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मैंने फिर ठकुराइन की आँखों में देखा कि वहाँ कोई पुराना शिकवा या व्यंग्य का भाव तो नहीं है। यह भी सोचा कि क्या आनेवाले दस साल में उसे साधु महाराज की घटना भी भूल जाएगी और वह उसे भी मेरी तरह चाय पीने को कह सकेगी? या कि वह अपने साथ हुई घटना को क्षमा कर सकती थी मगर अपनी लड़की के साथ हुई घटना को नहीं...?
“ठाकुर साहब के उठ जाने का मुझे सचमुच ही बहुत अफ़सोस है।” मैंने अपनी शर्मिन्दगी को छिपाने की चेष्टा करते हुए कहा। “मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि इतनी जल्दी ऐसी घटना हो जाएगी। उनकी अभी उम्र ही क्या थी! वे रहते, तो तुम्हें इस तरह की चिन्ता क्यों करनी पड़ती?” मगर यह कहते हुए भी मैं देख यही रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि ठकुराइन को दस साल पहले की घटना भी याद है और वह केवल शिष्टाचार रखने के लिए ही उस भाव को दबाये हुए है।
“वो रहते, तो कोई लड़की की तरफ़ आँख उठाकर भी देख सकता था?” वह बोली, “वो उसकी आँख न निकालकर रख देते?”
मेरी शर्मिन्दगी बढ़ती जा रही थी और मैं सोच रहा था कि कहीं ठकुराइन यह सब बात मुझी को सुनाने के लिए तो नहीं कह रही? कहीं आज भी उसे मुझसे डर तो नहीं लग रहा और वह इन बातों से मेरे मन में एक डर ही तो नहीं बिठाना चाहती? ठकुराइन ने शायद मेरे मन के असमंजस को भाँप लिया, क्योंकि उसने कहा, “उन दिनों तुम लोग पास में रहते थे, तो मुझे भी कोई खटका नहीं था। देवर-भौजाई में सौ-सौ बातें कह-सुन ली जाती हैं, मगर बखत पडऩे पर तुम लोग किसी को भाभी या भाभी की लड़की की तरफ़ आँख उठाकर देखने देते? मगर अब तो भैया दुनिया ऐसी खाली हुई है कि अपना कहने को कोई नज़र ही नहीं आता। मैं रात-दिन भगवान से यही मनाती हूँ कि तू किसी तरह इस लड़की का बेड़ा पार लगा दे, फिर चाहे तू मुझे मौत ले आना। जब तक इस इमारत का कोई रखवाला नहीं मिल जाता, तब तक मैं मरना नहीं चाहती। अगले लोक में जाकर ठाकुर साहब से क्या कहूँगी कि लड़की को ऐसे ही हवा-पानी के भरोसे छोड़ आयी हूँ? उस कलमुँही खुरशीद की बात सोचकर जान और मुँह को आती है।”
खुरशीद की बात ठकुराइन ने तब भी बीच में ही छोड़ दी थी और मेरे मन में उस बात को सुनने की उत्सुकता बनी हुई थी। “उस लड़की की तुम क्या बात कह रही थीं?” मैंने कहा, “कोई ऐसी-वैसी बात हो गयी थी क्या?”
“उसकी बात तुम क्या पूछते हो, भैया!” ठकुराइन की आँखें ऐसी हो गयीं जैसे वह अपने सामने एक भयानक दृश्य देख रही हो, “वह कोई बात जैसी बात थी?” उस दृश्य की याद उसके चेहरे पर एक छाया-सी ले आयी थी। उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गयी और वह ज़रा पास को सरक आयी, “पहले दो-तीन महीने तो किसी को पता नहीं चला। मगर हमें कुछ शक ज़रूर हो गया कि क्या बात है जो अब पहले की तरह दबंग होकर किराया नहीं माँगती, बहुत धीरे-से आकर कहती है। एक बार किराया लेने आयी तो गोपाल की माँ को लग गया कि क्या बात है। तुम जानो हम लोग तो चिडिय़ा की भी चाल पहचानती हैं। बात मरदों के कान में पहुँची, तो उन्होंने जाकर मियाँ को पकड़ा। इस पर यहाँ वह बखेड़ा हुआ, वह बखेड़ा हुआ कि तुम्हें क्या बताऊँ! मरदों ने मियाँ से कह दिया कि या तो लड़की को इसका वह जो है, उसके पास भेज दो या घर खाली करके चले जाओ। मगर तुम जानो यह मियाँ मरदूद ऐसे जानेवाला है? जो पाकिस्तान से जायदाद के लिए यहाँ आ गया, वह लोगों के कहने से घर छोड़ देगा? कहने लगा कि मेरी लड़की को कुछ नहीं है; और अगर हो भी तो आप लोगों को दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है। मैं न तो अपनी लड़की को छोड़ सकता हूँ और न ही अपना घर छोड़कर जा सकता हूँ। निकलेगी, तो इस घर से मेरी लाश ही निकलेगी। उस दिन मरदों ने इसके साथ वह बुरी की कि क्या बताऊँ! आगे-पीछे की सब कसर निकाल ली। बन्तासिंह ने तो इसकी दाढ़ी तक नोच ली, मगर वह अपने हठ पर अड़ा रहा कि चाहे जो हो जाए, मैं न लड़की को भेजूँगा, और न घर ही छोड़कर कहीं जाऊँगा।”
“अच्छा!” उस स्थिति की कल्पना से मेरे रोंगटे खड़े हो गये।
“एक दिन तो इसी चीं-चीं में-में में निकल गया। मरदों ने उससे कह दिया कि सुबह तक तुमने कुछ न किया, तो हमें तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती करनी पड़ेगी। हम अपनी बेटियों और बहुओं के बीच ऐसी लड़की को नहीं रहने दे सकते। हम लोग बहुत डर रही थीं कि कहीं इससे खार खाकर साथ की गली के मुसलमान दंगा ही न शुरू कर दें। रात को हम लोगों को ठीक से नींद भी नहीं आयी। मैंने अपने सब दरवाज़े अन्दर से बन्द रखे। मगर सवेरे उठते ही पता चला कि वह लड़की रातों-रात जाने कहाँ चली गयी है। बाप को भी बताकर नहीं गयी। वह दिन-भर माथा पीट-पीटकर रोता रहा। कोई कहता था कि जमुना में कूद मरी है। कोई कहता था कि अपने उसी के साथ भागकर पाकिस्तान चली गयी है। कोई कुछ कहता था, कोई कुछ। मगर चली गयी, इसी से हमने शुक्र किया कि बला टली। नहीं जाने यहाँ क्या-क्या हो जाता और किस-किसकी जान जाती!”
“उसके जाने के बाद मियाँ ने उसके बारे में पूछताछ नहीं की?”
