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Thriller विक्षिप्त हत्यारा

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मेहता रोड की 115 नम्बर इमारत के सामने अन्धेरा था । सुनील इमारत की लाबी में प्रविष्ट हो गया । भीतर सीढियों के पास कई नेम प्लटें लगी हुई थीं, उन में से एक के अनुसार ग्यारह नम्बर फ्लैट चौथी मंजिल पर था और उसमें फ्लोरी ही रहती थी ।

सुनील सीढियां तय करता हुआ चौथी मंजिल पर पहुंचा ।

फ्लोरी के फ्लैट का दरवाजा आधा खुला हुआ था । भीतर बत्तियां जल रही थीं ।

सुनील ने बाहरी द्वार की पैनल में लगे घन्टी के बदन को दबाया।

भीतर कोई द्वार खुलने की आवाज आई । फिर एक आदमी अधखुले दरवाजे पर प्रकट हुआ । उसने प्रश्नसूचक नेत्रों से सुनील की ओर देखा ।

“फ्लोरी है ?” - सुनील ने पूछा ।

“एक मिनट ।” - वह आदमी बोला, वह उल्टे पांव वापिस लौट गया ।

“कोई आदमी फ्लोरी को पूछ रहा है ।” - सुनील को भीतर से उसी आदमी का स्वर सुनाई दिया ।

“उसे भीतर बुलाओ ।” - उत्तर में एक घुटी हुई आवाज सुनाई दी ।

अगले ही क्षण वह आदमी दुबारा द्वार पर प्रकट हुआ ।

“भीतर आईये ।” - वह बोला ।

“फ्लोरी है ?” - सुनील ने पूछा ।

“भीतर तशरीफ लाइये ।”

सुनील हिचकिचाता हुआ भीतर प्रविष्ट हुआ ।

उस आदमी ने आगे बढकर एक दरवाजा खोला और सुनील को भीतर प्रविष्ट होने का संकेत किया ।

सुनील आगे बढा ।

चौखट के पास पहुंचते ही वह ठिठक गया । भीतर कमरे में जो पहली सूरत उसे दिखाई दी थी वह पुलिस इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल की थी, उसने उसे देखा और फिर उसके मुंह से अपने आप निकल गया - “ओह, नो । नाट यू अगेन ।”

सुनील अनिश्चित-सा वहीं खड़ा रहा ।

“भीतर आओ ।” - प्रभूदयाल ने आदेश दिया ।

सुनील भारी कदमों से कमरे में प्रविष्ट हो गया । उस ने देखा भीतर प्रभूदयाल के अतिरिक्त तीन सिपाही भी मौजूद थे । प्रभूदयाल की यूनीफार्म की सिलवटें दोपहर से दुगनी हो गई थीं । उसके चेहरे पर थकान के गहरे चिन्ह थे । आंखें अनिद्रा की वजह से लाल हो चुकी थीं । सुनील जानता था कि ऐसी स्थिति में प्रभूदयाल से होशियारी दिखाना भूखे शेर को छेड़ने जितना खतरनाक साबित हो सकता था ।

“और तुम तो कहते थे कि तुम्हें फ्लोरी का पता नहीं मालूम था ।” - प्रभूदयाल व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला ।
 
“इन्स्पेक्टर साहब ।” - सुनील बाला - “दोपहर को मुझे फ्लोरी का पता नहीं मालूम था । फ्लोरी का पता मैंने अभी मैड हाउस से मालूम किया है ।”

“यहां तुम फ्लोरी से मिलने आये हो ?”

“हां ।”

“क्यों ?”

“फ्लोरी मेरी गर्लफ्रैंड है ।”

“मैंने यह नहीं पूछा फ्लोरी तुम्हारी क्या है ! मैंने पूछा है कि इतनी रात गये फ्लोरी से क्यों मिलने आये हो ?”

“मैंने यही बताया है इन्स्पेक्टर साहब, फ्लोरी मेरी गर्लफ्रैंड है और आदमी अपनी गर्लफ्रैंड से इतनी रात गये क्यों मिलने आता है ?”

“रोमांस ?”

सुनील चुप रहा ।

“फ्लोरी को मालूम था तुम आ रहे हो ?”

“नहीं । वह तो समझती थी कि मैं उसके घर का पता कभी नहीं जान पाऊंगा ।”

“फिर तुमने कैसे जाना ।”

“मैड हाउस में एक व्यक्ति को रिश्वत देकर । फ्लोरी रोज वहां अपने फोटोग्राफर के धन्धे के लिये जाती थी । इसलिये मुझे उम्मीद थी कि मैड हाउस में किसी न किसी को उसका पता जरूर मालूम होगा ।”

“इससे पहले तुमने कभी उसका पता जानने की कोशिश नहीं की थी ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“पहले कभी जरूरत नहीं पड़ी थी ।”

“क्यों जरूरत नहीं पड़ी थी ?”

“क्योंकि पहले वह रोज रात को मैड हाउस आती थी, लेकिन आज रात वह नहीं आई थी ।”

“आखिरी बार फ्लोरी से कब मिले थे तुम ?”

सुनील ने कानों में घन्टियां बजने लगीं । यह प्रश्न उसका बहुत जाना-पहचाना था । यह प्रश्न तभी पूछा जाता था जबकि प्रश्न जिसके बारे में पूछा जा रहा हो वह या तो फरार हो गया हो और या फिर दूसरी दुनिया में पहुंच गया हो ।

“फ्लोरी कहां है ?” - उसने सशंक स्वर से पूछा ।

“जो मैंने पूछा, उसका जवाब दो ।” - प्रभूदयाल कर्कश स्वर से बोला ।

“कल रात को ।”

“किस समय ?”

