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Thriller विक्षिप्त हत्यारा

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सब-इन्स्पेक्टर कोई नया भर्ती हुआ युवक था । सुनील के चिल्लाने का उस पर प्रत्याशित प्रभाव पड़ा । उसकी रिवाल्वर अभी भी सुनील की ओर तनी हुई थी ।

“मैं पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट रामसिंह को फोन करना चाहता हूं ।” - सुनील बोला ।

“क्यों ?” - सब-इन्स्पेक्टर ने पूछा ।

“रामसिंह मेरा मित्र है और मुझे तुम लोगों से ज्यादा जानता है ।”

सब-इन्स्पेक्टर सिपाही और घूमा और बोला - “हैडक्वार्टर फोन करो ।”

“यह आदमी...”

“मैं इसे सम्भाल लूंगा ।”

सिपाही प्लैट से बाहर निकल गया ।

“मैंने पुलिस सुपरिन्डेन्डेन्ट रामसिंह को फोन करने की बात की थी ।” - सुनील बोला ।

“मैंने तुम्हारी बात सुन ली है ।” - सब-इन्स्पेक्टर बोला - “सुपरिन्टेन्डेन्ट तुम्हारे दोस्त हैं, हमारे नहीं । मैं उन्हें खामखाह डिस्टर्ब करने की जिम्मेदारी अपने सिर नहीं लेना चाहता ।”

“लेकिन...”

“तुम जब यहां से छूटो तो उन्हें फोन कर लेना ।”

सुनील चुप हो गया ।

“वहां बैठ जाओ ।” - सब-इन्स्पेक्टर एक ओर पड़ी कुर्सी की ओर संकेत करता हुआ बोला ।

सुनील उस पर बैठ गया ।

सब-इन्स्पेक्टर उसके सामने एक कुर्सी घसीट कर बैठ गया । सुनील ने अपनी जेब से लक्की स्ट्राइक का पैकेट निकाला । उसने एक सिगरेट सुलगा लिया । उसने सब-इन्स्पेक्टर को सिगरेट आफर करने का उपक्रम नहीं किया । फिर सुनील ने अपनी जेब से ‘ब्लास्ट’ का आइडेन्टिटी कार्ड निकाला और उसे सब-इन्स्पेक्टर की ओर बढाता हुआ बोला - “यह मेरा आइडेन्टिटी कार्ड है ।”

“अभी इसे अपने पास रखो । और मैं तुम्हें सिगरेट पीने की इजाजत इस उम्मीद पर दे रहा हूं कि तुम सिगरेट की राख या उसका बचा हुआ टुकड़ा फर्श पर नहीं गिराओगे ।”

“नहीं गिराऊंगा । थैंक्यू ।”

सब-इन्स्पेक्टर ने रिवाल्वर अपनी गोद में रख ली थी लेकिन वह सुनील के प्रति पूर्णतया सावधान था ।

“तुम यहां कैसे आ पहुंचे ?” - सुनील ने पूछा ।

“बीट के सिपाही ने गोली चलने की आवाज सुनी थी । उसने पुलिस चौकी फोन कर दिया था । भगत सिंह रोड की चौकी यहां से पास ही है ।”

“ओह !”

“तुमने इस आदमी की हत्या की है ?”

“नहीं ।”

“रिवाल्वर तुम्हारे हाथ में थी ?”

“थी लेकिन मैंने गोली नहीं चलाई थी । रिवाल्वर क्योंकि मेरी थी इसलिये मैंने इसे फर्श पर से उठा लिया था । उस समय मुझे यह मालूम नहीं था कि गोली इसी रिवाल्वर में से चलाई गई थी ।”

“किस्सा क्या है ?”

सुनील ने कम से कम शब्दों में उसे सारी घटना कह सुनाई और सबूत के तौर पर अपनी खोपड़ी के पृष्ठ भाग में निकल आया वह गुमड़ भी दिखा दिया जो तब तक अण्डे से बड़ा हो गया था ।

सब-इन्स्पेक्टर चुप रहा ।

थोड़ी देर बाद पहले वाले सिपाही के साथ तीन और सिपाही फ्लैट में प्रविष्ट हुए । दरवाजा क्षण भर के लिये खुला और सुनील ने देखा बाहर तमाशाइयों की तगड़ी भीड़ जमा हो चुकी थी ।

“इन्स्पेक्टर साहब आ रहे हैं ।” - एक सिपाही बोला ।

सब-इन्स्पेक्टर के संकेत पर दो सिपाही सुनील के सिर पर आ खड़े हुए ।

फिर फ्लैट में कुछ और आदमी प्रविष्ट हुए । उनमें से एक फोटोग्राफर था, एक पुलिस का डाक्टर था और दो फिंगरप्रिन्ट एक्सपर्ट थे ।

डाक्टर ने सोहन लाल का मुआयना किया और लगभग तत्काल ही घोषणा कर दी कि वह मर चुका था । 38 कैलिबर की तीन गोलियों ने उसके सीने को उधेड़ कर रख दिया था । उसके बाद भी उसका जीवित रह पाना एक करिश्मा होता ।

फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट अपना-अपना कार्य करने लगे । रिवाल्वर ट्रीगर के भीतर पेंसिल डाल कर बड़ी सावधानी से फर्श उसे उठा ली गई । फोटोग्राफर के निपटने के बाद चाक से लाश की फर्श पर पोजीशन मार्क कर दी गई ।

फिर अन्त में ड्रामे के सबसे महत्वपूर्ण पात्र की तरह बड़े ही ड्रामेटिक अन्दाज से इन्स्पेक्टर प्रभूदयाल ने फ्लैट में कदम रखा ।

सब-इन्स्पेक्टर ने उठ कर प्रभूदयाल को सैल्यूट मारा, फिर वह प्रभूदयाल के समीप पहुंचा और धीमे स्वर में बोला - “हथकड़ी डाल दें ?”

