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अद्भुत-एक हॉर्रर कहानी complete

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एक आदमी तुरंत सामने आया. और इलेक्ट्रीक चेअर ऑपरेट करनेके पॅनलके पास गया. पुलिसके जो लोग ऍंथोनीको इलेक्ट्रीक चेअरके पास ले गए थे उन्होने उसे अब उस चेअरपर इलेक्ट्रीक बिठाया. काले कपडेसे उसका चेहरा ढंका गया. फिर वे पुलिस इलेक्ट्रीक चेअर चेंबरसे बाहर आ गए और उन्होने चेंबर बंद कर दिया.

मुख्य अधिकारीने पॅनलके पास खडे ऑपरेटरकी तरफ देखा. ऑपरेटर पॅनलके पास एकदम तैयार खडा था. फिरसे वह अधिकारी अपनी घडीकी तरफ देखने लगा. शायद उसकी उलटी गीणती शुरु हो गई थी.

भलेही उन लोगोंको वह हमेशाका था फिरभी वातावरणमें थोडा तनाव स्पष्ट दिखने लगा. अचानक उस अधिकारीने ऑपरेटरको इशारा किया.

ऑपरेटरने एक पलकीभी देरी ना करते हूए इलेक्ट्रीक चेअर पॅनलपर एक लाल बटन दबाया.

थोडी देरमें ऑपरेटर काम तमाम होगया इस अंदाजमें उस अधिकारीके तरफ देखने लगा.

डॉक्टर उस अधिकारीने डॉक्टरको पुकारा.

डॉक्टर झटसे इलेक्ट्रीक चेअर चेंबरके पास गया, चेंबर खोला और अंदर चला गया.

सर ही इज डेड अंदरसे डॉक्टरका आवाज आगया.

वह अधिकारी एकदमसे मुड गया और वह जगह छोडकर वहांसे चला गया. वह ऑपरेटर वहीं बगलमें एक कमरेमें चला गया. वहा बाजुमेंही खडा एक स्टाफ मेंबर उस चेंबरमें, शायद चेंबर साफ करनेके लिए घुस गया. सबकुछ कैसे किसी मशिनकी तरह चल रहा था. उन सबको भलेही वह हमेशाका हो फिरभी जॉनके लिए वह हमेशा होनेवाली बाते नही थी. वह अबभी वही खडा एक एक चिज और एक एक हो रही बातें ध्यानसे निहार रहा था.

अब डॉक्टरभी वहांसे चला गया.

वहां सिर्फ सॅम अकेलाही बचा. वह अबभी वहां चूपचाप खडा था, उसके दिमागमें शायद कुछ अलगही चल रहा हो.

अचानक कोई जल्दी जल्दी उसके पिछेसे वहां आगया.

अच्छा. हो गया है शायद पिछेस आवाज आया.

सॅमने मुडकर पिछे देखा और उसका मुहं आश्चर्यसे खुला का खुला ही रह गया. उसके सामने ऑपरेटर खडा था.

ये तो अभी अभी पॅनल ऑपरेट कर उस बगलके कमरेमे गया था.

फिर अभीके अभी ये इधर किधरसे आगया.

मुझे चिंता थी की मेरी अनुपस्थीमें पॅनल कौन ऑपरेट करेगा. वह ऑपरेटर बोला.

बाय द वे किसने ऑपरेट किया पॅनल उस ऑपरेटरने सॅमको पुछा.

सॅमको एक के बाद एक आश्चर्यके धक्के लग रहे थे. .

सॅमने बगलके कमरेकी तरफ देखा.

किसने ऑपरेट किया मतलब . तुमनेही तो ऑपरेट किया सॅमने अविश्वासके साथ कहा.

क्या बात करते हो . मै तो अभी अभी यहां आ रहा हूं . उस ऑपरेटरने कहा.

सॅमने फिरसे चौंककर उसकी तरफ देखा और फिर उस बगलके कमरेकी तरफ देखा जिसमें वह थोडी देर पहले गया था.

आवो मेरे साथ .आवो सॅम उसे उस बगलके कमरेकी तरफ ले गया.

सॅमने उस कमरेका दरवाजा धकेला. दरवाजा अंदरसे बंद था. उसने दरवाजेपर नॉक किया. अंदरसे कोई प्रतिक्रिया नही थी. सॅम अब वह दरवाजा जोर जोरसे ठोकने लगा. फिरभी अंदरसे कोई प्रतिक्रिया नही थी. सॅम अपनी पुरी ताकदके साथ उस दरवाजेको धकेलने लगा. वह संभ्रममे पडा ऑपरेटरभी अब उसे धकेलनेमें मदद करने लगा.

जोर जोरसे धकेलकर और धक्के देकर आखिर सॅमने और उस ऑपरेटरने वह दरवाजा तोडा.

दरवाजा टूटतेही सॅम और वह ऑपरेटर जल्दी जल्दी कमरेमें घुस गए. उन्होने कमरेमें चारो तरफ अपनी नजरे दौडाई. कमरेमे कोई नही था. उन्होने एक दुसरेकी तरफ देखा. उस ऑपरेटरके चेहरेपर संभ्रमके भाव थे तो सॅमके चेहरेपर अगम्य ऐसे डरके भाव दिख रहे थे.

अचानक उपरसे कुछ निचे गिर गया. दोनोंने चौंककर देखा. वह एक काली बिल्ली थी, जिसने उपरसे छलांग लगाई थी. वह बिल्ली अब सॅमके एकदम सामने खडी होगई और एकटक सॅमकी तरफ देखने लगी. वे आश्चर्यसे मुंह खोलकर उस बिल्लीकी तरफ देखने लगे. धीरे धीरे उस काली बिल्लीका रुपांतर नॅन्सीके सडे हूए मृतदेहमें होने लगा. उस ऑपरेटरके तो हाथपैर कांपने लगे थे. सॅमभी बर्फ जम जाए ऐसा एकदम स्थिर और स्तब्ध होकर उसके सामने जो घट रहा था वह देख रहा था. धीरे धीरे उस सडे हूए मृतदेह का रुपांतर एक सुंदर, जवान तरुणीमें हो गया. हां, वह नॅन्सीही थी. अब उसके चेहरेपर एक सुकून झलक रहा था. देखते देखते उसके आंखोसे दो बडे बडे आंसू निकलकर गालोंपर बहने लगे और धीरे धीरे वह वहांसे अदृष्य होकर गायब होगई.

ई मेल विषय–फैमिली अफेयर

प्रिय प्रभु, शीनी तलाक लेने पर उतारू . तुम्हारी भाभी ने खाना पीना छोडा . घर में मातमी माहौल . प्रपन्नाचार्य एस्ट्रोलाजर को शीनी की जन्मपत्री दिखा कर उपचार पूछो . अलगरजी मत करना . तुम्हारा हरदयाल .

हरदयाल ने कम्प्यूटर आफ किया और कोने में पडे दीवान पर ढेर हो गया . शीनी ने हमेशा उसे तनाव में रखा था . शादी की जिद ठानी थी, तब भी वह महीनों परेशान रहा था, पूरे परिवार का अमन चैन खत्म हो गया था और अब शादी के पचीस साल बाद यह नया शगूफा . दो जवान बेटियाँ हैं, वे क्या सोच रही होंगी . छह छह फीट के दो लड़के हैं, वे इस स्थिति का कैसे सामना करेंगे शीनी के विवाह के अवसर पर उसने भारतीय संस्कृति और जीवन शैली को महिमा मंडित करते हुए दावा किया था कि हम भारतीय लोग विवाह को एक पवित्र बंधन मानते हैं .

हम इस सम्बंध को जन्म जन्मांतर तक निभाने का संकल्प लेते हैं . निक को हमने एक अत्यंत विनम्र, आज्ञाकारी और कर्तव्यनिष्ठ नवयुवक के रूप में जाना है . हमारा विश्वास है कि पूर्वजन्म में वह भी एक भारतीय आत्मा रहा होगा . हम उससे अपेक्षा रखते हैं कि वह हमारी फूल सी बिटिया को हमेशा फूलों की सेज पर रखेगा और उसके प्रति अपने प्रेम में लेशमात्र की कमी न आने देगा . हम दोनों के सुखद और सुदीर्घ दाम्पत्य की कामना करते हैं .

यह सोच कर हरदयाल का सिर शर्म से फोम के तकिये में झुकता चला गया कि निक ने तो शपथ का निर्वाह किया, उसकी बिटिया ने ही इस बंधन को तार तार करने की ठान ली . यह एक ऐसी शर्मनाक खबर थी, जो अभी तक परिवार तक सीमित थी, मगर जल्द ही जंगल की आग की तरह इसकी लपटें हर सिम्त उठने लगेंगी . हरदयाल दीवान की पट्टी पर अपना सिर पटकने लगा . सिर पटकने से उसे बहुत राहत मिलती . यह तरीका उसने अपनी पत्नी से सीखा था . एक जमाना था, वह जरा जरा सी बात पर सिर पटकने लगती . सामने दीवार पड़ती तो दीवार पर, खम्भा पड़ता तो खम्भे पर . बच्चे बड़े हुए तो वे भी बात बात पर सिर पटकने लगे . हरदयाल की पत्नी शैल को बच्चों की खातिर अपना यह शौक छोड़ना पड़ा . अब उसे मनस्ताप होता तो मंत्रेच्चार करने लगती . दसियों मंत्र और चालीसे उसने कंठस्थ कर लिये थे .

आधी रात को जब हरदयाल की नींद खुली तो उसने पाया उसकी पत्नी पलंग पर नहीं थी, वह घर के एक कोने में मंदिर के सामने बैठ कर तन्मयता से पूजा कर रही थी . बीच बीच में वह पीतल की छोटी सी घंटी उठा लेती और भगवान के कानों के पास ध्वनि करती . वह शंख ध्वनि करना भी सीख गयी थी . लग रहा था, पूजा करने में उसने शरीर की पूरी ऊर्जा लगा ली थी . उसने जैसे तय कर लिया था कि वह ईश्वर को इस बात के लिए राजी करके ही दम लेगी कि शीनी तलाक की जिद छोड़ दे . पूजा करते करते सहसा वह निढाल हो गयी और वहीं आसन पर लुढ़क गयी .

शील ने छोटी बिटिया नेहा को भी सेण्ट पाल से बुलवा लिया था . वह बच्चों को राबर्ट के पास छोड़ आयी थी कि शाम तक तो उसे लौट ही आना है, मगर यहाँ अपने माता पिता की स्थिति देख उसने एकाध दिन उनके पास रुक जाना ही बेहतर समझा . शीनी उसकी बड़ी बहन नहीं सखी भी रही है, उसे विश्वास था कि शीनी उसकी बात पर तो जरूर ही गौर करेगी, मगर ज्योंही नेहा ने उसे अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया, शीनी ने उसे अपनी सीमा में ही रहने का मशवरा दिया और फोन पटक दिया . नेहा इस व्यवहार के लिए तैयार न थी . उसे गहरा आघात लगा . इस घर में आज पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी ने उससे सुबह चाय तक के लिए नहीं पूछा था . एक खास तरह का बेगानापन चारों तरफ पसरा हुआ था . नीचे माँ और ऊपर पिता ने मनहूसियत फैला रखी थी . जब जब ऐसा हुआ, शीनी के कारण ही हुआ . उसे झटके देने की आदत है . पहला झटका उसने तब दिया था जब वह विधिवत घोषित रूप से डेट पर गयी थी . नेहा उन दिनों स्कूल में पढती थी . स्कूल से लौट कर उसने पाया, घर का माहौल कभी इतना मनहूस और गमगीन न था . लग रहा था, दीवारें रो रही हैं, फरनीचर सिसक रहा है . फर्श पर बिछा कालीन मुर्दे की तरह निस्पंद पडा था . हस्बेमामूल उसने अत्यंत उत्साह से आवाज दी थी, मॉम कहाँ हो . मैं आ गयी .

नेहा को याद है, उसकी आवाज कमरे का चक्कर लगा कर उसी की गोद में आ गिरी थी . उसने दुबारा आवाज दी मॉम मॉम . कोई उत्तर न पाकर वह बेडरूम में घुस गयी थी . उसने देखा उसकी माँ आज ही की तरह औंधी लेटी थी और सिसकियाँ भर रही थी .

क्या हुआ माँ उसने माँ को हिलाते हुए पूछा .

मर गयी तेरी माँ . माँ ने सिसकियों के बीच जवाब दिया .
 
नेहा हतप्रभ माँ के पास खड़ी रही . उसे जिला स्तरीय स्कूली प्रतियोगिता में वादन का पहला पुरस्कार मिला था और वह बहुत उत्साहित थी . उसने लगभग दौड़ते हुए घर में प्रवेश किया था कि जाते ही माँ से लिपट जाएगी और माँ थी कि उसकी तरफ पलट कर भी न देख रही थी . उसने लिविंग रूम में जाकर डैड को फोन मिलाया और हवा में तैरते हुए बताने लगी, डैड, आई एम फीलिंग एज इफ आई एम आन टाप आफ द वर्ल्ड . दस लड़कियों में फर्स्ट आयी हूँ . कम होम अर्ली डैड, आई एम सो एँक्शस टु शेयर माई फीलिंग्स विद यू .

नेहा जानबूझ कर ऊँचे स्वर में बोल रही थी ताकि उसकी माँ भी यह खुशखबरी सुन ले और आकर उसे अपने आलिंगन में ले ले . माँ पर इस खबर का भी कोई असर न हुआ और वह जस की तस लेटी रही .

मॉम, मॉम, इस तरह परेशान क्यों हो

जवाब में माँ की सिसकियाँ और तेज हो गयीं . अचानक नेहा को शीनी का ध्यान आया, शीनी कहाँ है मॉम

मेरे रोकते रोकते वह किसी गोरे के साथ मुँह काला करने चली गयी . हाय रे, मैं तो बर्बाद हो गयी, मैं कहीं की न रही . मुझसे यह सब न सहा जाएगा . मुझे ऊपर उठा ले मेरे पातशाह . माँ विलाप करने लगी .

नेहा को समझते देर न लगी कि शीनी निक के साथ ’डेट पर गयी है . वह कई दिन पहले इसकी घोषणा कर चुकी थी . माँ उस समय भी चिल्लायी थी . शीनी को पीटने के लिए उसके हाथ भी उठे थे, मगर डैड ने उसका हाथ थाम लिया था . उन्होंने उस वक्त शीनी से कहा तो कुछ नहीं, मगर वहाँ से उठ कर अपनी असहमति प्रकट कर दी थी .

नेहा के लिए यह कोई अजूबा बात न थी . उसके स्कूल की सहेलियाँ आये दिन किसी न किसी के साथ डेट पर जाती रहती थीं . डेट को लेकर उसके मन में एक हिचक जरूर थी, मगर परहेज नहीं था . उसकी कक्षा के दो एक लड़के उसे भी डेट पर ले जाने की पेशकश दे चुके थे, मगर उसने विनम्रता से मना कर दिया था . उसे मालूम था, एक न एक दिन हर लड़की डेट पर जाती है, वह भी जाएगी . माँ को इस तरह रोते कलपते देख उसे बहुत पीड़ा हुई . उसकी जहालत पर गुस्सा भी आया . माँ की नजर में जो हिन्दुस्तान में होता है, वही सही है . उसे विश्वास नहीं होता कि माँ ने भारत में समाजशास्त्रमें एम. ए. किया था . औसत हिन्दुस्तानी अभिभावक लड़का लड़की के मेलजोल को निरापद नहीं मानते . जाने उनके मन में यह क्यों घुस गया है कि लड़का लड़की एकांत पाते ही सेक्स करने लगेंगे . वे अपने बच्चों पर भी भरोसा नहीं करना चाहते . नेहा अपनी बहन को अच्छी तरह जानती है, वह लौट कर यह कहने में भी सक्षम है कि माँ मैं सही सलामत लौट आयी हूँ, चिन्ता न करो कोई सेक्स वेक्स नहीं हुआ . माँ बहुत गर्व से बताया करती थी कि हिन्दुस्तानी लड़कियाँ डेटफेट पर नहीं जातीं . मौका मिलते ही वह एक आदर्श हिन्दुस्तानी लड़की का खाका पेश करती रहती थी . उसकी हमेशा यही कोशिश रहती थी कि उसकी लड़कियाँ विलायत में रहते हुए भी शुद्ध हिन्दुस्तानी लड़कियों की तरह पेश आयें . शलवार कमीज पहनें और हमेशा सिर ढाँप कर रखें . नजरें झुकी रहें .

दोनों लड़कियाँ आज तक यह मानने को तैयार न थीं कि शादी से पहले मम्मी और डैडी ने एक दूसरे से विधिवत बातचीत तक न की थी .

पहली बार डैडी को देखा था तो कैसा लगा शीनी माँ से पूछती .