“मैं उससे लगभग सवा बारह बजे अलग हुआ था ।”

“उसके बाद से तुमने उसकी सूरत नहीं देखी ?”

“नहीं ।”

“फ्लोरी भीतर है ।” - एकाएक प्रभूदयाल बगल के एक कमरे की ओर संकेत करता हुआ बोला - “जाओ, मिल लो ।”

सुनील अनिश्चित सा बगल के कमरे की ओर बढा ।

झिझकते हुए उसने उस कमरे का द्वार खोलकर भीतर कदम रखा ।

भीतर कमरे में एक टेबल लैम्प के प्रकाश में सुनील की आंखों के सामने जो दृश्य आया उसे देखकर उस की आंतें उबल पड़ी ।

वह एक बैडरूम था । पलंग पर फ्लोरी की लाश पड़ी थी । लाश की हालत ऐसी थी जैसे वह कोई इन्सान न होकर कोई बकरा हो जिसके शरीर का आधा गोश्त काट-काट कर बेचा जा चुका हो । हत्यारे ने फ्लोरी के शरीर को बड़ी बेदर्दी से चाकू से काटा था । चेहरे को छोड़कर शरीर का कोई ऐसा भाग नहीं था जहां से गोश्त के लोथड़े न उखड़े पड़े हों । उसकी दोनों छातियां कटी हुई थीं और उनका गोश्त पसलियों के पास लटक रहा था । बाकी शरीर पर चाकू के कई गहरे घाव थे । आंखें बाहर उबली पड़ रही थीं, जैसे अभी शरीर से अगल हो जायेंगी । पलंग की चादर बैडरूम का फर्श पर दीवारें बूचड़खाने की तरह खून से रंगी हुई थीं।

ऐसी नृशंस हत्या सुनील ने आज तक नहीं देखी थी ।

एकाएक सुनील ने एक जोर की उबकाई ली और अपना पेट पकड़ लिया ।

“इधर ।” - अपने पीछे से उसे प्रभूदयाल की आवाज सुनाई दी ।
 
सुनील पेट पकड़े प्रभूदयाल द्वारा निर्दिष्ट दिशा की ओर भागा । उधर बाथरूम था । सुनील को एक जोर की उल्टी आई और उसका सारा खाया-पिया बाहर निकल आया । वह लम्बी-लम्बी सांसें लेने लगा । फिर उसने कुल्ला किया, मुंह धोया, थोड़ा पानी पिया और बाथरूम से बाहर निकल आया ।

फ्लोरी की लाश की दिशा में दुबारा आंखें उठाये बिना वह बैडरूम से बाहर निकल आया ।

प्रभूदयाल भी उसके पीछे-पीछे कमरे से निकल आया । उसके संकेत पर एक सिपाही ने बैडरूम का दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया ।

सुनील ने जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकट निकाला और कांपते हाथों से एक सिगरेट सुलगा लिया ।

“कैसा लगा ?” - प्रभूदयाल ने धीरे से पूछा ।

“ऐसी की तैसी तुम्हारी ।” - सुनील झल्लाकर बोला - “यू... यू ब्लडी सैडिस्ट ।”

“तुम्हें वह वीभत्स दृश्य दिखाने से मुझे बड़ा फायदा हुआ है ।”

“तुम्हें क्या फायदा हुआ है ?”

“और सिर्फ मुझे ही नहीं तुम्हें भी फायदा हुआ है । मुझे इस बात पर विश्वास हो गया है कि फ्लोरी की हत्या तुमने नहीं की । तुम्हारे लिये वह दृश्य एकदम नया था । अगर फ्लोरी की वह हालत तुमने बनाई होती तो उसकी लाश को दुबारा देखकर तुम उल्टियां न करने लगते ।”

सुनील चुप रहा ।

“तुम्हारे ख्याल से हत्यारा कौन हो सकता है ?”

“मुझे क्या मालूम ?”

“लेकिन तुम्हें अनुमान लगाने की तो कोशिश करनी चाहिये । आखिर वह तुम्हारी सहेली थी ।”

“इतनी पक्की सहेली नहीं थी कि मैं उसके हर जानकार को जानता होऊं या मुझे उसकी निजी लाइफ की जानकारी हो ।”

“फिर भी !”

“फिर भी यह कि यह किसी नार्मल इन्सान की हरकत नहीं है । फ्लोरी की हत्या करने वाला जरूर कोई शत-प्रतिशत विकृत दिमाग का व्यक्ति था । इस विषय में मुझसे कुछ पूछने के स्थान पर उल्टे तुम्हें हैडक्वार्टर जाकर पुलिस का रिकार्ड टटोलना चाहिये कि क्या इस प्रकार के पैट्रन का कोई कत्ल कही और भी हुआ है और अगर हुआ है तो पहले वाला कत्ल किसने किया था !”

