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Vasna Story मिस्टर & मिसेस पटेल (माँ-बेटा:-एक सच्ची घटना)

डिनर टेबल पे शादी वगेरा लेके कोई बात नहीं हुआ. बस में जो खाना पसंद करता हु , वही चीजे नानी जी मुझे ज़ादा ज़ादा दे रहे है. मैं जानता था यह सब माँ ने मेरे लिए ही बनाया. आज वह सामने आने में शर्मा रही है, इस लिए नानी के हाथों से सब बार बार देणे भेज रही है. मैं मना कर रहा हुन , पर नानी जी केवल "तुम्हारे लियेही बनाई गयी है. क्यूँ नहीं खाओगे?" और फिर मेरे तरफ देखके, एक मुस्कराहट लेके बोली
" बस और कुछ दीण..... नानी के हाथ का खाना खा लो... फिर तो तुम्हे साँस के हाथ का खाना खाना पड़ेगा." बोलके थोड़ा हास् के किचन के तरफ चलि गई. नाना जी भी इस बात से हॅसने लगे. मैं शर्म के मारे अंदर घुसे जारहा था.

मैं डिनर के बाद नाना जी के रूम में बैठके बात कर रहा था. नानाजी पूछे की अब मुझे नया घर पे शिफ़्ट करना है की उसी घर को रखना है, मैंने बताया की यह घर ही फिलहाल ठीक है . काफी बड़ा घर ही तो है. नानी जी बोलने लगी की अब तो में अकेला था, सब चल जाता था. लेकिन अब फॅमिली रहेगा. हा..होगा वह बहुत छोटी फॅमिलि, केवल पति पत्नी की, फिर भी फॅमिली ही है. सो उसके लिए सारे सामान का भी बंदोबस्त करना पडेगा. मैं ने बोला की उस बात पे कोई चिंता नहि. वह सब में खुद ही संभल सकता हु. तो फिर केवल यह सामने आया की मुंबई वाली रिसोर्ट और शादी को लेके ही जो भी कुछ चिंता है. नाना जी ने कहा की ठीक है, तुम्हारा अब तो ऑफिस भी है. साइट सुपरवाइजर भी है. तोह तुम एमपी में रहनेका सब इन्तेज़ाम को देखो. और में रिसोर्ट वगेरा फाइनल करता हु. लेकिन उस से पहले शादी का एक शुभ दिन, शुभ मुहूर्त भी ढूँढ़ना है. जब यह सब बातें हो रहा था, तब मेरे दिमाग में और कुछ चल रहा था. अगर वह चीज़ मिस होगया तो शायद माँ से मिलना ना-मुमकिन हो जाएगा. मैं फ़टाफ़ट डिस्कशन को एन्ड करके नाना जी के रूम से बाहर आगया. और जैसेही में ड्राइंग रूम की तरफ जाने लगा तब मुझे मेरे रूम की लाइट चालू दिखाइ दिया. मेरी छाती में झट से एक ऐसा फीलिंग्स हुआ की जैसे मेरी छाती से कुछ निकल ने लगा और अचानक मेरी बॉडी हल्का सा हो गया.

मै धीरे से अपने रूम के तरफ चलने लगा. मुझे मालूम था जब में नहीं रहूँगा तब माँ आके मेरा बिस्तर ठीक करके जाएगी. और इस लिए में डिनर करके नानाजी के रूम में जाके वह मौके का इंतज़ार कर रहा था. जिंतना नजदीक जा रहा था , उतनाही नर्वस भी हो रहा था. एक अजीब अनुभुति भी हो रहा था और एक नशा भी. माँ को फेस करने के बाद क्या होगा, वह पता नहीं था. उनको देख के में कैसे रियेक्ट करूँगा या वह कैसे रियेक्ट करेंगी, यह सब अनजान था. फिर भी में उनको एकबार सामने से देखना चाहता हु. बात करना चाहता हु.
मै डोर के पास जातेहि वह मेरा प्रजेंस फील कर लि. वह मेरे तरफ पीठ करके , थोड़ा झुक के, मच्छर दानी सही से चारो तरफ से बिस्तर के साइड में घुसा रहे थी. मेरे आते ही वह अचानक वह सब बंद करके खड़ी हो गई उनका फुल बैक साइड मेरी तरफ है. एक हलकी येलो कलर की प्रिंटेड साड़ी और मैचिंग ब्लाउज पहनी हुई थी. ब्लाउज के ऊपर गोरी गोरि, क्रीम जैसा मूलयां, सुडौल गर्दन और पीथ के ऊपरी भाग नज़र आरहा था बाल एक जुड़ा बांधके रखा है. उनकी बॉडी कर्वे ढ़लान लेके दोनों साइड से आके उनकी पतली कमर में मिल गया. उनके नितम्ब के ऊपर से साड़ी टाइट होक बढ़ा हुआ है. उससे वह और भी उभर के सामने आगया. आज तक जो चीज़ मेरा फंतासी दुनिया में होता था, आज पहली बार यह हुआ की उनको देखके उनके सामने हि, पाजामे के अंदर मेरा पेनिस कठिन होने लगा. उन्होंने उनका राईट हैंड से पलंग का स्टैंड पकड़के स्थिर हो गयी. यह सब कुछ्, कुछ दिन से जो हो रहा है, उनसब के बीच आज पहली बार में माँ को एकांत में मेरे नजदीक पाया. उनको उसी तरह सर झुकाके खड़ी होदे देख के अचानक मेरे अंदर का सब नर्वस्नेस धीरे धीरे ग़ायब होने लगा और एक अजीब मदहोशी मेरे में छाने लगा. जो अनुभुति और प्यार में उनके लिए पिछले ६ साल से छुपाके रखा था, आज वह प्यार, वह अनुभुति पहली बार मेरे दिल में इस वास्तव दुनिया में आने लगा. दिन भर बहुत कुछ सोचा था माँ को लेके, लेकिन अब जब वह सामने खड़ी है तो में सब कुछ भूल गया . केवल मेरे छाती में वहि पाणी का तरंग जैसे कुछ बहने लगा. मैं रूम के अंदर गया. वह अपने राईट हैंड की थंब नेल से पलंग के स्टैंड के उप्पर रब करने लगी. मैं उनको देखते हुए कहा
"मा......अक्टुअली.....मतलब.......में तुमसे सच मुच बहुत प्यार करता हु"
येह सुनतेही माँ शायद थोड़ा काँप उठि. फिर खुद को कण्ट्रोल करके वहां खड़ी रहि. मुझे उनका चेहरा देखने का बहुत मन कीया. मैं धीरे धीरे चलके मेरे स्टडी टेबल के पास गया. वहाँ से उनका साइड प्रोफाइल नज़र आ रहा था उनके चेहरा पे शर्म छाया हुआ है. नज़र झुकि हुई है पैरों की उँगलियाँ के तरफ. यहाँ से मुझे उनके पेट् का कुछ हिस्सा नज़र आरहा है. एक दम फ्लैट है. मैं उस तरफ देख के सोचने लगा की उस पेट् के अंदर ही एकदिन मेरा बच्चा आएगा. मैं यह सोच के और भी रोमाँचित हो गया और पाजामे के अंदर मेरा अपना पेनिस सख्त हो गया. जैसे ही में डोर छोड़के अंदर आया और चुप चाप यह सब सोचने लगा, उन्होंने फट से मुड़के , मेरे तरफ बैक करके , तेज़ी से घर से निकल गई. मैं उनका जाना देखने लगा. ऐसी एक सुन्दर औरत, जिसको में प्यार भी करता हु, रेस्पेक्ट भी करता हु, चाहता भी हु, उनके साथ ही में पूरी ज़िन्दगी बिताने वाला हु. यह सोच के मन में ख़ुशी छा गया.
 
अगला दिन शनिवार है. मैं हर बार की तरह ऑफिस में मॉर्निंग शिफ़्ट में जाके, बस साइन करके जल्दी जल्दी निकल गया स्टेशन के लिये. मुझे अब एक नयी अनुभुति होने लगी. मेरा डिसीजन अब माँ भी जान चुकी होगी. और घर पर सब को मालूम है की इस रिश्ते के लिए हम दोनों ही मंजूरी दे दिया है. सो नाउ में सोचने लगा की अब कैसे इन सब को फेस करुन्गा.
पहले की तरह इस बार भी मुझे घर पे वार्म वेलकम मिला. पर फिर भी में थोड़ा डिफरेंस मेहसुस करने लगा. नाना नानी इस तरह मेरा स्वागत किया जैसे में कोई बाहर का आदमी हु एंड वेरी रेस्पेक्टड्. मैं यह सोच के थोड़ा शर्मा गया की वह लोग ऐसे कर रहे है शायद इस लिए की में कुछ दिन में उनलोगों का दमाद बन्ने जा रहा हु.

