• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

अधखिला फूल (उपन्यास) /'हरिऔध'

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
देवहूती और उसकी मौसी के घर के ठीक पीछे भीतों से घिरी हुई एक छोटी सी फुलवारी है। भाँत-भाँत के फूल के पौधे इसमें लगे हुए हैं, चारों ओर बड़ी-बड़ी क्यारियाँ हैं, एक-एक क्यारी में एक-एक फूल है-फुलवारी का समाँ बहुत ही निराला है। जो बेले पर अलबेलापन फिसला जाता है, तो चमेली की निराली छबि कलेजे में ठण्डक लाती है। नेवारी ने ही आँखों की काई नहीं निवारी है-जूही के लिए भी फुलवारी में तू ही तू की धुम है। कुन्द मुँह खोले हँस रहा है, सेवती फूली नहीं समाती। हरसिंगार की आनबान, केवड़े की ऐंठ, सूरजमुखी की टेक, केतकी का निराला जोबन, मोगरे की फबन, चंपे की चटक, मोतिये की अनूठी महँक-सब एक-से-एक बढ़कर हैं। इन फूल के पेड़ों से दूर जहाँ क्यारियाँ निबटती हैं-फूलों के छोटे-छोटे पौधे थे-इनके पीछे हरे-भरे केले के पेड़ अकड़े खड़े थे, जिनके लम्बे-लम्बे पत्ते बयार लगने से धीरे-धीरे हिल रहे थे। इन सबके पीछे फुलवारी की भीत थी, और उसके नीचे एक बहुत ही लम्बी चौड़ी खाई थी, खाई में जल भरा हुआ था, कई ओर कमल खिले हुए थे।

इस फुलवारी के बीच में एक पक्का चौतरा है, इस पर पारबती और देवहूती बैठी हुई हैं। भोर हो गया है, सूरज की सुनहली किरणें चारों ओर छिटक रही हैं। एक भौंरा एक फूल पर गूँज रहा है। गूँजता-गूँजता ठीक फूल की सीधा में आता है, ठिठकता है, सिकुड़े हुए पाँवों को फैलाकर फूल की ओर झुकता है। फिर ठिठकता है। और पहले की भाँत चक्कर लगा कर झूमने लगता है। कितने क्षण यों ही गूँजता रहा, फिर पंख समेट कर उस पर बैठ गया। कुछ बेर चुपचाप उसका रस पीता रहा। फिर अधरुँधे गले से भन्न-भन्न करने लगा। इस के पीछे गूँजता हुआ उसपर से उड़ गया। अब दूसरे फूल के पास गया, पहले इसके भी चारों ओर गूँजता रहा, फिर उसी भाँत इस पर बैठा, रस लिया, भन्नभन्न बोला, फिर गूँजता हुआ इस पर से भी उड़ गया। पारबती और देवहूती के देखते-देखते यह बीसियों फूल पर गया, पर इसका मन न भरा। धीरे-धीरे वह और फूलों पर जाकर गूँजता और रस लेता रहा। पर जिस फूल पर से एक बार वह रस लेकर उड़ा उसके पास फिर न गया।

पारबती ने कहा-देवहूती! इस भौंरे को देखती हो? जो गत इसकी है, ठीक वही कुचाली पुरुषों की है। वह अपने रस के लिए इधर-उधर चक्कर लगाते फिरते हैं। भोली-भाली स्त्रियों को झूठी-मूठी बातें बना कर ठगते हैं। जब काम निकल जाता है फिर उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखते।

मीठे सुर से हमी लोग नहीं रीझते। चिड़ियाँ ही इसको सुनकर नहीं मतवाली बनतीं। कीड़े-मकोड़े ही पर इसका रंग नहीं जमता। यह पेड़ों तक को मोह लेता है। जो अच्छा बाजा मीठे सुर से बजता हो और पास ही कोई फूल का पौधा रखा हो, तो देखोगी उसकी पत्तियाँ सगबगा उठीं। उसका हरा रंग और गहरा हो गया। फूल खिल गये और उस पर जोबन छा गया। इसीलिए भौंरा आते ही फूल पर नहीं बैठ जाता। कुछ घड़ी फूल के आस पास गूँजता है। या अपनी मीठी गूँज से उसके रस को उभाड़ता है। और तब उस पर रस लेने के लिए बैठता है।

एक छोटा-सा कीड़ा जो अपना काम निकालने के लिए इतना कुछ कर सकता है-रस पाने के लिए जो वह ऐसी दूर की चाल चल सकता है, तो अपना काम निकालने के लिए मनुष्य क्या नहीं कर सकता। जिस स्त्री को वह फँसाना चाहता है, उसका सामना होने पर वह कहता है, तुम मेरी आँखों की पुतली हो, मेरे प्राण की प्यारी हो, तुमको देखकर मेरे कलेजे में ठण्डक होती है, जी में आनन्द की धारा बहती है। तुम्हीं से मेरा जीना है। तुम्हीं से मेरे अंधेरे जी में उँजाला है। जब तक आँखों के सामने रहती हो, समझता हूँ स्वर्ग में बैठा हूँ। आँखों से ओझल होते ही मुझ पर बिजली-सी टूट पड़ती है। जब उसके पास चीठी भेजता है, लिखता है-तुम्हारे बिना मेरा कलेजा जल रहा है। अनजान में ही न जाने कैसी एक पीर सी हो रही है। खाना-पीना कुछ नहीं अच्छा लगता। दिन-रात का कटना पहाड़ हो गया है। चारों ओर सूना लगता है। जी को न जाने कैसी एक चोट सी लग गयी है, हम सच कहते हैं जो तुम न मिलोगी, हम कभी न जीयेंगे। तुम्हारे बिना हमारा है कौन? हम जानते हैं तुम्हीं को, नाम जपते हैं तुम्हारा ही, जग में जहाँ देखते हैं, तुम्हीं को देखते हैं। खाते-पीते उठते-बैठते सूरत तुम्हारी ही रहती है। हम रहते हैं कहीं, पर मन हमारा तुम्हारे ही पास रहता है। उसकी सिखायी पढ़ायी कुटनियाँ आती हैं, तो कहती हैं-बहू तुम्हारा कलेजा न जाने कैसा है, पत्थर भी पसीजता है। पर कितनाहू कहो, तुम नहीं मानती हो। वह तुम्हारे लिए मर रहे हैं, पड़े तड़पते हैं, आठ आठ आँसू रोते हैं, खाना-पीना तक छूट गया है, पर तुम्हारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। भला इतना भी किसी को सताते हैं! जी की लगावट अपने हाथ नहीं, जो किसी भाँत तुम पर उनका जी आ गया, तो तुमको इतना कठोर न होना चाहिए। सबका सब दिन एक ही सा नहीं बीतता। क्या यह जोबन सदा ऐसा ही रहेगा? फिर थोड़े दिनों के लिए इतना क्यों इतराती हो? प्यासे ही को पानी पिलाया जाता है। भूखे ही को दो मूठी अन्न दिया जाता है। फिर न जाने, क्यों तुम इन बातों को नहीं समझती हो। इतना ही नहीं, गहने-कपड़े, रुपये-पैसे की अलग लालच दी जाती है। कभी-कभी हाथ जोड़ने और नाक रगड़ने से भी काम लिया जाता है। तलवे की धूल तक सर पर रख ली जाती है। पर ये सब धोखेधड़ी की बातें हैं। छल और कपट इन बातों में कूट-कूट कर भरा रहता है। सचाई और भलमनसाहत की इनमें गन्ध तक नहीं होती।

जिसकी हम भगवान के घर से हैं, जिसके लिए हम बनी हैं, जो हमारा जनम-संघाती है, आँखों की पुतली हम हैं तो उसकी, प्राणों की प्यारी हैं तो उसी की। हमारे लिए तड़प सकता है, आँसू बहा सकता है, खाना पीना छोड़ सकता है, जी सकता है, मर सकता है तो वही। जो ये सब गुण उसमें न हों तो भी जो कुछ है हमारा वही है। कहाँ तक वह हमारे काम न आवेगा। जो वह हमको छोड़ दे, जो ऐसा संयोग आन पड़े जिससे जन्म भर फिर उसके मिलने की आस न हो; तो भी उसी के नाम के सहारे हमको अपना दिन काट देना चाहिए। ऐसा होने पर यहाँ वहाँ हमारी और जैजैकार होगी। दूसरा हमारा कौन है? जिसकी परछाहीं पड़ते ही हमारा जनम बिगड़ता है, लोगों को मुँह दिखाना कठिन होता है, उससे हमको किस भलाई की आस हो सकती है? गहने कपड़े, रुपये पैसे देह और हाथ के मैल हैं! इनके पलटे क्या सतीपन ऐसा रतन मिट्टी में मिलाया जा सकता है!!! गहने कपड़े, रुपये पैसे फिर मिल सकते हैं, पर जब स्त्री का सतीपन एक बेर बिगड़ जाता है, तो वह इस जनम में फिर कभी हाथ नहीं आता। ऐसी दशा में क्या कोई भलेमानस स्त्री, क्या कोई अच्छे घर की बहू बेटी, गहने कपड़े, रुपये पैसे के लालच से अपना सतीपन गँवा सकती है?

