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अंदाज़

'क्या मतलब ?'

'जैसे ही मैंने बताया कि रुपये कहां है, तुम मुझे गोली मार दोगे।'

'तुम सचमुच बहुत चालाक हो ।'

'अत: तुम चुपचाप यहां से चले जाओ।'

रिवाल्वर डॉली की कनपटी से हट गया ।

गंजे ने कहा

'तुम सचमुच इतनी चालाक हो कि पलक झपकने में करोड़पति बन सकती हो ।' 'हमसे हाथ मिला लो । हमारे गैंग में कोई लड़की है भी नहीं । तुम्हारे पास जो पच्चीस लाख रुपये हैं, उनमें से ही तुम्हें तुम्हारा हिस्सा दस प्रतिशत मिल जाएगा।'

डॉली सन्नाटे में रह गई।

गंजे ने कहा

'बोलो...हां...या ना...?'

डॉली ने थुक निगलकर कहा

'म...म...मैं इतनी जल्दी कैसे जवाब दे सकती हूं।'

'ठीक है, हम तुम्हें सोचने की मोहलत देते हैं गंजे ने कुछ पल रुककर कहा

'तुम जितना समय चाहो, खुद ही सोचने के लिए मांग लो।'

डॉली ने होंठों पर जुबान फेरकर कहा

कम-से-कम एक सप्ताह ।'

गंजे ने कहा

'हमें स्वीकार है । लेकिन हम इस कमरे की दिन-रात निगरानी करेंगे । यह सोचना भी मत कि तुम हमें डॉज देकर इस होटल से भाग सकती हो ।' फिर वह रिवाल्वर जेब में रखकर मुड़ा और दरवाजे के करीब पहुंचकर रुका ।

फिर डॉली की तरफ मुड़कर वार्निग देने के अंदाज में बोला

'एक सप्ताह...याद रखना...'

'ज...ज...जी...!'

गंजा दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया । दरवाजा बंद हो गया।

डॉली देर तक उस दरवाजे की तरफ देखती रही, जिससे गंजा निकलंकर गया था । फिर वह अचानक बैड पर गिर गई और तकिये में मुंह छुपाकर रोने लगी

'हे भगवान! अब क्या करूँ मैं?'

'राज मुझसे प्यार नहीं करता।'

'उसने मुझे सिर्फ उन पच्चीस लाख रुपयों के लिए पुलिस से बचाया था ।'

'वह खुद खुलकर सामने नहीं आना चाहता

'लेकिन उसने अपना आदमी लगा रखा है।'

'यह गंजा जरूर उसी का आदमी है।'

'इसीलिए जब मैंने इस गंजे का जिक्र राज से किया तो उसने हंसकर टाल दिया ।'

'और अब इंस्पेक्टर मेहरा से मिलने के बहाने मुझे अकेली छोड़कर चला गया।'

'ताकि उसके पीछे यह गंजा आकर मुझे धमका सके ।'

'राज मेरे फ्राड से भी परिचित है ।'

'इसीलिए वह मुझे अपने गैंगा में भी शामिल करना चाहता है।'

'अगर यह गंजा राज का आदमी न होता तो मुझे जिन्दा

क्यों छोड़ता ?'

'हे भगवान! मैं क्या करू?'

'क्या मैं राज को सुधारने में कभी सफल हूंगी?'

'क्या मैं राज को डॉली आंटी के सामने ले जाकर खड़ा कर सकूँगी।'

'यशोदा आंटी बहुत भोली, बहुत नेक दिल है ।'

'अगर उन्हें पता चला कि उनका बेटा चोर है तो क्या होगा?' 'सदमे से तो उनका हार्ट-फेल हो जाएगा।' डॉली ने झुरझुरी-सी ली और आगे सोचा 'नही...नहीं, यह हर्गिज नहीं हो सकता।' 'मैं यशोदा आंटी को नहीं मरने दूंगी।'
 
'मैंने राज को सुधारने की प्रतिज्ञा की है।'

'मैं किसी भी कीमत पर राज को सुधारकर रहूंगी।'

'चाहे उसनेके लिए मुझे बड़ी से बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।'

'अगर राज खुलकर सामने नहीं आना चाहता तो न सही ।'

'मैं राज के आदमी की बात मान लूंगी।' 'मैं राज के गैंग में शामिल हो जाऊंगी।'

'एक दिन मैं गैग के हर सदस्य को जान जाऊंगी।'

'उनके अड्डों के पते लगा लूंगी।' 'और मैं पुलिस से रेड करा दूंगी।'

'राज को निर्दोष साबित करके उसे बचा लूंगी।'

'ताकि वह यशोदा आंटी के पास पहुंच सके ।'

तभी डॉली ने दरवाजे पर दस्तक सुनी । फिर जल्दी से उठकर अपने आंसू झटपट साफ किए और दरवाजा खोला

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राज ने भीतर प्रवेश किया और हैरत से बोला

'पता नहीं किसने बहकाया था ।'

डॉली के दिल पर धक्का -सा लगा। उसने सोचा

'मेरा अंदाजा कितना ठीक था ।' फिर भी वह बनावटी हैरत से बोली

'क्या मतलब?'

'वह परचा इंस्पेक्टर मेहरा ने नहीं भेजा था ।'

'तो फिर किसने भेजा था ?'

'पता नहीं कौन था?'

इंस्पेक्टर मेहरा से मिले थे?'

'उनका रूम ही बंद था । मैंने काउंटर पर पूछा तो क्लर्क ने बताया कि मेहरा साहब हम लोगों के ऊपर आते ही किसी के साथ बाहर चले गए थे ।'



'हे भगवान! फिर कौन हो सकता है?'

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'मेरे पीछे तो कोई यहां नहीं आया?'

