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अंदाज़

'होना भी नहीं चाहिए, । आत्माएं अगर हैं भी वह भी कभी हमारी ही तरह थी और हम भी कभी उन्हीं की तरह होंगे।'

फिर उसने एक कांस्टेबिल से कहा

'हवलदार! साहब की गाड़ी चैक कर लो। ब्रेक, स्टेयरिंग और व्हील-सब वर्किंग आर्डर में हैं या कोई खराबी है।'

'जी, साहब ।'

कांस्टेबिल चैक करने लगा।

इंस्पेक्टर ने मुस्कराकर राज से कहा

'बहरहाल, आप जिस होटल में भी ठहरे, मुझे जरूर फोन कर दीजिएगा ।'

'खैरियत?'

'आपकी खैरियत ही मालूम करने के लिए कह रहा हूं | जरूरी नहीं कि आप फोन करें ही। लेकिन कम-से-कम मेरी तसल्ली तो होगी ।'

उसने माली की तरफ इशारा करके कहा

'और इस मुर्ख ने फिर कभी कोई शिकायत की तो मैं बता सकूँगा कि यह अंधविश्वासी है।'

'बेहतर है।'

फिर कांस्टेबिल ने जोर से कहा

'साहब! सब ठीक है।'

'ओ.के.!' इंस्पेक्टर ने राज से हाथ मिलाकर कहा-'विश यू ए प्लेजेंट हनीमून ।'

'शुक्रिया!'

'मेरे लिए कोई सेवा हो तो बताइएगा।' फिर वे लोग जीप में सवार होकर चले गए।

डॉली और राज ने एक-दूसरे की तरफ देखा । डॉली का चेहरा सफेद था । उसने राज का हाथ कसकर पकड़ा रखा था।

वह थूक निगलकर बोली

'भगवान के लिए, चलो यहां से ।'

राज ने कहा

'हां, चलो।'

अचानक माली ने सामने आकर हाथ जोड़ते हुए कहा

'भगवान के लिए रुक जाइए, साहब ।'

राज ने कहा

'नहीं...हम नहीं रुकेंगे।'

'साहब! भगवान न करें...आपको कुछ हो गया तो?'

'बकवास मत करो । हमें कुछ नहीं होगा।'

'हुजूर! पहले दो जोड़े...!'

'वह संयोग था ।'
 
'साहब! मेरे मालिक की आत्मा को मुक्ति दिला दीजिए।'

'बको मत । मुझे तुम भी कोई प्रेतात्मा मालूम होते हो ।'

माली गिड़गिड़ाता रह गया।

डॉली और राज गाड़ी में बैठे । राज ने इंजन स्टार्ट किया । गाड़ी ने हाफ-राउंड लिया और फाटक से निकलकर सड़क पर दौड़ने लगी।

डॉली ने राज की भुजा जोर से पकड़ ली और कंपकंपाती आवाज में बोली

'भगवान के लिए धीरे चलाओ ।'

'घबराओं मत डॉली । कुछ भी नहीं होगा।'

'मुझे बहुत डर लग रहा है ।'

'डरने की क्या बात है? गाड़ी पुलिस वाले चैक कर चुके हैं।'

'लेकिन पुलिस वाले राय बहादुर की आत्मा को भी तो मानते है।'

-

'वह तो अब हमें भी मानना पड़ेगा।'

'तो फिर उनकी आत्मा ।'

राज ने बात काटकर कहा

'वह जानती होगी कि हम दोनों शादी-शुदा नहीं है।'

'लेकिन रात को तो यही समझ रही थी।'

'समझ नहीं रहे थे, कह रहे थे ।'

'मगर क्यों?'

'शायद वे हम दोनों को दो प्रेमी समझे हों ।'

'लेकिन आत्माएं कब गलत समझ सकती हैं?'

'संभव है, उनकी आत्मा ठीक ही समझती हो

डॉली के दिमाग में कुछ छनाका-सा हुआ। उसने होंठों पर जुबान फेरकर धीरे-से कंपकंपाती हुई आवाज में कहा

'क...क्या मतलब?'

'शायद हम दोनों...अनजाने में एक-दूसरे से प्यार करने लगे हों ।'

डॉली कुछ न बोली।

राज ने उसे कनखियों से देखा । लेकिन फिर वह भी कुछ नहीं बोला ।

कुछ देर बाद डॉली ने ही शांति भंग की
 
'अब हम कहां जाएंगे?'

'यही तो मैं सोच रहा हूं।'

'मुम्बई पुलिस ने चोरी की गाड़ी की खबर यहां तक भेज दी है।'

'शुक्र है । मैंने फौरन ही गाड़ी के नम्बर बदला लिए थे, वरना आज हम दोनों पकड़े गाए होते । गाड़ी

तो साथ थी ही।'

अचानक डॉली को याद आया कि वह राज से किसलिए मिली है। उसने राज की भुजा पर हाथ रखा और धीरे-से बोली

'एक बात कहूं, राज बाबू?'

'कहो...?'

'तुम यह धंधा छोड़ क्यों नहीं देते?'

'कौन-सा धंधा?'

'यही चोरी, डकैती, फ्राड वगैरह । हर वक्त पुलिस की तलवार सिर पर लटकी रहती है । आखिर कब तक कानून से भागते फिरोगे?'