हमने देखा है बहुत सी भोलीभाली स्त्रियों कुचाली पुरुषों के फंदे में फँस गयी हैं औेर उनका जनम बिगड़ गया है। ऐसे पुरुषों के हाथ जो स्त्रियों पड़ीं अपने पति के साथ फिर उनका अच्छा बरताव नहीं होता। यह एक मोटी बात है। जब अच्छा बरताव न होगा, पतिे का भी वह नेह उस स्त्री में न रह जावेगा। जब ये बातें हुईं, फूट की नींव पड़ी। जब फूट की नींव पड़ी, घर नरक हुआ, फिर सुख से दिन नहीं कट सकता, जिससे बढ़कर दुख की बात कोई हो नहीं सकती। तो क्या थोड़े से सुख के लिए एक अनजान नीच, खोटे और कुचाली पुरुष के लिए अपना घर यों बिगाड़ देना चाहिए? और जो कहीं कोई रोग लग गया, क्योंकि ऐसे पुरुष रोग से भरे रहते हैं, तो सब सत्यनाश हुआ। रोग ने देह में घर किया, लड़के बालों से मुँह मोड़ना पड़ा। जो लड़के बाले हुए भी, तो पहले तो जीते नहीं, जो जीये तो वह भी जनम भर झींखते रहे। कहीं किसी ने देख सुन लिया तो भी वही बात हुई। जग में नीचा अलग देखना पड़ता है और आँख तो किसी के सामने ऊँची हो ही नहीं सकती। ये तो यहाँ की बातें हुईं। वहाँ जो भगवान इस बुरे काम का पलटा देंगे सुरत करने से भी रोंगटे खड़े होते हैं।

पारबती इतना कहकर चुप हो गयी और देवहूती के मँह की ओर देखने लगी। उसने देखा, उसके मुखड़े पर एक अनूठी ललाई झलक रही है, आँखों से जीत फूट रही है और वह बहुत ही धीरी पूरी जान पड़ती है। पारबती यह देखकर मन-ही-मन बहुत सुखी हुई। इसके पीछे दोनों वहाँ से उठकर चली गयीं।
 
देवहूती माँ के साथ फुलवारी से घर आयी। कुछ घड़ी घर का काम-काज करती रही। पीछे अपनी कोठी में आकर चुपचाप बैठी। इस घड़ी कुछ काम इसके पास नहीं था; पर मन के लिए कुछ काम चाहिए, मन बिना काम नहीं बैठ सकता। जब सुनसान रात में हम गाढ़ी नींदों सोते हैं, जिस घड़ी हमारे हाथ-पाँव नाक-कान आँख मुँह किसी के लिए कोई काम नहीं रहता, मन उस घड़ी भी अपनी रूई-सूत में उलझा रहता है। जो बातें हम दिन में देखते सुनते हैं, जो काम हम जागते में करते हैं, उन्हीं को उलट-पलट कर वह उस समय ऐसी मूरतें गढ़ता है, ऐसे-ऐसे दिखलावे दिखलाता है, जो सोच-विचार में भी नहीं आ सकते। इसी का नाम सपना है। देवहूती का मन भी इस घड़ी एक काम में लगा। यह सोचने लगी-इस धरती पर भी कैसे-कैसे लोग हैं! दूसरे को छलने के लिए कैसी-कैसी बातें बनाते हैं! कामिनीमोहन की चीठी को पढ़कर मैंने उसका एक-एक अक्षर सच समझा था, पर आज उसका भण्डा फूटा। माँ की बातों को सुनकर मैंने समझा ऊपर से वह जैसा भला और अच्छा है, भीतर से वह वैसा ही बुरा और टेढ़ा है। राम ऐसे लोगों से काम न डालें। वह इन सब बातों को सोच ही रही थी, इतने में फूल तोड़ने का समय हुआ जानकर बासमती वहाँ आयी और उदास मन से देवहूती के पास बैठ गयी। देवहूती ने देखकर पूछा, बासमती आज इतनी उदास क्यों हो?

बासमती-बेटी! मैं उदास क्यों हूँ, मैं इसको क्या बताऊँ? न जाने मेरा जी कैसा है, जो दूसरे का दु:ख देख ही नहीं सकता। और न जाने तुमने मुझपर क्या कर दिया है, जो दिन रात तुम मेरे चित्त से उतरती ही नहीं हो। जब मैं तुम्हारी बातें सोचती हूँ, तभी मेरा जी भर आता है। इस घड़ी मैं यही सोच रही थी। इसी से उदास जान पड़ती हूँ-नहीं, तो और कोई दूसरी बात तो नहीं है।

देवहूती-क्यों? है क्या?

बासमती-क्या यह भी बताना होगा? बेटी! तू बड़ी भोली है। तेरा यह भोलापन ही तो मुझे और मार डालता है। न जाने तेरा दिन कैसे बीतेगा।

देवहूती-दिन तो सभी बीतते जाते हैं, क्या अब तक कोई नहीं बीता है?

बासमती-बेटी, तुम इन बातों को क्या समझोगी? हम लोगों ने इसी में बाल पकाये हैं। समय का फेरफार देखा है। हमी लोग इन बातों को समझती हैं। यह हम भी जानती हैं-सभी दिन बीत जाते हैं। कोई बीतने से नहीं रहता। पर क्या जैसे तुम्हारा दिन बीत रहा है, इसको इसी भाँत बीतना चाहिए? तुम्हारे ये ही दिन हँसने-बोलने और रंगरलियाँ मनाने के हैं। तुम्हारे ये दिन बनाव सिंगार और सजधज के हैं। ये ही दिन हैं जो आँख किसी चाँद से मुखड़े की ऐसी मतवाली होती है, जो एक पल का ओट भी नहीं सह सकती। कान किसी मिसरी से भी मीठी बातों के ऐसे प्यासे होते हैं, जो रात दिन उसका रस पीने पर भी प्यास नहीं उतरती। ये ही दिन हैं, जो घर में स्वर्ग की बयार चलती है, हाथों में चाँद आता है। थल में कमल फूलता है और पास ही कोकिल बोलता है, पर तुम्हारा दिन ऐसे कहाँ बीतता हैं? चमेली खिल गयी है, भँवर कहाँ है? तारों से सजकर रात की छबि दूनी हो गयी है, पर उसका मुँह उजला करनेवाला चाँद कहाँ है? तुम्हारा जोबन बन का फूल हो रहा है, जो सुनसान बन में खिलता है और वहीं कुम्हिला जाता है।

देवहूती-तो क्या दूसरे का सेंदुर देखकर लिलार फोड़ना होगा?

देवहूती ने इस बात को इस ढंग से कहा, और कहने के समय उसके मुखड़े पर कुछ ऐसा तेज दिखलायी पड़ा, जिसको देखकर बासमती काँप उठी। वह देवहूती की माँ से बहुत डरती थी, इसलिए चट बात पलट कर बोली-

बासमती-नहीं नहीं, बेटी! मैं यह नहीं कहती। मैं यह कहती हूँ जो आज बाबू साधु न हो गये होते, तो तुम्हारी यह दशा क्यों होती! मैं तुम्हारा दुख देखकर ही रोती हूँ। और क्या मैं कोई दूसरी बात कहती हूँ?