प्रभूदयाल चुप रहा । उसने एक उड़ती निगाह सुनील की ओर डाली । उसने सुनील को वहां देखकर कोई हैरानी प्रकट नहीं की । लगता था कि सुनील के बारे में उसे पहले ही खबर की जा चुकी थी, फिर उसने धीरे से नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।
 
प्रभूदयाल सुनील को पूर्णतया नजरअन्दाज किये अपने आदमियों में घूमता रहा और उनसे बातें करता रहा ।

सुनील ने सिगरेट का बचा हुआ टुकड़ा बुझाकर अपनी जेब में डाल लिया ।

प्रभूदयाल ने लाश देखी डाक्टर से बात की, फिर फिंगरप्रिंट वालों से बात की, रिवाल्वर देखी, फिर पिछले कमरे का दरवाजा खोलकर भीतर झांका ।

“लाश उठवा दो ।” - उसने आदेश दिया - “और तुम मेरे साथ आओ ।”

आखिरी आदेश सुनील के लिये थे ।

प्रभूदयाल पिछले कमरे में प्रविष्ट हो गया ।

सुनील भी उस ओर बढा ।

प्रभूदयाल पलंग पर टांगे लटकाये बैठा था ।

“दरवाजा बन्द कर दो और कहीं बैठ जाओ ।” - प्रभूदयाल बोला ।

सुनील ने दरवाजा बन्द कर दिया और उसके सामने पड़ी एक ऊंची ड्रैसिंग टेबल पर बैठ गया ।

“उस आदमी की हत्या तुमने की है ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।

“मेरे इन्कार करने से तुम्हें मेरी बात पर विश्वास हो जायेगा ?” - सुनील बोला ।

“मैंने तुम से एक सवाल पूछा है ।” - प्रभूदयाल कठोर स्वर से बोला - “और यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है ।”

“मैंने उसकी हत्या नहीं की ।”

प्रभूदयाल कुछ क्षण उसे घूरता रहा और फिर गहरी सांस लेकर बोला - “राजनगर में जहां भी कोई हत्या होती है, वही तुम पहले से ही मौजूद होते हो और अगर मौजूद नहीं होते तो मरने वाले से किसी न किसी रूप से तुम्हारा सम्बन्ध जरूर जुड़ा होता है । क्यों ?”

“इसमें मेरा क्या कसूर है ? यह तो एक संयोग की बात है कि मैं जिस आदमी में भी दिलचस्पी लेता हूं, उसी को कोई न कोई भगवान के घर पहुंचा देता है ।”

“सुनील, भगवान के लिए तुम कभी अपने आप में भी दिलचस्पी लो न ?”

“ताकि मैं भी भगवान के घर पहुंच जाऊं ?”

“हां ।”

सुनील चुप रहा ।

“क्या किस्सा है ?” - प्रभूदयाल ने पूछा ।

“क्या मैं अपने आपको गिरफ्तार समझूं ?” - सुनील ने पूछा ।

प्रभूदयाल की निगाह फिर सुनील पर जम गई । उस बार जब वह बोला तो उसकी आवाज बहुत धीमी थी, बहुत मीठी थी और बहुत खतरनाक थी - “सुनील, तुम तो अखबार निकालते हो । इस नगर में घटित होने वाली सारी घटनाओं की तुम्हें जानकारी होती होगी । इसलिये तुम्हें यह भी मालूम होगा कि कल विक्रमपुरे के इलाके में एक गोदाम में आग लग गई थी । आग की चपेट में आकर तीन आदमी मर गये थे । हमारे एक्सपर्ट कहते हैं कि वे तीन आदमी आग की चपेट में आकर नहीं मरे थे । उनकी हत्या की गयी थी और फिर हत्या को दुर्घटना का रूप देने के लिए लाशों को गोदाम में डालकर गोदाम में आग लगा दी गई थी । वह हत्या का मामला है और उसकी तफ्तीश मैं ही कर रहा हूं । अब एक और हत्या यहां हो गई है । यह भी मेरे ही गले पड़ गई है । पिछले चौबीस घन्टे से मैं शैतान की तरह काम कर रहा हूं । मुझे एक क्षण को सांस लेने को भी फुरसत नहीं मिली है । मैं शेव नहीं कर सका हूं, ब्रश नहीं कर सका हूं । नहा नहीं सका हूं, वर्दी नहीं बदल सका हूं, ढंग से कुछ खा तक नहीं सका हूं । इससे पहले कि पहले केस से मेरा पीछा छूट सके और मैं शान्ति की सांस ले सकूं, दूसरा केस आ गया है । इस केस में तुम मर्डर सस्पेक्ट नम्बर वन हो और मेरी जिम्मेदारी पर हो । मैं इतना व्यस्त हूं कि पूरा एक सप्ताह मुझे तुमसे सवाल करने की फुरसत नहीं मिलेगी लेकिन मैं तुम्हारी खातिर समय निकाल रहा हूं क्योंकि मैं तुम्हें ले जाकर पुलिस हैडक्वार्टर की किसी कोठरी में बन्द कर दूं और तब तक तुम्हारे बारे में सोंचू भी नहीं जब तक कि मैं पहले किस से निबट न जाऊं, लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहता । वाकई मैं ऐसा नहीं करना चाहता । अगर तुम चाहते हो कि तुम तभी अपनी जुबान खोलो जबकि तुम बाकायदा गिरफ्तार कर लिये जाओ तो तुम्हारी यह इच्छा भी पूरी हो जायेगी । मैं तुम्हें हैडक्वार्टर ले जाकर हवालात में बन्द कर दूंगा और अगले शुक्रवार तक तुम्हारे नाम का भी जिक्र नहीं आने दूंगा । फिर एकाएक मुझे तुम्हारी याद आयेगी और मैं फिर तुम से वही प्रश्न तब पूछूंगा जो मैं अब पूछ रहा हूं । मर्जी तुम्हारी है । तुम्हें मेरे सवाल का जवाब देने का जो मौका पसन्द है, चुन लो ।”

प्रभूदयाल चुप हो गया । एकाएक वह बेहद थका हुआ इंसान दिखाई दे रहा था ।
 
“मैं सारी कहानी बाहर सब-इन्सपेक्टर को सुना चुका हूं ।” - सुनील हथियार डालता हुआ बोला । उसे मालूम था कि प्रभूदयाल कोई धमकी नहीं दे रहा था । वह जो कुछ कह रहा था, उसे कर गुजरने का इरादा भी रखता था ।

“कोई बात नहीं ।” - प्रभूदयाल बोला - “वह कहानी फिर दोहरा दो ।”

“कल रात मैं मैजेस्टिक सर्कल पर लिबर्टी बिल्डिंग में स्थित मैड हाउस में गया था ।”

“क्यों ?”

“यूं ही । तफरीह के लिये ।”

“फिर ?”

“वहां से सोहन लाल नाम का जो आदमी बाहर मरा पड़ा है, मेरे पीछे लग रहा था । मैड हाउस में मुझे फ्लोरी नाम की अपनी एक जानकार मिल गयी थी । उसकी सहायता से मैंने अपनी ओर से सोहन लाल से पीछा छुड़ा लिया था, लेकिन मेरा ख्याल गलत था । सोहन लाल अपने दो आदमियों के साथ बदस्तूर मेरे पीछे लगा हुआ था । मेरे फ्लैट में प्रविष्ट होते ही ये मुझ पर टूट पड़े और फिर मेरी जेब में कितने रुपये मौजूद थे, सब निकालकर भाग गये ।”

“तुम्हारी जेब में कितने रुपये थे ?”