राज ने व्यंग्य से कहा 'खूब! यह उपदेश तुम मुझे दे रही हो?'

'देखों, मैंने छोटे-मोटे फ्राड जरूर किए हैं। लेकिन कभी कोई बड़ी चोरी या डाका नहीं डाला है

'और इस प्रकार तुम्हें कम दंड मिलेगा?'

'प्रकट है।'

'अगर मैं पकड़ा गया तो क्या मुझे भी कम दंड मिलेगा?'

'तुम्हें दंड मिलेगा ही नही ।'

'वह कैसे...?'

'तुम्हारे सारे अपराध मैं अपने सिर ले लूंगी।'

'डॉली...।'

राज की आवाज कांप गई ।

उसने गाड़ी को ब्रेक लगाए । ध्यान से डॉली की आंखों में देखा तो डॉली ने कहा

'क्या तुम गलत समझ रहे हो?'

'लेकिन तुम मेरे लिए इतनी बड़ी कुरबानी क्यों दोगी?'
 
डॉली ने सोचा कि यशोदा आंटी के बारे में बता दे । मगर उसने फिलहाल सच्चाई बताने का इरादा छोड़कर कहा

'क्या तुम इतना भी नहीं समझते?'

'मैं कुछ-कुछ समझ रहा हूं।'

'सिर्फ कुछ...कुछ...?'

-

-

'शायद मैंने सच कहा था ।'

'क्या...?'

'यही कि हम दोनों एक-दूसरे से अनजाने में प्यार करने लगे हैं।'

'राज बाबू!'

'डॉली...!'

राज ने डॉली का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया। फिर बोला

'काश! तुम मुझे कुछ वर्षों पहले मिली होती और यही बात कही होती तो मैं अपराध जगत में गर्दन तक न धंस जाता।'

'अब भी तो कुछ नहीं बिगड़ ।'

'डॉली! प्यार क्या इतना स्वार्थी होता है कि मैं अपनी जगह तुम्हें फंसाकर आजाद हो जाऊंगा? अरे, मेरा वश चले तो तुम्हारे अपराध भी अपने सिर ले लूं ।'

अचानक पीछे से किसी गाड़ी के हार्न की आवाज आई और दोनों चौंककर अलग हो गए।

राज ने पलटकर देखा । डॉली ने भी।

पीछे जीप को देखकर डॉली के दिल पर एक धक्का-सा लगा और वह एक अनजानी-सी आशंका से सिर से पांव तक कांप-कांप गई।

जीप में से इंस्पेक्टर ने ऊंची-सी आवाज में कहा

'अरे, श्रीमान! एक साइड में तो गाड़ी कर लीजिए।'

राज ने झट इंजन स्टार्ट करके साइड में गाड़ी ले ली । जीप बराबर आकर रुक गई । इंस्पेक्टर ने हंसते हुए संफाई दी

'मैं अजीब पुलिस वाला हूं | आपका नाम ही मालूम करना भूल गया था ।'

'जू...ज्...जी मेरा नाम राज सक्सेना है!'

'मिस्टर राज सक्सेना?'

'जी, हां ।' फिर उसने डॉली की तरफ इशारा किया-'और यह मेरी धर्मपत्नी ।'

'बस...बस, इतना ही काफी है-मिस्टर एंड मिसेज राज सक्सेना!' इंस्पेक्टर ने हंसकर कहा-' अच्छा हुआ, आप मिल गए । आप कौन-से होटल में ठहरेंगे?'

राज ने होटल का नाम बताया।

इंस्पेक्टर ने अपने बराबर बैठे एक सूटवाले अधेड़ उम्र अजनबी से सम्बोधित होकर कहा

'लीजिए, आपका काम हो गया।'

फिर वह राज से बोला

'मिस्टर सक्सेना आपको थोड़ा-सा कष्ट देना

'थोड़ा क्यों, बहुत-सा कष्ट दीजिए ।'

'अरे, नहीं । मैं विशुद्ध पुलिस वाला नहीं, मैं तो अपराधियों को भी ज्यादा कष्ट देना नहीं पसंद करता हूं।'

'मेरे योग्य सेवा...?'

इंस्पेक्टर ने अजनबी की तरफ इशारा करके कहा 'यह मेरे दोस्त हैं-सी. आई. डी. इंस्पेक्टर पी. सी. मेहरा ।' सी आई डी इंस्पेक्टर ।'

डॉली के दिमाग पर हथौड़ा-सा पड़ा।

राज ने हाथ जोड़कर कहा 'नमस्ते, बड़ी खुशी हई।'

इंस्पेक्टर ने हंसकर कहा

'आप चाहें तो यह खुशी होटल तक कायम रह सकती है।'

'जी...?'