देवहूती-यह सच है, पर क्या तुमको ऐसी बातें मुझसे कहनी चाहिए, जिन बातों को सुनकर मेरे जी को गहरी चोट लगे? तुमको तो ऐसी बातें करनी चाहिए, जिससे मैं अपना दुख कुछ घड़ी भूल जाऊँ-मेरा जी कुछ बहले।

बासमती-बेटी! मैं बहुत सीधी हूँ-काट छाँट नहीं जानती। तुमको देखकर जो दुख मुझको होता है-उसको मैं तुमसे कह देती हूँ-पेट में नहीं रखती।

देवहूती-मैं यह नहीं कहती-पर वैसी बातों को सुनकर मेरे जी को बहुत बड़ी चोट लगती थी-इसीलिए मैंने तुमसे आज ये बातें कहीं-नहीं तो क्या काम था। देखो, बासमती! इस धरती पर हँसने, बोलने, रंगरँलियाँ मनाने, अच्छे गहने कपड़े पहनने, प्यार करने और कराने ही में सुख नहीं है, और बातों में भी सुख है। जिसका सुहाग बना है, जिसका जोड़ा नहीं बिछुड़ा है-जिसका पति आँखों में बसता है-कलेजे का हार है, वह रंगरँलियाँ मनावे, हँसे, बोले, अच्छे गहने कपड़े पहने, तो उसके लिए सब सजता है-जो वह ऐसा न करे तभी बुरा है। जो जो बातें एक दूसरे के सुख के लिए भगवान ने बनायी हैं-अपनी और अपने पति की भलाई के लिए उनको काम में न लाना भगवान की चलाई हुई बातों के मिटाने का जतन करना है। हमारे यहाँ पोथियों में लिखा है, ''पति स्त्री का देवता है।'' सच है-जो जिसका देवता है-वही उसका सब कुछ है-स्त्री का पति ही सब कुछ है-जैसे बने उसी की होकर रहना चाहिए। इसी में सब सुख है। पर जिसका भाग फूट गया है-जिसका जोड़ा बिछुड़ गया है-जिसके सर का सेहरा उतर गया है-उसको इन बातों में सुख नहीं है-इन बातों को जी में लाना भी उसके लिए पाप है-उसके लिए सुख की दूसरी ही बातें हैं। इस धरती पर कितने बच्चे ऐसे हैं जिनकी माँ नहीं, कितने बाप हैं जिनको बेटी नहीं, कितने भाई हैं जिनकी बहन नहीं, कितने रोगी हैं जिनकी कोई सेवा करनेवाला नहीं-कितने दुखिया हैं जिनका कोई आँसू पोछनेवाला नहीं-कितने भूखे, कंगाल हैं जिनको कोई सहारा देनेवाला नहीं। क्या बिना माँ के बच्चों को पालने में, क्या बिना बेटी और बहन के बाप-भाई को धर्म की बेटी और बहन बनाने में, क्या रोगियों की सेवा करने में, दुखियों का आँसू पोछने में, भूखे और कंगालों को सहारा देने में, सुख नहीं है? बहुत बड़ा सुख है, और इसी सुख की खोज ऐसी स्त्रियों को करनी चाहिए। घर ही में कोई झगड़ालू है, किसी में ऐंठ बहुत है, किसी को अपनी ही पड़ी रहती है, कोई दूसरे की नहीं देख सकता, कोई थोड़े ही में बिगड़ जाता है, कोई मनाने पर भी नहीं मानता-कहीं कोई स्त्री पति से रूठ कर मुँह लपेटे पड़ी है-कहीं कोई बच्चा अपनी कड़वी माँ के थपेड़ों को खाकर पड़ा रो रहा है-कहीं भाई-भाई लड़ रहे हैं-कोई बाप बेटे में चल रही है-कहीं सास पतोहू में उलझी है-कहीं देवरानी जेठानी तड़प रही हैं-कहीं ननद भौजाई में तू तू मैं मैं हो रही है। इन सबसे एक रस बरतने में-समय-समय पर सबकी सम्हाल करने में-उलझते को सुलझाने में-बिगड़ते को बनाने में-क्या सुख नहीं है? और क्या हम सी स्त्रियों के लिए इस सुख से बढ़कर कोई और सुख हो सकता है? यह सुख ऐसा वैसा सुख नहीं है-इस सुख के मिलने पर-ऊसर में गंगा बहती है-अंधेरी रात में चाँद उठता है-जलती दोपहर में ठण्डी पवन चलती है-घूर पर पारस मिलता है-उकठा हुआ काठ हरा होता है-और रेतीली धरती पर वर्षा होती है। मैं इसी सुख की खोज में हूँ, इस धरती पर अब मेरे लिए कोई दूसरा सुख नहीं है।

पतिवाली स्त्रियों के पास बड़ा झंझट होता है, सबसे पहले उसको पति की सेवा टहल और सम्हाल करनी होती है, क्योंकि सबसे बड़ा धर्म उसका यही है, इसलिए वह जैसा चाहिए वैसा इस सुख को नहीं पा सकती। हमारी ही ऐसी स्त्रियों इस सुख को ठीक-ठीक पा सकती हैं। पति के संग स्त्रियों का कुछ स्वार्थ भी रहता है, इसी से उनके सुख में कभी-कभी दुख की झलक भी पायी जाती है। पर जिस सुख की बात हमने कही है, माँ कहती हैं इसमें स्वार्थ की छूत नहीं रहती। इसलिए इसमें दुख का लेश भी नहीं रहता। इसी ढंग का सुख कोई-कोई पतिवाली स्त्री भी पाती हैं, पर वे ही जो सब स्वार्थों से मुँह मोड़कर पति की सेवा टहल करती हैं।

बासमती देवहूती की बातों को सुनकर भौचक बन गयी और उसका मुँह तकने छोड़ उससे फिर कुछ कहते न बना। इसके पीछे दोनों फूल तोड़ने के लिए चली गयीं।
 
पहाड़ों में जाकर नदियों को देखो, दूर तक कहीं उनका कुछ चिह्न नहीं मिलता। आगे बढ़ने पर थोड़ा सा पानी सोते की भाँति झिर झिर बहता हुआ देख पड़ता है और आगे बढ़ने पर इसी की हम एक पतली धार पाते हैं। यही पतली धार कुछ और आगे बढ़कर और कई एक दूसरे पहाड़ी सोतों से मिलकर एक छोटी नदी बन जाती है। कलकल कलकल बहती है। लहरें उठती हैं। कहीं पत्थर की चट्टानों से टकरा कर छींटे उड़ाती है। फिर बड़ी नदी बनती है और बड़े वेग से समुद्र की ओर बहती है। हमारी चाहों का भी यही ढंग है, पहले जी में इसका कुछ चिह्न नहीं होता। पीछे धीरे-धीरे उसकी एक झलक सी इसमें दिखलाई देती है। कुछ दिन और बीतने पर उसकी एक धार सी भीतर ही भीतर फूटने लगती है। पीछे यही धार फैलकर जी में घड़ी-घड़ी लहरें उठाती है। अठखेलियाँ करती है। अड़चनों से टक्कर लगाती है। और अपने चाहतें की ओर बड़े वेग से चल निकलती है।

देवहूती के लिए कामिनीमोहन की चाह भी अब यही पिछले ढंग की चाह है। वह उस में डूब रहा है। उसी की भँवरों में पड़ कर चक्कर खा रहा है। लाख हाथ-पाँव मारता है, पर कहीं थल बेड़ा नहीं मिलता। वह अपनी बैठक में पलँग पर लेटा है, उस की आँखें कड़ियों से लगी हैं, भौंहें कुछ ऊपर को खिंच गयी हैं और वह चुपचाप देवहूती की छवि मन-ही-मन खींच रहा है। उसने चम्पे के फूलों से बनाकर एक मूर्ति खड़ी की। कमल की पंखड़ियों से आँखें बनायीं-तिल के फूल से नाक सँवारी-दुपहरिया के फूल से होठ बनाया-हाथ और पाँव में भी कमल की पंखड़ियों को लगाना चाहा, पर चम्पे के फूल से यहाँ भी काम लिया। हाँ! उँगलियाँ बनाने में फूल से काम न चला, इसलिए वहाँ कलियाँ लगायीं। और सब जैसा-का-तैसा रहने दिया। भौंरों की पाँतियों को पकड़ कर बाल बनाना चाहा, पर ये सब ठहरते न थे, इसलिए चुनी हुई पतली-पतली सुथरी सेवारों से काम लिया-तब भी यह बनावट बहुत ही बाँकी रही। बेले का फूल बहुत ही उजला होता है, नेवारी और जूही का फूल भी वैसा ही होता है, चमेली का फूल इन सबों के इतना उजला नहीं होता, पर उसमें कुछ लाली होती है, कामिनीमोहन ने जो साड़ी इस मूर्ति को पहनायी वह इन फूलों के रंग की न थी। हाँ, चमेली के फूल में से लाली निकाल ली जावे, तो इस साड़ी का रंग ठीक उसके फूल का-सा होगा। पर साड़ी के आँचल का एक कोना ऐसा न था, इसका रंग ठीक सरसों के फूल का सा था, जिससे जान पड़ता है, उतनी साड़ी हलदी में रंगी हुई थी, साड़ी के नीचे कामिनीमोहन ने झूले की भाँति का एक और कपड़ा पहनाया, यह भी उजला ही था, जैसा हरसिंगार के फूल की पंखड़ी होती है। गहनों में, कानों में दो चार बालियाँ, हाथों में पाँच चार चूड़ियों के साथ सोने का कड़ा, उँगलियों में दो एक ऐसे वैसे छल्ले, और पाँव में चाँदी के कडे थे। पर झनकार किसी में न थी।

यह सब करके कामिनीमोहन ने उसमें जी डाला, जी डालते ही इस मूर्ति के मुखड़े पर न जाने कैसी एक जोत दिखने लगी, न जाने कैसी एक छटा उसके ऊपर छकलने लगी। सहज लजीला मुखड़ा होने से उसकी ललाई जो कुछ गहरी हो गयी थी, बहुत ही अनूठी थी, भोलापन इन सबों से निराला था। भोर के तड़के चम्पे की पंखड़ी को सूरज की सुनहली किरणों से चमकते देखा है-चाँद की प्यारी किरणों से धीरे-धीरे कोईं के फूल को खिलते देखा है-लजालु का हरी-हरी पत्तियों का कुछ छू जाने पर लाज के बस में पड़ते देखा है-पर वह बात कहाँ! वह अनूठापन कहाँ!!!