“वह कई दिन अपनी कोठरी से बाहर ही नहीं निकला। वहीं पड़ा रहा और रोता रहा। हमको तरस भी बहुत आता था कि राँड को जाना ही था तो बाप को भी साथ ले जाती। इस बुढ़ापे में उसकी रोटी बनानेवाला भी कौन है जिसके भरोसे उसे छोड़ गयी? उसके बाद तो मियाँ को ऐसा लकवा मार गया कि न उठे-बैठे, न खाये-पिये और न कभी सितार बजाये। अब थोड़े दिनों से फिर रात को अपनी टुन-टुन करने लगा है। रोटी कसाइयों के ढाबे में जाकर खाता है। कई बार तो सारी-सारी रात सितार बजाने में लगा रहता है जैसे अपने साथ दूसरों की नींद से भी दुश्मनी हो। मगर अब कोई उससे कुछ कहता नहीं है। वह भी इस घर में किसी से बात नहीं करता। सिर्फ़ महीने में एक बार किराये की कॉपी लेकर सबके दरवाज़े पर आ खड़ा होता है। किराया तो मैं कहती हूँ कि जिस दिन वह मरेगा, उस दिन भी लोगों से इकट्ठा करके साथ अपनी क़ब्र में ले जाएगा। मुआ और सब कुछ छोड़ देगा, मगर किराये की उगाही नहीं छोड़ेगा।...अच्छा भैया, एक बात बताओ, जब यह मर जाएगा, तो इस मकान के किराये की वसूली का क्या होगा? यहाँ की मलकियत हम लोगों की हो जाएगी, या सरकार फिर भी हमसे किराया लिया करेगी? मेरे सिर पर तो पहले ही छ: महीने का किराया चढ़ा हुआ है। ठाकुर साहब के बाद से हम दो बख़त रोटी मुश्किल से खाती हैं, किराया कहाँ से दें? मुये ने अपनी आयी मेरे घर भेज दी, मेरे लिए तो वह भूत के समान है। जिस दिन मरेगा, उस दिन मैं पाँच पैसे का परसाद चढ़ाऊँगी।”
कोठरी में दोपहर भी शाम की तरह उदास और भारी लग रही थी। वहाँ की हर चीज़ वीरान और उजड़ी हुई-सी हो रही थी। उस कोठरी में पहले ऐसा क्या था जो अब नहीं रहा था? न जाने क्यों मुझे वह पहले से कहीं ज़्यादा ख़ाली और अकेली महसूस हो रही थी।
निम्मा दूध का गिलास लिये हुए आ गयी। धूप से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। उसकी कमीज़ के आधे बटन खुले थे। इतनी बड़ी होकर भी उसे शरीर का होश रखना नहीं आया था। ठकुराइन ने गिलास उसके हाथ से लेकर उसे अपने पास बिठा लिया।
“मरी, तू इन्हें पहचानती नहीं?”
निम्मा मुँह खोलकर मुसकरायी और उसने सिर हिला दिया।
“हाँ, पहचानोगी कैसे नहीं?” ठकुराइन बोली, “तुम्हीं भैया हमें भूल जाओ तो भूल जाओ। हम लोग थोड़े ही तुम्हें भूल सकती हैं? यहाँ से जाकर न तो तुमने चिट्ठी लिखी, न ही अरविन्द भैया ने लिखी। तुम लोग तो भैया विलायतवालों से जान-पहचान रखोगे, हम लोगों की याद भी तुम्हें कैसे आ सकती है?”
निम्मा खोजती हुई-सी आँखों से मेरे चेहरे की तरफ़ देख रही थी। वह शायद समझना चाहती थी कि विलायतवालों से जान-पहचान रखनेवाला व्यक्ति कैसा होता है।
“तू इनके लिए चाय बनाकर लाएगी कि मैं जाऊँ?” ठकुराइन ने उससे कहा, तो वह तुरन्त उठ खड़ी हुई, “मैं बनाकर ला रही हूँ।” उसने कहा और गिलास लिये हुए वहाँ से चली गयी।
“उन दिनों गुडिय़ों-पटोलों से खेलती थी और...अब देखो कितनी होशियार हो गयी है।” ठकुराइन एक उसाँस में बोली, “वैसे अभी सोलह की हुई है मगर लगता है जैसे अठारह-बीस को छू रही हो। भैया, तुम्हारी तो इतनी जान-पहचान है, तुम इसके लिए कोई लड़का नहीं बता सकते? मैं तुम्हारा ज़िन्दगी-भर अहसान मानूँगी। यही सोचकर कि बिना बाप की लड़की है, तुम इसके लिए कुछ खोज-ख़बर करो। कोई सत्तर-अस्सी कमानेवाला लड़का हो जिसे लेन-देन का लोभ न हो, तो मैं इसके हाथ पीले करके निश्चिन्त हो जाऊँ। यह ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है, मेरी जान घटती जाती है। तुम्हारे पास तो सैकड़ों काम करते होंगे। उनमें कोई अच्छा लड़का तुम्हारी नज़र में हो, तो उससे बात करो। मुझे जात-पाँत का भी कोई विचार नहीं। ये विचार अब रहे ही कहाँ हैं? कहना, मेरे अपने रिश्ते में ही एक लड़की है...।”
“मैं पता करूँगा।” मैंने कहा, यह जानते हुए भी कि मैं सिर्फ़ टाल रहा हूँ और आज के बाद दूसरी बार शायद मैं इस तरफ़ आऊँगा भी नहीं। मगर ठकुराइन इतने से ही काफ़ी आश्वस्त हो गयी। झूठ का सहारा भी आखिर सहारा तो होता ही है।
“ज़रूर पता करना भैया!” ठकुराइन थोड़ा और पास को सरक आयी, “लड़का लड़की को देखकर हाँ करना चाहे, तो मैं दिखा भी दूँगी। आजकल की जो रीति है, वही तो हमें करनी पड़ेगी। तुम जानो आजकल लड़के लड़की देखे बगैर शादी नहीं करते। लड़की देखने में तो ठीक ही लगती है। नहीं?”
“मैं पता करूँगा।” मैंने फिर वही बात कह दी।
“हाँ, भैया, तुम इसका काम ज़रूर करा दो। मैं तुम्हारे पाँव पकडऩे को तैयार हूँ।” ठकुराइन सचमुच पाँव पकडऩे लगी, तो मैंने उसे हाथ से पकड़कर रोक दिया।
“न-न भाभी, यह तुम क्या कर रही हो? मैंने कहा है कि मैं ज़रूर पता करूँगा।”
ठकुराइन कुछ देर चुप रहकर मुझे देखती रही। उसकी आँखें भर आयी थीं—जाने स्नेह या आभार से!
“कोई लड़का है तुम्हारी नज़र में?” उसने पूछा।
“नहीं, है तो नहीं, मगर पता तो किया जा सकता है।” मैंने कहा।
वह कुछ देर न जाने क्या सोचती रही। फिर बोली, “तुम अपने लिए कोई मेम ले आये कि नहीं?”
“नहीं, अभी नहीं।” मैंने एक खोखली हँसी के साथ कहा, “कोई मेम मुझे पसन्द ही नहीं करती।”
“हाँ पसन्द नहीं करती!” ठकुराइन अपने हाथ को झटककर बोली, “झूठे कहीं के! मेरी कोई मेम वाकिफ़ नहीं, नहीं मैं तो कल ही तुम्हारा उससे ब्याह करा दूँ।”
“अरविन्द मेरे जाने के बाद कितने दिन यहाँ रहा था?” मैंने चाहा कि यह शादी-ब्याह का विषय किसी तरह बदल जाए।
“तुम्हारे जाने के छ: महीने बाद वे भी यहाँ से चले गये थे।” ठकुराइन बोली, “और तुम्हारी तरह उन्होंने भी जाकर फिर कभी सुध नहीं ली कि हम लोग जीते हैं या मर-खप गये।” और उसके बाद ही वह तुरन्त पहले प्रकरण पर लौट आयी, “अब साल-छ: महीने में तुम इस लड़की का कुछ करा दो, फिर चाहे मैं मर-खप भी जाऊँ। यह सातवीं तक पढ़ी थी, आगे मैं इसे नहीं पढ़ा सकी। अगर इस तरह कोई न मिले, और तुम ठीक समझो, तो मैं इसे फिर स्कूल में दाख़िल करा दूँ और ग्यारहवीं करा दूँ। अब तो सुना है दसवीं की ग्यारहवीं होने लगी है। मुए ग़रीबों का एक साल और ख़राब करते हैं, और क्या?”