'इंस्पेक्टर मेहरा को भी उसी होटल जाना है। यह एक केस की छानबीन के लिए गांव गए थे। वापसी में बस नहीं मिली, मेरी जीप मिल गई । मुझे एक और गांव जाना है, अभी यह बेचारे अकारण परेशान होंगे।'

'कोई बात नहीं । यह हमारे साथ सफर कर सकते हैं । यह हमारा सौभाग्य होगा।'

'शुक्रिया, मिस्टर सक्सेना ।'

'देट्स माई प्लेजर ।'

इंस्पेक्टर मेहरा ने कहा

'अच्छा मिस्टर मेहरा, आपकी और मेरी दोनों की ही समस्या हल हो गई।'

मेहरा ने इंस्पेक्टर से हाथ मिलाया और जीप से उतर आया।

राज ने डॉली को पीछे भेज दिया और मेहरा को आगे बिठा लिया ।

पुलिस इंस्पेक्टर ने हंसकर कहा

'अब प्रेतात्मा कोई एक्सीडेंट नहीं करेगी। भूत-पिशाच और प्रेतात्माएं भी पुलिस और खुफिया वालों से डरती है।'

फिर वह हंसता हुआ जीप बढ़ाकर ले गया ।

राज ने इंजन स्टार्ट किया और गाड़ी दूसरे रास्ते पर चल पड़ी।
 
इंस्पेक्टर मेहरा ने कुछ देर खामोश रहने के बाद कहा-'लगता है, आप दोनों को कही देखा है?'

डॉली की छाती पर धक्का-सा लगा।

राज ने अपने ऊपर काबू रखते हुए मेहरा की तरफ देखा और मुस्कराकर कहा

'आप मुम्बई में रहते है ना?'

'जी, हां ।'

'तब जरूर देखा होगा । हम लोग भी वहीं रहते हैं।'

'कोई कारोबार है आपका?'

'मेरे ताऊ का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट का बिजनेस है।'

'क्या नाम है उनका?'

'निहालचंद सक्सेना ।'

मेहरा ने चौंककर कहा

'ओह, उनसे तो मेरी खास जान-पहचान है।'

'फिर संभव है, बंगले पर ही देखा हो ।'

सुना है, उन्हें बिजनेस में बहुत बड़ा घाटा हुआ था ।'

'आपने ठीक सुना है । बंगला भी बिक गया था । बैक-बैलेंस भी निल । अंकल ने तो साहस छोड़ दिया था । पर मैंने नए सिरे से संभाल लिया है। धीरे-धीरे सब-कुछ रास्ते पर आ ही जाएगा, अगर ऊपर वाले की दया होगी ।'

'क्यों नहीं होगी । परिश्रम के साथ अगर कोई दूसरा भाग्य भी जुड़ जाए।'

उसने शीशे में डॉली को देखा और पूछा आपने हाल ही में शादी की है।'

'बस, यही समझ लीजिए कि हनीमून मनाने आए हैं।'

'वही तो मैंने सोचा कि निहाल और मुझे न बुलाए।'

'अच्छे संबंध हैं आपके ।'

'बहुत अच्छे । मैंने तो अपनी भतीजी का रिश्ता भी आफर किया था आपके लिए । लेकिन तब आप पढ़ रहे थे । अब तो उसकी भी शादी हो गई।'

फिर उसने कहा

'आप मिसेज...?'

'मिसेज डॉली सक्सेना..!'

'डॉली जी...'

'बस और कूछ मत पूछिए । यह हमारी 'लव मैरिज' है।'

'ओह, अच्छा । दरअसल मेरे पूछने का कारण और था ।'

'क्या...?'

'जाने दीजिए ।' अकारण मिसेज सक्सेना मेरे बारे मे न जाने क्या सोचेंगी।'

'कुछ नहीं, बताइए?'

'दरअसल मैं भी मुम्बई से डॉली नामक एक लड़की की तलाश में ही इधर आया हूं।'

'ओहो...!'

डॉली का दिमाग जैसे ढोल बजाने लगा।

इंस्पेक्टर मेहरा ने कहा 'वह एक अनाथ लड़की है । अनाथ आश्रम में रहती है ।'

राज ने उसे कनखियों से देखकर कहा कोई अपराध किया है उसने?'

'अजी, हम क्या साधु-संन्यासियों के पीछे दौड़ते हैं।'

-

'क्या अपराध किया है?'

'फ्राड...डकैती...!'

'नहीं...!'

'सेठ गोपालदास का नाम सुना है?'

'जी, हां ।'

'उनके साथ पूरे पचास हजार का फ्राड किया

'यह बात है।'

__ 'इसके अलावा सेठ मुरली मनोहर का नाम भी सुना होगा।'

'क्यों नहीं....।'

'उनके यहां परसों रात पच्चीस लाख का डाका पड़ा था ?'

'पच्चीस लाख ? उस लड़की ने डाका डाला था।'

'यही तो संदेह है कि वह किसी दल के लिए या दल के साथ काम करती है।'

'अच्छा ...?'

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'सब-इंस्पेक्टर उसे रुपयों के बैग के साथ पकड़कर ला रहा था । लेकिन एक मोटर साइकिल सवार, जो शायद उसके गिरोह का था, उसे ले भागा

'माई गॉड ।'

'पुलिस ने अनाथ-आश्रम पर भी छापा मारा था । लेकिन वहां से ऐसी कोई चीज बरामद नहीं हुई, जिससे अनाथ-आश्रम पर संदेह किया जा सकता ।'

'अच्छा ...!'