जी डालकर कामिनीमोहन ने अपने आपको खो दिया, बड़ी उलझन में पड़ा, उसके सर की साड़ी को खसका कर कुछ नीचा करना पड़ा, ज्यों ज्यों वह सर की साड़ी नीचा करने लगा, उसकी उलझन बढ़ने लगी। वह सोचने लगा, जो देवहूती में लाज न होती तो क्या अच्छा होता, फिर सोचा, नहीं-नहीं, लाज ही तो उसकी चाह जी में और बढ़ा देती है! लाज ही से तो वह और प्यारी लगती है!!! खुले मुँह की स्त्रियों कितनी देखी हैं-पर क्या घूँघटवाली के ऐसा उनका भी आदर है? कपड़ों में लिपटी किवाड़ों की ओट में खड़ी स्त्री जितना जी को चंचल करती है-क्या द्वार पर आकर अकड़ी खड़ी हुई स्त्री के लिए भी जी उतना ही चंचल होता है! सीधी चितवन कितनी ही देखी है-पर क्या वह तिरछी चितवन के इतनी ही काट करती है? खिलखिला कर हँसना जी की कली खिलाता है-पर क्या होठों तक आ कर लौट गयी हुई हँसी के इतना ही? और क्या यह सब लाज के ही हथकण्डे नहीं हैं? जो कुछ हो, पर क्या अच्छा होता देवहूती, जो तुम्हारा मुखचन्द एक बार मैं बिना बादलों के देखने पाता! इस घड़ी कामिनीमोहन की सब सुध खो गयी थी, वह बावलों की भाँति कहने लगा, क्या न देखने दोगी, देवहूती? मान जाओ, एक बार तो देखने दो। पर फिर अचानक वह चौंक उठा, उसने सुना, जैसे कोई कहता है-आप क्यों अपने पाँवों में अपने आप कुल्हाड़ी मार रहे हैं? कामिनीमोहन ने सुधि में आ कर देखा-साम्हने बासमती खड़ी है। उसको देखकर वह कुछ लजाया, पर छूटते ही पूछा, क्यों बासमती? क्या मैं अपने आप पाँव में कुल्हाड़ी मार रहा हूँ?

बासमती-और नहीं तो क्या? एक ऐसी वैसी छोकरी के लिए इतना आपे से बाहर होना, क्या अपने आप अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारना नहीं है?

कामिनीमोहन-क्या करूँ, बासमती! जी नहीं मानता, जो देवहूती दो चार दिन के भीतर मुझसे न मिली, तो मुझको बावला हुआ ही समझो।

बासमती-क्यों? देवहूती में कौन सी ऐसी बात है? देवहूती से बढ़कर कितना ही आपके लिए मर रही हैं, कितनी ही आप पर निछावर हो चुकी हैं, फिर देवहूती में क्या रखा है, जो आप उसके लिए बावले होंगे?

कामिनीमोहन-इसको मेरे जी से पूछो। बासमती! मैं बातों से नहीं बतला सकता।

बासमती-यह आपकी बहुत बड़ी कचाई है, घबड़ाने से कुछ नहीं होता, धीरे-धीरे सभी बातें ठीक हो जाती हैं। आप की कचाई और घबराहट ही सब बातें बिगाड़ती हैं। आप जितना ही उसके लिए चंचल होते हैं वह उतना ही ऐंठती है। मैं कहती थी आप उसके पास कोई चीठी न लिखिये, पर आप ने न माना, अब यह इतना तन गयी है, जो पुट्ठे पर हाथ तक नहीं रखने देती!

कामिनीमोहन-तुम सदा ऐसी ही बातें कहा करती हो, कुछ होता जाता तो है नहीं, उलटे सब बातों को मेरे ही सर मढ़ती हो। क्या मेरी चीठी भेजने से पहले उसके ये ढंग न थे?

बासमती-जी नहीं, ये ढंग नहीं थे। क्या देवकिशोर भी कभी फूल तोड़ते समय वहाँ आता था, पर जिस दिन से आप की चीठी गयी है, उसी दिन से ज्यों फूल तोड़ने के लिए देवहूती फुलवारी में आती है, त्यों किसी ओर से देवकिशोर भी किसी बहाने आ धमकता है। और जब तक देवहूती फुलवारी से नहीं जाती-वह वहाँ से टलता तक नहीं।

कामिनीमोहन-इसमें भी तुम्हीं से कोई भूल हुई है, नहीं तो देवकिशोर इन बातों को क्या जानता?

बासमती-मुझसे कोई भूल नहीं हुई है, मैं तुम्हारी चीठी को ऐसा चुपचाप देवहूती के पास रख आयी...जो वह भी इस बात को न जान सकी। मैं ऐसे काम के लिए उसके घर में आयी गयी-जैसे छलावा-किसी ने देखा तक नहीं।

कामिनीमोहन-ये तुम्हारी बातें हैं, पारबती की दीठ कौन बचा सकता है। फूल तोड़ने के समय देवकिशोर का फुलवारी में आना उसी की चाल है।

बासमती कुछ खिसियानी सी होकर अपने आप सोचने लगी बात तो ठीक है, मैंने भी कुछ ऐसा ही सुना है, पर जी की बात जी ही में रखकर बोली-आप कहेंगे क्या, मैं पहले से ही जानती हूँ। जितनी चूक है-सब मेरी चूक है। जहाँ कोई बात बिगड़ी, उसमें मेरा ही दोष है। मैं आपकी लौड़ी हूँ, जो आप ऐसी बातें कहते हैं तो मैं बुरा नहीं मानती, बात दिनों दिन बिगड़ रही है, दुख इसी का है। आपका काम हो जावे, मैं कनौड़ी बनकर ही रहूँगी।

कामिनीमोहन-अब मैंने समझा, जान पड़ता है कल्ह जब तू मेरे कहने से उसके यहाँ गयी, उस घड़ी वह तेरे हाथ न चढ़ी। इसी से आज इतना रंग पलटा हुआ है। नहीं, तू तो स्वर्ग की अप्सरा को धरती पर उतार लाने को कहती थी।

बासमती-अब भी मैं यही कहती हूँ-क्या अब जो अड़चनें बढ़ गयी हैं-इससे मैं हार मानूँगी? नहीं-नहीं, ऐसा आप मत सोचिये, बासमती ऐसी मिट्टी से नहीं बनी है, अपना काम करके ही दिखाऊँगी, पर इतना कहती हूँ-काम अब इधर नहीं निकल सकता।

कामिनीमोहन-आज तीसवां दिन है, फूल तोड़ते एक महीना हो गया, कल्ह से देवहूती मेरी फुलवारी में फूल तोड़ने न आवेगी। जो आज काम न निकला, तो फिर कब निकलेगा, जैसे हो बासमती आज काम पूरा करना चाहिए।

बासमती-आप फिर उतावली करते हैं, मेरी बात मानकर आप उतावले न हों, आजकल उसके रंग-ढंग ठीक नहीं हैं। आज उसको अपने रंग में ढालना टेढ़ी खीर है।

कामिनीमोहन-बासमती! तुम भूलती हो, जो आज कुछ न हुआ, फिर कुछ न होगा। मैं तुम्हारी भाँति जी का कच्चा नहीं हँ। जो कुछ मैंने सोच रखा है, आज उसको कर दिखाऊँगा। मैं तुमको इस घड़ी देख रहा था तुम कितनी हो, नहीं तो इन बातों से कुछ काम न था।

