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कागज की किश्ती
करम चन्द हजारे ने चोरी की एम्बैसेडर कार को पंजाब बैंक की इमारत के ऐन सामने लाकर रोका। उसके सारे जिस्म पर पसीने के धारे बह रहे थे जिनकी वजह से उसकी शोफर की वर्दी भीगी जा रही थी। उसके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ जिस गोंद जैसे पेस्ट से चिपकी हुई थीं, वह उसके लिए बहुत असुविधा पैदा कर रहा था और उसका जी बार-बार खुजलाने को — बल्कि दाढ़ी नोच देने को — करने लगता था।
करम चन्द हजारे एक मुश्किल से इक्कीस साल का, दानवाकार व्यक्ति था। अपने आकार की वजह से उसकी ख्वाहिश होती थी कि लोग उसे करम चन्द पहलवान के नाम से पुकारें लेकिन उसकी ख्वाहिश के खिलाफ अधिकतर लोग उसे ‘लल्लू’ कहकर पुकारते थे।
एम्बैसेडर की पिछली सीट पर उसी जैसी नकली दाढ़ी-मूंछ और पगड़ी से सुसज्जित दो ‘सरदार’ बैठे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि करम चन्द की शोफर जैसी वर्दी की जगह वे शानदार सूट पहने थे और गोद में कीमती ब्रीफकेस रखे हुए थे।
उनमें से एक एंथोनी फ्रांकोजा था।
एंथोनी एक कोई तीस साल का क्रिश्चियन नौजवान था और एक खतरनाक गैंगस्टर था। वह मुम्बई के धारावी नामक इलाके का बेताज बादशाह कहलाता था। मुम्बई के ही नहीं बल्कि मुम्बई से बाहर के भी बड़े-बड़े दादाओं से उसके ताल्लुकात बताये जाते थे। बैंक लूटना उसका पसन्दीदा धन्धा था, उसके अलावा स्मगलिंग, डोप पैडलिंग जैसे कुकर्मों में भी उसका पूरा-पूरा दख्ल था। धारावी के इलाके में टोनी दादा के नाम से उसे बच्चा-बच्चा जानता था और उसका खौफ खाता था।
उसकी बगल में बैठे दूसरे व्यक्ति का नाम गुलफाम अली था। उम्र में वह एंथोनी से पांच-छः साल बड़ा था। वह भी एंथोनी जैसा ही खतरनाक दादा था और कहा जाता था कि दर्जनों खून कर चुका था। धारावी के गन्दे नाले से जब भी कोई लाश बरामद होती थी तो सबसे पहले वहां के बाशिन्दों का ध्यान गुलफाम अली की तरफ ही जाता था। कत्ल के लिए उसका पसन्दीदा हथियार नाईयों द्वारा हजामत के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला उस्तुरा था जिसे वह हमेशा खूब धार देकर रखता था।
चोरी की एम्बैसेडर में सवार होकर कल्याण के उस बैंक को लूटने की नीयत से जिस वक्त वे तीनों वहां पहुंचे थे, उस वक्त बैंक खुलने के वक्त में अभी पांच मिनट बाकी थे।
बैंक के दरवाजे पर तैनात रायफलधारी गार्ड ने संदिग्ध भाव से एम्बैसेडर की तरफ देखा लेकिन जब उसे गाड़ी की नम्बर प्लेट पर ‘पंजाब बैंक स्टाफ कार’ लिखा दिखाई दिया तो उसके चेहरे पर से सन्देह के बादल छंट गए।
हाथों में ब्रीफकेस सम्भाले दो बड़े रोबीले सरदार गाड़ी से बाहर निकले।
बैंक के दरवाजे पर बैंक के कुछ उतावले ग्राहक जमा थे जिन्हें गार्ड ‘अभी टाइम नहीं हुआ’ कहकर भीतर जाने से रोक रहा था। उन लोगों के बीच में से रास्ता बनाते वे दोनों सरदार दरवाजे के पास पहुंचे।
“मैनेजर साहब आ गए?” — एंथोनी ने अधिकारपूर्ण स्वर में पूछा।
“जी हां।” — गार्ड के स्वर में अदब का पुट अपने आप ही आ गया।
“अभी जी.एम. साहब यहां पहुंचने वाले हैं। जरा आंखें खुली रखना। सफेद कोन्टेसा पर निगाह रखना।”
“जी, साहब।” — गार्ड एक क्षण हिचकिचाया और फिर बोला — “साहब, आप...”
