दन मेरी तरफ घूमी।

“वह कोट—पैंट पहने आदमी था।” मैं बोली—”लेकिन वो शक्ल से बदमाश नजर आ रहा था। मैंने उसे उस तरफ भागते देखा था।”

मैंने गलियारे में दूसरी तरफ उंगली उठा दी।

तत्काल दोनों बैल ब्वॉय उसी तरफ दौड़ पड़े।

“गोली आपके कंधे के अलावा तो कहीं और नहीं लगी तिलक साहब?” मैनेजर बहुत गौर से तिलक राजकोटिया को देखता हुआ बोला।

“नहीं।”

“चलो- शुक्र है।”

तभी कुछ दौड़ते कदमों की आवाज और हमारे कानों में पड़ी, जो उसी गलियारे की तरफ आ रहे थे।

मैनेजर के चेहरे पर अब चिंता के भाव दौड़ गये।

“लगता है!” वह थोड़ा आंदोलित होकर बोला—”गोली की आवाज कुछ और लोगों ने भी सुन ली है और अब वो इसी तरफ आ रहे हैं। अगर यह बात ग्राहकों के बीच फैल गयी कि होटल में किसी बदमाश ने गोली चलाई है, तो इससे होटल की रेपुटेशन पर बुरा असर पड़ेगा।”

“फिर हम क्या करें?” मेरी आवाज में बैचेनी झलकी।

“एक तरीका है।”

“क्या?”

“आप फौरन तिलक साहब को लेकर ऊपर पैंथ हाउस में चली जाएं मैडम, मैं अभी यहां के हालात नार्मल करके ऊपर आता हूं।”

“ठीक है।”

मैंने फोरन तिलक राजकोटिया को कंधे से कसकर पकड़ लिया और फिर उसके साथ लिफ्ट में सवार हो गयी।

मैंने जंगला झटके के साथ बंद किया।

तभी दोनों बैल ब्वॉय दौड़ते हुए वहां आ पहुंचे।

“क्या हुआ?” मैनेजर ने उनसे पूछा—”क्या उस बदमाश का कहीं कुछ पता चला?”

“नहीं साहब- वह तो इस तरफ कहीं नहीं है।”

“जरूर साला भाग गया होगा।”

मैंने लिफ्ट के पैनल में लगा एक बटन दबा दिया।

तुरन्त लिफ्ट बड़ी तेजी से ऊपर की तरफ भागने लगी।

“मैं तुमसे क्या कहती थी!” लिफ्ट के स्टार्ट होते ही मैं तिलक से सम्बोधित हुई—”अब तुम्हें सावधान रहने की जरूरत है- क्योंकि सावंत भाई के इरादे ठीक नहीं हैं। वह बुरी तरह हाथ धोकर तुम्हारे पीछे पड़ चुका है।”

तिलक राजकोटिया धीरे—धीरे स्वीकृति में गर्दन हिलाने लगा।

•••
 
तिलक अब अपने शयनकक्ष में लेटा हुआ था।

दर्द के निशान अभी भी उसके चेहरे पर थे।

होटल का मैनेजर और दोनों बैल ब्वॉय भी उस समय वहीं मौजूद थे। वह थोड़ी देर पहले ही नीचे से ऊपर आये थे।

“आज तो बस बाल—बाल बचे हैं।” मैनेजर अपने कोट का ऊपर वाला बटन लगाता हुआ बोला।

वह हड़बड़ाया हुआ था।

“क्या हो गया?” तिलक ने पूछा।

“होटल के ग्राहकों के बीच यह बात पूरी तरह फैल गयी थी कि वह गोली की आवाज थी। मैं बड़ी मुश्किल से उन्हें इस बात का यकीन दिला सका कि ऐसा सोचना उनकी गलती थी। वह गोली की आवाज नहीं थी।”

“फिर किस चीज की आवाज थी वो?”

“मैंने उन्हें समझाया कि कार के बैक फायर की आवाज भी बिल्कुल ऐसी ही होती है, जैसे कोई गोली चली हो। जैसे कोई बड़ा धमामा हुआ हो। तब कहीं जाकर उन्हें यकीन हुआ। अलबत्ता एक ग्राहक तो फिर भी हंगामा करने पर तुला था।”

“क्या?”

