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अंधेरे बंद कमरे / मोहन राकेश संचयन

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मैंने फिर ठकुराइन की आँखों में देखा कि वहाँ कोई पुराना शिकवा या व्यंग्य का भाव तो नहीं है। यह भी सोचा कि क्या आनेवाले दस साल में उसे साधु महाराज की घटना भी भूल जाएगी और वह उसे भी मेरी तरह चाय पीने को कह सकेगी? या कि वह अपने साथ हुई घटना को क्षमा कर सकती थी मगर अपनी लड़की के साथ हुई घटना को नहीं...?

“ठाकुर साहब के उठ जाने का मुझे सचमुच ही बहुत अफ़सोस है।” मैंने अपनी शर्मिन्दगी को छिपाने की चेष्टा करते हुए कहा। “मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि इतनी जल्दी ऐसी घटना हो जाएगी। उनकी अभी उम्र ही क्या थी! वे रहते, तो तुम्हें इस तरह की चिन्ता क्यों करनी पड़ती?” मगर यह कहते हुए भी मैं देख यही रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि ठकुराइन को दस साल पहले की घटना भी याद है और वह केवल शिष्टाचार रखने के लिए ही उस भाव को दबाये हुए है।

“वो रहते, तो कोई लड़की की तरफ़ आँख उठाकर भी देख सकता था?” वह बोली, “वो उसकी आँख न निकालकर रख देते?”

मेरी शर्मिन्दगी बढ़ती जा रही थी और मैं सोच रहा था कि कहीं ठकुराइन यह सब बात मुझी को सुनाने के लिए तो नहीं कह रही? कहीं आज भी उसे मुझसे डर तो नहीं लग रहा और वह इन बातों से मेरे मन में एक डर ही तो नहीं बिठाना चाहती? ठकुराइन ने शायद मेरे मन के असमंजस को भाँप लिया, क्योंकि उसने कहा, “उन दिनों तुम लोग पास में रहते थे, तो मुझे भी कोई खटका नहीं था। देवर-भौजाई में सौ-सौ बातें कह-सुन ली जाती हैं, मगर बखत पडऩे पर तुम लोग किसी को भाभी या भाभी की लड़की की तरफ़ आँख उठाकर देखने देते? मगर अब तो भैया दुनिया ऐसी खाली हुई है कि अपना कहने को कोई नज़र ही नहीं आता। मैं रात-दिन भगवान से यही मनाती हूँ कि तू किसी तरह इस लड़की का बेड़ा पार लगा दे, फिर चाहे तू मुझे मौत ले आना। जब तक इस इमारत का कोई रखवाला नहीं मिल जाता, तब तक मैं मरना नहीं चाहती। अगले लोक में जाकर ठाकुर साहब से क्या कहूँगी कि लड़की को ऐसे ही हवा-पानी के भरोसे छोड़ आयी हूँ? उस कलमुँही खुरशीद की बात सोचकर जान और मुँह को आती है।”

खुरशीद की बात ठकुराइन ने तब भी बीच में ही छोड़ दी थी और मेरे मन में उस बात को सुनने की उत्सुकता बनी हुई थी। “उस लड़की की तुम क्या बात कह रही थीं?” मैंने कहा, “कोई ऐसी-वैसी बात हो गयी थी क्या?”

“उसकी बात तुम क्या पूछते हो, भैया!” ठकुराइन की आँखें ऐसी हो गयीं जैसे वह अपने सामने एक भयानक दृश्य देख रही हो, “वह कोई बात जैसी बात थी?” उस दृश्य की याद उसके चेहरे पर एक छाया-सी ले आयी थी। उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गयी और वह ज़रा पास को सरक आयी, “पहले दो-तीन महीने तो किसी को पता नहीं चला। मगर हमें कुछ शक ज़रूर हो गया कि क्या बात है जो अब पहले की तरह दबंग होकर किराया नहीं माँगती, बहुत धीरे-से आकर कहती है। एक बार किराया लेने आयी तो गोपाल की माँ को लग गया कि क्या बात है। तुम जानो हम लोग तो चिडिय़ा की भी चाल पहचानती हैं। बात मरदों के कान में पहुँची, तो उन्होंने जाकर मियाँ को पकड़ा। इस पर यहाँ वह बखेड़ा हुआ, वह बखेड़ा हुआ कि तुम्हें क्या बताऊँ! मरदों ने मियाँ से कह दिया कि या तो लड़की को इसका वह जो है, उसके पास भेज दो या घर खाली करके चले जाओ। मगर तुम जानो यह मियाँ मरदूद ऐसे जानेवाला है? जो पाकिस्तान से जायदाद के लिए यहाँ आ गया, वह लोगों के कहने से घर छोड़ देगा? कहने लगा कि मेरी लड़की को कुछ नहीं है; और अगर हो भी तो आप लोगों को दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है। मैं न तो अपनी लड़की को छोड़ सकता हूँ और न ही अपना घर छोड़कर जा सकता हूँ। निकलेगी, तो इस घर से मेरी लाश ही निकलेगी। उस दिन मरदों ने इसके साथ वह बुरी की कि क्या बताऊँ! आगे-पीछे की सब कसर निकाल ली। बन्तासिंह ने तो इसकी दाढ़ी तक नोच ली, मगर वह अपने हठ पर अड़ा रहा कि चाहे जो हो जाए, मैं न लड़की को भेजूँगा, और न घर ही छोड़कर कहीं जाऊँगा।”

“अच्छा!” उस स्थिति की कल्पना से मेरे रोंगटे खड़े हो गये।

“एक दिन तो इसी चीं-चीं में-में में निकल गया। मरदों ने उससे कह दिया कि सुबह तक तुमने कुछ न किया, तो हमें तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती करनी पड़ेगी। हम अपनी बेटियों और बहुओं के बीच ऐसी लड़की को नहीं रहने दे सकते। हम लोग बहुत डर रही थीं कि कहीं इससे खार खाकर साथ की गली के मुसलमान दंगा ही न शुरू कर दें। रात को हम लोगों को ठीक से नींद भी नहीं आयी। मैंने अपने सब दरवाज़े अन्दर से बन्द रखे। मगर सवेरे उठते ही पता चला कि वह लड़की रातों-रात जाने कहाँ चली गयी है। बाप को भी बताकर नहीं गयी। वह दिन-भर माथा पीट-पीटकर रोता रहा। कोई कहता था कि जमुना में कूद मरी है। कोई कहता था कि अपने उसी के साथ भागकर पाकिस्तान चली गयी है। कोई कुछ कहता था, कोई कुछ। मगर चली गयी, इसी से हमने शुक्र किया कि बला टली। नहीं जाने यहाँ क्या-क्या हो जाता और किस-किसकी जान जाती!”

“उसके जाने के बाद मियाँ ने उसके बारे में पूछताछ नहीं की?”

“वह कई दिन अपनी कोठरी से बाहर ही नहीं निकला। वहीं पड़ा रहा और रोता रहा। हमको तरस भी बहुत आता था कि राँड को जाना ही था तो बाप को भी साथ ले जाती। इस बुढ़ापे में उसकी रोटी बनानेवाला भी कौन है जिसके भरोसे उसे छोड़ गयी? उसके बाद तो मियाँ को ऐसा लकवा मार गया कि न उठे-बैठे, न खाये-पिये और न कभी सितार बजाये। अब थोड़े दिनों से फिर रात को अपनी टुन-टुन करने लगा है। रोटी कसाइयों के ढाबे में जाकर खाता है। कई बार तो सारी-सारी रात सितार बजाने में लगा रहता है जैसे अपने साथ दूसरों की नींद से भी दुश्मनी हो। मगर अब कोई उससे कुछ कहता नहीं है। वह भी इस घर में किसी से बात नहीं करता। सिर्फ़ महीने में एक बार किराये की कॉपी लेकर सबके दरवाज़े पर आ खड़ा होता है। किराया तो मैं कहती हूँ कि जिस दिन वह मरेगा, उस दिन भी लोगों से इकट्ठा करके साथ अपनी क़ब्र में ले जाएगा। मुआ और सब कुछ छोड़ देगा, मगर किराये की उगाही नहीं छोड़ेगा।...अच्छा भैया, एक बात बताओ, जब यह मर जाएगा, तो इस मकान के किराये की वसूली का क्या होगा? यहाँ की मलकियत हम लोगों की हो जाएगी, या सरकार फिर भी हमसे किराया लिया करेगी? मेरे सिर पर तो पहले ही छ: महीने का किराया चढ़ा हुआ है। ठाकुर साहब के बाद से हम दो बख़त रोटी मुश्किल से खाती हैं, किराया कहाँ से दें? मुये ने अपनी आयी मेरे घर भेज दी, मेरे लिए तो वह भूत के समान है। जिस दिन मरेगा, उस दिन मैं पाँच पैसे का परसाद चढ़ाऊँगी।”

कोठरी में दोपहर भी शाम की तरह उदास और भारी लग रही थी। वहाँ की हर चीज़ वीरान और उजड़ी हुई-सी हो रही थी। उस कोठरी में पहले ऐसा क्या था जो अब नहीं रहा था? न जाने क्यों मुझे वह पहले से कहीं ज़्यादा ख़ाली और अकेली महसूस हो रही थी।

निम्मा दूध का गिलास लिये हुए आ गयी। धूप से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। उसकी कमीज़ के आधे बटन खुले थे। इतनी बड़ी होकर भी उसे शरीर का होश रखना नहीं आया था। ठकुराइन ने गिलास उसके हाथ से लेकर उसे अपने पास बिठा लिया।

“मरी, तू इन्हें पहचानती नहीं?”

निम्मा मुँह खोलकर मुसकरायी और उसने सिर हिला दिया।

“हाँ, पहचानोगी कैसे नहीं?” ठकुराइन बोली, “तुम्हीं भैया हमें भूल जाओ तो भूल जाओ। हम लोग थोड़े ही तुम्हें भूल सकती हैं? यहाँ से जाकर न तो तुमने चिट्ठी लिखी, न ही अरविन्द भैया ने लिखी। तुम लोग तो भैया विलायतवालों से जान-पहचान रखोगे, हम लोगों की याद भी तुम्हें कैसे आ सकती है?”

निम्मा खोजती हुई-सी आँखों से मेरे चेहरे की तरफ़ देख रही थी। वह शायद समझना चाहती थी कि विलायतवालों से जान-पहचान रखनेवाला व्यक्ति कैसा होता है।

“तू इनके लिए चाय बनाकर लाएगी कि मैं जाऊँ?” ठकुराइन ने उससे कहा, तो वह तुरन्त उठ खड़ी हुई, “मैं बनाकर ला रही हूँ।” उसने कहा और गिलास लिये हुए वहाँ से चली गयी।

“उन दिनों गुडिय़ों-पटोलों से खेलती थी और...अब देखो कितनी होशियार हो गयी है।” ठकुराइन एक उसाँस में बोली, “वैसे अभी सोलह की हुई है मगर लगता है जैसे अठारह-बीस को छू रही हो। भैया, तुम्हारी तो इतनी जान-पहचान है, तुम इसके लिए कोई लड़का नहीं बता सकते? मैं तुम्हारा ज़िन्दगी-भर अहसान मानूँगी। यही सोचकर कि बिना बाप की लड़की है, तुम इसके लिए कुछ खोज-ख़बर करो। कोई सत्तर-अस्सी कमानेवाला लड़का हो जिसे लेन-देन का लोभ न हो, तो मैं इसके हाथ पीले करके निश्चिन्त हो जाऊँ। यह ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है, मेरी जान घटती जाती है। तुम्हारे पास तो सैकड़ों काम करते होंगे। उनमें कोई अच्छा लड़का तुम्हारी नज़र में हो, तो उससे बात करो। मुझे जात-पाँत का भी कोई विचार नहीं। ये विचार अब रहे ही कहाँ हैं? कहना, मेरे अपने रिश्ते में ही एक लड़की है...।”

“मैं पता करूँगा।” मैंने कहा, यह जानते हुए भी कि मैं सिर्फ़ टाल रहा हूँ और आज के बाद दूसरी बार शायद मैं इस तरफ़ आऊँगा भी नहीं। मगर ठकुराइन इतने से ही काफ़ी आश्वस्त हो गयी। झूठ का सहारा भी आखिर सहारा तो होता ही है।

“ज़रूर पता करना भैया!” ठकुराइन थोड़ा और पास को सरक आयी, “लड़का लड़की को देखकर हाँ करना चाहे, तो मैं दिखा भी दूँगी। आजकल की जो रीति है, वही तो हमें करनी पड़ेगी। तुम जानो आजकल लड़के लड़की देखे बगैर शादी नहीं करते। लड़की देखने में तो ठीक ही लगती है। नहीं?”

“मैं पता करूँगा।” मैंने फिर वही बात कह दी।

“हाँ, भैया, तुम इसका काम ज़रूर करा दो। मैं तुम्हारे पाँव पकडऩे को तैयार हूँ।” ठकुराइन सचमुच पाँव पकडऩे लगी, तो मैंने उसे हाथ से पकड़कर रोक दिया।

“न-न भाभी, यह तुम क्या कर रही हो? मैंने कहा है कि मैं ज़रूर पता करूँगा।”

ठकुराइन कुछ देर चुप रहकर मुझे देखती रही। उसकी आँखें भर आयी थीं—जाने स्नेह या आभार से!

“कोई लड़का है तुम्हारी नज़र में?” उसने पूछा।

“नहीं, है तो नहीं, मगर पता तो किया जा सकता है।” मैंने कहा।

वह कुछ देर न जाने क्या सोचती रही। फिर बोली, “तुम अपने लिए कोई मेम ले आये कि नहीं?”

“नहीं, अभी नहीं।” मैंने एक खोखली हँसी के साथ कहा, “कोई मेम मुझे पसन्द ही नहीं करती।”

“हाँ पसन्द नहीं करती!” ठकुराइन अपने हाथ को झटककर बोली, “झूठे कहीं के! मेरी कोई मेम वाकिफ़ नहीं, नहीं मैं तो कल ही तुम्हारा उससे ब्याह करा दूँ।”

“अरविन्द मेरे जाने के बाद कितने दिन यहाँ रहा था?” मैंने चाहा कि यह शादी-ब्याह का विषय किसी तरह बदल जाए।

“तुम्हारे जाने के छ: महीने बाद वे भी यहाँ से चले गये थे।” ठकुराइन बोली, “और तुम्हारी तरह उन्होंने भी जाकर फिर कभी सुध नहीं ली कि हम लोग जीते हैं या मर-खप गये।” और उसके बाद ही वह तुरन्त पहले प्रकरण पर लौट आयी, “अब साल-छ: महीने में तुम इस लड़की का कुछ करा दो, फिर चाहे मैं मर-खप भी जाऊँ। यह सातवीं तक पढ़ी थी, आगे मैं इसे नहीं पढ़ा सकी। अगर इस तरह कोई न मिले, और तुम ठीक समझो, तो मैं इसे फिर स्कूल में दाख़िल करा दूँ और ग्यारहवीं करा दूँ। अब तो सुना है दसवीं की ग्यारहवीं होने लगी है। मुए ग़रीबों का एक साल और ख़राब करते हैं, और क्या?”

मैंने फिर चेष्टा की कि बात उस प्रकरण से हट जाए मगर ठकुराइन लड़की के बारे में मुझे पूरी जानकारी देती रही। लड़की बहुत होशियार है। सब काम बहुत समझदारी से करती है। गली में चलती है, तो आँखें नीचे करके। कभी किसी की तरफ़ देखती भी नहीं। थोड़ी-बहुत कढ़ाई भी कर लेती है, पढ़ती थी तो अपनी क्लास में दूसरी-तीसरी आया करती थी।

“भैया, तुम कभी-कभी आ जाया करो।” इसके अलावा वह मुझसे अनुरोध करती रही, “मुझे हौसला रहेगा कि मेरा भी दुनिया में कोई अपना है। तुम्हें लड़के की तसल्ली हो जाए, तो तुम्हीं मेरी तरफ़ से हाँ कर देना। लड़के को चाहे कभी अपने साथ ही ले आना। वह आप ही देख लेगा कि लड़की में क्या-क्या गुण हैं। वह और कोई चीज़ सिखाने को कहे तो मैं वह इसे सिखा दूँगी। मैं कहती हूँ बस किसी तरह इसका पार लग जाए।”

निम्मा चाय ले आयी। उसका चेहरा पहले से लाल हो रहा था। वह चाय का गिलास मेरे सामने रखकर जल्दी से वापस लौट गयी। ठकुराइन हँसने लगी।

“मरी ब्याह की बात से ही शरमाने लगी।” वह बोली, “उधर से सब सुन रही थी। इसे कान-रस बहुत है। मैं इससे बचकर किसी से एक बात भी नहीं कर सकती।” और फिर उसने प्यार से आवाज़ दी, “निम्मो!” निम्मा नहीं आयी, तो उसने फिर आवाज़ दी, “मरी इधर आ, बात सुन!”

निम्मा दुपट्टे का पल्ला मुँह में लिये हुए बीच की चौखट के पास आकर खड़ी हो गयी। उसके बटन उसी तरह खुले थे। कमीज़ वैसे भी कई जगह से मैली और फटी हुई थी। सलवार ऊँची बँधी होने से उसके खुश्क टखने बाहर नज़र आ रहे थे। उसकी कमीज़ इस तरह हिल रही थी जैसे वह बहुत तेज़ दौड़कर आयी हो और उसकी साँस फूल रही हो। “अम्माँ, किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो दे जाऊँ?” उसने पल्ला मुँह से निकालकर कहा और उसे फिर उसी तरह दबा लिया।

“क्यों लाला, खाने को कुछ मँगवाऊँ?” ठकुराइन ने पूछा।

“नहीं भाभी! मुझे देर हो रही है, अब मैं चलूँगा। बस जल्दी से चाय पी लूँ।”

मैं गिलास उठाकर जल्दी-जल्दी चाय के घूँट भरने लगा। मुझे अपने से कोफ़्त हो रही थी कि दफ़्तर से किस काम के लिए आया हूँ, और यहाँ आकर क्या झख मार रहा हूँ। फ़ोटोग्राफर से अलग होने के बाद मैंने किया ही क्या था? उसका कैमरा कन्धे पर डालकर ले आया था और तसवीर अब तक एक भी नहीं ली थी।

“अम्माँ, इनसे कहो ये अपनी मशीन से हमारी तसवीर खींच दें।” निम्मा बोली, “हम अपनी तसवीर शीशे में जड़ाकर दीवार पर लगाएँगे।”

“मरी, जाने कित्ता ख़र्च होता है तसवीर खींचने पर!” ठकुराइन बोली, “तसवीर ऐसे ही थोड़े खिंच जाती है!”

“इसमें फ़िल्म नहीं है, फ़िल्म होती तो मैं खींच देता,” मैंने कहा। मन एक बार झुँझला उठा कि उसकी एक तसवीर खींच ही देता, तो क्या था! मगर फिर सोचा कि ठीक ही तो है—वह कैमरा मैं प्रोफ़ेशनल काम के लिए लाया हूँ, या इस तरह की तसवीरें खींचने के लिए? अपने फ़ीचर में मैं निम्मा की तसवीर को किस तरह इस्तेमाल कर सकता हूँ? मगर मेरा एक मन यह भी था कि उस घर की सीढिय़ाँ चढ़कर ऊपर की कोठरी में जाऊँ और वहाँ टूटी चारपाई पर पड़े हुए मियाँ इबादत अली की एक तसवीर ले लूँ। उस तसवीर का तो मैं प्रोफ़ेशनल तौर पर इस्तेमाल कर सकता था। उस पर तो बल्कि एक बहुत अच्छा शीर्षक भी दिया जा सकता था। साथ के विवरण में मियाँ इबादत अली के पाकिस्तान जाने और लौटकर आने की बात और उसकी लड़की खुरशीद का किस्सा भी दिया जा सकता था। इससे फ़ीचर काफ़ी रोचक बन सकता था। मगर निम्मा के सामने बोला हुआ झूठ मेरी मजबूरी बन गया था। मैं अब इबादत अली की तसवीर भी कैसे ले सकता था?

मैं उनके यहाँ से चला तो ठकुराइन मुझे गली के मोड़ तक छोडऩे साथ चली आयी। गली में आकर भी वह वही बातें दोहराती रही। लड़की के ब्याह पर वह ज़्यादा नहीं, मगर चार-पाँच सौ तो ख़र्च करेगी ही। ठाकुर साहब होते तो जाने कितना करते! मैं उनके यहाँ फिर कब आऊँगा? मैं न आ सकूँ, तो वही कभी मेरे घर पर आकर मुझसे पूछ ले। मैं एक कार्ड पर अपना पता लिखकर उसे ज़रूर भेज दूँ। कार्ड लिखूँ, तो ठाकुर साहब के नाम से ही लिखूँ...।

ठकुराइन के लौट जाने पर मैं पानवाले से सिगरेट ख़रीदने के लिए रुका, तो उसने सिर से पैर तक मेरा ज़ायज़ा लेते हुए कहा, “क्यों साहब, आप इनके रिश्तेदार हैं?”

“क्यों?” उसकी बदतमी$जी पर मुझे गुस्सा आ गया।

“ऐसे ही पूछ रहे हैं।” वह बोला, “हम तो समझते थे ये माँ-बेटी अकेली ही हैं।”

“मेरी इन लोगों के साथ पुरानी वाक़फियत है।” मैंने कहा, “मैं पहले इसी घर में रहता था।”

“अच्छा, हाँ!” वह आवाज़ को कुछ लटकाकर बोला, “हमने समझा आपकी इनके साथ रिश्तेदारी है!”

“एक तरह से रिश्तेदारी है भी।” मैंने माथे पर त्योरी डालते हुए कहा, “तुम बात करो।”

“बात कुछ भी नहीं।” वह डब्बी देकर पैसे गिनता हुआ बोला, “बेचारी ग़रीब हैं, घरों में जाकर बरतन-अरतन मलती हैं, इसलिए हमने कहा...।”

“क्या कहा...?”

“कुछ नहीं।” वह बोला, “ऐसे ही हम बात के लिए बात कर रहे थे...।”

मैं गली से बाहर आया, तो कोई चीज़ मुझे अन्दर से कोंच रही थी। मुझे लग रहा था कि वहाँ और भी कुछ था जिसकी मुझे तसवीर लेनी थी, मगर मैं नहीं ले सका था। लेकिन वह 'कुछ’ क्या था?

मैं लौटकर दफ़्तर पहुँचा, तो वहाँ हरबंस मेरा इन्तज़ार कर रहा था।

“तुम कब से आये हुए हो?” मैंने पूछा।

“अभी थोड़ी देर हुई आया था।” वह बोला, “मैं तुम्हें अपने साथ एक जगह ले जाने के लिए आया हूँ।”

मैंने उसे बताया कि मैं दिन-भर शहर में गलियों की ख़ाक छानता रहा हूँ, इसलिए बहुत थका हुआ हूँ।

“थके हुए होने से क्या होता है?” वह बोला, “थका हुआ आदमी चाय पीने तो चल ही सकता है।”

“मगर यह भी तो पता चले कि चलना कहाँ है?”