लेकिन उसका वाक्य पूरा हो पाने से पहले ही ‘साहब’ हाथ की एक हरकत से उसे परे धकेलता भीतर दाखिल हो चुका था।
उसके पीछे-पीछे गुलफाम अली ने भी भीतर कदम रखा।
दोनों लम्बे डग भरते मैनेजर के केबिन की तरफ बढ़े।
बैंक का सारा स्टाफ ड्यूटी पर आ चुका था लेकिन अपनी सीट पर बैठने का ख्वाहिशमद अभी कोई भी नहीं दिखाई दे रहा था।
दोनों मैनेजर के केबिन में दाखिल हुए।
मैनेजर के केबिन को बाकी हाल से अलग करने वाली पार्टीशन में एक विशाल, आयताकार शीशा लगा हुआ था जिसमें से मैनेजर के आधे से अधिक केबिन को देखा जा सकता था।
बाहर गेट पर खड़े गार्ड ने देखा कि देखने में तनिक अधिक आयु का लगने वाला सरदार मैनेजर की मेज के सामने बैठा था। उसने अपना ब्रीफकेस मेज पर सीधा खड़ा करके इस प्रकार रख लिया कि उसका दायां हाथ ब्रीफकेस की ओट में हो गया था और गार्ड को दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन अजीब बात गार्ड को यह न लगी, अजीब बात उसे यह लगी कि नौजवान सरदार अपने साथी के पहलू में बैठने के स्थान पर विशाल मेज का घेरा काट कर मैनेजर के सिर पर जा खड़ा हुआ था।
जरूर मैनेजर साहब का कोई जिगरी है। — गार्ड ने मन ही मन सोचा।
फिर गार्ड ने मैनेजर की गर्दन धीरे से सहमति में हिलती देखी। फिर वह अपने स्थान से उठा और भारी कदमों से चलता दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजा ठोस लकड़ी का था, बन्द था इसलिए थोड़ी देर के लिए मैनेजर उसकी दृष्टि से ओझल हो गया। फिर दरवाजा तनिक खुला और मैनेजर ने खुले दरवाजे से बाहर कदम रखने के स्थान पर केवल अपना सिर बाहर निकाला।
“पीताम्बर!” — उसने गार्ड को आवाज लगाई।
“जी, साहब!” — पीताम्बर तत्पर स्वर में बोला।
“दरवाजा भीतर से बन्द कर दो और जरा इधर आओ।”
“जी, साहब।”
गार्ड ने विरोध करते ग्राहकों के मुंह पर दरवाजा बन्द कर दिया और केबिन की तरफ बढ़ा। उसने देखा दरवाजा पहले की तरह बन्द हो गया था और मैनेजर वापिस अपनी कुर्सी पर जा बैठा था। नौजवान सरदार अब भी उसके सिर पर खड़ा था और मुस्करा रहा था।
गार्ड को मैनेजर के चेहरे पर मुस्कराहट के बदले मुस्कराहट न दिखाई दी।
दरवाजा बन्द होने की वजह से अब कुर्सी पर बैठा अधेड़ सरदार उसे नहीं दिखाई दे रहा था।
उसने बड़े अदब से दरवाजा खोला। भीतर के लिए उठते कदम के साथ उसकी निगाह सामने पड़ी।
कुर्सी पर बैठा सरदार वहां से गायब था।
उसने भीतर कदम रखा।
दरवाजा एक झटके से उसके पीछे बन्द हो गया, ठण्डे लोहे का स्पर्श उसकी कनपटी से हुआ और कोई सांप की तरह उसके कान में फुंफकारा — “खबरदार! जरा भी आवाज निकाली तो गोली।”
गार्ड को जैसे सांप सूंघ गया।
“रायफल गिरा दो।”
गार्ड हिचकिचाया। वह स्पर्श से ही समझ गया था कि उसकी कनपटी पर जो ठण्डा लोहा छू रहा था, वह रिवॉल्वर की नाल थी। वह मन ही मन अपने आपको कोस रहा था। कितनी आसानी से वह बेवकूफ बना लिया गया था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे बेवकूफ बनाना इतना आसान साबित होगा।
“इसे अपनी जान प्यारी नहीं मालूम होती।” — मैनेजर के सिर पर सवार खड़ा एंथोनी कहरभरे स्वर में बोला — “एक सैकेण्ड में इसने रायफल न फेंकी तो पहली गोली मैं तुझे मारूंगा।”
तब पीताम्बर ने देखा कि मैनेजर के सिर पर खड़े सरदार का दायां हाथ उसके कोट की जेब में था। जेब में भीतर की तरफ एक छेद था जिसमें से रिवॉल्वर की नाल बाहर झांक रही थी। नाल मैनेजर की छाती से मुश्किल से एक फुट दूर थी और उसका रुख सीधे मैनेजर के दिल की तरफ था।
“पीताम्बर!” — मैनेजर घुटे स्वर में बोला — “रायफल गिरा दे।”
तीव्र अनिच्छापूर्ण भाव से पीताम्बर ने रायफल अपनी उंगलियों में से निकल जाने दी। रायफल हल्की सी धप्प की आवाज के साथ कार्पेट बिछे फर्श पर गिरी।
गुलफाम अली ने अपने पांव की ठोकर से रायफल परे सरका दी और खुद भी गार्ड से थोड़ा परे हट गया।
“अब तेरे कू बाहर जाने का है।” — गुलफाम अली पूवर्वत् सांप की तरह फुंफकारता बोला — “ये याद रख के बाहर जाने का है कि तेरे साहब का लाइफ तेरे हाथ में है। बरोबर?”