“लगभग दो सौ रुपये ।”

“और कुछ भी चोरी गया ?”

“नहीं ।”

“क्यों ? जब वे तुम्हारे फ्लैट में घुस ही आये थे तो उन्होंने और चीजों पर हाथ साफ क्यों नहीं किया ?”

“मेरी उनसे मार कुटाई हो गई थी । मार कुटाई से जो धमाधम मची थी उसकी वजह से मेरे फ्लैट के एकदम नीचे वाला किरायेदार चिल्लाने लगा था । शायद वे लोग उसी के डर से जो हाथ लगा था वही लेकर रफूचक्कर हो गये थे । शायद उन्हें भय था कि कहीं नीचे वाला किरायेदार ऊपर न आ जाये ।”

“तुमने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई थी ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि दो सौ रुपये की मामूली रकम की चोरी के लिए मैं पुलिस को परेशान नहीं करना चाहता था ।”

“वैरी गुड । पुलिस का बड़ा ख्याल है तुम्हें और दो सौ रुपयें की रकम भी तुम्हारे लिये मामूली है । मेरी तो वह आधे महीने की तनख्वाह होती है ।”

सुनील चुप रहा ।

“खैर फिर ?”

“फिर मैंने सोहन लाल के घर का पता लगा लिया ।”

“कैसे ?”

“वह मैड हाउस से मेरे पीछे लगा था । मैं इस आशा में दुबारा कहां पहुंच गया कि शायद वो फिर दिखाई दे जाये ।”

“और वह तुम्हें दिखाई दे गया ।”

“हां ।”

“और फिर तुमने उसकी हत्या कर दी क्योंकि वह तुमसे तुम्हारे दो सौ रुपये छीनकर भाग गया था ?”

“मैंने उसकी हत्या नहीं की, मेरे बाप ।” - सुनील झल्लाकर बोला ।

“तो फिर वह कैसे मर गया ?”

सुनील ने बाकी की कहानी सारांश में सुना दी ।

“और यह मेरी खोपड़ी देखो ।” - सुनील उसके सामने अपनी खोपड़ी का पिछला भाग करता हुआ बोला - “मेरी खोपड़ी पर जो अंडे जितना गूमड़ दिखाई दे रहा है इसकी अपने डाक्टर को बुलाकर चाहो तो अच्छी तरह मुआयना करवा लो । यह असली है और ताजा है और इस बात का सबूत है कि फ्लैट में मेरे और सोहन लाल के अतिरिक्त कोई तीसरा व्यक्ति भी था जिसने मुझ पर पीछे से आक्रमण किया था और फिर मेरी रिवाल्वर से सोहन लाल की हत्या कर दी थी ।”

“कहानी अच्छी है और काफी हद तक विश्वसनीय भी लगती है ।”

“यह कहानी नहीं है, हकीकत है ।”

“अच्छा, हकीकत ही सही । अब तुम मेरी एक आध बात का जवाब दो ।”

“पूछो ।”

“तुम सोहन लाल को कल रात से पहले नहीं जानते थे ?”

“सवाल ही नहीं पैदा होता था ।”

“लेकिन मैं सोहन लाल को बड़े लम्बे अरसे से जानता हूं । पहले वह धर्मपुरे के इलाके का मामूली-सा दादा था और नकली शराब का धन्धा करता था फिर एकाएक राजनगर से गायब हो गया । कई साल गायब रहने के बाद जब राजनगर में दोबारा प्रकट हुआ तो इसका काया पलट हो चुका था । इसने अपना पुराना धन्धा छोड़ दिया था और बड़ी मान-मर्यादा के साथ फ्लैट में रहने लगा था । हमें मालूम है कि सोहन लाल फोर स्टार नाईट क्लब के मालिक राम ललवानी के लिये काम करता है और राम ललवानी इसे काफी पैसा देता है । इस फ्लैट के ठाठ तुम देख ही रहे हो । एक-एक चीज से रईसी टपक रही है और इस फ्लैट का किराया चार सौ रुपये महीना है । अब तुम मुझे यह समझाओं कि इतना सम्पन्न आदमी इतना बड़ा बखेड़ा क्यों करेगा कि दो सौ रुपये की तुच्छ रकम के लिये अपने दो साथियों के साथ तुम्हारे फ्लैट पर आकर तुम्हें दबोच ले और फिर एक बार तुम्हारे प्लैट में घुस आने के बाद भी तुम्हारे फ्लैट की किसी कीमती चीज को हाथ न लगाये और तुम्हारी फ्लैट की किसी कीमती चीज को हाथ न लगाये और तुम्हारी कलाई पर बन्धी हुई कीमती घड़ी उतार लेने की और भी उसका ध्यान न जाये ?”

सुनील को तत्काल कोई उत्तर न सूझा । उसकी कहानी वाकई कमजोर थी ।

“मैं तुम्हें बहुत मुद्दत से जानता हूं सुनील । पहले तो तुम बड़ी विश्वसनीय कहानियां सुनाया करते थे ।”

“अगर मैंने कहानी सुनाई होती तो वह जरूर-जरूर विश्वसनीय होती । यह बात इस लिये कमजोर लग रही है क्योंकि यह सच्ची है । अगर तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो तुम फ्लोरी नाम की उस लड़की से पूछ लो जिसका मैंने तुम से जिक्र किया था । मैंने उसे बताया था कि एक आदमी मेरा पीछा कर रहा है और अपनी ओर से कोलाबा रेस्टोरेन्ट में उसके साथ खाना खाते समय मैंने सोहन लाल से पीछा छुड़ाने की बड़ी अच्छी स्कीम बना ली थी और उस पर अमल भी किया था लेकिन...”