मैंने फिर चेष्टा की कि बात उस प्रकरण से हट जाए मगर ठकुराइन लड़की के बारे में मुझे पूरी जानकारी देती रही। लड़की बहुत होशियार है। सब काम बहुत समझदारी से करती है। गली में चलती है, तो आँखें नीचे करके। कभी किसी की तरफ़ देखती भी नहीं। थोड़ी-बहुत कढ़ाई भी कर लेती है, पढ़ती थी तो अपनी क्लास में दूसरी-तीसरी आया करती थी।
“भैया, तुम कभी-कभी आ जाया करो।” इसके अलावा वह मुझसे अनुरोध करती रही, “मुझे हौसला रहेगा कि मेरा भी दुनिया में कोई अपना है। तुम्हें लड़के की तसल्ली हो जाए, तो तुम्हीं मेरी तरफ़ से हाँ कर देना। लड़के को चाहे कभी अपने साथ ही ले आना। वह आप ही देख लेगा कि लड़की में क्या-क्या गुण हैं। वह और कोई चीज़ सिखाने को कहे तो मैं वह इसे सिखा दूँगी। मैं कहती हूँ बस किसी तरह इसका पार लग जाए।”
निम्मा चाय ले आयी। उसका चेहरा पहले से लाल हो रहा था। वह चाय का गिलास मेरे सामने रखकर जल्दी से वापस लौट गयी। ठकुराइन हँसने लगी।
“मरी ब्याह की बात से ही शरमाने लगी।” वह बोली, “उधर से सब सुन रही थी। इसे कान-रस बहुत है। मैं इससे बचकर किसी से एक बात भी नहीं कर सकती।” और फिर उसने प्यार से आवाज़ दी, “निम्मो!” निम्मा नहीं आयी, तो उसने फिर आवाज़ दी, “मरी इधर आ, बात सुन!”
निम्मा दुपट्टे का पल्ला मुँह में लिये हुए बीच की चौखट के पास आकर खड़ी हो गयी। उसके बटन उसी तरह खुले थे। कमीज़ वैसे भी कई जगह से मैली और फटी हुई थी। सलवार ऊँची बँधी होने से उसके खुश्क टखने बाहर नज़र आ रहे थे। उसकी कमीज़ इस तरह हिल रही थी जैसे वह बहुत तेज़ दौड़कर आयी हो और उसकी साँस फूल रही हो। “अम्माँ, किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो दे जाऊँ?” उसने पल्ला मुँह से निकालकर कहा और उसे फिर उसी तरह दबा लिया।
“क्यों लाला, खाने को कुछ मँगवाऊँ?” ठकुराइन ने पूछा।
“नहीं भाभी! मुझे देर हो रही है, अब मैं चलूँगा। बस जल्दी से चाय पी लूँ।”
मैं गिलास उठाकर जल्दी-जल्दी चाय के घूँट भरने लगा। मुझे अपने से कोफ़्त हो रही थी कि दफ़्तर से किस काम के लिए आया हूँ, और यहाँ आकर क्या झख मार रहा हूँ। फ़ोटोग्राफर से अलग होने के बाद मैंने किया ही क्या था? उसका कैमरा कन्धे पर डालकर ले आया था और तसवीर अब तक एक भी नहीं ली थी।
“अम्माँ, इनसे कहो ये अपनी मशीन से हमारी तसवीर खींच दें।” निम्मा बोली, “हम अपनी तसवीर शीशे में जड़ाकर दीवार पर लगाएँगे।”
“मरी, जाने कित्ता ख़र्च होता है तसवीर खींचने पर!” ठकुराइन बोली, “तसवीर ऐसे ही थोड़े खिंच जाती है!”
“इसमें फ़िल्म नहीं है, फ़िल्म होती तो मैं खींच देता,” मैंने कहा। मन एक बार झुँझला उठा कि उसकी एक तसवीर खींच ही देता, तो क्या था! मगर फिर सोचा कि ठीक ही तो है—वह कैमरा मैं प्रोफ़ेशनल काम के लिए लाया हूँ, या इस तरह की तसवीरें खींचने के लिए? अपने फ़ीचर में मैं निम्मा की तसवीर को किस तरह इस्तेमाल कर सकता हूँ? मगर मेरा एक मन यह भी था कि उस घर की सीढिय़ाँ चढ़कर ऊपर की कोठरी में जाऊँ और वहाँ टूटी चारपाई पर पड़े हुए मियाँ इबादत अली की एक तसवीर ले लूँ। उस तसवीर का तो मैं प्रोफ़ेशनल तौर पर इस्तेमाल कर सकता था। उस पर तो बल्कि एक बहुत अच्छा शीर्षक भी दिया जा सकता था। साथ के विवरण में मियाँ इबादत अली के पाकिस्तान जाने और लौटकर आने की बात और उसकी लड़की खुरशीद का किस्सा भी दिया जा सकता था। इससे फ़ीचर काफ़ी रोचक बन सकता था। मगर निम्मा के सामने बोला हुआ झूठ मेरी मजबूरी बन गया था। मैं अब इबादत अली की तसवीर भी कैसे ले सकता था?
मैं उनके यहाँ से चला तो ठकुराइन मुझे गली के मोड़ तक छोडऩे साथ चली आयी। गली में आकर भी वह वही बातें दोहराती रही। लड़की के ब्याह पर वह ज़्यादा नहीं, मगर चार-पाँच सौ तो ख़र्च करेगी ही। ठाकुर साहब होते तो जाने कितना करते! मैं उनके यहाँ फिर कब आऊँगा? मैं न आ सकूँ, तो वही कभी मेरे घर पर आकर मुझसे पूछ ले। मैं एक कार्ड पर अपना पता लिखकर उसे ज़रूर भेज दूँ। कार्ड लिखूँ, तो ठाकुर साहब के नाम से ही लिखूँ...।
ठकुराइन के लौट जाने पर मैं पानवाले से सिगरेट ख़रीदने के लिए रुका, तो उसने सिर से पैर तक मेरा ज़ायज़ा लेते हुए कहा, “क्यों साहब, आप इनके रिश्तेदार हैं?”
“क्यों?” उसकी बदतमी$जी पर मुझे गुस्सा आ गया।
“ऐसे ही पूछ रहे हैं।” वह बोला, “हम तो समझते थे ये माँ-बेटी अकेली ही हैं।”
“मेरी इन लोगों के साथ पुरानी वाक़फियत है।” मैंने कहा, “मैं पहले इसी घर में रहता था।”
“अच्छा, हाँ!” वह आवाज़ को कुछ लटकाकर बोला, “हमने समझा आपकी इनके साथ रिश्तेदारी है!”
“एक तरह से रिश्तेदारी है भी।” मैंने माथे पर त्योरी डालते हुए कहा, “तुम बात करो।”
“बात कुछ भी नहीं।” वह डब्बी देकर पैसे गिनता हुआ बोला, “बेचारी ग़रीब हैं, घरों में जाकर बरतन-अरतन मलती हैं, इसलिए हमने कहा...।”
“क्या कहा...?”
“कुछ नहीं।” वह बोला, “ऐसे ही हम बात के लिए बात कर रहे थे...।”
मैं गली से बाहर आया, तो कोई चीज़ मुझे अन्दर से कोंच रही थी। मुझे लग रहा था कि वहाँ और भी कुछ था जिसकी मुझे तसवीर लेनी थी, मगर मैं नहीं ले सका था। लेकिन वह 'कुछ’ क्या था?
मैं लौटकर दफ़्तर पहुँचा, तो वहाँ हरबंस मेरा इन्तज़ार कर रहा था।
“तुम कब से आये हुए हो?” मैंने पूछा।
“अभी थोड़ी देर हुई आया था।” वह बोला, “मैं तुम्हें अपने साथ एक जगह ले जाने के लिए आया हूँ।”
मैंने उसे बताया कि मैं दिन-भर शहर में गलियों की ख़ाक छानता रहा हूँ, इसलिए बहुत थका हुआ हूँ।
“थके हुए होने से क्या होता है?” वह बोला, “थका हुआ आदमी चाय पीने तो चल ही सकता है।”
“मगर यह भी तो पता चले कि चलना कहाँ है?”