“उसी के घर चलना है...,” वह थोड़ा रुकता हुआ बोला, “पोलिटिकल सेक्रेटरी के। वह बहुत दिनों से घर पर आने के लिए कह रहा था। नीलिमा भी बहुत कह रही थी कि उसने इतनी बार बुलाया है, तो हमें ज़रूर चलना चाहिए। आज उसी ने उससे फ़ोन पर कह दिया था कि हम शाम को आएँगे।”

“तो तुम लोग चले जाओ।” मैंने कहा, “मुझे साथ में घसीटने की क्या ज़रूरत है? एक तो मैं बहुत थका हुआ हूँ और दूसरे उसने तुम्हीं को बुलाया है, इसलिए...।”

“मगर वह तुम्हारे बारे में भी तो पूछता रहता था। मैंने बाद में उससे फ़ोन पर कह दिया था कि तुम भी हमारे साथ आओगे...।”

“मगर मुझे साथ ले जाने की कोई ख़ास वजह है क्या?”

“एक छोटी-सी वजह भी है। वे लोग मुझे एक नौकरी आफ़र कर रहे हैं। हो सकता है वह आज उस बारे में कोई बात करना चाहे। मैं अपने मन में तय नहीं कर सका कि मुझे वह नौकरी ले लेनी चाहिए या नहीं, इसलिए अभी उस बारे में उससे बात नहीं करना चाहता। तुम साथ रहोगे, तो उस विषय में बात नहीं उठेगी।”

“मगर तुम मेरी हालत भी तो देखो कि मैं...।”

“तुम्हें मैंने कह दिया है कि तुम्हें मेरे साथ चलना है, बस! मेरी वजह से थोड़ी तकलीफ़ ही उठा लोगे, तो क्या है?”

मैंने और हील-हुज्जत नहीं की; अपनी डाक देखी, एक मिनट के लिए जाकर अपने सम्पादक से बात की और उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

पोलिटिकल सेक्रेटरी के घर की सीढिय़ाँ इतनी चिकनी थीं कि ऊपर जाते हुए पैर फिसल जाने से मेरे घुटने पर थोड़ी चोट आ गयी।

गैलरी में आकर हरबंस ने घंटी बजायी। एक चपरासी हमें बड़े कमरे में ले गया। पोलिटिकल सेक्रेटरी ने कमरे के दरवाज़े पर आकर हमारा स्वागत किया। “ओ, हरबंस! नीलिमा!” उसने उत्साह के साथ कहा, “और यह हमारा 'न्यू हैरल्ड’ वाला दोस्त है। इसके सम्पादक ने दो-एक बार इसकी बात की है। तुमने भी कई बार ज़िक्र किया है। मैं सिर्फ़ नाम भूल रहा हूँ। क्या नाम बताया था तुमने हरबंस?”

“मधुसूदन,” हरबंस ने कहा।

पोलिटिकल सेक्रेटरी ने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर गरमजोशी के साथ हिलाया। “हाँ-हाँ, मडुसुडान,” उसने कहा, “मैं सुडान का ध्यान रखूँगा, तो मुझे याद रहेगा। इस नाम में भी एक रिदम है। मैं संगीत का बहुत शौक़ीन हूँ। हरबंस ने शायद तुम्हें बताया हो। या शायद न भी बताया हो। वह अपने सिवा किसी की तारीफ़ नहीं करता। सिर्फ़ तुम्हारी करता है। मैं कह नहीं सकता क्यों। नीलिमा कहीं तुमसे ईर्ष्या न करने लगे। आओ,आओ। कुछ कलाकार आये हुए हैं। मैं पहले तुम लोगों का उनसे परिचय करा दूँ। बहुत युवा कलाकार हैं। मगर मैं कहा करता हूँ कि यौवन ही वास्तविक कला को जन्म दे सकता है। कला एक सृष्टि है और यौवन का सृष्टि के साथ गहरा सम्बन्ध है। आओ...!”

पहले उसने अपनी पत्नी से परिचय कराया। वह हाथ मिलाते ही यह कहकर चली गयी कि वह अरुण को बच्चों के पास छोड़ आये, नहीं तो वह बेचारा बड़ों के बीच बहुत अकेला और खोया-खोया महसूस करेगा। “मैं अभी आ रही हूँ।” उसने चलते-चलते नीलिमा से कहा, “मैं तुमसे बात करने के लिए बहुत उत्सुक हूँ।”

कमरे में चार व्यक्ति और थे। एक अधेड़ दम्पती थे, मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी, जो शायद सोशल कॉल के लिए आये थे। दो युवा चित्रकार थे जिन्होंने हाल ही में फ़ाइन आर्ट का डिप्लोमा लिया था। एक का नाम था रणधीर और दूसरे का सुभाष। रणधीर बाल और दाढ़ी दोनों बढ़ाये हुए था। कुरता-पाजामा पहने था। सुभाष नीली कॉर्डराय की पतलून के साथ पीली जैकेट पहने था। उन दोनों ने अतिशय नम्रता के साथ हम सबसे हाथ मिलाया, जैसे हम सब भी पोलिटिकल सेक्रेटरी के रुतबे के ही लोग हों।

“हम लोग इनके बनाये हुए कुछ चित्र देख रहे थे।” पोलिटिकल सेक्रेटरी बोला, “ये लोग बहुत अच्छी रचनाएँ कर रहे हैं। मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी कला के बहुत शौक़ीन हैं। मेरा ख़याल है आप सबको भी इसमें दिलचस्पी होगी। क्यों हरबंस? अरे, मैं यह किससे पूछ रहा हूँ! मिस्टर गुलाटी, मेरा दोस्त हरबंस इतिहास का पंडित है, मगर कला का भी बहुत बड़ा पारखी है। इसकी पत्नी, या लड़की नीलिमा, यह भारतीय नृत्य की...क्या कहूँ क्या है! हरबंस, मुझे बताओ ठीक शब्द क्या है? मगर तुम नहीं बताओगे। तुम उससे ईर्ष्या करते हो, मैं जानता हूँ। हमारा दोस्त...मैं फिर तुम्हारा नाम भूल गया। मैं तुम्हें 'न्यू हैरल्ड’ ही कहूँगा। हाँ तो 'न्यू हैरल्ड’, इसे भारतीय नृत्य की क्या कहना चाहिए...!” वह चुटकी बजाने लगा। “मुझे ठीक शब्द मालूम है, मगर वह मेरे दिमाग़ में आ नहीं रहा। वह है...क्या है...अच्छा हम अपने दोस्त 'न्यू हैरल्ड’ को सोचने देते हैं और तब तक ये चित्र देखते हैं।”

इस बीच उसकी पत्नी अरुण को छोड़कर आ गयी। उसे देखते ही वह बोला, “आओ डियर, आओ। मैं सोच रहा था कि तुम आ जाओ, तभी हम चित्र देखें। इसीलिए इन लोगों को बातों में लगाये हुए था। तुम यहाँ आकर मेरे पास बैठो। तुम जाने हमेशा मुझसे दूर-दूर क्यों रहती हो! तुम जानती हो मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ, फिर भी...।”

“मैं यहाँ अपने पत्रकार मित्र के पास बैठ रही हूँ।” उसकी पत्नी ने कहा, “मैं तुम्हारी वही रोज़-रोज़ की बातें सुनकर और नहीं ऊबना चाहती। अपने इस नये मित्र से तो मैं इन चित्रों के बारे में कुछ समझ भी सकूँगी, तुम तो बस शोर ही मचाते रहोगे और देखने-समझने कुछ नहीं दोगे।”

वह मेरे पास की कुरसी पर आ बैठी। पोलिटिकल सेक्रेटरी घूरकर देखने की मुद्रा बनाकर मुझसे बोला, “देखो मिस्टर 'न्यू हैरल्ड’, मैं तुमसे ही मित्रतापूर्ण व्यवहार की आशा करता हूँ। मुझे उम्मीद है कि तुम अपने पहले समीक्षक की तरह ख़तरनाक आदमी नहीं हो।”
 
“तुम बस अपना नाटक ही करना चाहते हो, या चित्र भी देखना चाहते हो?” उसकी पत्नी ने उसे झाड़ दिया। वह डाँट खाये हुए बच्चे की तरह बिल्कुल सीधा होकर बैठ गया और बोला, “मैं चित्र देखना चाहता हूँ, डार्लिंग! मगर मुझे शेक्सपीयर की वह पंक्ति हमेशा याद रहती है—फ्रेल्टी दाई नेम इज़...।”

“प्लीज़!” उसकी पत्नी गम्भीर होकर बोली। वह भी सहसा गम्भीर हो गया।

“तो मिस्टर सुभाष, अब अगला चित्र!”

सुभाष ने दीवार पर लगे हुए एक चित्र को उतार दिया और उसकी जगह दूसरा चित्र लगा दिया। नीचे उस दीवार के साथ छ:-आठ कैनवस रखे थे। जो चित्र लगाया गया था, उसे देखकर लगता था जैसे वह प्रागैतिहासिक युग का एक बड़ा-सा $गार हो। उसमें काले, हरे और भूरे रंगों का प्रयोग एक भय और नृशंसता का वातावरण पैदा करता प्रतीत होता था।

“इसका शीर्षक क्या है?” पोलिटिकल सेक्रेटरी ने कलाकार से पूछा।

“शीर्षक कुछ भी हो सकता है।” सुभाष ने कहा, “हर व्यक्ति इसे अपने मन से अलग शीर्षक दे सकता है।”

“मेरे ख़याल में इसका शीर्षक होना चाहिए...क्या होना चाहिए...क्यों मिस्टर गुलाटी, इसका शीर्षक क्या होना चाहिए...?”

मिस्टर गुलाटी बहुत उत्तरदायित्वपूर्ण काम करने के ढंग से चित्र को और ध्यान से देखने लगे। फिर सोचते हुए-से बोले, “इसका शीर्षक...इसका शीर्षक मेरे ख़याल में...होना चाहिए...अम्...म्...म्...”

“हाँ-हाँ, बताइए।”

“अँधेरा और उजाला नहीं हो सकता?”

“अँधेरा और उजाला!” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी चित्र का गम्भीर अध्ययन करती हुई बोली, “मगर मुझे तो इसमें अँधेरा ही अँधेरा नज़र आता है। उजाला इसमें कहाँ है?”

“मैं समझता हूँ शायद चित्र पर ठीक से लाइट नहीं पड़ रही।” मैंने धीरे से कहा।

“हाँ-हाँ, मैं भी यही सोच रहा था,” पोलिटिकल सेक्रेटरी बोला। उसने उठकर उस तरफ़ की खिड़की बन्द करके दो-एक बत्तियाँ और जला दी और कहा, “अब?”

“अब मुझे कुछ उजाला नज़र आ रहा है।” उसकी पत्नी ने कहा जिससे सब लोग हँस दिये और कलाकार कुछ झेंप गया।

“और तुम्हारा क्या शीर्षक है, हरबंस?”

हरबंस उस समय न जाने कहाँ खोया हुआ था। वह सहसा चौंक गया। तभी बैरा ट्रे में चाय लिये हुए आ गया। कुछ देर के लिए बात रुकी रही। तब तक हरबंस चित्र को देखता रहा। फिर अपनी चाय में चीनी हिलाता हुआ बोला, “मुझे तो यह एक गर्भाशय-सा लगता है।”

“गर्भाशय!” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी अपनी गम्भीरता में चौंक गयी।

“यह कैसे हो सकता है?”

“क्योंकि इसमें कुछ वैसी ही गोलाइयाँ हैं और...”

“जैसे कि तुमने गर्भाशय देख रखा है!” नीलिमा ने उस पर टिप्पणी कर दी तो हरबंस कुछ सकपका गया।

“ओ नीलिमा!” पोलिटिकल सेक्रेटरी हाथ पर हाथ मारकर बोला, “तुम क्या कहना चाहती हो कि वह...? नहीं-नहीं, ऐसी बात कहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं है। वह तुम्हारा पति है तो क्या हुआ? इसका यह मतलब नहीं कि तुम जो मुँह में आये, उससे कह सकती हो।”

“ठहरो, तुम मुझे समझने तो दो।” उसकी पत्नी ने फिर उसे डाँट दिया।

पोलिटिकल सेक्रेटरी फिर सीधा होकर बैठ गया, “अब मैं बिल्कुल चुप रहूँगा। लोगों के सामने मैं बार-बार डाँट नहीं खाना चाहता। सब लोग घर जाकर बात करेंगे कि पोलिटिकल सेक्रेटरी अपनी बीवी से दबता है। मैं इस बदनामी से बहुत डरता हूँ। अच्छा, मैं अपना शीर्षक बताऊँ? नहीं, पहले हरबंस तुम यह बताओ कि तुम्हें यह गर्भाशय कैसे लगता है?”

हरबंस तब तक फिर कहीं और खो गया था। उसने सिर्फ़ कन्धे हिला दिये और कहा, “ऐसे ही...मुझे ऐसा महसूस होता है।”

“अच्छा, माफ़ करना, मैं अपना शीर्षक बताने के लिए बहुत बेचैन हो रहा हूँ।” पोलिटिकल सेक्रेटरी बोला, “मेरा शीर्षक है...बता दूँ? मेरा शीर्षक है...देखो, तुम लोगों को ठीक न लगे, तो हँसना नहीं। मेरा शीर्षक है—'सपना’।”

“सपना?” उसकी पत्नी ने होंठ बिचका दिये, “असम्भव! यह सपना कैसे हो सकता है?”

“अच्छा, तुम बताओ कि यह सपना क्यों नहीं हो सकता? मुझे पता था कि तुम्हें मेरा बताया हुआ शीर्षक कभी पसन्द नहीं आएगा।” पोलिटिकल सेक्रेटरी ने कुहनियाँ समेटकर पीछे को टेक लगा ली, “मैं कई बार रात को इस तरह का सपना देखता हूँ। इन्हीं रंगों में और ठीक इसी तरह की गोलाइयों में। अगर मैं कलाकार होता, तो मैं उसका ठीक इसी तरह का चित्र बनाता।”

“अच्छा, हम कलाकार से ही पूछते हैं कि उसके ख़याल में इसका कौन-सा शीर्षक ज़्यादा ठीक है।” उसकी पत्नी पहले जिस गम्भीरता के साथ चित्र को देख रही थी, अब उसी गम्भीरता के साथ कलाकार के चेहरे को देखने लगी। दोनों कलाकारों ने एक बार एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर रणधीर बोला, “देखिए शीर्षक तो कुछ भी हो सकता है। वैसे 'सपना’ शीर्षक में कुछ कोमलता है, इसलिए व्यक्तिगत रूप से मुझे यह ज़्यादा अच्छा लगता है। मगर किसी भी चित्र का कोई एक ही शीर्षक नहीं होता।”

“देखा!” पोलिटिकल सेक्रेटरी कुछ चमककर बोला, “मैं कलाकार नहीं हूँ, मगर शीर्षकों का रहस्य मैं थोड़ा-बहुत जानता हूँ। जिन चित्रों के लिए और कोई शीर्षक न सूझता हो, उन पर इन तीन-चार शीर्षकों में से कोई एक शीर्षक ज़रूर ठीक बैठ जाता है—सपना, समय, अन्तरमन और खोज। जहाँ इनमें से भी कोई न चल सकता हो, वहाँ मैं उसे सिर्फ़ एब्स्ट्रेक्ट कह देता हूँ।”

“वैसे 'माँ और बेटा’ भी इसी तरह का एक शीर्षक है।” मिस्टर गुलाटी ने सुझाव दिया।

“यह शीर्षक अब पुराना हो गया है।” पोलिटिकल सेक्रेटरी बोला, “अब 'माँ और बेटा’ शीर्षक सुनकर कुछ अजीब-सा लगता है। हाँ, ये दोनों शब्द अलग-अलग शीर्षक के रूप में दिये जा सकते हैं। तुम्हारा क्या शीर्षक है, 'न्यू हैरल्ड’?”

मेरा उत्तर देने को मन नहीं हो रहा था। फिर भी मैंने कहा, “मुझे तो यह आदिम गुफ़ा जैसी लगती है।”

“इसका मतलब है कि तुम्हारा और हरबंस का शीर्षक एक ही है।” पोलिटिकल सेक्रेटरी फिर हँसा, “तभी तुम दोनों में इतनी दोस्ती है। तुम दोनों बिल्कुल एक ही तरह सोचते हो।”

कलाकार ने उस चित्र को हटाकर एक नया चित्र लगा दिया—खिड़की के परदे के पास रखे हुए गुलदस्ते का। पोलिटिकल सेक्रेटरी एकदम बोल उठा, “इसका शीर्षक मैं बताता हूँ—स्टिल लाइफ़। क्यों?” और वह हँसता रहा जैसे उसने यह बहुत बड़ी मज़ाक की बात कही हो।

“क्यों, यह शीर्षक पुराना नहीं है?” उसकी पत्नी अपनी उसी गम्भीरता के साथ बोली।

“यह पुराना होनेवाला शीर्षक नहीं है। दुनिया में बने एक-तिहाई चित्रों का शीर्षक यही होगा। क्यों हरबंस?”

“आज तुम बहुत मूड में हो!” हरबंस ने जैसे बला टालने के लिए कहा।

“सुन लिया?” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी बोली, “तुमसे कितनी बार कहती हूँ कि जितनी बरदाश्त हो, उससे ज़्यादा न पिया करो।”

“देखो मेरी बीवी को।” पोलिटिकल सेक्रेटरी ने सिर खुजलाते हुए कहा, “कोई मेरी तारीफ़ भी करे, तो यह उसमें से दूसरा ही मतलब निकाल लेती है। मैं चाहे अपने गले को रेगिस्तान की तरह खुश्क रखूँ, फिर भी यह कहे बिना नहीं मानेगी।”

बैरा एक के बाद एक सैंडविच और पैटीज़ की प्लेटें लिये हुए सामने आ जाता था। कलाकार एक चित्र दीवार से उतारता और उसकी जगह दूसरा चित्र लगा देता था। उसके अधिकांश चित्र पहले चित्र की तरह एब्स्ट्रेक्ट के प्रयोग थे। उनमें स्याह रंग का प्रयेाग बहुत खुलकर किया गया था जो पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी को पसन्द नहीं आ रहा था। वह अपनी अरुचि को खामोश रहकर छिपाने का प्रयत्न कर रही थी। सुभाष अपने सब चित्र दिखा चुका, तो रणधीर अपने चित्र दिखाने लगा। उनमें ज़्यादातर मानवीय आकृतियों के चित्र थे और कुछ लैंडस्केप थे। उनके रंग भी काफ़ी भड़कीले थे। उन चित्रों को देखते हुए पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी काफ़ी उत्साहित हो उठी। मैं बार-बार कमरे के नीले परदों को देखता था, फिर कॉफ़ी की प्यालियों और सैंडविच की प्लेटों को देखता था। मन हो रहा था कि किसी तरह वह सिलसिला समाप्त हो, तो वहाँ से उठकर चलूँ। कमरे की सजावट काफ़ी अच्छी थी। भूरे रंग का मोटा गलीचा तो बहुत ही अच्छा था। कुरसी पर बैठे हुए पैर उसमें धँस-धँस जाता था। दीवारों पर तसवीरों के बड़े-बड़े फ्रेम लगे थे। आँखें उन पर अटकती नहीं थीं, उनमें खो जाती थीं। सोफ़े काफ़ी बड़े और खुले थे। मगर वह सब कुछ मुझे अपने से बहुत दूर का लग रहा था, शायद छोटे घरों में रहने के अभ्यास के कारण। रणधीर अपने एक लैंडस्केप के विषय में कुछ बता रहा था और मैं सोच रहा था कि वह सजावट उस घर के व्यक्तित्व को प्रकट करती है, या उस घर में रहनेवाले लोगों के? या उन दोनों से अलग किसी और ही व्यक्तित्व को? बार-बार मेरा मन अपनी घड़ी की तरफ़ देखने को होता था, मगर सभ्यता के तकाज़े से मैं अपनी आँखों को कलाई की तरफ़ नहीं जाने देता था।

रणधीर अपने हर चित्र को दीवार पर लगाने से पहले एक छोटी-सी भूमिका बाँधता था, और उसे उतारने के बाद भी उसके बारे में कुछ न कुछ बताता रहता था। वह अपने हर चित्र की प्रेरणा के स्रोत के सम्बन्ध में लोगों को पूरी जानकारी दे देना चाहता था। मैंने अपनी घड़ी पर हाथ रख लिया था कि ग़लती से मेरी आँखें उस तरफ़ न चली जाएँ। सब लोग शीर्षकों का खेल उसी तरह खेल रहे थे। एक अपना शीर्षक रखता था, तो दूसरा उसे हटाकर अपना शीर्षक रखना चाहता था। पोलिटिकल सेक्रेटरी उस खेल का नायक था। वह किसी-किसी समय इतना शोर करता था कि मेरा ध्यान भी घड़ी से हटकर उसकी बात की तरफ़ चला जाता था।

सब चित्र दिखाकर रणधीर चेहरे पर एक उत्सुकता का भाव लिये हुए सोफ़े पर आ बैठा। सुभाष के चेहरे पर भी वैसी ही उत्सुकता नज़र आ रही थी कि शायद लोग अब उनके चित्रों पर कुछ टीका-टिप्पणी करें। मगर जब किसी ने कुछ नहीं कहा तो रणधीर बोला, “देखिए, हम अपने चित्रों के सम्बन्ध में आप लोगों की सही राय जानना चाहते हैं। आप जानते हैं कि आप लोगों की राय हमारे लिए कितनी मूल्यवान हो सकती है।”

“मेरे ख़याल में तो सभी चित्र बहुत अच्छे थे।” पोलिटिकल सेक्रेटरी ने कहा।

“हम सब आपके आभारी हैं कि आप लोगों ने यहाँ आकर हमें अपनी कला से परिचित होने का अवसर दिया।”

“फिर भी कोई चीज़ जो आपको ज़्यादा पसन्द आयी हो...।”

“मैंने कहा है न, मुझे सभी चित्र एक से पसन्द आये हैं। सब के सब बहुत अच्छे हैं। बाकी मिस्टर गुलाटी और हमारा 'न्यू हैरल्ड’ का दोस्त आपको ज़्यादा बता सकते हैं। आपको पता है हमारा यह 'न्यू हैरल्ड’ का आर्ट और ड्रामा क्रिटिक है! इसकी राय आपके लिए सबसे मूल्यवान हो सकती है। आप लोग अब कुछ देर आपस में बातचीत करें। मैं उतनी देर हरबंस को अपना घर दिखा दूँ। मैं बहुत दिनों से इस शख्स को अपने घर पर आने के लिए कह रहा था, मगर आज यह पहली बार आया है। आओ हरबंस, तुम्हें उधर के हिस्से दिखा दूँ।” कहता हुआ पोलिटिकल सेक्रेटरी उठ खड़ा हुआ, “मैं अपनी स्टडी तुम्हें खास तौर पर दिखाना चाहता हूँ। मैंने इधर कुछ नयी किताबें मँगवायी हैं जिन्हें देखकर तुम्हें खुशी होगी। आओ, तुम्हें चुपचाप बैठे देखकर मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”

हरबंस ने एक नज़र मेरी तरफ़ देखा और उठ खड़ा हुआ, “मैं अभी आ रहा हूँ।” उसने बिना वजह मुझसे कहा और पोलिटिकल सेक्रेटरी के साथ चला गया।

“आपका वह जो एब्स्ट्रेक्ट था।” उनके चले जाने के बाद मिस्टर गुलाटी कहने लगे, “जिसका शीर्षक मिस्टर मधुसूदन ने 'हिरोशिमा’ बतलाया था, मैं उसके बारे में एक बात पूछना चाहता हूँ...।”

“नीलिमा, तुमने भी तो मेरा घर नहीं देखा है।” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी नीलिमा से बोली, “आओ, मैं तुम्हें ऊपर चलकर अपना टैरेस दिखलाऊँ। मैंने यह घर उस टैरेस की वजह से ही पसन्द किया था। तुम देखना पसन्द करोगी?”