'वहां की संचालिका बूढ़ी महिला है शरीफ, नेक । लड़कियां भी सीधी-सादी हैं । यह जरूर मालूम हुआ है कि अक्सर वही लड़की डॉली , आश्रम से गायब रहती थी और फ्राड भी वही करती थी।'

'ओहो...।'

'बर्थ-डे मनाने के लिए उसने सेठ गोपालदास को पचास हजार का चिरका दिया था । वे सारे कपड़े, जूते और कास्मैटिक्स का सामान आश्रम की लड़कियों ने खुद पुलिस को दे दिया, जो उस लड़की डॉली ने शॉपिंग सेंटर से उड़ा दिया था ।'

डॉली को ऐसा लग रहा था, जैसे वह अभी बेहोश होकर लुढ़क जाएगी।

……………………………..

होटल के कम्पाउंड में गाड़ी रुक गई ।

अगली सीट से राज और सी. आई डी. इंस्पेक्टर मेहरा उतरे । राज ने पिछला दरवाजा खोला और डॉली को उतरने के लिए हाथ का सहारा दिया।

डूबते को तिनके के सहारे की भांति उस समय डॉली के लिए राज के हाथ का सहारा बहुत था, वैसे उसकी पिंडलियों में तो जैसे दम ही नहीं था ।

तीनों अंदर की दिशा में बढ़े तो मेहरा ने राज से पूछा

'आपने कमरा रिजर्व करा लिया था?'

राज ने जबरदस्ती मुस्कराकर कहा

'मैंने अपने कारोबारी मैनेजर से कहा था । शायद उन्होंने बुक करा दिया हो।'

काउंटर पर पहुंचकर मेहरा ने अपने कमरे की चाबी मांगी और फिर राज से कहा 'मालूम कीजिए । आपका कमरा बुक है या नहीं । आजकल यहां मुस्किल से ही रिजर्वेशन मिलता है । लेकिन शायद मैं इस सिलसिले में आपकी कुछ मदद कर सकू ।'

'जी, शुक्रिया!'

राज ने काउंटर-क्लर्क की तरफ देखते हुए संखारकर कहा

'देखिए, हमारे मैनेजर ने हमारे कमरे की बुकिंग कराई होगी । जरा रिजर्वेशन चार्ट देखिए ।'

काउंटर-क्लर्क ने सादर मुद्रा में पूछा

'आपका शुभ नाम?'

डॉली ने झटके से कहा

"अरे, नाम रिजर्वेशन चार्ट में लिखा होगा।'

राज फिर से झट खंखारकर बोला

'जी, हां मिस्टर एंड मिसेज राज सक्सेना

क्लर्क ने रजिस्टर चैक करना शुरू किया ।

-

-

उस दौरान सी. आई. डी. इंस्पेक्टर मेहरा राज से बातें करने लगा । लेकिन डॉली एक ऐसे आदमी को देखकर चौंक पड़ी, जो प्रकट में अखबार पढ़ रहा था, लेकिन डॉली ने साफ नोट किया था कि वह अखबार के ऊपर से डॉली और राज को चैक कर रहा है।

लाल-लाल खूनियों जैसी मोटी-मोटी आंखें, गंजा, चिकना सिर, फूले हुए नथुने शरीर पर काली पतलून, काली जैकेट-वह हुलिये से बदमाश मालूम हो रहा था।

डॉली के शरीर में सनसनी-सी दौड़ गई।'

कुछ देर बाद काउंटर-क्लर्क ने राज से सम्बोधित होकर कहा

सॉरी, सर! इस नाम पर कोई कमरा रिजर्व नहीं है।'

राज ने बनावटी गुस्से से कहा

'व्हाट नानसेंस? मेरे मैनेजर ने जरूर फोन पर बुकिंग कराई होगी मुम्बई से । सक्सेना एंड सक्सेना एन्टरप्राइजेज की तरफ से ।'
 
'सर! आप खुद रजिस्टर चैक कर सकते है ।'

'ईडियट!'

'जी...?'

'ओह, सॉरी! मैं अपने मैनेजर के लिए कह रहा हूं | जरा आपरेटर से मुम्बई के नम्बर तो मिलवाइए । मैं अभी मैनेजर को डिसमिस कराता हूं

'मेहरा ने कहा

'जाने भी दीजिए, मिस्टर सक्सेना । भूल-चूक आदमी से होती ही है। वैसे अब आपको यहां रिजर्वेशन मिलना मुश्किल होगा।'

-

उसने काउंटर-क्लर्क से कहा

'क्यों मिस्टर राजेन्द्रनाथ?'

'यस, सर! हनीमून सीजन है ना । आजकल सारा मुम्बई कारोबार छोड़कर हनीमून मनाने के लिए पुणे पर टूट पड़ा है । कई लोग तो ऐसे भी आए हुए हैं हनीमून के लिए, जिनकी पत्नियां मुम्बई से ट्रंककॉल कर-करके अपने पतियों को ढूंढ रही है।' मेहरा ने झट से कहा

'ऐनी-वे, मैंने अपने दोस्त के लिए कमरा रिजर्व कराया था ना?'