'नहीं तो...।'

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'ऐसा लगता है, किसी ने मुझे जान-बूझकर यहां से हटाने की कोशिश की थी।'

'क्यों...?'

'शायद तुम...तुम्हारे साथ...' फिर राज संभलकर बोला-'मेरा मतलब है तुम पर किसी प्रकार का हमला करना चाहता हो ।' 'तुमने वह पच्चीस लाख का बैग जो पलिस को सौंप दिया है।'

'हे भगवान! फिर क्या होगा?'

'जब तक उन लोगों को विश्वास न हो जाए कि...' वह कुछ कहते-कहते रुक गया ।

तब डॉली ने पूछ लिया 'क्या विश्वास न हो जाए...?'

राज ने जवाब दिया 'कुछ नहीं, यहां तुम्हारी जिन्दगी खतरे में है

'फिर...?'

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'हमें यहां नहीं रहना चाहिए।'

'फिर कहा जाएंगे?'

'कहीं भी जाएं । मगर हम यहां नहीं रहेंगे।'

राज ने उसे खींचकर छाती से लगा लिया। फिर बोला 'मैं तुम्हारी जिन्दगी किसी भी कीमत पर संकट में नहीं डालना चाहता ।'
 
अगले ही पल डॉली उसकी छाती से चिमटकर सिसक-सिसक कर रो पड़ी।

बड़ी मुश्किल से डॉली के गले से खाना उतर सका । वह भी जबरदस्ती कई कौर जब उसे राज ने खिलाए । खाने के बाद जब वह मंह साफ करके बाहर आई तो राज ने उसकी कमर में हाथ डालकर कहा

'एक बात बताओगी?'

डॉली ने भारी-सी आवाज में कहा 'पूछो...?'

'क्या तुम्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं?'

'राज...!'

'डॉली तुम्हारे ऊपर तब आंच आएगी, जब मैं नहीं रहूंगा।'

'राज बाबू!'

'डॉली ने कंपकपाकर राज का मुंह बंद कर दिया। फिर उसकी छाती से लगकर सिसक पड़ी।

राज ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा 'जब तक मैं तुम्हारे साथ हूं । तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता ।'

डॉली ने बड़ी मुश्किल से सिसकियां रोककर कहा 'मैं इसीलिए तो कह रही थी कि...मेहरा साहब और पुलिस-इंस्पेक्टर के सामने...।'

राज ने कहा 'हर्गिज नहीं।'

'क्यों...?'

'डॉली, इस प्रकार पूरा गैंग तुम्हारा दुश्मन बन जाएगा।'

'वह तो अब भी है।'

'अभी उन्हें यह इत्मीनान है कि तुम आजाद हो और वह तुम से कभी भी उन रुपयों के बारे में मालुम करा सकते हैं।'

'लेकिन वे रुपये तो मैंने पुलिस को सौंप दिए थे ।'

'पुलिस ने तुम्हारी गिरफ्तारी के लिए झूठा प्रोपेगंडा शुरू कर दिया है।'

'क्या...?'

'जो बैग तुम देकर भागी थी-उसमें पहले असली नोट समझे गए थे । लेकिन बाद में पता चला कि वे सब नकली नोट हैं।'

'इस बहाने पुलिस तुम्हें और उस गैंग को पकड़ना चाहती है।'

'इसालिए तो मैं कह रही हूं कि मैं हाजिर हो जाऊं।'

'मैं भी तुम्हें यही मश्विरा देता । लेकोन गैंग वाली से दुश्मनी मोल लेना अच्छा नहीं । तुम कभी तो सजा पूरी करके निकलोगी?'

डॉली कुछ न बोली। राज ने फिर मे कहा 'और फिर वे लोग जानते हैं, तुम उस अनाथ-आश्रम में रहती हो, जिसमें ग्यारह मासूम लड़कियां और भी हैं, साथ में तुम्हारी यशोदा आंटी...'

'फिर...?'

'वे लोग तुम पर दबाव डालने के लिए उन लोगों को कष्ट पहुंचा सकते हैं।'

डॉली के दिल को धक्का-सा लगा। उसने सोचा 'अब यह मुझे धमकी दे रहा है।'

'मैं पुलिस में हाजिर हो गई तो यह मेरी साथियों को परेशान करेगा ।'

'यशोदा आंटी के साथ ज्यादती करेगा।'

'इसे क्या मालूम कि यशोदा आंटी इसकी सगी मां हैं।'

'काश, मैं इसे बता सकती।'

'हर्गिज नहीं...'

'जब तक यह पूरी तरह न सुधर जाए, मैं इसे किसी कीमत पर नहीं बताऊंगी कि यह यशोदा आंटी का सगा बेटा है।'

अचानक राज ने उसका चेहरा हाथों में लेकर कहा

'तुम बार-बार किस सोच में डूब जाती हो, डॉली ?'
 
डॉली ने झट से संभलकर कहा

'कुछ भी नही ।'

'सच कह रही हो?'

'भला, तुम से झूठ बोलुंगी । अब मेरा सहारा तुम्हारे सिवाय है कौन ?'

'तो सुनो डॉली । हम आज रात में किसी भी तरह छुपकर यहां से निकल जाएंगे।'

डॉली ने बनकर पूछा 'छुपकर क्यों?'

'इसलिए कि अगर गैंग के कुछ लोग तुम्हारी निगरानी कर रहे हैं तो वे यही समझते रहें कि हम दोनों इसी कमरे में हैं।'

'लेकिन हम निकलेंगे कैसे ?'

'यह तुम मेरे ऊपर छोड़ दो।'

'और निकलकर कहां जाएंगे?'