“हाँ ज़रूर।” नीलिमा बोली, “मैं जब से आयी हूँ, तब से इस घर की एक-एक चीज़ को ध्यान से देख रही हूँ। यहाँ की छोटी से छोटी चीज़ से भी आपके टेस्ट का पता चलता है।”

“तो आओ। मैं तुम्हें अपना टैरेस ज़रूर दिखाना चाहूँगी।” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी अपनी जगह से उठ खड़ी हुई, “आप लोगों की कला-सम्बन्धी बातचीत में हम लोग क्या हिस्सा ले सकेंगी? मैं तो इस मामले में बिल्कुल नासमझ हूँ। थोड़ी देर के लिए आप हमें क्षमा करेंगे? आओ नीलिमा!”

“तुम भी हमारे साथ ही क्यों नहीं चलते?” नीलिमा उठती हुई मुझसे बोली, “अभी थोड़ी देर में हम लोग लौट आएँगे।”

मैं भी कला-सम्बन्धी बातचीत से बचना चाहता था, इसलिए मैंने मन में नीलिमा को इस सुझाव के लिए धन्यवाद दिया और झट ही उसके साथ चलने के लिए उठ खड़ा हुआ। “क्षमा कीजिएगा, हम लोग अभी वापस आ जाएँगे,” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी ने फिर कहा और हम लोग कमरे से बाहर निकल आये।

ऊपर का टैरेस काफी खुला था और उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसकी सादगी थी। वहाँ रखे हुए बेंत के मोढ़े और कुरसियाँ नीचे के कमरे की सजावट से बहुत भिन्न थे। नीचे बैठे हुए उस बहुमूल्य सजावट में अपना आप बहुत छोटा लगता था, मगर वहाँ आकर उस तुच्छता की अनुभूति से बहुत कुछ छुटकारा मिल सकता था। मैं कुछ खुलेपन का अनुभव करता हुआ वहाँ एक कुरसी पर बैठ गया। मगर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ जब पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी ने भी वहाँ आकर यही कहा, “नीचे के कमरे में बैठे हुए तो कई बार मेरा दम घुटने लगता है। वहाँ रात-दिन लोग आते रहते हैं और उनसे एक ही तरह की बातें करनी होती हैं। मैं अपने पति की प्रशंसा करती हूँ जो इन बातों से थकता नहीं। इन बातों के साथ-साथ वह अपना काम भी करता जाता है। मगर मैं बहुत थक जाती हूँ। मुझे अपने घर में यह टैरेस ही एक ऐसी जगह लगती है जहाँ आकर मेरे मन को कुछ शान्ति मिलती है। पीछे हमारे अपने घर में भी एक ऐसा ही टैरेस है और मैं यहाँ बैठकर कई बार अपने को वहीं बैठी हुई महसूस करती हूँ। सचमुच अपने घर के वातावरण के साथ आदमी का मन किस तरह जुड़ा रहता है!”

और वह हमें अपने वहाँ के घर के बारे में बहुत कुछ बतलाती रही कि वह इमारत किस तरह की बनी है, उसमें छोटा-सा बा$गीचा कितना अच्छा है और उसमें उसने किस-किस तरह के फूल लगा रखे हैं। “मैं बहुत उत्सुकता से अपने घर वापस जाने की राह देख रही हूँ।” उसने कहा, “यहाँ हमारी टर्म का अब एक ही साल रहता है, उसके बाद शायद हम वापस चले जाएँगे। मैं तो कई बार सोचती हूँ कि मैं बच्चों को लेकर पहले ही चली जाऊँ।”

नीलिमा कुछ देर टैरेस पर घूमती रही और वहाँ रखे गमलों में लगे हुए फूलों की प्रशंसा करती रही। “तुम्हें सचमुच मेरा टैरेस अच्छा लगा?” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी ने उससे पूछा।

“सचमुच यह बहुत अच्छी जगह है।” नीलिमा बोली, “यहाँ आकर तो मन होता है कि एक कुरसी पर ढीले होकर पड़े रहें और आसपास की तरफ़ देखते रहें।”

“मैंने सोचा कि तुम भी वहाँ बैठी-बैठी ऊब गयी होगी, इसलिए तुम्हें कुछ देर खुली हवा में ले आऊँ।” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी ने कहा, “अब नीचे चलें?”

“मेरा अभी यहाँ से जाने को मन नहीं हो रहा।” नीलिमा बोली, “अगर मेरे घर में ऐसा टैरेस हो, तो मैं दिन का आधा वक़्त वहीं बैठी रहा करूँ।”

“मैं भी कई बार बहुत-बहुत देर तक यहाँ आकर बैठी रहती हूँ।” पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी बोली, “यहाँ आकर मन की सारी ऊब और थकान दूर हो जाती है। मगर...मेरा ख़याल है अब चला ही जाए, क्योंकि वे लोग यह न सोचें कि पति-पत्नी दोनों हमें अकेला छोड़कर चले गये हैं। एटिकेट की माँग है कि...।” और वह एक हल्की-सी हँसी हँस दी, “सचमुच एटिकेट की भी क्या-क्या माँग होती है!”

जब हम लोग लौटकर नीचे आये, तो वहाँ कमरे में अस्वाभाविक-सी खामोशी छायी थी। मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी बिल्कुल ख़ामोश बैठे थे और दोनों कलाकार बहुत धीरे-धीरे आपस में ही कुछ बात कर रहे थे। पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी ने वहाँ आकर उन लोगों से फिर क्षमा माँगी और मुसकराकर कहा, “मैंने तो सोचा था कि आप लोगों में कला के मूल्यों के सम्बन्ध में खूब गरमागरम बहस हो रही होगी और आप लोग यहाँ बिल्कुल चुपचाप बैठे हैं। ठहरिए, मैं अभी अपने पति को बुला लाती हूँ। वही एक आदमी है जो इतनी बात कर सकता है कि किसी और के बात करने की ज़रूरत ही न रहे। वह और किसी को बात करने का मौका ही नहीं देता। क्यों मिस्टर गुलाटी?”

“उनके रहने से महफ़िल में बहुत रौनक रहती है।” मिस्टर गुलाटी बोले, “उन जैसा जानदार और ज़िन्दादिल आदमी मैंने बहुत कम देखा है।”

“तो मैं अभी उसे बुलाकर ला रही हूँ,” कहती हुई पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी फिर वहाँ से चली गयी। वह लौटकर आयी, तो उसके पीछे पोलिटिकल सेक्रेटरी भी वहाँ आ गया।

“मुझे बहुत-बहुत अफ़सोस है।” उसने आते ही कहा, “कि मेरे चले जाने से यहाँ कला-सम्बन्धी बातचीत रुक ही गयी। इसकी सारी ज़िम्मेदारी हमारे 'न्यू हैरल्ड’ वाले दोस्त पर है। मैंने तो सोचा था कि मैं आपको एक आर्ट क्रिटिक के भरोसे छोड़कर जा रहा हूँ, मगर ये आर्ट क्रिटिक के लोग जाने अपने को क्या समझते हैं कि आसानी से अपनी राय ही नहीं बताते! क़सूर मेरी पत्नी का भी है जो इस बेचारे को अपना टैरेस दिखाने ले गयी। यह अपने टैरेस को दुनिया-भर की कला से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण समझती है। मैं पहले आप लोगों को संगीत का एक डोज़ देता हूँ। मैं कहा करता हूँ कि संगीत ही वह चीज़ है जो इन्सान के अन्दर एक नयी रूह फूँक सकती है। संगीत और शराब! इन दोनों चीज़ों से अन्दर के सब जाले उतर जाते हैं। हम अभी दोनों का एक-एक डोज़ लेंगे। मगर पहले संगीत...।”

वह एक कवर खोलकर उसमें से रिकार्ड निकालने लगा, तो नीलिमा ने कहा, “मगर मेरे पति को आप कहाँ छोड़ आये?”

“मुझे अफ़सोस है नीलिमा।” पोलिटिकल सेक्रेटरी हँसकर बोला, “तुम्हारे पति को मैं तुमसे उधार माँगकर ले गया था, मगर वह मुझसे गुम हो गया है। मैं इसके लिए तुमसे बहुत-बहुत क्षमा-प्रार्थी हूँ।”

“वह अन्दर कुछ कागज़ देख रहा है।” उसकी पत्नी बोली, “अभी आ जाएगा।”

“तो तुम्हें वह मिल गया?” पोलिटिकल सेक्रेटरी रिकार्ड छाँटता हुआ अपनी पत्नी से बोला, “शुक्रिया! बहुत-बहुत शुक्रिया! तुमने मेरे सर से एक बोझ उतार दिया, नहीं तो मैं हमेशा के लिए नीलिमा के सामने शर्मिन्दा रहता।” और कुछ रिकार्ड छाँटकर उन्हें रेडियोग्राम में लगाते हुए उसने नीलिमा से कहा, “नीलिमा, तुमने देखा, मेरी पत्नी कितनी अच्छी है! मैं जब भी किसी के पति को गुम करता हूँ, यह फ़ौरन उसे ढूँढ़कर ले आती है। मैं कितनी ही बार इसका तजरबा कर चुका हूँ। यह लो, वह रहा तुम्हारा पति!”

हरबंस उधर से आया और आकर चुपचाप मेरे साथवाली कुरसी पर बैठ गया। वह कुछ घबराहट में था क्योंकि बैठते हुए उसका एक पैर मेरे जूते पर पड़ गया। बैठते ही उसने सिगरेट सुलगा ली और पीछे को टेक लगाकर थोड़ा लम्बा हो गया।

रेडियोग्राम पर ऑर्केस्ट्रा आरम्भ हो गया था। पोलिटिकल सेक्रेटरी ऑर्केस्ट्रा की धुन के साथ-साथ घुटने हिलाता हुआ रिकार्ड छाँट रहा था। उसकी पत्नी कुछ देर के लिए उठकर बाहर चली गयी और लौट आयी। कुछ देर में बैरा एक ट्रे में शराब की बोलतें और गिलास ले आया।

“नीलिमा, तुमने मेरी पत्नी के सामने हमारे टैरेस की कुछ प्रशंसा की कि नहीं?” पोलिटिकल सेक्रेटरी बोला, “एक चीज़ मैं तुम्हें बता दूँ। यह सिर्फ़ उन्हीं लोगों की प्रशंसा करती है जो इसके टैरेस की प्रशंसा करते हैं।”

“वह टैरेस है ही इतना अच्छा कि कोई उसकी प्रशंसा किये बिना रह नहीं सकता।” नीलिमा ने कहा।

“इसका मतलब है कि तुम मेरी पत्नी को पहली बार मिलने पर ही अच्छी तरह जान गयी हो।” पोलिटिकल सेक्रेटरी फिर हँसा, “तुम्हें इन्सान की खूब पहचान है, यह मैं मान गया।” और उसने अपने गिलास को ऊँचा उठाकर कहा, “टू द टैरेस!”

सब लोगों ने अपने-अपने गिलास होंठों से लगा लिये। पोलिटिकल सेक्रेटरी सहसा गिलास रखकर उठ खड़ा हुआ। “संगीत और शराब के साथ तीसरी चीज़ नृत्य।” वह बोला, “नीलिमा, तुम मेरी पार्टनर बनना स्वीकार करोगी? देखो, तुम मुझे इनकार नहीं कर सकतीं। आओ...!”

नीलिमा भी अपना गिलास रखकर उठ खड़ी हुई और वह उसे साथ लेकर नाचने लगा। उसकी पत्नी ने हरबंस के पास जाकर अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ा दिया। “आओ हरबंस, मैं तुम्हारी पार्टनर बनकर तुम्हारे साथ नाचूँगी,” उसने कहा।
 
मगर हरबंस नहीं उठा। वह जिस तरह ढीला-सा बैठा था, उसी तरह बैठा रहा। “मैं नाचना नहीं जानता।” वह धीरे-से बोला।

“क्या?” पोलिटिकल सेक्रेटरी ने नीलिमा के साथ ग़लीचे पर चक्कर काटते हुए कहा, “तुमने इतने साल लन्दन में रहे और तुमने नाचना नहीं सीखा? नहीं, मैं यह बात नहीं मान सकता। नीलिमा इतना अच्छा नाचती है, तो यह कैसे हो सकता है कि तुम नाचना जानते ही नहीं? तुम्हारी यह बात मैं नहीं सुनूँगा। आज तुम्हें ज़रूर नाचना पड़ेगा। डार्लिंग, इसे हाथ से पकड़कर वहाँ ले आओ। देखें यह कैसे नहीं नाचता! और मिस्टर गुलाटी, आप भी उठिए। मिसेज़ गुलाटी नाचना जानती हैं, मुझे पता है। हमारा 'न्यू हैरल्ड’ का दोस्त और ये कलाकार, इन बेचारों के लिए यहाँ कोई पार्टनर नहीं हैं, इसलिए ये सिर्फ़ बैठकर देखेंगे। आइए मिस्टर गुलाटी, प्लीज़...”

मिस्टर गुलाटी मिसेज़ गुलाटी को लेकर उठ खड़े हुए और बहुत सावधानी से धीरे-धीरे हिलने लगे। पोलिटिकल सेक्रेटरी की पत्नी ने हरबंस को भी हाथ से पकड़कर उठा लिया। हरबंस उसके साथ पहले चक्कर में ही लडख़ड़ा गया। पोलिटिकल सेक्रेटरी ने सहसा नीलिमा का हाथ छोड़ दिया और हरबंस का हाथ अपने हाथ में लेकर उसे जल्दी-जल्दी चक्कर देने लगा। हरबंस का चेहरा कानों तक सुर्ख हो रहा था और उसका एक भी पैर सीधा नहीं पड़ रहा था। पोलिटिकल सेक्रेटरी उसे जिस तरफ़ को भी चक्कर देता था, वह उसी तरफ़ को लुढ़क जाता था। आख़िर उसने अपना हाथ छुड़ा लिया और कठिनाई से अपने को सँभाले हुए अपनी कुरसी पर लौट आया। पोलिटिकल सेक्रेटरी इस पर खिलखिलाकर हँसा और उसने फिर नीलिमा का हाथ थाम लिया। हरबंस का सुर्ख चेहरा कुरसी पर आकर भी काफ़ी देर ठीक नहीं हुआ और उसकी साँस काफ़ी तेज़-तेज़ चलती रही। पोलिटिकल सेक्रेटरी नीलिमा के साथ तेज़ क़दमों से नाचने लगा। मिस्टर और मिसेज़ गुलाटी तब भी मशीन के पुरजों की तरह लगभग एक ही जगह पर हिले जा रहे थे...।
 
अंधेरे बंद कमरे [भाग-4]

सुषमा से मुझे ‘ला बोहीम’ में मिलना था। बात चूँकि लोगों की ज़बान पर पहुँच गयी थी, इसलिए मैं इस बार उससे खुलकर बात कर लेना चाहता था। मैं जानता था कि सुषमा भी इसकी प्रतीक्षा में है कि कब मैं उससे इस विषय में बात करता हूँ। पिछले कुछ दिनों में हम जब-जब भी मिले थे तो हमेशा हमें इस तरह लगता रहा था जैसे कि अगली बात हम उसी विषय में करने जा रहे हैं। आँखों से और चेहरे के भावों से वह बात न जाने कितनी बार कही जा चुकी थी! मगर मुँह पर आते-आते बात शायद इसलिए रुक जाती थी कि अगर मन के किसी कोने में अब भी उस विषय में कुछ सोचना बाकी है, तो अगली बार मिलने तक वह और सोच लिया जाए। सुषमा के नाम के साथ थोड़ा इतिहास जुड़ा हुआ है, यह मैं अच्छी तरह जानता था। लोग उसके पुराने मित्रों में कई-एक लोगों की चर्चा करते थे। मगर इस बात को सोचकर मेरे मन में कोई दुविधा नहीं थी। मैं सोचता था कि इस तरह का इतिहास किसके जीवन में नहीं होता! क्या मेरे अपने जीवन में इस तरह का कोई इतिहास नहीं था? और जितने लोगों को मैं जानता था, उनमें कौन ऐसा था जो इस तरह के इतिहास से बिल्कुल बचा हुआ था? फ़र्क़ इतना ही तो था कि कुछ लोगों के इतिहास की चर्चा सिर्फ़ थोड़े-से लोगों में और सिर्फ़ एक फुसफुसाहट के रूप में होती थी और सुषमा के इतिहास की लोग खुलकर चर्चा कर लेते थे। और इसका कारण भी तो सुषमा का अपना खुलापन ही था।

वह कभी अपने मित्रों के सम्बन्ध में बात करते हुए किन्तु-परन्तु का प्रयोग नहीं करती थी। जितना कुछ लोगों के मुँह से जाना जा सकता था, उससे कहीं ज़्यादा उसने खुद ही मुझे बता दिया था। लोग कहते थे कि सुषमा लोगों के घर तोड़ती है, वह ‘होम-ब्रेकर’ है। मगर मैं जानता था कि वह घर तोडऩा नहीं, घर बनाना चाहती है। अपने लिए घर बनाने और उसमें रहने की उसे कितनी चाह है, यह बात उसके शब्दों से ही नहीं, सारे हाव-भाव से प्रकट होती थी। मैं यह जानता था कि वह मेरे ऊपर जो इतना निर्भर करने लगी है, उसके पीछे भी मूल भावना यही है। यह बात ठीक थी कि उसने अपने आकर्षण के प्रभाव को कई लोगों पर आज़माने का प्रयत्न किया था। यह उसके लिए एक खेल की तरह था। उसने मुझसे कहा था कि इस खेल को ख़तरनाक हद तक उसने कभी नहीं जाने दिया। लोग उसे जो भी कहें, उसने आज तक किसी का घरेलू जीवन नष्ट नहीं किया। “जो लोग इतनी कच्ची ज़मीन पर खड़े हैं कि कोई भी लडक़ी उनकी तरफ़ अपनी उँगली बढ़ाये, तो वे उसे पकडक़र चल सकते हैं उनके साथ कुछ खिलवाड़ करने में अच्छा नहीं लगता?” उसने हँसकर कहा था, “मैं कई बार सिर्फ़ यही देखना चाहती थी कि कौन आदमी जो ऊपर से बहुत बनता है, वास्तव में कितने डगमग क़दमों से चल रहा है।”

मैंने एक बार ख़ास तौर पर हरबंस के बारे में पूछा, तो उसने थोड़ी-सी बात कहकर टाल दिया था। “वह तुम्हारा दोस्त है।” उसने कहा, “इसलिए ज़्यादा तुम उसी से पूछ लेना। मैं सिर्फ़ इतना जानती हूँ कि उस जैसे आदमी के साथ मेरी मित्रता हो ही नहीं सकती थी।”

मैंने उस बात को ज़्यादा तूल नहीं दिया। यह जानते हुए कि हरबंस मेरा मित्र है, वह उसके बारे में ज़्यादा बात कर भी कैसे सकती थी? मेरे मन में अगर दुविधा थी, तो वह अपनी बात सोचकर ही थी। क्या मैं सुषमा जैसी लडक़ी के साथ विवाहित जीवन की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार था? मेरे मन में इसके विपक्ष में दलील कोई नहीं थी, फिर भी न जाने क्यों एक हिचक-सी थी। मैं अपने से पूछता था कि क्या मेरे मन में सुषमा के लिए उस तरह की भावना है जैसी कभी किसी और के लिए थी?

मगर मैं इस सवाल को दिमाग़ से निकाल देना चाहता था। भावना की नापजोख इस तरह कैसे हो सकती है्र और बरसों पहले की मन:स्थिति के साथ मैं आज की मन:स्थिति की तुलना कर ही कैसे सकता था? इस तरह पैमाना लेकर बैठने से क्या ज़िन्दगी कभी चलती है? गुज़रे हुए दिन गुज़र गये थे और मुझे अपने लिए आज की और आनेवाले कल की व्यवस्था करनी थी। अपनी इस दुविधा से निकलने के लिए मैंने उन दिनों की सारी बात सुषमा को बता भी दी थी। इस पर वह सिर्फ़ एक बार हँस दी थी और उसने कहा था, “शुक्ला सचमुच बहुत अच्छी लडक़ी है। मैं उसे अब भी बहुत प्यार करती हूँ।”

मेरे मन में एक हल्की-सी दुविधा और भी थी। सुषमा के अपने बने हुए विचार थे। वह हर विषय पर इतने अधिकारपूर्ण ढंग से बात करती थी और इतने सधे ढंग से अपनी बात रखती थी कि उसके साथ बहस करके उसके मत को बदलना लगभग असम्भव प्रतीत होता था। उसके बहुत से विचार ऐसे थे जिनसे मैं दिल से सहमत नहीं हो सकता था, मगर मैं अपने पक्ष का प्रतिपादन उतनी अच्छी तरह नहीं कर पाता था जितनी अच्छी तरह वह अपने पक्ष का प्रतिपादन करती थी। इसका एक कारण शायद यह भी था कि मैं उसकी बात धैर्य के साथ सुन लेता था। और वह मेरी बात सुनते हुए एकदम अधीर हो उठती थी। वह जब अधीर होकर बात करती थी, तो उसकी बातों में एक चामत्कारिक-सा प्रभाव आ जाता था। जीवन के सम्बन्ध में उसकी दृष्टि बहुत ही व्यक्तिवादी थी जिससे मुझे चिढ़ होती थी। एक बार बात-बात में उसने कहा था, “मैं इन्सान हूँ, तो मैं ठीक से जीऊँ क्यों नहीं? हम सब जानते हैं कि जीने की अपनी शर्तें हैं। हमें जीना है तो हमें उन शर्तों का पालन करना ही चाहिए। ठीक से जीना है, तो ठीक से पालन करना चाहिए।”

“मगर इन्सान जीने की शर्तों को बदल भी तो सकता है।” मैंने कहा, “अगर ऐसा न होता, तो हम आज भी आदिम काल की शर्तों पर ही ज़िन्दगी बिता रहे होते।”

“समय के साथ शर्तें बदल जाती हैं, यह मैं मानती हूँ, मगर उनके बदलने-बदलने में लाखों-करोड़ों आदमियों की ज़िन्दगियाँ तबाह हो जाती हैं। उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा इतना सन्तोष मिल सकता है कि वे इतिहास में जीते हैं। और इतिहास में भी नाम बनकर नहीं, केवल एक घटना बनकर। और कई बार तो घटना बनकर भी नहीं, केवल एक परिस्थिति बनकर। उस तरह जीने में इन्सान का अपना क्या रह जाता है?”

“और इस तरह जीने में इन्सान का अपना क्या होता है?”

“क्यों? बहुत कुछ है जो अपना होता है। मुझे खाने-पहनने का शौक है, घूमने का शौक है, अच्छा संगीत सुनने का शौक है। ये सब शौक पूरे होते हैं, तो मुझे अपने जीवन का कुछ अर्थ नज़र आता है। बाकी बातें किताबों में पढऩे के लिए तो ठीक हैं, उन्हें अपने पर लागू करना बहुत मुश्किल है। और जो लोग इस तरह का दावा करते हैं, तुम समझते हो कि वे सचमुच अपने व्यक्ति को भूलकर जीते हैं? फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि कुछ लोग ज़िन्दगी में एक तरह का धोखा बनाये रखना चाहते हैं और मैं अपने को उस धोखे से मुक्त रखना चाहती हूँ। हमारे आसपास जो लोग बहुत-बहुत सिद्धान्तों की बातें बघारते हैं, तुम उनमें से किसी को भी देख लो। यह बहुत साफ़ नज़र नहीं आता कि उसकी सैद्धान्तिक ज़िन्दगी और व्यक्तिगत ज़िन्दगी में एक बहुत बड़ी खाई है?”