“उसी के घर चलना है...,” वह थोड़ा रुकता हुआ बोला, “पोलिटिकल सेक्रेटरी के। वह बहुत दिनों से घर पर आने के लिए कह रहा था। नीलिमा भी बहुत कह रही थी कि उसने इतनी बार बुलाया है, तो हमें ज़रूर चलना चाहिए। आज उसी ने उससे फ़ोन पर कह दिया था कि हम शाम को आएँगे।”
“तो तुम लोग चले जाओ।” मैंने कहा, “मुझे साथ में घसीटने की क्या ज़रूरत है? एक तो मैं बहुत थका हुआ हूँ और दूसरे उसने तुम्हीं को बुलाया है, इसलिए...।”
“मगर वह तुम्हारे बारे में भी तो पूछता रहता था। मैंने बाद में उससे फ़ोन पर कह दिया था कि तुम भी हमारे साथ आओगे...।”
“मगर मुझे साथ ले जाने की कोई ख़ास वजह है क्या?”
“एक छोटी-सी वजह भी है। वे लोग मुझे एक नौकरी आफ़र कर रहे हैं। हो सकता है वह आज उस बारे में कोई बात करना चाहे। मैं अपने मन में तय नहीं कर सका कि मुझे वह नौकरी ले लेनी चाहिए या नहीं, इसलिए अभी उस बारे में उससे बात नहीं करना चाहता। तुम साथ रहोगे, तो उस विषय में बात नहीं उठेगी।”
“मगर तुम मेरी हालत भी तो देखो कि मैं...।”
“तुम्हें मैंने कह दिया है कि तुम्हें मेरे साथ चलना है, बस! मेरी वजह से थोड़ी तकलीफ़ ही उठा लोगे, तो क्या है?”
मैंने और हील-हुज्जत नहीं की; अपनी डाक देखी, एक मिनट के लिए जाकर अपने सम्पादक से बात की और उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गया।
पोलिटिकल सेक्रेटरी के घर की सीढिय़ाँ इतनी चिकनी थीं कि ऊपर जाते हुए पैर फिसल जाने से मेरे घुटने पर थोड़ी चोट आ गयी।
गैलरी में आकर हरबंस ने घंटी बजायी। एक चपरासी हमें बड़े कमरे में ले गया। पोलिटिकल सेक्रेटरी ने कमरे के दरवाज़े पर आकर हमारा स्वागत किया। “ओ, हरबंस! नीलिमा!” उसने उत्साह के साथ कहा, “और यह हमारा 'न्यू हैरल्ड’ वाला दोस्त है। इसके सम्पादक ने दो-एक बार इसकी बात की है। तुमने भी कई बार ज़िक्र किया है। मैं सिर्फ़ नाम भूल रहा हूँ। क्या नाम बताया था तुमने हरबंस?”
“मधुसूदन,” हरबंस ने कहा।
पोलिटिकल सेक्रेटरी ने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर गरमजोशी के साथ हिलाया। “हाँ-हाँ, मडुसुडान,” उसने कहा, “मैं सुडान का ध्यान रखूँगा, तो मुझे याद रहेगा। इस नाम में भी एक रिदम है। मैं संगीत का बहुत शौक़ीन हूँ। हरबंस ने शायद तुम्हें बताया हो। या शायद न भी बताया हो। वह अपने सिवा किसी की तारीफ़ नहीं करता। सिर्फ़ तुम्हारी करता है। मैं कह नहीं सकता क्यों। नीलिमा कहीं तुमसे ईर्ष्या न करने लगे। आओ,आओ। कुछ कलाकार आये हुए हैं। मैं पहले तुम लोगों का उनसे परिचय करा दूँ। बहुत युवा कलाकार हैं। मगर मैं कहा करता हूँ कि यौवन ही वास्तविक कला को जन्म दे सकता है। कला एक सृष्टि है और यौवन का सृष्टि के साथ गहरा सम्बन्ध है। आओ...!”
पहले उसने अपनी पत्नी से परिचय कराया। वह हाथ मिलाते ही यह कहकर चली गयी कि वह अरुण को बच्चों के पास छोड़ आये, नहीं तो वह बेचारा बड़ों के बीच बहुत अकेला और खोया-खोया महसूस करेगा। “मैं अभी आ रही हूँ।” उसने चलते-चलते नीलिमा से कहा, “मैं तुमसे बात करने के लिए बहुत उत्सुक हूँ।”
कमरे में चार व्यक्ति और थे। एक अधेड़ दम्पती थे, मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी, जो शायद सोशल कॉल के लिए आये थे। दो युवा चित्रकार थे जिन्होंने हाल ही में फ़ाइन आर्ट का डिप्लोमा लिया था। एक का नाम था रणधीर और दूसरे का सुभाष। रणधीर बाल और दाढ़ी दोनों बढ़ाये हुए था। कुरता-पाजामा पहने था। सुभाष नीली कॉर्डराय की पतलून के साथ पीली जैकेट पहने था। उन दोनों ने अतिशय नम्रता के साथ हम सबसे हाथ मिलाया, जैसे हम सब भी पोलिटिकल सेक्रेटरी के रुतबे के ही लोग हों।
“हम लोग इनके बनाये हुए कुछ चित्र देख रहे थे।” पोलिटिकल सेक्रेटरी बोला, “ये लोग बहुत अच्छी रचनाएँ कर रहे हैं। मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी कला के बहुत शौक़ीन हैं। मेरा ख़याल है आप सबको भी इसमें दिलचस्पी होगी। क्यों हरबंस? अरे, मैं यह किससे पूछ रहा हूँ! मिस्टर गुलाटी, मेरा दोस्त हरबंस इतिहास का पंडित है, मगर कला का भी बहुत बड़ा पारखी है। इसकी पत्नी, या लड़की नीलिमा, यह भारतीय नृत्य की...क्या कहूँ क्या है! हरबंस, मुझे बताओ ठीक शब्द क्या है? मगर तुम नहीं बताओगे। तुम उससे ईर्ष्या करते हो, मैं जानता हूँ। हमारा दोस्त...मैं फिर तुम्हारा नाम भूल गया। मैं तुम्हें 'न्यू हैरल्ड’ ही कहूँगा। हाँ तो 'न्यू हैरल्ड’, इसे भारतीय नृत्य की क्या कहना चाहिए...!” वह चुटकी बजाने लगा। “मुझे ठीक शब्द मालूम है, मगर वह मेरे दिमाग़ में आ नहीं रहा। वह है...क्या है...अच्छा हम अपने दोस्त 'न्यू हैरल्ड’ को सोचने देते हैं और तब तक ये चित्र देखते हैं।”
इस बीच उसकी पत्नी अरुण को छोड़कर आ गयी। उसे देखते ही वह बोला, “आओ डियर, आओ। मैं सोच रहा था कि तुम आ जाओ, तभी हम चित्र देखें। इसीलिए इन लोगों को बातों में लगाये हुए था। तुम यहाँ आकर मेरे पास बैठो। तुम जाने हमेशा मुझसे दूर-दूर क्यों रहती हो! तुम जानती हो मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ, फिर भी...।”
“मैं यहाँ अपने पत्रकार मित्र के पास बैठ रही हूँ।” उसकी पत्नी ने कहा, “मैं तुम्हारी वही रोज़-रोज़ की बातें सुनकर और नहीं ऊबना चाहती। अपने इस नये मित्र से तो मैं इन चित्रों के बारे में कुछ समझ भी सकूँगी, तुम तो बस शोर ही मचाते रहोगे और देखने-समझने कुछ नहीं दोगे।”
वह मेरे पास की कुरसी पर आ बैठी। पोलिटिकल सेक्रेटरी घूरकर देखने की मुद्रा बनाकर मुझसे बोला, “देखो मिस्टर 'न्यू हैरल्ड’, मैं तुमसे ही मित्रतापूर्ण व्यवहार की आशा करता हूँ। मुझे उम्मीद है कि तुम अपने पहले समीक्षक की तरह ख़तरनाक आदमी नहीं हो।”
“ठाकुर साहब के उठ जाने का मुझे सचमुच ही बहुत अफ़सोस है।” मैंने अपनी शर्मिन्दगी को छिपाने की चेष्टा करते हुए कहा। “मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि इतनी जल्दी ऐसी घटना हो जाएगी। उनकी अभी उम्र ही क्या थी! वे रहते, तो तुम्हें इस तरह की चिन्ता क्यों करनी पड़ती?” मगर यह कहते हुए भी मैं देख यही रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि ठकुराइन को दस साल पहले की घटना भी याद है और वह केवल शिष्टाचार रखने के लिए ही उस भाव को दबाये हुए है।
“वो रहते, तो कोई लड़की की तरफ़ आँख उठाकर भी देख सकता था?” वह बोली, “वो उसकी आँख न निकालकर रख देते?”