'उसी बूढ़े के बंगले में ।'

डॉली उछल पड़ी 'वह जो मर चुका है।'

'हां, डॉली...'

'नहीं...नहीं, मैं वहां नहीं जाऊंगी।'

'क्यों...?'

'उसकी आत्मा हमें फिर से परेशान करेगी।'

'डॉली! परेशान करना सिर्फ भ्रम है।

वह एक अच्छा आदमी था । इसीलिए वह अपने पापों से मुक्ति चाहता है।

'उसके लिए वह सिर्फ अपनी बेटी और दामाद की पुष्य तिथि की रात को ही आत्मा के रूप में किसी बूढ़े को लाता है।'

'लेकिन वहीं क्यों?'

'इसलिए कि वह जगह हमारे लिए सबसे ज्यादा सुरक्षित है।'

'भला उस वीराने में बंगला हमारे लिए सुरक्षित है?'

'डॉली, वे लोग हमें शहर में ढूंढ़ेंगे । शहर से बाहर नहीं । अगर वह वहां का पता पाने में सफल हो भी गए तो इससे पहले कि हम उनके सामने पड़ें, हम उन्हें देख लेंगे क्योंकि हम अंदर होंगे । वह इलाका घनी आबादी वाला नहीं कि कोई कहीं भी छुप सके

'डॉली ने उसकी छाती से लगकर कहा

'तुम जैसा उचित समझो । मैंने तो अब सब कुछ तुम पर छोड़ दिया है।'

एक बार फिर से राज ने उसे प्यार कर लिया और वह फिर से रो पड़ी।

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डॉली भयभीत नजरों से दरवाजे की तरफ देख रही थी । बार-बार उसे लगता कि वही गंजा फिर से अंदर आ जाए और वह उससे कह दे कि वह उसके गैंग के लिए काम करेगी।

राज बाहर गया था।

अचानक दरवाजा खुला और वह उछल पड़ी । उसका दिल बहुत जोर से धड़का । फिर जब उसने अंदर आने वाले को देखा तो उसके मुंह से चीख निकलते-निकलते रह गई।

__ आने वाले ने रिवाल्वर उसके ऊपर तानते गुर्राकर कहा-'खबरदार...खबरदार...अजीज...आवाज बाहर

और साथ में गोली अंदर पान चबाकर!'

वह एक अच्छे कद और शरीर का अजनबी था, जिसके बदन पर शेरवानी और बड़ी मोहरी का पायजामा थे। पैरों में जोधपुरी नागरे, चेहरे पर मौलवी-मुल्लाओं सरीखी दाढ़ी पान की पीक से तर, सिर के बाल खिचड़ी, जो सफेद दो पल्ली टोपी से लटों की तरह झांक रहे थे और आंखों पर ऐनक ।

उसके हाथ में एक अटैचीकेस भी था । उसने मुंह चलाते हुए कहा

'अजीजा! हम तुम्हें भगाने के लिए आए है।'

'ज...ज...जी...?'

'वल्लाह! इतनी सुन्दर चीज को देखकर हम अपने दिल पर काबू नहीं रख सकते-पान चबाकर।'

डॉली ने सोचा

'जरूर...यह कोई राज के ही दल का आदमी है । शायद इसे गंजे ने भेजा हो ।'

उसने पूछा

'क्या सोच रहे ही, अजीजा? बाहर तुम्हारा आशिके दिलगीर इंस्पेक्टर मेहरा से बातें कर रहा है-पान चबाके । इससे अच्छा मौका और कोई नहीं हो सकता तुम्हें बाहर ले जाने का पान चबाके । 'तुमने इंकार किया तो...हम...तुम्हें सुहागिन बनने से पहले ही विधवा कर देंगे-पान चबाके । क्या , अजीजा?'

'ज...ज....जी...!'

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'तो फिर लो । जल्दी से हुलिया बदल लो-पान चबाके ।' अजनबी ने अटैची बैड पर रखकर खोल दी, जिसमें ठेठ लखनऊ की महिलाओं के कपड़े और एक काला बुरका था । जोधपुरी जनाना नागरे भी।

अजनबी ने मुंह चलाते हुए कालीन पर पीक की पिचकारी मारी तो डॉली उछलकर पीछे हट गई। अजनबी ने रिवाल्वर हटाकर कहा

'जल्दी करो, अजीजा । कहीं वह तुम्हारा आशिये-नामुराद आ गया तो बेचारे का जनाजा बड़ी धूमधाम सेर निकलेगा।'

'नही...नहीं...मैं चल रही हूं।'

'शाबाश, हम यहां रिवाल्वर लिए खड़े हैं पान चबाके । तुम जल्दी से यह जोड़ा लेकर जाओ और बाथरूम में बदल डालो ।

'हम नामहरम को बैगर कपड़ों के देखना गुनाहे-अजीम समझते हैं-पान चबाके । बस, एक बार तुमसे निकाह हो जाए तो फिर हमारे जलवे देखना-पान चबाके ।'

डॉली कुछ न बोली । वह चुपचाप कपड़े निकालकर बाथरुम में चली आई। कपड़े बदलते हुए बार-बार उसकी कल्पना में राज की छवि उभरती और उसका दिल अनायास भर-भर आता । उसका मन करता कि वह चीख-चीखकर रोने लगे।

'राज रास्ता साफ देखने के बहाने बाहर गया था । एक घंटे से ज्यादा हो गया था । अभी तक लौटकर नहीं आया था ।'

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'और अपने पीछे उसने अपने इस आदमी को भेज दिया...ताकि मुझे ले जा सके ।'

'पता नहीं, वह कहां होगा?'