बासमती-राम करें आपने जो सोचा है, वह पूरा उतरे, मैं कच्ची हूँ कि पक्की, यह आप भली-भाँति जानते हैं-आज भी जानेंगे। मैं कितनी हूँ यह भी आपने बहुत दिनों से समझ रखा है-आज भी समझेंगे, पर आपका जी इस घड़ी कहाँ है, कुछ समझ में नहीं आता। आप उतावले होकर ऐसी बातें कह रहे हैं, इसी से मुझको डर है। उतावलापन अच्छा नहीं। पर जब आप नहीं मानते हैं, तो मैं अपना मुँह पीट डालूँ तो क्या? मैं जाती हूँ-आप जो कुछ कीजिएगा, बहुत चौकसी से कीजिएगा। आप चाहे इस घड़ी न मानें पर मैं कहे जाती हूँ, जहाँ तक हो सकेगा, मेरे योग्य जो काम होगा, मैं उसमें न चूकूँगी।

बासमती के चलते-चलते कामिनीमोहन ने कहा-बासमती! कुछ कहना है।

बासमती पास आयी। फिर न जाने दोनों में क्या चुपचाप बातें हुई-इसके पीछे दोनों वहाँ से चले गये।
 
कामिनीमोहन की फुलवारी के चारों ओर जो पक्की भीत है उसमें से उत्तरवाली भीत में एक छोटी सी खिड़की है। यह खिड़की बाहर की ओर ठीक धरती से मिली हुई है, पर भीतर की ओर फुलवारी की धरती से कुछ ऊँचाई पर है। खिड़की से फुलवारी की धरती तक नीचे उतरने को बारह सीढ़ियाँ हैं। इस घड़ी इन्हीं सीढ़ियों से होकर बासमती और देवहूती फुलवारी में उतर रही हैं। पर जिस झोंक से देवहूती का पाँव उतरने के लिए उठ रहा है, बासमती का पाँव वैसा नहीं उठता। वह कुछ ठहर-ठहर कर नीचे उतर रही है। देवहूती सीढ़ियों से जब फुलवारी में उतरी, बासमती चार सीढ़ी ऊपर थी, देवहूती फुलवारी में उतर कर दो डेग आगे बढ़ी थी-त्योंही उसका पाँव नीचे की ओर धरती में धंसने लगा। देवहूती बहुत घबड़ायी, उसने बहुत चाहा, कुछ पकड़कर ऊपर ही रह जावे, पर चाह पूरी न हुई-उसके औसान जाते रहे। देखते-ही-देखते देवहूती धरती में लोप हुई। जब उसका पाँव नीचे की धरती से लगा, उसकी आँखें खुलीं। आँखें खुलते ही उसने देखा, जिस छीके में वह ऊपर से नीचे आयी थी, और धरती पर पाँव लगते ही जिससे खट से अलग हो गयी थी, वह अब बड़े वेग से ऊपर को उठ रहा था। ज्यों-ज्यों वह ऊपर उठ रहा था, ऊपर का वह बड़ा छेद, जिसमें होकर देवहूती नीचे आयी थी, मुँद रहा था। देखते-ही-देखते छेद मँद गया, और छीका उसी छेद के ऊपर छत में जा लगा-जो अब देखने में छत का बेल बूटा जान पड़ता था।

देवहूती इस घड़ी एक बहुत ही सजी हुई कोठरी में थी, सजने के लिए जो जो चाहिए, वह सब इसमें था। इस कोठरी की भीतों की बनावट भी निराली थी, ऐसे-ऐसे नग इसमें लगे थे, जिससे सारा घर जगमगा रहा था। कोठरी के सामने एक छोटा सा आँगन था, आँगन के चारों ओर पहाड़ सी ऊँची-ऊँची भीतें थीं। बाहर निकलने का कहीं कोई पथ न था। देवहूती ने यह बस देखा, और सोचने लगी, अब मैं क्या करूँ। कामिनीमोहन की ही यह चाल है, यह बात उसके जी में भली-भाँति जँच गयी, पर अब छुटकारा कैसे हो-यही वह सोच रही थी। इतने में ऐसा जान पड़ा, जैसे सामने की भीत को पीछे से कोई ठोंक रहा है, एक-एक करके तीन बार ऐसा हुआ, चौथी बार खटके के साथ भीत के भीतर छिपी हुई एक खिड़की खुल गयी-और इसी पथ से कामिनीमोहन ने बड़े ठाट से कोठरी के भीतर पाँव रखा। कामिनीमोहन के कोठरी में आते ही फिर भीत जैसी की तैसी हुई-अब कहीं खिड़की का चिह्न न था।

पुरुषों के विचलाने के लिए उस खेलाड़ी ने स्त्रियों को बहुत से हथियार दिये हैं, कौन हथियार कब काम में लाना चाहिए, इसको वे भली-भाँति जानती हैं। देवहूती भी स्त्री है, वह इस बात को नहीं जानती थी, यह नहीं कहा जा सकता। हाँ! इतना हो सकता है, सब स्त्रियों अपने हथियारों को एक ही ढंग से काम में नहीं ला सकतीं, जैसे भाला बरछी चलाने में कोई बहुत ही चौकस होता है-कोई कुछ उससे घटकर-कोई उससे भी घटकर। उसी भाँत अपना हथियार चलाने में स्त्रियों की गत है-देवहूती किस ढंग की थी, हम नहीं बतला सकते-पर जिस घड़ी देवहूती और कामिनीमोहन की चार आँखें हुईं-देवहूती ने अपनी आँखों से बहुत-सा विष उसके ऊपर उगल दिया। इस घड़ी उसके सर का कपड़ा माँग से भी कुछ पीछे था, बिखरे हुए बाल दोनों गालों पर बड़े अनूठेपन के साथ हिलते थे, होठ अनोखे ढंग से खुले थे, जिस के भीतर मीठी मुसकिराहट झलक रही थी। भौंहें कुछ टेढ़ी थीं, आँखों में लाल डोरे पड़ रहे थे, और मुखड़े का ढंग बहुत ही निराला था। वह झुकी हुई अपने बालों में उलझी कान की बालियों को सुलझा रही थी, बीच-बीच में उसके हाथों की चूड़ियाँ बहुत ही मीठेपन से बजती थीं। यह सब देख सुनकर कामिनीमोहन का अपने आपे में न रहना कोई बड़ी बात नहीं है-सचमुच इस घड़ी वह अपने आपे में नहीं था-और सब भाँत देवहूती के हाथों का खिलौना हो गया था। कुछ घड़ी हक्का-बक्का बना वह उसको देखता रहा, पीछे जी सम्हाल कर बोला, देवहूती! तुम जितनी सुन्दर हो उतनी ही कठोर हो।

देवहूती-कठोर पुरुष लोग होते हैं, उन्हीं का कलेजा पत्थर का होता है, हम स्त्रियों कठोर होना क्या जानें।

कामिनीमोहन-हम महीनों से तुम्हारे लिए मर रहे हैं, आँसू बहा रहे हैं, पर तुमने कभी हमारी ओर आँख उठाकर देखा तक नहीं, उलटे कहती हो, पुरुषों का ही कलेजा पत्थर का होता है।

देवहूती-तुम हमारे जी की क्या जानते हो! जो तुम मेरे लिए मर रहे हो-तो मैं तुम्हारे लिए मर चुकी हूँ-जीती क्योंकर हूँ यह नहीं समझ में आता। तुम मेरे लिए आँसू बहा रहे हो, तो तुम्हारे लिए मेरा कलेजा जलकर राख हो गया है, उस में एक बूँद लहू नहीं जो आँसू निकाले। हाँ, यह सच है, मैंने तुम्हारी ओर कभी आँख उठाकर नहीं देखा, पर तुमने कभी भले घर की बहू बेटी को किसी को किसी के सामने आँख उठाकर देखते देखा है? मैं कब अकेली रही जो तुम्हारी ओर आँख उठाकर देखती। बासमती के सामने मुझसे ऐसा काम नहीं हो सकता।

कानिमीमोहन-क्या बासमती कोई और है?

देवहूती-और क्यों नहीं है! जो बात हमारे तुम्हारे बीच की है, उसको तुम जानो, मैं जानूँ-तीसरी को जनाना मैं नहीं चाहती। इसलिए मैंने तुम्हारी चीठी के पलटे में कोई चीठी भी नहीं भेजी-किसके हाथ भेजती। पर मेरा सब किया कराया आज मिट्टी हुआ, आज बासमती ने सब जाना, मेरा यही उलाहना है-और कुछ नहीं।

कामिनीमोहन-यह चूक तो हुई। पर तुम्हारे फाँसने के लिए ही मैंने ऐसा किया, तुम्हारे जी की बात मैं नहीं जानता था, नहीं तो कभी ऐसा न करता।

देवहूती-तुम्हारा रूप, तुम्हारी मतवाली करनेवाली आँखें, तुम्हारी जी उलझानेवाली लटें, तुम्हारी रसभरी मुसकिराहट, जिसको न फाँसेगी-तुम्हारी यह चाल उसको नहीं फाँस सकती। इस निराली कोठरी में भी तुम उसका कुछ नहीं कर सकते। पर मैं तो यों ही तुम्हारे ऊपर मर रही हूँ-चाहे यों फाँसो चाहे वों-

कामिनीमोहन-यह कौन जानता था, आज जो कुछ मैंने किया उसमें बासमती ही आँखों की किरकिरी है, नहीं तो क्या तुम्हारे जी की बात मैं किसी भाँत जान सकता था?