मेरी शर्मिन्दगी बढ़ती जा रही थी और मैं सोच रहा था कि कहीं ठकुराइन यह सब बात मुझी को सुनाने के लिए तो नहीं कह रही? कहीं आज भी उसे मुझसे डर तो नहीं लग रहा और वह इन बातों से मेरे मन में एक डर ही तो नहीं बिठाना चाहती? ठकुराइन ने शायद मेरे मन के असमंजस को भाँप लिया, क्योंकि उसने कहा, “उन दिनों तुम लोग पास में रहते थे, तो मुझे भी कोई खटका नहीं था। देवर-भौजाई में सौ-सौ बातें कह-सुन ली जाती हैं, मगर बखत पडऩे पर तुम लोग किसी को भाभी या भाभी की लड़की की तरफ़ आँख उठाकर देखने देते? मगर अब तो भैया दुनिया ऐसी खाली हुई है कि अपना कहने को कोई नज़र ही नहीं आता। मैं रात-दिन भगवान से यही मनाती हूँ कि तू किसी तरह इस लड़की का बेड़ा पार लगा दे, फिर चाहे तू मुझे मौत ले आना। जब तक इस इमारत का कोई रखवाला नहीं मिल जाता, तब तक मैं मरना नहीं चाहती। अगले लोक में जाकर ठाकुर साहब से क्या कहूँगी कि लड़की को ऐसे ही हवा-पानी के भरोसे छोड़ आयी हूँ? उस कलमुँही खुरशीद की बात सोचकर जान और मुँह को आती है।”
खुरशीद की बात ठकुराइन ने तब भी बीच में ही छोड़ दी थी और मेरे मन में उस बात को सुनने की उत्सुकता बनी हुई थी। “उस लड़की की तुम क्या बात कह रही थीं?” मैंने कहा, “कोई ऐसी-वैसी बात हो गयी थी क्या?”
“उसकी बात तुम क्या पूछते हो, भैया!” ठकुराइन की आँखें ऐसी हो गयीं जैसे वह अपने सामने एक भयानक दृश्य देख रही हो, “वह कोई बात जैसी बात थी?” उस दृश्य की याद उसके चेहरे पर एक छाया-सी ले आयी थी। उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गयी और वह ज़रा पास को सरक आयी, “पहले दो-तीन महीने तो किसी को पता नहीं चला। मगर हमें कुछ शक ज़रूर हो गया कि क्या बात है जो अब पहले की तरह दबंग होकर किराया नहीं माँगती, बहुत धीरे-से आकर कहती है। एक बार किराया लेने आयी तो गोपाल की माँ को लग गया कि क्या बात है। तुम जानो हम लोग तो चिडिय़ा की भी चाल पहचानती हैं। बात मरदों के कान में पहुँची, तो उन्होंने जाकर मियाँ को पकड़ा। इस पर यहाँ वह बखेड़ा हुआ, वह बखेड़ा हुआ कि तुम्हें क्या बताऊँ! मरदों ने मियाँ से कह दिया कि या तो लड़की को इसका वह जो है, उसके पास भेज दो या घर खाली करके चले जाओ। मगर तुम जानो यह मियाँ मरदूद ऐसे जानेवाला है? जो पाकिस्तान से जायदाद के लिए यहाँ आ गया, वह लोगों के कहने से घर छोड़ देगा? कहने लगा कि मेरी लड़की को कुछ नहीं है; और अगर हो भी तो आप लोगों को दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है। मैं न तो अपनी लड़की को छोड़ सकता हूँ और न ही अपना घर छोड़कर जा सकता हूँ। निकलेगी, तो इस घर से मेरी लाश ही निकलेगी। उस दिन मरदों ने इसके साथ वह बुरी की कि क्या बताऊँ! आगे-पीछे की सब कसर निकाल ली। बन्तासिंह ने तो इसकी दाढ़ी तक नोच ली, मगर वह अपने हठ पर अड़ा रहा कि चाहे जो हो जाए, मैं न लड़की को भेजूँगा, और न घर ही छोड़कर कहीं जाऊँगा।”
“अच्छा!” उस स्थिति की कल्पना से मेरे रोंगटे खड़े हो गये।
“एक दिन तो इसी चीं-चीं में-में में निकल गया। मरदों ने उससे कह दिया कि सुबह तक तुमने कुछ न किया, तो हमें तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती करनी पड़ेगी। हम अपनी बेटियों और बहुओं के बीच ऐसी लड़की को नहीं रहने दे सकते। हम लोग बहुत डर रही थीं कि कहीं इससे खार खाकर साथ की गली के मुसलमान दंगा ही न शुरू कर दें। रात को हम लोगों को ठीक से नींद भी नहीं आयी। मैंने अपने सब दरवाज़े अन्दर से बन्द रखे। मगर सवेरे उठते ही पता चला कि वह लड़की रातों-रात जाने कहाँ चली गयी है। बाप को भी बताकर नहीं गयी। वह दिन-भर माथा पीट-पीटकर रोता रहा। कोई कहता था कि जमुना में कूद मरी है। कोई कहता था कि अपने उसी के साथ भागकर पाकिस्तान चली गयी है। कोई कुछ कहता था, कोई कुछ। मगर चली गयी, इसी से हमने शुक्र किया कि बला टली। नहीं जाने यहाँ क्या-क्या हो जाता और किस-किसकी जान जाती!”
“उसके जाने के बाद मियाँ ने उसके बारे में पूछताछ नहीं की?”
