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अद्भुत-एक हॉर्रर कहानी complete

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चित्रा ने करन से पूछा,

तुम किस किसको न्योता देना चाहोगे

करन ने कुछ सीनियर फैकल्टी मेम्बरज के नाम गिना दिए जिन्हें वह एकाध बार मिल चुका था और जो शायद उसका नाम उसके चेहरे से जोड़ सकते थे . स्नातकों की फहरिस्त चित्रा और डेविड पर छोड़ दी .

रसल स्क्वेयर का अहाता लंदन के बीचो बीच पड़ता है . इंस्टीट्यूट ऑफ कामनवेल्थ स्टडीज और स्कूल आफ ओरियंटल ऐंड अफ़ीकन स्टडीज जैसी दो नामवर संस्थाएँ इसी अहाते में एक दूसरे से कुछ ही कदमों की दूरी पर हैं . वहां के सीनियर फैकल्टी मेम्बर्स इंग्लैंड में ही नहीं, दूसरे मुल्कों में भी आला तालीम, व्यापारी और सियासती मामलों में सलाह करते हैं, देते हैं . न जाने कौन, कब, किसकी नजर में पड़ जाये कहाँ से कहाँ पहुँच जाये वैसे भी करन यही मान कर चलता था कि अंग्रेज़ों ने ऐसा एम्पायर तो जरूर बनाया था जहाँ सूरज कभी डूबता नहीं, लेकिन जब वो टूट कर बिखरा तो काफ़ी मेस हो गई . उसे संभालने के लिए कुछ तो इमदाद चाहिए थी . वह तैयार था, बस बात उस पर किसी की नजर पड़ने की थी .

नीली छतरीवाला अगर अंग्रेज है तो उपर से नीचे देखने वक्त मैं उसे एक बार बस दिखाई दे जाऊँ, बाकी मैं खुद सँभाल लूँगा . उसने चित्रा से कहा, फिर तुम्हारी पार्टी में तो ताहिरा भी मेरे साथ होगी . उसे देख कर नजर फेर लेना मुमकिन ही नहीं .

सीनियर फैकल्टी मेम्बर्स जब तक पार्टी में रुके, बाकी मेहमान उन्हीं को घेरे रहे, उनके जाते ही पूरी पार्टी का नक्शा बदल गया . छोटी छोटी टोलियाँ बनीं और यहाँ वहाँ बिखर गई . कैंट, मार्लबरो और रॉथमैन सिगरेटों से उठते धुएँ की अलग–अलग महक कई–कई आवाज़ों से उठता बे–अल्फ़ाज शोर . खाली गिलासों को भरने के लिए कोने में रखी ड्रिंक्स की ट्रे की तरफ बढ़ते और वहाँ से लौटते कदमों की चहल पहल . करीनेवार बेतरतीबी का जीता जागता मेला . मेले में करन ताहिरा से कब जुदा हुआ, उसे पता नहीं चला .

दीवार से सटी बुक शेल्फ के पास खड़ी ताहिरा का जी चाहा कि वह एक नहीं, छः सात हो जाये . हर टोली में एक साथ शामिल हो, हर उठते हुए ठहाके पर खिलखिला के हँसे, और फिर किसी जादुई पिटारी में ताजा धुएँ की महक, उठती आवाजों का शोर, चलते फिरते कदमों की आहट को कैद कर ले . पिटारी इतनी छोटी हो कि आज तो उसके पर्स में आसानी से पूरी आ जाए . लेकिन हैडन सैंट्रल पहुँचनेपर फैल कर वो सारा कमरा भर दे जहाँ वह करन के जाने और लौटने के बीच बिल्कुल अकेली होती है . उस कमरे में न टी वी था, न रेडिओ न टेपरिकार्डर . उस कमरे की घड़ी भी टिक टिक नहीं करती थी . सड़क की तरफ खुलती एक खिड़की थी, गुसलखाने की तरफ जाते हुए गलियारे में एक दरवाजा . पचासी साल की स्पिंस्टर बहिन के मरने पर अस्सी साल के बिली को हैंडन सेन्ट्रल का मकान इकलौते वारिस की हैसियत से मुफ़्त मिला था . पिछले दस सालों में दो बीवियों को दफ़्न कर चुका था . अब एक बयासी साल की बेवा के चक्कर लगा रहता था . दो कमरों वाले मकान का एक कमरा किराये पर चढ़ा दिया था करन को . पूरे लंदन में करन को वहीं क्यों रहना पसंद आया, यह उसने ताहिरा को नहीं बताया . बस इतना ही कह दिया बिना ताहिरा के पूछे,

थोड़ी सी परेशानी बर्दाश्त कर लो भाई . हाथ खुलते ही निकल जायेंगे यहाँ से .

ताहिरा के कंधे पर एक मुलायम हाथ आ कर टिक गया .

क्यों ताहिरा यह फैसला नहीं कर पा रही हो कि किस खुशनसीब टोली में जाकर शामिल होना है आज चित्रा पूछ रही थी . डेविड उसके पास खड़ा था .

खुलते हुए गेहुए रंग और जहीन चेहरे वाली कली सी नाजुक चित्रा . मँझले कद का दुबला पतला लंबे भूरे बालों वाल डेविड . चित्रा अपने पाँव के नीचे आता एक कुशन उठाने को झुकी तो डेविड ने उसके माथे पर गिरते बालों की लट पीछे सरका दी . चित्रा ने हाथ बढ़ा कर ड्रिंक ट्रे से एक गिलास उठाया तो डेविड ने बोतल पकड़ कर उँड़ेलना शुरू कर दिया . गिलास उसके हाथों से लेकर पहले उसी के ओठों तक ले गया और उसके घूँट भरते ही खुद भी उसी गिलास से सिप करने लगा . अब चित्रा डेविड की बाँह के घेरे में थी और वह अपने ओठ उसके माथे पर रख कर लंबी साँस ले रहा था .

हम यहीं अपनी एक छोटी सी टोली क्यों ना बना ले कम से कम थोड़ी देर के लिये, सिर्फ हम तीनों डेविड ने कहा .

उसके खुले बालों में अँगुलियाँ घुमाती चित्रा हँस दी .

मुझे लगता है कि डेविड को अपने बालों की पोनी टेल बाँधनी चाहिये . मुझसे कहीं घने बाल हैं इसके . तुम्हारा क्या ख्याल है ताहिरा

ताहिरा का मन अचानक करन से बिल्कुल सट कर बैठने को हुआ . उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई .

करन को देख रही हो न वहाँ सोफ़े पर है .

ताहिरा को अपनी तरफ आते देखकर करन के साथ सोफ़े पर बैठे दोनों अजनबी उठ खड़े हुए . करन ने दोनों को वापस बिठा दिया फिर अपनी जगह पर ताहिरा को बिठा, खुद उसके पास सोफ़े के बाजू पर बैठ गया .

यह असलमबेग है, कराची से, और यह अयूमा ओवुली है नैरोबी से . उसने परिचय कराया . दोनों मेरी तरह इंस्टीट्यूट में फेलोज हैं .

असलम नें ताहिरा को अपनी बातचीत में शामिल करते हुए कहा,

हम लोग पीने वालों की जमातें बना रहे थे . एक वो जो बोतल देखकर कहते हैं आज तू नहीं या मैं नहीं, दूसरे वो जो पीते कम और झूमते ज्यादा हैं . वह रुका, भरपूर नजरों से पहले ताहिरा और फिर सामने से आती हुई चित्रा को देखा . फिर आह भर कर बोला,

तीसरे वो जिन्हें अच्छी सूरत देखकर बिना पिये ही नशा हो जाता है .

डेविड भी अब तक आ गया था और चित्रा के कंधे तक कटे बालों से छेड़खानी कर रहा था . चित्रा ने असलम की कही बात का तर्जुमा किया तो हँस कर बोला,

अगर तुम चित्रा को निहारने से एक आध मिनट की फ़ुरसत ले सको असलम, तो मैं पूछना चाहता हूँ कि तुम्हारे लिये क्या ला सकता हूँ मेरा मतलब है कि तुम्हारे पीने के लिये .

असलम न मुस्कुराया, न कुछ बोला . जब डेविड ड्रिंक्स ट्रे की तरफ जाने को मुड़ा तो असलम ने उसे रोक लिया .

एक बात बताओगे डेविड ऐसा क्या है तुम गोरे आदमियों के पास कि हमारे यहाँ की आला उमदा लड़कियों को तुम फाँस लेते हो और हमारे हिस्से आती हैं तुम्हारी बेचारी तलछट . दफ्तरों में टाइप करने वालियाँ, डाकघरों के खतों को मोहरें लगाने वालियाँ, बसों और गाड़ियों के टिकट बेचने वालियाँ

ताहिरा ने असलम की तरफ देखा . वो न तो पी रहा था न ही उसकी आँखों में कोई हँसी मजाक की हल्की सी छाँव थी .

करन ने बात का रुख मोड़ा .

यह सारा कुसूर मेरा है . न मैं ताहिरा को चित्रा समझता, न चित्रा डेविड से मिलती . मैं तो अपनी खूबसूरत बीवी को आज भी सेल्सगर्ल होते होते बचा लाया हूँ . क्या पता कौन खरीददार कभी दुकान की रसीद के साथ बेचनेवाली को भी बतौर तोहफ़ा पैक करवा लेनेकी ज़िद पकड़ ले .

इस से पहले कि चित्रा करन की बात का तर्जुमा करे, असलम करन की तरफ देखकर बोला .

तुम हिंदुओं की हीपोक्रसी का तो जवाब ही नहीं . यहाँ आते ही स्कर्ट पहनी हुई हर चीज के साथ लिपट जाने और जहाँ तहाँ जायका बदलने में तुम्हें कोई परहेज नहीं रहता . फिर वहाँ जा कर कुँवारी दुल्हनें ले आते हो जो तुम्हारे अलावा किसी को देख भी ले तो उनकी शामत . न उसकी आवाज में कोई चुहल थी, न चेहरे पर कोई मुस्कराहट .

अब बस भी करो असलम . अभी तक खामोश बैठे अयुमा आवुलो ने ट्रूस की माँग करता हुआ हाथ उठा दिया . तुम भी कैसा हरामीपना दिखाने पर उतर आये हो .

अब असलम उठ कर खड़ा हो गया . अयूमा ओवुली के कंधों पर उसने दोनों हाथ रख दिये और मुस्करा कर कहा,

तुम्हारी बात तो मैंने सुन ली, मेरे साँवले सलोने दोस्त, लेकिन अगर किसी गोरे हरामी ने मुझे माँ की गाली दी होती तो यकीनन उसी की माँ को ही खराब कर के उसकी बात रख लेता .

ताहिरा ने डेविड को देखा . उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न परेशानी . पास खड़ी चित्रा को देख उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े इत्मीनान से डेविड ने पूछा, चल के देखें कि पॉट रोस्ट तैयार हो गया या नहीं पक जाने की खुशबू तो आ रही है .

जैसे किसी ने कुछ कहा ही नहीं, जैसे किसी ने कुछ सुना ही नहीं .

अपोलो ११ की चाँद के धरातल पर पहुँचती तस्वीर ज्योंही टी वी पर उभरी, डेविड ने एक एक करके कमरे के सारे लैंप बुझा दिये . उस घुप्प अँधेरे में पूरा कमरा भी आसमान हो गया . फिर जो बत्ती जलाई तो कमरे की छत पर छोटे छोटे टिमटिम करते नीले बल्बों का चंदोवा था, हल्के स्लेटी रंग की दीवारों पर टंगे छोटे बड़े कई पोस्टर धुँधले बादलों की टुकड़ियाँ थीं, वॉल टू वॉल फरशी दरी एक तिलस्मी कालीन थी, और उस पर जहाँ तहाँ बिखरी मेहमानों की टोलियाँ अपनी अँगुलियाँ क्रास किये टी वी पर नजरें एकटक गडाए थीं जैसे पलक झपकने पर तिलस्म टूटने का अंदेशा हो . स्पेस सूट पहने नील आर्मस्ट्रांग का पहला कदम जब चाँद के अछूते धरातल पर उतरने में सिर्फ जरा सा ठिठका तो ताहिरा ने पास बैठे करन का हाथ कस कर थाम लिया . दुनिया के हर इन्सान के लाखों मील दूर, अपोलो ११ में अपने दूसरे साथियों की पहुँच से बाहर, यह अकेला इंसान इस वक्त कितनी नजरों के दायरे में है किसी एक अकेली जान को क्या कभी इतनी नजरों ने पहले भी एक साथ देखा है देखेंगी

तालियों की गड़गड़ाहट के साथ देखने वालों ने एक दूसरे को गले लगाया, शैम्पैन के ग्लास खनके . असलम अपना गिलास ताहिरा के गिलास से खनका कर करन से बोला,

आज के बाद खूबसूरत चेहरों की तशबीह चाँद के देने वालों का क्या होगा यार, मगर आज के दिन मुझे जाम उठाने की इजाजत दे ही दो . एक ऐसी खूबसूरत औरत के नाम जिसकी मिसाल चाँद से हो ही नहीं सकती क्योंकि उसके सामने चाँद भी फीका लगता है. मैं अपना यह जाम तुम्हारी दुल्हन के नाम उठाता हूँ, करन .

ताहिरा ने जाहिदा खाला को एक और खत लिखा,

खाला जान,

कल चित्रा ने हमारे लिए एक शानदार दावत दी . बहुत शहाना इलाके में रिहाइश है उसकी, लेकिन जमीन से ऊपर नहीं, जमीन के नीचे . यहाँ उसे बेसमेंट कहते हैं . दावत का सारा माहौल ही बिल्कुल तिलस्मी कर के रखा था उसने . मेहमान कह रहे थे कि मेरा काशनी मुकैश वाला दुपट्टा और चित्रा की बेसमेंट की नीची छत से टिमटिमाते छोटे छोटे नीले बल्बों की रोशनी में मुकाबला चल रहा है . किसके पास ज्यादा सितारे हैं

चित्रा की तो मैं फूफी हूँ न खाला जान . उम्र में भी मुझसे कोई साल भर छोटी है वो लेकिन मेरा ऐसा दुलार करती है वो जैसे मेरी आपा हो . बड़ी ही प्यारी है और सँभली हुई भी .

मैंने उसे एक बार भी माथे पर तेवर डाले नहीं देखा है तो बड़ी कम–गो . पर हर बात इशारतन सँभाल लेती है . मुझे तो लगता है कि वो जो भी चाहे कर सकती है . चाँद पर भी उतरती तो वहाँ ऐसे घूमने निकल जाती जैसे कम्पनी बाग में सैर करने गई हो .

लाहौर से लंदन इतना दूर तो नहीं है न खाला जान जितना जमीन से चाँद आप यहाँ आतीं तो कितना अच्छा होता .

आपकी अपनी गुड़िया

ताहिरा

हाँ एक बात और . मुझे मेरा खत मिलते ही लंबा सा खत लिखियेगा . इतना लंबा कि उसे एक बार पढ़ने में ही मेरा पूरा दिन निकल जाये . रुक रुक पढ़ूँगी और पढ़ती पढ़ती आपसे बातें करूँगी . कितनी बातें बतानी है आपको .

ताहिरा

पूरा करने के बाद ताहिरा ने काफ़ी बार सोचा कि डेविड के बारे में कुछ लिखे . चित्रा उसी के साथ रहती है . दोनों कितने प्यारे लगते हैं . लेकिन लिखा कुछ नहीं .
 
डाक में ख़त छोड़ते ही ताहिरा जवाब का इंतज़ार करने लगी, एक हफ्ता पहुँचने में, एक हफ्ता जवाब में . ठीक पंद्रह दिन में जवाब आया . सिर्फ तीन जुमले, वो भी छोटे छोटे .