देवहूती-तुम यह क्या कहते हो, जिस दिन मेरी आँख तुम्हारे ऊपर पड़ी, उसी दिन तुमको समझ लेना चाहिए था, मैं तुम्हारी हो चुकी। वह कौन स्त्री है जो तुमको देख कर तुम्हारे ऊपर निछावर न होगी।

कामिनीमोहन-यह बात दूसरी स्त्री कहे, पर तुम मत कहो, देवहूती। मैं आप तुम पर निछावर हूँ, मैं ही नहीं, मेरा धन, प्राण, सब तुम पर निछावर है, मेरे घर की लक्ष्मी तुम्हीं हो, मैं तुम्हारे लिए सब छोड़ सकता हूँ-पर तुमको नहीं छोड़ सकता। जिस दिन तुम आँख भरकर मुझको देखोगी, जिस दिन अपनी फूल ऐसी बाँहों को फैलाकर मुझसे मिलोगी उस दिन मैं अपना बड़ा भाग समझूँगा।

देवहूती-मुझको धन संपत से कुछ काम नहीं, मैं तुम्हारे रूप गुण की भिखारिनी हूँ-वही मुझको चाहिए। तुम्हारे संग उजाड़ में भी रहना हो तो वही स्वर्ग है। मुझको अब किसका आसरा है, जो मैं हाथ लगे सोने से भी मुँह मोडूँगी। पर बात इतनी है-मैं आजकल देवी की पूजा कर रही हूँ-कल्ह पूजा पूरी होगी-फिर मैं आपसे बाहर नहीं। देवी देवते की बात में सदा डरना चाहिए, पीछे कुछ हुआ तो जनम भर पछतावा रहेगा। मेरे दिन खोटे हैं, इसमें मैं फूँक-फूँक कर पाँव रखती हूँ। थोड़ा सा आज बासमती का भी खटका लगा है-दूसरे दिन यह खटका भी न रहेगा। जितनी घड़ियाँ यहाँ बीत रही हैं, मैं लाजों मर रही हूँ, न जाने बासमती क्या सोचती होगी।

कामिनीमोहन-मैं तुम्हारा दास हूँ-जो तुम कहती हो मैं उससे बाहर नहीं हो सकता। मैं तुमको अभी फुलवारी में पहुँचाऊँगा-पर फिर मैं कैसे तुमसे मिलूँगा-यह बात मेरी समझ में नहीं आती।

देवहूती-मैं जिस घर में रहती हूँ-उसमें दक्खिन ओर एक बड़ा कोठा है, कोठे में दो खिड़कियाँ हैं, एक बड़ी और एक छोटी। बड़ी पर मैं बहुत बैठा करती हूँ-तुम भी उस ओर बहुत आते जाते हो, परसों मैं तुमको जाते देखकर उस पर से एक चीठी गिराऊँगी, उस चीठी में जो लिखा हो, वही करना, क्या जाने मेरे दिन फिर पलटें।

कामिनीमोहन-अच्छा देवहूती, जाओ, मुझमें इतना बल नहीं, जो मैं तुम्हारी बात न मानूँ, पर इस दास को न भूलना।

इतना कहकर कामिनीमोहन ने देवहूती के पीछेवाली भीत को पहले ही की भाँति तीन बार ठोंका, चौथी बार ठोकने पर इस भीत में भी एक खिड़की दिखलायी पड़ी। देवहूती चट उसी में से होकर बाहर हुई, भीत फिर जैसी की तैसी हुई। जाते-जाते देवहूती कह गयी, मैं सब भूल सकती हूँ-पर तुमको भूल नहीं सकती।
 
बड़ी गाढ़ी अंधियाली छायी है, ज्यों-ज्यों आकाश में बादलों का जमघट बढ़ता है, अंधियाली और गाढ़ी होती है। गाढ़ापन बढ़ते-बढ़ते ठीक काजल के रंग का हुआ, गाढ़ी अंधियाली और गहरी हुई, इस पर अमावस, आधी रात और सावन का महीना। पहरों से झड़ी लगी है; बड़ी धुम से वर्षा हो रही है, बादल जी खोलकर पानी उगल रहे हैं। कभी-कभी कौंध होती है-पर बहुत थोड़ी-बिजली झलक भर जाती है। मुँह निकालना उसको भी दूभर है। गरज बादलों के भीतर ही घूम रही है, पानी पड़ने की ओर चिंघाड़ सुनकर नीचे आते उसका कलेजा भी दहलता है। बूँदें धाड़ाके के साथ गिर रही हैं, ओलती से मुट्ठियों मोटी धार पड़ रही है और चारों ओर पानी बहने की हर हर हर हर बहुत ही डरावनी धुन फैली हुई है। यह सब बहुत ही छिपे-छिपे घोर अंधियाली की गोद में होता है। आँखें फाड़ कर देखने पर भी कहीं बँद और पानी की झलक तक नहीं दिखलाती। हाँ, बूँदों के गिरने, पानी के धुम से पड़ने और बहने की मिली हुई कठोर धुन इस अंधियाली के कलेजे को भी भेद कर कानों तक पहुँचती है, और रात के गहरे सन्नाटे को भी तोड़ रही है, पर घोर अंधियाली ने इसको भी अपने रंग में रँग कर बहुत ही डरावनी बना रखा है।

इसी बेले एक गली में घुटनों पानी हेलते हुए तीन जन घुस रहे हैं। यह तीनों बीच गली में जाकर ठहरे। गली की पश्चिम ओर एक ऊँचा कोठा है, उसकी एक बड़ी खिड़की खुली हुई है। ऐसी घोर अंधियाली में इस खिड़की के भीतर उँजाला है, खिड़की से गली की धरती तक एक रस्सी की सीढ़ी लगी हुई है, इन तीनों में से एक ने टटोल कर इस रस्सी की सीढ़ी को पाया और बहुत फुर्ती से उसके सहारे खिड़की तक पहुँचकर वह कोठे के भीतर पैठ गया। वहाँ उसने कोठे को सूना पाया, केवल एक चौदह पन्द्रह वर्ष की बहुत ही सुन्दर लड़की एक पलँग पर अलबेलेपन के साथ अचेत सो रही थी। एक चटाई पलँग के पास ही धरती पर बिछी हुई थी। एक मिट्टी का दीया टिमटिमाता हुआ जल रहा था, और कहीं कोई न था। कोठे पर चढ़नेवाला बहुत ही चुपचाप पहले कोठे की सीढ़ी के पास गया, वहाँ जो द्वार था उसको उसने बाहर की ओर से लगाया। धीरे-धीरे बिलाई के काँटों को पकड़कर किवाड़ों को आगे की ओर खींचा पर वह न खुले, जी का पूरा ढाढ़स हुआ। उसने भीतर से भी बिलाई लगा दी। इस द्वार के दक्खिन ओर एक बड़ी खिड़की थी, वह अब इसके पास आया, धीरे-धीरे इसके किवाड़ों को भी देखा, यह भी बाहर से लगे हुए थे। इसके कीलकाँटों को भी भली-भाँत देखकर पीछे इसकी बिलाई भी उसने भीतर से लगा दी। यह सब करके वह निचिन्त हुआ-एक ऊँची साँस भीतर से निकलकर बाहर आयी। कलेजा धक-धक करने लगा-पर वह जी को थामकर धीरे-धीरे पलँग की ओर बढ़ा। पलँग के पास पहुँचा ही था, इतने में जिस खिड़की से वह आया था, उसी खिड़की से उसने एक दूसरे जन को कोठे के भीतर पैठते देखा, कोठे के दीये की जोत ठीक इस पैठनेवाले के मुँह पर पड़ती थी, उसी धुंधली जोत में उसने देखा, पैठनेवाला उन्नीस बीस बरस का लम्बा गठीला जवान है। हाथ-पाँव बहुत ही कड़े हैं, सारे अंग खुले हुए हैं, केवल एक कसा हुआ लँगोटा देह पर है। सर के कटे हुए छोटे-छोटे बालों से पानी की अनगिनत बूँदें टपक रही हैं, मुँह उसका बहुत गम्भीर है-जिस पर बेडरी और भलमनसाहत एक साथ झलक रही है।