मैं फ्रेश होने के लिए अपने रूम में गया. गर्मी का समय. तो में फिर से नहाना चाहताथा. शावर के नीचे खड़े होक नाहा रहा था. ठंडे पानी से नहाने में बहुत अच्चा लग रहा है. मैं पूरा बदन अपना हाथ से रगड रगड के आच्छे से नहाने लगा. जब मेरा हाथ मेरे पेनिस छुये, में नीचे की तरफ देखा. पेनिस अब अपना नार्मल साइज में था. उसको हाथ में लेके सोचा की बेटा, और कुछ दिन सेहलो, कल्पना में तुम जहाँ घुसके सबसे आराम और शान्ति मेहसुस करते हो, वह तुमको मिलने वाला है, पूरी ज़िन्दगी के लिये. यह सोचते ही पेनिस फूलने लगा. मैं तुरंत उसको छोड़ दिया और उसके आस पास सब साफ़ सफाई करके शावर से बाहर आगया.
एक पाजामा और टी-शर्ट पहेनके रूम से बाहर निकल तेहि माँ के रूम की तरफ देखा. यह सोच के रोमाँचित हो गया की मेरी होनेवाली बीवी मेरे आस पास ही घूम रही है. मुझे माँ से मिलने की एक चाहत होने लगी. पर अब शायद वह नानी के साथ ही होगी. सो में सोचने लगा की उनसे कैसे, कहाँ थोड़ा अकेले में मिल पाऊंगा.

मैन ड्राइंग रूम में आके नाना जी के पास बैठ के टीवी न्यूज़ देखने लगा. तभी नानी जी एक प्लेट में कुछ मिठाई लेके मेरे सामनेवाली सेंटर टेबल पे रखदी. इस टाइम बराबर मुझे चाय मिलता था. आज भी वही एक्सपेक्ट किया था. अचानक आज इस तरह से मिठाई का प्लेट देखके में ऐसे ही कहा दिया
" यह क्या.... अभी यह मिठाई-फिटाई कौन खायेगा नानी जी ?"
नानीजी पाणी का गिलास आराम से रखते रखते बोली
" क्यूं....तुम खाओगे"

मैं क्यजुअली बोला
" अरे नानीजी मुझे यह मिठाई नहि...अब एक गरम चाय चहिये"
नानी मेरे तरफ देखके मुस्कुराके बोली
" चाय भी पिलायेंगे. लेकिन उससे पहले यह खालो. अब यह घर तुम्हारा अपना घर के साथ साथ तुम्हारा ससुराल भी बनने जा रहा है. सो शुरुवात मीठा खाके करोगे तो रिश्ता भी मीठा रहेंगा" बोलके चेहरे पे एक मुस्कराहट फैलाके जाने लगी. मैं एक दम ऐसे खुल्लम खुल्ला बाते सुनक, अपने आप थोड़ा शरमाने लगा. नानाजी मेरे तरफ देखके स्माइल करके बोल
" खा लो"
मैन इस बात को यही समेटने ने केलिए चुप चाप प्लेट उठाके खाने लगा और टीवी की तरफ नज़र तिकाके सिचुएशन सहज करनेकी कोशिश करने लगा.

कुछ देर बाद नानी फिरसे आई और आके नाना के पास बैठ गयी. फिर नानाजी टीवी ऑफ करके मेरे से बात करना चालू किया. वह लोग धीरे धीरे सीरियस होने लगे और मुझे बहुत सारी चीज़ों में मेरा राइ पुछने लगे. जैसे की शादी का प्रोग्राम कहाँ , कैसे किया जाए. हमारे ज़ादा रिश्तेदार कभी नहीं थे, और जो भी थे पिछले कुछ सालों मे न मिलने के कारण, सब बिछड गए. सो उसमे कोई प्रॉब्लम नहीं है. प्रॉब्लम है हमारा मुहल्ला और पड़ोसी और कुछ दोस्तोँ को लेके. इन लोगों से हमें बचके सब कुछ करना पड़ेगा. इस लिए तय हुआ की यहाँ नहि, और कहीं जाके शादी का प्रोग्राम बनाना पड़ेगा. यानि की कोई दूर जगह जाके, जहाँ हमारा रिलेशन्स वगेरा किसीको कुछ भी मालूम नहि. वहाँ जेक शादी का रसम सम्पन्न करना पड़ेगा. तब नानी को याद आया की कुछ साल पहले , नाना जी का बिज़नेस लाइन का कोई दोस्त की बेटी की शादी हम सब लोग मिलके अटेंड किया था मुंबई मे. एक्चुअली वह जगह मुंबई सिटी के अंदर नहीं था. मुंबई से कुछ किलोमीटर्स दूरि पे, मुंबई-गुजरात हाईवे के साइड में एक रिसोर्ट में हुआ था शादी. वहाँ की खास बात यह थी की एकदम अकेले में है वह रिसोर्ट और शादी में अटेंड करनेवाले सब को रहने का आवास भी प्रदान करता है. साथ में जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है यानि की शादी का रसम का अरेंजमेंट--पंडित से लेके रजिस्टर्ड साहब तक, सब वह लोग देते है. ..था वह एक बड़ा शादि, पर हम्मे तो वह सब कुछ नहीं चहिये. खाली शादी का रसम पूरा करने का बन्दोबस्त, हम चार लोगों का रहने का इन्तेज़ाम. बस और क्या. यह सब डिस्कशन में में थोड़ा संकोच करने लगा और खुलके बात नहीं कर पा रहा था. पर नाना जी बोले " अरे बेटे यह सब तुम्हारी ज़िन्दगी की महत्वपूर्ण चीज़ें है. इस में तुमको खुलके आगे आना चहिये. और हम तुम्हारे साथ है." तब में थोड़ा सहज होने लगा और नाना जी से सारे प्लानिंग करने लगा.

इन सब बातों के बीच मेरे दिमाग में यह सोच चल रहा है की कैसे भी करके माँ से एकबार मुलाकात करनी है. मुझे यह भी मालूम था की माँ से ऐसे आसानी से मुलाकात नहीं हो पायेगा. वह जानबूझ के मुझसे दूर रह रही है. बिलकुल कोई मौका नहीं देरही है आमने सामने आनेका. इस्स लिए में उनका चेहरा ठीक से देख भी नहीं पा रहा हु. पर नाना जी से बात करते करते ही मेरा दिमाग में एक झलक सी आइ. मुझे एक ही रात घर पे रुख ने को मिलता है. दूसरी रात में यानि की संडे रात को में निकल जाता हुन एमपी के लिये. सो मुझे आज रात में ही माँ से मिलना है. एकान्त मे. इतनी सब कुछ बाते हो रही है. शादी की प्लानिंग तक शुरु हो गया. और अभी तक दूल्हा और दुल्हन की एक बार बात भी नहीं हो पाई मुझे एक बार उनसे बात करनी है.
 
आखिर उस शुक्रवार मैं, डिनर के बाद मे नानाजी को फोन लगाया. नानाजी फोन उठा के बोले
"हैल्लो.''
मैं तुरंत कुछ बोल नहीं पाया. कुछ पल बाद बोला
''हैल्लो नानाजी..आप लोग सो तो नहीं गए?''
''नही नहीं बेटा.... सोया नही..बस सोने की तैयारी कर रहा हु".
मेरे दिमाग में बहुत कुछ चल रहा है. कैसे क्या कहुँ वह ठीक से मुह मे नहीं आरहा है. मैं जबाब में केवल ''आह अच्छा..'' ही बोल पाया. फिर मेरी चुप्पी देख के नानाजी भी बात ढूंढ ने लगे और बोलै
''टीम कैसे हो बेटा?''
''में ठीक हुण''
"डिनर हो गया तुम्हारा?"
"हा जी...."
फर से चुप्पी छा गया. आज हज़ारों बाधा, हज़ारों चिंता, हज़ारों अनुभुति मेरे दिल के उप्पर भारी होके बैठा हुआ है. पर मुझे आज वह सबकुछ तोड़के, सब बाधा हटाके बोलना है जो में बोलने के लिए फ़ोन किया. मेरी इस तरह ख़ामोशी देखके नानाजी पुछै
''हितेश...बेटा तुम्.... कुछ कहना चाहोगे?''
मैने ने जैसे ही जवाब में '' ह्म्म्म'' कहा, मेरे बदन में एक करंट सा खेल गया. पूरा शरीर कांपने लगा. खुद को कण्ट्रोल करते हुए मैंने कहा
'' नानाजी,.....आप लोग मुझसे बहुत बड़े है. और हमेशा से मेरी भलाई बुराई सोचते आरहे है......''
फिर में रुक गया. बात सजाने लगा मन मे. पर में समझ गया नानाजी बहुत ध्यान से बिलकुल साइलेंट होक सुन्ने लगे. शायद वह मेरी ख़ामोशी की भाषा भी पड़ने की कोशिश कर रहे थे. मैं फिर बोलने लगा
''अगर....अगर....आप लोगों को लगता है की .....इस में ही सब का अच्छा है......इस में सब खुश रहेंगे ....... और ....... और ..... माँ भी इस से सेहमत है ......... तो .... .....''
मैं रुक गया. यह बताने के बाद एक खुशी और एक अद्धभुत फीलिंग्स मेरे पूरे शरीर के खून में दौड़ने लगी. नानाजी आवाज़ में थोड़ी हसि मिलाके अचानक बोले
'' मैं समझ गया बेटा. तुम बिलकुल चिंता मत करो. सब ठीक हो जाएग.
तूम बस कल घर आओ . बाकि बाते घर पे बैठ के करेंगे''
उस रात मुझे न कोई तस्वीर, न कोई मन घड़ंत दुनिया की जरुरत पड़ी. मैं अपने ही बेड पे लेते लेते आनेवाले कल में जो होनेवाला है, वह सोच के बिलकुल रोमांचित हो गया. इतने दिन जो चीज़ केवल मेरे मन के अंदर एक छोटे कमरे में रखी हुई है. आज अचानक वह चीज़ इस बाहर की वास्तव दुनिया में सच होने जा रही है. मेरे रूम की ब्लू नाईट लैंप की रौशनी चारो तरफ फैली हुई है. मैं यह सब सोच के मेरे पाजामे का नाडा खोल. आलरेडी मेरा पेनिस उसके आनेवाले समय को मेहसुस करके खुद ही ख़ुशी से फूल रहा था. मैं पूरा मुठ्ठी से उसको पकड़के धीरे धीरे सहलाने लगा. आँख बंध करते ही मेरी माँ मेरी नज़र के सामने अपनी झुकि हुई नज़र से खड़ी है. मैं और उत्तेजित हो गया यह सोच के की यह खूबसूरत औरत कुछ दिनों में बस मेरी ही होने वाली है. मेरी बीवी बननेवाली है. मेरा पेनिस का कैप इस सोच में और फूल गया. मैं तेज़ी से हिलने लगा. और माँ का गले में मेरा दिया हुआ मंगलसूत्र और मांग में मेरे नाम का सिन्दूर कल्पना करके में ओर्गास्म की तरफ पहुच गया. मेरा बॉल्स फूल गया और सीमेन शूट करने के लिए तैयार हो गया. मैं तेज़ी से स्वास ले लेके केवल बोलने लगा ' मा..आई लव यू लव यु मा...आई.. लव यु'. माँ की कोमल पुसी , जिसको बस कुछ दिन बाद से केवल मुझे ही एक्सेस करने का अधिकार मिलेगा, उसको कल्पना करके उसके अंदर मेरा वीर्य छोड़ने का सुख मेहसुस करके, मेरा एकदम फुला हुआ मोटा पेनिस जोर जोर से झटके खाने लगा और अचानक फींकी लेके मेरा सीमेन मेरा फेस, गला ,छाती सब गिला करके भर भरके निकल ने लगा. आज पहली बार इतना सीमेन निकला की में खुद हैरान हो गया. जब मेरा ओर्गास्म पूरा होगया, में शान्ति से अंख बंध करके बेड पे पड़ा रहा.
 