वह कैसे भी होते, मुझे अच्छे लगते . यह बताते हुए माँ यह भी जड़ देती, हमें यही सिखाया गया था . इस बात का साफ साफ यह अर्थ निकलता था कि मेरे तजुर्बे से कुछ सबक ले लो . घर में मम्मी डैडी की शादी की एक तस्वीर थी जो बच्चों के मनोरंजन का साधन बन चुकी थी . शीनी कहा करती थी कि तस्वीर में दोनों के चेहरे इतने कठोर और ऐंठे हुए लग रहे थे कि देख कर यह पूछने की इच्छा होती थी कि शादी की तस्वीर है या तलाक के कागजों पर दस्तखत करने के फौरन बाद की आजिज आकर मम्मी ने बेसमेण्ट में वह तस्वीर छिपा दी थी, मगर शीनी को इसकी भनक लग गयी थी . जब कभी घर में सन्नाटा खिंच जाता, शीनी वह तस्वीर खोज निकालती . उसके बाद घंटों ठहाके लगते . तस्वीर की नयी नयी व्याख्याएँ पेश की जातीं . शीनी कहती, ऐसा लगता है कि दो बाल ब्रह्मचारियों की जोर जबरदस्ती से शादी करके तस्वीर खींच ली गयी है . मम्मी ने सिर ऐसे ढाँप रखा है जैसे बहुत बर्फ गिर रही हो और डैडी को तो देखो, कैसी गोल टोपी पहन रखी है . लगता है खास तौर पर शादी के लिए खरीदी थी .

दीदी तुमने बैकग्रांउड पर ध्यान नहीं दिया . नेहा कहती, जंगल का कितना सुरम्य दृश्य है . हिरण शावक दौड़ रहे हैं . पेडों पर कोयल बोल रही है . मोर अपने बहुरंगी पंख फैलाये नृत्य कर रहे हैं . मॉम यह कहाँ का दृश्य है

जन्नत का . शील कहती, ऐसा ही है हमारा हिन्दुस्तान . देखो कैसे कलकल झरने बह रहे हैं .

माँ तुलना न किया करो . कैनेडा जैसी एक भी झील भारत में दिखा दो . अपनी पवित्र नदियों का रखरखाव तो भारत रख नहीं पाता .

मेरा बस चले तो तुम्हारे ऊपर टाडा लगा दूँ .

टाडा क्या होता है

रहने दो . जी.के. इतना न बढा लो कि अपच हो जाए .

तभी अचानक टेलीफोन की घंटी बजने लगी थी . नेहा को आज भी याद है कि उसने देर तक रिसीवर नहीं उठाया था . वह आशा कर रही थी कि माँ कोपभवन से निकल कर रिसीवर उठा लेगी . मगर माँ उसी प्रकार निश्चल लेटी रही . उसने माँ की नाक के आगे अंगुलियाँ फैला कर सुनिश्चित किया कि माँ की साँस चल रही थी . वह कुछ ऐसे अवसाद में डूबी हुई थी जैसे शीनी ने कुल की तमाम मर्यादाओं का गला घोंट दिया हो और अब डेट से लहू लुहान लौटेगी . माँ अपनी दोनों बेटियों को असूर्यपश्या बना कर रखना चाहती थी . वह ऐसी लड़कियों के उदाहरण पेश करती कि शीनी गुस्से से लालपीली हो जाती . जब माँ बताती कि उसकी सहेली लीला की बेटी अपूर्वा पैंतीस की हो गयी, बैंक में नौकरी करती है और कभी डेट पर नहीं गयी तो शीनी तुनुक कर जवाब देती, देखना माँ एक दिन वह पागल हो जाएगी या आत्महत्या कर लेगी .

माँ अपूर्वा को अक्सर वीकएंड पर आमंत्रित करती . उसकी हार्दिक इच्छा थी कि उसकी बेटियाँ भी अपूर्वा के नक्शेकदम पर चलें, मगर लड़कियों को अपूर्वा से एलर्जी थी, वे उसके साये से दूर भागतीं . शीनी ने तो एक दिन उससे कह दिया कि अपूर्वा तुमने बाल विधवा का रूप क्यों अपना रखा है . तुम्हारे पास अच्छी खासी सूरत और नौकरी है, किसी जवान गबरू से दोस्ती करो और घर बसाने की सोचो . ऐसे ही रहने का इरादा हो तो हिन्दुस्तान लौट कर साध्वी बन जाओ . अपूर्वा के जाने के बाद माँ ने शीनी को डांटा तो उसने अत्यंत बदतमीजी में जवाब दिया कि माँ सिर्फ दिन रात शलवार पर पहरा देने वाली लड़कियाँ ही पवित्र नहीं होतीं . मैं देख रही हूँ, इस देश में हिन्दुस्तानियों ने अपनी बेटियों को यही एक काम दे रखा है . आज पूरी दुनिया में लड़कियाँ मर्दों के कंधे से कंधा मिला कर काम कर रही हैं .

जो मुँह में आता है बकती रहती हो . माँ, बाप दुश्मन तो नहीं होते .

यहाँ आकर दुश्मन भी हो जाते हैं . कुलभूषण जी ने अपनी बिटिया को कितने अनुशासन में रखा हुआ था . बेचारी अवसादग्रस्त होकर छत के कुंडे से झूल गयी . बाप बडे गर्व से अफसोस में आये लोगों को उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट दिखा रहा था कि वह कुंआरी थी .

फाँसी पर झूल गयी, मगर अपनी इज्जत को बट्टा नहीं लगने दिया . शील ने कहा, यों ही दुनिया में सीना तान कर नहीं खडा भारत .

तो जाओ वहीं जा बसो . शीनी ने माँ से कहा, मुझे तो विस्मय होता है कि तुमने इस देश की नागरिकता ली ही क्यों .

मैं तो आना ही नहीं चाहती थी गोमांस भक्षियों के इस देश में .

माँ, क्यों अपने को धोखा देती रहती हो . नागरिकता लेने के लिए न जाने कितने सच्चे झूठे शपथपत्र तुमने दाखिल किये थे . मेरा मुँह न खुलवाओ .

तुम्हारे जैसी संतान भगवान किसी को न दे . माँ ने बहुत दुखी होकर कहा था, जो अपने माँ बाप की दुश्मन हो जाए . मैं तो अपने को कोसती रहती हूँ कि ऋषियों मुनियों की पवित्र धरती छोड़ कर यहाँ क्यों चली आयी . पिछले जन्म में जरूर कोई पाप किया होगा, जिसका दंड भोग रही हूँ .

माँ तुम जैसे जानती नहीं कि ऋषियों मुनियों की धरती से छल छद्म से कितने लोग यहाँ आते हैं . कोई सगी बहन से फर्जी शादी रचा कर चला आता है तो कोई बहू से . जितनी झूठी शादियाँ और झूठे तलाक यहाँ के हिन्दुस्तानियों के बीच होते हैं, किसी दूसरे मुल्क के लोगों के बीच न होते होंगे .

मैंने लड़कियाँ नहीं, साँपिनें पैदा की हैं . माँ तर्क में नहीं पड़ना चाहती थी .

तुम्हें गर्व होना चाहिए कि तुम्हारी ये साँपिनें दोहरी जिन्दगी नहीं जीतीं . जब मैं हिन्दुस्तानियों को यह कहते हुए सुनती हूँ कि अवर कंट्री इज वैरी वैरी ग्रेट तो मेरा बहुत मनोरंजन होता है . दलितों, अल्पसंख्यकों और अपनी बहुओं को जिन्दा जलाने वाली कौम जब नैतिकता और अहिंसा का वास्ता देती है तो मेरी हंसी छूट जाती है .

यह जो कैंची की तरह तुम्हारी जुबान चलने लगी है, किसी दिन काट के रख दूँगी . गंदे लोग किस समाज में नहीं होते . मोई मरजानी सारी कौम को बदनाम कर रही है . ऐसी राष्ट्रविरोधी बातें करोगी तो कोई हिन्दुस्तानी तुमसे शादी करने को तैयार न होगा .

मुझे करनी ही नहीं किसी हिन्दुस्तानी से शादी .

मैं जान दे दूँगी, मगर किसी गोरे से शादी करने की इजाजत न दूँगी . राष्ट्रविरोधी कहीं की .

राष्ट्रविरोधी तो तुम हो . यहाँ की नागरिक हो और तुम्हारी लायल्टी दूसरे देश के साथ है . मैं तो यहाँ पैदा हुई थी और यहीं की जीवन शैली अपनाऊँगी .

जीवन शैली अपनाने से तुम्हें किसने रोका है . मैं तो सिर्फ इतनी सी बात तुम्हारे भेजे में डालना चाहती हूँ कि बेटा यहाँ की चकाचौंध से इतना प्रभावित न हो जाओ कि नारीसुलभ गुणों को भुला बैठो . नारी का सबसे बडा आभूषण लज्जा है . शील है . कोमलता है . कन्याओं का तो कौमार्य भी है .

माँ का रटारटाया भाषण सुन कर शीनी भड़क गयी, तुम लोगों की सारी नैतिकता चड्ढी तक सीमित है .

शीनी ने जानबूझ कर चड्ढी का जिक्र किया था . शीला चड्ढी को लेकर बहुत सजग रहती थी . बच्चियों को स्कूल रवाना करने से पहले शुरुआती कक्षा से ही वह सुनिश्चित कर लेती थी कि बच्चियों ने चड्ढी पहनी है कि नहीं . बच्चियाँ अब बडी हो गयी थीं और माँ जब स्कूल जाने से पहले पूछती कि चड्ढी पहन ली है तो दोनों बच्चियाँ जलभुन कर राख हो जातीं . शीनी आजिज आकर एक दिन माँ से भिड़ गयी, चड्ढी के भीतर क्या हीरे जवाहरात रखे हैं

हमारी संस्कृति में तो यह हीरे जवाहरात से भी ज्यादा मूल्यवान है . हीरा खो जाए तो दुबारा खरीदा जा सकता है, मगर इसे नहीं . यह स्त्री का ऐसा आभूषण है जो खो जाने पर दुबारा हासिल नहीं किया जा सकता .

माँ, मेरी समझ में नहीं आता कि हिन्दुस्तानी लोग अपनी बेटियों के यौन जीवन के प्रति इतना क्रूर क्यों हो जाते हैं . अपनी बेटी की उम्र तक छह बच्चे पैदा करने वाले माँ बाप भी बेटी को दिमागी तौर पर चेस्टिटी बेल्ट पहनाते रहते हैं .

यह कौन सी बेल्ट होती है . मेरे साथ ज्यादा अंग्रेजी न झाड़ा करो .

गुप्तांग पर ताला लगाने वाली पेटी .

क्या बक रही हो . यह कैसी शिक्षा पद्धति है जो यह भी नहीं सिखाती कि माँ बाप के साथ कैसे पेश आना चाहिए . कौन ऐसे माँ बाप होंगे जो अपनी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे .

सब हिन्दुस्तानी अपनी बेटियों के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं . तुम भी ऐसा ही कर रही हो . जब से मैंने होश संभाला है तुम मुझे शीलरक्षक पेटी ही तो पहनाती रहती हो . यह मानसिक पेटी तो असली पेटी से भी ज्यादा यंत्रणा देती है .

मेरा बस चले तो मैं तुझे वापिस पंजाब भेज दूँ . तुम्हारे लच्छन मुझे ठीक नहीं लग रहे . स्कूल से क्या क्या सीख कर आती हो .
 
नेहा को शीनी का दो टूक बात करने का अंदाज बहुत अच्छा लगता था . वह खुद तो इतनी दब्बू थी कि अपनी फरमाइश भी शीनी के माध्यम से माँ बाप तक पहुंचाती थी . भीतर ही भीतर वह शीनी के डेट पर जाने के साहसिक कदम से खुश ही थी . जो चीजें शीनी संघर्ष करके हासिल करती थी, नेहा को विरासत मे मिल जाती थी . उसे विश्वास था कि जब वह डेट पर जाएगी तो घर में इतना बवाल न होगा . वह अभी सिर्फ चौदह की थी और उसका एक सहपाठी विलियन उससे कई बार डेट के लिए आग्रह कर चुका था . एक दिन तो वह नेहा की बेरुखी से आजिज आकर बोला, कि हिन्दुस्तानी लड़कियाँ डेट से ऐसे डरती हैं, जैसे अनाडी लड़कियाँ हनीमून से . नेहा तो सचमुच अनाड़ी थी, इतनी अनाड़ी कि हनीमून का मतलब भी न समझती थी . घर जाकर सबसे पहले उसने डैड के एन एबी जेड आफ लव में हनीमून का अर्थ देखा और मुक्कियाँ तान कर विलियम को कोसा . नेहा विचारों में ऐसी खोयी थी कि फोन कई बार टनटना कर शांत हो चुका था . इस बार घंटी बजी तो उसने अनिच्छा से फोन उठा लिया था . डैड थे लाइन पर, घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा, मैं एक घंटे से परेशान हूँ .

मैं सो गयी थी डैड . नेहा ने कहा .

तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं

मम्मी बेडरूम में है . नेहा ने बताया, शीनी डेट पर गयी है और मम्मी तब से रो रही है .

उस बदतमीज लड़की ने मनमानी ही की . डैड ने एक लम्बी साँस भरते हुए कहा, मम्मी उठे तो बता देना मैं खाना खा कर आऊँगा . भारत से स्वामी अपूर्वानंद जी आये हुए हैं . गुजराल के यहाँ उनका प्रवचन और भंडारा है . और हाँ, शीनी आ जाए तो मुझे सूचित जरूर कर देना .

जी डैड . नेहा ने कहा .

नेहा को लग रहा था कि घर का वातावरण बहुत तनावग्रस्त हो गया है . शीनी के लौटने पर अच्छा खासा बवाल होने की सम्भावना बन रही थी . माँ को अवसाद से बाहर लाने में काफी मशक्त करनी पड़ सकती है और शीनी ने अगर कहीं डैड से जुबान लडाने की गुस्ताखी कर दी तो उसके गम्भीर परिणाम हो सकते हैं . शीनी पहले ही सबको आगाह कर चुकी है कि किसी ने उस पर हाथ उठाया तो वह पुलिस को खबर कर देगी . अब तक कई हिन्दुस्तानी परिवार बच्चों की शिकायत कर पुलिस की चपेट में आ चुके थे . नेहा की हमदर्दी शीनी के साथ थी, उसे लग रहा था कि उसके माता पिता को पिछडी मानसिकता से मुक्ति पानी चाहिए और वे एक मामूली सी बात को लेकर तूमार बांध रहे हैं . यहाँ के आचार व्यवहार में डेट पर जाना एक सामान्य बात है . विलियम को मना करने के बाद एक दिन नेहा ने अपनी सहेली एस्टैला से पूछा कि क्या वह कभी डेट पर गयी है तो उसने अत्यंत सादगी से जवाब दिया कि वह हर वीकएंड को डेट पर जाती है और उसके घर वाले भी इसमें हस्तक्षेप नहीं करते . एक दिन उसने एस्टैला से डरते डरते पूछा, एस्टैला, अगर तुम बुरा न मानो तो मैं तुमसे एक निजी सवाल पूछना चाहती हूँ .

पूछो पूछो .

एस्टैला, सच सच बताना . क्या तुम अभी तक पवित्रहो

बडा बेहूदा सवाल है . पवित्र से तुम्हारा क्या अभिप्राय है

आई मीन कि क्या तुम वर्जिन हो

एस्टैला ने बहुत जोर से ठहाका लगाया, मैं तो साल भर से गर्भनिरोधक गोलियों के कोर्स पर हूँ . अच्छा, तो अब तुम बताओ कि क्या तुम अभी तक वर्जिन हो

नेहा का चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया . लजाते हुए बोली, और क्या .

मुझे तो वर्जेनिटी एक बोझ लगने लगी थी . मैं जल्द से जल्द उससे मुक्ति पा लेना चाहती थी ताकि सामान्य जीवन जी सकूं . सच तो यह है मैं इससे आब्सैस्ड नहीं रहना चाहती थी .

तो तुमने क्या किया नेहा ने डरते डरते पूछा .

मुक्ति पा ली . और क्या किया

कैसा था तुम्हारा अनुभव

बहुत खराब . अनाडीपन की भोंडी मिसाल . चार पाँच सेकेण्ड में ही वारे न्यारे हो गये . आई फाडंड इट लैस इराटिक दैन ए गाइनिकालजिकल एग्जाम .

एस्टैला की बात सुन कर नेहा बहुत निराश हुई . एस्टैला ने नेहा को भींचते हुए कहा, निराश न हो मेरी जान . यहीं से स्वर्ग के आनंद द्वार खुलते हैं . मेरे लिए तो प्रत्येक वीकएंड एक नयी एक्स्टेसी, एक नया हर्षोन्माद लेकर आता है . तुम अभी बच्ची हो, ये बातें तुम्हारी समझ में न आयेंगी . मैंने सुना है ज्यादातर हिन्दुस्तानी लड़कियाँ उसी तरह वर्जेनिटी को चिपकाये घूमती हैं जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को . मुझे लगता है, बहुत से पेरेण्ट्स बच्चों के यौन जीवन से ईष्र्या करने लगते हैं और उन्हें प्रताडित करते हैं .

नेहा नाराज हो गयी थी एस्टैला की बात से . उसने कहा, हिन्दुस्तानी पेरेण्ट्स तो ऐसा नहीं करते . हमारे यहाँ हर काम के लिए उम्र तय है . नेहा को लगा था कि एस्टैला हिन्दुस्तानियों पर कटाक्ष कर रही है .

तुम तो नाराज हो रही हो . फर्क सिर्फ इतना है कि हम किसी को अपना भविष्य तय करने की इजाजत नहीं देते .

तुम्हारी दोस्ती तो ट्रेंट से चल रही है न . नेहा ने बात का रुख बदलते हुए पूछा .

कौन ट्रेंट

वही जिसने नाईन्थ में टाप किया है .

उसे तो मैंने बहुत पहले लताड़ दिया था .

क्यों

बहुत शक्की और झक्की स्वभाव का है . कोई लड़की उसके साथ डेट पर नहीं जाना चाहती .