अपने गैंग में फंसा रहा है।'

'खैर, कुछ भी हो । मुझे तो वैसे भी गैंग में शामिल होना ही था ।'

'इस गैंग का पतन करने का एक ही रास्ता है

'गैग का पतन हो गया तो मैं राज के सारे अपराध अपने सिर ले लुंगी।'

'राज को जब मेरे बलिदान का पता चलेगा तो वह खुद-ब-खुद रास्ते पर आ जाएगा।'

_ 'यूं भी यशोदा आंटी को अपनी मां पाकर वह जरूर बदलेगा ।'

बाहर से आवाज आई

'अरे, अजीजा! क्या तुम हज्जे-बैतुल्ला की तैयारी कर रही हो?'

डॉली ने कहा

'बस, तैयार हूं । अभी आती हूं।'

'जल्दी आओ अजीजा, कहीं हमारे हाथों एक नौजवान आशिक का खून न हो जाए-पान चबाके । वैसे हम बड़े रहमदिल हैं । मगर हुस्न के मामले में रकाबत हर्गिज सहन नहीं कर सकते-वह भी पान चबाके ।'

डॉली जल्दी-जल्दी बाहर निकल आई । कुछ देर बाद वह अपने कमरे से निकली तो अजनबी मौलाना का एक हाथ कमर पर पीछे रखा हुआ था, दूसरे हाथ में अटैची थी और वह इतना लंगड़ा रहा था, जैसे झूला-झूलता हुआ चल रहा हो ।

डॉली सिर से पांव तक बुरके में ढंकी थी और पैरों में नागरे जूते थे । उसके पहले के कपड़े अटैची में रखे थे।
 
लिफ्ट से निकलकर जब वे दोनों काउंटर के पास से गुजरने लगे तो गंजा लाउंज में बैठा बदस्तूर अखबार देख रहा था और बार-बार कनखियों से वह लिफ्ट और सीढियों की तरफ भी देखता जाता था, जैसे अब भी निगरानी पर नियुक्त हो।

काउंटर पर खड़े क्लर्क राजेन्द्रनाथ ने उन दोनों को देखा तो बड़े जोर से अजनबी को सम्बोधित करते हुए बोला

'अस्सलामाले कुम!'

अजनबी ने बड़ी शान से जवाब दिया

'व मालेकुस्सलाम मियां!'

जवाब देते हुए उसके मुंह से पीक निकलकर दाढ़ी पर से होती हुई, शेरवानी से गुजरकर नीचे फर्श पर फैल गई । पर न तो अजनबी ने देखी, न ही राजेन्द्रनाथ ने।

राजेन्द्रनाथ ने कहा 'वापसी की एंट्री तो कराते जाइए । एक सौ एक ग्राहक लाइन में है । आज अपने साथ वैसे ही घोटाला हो गया है । कुछ तो नुकसान पूरा हो जाएगा

बूढ़े ने नथुने फुलाकर कहा 'किस बात की एंट्री, मियां?'

'आप होटल छोड़कर जा रहे हैं ना ?'

'दो घंटे पहले आए हैं और दो घंटे बाद होटल छोडकर भी चले जाएंगे। यहां हमारे पास हराम की कमाई नहीं आती-पान चबाके ।

'माफ कीजिएगा, बड़े मियां । मैं समझ रहा था, मेरी तकदीर का सितारा एक बार फिर से चमकने वाला है।'

बूढ़े ने आखें निकालकर कहा

'क्या फरमाया? बड़े मियां? बड़े मियां आप, आपके बाप, आपके बाप के बाप । आप हमारी जवानी पर दाग लगाकर हमारी बेगम को बरगलाना चाहते हैं। 'आइए बाहर निकलकर । अभी हम आपके सारे कस-बल न निकाल दें, हमारा नाम अब्दुर्रहमान शिराजी नहीं, पान चबाके ।'

___ 'माफ कीजिएगा । मैं इन्हें आपकी बेगम नहीं, आपकी दुख्तरे नेक-अख्तर समझा था।'

'खबरदार मियां! जुबान संभाल के, वरना अभी आपकी जुबान खींचकर आपके हाथ पर रख देंगे-पान चबाके ।'

...अच्छा, आप जब तक पान चबाकर आइए, मैं जुबान संभालता हूं।'

_ 'लाहौल विला कुव्वत इल्ला विला । यह होटल है या गुण्डों का गढ़ । हमें मालूम होता तो कभी इस होटल में कयाम न फरमाते ।'

फिर वह झूला झूलता हुआ बाहर निकल गया

काउंटर-क्लर्क ने सफेद-धवल फर्श पर पान की पीक देखी तो उछल पड़ा।

चिल्लाकर वेटर को बुलाया और बोला

'यहां बैठकर किसने हजामत बनवाई है, जो इतना खून बह गया ।'

वेटर ने दबी-दबी जुबान से कहा

'सरकार! इस काउंटर के आसपास आपके होते हुए किसी की क्या मजाल जो आपका रिकार्ड तोड़ सके?'

करेक्ट! हमारा रिकार्ड नहीं टूटना चाहिए, चाहे सिर ट्ट जाए | जाओ, जल्दी से किसी कमरे के ग्राहक के नाम तार देकर आओ कि उसकी मां का देहांत हो गया है।'

'क्यों, साहब?'

'अरे, अक्ल के दुश्मन । कोई कमरा तो खाली होना चाहिए, ताकि अपना कुछ नुकसान तो पूरा होने की आशा बंधे ।'

अचानक सीढ़ियों पर से एक गठरी-सी लुढ़कती नजर आई । फिर वह गठरी एक आदमी बनकर खड़ी हो गई, जिसके शरीर पर नेकर के अलावा कुछ नहीं था और दाढ़ी-मूंछे थी।

कमर पर पीछे की तरफ हाथ रखकर वह बड़ी तेजी से झूला झूलता हुआ आगे आया और हांफते हुए चीखा

'कहा गया...कहां गया वह बदमाश-पान चबाके?'