गार्ड ने बड़ी कठिनाई से सहमति में सिर हिलाया।
“तेरे कू बाहर जा के स्टाफ कू बोलने का है कि साहब अक्खे स्टाफ की इम्पोरटेन्ट मीटिंग बुलायेला है। सब कू अब्बी का अब्बी इधर आने कू मांगता है। बरोबर?”
गार्ड ने फिर सहमति में सिर हिलाया।
“मैं तेरे को एक मिनट में लौट के आना मांगता है। तेरे कू बी और बाकी लोगों कू बी। एक सैकेण्ड भी ज्यास्ती होयेंगा तो तेरा साहब इदर मरा पड़ा होयेंगा। बरोबर?”
गार्ड ने सहमति में सिर हिलाया।
“मूंडी मत हिला। जुबान से बोल।”
“हं-हां।” — गार्ड फंसे स्वर में बोला।
“क्या हां?”
“मेरे को बाहर जाने का है और सारे स्टाफ को मीटिंग के वास्ते इधर बुलाकर लाने का है।”
“इम्पोरटेन्ट कर के मीटिंग का वास्ते। हैड आफिस से दो साहब” — गुलफाम अली ने अपनी और एंथोनी की तरफ इशारा किया — “आयेला है। इस वास्ते।”
“हां।”
“हिल।”
गार्ड दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। अब सरदार की भाषा सुनकर ही वह समझ गया था कि सरदार नकली था, उसकी दाढ़ी, मूंछ, पगड़ी वगैरह सब नकली था।
गुलफाम अली ने रायफल उठाकर कार्पेट के नीचे सरका दी और गार्ड के पीछे दरवाजे के दहाने पर पहुंचा। रिवॉल्वर वाला हाथ उसने अपने कोट की जेब में डाल लिया।
गार्ड मैनेजर की जान खतरे में डालकर चिल्लाने का इरादा कर रहा था लेकिन अब अपनी भी जान को खतरा पाकर उसने वह इरादा छोड़ दिया। वह बड़ी आसानी से शूट किया जा सकता था।
उसने डकैतों का सन्देशा स्टाफ के सामने दोहराया।
सब लोग मैनेजर के केबिन की तरफ बढ़ने लगे। प्रवेश द्वार भीतर से बन्द किये जाने की वजह से जो एकाध जना हैरान हो रहा था, उसने यही समझा कि ऐसा उस मीटिंग की वजह से किया गया था जिसकी अभी-अभी पीताम्बर ने घोषणा की थी।
वह छोटी सी ब्रांच थी जिसमें एक चपरासी और गार्ड को भी मिलाकर कुल जमा नौ आदमी थे जो कि बड़ी आसानी से मैनेजर के केबिन में समा गए।
वहां उन्होंने अपने आपको आगे और पीछे दोनों तरफ से साइलेन्सर लगी खतरनाक रिवॉल्वरों से कवर हुआ पाया।
सबको जैसे सांप सूंघ गया।
“इन्हें कह” — एंथोनी बोला — “कि सब औंधे मुंह फर्श पर लेट जायें।”
भय से थर-थर कांपते मैनेजर के पास उसके आदेश को दोहरा देने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।
“सेफ की चाबियां!”