“अगर कुछ लोगों की ज़िन्दगी में इस तरह की खाई है, तो इसका यह मतलब तो नहीं कि इस तरह की खाई रखे बग़ैर जिया ही नहीं जा सकता...।”

“नहीं जिया जा सकता सूदन, बिल्कुल नहीं जिया जा सकता।” वह हठ के साथ बोली, “जो आदमी आज इस तरह जीने की कोशिश करेगा, उसे ज़िन्दगी दो दिन में बुहारकर एक तरफ़ कर देगी। तुम ज़िन्दगी में यह ख़तरनाक कोशिश करके देखो, तो तुम्हें खुद पता चल जाएगा और इसके बाद एक स्नेहपूर्ण स्पर्श के साथ उसने कहा, “मगर मैं यह भी कभी नहीं चाहूँगी कि तुम इस तरह की कोशिश करो। एक प्रयोग करने-करने में अपनी ज़िन्दगी नष्ट कर देना, यह कहाँ की अक्लमन्दी है! यह ज़्यादा अच्छा नहीं कि इस विषय में मग़ज़पच्ची करने की बजाय हम लोग चलकर कोई अच्छी-सी पिक्चर देखें? ‘प्लाज़ा’ में ‘एराउंड द वल्र्ड इन एटी डेज़’ तुमने देख ली है?”

“नहीं, अभी नहीं देखी।” मैंने कहा।

“मैं एक बार देख आयी हूँ।” वह बोली, “मगर तुम्हारे साथ एक बार फिर देखना चाहूँगी। तुम इस वक़्त चल सकोगे?”

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं!”

“तो आओ चलें। यह बहस-मुबाहिसा किसी और दिन करेंगे।”

मैंने धीरे-धीरे अपने मन की रुकावट पर भी काबू पा लिया था। साथ-साथ जीवन बिताने की यह एक अनिवार्य शर्त कैसे थी कि पति-पत्नी के विचारों में साम्य हो ही? सुषमा अपनी तरह से सोचती थी, तो ठीक था। उसके अपने विचार थे। मेरे विचार उससे अलग थे, तो क्या यह ज़रूरी था कि वह भी मेरे विचारों को अपने ऊपर ओढ़ ले? और आगे चलकर उसके विचार बदल भी तो सकते थे। और न भी बदले, तो क्या था? विवाहित जीवन में दो व्यक्तियों को एक-दूसरे के विचारों का सम्मान नहीं करना चाहिए?

‘ला बोहीम’ के एक अँधेरे कोने में बैठे हुए यही बातें फिर बार-बार मेरे मन में उठ रही थीं। सुषमा अपने सफ़ेद कोट में बहुत अच्छी लग रही थी। उतनी अच्छी वह मुझे पहले कभी नहीं लगी थी। सोने के छोटे-छोटे गोल टॉप्स उसके लम्बे साँवले चेहरे पर बहुत खिल रहे थे। वह बात करते समय अपनी गरदन सीधी करती, तो उसकी लचक से मेरे शरीर में एक सिहरन-सी भर जाती। मुझे लग रहा था कि उसकी गरदन में उतनी लचक पहले मैंने कभी नहीं देखी। वह और दिनों की अपेक्षा बहुत प्रसन्न भी नज़र आ रही थी।

“तो?” हम दोनों जितने फ़ासले पर बैठे थे उतने फ़ासले से हम हाथ बढ़ाकर एक-दूसरे को छू भी सकते थे और कभी-कभी प्लेट पकड़ाते समय तो वह फ़ासला और भी कम प्रतीत होता था। मगर अचानक बीच में खामोशी का एक व्यवधान आ जाता और उसमें वह फासला काफ़ी बड़ा लगने लगता। फ़ासला कम होता था, तो मैं केवल उसी को देखता था। फ़ासला बढ़ जाता था, तो मुझे दूसरी बातों का भी ध्यान आने लगता था।

हम लोग खाना खा चुके थे। खाने के लिए मैंने जो ‘डिशें’ मँगवायी थीं, खाते समय मुझे खुद उनके नाम याद नहीं रहे थे। मैंने जान-बूझकर कुछ अपरिचित डिशों का ऑर्डर दिया था; कुछ तो सुषमा को प्रभावित करने के लिए और कुछ अपने-आपको ज़िन्दगी के एक और ही स्तर पर महसूस करने के लिए। बैरा आकर प्लेटें उठाने लगा, तो मैंने उससे कॉफ़ी लाने के लिए कह दिया। बैरा फिर भी झुका रहा, “कौन-सी कॉफ़ी सर? इटालियन फ़िल्टर, बेल्जियन फ़िल्टर, या...?”

“बेल्जियन फ़िल्टर।” मैंने बिना यह जाने कि इटालियन फ़िल्टर और बेल्जियन फ़िल्टर में क्या फ़र्क है, बहुत सरसरे ढंग से कह दिया और सुषमा की तरफ़ मुडक़र कहा, “तो हाँ...?”

हम लोगों को साथ-साथ बैठे लगभग पौन घंटा हो गया था। मगर जिस विषय पर मुझे बात करनी थी, उस विषय पर मैं तब तक नहीं आ सका था। वह जब भी मुसकराती थी, तो मुझे लगता था कि वह आशा कर रही है कि मैं अब उस विषय में बात करूँगा और मैं यह सोचकर टाल जाता था कि शायद यह नहीं, इसके बाद आनेवाला कोई क्षण उस बात के लिए ज़्यादा उपयुक्त होगा। हम दोनों आँखों ही आँखों में लगातार एक-दूसरे की टोह ले रहे थे और प्रतीक्षा कर रहे थे। खाना खाते समय जो एक बत्ती जल रही थी, कॉफ़ी आ जाने पर सुषमा ने उसे भी स्विच दबाकर बुझा दिया, जिससे हमारे वाली मेज़ बिल्कुल अँधेरे में घिर गयी। रिकॉर्ड पर हल्का वाद्य संगीत वातावरण के रहस्यमय प्रभाव को और भी बढ़ा रहा था। अँधेरे में सुषमा की बड़ी-बड़ी आँखें बहुत भावपूर्ण लग रही थीं और उनमें पहले से कहीं ज़्यादा चमक आ गयी थी। उसने बेल्जियन फ़िल्टर के ढक्कन उठाकर रख दिये और कॉफ़ी में चीनी मिलाने लगी। इन सब चीज़ों के बारे में वह नि:सन्देह मुझसे कहीं ज़्यादा जानती थी।

सवाल हम दोनों की आँखों में था जिसे टालते हुए हम ‘ला बोहीम’ की नेवाड़ी छत और फ़ानूसदार बत्तियों के बारे में, पिछले दिनों देखे हुए नृत्यों और नाटकों के बारे में और एक-दूसरे की टिप्पणियों और लेखों के बारे में बातें कर रहे थे। सुषमा को यह जानकर आश्चर्य हुआ था कि अपने पत्र में दिल्ली की गलियों के विषय में लेख मैंने लिखा था। उसे वह लेख बहुत पसन्द आया था। “उस लेख से सचमुच यह लगता था कि किसी ने उन गलियों में जाकर उन्हें बहुत पास से देखा है।” उसने कहा, तुमने उसमें जो एक बुड्ढे मुसलमान सितारवाले की बात लिखी थी, वह टच बहुत ही अच्छा था। क्या सचमुच ऐसा कोई शख्स तुम्हें वहाँ मिला था?”

मैंने कहना चाहा कि मैं उस शख्स से मिला ही नहीं, उसे बहुत पास से जानता रहा हूँ; बल्कि जिस घर में वह रहता है, उसी घर में कई महीने रहा भी हूँ, मगर यह बात मुझे उस समय की मानसिक स्थिति के अनुकूल नहीं लगी। मैं अपने प्रस्ताव की भूमिका के रूप में अपने को उस पुरानी ज़िन्दगी की याद नहीं दिलाना चाहता था। मैं जानता था कि वह एक ऐसा विषय है जो मेरे मन को सीधी पटरी से हटाकर गुमराह कर देता है। मैं उस समय गुमराह नहीं होना चाहता था, इसलिए मैंने उससे इतना ही कहा कि मैंने जो कुछ लिखा था कल्पना से नहीं लिखा था, हालाँकि मेरे ख़याल में सारा अध्ययन बहुत सतही और अधूरा था।

“यह सिर्फ़ तुम्हारी विनम्रता है, नहीं तो यह स्टडी तो मेरे ख़याल में...।” मैं जानता था कि वह जो कुछ कह रही है, उसका सीधा सम्बन्ध उस विषय से न होकर, जिसकी वह बात कर रही है, एक और ही विषय से है जिसकी बात अभी आरम्भ होने को है। मेरे लेखों की प्रशंसा वह उसी तरह कर रही थी जैसे हम किसी का घर किराये पर लेने के लिए जाएँ तो पहले उसके बच्चे की प्रशंसा करते हैं।

“तो...”

हम दोनों में जैसे एक खेल चल रहा था जिसमें ‘तो’ कहकर गेंद एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ फेंक दी जाती थी। दूसरा कुछ देर उधर से इधर की बातें करता था और फिर ‘तो’ के साथ गेंद उधर से इधर कर देता था।

“तुमने कहा था कि आज तुम कुछ गम्भीर बात करना चाहते हो।” आख़िर सुषमा ने ही उस विषय की ओर संकेत किया। मुझे खुशी हुई कि खेल का पहला दौर मेरे ही हाथ में रहा है।

“यह हल्का-हल्का संगीत कितना अच्छा लग रहा है!” मैंने अपनी जीत का मज़ा लेते हुए कहा, “दिल्ली में यह अपनी तरह की एक ही जगह है। मन होता है कि ऐसे और भी कई रेस्तराँ यहाँ हों।”

“यह तो है ही,” वह अपने में कुछ सिमट गयी। कुछ देर हम जैसे संगीत सुनने के लिए चुप रहे। उसके सफ़ेद कोट का आगे को उभरा हुआ भाग जल्दी-जल्दी हिल रहा था। उसकी साँस कुछ तेज़-तेज़ चल रही थी। जब रिकॉर्ड बदल गया, तो उसने कहा, “मैं भी एक बात तुम्हें बताना चाहती हूँ, मगर अभी नहीं बताऊँगी। तुम पहले अपनी बात कर लो, बाद में बताऊँगी।”

“नहीं, पहले तुम अपनी बात बताओ।”

“नहीं, पहले तुम बात कर लो।”

“मैं तो सिर्फ़ तुमसे मिलने का बहाना चाहता था। बात कुछ भी नहीं थी।”

“पहले तो मुझसे मिलने के लिए जैसे तुम बहाने की तलाश करते हो!”
 
वह मुसकरायी, तो उसका चेहरा थोड़ा लाल हो गया जिससे वह और भी सुन्दर लगने लगी। जाने उसकी कॉफ़ी में चीनी ठीक से नहीं मिली थी, या वैसे ही वह अपनी कॉफ़ी को चम्मच से हिलाने लगी। उसकी पतली-सी उँगली में रूबी की अँगूठी चमक रही थी। मैंने हाथ बढ़ाकर उस उँगली को हल्के से छू दिया और कहा, “तुम्हारी यह अँगूठी बहुत सुन्दर है!”

“शुक्रिया!” वह बोली, “वैसे कोई खास अच्छी तो नहीं है।”

“मुझे बहुत अच्छी लग रही है।”

“तो तुम्हें उतार दूँ?”

“मुझे पूरी आ जाएगी?”

“तुम्हें नहीं तो तुम्हारी पत्नी को पूरी आ जाएगी।” कहते हुए उसने अँगूठी उतार दी और अपनी हथेली पर रखकर मेरी तरफ़ बढ़ा दी। मैं पल-भर उसके हाथ को अपने हाथ में लिये रहा और उसकी आँखों में देखता रहता। “मेरी कोई पत्नी होगी, तभी तो उसे पूरी आएगी,” मैंने कहा।

“तुम रख लो,” वह बोली, “जब होगी, तब उसे पहना देना।”

“और तब तक?”

“तब तक इसे अपने सन्दूक में रख छोडऩा।”

“इतनी कीमती चीज़ मेरे सन्दूक में रहेगी, तो मेरे लिए रात को सोना मुश्किल हो जाएगा।” मैंने कहा और अँगूठी उसकी हथेली से उठाकर उसकी उँगली में पहना दी। “और सन्दूक की जगह यह यहीं ज़्यादा अच्छी लगती है।” अँगूठी पहनाते हुए मैंने महसूस किया कि उसकी उँगलियों का दबाव मेरी उँगलियों पर कुछ बढ़ गया है। अँगूठी पहना चुकने के बाद भी पल-भर हमारी उँगलियाँ आपस में उलझी रहीं। सुषमा जानती थी और मैं जानता था कि वही क्षण शायद हमारे लिए निर्णय का क्षण है।

“तुम्हारा ब्याह होगा, तो मैं यह अँगूठी अपनी तरफ़ से तुम्हारी पत्नी को उपहार में दे दूँगी।” वह बोली।

“और अगर मैं ब्याह से पहले ही यह उसे देना चाहूँ...?”

“तो तुम मुझसे माँग लेना।”

“और अगर मैं चाहूँ कि तुम्हीं इस अँगूठी को पहने रहो...?”

उसके सफ़ेद कोट का उतार-चढ़ाव पहले से भी तेज़ हो गया था। उसने कॉफ़ी की प्याली उठायी और ज़रा ऊपर तक ले जाकर फिर नीचे रख दी। उसकी उँगलियाँ जैसे इतनी अशक्त हो गयी थीं कि कॉफ़ी की प्याली का भार भी नहीं सँभाल सकती थीं। उसके चेहरे पर लालिमा की तहें गहरी होती जा रही थीं, जैसे साफ़ पानी में बार-बार एक रंग छिटक जाता हो और इससे पहले कि वह घुलकर विलीन हो जाए, उसमें और रंग आ मिलता हो। रंग के उस आक्रमण से थककर उसने पीछे टेक लगा ली। कुछ क्षणों के लिए वह प्रसिद्ध पत्रकार सुषमा श्रीवास्तव की जगह एक बहुत साधारण लडक़ी हो गयी। जाने सचमुच ऐसा था, या अँधेरे में मेरी कल्पना को ऐसा लग रहा था!

“मेरा ख़याल है अब हमें गम्भीर होकर बातें करनी चाहिए।” आखिर उसने अपनी थकान से संघर्ष करते हुए कहा।

“तुम्हें यह क्योंकर लगा कि अब तक हम गम्भीर होकर बातें नहीं कर रहे थे?”

मैं फिर मुसकराया। उसने भी मुसकराने की चेष्टा की, मगर अपनी थकान में ठीक से मुसकरा नहीं सकी।

“तुम आज बिल्कुल दूसरी तरह के मूड में हो।” उसने कहा।

“किस तरह के मूड में?”

“बिल्कुल और ही तरह के मूड में। मैं सोचती थी कि जाने ऐसी कौन-सी गम्भीर समस्या आ खड़ी हुई है जिसके बारे में तुम बात करना चाहते हो!”

मैंने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया, तो उसने चुपचाप अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया। मैं पल-भर उसकी उँगलियों को सहलाता रहा। फिर मैंने कहा, “क्या हम सचमुच एक गम्भीर समस्या के बारे में ही बातचीत नहीं कर रहे हैं?”

“तुम तो शरारत करते हो।” वह बोली।

“इसमें शरारत क्या है?”

“यह शरारत नहीं तो और क्या है?” कहते हुए उसने अपना हाथ छुड़ा लिया।

“तो तुम बताओ इस विषय में गम्भीर बात और किस तरह से की जाती है?”

“मुझे अभी विषय का ही नहीं पता, तो मैं तुम्हें यह कैसे बताऊँ?”

“तुम सच कहती हो कि तुम नहीं जानतीं कि हम किस विषय में बात कर रहे हैं?”

वह थोड़ा मुसकरायी और एक हाथ को दूसरे हाथ से सँभालती हुई थोड़ा आगे की तरफ़ झुक गयी।

“तुम यह गम्भीर होकर कह रहे हो?”

“बिल्कुल गम्भीर होकर कह रहा हूँ।”

“जितना तुम मुझे जानते हो, उसके बाद तुम्हारे मन में कहीं कोई शंका तो नहीं है?”

“मेरे मन में कोई शंका नहीं है। तुम मुझे अपने मन की बात बताओ।”

“मेरे मन की बात क्या तुम पहले से ही नहीं जानते?”

“फिर भी क्या कुछ बातें ऐसी नहीं हैं जो हमें और विस्तार से जान लेनी चाहिए?”

“जैसे?”

“जैसे कि हम लोग इसके बाद अपनी ज़िन्दगी को कैसी रूपरेखा बनाकर रहेंगे, कहाँ रहेंगे, किस तरह रहेंगे...?”

“हाँ-हाँ। इसी बारे में तो मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती थी। मैने समझा...तुम दूसरी बात के बारे में कह रहे हो।”

“दूसरी कौन-सी बात के बारे में?”

“एक-दूसरे के विषय में और विस्तार से जानने के बारे में।”

“मैं तुमसे एक बात पूछूँ?”

“पूछो।”

“तुम यह निश्चय हारकर एक समझौता करने के रूप में तो नहीं कर रहीं?”

वह पल-भर कुछ सोचती रही। जैसे मेरे शब्दों की तह में जाना चाहती हो। फिर बोली, “ऐसा होता, तो मैं तुमसे साफ़ कह देती। यूँ तो किसी आदमी को पूरी तरह उसके साथ रहकर भी नहीं जाना जाता...।”

“मगर क्या...?”

“मगर मैं इतना कह सकती हूँ कि जितनी बार मैं तुमसे मिली हूँ, मुझे लगा है कि तुम दूसरे लोगों से काफ़ी अलग हो और जिस तरह विश्वास और भरोसे के साथ मैं तुमसे बात कर सकती हूँ, उस तरह और किसी से नहीं कर सकती। आज तो खास तौर पर मुझे लग रहा था कि...।”

“क्या लग रहा था?”

“लग रहा था जैसे मैं अपने सबसे घनिष्ठ मित्र से बात कर रही हूँ।”

संगीत की एक लहर उधर की चमकती हुई मेज़ों के पास से भटकती हुई हमारे आसपास के अँधेरे में से होकर गुज़र गयी। उसके बाद कई एक लहरें साथ-साथ चली आयीं, जैसे कि कुछ देर से वे दूर ठिठकी हुई थीं, एक जगह स्तब्ध होकर हमें देख रही थीं और अब उन्होंने अपने आगे का बाँध तोड़ दिया था और तेज़ी से हमें चारों ओर से घेर लेने के लिए बढ़ आयी थीं। मुझे महसूस होने लगा कि उन लहरों में एक उन्माद है जो मेरे अन्दर भी प्रतिध्वनित हो रहा है। मगर उस प्रतिध्वनि में भी मेरे अन्दर की एक ध्वनि डूब नहीं पायी थी—बहुत गहरे से ऊपर को उठती हुई ध्वनि जो कि एक घायल होकर गिरे हुए पक्षी की तड़प की तरह थी—उस तड़प की तरह जो भूनकर और सजाकर प्लेट में रख दिये जाने पर भी उसके अन्दर से मिट नहीं पाती और छुरी से कटते हुए हर रेशे के अन्दर से बोल उठना चाहती है। वह तड़प किस चीज़ की थी? एक पुरानी कुचली हुई भावना की या किसी और चीज़ की?

मगर संगीत की लहरों के वेग में वह तड़प धीरे-धीरे डूबती जा रही थी। मैं उन लहरों में इस तरह खो रहा था कि उनकी लय उस समय मेरे विचारों की भी लय हो गयी थी। वह लय ही मेरे लिए सच थी और वह तड़प—वह एक झूठ था जो मेरे अन्दर से मुझे छलना चाहता था। मगर मैं इतना असावधान, इतना एडोलेसेंट नहीं था कि उसे अपने पर छा जाने देता। मेरा विवेक, मेरा तर्क, मेरा इतने वर्षों का अनुभव और उन सबसे ऊपर सुषमा का सहज व्यवहार, बहुत कुछ था जो मुझे उस अनुभव से बचाये रख सकता था। उस तरह के अनुभव में अपने को खो देने की किशोर स्थिति से मैं बहुत आगे आ चुका था। मैं अब उतना कच्चा नहीं था जितना दस वर्ष पहले था। मैं जानता था कि मैं जीवन में अबाध सुख की कामना नहीं कर सकता। मैं सुख को सुख के और दुख को दुख के रूप में पहचानता अवश्य था, उन दोनों से पैदा होनेवाले दर्द को भी जानता था, मगर सुख और दुख का दर्द अब कभी मेरे मन को उसकी सम्पूर्णता में नहीं छा सकता था। सुख और दु:ख के हर अनुभव में मेरे अन्दर का वयस्क पत्रकार सदा मुझे सचेत रखता था और जब भी मेरा मन भटकने लगता, तो मुझे बाँह से पकडक़र ठीक सडक़ पर ले आता था।

“तुम सच-सच बताओ तुम्हें कैसा लग रहा है?” उसने पूछा।

“मुझे?” मैंने वयस्क भाव से हँसकर कहा, “मुझे जैसा लग रहा है, वह मैं शब्दों में प्रकट नहीं कर सकता।”

इससे उसकी आँखों में एक ऐसा भाव उमड़ आया कि कई पल मैं सिर्फ़ उसकी तरफ़ देखता रहा। उसके कोट का उतार-चढ़ाव पहले से कुछ हल्का पड़ गया था। उसने एक बार अपने खुश्क हुए होंठों पर ज़बान फेरी और एकटक मेरी तरफ़ देखते हुए कॉफ़ी का प्याला उठाकर मुँह से लगा लिया।

“तो?” कुछ देर इधर-उधर भटककर हम फिर उसी ‘तो’ वाले कोर्ट में पहुँच गये।

“मेरा ख़याल है अब यहाँ से चला जाए।” वह बोली।

“अब कहाँ चलने का इरादा है?”

“यहाँ से मेरे यहाँ चलो। मुझे तुमसे जो बात कहनी है, वह वहीं चलकर बताऊँगी। तुम्हें अपना कमरा भी दिखा दूँगी। आज तक तुमने मेरा कमरा तो देखा ही नहीं। और बात वहीं बैठकर करेंगे। तुम्हें कहीं जाने की जल्दी तो नहीं है?”

“नहीं, मुझे क्या जल्दी होगी? मगर तुम पहले कहतीं, तो कॉफ़ी वहीं चलकर पीते।”

“अब भी तो पी सकते हैं। मेरे पास अपना पर्क्युलेटर है।”

“पर्क्युलेटर से ज़्यादा बड़ी बात यह है कि तुम अपने हाथ से बनाओगी।”

इस पर वह खुलकर हँस दी। उसके दाँत बहुत छोटे-छोटे और सफ़ेद थे, खूब तीखे और चिकने, जैसे सान पर तेज़ किये गये हों। “कितनी पुरानी बातें हैं,” वह बोली, “फिर भी कितनी अच्छी लगती हैं! वैसे सभी पुरुष इस तरह की बातें कहते हैं।”

“यह तुमने कैसे सोच लिया कि मैं सभी पुरुषों में से नहीं हूँ?”

“लगते तो नहीं हो।”

“सच?”