क्यों

वह भी तुम्हारी तरह वर्जेनिटी के प्रश्न पर अब्सैस्ड रहता है . मैंने बहुत पहले उसे राय दी थी कि उसे किसी वर्जिन की तलाश है तो इंडिया चला जाए, सुनते हैं वहाँ ढेरों मिलती हैं .

नेहा कहते कहते रुक गयी कि भारत जाने की जरूरत नहीं, यहाँ भी बहुत सी ऐसी लड़कियां मिल जाएंगी . उसने मन ही मन तय किया कि मौका मिला तो वह ट्रेंट से दोस्ती करेगी . नेहा अभी उसके साथ डेट पर जाने का सपना देख ही रही थी कि एक दिन खबर लगी कि ट्रेंट सचमुच छात्र विनिमय कार्यक्रम के तहत चंडीगढ चला गया है . नेहा का दिल बैठ गया . उसे विश्वास हो गया कि ट्रेंट चंडीगढ से अकेला नहीं लौटेगा, चंडीगढ की कोई न कोई असूर्यपश्या उसके साथ अवश्य लौटेगी . एक दिन एस्टैला ने नेहा को बताया कि वह इस वर्ष परीक्षाओं के बाद माइकल के साथ यूरोप भ्रमण पर जा रही है . नेहा की समझ में नहीं आ रहा था कि एस्टैला के घर वाले उसके इस प्रस्ताव पर कैसे राजी हो गये कि वह एक लड़के के साथ अकेले यूरोप भ्रमण कर जाये . उसकी माँ तो इस प्रस्ताव पर जहर खा लेती . जहर खाने की हिम्मत न होती तो उसका गला घोंट देती . कुछ भी हो सकता था . उसकी माँ पागल भी हो सकती थी . उसके पिता घोर यंत्रणा में से गुजरते मगर जल्द ही अपने को समझा बुझा कर शांत हो जाते . उनका तकियाकलाम भी उनके इस व्यक्तित्व के अनुरूप था . जब कहीं पेश न चलती तो वह गुनगुनाते— होता वही है जो मंजूरे खुदा होता है .

बहुत देर तक बेडरूम से कोई आवाज न आयी तो नेहा ने भीतर जाकर देखा, माँ रोते रोते सो गयी थी . बेड के पास ही तिपाई पर सैड़ेटिव का पत्ता पडा था . यह डैड की दवा थी . वह रोज सोने से पहले एक टिकिया लेते थे . लगता है आज माँ ने भी इसका सेवन किया है . अच्छा ही है, तनाव कुछ कम होगा . नेहा को विश्वास था कि अगर शीनी अच्छे मूड में लौटी तो माँ को दो मिनट में मना लेगी . दरअसल माँ की जान उसी में बसती थी . लाख चाहने पर भी वह उससे देर तक नाराज नहीं रह पाती थी . डैड की स्थिति भी माँ से बेहतर न थी .

शीनी तो हमारी पहली भूख प्यास की संतान है . वह कहते और बात आयी गयी हो जाती . मगर आज मामला संगीन था . नेहा इस बिन्दु को समझ रही थी .

माँ ने बाँह से मुँह ढाँप रखा था और वह बहुत धीमे और लयबद्ध खर्राटे भर रही थी . खर्राटे इतने धीमे थे कि ध्यान देने पर ही सुनाई पड़ते थे . शील खर्राटे ही नहीं भर रही थी, एक लम्बा सपना भी देख रही थी . इस सपने का सी डी वह कई बार देख चुकी थी . नया नया वी.सी.डी. प्लेयर खरीदने वाले मध्यवर्गीय परिवारों की तरह उसके संग्रह में केवल वही सी डी थी, जो प्लेयर के साथ मुफ्त मिलती है . वह माँ की गोद में सिर रख कर लेटी हुई है और माँ अत्यंत प्यार से उसके बाल सहला रही है . सच्चाई यह थी कि इस समय नेहा ही बहुत प्यार से माँ के बाल सहला रही थी यह दृश्य कुछ लम्बा खिंच गया क्योंकि नेहा को देर तक माँ पर लाड़ आता रहा . स्कूल भेजते समय उसके बालों पर प्यार से हाथ फेरती और फिर दोनों हाथों से चुनरी से उसका सिर ढँक देती–अच्छे बच्चे हमेशा सिर ढँक कर रखते हैं .
 
शील ने सिर पर चुनरी ओढे ओढे ही प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली . सरदार धारा सिंह स्कूल के हैडमास्टर थे, उन्होंने पिता को समझाया, सलियाराम तेरी बेटी बहुत जहीन है . स्कूल में अव्वल आयी है . इसकी पढाई का कोई इंतजाम करो . धारा सिंह के मश्वरे पर अमल करते हुए सलियाराम ने बिटिया को उसकी मौसी के पास जालंधर भेज दिया . शील ने घर वालों को निराश न किया और कालिज तक पहुँचते पहुँचते वजीफा पाने लगी . अपने कालिज की वह सबसे शर्मीली लड़की थी . हरदयाल समाजशास्त्र के अध्यापक थे . एम.ए. का परिणाम घोषित हुआ तो उन्हें यकीन नहीं आया कि उनकी कक्षा की सबसे शांत और छुईमुई लड़की ने सबसे अधिक अंक पाये हैं . उन्होंने अनेक बार उससे बात करने की कोशिश की थी, मगर वह अपनी गर्दन को झटका देकर ही जवाब दे देती . हरदयाल ने यह भी लक्षित किया था कि वह अपनी सहेलियों के बीच खूब चहकती थी . उन्होंने तय किया कि आज तो वह उस लड़की की जुबान खुलवा कर ही रहेंगे . बाद में उन्होंने महसूस किया कि लड़की की कम उनकी अपनी जुबान ज्यादा खुल गयी थी . उन्होंने शील को बुलवा भेजा . वह आयी तो सिर से पैर तक अजीब तरह के आभिजात्य से ढँकी हुई, जैसे कोई ढँकी हुई थाली उनके सामने आ गयी हो . उसने सिर झुका रखा था और उस पर कुछ इस अंदाज से कपड़ा ओढ़ रखा था कि चेहरा दिखायी नहीं पड़ रहा था .

दो साल तक मुझसे पढी हो, अब यकायक यह हया कैसी हरदयाल का मिजाज शायराना नहीं था मगर अचानक उन्होंने पाया, वह कह रहे थे, जवां होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया पर्दा .

शील ने और भी सिर झुका लिया . धनुष थोड़ा और झुक गया .

क्या मुँह में जुबान नहीं है

है . उसने सिर हिलाया, जैसे स्प्रिंग लगा हो .

प्रोफेसर खुद बहुत संकोची स्वभाव का था, न जाने किस झोंक में कह उठा, मुझसे शादी करोगी

स्प्रिंगदार गर्दन फिर हिली . हाँ कहने के बाद देर तक न न करती रही . प्रोफेसर बोला, शादी तय समझो . जाकर पिता से कहो, तुम्हारी शादी की तैयारी करें .

अचानक उसने तनिक सा सिर उठाया और बोली, यह कैसे हो सकता है सर

हरदयाल ने उसके सुर्ख गाल थपथपा दिये, ऐसे .

शील ने मुँह में दुपट्टा खोंसा और साइकिल स्टैण्ड तक भागते हुए चली गयी . उसका तालू सूख गया था . वह दौड़ रही थी या उड़ रही थी . उसके जैसे पंख निकल आये थे . सपने में इस समय वह व्योम में एक पक्षी की तरह विहार कर रही थी . यह एक छोटी सी सी डी है जो उसके सपनों में अक्सर चलती रहती है . हर आदमी का एक सपना होता है जो जीवन पर्यन्त उसका पीछा करता रहता है . शील का यही सपना था, जो कभी उसका पीछा करता था और कभी वह उसका पीछा करती थी .

यह शील की छोटी सी मुख्तिसर सी प्रेम कहानी थी .

शादी के बाद, हनीमून के दौरान, यकायक उसके जीवन में, उसके नहीं उन दोनों के जीवन में चमत्कारिक घटनाएं होने लगीं . कल्पनातीत था वह समय . देह और मन का सारा विषाद और अवसाद स्फूर्ति और ऊर्जा में रूपांतरित हो गया . वे लोग शिमला में थे जब खबर लगी कि हरदयाल को कैनेडा में जॉब मिल गया है और तीन माह के भीतर ही उसे उड़ जाना होगा . वह होटल की लाबी में खड़ा था जब उसे यह खबर मिली . हरदयाल ने शील को अपनी बाहों में भींच लिया और उसकी गर्दन, ललाट और पलकों पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी, तुम मेरे लिए कितनी भाग्यशाली सिद्ध हो रही हो .

शील छिटक कर अलग हो गयी थी, तुमने तो लोकलाज भी छोड़ दी . देख नहीं रहे, हम लोग लाबी में खड़े हैं .

हरदयाल उसे घसीटते हुए लिफ्ट की ओर भागा . वह बेकाबू हो रहा था . वह इसी समय अपना सम्पूर्ण प्यार शील पर उड़ेल देना चाहता था . शील को विश्वास है, शीनी उसी रोज उसके पेट में आयी थी .

शील की चेतना में अचानक चेहरे बदलने लगे . क्या गजब हुआ कि हरदयाल की जगह उसे किसी फिरंगी का क्रूर चेहरा नजर आने लगा, जो उसकी बिटिया को लगभग घसीटते हुए एक गुफा में ले जा रहा था . भयाक्रांत शीनी मदद के लिए पुकार रही थी . शीनी आँखों से ओझल होती, इससे पहले ही शील जोर से चिल्लायी, बचाओ, बचाओ . मेरी बिटिया को बचाओ . कोई है

नेहा जो माँ को गहरी नींद में पाकर लिविंग रूम में चली आयी थी, माँ की आवाज सुन कर कमरे की तरफ लपकी . उसने देखा, उसकी माँ पसीने से लथपथ बिस्तर पर हाँफ रही थी .

क्या हुआ मॉम

शील ने आँखें खोलीं और यह जान कर राहत की साँस ली कि वह यथार्थ नहीं था, एक दु स्वप्न था . उसे अपने संसार में लौटने में देर न लगी . एक टीस की तरह उसे याद आया कि शीनी डेट पर गयी हुई है . वह पलंग पर उकडूँ बैठ कर फिर बिसूरने लगी . नेहा भाग कर पानी का गिलास ले आयी, अब क्या हुआ मॉम . शीनी डेट पर गयी है, हमेशा के लिए ससुराल नहीं चली गयी .

यह लड़की मेरी मौत बन कर पैदा हुई है . नेहा ने तुरंत माँ के मुँह पर पानी का गिलास लगा कर उसकी जुबान बंद कर दी .

अब मैं नहीं बचूँगी . यह सब मुझसे बर्दाश्त न होगा .

माँ अपनी बिटिया पर भरोसा रखो . वह अपनी रक्षा करने में सक्षम है .

नेहा, तुम इन मर्दों को नहीं जानती . तुम अभी बच्ची हो मेरी बिटिया . मैं अपनी कम्युनिटी के लोगों को क्या मुँह दिखाऊँगी

माँ तुम पागल हो गयी हो . हम एक सभ्य समाज में रहते हैं .

मुझे नहीं चाहिए ऐसा सभ्य समाज . मुझे हिन्दुस्तान वापिस भेज दो . यहाँ इस मुल्क में मेरा दम घुट जाएगा .

यहाँ हिन्दुस्तान से कहीं ज्यादा आक्सीजन है साँस लेने के लिए . नेहा बोली, याद है हरिद्वार की भीड़ में आपका दम घुटने लगा था .

माँ दुबारा सिसकने लगी . नेहा को माँ का यह प्रलाप वाहियात लग रहा था, उसने गुस्से से कहा, वह डेट पर गयी है व्यभिचार करने नहीं .

हाय वह फिरंगी के साथ चली गयी . उसने हम सबका धर्म भ्रष्ट कर दिया .

माँ धर्म तो उसी दिन भ्रष्ट हो गया था, जब इस धरती पर कदम रखा था . याद है हम दोनों को एक किरस्तीन नर्स ने पैदा किया था .

माँ की हिचकियाँ कुछ शांत हुईं, मगर यह कह कर नेहा ने माँ का जख्म फिर हरा कर दिया, देस में भी हम बिरादरी बाहर हो चुके होंगे . याद करो तुम्हारी बहन रुक्मिणी ने लिखा था कि देस में बडी तेज अफवाह है कि हम सब लोग ईसाई हो गये हैं .

नेहा ने जैसे जख्म पर नमक छिड़क दिया था . माँ ने ड्राअर से सैड़ेटिव की एक और गोली निकाली और निगल गयी . नेहा ने गोलियों का पत्ता अपनी जेब में रख लिया और कमरे से बाहर निकल आयी .

अपने कमरे में जाकर वह सी डी पर तेज आवाज में आई जस्ट कैंट स्टाप लविंग यू सुनते हुए बेतहाशा नाचने लगी . वह इस समय कुछ भी सोचना न चाहती थी, न माँ के बारे में न बहन के बारे में . नाचते नाचते वह थक कर बिस्तर पर गिर पडी . बाहर कोई कालबेल बजा रहा था .

नेहा को इतने वर्षों के बाद आज भी याद है कि कालबेल की आवाज सुन कर भी वह अनमनी लेटी रही थी . नेहा को पल भर में ही पता चल गया था कि शीनी लौट आयी है . गुस्से में उसने कालबेल पर जो अंगूठा दबाया था, उसे दबा ही रहने दिया . यह हरकत शीनी के अलावा दूसरा कोई नहीं कर सकता था . शीनी को अब कालबेल की चिन्ता नहीं रह गयी थी . कालबेल चाहे जल कर राख हो जाए, दरवाजा फौरन खुलना चाहिए . नेहा ने यही किया . वह दौड़ती हुई गयी और साँकल हटा दी .

सो रही थी क्या, कब से घंटी बजा रही हूँ .

शीनी अकेली नहीं थी, साथ में एक लड़का भी था . गोरा . शीनी ने लड़के से परिचय कराया, माई फ्रेण्ड निक .

नेहा ने हाथ बढाया, हाई नेहा हेयर .

निक मुस्कराया . लड़कियों की तरह उसके गालों में डिम्पल उभरे और विलीन हो गये . उसकी नीली आँखें किसी बिल्ली की आँखों की तरह चमक रही थीं . ठुड्डी पर बकरे की तरह कहीं कहीं बाल दिखायी दे रहे थे . निक शीनी की बगल में ही खडा था . नेहा को यह देख कर निराशा हुई कि निक शीनी से कद में एक ड़ेढ इंच ही लम्बा था . नेहा कहा करती थी कि ऐसा ब्वाय फ्रेण्ड किस काम का जो कद काठ में आठ दस इंच भी बडा न हो .

मॉम कहाँ हैं शीनी ने लिविंग रूम में निक को सोफे पर बैठने का इशारा किया .

सो रही हैं . नेहा बोली, हाउ वाज द डेट

क्वायट बोरिंग . जवाब निक ने दिया, बस यही एक उपलब्धि रही कि शीनी को चाय पिलाने ले जा सका . उसने हाथ थामने की भी औपचारिकता नहीं निभायी .

मॉम तो इसी गम में सेडेटिव लेकर सो गयीं कि किसी अजनबी ने उसकी बिटिया का हाथ न थाम लिया हो .

वेयर इज योर ग्रेट मॉम

बेडरूम में .

क्या मैं वहाँ जा सकता हूँ

बिल्कुल नहीं . शीनी गुर्रायी, देखो मेरे जाने से घर में कितनी अशांति फैल गयी .

अशांति दूर करने ही मैं तुम्हारे साथ आया हूँ . निक उठा और जेब से कार की चाबी निकाल कर बेडरूम के दरवाजे पर दस्तक देने लगा .

यह तो हमारा बेडरूम है . नेहा को हँसी का दौरा पड़ गया .

निक को दूसरे बेडरूम का दरवाजा खोजने में देर न लगी . नेहा हँस रही थी और वह दरवाजे पर धीरे धीरे टिक टिक करता रहा . भीतर कोई स्पंदन न हुआ . टिक टिक की धीमी आवाज स्पष्ट सुनाई देने से आभास हो रहा था कि घर में कितना सन्नाटा है . सन्नाटा था, मगर सूनापन नहीं था . कैनेडा के अधिसंख्य घरों में प्राय निर्जन सड़कों का सन्नाटा घर के भीतर घुस आता है, धूल की तरह . नामालूम तरीके से .

तुम बैठो निक, मैं मॉम को बुला कर लाती हूँ . नेहा बोली .

निक को राहत महसूस हुई, वरना वह ऊब और विरक्ति से घिरता जा रहा था .

तुम्हारी क्या खिदमत की जाए शीनी ने निक से पूछा .

जस्ट होल्ड माई हैण्ड . न्यूनतम यही माँग सकता हूँ .

नथिंग डूईंग . शीनी ने कहा, लगता है तुम्हारी खैरियत इसी में है कि तुम चुपचाप लौट जाओ .

आज तो मैं फैसला करके ही लौटूँगा .

काहे का फैसला

अपने और तुम्हारे भविष्य का .

लगता है तुम्हारे ग्रह गर्दिश में हैं . मैं तुम्हें पहले ही आगाह कर चुकी हूँ कि अपने मॉम या डैड के किसी प्रकार के भी व्यवहार के लिए जवाबदेह नहीं हूँगी . अंडरस्टैण्ड .