मैनेजर ने मेज के दराज से चाबियां निकालकर उसे सौंप दीं।
एंथोनी ने चाबियां गुलफाम अली की तरफ उछाल दीं।
गुलफाम अली चाबियां लेकर केबिन के बाहर निकल गया।
“अब तू भी। फर्श पर। औंधे मुंह।”
मैनेजर ने आदेश का पालन किया।
“कोई हरकत नहीं मांगता। जो कोई भी सिर उठायेंगा उसे गोली।”
कोई कुछ न बोला।
सतर्कता की प्रतिमूर्ति बना एंथोनी उनके सिर पर खड़ा रहा।
थोड़ी देर बाद गुलफाम अली वापिस लौटा। वह ब्रीफकेस के अलावा प्लास्टिक के दो भरे हुए बैग सम्भाले था। उसने एंथोनी को इशारा किया।
एंथोनी दरवाजे के करीब पहुंचा। उसने एक बैग गुलफाम के हाथ से ले लिया। गुलफाम ने कार्पेट के नीचे से रायफल निकालकर बगल में दबा ली।
“पांच मिनट और कोई सिर न उठाये।” — फिर वो औंधे पड़े लोगों से अपने क्रूरतम स्वर में सम्बोधित हुआ — “दरवाजे के हैंडल के साथ हम एक टाइम बम की तार जोड़कर जा रहे हैं। पांच मिनट से पहले किसी ने हैंडल को घुमाने की कोशिश की तो टाइम बम फट जायेंगा और सारी इमारत भक्क से उड़ जायेंगी। पांच मिनट बाद बम अपने आप डिस्कनेक्ट हो जायेंगा। जिसे अपनी और अपने साथियों की जान प्यारी न हो, वही पांच मिनट से पहले उठकर हैंडल को छुए।”
कोई कुछ न बोला।
दोनों बाहर निकले। एंथोनी ने अपने पीछे केबिन का दरवाजा बन्द कर दिया। गुलफाम ने रायफल को दरवाजे के बाहर काउन्टर के पीछे उछाल दिया।
सावधानी से वे मुख्यद्वार की तरफ बढ़े।
अभी वे दरवाजे से दूर ही थे कि एकाएक लम्बे काउन्टर के परले सिरे पर स्थित टायलेट का दरवाजा खुला और एक आदमी ने बाहर कदम रखा। उसने हाथों में रिवॉल्वर, प्लास्टिक के बैग और ब्रीफकेस लिए दो सरदारों को दरवाजे की तरफ बढ़ते देखा, फिर हाल के उजड़ेपन और मुकम्मल सन्नाटे पर गौर किया तो उसका मुंह अपने आप ही खुल गया।
प्लास्टिक का बैग एंथोनी के रिवॉल्वर वाले हाथ में था। उसने बैग जमीन पर गिर जाने दिया और चिल्लाने को तत्पर उस आदमी पर दो फायर किये।
निशब्द पहली गोली जाकर उसके कन्धे से कहीं टकराई। वह फिरकनी की तरह घूम गया।
दूसरी गोली उसकी कनपटी को हवा देती हुई गुजर गई। एंथोनी ने फर्श पर गिरा बैग उठाया और दरवाजे की तरफ लपका।
दरवाजा खोलने से पहले उन्होंने रिवॉल्वरें जेब में डाल लीं।
“यह क्या तमाशा है?” — बाहर कोई झुंझलाहटभरे स्वर में बोला — “पांच मिनट ऊपर हो गए टाइम से, अभी तक बैंक नहीं खुला।”
“हम कब से इन्तजार कर रहे हैं।” — कोई और बोला।
“आज बैंक नहीं खुलेगा।” — एंथोनी रोबीले स्वर में बोला — “बैक के चेयरमैन की डैथ हो गई है। उसके सोग में आज बैंक बन्द रहेगा।”
उसने दरवाजा बन्द करके उसे बाहर से कुन्डी लगा दी।
लोगों को विरोध में अनाप-शनाप बोलता छोड़कर वे कार की ओर लपके।
तभी भीतर से दरवाजा पीटा जाने लगा।
“पकड़ो! पकड़ो!” — भीतर से शोर उठा — “डाका पड़ गया! पकड़ो!”