वह फिर एक बार हँस दी। मैंने बैरे से बिल लाने के लिए कह दिया।

कॉन्सीक्यूशन-हाउस में पहली मंज़िल पर उसका कमरा था। वैसे बड़े कमरे के साथ एक छोटा कमरा भी था। हर चीज़ बहुत साफ़, उजली और करीने से रखी हुई थी।

“तुम बहुत ढंग से रहती हो।” मैंने उससे कहा, “कभी मेरा कमरा देखो, तो तुम्हें लगेगा कि वह कमरा नहीं, एक गोदाम है।”

“ऐसा कैसे हो सकता है?” वह बोली, “तुम यूँ ही मुझे बना रहे हो।”

“मैं बना नहीं रहा, सच कह रहा हूँ।” मैंने कहा, “तुम कभी चलकर देखो, तो खुद ही कहोगी।”

“मैं यह बात मान ही नहीं सकती।”

“तुम नहीं मानना चाहो, तो मैं ज़बरदस्ती तो नहीं मनवा सकता, मगर असलियत वही है जो मैं तुमसे कह रहा हूँ।”
 
“अब यूँ ही बात मत किये जाओ। तुम्हारे जैसा कल्चर्ड आदमी अपने कमरे को गोदाम बनाकर रहता होगा!”

“हो सकता है मैं उतना कल्चर्ड नहीं हूँ जितना तुम समझती हो।”

“अच्छा ठीक है, मैं मान लेती हूँ। आज तो तुम जो कुछ भी कहोगे, मैं सब मान लूँगी।”

मैंने सोफ़े पर बैठकर अपनी टाँगें सामने की तिपाई पर फैला दीं। “तुम्हें एतराज तो नहीं है?” मैंने मुसकराकर पूछा।

“मैं जानती हूँ तुम यह सब क्यों कर रहे हो।” वह कोट उतारती हुई बोली, “मगर मुझे तुम्हारी किसी बात पर एतराज नहीं है।”

“वैसे तुम्हें यह अच्छा नहीं लगता न?”

“तुम्हें अच्छा लगता है?”

मैंने अपनी टाँगें समेट लीं। कोट उतार देने पर उसके शरीर का उभार उतना सुडौल नहीं रहा जितना कोट पहने हुए लगता था। शायद उसका ब्लाउज़ एक साइज़ ढीला था। मैंने उसके चेहरे की तरफ़ देखा, तो वहाँ भी हल्की-हल्की लकीरें खिंच आयी थीं। शायद इसलिए कि वह पैदल वहाँ तक आने से थक गयी थी, या शायद इसलिए कि उसे मेरे व्यवहार से कुछ निराशा हुई थी। एक कारण यह भी हो सकता था कि घर के वातावरण में आकर हर चेहरा अपना ऊपरी लिबास उतारकर अपने को वैसे ही ढीला छोड़ देता है। मगर सिर्फ़ कोट उतार देने से किसी के आकार-प्रकार में इतना फ़र्क़ पड़ सकता है, यह बात उस समय मुझे कुछ विचित्र-सी लगी।

“मैं कॉफ़ी रख दूँ, अभी आती हूँ।” कहकर वह पीछे के छोटे कमरे में चली गयी। जब वह लौटकर आयी, तो उसने नाइट सूट के साथ नीला धारीदार ड्रेसिंग गाउन पहन रखा था और बालों की पिनें निकालकर उन्हें बहुत ढीले-ढाले ढंग से लपेट लिया था। ड्रेसिंग गाउन में उसके शरीर की सब गोलाइयाँ छिप गयी थीं और ढीले बालों से उसका चेहरा एक सियामी गुडिय़ा के चेहरे जैसा लग रहा था।

“मुझे कुछ देर लग गयी।” उसने आकर कहा, “कॉफ़ी अभी दो-चार मिनट में हुई जाती है। मेरा ख़याल है मैं कॉफ़ी ले आऊँ, तो एक ही बार आकर बैठूँ।”

जब तक वह कॉफ़ी लेकर आयी, तब तक मैं उसके कमरे की साज-सजावट को देखता रहा। एक तरफ़ ताँबे का हंसों का जोड़ा रखा था। दूसरी तरफ़ प्लास्टर ऑफ़ पैरिस की स्याह मूर्ति थी—दो अस्पष्ट आकृतियों के सम्मिलन का छायाभास देती हुई। दीवार पर लगे चित्रों में कहीं दो पेड़ थे और कहीं दो जिराफ़। बिस्तर के पास तिपाई पर डचेस ऑफ़ विंडसर की आत्मकथा रखी थी ‘द हार्ट हैज़ इट्स रीज़न्स’।

“तुम आजकल डचेस की आत्मकथा पढ़ रही हो?” उसने कॉफ़ी प्यालों में डाल दी, तो मैंने पूछा।

“हाँ,” वह बोली, “मैं पहले भी एक बार पढ़ चुकी हूँ। मुझे यह पुस्तक बहुत अच्छी लगती है।”

“तुम जब कॉफ़ी बना रही थीं, तो जानती हो मैं क्या देख रहा था?”

“क्या देख रहे थे?”

“देख रहा था कि तुमने अपने कमरे की सजावट के लिए जितनी चीज़ें चुनी हैं, उनमें सब तरह के जोड़े इकट्ठे कर रखे हैं। पेड़, पशु, पक्षी और इन्सान, सबके जोड़े यहाँ हैं।”

उसने एक बार आश्चर्य के साथ कमरे की सब चीज़ों पर नज़र दौड़ायी और हँसकर बोली, “मैंने इस नज़र से इन चीज़ों को कभी नहीं देखा।”

“और मैं हैरान हो रहा था कि फिर भी तुमने आज तक अपने लिए इस तरह की अकेली ज़िन्दगी क्यों चुन रखी है।”

“मैंने यह ज़िन्दगी चुन रखी है?” उसके स्वर में कुछ कटुता आ गयी जिससे उसके चेहरे की लकीरें और स्पष्ट हो उठीं, “मैं कब से इस ज़िन्दगी से तंग आ चुकी हूँ।” उसने अपने सिर को झटक लिया जिससे उसका ढीला जूड़ा खुल गया। उसने अपने सारे बालों को दाएँ कन्धे पर ले लिया।

“मगर तुम चाहतीं, तो तुम बहुत पहले ही इस ज़िन्दगी को नहीं बदल सकती थीं?”

“पहले तो खैर मैं इस तरफ़ ध्यान ही नहीं देती थी।” वह बोली, “मगर एक-डेढ़ साल से जब से मैंने इस विषय में सोचना शुरू किया है, तब से मुझे लगता रहा है कि...।” वह सहसा रुककर बहुत गम्भीर दृष्टि से मेरी तरफ़ देखने लगी।

“हाँ-हाँ...।”

“मुझे लगता रहा है कि अपने आसपास जितने भी पुरुषों को मैं जानती हूँ, वे सब के सब...।”

“वे सब-के-सब क्या हैं? दरिन्दे?”

“यह तो बहुत कोमल शब्द हैं।” वह बोली, “दरिन्दों में तो फिर भी एक-दूसरे के लिए कुछ भावना होती होगी।” उसकी आँखें उस समय एक आईने की तरह हो गयी थीं जिसमें मैं अपना चेहरा देखने का प्रयत्न कर रहा था कि मैं उसे क्या नज़र आ रहा हूँ। क्या वह आँखों ही आँखों से मेरे अन्दर भी उस वनमानुस को पहचानने का प्रयत्न कर रही थी जिसके बारे में वह मुँह से शिकायत कर रही थी।

“अगर तुम्हें यही लगता रहा है, तो क्या अब तुमने इस चीज़ को स्वीकार कर लिया है या...?”

“स्वीकार कर सकती, तो मेरे मन में इतनी कड़वाहट न रहती।” वह बोली।

“मगर मुझे अपने मन में कहीं यह विश्वास भी रहा है कि यही सचाई नहीं है।”

“तो आज तुम क्या सोचती हो?”

वह हँस दी, “तुम क्या मुझसे अपनी तारीफ़ सुनना चाहते हो?” गरम कॉफ़ी ने उसके होंठों से लिपस्टिक के रंग को काफ़ी हद तक हटा दिया था जिससे उन पर एक अस्वाभाविक-सा रंग उठ आया था।

“न जाने पुरुषों के हृदय में स्त्रियों को लेकर इतनी कड़वाहट क्यों नहीं होती?” मैंने कहा।

“अभी उतना नहीं जानती...” मैंने उसके लिए वाक्य पूरा कर दिया।

“तुम अभी यहाँ आये नहीं कि आते ही इस तरह की बातें करने लगे?” वह सहसा उठती हुई बोली, “मैं आज के दिन तुमसे कोई ऐसी बात नहीं सुनना चाहती जिससे मेरा मन उदास हो। मैं चाहती हूँ कि हम सचमुच गम्भीरतापूर्वक कुछ बातें कर लें।”

“तुम मुझे क्या बताना चाहती थीं?”

“मैं अभी तुम्हें बताती हूँ। यह रोशनी तुम्हारी आँखों को चुभती तो नहीं है?”

“नहीं तो...।”

“मगर मेरी आँखों को चुभती है। तुम्हें बुरा न लगे, तो मैं हल्की रोशनी जला दूँ?”

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं?”

उसने बीच की रोशनी बुझाकर कोने की तरफ़ का ज़ीरो बल्ब जला दिया। कमरे के वातावरण में एक रूमानी अलसता फैल गयी। वह आकर कुरसी पर बैठी, तो मुझे लगने लगा जैसे छत और दीवारें भी ज़रा पास-पास को सिमट आयी हों। मुझे याद हो आया कि हरबंस ने मेरे साथ अपने विषय में बातें की थीं, तो उसने भी अपने चारों तरफ़ इसी तरह झुटपुटा-सा कर लिया था। क्या वास्तव में अँधेरा जिस तरह की आत्मीयता को जन्म देता है, वह उजाले में नहीं बन सकती? अँधेरे में शायद इन्सान दबे पैरों अपने अन्दर उतरता जाता है, उतरता जाता है; जैसे वह किसी ग़ैर के घर में चोरी के लिए दाख़िल हुआ हो और अपने अन्दर से सब कुछ बाहर निकाल लाता है। और उजाला हो, तो वह उस चोर गली की तरफ़ मुँह करते भी कतरा जाता है।

कमरे की वह रूमानी अलसता सुषमा के चेहरे के गम्भीर भाव के लिए बहुत उपयुक्त पृष्ठभूमि की तरह लग रही थी। वह लेटने की तरह कुरसी पर नीचे को सरक गयी और उसकी बाँहें कुरसी की बाँहों पर इस तरह ढीली हो गयीं जैसे शरीर के साथ उनका कोई सम्बन्ध ही न रहा हो।

“तुम नहीं जानते मधुसूदन कि मैं अब तक कितनी थक चुकी हूँ।” वह बोली। “मैं पहले इस बात का बहुत पक्षपात करती रही हूँ कि एक लडक़ी को बिल्कुल स्वतन्त्र जीवन बिताना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के साथ बँधकर उसके शासन में रहना मुझे बहुत गलत लगता था। और तुम जानते हो कि हर पुरुष किसी न किसी रूप में स्त्री पर शासन करना चाहता है। मैं सोचती थी कि मैं एक अपवाद बन सकती हूँ। पुरुषों के शासन से बचकर उन्हें अपने शासन में रख सकती हूँ। मैंने इसका प्रयोग करना चाहा, तो वह प्रयोग मुझे काफ़ी हद तक सफल भी लगा। मुझे लगा कि मैं जिस किसी को चाहूँ, अपने इशारे पर नचा सकती हूँ। मैंने कुँआरी रहकर ज़िन्दगी काटने वाली लड़कियों के रूखे चेहरे देखे थे और मुझे लगता था कि उन्हें वास्तव में जीना नहीं आता। मगर बहुत जल्द मुझे लगने लगा कि मैं जिसे अपना शासन समझती हूँ, वह भी शासन नहीं, एक माँग है, और वह माँग सदा मुझी को हीन करती है जिससे दूसरा अपने को जाने क्या समझने लगता है! क्योंकि मुझे यह स्थिति स्वीकार्य नहीं थी, इसीलिए मैं अपनी ऊँचाई बनाये रखने के लिए सदा अपनी माँग से लड़ती रही हूँ। मैं जानती हूँ कि लोग मेरे बारे में कई तरह की बातें करते हैं, मगर सच यह है कि मैंने आज तक अपने को किसी पुरुष के सामने हीन नहीं होने दिया; किसी को अपनी कमजोरी का फ़ायदा नहीं उठाने दिया। मैं सोचती रही हूँ कि एक दिन मैं या तो उस माँग से ऊपर उठ सकूँगी, या कोई ऐसा उपाय ढूँढ़ लूँगी जिससे मैं अपने को हीन किये बिना उसे पूरी कर सकूँगी। मगर सच बात यह है कि दोनों में से कोई भी बात नहीं हुई और मैं आज तक अपने से लड़ती हुई जहाँ की तहाँ खड़ी हूँ। मैं आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती थी, इसलिए मैंने आर्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त की; अकेली रहना और खुद अपने लिए कमाना सीखा। पुरुषों में स्त्रियों के प्रति जो संरक्षणात्मक भाव रहता है, वह मुझे बरदाश्त नहीं था, इसलिए मैंने ऐसा काम चुना जिसमें मैं अपने को किसी भी पुरुष के बराबर सिद्ध कर सकूँ। मैंने एक पत्रकार के रूप में किसी पुरुष से कम काम नहीं किया और कम अनुभव प्राप्त नहीं किया। मगर फिर भी इधर काफ़ी अरसे से मुझे लग रहा है कि मेरी सफलता में ही कोई चीज़ ऐसी है जो मुझे तोड़ रही है। मैंने अपने को टूटने से बचाने के लिए भी काफ़ी संघर्ष किया है। मगर अब ज़्यादा संघर्ष भी मेरे बस का नहीं रहा। मुझे किसी-किसी समय लगता है कि मैं अन्दर से चाहती हूँ कि मैं टूट जाऊँ। यह परिस्थितियों के कारण है या अपने अन्दर की ही किसी कमजोरी के कारण, मैं नहीं जानती। मैं बस इतना जानती हूँ कि मैं अपने वर्तमान से बाहर आना चाहती हूँ। इसलिए मैं सोच रही थी कि दो-तीन साल के लिए विदेश चली जाऊँ, तो शायद उससे मेरे अन्दर की समस्या कुछ हल हो जाए। मगर उसमें भी मुझे एक डर लगता था। और उस डर से बचने के लिए ही मैं चाहती थी कि अगर जाना हो, तो अपने को यहीं से सुलझाकर जाऊँ। नहीं तो यह न हो कि...।”

उसके आत्मविश्वास की तह में इतनी थकान छिपी होगी, इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। “क्या न हो?” मैंने अपने प्याले को सॉसर में घुमाते हुए पूछा।

“यही कि वहाँ जाकर भ्रम का आखिरी शीशा भी टूट जाए और मुझे महसूस हो कि मैं एक सुनसान जगह से बचने के लिए दूसरी उससे भी सुनसान जगह पर पहुँच गयी हूँ। मैं अब रिस्क नहीं लेना चाहती। मुझे कई बार ज़िन्दगी इतनी डरावनी लगती है कि मैं उससे बचकर एक छोटे-से कोने में दुबक रहना चाहती हूँ। एक पत्रकार के रूप में तुमने भी महसूस किया होगा कि ज़िन्दगी का सारा ढाँचा—युद्ध, राजनीति और बड़े-बड़े भयानक अस्त्र—यह सब कुछ कितना भीषण और कितना अमानुषिक है! मैं इस सबको बस रोज़ी का साधन मानना चाहती हूँ और अपने लिए एक छोटा-सा घर बनाकर रहना चाहती हूँ जहाँ से मुझे ज़िन्दगी की दीवारें इस तरह हिलती नज़र न आयें। मैं अपने आसपास छोटे-छोटे सुख के साधन जुटाकर और सब कुछ भूल जाना चाहती हूँ। मेरे अन्दर बहुत महत्त्वाकांक्षा रही है, मगर अब मुझे उस महत्त्वाकांक्षा से भी डर लगता है। मैं उन्नति करना चाहती हूँ, उतनी ही जितनी कि कोई भी कर सकता है, मगर उससे पहले मैं अपने लिए सुख चाहती हूँ, सुख जो एक छोटे-से घर मे ही मिल सकता है, जहाँ मैं एक छोटा-सा बाग लगा सकूँ और एक-एक पौधे को सींचकर बड़ा कर सकूँ, उसकी हर नयी पत्ती को देखकर खुश हो सकूँ और किसी से कह सकूँ कि देखो आज उस पौधे में एक नयी पत्ती निकली है। मैं कभी इस तरह की भावुकता का मज़ाक उड़ाया करती थी, मगर अब मुझे लगता है कि मैं अपने अन्दर वह सभी कुछ चाहती हूँ जिसका कि मैं मज़ाक उड़ाती थी।”

वह बोलते-बोलते थककर चुप हो गयी। उसकी बाँहें उसी तरह निर्जीव-सी पड़ी थीं। बल्कि उसका सारा शरीर ही निर्जीव-सा लग रहा था। उसकी आँखों में एक कातरता थी—उस कबूतर की-सी कातरता जो घायल होकर पड़ा हो और अपनी तरफ़ बढ़ते हुए हाथों को देखकर सोच रहा हो कि वे उसे बचानेवाले हाथ हैं या झिंझोड़ देनेवाले हाथ हैं।
 
“तुम इस समय सचमुच बहुत थकी हुई लग रही हो,” मैंने कहा।

“मैं लगभग एक-डेढ़ साल से इसी तरह थकी हुई महसूस कर रही हूँ।” वह अपने को थोड़ा सँभालने की चेष्टा करती हुई बोली, “ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं, मुझे लगता है कि मैं अपनी बेबसी में एक डरावनी घाटी में नीचे-नीचे उतरती जा रही हूँ। मैं जितना चाहती हूँ कि उस रास्ते से लौट चलूँ, उतना ही अपने को घाटी के नज़दीक पहुँचते हुए पाती हूँ।”

“इस तरह की स्थिति में अक्सर लोग अपने मन को बहलाने के लिए धर्म और ईश्वर की बात करने लगते हैं। नहीं?”

“मैं इन सब ढकोसलों से नफ़रत करती हूँ,” कहते हुए वह कुछ उत्तेजित हो उठी और उत्तेजना से उसकी निर्जीवता बहुत कुछ कम हो गयी। “तुम इनमें विश्वास करते हो?”

“मैं इन चीज़ों के बारे में कभी सोचता ही नहीं, विश्वास करने की तो बात ही अलग है।” मैंने कहा।

“क्या तुम समझते हो कि जीवन में कोई ऐसा भी मूल्य है जिस पर आदमी अपने मन को स्थिर रख सके?” वह उसी कटुता के साथ बोली, “कोई भी ऐसी चीज़ है जिसका दामन पकडक़र आदमी खड़ा रह सके? मुझे लगता है कि जितने लोग इस तरह की बातें करते हैं वे या तो अपने को धोखा देना चाहते हैं, या दूसरों को। इस तरह उन्हें ज़िन्दगी बिताने के लिए एक अच्छा स्वाँग भी मिल जाता है।”

“तो तुम्हें लगता है कि जीवन में किसी तरह का कोई मूल्य है ही नहीं?”

“बिल्कुल नहीं। अगर कोई मूल्य है तो इतना ही कि हर इन्सान अपने लिए थोड़ा-बहुत सुख जुटाकर किसी तरह जी लेना चाहता है,जैसे मैं चाहती हूँ, तुम चाहते हो और हमारे आसपास सब लोग चाहते हैं।”

“मगर हर इन्सान के अन्दर स्नेह, सहानुभूति और सौन्दर्य की जो एक भूख होती है...।”

“ये सब कोरे शब्द हैं जिनका कभी अर्थ रहा होगा, आज कोई अर्थ नहीं है।”

“मगर हर इन्सान दूसरे पर निर्भर तो रहना चाहता ही है...।”

“हाँ, मगर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और सुख के लिए ही। अन्दर से हर इन्सान बहुत छोटा और बहुत स्वार्थी है। और आज ही नहीं, सदा से ऐसा रहा है। मुझे किसी के मुँह से ये खोखले शब्द सुनना अच्छा नहीं लगता। तुम्हारे मुँह से तो बिल्कुल ही नहीं।”

“तो इसका तो यह मतलब है कि जीवन में तुम किसी तरह की आस्था का कोई स्थान ही नहीं मानतीं?”

“वह मैं नहीं जानती।” कहते हुए उसने पल-भर के लिए आँखें मूँद लीं, “मैं कितना चाहती रही हूँ कि जीवन में मुझे किसी तरह की आस्था मिल जाये, मगर उसकी जगह जो कुछ मिल रहा है, वे हैं कोरे शब्द। सदियों से लोग एक-दूसरे को छलने के लिए इन झूठे शब्दों का प्रयोग करते आये हैं और अब भी करते जा रहे हैं। मैं पहले अपने लिए इनमें एक शब्द ढूँढना चाहती थी। मगर अब मैं इन सब शब्दों से अपना पिंड छुड़ाना चाहती हूँ। ये शब्द केवल हमारे सुख में बाधा ही डाल सकते हैं। मुझे इस तरह के सब शब्दों से नफ़रत है। मैं अपने लिए अब एक छोटा-सा घर चाहती हूँ, बस!”

कुछ देर हम दोनों चुप रहे। कमरे की छत और दीवारें धीरे-धीरे और पास घिर आयी थीं। अँधेरा कन्धों पर उठाये हुए हल्के बोझ की तरह लग रहा था। सुषमा शायद मेरे चेहरे में खोज रही थी कि जो कुछ वह चाहती है, क्या वह उसे इस सामने बैठे हुए व्यक्ति से मिल सकता है?

“तुम सहसा उदास क्यों हो गये?” उसने अपनी कुहनियों पर झुककर पूछा।

“नहीं, मैं उदास नहीं हूँ।” मैंने अपने को झटककर थोड़ा सचेत कर लिया।

“मैं तुम्हें अपने साथ लायी थी कि तुम्हें एक खुशी की बात बताऊँगी।” वह बोली, “और उसकी जगह मैंने अपनी बातों से तुम्हें उदास कर दिया है। मगर यही तो मैं समझ नहीं पाती कि जो समय हमें सुख की खोज में बिताना चाहिए, उसे हम दुख को टटोलने में क्यों गँवा देते हैं? तुम हाथ देखना जानते हो?” कहते हुए उसने अपनी हथेली मेरे सामने फैला दी।

“नहीं,” मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। फिर पूछा, “तुम हस्त-रेखाओं में विश्वास करती हो?”

“कभी करती थी।” उसने कहा, “अब किसी चीज़ में भी नहीं करती। तुम करते हो?”

“नहीं। मैं पहले भी नहीं करता था। मगर तुम विश्वास नहीं करतीं तो तुमने मुझसे पूछा क्यों था?”

“मैं अपना हाथ तुम्हारे हाथ में देने के लिए कोई बहाना चाहती थी।”

हमारे हाथों की उँगलियाँ आपस में उलझ गयीं और काफ़ी देर तक उलझी रहीं। फिर हल्के से दबाव से मैंने उसे अपनी तरफ़ खींच लिया, तो वह काफी आगे तक झुक आयी। मैंने उसका हाथ छोड़ दिया और धीरे-से उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में ले लिया, “तुम इस समय बहुत सुन्दर लग रही हो।” मैंने कहा।

“यह इसलिए कि मैं इस समय तुम्हारे बहुत पास हूँ और तुम्हारे हाथ आसानी से मुझ तक पहुँच सकते हैं।”

इससे उसके चेहरे पर मेरे हाथों का दबाव कुछ कम हो गया और मैं थोड़ा पीछे को हट गया।

“तुम तो इतनी-सी बात से पीछे हटने लगे।” कहते हुए उसने अपने दोनों हाथ मेरे हाथों पर रखकर उन्हें अच्छी तरह अपने चेहरे के साथ दबा लिया। “तुम्हारे हाथ बहुत गरम हैं।” उसने कहा।

“तुम्हारा चेहरा ठंडा है, शायद इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है।”

“शायद,” कहकर उसने मेरे हाथों को और भी दबा लिया। कुछ क्षण इसी तरह बीत जाने के बाद उसने फुसफुसाने के स्वर में कहा, “मधु!”