भीतर कमरे से नेहा और मॉम की फुसफसाहट कमरे से बाहर रेंग रही थी . शीनी की जान में जान आयी कि निक के आने की बात सुन कर माँ ने विलाप नहीं शुरू कर दिया . माँ सक्षम थी कि अचानक पंजाबी शैली में विलाप शुरू कर देती . उस समय उनका विवेक भी साथ छोड़ जाता है . घर में इसे सीन क्रिएट करना कहा जाता था . शीनी को यह एक अच्छा लक्षण लगा . वह तो मानसिक रूप से अपने को इसके लिए तैयार करके लौटी थी कि उसको देखते ही घर में कुहराम मच जाएगा . उसे लगा, नेहा बहुत सकारात्मक भूमिका निभा रही है . इस अवसर का लाभ उठाते हुए शीनी भी कमरे में घुस गयी .

मॉम मैं आ गयी . सही सलामत . पाक साफ . शीनी ने माँ के बालों में अंगुलियाँ चलाते हुए कहा, मुझ पर भरोसा रखो मॉम . देखो, बाहर मेरा दोस्त आया है . वह क्या राय बनाएगा हम लोगों के बारे में . चलो उठो, वह तुम्हारे हाथ के चीज पकौड़े खाना चाहता है . उठो, उठो, मेरी बहुत अच्छी माँ .

शील ने आखें खोलीं . अपने ऊपर झुका बेटी का मासूम निष्पाप चेहरा देखा . एक उपालम्भ भरी नजर से उसे देखा और गले लगा दिया . माँ की दृष्टि में लाड़, शिकायत, ममत्व, असहजता, रूठने आदि का ऐसा मिलाजुला भाव था कि शीनी को भी रुलाई आ गयी . नेहा दोनों को अकेला छोड़ चुपचाप बाहर निकल आयी कि निक को उसके हाल पर नहीं छोड़ देना चाहिए . वह अपने को अटपटी स्थिति में पा रहा होगा कि दोनों बहनें उसे छोड़ कर कहाँ गायब हो गयीं .

निक कमरे में नहीं था . नेहा ने सब जगह देख लिया . दीदी के बेडरूम में देख आयी, रसोई में भी झांक लिया, बाथरूम भी खाली थे . ऐसे मनहूस और गैरदोस्ताना माहौल में कौन बैठना पसंद करेगा . वह माँ और बहन दोनों को कोसते हुए सोफे पर धंस गयी और टी.वी. खोल लिया . वह देर तक चैनल बदलती रही . उसने कुछ ही देर में साठ सत्तर चैनलों का सफर तय कर लिया . कोई भी चैनल उसे बाँध नहीं पाया . उसने टी.वी. बंद कर दिया और इंतजार करने लगी कि कमरे से कोई बाहर आये . कमरे से न माँ नमूदार हुई न बहन . उसकी भी भीतर जाने की इच्छा न हुई . वह दरवाजा खोल बाहर निकल गयी . उसकी कुछ देर टहलने की इच्छा हो रही थी . उसने देखा बाहर लान में कोई सूखे पत्ते बुहार रहा था . वह कोई दूसरा नहीं, निक था . उसने लान के बीचोबीच सूखे पत्तों का एक पिरामिड सा निर्मित कर लिया था और अब उसकी होली जलाने की तैयारी कर रहा था .
 
निक तुम यहाँ हो . मैं तुम्हें पूरे घर में ढँढ आयी हूँ .

तुम लोगों का लान कितना निगलैक्टिड है . मैं हफ्ते में एक बार रेकिंग और मोईंग कर दिया करूँगा . डैडी से पूछना, इस काम के लिए कितना मेहनताना देंगे .

मेरे डैड की गार्डनिंग में कोई दिलचस्पी नहीं है .

मॉम की .

वह उनकी सहकर्मिणी हैं . नेहा ने पूछा, यह अचानक आपको लान की सफाई की क्या सूझी

मैं खाली नहीं बैठ सकता . यह मेरी कमजोरी है .

हमारा लान कभी इतना साफ सुथरा नहीं था निक . नेहा ने कहा, थैंक्यू सो मच .

तुम्हारी बहन को तो थैंक्यू कहने में भी तकलीफ होती है .

क्यों निक, पहली फुर्सत में ही मेरी बुराई करने लगे . शीनी ने बाहर आकर अपना नाम सुना तो बोली, वाऊ निक, तुम तो बहुत अच्छे माली हो . थक गये होगे, भीतर चलो तुम्हें गर्मागर्म चाय पिलायें .

निक ने काम में जुटने से पहले अपनी जीन्स के पांयचे मोड़ लिये थे, आस्तीनें चढा ली थीं . उसने पत्तों में आग लगा दी तो आग के प्रकाश में उसका चेहरा दिप दिप करने लगा . बाहर ठंडी बर्फीली हवा चल रही थी . दोनों बहनें सीने से बाहें चिपकाये खडी थीं . सूखे पत्ते चटचटाते हुए जल रहे थे . तीनों को यह तपिश बहुत सुखद और आरामदेह लग रही थी . निक ऐसे मुस्तैद खडा था जैसे फायर बिग्रेड का कोई कर्मचारी हो . पत्ते बहुत तेजी से जल कर राख हो गये .

निक तुम तो इस मुद्रा में खड़े हो जैसे कोई किला फतेह करने निकले हो . शीनी बोली .

निकला तो इसी इरादे से था, मगर तुम परिणति देख ही रही हो . वह हँसा . उसके आगे के दांतों के बीच थोडी खाइयाँ थीं .

चलो भीतर चलो . तुम्हें अपनी माँ से मिलवा दूँ .

मुझे घुसपैठिया तो न समझ लेंगी

वह तो तुम हो ही . शीनी ने कहा .

ताहिरा के हिन्दू बाप की एक ही हिन्दू बीवी थी . लेकिन तब वो ताहिरा का बाप नहीं था, सिर्फ एक मुरीद था . बीबी बदरुन्निसा की आवाज का . वो भी अकेला नहीं, अनेकों में एक .

हर शनिवार रात के नौ बजे रेडिओ लाहौर से वह आवाज सुनाई देती . एक गजल सुनाती और सुनने वाले अटकल लगाते . कौन होगी कैसी होगी जितनी अटकलें, उतने चेहरे . कई–कई अजनबियों के साथ अलग–अलग पहचान कायम करती बेशुमार चेहरों वाली एक ही आवाज .

मुझे तो लगता है कि मेरे ही हाथ की बनी ताजा नानखटाई खा कर गाती है .

नहीं मियाँ, इतनी कुरमुरी नहीं कि मुँह में डालते ही घुल जाये . ये तो मटके में रख कर ठंडाया हुआ जलजीरा है . चुस्कारे लेकर पीयो और देर तक जायका बना रहे .

मेरी मानो तो ऐसा कि बन्नो रानी सतरंगी लहरिये वाली चुन्नी का पल्ला उछालती तीजों की पींग का हुलारा लेने जाती हो,

मन्नू ते बादशाओ सुन के सबज रंग दीया कच्च दीयाँ चूड़िया दिस्स जाँदीया नें . ऐंज लगदा है कि जींवे कोई हल्की जई वीणी खनका के अख्खाँ अग्गों ओजल हो जाये .

भई हमने लोगों को गजल कहते भी देखा है और गजल गाते भी सुना है, लेकिन फकत आवाज में रंग, खुशबू और जायके का माहौल . यह हुनर तो बस बदरूनिसा को ही हासिल है .

शायरी और मौसिकी का क्या रिश्ता जोड़ा है इस आवाज ने लगता है कि जैसे शायर की इजाजत लेकर उसका कलाम उसीको पेश करती हो .

शर्तिया कुँवारी होगी . आवाज से मासूमियत के तकाजे उभरते हैं, हसरतों के साये नहीं .

यकीनन कमसिन होगी .

हर कुँवारी कमसिन होती है, यार मेरे .

क्यों मियाँ देखने को तरस गये हो क्या

नहीं भई, यहाँ तो अब कुँवारे जिस्म के तसव्वुर से ही बदन चटख जाता है . उसके बाद घर में जो है, उसी से गुजर हो जाती है .

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गुजरात तहसील के रेडियो वाले घरों में शनिवार शाम को कुछ ज्यादा ही गहमा गहमी रहती . जिस मोहल्ले में जितने कम रेडियो, उतनी बड़ी रेडिओ मंडली . वकीलों, ठेकेदारों और सरकारी मुलाज़िमों के घरों में तो ज्यादातर घर के ही लोग होते, लेकिन रायसाहिब बदरीलाल के तिमंज़िले मकान की बैठक में जमा होने वाली रेडिओ मंडली पाँच–सात से शुरू होकर बीस–पचीस तक जा पहुँची थी . नीचे दूकान ऊपर मकान वाली ढक्की दरवाजा गली में शायद ही कोई घर ऐसा बचा हो जहाँ के मर्द शनिवार रात को बैठक न पहुँचते हों . मुनयारी, पसारी, लुहार, मोची, नाई, आढ़ती, दर्ज़ी, कसाई, सर्राफ सभी रहते थे उस गली में, सभी के पुश्तैनी मकान थे, तिमंज़िले तो सभी ने कर लिये थे . लेकिन किसी की मजाल न थी कि चौबारी छत भी अकेले कमरे से ढक ले .

आस पास के मकानों को नंगा करना है क्या गली के बड्ढ़े बडेरे बरज देते .

पूरे शहर की गलियाँ तंग होने लगी थीं, जिस के पास चार पैसे आ जाते, वही अपना चबूतरा चौड़ा करवा लेता . लेकिन ढक्की दरवाजा गली उतनी ही चौड़ी थी जितनी किले वालों ने बनवाई थी . तीन–तीन घुड़सवार बतियाते हुए एक साथ गुजर सकते थे . गली की औरतों को बुरका सँभालते हुए नुक्कड़ तक जाकर ताँगों की चादर लगी पिछली सीट पर उचक नहीं चढ़ना पड़ता था . पूरा का पूरा ताँगा सीधे मकानों के आगे आन खड़ा होता था और बिना बचो, बचो कहे मुड़ जाता था . सपाट टीले पर सिपहसिलारों का किला था और ढलान के कदमों मे बिछी ढक्की दरवाजा गली थी . किले की बुर्जियों से पहरेदार गली में बसे अपने मुलाज़िमों पर नजर भी रख लेते थे और सौदा–सुलफ लेने उन्हें दूर भी नहीं जाना पड़ता था .

बुर्जियाँ गिर गईं . किला टूट बिखर कर खंडहर हो गया . सिपहसलारियाँ खत्म हुईं . लेकिन ढक्की दरवाजा गली में रहने वालों को खुद मुख्तयारी की आदत पड़ गई . जिसे जरूरत हो, उनके पास आये . उन्हें किसी की मोहताजी नहीं . जो कुछ कहीं और न मिले, उनके पास निकल ही आता . खरीद लो या उधार माँग लो . नकदी न हो तो किश्तों में चुका दो . लिखा पढ़ी न कर सको तो अँगूठा लगा दो .

ढक्की दरवाजा गली के रायसाहिब बदरीलाल की पास पड़ोस के कई मोहल्लों में अच्छी–खासी साख थी . हर शाम ढले और छुट्टी के दिन कोई न कोई सलाह–मशविरा करने आ ही जाता . बड़ी कचहरी के सरकारी वकील से रोज का मिलना–जुलना था . खुद वकालत नहीं पढ़ी थी लेकिन नामी–गरामी वकीलों को एकाध पोशीदा दाँव–पेंच सिखा ही सकते थे . जमीन–जायदाद और कर्ज़ा–कुड़की के मामलात में खास दखल था उनका . कानूनी कार्रवाहियों की मियाद घटाने–बढ़ाने के कई टोटके थे उनके पास . चाहते तो छोटी–मोटी हेरा–फेरियाँ करने में ही साहूकार हो जाते . लेकिन रायसाहिब को लालच नहीं था . बस जरा शौकीन तबीयत थे .

ढीली–ढाली चारखाना या धारीदार तहमदों के फेंटे खुले–आम कसते, मटमैली गंजी–बनयानों से पसीना पोंछते तुड़ी–मुड़ी नोकों वाली धूल से सनी गुरगाबियों की उतारते–पहनते मर्दों की गली में रायसाहिब की एक अलग सी लिबासी शख्सियत थी . घर के अन्दर जाकर मिलो तो झक–पक सफेद लठ्ठे की सलवार, सीपी के बटनों वाला पापलीन या बोस्की का बादामी कुरता और साफ–सुथरे नाखूनों वाले बिना गाँठों के पैरो में भठवारी चप्पलें . गली से गुजरें तो गर्मियों में भी सलवार कुरते के उपर चुस्त काली शेरवानी, चमचम करते पम्पशू, तिल्ले वाली टोपी पर कस के बँधा हुआ सफेद मलमल का तुर्रेदार साफा . लंबा कद, भखता हुआ खुला रंग, भूरी–नीली आँखें और तीखी नाक . पता नहीं क्या खाकर जना था कि पचास पार करने पर भी कद–काठी सरू के पेड़ जैसी तनी रहती थी . गली में रूक कर बात करते तो लगता कि जैसे कोई सरहदी पठान सैरी–तफरीह के लिए तराई में उतर आया हो .

पूरी ढक्की दरवाजा गली में बस रायसाहिब का ही एक ऐसा मकान था कि जिसकी निचली मंज़िल में दुकान नहीं थीं . ना ही उनके मकान के अगले चबूतरे पर टीन–कनस्तर, थैले–बोरे या भाँडे–कसोरे बिखरे रहते थे . निचली मंजिल के पिछले हिस्से में उन्होंने हमाम बनवा लिया था, अगले हिस्से में ऊदी–सलेटी चौकोर टाइलों का फर्श बिछवा कर उपर जाने वाली सीढ़ियों में संगमरमर लगवा दिया था . वैसे भी सिवाय उनके कोई भी तो उस गली में दो–दो घरों का मालिक नहीं था . पुश्तैनी घर था गली के बीचों–बीच . नुक्कड़ वाला मकान उन्होंने खरीद लिया था, नीचे की दोनों दुकानों समेत, वो भी अपने लिए नहीं . अपनी बेवा बहिन के लिए ताकि वह अपने बाल–बच्चों समेत उनकी नजरों के सामने और रिहाईश से कुछ हट कर रह सके . कुछ मौका ही ऐसा बना कि रायसाहिब के मन की हो गई .

नुक्कड़ वाले मकान की बे–औलाद मालकिन ने अपना तीस साल का रंडापा बड़े आराम से काटा था . जब तक जिंदा रही, किसी मुफ्तखोरे रिश्तेदार को पास फटकने नहीं दिया . दुकानों का किराया तो आता ही था, किरायेदार दुःख–सुख भी पूछ लेते थे . जब वो मरी, तो उसके कई वारिस पैदा हो गए . गाली–गलौज से शुरू होकर बात मुकदमे कचहरी तक पहुँचने को हुई .

मदरसों में उर्दू–तालीम पाकर अर्ज़ी–नफीस बने लाला हुकम चंद के इंटर पास मुंसिफ बेटे बदरीलाल ने बेऔलाद बेवा के किरायेदारों और दावेदारों से अलग–अलग बात की . सितर–मितर दोनों का पास रखा .

नये मकान मालिक या तो तुमसे दुकानें खाली करवा लेंगे या किराया बढ़ा देंगे . बदरीलाल ने किरायेदारों को समझाया .

बँट–बटा कर आठ दस वारिसों के हिस्सों का फैसला कौन करेगा उसने दावेदारों से पूछा .

बात एक बार मुकद्दमें बाज़ी तक पहुँची तो बरसों लटक जाएगी .

वाजिब दाम चुका कर, बदरीलाल ने ही वारिसों से लिखा–पढ़ी की और दुकानों समेत मकान अपने नाम करवा लिया . नकदी उठाने के लिए पहले किरायेदारों से पेशगी वसूल की और फिर किराया कुछ कम कर के सूद अदा कर दिया . फिर भी पैसे कम पड़े तो बीवी का सतलड़ा हार और गोखड़ू का जोड़ा बेच दिया . कोई खानदानी जेवर तो थे नहीं कि बेचते हुए हाथ काँपते . दहेज में मिले थे, वो भी नए बनवा कर .

वैसे भी बदरीलाल के ससुरालवालों को क्या कमी थी गुजराँवाला के जानेमाने ठेकेदार थे . साल में एकबार बदरीलाल की बीवी अपने दो बेटे और एक बकसा लेकर मायके जाती और ताँगा भर कर असबाब लदवा कर लौटती . साथ में कोई भाई–भतीजा आता और फल–तरकारी की टोकरियाँ ताज़ी बनवा कर हाथ जोड़ते हुए बदरीलाल को दे जाता . फिर कई दिन तक बदरीलाल की बीवी घर भर को सजाती सँवारती . सात कोनों वाली हाथी दाँत से नक्काशी की हुई तिपाई, सिंगर की मशीन, मरफी का रेडिओ, फूलों के डिजाइन की फर्शी दरी, बिजली का जमीन पर खड़ा होता पंखा, यूँ ही तो नहीं सिमटते थे रखने–बचाने के लिए घर में बैठक के अलावा भी कई कोने थे . लेकिन मायके की दी सौगात आए–गए को दिखाई तो दे
 
दरअसल बदरीलाल की रायसाहिबी भी उसकी बीवी के मायके वालों की सौगात ही थी . तब उसकी शादी को करीब पंद्रह बरस गुजर गये थे . पहली जंग खत्म हुए अरसा हो गया था . बरतानिया हुकूमत के लिए बदरीलाल की रेडिओ मंडली का रवैया जंग के फौजी कारवाइयों से कहीं दूर और इंकलाबियों के हथकंडों के बहुत करीब आ पहुँचा था . रेडिओ की खबर चाहे जैसे भी हो, रेडियो मंडली की बातें अंग्रेजों की माँ–बहिन, बहू–बेटियों के साथ अज़ीबो गरीब रिश्ता कायम किए बिना खत्म न होती थी . ढक्की दरवाजा गली तो क्या, पूरे गुजरात तहसील में किसी ने चलती फिरती मेम नहीं देखी थी . लेकिन जब भी रेडिओ से किसी गार्डन पार्टी या हुकूमती इजलास की खबर आती, ढक्की के मर्दों की नजरें दूर–दूर तक मेमों की तलाश में निकल पड़ती .