प्रत्यक्षतः भीतर मौजूद लोगों में से कोई बम की धमकी में नहीं आया था।
भीड़ की तवज्जो फौरन दोनों सरदारों की तरफ गई।
दूर कहीं फ्लाइंग स्क्वायड के सायरन की आवाज गूंजी।
एम्बैसेडर की ड्राइविंग सीट पर बैठे लल्लू ने बड़ी फुर्ती से अपने स्थान पर बैठे-बैठे ही हाथ बढ़ाकर उनकी तरफ के दोनों दरवाजे खोल दिये।
उनके भीतर बैठने से पहले ही कार हरकत में थी।
लल्लू ने एक बार जोर से एक्सीलेटर दिया और ब्रेक पर पांव मारा तो कार के दोनों झूलते दरवाजे अपने आप ही भड़ाक की आवाज के साथ बन्द हो गए। फिर कार तोप से छूटे गोले की तरह वहां से भागी।
करम चन्द हजारे ने चोरी की एम्बैसेडर कार को पंजाब बैंक की इमारत के ऐन सामने लाकर रोका। उसके सारे जिस्म पर पसीने के धारे बह रहे थे जिनकी वजह से उसकी शोफर की वर्दी भीगी जा रही थी। उसके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ जिस गोंद जैसे पेस्ट से चिपकी हुई थीं, वह उसके लिए बहुत असुविधा पैदा कर रहा था और उसका जी बार-बार खुजलाने को — बल्कि दाढ़ी नोच देने को — करने लगता था।
करम चन्द हजारे एक मुश्किल से इक्कीस साल का, दानवाकार व्यक्ति था। अपने आकार की वजह से उसकी ख्वाहिश होती थी कि लोग उसे करम चन्द पहलवान के नाम से पुकारें लेकिन उसकी ख्वाहिश के खिलाफ अधिकतर लोग उसे ‘लल्लू’ कहकर पुकारते थे।
एम्बैसेडर की पिछली सीट पर उसी जैसी नकली दाढ़ी-मूंछ और पगड़ी से सुसज्जित दो ‘सरदार’ बैठे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि करम चन्द की शोफर जैसी वर्दी की जगह वे शानदार सूट पहने थे और गोद में कीमती ब्रीफकेस रखे हुए थे।
उनमें से एक एंथोनी फ्रांकोजा था।
एंथोनी एक कोई तीस साल का क्रिश्चियन नौजवान था और एक खतरनाक गैंगस्टर था। वह मुम्बई के धारावी नामक इलाके का बेताज बादशाह कहलाता था। मुम्बई के ही नहीं बल्कि मुम्बई से बाहर के भी बड़े-बड़े दादाओं से उसके ताल्लुकात बताये जाते थे। बैंक लूटना उसका पसन्दीदा धन्धा था, उसके अलावा स्मगलिंग, डोप पैडलिंग जैसे कुकर्मों में भी उसका पूरा-पूरा दख्ल था। धारावी के इलाके में टोनी दादा के नाम से उसे बच्चा-बच्चा जानता था और उसका खौफ खाता था।
उसकी बगल में बैठे दूसरे व्यक्ति का नाम गुलफाम अली था। उम्र में वह एंथोनी से पांच-छः साल बड़ा था। वह भी एंथोनी जैसा ही खतरनाक दादा था और कहा जाता था कि दर्जनों खून कर चुका था। धारावी के गन्दे नाले से जब भी कोई लाश बरामद होती थी तो सबसे पहले वहां के बाशिन्दों का ध्यान गुलफाम अली की तरफ ही जाता था। कत्ल के लिए उसका पसन्दीदा हथियार नाईयों द्वारा हजामत के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला उस्तुरा था जिसे वह हमेशा खूब धार देकर रखता था।
चोरी की एम्बैसेडर में सवार होकर कल्याण के उस बैंक को लूटने की नीयत से जिस वक्त वे तीनों वहां पहुंचे थे, उस वक्त बैंक खुलने के वक्त में अभी पांच मिनट बाकी थे।
बैंक के दरवाजे पर तैनात रायफलधारी गार्ड ने संदिग्ध भाव से एम्बैसेडर की तरफ देखा लेकिन जब उसे गाड़ी की नम्बर प्लेट पर ‘पंजाब बैंक स्टाफ कार’ लिखा दिखाई दिया तो उसके चेहरे पर से सन्देह के बादल छंट गए।
हाथों में ब्रीफकेस सम्भाले दो बड़े रोबीले सरदार गाड़ी से बाहर निकले।
बैंक के दरवाजे पर बैंक के कुछ उतावले ग्राहक जमा थे जिन्हें गार्ड ‘अभी टाइम नहीं हुआ’ कहकर भीतर जाने से रोक रहा था। उन लोगों के बीच में से रास्ता बनाते वे दोनों सरदार दरवाजे के पास पहुंचे।
“मैनेजर साहब आ गए?” — एंथोनी ने अधिकारपूर्ण स्वर में पूछा।
“जी हां।” — गार्ड के स्वर में अदब का पुट अपने आप ही आ गया।
“अभी जी.एम. साहब यहां पहुंचने वाले हैं। जरा आंखें खुली रखना। सफेद कोन्टेसा पर निगाह रखना।”
“जी, साहब।” — गार्ड एक क्षण हिचकिचाया और फिर बोला — “साहब, आप...”