मेरा शरीर रोमांचित हो उठा। बचपन के बाद पहली बार किसी ने मुझे इस नाम से सम्बोधित किया था। “तुम तो बिल्कुल बच्ची-सी लग रही हो।” मैंने कहा।

“मुझे अब जीवन में इतना ही चाहिए कि किसी के सामने हमेशा इस तरह बच्ची-सी बनी रहूँ।”

मेरे होंठ आगे को झुक गये। उसकी गरम साँस मेरी साँस से टकराने लगी।

“तुम हो ही बिल्कुल बच्ची-सी।” मैंने कहा और कुछ क्षणों के लिए जीरो बल्ब की रोशनी भी आँखों से ओझल हो गयी। दीवारों ने जैसे बहुत पास आकर हमें ऊपर से ढक लिया और हम एक अँधेरे गुम्बज में एक-दूसरे के स्पर्श में खोये रहे। जब मेरे होंठ उसके होंठों से हटे, तो मुझे लगा जैसे उनकी जड़ें वहीं रह गयी हों और मैंने केवल उन्हें ऊपर से तोडक़र अलग कर लिया हो। मुझे यह भी महसूस नहीं हुआ कि इस बीच मेरे हाथ उसके नाखूनों से छिल गये हैं। एक बहुत तेज़ साँस फिर मुझे अपने में लपेट लेने के लिए बहुत पास-पास आ रही थी। मैं उस साँस के पाश में खिंचता जा रहा था। “ज़िन्दगी सचमुच कितनी अच्छी हो सकती है मधु, अगर हम...” उसने फिर फुसफुसाकर कहा और अँधेरा पहले से भी स्याह होकर घिर आया। जड़ों से उखड़े हुए फूल फिर अपनी जड़ों से जा मिले और बीच की तिपाई भी हमारे बीच से हट गयी। कबूतर के पंखों का एक नरम-नरम बोझ मेरे ऊपर लद गया और मैं उस बोझ के नीचे अपने को बिल्कुल भूलने लगा। कुछ देर लगता रहा जैसे अँधेरे की जगह हम गहरे पानी में डूबे हों और वह पानी अपनी गहराई के हल्के बोझ से हमें सहलाता हुआ ऊपर से गुज़रता जा रहा हो और पानी में तैरती हुई मछलियाँ शरीर से टकरा-टकरा जाती हों और साँसों की रस्सियाँ हाथ-पैरों को कसती जा रही हों। एक लहर गुज़रने से पहले ही दूसरी लहर उमड़ आती हो, फिर तीसरी, और पानी हमें ऊपर-ऊपर अपनी सतह की तरफ़ उठाये लिये जा रहा हो। “मधु!” पाश की तरह कसती हुई साँसें धीरे-धीरे कह रही थीं, “मैं जीवन में अब अपने छोटे-से सुख के अलावा और कुछ नहीं चाहती, कुछ नहीं, बिल्कुल कुछ नहीं...।”

“तुम अपने को इतनी बेबस क्यों समझती हो शमी?” मैंने कहा, “तुममें तो इतना आत्म-विश्वास है, इतनी सामर्थ्य है।”

“वह सब झूठ है।” वह बोली, “मैं अब यहाँ से चली जाना चाहती हूँ, बस। मगर अकेली नहीं, तुम्हें साथ लेकर। यही बात थी जो मैं तुम्हें बताना चाहती थी।”

“मगर तुम कहाँ जाने की बात कर रही हो?”

उसने देश का नाम लिया, तो मैं एकदम चौंक गया। मेरी आँखों के सामने सहसा पोलिटिकल सेक्रेटरी का चेहरा घूम गया। “मुझे तीन साल के लिए वहाँ से नौकरी का ऑफ़र मिला है।” वह बोली, “मैंने उनसे कहा था कि मैं शायद शादी करके ही यहाँ से जाना चाहूँ। उन लोगों ने मुझे प्रॉमिस किया है कि मेरे हस्बैंड के लिए भी वे वहाँ नौकरी की व्यवस्था कर देंगे...।”

एकाएक न जाने कैसे गुम्बज की दीवारें टूट गयीं, अँधेरे में उठती हुई लहरें रुक गयीं और ज़ीरो बल्ब फिर अपनी जगह पर जल उठा।

“क्या बात है, मधु?” सुषमा ने बिना ज़रा भी हिले-डुले पूछा।

“कुछ नहीं।” मैंने कहा, “मेरा सिर कुछ चकरा रहा है। मैं थोड़ा पानी पिऊँगा।”

“मैं अभी तुम्हें पानी ला देती हूँ,” कहकर वह कुछ अनमने भाव से मुझसे अलग हो गयी। कुछ ही क्षणों में कमरे की बीच की बत्ती जल उठी, तो जैसे सभी कुछ बदल गया। लहरों और मछलियों की दुनिया से मैं सहसा कॉन्सीक्यूशन हाउस के पहली मंज़िल के कमरे में पहुँच गया। वही ताँबे की मूर्तियाँ और वही दीवारों के चित्र—या अभी-अभी केवल उन चित्रों में एक की वृद्धि ही नहीं हुई थी? मगर वे चित्र जितने स्थायी थे, क्या यह चित्र भी उतना स्थायी हो सकता था?

वह पानी का गिलास ले आयी, तो मुझे उसकी आँखों से लगा कि वह मुझे एक सन्देहपूर्ण दृष्टि से देख रही है। उसका ड्रेसिंग गाउन उसके शरीर पर नहीं था; जब वह मेरे पास से उठकर गयी थी, तब भी नहीं था। वह उसने कब उतार दिया था, यह मैं सोचकर भी नहीं सोच सका। नाइट सूट और बिखरे हुए बालों से वह उस समय कनॉट प्लेस के किसी शो-केस की आकृति जैसी लग रही थी—उसका मानवीय रूप उसके अंगों की कोमलता तक ही सीमित था। उसने गिलास मुझे देकर कुरसी पर बिखरा हुआ अपना नाइट गाउन उठा लिया और बाँहें फैलाकर उसे पहनने लगी।

“क्षमा करना।” मैंने कहा, “मुझे अचानक ही एक जलन-सी महसूस होने लगी थी। न जाने क्यों? शायद बहुत ज़्यादा कॉफ़ी पीने की वजह से...!”

“अच्छा?” मगर बुझे हुए स्वर में उसके ‘अच्छा’ कहने में एक व्यंग्य भी था और अविश्वास भी।

मैंने पानी पीकर गिलास रख दिया और अपने दोनों हाथों की उँगलियाँ आपस में उलझा लीं, “तुमको ज़रूर बुरा लगा है।” मैंने कहा।

“नहीं, मुझे क्यों बुरा लगता?” वह बहुत दूर से तटस्थता के साथ बोली, “यह सब बहुत ही स्वाभाविक है।”

“क्या स्वाभाविक है?”

“मेरा मतलब है कि कई बार आदमी को इस तरह की जलन या घुटन का अनुभव होने लगता है। इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है।”

“मगर मैंने घुटन की बात तो नहीं कही थी।”

“हाँ, तुमने सिर्फ़ जलन की बात कही थी। मुझे अफ़सोस है मैंने अपनी तरफ़ से एक और शब्द जोड़ दिया।”

“तुम मुझसे नाराज़ हो गयी हो!” उसके चेहरे पर ऐसी जड़ता भी आ सकती है, यह भी मेरे लिए एक नया अनुभव था। उसकी इस समय की निर्जीवता कुछ समय पहले की निर्जीवता से कितनी भिन्न थी!

“नहीं, मैं नाराज़ क्यों हूँगी? वह एक क्षण की कमज़ोरी थी जो क्षण बीतने पर दूर हो गयी।”

“तुम मुझे ग़लत समझ रही हो।” मेरा मन हुआ कि उसे बता दूँ कि मेरी अनुभूति में न्यूनता नहीं आयी थी, परन्तु मुझे सहसा एक ऐसा चेहरा दिखायी दे गया था जिसने मेरे लिए उस अनुभूति का रूप बिल्कुल बदल दिया था। मेरा यह भी मन हुआ कि जिस तरह कुछ देर पहले वह मुझसे अपने बारे में बात कर रही थी, उसी तरह मैं उससे अपने बारे में बात करने लगूँ और जो-जो बातें मेरे मन में उठ रही हैं, वे सब उसे बता दूँ और कहूँ कि हमें एक छोटा-सा घर बनाकर रहना है, तो क्यों हम यहीं रहकर ऐसा नहीं कर सकते? मगर यह सब कहने के लिए मैं उसकी आँखों में जो भाव देखना चाहता था, उस भाव का वहाँ स्पर्श भी नहीं था।

“स्त्रियाँ हमेशा ही पुरुषों को ग़लत समझती हैं।” उसने कहा।

“हमेशा तो नहीं, मगर कभी-कभी बहुत ग़लत समझती हैं।”

वह चुप रहकर कुछ देर सूनी आँखों से दीवार की तरफ़ देखती रही। फिर सहसा जैसे अपने को समेटती हुई बोली, “मुझे लगता है मुझे जितनी दूर तक जाना चाहिए था, मैं उससे बहुत आगे चली गयी थी।”

“अर्थात्?” मैं जानता था कि वह क्या कह रही है, मगर मैं चाहता था कि किसी तरह हम लोगों से पहले की-सी सहजता लौट आये।

“अर्थात् कुछ नहीं। तुम्हें और पानी ला दूँ?” उसके चेहरे ने एक बहुत ही शिष्ट और अभिजात रूप ग्रहण कर लिया था।

“नहीं।”

“तो...?”

“मेरे ख़याल में उचित यह होगा कि हम फिर किसी समय मिलकर इस बारे में बात करें। इस मन:स्थिति में शायद मैं अपनी बात तुम्हें ठीक से समझा नहीं सकूँगा।”

“ठीक है।” वह बोली, “तुम्हें जब भी सुविधा हो, तुम फ़ोन कर लेना। संक्षेप में बताने की बात हो, तो चाहे फ़ोन पर ही बता देना।”
 
मुझे लगा कि यह मुझे जाने के लिए संकेत है। मगर न जाने क्यों मेरा मन उठने और जाने को नहीं हो रहा था। शायद मैं जाने से पहले अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहता था जो मैं नहीं कर पा रहा था। मगर संकेत इतना स्पष्ट था कि और बैठना भी ठीक नहीं लगता था।

“तुम्हें इस वक़्त आराम की ज़रूरत है।” मैंने उठते हुए कहा, “इस समय मैं और रुककर तुम्हें परेशान नहीं करूँगा। पहले ही मैंने तुम्हें काफ़ी परेशान कर दिया है।”

“क्यों?” वह उसी रूखे आभिजात्य के साथ बोली, “मेरे लिए तो यह खुशी की बात थी कि आज की शाम तुम्हारे साथ इतनी अच्छी बीत गयी। मैं तो बल्कि समझ नहीं पा रही कि तुम्हें किस तरह धन्यवाद दूँ, खाना खिलाने के लिए भी और यहाँ आने के लिए भी।”

अगर मैं अपने मन से चल सकता, तो उसकी बाँह पकडक़र उससे कहता कि सुषमा अपने को इस लबादे में लपेटकर मुझसे बात न करो; तुम्हारा वह कमजोर व्यक्तित्व तुम्हारे इस अभिजात व्यक्तित्व की अपेक्षा कहीं अधिक मानवीय और स्वाभाविक था; वह व्यक्तित्व इसकी अपेक्षा कहीं अधिक सबल और सजीव भी था; तुम क्यों नहीं अपने उसी रूप में बनी रहतीं और चलते समय मुझसे उसी तरह बात कर सकतीं? मगर ज़ीरो बल्ब की रोशनी में मैं जितने अधिकार के साथ उससे बात कर रहा था, उसका सौवाँ हिस्सा अधिकार भी उस समय मुझे उस पर नहीं लग रहा था।

“तुम्हारा मन इस समय दूसरी तरह का हो गया है।” मैंने कहा, “मैं दो-एक दिन में फिर किसी समय तुमसे बात करूँगा। तुम नीलिमा के शो में तो आओगी?”

क्षण-भर के लिए अपने आभिजात्य से बाहर निकलकर उसने होंठ बिचका दिये।

“कह नहीं सकती कि आऊँ या न आऊँ। हो सकता है कि उसे कवर करने के लिए आ भी जाऊँ।”

“तुम्हें ज़रूर आना चाहिए।” मैंने कहा, “एक तरह से उसका यह पहला ही शो है और हमें उसे हतोत्साहित नहीं करना चाहिए।”

उसका भाव ऐसा हो गया जैसे उसने अन्दर ही अन्दर एक बार हँस लिया हो।

“तो तुम भी आजकल उसकी वकालत कर रहे हो?” उसने कहा।

“क्यों? इसमें वकालत की क्या बात है?”

“मैं यह भूल ही गयी थी कि वे लोग तुम्हारे घनिष्ठ मित्र हैं।”

“मेरी उनसे मित्रता है, इसमें कोई सन्देह नहीं, मगर...।”

“अच्छा है वे लोग किसी से तो मित्रता रख सकते हैं, वरना...।” मुझे लगा कि उसे यह सब कहने में एक तरह का प्रतिशोध लेने का सुख मिल रहा है।

“वरना क्या?”

“मैं जितना उन्हें जानती हूँ उससे मेरी तो राय यही थी कि अपने अलावा उन लोगों को दुनिया में और किसी चीज़ से मतलब नहीं है।”

“तुम समझती हो कि तुम उन्हें इतना पास से जानती हो?”

“मैं उनमें से एक को ही जानती हूँ। पति को। तुमने उसके बारे में एक बार पूछा भी था। पत्नी को तो मैंने सिर्फ़ देखा ही है। मुझे तो नहीं लगता कि उसमें वह चीज़ है...।”

“क्या चीज़?”

“जो एक कलाकार में होनी चाहिए।”

“अर्थात्?”

“अर्थात् वह सुरुचि, कोमलता, भावना, अनुभूति...।”

“मगर बिना उसका प्रदर्शन देखे तुम कैसे कह सकती हो?”

“मेरी अपनी राय है। मुझे ऐसा लगता है।”

“ख़ैर, मैं इस समय इतना ही कहूँगा कि तुम उस दिन ज़रूर आओ और जो भी राय बनानी हो, उसका शो देखकर ही बनाओ। पहले से मन में पूर्वाग्रह हो, तो हम कभी किसी का सही मूल्यांकन नहीं कर सकते।”

“पूर्वाग्रह दोनों तरह का हो सकता है।” वह बोली, “पक्ष में भी और विपक्ष में भी। तुम कैसे कह सकते हो कि तुम्हारे मन में पूर्वाग्रह नहीं है?”

“इसका पता तुम्हें मेरी टिप्पणी से चल जाएगा।”

“तो ठीक है।” वह बोली, “मैं उस दिन आऊँगी।”

“उस दिन ही और बात भी करेंगे...।” मैंने उसके कन्धे को हल्के से छुआ कि शायद मेरे चलते समय वह अपना तनाव कुछ छोड़ दे, मगर उसका कन्धा ज़रा भी ढीला नहीं हुआ। मैंने अपना हाथ हटा लिया।

“तुम्हें नीचे तक पहुँचा आऊँ?” उसने पूछा।

“नहीं।” मैंने कहा, “तुम्हें कपड़े बदलने पड़ेंगे। तुम बैठो।”

“सुनो।” मैं दरवाज़े से निकलने लगा, तो उसने कहा। मैं रुक गया। क्षण-भर हम चुपचाप एक-दूसरे की तरफ़ देखते रहे।

“मैं समझती थी कि हम लोग साथ-साथ बाहर चल सकेंगे। मगर मैं तुम्हारा मन जितना समझ सकी हूँ, वह ठीक ही समझा है न?”

“देखो, तुम इस वक़्त यह बात न पूछो। उस दिन मिलेंगे, तो बात करेंगे।”

“तुम समझते हो कि बात करने को कुछ बाकी है?”

“सभी कुछ बाकी है।”

“अच्छा, गुड नाइट!”

“गुड नाइट!”

मैं कॉन्सीक्यूशन हाउस के गेट से बाहर निकला, तो मुझे अपना सिर बहुत भारी लग रहा था। यह भारीपन एक मर्ज़ था जिसका जब तब मेरे ऊपर दौरा हो जाता था। बात करते-करते, चलते-चलते, अनायास, बिना कारण यह भारीपन मुझे छा लेता था। उस स्थिति में अपने आसपास का विवेक मिट जाता था, अपने अन्दर और बाहर सब कुछ पथराया हुआ सा लगता था; सडक़, खम्भे, तारे और आकाश सब एक कब्रिस्तान की तरह हो जाते थे। मुझे हर चीज़ से वितृष्णा और विरक्ति होने लगती थी। एक-एक क़दम चलना मेरे लिए बोझ बन जाता था। मैं नहीं समझ पाता था कि यह भारीपन क्या है? क्या यह एक ऐसा रोग था जो टिकिया खाने से ठीक हो सकता था? या इस रोग का इलाज़ किसी भी तरह सम्भव नहीं था? सडक़ से कई-कई गाडिय़ाँ गुज़र रही थीं और मुझे अपने पथराये हुए मन में कई एक ख़ाके नज़र आ रहे थे—पत्थर पर बनी हुई लकीरों की तरह। गाँव का पोखर, कीचड़ में डुबकियाँ लेते हुए सूअर, अलमारी में रखी हुई तसवीरोंवाली किताब, अमृतसर का कंजरियोंवाला बाज़ार, क़स्साबपुरा की गली, पोलिटिकल सेक्रेटरी का कमरा, हरबंस के घर की दीवारें, कबूतर के पंखों का बोझ, एक दूर के देश की तरफ़ उड़ाकर ले जाता हुआ हवाई जहाज़, एक सजा हुआ छोटा-सा घर, नीले परदोंवाली गाड़ी, सुगन्धित तम्बाकू के सिगरेट, मुसकराकर बातें करते हुए लोग, टेलीप्रिंटर पर आती हुई ख़बरें, सम्पादक का चेहरा, अपने कमरे की खिडक़ी, वहाँ से दिखायी देते हुए बत्तियों के झुरमुट और...और फिर वही पोखर, वही कीचड़ से लथपथ सूअर और ताई की झिडक़ी, “तू नहीं मानेगा कीचड़ से खेले बिना, मधू! सूअर के बीच एक सूअर तू भी है...!”

सुबह अभी नींद नहीं खुली थी कि बीच की मंज़िल के किरायेदारों के लडक़े ने आकर दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा खोला, तो उसने पतंग की खपची मुँह में चबाते हुए कहा, “अंकलजी, नीचे कोई आपसे मिलने के लिए आयी है।”

“मुझसे मिलने के लिए!” मुझे आश्चर्य हुआ कि सुबह-सुबह वहाँ मुझसे कौन मिलने के लिए आ सकती है। मगर फिर सोचा कि हो सकता है नीलिमा आयी हो कि मैं चलकर एक बार उसकी प्रैक्टिस देख लूँ। एक ख़याल यह भी आया कि सम्भव है सुषमा ही दफ़्तर से मेरा पता पूछकर चली आयी हो। मैंने जल्दी-जल्दी अपने कपड़ों की सलवटें ठीक कीं, बालों में कंघी की, एक बार आईना देखा और नीचे चला गया। मगर नीचे पहुँचते ही मैं एकदम अचकचा गया। घर के सामने सडक़ के उस तरफ़ ठकुराइन और निम्मा खड़ी थीं। सडक़ के नीचे पाइप बिछाने के लिए सडक़ बीच से खोदी गयी थी। बीच की खाई को पार करने के लिए पतला फट्टा हमारे घर से थोड़ा हटकर रखा था।

“भाभी, तुम!” मैंने उन पर नज़र पड़ते ही कहा।

“हाँ भैया! तुम्हारा घर ढूँढऩे में हम लोग इतनी परेशान हुई हैं कि क्या कहूँ! अब भी मालूम नहीं था कि ठीक जगह पहुँच गयी हैं या नहीं।...ठहरो, पहले उधर से हम लोग पार कर लें।” कहते हुए उसने निम्मा का हाथ पकड़ लिया।

“चल मरी, अभी उधर से घूमकर आना पड़ेगा।”

बहुत सँभल-सँभलकर पैर रखते हुए उन लोगों ने आगे-पीछे फट्टे को पार किया। मैं उन्हें लाने के लिए कुछ क़दम आगे चला गया।

“मैंने सोचा था कि करोलबाग़ में किसी बड़े बँगले में रहते होगे।” ठकुराइन पास आकर बोली, “मुझे क्या मालूम था कि तुम इतनी ऊँची पहाड़ की चोटी पर चढक़र रहते हो! पहले डर लगे कि किसी बोतलोंवाली मोटर के नीचे ही न आ जायें। फिर आगे यह मरी नहर आ गयी। तुमने भी जगह ली तो कहाँ!”

हम लोग सेहन में आ गये, तो मैंने पूछा, “मगर तुम्हें इस जगह का पता कैसे चला! मैं तो उस दिन तुम्हें बताकर नहीं आया था।”

“यह तुम कुछ मत पूछो भैया!” ठकुराइन अपनी चादर को ठीक से सँभालती हुई बोली, “पहले कल अरविन्द भैया के दफ़्तर में जाकर पूछा, तो उन्होंने तुम्हारा पहलेवाले अख़बार का पता बता दिया। वहाँ गयी, तो एक खद्दरपोश आदमी ने बताया कि हाँ दस साल पहले तो हमारे पास ही काम करते थे, अब किसी दूसरे अख़बार में काम करते हैं। मगर उस भले आदमी ने इतना किया कि वहीं से तुम्हारे अख़बार में टेलीफ़ोन करके तुम्हारा घर का पता पूछ दिया। कल का सारा दिन इसी में गया। आज सवेरे जल्दी निकल आयी थी कि तुम घर से चले न जाओ, मगर घंटा-भर घूम-घूमकर अब तुम्हारा मकान मिला है। यहाँ की चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते तो हम दोनों का दम निकल गया।”
 
निचली मंज़िल की बबुआइन ग़ौर से देख रही थी कि बरसातीवाले बाबू के यहाँ ये कौन मेहमान आयी हैं। ठकुराइन घर की धुली हुई मैली धोती के ऊपर उसी तरह की मैली चादर ओढ़े थी।

निम्मा अपेक्षाकृत साफ़ सलवार-कमीज़ पहने थी, मगर उसमें भी ऊपर से नीचे तक इस तरह सलवटें पड़ी थीं जैसे दिनों के बाद वे कपड़े बन्द ट्रंक में से निकाले गये हों। वह कुछ घबरायी हुई-सी थी और अपनी माँ के कहे हुए हर शब्द को बहुत उत्सुकतापूर्वक सुन रही थी। पैरों में उसने चमड़े की गुरगाबी पहन रखी थी जिसका कीचड़ बहुत खरोंचने पर भी पूरा नहीं उतरा था। बरसाती में रहने वाले कुँआरे आदमी के पास इस तरह के वेश में एक स्त्री और एक लडक़ी के आने का बबुआइन जाने अपने मन में क्या अर्थ लगा रही थी!