इस पिछले जन को इस भाँत अचानक आया हुआ देखकर उस पहले जन के पेट में खलबली पड़ गयी, औसान जाते रहे और कलेजा बल्लियों उछले लगा। जिस घड़ी पहले जन की आँख इस पिछले जन पर पड़ी थी, उसी घड़ी उसने ठीक कर लिया था, यह मेरे साथवाले दो जनों में से कोई एक नहीं है, यह इस गाँव का लोग भी नहीं जान पड़ता, क्योंकि इस गाँव का ऐसा कौन है जिसको मैं नहीं जानता, पर इसको तो आज तक मैंने कभी नहीं देखा। इसलिए फिर यह है कौन? उसने उसी घड़ी उसी हड़बड़ी में सोचा, यह हो न हो कोई चोर है! और जो चोर नहीं है तो देवहूती का छैल है! जो इसी भाँति छिपकर नित इसके पास आता है। ये दोनों बातें ऐसी थीं, जिनके जी में समाते ही वह जल भुन गया, उसके ऊपर उसको कुछ रोष भी हुआ, जिससे घबराहट दूर हुई, और जी कुछ कड़ा हुआ, इसलिए उसने कोठे में उसके पाँव रखते ही उससे कुछ अक्खड़पन के साथ पूछा, क्यों रे, तू कौन है?

पिछला जन-मैं तेरा यम हूँ।

पहला जन-हाँ, तू मेरा यम है! देख मुँह सम्हाल कर बातें कर, छोटा मुँह बड़ी बात अच्छी नहीं होती।

पिछला जन-मैं ही तो इस अंधियाली रात में छिपकर दूसरे के घर में घुस आया हूँ। मैं ही तो एक परायी स्त्री का सत इस भाँत कपट करके बिगाड़ना चाहता हूँ-इसी से मुझको बड़ा डर है।

पहला जन-मैं तो दूसरे के घर में छिपकर परायी स्त्री का सत बिगाड़ने आया हूँ! पर यह तो बतला-तू यहाँ क्यों आया है? क्या तू चोर नहीं है?

पिछला जन-मैं चोर हूँ या साह तुझे आप जान पड़ेगा, कुछ घड़ी में तू यह भी जानेगा, मैं किसलिए यहाँ आया हँ।

पहला जन-मैं कुछ घड़ी में क्या जानूँगा, अभी जानता हूँ तू मरने के लिए यहाँ आया है। चींटी को पंख निकलता है तो अपने आप वह आग पर जाकर जल मरती है।

पिछला जन-ठीक बात है! मैं मरने के लिए ही यहाँ आया हूँ; पर यह जान ले तुझे मारकर मरूँगा, बिना तुझे मारे मैं कभी न मरूँगा।

पहला जन-तू किस बूते इतनी हैकड़ी बघारता है? तू नहीं जानता मैं कौन हूँ?

पिछला जन-मैं जानता हूँ-तू देश का नीच, कुचाली और नटखट है।

पहला जन-चुप रह! जो गाली बकेगा तो जीभ पकड़कर खैंच लूँगा।

पिछला जन-आ, देखूँ तो कैसे मेरी जीभ खैंचता है! एक ही झापड़ में तो अंधा होकर धरती पर गिर पड़ेगा।

पहला जन-मुन्ना! मुन्ना!! ओ मुन्ना!!! बघेल! बघेल!! ओ बघेल!!! अबकी बार चिल्ला कर कहा-ओ मुन्ना और बघेल! अभी कोठे पर चढ़ आओ।

पिछला जन-मुन्ना और बघेल के भरोसे ही यह सीटी पटाक थी, तो तेरी देखी गयी। पापी नीच! जा। अब तू भी वहीं जा जहाँ मुन्ना और बघेल गये हैं।

इतना कहकर कड़क कर पिछला जन पहले जन की ओर झपटा, धन जन और जवानी के मद से मतवाले पहले जन से भी यह न सहा गया, वह भी छुरी निकाल कर इसकी ओर दौड़ा, पर पिछले जन ने बहुत ही फुर्ती से उसके हाथ से छुरी छीन ली, और गला पकड़कर एक ही झटके में उसको पछाड़ कर उसके ऊपर चढ़ बैठा।

इस झपटा-झपटी और कड़का-कड़की में उस पलँग पर सोयी हुई लड़की की नींद टूट गयी-वह घबड़ा कर पलँग पर उठ बैठी, आँख मलते-मलते बोली, भगमानी! भगमानी!! यह कैसी धमा चौकड़ी है!!! उसकी बोली उस सुनसान कोठे में गूँज उठी, पर किसी दूसरे का बोल न सुनाई पड़ा। उसने हड़बड़ी में आँखें खोल दीं, पास की चटाई पर किसी को न पाया, उससे थोड़ी ही दूर पर उसने कामिनीमोहन को धरती पर गिरा और उसके ऊपर एक अनजान को बैठे देखा। इस अनसोची और अनहोनी बात को अचानक देखकर वह काँप उठी-उसकी घिग्घी बँधा गयी और वह चक्कर में आ गयी। अभी वह सम्हली नहीं थी, इतने ही में उस पिछले जन ने जिसको अब हम देवस्वरूप नाम से पुकारेंगे, कहा-क्यों रे! राक्षसी!! भले घर की बहूबेटी का क्या यही काम है?

लड़की ने कहा, आप क्या कहते हैं, मैं समझ नहीं सकती हूँ। पर जिस भले घर की बहू-बेटी के ऐसे निराले कोठे में, ऐसी अंधियाली रात में, इस भाँति दो अनजान पुरुष धमाचौकड़ी करते हों वह भले घर की बहू-बेटी काहे को है। आप मुझको भले घर की बहू-बेटी न कहिये। मुझको अब इस धरती पर रहना भी भारी है। अब मैं यही चाहती हूँ धरती माता फट जावें और मैं उसमें सम जाऊँ।

देवस्वरूप ने कहा, तुम मत दुखी हो, मैंने तुम्हारा जी देखने के लिए ही वह बात कही थी, अब मुझको तुमसे कुछ नहीं कहना है। मैं कामिनीमोहन से दो-चार बात करना चाहता हूँ। यह कहकर वह कामिनीमोहन की ओर फिरा, उसको कड़ी आँखों से देखकर बोला, देखो कामिनीमोहन! मैं तुम्हारे ऊपर चढ़कर बैठा हूँ, तुम्हारी छुरी यह मेरे हाथ में है, मैं इसको तुम्हारे कलेजे में घुसेड़ दूँ-या तुम्हारे गले में चुभा दूँ, तो तुम अभी तड़प कर मर जाओगे, इस घड़ी तुम्हारा मरना-जीना मेरे हाथ में है। पर सच बात यह है-तुमको जी से मारने के लिए यहाँ नहीं आया हूँ-मैं इस लड़की का धर्म बचाने के लिए यहाँ आया था, राम की दया से वह बात पूरी हुई-मैं तुम्हारा जी लेकर क्या करूँगा। मैं तुमको अब छोड़ दे सकता हूँ। पर यों न छोडूँगा। तुम दो बातों के लिए मुझसे शपथ करो, तभी छोड़ँगा, क्या शपथ करोगे?

कामिनीमोहन ने बहुत धीरे से कहा, आप क्या कहते हैं?