“वो कहता था कि उसने एक आदमी के चीखने की आवाज सुनी थी। वो बड़े पुख्ता अंदाज में कह रहा था कि अगर वो कार के बैक फायर की आवाज थी, तो उसे किसी आदमी के बुरी तरह चिल्लाने की आवाज क्यों सुनाई पड़ी?”

“उससे क्या कहा तुमने?”

“मैंने उसे समझाया कि वह जरूर उसका वहम था।”

“मान गया वो इस बात को?” मैं अचरजपूर्वक बोली।

“पहले तो नहीं माना। लेकिन जब मैंने उसे यह दलील दी कि अगर होटल में सचमुच कोई गोली चली होती या वहां कोई हादसा घटा होता- तो वह नजर तो आता। दिखाई तो पड़ता। तब कहीं जाकर वह शांत हुआ। तब कहीं उसकी बोलती बंद हुई।”

“ओह!”

वाकई एक बड़ा हंगामा होने से बचा था।

होटल का मैनेजर कुर्सी खींचकर वहीं तिलक के करीब बैठ गया।

“गोली निकालने के लिए किसी डॉक्टर को बुलाया?”

“हां।” मैं बोली—”मैं एक डॉक्टर को फोन कर चुकी हूं, वह बस आता ही होगा।”

“ठीक किया।”

फिर मैनेजर बहुत गौर से तिलक राजकोटिया के कंधे के जख्म को देखने लगा।

उसमें से खून अभी भी रिस रहा था।

“हाथ तो सही हिल रहा है?”

“हां।” तिलक ने अपना हाथ हिलाया—डुलाया—”हाथ तो सही हिल रहा है, बस थोड़ा दर्द है।”

“सब ठीक हो जाएगा। शुक्र है- जो गोली सिर्फ मांस में जाकर धंसी है, अगर उसने किसी हड्डी को ब्रेक कर दिया होता, तो फिर हाथ महीनों के लिए बेकार हो जाता।”

मैंने भी आगे बढ़कर जख्म का मुआयना किया।

गोली कंधे में धंसी हुई बिल्कुल साफ नजर आ रही थी।

वह कोई एक इंच अंदर थी।

“मैं अभी आती हूं।” एकाएक मैं कुछ सोचकर बोली।

“तुम कहां जा रही हो?”

“बस अभी आयी।”

मैं शयनकक्ष से बाहर निकल गयी।

जल्द ही जब मैं वापस लौटी- तो मेरे हाथ में कोई एक मीटर लम्बी रस्सी थी।

रस्सी काफी मजबूत थी।

“इस रस्सी का आप क्या करेंगी मैडम?” मैनेजर ने पूछा।

“इसे मैं इनके कंधे पर ऊपर की तरफ कसकर बांध दूंगी।” मैं बोली—”इससे गोली का जहर पूरे शरीर में नहीं फैल पाएगा और खून का प्रवाह भी रुकेगा। जब तक डॉक्टर नहीं आ जाता- तब तक मैं समझती हूँ कि ऐसा करना बेहतर है।”

“वैरी गुड- सचमुच आपने अच्छा तरीका सोचा है।”

मैनेजर ने प्रशंसनीय नेत्रों से मेरी तरफ देखा।

जबकि मैं रस्सी लेकर तिलक की तरफ बढ़ गयी।

“आप अपना हाथ थोड़ा ऊपर उठाइए।”

तिलक ने अपना वह हाथ ऊपर उठा लिया- जिसमें गोली लगी हुई थी।

मैंने फौरन कंधे से ऊपर रस्सी कसकर बांध दी।

रस्सी कसने का फायदा भी फौरन ही सामने आया। तत्काल खून बहना बंद हो गया।

मैंने डस्टर से तिलक के कंधे पर मौजूद बाकी खून भी साफ कर दिया।

उस समय मेरी एक्टीविटी देखकर कोई नहीं कह सकता था कि मैंने ही वह गोली चलाई है।

मैंने ही तिलक राजकोटिया को उस हालत में पहुंचाया है।

•••
 
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