आगला दिन रविवार था मैं सुबह जल्दी उठ गया था मैं हमेशा जल्दी उठ ता हु माँ ने ये आदत लगाई है मुझे. माँ जादातर मेरे पीछे पड़ पड़ के बचपन से यह आदत बनादि है. माँ हमेशा बोलती थी की सुभा उठके पढाई करूँगा तोह जल्दी से सब याद रह जाएगा. ऐसी बहुत सारी अच्छी आदते मेरे में डाल दिया है माँ ने. इस लिए में ज़िन्दगी के रास्ते में चलते टाइम हर पल उनकी उपस्थिति महसुस करते आया हु. वही एक मात्र नारी है जो मेरे पूरे दिल में छाई हुई है. शायद इस लिए कभी और कोई लड़की मेरे मन में जगह बना नहीं पाई
सुबह नींद तूट ते ही देखा सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर लाक़े पूरा घर रौशनी से भर दिया. खिड़की से बाहर की कुछ आवाज़ें आ रहा है. ऊपर फैन घूम रहा है फुल स्पीड में, फिर भी गर्मी जा नहीं रही है. लेकिन यह सब के अलवा मेरे दिल में एक ठण्डी शीतल अनुभुति महसुस कर रहा हु, जो मेरे पूरे बदन को एक नशीली आवेश में भरके रखा है कल रात नानाजी नानीजी ने जो बात कही है, हो सकता है वह इस दुनिया में ऐसा होता नहीं है. समाज उस चीज़ को मान्यता देता नहीं है. पर हमारे घर में सब..यनि की नाना, नानी और मा...सब इस में सहमत है. सब हमारी खुद की भलाई के लिए ही यह चाहते है. और उसके लिए जो भी बाधा का सामना करना पड़ेगा, जो संकट सामने आकर खड़ा होगा, जो सैक्रिफाइस करना पड़ेगा, वह लोग सब कुछ सहने के लिये, सामना करने के लिए भी तैयार है. तो बाहर की दुनिया के बारे में क्या सोचना है !! और माँ भी एक नारी है. उनके अंदर जो औरत है, उस सुन्दर औरत को में पिछले ६ साल से, एक कल्पना की दुनिया बनाके, अपने ही अंदर छुपाके रख के प्यार करते आ रहा हु. बॉल अब मेरे कोर्ट में है. अगर में चाहू तो वह कोमल दिल की नाज़ुक औरत ज़िन्दगी भरके लिए मेरी हो सकती है इसी वास्तव दुनिया मे, मेरी जीवनसाथी बन सकती है, मेरी बीवी बन सकती है, मेरे बच्चों की माँ बन सकती है. एक ख़ुशी के आवेश मे में आँख मूंद के बिस्तर पर पड़ा रहा. तभी दरवाज़ा खट खटाके नानाजी नास्ते के लिए बुलाया.

अब यह अबतक की मेरी ज़िन्दगी का सबसे कठिन समय है. ऐसी एक परिस्थिति हुई है, जहाँ हर कोई एक सीक्रेट को जानलिया. और ऊपर से इनमे से कोई भी एक इंसान यह भी जनता है की यह सीक्रेट बाकि सब को भी मालूम है. फिर भी कोई कुछ नहीं बोल पा रहा है इस बिषय मे. सब पहले जैसा रहने का, बोलने का कोशिस कर रहा है, पर अंदर ही अंदर न जाने क्या एक चीज़ सब को एक दूसरे से थोड़ा अलग कर के रख रही है. खाली एक ही डिफरेंस है. हम चरों में से, केवल माँ सब की नज़र से छुपके रह रही है. स्पेशली मेरे. नाश्ते की टेबल पे भी कल रात जैसी स्थिति थी. माँ किचन से नानी के हाथ से खाना भेज रही है. आज केवल सब लोग थोड़ा कम बोल रहे है.

पुरा दिन ऐसे ही कट ता रहा. नाना नानी से में कम्फर्टेबल होने की कोशिश किया. फिर भी दिमाग का एक हिस्सा सब कुछ नार्मल बनाने में रोक रहा है. वह लोग भी आपस में बात कर रहे है लेकिन धीरे धीरे, कभी कभी मेरे से दूर रहके या मेरा नज़र से बाहर. पर सब कुछ मैं महसूस कर पा रहा था. ड्राइंग रूम में ज़ादा तर टाइम बिताने लगा. इस लिए माँ भी नज़र नहीं आइ. क्यूँ की में समझ गया माँ केवल अपने रूम और किचन में ही आना जाना कर रही है पीछे का बरंदाह से. सो वह मेरे सामने अने में हिचकिचा रही है. शायद शर्म उनको घिरके रखा है
मैं हमेशा की तरह संडे रात को निकल पड़ा स्टेशन जाने के लिए . मैं रात को ट्रेवल करता था एमपी जाने के लिये. क्यूँ की रात में में सोटे सोटे एमपी पहुच जाता था. इस में नीद भी हो जाती और टाइम भी मैनेज हो जात. हर बार की तरह इस बार सब कुछ पहले जैसे नहीं हुआ. इस बार में चुप चाप निकल ने की तैयारी करने लगा. नाना नानी भी मुह पे स्माइल लेके चुप चाप खड़े है. नानी का पैर छूटे ही उन्होंने सिलेंटली मुझे गले लगा लिया. और कुछ पल ऐसे ही वह पकड़ के रखी. जैसे उन्होंने मुझे कोई सहारा दे रही है. मेरे अंदर की सोच को एक परम ममता से भर दे रही है. जब उन्होंने मुझे छोड़ा तब एक माँ की स्नेह भरी आवाज़ से बोली " अपना ख़याल रखना". मैं ने खामोशी से सर हिलाया. नानाजी मेरे नज़्दीक आकर उनका राईट हैंड मेरे पीठ में रख के थप थपा दिए. मैं उनका पैर छुने गया तो उन्हों ने सिचुएशन इजी करने के लिए कहा " क्या भाय...अपना हीतेश इतने बड़े ऑफिस में इतना बड़ा बड़ा काम कर रहा है, अब वह बच्चा नहीं है. वह अब अपनी ज़िन्दगी का भलाई बुराई खुद ही सोच सकता है...." . फिर मुझे देख के कहा " है की नहीं ?" . मैं खामोशी से स्माइल देके मेरा बैग उठाने लगा. मेरा मन बहुत कह रहा था की में एक बार माँ से मिलके जाऊ. लेकिन कल रात से में खुद उनके सामने जा नहीं पा रहा हु जिद्द के लिए नहि, एक संकोच घेर के रखा है मुझे. एक शर्म मुझे दूर करके रखा है उनसे. चाह कर भी मेरा कदम उठाके उनके सामने जा नहीं पा रहा हु. शायद यह इस लिए की में मेरे से ज़ादा उनको शर्मिंदा नहीं करना चाहता था एक अजीब परिस्थिति में उनको डालके. ऐसे सिचुएशन में उनको नहीं ड़ालना चाहता था जहाँ वह शर्म और ग्लानी में खुद को दुःख पहुँचाए. तभी भी में जाने से पहले उनकी एक झलक देखने के लिए छट पटा रहा था. दरवाजे से निकल के पीछे मुड़के नाना नानी को "बाय" बोलते टाइम , उनकी नज़र चुराके अंदर की तरफ देखा था. मन सोच रहा था , शायद वह वहां कहीं खड़ी होगी. पर में निराश होके निकल गया
ओफिस में काम का प्रेशर था. मैं पूरा दम लगाके काम पे लग गया.
फिर भी हमेशा वह बात मेरा मन में रहता था. पूरे हप्ताह में इस को लेके सोचता रहा. ऑफिस में या साइट विजिट के टाइम भी मन में वह बात आजाती थी. जब भी उस बारे मे में थोड़ा गौर से सोचता था, तब ख़ुशी का एक आवेश मुझे पकड़ लेता था. पूरे हप्ता में ऐसे ही एक ख़ुशी और एक टेंशन में गुजर ता रहा
मैं वापस अने के बाद माँ को भी फ़ोन नहीं करता था. जब भी में फ़ोन करने के लिए सोचता था, मुझे एक शर्म और एक अन्जान अनुभुति घिरके रहता था. नानीजी एक बार फ़ोन करके मेरा हाल पूछे थे. बस...और न उनलोगों ने, ना में...हम कोई किसीसे बात नहीं कर रहा था.
ऐसे धीरे धीरे सब कुछ सोच के, सब ठीक विचार कर के, मेरे मन में एक रोशनाई पैदा होते रही. मेरा दिल भी अब एक पक्का डिसिशन में पहुच गया. और जैसे ही मेरा दिमाग उस डिसिशन को एक्सेप्ट किया, तभी से मेरे अंदर एक आनंद और सुख की अनुभुति फैली हुई है. मैं संकोच से बाहर आके मेरा डिसिशन नानाजी को बताना चाहा.
 