ताहिरा, मेरी जान

कैसी बड़ी बड़ी बातें करने लगी है तू मैं तो हर वक्त तुझे ख़त लिखती रहती हूँ, मगर कलम से नहीं . अब भी आँखों में तेरी सूरत है और हाथ काँप रहा है .

फिर लिखूँगी, मेरी गुड़िया,

तुम्हारी ही ख़ाला

ख़त पढ़ते ही ताहिरा फिर लिखने बैठ गई .

मेरी बहुत याद आती है न आपको खाला जान, लेकिन मुझसे ज़्यादा नहीं मैं भी आपकी उस गुड़िया को बहुत याद करती हूँ जिसे नींद से उठाने के लिए कोलोनी के मुर्गे की बाँग कभी सुनाई नहीं देती थी, जो सुबह की अँगीठी के धुएँ को दोनों हाथों में समेटकर उपर हवा में उछालती थी, जिसके दुपट्टे का पल्ला दूधवाले की साईकल में फँस कर फटते हुए कई बार बचा था . जिसके बालों में तेल लगा कर आप पहले धूप में बिठा देती थीं और फिर ख़ुद ही कहती थीं, अब उठोगी भी या रंग मैला करने की कसम खा ली है . कितना लिखूँ ख़ाला जान कैसे कैसे कहकर लिखूँ आप को तो बिना बताए मेरी बात समझने की आदत है न बस थोड़ा लिखा ज़्यादा जानें और मेहरबानी करके अगले ख़त से लिखें कि आप पिछला ख़त लिखने के बाद कितनी देर तक रोई थी

ख़त डाक में छोड़ कर जब ताहिरा अपनी गली में मुड़ी तो किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया . मटमैले पैंट कोट वाला एक खुरदरा सा बुजुर्ग गोरा था . ताहिरा को अपनी तरफ देखते पाया तो उसकी गिजगिजी आँखों में लार उतर आई . खीसें निपोर कर बोला,

तो तुम्हीं हो वो ख़ूबसूरत बला जो उस सुअर बिली की गंदगी के ढेर में रहती है

उसके मुँह खोलते ही मछली, बीयर और टमाटर सॉस से मिली तले हुए आलुओं की एक बासी भभक उठी . ताहिरा ने अपने दुपट्टे का पल्ला मुँह पर रखने के लिए हाथ उठाया तो भभकी ने एक हाथ से उसके हाथ को कस कर पकड़ा और अपनी छाती पर दबा दिया . अपना दूसरा हाथ उसने ताहिरा की कमर पर रखा और कूल्हों से चिपटी उसकी रेशमी सलवार को सहलाने लगा .

थर थर काँपती ताहिरा ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई . भरी दुपहरी में कई लोग गली में आ जा रहे थे . कुछ ही हाथ की दूरी पर दो थुलथुली गोरी औरतें मलबे में फेंकने वाले काले रंग के थैले पकड़े बतिया रही थीं .

ताहिरा ने भभकी की गिरफ्त से छूटने की कोशिश करते हुए ज़ोर से चिल्ला दिया,

छोड़ो मुझे, प्लीज़ जाने दो . वह कहती गई और बड़ी आजिज़ी से थुलथुली औरतों को देखती गई . उनमें से एक ने अपने हाथ में पकड़ा काला थैला नीचे रखा, सुर्ख लिपस्टिक से सने ओठों को कानों तक खींच कर हँसी और पूछा,

कोई मदद चाहिए हनी

ताहिरा की जान में जान आई और हलक में अटक कर रह गई . लिपस्टिकी औरत ताहिरा से नहीं, भभकी से बात कर रही थी . भभकी ने ताहिरा के कूल्हों पर फिरते अपने हाथ को ज़ोर से दबाया और बड़ी सी चुटकी भर के कहा,

ऐसी कोई बात नहीं, मॅगी . मैं तो इस हूर परी से पूछ रहा हूँ कि क्या ये मुझे कहीं भी ज़रा सा छू कर देखना चाहती है कि मैं कितना ऊपर उठ सकता हूँ .

अब वो ताहिरा के हाथ को अपनी कमीज़ के अंदर घुसेड़ता हुआ नीचे की तरफ ढकेल रहा था . पूरे ज़ोर से उसे धक्का देकर ताहिरा भागी . घर के दरवाज़े पर ही बिली दिखाई दिया . ताहिरा की हिम्मत न हुई कि उससे कुछ कहे या पूछे . क्या उसने वह देखा था जो ताहिरा के साथ हुआ या वो बिली के लिए कोई देखने वाली वारदात ही न थी . वह करन को फोन करना चाहती थी, लेकिन उसके लिए बिली की इजाज़त लेनी पड़ती . फोन बिली के कमरे में ही था, ताहिरा कतरा गई .

अपने कमरे में पहुँच कर उसने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया . उसका जी चाह रहा था कि किसी रोशन जगह पर एक महफूज़ कोने में बैठ जाए और दहाड़ें मार कर रोए . लेकिन धूप से चौंधियाई उसकी आँखों को सारा कमरा घुप्प अँधेरे में खोया लगा . वैसे भी कमरे की छोटी सी खिड़की के आगे लगे भारी भरकम पुराने परदों की ओट से रोशनी अंदर आते हुए सहम जाती थी . ताहिरा ने खिड़की के पास जाकर एक परदा हटा दिया और उसी के साथ टंगी डोरी से बाँधना चाहा . तभी बाहर से फेंकी एक ईंट खिड़की के शीशे पर लगी और काँच के कई टुकड़ों समेत कमरे की दरी पर आकर टिक गई . हटाया हुआ परदा ताहिरा के हाथ से छूट कर फैल गया .

बुत सी बनी ताहिरा कुछ देर चुपचाप खिड़की के पास खड़ी रही . फिर हल्के अँधेरे को टटोलती हुई बिजली का स्विच जला कर वह कमरे के दरवाज़े के साथ पीठ टिका अपने आस पास देखने लगी . इस चौकोर कमरे का कौन सा कोना ऐसा महफूज़ है जहाँ वह अपने घुटनों पर सिर रख कर आँखें बंद कर ले

अचानक ताहिरा के सारे बदन में एक ज़ोर से कँपकँपी उठी जैसे उसने कोई बिजली का नंगा तार छू लिया हो .

हाँ, उसने लंबी सांस ली, अब मुझे पता लग गया कि मैं करन के घर से जाने के बाद खिड़की के पास ही क्यों बैठ जाती हूँ, वह अब अपने आप से बात कर रही थी .

मुझे खौफ लगा रहता है कि मेरे अकेले होते ही इस कमरे की कोई न कोई चीज़ अपना हुलिया बदल डालेगी . किसी न किसी बहाने मुझसे वह करवा देगी जो मुझे नहीं करना चाहिए .

वह बोलती जा रही थी .

नहीं कुछ करवाएगी नहीं, टोकेगी हाँ टोकेगी वह करने से जो मैं करती रहती हूँ .

अब वो आँखें फाड़ फाड़ कर सारे कमरे को देखने लगी जैसे हर छिपे हुए जिन्न का सुराग ढूँढती हो .

छोटे से कमरे में ठूँस कर रखा हुआ तमाम फर्नीचर या तो बहुत बड़ा था या सालों के इस्तेमाल का मारा . भरकम फोर पोस्टर बेड के ऊपर उबड़ खाबड़ लिहाफों और पैबंद लगे सीले से कम्बलों का एक ढेर था जिसे तेज़ धूप और ताज़ी हवा की सख्त ज़रूरत थी .

छिलते हुए बदरंग गद्दों से ढकी, छुओ तो कराहती एक ही कुरसी थी जिसमें एक अकेला बैठे तो पीठ का सहारा देने में लुड़क जाए और दो जन बैठें तो साँस न ले सकें . कमरे के बीचो बीच टेड़ी मेड़ी टाँगों वाली एक गोल तिपाई के आस पास दो भारी लोहे के फ्रेम की कुर्सियाँ थीं जिन्हें खाना खाते वक्त ज़रा भी खींचना धकेलना पड़े तो नीचे बिछी बेरंग दरी का छेक और फैल जाए .

बुझी राख से भरी ठंडी फायरप्लेस को भुतहा बनाने के लिए अगर कोई कमी थी तो सिर्फ एकाध मकड़ी के जाले की, वरना उसके सामने पड़े पुराने ताँबे और लोहे के काले देगचे तो पहले ही आग फूँकने और बुझाने के हथियारों से लैस थे .

जो कभी फर्शी दरी रही होगी, अब वह एक बड़ा सा चिथड़ा था जिसे खींच तान कर उसके पैबंदों को फर्नीचर के नीचे छिपा दिया गया हो .

फोर पोस्टर बेड कई बार ताहिरा को अकेले पा कर फुसफुसा चुका था .

मत सोया करो इसके साथ . यह तुम्हारे ऊपर सवार होकर तुम्हें कचोटेगा और तुम्हारा दम घोट कर खुद आराम से ख़र्राटे लेगा

शाम को करन के आने से पहले जब वह खाने वाली मेज़ पर प्लेटे सजाती तो कई बार मेज़ की टेड़ी मेड़ी टाँगें ताहिरा के टखनों या घुटनों से टकरा कर टोकतीं,

क्यों रोज़ रोज़ उसके लिए ऐसा लज़ीज़ खाना पकाती हो वो तो तुम्हें रोज़ाना पिल्स ही खाने को कहता है न ताकि उसका मज़ा बना रहे और तुम अभी माँ न बन सको . तुम्हें क्या जल्दी है माँ बनने की अभी तो तुम्हें तेईसवाँ साल ही लगा है न मत फटकने दो उसे अपने पास पिल्स खाकर जो सारा दिन तुम्हारा मन भारी रहता है उसे पल दो पल के शौक से क्या बहलाना

दिन के गुमसुम हल्के उजाले में जब वह बेनागा फायरप्लेस के उपर वाली मैन्टलपीस की धूल झाड़ती, तो राख की ठंडी ढेरी नीचे से बुदबुदा कर इल्तजा करती .

मेरी बात सुनो ताहिरा, कहीं से थोड़ी सी सूखी लकड़ी लाकर बस एक बार मुझे जलती आग की गरमी दे दो . फिर देखना, मैं किस होशियारी से इस सारे कमरे को फूँक कर अपने जैसा बना दूँगी .

कमरे में इधर उधर जाते जब कभी किसी पैबंद पर उसका पाँव पड़ता तो पूरी की पूरी फर्शी दरी सिहर उठती .

मेरी भी मजबूरी है, ऐ खूबसूरत शहज़ादी ऐसी जगह–जगह से छिदी हुई न होती तो तेरा तिलस्मी कालीन बन जाती . रोज़ दिन में उड़ाकर तुम्हें ज़ाहिदा ख़ाला के पास छोड़ती और शाम को लौटा लाती, करन के घर वापिस आने से पहले . मज़ाल थी किसी की जो गलत–सलत कह–छू कर तुम्हें परेशान करता

ज़ाहिदा के लिए ताहिरा उस कुँवारी माँ की इकलौती औलाद थी जिसकी गोद तो भरी थी, मगर कोख नहीं .

एक हुनरमंद कहारन के पुश्तैनी ओसारे से तप कर निकला बेशकीमती तोहफा थी ताहिरा . गुँधती माटी में सर का एक छोटा सा बाल भी रह गया होता तो तोहफे में खोट रह जाता . किसी खानदानी ललारी के सधे हुए हाथों से रंगा सतलहरिया दुपट्टा थी ताहिरा . महीन चुन्नटों मे बँधा कोई रंग ज़रा सा भी फैल जाता तो दुपट्टे की लहरियाँ सैलाब बन जातीं . गुजरात से लाहौर जाती पैसंजर गाड़ी के हिचकोले खाती बीस–बाइस साल की ज़ाहिदा की गोद में पड़ी, मरी माँ के पेट से निकली, सतमासी पैदाइश का जिंदा करिश्मा ताहिरा . लाहौर की रिफ्यूजी कालोनी में एक कमरे वाले घर में रहने की दरख़ास्त लिखती ज़ाहिदा के कंधे से लगी फूल सी हल्की ताहिरा .

रिफ्यूजी कॉलोनी के शोरोगुल भरे अहाते में ज़मीन पर आगे पाँव पसारे बैठी हुई ज़ाहिदा के घुटनों और टख़नों के बीच मुँह के बल लिटाई, बादाम के तेल की मालिश करवाती, पटोले सी ढीली ढाली ताहिरा . आस पास के घरों की अँगीठियों पर मिट्टी का लेप करती उकडू बैठी ज़ाहिदा की पीठ से चिपटती, अपने पाँव पर खड़ा होना सीखती ताहिरा . रस्सी पर कढ़ाई किए पलंगपोश को लटकाती, हाथ उठाए खड़ी ज़ाहिदा की कमर को अपने सिर से छू कर खिल खिल करती गुड़िया सी गोल मटोल ताहिरा .

गोरी चिट्टी, भूरी नीली आँखों वाली ताहिरा .

घनी पलकों और घुँघराले बालों वाली ताहिरा .

नाजुक अंगुलियों और नर्म हाथ पैरों वाली ताहिरा .

स्कूल का बैग उठाए कॉलनी के नुक्कड़ से सड़क को मुड़ते हुए लौट लौट कर ख़ाला को हाथ हिलाकर देखती ताहिरा .

और फिर एक दिन अपने चेहरे को दोनों हाथों से थामे ज़ाहिदा के काँधों से कहीं उपर सिर निकालती, ज़रा सा झिझक कर पूछती ताहिरा .

ख़ाला जान, मैं किस के जैसी दिखती हूँ अम्मी जैसी

आपा जैसे तो बस घने बाल और लंबी गर्दन है तेरी . कद–काठी, चेहरा–मोहरा, नैन–नक्श सब रायसाहिब के छोटे बेटे गोपाल जैसे हैं . बड़ा खूबरू था वो जब मैंने देखा था, ज़ाहिदा ने कहा और एक ठंडी साँस भरी .

बदरूनिसा से मिलने ज़ाहिदा कभी कभार ढक्की दरवाज़ा गली चली जाती थी . छुट्टी वाले दिन जाती तो कहीं न कहीं गोपाल दिखाई दे जाता . कभी घर में, कभी गली में . सीढ़ियाँ उतरते–चढ़ते एकाध बार ज़ाहिदा का दुपट्टा गोपाल की कमीज़ की कुहनी छू लेता .

चाची, मैं पूछ रहा था, कहता हुआ गोपाल रसोई में गपशप करती बहनों को अपने आने से आगाह करता और फिर चाय या पानी की फरमाईश करते कुछ देर के लिए दहलीज़ पर टिका रहता .

पता नहीं किस रिश्ते से उसने बदरूनिसा को चाची कहना शुरू किया था . एक बार इविनिंग इन पेरिस के अत्तर की दो छोटी छोटी नीली शीशियाँ ले आया और चाची की दे दीं .

यह दो किस लिए बदरूनिसा ने पूछा, एक तो आपके लिए है चाची . दूसरी आप ज़ाहिदा को दे दें न कह कर वह दहलीज़ पर टिके बिना मुड़ गया . ज़ाहिदा ने शीशी लेने को हाथ बढ़ाया तो बदरूनिसा ने छोटी बहिन का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया .

मत कुबूल कर ये तोहफा, मेरी लाड़ो . जिस गली में रहना नहीं उसका पता पूछ कर क्या करेगी
 
बँटवारे के बाद गोपाल ने बदरूनिसा को एक ख़त लिखा जिसे अमृतसर से लाहौर पहुँचने में करीबन बीस बरस लग गए . दंगे फसादों के ख़ून–ख़राबे में कुछ डाक के थैले भी ज़ख्मी हुए थे . मारो काटो से लहू–लुहान एक मुसाफिर ने रात के अँधेरे में डाक गाड़ी के थैलों में पनाह ली थी और वहीं पर हमेशा के लिए सो गया था . उसके ज़ख्मों के निशान कुछ थैलों की उपरी परत से चिपटे ख़तों ने अपने उपर ले लिए थे . गोपाल के लिखे ख़त पर बीवी बदरूनिसा, मकान नम्बर चौदह, ढ़लकी दरवाज़ा गली बच गया, गुजरात धब्बा बन गया . ख़त शहरों शहरों भटका . यहाँ नहीं है के ठप्पे खा खाकर तुड़ा मुड़ा . जब गुजरात के एक पुराने डाकिये के हाथ पड़ा, तो अपने दोनों हाथ उपर उठा कर कहा,

वाह री चिठ्ठी, इतने बरसों बाद तुझे अपना सिरनांवा मिला है तो ज़रूर ख़ुदा बिछड़ों को मिलाने की अपनी तज़वीज़ में मुझे शामिल करना चाहता है .

चौदह नम्बर मकान के नए मालिक को वहाँ रहते दस बरस गुज़र चुके थे . डाकिए ने ख़त उसे नहीं, बेकरी वाले बख्तियार को दे दिया . बदरीलाल के नुक्कड़ वाले मकान में अब वही रहता था . जब तक उसकी घरवाली जीती थी, ज़ाहिदा के साथ ख़तो–ख़ताबत करती रही . एकाध बार लाहौर जाकर मिल भी आई थी .

गोपाल का ख़त ज़ाहिदा को मिल गया . उसने बार बार पढ़ा . ताहिरा को पढ़ाया .

अमृतसर

१ अक्तूबर १९४७

चाची,

भाइया जी को हम उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ अपने साथ लाए थे . वो अमृतसर नहीं पहुँचे . बॉर्डर पार करने से पहले ही खून ख़राबे में दम तोड़ दिया और अपनी ज़िद रख ली .

इकबाल भापा पुलिस में भरती हो गया है . मैं एल.एल.बी. में दाख़ला ले रहा हूँ .

आप लोगों की सलामती की दुआ करता हूँ . अपनी ख़ैरियत का ख़त अमृतसर पुलिस स्टेशन के मार्फत लिखेंगी तो हमें मिल जाएगा .

गोपाल

जिन लोगों की सलामती माँगी है इस ख़त ने, उसमें तो तू और मैं भी आते हैं न ज़ाहिदा ने ताहिरा से पूछा . और ख़त का जवाब लिखवा भेजा . इकबाल की मार्फत गोपाल को .

लाहौर

५ जनवरी १९६८

गोपाल भाई जान को ताहिरा का सलाम .

अम्मी के नाम लिखा आप का ख़त मिल गया . वो भी अपनी मर्ज़ी के खिलाफ ही गुजरात से लाहौर जाने वाली गाड़ी में चढ़ी थी . मगर उतरी कभी नहीं .

ज़ाहिदा ख़ाला और मैं ख़ैरियत से हैं . मैंने इसी साल बी॰ए॰ किया है .

ख़ाला जान आप सबकी सलामती की दुआ के साथ अपना सलाम कहती है .

ख़त का जवाब आने में मुश्किल से एक महीना भी नहीं लगा .

दिल्ली

१० फरवरी १९६८

ताहिरा बीबी,

अपने भाई जान को लिखा तुम्हारा ख़त पढ़ कर हमें कितनी खुशी हुई है, इसका शायद ही तुम अंदाज़ लगा सको .

हमारी बेटी चित्रा, तुम्हारे भाई जान और मैं जल्द से जल्द तुम्हें और ज़ाहिदा को मिलना चाहते हैं . चित्रा इसी साल आर्ट हिस्टरी में एम॰ए॰ करने लंदन चली जाएगी . कितना ही अच्छा हो अगर उसके जाने से पहले आप दोनों कुछ दिन हम सब के साथ हमारे पास रहो .

चित्रा के जाने में अभी दो तीन महीने हैं . वो तुम्हें मिलने को बहुत उतावली हो रही है . तुम्हारा ख़त आते ही तुम्हारे यहाँ आने का इंतज़ाम तुम्हारे भाई जान कर देंगे . ज़ाहिदा को ज़रूर साथ लाना . और हम सब का सलाम कहना .

तुम्हारे भाई जान यहाँ मैजिस्ट्रेट हैं . मैं मोतीलाल नेहरू कालेज में हिस्टरी पढ़ाती हूँ .

तुम्हारे ख़त के इंतज़ार में बड़े प्यार से,

तुम्हारी भाभी

मालती

मोतीलाल नेहरू कालेज में मालती के कलीग और इंग्लिश विभाग के हैड डाक्टर शिवनाथ जुत्शी अपने भतीजे करन को चित्रा से मिलवाना चाहते थे . जम्मू कश्मीर युनिवर्सिटी से पोलिटिकल साईंस में एम॰ए॰ करने के बाद वो एक साल के लिए कॉमनवेल्थ फेलोशिप लेकर लंदन जाने वाला था .

मोतीबाग में गोपाल मलिक के ग्राउंडफ़्लोअर वाले फ़्लैट में उस दिन सुबह से ही आना–जाना लगा था . छुट्टी का दिन था . मिलने वाले चित्रा को लंदन जाने की बधाई देने आते, और ताहिरा को मिल कर जाते . शाम को करन जब अपने चाचा के साथ पहुँचा तब भी चार पाँच लोग गोपाल और ताहिरा को घेरे बैठे थे . नए आने वालों का स्वागत करने के लिए गोपाल को उठते देख, करन ने दोनों हाथ जोड़ कर अपना माथा छुआ और फिर एक सरसरी नज़र आस पास दौड़ा कर कहा,

मुझे खुद ही आप दोनों को पहचान लेने का मौका दीजिए, सर . आप मैजिस्ट्रेट गोपाल मलिक हैं, और जो आप के बायें हाथ बैठी हैं, वह आपकी बेटी चित्रा है .

गोपाल उस से हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़े ही थे कि करन ने उन्हें बड़े ही नाटकीय तरीके से फौजी सलाम ठोका .

मैं पूरी इमानदारी से कसम खा कर कहता हूँ, सर मैंने बाप–बेटी की ऐसी खूबसूरत हमशकल जुड़वाँ जोड़ी नहीं देखी .

गोपाल मुस्करा दिए . करन के कंधे पर अपना हाथ रख कर पूछा, तुम करन हो न तुम्हें तो अपने चारों तरफ खूबसूरती देखने की आदत होनी चाहिए भई . कश्मीर की वादी तो खूबसूरती की जन्नत है .

कश्मीर की वादी न सर मगर मैं तो दिल्ली की बात कर रहा हूँ . पिछले एक महीने में कनाट प्लेस के कई चक्कर लगा चुका हूँ . लगता है अच्छी सूरतें मोतीबाग से बाहर नहीं निकलतीं आजकल .

गोपाल अब हँस दिए . ताहिरा के सिर पर अपना हाथ रखा और कहा,

यह ताहिरा है . मेरी छोटी बहिन .

ताहिरा करन ने दुहराया .

हाँ, परसों ही लाहौर से आई है . गोपाल कुछ रूक कर बोले, बँटवारे में गुम गई थी . अब मिली है .

करन ने ताहिरा को उपर से नीचे तक बड़े गौर से देखा . थोड़ी देर चुप रहा और फिर बड़े ही तपाक से बोला .

यह गुम कैसे हो सकती है सर इन्हें देखकर तो देखने वालों के होश–हवास गुम हो सकते हैं . एक बार दिखाई दे जाएँ तो दुबारा देखने की उम्मीद में भूख–प्यास गुम हो सकती है .

कमरे में बैठे हुए सभी लोग अपनी बातचीत छोड़ कर करन और गोपाल को ही देख रहे थे . एक पुरज़ोर ठहाके की आवाज़ हुई, जिसमें डाक्टर शिवनाथ जुत्शी भी शामिल थे . अब कहीं जाकर उन्हें गोपाल से हाथ मिलाने का मौका मिला .

बड़ा हाज़िरजवाब और खुश मिज़ाज है आपका भतीजा, जुत्शी साहिब . गोपाल ने कहा, फ़े.लोशिप का टॉपिक जो भी हो, इसके हाथ लग कर दिलचस्प हो जाएगा .

कहता तो है कि पार्लियामेंट्री प्रणालियों और परंपराओं की जानकारी हासिल कर के किसी पोलीटिकल पार्टी में शामिल हो जाऊँगा . डॉ॰जुत्शी बोले .

यहाँ या वहाँ गोपाल ने करन को ज़रा छेड़ कर कहा .

इस का फैसला तो मौका–माहौल देखकर ही

होगा न सर . इस वक्त तो बस यही तय किया है कि लंदन में रह कर अंग्रेज़ी बोलना सीखूँगा .

क्यों बर्खुरदार अंग्रेज़ी तो तुम अब भी अच्छी ख़ासी बोलते हो . उसके लिए लंदन जाना बात कुछ बनी नहीं . गोपाल को करन से चुहल सी करने में लुत्फ आ रहा था .

बात ही तो बनती है सर . कोई मामूली सी बात भी अगर ब्रिटिश एक्सेंट में अंग्रेज़ी बोल कर कहें, तो उसमें काफी वज़न आ जाता है . करन ने कहा और फिर निहायत संजीदगी से बी बी सी वाले एक्सेंट की बखूबी नकल करते हुए बोला,

आई कैन नौट से इट विद एब्सोल्यूट सरटेनिटी फ्रॉम दिस डिस्टेंस बट इट अपियर्स दैट विजय हज़ारे इज़ गोइंग टु बी डिक्लेयर्ड एल बी डब्ल्यू .

कमरे में फिर एक खुला हुआ ठहाका उठा . गोपाल ने हँसते हुए करन की पीठ ठोकीं और बोले,

बहुत खूब फिर ड्राइंगरूम के अंदर की तरफ खुलते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए कहा,

मैं चित्रा को बुलाकर लाता हूँ . तुम उससे मिलना चाहते थे न

करन ने गोपाल का रास्ता रोक लिया .

एक मिनट रूक जाइए सर, मुझे आपसे कुछ पूछना है .

गोपाल ने सिर हिलाकर हामी भर दी . करन अब ताहिरा की तरफ बढ़ा, फिर जिस कुरसी पर वो बैठी थी, उसके पास खड़ा हो गया .

मैं पूछना चाहता हूँ सर कि आपकी बहिन बोल तो लेती है न

गोपाल दरवाज़े की तरफ जाते जाते मुड़ आए .

ताहिरा, अगर तुम कहो तो इस बातूनी के लिए तुम्हारी तरफ से मैं कुछ कह दूँ

कहिए न भाई जान . ताहिरा बड़े अदब से बोली और कुर्सी से उठ कर गोपाल के पास खड़ी हो गई .

तुम्हारी अम्मी कभी कभी एक गज़ल गुनगुनाया करती थी . उसी का एक शेर याद आ रहा है, गोपाल ने ताहिरा की पीठ पर अपना हाथ रख कर कहा और करन की तरफ देखा .

प्लीज़ सर इनकी तरफ से कहिए तो कुछ भी कह दीजिए, करन बोला . मैं ही नहीं, यहाँ बैठे सभी लोग सुनना चाहेंगे .

अच्छी बात है . सुनिए, शेर ग़ालिब का है . ताहिरा की अम्मी उनकी ग़ज़लें अक्सर अपने रेडिओ प्रोग्राम में गाती थीं . वह बोलते बोलते रूक गए जैसे कुछ और याद आ गया हो .

हमारे साथ रहना शुरू किया तो गाना छोड़ दिया पर गुनगुना देती थी कभी कभी .

कमरे में एकदम ख़ामोशी छा गई . गोपाल ने शेर कहा,

है कुछ ऐसी ही बात कि चुप हूँ

वरना क्या बात कर नहीं आती .

ताहिरा ने बाहर से फेंकी जाने वाली ईंट की बात करन को बताई तो वह तमक उठा . सवालों की बौछार कर दी .

ईंट तुम्हें कहीं लगी

नहीं .

तुमने खिड़की से बाहर किसी को खड़े या भागते देखा

नहीं .

और वह काँच उसका कोई टुकड़ा तुम पर गिरा

नहीं .

ताहिरा को इंतज़ार था कि करन अब उसे बाहों में लेकर कहेगा कि शुक्र है तुम ठीक हो, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ .

वो ईंट कहाँ है करन ने पूछा जैसे उसे शक हो कहीं ताहिरा ने खुद ही खिड़की का शीशा तोड़ा है .

ताहिरा ने सारा दिन दम साधे करन के लौटने की राह देखी थी . चाहा था कि उसकी बाज़ुओं में सिमट कर पहले जी भर के रो ले और फिर जब वो अपने ओठों से ताहिरा के आँसू पोछे तो सिसक–सिसक कर कहे,

हमें यहाँ नहीं रहना, करन .
 
लेकिन करन था कि उसी की जवाबतलबी पर लगा था . ऐसे सुबूत इकठ्ठे कर रहा था जैसे कोई पेशावर वकील किसी मुवक्किल के नए मुकदमे की पैरवी करने की तैयारी में हो .

वो ईंट कहाँ है ताहिरा करन ने फिर पूछा .

ताहिरा ने खिड़की के नीचे वाली दीवार की तरफ इशारा कर दिया . करन ने जेब से रूमाल निकाला . उसे ईंट पर रखा और फिर ईंट को ऐसे सँभाल कर कमरे के बीच वाली मेज़ पर रखा जैसे कोई ताज़े फूलों का गुलदस्ता सजा रहा हो .

ताहिरा के लिए अपनी उमड़ती रूलाई रोकना मुश्किल हो रहा था .

करन अब खिड़की के पास खड़ा परदा उठाकर पूछ रहा था,

यह काँच तो बुरी तरह से चूर चूर हुआ है .

ताहिरा हुमक कर फ़ायरप्लेस की तरफ बढ़ी, दीवार से टिका कर रखा एक दुहरा ब्राउन बैग उठाया और करन की तरफ बढ़ा दिया . बैग भारी था, उसे दोनों हाथो में लेने के लिए ताहिरा ने ज्योंही अपना दूसरा हाथ बैग के मुहाने पर रखा, करन ने उसके हाथों से बैग थामना चाहा . और इसी पकड़ धकड़ में बैग में से झाँकता एक नुकीला बड़ा सा काँच ताहिरा की हथेली में चुभ गया .

खून की एक बड़ी सी बूँद निकली और धार बन कर ताहिरा की हथेली से उसकी कलाई तक फैल गई . सन्न सी खड़ी ताहिरा ने अपनी ज़ख्मी हथेली को दूसरे हाथ में पकड़ा और बहते खून पर अपना अँगूठा दबा दिया .

करन काच वाले बैग को ईंट के पास मेज़. पर रख के चुपचाप ताहिरा को देख रहा था . उसको अपने अँगूठे से हथेली दबाते देखा तो बड़ी रूखाई से बोला, इतनी ज़ोर से मत दबाओ, यहाँ आओ में देखता हूँ .

ताहिरा अपनी जगह से नहीं हिली तो करन ने पास आकर उसका अँगूठा उसकी हथेली से हटा दिया . कलाई पकड़ कर उसकी हथेली का रुख फर्श की तरफ किया . पहले तेज़ तेज़ कदमों से चला कर ताहिरा को खिड़की के पास ले गया . फिर वैसे ही चला कर कमरे के दरवाज़े तक कई बार ताहिरा की हथेली से छूटे खून के कतरे अब तक कमरे की मटमैली फ़र्शी दरी पर यहाँ वहाँ गिर चुके थे . वह समझ नहीं पा रही थी कि करन क्या करना चाहता है . इससे पहले कि वह पूछे, करन ने उसे अपनी बाहों में थाम लिया .