“वह कई दिन अपनी कोठरी से बाहर ही नहीं निकला। वहीं पड़ा रहा और रोता रहा। हमको तरस भी बहुत आता था कि राँड को जाना ही था तो बाप को भी साथ ले जाती। इस बुढ़ापे में उसकी रोटी बनानेवाला भी कौन है जिसके भरोसे उसे छोड़ गयी? उसके बाद तो मियाँ को ऐसा लकवा मार गया कि न उठे-बैठे, न खाये-पिये और न कभी सितार बजाये। अब थोड़े दिनों से फिर रात को अपनी टुन-टुन करने लगा है। रोटी कसाइयों के ढाबे में जाकर खाता है। कई बार तो सारी-सारी रात सितार बजाने में लगा रहता है जैसे अपने साथ दूसरों की नींद से भी दुश्मनी हो। मगर अब कोई उससे कुछ कहता नहीं है। वह भी इस घर में किसी से बात नहीं करता। सिर्फ़ महीने में एक बार किराये की कॉपी लेकर सबके दरवाज़े पर आ खड़ा होता है। किराया तो मैं कहती हूँ कि जिस दिन वह मरेगा, उस दिन भी लोगों से इकट्ठा करके साथ अपनी क़ब्र में ले जाएगा। मुआ और सब कुछ छोड़ देगा, मगर किराये की उगाही नहीं छोड़ेगा।...अच्छा भैया, एक बात बताओ, जब यह मर जाएगा, तो इस मकान के किराये की वसूली का क्या होगा? यहाँ की मलकियत हम लोगों की हो जाएगी, या सरकार फिर भी हमसे किराया लिया करेगी? मेरे सिर पर तो पहले ही छ: महीने का किराया चढ़ा हुआ है। ठाकुर साहब के बाद से हम दो बख़त रोटी मुश्किल से खाती हैं, किराया कहाँ से दें? मुये ने अपनी आयी मेरे घर भेज दी, मेरे लिए तो वह भूत के समान है। जिस दिन मरेगा, उस दिन मैं पाँच पैसे का परसाद चढ़ाऊँगी।”
कोठरी में दोपहर भी शाम की तरह उदास और भारी लग रही थी। वहाँ की हर चीज़ वीरान और उजड़ी हुई-सी हो रही थी। उस कोठरी में पहले ऐसा क्या था जो अब नहीं रहा था? न जाने क्यों मुझे वह पहले से कहीं ज़्यादा ख़ाली और अकेली महसूस हो रही थी।
निम्मा दूध का गिलास लिये हुए आ गयी। धूप से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। उसकी कमीज़ के आधे बटन खुले थे। इतनी बड़ी होकर भी उसे शरीर का होश रखना नहीं आया था। ठकुराइन ने गिलास उसके हाथ से लेकर उसे अपने पास बिठा लिया।
“मरी, तू इन्हें पहचानती नहीं?”
निम्मा मुँह खोलकर मुसकरायी और उसने सिर हिला दिया।
“हाँ, पहचानोगी कैसे नहीं?” ठकुराइन बोली, “तुम्हीं भैया हमें भूल जाओ तो भूल जाओ। हम लोग थोड़े ही तुम्हें भूल सकती हैं? यहाँ से जाकर न तो तुमने चिट्ठी लिखी, न ही अरविन्द भैया ने लिखी। तुम लोग तो भैया विलायतवालों से जान-पहचान रखोगे, हम लोगों की याद भी तुम्हें कैसे आ सकती है?”
निम्मा खोजती हुई-सी आँखों से मेरे चेहरे की तरफ़ देख रही थी। वह शायद समझना चाहती थी कि विलायतवालों से जान-पहचान रखनेवाला व्यक्ति कैसा होता है।
“तू इनके लिए चाय बनाकर लाएगी कि मैं जाऊँ?” ठकुराइन ने उससे कहा, तो वह तुरन्त उठ खड़ी हुई, “मैं बनाकर ला रही हूँ।” उसने कहा और गिलास लिये हुए वहाँ से चली गयी।
“उन दिनों गुडिय़ों-पटोलों से खेलती थी और...अब देखो कितनी होशियार हो गयी है।” ठकुराइन एक उसाँस में बोली, “वैसे अभी सोलह की हुई है मगर लगता है जैसे अठारह-बीस को छू रही हो। भैया, तुम्हारी तो इतनी जान-पहचान है, तुम इसके लिए कोई लड़का नहीं बता सकते? मैं तुम्हारा ज़िन्दगी-भर अहसान मानूँगी। यही सोचकर कि बिना बाप की लड़की है, तुम इसके लिए कुछ खोज-ख़बर करो। कोई सत्तर-अस्सी कमानेवाला लड़का हो जिसे लेन-देन का लोभ न हो, तो मैं इसके हाथ पीले करके निश्चिन्त हो जाऊँ। यह ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है, मेरी जान घटती जाती है। तुम्हारे पास तो सैकड़ों काम करते होंगे। उनमें कोई अच्छा लड़का तुम्हारी नज़र में हो, तो उससे बात करो। मुझे जात-पाँत का भी कोई विचार नहीं। ये विचार अब रहे ही कहाँ हैं? कहना, मेरे अपने रिश्ते में ही एक लड़की है...।”
“मैं पता करूँगा।” मैंने कहा, यह जानते हुए भी कि मैं सिर्फ़ टाल रहा हूँ और आज के बाद दूसरी बार शायद मैं इस तरफ़ आऊँगा भी नहीं। मगर ठकुराइन इतने से ही काफ़ी आश्वस्त हो गयी। झूठ का सहारा भी आखिर सहारा तो होता ही है।
“ज़रूर पता करना भैया!” ठकुराइन थोड़ा और पास को सरक आयी, “लड़का लड़की को देखकर हाँ करना चाहे, तो मैं दिखा भी दूँगी। आजकल की जो रीति है, वही तो हमें करनी पड़ेगी। तुम जानो आजकल लड़के लड़की देखे बगैर शादी नहीं करते। लड़की देखने में तो ठीक ही लगती है। नहीं?”
“मैं पता करूँगा।” मैंने फिर वही बात कह दी।
“हाँ, भैया, तुम इसका काम ज़रूर करा दो। मैं तुम्हारे पाँव पकडऩे को तैयार हूँ।” ठकुराइन सचमुच पाँव पकडऩे लगी, तो मैंने उसे हाथ से पकड़कर रोक दिया।
“न-न भाभी, यह तुम क्या कर रही हो? मैंने कहा है कि मैं ज़रूर पता करूँगा।”
ठकुराइन कुछ देर चुप रहकर मुझे देखती रही। उसकी आँखें भर आयी थीं—जाने स्नेह या आभार से!
“कोई लड़का है तुम्हारी नज़र में?” उसने पूछा।
“नहीं, है तो नहीं, मगर पता तो किया जा सकता है।” मैंने कहा।
वह कुछ देर न जाने क्या सोचती रही। फिर बोली, “तुम अपने लिए कोई मेम ले आये कि नहीं?”
“नहीं, अभी नहीं।” मैंने एक खोखली हँसी के साथ कहा, “कोई मेम मुझे पसन्द ही नहीं करती।”
“हाँ पसन्द नहीं करती!” ठकुराइन अपने हाथ को झटककर बोली, “झूठे कहीं के! मेरी कोई मेम वाकिफ़ नहीं, नहीं मैं तो कल ही तुम्हारा उससे ब्याह करा दूँ।”
“अरविन्द मेरे जाने के बाद कितने दिन यहाँ रहा था?” मैंने चाहा कि यह शादी-ब्याह का विषय किसी तरह बदल जाए।
“तुम्हारे जाने के छ: महीने बाद वे भी यहाँ से चले गये थे।” ठकुराइन बोली, “और तुम्हारी तरह उन्होंने भी जाकर फिर कभी सुध नहीं ली कि हम लोग जीते हैं या मर-खप गये।” और उसके बाद ही वह तुरन्त पहले प्रकरण पर लौट आयी, “अब साल-छ: महीने में तुम इस लड़की का कुछ करा दो, फिर चाहे मैं मर-खप भी जाऊँ। यह सातवीं तक पढ़ी थी, आगे मैं इसे नहीं पढ़ा सकी। अगर इस तरह कोई न मिले, और तुम ठीक समझो, तो मैं इसे फिर स्कूल में दाख़िल करा दूँ और ग्यारहवीं करा दूँ। अब तो सुना है दसवीं की ग्यारहवीं होने लगी है। मुए ग़रीबों का एक साल और ख़राब करते हैं, और क्या?”