'जी, हां । एक वही कमरा खोली है । मुझे उस पर डबल-ब्लैक मिल रही है । एक साहब ने तो ब्लैक चैक तक सामने रख दिया । अगर वह कमरा किसी आम आदमी ने बुक कराया होता तो मैं उसे गच्चा दे देता और इस समय काफी मालदार हो चुका होता ।'

'अब आप उस कमरे की चाबी मिस्टर सक्सेना को दे दीजिए और वह कमरा उनके नाम पर शिफ्ट कर दीजिए।'

काउंटर-क्लर्क ने हाथ मलते हुए कहा

'ओहो, सर | ब्लैक के बिना? मेरा मतलब है कि व्हाइट में? मैंने तो सोचा था, आप खुफिया पुलिस के आदमी है । आपके द्वारा दस राना तक ब्लैक मिल सकती है।'

मेहरा ने गुस्से से कहा 'मिस्टर राजेन्द्रनाथ ।'

'ओह, आई एम सॉरी । मैं भूल गया था । सच बोलना जुर्म है।'

फिर उसने रिजर्वेशन चार्ट देखकर मेहरा से उसके रिजर्व कराए कमरे के ग्राहक का नाम पूछा

और की-बोर्ड पर से चाबी उतारकर अपने पास ही रखे रजिस्टर में से पहले ग्राहक का नाम काटा और राज से संबोधित होते पूछा

'यस, सर । आप लोगों का नाम?'

'मिस्टर एंड मिसेज राज सक्सेना ।'

काउंटर-क्लर्क ने नाम लिखने के बाद पूछा

'आपकी शादी हो गई है?'

राज ने गुस्से से पूछा

'व्हाट नानसेंस? क्या हम दोनों मिस्टर एंड मिसेज वैसे ही बन गए ?'

'आई एम सॉरी, सर...वेरी सॉरी । दरअसल मैं समझा था, यह आपकी पार्ट-टाइम वाइफ हैं।'

'आप बड़े बदतमीज हैं?'

'जी, नहीं । मुझसे बड़े मेरे बाप है । जबसे होश संभाला है, मेरी मां उनसे इसीबात पर लड़की रहती हैं कि वह मेरी मां से शादी क्यों नहीं करते? मगर उनके कामों पर जूं ही नहीं रेंगती और फिर रेंगेगी भी कैसे? वह बेचारे सफाचट हैं । सिर पर एक

भी बाल नहीं।'

उस दौरान मेहरा किसी और से बात करने लगा था । राज ने गुस्से से काउंटर-कलर्क ले कहा

'अच्छा, लाइए...रूम की चाबी दीजिए ।'

काउंटर-क्लर्क ने चाबी दी और हाथ मलता हुआ खुशामद से बोला

सर! कुछ चाय-पानी के लिए ही सही ।'

राज ने गुस्से से कहा

'नान्सेंस! आप खुफिया पुलिस वालों से भी रिश्वत मांग रहे हैं?'

'सर! इसी को तो कहते हैं, चोर पर मोर!'

डॉली ने अचानक गुस्से से ऊंची आवाज में कहा
 
'हम लोग अभी आपकी शिकायत मैनेजर से करेंगे।'

'अरे बाप रे । उनसे शिकायत मत कीजिएगा । मैंने पूरे पचास माहकों से जो ब्लैक की रकम ली है, उसमें उनका हिस्सा नहीं दिया । वह मुझसे पहले ही भड़के बैठे हैं।'

सी: आई. डी. इंस्पेक्टर मेहरा ने मुड़कर पूछा

'क्या बात है मिसेज सक्सेना ?'

डॉली में गुस्से से काउंटर-क्लर्क की तरफ इशारा करके कहा

'देखिए, आपने अपने दोस्त का कमरा हमें दिलाया है । यह साहब हमसे फिर भी ब्लैक मांग रहे हैं । कह रहे हैं, अगर ब्लैक नहीं मिली तो वह हमारा दिया हुआ किराया भी रजिस्टर में नहीं चढ़ाएगें ।'

मेहरा ने काउंटर-क्लर्क को घूरकर कहा-'क्यों मिस्टर राजेन्द्रनाथ ?'

राजेन्द्रनाथ हड़बड़ाकर बोला

'अरे, इंस्पेक्टर साहब! मैडम झूठ बोल रही है । इन्होंने अभी किराया दिया ही कब है ?'

डॉली ने गुस्से से राज से कहा

'सुन लिया आपने? मैं आपसे कह रही थी कि किराया इंस्पेक्टर मेहरा साहब के सामने दीजिए। इस आदमी की नीयत अच्छी नहीं मालूम होती।'



इंस्पेक्टर मेहरा ने गुस्से से काउंटर-क्लर्क से कहा

'मिस्टर राजेन्द्रनाथ! आप रजिस्टर में किराये की एंट्री करके इन लोगों को रसीद दीजिए । वरना मैं अभी आपको डिसमिस करता हूं रिश्वत मांगने के जुर्म में!'

राजेन्द्रनाथ ने रोआंसी आवाज में कहा

'अरे, सर! मैं सच कहता हूं।'

मेहण ने आंखों निकालकर कहा-'मिस्टर राजेन्द्रनाथ! इन्हें रसीद दीजिए और किराये की एंट्री कीजिए।'

राजेन्द्रनाथ ने रुधे गले से वहा 'यस, सर !'

उसने रजिस्टर में एंट्री करके किराये की रसीद बनाई और दे दी।

फिर भर्राई हुई आवाज में बोला 'शायद असल में...इसे कहते हैं चोर पर मोर

राज ने इंस्पेक्टर मेहरा से हाथ मिलाकर कहा-'अच्छा, इंस्पेक्टर मेहरा! बहुत-बहुत शुक्रिया।'

__'अरे, श्रीमान! शुक्रिया तो मुझे आपका अदा करना चाहिए । आपने मुझे यहां तक लिफ्ट दी । वैसे मैं ग्राउंड-फ्लोर पर ग्यारह नंबर में ही हूं । कोई भी जरूरत या परेशानी हो तो याद कीजिएगा।'

'शुक्रिया!'