चलो ताहिरा, वहाँ कुर्सी पर बैठो . मैं तुम्हारा हाथ धोकर बैंडेज कर देता हूँ . उसकी आवाज़ में अब नरमी थी और आँखों में फ़िक्र . कुरसी पर बैठते ही ताहिरा फफक कर रो दी .

अगले दिन करन ताहिरा को अपने साथ रसल स्क्वेयर ले गया . जहाँ कहीं कोई जान पहचान वाला दिखाई दिया, वहीं करन ने रुक कर बात की . खुद बड़ी गरमजोशी से हाथ मिलाया और ताहिरा की तरफ़ देख कर कहा .

माफ़ी चाहता हूँ . ताहिरा आज आप से हाथ नहीं मिला पाएगी . कल शाम हमारे साथ एक अजीब हादसा हो गया था .

कुछ करन की नक्शेबाज़ी, कुछ लिखने वाले की कलम की करामात, कुछ कश्मीर से जुड़ी हर नई खबर में इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉमनवेल्थ स्टडीज़ और स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल अ‍ॅण्ड आफ्रिकन स्टडीज़् की गहरी दिलचस्पी . कैम्पस जरनल में करन और ताहिरा के बारे में लिखा लेख छपते ही रसल स्क्वेयर ही नहीं, आस पास के कई इलाकों में सनसनी बन गया .

दो सफ़े के लेख में चार रंगीन तस्वीरें थी . पहले सफ़े के बीचों बीच चित्रा की दी गई पार्टी में लिया बड़ा सा फ़ोटो . काशनी मुकैश वाले दुपट्टे में फ़िल्म स्टार जैसी खूबसूरत ताहिरा के साथ सट कर मुस्कुराता हुआ नेहरू जैकेट वाले सूट में राजकुमारों जैसी शख्सियत वाला करन . दूसरे सफ़े पर एक तस्वीर में टूटे हुए काँच के आगे से खिड़की का परदा हटाता हुआ घबराया सा करन, दूसरी तस्वीर में परेशान सी, सहमी सी ताहिरा की पट्टी बँधी हथेली को फूँक से सहलाता फ़िक्रमंद करन . और पूरे दूसरे सफ़े के ठीक उपर एक कोने से दूसरे कोने तक चढ़ते सूरज की सुर्ख सुनहरी धूप में झिलमिलाती डल लेक में फूलों से लदे शिकारों की तस्वीर .

खूबसूरती की पैदाइश पर बदनुमा हमला उनवान था लेख का पहले जुमले में ही ऐसा समाँ बाँधा गया था कि पढ़ने वाला पूरे दो सफ़े पढ़े बिना छोड़ न पाए .

शहज़ादे जैसा कश्मीरी ब्राह्मण करन हाथ में ताज़ा गुलाबों का गुलदस्ता लिए हेंडन सेन्ट्रल पहुँचने की जल्दी में था . पाकिस्तानी ताहिरा के साथ उसकी शादी को उस दिन छह महीने हो गए थे . वह वक्त से पहले पहुँच कर अपनी नई नवेली दुल्हन को चौंका देगा, ऐसा सोचकर जब उसने घर के अन्दर कदम रखा तो क्या देखा बेपनाह हुस्न की मालकिन ताहिरा के नाज़ुक हाथ खून से रँगे हैं . और वह ज़र्द चेहरा लिए दरवाज़े और खिड़की के बीच चक्कर लगा रही है .

उसे कश्मीर के एक जाने माने सेक्युलर हिन्दू परिवार की लाखों की जायदाद और कालीनों के व्यापार का लाड़ला वारिस करार करते हुए, लिखने वाले ने करन के कई किताबी जुमले बखूबी दुहराए थे .

खूबसूरती का कोई मज़हब नहीं होता . करन कहता है

मुल्कों की सरहदें इन्सानी रिश्तों के बीच दीवारें नहीं उठा सकतीं . यह करन की उम्मीद नहीं, बल्कि उसका अपना तजुर्बा है .

ताहिरा के साथ शादी के बाद मेरी अगर दो ही औलाद हुई तो उन में से एक उस जलूस में शामिल होगा जो कश्मीर को इंडिया का ही हिस्सा मानता है और दूसरा उसके खिलाफ़ नारे लगाता रहेगा . यह था करन का जवाब जब उस को पूछा गया कि कश्मीर के मसले को लेकर उनकी आनेवाली पीढ़ी किस का साथ देगी माँ का या बाप का

लेख के मुताबिक ताहिरा के हिन्दू पिता अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़माने में रायसाहिब थे और मुसलमान माँ एक मशहूर रेडिओ सिंगर .

लेख के आखिरी हिस्से में कहा गया था कि शादी के बाद लंदन आना करन और ताहिरा की ज़रूरत नहीं, मजबूरी थी . दिल्ली या कश्मीर में रहने पर उन दोनों के परिवारों को कट्टर मज़हबी लोग नुकसान पहुँचा सकते थे .

गैर मुल्की रस्मों–रिवाज़ों के बारे में अपनी जानकारी जताते हुए लिखने वाले ने यह भी कहा कि हिंदू घरों में शादी के बाद दुल्हनें अपने ससुराल में रहती हैं और मायके वाले उन्हें दान में दे देते हैं .

ताहिरा का भी कन्यादान हुआ . दिल्ली की एक छोटी सी कचहरी में एक सादी सी सिविल मैरेज के बाद उसका कन्यादान किया दिल्ली के जाने माने मैजिस्ट्रेट गोपाल मलिक ने . ताहिरा के हिंदू पिता गोपाल के भी पिता थे . गोपाल की हिंदू माँ उनके पिता की ब्याहता पत्नी थी . और ताहिरा की मुसलमान माँ

उनकी कोई शादी नहीं हुई .

ताहिरा और करन को क्लीवर विलेज में रहते करीबन छह महीने हो गए थे . रॉयल बोरोह ऑफ़ विंडसर की इस सबसे पुरानी बस्ती का नाम कभी क्लिफवेअर था शायद यानि कि पहाड़ी के रहने वाले . ज्यादातर सपाट धरातल वाले क्लेवर विलेज की पहाड़ियाँ वक्त ने कब और कैसे ज़मीन में छिपा दीं, यह तो यकीनन कोई नहीं जानता . बस कुछ पुराने घराने वालों का कहना है कि विंडसर कैसल उनके पुरखों की आँखों के सामने बना था . उस इलाके मे मीलों तक बाढ़ जैसा उमड़ता थेम्स दरिया तब भी कुछ दूर तक एक काफी चौड़ी सी गली बन कर बहता था . वहीं बस गया था क्लीवर विलेज . उन दिनों न कोई रेल की पटरी थी, न ही दरया पार करने का पुल . सिपाही, व्यापारी, कारीगर तंग दरिया पार करके इस किनारे से उस किनारे जाते थे .

क्लीवर विलेज वाले किनारे पर खड़े होकर जब ताहिरा ने पहली बार विंडसर कैसल को देखा तो कई बार निगाहें इधर उधर घुमाने के बाद भी पूरा नज़ारा एक साथ न देख पाई .

दूर दूर तक उठती गिरती लहरों से खींचा थेमस दरिया का हाशिया . हाशिये से उपर उठती घने पेड़ों की कद्दावर मेहराबें . मेहराबों से बहुत ऊपर उठती ठोस पत्थरों की दीवार और दीवार के सिर पर पहना कढ़ावदार बुर्जियों, उभरते गुम्बदों और तीखे तर्राशे स्टीपलस् का बुलंद बेमिसाल ताज . ईंट, पत्थर, गारा, चूना, मिट्टी की उम्रे दराज़ी की ज़िंदा दास्तान .

ताहिरा जब भी यह नज़ारा देखती तो सोचती कि अगर दुनिया में पुराने किलों की कोई बिरादरी होती तो विंडसर कैसल बेचारा कितना अकेला होता . खंड़हरों और तारीख़ी इमारतों के बड़े से हजूम में बसा–बसाया किला . लेकिन बेचारा क्यों होता मगरूर होता वो तो अभी तक उन्हीं बादशाहों और मलकाओं की रिहायश है जिनके पुरखों ने उसे बनवाया था .

ताहिरा इस किनारे पर खड़े होकर उस किनारे पर बसे विंडसर कैसल को बार बार देखने आती . छोटा रास्ता लेती तो पंद्रह मिनट भी न लगते . लेकिन वो जब भी आती, एक नए रास्ते चल कर पहुँचती . कभी इंग्लिश समर की गुदगुदी धूप सेंकते कॉटेजेस के पिछवाड़ों में लगे बेशुमार गुलाबों के रंग पहचानती हुई, कभी अभी अभी बरस के थमी बरसात से धुले छोटे गिरजा घर की सरहदी हेज के यूज़् की पत्तियों की कतरन को सँवारती हुई, कभी सूखे पत्तों के कालीन पर अपने कदमों के चरमरी शोर के लिए ख़ामोश माफ़ी माँगती हुई और कुछ एक बार चर्चयार्ड की शुमाली दीवार के पास बनी एक कब्र को देखकर अपने हाथों की अँगुलियों को एक एक करके खींचती हुई .

किसी मेरी एैन हल्ल की कब्र थी जो अठारह साल तक मलका विक्टोरिया के बच्चों की नैनी रही थीं . उन सभी शहज़ादे, शहज़ादियों ने कब्र के उपर एक सिल में अपने नाम खुदवा कर उसके लिए अपने प्यार को पत्थर में लिख दिया था . ताहिरा ने वो नाम कभी नहीं पढ़े . उसकी नज़र बस देर तक उस क्रास पर टिकी रहती जो कब्र से उठकर एक बेहद बारीकी से खुदे हुए खजूर के पत्ते की शक्ल इख्तयार कर लेता था . ताहिरा अपनी अँगुलियाँ उस खुदे हुए पत्ते पर फिराती तो उसे लगता कि उसकी रगों में से किसी छोटे से बरतन में से छलक कर पानी की कुछ बूँदें उसकी हथेलियाँ गीली कर देती हैं . पैरों को नम हाथों से पुंछवा देती हैं . उसकी अँगुलियों के नम पोर कुछ छूना चाहते हैं, कुछ ऐसा जिसे वह गूँथ सके, सँवार दे, सजा सके, निखार दे . जो सब के बीच होता हुआ भी सबसे अलग हो .

केअरटेकर की हैसियत से रहने के लिए क्लीवर विलेज में जो घर करन को मिल गया था, उसके न आगे किसी मलबा फेंकने की हौदी थी, न पीछे कोई आम रास्ता . पाँचों कमरों में हर एक की अलग सजावट . चमकती लकड़ी के फ़र्श पर जहाँ तहाँ बिछे बेशकीमती छोटे बड़े कालीन . ऊँची चौड़ी साफ़ सुथरी शीशे की खिड़कियों के आगे महीन और मोटे दुहरे परदे . तपी गेरूआ ईंटों की फ़ायरप्लेस में सूखी साफ़ लकड़ियों का छोटा सा गठ्ठर, तहा के रखे बुरदार तौलिये, बिना सिलवट के चादरों और सिरहानों के गिलाफ़ों की सजी सजाई ढेरियाँ .

ताहिरा ने एक दिन लिविंग रूम के कोने वाली गोल मेज़ पर रखा बोन चायना का बड़ा सा नाजुक गुलदान उठा कर कमरे के बीचों बीच पड़ी कॉफ़ी टेबल पर सजा दिया . मेज़ के नीचे वाले हिस्से पर बिखरी रंग बिरंगी भारी जिल्दों वाली कला की किताबों को सहेज कर मेज़ के उपर रखना ही चाहती थी कि गुलदान ने निहायत तहज़ीब से टोक दिया .

माफ़ कीजिएगा मैडम . किसी भारी सी किताब के साथ इत्तफ़ाकन छू जाने का खतरा मुझे परेशान करता रहेगा . वैसे भी कौन जाने कब कोई कॉफ़ी उँडेलता हुआ हाथ ज़रा सा काँप जाए और मुझे उसकी गरम बूँदों के छालों से झुलसना पड़े

बॅकयार्ड में सुखाई धुली हुई चादरों को तहा कर अलमारी में रखने वाली थी कि एक मुलायम इल्तज़ा हुई .

अगर आप बुरा न माने तो एक गुज़ारिश है मेरी . एक दो मिनट का अपना कीमती वक्त मुझे देकर आप मेरी सलवटें निकाल देंगी क्या आज बाहर धूप में कोई खास गरमी नहीं थी . इस्त्री करने वाला फ़ोल्डिंग बोर्ड वहाँ लांड्री रूम की दीवार से टँगा हुआ है, ये तो आप जानती ही हैं .
 
लकड़ी के फ़र्श पर उसके हाथ से छूट कर एक टमाटर गिर गया था जो उसी के पाँव के नीचे आकर कुचला गया . जब वो फ़र्श पोंछने के लिए किचन टॉवेल गीला करके लाई तो लकड़ी का तख्ता कराह दिया .

आपको परेशान करते हुए मुझे बहुत ही झिझक महसूस हो रही है . लेकिन प्लीज़, मेरे ऊपर आप पानी ना इस्तेमाल करें तो बड़ी मेहरबानी होगी . शायद दिखने में मज़बूत टीक की लकड़ी सा ही लगता हूँ, मगर ऐसा है नहीं . दर असल मुझे तो सीलाहट से अ‍ॅलर्जी है .

ज़ाहिदा खाला के हाथ से कढ़ाई किए पलंगपोशों की एक जोड़ी निकाल कर उसने डबल बेड पर बिछा दी . साथ साथ बिछाए तो डबल बेड के बीचों बीच एक दरार पड़ गई . उसने एक पलंग पोश को चौड़ाई में बेड के पायताने से सिरहाने तक बिछाया और तकियों के उपर दूसरा पलंगपोश दुहरा उढ़ा दिया . खिड़की के पास खड़े होकर अपनी सूझ बूझ की हामी भरने ही वाली थी कि पूरा का पूरा बेडरूम फुस फुस करने लगा . दीवारों के रंग, बेड साइड नाईट स्टैंडस् पर रखे टेबल लैम्प की छोटी छोटी छतरियों के रंग . फ़र्श से दीवार तक उठती खिड़की के सामने रखी आरामकुर्सी के गद्दे, कोने में पड़ा ब्ल्यू ट्यूडर का गुलदान .

वाह क्या बेजोड़ हाथ के काम का नमूना है . कितनी नफ़ासत से की गई कढ़ाई है . पता नहीं कितना वक्त लगा होगा ये दो पलंगपोश बनाने में . आज कल ऐसी चीज़ देखने को कहाँ नसीब होती है यह तो हमारी ही बदनसीबी है कि हम ऐसी अनोखी चीज़ के साथ रहने की हिमाकत नहीं कर सकते . ना हमारे रंग ना हमारी सजावट की स्कीम . कितने शर्म की बात है कि दीज़ टू डोन्ट बिलॉन्ग हिअर

यहाँ नहीं तो कहाँ व्हेअर दे डू बिलॉन्ग क्या सिर्फ़ पलंगपोश ही आउट ऑफ़ प्लेस है या ताहिरा भी, और करन वो तो क्लेवर विलेज पहुँचने से पहले ही वहाँ ऐसा रच रम गया था जैसे विंडसर केसल वालों के साथ बाद दुपहर की चाय पीने का आदी हो . हैंडन सेंट्रल छोड़ कर पैडिंगटन स्टेशन से ब्रिटिश रेल में बैठते ही उसके दिमागी ट्रान्स्फ़ॉर्मर ने हादसों को मौका बनाकर उसके मतलब निकालना शुरू कर दिया था .