“मुझे सीख मत दो ।” - प्रभूदयाल बोला - “इस प्रकार का रिकार्ड हैडक्वार्टर पर पहले ही टटोला जा रहा है और सारे देश के पुलिस हैडक्वार्टर्स पर इन्क्वायरी भिजवाई जा चुकी है । हमें अगले चौबीस घन्टे में हत्यारे के मामले में किसी जानकारी हासिल कोने की आशा है ।”

सुनील चुप रहा । प्रभूदयाल भी कुछ न बोला ।

“अगर इजाजत हो तो मैं यहा से दफा हो जाऊं ?” - सुनील ने पूछा ।

प्रभूदयाल ने उत्तर न दिया ।

सुनील उसके बोलने की प्रतीक्षा करने लगा ।

“सुनील” - अन्त में प्रभूदयाल बोला - “तुम्हारे यहां आने ने मुझे एक नई सम्भावना पर विचार करने पर मजबूर कर दिया है ।”

“क्या ?”

“कहीं सोहन लाल और फ्लोरी की हत्या में कोई सम्बन्ध तो नहीं ! कहीं दोनों हत्यायें एक ही हत्यारे का काम तो नहीं ! सुनील, तुम वह धागा हो जो दोनों हत्याओं को एक सूत्र में पिरो रहा है । अपने कथनानुसार तुम सोहन लाल से मिलने उसके फ्लैट पर पहुंचे तो सोहन लाल मारा गया । फिर तुम फ्लोरी से मिलने यहा पहुंचे तो फ्लोरी की हत्या हो गई । इन तथ्यों से मैं एक ही नतीजे पर पहुंचा हूं कि सारे सिलसिले से तुम्हारा कोई बहुत गहरा सम्बन्ध है जिसके बारे में तुम हमें कुछ बता नहीं रहे हो ।”

“जो मुझे मालूम था, मैं तुम्हे पहले ही बता चुका हूं ।”

“तुमने हमें विशेष कुछ नहीं बताया है । तुमने हमें वही बातें बताई हैं जो हमें वैसे भी बड़ी आसानी से मालूम हो सकती थीं । अब मैं सारी कहानी सुनना चाहता हूं । इस वक्त तुम्हारे साथ सिरखापाई करने का मेरे पास समय नहीं है । कल ठीक दस बजे मैं पुलिस हैडक्वार्टर में तुम्हारा इन्तजार करूंगा । अगर तुम्हें वहां आने में कोई एतराज हो तो उसे अभी जाहिर कर दो ताकि मैं कोई दूसरा इन्तजाम करूं ।”

“दूसरा इन्तजाम क्या करोगे ?”

“मैं तुम्हें दो हत्याओं के सन्देह में गिरफ्तार कर लूंगा और हथकड़ी लगवाकर हैडक्वार्टर भेज दूंगा । रात भर तुम हैडक्वार्टर की हवालात में सड़ोगे फिर जब मुझे फुरसत होगी, मैं हवालात के लिये तुम्हें बुला लूंगा और, जैसा कि मैं दोपहर को भी तुम्हें बता चुका हूं, मैं बहुत व्यस्त हूं । मुझे मरने की फुरसत नहीं है सम्भव है, मैं कई दिन तुम्हारे लिये वक्त न निकाल पाऊं ।”
 
सुनील को प्रभूदयाल के एक नये रूप के दर्शन हो रहे थे । हमेशा की तरह वह उस पर गर्ज नहीं रहा था । जरा-सा बहाना मिलने पर ही वह उसे गिरफ्तार करने का इरादा नहीं कर रहा था । आज वह उसके साथ बड़े सलीके से पेश आ रहा था । सुनील समझ नहीं पा रहा था कि प्रभूदयाल बेहद थका हुआ था इसलिए ऐसा कर रहा था या उसकी उन हरकतों में भी कोई गहरी चाल थी ।

“मैं कल दस बजे पुलिस स्टेशन पर हाजिर हो जाऊंगा ।” - सुनील बोला ।

“थैंक्यू ।” - प्रभूदयाल बोला - “मैं तुम्हारा इन्तजार करूंगा और अगर तुम्हारा इरादा पुलिस को सहयोग न देने का हो या तुमने सोच लिया हो कि तुम मेरी शराफत का नाजायज फायदा उठाओगे और मुझे घिस्सा देने से बाज नहीं आओगे तो रात भर में कोई ऐसी शानदार कहानी जरूर सोच लेना जिस पर मुझे विश्वास आ जाये । मेरा मतलब है कि अगर मुझे कोई कहानी ही सुनानी हो तो उसे हकीकत का बड़ा चमकदार लिबास पहनाकर मेरे पास आना । ओके ।”

“ओके ।”

“गैट गोइंग ।”

सुनील फौरन फ्लैट से बाहर निकल गया ।

रह-रहकर उसकी आंखों के सामने फ्लोरी की कटी-फटी लाश घूम जाती थी और उसके पेट में गुबार-सा उठने लगता था । वह सोच रहा था कि अगर उसने फ्लोरी का पता तलाश करने के लिये इतना समय बरबाद न किया होता, अगर उसने फ्लोरी द्वार दिये तस्वीर वाले लिफाफे पर लिखा उसका पता एक बार पढ भी लिया होता तो शायद वो नृशंसता का शिकार होने से बच जाती । उसकी हत्या उसी समय के दौरान हुई थी जब वह मैड हाउस में बैठा फ्लोरी के वहां आने की प्रतीक्षा कर रहा था ।

और क्या मुकुल की तस्वीर का नैगेटिव हत्यारे के हाथ में लग गया था ?
 