“आओ भाभी, ऊपर चलें, वहीं चलकर बात करेंगे।” मैंने कहा और चुपचाप सीढिय़ाँ चढऩे लगा। ऊपर कमरे में आते ही ठकुराइन थकी-सी चारपाई पर बैठ गयी। निम्मा एक मोढ़े की पीठ पकड़े खड़ी रही।

“तुम्हें जगह ढूँढऩे में सचमुच बहुत तकलीफ़ हुई होगी।” मैंने कहा, “मैं तो यह सोच भी नहीं सकता था कि तुम इस तरह परेशान होती हुई यहाँ आओगी।”

“हाँ भैया, तुम क्यों कभी हमारे आने की बात सोचोगे?” ठकुराइन न जाने क्या सोचकर चारपाई से उठ खड़ी हुई और कमरे के चारों मोढ़ों में से सबसे टूटे हुए मोढ़े पर बैठ गयी, “तुम्हें हमसे मुराद नहीं, मगर हमें तो भैया तुमसे मुराद है ही। देख लो ज़मीन सूँघती हुई किसी तरह पहुँच ही गयी।”

निम्मा उसी तरह खड़ी थी। मैंने उससे बैठने को कहा, तो वह चुपचाप मोढ़े पर बैठ गयी। ठकुराइन इस तरह मेरे चेहरे की तरफ़ देख रही थी जैसे अभी-अभी उसने मुझे कोई जुर्म करते पकड़ा हो। मैंने अपने लिए भी एक मोढ़ा खींच लिया और उस पर बैठते हुए कहा, “तुम्हारे चेहरे से तो लगता है भाभी, जैसे तुम किसी वजह से मुझसे नाराज़ हो। यह क्या इसीलिए है कि मैंने तुम्हें अपना पता लिखकर कार्ड नहीं डाला!”

“तुम क्या कार्ड डालते भैया!” ठकुराइन बोली, “और भाभी बेचारी तुमसे क्या नाराज़ होगी! अगर उसे कोई दु:ख है तो उसका रोना रोकर भी वह क्या करेगी! दु:ख तो गाँठ में बाँधकर उसने जनम ही लिया था। आज तो मैं तुम्हारे पास एक दरखास लेकर आयी हूँ अगर तुम मंजूर करो तो!”

निम्मा चुपचाप ज़मीन की तरफ़ देखने लगी। अपनी ख़ामोशी में वह बिल्कुल बच्ची-सी लग रही थी।

“हाँ-हाँ, बताओ, क्या बात है!” मैंने कहा। सोचा कि वह फिर वही लडक़ी के लिए लडक़ा ढूँढऩे की बात कहेगी। साथ ही मुझे समय का भी ध्यान हो आया कि बातचीत में पन्द्रह-बीस मिनट से ज़्यादा लग गये तो समय पर तैयार होकर दफ़्तर कैसे पहुँचूँगा।

“पहले तुम यह बताओ कि हम लोगों के घर की रपट तुमने ही की थी?” ठकुराइन मेरे चेहरे पर आँखें स्थिर किये हुए बोली।

“रपट? कैसी रपट?”

“मैं तो घर में सबसे कहती थी कि यह काम मधुसूदन भैया का नहीं हो सकता। वे ऐसा काम कर ही नहीं सकते। मगर सब लोग मुझसे यही कहते थे कि यह काम तुम्हीं ने किया है। तुम्हीं उस दिन वह मरी तसवीरोंवाली मशीन लिये हुए हमारे घर आये थे। तुम एक बार सौंह खाकर कह दो कि तुमने रपट नहीं की, तो मैं जाकर अच्छी तरह सबका मुँह तोड़ दूँ...।”

“मगर भाभी कुछ समझ भी आये कि तुम किस रिपोर्ट की बात कर रही हो। मुझे आखिर तुम लोगों की किस बात की रिपोर्ट करनी थी? और कोई बात होती भी तो क्या तुम समझती हो कि मैं जाकर तुम लोगों की रिपोर्ट करता?”

“तो इसका मतलब है कि तुमने नहीं की।” ठकुराइन कुछ आश्वस्त होकर बोली, “तब तो मैं सब लोगों से ठीक ही लड़ी थी कि यह काम मधुसूदन भैया का नहीं हो सकता। अब मैं जाकर पूछूँगी सबसे। और तो और, राँड गोपाल की माँ भी सबमें शामिल हो गयी। कहती थी कि यह काम बस तुम्हारा ही हो सकता है।”

“मगर तुम यह भी बताओ कि बात क्या है?”

“बात तो बहुत ज़बरदस्त है भैया!” ठकुराइन मोढ़े पर आगे को सरक आयी। “किसी मुंडीकाटे ने सरकार में इस बात की रपट कर दी है कि हमारा मुहल्ला शहर का सबसे गन्दा मुहल्ला है और कि वहाँ जाने कैसी-कैसी बुराई फैल रही है! सब झूठ बातें, बिल्कुल झूठ! जाने बीच के किसी दुश्मन का काम है या किसका! मुए को सबसे ज़्यादा बैर हमारे घर से ही न था। सितारवाले मियाँ का नाम लिखकर उसने हमारे घर का अता-पता भी दे दिया है। तीन दिन हुए कमेटीवाले हमारे मुहल्ले की जाँच करने आये, तो हमें पता चला। गली में जितने सब्जीवाले बैठते थे, मरों ने सबको उठा दिया और नालियों में जाने क्या काली-सी दवाई डाल गये हैं! कहते थे कि दो-चार दिन में ओवरसियर साहब आएँगे और मुहल्ले के जो-जो घर गिरने की हालत में हैं, उन्हें गिरवा देंगे। हमारे घर के लिए वे कहते थे कि यह तो बिल्कुल ही कंडम है, इसलिए इसे सबसे पहले गिराया जाएगा। कोई कहता था कि सितारवाले मियाँ का काम है। मरा आप मरने को है और मरते-मरते घर के सब लोगों की मिट्टी पलीद कर जाना चाहता है। मगर उस दिन से उसे जिस तरह गश आ रहा है उससे मैं कहती हूँ कि नहीं, यह काम उसका नहीं हो सकता।”

यह सब सुनते हुए मैं अन्दर कटा जा रहा था। लेख लिखते समय मैंने यह नहीं सोचा था कि उसका ऐसा असर भी हो सकता है। जहाँ यह बात खुशी की थी कि स्थानीय अधिकारियों पर अख़बार में छपी बात का कुछ असर होता है, वहाँ यह बात बहुत परेशान करनेवाली थी कि कहीं सचमुच ही मेरी वजह से उन लोगों के घर न गिरा दिये जायें। उस वजह से अपने ऊपर आनेवाला जो लांछन था वह मुझे और भी परेशान कर रहा था।

“हम लोगों को तो तीन रातों से नींद ही नहीं आयी।” ठकुराइन बोली, “कुछ सूझ ही नहीं पड़ता कि किस दुश्मन ने यह दुश्मनी की है। हममें से किसके साथ किसी का ऐसा बैर हो सकता है? होगा तो किसी का मियाँ के साथ ही बैर होगा। लोगों को मियाँ पर इतना गुस्सा आ रहा था कि कल गोपाल ने उसके नाम की तख्ती उखाडक़र चूल्हे में जला दी कि जब ओवरसियर साहब घर की पहचान के लिए आएँगे तो हम कह देंगे कि यहाँ इस नाम का कोई आदमी नहीं रहता। क्यों भैया, यह हो भी तो सकता है कि खुद उसी ने अपना घर गिरवाने के लिए सरकार को लिखा हो। उसकी सरकार में चलती तो बहुत है!”

“ऐसी बात नहीं है, भाभी!” मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ठकुराइन को किस तरह सारी स्थिति समझाऊँ। “इसमें इबादत अली ने कुछ नहीं किया। उसे इस बुढ़ापे में क्यों यह सूझेगी कि अपना घर गिरवाये...!”

“अरे, तुम उसे नहीं जानते भैया!” ठकुराइन कुछ सोचती हुई-सी अपना घुटना खुजलाने लगी, “वह बुड्ढा मरा ऐसा कमजात है कि उसका कुछ पता भी नहीं कि जाते-जाते हम लोगों से अपना सारा बैर निकाल ले। उसे हमसे इस बात की दुश्मनी तो है ही कि हम उसकी मरज़ी के खिलाफ उस घर में रहते हैं और उसकी लडक़ी हमीं लोगों की वजह से घर छोडक़र गयी है। इधर कई दिनों से उसे दिल का ऐसा दौरा पड़ता है कि कुछ पता नहीं कि वह कब अपना बोरिया समेट ले।” और थोड़ा आगे को झुककर वह कुछ रहस्यपूर्ण ढंग से बोली, “घर में मरदों ने तो यह सोच रखा है कि अगर यह उस बुड्ढे का काम हुआ, तो रातोंरात उसका बोरिया बनाकर जुमना जी में डाल आएँगे और कह देंगे कि पता नहीं कि वह घर छोडक़र कहाँ चला गया है। वे कहते हैं कि अगर वह हमसे इस तरह दुश्मनी कर सकता है, तो हमें उसका किस बात का लिहाज है। ज़्यादा से ज़्यादा हिन्दू-मुसलमानों का झगड़ा ही तो होगा, हो जाए!” और यह कहते-कहते वह एक बार सिहर गयी, “मगर भैया, अगर सचमुच झगड़ा हुआ, तो जिनके घर में मरद हैं, उन्हें तो उतना डर नहीं। तुम मुझे बताओ, हम माँ-बेटी क्या करेंगी, कहाँ जाएँगी? मुझे तो अपने लिए हर तरफ़ आफत ही आफत नज़र आती है।”

यह जानते हुए भी कि ठकुराइन जो कुछ कह रही है, उसमें ज़्यादा उसके मन का वहम ही है और ऐसी स्थिति शायद पैदा कभी नहीं होगी, मुझे यह ज़रूरी लग रहा था कि मैं इबादत अली के सम्बन्ध में उसकी ग़लतफ़हमी दूर कर दूँ। दूसरी तरफ़ मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि उसे पूरी बात समझाऊँ किस तरह! एक पत्रकार के रूप में अपना फ़र्ज पूरा करने के लिए मैंने जो काम किया था, उसे करते हुए यह मैंने कब सोचा था कि वैयक्तिक स्तर पर मुझे उसे और ही तरह से झेलना पड़ेगा? पूरी बात बता देने पर एक डर यह भी था कि अगले दिन सारा मुहल्ला ठकुराइन के साथ आकर मेरे घर पर धरना न दे दे। यह सारी स्थिति मुझे बहुत नाटकीय और दुखदाई लग रही थी कि मैं तो अपने कर्तव्य से प्रेरित होकर एक लेख लिखता हूँ और उसके परिणामस्वरूप मेरे ही परिचित लोगों को बेघर-बार होना पड़ता है और उसके लिए पिटाई बुड्ढे इबादत अली की होती है। मुझे ठकुराइन को असलियत बता देने के सिवा कोई चारा नज़र नहीं आया।

“इसमें ग़रीब इबादत अली का कोई कसूर नहीं है भाभी।” मैंने कहा, “यह जो भी कार्रवाई हुई है, वह किसी रिपोर्ट की वजह से नहीं हुई। बात असल में यह है कि मैंने दिल्ली के कुछ इलाकों की गन्दगी के बारे में एक लेख लिखा था...।”

“तो तुमने ही लिखा था?” ठकुराइन सहसा तमक उठी। निम्मा भी, जो तब तक कमरे के बिखरे हुए सामान को उड़ती नज़रों से देख रही थी, सहसा इस तरह मुझे देखने लगी जैसे उनके घर में चोरी करके भागा हुआ चोर सहसा पकड़ लिया गया हो। “मुझे नहीं पता था भैया कि तुम हम लोगों के साथ इस तरह की बेमुरव्वती करोगे। तुमने और किसी का नहीं, तो कम से कम मेरा और इस लडक़ी का ही कुछ ख़याल किया होता कि हम ग़रीब बेघर-बार होकर कहाँ जाएँगी? मैं तो फिर भी जैसे-तैसे बख़त काट लूँ, मगर इस डेढ़ गज़ की घोड़ी को बताओ कहाँ ले जाकर रखूँ? तुमने तो लिख दिया और अपना नाम कर लिया, मगर हम गरीबों की सोचो अब क्या हालत होगी। सरकार हमको धक्का देकर घर से निकाल देगी, तो हम किसके घर में जाकर रहेंगी और किसके सिर चढक़र बैठेंगी? मैं तो पहले ही रात-दिन इसकी रखवाली करने में मरी जाती हूँ। फिर तो यही एक रास्ता रह जाएगा कि इसे साथ लेकर किसी कुएँ की शरण ले लूँ या तुम्हारे घर के सामने आ बैठूँ। तुमने हमारे साथ अच्छी की!”

“भाभी, तुम बात को ग़लत समझ रही हो।” मैं अपनी सफ़ाई देने की चेष्टा करने लगा, “बात दरअसल में इस तरह नहीं है। बात यूँ है कि...।”

“मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनूँगी।” ठकुराइन रोष के साथ बीच में ही बोल उठी, “भाभी ने जितने दिन तुम्हें घर में रखा, बिल्कुल अपने सगों की तरह ही रखा और अपने सगों की तरह ही खिलाती-पिलाती रही। चाहे तुमसे पैसा लेकर ही खिलाया, मगर खिलाया तो उसी प्यार के साथ जो प्यार आज के ज़माने में लोगों को अपने सगों से भी नहीं होता। भाभी अगर ग़रीब न होती, तो तुमसे कभी एक पैसा भी न लेती। मगर तुम्हें भाभी को उसका यही बदला देना था? तुम बताओ तुमने अपने मुहल्ले के बारे में वे सब बातें क्यों लिखीं? आज चाहे नहीं, मगर कभी तो वह तुम्हारा अपना ही मुहल्ला था। तुमने हम लोगों के बारे में यह लिख दिया कि हम नालियों की गन्दगी में रहते हैं और हमारी लड़कियाँ जाने क्या-क्या करती फिरती हैं! कमेटीवाले जो आये थे, वे हँस-हँसकर हमसे पूछ रहे थे कि हमें बताओ मियाँ की लडक़ी का क्या किस्सा था। हाय, यह भी कोई लिखने की बात थी? वह मरी जैसी भी थी, तुम उसके बाप के दिल से तो पूछकर देखो कि उसके चले जाने से उसे कैसा लगता है!”

“भाभी, मैंने ऐसी कोई बात नहीं लिखी।” ठकुराइन के गुस्से के सामने मेरी स्थिति सचमुच एक मुजरिम की-सी हो गयी थी, “और जो कुछ मैंने लिखा था, वह उस एक मुहल्ले के बारे में ही नहीं, दिल्ली के और भी कई ऐसे इलाकों के बारे में लिखा था...।”

“तुम यह बताओ कि तुमने बीच में हमारे मुहल्ले का नाम लिखा था कि नहीं?”

“मुहल्ले का नाम किसी सिलसिले में बीच में आ गया होगा...।”

“आ गया होगा क्या? तुमने बीच में इबादत अली के घर का पता दिया था कि नहीं?”

“इबादत अली का नाम भी वैसे ही बीच में आ गया था, नहीं तो...।”

“नहीं तो क्या? तुमने सारी दुनिया के सामने हमारी मिट्टी पलीद कर दी और यह सब झूठ लिखकर! तुम्हें पता है कि अपनी इज़्ज़त-आबरू के लिए वहाँ सब लोग किस तरह अपनी जान सुखाकर रहते हैं और तुमने लिख दिया कि...।”

ठकुराइन का गुस्सा इतना बढ़ गया था कि शायद वह उस समय और भी कितना कुछ कह जाती। मैं सहसा मोढ़े से उठकर उसके कन्धे दबाने लगा, “भाभी, तुम मेरी बात तो सुनो।” मैंने कहा, “मैंने सचमुच कोई कसूर नहीं किया और न ही मैंने कोई ऐसी बात लिखी है। मैंने तो बल्कि जो बात लिखी थी, वह इससे बिल्कुल उल्टी थी...।”

“तो फिर कमेटीवाले वहाँ कागज लिखने क्यों आये थे? वे क्यों कहते थे कि ओवरसियर साहब आकर हमारे घर की जाँच करेंगे और उसे गिरवा देंगे?”

“पहले तुम शान्त हो जाओ भाभी, फिर मैं तुम्हें सारी बात समझाता हूँ।” कहकर मैं उसके कन्धे दबाता रहा। ठकुराइन पहले तो कुछ सकपकायी फिर सहसा हँस दी। उसके हँसने से निम्मा के होंठों पर हल्की-सी हँसी की रेखा आ गयी।

“पहले ऐसा काम करते हो, और फिर इस तरह भाभी की खुशामद करते हो,” ठकुराइन बोली।

“मैं पहले नीचे जाकर अपने दफ़्तर में फ़ोन कर दूँ कि मुझे आने में देर हो जाएगी, फिर आकर तुम्हें पूरी बात बताता हूँ।” मैंने कहा और ठकुराइन के आक्रोश से बचने के लिए झट नीचे चला गया। नीचे से मैंने दफ़्तर में फ़ोन किया और पास के दुकानदार से विटारोज़ की दो बोतलें ले लीं। बबुआइन ने मुझे बोतलें ले आते देखा, तो उसकी आँखों का कठोर भाव और भी कठोर हो गया।

मैंने बोतलें ले जाकर ठकुराइन के सामने रखीं, तो उसका चेहरा हँसी से फैल गया। अब इतनी सरदी में हमें यह ठंडा पानी पिलाओगे!” उसने कहा।

“अगर घर की तरह घर होता तो तुम्हें चाय ही पिलाता।” मैंने कहा, “मगर इस हालत में...।”

“तो तुमसे कहा किसने है कि तुम इस हालत में रहो?” ठकुराइन अब बहुत मीठे गुस्से के साथ बोली, “क्यों नहीं अपने लिए कोई लेडी-वेडी ले आते जो तुम्हारे घर को घर बना दे?”

लेडी-वेडी शब्द का उच्चारण ठकुराइन ने इस तरह किया कि निम्मा सहसा खुलकर हँस दी। मैंने बोतलें खोलकर उन दोनों को दे दीं। ठकुराइन अपनी हँसी को रोकती हुई बोली, “और क्या! किसी भले घर की लडक़ी से तुम्हारा गुज़ारा थोड़े ही होगा? तुम्हें तो चाहिएगी बस ऐसी कि...।”

“तुम्हें इतनी ही फिक्र है तो कोई ढूँढ़ क्यों नहीं देतीं!” मैंने सोचा कि इस तरह बात बदल जाएगी, तो मैं ठकुराइन के सामने अपनी बेगुनाही की बात अच्छी तरह रख सकूँगा।

“मैं तुम्हें आज ही ढूँढ़ देती हूँ, तुम करनेवाले बनो,” ठकुराइन बोली, “तुम्हारे लिए क्या लड़कियों की कमी है?”

“मुझे तो सख्त कमी नज़र आती है।” मैंने हँसकर कहा, “कोई लडक़ी मुझसे बात ही नहीं करती।”

“हाँ, वह आप ही तो बात करेगी तुमसे! जिसके आगे-पीछे कोई नहीं होगा, वही आकर तुमसे अपने आप बात करेगी।”

“तो बताओ फिर कैसे होगा?” मैंने अपना चेहरा गम्भीर बनाकर कहा, तो ठकुराइन सचमुच गम्भीर हो गयी, “तुम्हें सचमुच करना हो, तो बात करो।” वह बोली, “ऐसे छेडख़ानी कर रहे हो तो बात दूसरी है।”

“नहीं छेडख़ानी नहीं कर रहा, बिल्कुल सच कह रहा हूँ।”

“तो बताओ किसी सीधी-सादी लडक़ी से करोगे या विलायत की मेम ही लाओगे।”

“विलायत की मेमें तो सुना है भाभी कि घर में आदमी को गुलाम बनाकर रखती हैं और...।”

“तो सीधी-सादी लडक़ी एक तो यह तुम्हारे सामने बैठी ही है। बोलो, करोगे इससे ब्याह?”

मैं एकदम चौकन्ना हो गया कि बात कहाँ की कहाँ पहुँच गयी! मैं नहीं जानता था कि हँसी की बात को ठकुराइन इतनी गम्भीरता से ले लेगी। निम्मा अपने हाथ की बोतल वहीं रखकर सहसा उठकर खिडक़ी के पास चली गयी। मेरा सोच-विचार सहसा गुम हो गया और मुझे गुस्सा भी आया कि ठकुराइन ने लडक़ी के सामने यह क्या बात कर दी।

“बोलो?” ठकुराइन ऐसे स्वर में बोली कि कुछ देर मेरी ज़बान तालू के पास अटकी रही। मैं बहुत कठिनाई से अपना मुँह खोल पाया। “इस बात को छोड़ो भाभी।” मैंने कहा, “अभी मैं अपना ही गुज़ारा नहीं कर पाता, तो ब्याह करके क्या करूँगा! मैं तो ऐसे ही बात कर रहा था।”

“बस!” ठकुराइन का स्वर फिर तीखा हो गया। “वह मुँह से कहने की ही बात थी न कि कोई सीधी-सादी लडक़ी हो, तो ब्याह कर लूँगा? साफ क्यों नहीं कहते कि ब्याह करूँगा तो किसी बालकटी सोनपरी से ही? मेरे बस की बात होती, तो मैं तुम्हारे लिए ऐसी भी ढूँढक़र ला देती। मगर यह मेरे बस की बात ही नहीं है।”

ठकुराइन ने जिस ढंग से यह कहा उससे मैं अन्दर ही अन्दर शरम से पानी हो गया। मैं अब चाहने लगा कि किसी तरह बात को पहले के विषय पर ला सकूँ, तो अच्छा है।
 
“मैं तुम्हें उस लेख के बारे में बता रहा था।” मैंने कहा, “वह लेख मैंने लिखा था कि इस शहर में जहाँ-जहाँ गन्दगी है, सरकार उसे दूर करने के लिए कोई क़दम उठाये।” और मैं काफ़ी घुमा-फिराकर और काफ़ी विस्तार के साथ ठकुराइन को बताने लगा कि उस लेख में मैंने क्या-क्या लिखा था और यह सब लिखने में मेरा उद्देश्य क्या था। जब मैं अपनी सारी दिमाग़ी पूँजी ख़र्च कर चुका तो ठकुराइन ने आहिस्ता से सिर हिला दिया। “झूठ बात है,” वह बोली, “पहले तो ये बातें लिखकर हम लोगों की जान नाक में कर दी, और अब ऊपर से यह लीपापोती कर रहे हो। तुम मुझे जितनी अनजान समझते हो, मैं उतनी अनजान नहीं हूँ।”

मैंने फिर उसे समझाना चाहा कि सरकार उनके लिए नये घर का प्रबन्ध किये बिना उनके पुराने घर को नहीं गिरा सकती और मैं इस बारे में पूछताछ करके थोड़े ही दिनों में उसे पूरा पता दूँगा। मगर ठकुराइन का अविश्वास उसी तरह बना रहा। “अब भैया इन बातों से हमें ठगो नहीं।” वह बोली, “मैं नहीं जानती थी कि तुम भी दस साल में इस तरह बिल्कुल बेपत के हो जाओगे और मुँह से कुछ कहोगे, करोगे कुछ।”

“अब भाभी, मैं तुम्हें किस तरह अपनी बात का विश्वास दिलाऊँ?” मैंने हताश होकर अपने हाथ आपस में उलझा लिये।

“भाभी को विश्वास दिलाने की क्या ज़रूरत है, भैया?” ठकुराइन अपनी चादर को ठीक से कन्धे पर समेटती हुई बोली, “तुम उसके लिए अच्छा करो, तो ठीक है और बुरा करो, तो ठीक है। उनके जाने के बाद इतने दिन हो गये दुनिया की मार सहते हुए। अब और पड़ेगी, तो और सह लूँगी। जहाँ बस न हो वहाँ आदमी कर क्या सकता है?”