मुझे तो यकीन है कि उस बदमाश गोरे ने हमारे कमरे की खिड़की का काँच तोड़कर हमारी किस्मत का दरवाज़ा खोल दिया है . चित्रा बता रही थी कि कैम्पस जरनल में लेख पढ़ते ही डॉ॰ टेलर ने उसे बुलाकर खुद ही हमारे बारे में पूछा था . अब तो सारे कैम्पस में यह अफ़वाह है कि मैं उनकी नज़र में आ गया हूँ . सब जलने लगे हैं मुझसे, ऑफ़ कोर्स, देअर आर एक्सेपशन्स . लेकिन फिर भी .

ज्यादातर लोग तो क्लीवर विलेज के टेलर हाउस में रहने का मौका हासिल करने के लिए एक आध हाथ पाँव गँवाने को तैयार हो जाते . ख़ास कर इसलिए कि उन्हें पता है कि डॉक्टर टेलर जब सबाटिकल पर होंगे, तो यहाँ उनकी रिहाइश वाली खतो–खिताबत का ज़िम्मा मुझ पर होगा . बहुत भरोसा किया है उन्होंने हम पर . तुम्हें भी पूरी एहतियात से रहना होगा . जो जहाँ जैसे छोड़ कर गए हैं, लौटने पर उनको सब कुछ वैसा ही मिलना चाहिए .

करन बोलता चला गया . उसके कंधे की तरफ़ वाला ताहिरा का एक कान उसकी बात फिर सुन रहा था . हर बार उस बात को दुहराते वक्त करन उसमें कोई और नुक्ता निकाल लेता था . लेकिन उसे सुनने के लिए एक ही कान काफ़ी था .

ताहिरा का दूसरा कान ब्रिटिश रेल की रफ्तार और आवाज़ का ताल मेल बैठाने में लगा था . इतनी तेज़ रफ्तार और ऐसी कम आवाज़ हरियाली के इतने रंग उसने पहले कभी नहीं देखे थे . उसने खिड़की से आँखें हटा कर करन को देखा .

ज़ाहिदा ख़ाला कहती थी कि कच्चे हरे और सावे कचूच के बीच हरे रंगों का एक कुनबा होता है . अंगूरी, मेहँदी, तोतिया, घीयाकपूरी, ज़हरमोहरा, मूँगिया . . .

यह तुम रंग गिन रही हो या सब्ज़ी–तरकारियों की लिस्ट बना रही हो करन ने उसे बीच में ही टोक दिया . फिर वह उठ खड़ा हुआ . सीट की बाज़ू से टिका अपना अखबार उठाया और ताहिरा का कंधा थपथपा कर बोला,

तुम अब आराम से अपने रंगों की गिनती करो . मैं वहाँ सामने वाली सीट पर बैठता हूँ, वैसे भी मुझे उसी तरफ़ देखना पसंद है जहाँ मैं जा रहा हूँ . जो पीछे छूट गया उसे कब तक देख सकता हूँ

खिड़की से बाहर पीछे छूटती हरियाली तो भाग दौड़ कर ब्रिटिश रेल के साथ ही चल रही थी . सिर्फ़ उफ़क वहीं का वहीं था, डूबते सूरज की फैलती सुर्खी में नहाया . छोटे छोटे रूई के गोलो जैसी बदलियों के तौलिए से बदन पोंछता ताहिरा आँख झपकने से कतरा रही थी . बीच आसमान में उगते डूबते सूरज के रंग उसने देखे थे . लेकिन मीलों फैली हरियाली के पार रंग बदलता उफ़क नज़र के सामने पहुँच से दूर इतनी नज़दीकी, इतना फ़ासला.

गाड़ी जब स्टेन्स पर रूकी तो बिज़नेस सूट और ब्रीफ़केस वाली एक अंग्रेज़ औरत करन के पास वाली सीट पर आकर बैठ गई . ट्रेन के चलते ही उसने अपना ब्रीफ़केस अपनी गोद में रखा और आँखें मूँद लीं .

खिड़की से बाहर अब सुरमई छिटपुटे में दूर दूर तक इक्की दुक्की रोशनी के छोटे छोटे हजूम टिमटिमाने लगे थे . ताहिरा देखती रही और झपक गई . जब उसने आँख खोली तो देखा कि उसके सामने वाली दो सीटों पर एक आदमी और औरत बड़े सुकून से आँखें मूँदे सटे–सटाए बैठे हैं . औरत का सर मर्द के कंधे पर है, मरद का सिर औरत के कटे हुए भूरे बालों पर झुका है .

ताहिरा ने गौर से देखा . औरत तो बिलकुल सोई हुई थी, लेकिन मर्द आँख मूँदते ही खर्राटे लेने वाला करन क्या वाकई इतनी खामोशी से सो सकता है या खर्राटे बैठ कर सोने से नहीं आते

ताहिरा देखती रही और सोचती रही .

मेरे बिस्तर में मेरे साथ सोने वाला मेरा शौहर आज मेरी ही आँखों के सामने एक अजनबी औरत के सर का सहारा लेकर आँखे मूँदे बैठा है . और मेरे मन में एक बार भी यह खयाल नहीं आता कि मैं इसे जगा दूँ . क्या वाकई मुझे कोई रंजिश नहीं जो रंज नहीं दे पाता, वह खुशी देगा क्या

डचेट स्टेशन पर गाड़ी रूकते ही अंग्रेज़ औरत ने कुछ हड़बड़ा कर आँखें खोलीं और अपना ब्रीफ़केस उठा कर खड़ी हो गई . करन वैसे ही आँखें मूँदे रहा . औरत ने एक बार करन को देखकर ताहिरा से कहा,

लगता है मैंने इनका कंधा उधार ले लिया था . और फिर वह हल्का सा मुस्करा कर गाड़ी से उतर गई .

गाड़ी के दुबारा चलते ही करन ने आँखें खोल दीं .

लगता है मुझे झपकी आ गई थी, उसने मुँह पर हाथ रख कर जमुहाई ली और खिड़की से बाहर छूटते हुए स्टेशन को देख कर बोला .

हमें अगले स्टेशन पर उतरना है .

उस रात जब टेलर हाउस के साफ़ सुथरे बिस्तर में करन ने ताहिरा को टटोलना शुरू किया तो वह इंतज़ार करती रही . अब उसका बदन मौज बन के उठेगा . अब उसके होंठ मीठे दर्द से चीखेंगे . अब वो डूबते सूरज की अलसाई धूप जैसी बिखर कर सिमट जाएगी . अब. अब. अब. जब उसकी कमर पर रखे करन के हाथ की गिरफ़्त ढ़ीली पड़ गई तो ताहिरा को लगा कि वह महज़ चाभी घुमा घुमा कर चलाने वाला एक ढोलकिया खिलौना है . चाभी पूरी होने तक इंतज़ार करता है . चाभी पूरी होते ही हाथ पाँव चला कर कुछ देर ढोलक बजाकर नाच गा लेता है . चाभी खत्म होते ही फिर वैसे का वैसा, ख़ामोश बिना किसी हरकत के साबुत सबूत . ना नाचने का शरूर, न गाने का हुनर .

क्लीवर विलेज में रहने के बाद ताहिरा को एक नई लत पड़ गई थी . यहाँ वहाँ से माटी इकट्ठी करने की . बॅकयार्ड में टूल शेड के पास एक छोटा सा गढ़ा बना कर वह माटी को पैरों से रौंधती, हाथों से ढेरियाँ बनाती, अँगुलियों से गाँठें निकालती और घंटों तक छोटे बड़े खिलौने बनाती . थाली, कटोरी, तवा, परात, चकला बेलन, कुर्सी मेज़, अँगीठी चूल्हा . करन के आने तक धूप सेकते अपने खिलौनों को देखती और फिर सहेज कर टूल शेड के एक ख़ाली शेल्फ़ पर रख देती .

एक दिन ताहिरा ने इंग्लिश मार्मालेड का एक ख़ाली मर्तबान गुंधी माटी में लपेट दिया . भरी दुपहरी डाइनिंग रूम की बड़ी खिड़की के चौड़े शीशों से आती धूप में रख कर उसे सुखाया . सँभाल कर मर्तबान खींच लिया और माटी के एक नए मर्तबान को कच्ची फल तरकारी के टुकड़ों का गजरा पहना दिया . अब वह रोज़ कोई नया बरतन बनाती . कभी अधसूखे बरतन में छुरी की धार से महीन खुदाई करती . कभी गीले बरतन को सूखे फूल पत्तों की बेलें बनाकर सजा देती . टूल शेड का सामान एक कोने में सिमटता गया . और वहाँ की शेल्व्ज पर माटी के ताज़ा बरतनों की कतारें लगने लगी .
 
ज़ाहिदा को ताहिरा का एक और खत पहुँचा .

क्लीवर विलेज १८ अगस्त १९७०

ख़ाला जान

मेरे माटी के बरतनों में तरेड़ रह जाती है . मेरे हाथों से चिपकाए फूल पत्ते माटी में घँस तो जाते हैं मगर सूख कर अपने रंगों की शोखी गँवा देते हैं .

आपने मुझे माटी रूँधना क्यों नहीं सिखाया ख़ाला जान आप के हाथों रंगे दुपट्टे अभी तक लिशकते हैं मेरे ऊपर . मेरे हाथों वैसा पक्का रंग मेरे बरतनों पर क्यों नहीं चढ़ता

मोटे मोटे हरफ़ो में जाहिदा का लिखा जवाबी खत ताहिरा ने बार बार पढ़ा .

लाहौर २८ अगस्त १९७०

बस्ती टीले वाले कहते थे कि गाने का हुनर मेरी आपा को घुट्टी में मिला था . मैं कहती हूँ ताहिरा कि माटी रूँधने का हुनर तेरी धमनी में है . गुँधती माटी में टोब्बे पड़ सकते हैं, फुँदनी उठ जाती है लेकिन तरेड़ नहीं पड़ती . तरेड़ पड़ती है गीले बरतन को तपाने में, हर बरतन का अपने हिस्से का ताप . कम तपे तो कच्चा रह जाए, ज्यादा तपाओ तो तरेड़ . एक बार तप कर सूखा तो चाहो जब तक धूप में पड़ा रहे . तप जाएगा दुबारा, लेकिन नई तरेड़ तभी पड़ेगी जब किसी की ठोकर लगे .

मुझे ठीक से समझाना नहीं आता मेरी गुड़िया . लेकिन फिर भी कोशिश करती हूँ . माटी को रंगना क्यों रूँधी माटी तो अपने ही रंग ले कर तपती है न गाचनी, बिस्कुटी, स्लेटी, नीला, काशनी . हर रंग का अपना छोटा सा कुनबा . जितनी तेज़ धूप की गरमी उतनी चटख रंग की शोखी . जैसी झीनी छाँव, वैसा हल्का रंग . बस तू तो बरतन तपाने में लंदन की धूप छाँव का हिसाब बना ले . हर बरतन को उसी के हिस्से का ताप देगी तो न तरेड़ आएगी, न रंग मैला होगा उसका .

खुश रहो मेरी जान .

सितम्बर के महीने में लंदन की धूप छाँव का क्या हिसाब धुंध घनी हो तो दोस्त अजनबी बन कर गुम जाए, छंटे तो अजनबी हमकदम हो ले . क्लीवर विलेज में भी सुबह कोहरा बन के होती, दोपहर धुआँ बन के फैलती और शाम गुबार बन कर उमसती . करन सुबह के कोहरे को कोसता हुआ घर से निकलता और शाम का गुबार लेकर वापस आता . गुमसुम सी ताहिरा को देखता तो कभी टीवी चला देता और कभी अपने पास बिठा कर समझाता .

तुम इतना सोचा न करो ताहिरा . देख लेना, टेलर के सबैटिकल का साल खत्म होने से पहले ही हम अपने घर में होंगे . अगर तुम्हें इसी इलाके में रहना पसंद है तो मैं यहीं ब्रूनेल में कोई अच्छी सी पोज़ीशन देख लूँगा . वो बोलता जाता और ताहिरा सुन लेती . लेकिन उसे जो सुनाई देता, वो करन ने कहा होता तो ऐसे नहीं जैसे वह बोला था .

यह क्या तुम हर वक्त मुँह फुलाए बैठी रहती हो, देखती नहीं यह सारा दिन मेहनत करके तुम्हें आराम से रखने की ही तो कोशिश में हूँ . शायद करन ने ऐसा कभी नहीं कहा था, लेकिन ताहिरा को कई बार यही सुनाई दिया था .

एक दिन करन जब शाम को लौटा तो उसके हाथों में ताज़ा फूलों का गुलदस्ता था . ताहिरा को पकड़ा कर उसने चहकते हुए कहा .

मैंने कहा था ना तुम्हें . मुझे ब्रुनल युनिवर्सिटी में इवेंट ऑर्गनाइज़र की पोस्ट ऑफ़र हुई है . नई युनिवर्सिटी है प्रोफेसर टेलर वहाँ की अ‍ॅडवाइज़री बोर्ड के मेम्बर हैं . उन्होंने ही मेरा नाम सुझाया था . अब तुम बस पिल्स खाना छोड़ो और अपने लिए जीते जागते खिलौने बनाने की तैयारी करो . हम लोग अगले महीने ही मूव कर जाएँगे, फिर चाहो तो अपनी खाला को बुलवा लेना .

हमेशा की तरह आज भी करन एक ही साँस में ताहिरा से करने वाली बात को खत्म कर के ही रूका . अक्सर वह सुन भर लेती थी . आज पूछ बैठी,

और अगर मैं ऐसा न चाहूँ तो

टी वी चलाते हुए करन की पीठ थी ताहिरा की तरफ . वैसे ही चॅनेल्स के बटन दबाते हुए बोला .

क्या न चाहो

वही सब जो तुमने प्लान किया है . ताहिरा ने कहा . और कुछ रूक कर बोली, मेरे लिए .

करन अब टी वी से नज़र हटा कर उसकी तरफ देख रहा था .

क्यों भई, तुम्हें क्या परेशानी है

कोई खास नहीं . मुझे सोचने के लिए वक्त चाहिए, ताहिरा ने कहा और किचन की तरफ मुड़ते हुए पूछा, खाना लगा दूँ

हाँ, बड़ी कस के भूख लगी है, कहते हुए करन भी ताहिरा के साथ किचन में आ गया .

चलो, आज खाना मैं लगाता हूँ . उसने ताहिरा के हाथ से प्लेटें ली, खाना परोस के एक प्लेट उसे थमा दी और कहा,

वहीं टी वी के सामने बैठ कर खाएँगे .

ताहिरा ने जो कहने के लिए कई बार सोचा था वह आज भी न कह पाई . बस उस रात जब करन ऊपर सोने गया तो वह देर तक नीचे अकेली टी वी के सामने बैठी रही . ऊपर तब गई जब उसने इत्मीनान कर लिया कि करन खर्राटे ले रहा है .

अगली सुबह घर से निकलते वक्त करन ने बड़े प्यार से ताहिरा का माथा चूम लिया .

सोच लिया तुमने उसकी आवाज़ में शरारत थी .

नहीं, मुझे वक्त चाहिए . ताहिरा ने कहा .

तो लीजिए न वक्त मिसेज़ ताहिरा ज़ुत्शी . हमारे साथ लाहौर की कैम्प कॉलोनी से लंदन के क्लीवर विलेज आने के बाद, और कुछ शायद आपको न मिला हो, वक्त की कमी नहीं है आपके पास . करन की आवाज़ में तनज़ थी और चेहरे पर मुस्कराहट .

वैसे भी इतने अच्छे मौसम में सोचोगी तो अच्छा ही सोचोगी . इतने दिन बाद खुल के धूप निकली है आज .