Chapter 3

अगले दिन सुबह नौ बजे तैयार होकर सुनील अपने फ्लैट से निकलने ही वाला था कि फोन की घन्टी घनघना उठी ।

उसने रिसीवर उठा लिया ।

“हल्लो ।” - वह बोला ।

“मिस्टर सुनील देअर ?” - किसी स्त्री स्वर में प्रश्न किया ।

“स्पीकिंग ।”

“मिस्टर सुनील, मैं कावेरी बोल रही हूं ।” - दूसरी ओर से कावेरी का उत्तेजित स्वर सुनाई दिया । वह बहुत उत्तेजित स्वर से बोल रही थी इसलिये सुनील उसकी आवाज नहीं पहचान पाया था ।

“गुड मार्निंग, मिसेज जायसवाल ।” - सुनील शिष्ट स्वर में बोला ।

कावेरी ने उसकी बात की ओर ध्यान न दिया । वह पहले से भी अधिक उत्तेजित स्वर में बोली - “मिस्टर सुनील, बिन्दु गायब हो गई है ।”

“जी !” - सुनील चौंककर बोला ।

“जी हां । वह कल दोपहर से घर में नहीं है ।”

“तो फिर क्या हो गया ? कहीं मित्रों में चली गयी होगी ।”

“मैंने सारे राजनगर में हर ऐसे स्थान पर पूछताछ कर ली है जहा कि बिन्दु के होने की सम्भावना हो सकती है । बिन्दु कहीं नहीं है, मिस्टर सुनील ।”

“क्या वह पहले भी कभी आपको - या जब रायबहादुर साहब जीवित थे, उनको - बताये बिना यूं घर से चली जाती थी ?”

“नहीं । हरगिज नहीं । घर से तो वह किसी की इजाजत लिये बिना या किसी को बताये बिना अक्सर चली जाया करती थी लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि वह रात को वापिस न लौटी हो । और फिर वह अपने कपड़े वगैरह भी तो ले गई है ।”

“कपड़े !”

“जी हां । आज सुबह मुझे उसकी नौकरानी ने बताया है कि कल जब बिन्दु कोठी से गई थी तो अपने साथ एक सूटकेस भी लेकर गई थी । यह बात अगर मुझे नौकरानी ने कल बता दी होती तो मैं कल ही आपको फोन कर देती ।”

“नौकरानी ने आपको इस बात की सूचना पहले क्यों नहीं दी ?”

“क्योंकि उसे इसमें अश्वाभाविक कुछ भी नहीं लगा था । वह तो समझी थी कि बिन्दु जहां जा रही थी, मुझे बताकर जा रही थी । वह तो आज सुबह जिक्र आ गया तो उसने बताया कि वह कल अपने साथ एक सूटकेस भी लेकर गई थी । मिस्टर सुनील, मुझे एक शंका हो रही है ।”

“क्या ?”

“कहीं वह मुकुल के साथ तो नहीं चली गई !”

“आपने मुकुल से इस बारें में पूछा है ?”

“कैसे पूछती ? रात भर तो मुझे आशा ही लगी रही थी कि वह लौटकर आ जायेगी । रात के दो बजे के बाद तो वह मैड हाउस से घर कई बार आई है । उस समय मुझे यह बात नहीं मालूम थी कि इस बार हमेशा की तरह मनोरंजन के लिये नहीं गई है बल्कि अपना सामान भी साथ लेकर गई है । फिर अब जब नौकरानी ने सूटकेस के बारे में बताया तो मेरा दिल दहल गया । इस समय मैं मुकुल से इस विषय में कोई पूछताछ नहीं कर सकती । मैड हाउस तो शाम को ही खुलता है और मुझे यह मालूम नहीं है कि मुकुल रहता कहां है ?”

“मिसेज जायसवाल” - सुनील धीरे से बोला - “कल मुकुल मैड हाउस में नहीं था ।”

बात का महत्व तत्काल कावेरी की समझ में न आया ।
 
“आप... आपका मतलब है कि... कि मुकुल भी गायब है ?” - उसे कावेरी का आन्दोलित स्वर सुनाई दिया ।

“ऐसा ही मालूम होता है ।”

“फिर तो बिन्दु वहीं है जहां मुकुल है । वह नीच हिप्पी जरूर बिन्दु को भगाकर ले गया है वह आदमी बिन्दु पर इस बुरी तरह छाया हुआ है कि वह जो कहेगा, उसके औचित्य पर विचार किये बिना बिन्दु वही करेगी ।”

सुनील चुप रहा ।

“मिस्टर सुनील, आपकी राय में मुझे क्या करना चाहिये ?”

सुनील कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “आप फौरन पुलिस में रिपोर्ट कर दीजिये ।”

“इस से तो बड़ी बदनामी होगी ?”

“अगर बिन्दु यूं ही घर से गायब रही तो बदनामी तो वैसे भी होगी । यह खबर लोगों से छुपी नहीं रहेगी कि बिन्दु घर से गायब थी । किसी न किसी सन्दर्भ में ऐसी बातों का जिक्र निकल ही जाता है । नौकर-चाकर जिक्र कर देते हैं । पड़ोसी अटकलें लगा देते हैं । फिर ज्यादा बदनामी होती है, मिसेज जायसवाल । अच्छा यही है कि आप पुलिस को रिपोर्ट कर दीजिये । और रिपोर्ट करने के लिए अपने इलाके के पुलिस स्टेशन पर जाने की कोशिश मत कीजिये ।”

“तो फिर ?”