गंजा और दूसरे लोग उसे चौंककर देखने लगे

काउंटर-क्लर्क ने उसे हैरत से देखकर कहा-'पान चबाके? क्या वह आपके जुड़ावा भाई हैं या आप डबल रोल कर रहे है ?'

'क्या बकते हैं आप । यह होटल है या बदमाशों का अड्डा । वह बदमाश हमारे कमरे में घुस आया । हमारी बेगम डर के मारे बेहोश हो गई और उसने हमारे हाथ-पांव बांधकर हमारा यह हुलिया बना दिया ।'

काउंटर-क्लर्क खोपड़ी खुजाकर हैरत से बोला

'आपके हाथ-पांव बांध दिए? जरा बंधवाकर दिखाइए, कैसे बांधे थे, पान चबाके ?'

गंजे ने आगे कुछ नहीं सुना।

वह अखबार मेज पर फेंककर बड़ी तेजी से उठा और होटल से बाहर निकल गया ।

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कुछ देर बाद वह एक पब्लिक टेलीफोन बूथ की ओर लपक रहा था।

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टैक्सी एक सड़क पर रुकवाकर जब दाढ़ीवाले ने मुंह चलाते हुए नीचे उतरकर डॉली से सम्बोधित होकर कहा

'आइए, अजीजा । नीचे उतर आइए ।'

डॉली का दिल जोर से धड़क उठा।

'इस वीराने में टैक्सी रुकवाने का उद्देश्य क्या हो सकता है?'

यह सोचकर वह सिर से पांव तक दहल गई । लेकिन उसे उतरना तो पड़ा ही ।

अटैची संभालकर बूढ़े ने टैक्सी-ड्राइवर को किराया दिया और टैक्सी चले जाने के बाद बूढ़े ने झूला झूलने वाली चाल चलते हुए एक ढलवां पगडंडी की दिशा में बढ़ते हुए कहा

'आइए, अजीजा । हमारे नक्शे-कदम पर कदम रखती हुई तशरीफ ले आइए ।'

डॉली ने उसके पीछे-पीछे उतरते हुए भयभीत स्वर में कहा 'इस जंगल में आप क्यों उतरे हैं ?'

'अरे, अजीजा । जंगल में ही तो प्यार करने का मजा है, वह फाइव स्टार होटलों में कहां? मियां मजनूं, मियां फरहाद, मियां रांझा-इनमें से किसी को भी न तो ताजमहल होटल पंसंद था, न ही ओबेराय शेरटन-पान चबाके ।'

एक घनी जगह में पहुंचकर वह रुक गया । मुड़कर बड़े प्यार से डॉली से संबोधित होते हुए बोला

'अब अपना लिबास उतार दीजिए, अजीजा

डॉली ने सिर से पांव तक कांपकर कहा

'नही...!'

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'नहीं...नहीं तो माशूकों की खास अदा है, अजीजा । हमें मालूम है कि आप जैसी परी-जमाल की नहीं के पीछे एक हजार

'हां' होती है-पान चबाके ।'

'द...देखिए...'

'हम देखकर ही तो अपनी आंखें सेंकना चाहते हैं, अजीजा । हाय क्या गुलाब में गुंथी हुई चांदनी जैसा बदन होगा आपका ।'

'मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूं।'

'खुदाया, हाथ जोड़कर हमें शर्मिदा मत कीजिए।'

'देखिए, मेरी इज्जत पर हाथ मत डालिए ।'

'वल्लाह! अब आपकी इज्जत, हमारी इज्जत है। हमारी इज्जत आपकी इज्जत, अजीजा । जब हम दोनों का सब-कुछ एक-दूसरे का है तो फिर बीच में यह परदा कैसा-पान चबाके ।'

'नही, यह हर्गिज नहीं हो सकता ।'

'यह नहीं होता तो न तो हम होते, न आप होती, अजीजा । यह होने का सिलसिला तो हजरते-आदम के जन्नत से जमीन पर आते ही शुरू हो गया था-पान चबाके ।'

'नहीं...!'

'आपकी 'नहीं-नहीं' में हमारी जान न निकल जाए कहीं, अजीजा? बस, अब और न तड़पाइए । हमारे गले से लग जाइए-पान चबाके ।'

बूढ़े ने अटैची रखकर डॉली का हाथ पकड़ना चाहा, तो डॉली हड़बड़ाकर पीछे हट गई और कंपकंपाती आवाज में बोली

'देखों, बड़े मियां । मुझे मलाई का लड्डु मत समझ लेना कि प्लेट से उठाकर मुंह में रखा और चबाए बिना गटक लिया ।'

'लाहौल विला कुव्वत इल्ला-विला । अगर आप भी हमें बड़े मियां कहेंगी तो...खैर...तो अब हम आपको दिखा ही दें कि इस बूढ़े शरीर में कितने घोड़ों की ताकत है?'

अचानक बूढ़े ने झपट्टा मारकर डॉली का हाथ पकड़ लिया । डॉली ने बौखलाकर कोई पैंतरा दिखाने की कोशिश की, लेकिन दूसरे ही पल वह बूढ़े की छाती से चिमटी हुई थी। उसे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे उसे किसी केकड़े ने जकड़ लिया हो।

उसने बूढ़े की छाती पर चूंसे मारते हुऐ और हांफते हुए कहा 'छोड़...मुझे...छोड़ खबीस...शैतान...!'

फिर उसने अचानक बूढ़े की दाढ़ी नोच डाली । दूसरे ही पल दाढ़ी, मूंछों के साथ उखड़कर उसके हाथ में आ गई।

डॉली के होंठों से कंपकंपाती आवाज निकली

'राज...!'