सुना है नंगी टाँगों पर खुदरंग जुराबे पहन कर घूमती हैं .

हाथ मिला कर बात करती हैं

नहीं तो क्या गले मिलेंगी

उसका भी इंतजाम हो जाता है . मर्द औरतें एक दूसरे को बुक में लपेट कर नाचते जो हैं .

कहते हैं पान सुपारी कभी नहीं खातीं लेकिन बुल्लियाँ रंग लेती हैं .

लाहौर वालों ने देखी हैं . एक सर्राफे में गवर्नर साहिब की घरवाली जेवर लेने गई थी . पूरा एक हफ्ता बाद तक गली में से खुशबू आती रही .

सन १९३० की उस शाम को भी बदरीलाल की रेडिओ मंडली खबरें सुनती और खयाली पुलाव छौंकती बैठक में यहाँ वहाँ बिखरी हुई थी . कोई जमीन पर उकडू बैठा था, किसी ने गली की तरफ खुलते छज्जे की रेलिंग पर पीठ टिका रखी थी, कोई मूँज के मोढ़े पर कुहनी टिकाये फर्शी दरी पर पालथी मारे था . बैठक में करीने से सजे कीमख्वाब के गद्दों वाली कुर्सियाँ और सोफा खाली पड़ा था . खुद बदरीलाल रेडिओ के पास वाली बेंत की आराम कुर्सी में बैठा रेडिओ की आवाज ऊँची नीची कर रहा था . किरोशिये की मेजपोश से ढकी सातकोनी तिपाई पर रखा मरफी रेडिओ रात के आठ बजे वाली खबरें सुना रहा था .

बरतानवी हुकूमत ने अपनी हिन्दोस्तानी रियाया को दस नए रायबहादुरी के खिताबों से नवाज़िश करने का ऐलान कर दिया है . अब आप खिताब पाने वालों के नाम और उनके काबिले तारीफ कारनामों का ब्योरा सुनिए .

रायसाहिबी के नए खिताबियों के मालिक केदारनाथ का नाम सुनते ही बदरीलाल की चालीस इंच छाती चौड़ी होकर यकलख्त अड़तालीस हो गई . बेंत की कुर्सी की पीठ से टिकी उसकी गर्दन खुद–ब–खुद तन कर सीधी हो गई .

रेडिओ से ऐलान जारी रहा .

दरयागंज के इलाके का मुआईना करके दिल्ली के पुलिस कमिश्नर टामस रैड़िंग अपनी जीप में सवार होने ही वाले थे कि अचानक फैज बाजार मे घूमते हुए लोगों ने एक इंकलाबी जुलूस की शक्ल अख्त्रियार कर ली . चारों तरफ से पुलिस कमिश्नर की जीप पर पत्थर बरसने लगे . असिस्टैंट सुपरिटेन्डैन्ट मलिक केदारनाथ ने निहायत मुस्तैदी से पुलिस कमिश्नर के जख्मी सिर को अपने सीने से लगा कर उनका सारा वजूद अपने आड़े ले लिया और एक ही हाथ से आँसू गैस के गोले उछाल कर भीड़ को तितर बितर किया . घुड़सवार पुलिस के मौका–ए–वारदात पर पहुँचने तक कुछ इंकलाबी सड़क पर लेटे लेटे मुँदी आँखों से ईंट पत्थर और जलती हुई चित्थियाँ जीप पर फैंकते रहे .

मलिक केदारनाथ बदरीलाल की बीवी का छोटा भाई था . पिछली बार मायके से लौटने के बाद बदरीलाल की बीवी उसे लेकर काफी फिकरमंद थी . उसके मायके वालों को डर था कि कहीं उनके बारूतबा बेटे की नौकरी ही न छूट जाये . टामस रैड़िंग के जिस्म को उसने अपनी ओट में लेकर पत्थरों की मार से बचाया तो जरूर था . लेकिन आँसू गैस के कुछ गोले हाथ नीचा करके घुड़सवार पुलिस की तरफ भी फेंके थे ताकि इंकलाबियों को फैज बाजार की गलियों दुकानों में गुम हो जाने का थोड़ा सा वक्त मिल जाये .

बदरीलाल की रेडिओ मंडली को मलिक केदारनाथ की वतन–परस्ती का किस्सा तो किसी ने नहीं बताया उन्होंने खुद ही हस्ब–मामूल बहनोई की साले की रायसाहिबी में शामिल कर लिया .

अब दिल्ली जाकर केदारनाथ को साला रायसाहिब कहना हमें कहाँ नसीब होगा मगर किसी को रायसाहिब कह कर बुलाने से ही मुँह में मिश्री सी घुल जाती है .

भई कुछ भी कह लो . हमारे बदरीलाल के ठाठ–बाठ किसी से रायसाहिब से कम नहीं .

साडे वास्ते ते हुन तुसी रा–साब हो जी .

बदरीलाल कुछ दिनों तक तो अपने नाम के आगे राय–साहिब लगाने से हिचके . बस कभी कभार किसी पुराने अखबार के पन्ने पर रा॰स॰बी॰एल॰ लिख कर फाड़ते फेंकते रहे . लेकिन जब कोई गली वाला वैसे मुखातिब करता तो बेझिझक कबूल कर लेते . बातचीत लंबी हो जाती और उनकी आवाज में एक नरमी सी आ जाती . अचकन की उपर वाली जेब में उन्होंने एक चेन वाली घड़ी रख ली थी . शाम को घूमने निकलते तो हाथ में चाँदी की मूँठवाली छड़ी लेकर, घर का सरनाँवा भी बदल डाला . पहले मकान नम्बर चौदह, ढक्की दरवाजा गली हुआ करता था . बदला तो फोर्टीन, फोर्ट लेन ऑन ढक्की हो गया .

सन १९३० में बदरीलाल ने रायसहिबी के अंदाज अपनाने शुरू किये तो सारी गली में इकलौता मरफी रेडिओ उन्हीं की बैठक में था . दूसरी जंग शुरू होने तक कई घरों में रेडिओ बजने लगे थे . बदरीलाल को रायसाहिबी की लत लग गयी थी . खुद सलाम करते तो हाथ उठाकर भवों के नीचे ही रोक लेते . किसी का आदाब कुबूल करते तो गर्दन जरा सी झुकाकर बस जे.रे–लब मुस्करा देते . मौका माहौल देखकर रेडिओ से शाया होने वाली खबरों पर तस्करा करते . अदबी महफिलों में उठते बैठते . अपने आस पास ऐसा माहौल बना लिया था उन्होंने कि शौकीन लोग अक्सर उनकी बैठक में आना पसंद करते . और उन्हीं की गली से नहीं, आसपास के मुहल्लों से भी . शनिवार शाम की महफिल तो खास उन्हीं की बैठक में जमती . बीबी बदरुन्निसा की गजल सुनने के लिए . रेडिओ वाले घरों से भी बदरुन्निसा के मुरीद बदरीलाल की बैठकी मजलिस में शामिल होने आते .

दिसम्बर १९३९ की उस गुलाबी शाम को साढ़े आठ बजे से बदरीलाल की बैठक में गहमा गहमी थी . पिछले शनिवार को रेडिओ लाहौर वालों ने कहा था कि अगले हफ्ते बीवी बदरुन्निसा एक नये अंदाज में मिर्ज़ा गालिब का कलाम पेश करेंगी . नौ बजते बजते कई अटकले लगीं, और फिर एक जानी पहचानी आवाज रेडिओ से उभरते ही सुनने वाले बिल्कुल खामोश हो गए .

इबन–ए–मरियम हुआ करे कोई,

मेरे दुःख की दवा करे कोई .

गाना खत्म हो गया मगर खामोशी बनी रही . रेडिओ के पासवाली आरामकुर्सी पर बैठे बदरीलाल ने हर किता को आँखें मूँद कर सुना था, सिर हिला कर सराहा था . आँखें खोलीं तो पूरी मजलिस को सिर हिलाते देखा . हाथ बढ़ा कर उन्होंने हुक्के की नाल खींची और लंबी साँस लेकर गुड़गुड़ा दिया . चिलम की राख थोड़ी सी शोख होकर फिर दुबक गई . धुएँ का एक गुबार उठा और छितर कर यहाँ वहाँ बिखर गया . खामोशी फिर जहाँ की तहाँ .

तख्तपोश के सफेद मसनद से टिके हुए ठेकेदार निसार अहमद ने अपनी खिजाब से रंगी मूछों की सफेद जड़ों पर हल्की सी अँगुली फेरी, छोटा सा खंखार लिया और खामोशी तोड़ दी .

रश्क होता है असदुल्लाह खान गालिब के नसीब से, जिए तो एक नेकबख्त बीवी की वफा और एक कामिल गजलसरा की बेपनाह मोहब्बत पाई . मरे तो बीबी बदरुन्निसा नें जिला दिया .

सच मानिए तो यह इब्ने मरियम वाला किस्सा मेरी समझ में नहीं आया ठेकेदार जी . नुक्कड़ वाले मकान के नीचे की बेकरी वाली दुकान के मालिक मियाँ बख्तियार ने अपने पहलवानी कंधे उचका दिये .

परवरदिगार हमें गुस्ताखी की माफी दें मियाँ शायर का कहना है कि कोई मसीहा हो या पैगम्बर, हमें क्या जब तक कोई हमारे दुःख कम न करे तो हमारा कौन ठेकेदार निसार अहमद ने अपनी अदबी और मजहबी सूझबूझ का सिक्का उछाल दिया .

सर्राफ जमाली कामकाज के सिलसिले में हर किस्म के लोगों से मिलते थे . खरी बात कहने में माहिर थे .

मुकदी गल्ल ते ऐ हैगी ऐ बादशाओ कि रब्ब नाल गिला शिकवा कर के बंदा जाए ते कित्थे जाए साढ़ी शिकायत ते रेडिओ वालियाँ नाल ऐ . असी एत्थे आने आ ते बदरूनिस्सा दीया नसा खिच्च के नशा करन वालीयां गजला सुनने वास्ते . पीरां पैगम्बरा दीयां नसीहताँ सुननिया होंदिया ते होर किदरे जान्दे .

बैठक की रेडिओ मंडली सर्राफ जमाली से बिल्कुल मुत्तफक हो गई . फैसला हुआ कि कोई लाहौर जाकर रेडिओ वालों से मिले . हो सके तो मामले की जड़ तक पहुँचे . इबादत करने, मुजरा सुनने और कलाम कहने के मुकाम मुख्.तलिफ होते हैं . आवाजें. भी अलग अलग . बदरुन्निसा की आवाज में तो उन्हें इश्को–रूमान की गजलें ही सुनने को हैं जिनमें खुशबू हो, रंग हो, जायका हो . रेडिओ वाले न माने तो खुद बदरुन्निसा तक ही बात पहुँचे .

रेडिओ लाहौर वालो से मिलकर पसंजर गाड़ी में गुजरात लौटते हुए बदरीलाल नें फिर एक बार अपनी शेरवानी की ऊपरी जेब से वो परचा निकाला जिस पर उसने बदरुन्निसा का पता लिखा था .

दीनू ललारी

रंगरेजा बस्ती

गुजरात सरकारी कचहरी के पीछे

सरकारी कचहरी की इकमंजिला इमारत के पीछे गर्दो गुबार उड़ाता एक सपाट मैदान था . दूर दूर तक कोई बस्ती नजर नहीं आती थी . जब देखो, कुछ अधनंगे, सिर मुँडाए लड़के यहाँ वहाँ मटरगश्ती करते दिखाई देते थे .

कचहरी के पिछले बरामदे की चिक उठाकर बदरीलाल नें एक लड़के को इशारे से पास बुलाया .

मैदान के उस पार क्या है

गंदा नाला है .

और नाले के पार

बस्ती है .

तू बस्ती में रहता है

लड़के ने हाथ उठाकर बदरीलाल से रुके रहने को कहा और भाग गया . लौटा तो उसके साथ एक और लड़का था .

तू बस्ती में रहता है

नए लड़के ने ज़ोर ज़ोर से सिर हिला दिया

अब्दुल्ला रहता है बस्ती में . मैं तो कुम्हारी टीले का हूँ .

अब्दुल्ला काफी जानकार निकला .

दीनू ललारी को मरे तो बरसों हो गए जी .

तो बदरुन्निसा कुँवारी नहीं बेवा थी, बदरीलाल ने सोचा . रेडिओ मंडली की अटकलों में बेवा का तो कभी ज़िक्र ही नहीं हुआ था .

और दीनू ललारी की बीवी उसने अब्दुल्ला से पूछा .

वो भी मर गई जी, दोनों को उपर तल्ले हैजा हुआ था .

यतीम बदरुन्निसा के लिए बदरीलाल को कुछ हमदर्दी तो हुई लेकिन गंदा नाला पार करने की बात मन में आते ही मन उचट गया .
 
अब्दुल्ला बोलता गया .

दीनू लल्लारी की दोनों लड़कियाँ रहती हैं अपने मरे माँ–बाप के घर . कुम्हारी टीले पर उनके नानके हैं . वहाँ नहीं रहतीं, बस्ती में रहती हैं . कोई मरद नहीं है घर में, न कोई भाई न बड़ा . छोटी कुम्हारन है, बड़ी मरासन .

गजलसरा बदरुन्निसा को मरासन बनाकर अब्दुल्ला तो चला गया . लेकिन बदरीलाल ने फैसला किया कि अपनी रेडिओ मंडली का भरम तोड़ना कोई जरूरी नहीं . लगने दो अटकलें, होनें दो चुहल .

अगले शनिवार रेडिओ लाहौर से बीबी बदरुन्निसा की आवाज ने सुनने वालों से मोमिन खाँ मोमिन का कलाम कहने की इजाजत चाही . फिर जो गाया तो सुनने वाले झूम झूम गए . हाथ उठा–उठा कर दाद दी . ग़ालिब और मोमिन के चुनींदा शेर दुहराए . एक दूसरे को मुखातिब करके ठेकेदार निसार अहमद, बेकरी वाला बख्तियार और सर्राफ जमाली एक ही शेर दुहरा कर मोमिन को सलाम करते रहे .

रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह,

अटका कहीं जो आप का भी दिल मेरी तरह .

हुक्का गुड़गुड़ाते बदरीलाल से रहा नहीं गया .

चाहो तो गाने वाली को खुद मिल कर दाद दे सकते हो . इसी शहर में रहती है .

बस फिर क्या था कतार सी लग गई . पहले कौन जाए जब बदरीलाल ने पता बताया तो सब चुप हो गए .

ठेकेदार निसार अहमद ने छेड़खानी की .

क्या बात है यारो सोहनी कुम्हारन को मिलने के लिए एक शहजादा गड़रिया हो गया . शायरे आलम मिर्ज़ा ग़ालिब को गजलसरा डोमनी के घर जाने में कोई हिचक न हुई . आपको रंगरेजा बस्ती पहुँचने के लिए रास्ते में गंदा नाला पार करना पड़ा तो क्या हुआ

आप ही क्यों नहीं हो आते, ठेकेदार साहिब बदरीलाल नें हुक्के की नाल निसार अहमद की तरफ बढ़ा कर कहा .

ठेकेदार निसार अहमद ने इत्मीनान से एक लंबा सा कश गुड़गड़ा दिया . शरारती नजरों से धुएँ के बादल को सिमटते बिखरते देखते रहे . फिर हल्की सी आँख मारकर बदरीलाल के हाथ में हुक्के की नाल लौटाते हुए आह भरी .

रायसाहिब, रंगरेजा बस्ती सरकारी कचहरी के पीछे पड़ती है . पी.डब्ल्यू.डी. के दफ्तर के पिछवाड़े लगती तो बंदा जरूर बदरुन्निसा को सलाम करने हाज़िर हो जाता .

अच्छी बात है . बदरीलाल ने घर के अन्दर की तरफ खुलते हुए बैठक के दरवाजे की तरफ एक नजर डाली . वहाँ चिक के पीछे कोई नहीं था .

अपनी अपनी फरमाइश बता दें . मैं बीबी बदरुन्निसा तक पहुँचा दूँगा .

ठेकेदार निसार अहमद कुछ ज़्यादा ही मूड में थे . हुक्के की नाल माँगने के लिए बदरीलाल की तरफ हाथ बढ़ाते हुए उन्होंने फिर आँख मारी, फलहाल तो आप अपनी ही फरमाइश लेकर जाइये रायसाहिब . अगर उन्होंने रूबरू कलाम कह दिया तो फिर हम भी पहुँच जायेंगे किसी दिन .