लेकिन उसका वाक्य पूरा हो पाने से पहले ही ‘साहब’ हाथ की एक हरकत से उसे परे धकेलता भीतर दाखिल हो चुका था।
उसके पीछे-पीछे गुलफाम अली ने भी भीतर कदम रखा।
दोनों लम्बे डग भरते मैनेजर के केबिन की तरफ बढ़े।
बैंक का सारा स्टाफ ड्यूटी पर आ चुका था लेकिन अपनी सीट पर बैठने का ख्वाहिशमद अभी कोई भी नहीं दिखाई दे रहा था।
दोनों मैनेजर के केबिन में दाखिल हुए।
मैनेजर के केबिन को बाकी हाल से अलग करने वाली पार्टीशन में एक विशाल, आयताकार शीशा लगा हुआ था जिसमें से मैनेजर के आधे से अधिक केबिन को देखा जा सकता था।
बाहर गेट पर खड़े गार्ड ने देखा कि देखने में तनिक अधिक आयु का लगने वाला सरदार मैनेजर की मेज के सामने बैठा था। उसने अपना ब्रीफकेस मेज पर सीधा खड़ा करके इस प्रकार रख लिया कि उसका दायां हाथ ब्रीफकेस की ओट में हो गया था और गार्ड को दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन अजीब बात गार्ड को यह न लगी, अजीब बात उसे यह लगी कि नौजवान सरदार अपने साथी के पहलू में बैठने के स्थान पर विशाल मेज का घेरा काट कर मैनेजर के सिर पर जा खड़ा हुआ था।
जरूर मैनेजर साहब का कोई जिगरी है। — गार्ड ने मन ही मन सोचा।
फिर गार्ड ने मैनेजर की गर्दन धीरे से सहमति में हिलती देखी। फिर वह अपने स्थान से उठा और भारी कदमों से चलता दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजा ठोस लकड़ी का था, बन्द था इसलिए थोड़ी देर के लिए मैनेजर उसकी दृष्टि से ओझल हो गया। फिर दरवाजा तनिक खुला और मैनेजर ने खुले दरवाजे से बाहर कदम रखने के स्थान पर केवल अपना सिर बाहर निकाला।
“पीताम्बर!” — उसने गार्ड को आवाज लगाई।
“जी, साहब!” — पीताम्बर तत्पर स्वर में बोला।
“दरवाजा भीतर से बन्द कर दो और जरा इधर आओ।”
“जी, साहब।”
गार्ड ने विरोध करते ग्राहकों के मुंह पर दरवाजा बन्द कर दिया और केबिन की तरफ बढ़ा। उसने देखा दरवाजा पहले की तरह बन्द हो गया था और मैनेजर वापिस अपनी कुर्सी पर जा बैठा था। नौजवान सरदार अब भी उसके सिर पर खड़ा था और मुस्करा रहा था।
गार्ड को मैनेजर के चेहरे पर मुस्कराहट के बदले मुस्कराहट न दिखाई दी।
दरवाजा बन्द होने की वजह से अब कुर्सी पर बैठा अधेड़ सरदार उसे नहीं दिखाई दे रहा था।
उसने बड़े अदब से दरवाजा खोला। भीतर के लिए उठते कदम के साथ उसकी निगाह सामने पड़ी।
कुर्सी पर बैठा सरदार वहां से गायब था।
उसने भीतर कदम रखा।
दरवाजा एक झटके से उसके पीछे बन्द हो गया, ठण्डे लोहे का स्पर्श उसकी कनपटी से हुआ और कोई सांप की तरह उसके कान में फुंफकारा — “खबरदार! जरा भी आवाज निकाली तो गोली।”
गार्ड को जैसे सांप सूंघ गया।
“रायफल गिरा दो।”
गार्ड हिचकिचाया। वह स्पर्श से ही समझ गया था कि उसकी कनपटी पर जो ठण्डा लोहा छू रहा था, वह रिवॉल्वर की नाल थी। वह मन ही मन अपने आपको कोस रहा था। कितनी आसानी से वह बेवकूफ बना लिया गया था। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे बेवकूफ बनाना इतना आसान साबित होगा।
“इसे अपनी जान प्यारी नहीं मालूम होती।” — मैनेजर के सिर पर सवार खड़ा एंथोनी कहरभरे स्वर में बोला — “एक सैकेण्ड में इसने रायफल न फेंकी तो पहली गोली मैं तुझे मारूंगा।”
तब पीताम्बर ने देखा कि मैनेजर के सिर पर खड़े सरदार का दायां हाथ उसके कोट की जेब में था। जेब में भीतर की तरफ एक छेद था जिसमें से रिवॉल्वर की नाल बाहर झांक रही थी। नाल मैनेजर की छाती से मुश्किल से एक फुट दूर थी और उसका रुख सीधे मैनेजर के दिल की तरफ था।
“पीताम्बर!” — मैनेजर घुटे स्वर में बोला — “रायफल गिरा दे।”
तीव्र अनिच्छापूर्ण भाव से पीताम्बर ने रायफल अपनी उंगलियों में से निकल जाने दी। रायफल हल्की सी धप्प की आवाज के साथ कार्पेट बिछे फर्श पर गिरी।
गुलफाम अली ने अपने पांव की ठोकर से रायफल परे सरका दी और खुद भी गार्ड से थोड़ा परे हट गया।
“अब तेरे कू बाहर जाने का है।” — गुलफाम अली पूवर्वत् सांप की तरह फुंफकारता बोला — “ये याद रख के बाहर जाने का है कि तेरे साहब का लाइफ तेरे हाथ में है। बरोबर?”