नानाजी थोड़ा चुप हो गए. शायद मेरा रिएक्शन परख रहे है. मेरा दिमाग में दूसरा कैलकुलेशन चल रहा है. अब मुझे लगा की शायद इस बात से माँ दुखी है और मुझसे शायद नाराज भी है. मैं मन में सोचा की अगर उनका ख़ुशी के लिए मुझे शादी न भी करना पडे, तो मुझे कोई खेद नहीं है. उनको ज़िन्दगी भर खुश रखना चाहता हुं.
नानाजी फिर बोले
"देखो बेटे ..तुमहारा लाइफ में कोई आकर तुम्हारे पास खड़े हो जाए, तुम्हारा हर इमोशन सही तरह से शेयर कर ले, हर चढाई उतराई में तुम्हारे साथ रहके ज़िन्दगी की राहों में चलना आसान कर दे. इस लिए सब के लाइफ में बीवी की जरूरत पड़ती है."
मैं में जो सोच रहा था टेंशन के साथ, शायद उस का छाप मेरे फेस पे नज़र आया था. इस लिए नाना नानी हास पडा. नानाजी आगे बोलते रहै
" हमने आज तक तुमहारा सब भला बुरा सोच के ही काम किया. अब यह लास्ट ड्यूटी भी ठीक से पूरी हो जाये तो चैन से मर सकता हु."
मैं माँ का बात सोच के बोलने लगा
" नानाजी....आप का बात ठीक है... लेकिन ......."
मैन रुक गया. मुझे पहले माँ से जानना है , क्या इस बात को लेके वह दुखी है !!. इस लिए मुझे गुस्सा होक मेरे से दूर है!! लेकिन नानाजी शायद मेरा द्विधा समझ गए और मेरा बात पकड़ के बोले
" बेटा पहले में जो बोल रहा हुन ..पुरा सुन लो. फिर तुम आराम से सोच समझ के मुझे बताना. अगर तुम को लगे की यह हमारा सब का भलाई के लिए है, तो वैसे सोच के बताना, नहीं तो जो मन में डिसाईड करोगे ,वईसे ही बताना. कोई प्रेशर नहीं तुम्हारे उपर. "
यह बोलके नानाजी नानीजी को देखे. नानीजी भी सहमत होकर अपना सर हिलके मुझे आश्वसन दिलाया.
नानाजी फिर से बोलना शुरू किया
" बेटा...हुम तुम को सब चीज़ दिया बचपन से, जो हर कोई बच्चे को मिलता है, लेकिन एक चीज़ कभी नहीं दे पाये"
मैं नानाजी के तरफ देख के सुनने लगा
" हर बच्चे का नसीब में किसीको 'पापा' कहके बुलाने का सुख है, वह हम कभी तुम्हे प्राप्त करने का सौभाग्य नहीं दे पाया. और अब तुम्हारा शादी हो जाये तो तुम को एक नए मम्मी पापा भी मिलेंगे."
फिर नानाजी थोड़ा आगे आके , मेरा हाथ अपना हाथ के अंदर लेके, दूसरी हाथ से मेरे हाथ को दो बार थप थपाया. और एक मुलायम स्नेह भरी आवाज़ से मुझे देख के बोलने लगे
" हम सब का भलाई सोच के ही यह सब कर रहा हु.........अगर तुम को बोलू...मतलब...क्या तुम मुझे 'पापा' बोलके बुलाना पसंद करोगे?"
बोलके मेरे आँखों में अंख मिलके देखने लगे. मुझे इस बात को समझने में कुछ पल लग गया. जैसे ही इस का मतलब मुझे समझ में आया, तभी मेरा शरीर में एक अनजाना अनुभुति फ़ैलने लगाग. मैं फिर भी कन्फर्म होने के लिए , गले में उसका असर पड़ने ना देखे, पुछा
" मतलब आप क्या कहना चाहते है नानाजी ?"
नानाजी स्ट्रैट बोलने लाग
" बेटा अब में तुम्हारा नाना बनके नही, एक बेटी का बाप बनके तुमसे यह पुछ रहा हु की क्या तुम मेरी बेटी का हाथ थामोगे?"
अब मेरे अंदर एक अजीब सा, एक अद्भुत सा फीलिंग्स होने लगा. जो में बयां नहीं कर सकता. मैं केवल बोला
" एह्...यः....आप क्य...क्या कह रहे है नानाजी......"
"हम बहुत..बहुत सोच समझने के बाद यह बात तुमको बोलने का साहस किया"
मैं अपने आप को कण्ट्रोल करते हुए कह
"पर...पर....यह कैसे होगा.....कैसे मुमकीन है......"
" अगर हम चाहे तो सब हो सकता है बेटा"
मेरी माँ का चेहरा मेरे नज़र के सामने आया. मैं सोचने लगा की यह सब बात सुनने के बाद में माँ से कैसे फेस करूँगा अब. और नाना नानी मेरे से खुलके ऐसे बात कर रहे है की मुझे एक शरम, न जाने क्या , मुझ में छा ने लगाग. मैं बोला
" नानाजी हम कैसे ऐसे कर सकते है....ना की कहीं...कभी ऐसा हुआ!!"
नानाजी शांत आवाज़ से कहे
"बेटा...में और तुम्हारा नानी इस बारे में सोचा..हमसब का ख़ुशी के लिए हम कुछ भी सहने के लिए तैयार है. हम बस चाहते है की हमारा बेटी और हमारा पोता ज़िन्दगी में हमेशा खुश रहे..."
फिर थोड़ा रुक के बोले
" और...और तुम्हारी माँ भी इस रिश्ते के लिए राजी है."
मैं चोंक गया. क्या माँ भी जानती है यह सब!! क्या इस लिए वह मेरे सामने नहीं आरही है!! इस लिए फ़ोन पे ठीक से बात नहीं कर पायी!! और तो और उन्होंने इस रिश्ते को अपनाने के लिए भी मंजूरी दे दि.. मेरा स्पाइन में के एक ठण्डी शीतल पर दिल में कम्पन देणे वाली एक अनुभुति धेरे धेरे नीचे जेक पूरा सरीर में फैल गया. मेरा सर झिमझिम करने लगा. फिर भी में थोड़ा आश्चर्य और डाउट के साथ धिरे से पुछा
" क्या आप लोग माँ से भी इस बारे में बात......और.....और उन्होंने ...."
बोलके में चुप हो गया. नानाजी बोले
" पहले तो वह हम से बहुत गुस्सा किया. एक दम ख़फ़ा हो गयी थी. तीन दिन ठीक से बात भी नहीं कि, खाना भी नहीं खायी. दिन भर रूम लॉक करके अंदर रहने लगी. फिर और दो दिन बाद सिचुएशन थोड़ा सहज हुआ. मंजु भी धिरे धिरे थोड़ा नरम होने लगी. और कल जब तुम्हारा नानी से मंजु का बात हुआ तो तभी हम जान पाये."
मेरा दिमाग में बहुत सारे सोच्, चिंता भर के भीड़ करने लगा. मैं कुछ न बोलके बैठा था. नानाजी बोले
" हम तुम पर जबरदस्ती से हमारा इच्छा चढा नहीं रहा हु. इतना जल्दी जवाब देणे की जरुरत नही. तुम टाइम लेके सोचो. फिर बताओ. जो भी राय होगा तुम्हारा, उसको हम प्यार से एक्सेप्ट करेंगे"

उस दिन में बहुत सारे चिंता और नए नए अनुभुति के साथ धिरे धिरे नाना जी के रूम से निकल के मेरे रूम में आया. मेरा अनुपस्थिति में , मेरा बिस्तर एक दम फिट फाट बनाके गयी है मा. मैं ज़ादा सोच भी नहीं पा रहा था. बस जाके सो गाया. नीद नहीं आ रही थी. बीच बीच में एक नइ उत्तेजना से कांपने लगा. जो भावना मेरे मन के अंदर थी, आज वह सच मुच घटने जा रहा है. एक रोमाँच में बन्द होकर आंख बंध करके पड़ा रहा. ऐसे कैसे टाइम चला गया पता नहीं चला. देर रात तक अकेला सो सो के कुछ डिसिशन लेनेका फैसला किया. पर हालत ऐसा था की उस से पहले खुदको हल्का करने के लिए पाजामे के अंदर से अपना पेनिस निकल के हिलाने लगा. पेनिस आज ज़ादा गरम मेहसुस हुआ. मैं जोर से झटका मार मार के गरम गरम सीमेन पूरा बॉडी में बारिश जैसा गिराया. मन शांत होने लगा क्यों की तब तक शायद मेरे अंदर अन्जाने में कोई डिसिशन हो चुका था. और धिरे धिरे एक चैन की नीद आने लगी.
 