रंगरेजा बस्ती में दीनू ललारी के घर की साँकल खटका कर बदरीलाल एक तरफ खड़ा हो गया . एक चौदह पंद्रह बरस की गोल मटोल लड़की नें दरवाजा खोला और फ़ौरन उड़का दिया . फिर उड़के दरवाज़े की ओट से एक गंदमी चेहरा बाहिर निकला और बड़ी–बड़ी घनी पलकों वाली एक जोड़ी बेहद स्याह आँखें सवाल बन कर बदरीलाल के चेहरे पर टिक गईं . लड़की बोली कुछ नहीं .

अगर यही लड़की बदरुन्निसा है तो शायद हरफ उठाये है और अपनी आवाज सुनने और चेहरा देखने का मौका एक ही वक्त किसी अजनबी को नहीं देगी . मगर इतनी कम उम्र में ऐसी आवाज

क्या बीबी बदरुन्निसा यहीं रहती हैं बदरीलाल ने निहायत नरम आवाज में पूछा .

दरवाजा फिर बंद हो गया .

गंदा नाला पार करने से रंगरेजा बस्ती पहुँचने तक बदरीलाल के पीछे–आगे छोटे बड़े लड़कों का एक अच्छा खासा जुलूस इकठ्ठा हो गया था . मुँह बाए, सर खुजाते, ढीले झग्गों की आस्तीनों को खींचते अब वो सब के सब दीनू ललारी के घर के सामने मुस्तैदी से तैनात हो गए थे . ज्यों ही दरवाजा फिर खुला, भागते दौड़ते नजर आए .

गंदमी चेहरे वाली लड़की अपनी धारीदार चुन्नटों वाली चुन्नी का पल्ला सँभालती दरवाजा उड़का कर दहलीज पर खड़ी हो गई .

आपा पूछती है यहाँ क्यों आए हो

मैंने लाहौर जाकर रेडिओ वालों से यह पता हासिल किया है ताकि बीबी बदरुन्निसा को खुद बता सकूँ कि इसी शहर में कितने लोग उनकी गजलें शौक से सुनते हैं . अगर वह इजाजत देंगी तो फिर किसी दिन आ जाऊँगा .

उढ़का दरवाजा किसी ने अन्दर से खोल दिया . नीचे दरवाज़े की ऊँची दहलीज पार करने में बदरीलाल को अपना साफ़ा बँधा सर काफ़ी झुका कर जाना पड़ा . एक बार अंदर गया तो काफ़ी देर बाद बाहर लौटा . जब लौटा तो बार–बार वापिस आने के लिए . कभी कचहरी के काम की जल्दी निबटा कर दिन ही दिन गया . कभी शाम की सैर को और लम्बा करके दिन ढलने पर गया . पहले कुछ महीने आगे पीछे नजर डालता, फिर एकदम बेबाक . बिना नागा हर इतवार, सिवाय उस इतवार के जब एकादशी हो .

एकादशी वाले दिन बदरीलाल की हिंदू बीवी तड़के ही नहा धोकर पति के हाथों से कुटी मूँग की दाल, चावल, घी और ताँबे के सिक्के मँसवा कर मिसरानी को दे देती . कुल पर आने वाली बलाएँ टालने के लिए हर महीने पहले चाँद की रात घर के मालिक के हाथों बिना अन्नजल ग्रहण किए दान कराने की रीत थी . बदरीलाल तो दान की थाली मँसवा कर खा लेता . लेकिन उसकी बीवी चाँद निकलने तक निर्जला व्रत रखती . चौबारे जाकर चाँद को अर्ध्य देकर उतरती तो रसोई में आकर बदरीलाल दो पत्तलों के दोने उसके हाथ में थमा देता . एक में ताजा मिठाई, दूसरे में ताज़े फूलों का गजरा . मिठाई मुँह में डालकर वह व्रत तोड़ती . गजरा कभी अपनी कलाई, कभी चोटी में लपेट लेती, और कभी किसी घड़े या सुराही की गर्दन को पहना देती .

मोगरे के फूलों का गूँथा हुआ गजरा वह चाहे कहीं भी लपेटे, उसकी महक कई दिनों तक बदरीलाल की बीवी के बदन से उठती रहती . एकादशी के कम से कम हफ्ता बाद तक वह इतराई सी फिरती . पंजों के भार खड़ी होकर कभी अपनी उचकी एड़ियों पर लगी मेहँदी को देखती . इधर उधर नजर डालकर कभी गर्दन के नीचे सिर झुकाती और अपनी कमीज के उभारों को सहारा देती . अधपके बालों की किसी लट को बल देकर माथे पर गिरा देती और किसी को सँवार कर कान के पीछे सरका देती . वक्त बेवक्त कुछ गुनगुनाती . फल तरकारी की टोकरी बनवा कर नुक्कड़ वाले मकान में बदरीलाल की बेवा बहन के पास भिजवाती . फिर थोड़ी देर बाद खुद बुरका पहन कर हम उमर ननद का दुःख सुख पूछने पहुँच जाती .

बदरीलाल के ब्याह से हफ्ता पहले उसके घरवालों ने अपनी इकलौती बेटी की कुढमाई कर दी थी . बाद में करते तो गली मोहल्ला यही कहता कि दान–दहेज और शगुन में जो बेटे को मिला, वही बेटी को दे दिया . पाँच छः महीने बाद बेटी के ब्याह में वही सब काम तो आना ही था . लेकिन पहले से ही क्यों शरीकों को अँगुली उठाने का मौका देना रिश्तेदारों से भरा शादी का घर था . औरतें भाई के लिए घोड़ियाँ और बहिन के लिए सुहाग गाती फिरती थीं . सत्रह बरस की गोरी चिट्टी, छरहरी लाजो के न पाँव थमते थे न गला रूकता था . रेशम की मुलायम कमीज उसके ठसे बदन से लिपट कर तन तन जाती . हवाई ननून की बाँकड़ी लगी चुन्नी उसके ठुमकते कंधों से सरक–सरक पड़ती . किंगरी लगे पौंचों वाली घेरेदार सलवार की उठती गिरती सलवटे थिरक–थिरक लहरातीं .

ताइयों, चाचियों, फूफियों, मासियों को हाथ पकड़–पकड़ नचाती लाजो तिमंज़िले घर के दोनों तल्लों पर कूद फाँद करती और चौबारी छत पर खड़ी होकर पड़ोसनों से गप्प मारती. . एक ही साँस में घर के बेटे और जमाई को नाप तोल देती और फिर अपने पे नाज करती .

किक्कली कलीर दी, पग्ग मेरे वीर दी

दुपट्टा मेरे भाई दा, ते फिट्टे मुँह जवाई दा

गई साँ मैं गंगा, चढ़ा ल्याई वंगा

असमानी मेरा घघरा .

मैं ऐस किल्ली टंगां

नी मैं ओस किल्ली टंगां .

जब अपनी शादी के दिन पास आए तो रोज नया जोड़ा पहन कर घंटों आइना देखती और अपनी आँखों का काजल अपने ही कान के पीछे टिप्पी बनाकर लगाती . घर की औरतों ने बदरीलाल की नई ब्याहता को हँस कर समझाया .

अपनी चुलबुली ज़ुबान नूँ सँभाल के रख्खीं वौटिये नईं ते फेरेयाँ बैठी नच्चन वास्ते उठ्ठ खलोवेगी .

फेरों पर तो लाजो दुबकी सी गुड़िया बनी रही . ससुराल जाकर जब अपने गभरू जवान हवालदार लाड़े के साथ लौटी तो हँसते–हँसते दुहरी हो रही थी . कोने में ले जाकर घंटों बदरीलाल की बीवी से खुसरपुसर करती रही .

मैं की कहाँ भरजाई जिदे लड़ लग्गियाँ औ ते बत्ती बुझए बिना नेड़े नई आंदा . पर दो दो मुश्टंडे दयोर सारा दिन वेढ़े विच्च डंड बैठका कडदे रहंदे ने .

लाजो के शांत तबीयत दूल्हा को न सिगरेट शराब का ऐब था, न जुए की लत, न शाम को अड्डेबाज़ी की आदत . नौकरी से निबट कर सीधा घर आता, खाना खाता और फिर चौबारे जा अकेले कमरे की बत्ती बुझाकर बदन कसमसाता . जब तक लाजो रसोई सँभाल कर ऊपर पहुँचती, उसके मरद की हर नस ऐसी तनी मिलती जैसे किसी तेज रफ्तार घोड़ी को काबू में लाने वाली चाबुक . महीने भर में ही छरहरी लाजो गदरा गई . चेहरा ऐसा चमका जैसे पालिशी हो, भूरी नीली आँखों में खुमारी का काजल जैसे कई रातों की अनींद्री हों . मायके लौटी तो ठुमकती कम, अलसाती ज्यादा .

बदरीलाल की बीवी ने छेड़ा तो भरपूर अँगड़ाई लेकर बोली,

अद्दी रात मार पई,

कुट्ट सुट्टियाँ मलूक जहियाँ,

नाले सोहना मोती चुगदा

ते नाले पुच्छदा,

कित्थे, कित्थे लग्गियाँ .

पाँच बरसों में तीन बार लाजो मायके जच्चगी के लिए आई . भरा पूरा बदन लिए आती और गोल गोल मटोल बच्चा गोद में लेकर लौट जाती . गदराऐ बदन के उतार चढ़ाव फिर वैसे के वैसे .

क्यों नी लाजो औरतें तो एक बच्चे के बाद ही चौड़ी हो जाती है . तू क्या सारी उमर ऐसी ही छमकछल्लो बनी रहेगी .

आहो भरजाई, कमर दा कमरा बन गया तो हवालदार जी को उपर नीचे चढ़ने उतरने में टंटा होगा . मैंने तो अपनी सास को कपड़े धोने से भी छुट्टी दे दी है . आप बैठ के रगड़ा सोटा मारती हूँ और खड़ी होकर एक एक कपड़ा बालटी से निचोड़ कर निकालती हूँ . कपड़े साफ, सास खुश और मेरी कमर वैसी की वैसी .
 
हवलदारनी से थानेदारनी बनते ही लाजो की जुबान भी बदलने लगी थी . पुलिस महकमे के कारनामों के किस्से सुनाती . फरमाबरदारी और हरामजदगी जैसे अलफ़ाज इस्तेमाल करती . घर से बाहर निकलते थानेदार साहेब की पगड़ी और फीती की नजर उतारती . रात को दूध का गिलास देती तो बादाम डाल कर .

एक रात थानेदार ने दूध पीने से इंकार कर दिया . गले में दर्द था, सुबह तक हलक के उपर गिलटी फूल आई . ऐसी चारपाई पकड़ी कि दस दिन में बिना एक भी बात बोले सदा के लिए सो गया . उसकी स्यापा करती माँ ने अपनी छाती हाथों से पीटी और लाजो का माथा हथौड़े से तोड़ा .

नचोड़ लया नी तूँ मेरे शेर जये पुत्तर नूँ . खसमखानिऐ हर वेले ओनू चमुट्टी रहंदी सैं . अपनी उमर खा के जांदा ते अपने पुत्तरा दी कमाई वी खांदा ते सानू वी अपनी पेंशन ख्वांदा . दफ़ा हो जा, साड़िया नजरा तो . तैनू वेख के तेरे हट्टे कट्टे जिसम विच मैनू अपने पुत्तर दा निच्चुड़या खून दिसदा ऐ .

तीनों बेटों को लेकर लाजो मायके लौटी तो अपना जिस्म हर वक्त कस कर लपेटे रखती . बार बार नहाती जैसे कोई अनछूटा दाग धोती हो . छुआछूत करती . गदरया बदन पहला ढलका, फिर सलवटों से भरकर रूखा बबूल हो गया . न कोई उसे छुए, न करीब आये .

••

गंदे नाले के पार रंगरेजा बस्ती में बदरीलाल के बार–बार जाने की बात उड़ते–उड़ते सबसे पहले लाजो ने सुनी . बेकरी वाले बख्तियार की घरवाली से .

रब्ब झूठ न बुलावाये बाजी . जून की तपती दुपहरी में खस की पक्खी की हवा अपने चेहरे पर झुलाते हुए सिर हिला–हिला कर कहा उसने, सुना है बात हँसी मखौल से शुरू हो कर बड़ी दूर चली गई है . अब तो दो साल ऊपर ही होने को आए . बिना नागा हर इतवार आपका भाई खुले आम गंदा नाला पार करके पहुँच जाता है वहाँ .

लाजो को लगा कि उसका भाई कोई इंसान नहीं बल्कि किसी बड़े से पेड़ की कटी हुई टहनी है जिसे बख्तियार की घरवाली ढक्की दरवाजा गली से घसीट कर गंदे नाले के पार फेंक आई है . वह हड़बड़ा कर उठी और मुड़े तुड़े कपड़ों के ऊपर चादर से मुँह सिर लपेट कर शिखर दुपहरी में गली पकड़ ली . नुक्कड़ वाले मकान से बदरीलाल के घर हाँफती हुई पहुँची और सीधे बैठक मे जा घुसी . उसे देखते ही बैठक में उकडू बैठे दो तीन मिलनेवाले उठ खड़े हुए . लाजो उनके ज़ीना उतरने तक चुप रही .

फिर उसने अपनी चादर उतारकर तख्तपोश पर फेंकी और आरामकुर्सी से टिके बदरीलाल के सामने खड़ी होकर खुरदरी आवाज में पूछा .

ये गंदे नाले पार वाली मरासन तेरी क्या लगती है भापा

बदरीलाल ने हुक्के की नाल अपने मुँह की तरफ खींची तो लाजो ने हुक्का अपने पैर से दूर सरका दिया . एक बार बकना शुरू हो गई तो बस नारियल की सूखी मूँज से जैसे गरम राख को जूठे पतीलों के काले तलों पर रगड़ती ही गई . बदरीलाल ने अपना चेहरा एक दिन पुराने अखबार की सुर्खियों में छुपा लिया . सन १९४२ के हिन्दोस्तान छोड़ो इन्कलाब का सनसनीखेज ब्योरा और हिटलर जैसों से बरतानिया सरकार की टक्कर लेने का हौसला अखबार के पहले ही सफ़े पर नुमाया था . अखबार कुछ कह रहा था, लाजो कुछ पढ़ रही थी . बोलते बोलते जब वह हाँफने लगी तो कोई भी लफ्ज़ उसका पूरा नहीं हुआ . बदरीलाल ने अखबार एक तरफ रख दिया . गीले कपड़े से लिपटी सुराही के पास ही रखे ताँबे के गिलास में पानी उँड़ेला और बहिन को पकड़ा दिया .

गटागट गिलास खाली कर लाजो बदरीलाल की आरामकुरसी से सिर टिका कर बैठ गई . भाई के बाजू पर हाथ रख कर जरा नरम आवाज में बोली, गल्ली–मोहल्ला, पुरखे–शरीक तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, पर क्या तुझे भरजाई का भी कोई लिहाज नहीं कुछ तो बोल भापा

बदरीलाल नें अपना एक हाथ लाजो के सिर पर रखकर बस एक बार उसके रूखे बालों को सहलाया और लंबी साँस लेकर बोला, उसी का तो लिहाज है . वरना मैं बदरुन्निसा को मिलने उसके घर नहीं जाता . यहाँ इसी घर में ला कर रखता .

लाजो तमक कर उठी और दोनो हाथों से अपना माथा पीट लिया . बीच बैठक में खड़ी होकर ज़ोर ज़ोर से स्यापा करने लगी तू सहक सहक के मरेगा भापा . ऐसी मौत मरेगा कि कोई पानी देने वाला न होगा . अपने हिस्से का तेरा स्यापा मैं आज ही कर लेती हूँ .

बदरीलाल बैठक से निकल कर नीचे जाने वाली सीढ़ियों से उतर गया . उसके जाने के बाद भी लाजो अपने आप को पीटती ही रही . जब बदरीलाल की बीवी ने आकर उसका हाथ पकड़ा तो उसे अपने से लिपटा कर फफक उठी .

मैं तो उजड़ी ही थी भरजाई क्योंकि थानेदार को उपर से बुलावा आ गया . पर तू मेरी बदनसीब शहजादी, तू तो आदमी के रहते उजड़ गई .

बदरीलाल की बीवी गले से लिपटी ननद को बाहों के घेरे में लिए खामोशी से देर तक सुबकती रही . पीठ पर हाथ रख अपने से अलग किया तो तख्तपोश तक बाँह पकड़ कर ले गई . पास बैठा कर उसी की मैली कुचैली चुन्नी से पहले उसके आँसू पोंछे, फिर अपने .

तूने सुना न लाजो, जो तेरे भापे ने कहा . जब तक मैं इस घर में हूँ, उसको मेरा लिहाज है . पुरखों के इस घर को अगर दूसरी से बचाना है तो मुझे यहाँ रहना ही पड़ेगा . इस घर की राक्खी करूँगी . यहाँ से निकलूँगी ही नहीं . तेरे घर भी नहीं आऊँगी, तू ही आती जाती रहना .

तू मुझ रब्ब की मारी का आसरा है भरजाई . पर मैं करमसड़ी तुझे क्या हौसला दूँगी . सर के बल चल कर आऊँगी . पर तू तो फिर भी इकल्ली की इकल्ली . तेरे आँखों के सामने घूमे फिरेगा भापा और तू उसके पास न फटकेगी . रब्ब की दी बदाँ सहले, पर अपनी मर्ज़ी की मार तुझे बिल्कुल इकल्ला कर देगी .

तू ही तो कहती है न लाजो, बेटों की माँएँ कभी अकेली नहीं होतीं .