गार्ड ने बड़ी कठिनाई से सहमति में सिर हिलाया।
“तेरे कू बाहर जा के स्टाफ कू बोलने का है कि साहब अक्खे स्टाफ की इम्पोरटेन्ट मीटिंग बुलायेला है। सब कू अब्बी का अब्बी इधर आने कू मांगता है। बरोबर?”
गार्ड ने फिर सहमति में सिर हिलाया।
“मैं तेरे को एक मिनट में लौट के आना मांगता है। तेरे कू बी और बाकी लोगों कू बी। एक सैकेण्ड भी ज्यास्ती होयेंगा तो तेरा साहब इदर मरा पड़ा होयेंगा। बरोबर?”
गार्ड ने सहमति में सिर हिलाया।
“मूंडी मत हिला। जुबान से बोल।”
“हं-हां।” — गार्ड फंसे स्वर में बोला।
“क्या हां?”
“मेरे को बाहर जाने का है और सारे स्टाफ को मीटिंग के वास्ते इधर बुलाकर लाने का है।”
“इम्पोरटेन्ट कर के मीटिंग का वास्ते। हैड आफिस से दो साहब” — गुलफाम अली ने अपनी और एंथोनी की तरफ इशारा किया — “आयेला है। इस वास्ते।”
“हां।”
“हिल।”
गार्ड दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। अब सरदार की भाषा सुनकर ही वह समझ गया था कि सरदार नकली था, उसकी दाढ़ी, मूंछ, पगड़ी वगैरह सब नकली था।
गुलफाम अली ने रायफल उठाकर कार्पेट के नीचे सरका दी और गार्ड के पीछे दरवाजे के दहाने पर पहुंचा। रिवॉल्वर वाला हाथ उसने अपने कोट की जेब में डाल लिया।
गार्ड मैनेजर की जान खतरे में डालकर चिल्लाने का इरादा कर रहा था लेकिन अब अपनी भी जान को खतरा पाकर उसने वह इरादा छोड़ दिया। वह बड़ी आसानी से शूट किया जा सकता था।
उसने डकैतों का सन्देशा स्टाफ के सामने दोहराया।
सब लोग मैनेजर के केबिन की तरफ बढ़ने लगे। प्रवेश द्वार भीतर से बन्द किये जाने की वजह से जो एकाध जना हैरान हो रहा था, उसने यही समझा कि ऐसा उस मीटिंग की वजह से किया गया था जिसकी अभी-अभी पीताम्बर ने घोषणा की थी।
वह छोटी सी ब्रांच थी जिसमें एक चपरासी और गार्ड को भी मिलाकर कुल जमा नौ आदमी थे जो कि बड़ी आसानी से मैनेजर के केबिन में समा गए।
वहां उन्होंने अपने आपको आगे और पीछे दोनों तरफ से साइलेन्सर लगी खतरनाक रिवॉल्वरों से कवर हुआ पाया।
सबको जैसे सांप सूंघ गया।
“इन्हें कह” — एंथोनी बोला — “कि सब औंधे मुंह फर्श पर लेट जायें।”
भय से थर-थर कांपते मैनेजर के पास उसके आदेश को दोहरा देने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था।
“सेफ की चाबियां!”