मैंने फिर चेष्टा की कि बात उस प्रकरण से हट जाए मगर ठकुराइन लड़की के बारे में मुझे पूरी जानकारी देती रही। लड़की बहुत होशियार है। सब काम बहुत समझदारी से करती है। गली में चलती है, तो आँखें नीचे करके। कभी किसी की तरफ़ देखती भी नहीं। थोड़ी-बहुत कढ़ाई भी कर लेती है, पढ़ती थी तो अपनी क्लास में दूसरी-तीसरी आया करती थी।
“भैया, तुम कभी-कभी आ जाया करो।” इसके अलावा वह मुझसे अनुरोध करती रही, “मुझे हौसला रहेगा कि मेरा भी दुनिया में कोई अपना है। तुम्हें लड़के की तसल्ली हो जाए, तो तुम्हीं मेरी तरफ़ से हाँ कर देना। लड़के को चाहे कभी अपने साथ ही ले आना। वह आप ही देख लेगा कि लड़की में क्या-क्या गुण हैं। वह और कोई चीज़ सिखाने को कहे तो मैं वह इसे सिखा दूँगी। मैं कहती हूँ बस किसी तरह इसका पार लग जाए।”
निम्मा चाय ले आयी। उसका चेहरा पहले से लाल हो रहा था। वह चाय का गिलास मेरे सामने रखकर जल्दी से वापस लौट गयी। ठकुराइन हँसने लगी।
“मरी ब्याह की बात से ही शरमाने लगी।” वह बोली, “उधर से सब सुन रही थी। इसे कान-रस बहुत है। मैं इससे बचकर किसी से एक बात भी नहीं कर सकती।” और फिर उसने प्यार से आवाज़ दी, “निम्मो!” निम्मा नहीं आयी, तो उसने फिर आवाज़ दी, “मरी इधर आ, बात सुन!”
निम्मा दुपट्टे का पल्ला मुँह में लिये हुए बीच की चौखट के पास आकर खड़ी हो गयी। उसके बटन उसी तरह खुले थे। कमीज़ वैसे भी कई जगह से मैली और फटी हुई थी। सलवार ऊँची बँधी होने से उसके खुश्क टखने बाहर नज़र आ रहे थे। उसकी कमीज़ इस तरह हिल रही थी जैसे वह बहुत तेज़ दौड़कर आयी हो और उसकी साँस फूल रही हो। “अम्माँ, किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो दे जाऊँ?” उसने पल्ला मुँह से निकालकर कहा और उसे फिर उसी तरह दबा लिया।
“क्यों लाला, खाने को कुछ मँगवाऊँ?” ठकुराइन ने पूछा।
“नहीं भाभी! मुझे देर हो रही है, अब मैं चलूँगा। बस जल्दी से चाय पी लूँ।”
मैं गिलास उठाकर जल्दी-जल्दी चाय के घूँट भरने लगा। मुझे अपने से कोफ़्त हो रही थी कि दफ़्तर से किस काम के लिए आया हूँ, और यहाँ आकर क्या झख मार रहा हूँ। फ़ोटोग्राफर से अलग होने के बाद मैंने किया ही क्या था? उसका कैमरा कन्धे पर डालकर ले आया था और तसवीर अब तक एक भी नहीं ली थी।
“अम्माँ, इनसे कहो ये अपनी मशीन से हमारी तसवीर खींच दें।” निम्मा बोली, “हम अपनी तसवीर शीशे में जड़ाकर दीवार पर लगाएँगे।”
“मरी, जाने कित्ता ख़र्च होता है तसवीर खींचने पर!” ठकुराइन बोली, “तसवीर ऐसे ही थोड़े खिंच जाती है!”
“इसमें फ़िल्म नहीं है, फ़िल्म होती तो मैं खींच देता,” मैंने कहा। मन एक बार झुँझला उठा कि उसकी एक तसवीर खींच ही देता, तो क्या था! मगर फिर सोचा कि ठीक ही तो है—वह कैमरा मैं प्रोफ़ेशनल काम के लिए लाया हूँ, या इस तरह की तसवीरें खींचने के लिए? अपने फ़ीचर में मैं निम्मा की तसवीर को किस तरह इस्तेमाल कर सकता हूँ? मगर मेरा एक मन यह भी था कि उस घर की सीढिय़ाँ चढ़कर ऊपर की कोठरी में जाऊँ और वहाँ टूटी चारपाई पर पड़े हुए मियाँ इबादत अली की एक तसवीर ले लूँ। उस तसवीर का तो मैं प्रोफ़ेशनल तौर पर इस्तेमाल कर सकता था। उस पर तो बल्कि एक बहुत अच्छा शीर्षक भी दिया जा सकता था। साथ के विवरण में मियाँ इबादत अली के पाकिस्तान जाने और लौटकर आने की बात और उसकी लड़की खुरशीद का किस्सा भी दिया जा सकता था। इससे फ़ीचर काफ़ी रोचक बन सकता था। मगर निम्मा के सामने बोला हुआ झूठ मेरी मजबूरी बन गया था। मैं अब इबादत अली की तसवीर भी कैसे ले सकता था?
मैं उनके यहाँ से चला तो ठकुराइन मुझे गली के मोड़ तक छोडऩे साथ चली आयी। गली में आकर भी वह वही बातें दोहराती रही। लड़की के ब्याह पर वह ज़्यादा नहीं, मगर चार-पाँच सौ तो ख़र्च करेगी ही। ठाकुर साहब होते तो जाने कितना करते! मैं उनके यहाँ फिर कब आऊँगा? मैं न आ सकूँ, तो वही कभी मेरे घर पर आकर मुझसे पूछ ले। मैं एक कार्ड पर अपना पता लिखकर उसे ज़रूर भेज दूँ। कार्ड लिखूँ, तो ठाकुर साहब के नाम से ही लिखूँ...।
ठकुराइन के लौट जाने पर मैं पानवाले से सिगरेट ख़रीदने के लिए रुका, तो उसने सिर से पैर तक मेरा ज़ायज़ा लेते हुए कहा, “क्यों साहब, आप इनके रिश्तेदार हैं?”
“क्यों?” उसकी बदतमी$जी पर मुझे गुस्सा आ गया।
“ऐसे ही पूछ रहे हैं।” वह बोला, “हम तो समझते थे ये माँ-बेटी अकेली ही हैं।”
“मेरी इन लोगों के साथ पुरानी वाक़फियत है।” मैंने कहा, “मैं पहले इसी घर में रहता था।”
“अच्छा, हाँ!” वह आवाज़ को कुछ लटकाकर बोला, “हमने समझा आपकी इनके साथ रिश्तेदारी है!”
“एक तरह से रिश्तेदारी है भी।” मैंने माथे पर त्योरी डालते हुए कहा, “तुम बात करो।”
“बात कुछ भी नहीं।” वह डब्बी देकर पैसे गिनता हुआ बोला, “बेचारी ग़रीब हैं, घरों में जाकर बरतन-अरतन मलती हैं, इसलिए हमने कहा...।”
“क्या कहा...?”
“कुछ नहीं।” वह बोला, “ऐसे ही हम बात के लिए बात कर रहे थे...।”
मैं गली से बाहर आया, तो कोई चीज़ मुझे अन्दर से कोंच रही थी। मुझे लग रहा था कि वहाँ और भी कुछ था जिसकी मुझे तसवीर लेनी थी, मगर मैं नहीं ले सका था। लेकिन वह 'कुछ’ क्या था?
मैं लौटकर दफ़्तर पहुँचा, तो वहाँ हरबंस मेरा इन्तज़ार कर रहा था।
“तुम कब से आये हुए हो?” मैंने पूछा।
“अभी थोड़ी देर हुई आया था।” वह बोला, “मैं तुम्हें अपने साथ एक जगह ले जाने के लिए आया हूँ।”
मैंने उसे बताया कि मैं दिन-भर शहर में गलियों की ख़ाक छानता रहा हूँ, इसलिए बहुत थका हुआ हूँ।
“थके हुए होने से क्या होता है?” वह बोला, “थका हुआ आदमी चाय पीने तो चल ही सकता है।”
“मगर यह भी तो पता चले कि चलना कहाँ है?”