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अगले ही पल वह राज की छाती से लगकर सिसक पड़ी । राज ने अपनी व्हिग और टोपी उतारते हुए डॉली को बांहों में जकड़कर कहा 'नहीं पहचान सकी ना अपने राज को?'

डॉली ने रोते हुए कहा

'इतना भयानक मजाक | अगर आसपास कोई ऐसी जगह होती, जहां कूदकर मैं अपनी जान दे सकती तो अब तक कभी की जान दे चुकी होती ।'
 
राज ने उसके होंठों पर हाथ रखकर कहा 'नहीं, डॉली । अब इस जान पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं । तुम्हारी जान हमारी जान है और तुम हमारी जान से इस तरह नहीं खेल सकती।' फिर उसने डॉली की दोनों आंखें चूम ली, डॉली के आंसू पीछे और बोला

'बस, आदमी सब कुछ सहन कर सकता है । लेकिन अपनी प्रेमिका की आंखों में आंसू नहीं सहन कर सकता ।'

डॉली ने रुधे गले से कहा

'अगर तुमने होटल में ही मुझे असलियत बता दी होती तो...तो मेरी आधी जान ही क्यों रह जाती ?'

.

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राज ने उसका माथा चूमा और बोला 'कोयले की खदान में रहकर भी कोई किस प्रकार अपने शरीर और चेहरे को कालिख से बचा सकता है-इसका सबूत तुम्हारी आज की बहादुरी से मिल गया।'

फिर उसने अटैची खोलते हुए कहा 'एक घंटे पहले बराबर वाले कमरे में एक बूढ़ा, लंगड़ा अपनी नौजवान पत्नी के साथ आकर रहा था । मैंने उन दोनों को ध्यान से देखा था । फिर यह स्कीम मेरे दिमाग में आ गई।

_ 'बस, मुझे बाजार में से नकली दाढ़ी-मूंछ लानी पडी । बाकी चीजें बूढ़े के कमरे में मिल गई और हम दोनों किस तरह सबके सामने निकल आए-किसी को संदेह भी नहीं हुआ ।'

'और वह बूढ़ा और उसकी पत्नी ?'

'पत्नी बेहोश हो गई थी । बूढ़े को मैंने बांध दिया था । किसी वेटर ने आकर उसे बाद में खोला होगा।'

'और, जब हंगामा होगा?'

'तब तक हम होटल से बहुत दूर होंगे।' उसने कपड़े निकालकर कहा-'लो तुम अपने कपड़े पहन लो । फिर ये कपड़े अटैची के साथ यही कहीं छुपा देंगे।'

डॉली कपड़े लेकर एक पेड़ की आड़ में चली गई । राज भी कपड़े बदलने लगा।

बीच में डॉली ने उससे पूछा 'लेकिन तुमने टैक्सी क्यों छोड़ दी ?'

'इसलिए कि मैं नहीं चाहता था कि टैक्सी ड्राइवर को हमारे ठिकाने का पता लगे।'

'और हमें इस प्रकार गायब पाकर सी. आई. डी. इंस्पेक्टर मेहरा और पुलिस-इंस्पेक्टर को क्या हमारे ऊपर संदेह नहीं हो

जाएगा?'

'मैंने मेहरा के नाम एक परचा कांउटर पर छोड़ दिया है कि मेरी मिसेज के कुछ दुश्मन रिश्तेदार, जो मिसेज की संपत्ति हड़पना चाहते हैं, उन्हें मारने पर तुले है । इसलिए हम दोनों को छुपकर होटल छोड़ना पड़ रहा है।'

'ओहो...!'

'मैंने यह भी लिख दिया है कि शायद हम वापस दिल्ली ही चले जाएं ।'

'लेकिन वह गाड़ी...?'

'वह मैंने पहले ही पार्किंग से हटा दी थी । वह एक गैराज में मरम्मत के लिए पड़ी है क्योंकि मैंने उसका रेडिएटर तोड़ दिया था ।

'गैराजवाले ने कहा था कि मरम्मत में तीन-चार दिन लग जाएंगे।'

दोनों जब अपने-अपने कपड़े पहने पहनकर एक-दूसरे के सामने आ गए तो राज ने उसे ध्यान से देखा और उसका चेहरा दोनों हाथों में लेकर भावुक स्वर में बोला-'विश्वास नहीं होता ।'

डॉली ने उसे ध्यान से देखकर पूछा 'किस बात पर?'

राज ठंडी सांस लेकर बोला

'अपने भाग्य पर...!'

'राज बाबू ।'

'शायद पिछले जन्म में कोई बहुत बड़ा पुष्य किया होगा, जिसके बदले में इस जन्म में ईश्वर ने मुझे अप्सरा दे दी तुम जैसी ।'

डॉली राज की छाती से लग गई । उसका जी चाहा कि वह फूट-फूटकर रोने लगे । उसकी कल्पना में यशोदा की छवि घूम रही थी और वह सोच रही थी

'पता नहीं यह तुम्हारी कौन-सी चाल है, राज?'

'क्यों तुमने अपने ही आदमी से मुझे अपने गैंग में शामिल होने के लिए नहीं कहलवाया?'

'फिर क्यों मुझें उसकी नजरों से छुपाकर भाग निकले?'

'मैं तुम्हें सचमुच प्यार करने लगी हूं, राज

'काश, तुम्हारा प्यार भी सच्चाई में बदल जाए

'तुम्हारी आंखों पर से दौलत के प्रलोभन का परदा हट जाए...'