मैनेजर ने मेज के दराज से चाबियां निकालकर उसे सौंप दीं।
एंथोनी ने चाबियां गुलफाम अली की तरफ उछाल दीं।
गुलफाम अली चाबियां लेकर केबिन के बाहर निकल गया।
“अब तू भी। फर्श पर। औंधे मुंह।”
मैनेजर ने आदेश का पालन किया।
“कोई हरकत नहीं मांगता। जो कोई भी सिर उठायेंगा उसे गोली।”
कोई कुछ न बोला।
सतर्कता की प्रतिमूर्ति बना एंथोनी उनके सिर पर खड़ा रहा।
थोड़ी देर बाद गुलफाम अली वापिस लौटा। वह ब्रीफकेस के अलावा प्लास्टिक के दो भरे हुए बैग सम्भाले था। उसने एंथोनी को इशारा किया।
एंथोनी दरवाजे के करीब पहुंचा। उसने एक बैग गुलफाम के हाथ से ले लिया। गुलफाम ने कार्पेट के नीचे से रायफल निकालकर बगल में दबा ली।
“पांच मिनट और कोई सिर न उठाये।” — फिर वो औंधे पड़े लोगों से अपने क्रूरतम स्वर में सम्बोधित हुआ — “दरवाजे के हैंडल के साथ हम एक टाइम बम की तार जोड़कर जा रहे हैं। पांच मिनट से पहले किसी ने हैंडल को घुमाने की कोशिश की तो टाइम बम फट जायेंगा और सारी इमारत भक्क से उड़ जायेंगी। पांच मिनट बाद बम अपने आप डिस्कनेक्ट हो जायेंगा। जिसे अपनी और अपने साथियों की जान प्यारी न हो, वही पांच मिनट से पहले उठकर हैंडल को छुए।”
कोई कुछ न बोला।
दोनों बाहर निकले। एंथोनी ने अपने पीछे केबिन का दरवाजा बन्द कर दिया। गुलफाम ने रायफल को दरवाजे के बाहर काउन्टर के पीछे उछाल दिया।
सावधानी से वे मुख्यद्वार की तरफ बढ़े।
अभी वे दरवाजे से दूर ही थे कि एकाएक लम्बे काउन्टर के परले सिरे पर स्थित टायलेट का दरवाजा खुला और एक आदमी ने बाहर कदम रखा। उसने हाथों में रिवॉल्वर, प्लास्टिक के बैग और ब्रीफकेस लिए दो सरदारों को दरवाजे की तरफ बढ़ते देखा, फिर हाल के उजड़ेपन और मुकम्मल सन्नाटे पर गौर किया तो उसका मुंह अपने आप ही खुल गया।
प्लास्टिक का बैग एंथोनी के रिवॉल्वर वाले हाथ में था। उसने बैग जमीन पर गिर जाने दिया और चिल्लाने को तत्पर उस आदमी पर दो फायर किये।
निशब्द पहली गोली जाकर उसके कन्धे से कहीं टकराई। वह फिरकनी की तरह घूम गया।
दूसरी गोली उसकी कनपटी को हवा देती हुई गुजर गई। एंथोनी ने फर्श पर गिरा बैग उठाया और दरवाजे की तरफ लपका।
दरवाजा खोलने से पहले उन्होंने रिवॉल्वरें जेब में डाल लीं।
“यह क्या तमाशा है?” — बाहर कोई झुंझलाहटभरे स्वर में बोला — “पांच मिनट ऊपर हो गए टाइम से, अभी तक बैंक नहीं खुला।”
“हम कब से इन्तजार कर रहे हैं।” — कोई और बोला।
“आज बैंक नहीं खुलेगा।” — एंथोनी रोबीले स्वर में बोला — “बैक के चेयरमैन की डैथ हो गई है। उसके सोग में आज बैंक बन्द रहेगा।”
उसने दरवाजा बन्द करके उसे बाहर से कुन्डी लगा दी।
लोगों को विरोध में अनाप-शनाप बोलता छोड़कर वे कार की ओर लपके।
तभी भीतर से दरवाजा पीटा जाने लगा।
“पकड़ो! पकड़ो!” — भीतर से शोर उठा — “डाका पड़ गया! पकड़ो!”
प्रत्यक्षतः भीतर मौजूद लोगों में से कोई बम की धमकी में नहीं आया था।
भीड़ की तवज्जो फौरन दोनों सरदारों की तरफ गई।
दूर कहीं फ्लाइंग स्क्वायड के सायरन की आवाज गूंजी।
एम्बैसेडर की ड्राइविंग सीट पर बैठे लल्लू ने बड़ी फुर्ती से अपने स्थान पर बैठे-बैठे ही हाथ बढ़ाकर उनकी तरफ के दोनों दरवाजे खोल दिये।
उनके भीतर बैठने से पहले ही कार हरकत में थी।
लल्लू ने एक बार जोर से एक्सीलेटर दिया और ब्रेक पर पांव मारा तो कार के दोनों झूलते दरवाजे अपने आप ही भड़ाक की आवाज के साथ बन्द हो गए। फिर कार तोप से छूटे गोले की तरह वहां से भागी।