मै शनिबार अहमदाबाद पहुच गया. शाम हो गइ थी आने मे. नाना नानी मुझे हर बार की तरह स्माइल के साथ ही स्वागत किया. लेकिन हर बार की तरह माँ वहां दिखाइ नहीं दि. मैं अंदर आके अपना बैग रखा. पर मुझे समझ नहीं आ रहा था की जब यह लोग इतने खुश दिख रहे है तो , जरूर कोई गड़बड़ तो नहीं है घर पर. फिर भी माँ मेरे साथ ऐसे क्यों कर रही है. मेरी कौन सी ग़लती पे माँ मुझ पर नाराज हो गयी!! क्या में उनको अन्जाने में दुःख पहुंचाया!!! यह सब भावनाएं मुझे घेर ने लगी. माँ जनरली घर पर ही रहती है. और आज तो मेरा आने का दिन है. आज तो वह रहती ही है. तोह फिर क्यों वह मेरे से मिलने सामने नहीं आई.
हम सब ड्राइंग रूम के सोफे पे बैठे थे. नानीजी पानी लाक़े दिए पीने के लिए और फिर नाना नानी मेरे से हास् हास् के खुसी के साथ बात कर रही थे. वही सब पुराना टोपीक. मेरा हाल वगेरा पूछते रहे. मैं उनलोगे के सवाल का जवाब दे रहा था छोटी छोटी शब्द मे. क्यूँ की मेरा मन धीरे धीरे जिद्द पकड़ने लगा. अगर सच में अन्जाने में में कोई ग़लती कर भी लिया , तो माँ होकर उनका यह फ़र्ज़ नहीं बनता की वह सामने से आकर अपनी बेटे का वह दोष बतादे.. और चाहे तो जो मर्ज़ी सजा दे. ऐसा न करके वह पूरे हप्ताह मेरे से ठीक से बात भी नही की. और अभी तो वह मेरे सामने भी नही आइ . मेरा दिल उनके लिए जिद्दी होने लगा. मेरा आंख जलने लगी. मैंने सोचा की ठीक है, अगर वह माँ होकर अपनी बेटे के साथ ऐसा बर्ताव कर रही है, तोह में भी उनका बेटा हुण. मैं भी उनसे जाके मिलूँगा नहि, जब तक वह मेरे पास नही आती. मैं भी बहुत जिद्दी हुण. मैं बहुत भावुक बन रहा था. फिर भी में खुद को कण्ट्रोल करके नाना नानी से बात कर रहा था. इन सब बातों के बीच नानाजी मेरे तरफ देख के बोले
" बेटा.. तुमसे कुछ बात करना है." मैं शांति से बोला
" कहिये नानाजी"
उनहोने एक बार नानीजी को देख, फिर मेरे तरफ देख के थोड़ा स्माइल के साथ बोलै
" इतना अर्जेंट भी नहीं है. तुम फ्रेश हो जाओ. खाना वाना खाके आराम से बैठ के बाते करेंगे."
मैं मेरे रूम में जाकर फ्रेश होने लगा. नानाजी न जाने क्या बात करना चाहते है. लेकिन में माँ को लेके ज़ादा चिंतित था. ऐसे ही बहुत सारी चिंता से मन भरी था. कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. दिल बोल रहा था की है तो माँ इसी घर पर ही. दौड़ के जाके उनसे पुछु की क्या मेरा गुनाह है. पर मेरा जिद्द मेरा पैरों को बांध के रखा. मैं एक नया पाजामे और टी- शर्ट पेहेनके जैसे ही बाहर ड्राइंग रूम में आया, तब नानी डिनर के लिए बुलाया.
आज नानाजी और में बैठा. मालूम था की पहले जैसा आज सब कुछ होनेवाला नहीं था. नानी सर्व करने लगी. लेकिन में किचन में माँ की उपस्थिति फील कर रहा था. और एक दो बार तो नानी से बात भी करते हुए सुना. मुझे एक गुस्सा आया. सब तो ठीक ही है. तोह क्या में ही गुन्हेगार हूँ!! और नाना नानी को भी माँ का इस तरह से व्यवहार करना, या इस तरह से मेरे सामने पेश होना, जरूर नज़र आ रहा होगा. फिर भी कोई किसी को कुछ बोल भी नहीं रहा है. खाना खाते खाते सोचा की शायद नानाजी इस बारे में ही कुछ बताने वाले है.

डिनर के बाद नानाजी मुझे टेरेस पे लेके गये. गर्मी का टाइम था. सो टेरेस पे एक अच्छा फील हो रहा था. थोड़ा थोड़ा हवा आ रहा था बीच बीच मे. आस पास का एरिया में ऐसे ही सब प्राइवेट मकान है. और ईस्ट साइड में ,हमारे महल्ले का रास्ता जाकर जहाँ बड़े रास्ते से मिला है, वहां कुछ फ्लैट बिल्डिंग है. बाकि तरफ दूर दूर तक मैदान दिखाइ देता है. उधऱ से हवा आरही है. नानाजी किनारे के तरफ जाकर , टेरेस की फेंसिंग में टेक लगाके एक सिगरेट निकाले. और बोलने लगे " तुम्हारा नानी यहाँ नहीं है अब... तोह ठीक है...." बोलके हॅसने लगे और माचिस निकालकर सिगरेट जला लिये. मैं बोला
" नानाजी...डक्टर आप को स्मोक करने में मना किया है"
उन्होंने एक कस लगाके धुआं छोड़के बोला
" एक आध पिने में कुछ नहीं होता है..."
नानाजी हस्ते हस्ते ऐसे बाते सुनाने लगे. कुछ समय ऐसे ही बीत गया. पर मेरा मन यह सब सुन नहीं रहा था. मुझे बार बार यह चिंता सता रही है की नानाजी आखिर मुझे क्या बताना चाहते है.
ईस सब सोच के बीच नानीजी आवाज़ लगाई. हम नीचे गये. मैं नज़र घुमाके माँ को देख नहीं पाया. किचन में लाइट ऑफ है. माँ शायद डिनर करके अपने रूम में चलि गयी. मुझे बहुत ग़ुस्सा हुआ माँ के उपर. मैंने क्या ग़लती किया की उन्होंने मुझे ऐसे सजा दे रही है. नानाजी मुझे उनके कमरे में आने को कहे. नानीजी भी आ गई. नानाजी आकर दरवाज़ा थोड़ा बंध कर दिया.
मैं बेड के पास रखा कुरसी में बैठा. नाना नानी बेड पे आराम से बैठे. मेरा टेंशन बढ़ रहा है. आखिर क्या कहेंगे, और उस में माँ का क्या ताल्लुक है. यह सब हज़ारों चिंता जब मेरा दिमाग में भीड़ किया तब नानाजी बोलना सुरु किया.
"बेटा...हुम तुम्हारा परवरिश का कोई कमी नहीं रखा है. बचपन से सब कुछ देते आया. और आज तक तुम्हारा सब भावना चिंता हम करते है लेकिन अब तुम बड़े होगये हो. जॉब कर रहे हो. हम को छोड़के दूर जाकर अकेले रहने लगे हो. मालूम है वहां तुमको अकेले रहने में कुछ परेशानी फेस भी करना पडता है. तभी भी... यह सब से हम को बहुत ख़ुशी होता है. तुम अब तुम्हारी जिंदगी खुद जीने जा रहे हो. उस से हम को भी हटना पड़ेगा. और हम भी और कितना दिन रहेंगे. हमारा जाने के बाद भी तुम को अच्छी तरह ज़िन्दगी जीना है. अपना फॅमिली बनाना है. तो अब हम सोच रहे है की तुम्हारी शादी करवाने के लिये."
 
मैन पण्डितजी के सामने बैठके उनका कहना मान रहा हु. पण्डितजी पूजा सुरु कर दिया है. वह नाना जी से दूल्हा दुल्हन का नाम और उनलोगों का माता पिता का नाम पुछा. नानाजी मेरे नाम हीतेश बताया और माता पिता का नाम दीपिका और अरुन बताया. मैं थोड़ी टाइम समझ नहीं पया पर थोड़ी देर में याद आया की माँ का नाम उनका जमान कुन्डली में दीपिका ही लिखा हुआ है. बाकि सब क्लियर हुआ जब दुल्हन का नाम मंजु और माता पिता के नाम के लिए नाना ख़ुदका और नानी का ही नाम बताया. पंडित जी पूजा करने लगा. कुछ लेडीज लोग वहि चारों तरफ बैठ गये. मुझमें एक शर्म के साथ एक उत्तेजना भी फील हो रहा है. क्यूँ की बस मुहूर्त टाइम आनेहि वाला है. तभी पण्डितजी पूजा के बीच में बोले की दुल्हन को बुलाईये.