सुनील ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया ।

“फ्लोरी का पता बताओ ।” - प्रभूदयाल बोला ।

“फ्लोरी का पता तो मुझे मालूम नहीं लेकिन वह फोटोग्राफर है और हर शाम को मैड हाउस में आती है ।”

प्रभूदयाल ने सन्दिग्ध नेत्रों में उसकी ओर देखा ।

“मैं सच कह रहा हूं ।” - सुनील बोला ।
 
प्रभूदयाल उठ खड़ा हुआ । वह बैडरूम के सीमित क्षेत्रों में चहलकदमी करने लगा । वह बेहद गम्भीर था । वह बेहद चिन्तित था । लगता था जैसे वह जल्दी किसी नतीजे पर पहुंचने के लिये अपने दिमाग पर बहुत जार दे रहा था ।

कुछ क्षण यूं ही चहल-कदमी करते रहने के बाद एकाएक यह रुक गया और सुनील के सामने आ खड़ा हुआ ।

“सुनील” - वह गम्भीर स्वर में बोला - “मैं तुम्हें छोड़ रहा हूं । इसलिये नहीं क्योंकि मुझे तुम्हारी कहानी पर विश्वास आ गया है या मैं तुम्हें बुनियादी तौर पर एक ऐसा आदमी मानता हूं जो हत्या जैसा जघन्य अपराध नहीं कर सकता । मैं तुम्हें इसलिए छोड़ रहा हूं क्योंकि मैं तुम्हें बहुत अरसे से जानता हूं और मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता कि तुम किसी की हत्या कर दो और इतनी आसानी से पुलिस की पकड़ाई में आ जाओ । अगर तुमने हत्या की होती तो पहले तो पुलिस का तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं जाता । अगर ध्यान जाता तो इतनी आसानी से तुम पकड़ाई में नहीं आ जाते । अगर पकड़ाई में आ जाते तो अपनी निर्दोषिता इतनी शानदार कहानी सुनाते कि हमें उस मे एक भी कमजोर धागा दिखाई न देता । तुमने जो कहानी मुझे सुनाई है, वह बहुत कमजोर है, इसलिये वह मुझे सच्ची लग रही है ।”

प्रभूदयाल एक क्षण रुका और फिर बोला - “अगर सोहन लाल की लाश के पास कोई दूसरी रिवाल्वर मिलती, कोई और हथियार मिलता, एक छोटा-सा चाकू तक मिलता तो मैं मान लेता कि शायद तुमने उस पर गोली चलाई हो । मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता कि तुमने यूं दिन दहाड़े केवल उसका कत्ल करने की खातिर ही उसको शूट कर दिया हो और इसीलिये में तुम्हें छोड़ रहा हूं । सुनील, जरा सोचो । एक आदमी की हत्या हो जाती है । अगले ही क्षण एक दूसरा आदमी रिवाल्वर हाथ में लिये घटनास्थल पर मौजूद पाया जाता है । पुलिस इन्स्पेक्टर आता है, और दूसरे आदमी को छोड़ देता है । जब मेरे आला अफसर यह बात सुनेंगे तो वे शायद मुझ पर बुरी तरह बरसेंगे । मेरे मातहत जब यह बात सुनेंगे तो शायद वे मुझे परले सिरे का अहमक करार देंगे । लेकिन... खैर ।”

सुनीज मेज से उतर गया ।

“और अपनी कुशलता का समाचार देते रहना ।” - प्रभूदयाल बोला ।

“मतलब यह कि तुम मुझे चेतावनी दे रहे हो कि मैं फरार न हो जाऊं ?”

“ऐसा ही समझ लो । दरअसल पुलिस के कोड आफ कन्डक्ट में फरार होना जुर्म का इकबाल करना माना जाता है ।”

“मैं ध्यान रखूंगा ।”

“और अगर तुम्हें ऐसा लगे कि कोई महत्वपूर्ण बात तुम पुलिस को बताना भूल गये हो तो तुम्हें मालूम ही है कि मैं कहां मिल सकता हूं ।”

“थैंक्यू ।” - सुनील बोला और द्वार की ओर बढा । द्वार के समीप पहुंचकर वह ठिठका और प्रभूदयाल की ओर घूमकर बोला - “आज जब कि तुम मुझ पर इतने मेहरबान हो तो एक बात और बता दो ।”

“पूछो ।” - प्रभूदयाल बोला ।

“तुम ने राम ललवानी का नाम लिया था !”

“हां ।”

“पुलिस की उसमें क्या दिलचस्पी है ?”

प्रभूदयाल कुछ क्षण हिचकिचाया और फिर बोला - “हमें विश्वस्त सूत्रों से मालूम हुआ है कि फोर स्टार नाइट क्लब में एक बहुत ऊंचे दर्जे का गैरकानूनी वेश्यालय चलाया जा रहा है । राम ललवानी का सोहन लाल मार्का लोगों से सम्पर्क यह तो जाहिर करता ही है कि वह कोई भला आदमी नहीं है । ऐसा कोई धन्धा वह करता हो तो इसमें कोई हैरानी की बात तो है नहीं ।”

“पुलिस इस बारे में कुछ करती नहीं ?”

“करना चाहती है लेकिन कर नहीं पाती ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि राम ललवानी को नगर के एक बहुत बड़े व्यक्ति की सरपरस्ती हासिल है ।”

“सेठ मंगत राम की ?”

प्रभूदयाल ने हैरानी से उसकी ओर देखा ।

“मुझे मालूम है कि लिबर्टी बिल्डिंग सेठ मंगत राम की है” - सुनील जल्दी से बोला - “इसी से मैंने अनुमान लगाया था ।”

“हां । सेठ मंगत राम मालूम नहीं क्यों राम ललवानी जैसे घटिया आदमी पर मेहरबान है ? गृहमन्त्री तक सेठ मंगत राम के निजी मित्र हैं । केवल संदेह के आधार पर राम ललवानी पर चढ दौड़ने की हिम्मत तो आई.जी. में भी नहीं है, हम तो किस खेत की मूली हैं ! और अभी तक कोई शत-प्रतिशत ठोस बात मालूम हो नहीं पाई है । इसी सिलसिले में हम सोहन लाल को भी चैक करवा रहे थे ।”

सुनील चुप रहा ।

“ओके ।” - प्रभूदयाल ने कहा ।

सुनील ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिलाया और दरवाजा खोल कर बाहर निकल आया । वह सीधा फ्लैट से बाहर जाने वाले द्वार की ओर बढा ।

सब-इन्स्पेक्टर ने आगे बढकर उसे रोकने का प्रयत्न किया ।

“जाने दो ।” - पीछे से प्रभूदयाल की तीव्र स्वर सुनाई दिया ।

सब-इन्सेक्टर के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभरे लेकिन वह तत्काल एक ओर हट गया ।

इमारत से बाहर निकल कर सुनील ने अपनी मोटरसाइकल सम्भाली और सीधा ‘ब्लास्ट’ के आफिस में पहुंचा ।
 
रिसैप्शन डैस्क के समीप वह एक क्षण को ठिठका ।

“मेरा कोई फोन तो नहीं आया था, रेणु ?” - उसने रिसैप्शनिस्ट-कम तो टेलीफोन आपरेटर से पूछा ।

“नहीं ।” - रेणु बोली ।

और फिर इससे पहले कि रेणु अपनी ओर से कोई बात आरम्भ कर पाती सुनील आगे बढ गया । एक ओर रेलिंग लगे लम्बे गलियारे में होता हुआ वह अपने केबिन में पहुंच गया ।