“माँ, अब घर नहीं चलोगी?” कहती हुई निम्मा सहसा खिडक़ी के पास से हट आयी। मैंने देखा कि उसका चेहरा तमतमाया हुआ है और उसकी आँखों के कोरों में आँसू अटक रहे हैं जो उसके सँभालने पर भी नीचे गिर आने को हैं। मुझे उस समय पहली बार यह लगा कि वह लडक़ी बच्ची नहीं है, सचमुच बड़ी हो गयी है। तनकर खड़ी होने की वजह से वह शरीर के लिहाज़ से भी बच्ची नहीं लग रही थी। उसने जिस तरह उपेक्षा की नज़र से मुझे देखा, उससे क्षण-भर के लिए मुझे खुरशीद की आँखों का भाव याद हो आया और मैं उसके चेहरे से नज़र हटाकर दूसरी तरफ़ देखने लगा।

“हाँ, चल ही रही हूँ।” ठकुराइन चादर समेटकर उठती हुई बोली, “आज तो मरी, जाने को वह घर है, कल को वह घर भी नहीं रहेगा तो मुझसे कहाँ चलने को कहेगी?”

निम्मा की आँखों में रुके हुए आँसू सहसा नीचे बह आये। उसके साथ ही उसका चेहरा फिर बच्चों का-सा हो गया। उसने झट अपना मुँह मोड़ लिया और कमरे से बाहर चली गयी।

“अच्छा भैया, खुश रहो। भाभी के दिल से तो हमेशा तुम्हारे लिए असीस ही निकलेगी।” ठकुराइन ने रुलाई रोकने के लिए आँखों को झपकते हुए कहा, “कभी तुम्हें हमारी याद आ जाए, तो यह सोच लिया करना कि तुम्हारी खुशी से ही हमारी भी खुशी है। तुम्हारी भाभी के पास धन होता, तो वह तुम्हें खुशी देने के लिए अपनी तरफ़ से भी कुछ करती। मगर भगवान ने तो उसे ऐसी जगह मारा है जहाँ उसे पानी भी न मिले। देने को मेरे पास खाली असीस के सिवा क्या है? या यह अपनी जान है जो चाहकर भी किसी को दी नहीं जाती। यह जान भी अब इस लडक़ी की अमानत है। जितने दिन जीना है, अब बस इसी के लिए जीना है...।”

मैं ठकुराइन के साथ कमरे से बाहर निकला, तो निम्मा हमसे पहले ही जल्दी-जल्दी सीढिय़ों से उतर गयी। ज़ीने से उतरते हुए मैंने ठकुराइन से कहा, “भाभी, देखो तुम इस तरह दुखी होकर यहाँ से न जाओ। मेरी अपनी भी कुछ मजबूरियाँ हैं। और जहाँ तक घर का सवाल है, तुम यह विश्वास रखो कि तुम्हारा घर गिराने कोई नहीं आएगा।”

“सब विश्वास ही विश्वास है भैया।” ठकुराइन बोली, “यह मरा विश्वास ही खाकर तो ज़िन्दगी काट रहे हैं।”

“मैं उस बारे में पूरा पता करके तुम्हें कार्ड लिखूँगा, या किसी दिन खुद ही वहाँ आऊँगा,” मैंने कहा।

“यूँ ही झूठी बात क्यों कहते हो?” ठकुराइन बोली, “तुम जो कार्ड लिखोगे और जैसे हमारे घर आओगे, वह मुझे सब पता है। और अगर आओगे, तो भैया, हमारे सिर-आँखों पर! भाभी के रहते, वहाँ कोई तुमसे एक बात भी कह जाए, तो कहना। मैं तो जाकर सबसे यही कहूँगी कि वह तुम्हारा काम नहीं है, क्या जाने किसने अख़बार में छपा दिया है! और तुम कभी आ ही जाओ, तो तुम भी किसी को यह न बताना कि तुम्हीं ने यह खेल किया था। नहीं तो सब जने मुझसे कहेंगे कि यह राँड भी इसमें शामिल है जो हमसे झूठ बोलती है...।”

हम जब तक नीचे पहुँचे, तब तक निम्मा खाई पार करने के फट्टे पर पहुँच गयी थी। उसने जल्दी-जल्दी फट्टे को पार किया, तो एक बार पैर सीधा न पडऩे से थोड़ा लडख़ड़ा गयी, मगर किसी तरह सँभलकर उस पार पहुँच गयी।

“तुम कहो तो मैं चलकर तुम्हें घर तक पहुँचा आऊँ।” मैंने ठकुराइन से कहा।

“नहीं भैया, तुम कहाँ चलोगे!” ठकुराइन खाई की उभरी हुई मिट्टी पर सँभल-सँभलकर पैर रखती हुई बोली, “हम लोग आते बखत पहुँच गयीं, तो जाते बखत क्या नहीं पहुँच पाएँगी? इस घर का तो रास्ता भी नहीं पता था, उस घर की तो पैर अपने-आप टोह ले लेते हैं। तुम अब चलो, जाकर बैठो, पहले ही आकर तुम्हारा इतना टैम बरबाद कर दिया है। तुम भी कहोगे कि ये चुड़ैलें सुबह-सवेरे कहाँ से आ मरीं!”

“अम्माँ, अब तुम चलोगी कि नहीं?” निम्मा उधर से उतावले स्वर में बोली। मुझसे नज़र मिलते ही उसने मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया और सीधी चल दी। उसकी चाल से भी न जाने क्यों मुझे फिर खुरशीद की याद हो आयी।

उन्हें छोडक़र मैं ऊपर जाने लगा, तो बबुआइन फिर अपने चौखट के पास खड़ी थी, उसकी लडक़ी दहलीज़ लाँघकर बाहर आने लगी, तो उसने उसे बाँह पकडक़र रोक लिया और कहा, “चल अन्दर!”

मैं ढीले पैरों से सीढिय़ाँ चढक़र ऊपर पहुँचा और एक पिटे हुए मोहरे की तरह चारपाई पर सीधा पड़ गया।

धूपछाँह मौसम बूँदाबाँदी में, बूँदाबाँदी वर्षा में और वर्षा रात तक ओलों में बदल गयी थी। मैं हरबंस के पास उसकी बैठक के कमरे में बैठा था। ओलों के गिरने की आवाज़ के अलावा वातावरण में बिल्कुल खामोशी छायी थी, एक मनहूस-सी खामोशी जैसे कि वह खामोशी एक समुद्र हो, आकाश के ओर-छोर तक फैला हुआ समुद्र, जिसे अपने में डूबी हुई दुनिया की हलचलों से कोई वास्ता न हो और जो बरसते हुए बादलों के नीचे बेबस पड़ा हो। कभी ओले तेज़ हो जाते थे और खिड़कियों से टकराने लगते थे। कोई-कोई ओला रोशनदान से उछलकर कमरे में आ गिरता था और फ़र्श की दरी पर पड़ा-पड़ा कुछ देर सवालिया नज़र से हमारी तरफ़ देखता रहता था और फिर दरी के रेशों में ही कहीं डुबकी लगा जाता था। जब ओलों का ज़ोर कम होता, तो हवा का हहराता हुआ झोंका खिडक़ी के किवाड़ों को थपथपाकर उस खामोशी को एक झटका दे जाता।

मैं चुपचाप बैठा हरबंस के चेहरे के उतार-चढ़ाव को देख रहा था। हरबंस हाथ और टाँगें फैलाये दीवार पर बैठा था जैसे अभी-अभी उसे उठकर वहाँ से चले जाना हो। बाँके थोड़ी देर पहले सुलगती हुई अँगीठी रख गया था और मैं उस पर हाथ ताप रहा था। अँगीठी आयी थी, तो हरबंस ने एक गहरी नज़र से उसे देखते हुए कहा था, “यह भी उसी लडक़ी ने भिजवायी है। वह होती, तो क्या यह बात वह कभी सोच भी सकती थी?” ‘उसी लडक़ी’ से मतलब था शुक्ला से और ‘वह’ से मतलब था नीलिमा से। जिस समय मैं आया था उसी समय से मैंने लक्ष्य किया था कि नीलिमा की अनुपस्थिति में घर की सारी व्यवस्था शुक्ला ने सँभाली हुई है। उसने न सिर्फ़ घर का सारा सामान ठीक-ठिकाने से रख दिया था, बल्कि बाँके के साथ मिलकर रसोईघर में खाना भी बनवा रही थी। मुझे देखकर उसके मुरझाये हुए चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गयी थी और उसने कहा था, “तो आप आ गये हैं! मैं तो दोपहर से ही आपकी राह देख रही थी। भापाजी उधर अपने पढऩे के कमरे में हैं।”

“अब उसकी तबीयत कैसी है?” मैंने पूछा तो उसके चेहरे पर जाने क्यों बहुत रूखा-सा भाव आ गया।

“उनकी तबीयत ठीक नहीं है।” वह बोली, “मुझसे वे बात ही नहीं करते, इसलिए बाँके ही उनके कमरे में आता-जाता है। आप अगर हो सके तो आज की रात उनके पास रह जाएँ। किसी को तो रात को उनके पास होना ही चाहिए। रहने को तो मैं ही रह जाती, मगर...।” और अपनी सूनी-सी आँखों को आग की तरफ़ से हटाकर उसने कहा, “मैं सावित्री दीदी को और हर चीज़ के लिए माफ़ कर सकती हूँ मगर आज भापाजी के पास न आने के लिए कभी माफ़ नहीं कर सकती। इसका तो मतलब है कि उनके दिल में...।”

“मैं भी सुबह उसके पास गया था।” मैंने कहा, “मगर वह उसी तरह अपनी ज़िद पर अड़ी हुई है।”

“तो वे अड़ी रहें अपनी ज़िद पर!” कहते हुए शुक्ला की गरदन जिस तरह तन गयी, वह ढंग बिल्कुल नीलिमा जैसा था, “इससे किसी का नुक़सान होगा, तो उन्हीं का होगा। भापाजी की देखभाल तो किसी न किसी तरह हो ही जाएगी; वह सारी उम्र बैठकर पछताती रहेंगी। मैंने भी सोच लिया है कि न तो अब खुद ही उन्हें बुलाने जाऊँगी, और न ही किसी और को भेजूँगी। उन्हें अकेली रहना है, तो रहें अकेली और अगर किसी और के साथ घर बसाना है, तो...।”

“छि:!” मैंने कहा, “तुम भी ऐसी बे-सिर-पैर की बातें करने लगीं?”

“मैं बे-सिर-पैर की बातें नहीं कर रही।” वह बोली, “उनके स्वभाव को मैं और लोगों से ज़्यादा जानती हूँ। बल्कि जितना वे खुद जानती हैं, उससे भी ज़्यादा जानती हूँ। उन्हें ज़िन्दगी में जो कुछ मिला है उसकी वे परवाह नहीं करतीं, और जो कुछ नहीं मिला, उसी के पीछे भटकती हैं। मगर मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि वे भापाजी के साथ रहकर सुखी नहीं रह सकीं, तो सुख पाना उनके लिए बदा ही नहीं है। वे ज़िन्दगी-भर एक मृगतृष्णा के पीछे भटकती रहेंगी और इसी तरह छटपटाती रहेंगी।” शुक्ला का जूड़ा ढीला हो रहा था, शायद दिन-भर की व्यस्तता के कारण। उसके बालों की कई लटें उसके चेहरे पर आ गयी थीं। उसकी फ़िरोज़ी रंग की काँजीवरम् की साड़ी भी बहुत ढीले-ढाले ढंग से बँधी हुई थी जिससे उसका शरीर कुछ फूला-फूला-सा लग रहा था। जाने आग की वजह से या वैसे ही उसका चेहरा पहले से कहीं चिकना लग रहा था। मेरे मन में सहसा यह बात उठ आयी कि शायद थोड़े दिनों में वह माँ बननेवाली है। उसी क्षण, शायद मेरी आँखों के भाव को पढक़र, वह थोड़ा लजा गयी और उसके चेहरे की चिकनाहट में हल्की-सी सुरखी घुल-मिल गयी जिससे मेरा अनुमान निश्चय में बदल गया। बाँके ने हरबंस के कमरे में ले जाने के लिए कॉफ़ी बना ली थी। मैंने कॉफ़ी की ट्रे उसके हाथ से ले ली और कहा, “तुम रहने दो, मैं ले जाता हूँ।” जब मैं ट्रे लेकर वहाँ से चलने लगा, तो शुक्ला का सुर्ख चेहरा आग की तरह ही दमक रहा था।

हरबंस अपने पढऩे के कमरे में उसी पलंग पर लेटा हुआ था जिस पर एक बार मैंने रात काटी थी। अपने रूखे उलझे हुए बालों और दिन-भर की बढ़ी हुई दाढ़ी के कारण वह सचमुच बहुत बीमार लग रहा था। मुझे देखते ही वह एक झटके के साथ सीधा उठ बैठा और अपनी टाँगों पर फैले हुए कम्बल को हटाता हुआ बोला, “आओ, मैं तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रहा था। मैंने सोचा था कि शायद तुम कुछ जल्दी आओगे।”

मैंने ट्रे रख दी और एक ही साँस में पूरा ब्यौरा दे दिया कि सुबह से अब तक मैं किस तरह व्यस्त रहा हूँ। सिर्फ़ नीलिमा के पास जाने की बात मैंने नहीं बतायी। उसके पलँग के नीचे ह्विस्की की बोतल रखी थी जो तीन-चौथाई से ज़्यादा खाली थी। उसके साथ ही सोडा की कई खाली बोतलें रखी थीं। तिपाई पर कुछ फ़ाइलें रखी हुई थीं, जिनमें अस्त-व्यस्त लिखे हुए कुछ कागज़ थे। मैंने बैठते हुए एक सरसरी नज़र उन कागज़ों पर डाली, तो मुझे यह पहचानने में देर नहीं लगी कि वे वही कागज़ हैं जिन पर कभी उसने एक उपन्यास लिखना आरम्भ किया था और जो तब से अब तक उसी तरह उलझे हुए रखे थे। उसने जल्दी से उन फ़ाइलों को बन्द कर दिया और बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। “चलो साथ के कमरे में चलकर बैठते हैं।” उसने कहा, “कल रात से यहाँ पड़े-पड़े मेरा जिस्म और दिमाग़ बिल्कुल ज़ंग खा गये हैं।” और उसने खुद की ही कॉफ़ी की ट्रे उठा ली। हम दोनों बैठक के कमरे में आ गये, उसने खुद ही कॉफ़ी बनायी और एक प्याली मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

“तुम कल से अब तक बहुत सुस्त पड़ गये हो।” मैंने कहा। मैंने जान-बूझकर यह नहीं कहा कि वह कल से काफ़ी अस्वस्थ लग रहा है।

“शायद बिस्तर में पड़े रहने की वजह से ऐसा लग रहा हो।” वह बोला, “वैसे मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

“इसका मतलब है कि तुम पड़े-पड़े बहुत कुछ सोचते रहे हो।”

उसने सिर्फ़ कन्धे हिला दिये और कॉफ़ी के घूँट भरता रहा। फिर क्षण-भर बाद स्वयं ही बोला, “हाँ, कुछ सोचता भी रहा हूँ। और कुछ क्यों, कई कुछ सोचता रहा हूँ। तुम्हें पता है कि सावित्री घर छोडक़र चली गयी है?”

“मुझे पता है वह बीजी के घर पर है।”

“एक बार जब वह पहले छोडक़र गयी थी, तो मैंने महसूस किया था कि उसे नहीं जाना चाहिए था। मगर इस बार मैं बहुत सोच-सोचकर इसी नतीजे पर पहुँचा हूँ कि उसने जाकर शायद ठीक ही किया है। वह न जाती, तो हम लोग ज़िन्दगी-भर साथ रहकर उसी तरह कुढ़ते रहते। उसने अच्छा किया जो खुद ही निश्चय कर लिया। अगर यही निश्चय मुझे करना पड़ता, तो मेरे मन को ज़्यादा तकलीफ़ होती। अब मैं ज़्यादा साफ़ मन से अपने रास्ते पर लौट सकता हूँ।”

मैं उसका मतलब समझकर भी जान-बूझकर अनजान-सा उसकी तरफ़ देखता रहा। वह बताने लगा कि किस तरह जब पिछली रात को वे लोग लौटकर घर आये, तो पहले कुछ देर दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई और उन्होंने चुपचाप बैठकर खाना खाया। खाना खाने के बाद नीलिमा ने उसके बहुत पास आकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “तो तुम्हें आज मुझसे बहुत निराशा हुई है न?”

“अगर सच पूछती हो, तो मुझे बहुत निराशा हुई है।” वह बोला, “मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हें अभी कुछ दिन और इन्तज़ार करना चाहिए।”

इस पर नीलिमा भडक़ उठी और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी कि वह अपनी इन्हीं बातों से आज तक उसकी ज़िन्दगी नष्ट करता आया है; कि वह उसे बहुत छोटा और बहुत स्वार्थी आदमी समझती है; और कि उस दिन के शो को ख़राब करने की पूरी ज़िम्मेदारी उसी पर है। उसने जान-बूझकर अगर समय पर धोखा न दिया होता, तो आज वह दुनिया के सामने इस तरह ज़लील न होती। “मैं नहीं जानती थी कि तुम जान-बूझकर मेरे साथ इस तरह की हरकत करोगे।” वह कहती रही, “अगर तुममें ज़रा भी इन्सानियत का माद्दा होता, तो तुम मुझसे पहले ही कह देते कि तुम इस शो की सफलता नहीं चाहते। तुम अपने को बिल्कुल अलग रखते, तो भी सब कुछ ठीक हो सकता था। मगर तुमने जान-बूझकर ढोंग रचा, गुप्ता से झूठ बोला, मुझसे झूठ बोला और समय पर आकर हमें धोखा दे दिया। मैं तुम्हें इतने बरसों से अच्छी तरह जानकर भी पूरी तरह नहीं जान सकी थी। मैं नहीं जानती थी कि कोई इन्सान इतना नीचे तक भी जा सकता है। तुमने यूरोप में एम्प्रेसारियो के साथ मिलकर सारे ग्रुप को जिस तरह ख्वार किया था, उसकी भी वजह ठीक से मुझे अब समझ आ रही है। तुम्हारे लिए मैं सिर्फ़ औरत का शरीर हूँ, तुम्हारी वासना-पूर्ति का साधन, और तुम यह बरदाश्त नहीं कर सकते कि मैं इससे ज़्यादा कुछ बन सकूँ। तुम खुद एक असफल आदमी हो, इसलिए तुम मुझे भी अपनी तरह असफल बनाकर रखना चाहते हो। मगर मैं असफल चाहे रहूँ, तुम्हारे घर में अब नहीं रहूँगी। मुझे अफ़सोस है कि मैंने यह फ़ैसला बहुत पहले ही क्यों नहीं कर लिया। मगर अब समय हाथ से निकल गया है, इसलिए मैं मन मारकर चुपचाप तुम्हारे पास नहीं बैठी रहूँगी। मैं तुम्हारा घर छोडक़र जा रही हूँ और इसी समय जा रही हूँ। अगर तुम ज़रा भी इन्सान हो तो तुम मुझे रोकने या वापस बुलाने की कोशिश मत करना। मेरी तरफ़ से तुम्हें खुली छुट्टी है कि तुम जो जी चाहे करो, जिसे चाहे घर में रखो और जैसे चाहे अपनी ज़िन्दगी बिताओ। हम आज तक भी एक-दूसरे के लिए अजनबी थे, मगर इस बात को मानना नहीं चाहते थे। अब आगे के लिए इतना ही फ़र्क़ होगा कि हम इस बात को मानकर रहेंगे। अच्छा यही होगा कि आज के बाद न तुम मेरा चेहरा देखो और न ही मैं तुम्हारा चेहरा देखूँ। हमें आज से समझ लेना चाहिए कि हम एक-दूसरे के लिए मर चुके हैं।”

नीलिमा बोल रही थी और वह अपना सिर हाथ में पकड़े चुपचाप पलँग पर बैठा था। उसे बार-बार एक ही बात सूझ रही थी कि वह उसे बाँहों से पकड़ ले और उसके मुँह पर हाथ रखकर उसका मुँह बन्द कर दे। मगर वह यह भी नहीं कर सका और चुपचाप बैठा रहा। बोलते-बोलते नीलिमा के मुँह से झाग आने लगा, तो उसे उस पर दया भी आयी, मगर उसने बिना कुछ कहे चुपचाप ह्विस्की की बोतल लाकर खोल ली। नीलिमा दूसरे कमरे में चली गयी, तो उसने एक गिलास में ह्विस्की डालकर बाँके के हाथ उसके लिए भी भेज दी। मगर उसने गिलास बाँके से लेकर ज़मीन पर पटक दिया और जल्दी-जल्दी अपने कपड़े वगैरह बाँधकर खुद ही टैक्सी लाने भी चली गयी। जब उसने अपना सामान टैक्सी में रख लिया और सोये हुए अरुण को उठाकर बाहर जाने लगी, तो बाँके घबराया हुआ शुक्ला को बुलाने चला गया। मगर शुक्ला के आने से पहले ही वह वहाँ से चली गयी थी।

“तब से ही मैं इस लडक़ी को देख रहा हूँ।” हरबंस हाथ और टाँगें फैलाये कॉफ़ी का घूँट भरकर बोला, “कल रात से अब तक इसने क्या नहीं किया? मैं दरवाज़ा अन्दर से बन्द करके शराब पी रहा था और यह बाहर इस तरह बेचैन-सी घूम रही थी जैसे इसी के साथ कोई दुर्घटना हुई हो। मुझे इसने आवाज़ नहीं थी, खुद दरवाज़ा भी नहीं खटखटाया, इसलिए कि मैं इसके साथ बात नहीं करता, इसलिए कि मुझे इसका बुरा न लगे। मगर इसकी हर हल्की से हल्की आहट और फुसफुसाहट मेरे कानों में पड़ती रही है। बाँके जब भी दरवाज़ा खटखटाता था, तो मुझे पता चल जाता था कि यह दरवाज़े के पास ही खड़ी है। कभी-कभी तो मुझे महसूस होता था जैसे यह बन्द दरवाज़े से अन्दर चली आयी हो और मेरे सामने खड़ी होकर खामोश आँखों से मुझे देख रही हो। कोई व्यक्ति पास न होते हुए भी इतना पास हो सकता है, यह मैंने पहली बार महसूस किया। मुझे लग रहा था कि मेरे अन्दर की ही कोई कमज़ोरी उभरकर बाहर आ रही है और मैं इसकी उपस्थिति की बात भूल जाना चाहता था। मेरा शरीर और मन जैसे एक पहाड़ के शिखर से नीचे को झूलकर रुका हुआ था। मैं उस स्थिति से बचने के लिए, उसे भूलने के लिए, लगातार पीता रहा, पीता रहा। मगर मुझसे महसूस होता था कि जो चीज़ मुझे गिरने से बचाये हुए है, वह शराब नहीं है, एक ऐसा हाथ है जो छुए बिना मुझे कसकर पकड़े हुए है। मुझे मन में एक आभार का अनुभव भी हो रहा था और उस अनुभव से मुझे कुछ बुरा भी लग रहा था। मैं अनुभव से बचना चाहता था, मगर...।”
 
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