राज और डॉली जब दूसरे माले के लिए लिफ्ट में सवार हो रहे थे, तब भी डॉली ने उस गंजे, लाल आंखों वाले से घूरते हुए देखा था, जो लाउंज में बैठा था।

__कमरे में पहुंचकर डॉली ने उससे परेशान स्वर में कहा

'यह हम किस मुसीबत में फंस गए?'

राज ने जवाब दिया

'मुसीबत? अरे, तुम तो कमाल की लड़की हो, क्या नहले पर दहला मारा है । ढाई हजार रुपये किराये के बचा दिए । वरना मैं सोच रहा था कि मेरे पास सिर्फ दस हजार हैं । उनमें क्या-क्या कर लेंगे?'

डॉली ने कहा 'मैं कह रही थी, क्या वह सी. आई. डी. इंस्पेक्टर हमारे सिर पर ही सवार रहेगा?'

'अगर वह न होत तो हमें कमरा भी न मिलता।'

'तुमने दूसरी मुसीबत की तरफ ध्यान नहीं दिया?'

'वह क्या...?'

'अरे, लाउंज में एक तगड़ा-सा गंजा आदमी, जिसकी आंखें लाल-लाल, मोटी-मोटी और बाहर उबली पड़ रही थी, हमें घुर रहा था, मानो कच्चा चबा जाएगा।'

राज ने मुस्कराकर उसके क्धे पर हाथ रखा और बोला

'तुम्हें गलतफहमी हुई होगी।'

'मैं सच कह रही हूं । वह जरूर तुम्हार कोई पुराना दुश्मन मालूम होता है।'

'मेरा ही क्यों? क्या तुम्हारा नहीं हो सकता है।'

'भला मेरा दुश्मन क्यों होने लगा ?'

'क्योंकि तुम बहुत सुन्दर हो और सुन्दरता का हर कोई दुश्मन हो जाता है।'

डॉली ने उसकी आंखों में देखकर कहा 'क्या तुम भी मेरे दुश्मन हो?'

'दुश्मन नम्बर एक ।'

'अच्छा ...?'

'इतना ही बड़ा दुश्मन कि अगर कोई तुम्हें देखे तो उसकी आंखें निकालकर हथेली पर रख दूं

और तुमने किसी की तरफ देखा तो...'
 
राज कहते-कहते रुक गया तो डॉली ने मुस्कराकर कहां-'मेरी आंखें निकालकर हथेली पर रख दो-क्यों ?'

'नही, तुम्हें उठाकर अपने दिल की कोठरी में कैद कर लूंगा उम्र भर के लिए ।'

'सच...!'

'मैं कभी संयोग से ही सच बोलता हूं और आज तो बहुत प्यारा संयोग है ।'

'इतना ही प्यार हो गया है मुझसे ?'

'प्यार नापने का कोई स्केल होता तो नापकर दिखाता।

'पौने तीन फुट...?' राज धीरे-से हंस पड़ा और बोला

'नापता ही चला जाता । संसार के सारे पैमाने, सारे स्केल, सारे फूटे, सारे इंची टेप खत्म हो जाते । मगर मेरे प्यार की लम्बाई पूरी न हो पाती ।'

'और नापते-नापते हम दोनों बुड्डे-बुढ़िया हो जाते ।

जब नाप चुकते और तुम मेरी तरफ देखते तो चौंककर पूछते है तुम कौन?

___ 'मैं अपना नाम बताकर तुम्हारा नाम पूछती और जब तुम नाम बताते तो हम दोनों इस आघात से प्राण त्याग देते कि हम लोग एक बुड्ढे-बूढ़िया से प्यार करते रहे ।'

--

-

एकाएक दरवाजे पर दस्तक हुई और दोनों चौंककर अलग हो गए।

राज ने ऊंची आवाज में कहा 'कम इन...!'

वेटर ने दरवाजा खोला और अंदर एक पांव रखकर गुस्से से बोला

'साहब! काम बताना है तो बताइए, वरना लौटा दीजिए । गाली क्यों दे रहे हैं?'

'गाली मैंने कब दी है?'

'अभी आपने 'कमीन' कहा था ना । मैं खानदानी नवाब का बेटा हूं | मेरे अब्बाजान को आज तक लखनऊ से नवाबी की पेंशन मिलती है-सवा तीन सौ रुपये सालाना!'

'अच्छा भाई साहब । भूल हो गई । क्षमा कीजिए।'

'शमा...हमारी अम्मा बी का नाम है । आप मां तक भी पहुंच गए।

'अरे, बाबा । माफ कर दो।'

'तो इसमें बिगड़ने की क्या बात है? मैं तो अपके लिए मसाज लाया था ।'

'व्हाट...मसाज...?'

'जी, हां । यह लीजिए।'

वेटर ने एक परचा बढ़ाया तो राज ने लम्बी सांस ली और बोला

_ 'मैसेज लाए हो । तुम सचमुच खानदानी नवाब मालूम होते हो । जानते हो, चिकन तंदूरी किसे कहते हैं?'