“आप पुलिस हैडक्वाटर जाइये और इस विषय में किसी उच्च अधिकारी से मिलिये । इससे एक्शन भी फौरन होगा और बात की कोई गलत प्रकार की पब्लिसिटी भी नहीं हो पायेगी । मैं आपको पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह का नाम सुझाता हूं । वह बहुत नेक और ईमानदार आदमी है । वह इस बात को स्टन्ट नहीं बनने देगा ।”

“पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह !” - कावेरी ने अनिश्चियपूर्ण स्वर में दोहराया ।

“जी हां । और मिसेज जायसवाल, वैसे भी आप अपनी स्थिति को कोई विशेष महत्व नहीं दे रही हैं ।”

“क्या मतलब ?”

“आप रायबहादुर भवानी प्रसाद जायसवाल की पत्नी हैं । रायबहादुर साहब के प्रभाव से पुलिस भी बरी नहीं थी । आपकी किसी भी प्रकार की सहायता करने में वे गौरव का अनुभव करेंगे ।”

“मैं पुलिस को क्या बताऊं ?”

“आप पुलिस को बिन्दु और मुकुल के सम्बन्धों के बारे में तो बताइये ही, साथ ही इस बात की सम्भावना पर पूरा जोर दीजियेगा कि शायद मुकुल बिन्दु को बरगलाकर भगा ले गया बिन्दु के गायब होने में मुकुल का हाथ है तो वह पुलिस के जाल से बचकर निकल नहीं पायेगा ।”

“आल राइट ।”

“मैं खुद भी मुकुल को तलाश करूंगा और शीघ्र ही आपसे सम्पर्क स्थापित करूंगा ।”

“आप मुकुल को कैसे तलाश करेंगे ?”
 
“मैं मैड हाउस के वेटरों वगैरह से पूछताछ करूंगा । शायद किसी को मालूम हो कि मुकुल कहां रहता है । मुकुल के पिछले जीवन की तफ्तीश करने के लिये यूथ क्लब का एक आदमी बम्बई भी गया हुआ है । किसी भी क्षण उसकी रिपोर्ट आ सकती है शायद उस रिपोर्ट से ही मुकुल को तलाश करने में कोई सहायता मिले । वैसे मिसेज जायसवाल, सम्भावना यह भी है कि बिन्दु के घर ने लौटने में और पिछली रात मुकुल के मैड हाउस में न आने में कोई सम्बन्ध ही न हो ।”

“ऐसा नहीं हो सकता । मेरा मन कहता है कि वह हिप्पी ही बिन्दु को बरगला कर ले गया है ।”

“शायद ऐसा ही हो । बहरहाल आप सुनील सुपरिन्टेन्डेन्ट राम सिंह से फौरन सम्पर्क स्थापित कीजिये । अगर आपका ही सन्देह सच है तो देर करने से गड़बड़ हो जाने की सम्भावना है ।”

“ओके । मैं अभी पुलिस हैडक्वार्टर जाती हूं ।”

दूसरी ओर से सम्बन्धविच्छेद हो गया ।

सुनील ने रिसीवर को क्रेडल पर रख दिया ।

तत्काल टेलीफोन की घन्टी फिर बज उठी ।

सुनील ने दुबारा रिसीवर उठा लिया और बोला - “हल्लो ।”

“सुनील ?” - दूसरी ओर से रमाकांत का स्वर सुनाई दिया ।

“हां ।”

“रमाकांत बोल रहा हूं । जौहरी ने बम्बई से बाई एयर रिपोर्ट भेजी है । मैंने एक आदमी को आई.ए.सी. से कार्गो आफिस में भेजा है । वह वहां से रिपोर्ट लेकर सीधा तुम्हारे प्लैट पर आयेगा । वहीं रहना ।”

“अच्छा । कब तक आयेगा वह ?”

“बस, आता ही होगा ।”

सुनील ने रिसीवर रख दिया ।

उसने एक सिगरेट सुलगा लिया और प्रतीक्षा करने लगा ।

लगभग दस मिनट बाद फ्लैट की कालबैल बजी ।

सुनील ने उठकर द्वार खोला ।

द्वार पर यूथ क्लब का एक सुनील का जाना पहचाना वेटर खड़ा था । उसने सुनील को सलाम किया और एक मोटा-सा 4x9 इंच का लिफाफा सुनील की ओर बढा दिया ।

सुनील ने लिफाफा ले लिया ।

वेटर विदा हो गया ।

वापिस फ्लैट में आकर सुनील ने लिफाफा खोला । सुनील ने सारे कागजात बाहर निकाल लिये । रिपोर्ट के पहले पृष्ट पर जौहरी के हैण्डराइटिंग में लिखा था

गोपनीय रिपोर्ट

राम (चन्द्र) ललवानी

जन्म बम्बई । सन् 1929

सोलह मई सन 1941 को चोरी के इलजाम में गिरफ्तार हुआ । एक वर्ष की सजा हुई । बम्बई के रिफार्मेटरी स्कूल में रहा । फिर गिरफ्तार हुआ । कुल तीन साल रिफार्मेटरी स्कूल में रहा ।

दस सितम्बर, 1947 को सशस्त्र डकैती को इलजाम में गिरफ्तार हुआ । पुलिस उसके विरुद्ध पर्याप्त प्रमाण इकट्ठे नहीं कर सकी थी इसलिये केस डिसमिस हो गया ।

आठ जनवरी, 1950 को कत्ल के इलजाम में गिरफ्तरा हुआ । उसके खिलाफ जो चश्मदीद गवाह था, वह बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से कहीं गायब हो गया । उसके बिना पुलिस का केस कमजोर पड़ गया । राम ललवानी बरी हो गया ।

पुलिस का विचार है कि राम ललवानी के ही आदमियों द्वारा चश्मदीद गवाह की हत्या कर दी गई थी और फिर लाश गायब कर दी गई थी ।