बेटों को बाप की करतूत का पता है क्या

बदरीलाल की बीवी ने लंबी उसाँस ली .

गोपाल तो मस्त मौला है . हन्ने बन्ने दोनों रख लेता है . इकबाल का कुछ पता नहीं . कब क्या कर बैठे

साल भर पहले बी॰ ए॰ पास करके जब इकबाल बिजली पानी के महकमे में सरकारी मुलाजम हो गया तो बदरीलाल नें सारी गली में खालिस घी के केसरी लड्डू बाँटे थे . रात को जब कभी बाप बेटे इकठ्ठे रसोई में खाने आते तो अपनी थाली में ताजा फुलाया फुलका रखती हुई बीवी का हाथ रोक कर बदरीलाल कहता,

पहले इकबाल को दे भलीमानस . सारा दिन काम करता है . गुपाल की तरह चटखोरा नहीं कि बाहर खा पीकर घर आ जाए .

कई महीनों से इकबाल बाप के सामने पड़ने से कतरा रहा था . अगर कमी बाप–बेटा इकठ्ठे रसोई में खाने बैठ भी जाते तो दो फुलके खाकर ही इकबाल पीढ़ी सरका कर उठ खड़ा होता .

एक दिन बिना कुछ कहे सुने बिस्तर बोरिया बाँधते हुए माँ से बोला,

भाबो मेरा तबादला जेहलम हो गया है . परसों चला जाऊँगा .

अपने भाईया जी से कह कर तबादला रूकवा ले पुत्तर . मेरी आँखों के सामने रह . बदरीलाल की बीवी ने कहा .

भाइये का नाम न ले भाबो . तू भी चल मेरे साथ . परसों नहीं चलती तो एक हफ्ता बाद आकर ले जाऊँगा . रहनें का इंतजाम करते ही आऊँगा . तू तैयार रहना .

बदरीलाल की बीवी ने बेटे के कपड़े सँभालने में हाथ बँटाया और बोली,

जरूर आऊँगी पुत्तर . जब तेरा ब्याह हो जाएगा . फिर तू कमाने जाना और हम सास–बहू रज्ज रज्ज के तेरी कमाई की बरकतें देखेंगी .

इस घर में कोई भलामानस तो अब अपनी बेटी देने से रहा . इकबाल ने थूँ कह कर कहा, पर तेरे लिहाज से कोई राज़ी होता हो तो जल्दी ही बहू ले आ .

जरूर ले आऊँगी . पर तू कब आएगा परसों का गया क्या अपनी लाड़ी लेने ही आएगा

बड़ी जल्दी आऊँगा भाबो, आता रहूँगा लेकिन इस घर में नहीं . मुझे इस घर में अब भाइया के कपड़ों से गंदे नाले की मुश्क आती है .

बदरीलाल ने जब पहली बार गंदा नाला पार किया तो उसे नाक पर रूमाल रखना पड़ा था . नाले के उस पार भी एक सपाट मैदान था जिसे हाजतमंद बेरोक टोक खुले आम इस्तेमाल करते थे . कुछ ही कदम चल कर बदरीलाल शशोपंज मे आ गया . अपने कदमों पर नजर रखने के लिए गरदन झुकाकर चलता तो खाया पीया मुँह को आता . बिना नीचे देखे कदम उठाता तो किसी सूखी या लिजलिजी ढेरी पर पाँव पड़ने का अंदेशा . ठिठक गया वो . आगे पीछे दोनो तरफ नजर डाली . मैदान के अगले छोर तक पहुँचने का रास्ता कम और लौटने का ज्यादा लगा . नाक मुँह ढक कर वह आगे बढ़ा . मैदान पार किया तो एक पगडंडी के मुहाने पर खड़ा था .

पगडंडी के एक तरफ दूर दूर तक काली सलेटी, गेरूआ, गाचनी माटी के बरतन खिलौने धूप सेक रहे थे . जमीन पर मुँह औंधाए छोटे बड़े मटके . गर्दन ऊँची उठाये एकमुठी, दोमुठी नक्काशी सुराहियाँ . मैदान की धूल से जरा सा सिर निकाल कर झाँकते हुए चपटे कसोटे . आजू बाजू तैनात लंबे चौड़े गमले . चौमुखे दीये और खील फुलियो की हट्टियाँ . हौदे वाले हाथी . सवार समेत घोड़े . और इस भरपूर बेजान सी दुनिया के उपर उमस भरी दुपहरी में भूले भटके हवा के झोंके को तरसती गुँधी गुँधाई माटी की महक .

कहीं से जरा भी आवारा बयार की लय फूँक उठती तो चिलमों और मटकी की महकती साँसें पगड़ंडी के दूसरे किनारे ठुमक कर पहुँच जातीं . वहाँ लंबे बाँसों से तान कर बँधी हुई रस्सियों में घिरा रंगों का डेरा था . कड़क कलफ और अकडू अबरक से तने हुए ऊदे, नीले, नसवारी, केसरी और गुलाबी साफ़े थे . फरोज़ी, बदली, फलसई, अंगूरी, जहरमोरे और चंपई दुपट्टे हल्की सी माँड ओढ़े, तने हुए साफ़ों से अपनी दूरी बनाए थे . साफ़ों और दुपट्टों की निगरानी में चुन्नटों से सिमटी सतरंगी लहरियों वाली चुन्नियाँ थीं .

एक ही पगडंड़ी के इस तरफ महक का गुबार और उस तरफ रंगों की शोखी .

रंगरेजा बस्ती पगडंडी का आखरी पड़ाव थी .

उसके बाद कुम्हारी टीले तक जाने के लिए कोई एक रास्ता नहीं था . जहाँ कदम मुड़े वहीं रहगुजर निकल आती . लिपेपुते बेतरतीब बिखरे घरों के जमघट में न कोई आगा था न पीछा . किसी के आगे तंदूर लगा सहन तो किसी का आगा मवेशियों का तबेला . किसी के बाज़ू में चारा काटने की रहट तो किसी के साथ जुड़ी दाने भुनाने की भट्टी . कुम्हारी टीले वाले पानी लेने रंगरेजा बस्ती के कुएँ पर आते . बस्ती वालों को अपने भाँडे–टींडे कलई करवाने टीले पर जाना होता . इतनी शादियाँ हुई थीं बस्ती टीले में कि कोई भी किसी की कुड़मों का पिंड कह देता .

पगडंड़ी पार कर के रंगरेजा बस्ती में जाते बदरीलाल के कदम रूक गए . एक खटका सा उठा . न जाने कौन छींटा कसी कर दे कहाँ से आकर कोई कीचड़ उछाल दे बचे खुचे रंगों के घोल की कोई कमी तो थी बस्तीवालों को .

गुंधी कीचड़ में सनी उँगली छिटक देने में क्या वक्त लग सकता था टीले वालों को

लेकिन बस्ती टीले वालों की अपनी ही तहज़ीब थी . वह कीचड़ रौंधते थे तो ओसारे के चाक पर चढ़ा कर सँवारने के लिए . माटी का दोष तब न जब ओसारे से निकले बरतन खिलौने में तरेड़ मिले वहा रंग घोले जाते थे अलग थलग रख कर पक्के करने के लिए . रंगों में खोट तब जब ललारी के हाथ से यूँ ही छिटक कर एक बूँद किसी दूसरे रंग के कपड़े पर जा गिरे झक्ख सफ़ेदी पर दाग लगा दे .

कुम्हारन माँ और रंगरेजा बाप की बेटी थी बदरुन्निसा . ओसारे में चाक पर चढ़ी माटी को उसने भी रौंधा था . माँड़ पकाते कढ़ाहों के नीचे सरकंडों की आग ऊँची करने के लिए धुएँ में उसने भी फूँकें मारी थीं . लेकिन उसका सा रूँधा और भर्राया गला और किसी का न हुआ . मुलठ्ठी और शहद की घुट्टी चाटी . बनफशे का काढ़ा पीया . गले में तरावट आई . लेकिन आवाज का धुँधलका न छूटा . बोल निकले तो गाढ़े . बातें बनी तो साज और सुर साधे तो तरन्नुम . पके मटकों पर मेहँदी लगे हाथों से थाप देकर गाती बिलकीस बस्ती टीले के हर मौके का बेज़ोड़ गहना बन गई .
 
टीले वालों के एक ब्याह में लाहौर से आए बदरू मामा बिलकीस को दो दिन के लिए अपने साथ ले गए . लौटे तो बदरुन्निसा को साथ लेकर . रेडिओ वालों ने बदरू मामा के नाम से जुड़ता नया नाम दे दिया बिलकीस को . साथ ही हर शनिवार उस की गायी एक गजल रेडिओ से सुनाने की दावत . गजलों की पसंद रेडिओ वालों की, आवाज बदरुन्निसा की . वह महीने में एक या दो बार लाहौर जाकर गजलें रिकार्ड करवा आती . बुरका उसका . आने जाने का रिक्शा और पसंजर गाड़ी का किराया, खर्चे पानी का बंदोबस्त, सब रेडिओ वालों का . बस आवाज बदरुन्निसा की .

••

आपको मेरी आवाज यहाँ खींच लाई थी न मैं गाना बंद कर दूँ तो बदरुन्निसा ने पूछा .

अपने होठों से बदरुन्निसा के कुरते के बटन खोलता बदरीलाल कुछ नहीं बोला . उस लमहा सारी काईनात में उसके अहसास का एक ही मरकज था . वहाँ पहुँचने से पहले अगर वह साँस भी खींच कर ले लेता तो पूरी काईनात बिखर जाती . बस उसकी रंगों का पुरज़ोर उफान हर बाज़ू में आठ आठ हाथ बनकर बदरुन्निसा के गठीले बदन का हर उतार चढ़ाव सहलाता रहा, कचोटता रहा .

यहाँ भी, बदरुन्निसा ने सिमट कर कहा .

वहाँ भी, उसने बिखर कर खैरात माँगी .

हाय अल्लाह, मैं मरी . मैं गई . वह सिहर सिहर उठी .

रूक जाइए न, उसने बदरीलाल की ढ़ीली पड़ती गिरफ्त को अपनी बाहों के घेरे में कसना चाहा .

बस अब नहीं, कपड़े गीले हो जाते हैं .

घर में नहीं होते क्या

वहाँ बदलने का इंतजाम है .

यहाँ भी हो सकता है

यह मेरा घर नहीं है .

बदरुन्निसा नें उठ कर कोठरी के अंदर से लगी साँकल खोल दी . बदरीलाल को तख्तपोश पर बैठने के लिए गाव तकिया दिया . और मुंज के कानो का एक मोढ़ा खींच कर उससे कुछ दूर जा बैठी .

आपकी घरवाली का नाम क्या है

चाँद रानी .

बहुत खूबसूरत है

हाँ .

आप से क्या क्या बातें करती है

भाजी तरकारी की . नाते–रिश्तेदारों की .

और आप

मैं सुन लेता हूँ . बदरीलाल ने अब जूते पहनने शुरू कर दिये थे .

मैं आप से बात करूँ

उठते उठते बदरीलाल बैठ गया . सिर से हुंकारा कर भर कर बोला,

करो .

आपको पता है कि कचनार के फूल की कली उबाल कर डालने से घुले हुए रंग गाढ़े हो जाते हैं . लेकिन कचनार की डंडी की एक बूँद भी रंगे कपड़ों पर पड़ जाए तो दाग लग जाता है, कभी नहीं छूटता . कनेर के फूलों से . . .

बदरीलाल अब सहन के दरवाज़े की ओर मुँह करके खड़ा था . बदरुन्निसा नें बढ़ कर बाहर के दरवाज़े की साँकल खोल दी . दहलीज के पार खड़ी होकर अपनी किंगरी वाली फरोज़ी चुन्नी का पल्ला मरोड़ती हुई बोली,

अल्लाह मियाँ अगर हफ्ते में दो इतवार बना देता तो .



हर इतवार बिना नागा आनेवाला बदरीलाल उपर तल्ले दो इतवार नहीं आया . तीसरे इतवार तो पहले चाँद की रात थी, उसे आना भी नहीं था . लेकिन तड़के ही दीनू ललारी के बाहर वाले दरवाजे. की साँकल ऐसी बजी जैसे खटकाने वाला बहुत ही जल्दी में हों . बदरुन्निसा ने दौड़ कर दरवाजा खोला . ढीला ढीला कुरता और मटमैली तहमद पहने एक लंबा चौड़ा पहलवान सा काला धुत्त आदमी चौखट से लगा खड़ा था . बदरुन्निसा पर नजर पड़ते ही जहर आलूदा आवाज में बोला,

बदरीलाल हर इतवार तेरे पास ही आता है

बदरुन्निसा को लगा कि अगर उसने सिर भी हिला दिया तो उसकी खैर नहीं . पता नहीं आने वाला किस इरादे से आया हो . उसने हाथ बढ़ाकर दरवाजा बंद करना चाहा . पहलवानिया आदमी ने धूल सनी गुरगाबी में से फूल कर उठता हुआ अपना एक गठीला पैर दहलीज पर टिका दिया,

जाती कहाँ है बेहया तू ही है न वो मरासन जो रेडिओ पर गाती है

मैं बदरुन्निसा हूँ . वह सहम कर बोली .

बेकरी वाले बख्तियार को अपनी आँखों पर यकीन न हुआ . रेडिओ मंडली में लगी एक भी अटकल उस औरत पे पूरी नहीं उतरती थी जो उसके सामने थी . मंझला कद, दुहरा बदन, कढ़ी हुई कम दूध वाली चाय जैसा रंग . जुड़ी हुई भवों वाला माथा . उमर कोई पचीस के उपर . और गर्दन ऐसी लंबी तनी जैसे कोई मगरूर परीजादी हो .

ढ़क्की दरवाजा गली की बाकी औरतों की तरह बदरीलाल की बीवी भी बाहर निकलते वक्त बुरका पहनती थी, बैठक से घर की तरफ खुलने वाले दरवाज़े की चिक के पीछे कभी कभार उसकी लंबी परछाई में छरहरी काठी ही बेकरी वाले बख्तियार ने देखी थी .

हाथ लगाए मैली होती है जी . बख्तियार की घरवाली ने बताया था, माँ बाप ने सोच कर ही नाम चाँदरानी रखा है . दो जवान बेटों की माँ हो गई पर मजाल है कि जिस्म की मलाई उतरी हो . हाथ पैर कबूतर के परों जैसे कूले है . जब कभी जाओ, हँस कर मिलती है .

यहाँ क्यों आए हो बदरुन्निसा बड़ी बेरूखी से पूछ रही थी . उसकी जुड़ी भवों के उपर की शिकन और भी गहरी हो आई थी .

तुझे यह बताने कि तेरी बद्दुआओं से बदरीलाल की नेक बख्त बीवी के पेट में रसौली फूटी है . घरवाले उसे पिंडी के बड़े अस्पताल ले गए हैं . तेरा यार जाती बार मुझे कह गया था कि तुझे बता दूँ .



चिता में लगाई आग को सन्न चेहरे से देखता बदरीलाल सकते में आ गया . बदरीलाल की बीवी के लाल जोड़े से सजे जिस्म के फूले हुए पेट से पानी की एक तेज धार फूटी और जलती हुई लपटों से ऊँची उठ गई . देखने वालों के हाथ खुद–ब–खु.द तौबा के लिए उठे और रहम की दुआ माँगने लगे .

गम का गोला अंदर ही अंदर दबाये जीती थी . आज सब गमों से छूट गई .

अधमरी को मारने ले गया था अस्पताल में . उन्होंने चीरा देकर पेट खोला और जालिम कैंसर देख कर वहीं दुबारा सी दिया .

कैंसर से जालिम तो यह खुद निकला जी . घरवाली सहकती रही और यह मौजें करता रहा .

आँख की शरम होगी इसे तो अब उस मरासन के पास भी न फटकेगा .

कौन जाने उसी को खुदा का ख़ौफ आ जाए .

उसे कोई शरम–लिहाज होता तो यह चिता क्यों जलती

बदरुन्निसा रंगरेजा बस्ती छोड़कर ढक्की दरवाजा गली आ गई . बदरीलाल के साथ उसी के घर में रहने लगी . न निकाह न कोई कागज़ी कार्रवाही . बस रहने लगी . उसके आते ही रेडिओ मंडली पहले कुछ दिन सहमी रही . फिर इक्का दुक्का करके सभी लौटने लगे . न वो लाहौर जा कर गाती, न ही अब उसे लेकर कोई अटकल लगाता . बैठक की गहमा गहमी वैसी की वैसी .

बदरुन्निसा मिलने जुलने वालों के सामने बैठक में कभी न आती . चिक के उस पार गोपाल उससे कभी कभार बतिया लेता . बी॰ ए॰पास होने का नतीजा निकला तो गोपाल ने तफरीह के लिए काशमीर जाना चाहा . बदरुन्निसा ने अपना सोने का गुलूबंद तुड़वा कर पैसों का इंतजाम कर दिया तो गया वरना गोपाल के बाप ने तो मना ही कर दिया था .

जवान जहान बेटा है . उसकी छोटी सी ख्वाहिश को क्यों मारते हो . उसने गोपाल के बाप को समझाया .

गोपाल कश्मीर से लौटा तो बदरुन्निसा के लिए शाल लाया . सुर्ख रंग का शाल, उपर तिल्ले की आरी वाली कढ़ाई . बदरुन्निसा ने सँभाल कर रख दिया .

तेरी दुल्हन को दूँगी . उसने कहा .