पहले उसने रमाकांत को फोन करने का इरादा किया लेकिन फिर उसने वह इरादा छोड़ दिया ।

वह ‘ब्लास्ट’ के ईवनिंग एडीशन के लिये सोहन लाल की हत्या की घटना की रिपोर्ट तैयार करने में जुट गया । जिस समय वह भगत सिंह रोड से आया था, उस समय तक किसी भी अन्य समाचार-पत्र का रिपोर्टर घटनास्थल पर नहीं पहुंचा था । इसीलिए इस बात की पूरी सम्भावना थी कि शाम को केवल ‘ब्लास्ट’ ही ऐसा पेपर होता जिसमें सोहन लाल की हत्या का समाचार होता ।

उसकी कलम तेजी से कागजों पर चलने लगी ।

***

सुनील यूथ क्लब में पहुंचा ।

रमाकांत अपने दफ्तर में मौजूद था । वह अपनी विशाल मेज के पीछे घूमने वाली कुर्सी पर अधलेटा-सा बैठा था । उसने अपने दोनों पांव मेज पर रखे हुए थे और कमरा चारमीनार के कडुवे धुयें से भरा पड़ा था ।

सुनील के कमरे में प्रविष्ट होने की आहट सुनकर उसने नेत्र खोले लेकिन उसके पोज में कोई अन्तर नहीं आया ।

“आओ, प्यारयो ।” - रमाकांत बोला ।

“जब यूं रेल के इन्जन की तरह इस बेहूदा सिगरेट का धुआं उगलना हो तो कम-से-कम खिड़की तो खोल लिया करो ।” - सुनील बोला ।

“मुझे इस धुयें से कोई एतराज नहीं ।” - रमाकांत शांति से बोला ।

“लेकिन आने वाले को तो हो सकता है ।”

“तो आने वाला खिड़की खोल ले ।”

सुनील ने अपने होंठ काटे, कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर इरादा बदल दिया । उसन आगे बढकर खिड़की खोल दी ।

धुआं बाहर निकलने लगा ।

वह वापिस आकर रमाकांत के सामने एक कुर्सी पर बैठ गया ।

“आओ जी, जी आया नूं, मोतियावालयो, क्या हाल है ?” - रमाकांत टेप रिकॉर्डर की तरह भावहीन स्वर में बोलने लगा - “मुकुल के बारे में मुम्बई से कोई रिपोर्ट नहीं आई है । यह बात मालूम नहीं हो सकी है कि राम ललवानी और सेठ मंगत रात में कोई रिश्ता है या नहीं । मैं तुम्हें चाय हरगिज नहीं पिलाऊंगा । और सुनाओ, क्या-क्या हाल चाल है ? अच्छा, नमस्ते । जाती बार दरवाजा बन्द करते जाना ।”

“आज बहुत उखड़ रहे हो, प्यारेलाल !” - सुनील बोला - “क्या कल रात रमी में हारे गये रुपयों का गम अभी तक सता रहा है ?”

“वह गम भी अभी पैंडिंग पड़ा है लेकिन ज्यादा गम तो मुझे इस बार सता रहा है कि जो काम मैं तुम्हारे लिये करवा रहा हूं, उसने नगदऊ कतई हासिल नहीं होने वाला है ।”

“शायद हो जाये ।”

रमाकांत के नेत्रों में चमक आ गई । उसने मेज से पांव हटा लिये और सुनील की ओर झुकता हुआ बोला - “सच ?”

सुनील ने स्वीकृतिसूचक ढंग से सिर हिला दिया ।

“कोई नई बात हो गई है क्या ?”

“नहीं ।”

“तो फिर नगदऊ कहां से मिलेगा ?”

“मैं कहा था कि ‘शायद’ नगदऊ मिल जाये ।”

“दुर फिटे मूं ।” - नगदऊ के नाम पर जितनी तेजी से रमाकांत की आंखों में चमक पैदा हुई थी, उतनी ही तेजी से गायब हो गई ।

“आखिर तुम इतने लालची क्यों हो ?”

“आज की दुनिया में जिस आदमी को रुपये का लालच नहीं, वह इन्सान कहलाने का हकदार नहीं ।”

“मुझे रुपये का लालच नहीं ।”

“मैं इन्सानों का जिक्र कर रहा था ।”

“और मैं क्या हूं ?”

“तुम तो गधे हो और वह भी निहायत घटिया किस्म के ।”

सुनील चुप रहा ।

“अब क्या इरादा है ?”

“मेरा असली इरादा तुम्हारी तन्दुरुस्ती के लिये अच्छा साबित नहीं होगा ।”

“धमकी दे रहे हो ?” - रमाकांत आंखें निकालकर बोला ।

“हां ।”

रमाकांत कसमसाया और फिर बोला - “पुराने यार हो इसलिये छोड़ देता हूं वर्ना...”

सुनील ने यह नहीं पूछा कि वर्ना वह क्या करता ।
 
“रमाकांत” - वह गम्भीर स्वर में बोला - “मैंने जिस लिफाफे में तुम्हें मुकुल की तस्वीर भेजी थी, वह लिफाफा कहां है ?”

“तुम्हारा मतलब है, वह तस्वीर कहां है ?” - रमाकांत बोला ।

“मेरा मतलब वही है जो मैंने कहा है । मैं लिफाफे के बारे में ही पूछ रहा हूं ।”

“लिफाफे का भी कोई महत्व है ?”

“हां ।”

“क्या ?”

“उस पर उस फोटोग्राफर के घर का पता लिखा हुआ था जिससे ‘मैड हाउस’ में मैंने मुकुल की तस्वीर खिंचवाई थी ।”

“ओह ! वह लिफाफा तो बम्बई पहुंच गया ।”

“कैसे ?”

“भई, जब मैंने जौहरी को बम्बई भेजा था तो मुकुल की तस्वीर उस लिफाफे सहित ही मैंने उसे सौंप दी थी ।”

सुनील कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “तुम्हें मालूम है जौहरी बम्बई में कहां ठहरा हुआ है ?”

“हां ।”

“उसे अर्जेन्ट ट्रंक काल करो ।”

“फोटोग्राफर का पता पूछने के लिये ?”

“हां ।”

“फोटोग्राफर का पता इतना जरूरी क्यों है ?”

“क्योंकि वह फोटोग्राफर की जिन्दगी और मौत का सवाल है ।”

रमाकांत एकदम सीधा होकर बैठ गया ।

“अच्छा ! कैसे ?”