छः मार्च, 1952 को भिण्डी बाजार के मशहूर दादा गणपति की हत्या के सन्देह में गिरफ्तार किया गया । चार दिन बाद छोड़ा दिया गया । मुकददमा नहीं चल सका ।

सोलह दिसम्बर, 1953 को घड़ियों की स्मगलिंग के इलजाम में गिरफ्तरा हुआ । डेढ साल की कैद बामशक्कत ।

पच्चीस जून, 1956 में फिर पकड़ा गया । दो साल के लिये तड़ीपार का हुक्म ।
 
सन उन्नीस सौ छप्पन के बाद भी जब तक वह बम्बई या बम्बई से बाहर रहा, उसको कई बार पुलिस ने तफ्तीश के लिये गिरफ्तार किया । पुलिस को कई गम्भीर अपराधों में उसका हाथ होने का सन्देह रहा, लेकिन पर्याप्त प्रमाण प्राप्त न होने की वजह से कभी भी उस पर केस नहीं चलाया जा सका ।

सन उन्नीस सौ तरेसठ में राम ललवानी ने बम्बई में गुलनार नाम का एक सूरत शक्ल में बडा प्रतिष्ठित लगने वाला रेस्टोरेन्ट खोल लिया था । वहां गीगी ओब्रायन नाम की एक स्त्री राम ललवानी के साथ ही रहती थी । राम ललवानी की वह विधिवत ब्याही हुई पत्नी थी या रखैल थी, इस विषय में किसी को पक्का कुछ नहीं मालूम था । गीगी ओब्रायन और राम ललवानी दोनों उन दिनों कालबादेवी रोड पर स्थित एक इमारत के एक फ्लैट में रहते थे ।

सन चौसठ के आरम्भ में राम ललवानी ने बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से सुनीता अग्रवाल नाम की एक लड़की से विवाह कर लिया था । उस समय सुनीता अग्रवाल की आयु केवल बाइस साल थी लेकिल वह गलत प्रकार के लोगों की संगत में पड़ कर तीव्र मादक पदार्थों की इतनी आदि हो चुकी थी कि उस आयु में भी मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार थी । सुनीता अग्रवाल राजनगर के किसी करोड़पति सेठ की इकलौती लड़की है ।

ब्रैकेट में जौहरी ने लिखा था:

सेठ का नाम नहीं मालूम हो सका । राजनगर में करोड़पति सेठ कोई सौ पचास नहीं हैं । राजनगर में बड़ी आसानी से पता लगाया जा सकता है कि सुनीता अग्रवाल किस करोड़पति सेठ की इकलौती बेटी है ।

विश्वस्त सूत्रों से पता लगा है कि राम ललवानी का रेस्टोरेन्ट वास्तव में मादक पदार्थों के आदी लोगों का अड्डा था और राम ललवानी चरस से लेकर मारिजुआना और एल. एस. डी. वगैरह हर चीज बेचता था । सुनीता अग्रवाल भी उसी वजह से उसके रेस्टोरेन्ट में आया करती थी ।

सुनीता अग्रवाल से शादी के बाद राम ललवानी ने कालबा देवी रोड वाली इमारत में रहना छोड़ दिया था और कहीं और रहने लगा था लेकिन वे दोनों ही अक्सर गीगी ओब्रायन के फ्लैट पर आया करते थे ।

अप्रैल सन 1965 के बाद से किसी ने सुनीता अग्रवाल को राम ललवानी के साथ नहीं देखा । उसके तीन महीने बाद राम ललवानी भी बम्बई से गायब हो गया । बम्बई में किसी को मालूम नहीं कि वह अब कहां है ।

सुनील रिपोर्ट पढ रहा था और मन ही मन जौहरी और रमाकांत पर ताव खा रहा था । उसने रिपोर्ट मांगी थी मुकुल के बारे में लेकिन जौहरी ने उसे राम ललवानी का जीवन वृतान्त भेज दिया था ।

सुनील ने बाकी रिपोर्ट देखनी आरम्भ की ।

रिपोर्ट के साथ बाइस मार्च सन 1965 के बम्बई से निकलने वाले एक अखबार की कटिंग नत्थी था । प्रकाशित समाचार था -

मनोहर ललवानी पुलिस मुठभेड़ में हलाक

आज रात को एक बजे मनोहर ललवानी नाम का लगभग पच्चीस का नवयुवक बांद्रा पुल पर हुई पुलिस के साथ सशस्त्र मुठभेड़ में पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया । मनोहर ललवानी पुलिस द्वारा पिछले दिनों बम्बई में हुई उस नृशंस हत्याओं के लिये जिम्मेदार ठहराया गया था जिनकी वजह से सारी बम्बई में आतंक फैला हुआ था । पिछले छः महीनों में नगर के विभिन्न भागों में पुलिस को तीन जवान लड़कियों के नग्न शरीर चाकू से इस बुरी तरह कटे हुए मिले थे कि पत्थर का कलेजा रखने वाले इन्सान की आत्मा भी त्राहि-त्राहि कर उठे । पाठक भूले नहीं होंगे कि इस प्रकार की हत्याओं का आखिरी शिकार गीगी ओब्रायन नाम की एक डांसर थी जिसका शरीर पुलिस ने पिछले सप्ताह समुद्र में से निकाला था । पहली दो हत्याओं की तरह उसका पूरा शरीर बुरी तरह से कटा हुआ था । सारे शरीर पर से गोश्त के बड़े-बड़े लोथड़े उखड़े पड़े थे । गीगी ओब्रायन की दोनों छातियां कटी हुई थीं और उनका गोश्त पसलियों के पास लटक रहा था उसकी जांघों पिंडलियों और नितम्बों के आसपास से गोश्त के छोटे-छोटे लोथेड़े उखाड़े गये थे और बाकी बचे खुचे शरीर पर चाकू को इतने घाव थे कि उनकी गिनती नहीं हो सकती थी । ऐसी ही हालत में इससे पहले भी पुलिस को दो अन्य युवतियों की लाशें मिल चुकी थीं ।
 