लेकिन दुल्हन आई कहाँ उससे पहिले तो बँटवारा आया . अपने बाप और छोटे भाई को इकबाल लिवाने आया और अपने साथ उधर ले गया . और बदरुन्निसा, वो ताहिरा की माँ बनने का इधर ही इंतजार करती रही .

बेकरी वाले बख्तियार की घरवाली ने सलाह दी .

काफर की औलाद को इस मुसलमानों की गली में पैदा करोगी तो हम सब की खैर नहीं . दीवारें, छतें सभी जुड़ी हैं इस गली के घरों की . तुम्हारे घर में लगाई आग हम सब को जला देगी . लाहौर चली जाओ, बाद में कभी लौट आना .

बदरुन्निसा ने छोटी बहिन जाहिदा को लेकर लाहौर जाने वाली खचाखच गाड़ी तो पकड़ी मगर उससे उतरी नहीं .

२२ जुलाई १९६९ की शाम चित्रा ने ताहिरा और करन के लिए एक दावत रखी थी . रसल स्क्वेयर के इंस्टीट्यूट आफ कामनवेल्थ स्टडीज से हैडन सैंट्रल वापिस आने में करन को कुछ देर हो गई थी . घर पहुँचा तो ताहिरा खिड़की से झाँकती मिली . पूरा दिन उसने कई जोड़े उतारे पहने थे . उसका जी चाहता था कि वह ऊदे रंग का शरारा–कुरती पहने ताकि जाहिदा खाला के हाथ का बना महीन कढ़ाई वाला भारी दुपट्टा ओढ़ सके . लेकिन करन कह गया था कि अंडरग्राउंड में जाना है, इसलिए गरारा या शरारा पहन कर सीढ़ियाँ उतरना चढ़ना मुश्किल होगा .

काशनी चूड़ीदार कुरते के साथ मुकैश लगा दुपट्टा पहन जब ताहिरा करन के साथ घर की सीढ़ियों से उतरी तो बुढ़ऊ मकान मालिक दरवाज़े के साथ ही जुड़ कर खड़ा था .

खूबसूरत, बहुत ही खूबसूरत . उसने अपनी दो सूखी सी उँगलियों से अपने होंठ चूम कर कहा, लेकिन नहाते वक्त इतनी देर तक गरम पानी मत चलाया करो, मेरा खर्चा बढ़ जाता है .

ताहिरा को लगा जैसे उसके खूबसूरत लिबास के नीचे एक गीला तौलिया उसे लपेट में लिए है जिसे जितना भी निचोड़ लो, उसकी गीलाहट नहीं जाती . तौलिया सूखे तब न जब उसे कहीं खुली हवा या धूप में फैलाया जाये लेकिन यह तौलिया तो धोने के बाद भी साफ नहीं होता था . बस हर रोज इस्तेमाल के बाद और गीला होकर चिपट ही जाता था .

हैडन सैंट्रल की उबड़ खाबड़ गोरों की गली के दोनों तरफ बिल्कुल एक जैसे एक दूसरे से सटे हुए गिरते ढहते से दिखाई देने वाले मकानों में रहनेवाले भी ढीले ढाले थे . ताहिरा जब कभी सौदा सुल्फ लेने अकेले गली में उतरती, तो उसे नुक्कड़ तक पहुँच कर ही साँस में साँस आती . यू स्टिंकिंग पाकीज , कह कर एक बार किसी फटे हुए कोट और पजामानुमा पैंट वाले बुढ्ढ़े ने उस पर थूक दिया था . तभी से वह गली में अकेले आने से कतराती थी .

आज भी करन की कुहनी थामे गली से निकल जाने की उसे बहुत जल्दी थी . लेकिन चित्रा के घर पहुँचने में ताहिरा और करन को करीबन दो घंटे लग गये . हैडन सैंट्रल से कैसिंगहन स्ट्रीट का पूरा रास्ता अंडरग्राउंड़ में पैंतीस–चालीस मिनट का था . ताहिरा चारिंग क्रॉस पर ही उतर कर विंडोशापिंग में ऐसी लगी कि चलती कम और रुकती ज़्यादा . रीजंट स्ट्रीट, ब्रांड स्ट्रीट, आक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट की साफ सुथरी बंद दुकानों की सजी धजी विंडोज . न कीमत पूछने की जरूरत, न दाम चुकाने की कैफयत का एहसास . मन ही मन उसने बहुत सा सामान खरीदा और बड़े सलीके से एक खूबसूरत सा घर सजा लिया . एक ऐसा घर जिसमें वह जितनी देर चाहे नहा सकती थी . जहाँ कई खिड़कियाँ थीं, दरवाज़े थे और जिसके फर्श पर कोई फटी हुई दरी नहीं थी . बांड स्ट्रीट की एक शो विंडो में सजाये फर्नीचर को उसने एक इरानी कालीन के आस पास रखना शुरू ही किया था कि करन ने उसे एक हल्का सा धक्का देकर कहा,

तुम्हारे चलनें की रफतार अगर यही रही तो दुनिया का पहला आदमी चाँद पर पहले उतरेगा और हम चित्रा के घर बाद में पहुँचेंगे .
 
आदमी को चाँद पर तो गई रात ढले उतरना है ना, अभी तो सात भी नहीं बजे . ताहिरा ने एक बार फिर दामास्क के हलके तरबूजी रंग के गद्दों वाले सोफ़े को हसरत भरी नजरों से देखा .

चित्रा बड़ी स्मार्ट लड़की है ताहिरा . हमें शादी की मुबारक देने के लिए उसने आज का ही दिन चुना, यह महज इत्तफ़ाक नहीं है . तुम देखना, इस एक बनाए गए इत्तफ़ाक से और कितने इत्तफ़ाक निकल आयेंगे .

जैसे ताहिरा की नजरें अब शो विंड़ो से टंगे एक भूरे बादामी लेडीज कोट पर थी .

जैसे कि डेविड हमारी शादी की मुबारक का जाम उठाते हुए कहेगा, अगर इन्सान चाँद पर उतर के वहाँ चहल कदमी कर सकता है, और एक काश्मीरी ब्राह्मण नौजवान एक पाकिस्तानी मुस्लिम लड़की से शादी कर सकता है, तो दुनिया में क्या नहीं हो सकता अब तो हम यह उम्मीद भी कर सकते हैं कि वह दिन दूर नहीं जब भारत और पाकिस्तान अपने आपसी भेद–भाव भुला कर तमाम दक्षिण एशिया की माली हालत सुधारने में साँझी जिम्मेदारी सँभाल लेंगे .

ताहिरा ने शो विंडो से अपनी नजरें हटा ली . हल्की सी ताली बजाई और पूछा,

यह तुम हमारे लिए दी जाने वाली दावत की बात कर रहे हो या फ़ेलोशिप खत्म होने पर किसी और ग्रांट के लिए अप्लाय करने का मजमून ढूँढ रहे हो .

मुझे डेविड की तरह किताबें लिखने पढ़ने का कोई शौक नहीं .

तो यहाँ क्यों आए थे

इत्तफ़ाक से मौका मिला, आ गया वरना पापा जी के साथ काश्मीरी कालीन बेचता रहता .

ताहिरा अब फिर रुक गई थी . औरतों के अंडरगार्मेंटस की एक बड़ी दुकान की शो विंडो के सामने . शीशे की बड़ी सी खिड़की में लेस और सिल्क की ब्रा और पैंटीज के बीच एक छोटे से कार्डबोर्ड के फट्टे पर काले रिबन से लिखा था सेल्सगर्ल वान्टेड, फलेक्सिबल आवर्स .

देखो करन, लगता है मुझे भी इत्तफ़ाक से मौका मिल सकता है, मैं अप्लाय कर दूँ

जी नहीं .

लेकिन क्यों

इस बात पर जिरह करनें का यह कोई वक्त है क्या करन की आवाज में हल्की सी तल्ख़ी थी . हमें पहले ही काफ़ी देर हो चुकी है . फिर उसने जो ताहिरा का हाथ पकड़ कर चलना शुरू किया तो कैंसिगटन स्ट्रीट पहुँच कर ही रुका .



चौड़े सलेटी पत्थरों की शानदार तिमंजली इमारत . हर मंजिल पर फर्श से उठ कर छत को छूती साफ सुथरे काँच की खिड़कियाँ, खिड़कियों के आगे चमकते हुए काले रेलिंग वाली बालकनियों में सजे बड़े बड़े गमलों से ऊँचे उठते हरे कचूच पौधे . पौधों से परे खिड़कियों के पार बादामी झालर वाले महीन परदों की अधखुली भीतों से झाँकते कंदील . पूरी इमारत में जाने के लिए एक मजबूत महागनी की चमचमाती लकड़ी का लंबा चौड़ा दरवाजा . दरवाज़े के दायीं तरफ दीवार पर औंधाए गमले जैसे शेड से ढँके दूधिया बल्ब की रोशनी में चमचम करती पीतल से लिखी रहनेवालों के नाम की फहरिस्त . ताहिरा ने फहरिस्त पढ़नी शुरू ही की थी कि करन ने सिर हिलाकर टोक दिया .

हमें बेसमेंट में जाना है .

बेसमेंट का दरवाजा डेविड ने खोला, अदब से ताहिरा की कोहनी थामी और एक हल्की सी सीटी बजाकर चुपचाप खड़ा हो गया . कमरे में जमी भीड़ से उठती आवाज़ें एकदम खामोश हो गई .

लीजिए साहिबान, दुल्हन आ गयी . डेविड ने कहा .

तालियों की बौछार हुई, और यकलख्त ताहिरा के जिस्म से लिपटा गीला तौलिया कहीं गायब हो गया . फर्श को छूते अपने मुकैश वाले दुपट्टे का पल्ला सँभालती वह करन के बाजू से घिरी दूधिया बल्बों की गुदगुदी रोशनी में नहा गई . एक के बाद एक नया अजनबी चेहरा, हर जुबान से नये अंदाज में मुबारकबादी, हर मिलने वाले हाथ में गरमजोशी, हर उठती हुई नजर में कहीं अनकही खुशामदीद .

दुल्हनें तो सभी खूबसूरत होती हैं लेकिन इस दुल्हन की खूबसूरती बिलकुल बेमिसाल है . कहने वाले ने अपना नाम ह्यूम मोस्ले बताया . ताहिरा के साथ खड़े करन का चेहरा खिल उठा .

आप आज यहाँ आने का वक्त निकाल पाये, सर, यह हमारे लिये बहुत बड़ी बात है . हम दोनों आपके बेहद मशकूर हैं . करन बोला और फिर ताहिरा की तरफ देखकर कहा उसने जैसे कोई ताजा जीती ट्राफ़ी दिखा रहा हो .

प्रोफ़ेसर मोस्ले इंस्टीट्यूट आफ कॉमनवेल्थ स्टडिज के डायरेक्टर हैं .

ट्वीड का कोट ओर डार्क ग्रे पैंट के साथ हल्की स्लेटी कमीज और बरगंडी स्कार्फ पहने एक बरौब अजनबी अब ताहिरा से मिलने के लिए हाथ बढ़ाए खड़ा था .

डेवड ने परिचय कराया .

डा॰रिचर्ड टेलर आर्ट हिस्टरी डिपार्टमेन्ट के हेड हैं . चित्रा इनके डिपार्टमेन्ट की स्नातक है .

गरमजोशी से हाथ मिलाकर डा॰टेलर ने एक बाँह फैलायी और बिना छुऐ ताहिरा के कंधों को घेरे में ले लिया . फिर वैसे ही थामे पास की दीवार पर लगी एक ब्लैक अ‍ैंड व्हाइट तस्वीर दिखा कर बोले,

मुझे पूरा यकीन है कि आज से पचास साल बाद भी आप और आपके पति साथ साथ इतने ही खुश होंगे जितने आप दोनों आज हैं .

तस्वीर में एक जोड़े की पीठ थी . बाहें एक दूसरे की कमर में, सर एकदूसरे की तरफ झुकते हुए . गरम कोटों मे से झुके हुए काँधे, बालों की सफ़ेदी और हाथों की उभरी नसें सभी उनकी उम्र का अहसास दिला रही थीं . किसी पुल पर एक लैम्पपोस्ट के पास खड़े उनके न दिखने वाले चेहरे शाम के धुँधलके का नकाब ओढ़े थे .

तुम इस जोड़ी को जानते हो क्या डॉ टेलर ने डेविड से पूछा,

नहीं गर्मियों की छुट्टियों में चित्रा और मैं रोम गये थे, वहीं पर चित्रा ने इन दोनों को पुल पर ऐसा खड़ा देख कर यह तस्वीर ली थी, इनको बिना बताये . इनको एक कॉपी भेजने की इजाजत भी फ़ोटो लेने के बाद ही ली .

बहुत यादगार लम्हा कैमरे में उतारा है चित्रा ने . किसी आर्ट स्टूडेंट को कहना चाहिये कि वह फ़ोटोग्राफ़ी, एचिंग और आर्किटेक्चर के आपसी प्रभाव पर योरोपीय और एशियाई संदर्भ में कुछ और रिसर्च करे . तुम्हारा क्या ख्याल है डेविड मुझे तो अब तक लगता है कि यूरोप और एशिया की परम्पराएँ उनके इतिहास से कम और भूगोल से ज्यादा प्रभावित है .

खामोश खड़ी ताहिरा से अब एक और अजनबी हाथ मिला रहा था .

मिसेस जुत्शी, मैं आज शाम की खास मेहमान से जल्दी जाने की इजाजत चाहूँगा . मुझे घर पहुँचने के लिये अभी मीलों का फ़ासला तय करना है . इन्सान को चांद पर पहला कदम रखते हुए देखने के लिए, मेरा परिवार मेरे साथ होगा .

डेविड जाने वाले को दरवाजे तक छोड़ने गया, करन ने ताहिरा से कहा,

वो डा॰टामसपेलिंग थे, स्कूल ऑफ ओरियंटल एैंड अफ़ीकन स्टडीज में साउथ ऐशिया प्रोग्राम के डाइरेक्टर है, डेविड के बॉस हैं .

तुम जानते हो अभी जाने से पहले टॉमस मुझे क्या कह कर गया है डेविड कह रहा था, वह चाहता है कि किसी स्टूडेंट से कह कर कैम्पस जर्नल के आने वाले इश्यू में तुम दोनों को लेकर एक लेख छपाया जाये .

करन को बड़े नाटकीय आवाज में अपनी टाई ठीक करते हुए देख कर डेविड मुस्करा दिया .

अरे हाँ टॉमस यह भी कह रहा था कि तुम दोनों की जोड़ी इतनी खूबसूरत है कि कैमरा तो तुम्हें तलाश करेगा ही, देखने वाले भी एकबार देख लेंगे तो पूरा लेख पढ़ ही डालेंगे .

करन और ताहिरा की शादी को लेकर रसल स्क्वेयर के हरे भरे अहाते में काफ़ी चर्चा थी .

इन्स्टीट्यूट आफ कामन वेल्थ स्टड़ीज और स्कूल आफ ओरियंटल ऐंड अफ़ीकन स्टड़ीज में अन्तर–जातीय, अन्तर–मजहबी या अन्तर–देशीय शादी होना कोई बड़ी बात नहीं थी . अन्तरदेशीय माहौल में रहकर ही तो इंसान मजहब, जाति और राष्ट्रीयता के संकुचित दायरों से उपर उठता है न इसीलिए तो कई कई परोपकारी दूर दूर से बिछड़े हुए देशों के स्नातकों को वज़ीफ़े देकर बाहर की दुनिया में पढ़ने–लिखने का मौका देते हैं . लेकिन करन तो ताहिरा से शादी करने के बाद ही लंदन आया था, और वह भी पहली बार . जम्मू कश्मीर युनिवर्सिटी से सेकन्ड डिवीजन में एम ए किया था उसने और ताहिरा लाहौर के किसी प्राइवेट कालिज में पढ़कर बी ए हुई थी .

स्कूल आफ ओरियंटल ऐंड अफ़ीकन स्टड़ीज में हिस्टरी आफ आर्ट की छात्रा चित्रा की एक सहपाठिन ने पूछा कि क्या वह ताहिरा और करन को जानती है .

मेरे दादा ताहिरा के पिता थे . चित्रा ने ऐसे सहज कहा जैसे कि कुनबे के दरख्त की किसी टहनी पर हाथ रख दिया हो .

बस फिर तो उत्सुक स्नातकों का ताँता सा लग गया चित्रा के आस पास .

तुम्हारे दादा मुस्लिम थे क्या

करन तो ऊँची जाती का हिंदू है ना ब्राह्मण है

एक भारतीय और एक पाकिस्तानी में शादी होना तो बड़ी सनसनी वाली वारदात रही होगी

तुम्हारे यहाँ तो शादियाँ अरेंज होती है, इनका प्रेम विवाह हुआ होगा . मिले कहाँ होंगे यह दोनों काश्मीर में मिले हो, ऐसा मुमकिन तो नहीं लगता .

फतरतन कम बोलने वाली चित्रा ने डेविड को बताया,

करन और ताहिरा के बारे में बातें करना मुझे अजीब सा लगता है . पता नहीं वह दोनों खुद पब्लिक में क्या कहना चाहते हैं

तुम उन दोनो के लिये एक दावत दे सकती हो . कैम्पस वाले इस जोड़ी से एक बार खुद मिल लेंगे तो शायद एक दूसरे के आदी भी हो जायेंगे . डेविड ने सलाह दी .
 
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