“क्योंकि मुकुल में दिलचस्पी लेना लोगों की तन्दुरुस्ती के लिये अच्छा सिद्ध नहीं हो रहा है । मेरे पास मुकुल की तस्वीर थी इसलिये वह मोटा सोहनलाल अपने बदमाशों सहित मुझ पर चढ दौड़ा और मेरी अच्छी खासी मरम्मत भी कर गया और फिर तस्वीर भी लेकर ही टला । अगर मुकुल नहीं चाहता था कि उसकी तस्वीर किसी के पास हो तो वह यह भी नहीं चाहेगा कि नई तस्वीर हासिल करने का साधन भी किसी के पास रहे । मेरा इशारा मुकुल की तस्वीर के नैगेटिव की ओर है । मुझे भय है कि कहीं उस नैगेटिव को हथियाने की खातिर बदमाश फ्लोरी से भी मारपीट न करें ।”

“फ्लोरी ! फ्लोरी कौन है ?”

सुनील ने होंठ काट लिये । फ्लोरी का नाम अनायास ही उसके मुंह से निकल गया था ।

“फोटोग्राफर ।” - सुनील बोला ।

“वह लड़की है ?”

“हां ।”

“इसीलिये उसकी चिन्ता में मरे जा रहे हो ?”

“मजाक मत करो और थोड़ा एक्शन दिखाओ ।”

“अर्जेन्ट ट्रंक काल के पैसे कौन देगा ?”

“मैं दूंगा, मेरे बाप ।”

“फिर भला मुझे क्या एतराज हो सकता है ! फिर तो तुम चाहे चान्द के लिये अर्जेन्ट ट्रंक काल बुल करा लो ।”

“ओके ।” - सुनील उठता हुआ बोला ।

“जा रहे हो ?”

“हां ।”

“चाय तो पीते जाओ ।”

“अभी तो तुम यह कह रहे थे कि तुम हरगिज चाय नहीं पिलाओगे ।”

“मैं मजाक कर रहा था ।”

“फिर भी चाय पीने का समय नहीं है । मुझे खुद ही फ्लोरी को तलाश करना है ।”

“अच्छी बात है । जा रहे हो तो भगवान से प्रार्थना करते हुए जाओ कि जौहरी ने वह लिफाफा फेंक न दिया हो ।”

सुनील तनिक मुस्कुराया और कमरे से बाहर निकल आया ।

यूथ क्लब की इमारत से बाहर निकल कर उसने अपनी मोटरसाइकल सम्भाली और सीधा मैजेस्टिक सर्कल पहुंचा ।

मोटरसाइकल पार्क कर चुकने के बाद वह मैड हाउस की ओर बढा । उसने अपनी कलाई घड़ी पर दृष्टिपात किया । आठ बजने को थे ।

मैड हाउस के सामने फुटपाथ पर बड़ी चहल-पहल थी । मैड हाउस के दरवाजे पर पहले वाला गेटकीपर खड़ा था ।

सुनील रेलिंग के समीप आ खड़ा हुआ । वह भीतर घुसने की तरकीब सोचने लगा ।

उसने आसपास दृष्टि दौड़ाई । अपने से थोड़ी दूर रेलिंग के सहारे उसे मिनी स्कर्टधारी एक विदेशी युवती खड़ी दिखाई दी ।

सुनील अपने स्थान से हटा और उसके समीप जा खड़ा हुआ । युवती ने एक उड़ती-सी निगाह उसकी ओर डाली और फिर सड़की की ओर देखने लगी ।

“हल्लो !” - सुनील बाला ।

युवती ने उसकी ओर देखा और फिर अंग्रेजी में बोली - “तुमने मुझे बुलाया ?”

“यस ।” - सुनील अपने चेहरे पर एक गोल्डन जुबली मुस्कुराहट लाता हुआ बोला ।

“मैं तुम्हें जानती हूं ।”

“नो ।”

“तो फिर ?”

“मैडम, एक प्रार्थना है ।”

“क्या ?”

“मुझे केवल पांच...”

“सारी ! नो मनी ।”

“आई डिड नाट आस्क फार मनी ।”

“तो फिर ?”

“मैं आपके कीमती समय के केवल पांच मिनट चाहता हूं ।”

“क्यों ?” - युवती उलझनपूर्ण स्वर में बोली । उलझन के साथ-साथ उसके चेहरे पर थोड़ी दिलचस्पी भी झलक रही थी ।
 
“मैं मैड हाउस में जाना चाहता हूं । मैनेजमेंट पार्टनर के बिना किसी को भीतर नहीं जाने देता ।”

“तो फिर किसी ऐसे रेस्टोरेन्ट में चले जाओ जहां का मैनेजमेंट ऐसा बन्धन नहीं लगाता ।”

“लेकिन और जगह मुझे मजा नहीं आता। ऐट अदर प्लेसिज आई डू नाट फील माईसैल्फ ए पार्ट आफ असैन्ट्रिक ट्वन्टियथ सैन्चुरी ।”

लड़की मुस्कराई ।

“तो फिर ?” - सुनील ने आग्रहपूर्ण स्वर में पूछा ।

“तुम इतने खूबसूरत आदमी हो । तुम्हारी कोई गर्लफ्रैंड नहीं है ?”

“एक थी” - सुनील उदास स्वर में बोला - “लेकिन वह मुझे धोखा दे गई । मुझे छोड़ गई ।”

“कोई दूसरी तलाश कर दो ।”

“उसमें तो समय लगेगा न !”

“बस वह एक ही गर्लफ्रैंड थी तुम्हारी ।”

“हां । मैं शरीफ आदमी हूं । एक समय में एक से ज्यादा गर्लफ्रैंड कैसे रख सकता हूं ।”

युवती मुस्कराई ।

“सो ?”

“आई एम सारी, मैन ।” - युवती खेदपूर्ण स्वर में बोली - “मेरे पास तुम्हारे लिये पांच मिनट का भी समय नहीं है । मैं यहां किसी का इन्तजार कर रही हूं ।”

“मेरा काम दो मिनट में भी हो सकता है ।” - सुनील बोला - “आप मेरे साथ चलिये । जब हम ‘मैड हाउस’ में प्रविष्ट हो जायें तो आप उल्टे पांव वापिस आ जाइयेगा ।”

युवती हिचकिचाई, उसने सड़क के दोनों ओर दूर तक दृष्टि दौड़ाई और फिर सुनील से बोली - “चलो ।”

“थैंक्यू वैरी मच, मैडम ।” - सुनील हर्षित स्वर में बोला ।

दोनों मैड हाउस की ओर बढे ।

मैड हाउस के समीप पहुंचकर सुनील ने युवती की कमर में हाथ डाल दिया ।

युवती तनिक कसमसाई लेकिन मुंह से कुछ न बोली ।

गेटकीपर ने लोहे का गेट एक ओर सरका दिया ।

दोनों भीतर प्रविष्ट हो गये।

युवती उसके साथ-साथ सीढियां उतर कर नीचे हॉल में आई ।

“ओके ?” - नीचे पहुंचकर उसने पूछा ।

“ओके । थैंक्यू वैरी मच । आई एम वैरी ग्रेटफुल टू यू ।”