करन के जाते ही ताहिरा ने जल्दी जल्दी हाथ के काम निबटाए और टूल शेड जा पहुँची . कुछ देर खड़ी होकर एक कोने में रखे मुँह बँधे थैलों में भरी मिट्टी के रंग पहचानती रही, फिर कोने के आखिर में रखा एक थैला उठाने के लिए शेल्फ के नीचे झुकी, थैला पकड़ कर सिर ऊपर उठाया तो शेल्फ से टकरा गई . स्टील के दो बै्रकेटस् के ऊपर बिना कीलों से टिकाया हुआ लकड़ी का शेल्फ उलट कर जमीन पर आ गिरा . उस पर रखे बरतन खिलौनों में से कुछ शेल्फ के नीचे दबकर टूट गए . कुछ एक दूसरे से टकरा कर जो कुछ साबुत सबुत बचे, उनमें एक ताहिरा के पैर से टकरा कर वहीं टिक गया था . ताहिरा ने उठा लिया, बिल्कुल साबुत था . बिस्कुटी रंग की छोटी सी, चौड़ी गरदन वाली मटकी . नीचे अधगीली माटी में चीची उँगली डुबो कर बनाए गए गोल गोल छेदों की तड़ागी, ऊपर गले में पड़ा छुरी से काट काट कर बनाया गुलूबंद . पूरा एक हफ़्ता लगा था ताहिरा को उसे सजाने सँवारने में . जब तप कर तैयार हुआ तो ताहिरा ने उसके अंदर एक छोटी सी, मोटी सी मोमबत्ती रख कर जलाई थी . करन के लौटते ही उसका हाथ पकड़ कर खींचती हुई टूल शेड में ले आई थी उसे . एक सरसरी नज़र डाल कर करन वापिस मुड़ गया था जैसे कोई छूटती हुई गाड़ी पकड़नी हो . ताहिरा भागी भागी उसके पीछे लिविंग रूम में पहुँची तो देखा कि वह जंक मेल को गौर से पढ़ रहा था .

ताहिरा ने हाथ बढ़ा कर जंक मेल का पुलिंदा करन के हाथ से हटा दिया और पूछा,

तुम्हें कैसा लगा

क्या

वही जो मैं तुम्हें दिखाने ले गई थी,

वो. . ठीक था . करन ने पुलिंदा वापिस लेते हुए कहा,

लेकिन उस का तुम करोगी क्या

तहिरा टूल शेड में लौट आई थी मटकी में जलती मोमबत्ती बुझाने, और आज उसी मटकी को हाथ में उठाए जब वह लिविंग रूम की तरफ मुड़ी तो टूल शेड़ की जमीन पर टूटे बिखरे सभी बरतन खिलौने बगावती हो गए .

इसे अंदर मत ले जाओ . हम तो हादसे का शिकार हुए हैं . एक ही बार जो चोट लगी थी, लग गई . वहाँ रोज रोज करन की रुखाई कौन बर्दाश्त करेगा

ताहिरा ने मटकी को सँभाल कर ऊपर वाले शेल्फ पर रख दिया . बाकी सब कुछ वैसा ही बिखरा छोड़ कर तेज़ कदमों से टूल शेड के बाहर आ गई . धूप की रोशनी में अब कुछ गरमी भी आ गई थी . उसने एक बार आसमान को देखा, नहीं, वहाँ कोई बादल नहीं था . आज जैसा दिन न जाने फिर कब आए धुंध आएगी, बर्फ गिरेगी, लेकिन आज धूप थी . उसे आज ही की धूप सेंकनी थी . इसी एक दिन में अपने हिस्से की धूप छाँव का हिसाब लगाना था . कम तपी तो कच्ची रहकर घुल जाने का वहम .
 
ज्यादा तपी तो तरेड़ पड़ने का खतरा . यह जो दिनों की धुंध के बाद आज धूप निकली थी, यह उसी के हिस्से का ताप था . इससे फ़र्क ताप शायद उसके हिस्से में न हो, न इससे कम न ज्यादा . लेकिन क्या इतना ही ताप उसकी जरूरत थी कौन मापेगा उसका हिस्सा उसकी ज़रूरत

ताहिरा दौड़ती सी बैकयार्ड से घर में घुसी और साँस रोके कागज़ कलम लेकर खत लिखने लगी . जब तक लिखती रही, एक बार भी सिर नहीं उठाया . इस खत का एक एक हरफ़ उसने कई कई बार लिखा था, बस कागज़ पर ही नहीं उतार पाई थी . आज लिखने बैठी तो कुछ भी वक्त नहीं लगा, न सोचने में, न कागज पर उतारने में .

खत लिख कर उसने पर्स में डाला और घर से बाहर निकल गई . थेम्स दरिया के किनारे पहुँचने में आज उसे पंद्रह मिनट भी नहीं लगे . वहाँ धूप सेंकने वालों का मेला लगा हुआ था . ताहिरा तब तक चलती रही, जब तक उसे एक खाली बेंच दिखाई न दी . वहाँ बैठ कर उसने पर्स खोला और अपना लिखा खत पढ़ा . पहली कुछ सतरें चुपचाप पढ़ीं, फिर बोल कर के जैसे किसी के पास बैठे से बात करती हो .

१० सितम्बर १९९०

अम्मीजान,

जाहिदा खाला को खत लिखते तो मुझे डेढ़ बरस ही गुजरा है, लेकिन आपको मैं तब से खत लिखती आ रही हूँ, जब मैं पढ़ना लिखना नहीं जानती थी . मुझे यकीन है कि मेरे वो सारे खत आपने पढ़े हैं और कहीं सँभाल कर रख दिए हैं . मेरा यह खत कहीं सँभाल कर रखने से पहले क्या मुझे इसका जवाब नहीं लिख सकतीं आप मुझे वह जवाब चाहिए अम्मी क्योंकि जो फैसला मैंने आज किया है, वो मेरा नहीं आपका है .

दिल्ली में मैंने जब करन से शादी करने को हाँ कर दी तो ज़ाहिदा ख़ाला नें कहा था,

यह शादी ताहिरा करन से नहीं कर रही, यह तो बीबी बदरूनिसा की बेटी करवा रही है .

अपनी मुसलमान माँ की, अपने हिन्दू बाप के साथ जो हमेशा उसका मुरीद तो रहा लेकिन शौहर न बन सका .

करन कहता है कि खूबसूरती का कोई मजहब नहीं होता . होता है अम्मी होता है . हिन्दू और मुसलमान का मज़हब नहीं, शौहर और बीवी का मज़हब, रिश्तों और रवायतों का मज़हब .

मेरे अब्बा के साथ आपके रिश्ते को शादी की रवायत की जरूरत थी ही नहीं . होती तो मेरा वजूद ही न होता .

करन के साथ मेरी शादी की रवायत हुई . लेकिन रिश्ता नहीं बन पाया अम्मी . बीच में मज़हब की न भरने वाली खाई है . औरत और मरद के मज़हब की .

यह कैसा रिश्ता है मेरा करन से अम्मी वो अपनी जिन्दगी का हर लम्हा भरपूर जी लेता है . मर्द की पूरी ईमानदारी के साथ, और मैं अम्मी मैं उसकी बीवी बनने के बाद चाहते अनचाहते उन लमहों का इन्तज़ार करती हूँ जब वो मुझे औरत बना देता है . बाकी वक्त जैसे मैं जीती ही नहीं . सिर्फ जिन्दगी का इंतज़ार करती हूँ . औरत होने का अगर यही मज़हब है अम्मी तो मैं काफिर हूँ . हिंदू होती तो बुतपरस्त कहलाती न लेकिन मैं बुतपरस्त नहीं हूँ . करन मेरा खुदा नहीं है कि मेरी जिन्दगी को औरत होने के चंद लमहों का करम फ़रमा कर मेरी इबादत का ताउम्र हकदार हो जाए .

ज़िन्दगी के जिस मोड़ से करन मुझे मिला था, मैं वहाँ लौट कर नहीं जा सकती, जाना भी नहीं चाहती . करन मुझे जहाँ ले आया है, वहाँ आकर मैं निखर गई हूँ अम्मी . यहाँ का उफ़क़, यहाँ की धूप, यहाँ की धुंध, सभी मुझे खूब रास आते हैं . बस अपने हिस्से की धूप छाँव का हिसाब मिलाना बाकी है मुझे . किसी दिन ज़ाहिदा खाला को अपने पास बुला लूँगी . लेकिन आज मुझे किसी से कुछ नहीं कहना . सिवाय आपके अम्मी आज के बाद मेरे हाथों कराई आपकी शादी टूट गई .

आपकी

ताहिरा

खत पढ़ने के बाद ताहिरा नें बेंच की सीट को अपने दुपट्टे से पोंछा, ख़त वहाँ रखा और उसकी एक काग़ज़ी किश्ती बना दी . फिर वह बैंच से उठ उठ कर दरिया किनारे खड़ी हो गई . हवा न के बराबर थी, लहरें इतनी मद्धम कि पानी ठहरा सा, धूप पूरे जोरों पर . ताहिरा किनारे के और करीब चली गई . कंधे झुकाकर एक हाथ आगे बढ़ाया और किश्ती को दरया में उतार दिया . किश्ती जब तक किनारे के साथ साथ मँडराई, ताहिरा वैसे ही झुकी रही . जब लहरे किश्ती को बहा ले गई तो ताहिरा सीधी खड़ी हो गई .

इतनी छोटी सी किश्ती के लिए क्लीवर विलेज का पड़ोसी तंग मुहाने वाला थेम्स दरिया भी समुन्दर था . ताहिरा अपनी किश्ती को नज़रों से ओझल होने तक उसे देखना चाहती थी . वहीं खड़ी रही, खड़ी रही और देखती रही . किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया .

अगर आप अपनी आँखों को ज़रा सा आराम देना चाहें तो मैं आपकी किश्ती पर थोड़ी देर के लिए नज़र रख सकता हूँ .

बेहद नीली आँखों और बड़े लम्बे कद वाला एक गोरा नौजवान अजनबी ताहिरा के पास खड़ा उसे कह रहा था .

ताहिरा मुस्करा दी .

इस तरह अचानक मुस्कुराने से पहले आप कोई अलार्म की घंटी नहीं बजा सकतीं क्या देखने वाले को चेतावनी मिल जाएगी कि उसकी आखें चौंधियाने को हैं .

अजनबी ने एक हाथ से अपनी आँखों को दिखा कर कहा .

ताहिरा अब खुल कर हँस दी .

मेरा नाम हैंक है, हैंक देहान अजनबी ने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा . उसका तलफ़्फ़ुज़ इतना फर्क था कि उसके सैलानी होने का हरफ़िया बयान दे रहा था .

मैं ताहिरा हूं ताहिरा ने हाथ मिलाया .

आप भी मेरी तरह टूरिस्ट हैं क्या मैं हॉलेन्ड से आया हूँ .

मैं यहाँ रहती हूँ ताहिरा और हैंक अब दरिया किनारे साथ साथ चल रहे थे .

आप पाकिस्तान से हैं या इंडिया से हैंक ने उसके लिबास को एक बार फिर देखकर पूछा .

मुझे नहीं मालूम ताहिरा ने कह तो दिया और मन ही मन दोहराया जैसे खुद अपना मुल्क़ी तआरूफ माँगती हो .

हैंक की नीली आँखें कुछ छोटी हो गईं . उसके धूप में तपे हुए चेहरे का सवालियापन एक हल्की सी झुर्री बन कर उसकी पेशानी पर उभरा और गायब हो गया . अपने कंधे पर लटके कैमरे की तरफ उड़ती सी नज़र डालकर वह बोला,

मैं पेशावर फ़ोटोग्राफर हूँ . बहुत से अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए फ्री लान्स तस्वीरें उतारता हूँ . आप क्या यहाँ पर स्टुडेंट हैं, ताहिरा उसके मुँह से निकले ताहिरा के नाम में ता कम हीरा ज्यादा था .

ताहिरा ने सिर हिलाकर न कह दी .

क्या करती हैं आप हैंक ने फिर पूछा .

मुझे नहीं मालूम . ताहिरा ने कहा .

हैंक चलते चलते रुक गया .

देखिए, और आपको शायद कुछ मालूम हो या न हो, उतना तो आप ज़रूर जानती होंगी जो आप को पहलीबार देखने से कोई भी जान सकता है .

हैंक अब अपने दोनों हाथों का फोकस बनाकर ताहिरा को देख रहा था .

उतना मैं भी जानती हूँ . ताहिरा ने अपने आप को कहते सुना और चौंक गई . एक अजनबी के साथ ऐसी बेबाक़ी

हैंक ने अब फिर से चलना शुरू कर दिया था .

आप बुरा न माने तो पूछना चाहूँगा कि अगर आप चाहतीं तो इस वक्त क्या कर रही होती उसने पूछा .

किसी ऐसी जगह की तलाश में होती जहाँ मुझे क्ले पॉटरी बनाने का काम मिले . कहते ही ताहिरा फिर से चौंकी . एक अनजान हम कदम से अपनी इतनी ज़ाती बात करना, हो क्या गया था उसे

आप कहाँ कहाँ तलाश कर चुकी हैं हैंक ऐसे पूछ रहा था जैसे वहाँ पहुँचाने का रास्ता जानता हो .

अभी तो सिर्फ क्लीवर विलेज की डायरेक्टरी में ही देखा है . क्ले किसी और विलेज का नाम है . और पॉटर नाम के चार परिवार इसी इलाके में रहते हैं . क्ले पॉटरी बनाने के साथ उनका कोई ताल्लुक नहीं .
 
ताहिरा के कहते ही हैंक ज़ोर ज़ोर से हँसा .

आप तलाश करती रहिए . अब कामयाबी के बहुत करीब हैं आप . उसने कहा और दरिया किनारे आकर रुकती एक सैलानी किश्ती को देखने लगा . उसके सीढ़ियों से उतरते हुए लोगों में से एक ऊँची लंबी लड़की की तरफ उसने हथेली पर फूँक मार कर हल्का सा हवाई बोसा उड़ाया और ताहिरा से कहा,

वो इंगा है, मेरी डेट, किश्ती की सैर करना चाहती थी .

इंगा दौड़ती हुई आई और हैंक से लिपट गई .

क्या बढ़िया नज़ारा था मुझे खूब मज़ा आया . जब मैं नहीं थी तो तुम ने क्या किया

मेरी ताहिरा से मुलाकात हुई . हैंक ने कहा .

इंगा ने ताहिरा से मिलाने को हाथ बढ़ाया और ज़ोर से सीटी बज़ा कर बोली,

कितनी खूबसूरत हैं आप और आपकी पोशाक लगता है किसी फ़रिश्तों की दुनिया का पहनावा है . वो ताहिरा के दुपट्टे को छू रही थी .

क्या आपके साथ मैं एक तस्वीर खिंचवा सकती हूँ अपना पता देंगी हमको आप के लिए एक कॉपी डाक से भिजवा देंगे .

ताहिरा ने फोटो खिंचवा ली और पता दे दिया .

ताहिरा बदरूनिसा

केअर ऑफ चित्रा मलिक

२३ बी केंसिंग्टन स्ट्रीट

लंदन



छः साल के टिम्मी और चार साल की कैथी को उनके अपने अपने कमरों में सुला कर ताहिरा जब निकली तो गलियारे की दीवार से लटकी घड़ी रात के आठ बजा रही थी . ताहिरा पहले गलियारे के छोर वाले अपने कमरे की तरफ जाने को मुड़ी . फिर उसने इरादा बदल दिया . सोने से पहले एक बार फिर नए आने वाले मेहमान की नर्सरी देख आने का लालच हो आया . वहाँ हल्के नीले और मोतिया सफेद रंग में सजे कमरे का ताज़ा पेंट किया हुआ पालना मुलायम तकियों, गद्दों और कम्बलों से भरा था, टिम्मी और कैथी अपनी अपनी सोने की पारी ले चुके थे उस पालने में . ताहिरा ने हथेली पर फूँक कर पालने को एक किस नज़र किया और मुस्करा कर कहा,

हमारे नन्हें मुन्ने खैरियत से आना, अच्छी सेहत लेकर आना .