मनोहर ललवानी अपने भाई राम ललवानी के रेस्टोरेन्ट गुलनार में गिटार बजाता था और विलायती गाने गाता था । पुलिस को विश्वस्त सूत्रों से मालूम हुआ था गीगी ओब्रायन वगैरह की नृशंस हत्याओं के लिये मनोहर ललवानी जिम्मेदार था । आज रात को जब वह क्लब में से बाहर निकल रहा था तो पुलिस ने उसे घेर लिया लेकिन मनोहर ललवानी के पास रिवाल्वर थी, पुलिस इस विषय में असावधान थी । पुलिस इस बात की अपेक्षा नहीं कर रही थी कि मनोहर ललवानी पुलिस पर गोली चलाने की हिम्मत करेगा । परिणामस्वरूम मनोहर ललवानी गुलनार रेस्टोरेन्ट के सामने से पुलिस का घेरा तोड़कर निकल भागा लेकिन पुलिस से अपना पीछा छुड़ाने में सफल न हो सका । पुलिस ने उसका पीछा किया और बान्द्रा के रेल के पुल पर उसे दुबारा घेर लिया । दोनों ओर से गोलियों का आदान-प्रदान हुआ जिसमें एक सब-इन्सपेक्टर और दो सिपाही बुरी तरह घायल हो गये । मनोहर ललवानी पुल पर दोनों ओर से पुलिस द्वारा घिर गया था । जब उसकी रिवाल्वर की गोलियां खत्म हो गईं तो उसने रिवाल्वर फेंक दी और पुल के ऊपर चढकर नीचे समुद्र में छलांग लगाने की कोशिश की लेकिन वह अपने इस प्रयत्न में सफल नहीं हो सका । वह पुलिस इन्सपेक्टर कर्माकर की गोली का शिकार हो गया और फिर उसकी गोलियों से छलनी लाश पानी में जा गिरी ।

समुद्र में मनोहर ललवानी की लाश की तलाश जारी है ।

साथ में अखबार की दो कटिंग और थीं जिनमें गीगी ओब्रायन की हत्या से पहले मरी दो लड़कियों की हत्याओं का पूरा विवरण था । फ्लोरी की हत्या भी बिल्कुल उसी ढंग से हुई थी । चारों हत्यायें एक ही शख्स का कारनामा कैसे हो सकती थी जब कि कटिंग में छपा वह समाचार भी झूठ नहीं मालूम होता था कि पहली तीन हत्याओं का जिम्मेदार मनोहर ललवानी पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया था ।

दो ही बातें सम्भव मालूम होती थीं ।

या तो पुलिस ने किसी गलत आदमी को अपनी गोली का शिकार बना दिया था और या फिर मनोहर ललवानी ब्रान्दा के पुल से पानी में गिर कर मरा नहीं था और किसी प्रकार बच निकलने से सफल हो गया था ।

दूसरी सम्भावना उसे तत्काल ही निराधार मालूम होने लगी ।

जौहरी की रिपोर्ट में एक छोटी-सी अखबार की कटिंग और थी जिस पर लिखा था ।

आज रात को पुलिस ने समुद्र में से मनोहर ललवानी की लाश बरामद कर ली है । स्मरण रहे कि मनोहर ललवानी वही भयंकर हत्यारा है जो पिछली रात को बाद्रा के रेल पुल पर हुई पुलिस मुठभेड़ में इन्सपेक्टर कर्माकर की गोलियों का शिकार हो गया था । मनोहर ललवानी के बड़े भाई राम ललवानी को और मनोहर ललवानी के एक मित्र सोहन साल को लाश की शिनाख्त के लिये पुलिस ने बुलाया था । राम ललवानी ने अपने भाई की लाश को देखकर जोर-जोर से रोते हुए कहा था कि वह उसका छोटा भाई मनोहर ललवानी ही था । सोहन लाल ने राम ललवानी के बयान की पुष्टि की थी ।

जौहरी की रिपोर्ट के अन्त में अखबार में छपी कुछ तस्वीरों की कटिंग थी जिनके पीछे नाम भी लिखे हुये थे ।

पहली तस्वीर राम ललवानी की थी ।

सुनील ‘ब्लास्ट’ में छपे मैड हाउस के विज्ञापन में राम ललवानी की तस्वीर देख चुका था । वह निश्चय ही वही आदमी था जो आजकल राजनगर में ‘मैड हाउस’ नाम का डिस्कोथेक और फोर स्टार नाम की नाइट क्लब चला रहा था ।
 
दूसरी तस्वीर सोहन लाल की थी जो सुनील की रिवाल्वर से कल मारा गया ।

तीसरी तस्वीर मनोहर ललवानी की थी ।

वह एक मासूम से लगने वाले नवयुवक का दाढी-मूंछ रहित चेहरा था ।

उस तस्वीर के साथ एक कागज लगा हुआ था जिस पर जौहरी की हैंड राइटिंग में लिखा था ।

यद्यपि तस्वीर पुरानी है फिर भी सम्भव है कि मुकुल और मनोहर ललवानी एक हो ।

मुकुल ही मनोहर ललवानी था तो बाइस मार्च सन् पैंसठ को बम्बई में बान्दा के पुल पर हुई पुलिस मुठभेड़ में कौन मरा था ?