'आप क्या हमें जाहिल समझते हैं? चिकन वह कपड़ा है, जो किसी जमाने में नवाब खानदानों में पहना जाता था । आजकल जुलाहे, कुंजड़े भी पहनने लगे हैं । इसलिए हमने चिकन पहनना छोड़ दिया है । और दूसरा लफ्ट क्या बोला था आपने?'

'कुछ नहीं, तुम जा सकते हो।'

'हुंह...इससे तो हम लखनऊ में रिक्शा चलाते थे, वही ठीक था । यहां पर अजीब-अजीब बातें सुनने को मिलती हैं । हर वक्त सीढ़ियां चढ़ते-उतरते रहो ।'

'सीढ़ियां? तुम लिफ्ट क्यों नहीं इस्तेमाल करते?'

'यह क्या चीज होती है?'

'वह जिसमें सीढियां चढ़े-उतरे बिना आदमी ऊपर-नीचे आ-जा सकता है।'

'वाह, साहब! हमें मूर्ख समझ लिया है। अगर हमने ऊपर का बटन दबाया और लिफ्ट रुकी ही नहीं तो हम क्या चांद पर जाकर रहेंगे, जहां पता नहीं डाक खाना भी है या नहीं कि हम अपने अब्बाजान को लिखकर खबर कर दें, हम ब-खैरियत पहुंच गए हैं।'

'डॉली ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर कहा

'और अगर नीचे का बटन दब गया तो?'

वेटर ने बुरा मानकर कहा 'माफ कीजिएगा, बेगम साहिबा! हम खानदानी लोग हैं, औरतों से बात नही करते । हमारे अब्बाजान की शादी को पचास वर्ष हो गए-आज तक उन्होंने हमारी अम्मां जानी की सूरत नहीं देखी। 'हमारी शादी को पांच वर्ष हो गए । एक बच्चे के बाप बन गए । मगर हमने अपनी बेगम को अपने कमरे में कदम तक नहीं रखने दिया है ।' फिर वह बिगड़ता हुआ चला गया ।

डॉली हंसते-हंसते बैड पर लोटन-कबूतरी हो गई।

राज ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर वेटर का लाया हुआ परचा पढ़ा |

उसमें लिखा था :

.

फौरन मेरे कमरे में आइए ।

इंस्पेक्टर मेहरा

राज चौंक पड़ा।

डॉली ने हंसते-हंसते राज को देखा तो चौंककर सीधी बैठती हुई बोली

'क्या हुआ?'

राज ने परचा दिखाकर कहा

'यह इंस्पेक्टर मेहरा का मैसेज है । उन्होने तुरंत मुझे अपने कमरे में बुलाया है।'

'क्यों...?'

भला, क्या मालूम? मैं आता हूं मालूम करके

राज कमरे का दरवाजा खोलने लगा तो डॉली ने जल्दी से कहा

'मेरी बात सुनो ।'

राज रुककर बोला 'हां, बोलो?'

'कहीं उन्हें हम दोनों पर संदेह तो नहीं हो गया?'

'शायद...!'
 
डॉली नजदीक आई और राज का हाथ थामकर बोली-'देखो, राज! इससे अच्छा मौका फिर शायद ही हाथ आए ।'

'लेकिन हम भागकर जाएंगे कहां?'

'मैं भागने को नहीं कह रही ।'

'तो फिर...?'

'डंस्पेक्टर मेहरा भी अच्छे आदमी हैं । वह पुलिस इंस्पेक्टर भी, जिन्होंने हमें मेहरा साहब से मिलाया था ।'

'तो फिर...?'

'क्यों न तुम सरेंडर कर दो ।'

'मैं...?'

'मेरा मतलब है कि हम दोनों सरेंडर कर दें। मैं तुम्हें वचन देती हूं, तुम्हारे भी सारे अपराध मैं अपने सिर ले लूंगी।'

राज ने दोनों हाथों में उसका चेहरा लेकर उसके होंठ धीरे-से चूमे और उसकी आंखों में देखता हुआ बोला-'सचमुच तुम बहुत अच्छी हो, डॉली ।'

'राज...!'

'लेकिन मैं अपने अपराध तुम्हारे सिर मंढ़ दूं, यह मुझसे कभी नहीं होगा।'

'देखो, राज...।'

राज ने डॉली के होंठों पर हाथ रख दिया और बोला-'इस टॉपिक पर हम बाद में बात करेंगे। अभी मैं इंस्पेक्टर मेहरा के पास जा रहा हूं।' उसने एकबार फिर से डॉली के होंठ चूमे और बाहर निकल गया।

दरवाजा बंद हो गया और डॉली उस दरवाजे को देखती रह गई, जिससे राज निकलकर गया था । फिर उसने अपने होंठों पर हाथ फेरा ।

वे होंठ जो अब तक कुंवारे थे। पहली बार उन्हें किसी ने छुआ था तो वह राज था।

'राज बाबू ...।'

'यशोदा आंटी के बेटे ।'

'कहीं उन्हें सुधारते-सुधारते, मैं खुद भी तो उनसे प्यार नहीं करने लगी।'

सहसा डॉली का दिल बहुत जोर से धड़का । धड़कनों में एक संगीत-सा गूंज उठा और उसका रोम-रोम चीखने लगा।

'हां, यह सच है।'

'मैं भी उनसे प्यार करने लगी हूं।'

'वह भी तो मुझसे प्यार करने लगे हैं।'

'कितने अच्छे हैं वह ।'

'कितनी पवित्रता है उनके प्यार में ।'

'उनकी आंखों में जरा-सी भी वासना नहीं झलकती।'

'अगर उनके मन में वासना होती तो क्या वह बंगले में ही मेरे एकांत का लाभ उठाने की कोशिश न करते अंदर लेटकर?'