युवती मुस्कराई और उल्टे पांव वापिस लौट गई ।

सुनील ने हाल में चारों ओर दृष्टि दौड़ाई ।

बैंज बज रहा था और डांस फ्लोर पर कुछ जोड़े बैंड में से निकलती हुई धुन पर नाच रहे थे ।

सुनील मेजों में से गुजरता हुआ सारे तहखाने का चक्कर लगा गया ।

फ्लोरी उसे कहीं दिखाई न दी ।

न ही उसे कहीं मुकुल व बिन्दु के दर्शन हुए ।

खाली मेज कहीं भी नहीं थी । एक मेज के इर्द गिर्द चार पीपेनुमा स्टूल पड़े थे । उनमें से एक खाली था तीन पर एक युवक और दो युवतियां बैठी थीं ।

सुनील खाली स्टूल पर बैठ गया ।

उन तीनों ने एक उचटती-सी दृष्टि उस पर डाली और फिर अपनी बातों में मग्न हो गये ।

सुनील ने एक सिगरेट सुलगा लिया ।

साढे आठ बज गये ।

फ्लोरी, मुकुल व बिन्दु में से कोई वहां आता दिखाई न दिया ।

उसने अपनी बगल में बैठे युवक को टोका और पूछा - “आज मुकुल नहीं आया ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“मालूम नहीं । आम तौर पर तो वह सात बजे से ही यहां पर मौजूद होता है ।”

“और वह फोटोग्राफर भी नहीं दिखाई दे रही ।”

“कौन फोटोग्राफर ?”

“वही ऐंग्लो इन्डियन लड़की फ्लोरी जो यहां तसवीरें खींचा करती है ।”

“मुझे उसके बारे में कुछ नहीं मालूम ।”

उसी क्षण वेटर वहां आया ।

सुनील ने उसे कॉफी और हॉट-डॉग का आर्डर दिया और फिर पूछा - “आज फ्लोरी नहीं आई !”

“फ्लोरी मेमसाहब नौ बजे के आसपास आती हैं ?” - वेटर बोला ।

नौ बजे गये ।

फ्लोरी नहीं आई ।

दस बज गये ।

फ्लोरी नहीं आई ।

साढे दस बजे सुनील ने वेटर को दुबारा बुलाया ।

“क्या फ्लोरी रोज नहीं आती यहां ?”

“बिल्कुल रोज आती हैं, साहब । आज ही पता नहीं क्यों नहीं आई । शायद तबीयत खराब हो गई हो ।”

“हां, शायद । सुनो, तुम्हें फ्लोरी के घर का पता मालूम है ?”

वेटर ने नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया ।

“देखो । यहां बहुत-से ऐसे लोग होंगे जिनकी फ्लोरी ने तस्वीरें खींची हैं । तस्वीरों वाले लिफाफे पर भी फ्लोरी का पता छपा होता है । किसी न किसी को उसके घर का पता जरूर मालूम होगा ।”

“होगा साहब लेकिन मुझे इतनी फुरसत नहीं कि मैं हर किसी से पूछताछ करता फिरूं ।”

“इसका मतलब यह हुआ कि तुम दस रुपये नहीं कमाना चाहते ।”
 
“दस रुपये !” - वेटर की आंखें लालच से चमक उठीं ।

“हां ।”

“आप का मतलब है कि अगर मैं आपको फ्लोरी मेम साहब का पता मालूम कर दूंगा तो आप मुझे...”

“हां-हां । अब क्या तुम सारे मैड हाउस में इस का ढिंढोरा पीटना चाहते हो ?”

“मैं अभी मालूम करता हूं ।” - और वेटर लम्बे डग भरता हुआ वहां से चला गया ।

पांच मिनट बाद वह वापिस लौटा ।

“पता किसी को मालूम नहीं है” - वेटर तनिक निराश स्वर में बोला - “लेकिन क्या टेलीफोन नम्बर से काम चलेगा ?”

“चलेगा ।”

वेटर ने उसे एक छोटा-सा कागज थमा दिया जिस पर पैन्सिल से एक नम्बर लिखा हुआ था ।

सुनील ने वह कागज अपनी जेब में रख लिया और फिर वेटर की ओऱ पांच का नोट बढा दिया ।

“यह तो...” - वेटर ने कहना चाहा ।

“पांच का नोट है । मुझे मालूम है, प्यारे लाल । आधा काम, आधा दाम ।”

“लेकिन टेलीफोन नम्बर से तो पता मालूम हो सकता है ।”

“हो सकता होगा । साथ ही यह भी सम्भव है कि जो आदमी टेलीफोन नम्बर से पता बताये वह भी पांच रुपये मांगे ।”

वेटर ने अनिच्छापूर्ण ढंग से पांच का नोट ले लिया ।

“और बिल ।”

वेटर ने उसका बिल उसके आगे रख दिया ।

सुनील ने बिल चुका दिया । बिल की अदायगी में टिप के नाम पर उसने एक नया पैसा भी नहीं छोड़ा था ।

सुनील उठ खड़ा हुआ और सीढियों की ओर बढा ।

वेटर उसे जाता देखता रहा । उसके चेहरे पर सम्मान के भाव नहीं थे ।

अभी सुनील ने पहली सीढी पर ही कदम रखा था कि उसे वही युवती नीचे उतरती दिखाई दी जिसको सुनील ने मैड हाउस में घुसने के लिये गेट पास के रूप में इस्तेमाल किया था ।

सुनील को दोखते ही फौरन पहचान गई ।

“हल्लो ।” - वह मीठे स्वर में बोली ।

“हल्लो ।” - सुनील बोला ।

“जा रहे हो ?”