'तुम एक देवता से कम नहीं हो ।' 'मगर मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूंगी।' 'मैं तुम्हें सद्मार्ग पर लाकर रहूंगी, राज ।'

'चाहे उसके लिए मुझे तुम्हारे पूरे गैगा से ही क्यों न टकराना पड़े।'

राज ने उसे छाती से हटाया और बोला

'चलो, देर हो रही है । हमें पैदल ही बंगले पहुंचना है।'

अटैची कपड़ों समेत उसने एक घने पेड़ के पत्तों में छुपा दी। फिर वे दोनों सड़क की तरफ चल पड़े।

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बंगले का फाटक बद था।

लेकिन उसमें बाहर से ताला नही पड़ा था। इसका, मतलब था कि अंदर कोई न कोई मौजूद है।

वे दोनों वहां रुके तो डॉली का दिल जोर-जोर से धड़क उठा । उसकी कल्पना में बंगले के बूढ़े मालिक और उसके चौकीदार की आत्माएं घूम गई।

राज ने फाटक पर जोर-जोर से दस्तक दी । लेकिन अंदर मे कोई जवाब नहीं मिला।

इस बार राज ने फिर से दस्तके देकर जोर से पुकारा

'अरे कोई है?'

फिर भी अंदर से कोई जवाब नहीं मिला तो उसने डॉली की तरफ देखकर पुकारा

'मालूम होता है, यहां तो कोई भी नहीं।'

डॉली ने भयभीत स्वर में कहा

'कहीं वह माली भी तो आत्मा नहीं था?'

'अगर वह आत्मा था तो पुलिस-इंस्पेकटर को भी आत्मा ही होना चाहिए।'

तभी फाटक की निचली खिड़की खुली और माली ने झांककर देखा।

अजनबी सरीखे स्वर में उसने पूछा

'फरमाइए?'

राज ने जवाब दिया

'अरे, तुमने हमें पहचाना नहीं?'

माली ने गंभीरता से कहा 'मेरी याददाश्त इतनी कमजोर नहीं है।'

'तो फिर हमें आने दो ।'

'किसलिए...?'

'अरे, हम तुम्हारे मालिक की आत्मा को मुक्ति दिलाने आए है।'

'यानि यहां रहकर हनीमून मनाएंगे?'

'हां...!'

'तब तक जब तक आपकी पत्नी गर्भवती न हो जाए?'

'हां भई, हां ।'

'तो फिर जाइए, पहले शादी करके आइए ।'

राज और डॉली ने चौंककर एक-दूसरे को देखा । फिर राज ने माली की तरफ देखते हुए हैरत प्रकट करके पूछा

'क्या मतलब?'

माली ने जवाब दिया

'आप जीवित लोगों को मूर्ख बना सकते हैं, आत्माओं को नहीं।'

'हमने क्या मूर्ख बनाया है ?'

__'क्या आपने झूठ नही बोला था कि आप दोनों विवाहित हैं?'

'ओह भाई, वह हमारी मजबूरी थी।'

'कैसी मजबूरी ?'

'दरअसल हम अपने-अपने घरवालों की इच्छा के बिना प्रेम-विवाह करके निकले थे। रास्ते में तुम्हारे मालिक की आत्मा को हमने जिन्दा समझकर उनसे झूठ बोल दिया कि हम विवाहित है।'

'और शादी अब तक नहीं की?'

'अब हम दोनों एक-दूसरे को जीवन-साथी मान चुके है।'

'मान चुके है या बन चुके हैं?'

'आजकल में बन भी जाएंगे।'

'अब तक क्यों नहीं बने?'

'मेंने अखबार में अपने डैडी का विज्ञापन देखा था । वह और डॉली के घरवाले हम लोगों के लिए परेशान हैं और हमारी शादी के लिए तैयार है।'

'तो फिर आप लोग शादी करने अपने घर क्यों नहीं चले गए ?'

'असल में मुझे अपने डैडी की बात पर पूरा विश्वास नहीं ।'

'तो फिर...?'

'इसलिए मैंने अपनी प्रेमिका की मम्मी को ट्रंककॉल किया है।'

'काहे के लिए?'

'वह यहां आकर हमारी शादी करा दें। फिर हम लोग उनसे यहां रहने की आज्ञा ले लेंगे। फिर हम यहां से तभी जाएंगे जब तुम्हारे मालिक की आत्मा को श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।'

'पक्की बात है?'

'बिल्कुल पक्की बात ।'

'तो फिर चले जाइए।'

माली खिड़की के पास से हट गया ।

राज ने ठंडी सांस ली । फिर पहले डॉली ने झुककर भीतर प्रवेश किया, फिर राज ने प्रवेश किया और माली ने खिड़की बंद करके उसमें ताला डाल दिया।

राज ने पूछा 'यह ताला क्यों डाला है?'

माली गंभीरता से बोला 'ग्सलिए कि आप लोग डॉज देकर न चले जाए।'

'अब हम नहीं जाएंगी? ।'

'तो फिर आराम से बैठिए । आपको ताले की क्यों चिन्ता है ?'

'तुम्हें अपने मालिक से बहुत प्यार था ?'

'किस उल्लू के पट्टे को ऐसे मालिक से प्यार होगा, जिसने अपनी बेटी और दामाद को सुहागरात भी नहीं मनाने दी और मार डाला ।'

फिर तुम्हें उनकी आत्मा की मुक्ति की इतना चिन्ता क्यों है?'
 
'इसलिए कि जब तक उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल जाती, मैं कुंवारा रहूंगा।'

'क्यों?'

'इस क्यों का जवाब मेरे बापू से पूछिएगा-अगले साल छोटी मालकिन और उनके पति की पुण्य तिथि के अवसर पर!

'तो यह आदेश तुमहारे बापू का है ?'