इन्सान का मन और दिमाग उसके ज़िन्दगी का एक एक दिन, हर पल, सारे मोमेंट्स को याद नहीं रख पाता. उसका मन बस उसके लाइफ के कुछ दिन, कुछ पल, कुछ मोमेंट्स को अपनी आँखों और दिल के अनुभव से उसको कैद कर लेता है और उसको अपने मन में बस ज़िन्दगी भर के लिए रख लेता है. ज़िन्दगी में घटे हर इन्सिडेंट्स की सारी डिटेल्स वह भूल जाएग, पर उस इन्सिडेंट्स का कुछ कुछ हिस्सा उसके दिल और दिमाग में बचा रहता है. वह कभी कभी उसको पीडा देता है, कष्ट देता है और कभी कभी वह उसको ख़ुशी और आनंद का एह्सास दिलाता है. हमारे सब की ज़िन्दगी ऐसे नियमोँ से चलती है.
आज मेरे ज़िन्दगी का वह दिन है, जिसको शायद में अखरि सांस तक , इस्सके हर मोमेंट्स को याद करना चहुंगा, पर मुझे यह भी मालूम है मेरा मन मेरी चाहत पूरी नहीं कर सकता. मुझे इस आनंद का, ख़ुशी का हर पल बस कुछ स्टिल तसवीरों से अपनी दिल के दिवार पे फ्रेम में लगाके सजाके रखना है. और मेरा मन ज़िन्दगी में कभी भी, कहीं भी दिल की दीवारों पे टंगी हुई वह तसवीरें याद करके अब की महसुस कि हुई ख़ुशी के पलों को महसूस करके उसके मिठेपन का एह्सास दिलाता रहेगा.

मै अपनी जगह पे खड़ा था वहाँ मजूद सब लोग दुल्हन के आगमन के लिए उत्सुक्ता से इंतज़ार कर रहे है. मेरे मन में एक तूफ़ान जैसा चल रहा है. यह है वह घडी जिसकी याद करके इतने दिन गुजारते आया. यह वह पल जो मेरे और माँ की ज़िन्दगी को एक नई दिशा में ले जाकर एक नये रिश्ते में जोड देगा. हमारे बीच के माँ बेटे के बंधन के साथ पति पत्नी का प्यार भरा एक रिश्ता जुड़ जायगा. मैं ब्याकुल मन लेकर माँ को दुल्हन के रूप में देखने लिए पागल हो रहा हु. मेरे इस चिंता के बीच मुझे वहां मौजूद सब लोगों की आनंद ध्वनि और मंगलमय आवाज से में मेरे लेफ्ट साइड में डोर के तरफ देखा. माँ अपनी दुल्हन की भेष में हॉल में एंट्री लि. पर मुझे उनका चेहरा नज़र नहीं आया. दो आदमीयोने उनके सामने एक पर्दे जैसा कुछ उठके रखा है. जिस से मेरे और माँ के बीच एक विज़न बैरियर तैयार कर दिया. वह अपना सर झुकाके , धीरे कदमों से पूजा की तरफ आनेलगी. नानाजी उनकी साइड से अपने दोनों हाथों से माँ को पकड़के आरहे है. यह मालूम पड़ रहा है की माँ एक सुन्दर लाल, मरून और हरे कलर का सुन्दर गोल्डन डिज़ाइन किया हुआ लेहेंगा पहनी हुई है. मेरे मन को एक हतोड़ा जैसा पीठ रहा है. जिस्को में बचपन से प्यार करता हु, जो मुझे प्यार देकर आज इतना बड़ा किया , वह औरत, मेरी माँ, आज मेरी धरम पत्नी बन रहहि है. हाँ यह बात सही है की आज तक में मेरे मन की गहराई में, उनको सोच क़र, उनके शरीर के एक एक अंग की कल्पना करके, एक आदमी का एक औरत के लिए जो प्यार होता है, वह प्यार उनसे करते आरहा हु. और आज इस मुहूर्त के बाद बस वह मेरी हो जाएगी, केवल मेरी. जिसके साथ मेरे खुद का परिवार बनाकर, पूरी ज़िन्दगी जीने की ख्वाईश है. नानीजी मुझे देखते ही हमारी नज़र मिले. वह बस होंठो पे एक मुस्कान लेकर मुझे देखी और फिर माँ की तरफ देखकर माँ के कान में धीरे धीरे से कुछ बोली. मुझे माँ का एक्सप्रेशन तो दिखाइ नहीं दिया, पर नानी अपनी मुस्कान को और चौड़ी करके हॅसनेलगी. माँ को लगा शायद वह शर्म और ख़ुशी की मिक्स अनुभुति से और सर झुकाके नानी के हाथ के बंधन के अंदर पिघलने लगी. चारों तरफ से सब लेडीज की ख़ुशी और मंगलमय आवाज़ मेरे कानोमे रस घोलने लगी. सामने मेरी माँ को अपनी दुल्हन बन के आते हुए देख के में बस एक नयी अनुभुति में डुबने लगा.
 