“हां ।”

“मैं तो तुम्हारी वजह से यहां आई थी ।”

“मेरी वजह से ?” - सुनील बौखला कर बोला ।

“हां । जिसका मैं इन्तजार कर रही थी, वह तुम्हारे यहां घुसने के फौरन बाद ही आ गया था । आज पता नहीं क्या बात है मैं उसके साथ बोर हो गई । मैं उसे चलता करके यहां इस आशा में आई थी कि तुम अभी यहां से गये नहीं होगे । मेरी आशा पूरी हो गई ।”

यह क्या मुसीबत गले पड़ गई ! - सुनील मन ही मन बुदबुदाया ।

“लेकिन मैं भी बड़ा बोर आदमी हूं ।” - प्रत्यक्ष में सुनील बोला ।

“तुम्हारा ख्याल गलत है । तुम बहुत दिलचस्प आदमी हो ।”

सुनील ने उसकी बांह पकड़ ली और उसे तहखाने के एक कोने में ले आया ।

“तुम बहुत खूबसूरत हो ।” - सुनील धीरे से बोला ।

युवती शरमाई ।

“तुम्हारी उम्र भी बहुत कम है । मुश्किल से अठारह साल होगी ।”

“इक्कीस साल ।” - वह बोली ।

“वैरी गुड । अभी तुम्हारे सामने पूरी जिन्दगी पड़ी है । इस लिये मुझे विश्वास है कि तुम अभी ही मरना पसन्द नहीं करोगी ।”

युवती ने चिहुंक कर सुनील की ओर देखा । उसके चेहरे पर गहरी उदासी के बादल मंडरा रहे थे ।
 
“मेरी गर्लफ्रैंड यहां मौजूद है ।” - सुनील उदास स्वर से बोला - “किसी और लड़के के साथ । उसने मेरे साथ बेवफाई की है । मुझसे बेवफाई बर्दाश्त नहीं होती । उसकी बेवफाई ने मेरे मन को उस के लिये और सारी दुनिया के लिये भारी नफरत से भर दिया है । मेरे लिये अपनी या किसी और की जिन्दगी की कोई कीमत नहीं रही है । मैं सारा खेल ही खत्म कर देने वाला हूं । मैंने यहां पर एक बम लगा दिया है । ठीक पौने ग्यारह बजे वह बम फटेगा और इस स्थान से चीथड़े उड़ जायेंगे, मेरे चीथड़े उड़ जायेंगे, मेरी गर्लफ्रैंड के चीथड़े उड़ जायेंगे और तुम यहां से फौरन नहीं चली गई तो तुम्हारे भी चीथड़े उड़ जायेंगे । तुम ने मेरे साथ अच्छा सलूक किया है इसलिये मैंने तुम्हें यह बात बता दी है वर्ना मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि इस तहखाने में मौजूद आदमियों में से कौन मरता है और कौन जीता है ।”

युवती के नेत्र यूं फैल गये थे जैसे अभी कटोरियों में से बाहर निकल आयेंगे । वह भय और आतंक की प्रतिमूर्ति बनी हुई थी ।

“त-त-तुम पागल हो ।” - वह हकलाती हुई बोली - “म... मैं अभी पु... पुलिस को फ-फोन करती हूं ।”

“कोई फायदा नहीं होगा” - सुनील देवदास की तरह सिर हिलाता हुआ बोला - “समय बहुत कम है । इतने समय में पुलिस यहां नहीं पहुंच सकती और अगर पहुंच भी गई तो वह फौरन बम नहीं तलाश कर पायेगी । मैंने उसे बहुत गुप्त जगह पर छुपाया है ।” - फिर सुनील की निगाह युवती के चेहरे से हट कर शून्य में कहीं टिक गईं और वह मशीन की तरह बोलने लगा - “टिक.. टिक.. टिक.. वक्त आ रहा है.. कयामत आ रही है.. हे भगवान, मैं आ रहा हूं.. अपनी सीता बदनामी को साथ लेकर आ रहा हूं । टिक.. टिक.. टिक..।”

“सीता बदनामी ।”

“मेरी बेवफा गर्ल फ्रैंड का नाम है ।”

एकाएक युवती का मुंह यूं खुला जैसे वह चिल्लाने वाली हो ।

“अगर तुमने चिल्लाकर बम के बारे में किसी को जानकारी देने की कोशिश की तो मैं अभी तुम्हारी गरदन तोड़ दूंगा ।” - सुनील के स्वर में इतनी तीव्र क्रूरता का पुट था कि युवती का मुंह फौरन बन्द हो गया ।

“टिक... टिक... टिक... टिक...।”

युवती ने अपनी कलाई पर बन्धी नन्हीं-सी घड़ी पर दृष्टिपात किया और फिर आतंकित स्वर में फुसफुसाई - “ओह माई गॉड ! ओ माई गुड गॉड ।”

फिर वह तेजी से सीढियों की ओर भागी ।

सुनील के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कराहट आ गई । उसने अपनी घड़ी देखी ।

पौने ग्यारह बजने में एक मिनट बाकी था ।

वह लापरवाही से चलता हुआ सीढियों की ओर बढा ।

वह मैड हाउस से बाहर निकल आया ।

अंग्रेज युवती उसे कहीं दिखाई न दी ।

वह लिबर्टी सिनेमा में घुस गया । सिनेमा के पब्लिक टेलीफोन बूथ में से उसने उस नम्बर पर टेलीफोन किया जो मैड हाउस के वेटर ने उसे लाकर दिया था ।

दूसरी ओर घन्टी बजने का सिग्नल सुनाई देने लगा ।

कितनी ही देर घन्टी बजती रही लेकिन किसी ने टेलीफोन न उठाया ।

सुनील ने टेलीफोन डिस्कनैक्ट करके दुबारा नम्बर मिलाया । दूसरी बार भी घन्टी निरन्तर बजती रही लेकिन किसी ने टेलीफोन न उठाया ।

सुनील ने यूथ क्लब फोन किया ।

दूसरी ओर से रमाकांत की आवाज सुनाई देते ही वह बोला - “रमाकांत, सुनील बोल रहा हूं ।”

“बोलो प्यारयो” - रमाकांत का बोर स्वर सुनाई दिया - “तुम्हें बोलने से कौन रोक सकता है ।”

“तुमने बम्बई ट्रंक कॉल बुक करवा दी ?”
 
“हां ।”

“मैं तुम्हें एक टेलीफोन नम्बर बताता हूं, अगर तुम मुझे यह मालूम कर दो कि वह नम्बर कहां का है तो फ्लोरी के पते के लिए शायद बम्बई ट्रंक कॉल करने की जरूरत नहीं रहेगी ।”

“बताओ ?”

सुनील ने उसे एक नम्बर दिया ।

“यह नम्बर फ्लोरी का है ?”

“हां ।”

“लेकिन तुम्हें यह नहीं मालूम कि यह लगा कहां लगा हुआ है ?”

“नहीं मालूम ।”

“ओके । मुझे पन्द्रह मिनट बाद रिंग करना ।”

“दस मिनट बाद ।”

“अच्छा बाबा, दस मिनट बाद ।”

सुनील ने रिसीवर हुक पर टांग दिया ।

दस मिनट बाद उसने फिर यूथ क्लब टेलीफोन किया । रमाकांत ने उसे बताया कि वह टेलीफोन नम्बर मेहता रोड पर स्थित 115 नम्बर इमारत के ग्यारह नम्बर फैलट का था ।

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