अपने कमरे में लौट कर ताहिरा ने खिड़की का परदा हटा दिया . क्लीवर विलेज की कॉटेजेस की ढलान वाली छतें, यहाँ वहाँ खड़ी कारें और बिजली के खम्भे, सभी ने दूधिया सफेद बर्फ का गुदगुदा कम्बल ओढ़ रखा था . ऊपर से कोई शाहकार पैंजा किसी खामोश तूँबे से एक बिना ओर छोर का लिहाफ भरने के लिए मुसलसल हल्की महीन सफेद रूई सी बर्फ़ बिखरा रहा था .

ताहिरा ने खिड़की के पास रखे छोटे से मेज़ पर रखा टेबल लैंप जला दिया और ज़ाहिदा को खत लिखा .

डाल्टन कॉटेज

क्लीवर विलेज

२२ नवम्बर १९७०

मेरी प्यारी खाला,

अपनी सालगिरह पर मुझे अपका ढेरों प्यार मिला . शायद आप नहीं जानती कि आपका लिखा खत पढ़ कर मुझे ऐसे लगता है कि मेरी पूरी डिक्शनरी में तलाश करने पर भी जिस हरफ का मतलब नहीं मिलता, वही लिखकर आप क्या क्या कह देती हैं . आप क्या नजूमी हैं खाला जान किताब का पन्ना जो मैंने खोला भी नहीं, उसे आप पहले ही पढ़ चुकती हैं .

आपका अंदाज़ा बिल्कुल सही था, टिम्मी और कैथी ने कल सारा दिन खूब धमा चौकड़ी मचाई . सुबह मेरे जागने से पहले ही अपने रात के कपड़ों में लुढ़कते पड़ते मेरे पास आ गए . सारा दिन मुझसे गुब्बारे फुलवाते रहे और खुद लाल, नीले, पीले रंग के चॉक पेन्सिलों से साल गिरह मुबारक की तस्वीरें कार्ड छापते रहे . शाम को केक के ऊपर मोमबत्ती लगाने के लिए गुथम्गुत्था हो गए और फिर बराबरी से दोनों ने बारह बारह मोमबत्तियाँ जलाईं . केक काटने के बाद लड़ न पड़ें, इसलिए मैंने एक नहीं दो टुकड़े काटे और दाएँ बाएँ दोनों हाथों से एक ही वक्त दोनों को खिलाया .

मिस्टर और मिसेज़ डाल्टन कहते हैं कि अब उन्हें अगले महीने नर्सिंग होम जाने में बिल्कुल इत्मीनान रहेगा .

आपने पूछा है न कि मेरे माटी के साबुत बचे बरतन खिलौने कहाँ हैं यहीं है मेरे कमरे में . कुछ शीशे की अलमारी के ऊपरी खाने में, कुछ नीचे वाले ड्राअर में, मोमबत्ती वाली मटकी नीचे लिविंग रूम की फ़ायरप्लेस के आगे वाले पत्थर के प्लेटफॉर्म पर एक कोने में रखी है . मिसेज़ डाल्टन को बहुत पसंद आई थी . मैंने नज़र कर दी . वो कहती हैं कि मेरी हाथ की गुँधी माटी का अपना ही रंग है . उन्होंने बताया है कि क्लीवर विलेज में ही सूखे और ताजा फूलों की बीस दुकानें हैं . पूरे रॉयल बॉरो में शायद सौ से भी ज़्यादा होंगी . नए आने वाले बच्चे के कुछ बड़ा होने तक, वो मुझे इनमें से किसी दुकान पर हफ़्ते में एक दो बार काम करके ज़्यादा पैसा बनाने की इजाज़त दे देंगी .

यहाँ डाल्टन कॉटेज में रहने खाने का मेरा ख़र्चा नहीं है, उपर से महीने के एक सौ पाउंड भी मिलते हैं . मैंने बचाने शुरू कर दिए हैं, आपको यहाँ बुलाने के लिए, फिर हम दोनों मिल कर एक छोटी सी दुकान खोलेंगे . गुलदान, गमले, चाटियाँ, कसोरे, मटकिया बनाएँगे . अपने हाथों से, खुद रंग माटी को उसी के हिस्से का ताप देकर . मैंने दुकान का नाम भी सोच लिया है, जानती हैं क्या

कोठेवाली

आपको याद है खाला जान, जब गुजरात के बेकरी वाले बख्तियार की घरवाली हमें मिलने लाहौर आई थी .

खुदा बद नज़र से बचाए इसे, उसने मुझे देखते ही कहा था, क्या शहजादी जैसी लगती है . ढक्की दरवाज़ा गली वालों को पता न होता कि कोठेवाली की औलाद है तो मैं अपने फखरू के लिए ले जाती . बड़ा गबरू जवान निकला है वो भी माशाअल्लाह .

मुझे आपका उस दिन का जवाब आज फिर साफ साफ सुनाई दे रहा है,

कोठे दुमंजिलें, तिमंज़ले घरों के हुआ करते है बाजी . मेरी आपा जहाँ पैदा हुई, पली रही, वहाँ तो ऊपर छत को जाने वाली कोई सीढ़ी भी नहीं थी, आपने कहा था .

आप जानती हैं खाला जान अगर मैं भी उसी घर में पैदा होती तो क्या करती

मैं पड़सांग लगा कर जब जी चाहता, ऊपर छत पर चली जाती .

वह अपने ऑफ़िस में घुसा .

शायद इस वक्त लोड शेडिंग शुरू हो गई थी . मुख्य हॉल में आपातकालीन ट्यूब लाइट जल रही थी . वह उसके सहारे अपने केबिन तक आया . अँधेरे में मेज़ पर रखे कंप्यूटर की एक बौड़म सिलुएट बन रही थी . फ़ोन, इंटरकॉम सब निष्प्राण लग रहे थे . ऐसा लग रहा था संपूर्ण सृष्टि निश्चेष्ट पड़ी है .

बिजली के रहते यह छोटा सा कक्ष उसका साम्राज्य होता है . थोड़ी देर में आँख अँधेरे की अभ्यस्त हुई तो मेज़ पर पड़ा माउस भी नज़र आया . वह भी अचल था . पवन को हँसी आ गई, नाम है चूहा पर कोई चपलता नहीं . बिजली के बिना प्लास्टिक का नन्हा सा खिलौना है बस . बोलो चूहे कुछ तो करो, चूँ चूँ ही सही, उसने कहा . चूहा फिर बेजान पड़ा रहा .
 
पवन को यकायक अपना छोटा भाई सघन याद आया . रात में बिस्कुटों की तलाश में वे दोनों रसोईघर में जाते . रसोई में नाली के रास्ते बड़े बड़े चूहे दौड़ लगाते रहते . उन्हें बड़ा डर लगता . रसोई का दरवाज़ा खोल कर बिजली जलाते हुए छोटू लगातार म्याऊँ म्याऊँ की आवाज़ें मुँह से निकालता रहता कि चूहे ये समझें कि रसोई में बिल्ली आ पहुँची है और वे डर कर भाग जाएँ . छोटू का जन्म भी मार्जार योनि का है .

पवन ज़्यादा देर स्मृतियों में नहीं रह पाया . यकायक बिजली आ गई, अँधेरे के बाद चकाचौंध करती बिजली के साथ ही ऑफ़िस में जैसे प्राण लौट आए . दातार ने हाट प्लेट कॉफी का पानी चढ़ा दिया, बाबू भाई ज़ेराक्स मशीन में काग़ज़ लगाने लगे और शिल्पा काबरा अपनी टेबल से उठ कर नाचती हुई सी चित्रेश की टेबल तक गई, यू नो हमें नरूलाज़ का कांट्रेक्ट मिल गया .

पवन ने अपनी टेबल पर बैठे बैठे दाँत पीसे . यह बेवकूफ़ लड़की हमेशा ग़लत आदमी से मुख़ातिब रहती है . इसे क्या पता कि चित्रेश की चौबीस तारीख को नौकरी से छुट्टी होने वाली है . उसने दो जंप्स वेतन वृद्धी माँगे थे, कंपनी ने उसे जंप आउट करना ही बेहतर समझा . इस समय तलवारें दोनों तरफ़ की तनी हुई हैं . चित्रेश को जवाब मिला नहीं है पर उसे इतना अंदाज़ा है कि मामला कहीं फँस गया है . इसीलिए पिछले हफ़्ते उसने एशियन पेंट्स में इंटरव्यू भी दे दिया . एशियन पेंट्स का एरिया मैनेजर पवन को नरूलाज में मिला था और उससे शान मार रहा था कि तुम्हारी कंपनी छोड़ छोड़ कर लोग हमारे यहाँ आते हैं . पवन ने चित्रेश की सिफ़ारिश कर दी ताकि चित्रेश का जो फ़ायदा होना है वह तो हो, उसकी कंपनी के सिर पर से यह सिरदर्द हटे . वहीं उसे यह भी ख़बर हुई कि नरूलाज में रोज़ बीस सिलेंडर की खपत है . आई.ओ.सी. अपने एजेंट के ज़रिए उन पर दबाव बनाए हुई है कि वे साल भर का अनुबंध उनसे कर लें . गुर्जर गैस ने भी अर्ज़ी लगा रखी है . आई.ओ.सी. की गैस कम दाम की है . संभावना तो यही है बनती है कि उनके एजेंट शाह एंड सेठ अनुबंध पा जाएँगे पर एक चीज़ पर बात अटकी है . कई बार उनके यहाँ माल की सप्लाई ठप्प पड़ जाती है . पब्लिक सेक्टर के सौ पचड़े . कभी कर्मचारियों की हड़ताल तो कभी ट्रक चालकों की शर्तें . इनके मुक़ाबले गुर्जर गैस में माँग और आपूर्ति के बीच ऐसा संतुलन रहता है कि उनका दावा है कि उनका प्रतिष्ठान संतुष्ट उपभोक्ताओं का संसार है .

पवन पांडे को इस नए शहर और अपनी नई नौकरी पर नाज़ हो गया . अब देखिए बिजली चार बजे गई ठीक साढ़े चार बजे आ गई . पूरे शहर को टाइम ज़ोन में बाँट दिया है, सिर्फ़ आधा घंटे के लिए बिजली गुल की जाती है, फिर अगले ज़ोन में आधा घंटा . इस तरह किसी भी क्षेत्र पर ज़ोर नहीं पड़ता . नहीं तो उसके पुराने शहर यानी इलाहाबाद में तो यह आलम था कि अगर बिजली चली गई तो तीन तीन दिन तक आने के नाम न ले . बिजली जाते ही छोटू कहता, भइया ट्रांसफार्मर दुड़िम बोला था, हमने सुना है . परीक्षा के दिनों में ही शादी ब्याह का मौसम होता . जैसे ही मोहल्ले की बिजली पर ज़्यादा ज़ोर पड़ता, बिजली फेल हो जाती . पवन झुँझलाता, माँ अभी तीन चैप्टर बाकी हैं, कैसे पढूँ . माँ उसकी टेबल के चार कोनों पर चार मोमबत्तियाँ लगा देती और बीच में रख देती, उसकी क़िताब . नए अनुभव की उत्तेजना में पवन, बिजली जाने पर और भी अच्छी तरह पढ़ाई कर डालता .

छोटू इसी बहाने बिजलीघर के चार चक्कर लगा आता . उसे छुटपन से बाज़ार घूमने का चस्का था . घर का फुटकर सौदा लाते, पोस्ट ऑफ़िस, बिजलीघर के चक्कर लगाते यह शौक अब लत में बदल गया था . परीक्षा के दिनों में भी वह कभी नई पेंसिल ख़रीदने के बहाने तो कभी यूनीफार्म इस्तरी करवाने के बहाने घर से ग़ायब रहता . जाते हुए कहता, हम अभी आते हैं . लेकिन इससे यह न पता चलता कि हज़रत जा कहाँ रहे हैं . जैसे मराठी में, घर से जाते हुए मेहमान यह नहीं कहता कि मैं जा रहा हूँ, वह कहता है मी येतो अर्थात मैं आता हूँ . यहाँ गुजरात में और सुंदर रिवाज है . घर से मेहमान विदा लेता है तो मेज़बान कहते हैं, आऊ जो . यानी फिर आना .

यह ठीक है कि पवन घर से अठारह सौ किलोमीटर दूर आ गया है . पर एम.बी.ए. के बाद कहीं न कहीं तो उसे जाना ही था . उसके माता पिता अवश्य चाहते थे कि वह वहीं उनके पास रह कर नौकरी करे पर उसने कहा, पापा यहाँ मेरे लायक सर्विस कहाँ यह तो बेरोज़गारों का शहर है . ज़्यादा से ज़्यादा नूरानी तेल की मार्केटिंग मिल जाएगी . माँ बाप समझ गए थे कि उनका शिखरचुंबी बेटा कहीं और बसेगा .

फिर यह नौकरी पूरी तरह पवन ने स्वयं ढूँढ़ी थी . एम.बी.ए. अंतिम वर्ष की जनवरी में जो चार पाँच कंपनियाँ उनके संस्थान में आई उनमें भाईलाल भी थी . पवन पहले दिन पहली इंटरव्यू में ही चुन लिया गया . भाईलाल कंपनी ने उसे अपनी एल.पी.जी. यूनिट में प्रशिक्षु सहायक मैनेजर बना लिया . संस्थान का नियम था कि अगर एक नौकरी में छात्र का चयन हो जाए तो वह बाकी के तीन इंटरव्यू नहीं दे सकता . इससे ज़्यादा छात्र लाभान्वित हो रहे थे और कैंपस पर परस्पर स्पर्धा घटी थी . पवन को बाद में यही अफ़सोस रहा कि उसे पता ही नहीं चला कि उसके संस्थान में विप्रो, एपल और बी.पी.सी.एल जैसी कंपनियाँ भी आई थीं . फिलहाल उसे यहाँ कोई शिकायत नहीं थी . अपने अन्य कामयाब साथियों की तरह उसने सोच रखा था कि अगर साल बीतते न बीतते उसे पद और वेतन में उच्चतर ग्रेड नहीं दिया गया तो वह यह कंपनी छोड़ देगा .

सी.पी. रोड चौराहे पर खड़े होके उसने देखा, सामने से शरद जैन जा रहा है . यह एक इत्तफ़ाक़ ही था कि वे दोनों इलाहाबाद में स्कूल से साथ पढ़े और अब दोनों को अहमदाबाद में नौकरी मिली . बीच में दो साल शरद ने आई.ए.एस. की मरीचिका में नष्ट किए, फिर कैपिटेशन फीस दे कर सीधे आई.आई.एम. अहमदाबाद में दाखिल हो गया .

उसने शरद को रोका, कहाँ

यार पिज़ा हट चलते हैं, भूख लग रही है .

वे दोनों पिज़ा हट में जा बैठे . पिज़ा हट हमेशा की तरह लड़के लड़कियों से गुलज़ार था . पवन ने कूपन लिए और काउंटर पर दे दिए .

शरद ने सकुचाते हुए कहा, मैं तो जैन पिज़ा लूँगा . तुम जो चाहे खाओ .

रहे तुम वहीं के वहीं साले . पिज़ा खाते हुए भी जैनिज़्म नहीं छोड़ेंगे .