शादी का मुहूर्त मॉर्निंग में ही है. उसके बाद शुभ टाइम रात को है. सो यह लोग हमारी शादी का टाइम सुबह के मुहूर्त को पकड़के शेड्यूल किया है. हम एकदम सुबह से उठके सब तैयारी में लग गये. कल शाम के रिंग सेरेमनी वाले हॉल में शादी का इन्तेज़ाम किया हुआ है. वहाँ दो रूम है. एक में दूल्हा और उसका परिवर, दूसरे में दुल्हन और उसके परिवार के लिये. हम सब यहाँ आते ही में और माँ पहले रजिस्टर्ड साहब से मिले और उनके दिये हुये पेपर्स पे हमने साइन किया. नाना नानी भी थे. मैं माँ को देखा तो वह बस ख़ुशी से होठो पे मुस्कुराहट लेकर नज़र झुकाके नानी के साथ बैठी थी सुबह के इस समय वह बहुत प्यारी लग रही है. मेरे मन में एक अद्भुत अनुभुति दौड रही है. मैं भी थोड़ी शरम मेहसुस कर रहा हु. मैं उनसे पेन लेकर धीरे धीरे हस्बैंड के जगह पे साइन किया और नानीने मेरी गार्डियन बन के मेरे विटनेस के जगह पे साइन किया. फिर माँ अपनी हाथ निकल के धीरे धीरे वाइफ की जगह पे साइन किये और नानाजी उनके फादर का विटनेस साइन किया. माँ का साइन होते ही रजिस्टर्ड साहब मुझे और माँ को पति पत्नी बनने के लिए विश किया और तब सब लोग क्लैप करके हमें अभिनन्दन करने लगे. और कुछ साइन चाहिए था वह वहां की कुछ लेडीज से साइन करवा लिये. और वह जाते टाइम हमें फिर से विश करके चले गये. मैं और माँ क़ानूनी तौरसे हस्बैंड और वाइफ बन गये. फिर शास्त्र सम्मति से शादी का मुहूर्त जल्दी आनेलगा. तो में और माँ दूल्हा और दुल्हन के रूम में चले गए तैयार होने के लिये. मेरे सज धजने में ज़ादा कुछ रखा नहीं है. केवल शेरवानी पहन ना है और सर पे साफा लेना है. पर दुल्हन के रूम में सब बिजी है. दुलहन को सजाना और शादी का जोड़ा पहनके रेडी करने के लिए कल वाली कुछ लेडीज है. बाहर भी कुछ लोग जमा है. सब रिसोर्ट की तरफ से है और सब अपना अपना डूटीस के लिए है. ऐसी शादी न कभी कहीं हुआ, न यह लोग कहीं देखा. बल्कि यह लोगों को तो पता ही नहीं की एक माँ बेटा आज शादी करके पति पत्नी के रिश्ते में जुड़ने जा रहे है, जहाँ दूल्हा दुल्हन के साथ पूरे परिवार की भी सम्मति है. वह लोग बस अपनी ख़ुशी से मज़े के साथ सब कुछ कर रहे है. नानाजी मेरे रूम में कम और बाहर हॉल में और माँ के रूम में बार बार जाकर देखभाल कर रहे है. मैनेजर साहब वहि बाहर हॉल में बैठे है. पण्डितजी भी अपनि तैयारी सुरु कर दिये. लेकिन उनको भी यह भनक तक नहीं लगा की आज वह एक माँ बेटे की शादी करवाने वाले है. मैं बस एक सुन्दर डिज़ाइन किया हुआ शेरवानी पहनके सोफे में जाकर बैठा. मुझे शादी की एक नयी अनुभुति हर वक़्त घिरके रखी है. मैं जिसको सबसे ज़ादा प्यार करता हु इस दुनिया में, जिसको दिल से पत्नी के रूप में चाहते आरहा हु पिछला ६ साल से, वह खूबसूरत लडकि, मेरी माँ, आज मेरी बीवी बनेगि. मेरी माँ को मेरी दुल्हन के रूप में देखने के लिए मेरा मन बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है. बल्कि यह भी सच है की माँ को मेरी बीवी बनाके मेरी बाँहों में लेकर उनको प्यार करने की चाहत में मन अंदर ही अंदर बार बार चंचल होकर काँप उठ रहा है. पिछले ६ साल से उनको कल्पना करके उनके साथ मिलन का जो सपना मन ही मन में देखते आरहा था, अब हमारा नसीब हम को एक करके वह सपना सच कर दे रहा है. मैं अब मेरी ज़िन्दगी उनके साथ उनका पति बनके गुजारना चाहता हु. और वह भी मेरी पत्नी बनके ज़िन्दगी की आखरि सांस तक मेरे साथ जीना चाहती है.
कल रात रेस्टोरेंट में डिनर के टाइम माँ की ख़ुशी ,शरम और एक दबी हुई उत्तेजना वाला चेहरा देख के और नयी दुल्हन बनने का साज और मेहँदी देखके, में बहुत आर्गी फील कर रहा था मुझे माँ को मेरे बाँहों में भरके, मेरे गरम होंटों से उनके पूरे बदन को, हर अंग अंग को प्यार भरे चुम्बन से भर देणे का मन कर रहा था मैं उसी उत्तेजना से डिनर करते करते नाना नानी से छुपके माँ को एक एसएमएस कर दिया. लिखा था
" यु आर लुकिंग वेरी ब्यूटीफुल , हॉट एंड सेक्सी. आई कान'ट स्टे अवे फ्रॉम यु अनिमोर."
मेरे एसएमएस के बाद माँ को पता नहीं चला. क्यूँ की उनका मोबाइल पर्स के अंदर था मैं बस उनतक मेरी यह अनुभुति पहुचाने के लिए बार बार उनको देख रहा हु, जैसे की में उनको इशारे से बता पाऊँ की वह अपना मोबाइल चेक करले. पर वह देख नहीं रही है. सो मैं एक तरीका सोचा. मैनेजर के साथ नाना नानी बात कर रहे है. माँ उस तरफ देख रहा है. मैं मेरे और माँ के प्लेट के बीच रखी हुई एक डीश है. मैं चम्मच लेकर उसमेही घुमा रहा था माँ का विज़न एरिया में था, इस्लिये वह अचानक मेरे हाथ पे नज़र डाली. फिर मेरी तरफ आँख उठाके देखि. और वह खुद वह डीश उठाके मुझे सर्वे करने के लिए मेरी तरफ़ थोडा घुमतेहि में चम्मच पकडे हुये हाथ से इशारे में मना करके, लेफ्ट हैंड में पकडे हुये मोबाइल को इशारे में दिखाया.
वह पहले समझि नहि, पर जल्द समझ गयी. और मेरी तरफसे मुस्कुराके नज़र घुमा लिया. मैं समझ नहीं पाया की वह जान ने के बाद भी उनके मन में कोई प्रतिक्रिया या कोई रिएक्शन नहीं हुआ. मुझे माँ के ऊपर गुस्सा आने लगा और दोबारा उनको इशारा करने के लिए मौका ढूँढ़ने लगा. तभी माँ नानी के कान में कुछ बोली. नानी मैनेजर साहब को पूछि की वाशरूम किस तरफ है. मैनेजर बहुत इज़्ज़त से नानी से बात कर रहा था और वह हाथ उठाके दिखाया. तभी माँ अचानक चेयर से उठके अपनी पर्स उठाके चल पडी. और जाते टाइम एकबार मुझे लुक देकर मुस्कुराके गई.
मैं मोबाइल हाथ में लेकर बैठा था मैं समझ गया माँ वहां जाकर मेरा एसएमएस पडेगी. इस लिए यहाँ अलग होकर बैठा था नाना नानी के पास. माँ जाने के बस कुछ टाइम बाद मेरे मोबाइल वाइब्रेट किया. मैं खोला तो माँ का एसएमएस था उन्होंने लिखा था
" धत..बदमाश"
मुझे मालूम है माँ मेरा एसएमएस पढ़कर शर्म से लाल हो गयी होगी. और यह भी मालूम है उनके मन में भी मेरे जैसी चाहत आरही थी. मैं फ़टाफ़ट टाइप किया
" इट्स ट्रू मंजु सोना. आई एम लकी टू हैव यु अस माय बिलवड वाइफ. आई लव यु सो सो मच एंड विल लव यु फॉरऐवर"
ओर तुरंत उनका रिप्लाई आया
" आई लव यु टू सो सो मच जाणु."
वह यह रिप्लाई उनके दिल से लिखी है, यह में महसुस किया तब, जब वह वापस आयी और उनके चेहरे पे एक अद्भुत नयी दुल्हन का अभास दिखा था माँ को ऐसे रूप में सामने देख के और वह एसएमएस पढ़ के मेरा लिंग एक अद्भुत ख़ुशी से अंडरवेयर के नीचे फुल्ने लगा. मैं बस और थोडा सहन करके उस पल का इंतज़ार करने लगा जब वह शास्त्र सम्मति से मेरी बीवी बन जाएगी.
ओर अब वह घडी आगई.
 
मैनेजर हमारा बहुत ख्याल रख रहा है. हमें बार बार पुछ रहा है कोई तकलीफ हो रही है की नही कुछ चाहिए की नही पहले स्टार्टर आया, वह दो वेटर सर्व करने लगे, सब को सर्व करके बाकि वहि टेबल पे रख के साइड में चले गये. एक एक चीज रहा है और वह लोग ऐसे ही कर रहे है. थोड़ी देर बाद नानी उनको देख के प्यार से हास के बोली की वह लोग बस यहाँ रख दे, हम खुद सर्व कर लेंगे. फिर नानी हम सब को सर्व करने लगी. माँ भी हाथ लगा रही है. उनके हाथों में मेहँदी के साथ साथ रेड नेल पोलिश नज़र आयी. मुझे पहली बार माँ का इस तरह का रूप देखने को मिला. वह मेरे सामने एक अलग लड़की जैसी लगने लगी. जिसको में बचपन से जानता हु, वह माँ नहि, एक और कोई लडकि, जिसे धीरे धीरे जान रहा हु, जिसका रूप धीर धीरे नज़र आरहा है. वह इतनी खूबसूरत लग रही है की में मन ही मन खुदको लकी महसुस कर रहा हु. ऐसी खूबसूरत और सेक्सी एक लड़की मेरी जीवनसाथी, मेरी बीवी बनने जा रही है.
मैन कोर्स का खाना आगया. माँ सब को सर्व करनेलगी. हम सब एक साथ बहुत दिन हो गये है बाहर खाने नहीं गये थे सो सब लोग इस डिनर को एन्जॉय कर रहे है. और हमारी नई ज़िन्दगी शुरु होने से पहले सब का मन में जो टेंशन या संकोच था, सब यहाँ धीरे धीरे मीट रहा है. नानाजी और नानीजी उनके लाइफ की बिगनिंग की बहुत सारी बाते शेयर कर रहे है. कुछ हसि की बाते भी हो रही है. और फिर शादी के बाद उनलोगों ने क्या प्रॉब्लम फेस किया था, क्या क्या प्रॉब्लम कैसे आते है, और कैसे उसका सोलुशन होता है, वह सब माँ और मेरे साथ शेयर करने लगे. अब मैनेजर भी चले गए और दोनों वेटर भी साइड में जाकर खड़े है. सो हम बिन्दास बात करने लगे. मैं नाना और नानी को मम्मी पापा कह्के बुलाया दो बार. माँ उस टाइम मेरी तरफ एक झलक देखि थी. उनके चेहरे पे ख़ुशी और होटों पे मुस्कान मुझे नज़र आयी थी माँ केवल नानी के साथ कुछ बात धीरे धीरे कर रही थी. इन्ही सब बातों के बीच एक डीश सर्व करने के लिए माँ मेरी प्लेट के पास हाथ लायी तो मैं उनको देखके मुस्कुराके, अपने हाथ से इशारा करके ना कहा. वह बस मुस्कुराके हाथ हटा लि. जब नानी के पास गया तो नानी बात करते करते ध्यान दि और माँ को बोली
?? पहले हीतेश को दो मंजु??
मा यह सुनकर शर्मा के नज़र झुका लि और नानी की प्लेट में परोसते परोसते धीरे से नानी को बोलि
?? वह नहीं लेंगे. मैंने उनको पूछा ??
यह सुनते ही नानी के चेहरे पे एक हसि खील गयी. और वह खुश होकर नाना की तरफ देखि. माँ शर्मा के नज़र झुका के नानी की प्लेट में परोस रही है. नानी समझ गयी कि माँ ने इस नये रिश्ते को कैसे मन से एक्सेप्ट कर लिया है. नानी बस अपने लेफ्ट हैंड को पीछे से ले जाकर माँ की पीठ को पकड़ के माँ को अपनी तरफ खिची और कुछ ना बोलकर एक स्माइल देके बहुत कुछ समझ भी गयी और संमझा भी दिया.