“उसी के घर चलना है...,” वह थोड़ा रुकता हुआ बोला, “पोलिटिकल सेक्रेटरी के। वह बहुत दिनों से घर पर आने के लिए कह रहा था। नीलिमा भी बहुत कह रही थी कि उसने इतनी बार बुलाया है, तो हमें ज़रूर चलना चाहिए। आज उसी ने उससे फ़ोन पर कह दिया था कि हम शाम को आएँगे।”
“तो तुम लोग चले जाओ।” मैंने कहा, “मुझे साथ में घसीटने की क्या ज़रूरत है? एक तो मैं बहुत थका हुआ हूँ और दूसरे उसने तुम्हीं को बुलाया है, इसलिए...।”
“मगर वह तुम्हारे बारे में भी तो पूछता रहता था। मैंने बाद में उससे फ़ोन पर कह दिया था कि तुम भी हमारे साथ आओगे...।”
“मगर मुझे साथ ले जाने की कोई ख़ास वजह है क्या?”
“एक छोटी-सी वजह भी है। वे लोग मुझे एक नौकरी आफ़र कर रहे हैं। हो सकता है वह आज उस बारे में कोई बात करना चाहे। मैं अपने मन में तय नहीं कर सका कि मुझे वह नौकरी ले लेनी चाहिए या नहीं, इसलिए अभी उस बारे में उससे बात नहीं करना चाहता। तुम साथ रहोगे, तो उस विषय में बात नहीं उठेगी।”
“मगर तुम मेरी हालत भी तो देखो कि मैं...।”
“तुम्हें मैंने कह दिया है कि तुम्हें मेरे साथ चलना है, बस! मेरी वजह से थोड़ी तकलीफ़ ही उठा लोगे, तो क्या है?”
मैंने और हील-हुज्जत नहीं की; अपनी डाक देखी, एक मिनट के लिए जाकर अपने सम्पादक से बात की और उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गया।
पोलिटिकल सेक्रेटरी के घर की सीढिय़ाँ इतनी चिकनी थीं कि ऊपर जाते हुए पैर फिसल जाने से मेरे घुटने पर थोड़ी चोट आ गयी।
गैलरी में आकर हरबंस ने घंटी बजायी। एक चपरासी हमें बड़े कमरे में ले गया। पोलिटिकल सेक्रेटरी ने कमरे के दरवाज़े पर आकर हमारा स्वागत किया। “ओ, हरबंस! नीलिमा!” उसने उत्साह के साथ कहा, “और यह हमारा 'न्यू हैरल्ड’ वाला दोस्त है। इसके सम्पादक ने दो-एक बार इसकी बात की है। तुमने भी कई बार ज़िक्र किया है। मैं सिर्फ़ नाम भूल रहा हूँ। क्या नाम बताया था तुमने हरबंस?”
“मधुसूदन,” हरबंस ने कहा।
पोलिटिकल सेक्रेटरी ने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर गरमजोशी के साथ हिलाया। “हाँ-हाँ, मडुसुडान,” उसने कहा, “मैं सुडान का ध्यान रखूँगा, तो मुझे याद रहेगा। इस नाम में भी एक रिदम है। मैं संगीत का बहुत शौक़ीन हूँ। हरबंस ने शायद तुम्हें बताया हो। या शायद न भी बताया हो। वह अपने सिवा किसी की तारीफ़ नहीं करता। सिर्फ़ तुम्हारी करता है। मैं कह नहीं सकता क्यों। नीलिमा कहीं तुमसे ईर्ष्या न करने लगे। आओ,आओ। कुछ कलाकार आये हुए हैं। मैं पहले तुम लोगों का उनसे परिचय करा दूँ। बहुत युवा कलाकार हैं। मगर मैं कहा करता हूँ कि यौवन ही वास्तविक कला को जन्म दे सकता है। कला एक सृष्टि है और यौवन का सृष्टि के साथ गहरा सम्बन्ध है। आओ...!”
पहले उसने अपनी पत्नी से परिचय कराया। वह हाथ मिलाते ही यह कहकर चली गयी कि वह अरुण को बच्चों के पास छोड़ आये, नहीं तो वह बेचारा बड़ों के बीच बहुत अकेला और खोया-खोया महसूस करेगा। “मैं अभी आ रही हूँ।” उसने चलते-चलते नीलिमा से कहा, “मैं तुमसे बात करने के लिए बहुत उत्सुक हूँ।”
कमरे में चार व्यक्ति और थे। एक अधेड़ दम्पती थे, मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी, जो शायद सोशल कॉल के लिए आये थे। दो युवा चित्रकार थे जिन्होंने हाल ही में फ़ाइन आर्ट का डिप्लोमा लिया था। एक का नाम था रणधीर और दूसरे का सुभाष। रणधीर बाल और दाढ़ी दोनों बढ़ाये हुए था। कुरता-पाजामा पहने था। सुभाष नीली कॉर्डराय की पतलून के साथ पीली जैकेट पहने था। उन दोनों ने अतिशय नम्रता के साथ हम सबसे हाथ मिलाया, जैसे हम सब भी पोलिटिकल सेक्रेटरी के रुतबे के ही लोग हों।
“हम लोग इनके बनाये हुए कुछ चित्र देख रहे थे।” पोलिटिकल सेक्रेटरी बोला, “ये लोग बहुत अच्छी रचनाएँ कर रहे हैं। मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी कला के बहुत शौक़ीन हैं। मेरा ख़याल है आप सबको भी इसमें दिलचस्पी होगी। क्यों हरबंस? अरे, मैं यह किससे पूछ रहा हूँ! मिस्टर गुलाटी, मेरा दोस्त हरबंस इतिहास का पंडित है, मगर कला का भी बहुत बड़ा पारखी है। इसकी पत्नी, या लड़की नीलिमा, यह भारतीय नृत्य की...क्या कहूँ क्या है! हरबंस, मुझे बताओ ठीक शब्द क्या है? मगर तुम नहीं बताओगे। तुम उससे ईर्ष्या करते हो, मैं जानता हूँ। हमारा दोस्त...मैं फिर तुम्हारा नाम भूल गया। मैं तुम्हें 'न्यू हैरल्ड’ ही कहूँगा। हाँ तो 'न्यू हैरल्ड’, इसे भारतीय नृत्य की क्या कहना चाहिए...!” वह चुटकी बजाने लगा। “मुझे ठीक शब्द मालूम है, मगर वह मेरे दिमाग़ में आ नहीं रहा। वह है...क्या है...अच्छा हम अपने दोस्त 'न्यू हैरल्ड’ को सोचने देते हैं और तब तक ये चित्र देखते हैं।”
इस बीच उसकी पत्नी अरुण को छोड़कर आ गयी। उसे देखते ही वह बोला, “आओ डियर, आओ। मैं सोच रहा था कि तुम आ जाओ, तभी हम चित्र देखें। इसीलिए इन लोगों को बातों में लगाये हुए था। तुम यहाँ आकर मेरे पास बैठो। तुम जाने हमेशा मुझसे दूर-दूर क्यों रहती हो! तुम जानती हो मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ, फिर भी...।”
“मैं यहाँ अपने पत्रकार मित्र के पास बैठ रही हूँ।” उसकी पत्नी ने कहा, “मैं तुम्हारी वही रोज़-रोज़ की बातें सुनकर और नहीं ऊबना चाहती। अपने इस नये मित्र से तो मैं इन चित्रों के बारे में कुछ समझ भी सकूँगी, तुम तो बस शोर ही मचाते रहोगे और देखने-समझने कुछ नहीं दोगे।”
वह मेरे पास की कुरसी पर आ बैठी। पोलिटिकल सेक्रेटरी घूरकर देखने की मुद्रा बनाकर मुझसे बोला, “देखो मिस्टर 'न्यू हैरल्ड’, मैं तुमसे ही मित्रतापूर्ण व्यवहार की आशा करता हूँ। मुझे उम्मीद है कि तुम अपने पहले समीक्षक की तरह ख़तरनाक आदमी नहीं हो।”