अहमदाबाद में हर जगह मेनू कार्ड में बाकायदा जैन व्यंजन शामिल रहते जैसे जैन पिज़ा, जैन आमलेट, जैन बर्गर .

पवन खाने के मामले में उन्मुक्त था . उसका मानना था कि हर व्यंजन की एक ख़ासियत होती है . उसे उसी अंदाज़ में खाया जाना चाहिए . उसे संशोधन से चिढ़ थी .

मेनू कार्ड में जैन पिज़ा के आगे उसमें पड़ने वाली चीज़ें का खुलासा भी दिया था, टमाटर, शिमला मिर्च, पत्ता गोभी और तीखी मीठी चटनी .

शरद ने कहा, कोई ख़ास फ़र्क तो नहीं है, सिर्फ़ चिकन की चार पाँच कतरन उसमें नहीं होगी, और क्या

सारी लज़्ज़त तो उन कतरनों की है यार . पवन हँसा .

मैंने एक दो बार कोशिश की पर सफल नहीं हुआ . रात भर लगता रहा जैसे पेट में मुर्गा बोल रहा है कुकडूँकूँ .

तुम्हीं जैसों से महात्मा गांधी आज भी साँसें ले रहे हैं . उनके पेट में बकरा में में करता था .

शरद ने वेटर को बुला कर पूछा, कौन सा पिज़ा ज़्यादा बिकता है यहाँ .

जैन पिज़ा . वेटर ने मुसकुराते हुए जवाब दिया .

देख लिया, शरद बोला, पवन तुम इसको एप्रिशिएट करो कि सात समंदर पार की डिश का पहले हम भारतीयकरण करते हैं फिर खाते हैं . घर में ममी बेसन का ऐसा लज़ीज़ आमलेट बना कर खिलाती हैं कि अंडा उसके आगे पानी भरे .

मैं तो जब से गुजरात आया हूँ बेसन ही खा रहा हूँ . पता है बेसन को यहाँ क्या बोलते हैं चने का लोट .

पता नहीं यह जैन धर्म का प्रभाव था या गाँधीवाद का, गुजरात में मांस, मछली और अंडे की दुकानें मुश्किल से देखने में आतीं . होस्टल में रहने के कारण पवन के लिए अंडा भोजन का पर्याय था पर यहाँ सिर्फ़ स्टेशन के आस पास ही अंडा मिलता . वहीं तली हुई मछली की भी चुनी दुकानें थीं . पर अक्सर मेम नगर से स्टेशन तक आने की और ट्रैफ़िक में फँसने की उसकी इच्छा न होती . तब वह किसी अच्छे रेस्तराँ में सामिष भोजन कर अपनी तलब पूरी करता .
 
वे अपने पुराने दिन याद करते रहे, दोनों के बीच में लड़कपन की बेशुमार बेवकूफ़ियाँ कॉमन थीं और पढ़ाई के संघर्ष . पवन ने कहा, पहले दिन जब तुम अमदाबाद आए तब की बात बताना ज़रा .

तुम कभी अमदाबाद कहते हो कभी अहमदाबाद, यह चक्कर क्या है .

ऐसा है अपना गुजराती क्लायंट अहमदाबाद को अमदाबाद ही बोलना माँगता, तो अपुन भी ऐसाइच बोलने का .

मैं कहता हूँ यह एकदम व्यापारी शहर है, सौ प्रतिशत . मैं चालीस घंटे के सफ़र के बाद यहाँ उतरा . एक थ्री व्हीलर वाले से पूछा, आई.आई.एम. चलोगे किदर बोलने से, उसने पूछा . मैंने कहा, भाई वस्त्रापुर में जहाँ मैनेजरी की पढ़ाई होती है, उसी जगह जाना है . तो जानते हो साला क्या बोला, टू हंड्रेड भाड़ा लगेगा . मैंने कहा तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है . उसने कहा, साब आप उदर से पढ़ कर बीस हज़ार की नौकरी पाओगे, मेरे को टू हंड्रेड देना आपको ज़्यादा लगता क्या

तुम्हारा सिर घूम गया था

बाई गॉड . मुझे लगा वह एकदम ठग्गू है . पर जिस भी थ्री व्हीलर वाले से मैंने बात की सबने यही रेट बताया .

मुझे याद है, शाम को तुमने मुझसे मिल कर सबसे पहले यही बात बताई थी .

सच्ची बात तो यह है कि अपने घर और शहर से बाहर आदमी हर रोज़ एक नया सबक सीखता है .

और बताओ, जॉब ठीक चल रहा है

ठीक क्या यार, मैंने कंपनी ही ग़लत चुन ली .

बैनर तो बड़ा अच्छा है, स्टार्ट भी अच्छा दिया है

पर प्रॉडक्ट भी देखो . बूट पॉलिश . हालत यह है कि हिंदुस्तान में सिर्फ़ दस प्रतिशत लोग चमड़े के जूते पहनते हैं .

बाकी नब्बे क्या नंगे पैर फिरते हैं

मज़ाक नहीं, बाकी लोग चप्पल पहनते हैं या फ़ोम शुज़ . फ़ोम के जूते कपड़ों की तरह डिटरजेंट से धुल जाते हैं और चप्पल चटकाने वाले पॉलिश के बारे में कभी सोचते नहीं . पॉलिश बिके तो कैसे

पवन ने कौतुक से रेस्तराँ में कुछ पैरों की तरफ़ देखा . अधिकांश पैरों में फ़ोम के मोटे जूते थे . कुछ पैरों में चप्पलें थीं .

अभी हेड ऑफ़िस से फ़ैक्स आया है कि माल की अगली खेप भिजवा रहे हैं . अभी पिछला माल बिका नहीं है . दुकानदार कहते हैं वे और ज़्यादा माल स्टोर नहीं करेंगे, उनके यहाँ जगह की किल्लत है . ऐसे में मेरी सनशाइन शू पॉलिश क्या करें

डीलर को कोई गिफ़्ट ऑफ़र दो, तो वह माल निकाले .

सबको सनशाइन रखने के लिए वॉल रैक दिए हैं, डीलर्स कमीशन बढ़वाया है पर मैंने खुद खड़े हो कर देखा है, काउंटर सेल नहीं के बराबर है .

पवन ने सुझाव दिया, कोई रणनीति सोचो . कोई इनामी योजना, हॉलिडे प्रोग्राम

इनामी योजना का सुझाव भेजा है . हमारा टारगेट उपभोक्ता स्कूली विद्यार्थी हैं . उसकी दिलचस्पी टॉफी या पेन में हो सकती है, हॉलिडे प्रोग्राम में नहीं .

हाँ, यह अच्छी योजना है .

बाइ गॉड, अगर पब्लिक स्कूलों में चमड़े के जूते पहनने का नियम न होता तो सारी बूट पॉलिश कंपनियाँ बंद हो जातीं . इन्हीं के बूते पर बाटा, कीवी, बिल्ली, सनशाइन सब ज़िंदा हैं .

इस लिहाज़ से मेरी प्रॉडक्ट बढ़िया है . हर सीज़न में हर तरह के आदमी को गैस सिलेंडर की ज़रूरत रहती है . लेकिन यार जब थोक में प्रॉडक्ट निकालनी हो, यह भी भारी पड़ जाती है .

पवन उठ खड़ा हुआ, थोड़ी देर और बैठे तो यहाँ डिनर टाइम हो जाएगा . तुम कहाँ खाना खाते हो आजकल .

वहीं जहाँ तुमने बताया था, मौसी के . और तुम

मैं भी मौसी के यहाँ खाता हूँ पर मैंने मौसी बदल ली है .

क्यों

वह क्या है यार मौसी कढ़ी और करेले में भी गुड़ डाल देती थीं और खाना परोसने वाली उसकी बेटी कुछ ऐसी थी कि झेली नहीं जाती थी .

हमारी वाली मौसी तो बहुत सख़्त मिज़ाज है, खाते वक्त आप वॉकमैन भी नहीं सुन सकते . बस खाओ और जाओ .

यार कुछ भी कहो अपने शहर का खस्ता, समोसा बहुत याद आता है .

शहर में जगह जगह घरों में महिलाओं ने माहवारी हिसाब पर खाना खिलाने का प्रबंध कर रखा था . नौकरी पेशा छड़े अविवाहित युवक उनके घरों में जा कर खाना खा लेते . रोटी सब्ज़ी, दाल और चावल . न रायता न चटनी न सलाद . दर तीन सौ पचास रुपए महीना, एक वक्त . इन महिलाओं को मौसी कहा जाता . भले ही उनकी उम्र पचीस हो या पचास . रात साढ़े नौ के बाद खाना नहीं मिलता . तब ये लड़के उडुपी भोजनालय में एक मसाला दोसा खा कर सो जाते . इतनी तकलीफ़ में भी इन युवकों को कोई शिकायत न होती . अपने उद्यम से रहने और जीने का संतोष सबके अंदर .

घर गृहस्थी वाले साथी पूछते, जिंदगी के इस ढंग से कष्ट नहीं होता

होता है कभी कभी . अनुपम कहता, सन से बाहर हूँ . पहले पढ़ने की ख़ातिर, अब काम की . कभी कभी छुट्टी के दिन अनुपम लिट्टी चोखा बनाता . बाकी लड़के उसे चिढ़ाते, तुम अनुपम नहीं अनुपमा हो .

वह बेलन हाथ में नचाते हुए कहता, हम अपने लालू अंकल को लिखूँगा इधर में तुम सब बुतरू एक सीधे सादे बिहारी को सताते हो .

जब आप अपना शहर छोड़ देते हैं, अपनी शिकायतें भी वहीं छोड़ आते हैं . दूसरे शहर का हर मंज़र पुरानी यादों को कुरेदता है . मन कहता है ऐसा क्यों है वैसा क्यों नहीं है हर घर के आगे एक अदद टाटा सुमो खड़ी है . मारुति क्यों नहीं तर्क शक्ति से तय किया जा सकता है कि यह परिवार की ज़रूरत और आर्थिक हैसियत का परिचय पत्र है . पर यादें हैं कि लौट लौट आती हैं सिविल लाइंस, एलगिन रोड और चैथम लाइंस की सड़कों पर जहाँ माचिस की डिबियों जैसी कारें और स्टियरिंग के पीछे बैठे नमकीन चेहरे तबियत तरोताज़ा कर जाते . ओफ, नए शहर में सब कुछ नया है . यहाँ दूध मिलता है पर भैसें नहीं दिखतीं . कहीं साइकिल की घंटी टनटनाते दूध वाले नज़र नहीं आते . बड़ी बड़ी सुसज्जित डेरी शॉप हैं, एयरकंडीशंड, जहाँ आदमकद चमचमाती स्टील की टंकियों में टोटी से दूध निकलता है . ठंडा, पास्चराइज्ड . वहीं मिलता है दही, दुग्ध ना पेड़ा और श्रीखंड .

यही हाल तरकारियों का है . हर कालोनी के गेट पर सुबह तीन चार घंटे एक ऊँचा ठेला तरकारियों से सजा खड़ा रहेगा . वह घर घर घूम कर आवाज़ नहीं लगाता . स्त्रियाँ उसके पास जाएँगी और ख़रीदारी करेंगी . उसके ठेले पर ख़ास और आम तरकारियों का अंबार लगा है . हरी शिमला मिर्च है तो लाल और पीली भी . गोभी है तो ब्रोकोली भी . सलाद की शक्ल का थाई कैबेज भी दिखाई दे जाता है . ख़ास तरकारियों में किसी की भी कीमती डेढ़ दो सौ रुपए किलो से कम नहीं . ये बड़े बड़े लाल टमाटर एक तरफ़ रखे हैं कि दूर से देखने पर प्लास्टिक की गेंद लगते हैं . ये टमाटर क्यारी में नहीं प्रयोगशाला में उगाए गए लगते हैं . कीमत दस रुपए पाव . टमाटर का आकार इतना बड़ा है कि एक पाँव में एक ही चढ़ सकता है . दस रुपए का एक टमाटर है . भगवान क्या टमाटर भी एन.आर.आई. हो गया . शिकागो में एक डॉलर का एक टमाटर मिलता है . भारत में टमाटर उसी दिशा में बढ़ रहा है . तरकारियाँ विश्व बाज़ार की जिन्स बनती जा रही हैं . इनका भूमंडलीकरण हो रहा है . पवन को याद आता है उसके शहर में घूरे पर भी टमाटर उग जाता था . किसी ने पका टमाटर कूड़े करकट के ढेर पर फेंक दिया, वहीं पौधा लहलहा उठा . दो माह बीतते न बीतते उसमें फल लग जाते . छोटे छोटे लाल टमाटर, रस से टलमल, यहाँ जैसे बड़े बेजान और बनावटी नहीं, असल और खटमिट्ठे .

शहर के बाज़ारों में घूमना पवन, शरद, दीपेंद्र, रोज़विंदर और शिल्पा का शौक भी है और दिनचर्या भी . रोज़विंदर कौर प्रदूषण पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर रही है . कंधे पर पर्स और कैमरा लटकाए कभी वह एलिस ब्रिज के ट्रैफ़िक जाम के चित्र उतारती है तो कभी बाज़ार में जैनरेटर से निकलने वाले धुएँ का जायज़ा लेती है .

दीपेंद्र कहता है, रोजू तुम्हारी रिपोर्ट से क्या होगा . क्या टैंपो और जेनरेटर धुआँ छोड़ना बंद कर देंगे

रोजू सिगरेट का आख़िरी कश ले कर उसका टोटा पैर के नीचे कुचलती है, माई फुट तुम तो मेरे जॉब को ही चुनौती दे रहे हो . मेरी कंपनी को इससे मतलब नहीं है कि वाहन धुएँ के बग़ैर चलें . उसकी योजना है हवा शुद्धिकरण संयंत्र बनाने की . एक हर्बल स्प्रे भी बनाने वाली है . उसे एक बार नाक के पास स्प्रे कर लो तो धुएँ का प्रदूषण आपकी साँस के रास्ते अंदर नहीं जाता .

और जो प्रदूषण आँख और मुँह के रास्ते जाएगा वह

तो मुँह बंद रखो और आँख में डालने को आइ ड्राप ले आओ .

पवन के मुँह से निकल जाता है, मेरे शहर में प्रदूषण नहीं है .

आ हा हा, पूरे विश्व में प्रदूषण चिंता का विषय है और ये पवन कुमार आ रहे हैं सीधे स्वर्ग से कि वहाँ प्रदूषण नहीं हैं . तुम इलाहाबाद के बारे में रोमांटिक होना कब छोड़ोगे

रोजू हँसती है, वॉट ही मीन्स इज वहाँ प्रदूषण कम है . वैसे पवन मैंने सुना है यू.पी. में अभी भी किचन में लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनता है . तब तो वहाँ घर के अंदर ही धुआँ भर जाता होगा

इलाहाबाद गाँव नहीं शहर है, कावल टाउन . शिक्षा जगत में उसे पूर्व का ऑक्सफोर्ड कहते हैं .

शिल्पा काबरा बातचीत को विराम देती है, ठीक है, अपने शहर के बारे में थोड़ा रोमांटिक होने में क्या हर्ज़ है .

पवन कृतज्ञता से शिल्पा को देखता है . उसे यह सोच कर बुरा लगता है कि शिल्पा की ग़ैर मौजूदगी में वे सब उसके बारे में हल्केपन से बोलते हैं . पवन का ही दिया हुआ लतीफ़ा है शिल्पा काबरा, शिल्पा का ब्रा .

विश्वास नी जोत घरे घरे— गुर्ज़र गैस लावे छे यह नारा है पवन की कंपनी का . इस संदेश को प्रचारित प्रसारित करने का अनुबंध शीबा कंपनी को साठ लाख में मिला है . उसने भी सड़कें और चौराहे रंग डाले हैं .

end
 
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