सब की ज़िन्दगी में कुछ पल, कुछ दिन, कुछ मोमेंट्स ऐसे आते है, जहाँ उसकी ज़िन्दगी एक अनजान मोड़ पे आकर एक नयी दिशा में घूम जाती है. और तब वह शायद यह सोच नहीं पाता की इस तरह की नयी राह में कदम रखना कितना जरुरी या रिस्की होता है. पर हम सब इसको हमारे ज़िन्दगी में अनुभव करते है, और नयी सोच और नयी उम्मीद के साथ आगे चल पड़ते है. बाकि लोगों से मेरी ज़िन्दगी एक दम से तो अलग ही है. सब की शादी होती है. सब अपनी जीवनसाथी पाते है. पर में अपनी जीवनसाथी, अपनी बीवी के रूप में जिसको पाने जा रहा हु, वह मेरी माँ ही है. मुझे मालूम है हमारा यह नया रिश्ता औरों से बिलकुल अलग है. हम दोनों और नाना नानी ..सब की सम्मति से और हमारे बीच का प्यार और बंधन के कारन से , हम लोग इस रिश्ते को अपनाना चाहते है. सभी का अच्छा इसमें होगा यह सोच के हम इस कदम को उठाया है. पर समाज और संसार कैसे इस को देखेंगे वह भी मालूम है. इसके लिए हमें सब को बहुत कुछ सैक्रिफाइस भी करना पडेगा. माँ अब एक दूसरे लड़की के जैसी बन गई, जिसको में प्यार करता हु और चाहता भी हु. पर एक बात तो सच है. कोई भी रिश्ते में, खास करके पति पत्नी के रिश्ते में, वह रिश्ते मजबूत, टिकउ और हैल्थी होता है तब, जब उसमे एक दूसरे के लिए प्यार, एक दूसरे के ऊपर बिस्वास, और एक दूसरे को क्षमा करने की ताकत होती है मन मे. मेरे और माँ के मन में माँ-बेटे का प्यार तो था हि, अब एक नया प्यार दोनों के मन में छाया हुआ है, उसमे हम एकदूसरे को बहुत बहुत प्यार करते है. बचपन से दुनिया में हम एकदूसरे को सबसे ज़ादा बिस्वास करते आरहे है. और हमारी ख़ुशी के लिए हम बहुत कुछ सैक्रिफाइस करने की ताकत भी रखते है जो हम बचपन से करते भी आरहे है, और अब तो सब कुछ के लिए तैयार भी है. दुनिया की और कोई लडकि, वह कितनी भी सुन्दर और खूबसूरत क्यों ना हो, वह लड़की मेरे मन में वह जगह नहीं ले सकती है जहाँ मेरी मा...मेरी होनेवाली पत्नी बनके और मेरी माँ बनके मेरे दिल में बैठि हुई है. सुबह से एक हलचल मची हुयी है हमारे बीच.
 
हम दोनों ही हमारे हाथ अपनी तरफ खीच लिए धीरे धीरे. फिर पण्डितजी दुल्हन को पहनाने के लिए बोले. मैं नानाजी को एकबार घूम के देखा . वह बस मेरे बगल में बैठे थे. मैंरे घुमतेहि उनका एक हाथ मेरे कंधे पे रख के स्माइल देणेलगे. मैं स्माइल करके नज़र घुमाके मेरा हाथ आगे किया. माँ शायद यह सब कुछ नहीं देख पा रही है, इस लिए में आगे हाथ करते ही नानीजी माँ के पीठ पे एक ममता भरे हाथ से टच कि . माँने फिर अपना हाथ आगे लाया और दोनों के काँपते हुये हाथ एक साथ हुये. वह मेरे ऊँगली में अंगूठी पहना दि. फिर से एक ख़ुशी का रोला उठा और सब क्लैप करने लगे. मैनेजर नानाजी को बधाइयाँ देणे लगा. कुछ ओल्ड लेडीज नानी को हास के गले मिलाने लगी. और बाकि लोग मुझे और माँ को बधाइयाँ देणे लगे. हम उनको प्यार से उनकी शुभ कामनाओ का धन्यवाद करनेलगे. मैं माँ को चुराके देखा तो वह अब चेहरा उठाकर, नज़र उठके वह सब लेडीज लोगों को स्माइल दे रही है और सब को थैंक यु बोलकर आभार प्रकट कर रही है. उनके चेहरे पे एक ग्लो आगया. और आँखों में एक ख़ुशी की लहर दिखाइ दे रही है. एक बार वह नज़र घुमातेहि हमारी नज़र मिल गयी. मैं उनकी ख़ुशी मेहसुस करके खुद खुश होकर एक स्माइल किया तो वह मुस्कुरा के शर्मा गयी और नज़र झट से हटा ली.
हम वहां से अलग अलग दो रूम में चले गये. मेहँदी होने वाली है. माँ को मेहँदी के लिए सारी औरते ले गयी और कुछ लोग मेरे साथ थे. मैं वहां बैठा . और मेरी मेहँदी सुरु हो गई. मेरे बस दोनों हथेली में थोड़ी थोड़ी मेहँदी लगा दि. और में कहीं नहीं लगवाया. वह लोग फ़टाफ़ट मेरी मेहँदी लगाके मेरी रसम पूरी करदि. नाना और में बाहर आगया. नाना मुझे हास के देखे और बोले
??बेटे तुम यहाँ रहो. मैं मंजु के पास जाकर आता हु.??
मै बस हासके सर हिलाया तो वह चले गये. मुझे भी जाने का मन कर रहा था पर अब पॉसिबल नहीं है. सो में बाहर रिसेप्शन की तरफ आगे बढ़ गया.
थोड़ी देर बाद नानाजी आकर बोले
?? चलो हम कॉटेज में चलते है. वहाँ अभी बहुत टाइम लगेगा. मेहँदी लगाना , गाना बजाना बहुत कुछ चीज़ों का इन्तेज़ाम कर के रखे है यह लोग. ??
नानाजी यह बोलके हास के आगे बढे मैं उनके पीछे पीछे कॉटेज की तरफ चलने लगा. मेहँदी के साथ माँ को कैसे लगेगा वह कल्पना करते करते मन में एक ख़ुशी की लहर उठाके में कॉटेज पहुच गया. मेरा मन बस उनको देखने के इंतज़ार में अंदर ही अंदर छट फ़ट करने लगा.
मेरा यह इंतज़ार लम्बा हुआ , लेकिन ज़ादानही उसदिन रात को डिनर में ही में उनको देख पाया. कॉटेज वालों ने उस दिन हमारे लिए एक ग्रैंड डिनर का बंदोबस्त करके रखा था गेट से आते टाइम हम जो रेस्टोरेंट देखे थे वहां आज का डिनर फिक्स किया हुआ है. मेहँदी के बाद से हम अपने अपने रूम में ही थे सो न में माँ को न वह मुझे देखि. सो जब हम डिनर के लिए वहां जाने के लिए निकले तो तब में माँ को देखा. वह एक ग्रीन कलर की साड़ी पहनी हुई है. जिसमें मरून कलर की बॉर्डर है. साड़ी से मैच करता ब्लाउज , गले में सुबह वाली गोल्ड चेन और हाथ में वहि बँगलस. लेकिन सुबह से एक डिफरेंस है, वह है की उनके हाथ और पैर की मेहंदी. पैर की मेहँदी साड़ी के कारन ज़ादा नज़र नहीं रही है पर हाथ के एल्बो तक सुन्दर डिज़ाइन की मेहँदी लगी हुयी है, जो उनकी ब्यूटी को और निखार रहा है. अब वह सच मुच एक वैसी लड़की लग रही है, जो बस शादी के लिए अब दुल्हन बनने जा रही है.

रेस्टोरेन्ट में पहुच ते ही हम थोडे चौंक गये. इस टाइम इतना बड़ा रेस्टोरेंट आलमोस्ट फुल है. हमें मालूम है परसो एक शादी है, लेकिन उसका सब गेस्ट तो आज आये नहीं सुना था हमारा यह सवाल मैनेजर ने पड़ लिया और वह खुद हमें बताने लगा की यह रेस्टोरेंट सब के लिए ओपन है. बाहर से लोग डिनर करने आते है फॅमिली के साथ. यहाँ डिस्को भी है. सो सब टाइप के लोगों की भीड़ लगी रहती है. वह हमें रास्ता दिखाके एक सेपरेट एरिया में लाया. यहाँ लोग कम है. टेबल्स भी दुर दुर है. और दो चार टेबल भरे हुये है. जहाँ केवल फॅमिली टाइप लोग बैठे हुए है कुछ बच्चों के साथ. यहाँ आवाज़ थोड़ी कम है और उस रेस्टोरेंट से थोड़ी आवाज़ यहाँ तक आ रही है. टेबल पे केवल हम चारो है. दो वेटर हमारे लिए है वहा
मैने टेबल के पास रखी हुई चेयर्स को थोड़ी बाहर निकाल के नानी और माँ को बैठने के लिए हेल्प किया. और नानाजी टेबल के अपोजिट साइड में नानी की सामने बैठे. सो मुझे माँ के अपोजिट में उनके सामने बैठ्ना पडा माँ मुझे नहीं देख रही है. नानी से धीरे धीरे बात कर रही है, या तो नाना को बात करते हुए एक आध बार देख रहा हु. बस मुझसे नज़र हटाके रखी है. मैं उनकी तरफ बार बार देख रहा हु नाना नानी की नज़र छुपाके. एक बार चाह रहा था की वह भी मुझे देखे. हम आमने सामने बैठे है. कल हम शादी कर के पति पत्नी के रिश्ते में जुड़ने जा रहे है. वह मेरी बीवी बनने जा रही है. बस यही सब चिंता मेरे अंदर उनके प्रति चाहत और बढ़ती जा रही है. उनका इस तरह शरमाना, उनके मेहँदी लगे हुये हाथ, होंठो की मुस्कान, सांस के साथ साथ छाती का हल्का हल्का कम्पन ..यह सब मुझे बस उनकी तरफ खिचे जारहा है. मुझे मालूम है की शादी से पहले वह अब मेरी बाँहों में नहीं आने वाली है. पर में उनको एकबार बाहोंमे भरके उनके दिल की धड़कन महसुस करना चाहता हुं.
 
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