'यह उनके खून में दौड़ते हुए उस नमक का आदेश है, जो उन्होंने मालिक का खाया था । पता नहीं क्यों, पहले के नौकर इतने स्वामिभक्त होते थे?'

'तुम अपने मालिक के भक्त नहीं हो ?'

'अजी, क्या फायदा ऐसी स्वामिभक्ति कि कुल का नाम चलाने वाला ही पैदा न हो सके यानी स्वामी के साथ मेरे परिवार का नाम भी मर जाएगा। अगर आप जैसा कोई मूर्ख यहां पर नहीं फंसा।'

'तुम हमें मूर्ख समझते हो ?'

'बुद्धिमान आदमी इतनी सुन्दर प्रेमिका को लेकर दर-दर नहीं भटकते फिरते । मेरी प्रेमिका इतनी सुन्दरं होती तो नरक में जाते मालिक और भाड़ में जाता बापू का आदेश ।'

माली ने ताला खोला और बोला 'जाइए, अपना बैडरूम संभालिए ।'

राज ने टोका

'ठहरो..!

_ 'घबराइए मत । ऊपर सुब-कुछ मौजूद है। खाना पकाने का सामान तक ।'

'मैं यह कह रहा था कि अब हमें छुपकर ही रखना । कोई भी हमारे बारे में पूछे, कह देना कि हम

यहां वापस ही नहीं आए।'

'यानी मेम साहब की मां को भी लौटा दूं?'

'नहीं, बाबा । उन्हें मत रोकना ।'

'अच्छी बात है।'

फिर वह चला गया।

राज ने डॉली को साथ लेकर बैडरूम में प्रवेश किया । दरवाजा अंदर से बंद करके उसने ठंडी सांस ली और डॉली से बोला

, यह अच्छा हुआ । अब हम यहां सुरक्षित रहेंगे।'

'मगर कब तक?'

'यह तो समय ही बताएगा।'

फिर उसने डॉली की कमर में हाथ डालकर उसे अपनी छाती से लगाते हुए कहा

'क्यों न हम बूढ़े की आत्मा को मुक्ति दिला दें

डॉली ने झट से उससे अलग होकर कहा

'यह क्या कह रहे हो तुम?'

राज मुस्कराकर बोला

'पगली! मैं कह रहा हूं । क्यों न हम शादी कर लें?'

डॉली के दिमाग पर एक घूँसा-सा लगा। उसके चेहरे पर भूचाल-सा नजर आया तो उसे ध्यान से देखकर राज ने कहा

'क्यों ? क्या तुम्हें यह शादी-पसंद नहीं?'

'यह...यह बात नही ।'

'तुम मुझसे प्यार नहीं करती हो?'

'अपने जीवन से ज्यादा ।'

'और मैं भी तुमसे इतना ही प्यार करता हूं।'

'मैं जानती हूं।'

'तो फिर बीच में काहे की दीवार?'

डॉली ने उसे ध्यान से देखा और बोली 'तुमने अपने किसी अंकल की चर्चा की थी

'हां, लेकिन यह मत समझो कि वह मेरी पसंद को नापसंद कर देंगे।'

'अगर उन्हें मालूम हुआ कि मैं अनाथ हूं। मेरे कुल का पता नहीं है, न मां-बाप का और न ही दीन-धर्म का ।'

'मेरी तरह मेरे अंकल भी प्रेम को ही सबसे बड़ा धर्म मानते हैं।'

'यानि वह मुझे बहू स्वीकार कर लेंगे।'

'बिल्कुल...!'

'लेकिन मेरी अपनी भी तो कोई जिम्मेदारी है

'तुम्हारी यशोदा आंटी?'

'हां, न मैं उनकी आज्ञा के बिना शादी कर सकती हूं, न ही अपनी उन सहेलियों की अनुपस्थिति में, जिनके साथ मैंने होश संभाला है, इतनी बड़ी हुई

'तो फिर क्यों न तुम अपनी की आंटी को यही बुला लो । मैं माली से तो कह चुका हूं कि तुम्हारी मां हमारी शादी कराने आ रही है।'

'प्लीज, राज! इतनी जल्दी मत करो ।'

'आखिर क्यों?'

'क्या तुम्हें मालुम नहीं कि पुलिस कितनी जोरों से मेरी तलाश कर रही है।'

.

.

___ 'पुलिस तो मेरी भी तलाश में होगी । यह तो सारी उम्र का चक्कर है । इसके लिए क्या हम सारी उम्र की खुशियां बरबाद कर देंगे?'

'और जब हमारी संतान होगी, तब?'

'हूं...पहले तो हम पांच वर्षों तक फेमिली प्लानिंग करेंगे।'

'और संभव है, हम उससे पहले ही जेल में हों

'कम से कम मेरे होते हुए तो तुम हवालात में भी नहीं जा सकतीं।'

'इतना ही प्यार करते हो मुझसे?'

'अब भी क्या किसी सबूत की जरूरत है?'

डॉली ने उसका हाथ पकड़ा और विनीत स्वर में कहने लगी

__ 'तो फिर चलो, हम आज ही खुद को पुलिस को सौंप दें।'

'डॉली...?'

'एक बार हमने अपने-अपने अपराध का दंड भोग लिया तो फिर हम समाज के अच्छे नागरिक बनकर जीवन गुजार सकेंगे।'

राज ने उसे से ध्यान से देखकर कहा

'फिर तुम्हारे दल वाले क्या तुम्हें चैन से जीने देंगे?'

'राज...!'

'आज हम लोग जब होटल से निकले हैं तो मैं डिम गाइड में था । तुम मुझे अपने ही दल का कोई आदमी समझकर मेरे साथ चलने को तैयार हो गई थी ना?'
 
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