'उन्होंने अपने-आपकों खतरे में डाल लिया। लेकिन अंदर नहीं लेटे ।'

'हे भगवान! किसी तरह उन्हें अपराधों की दुनिया से निकाल दे।'

'यशोदा आंटी कितनी खुश होंगी यह सब जानकर ।'

तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।

डॉली चौक पड़ी।

फिर उसे उस वेटर का ख्याल आ गया और 'कम इन' कहते-कहते रुककर जोर से बोली

'आ जाओ!'

दरवाजा खुला ।

जिसने भी भीतर प्रवेश किया, उसे देखकर डॉली का ऊपर का सांस ऊपर रह गया, नीचे का नीचे । आंखें फटी रह गई, मुंह खुला हुआ। आने वाला वही गंजा, खूनी आंखों वाला था, जिसके हाथ में रिवाल्वर था । उसने होंठों पर उंगली रखकर डॉली को चुप रहने का इशारा किया और दरवाजा बंद करता हुआ रिवाल्वर की नाल डॉली की तरफ करके गुर्राया

'यह रिवाल्वर आवाज नहीं करता ।'

डॉली कुछ न बोली । बिल्कुल वैसे ही खड़ी रही । गंजे ने निर्ममता भरे स्वर में कहा

'मेरा निशाना बहुत शानदार है। अगर गले या माथे पर गोली मारी तो मरने वाले की चीख की आवाज भी असफल प्रेमी की तरह उसकी छाती में ही घुटकर रह जाती है।'

डॉली ने खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला और कंपकंपाती आवाज में बोली 'त...त...तुम...क...क...कौन हो...?

' गंजे ने क्रूर मुस्कान के साथ कहा 'अपना ससुराली समझ लो ।'

'म...म...मेरी अभी शादी नहीं हुई ।'

'और यहां इस नौजवान के साथ ऐश मना रही हो?'

'त...त...तुम गलत समझ रहे हो ।'

'तुम क्या कर रही हों-हमें इससे कोई मतलब नही ।'

'फि...फिर क्या चाहते हो?'

'पच्चीस लाख रुपये ।'

'क...क...कौन से?'

'जो बैग में भरकर उस अनाथ-आश्रम की छत पर फेंके गए थे, जिसमें तुम रहती हो ।'

'व...व...वह तो मैंने पुलिस को दे दिए थे ।'

रिवाल्वर वाला झटके से गुर्राया

'झूठ मत बोली । पुलिस को वह बैग खाली मिला था ।'

'म...म...मैं झूठ नहीं बोल रही ।'

'लड़की! अंगर तुमने रुपयों के साथ पुलिस को बैग दिया था तो फिर वहां से भागी क्यों थी?'

'स...स...सेठ गोपालदास को देखकर!'

जिनके साथ तुमने पचास हजार का फ्राड किया था ?'

'म...म...मैंने अपना बर्थ-डे मनाया था।'

'हमने तुम्हारे बारे में और भी जानकारी जुटाई है । तुम इस तरह के बहुत से फ्राड कर चुकी हो ।'

'म...म...मगर मैं आदी चोर या मुजरिम नहीं

'नहीं...तुम तो संन्यासिन या देवी हो ।'

.

'म...म...मैं...।'

गंजे ने आंखें और ज्यादा निकालकर कहा 'तुमने हमें डॉज देने के लिए वह बैग रद्दी कागजों से भरकर पुलिस को सौंपा था ।'

'यह ग...ग...गलत है।'

'फिर वहां से तुम अपने यार के साथ भाग खड़ी हुई, जो पहले ही से तुम्हारे पीछे मोटरसाइकिल लेकर आ रहा था ।'

'वह..वह...तो...।'

'तुम्हारा कोई नहीं...क्यों?'

.

.

.

'म...म...मैं...'

'वह तुम्हारा कोई नहीं और तुम उसके साथ इस होटल में एक ही कमरे में मिस्टर और मिसेज बनकर ठहरी हुई हो।'

'वह...वह...तो...एक दूसरा मामला है।'

'लड़की! तुम्हारा मामला पहला हो, दूसरा या तीसरा । लेकिने हमें हमारे वे पच्चीस लाख रुपये चाहिए, वरना हम तुम्हें जिन्दा नहीं छोड़ेंगे।'

उसने रिवाल्वर डॉली की कनपटी से लगा दिया और गुर्राकर कहा 'बताओ, वरना मैं ट्रेगर दबाता हूं।'

डॉली ने आंखें बंद कर लीं और कहा 'दबा दो...ट्रेगर...'

'लड़की...!'

'बस मै मर ही जाऊंगी तो फिर तुम्हें कौन बताएगा, वे रुपये कहां छुपाए हुए हैं मैंने ?'

.

'लड़की...!'

'अब तो मैं तुम्हें वैसे भी नहीं बताऊंगी।'
 
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