जौहरी की रिपोर्ट की आखिरी और छोटी-सी कटिंग में लिखा था:

पुलिस हैडक्वार्टर में मौजूद मनोहर ललवानी की फाइल के अनुसार मनोहर ललवानी एक विकृत मस्तिष्क का स्वामी था । वह बुरी तरह से हीन भावनाओं का शिकार था और अपनी इस कमजोरी के विकल्प के रूप में ही अपराधी प्रवृत्तियों का सहारा लेता था । पुलिस के मनोवैज्ञानिक का कथन है कि युवा लड़कियों की इस प्रकार की नृशंस हत्यायें वही आदमी कर सकता था जो एक मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की तरह किसी युवती के साथ रति-क्रिया में भाग लेने में असमर्थ हो और अपनी असमर्थता प्रकट हो जाने के बाद जिसे युवती की प्रताड़ना सुननी पड़ती हो । ऐसा व्यक्ति खास तौर पर अपने मस्तिष्क पर अपना अधिकार खो बैठता है और अगर वह प्रबल अपराधी प्रवृत्तियों वाला व्यक्ति है तो वह न केवल किसी की हत्या कर देने में एक क्षण के लिये भी नहीं हिचकता । बल्कि अपनी हार का अहसास मिटाने के लिये वह युवती के शरीर की धज्जियां उड़ानी आरम्भ कर देता है ।

रिपोर्ट में अन्त में जौहरी की हैंड राइटिंग में एक छोटा-सा नोट था:

राम ललवानी के बारे में इस रिपोर्ट में इतना कुछ इसलिये लिखा गया है क्योंकि वह मनोहर ललवानी का सगा भाई है और मनोहर ललवानी ही मुकुल मालूम होता है । दूसरी वजह यह है कि राम ललवानी के बारे में जानकारी पुलिस रिकार्ड द्वारा सहज ही हासिल हो गई थी ।

सुनील ने रिपोर्ट को दुबारा लिफाफे में डालकर मेज पर रख दिया । उस ने एक सिगरेट सुलगा लिया और सोचने लगा ।

उसे इस बात में कोई सन्देह नहीं रहा था कि मनोहर ललवानी ही मुकुल था । वह केवल अपनी वास्तविक सूरत छुपाने के लिये ही हिप्पी बना हुआ था । इस विषय में कावेरी का सन्देह एकदम सच निकला था ।

लेकिन अगर मुकुल ही मनोहर ललवानी था तो यह बात भी सच थी कि वह बम्बई में पुलिस मुठभेड़ में मरा नहीं था । राम ललवानी और सोहन लाल ने उसकी वास्तविकता छुपाये रखने के लिये झूठ बोला था । उन्होंने किसी दूसरे आदमी की शिनाख्त मनोहर ललवानी के रूप में की थी ।

उसने घड़ी पर दृष्टिपात किया । पौने दस बजने को थे । उसने सिगरेट को ऐशट्रे में डाल दिया और हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ । ठीक दस बजे उसने प्रभुदयाल के पास पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचना था । उस नाजुक स्थिति में प्रभूदयाल को नाराज करना कोई अक्लमन्दी का काम नहीं था ।

वह तेजी से बैडरूम में प्रविष्ट हो गया ।

उसने टेलीफोन का रिसीवर उठाया और यूथ क्लब का नम्बर डायल किया ।

रमाकांत से सम्पर्क स्थापित होते ही वह बोला - “रमाकांत, मैं सुनील बोल रहा हूं ।”

“अब क्यों बोल रहे हो ? सब कुछ तो हो गया है ।”

“रिपोर्ट के लिये धन्यवाद । अब दो छोटे-छोटे काम और करवाओ ।”

“प्यारयो, जिस प्रकार मैने जौहरी की रिपोर्ट भेजी है और तुमने धन्यवाद कर दिया है, उसी प्रकार जब मैं जौहरी के खर्चे का बिल तुम्हें भेजूंगा और तुम नगदऊ मेरे हवाले कर दोगे तो मैं शराफत और बड़े ही भाव-भीने स्वर से तुम्हें धन्यवाद कहूंगा ।”

“मैं इस वक्त नगदऊ की नहीं, काम की बात कर रहा हूं ।”

“बको ।”

“जौहरी की रिपोर्ट के अनुसार राम ललवानी ने सन चौंसठ के आरम्भ में बम्बई में सुनीता अग्रवाल नाम की एक लगभग बाइस साल की लड़की से शादी की थी । वह राजनगर के किसी करोड़पति सेठ की इकलौती बेटी है । तुमने यह मालूम करना है कि ऐसी लड़की राजनगर के कौन से सेठ की है या थी । राजनगर में करोड़पति सेठ पांच छः से अधिक नहीं हैं, इसलिये यह की कठिन काम नहीं है । वैसे भी अगर तुम शुरूआत सेठ मंगत राम को चैक करवाने से करोगे तो शायद तुम्हें और किसी को चैक करवाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी । सुनीता अग्रवाल के सेठ मंगत राम की लड़की होने की ज्यादा सम्भावनायें दिखाई देती हैं ।”
 
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