देवस्वरूप ने कहा, मैं यही कहता हूँ-एक तो आज से किसी परायी स्त्री को तुम छल-कपट करके मत फाँसो और न किसी भाँत उसका सत बिगाड़ो-दूसरे आज की जितनी बातें हैं, उनको अपने तक रखना, भूल कर भी किसी से न कहना।

कामिनीमोहन ने एक लम्बी साँस ली-विष की सी घूँट घोंट कर देवस्वरूप की कही हुई बातों के लिए भगवान को बीच देकर शपथ किया, और एक आह भर कर कहा, आप अब मुझको छोड़ दीजिए, मेरा जी निकल रहा है।

अच्छा, जा छोड़ दिया, पर मेरी बात को भूलना मत, बुरा मान कर तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते, मैं ऐसा वैसा मनुष्य नहीं हूँ-धर्म की रक्षा के लिए जो लोग कभी-कभी मनुष्य के रूप में दिखलायी पड़ते हैं-मैं वही हँ, तुम सचेत हो जाओ, धर्म के पथ पर चलोगे, तो आगे को तुम्हारे लिए बहुत अच्छा होगा। यह कहकर देवस्वरूप ने कहा, अच्छा, कामिनीमोहन अब तू इस कोठे से उतर, मैं भी तेरे साथ नीचे चलता हूँ।

इतनी बातचीत होने पीछे बारी-बारी दोनों उसी रस्सी की सीढ़ी से नीचे उतरे। नीचे उतर कर देवस्वरूप ने उस रस्सी की सीढ़ी को खिड़की से खींच कर टुकड़े-टुकड़े कर डाला। देवहूती चुपचाप यह सब लीला देखती रही, पर कोई बात उसकी समझ में नहीं आयी। वह खिड़की के किवाड़ लगाकर फिर अपने पलँग पर सो गयी। पर उसका जी रह-रह कर बहुत घबड़ाता था।

अब भी वर्षा का वही ढंग था, अंधियाली भी वैसी ही गहरी थी, इसी अंधियाली और वर्षा से देवस्वरूप कामिनीमोहन की आँखों से ओझल हुआ। कामिनीमोहन ने अपने दोनों साथियों को इधर-उधर बहुत खोजा, पर उनको कहीं न पाया, चुपचाप मन मारे वह घर आया, आज उसकी रात बहुत ही बेचैनी से कटी।
 
''देखो! चाल की बात अच्छी नहीं होती।''

अपनी फुलवारी में टहलते हुए कामिनीमोहन ने पास खड़ी हुई बासमती से कहा-

बासमती-क्या मैंने कोई आपके साथ चाल की बात की है? आपके होठों पर आज वह हँसी नहीं है, आँखें डबडबायी हुई हैं, मुँह बहुत ही उतरा हुआ है-यही सब देखकर मैंने जो पूछा-आपका जी कैसा है?-तो यह मेरी चाल की बात है? कामिनीमोहन-चाल की बात न है, और क्या है? तुम क्या नहीं जानती हो?-फिर सब बातें जान बूझकर पूछने का ढचर निकालना चाल की बात नहीं है, तो क्या?

बासमती-मैं क्या जानती हूँ? जितनी बातें मैं जानती हूँ उनमें एक बात भी ऐसी नहीं है, जिससे आप इतने उदास हों, मैं आपको हँसता खेलता देखने आयी थी, पर उलटे मुरझाया हुआ पाती हूँ-अब मैं क्या जानती हूँ बीच में क्या गड़बड़ हुई।

कामिनीमोहन-चुप रहो, बासमती! क्यों बहुत बात बनाती हो? तुम सब जानती हो और सब तुम्हारा ही बिगाड़ा बिगड़ता है। मुझसे काम बनाने के बहाने अलग ऐंठती हो, और वहाँ देवहूती की माँ को सब भेद बतला कर अलग कमाती हो, अब मैंने तुम्हारा मरम समझा है। पहले मैं तुमको ऐसा नहीं समझता था।

बासमती-राम! राम!! यह आप क्या कहते हैं, जो मैं आपसे छल कपट करती होऊँ, तो मेरी आँख फूट जावे, मेरे तन में ढोले पड़ें, मेरा एक पूत मेरे काम न आवे। मेरा कोई गला काट डाले, तो भी मैं आपकी बात दूसरे को नहीं बतला सकती, रुपया पैसा क्या है जो उसके लालच से मैं ऐसा करूँगी।

कामिनीमोहन-जो ऐसा नहीं है, तो फिर ऐसी घोर अंधियाली में, ऐसी कठोर वर्षा में, खड़ी आधी रात को एक अनजान पुरुष मेरा काम बिगाड़ने के लिए वहाँ कैसे पहुँचा गया।

बासमती-इसको राम जानें-मैं कुछ नहीं जानती, मैं जो झूठ कहूँ तो मेरी जीभ गल जावे। मैं आपकी लौंड़ी हूँ, काम लगने पर आपके लिए अपना कलेजा निकालकर सामने रख सकती हूँ-आप इस भाँत मुझको दोष न लगाया करें।

कामिनीमोहन-क्या कहूँ बासमती! रात की बात कुछ समझ में नहीं आती, सौ ठौर जी जाता है, तुम्हारा मन बूझने के लिए ही मैंने ये बातें कहीं, नहीं तो मैं जानता हूँ तुम ऐसी नहीं हो, मेरी इन बातों को तुम बुरा न मानना।

बासमती-आपने क्या कहा जो मैं बुरा मानूँगी, जिसपर चलना है, जो अपना होता है, उसी पर झाँझ निकाली जाती है। आप बिगड़ेंगे तो हम लोगों पर बिगड़ेंगे और किस पर बिगड़ेंगे?

बासमती की बातों से कामिनीमोहन का दुख कुछ हलका हुआ, उसने अपने जी का बोझ और हलका करने के लिए धीरे-धीरे रात की सब बातें बासमती से कहीं, पीछे एक लम्बी साँस भरकर कहा, बड़ा पछतावा यह है बासमती! मैं रात देवहूती से दो बातें भी न कर सका।

बासमती-मैं आपके जी की बात समझती हूँ। आप दो नहीं दस बातें करते तो क्या-अब उस बूँद से भेंट नहीं हो सकती।

कामिनीमोहन-मैं देखता तो वह क्या कहती है!

बासमती-यह आप अपनी खिसियाहट मिटाते हैं, जब वह अपनी चिकनी चुपड़ी बातों में आपको फाँस कर निकल गयी, तभी आपको समझना चाहिए था। वह नित फुलवारी के फाटक में होकर आती जाती थी, जब उस दिन फाटक छुड़ाकर मैं उसको खिड़की की ओर ले चली, तो वह एक डग आगे न रखती थी, पर मेरे ऐसा था जो मैं किसी भाँत उसको उस ओर लिवा गयी।

कामिनीमोहन-मैं उसको इतना नहीं समझता था, उसके भोले-भाले मुखड़े से इतना सयानापन नहीं झलकता।

बासमती-वह देखने ही को भोली-भाली है, उसकी माँ ने उसको पूरी पक्की बना दिया है। देखते नहीं उसका कलेजा! दो महीने आप नित उसके कोठे की ओर एक-एक नहीं चार-चार बार जाते रहे, पर क्या उसकी झलक तक दिखलाई पड़ी?

कामिनीमोहन-नहीं, कभी नहीं, झलक का देख पड़ना तो दूर, वह खिड़की भी मुझको कभी खुली नहीं मिली। इसी से तो बहुत समझ बूझकर रात की बात ठीक की गयी थी, पर क्या कहूँ हम लोगों की यह चाल भी पूरी न पड़ी।

बासमती-चाल तो सभी पूरी पड़ी थी, पर अनसोची बात के लिए क्या किया जावे। मैं यह नहीं समझती हूँ, यह दाल भात में मूसल कौन था?

कामिनीमोहन-जो यह बात मैं जानता ही, तो फिर क्या था, आज ही उसको ठिकाने लगाता! वह तो अपने को देवता बतलाता था, पर वह जैसा देवता है मैं जानता हँ! वह है कैंडे का! यह मैं कहँगा, पर अपने को देवता बतलाना उसकी निरी चाल थी।

बासमती-आपने आज उसको खोजवाया था?

कामिनीमोहन-खोजवा कर क्या करूँगा? ऐसी बातों पर धूल डालना ही अच्छा है, फिर मुझसे बैर करके कोई इस गाँव में ठहर सकता है? वह कभी सटक गया होगा, यहाँ बैठा थोड़े ही होगा।

बासमती-मुन्ना और बघेल तो आपके निज के लोग हैं, आप इनको क्यों नहीं उसके पीछे लगाते। इन दोनों के बीच की बात क्यों कर फूटेगी।

कामिनीमोहन-मुन्ना और बघेल का भी रात ही से पता नहीं मिलता, क्या कहूँ रात की जितनी बातें हैं, सभी निराली हैं।

बासमती-क्यों? यह लोग क्या हुए?

कामिनीमोहन-मैंने पैंतालीस सौ रुपये का गहना देवहूती के लिए बनवाया था, इन गहनों को मैं इसलिए साथ लेता गया था, जो देवहूती न मानेगी, तो इन्हीं का लालच देकर उस को मनाऊँगा। जब मैं कोठे पर चढ़ने लगा, गहनों का डब्बा बघेल को दे दिया, कोठे पर पहुँच कर मैं ऐसा उतावला हुआ जो यह बात भूल गयी। इसी बीच वे दोनों उस डब्बे को लेकर चंपत हुए। इतने रुपए का धन हाथ आया था, वह लोग क्यों कर छोड़ते!

बासमती-जो सौ रुपए भगमानी को और पचास साठ रुपए देवहूती के घर के दूसरे कामकाजियों को दिये गये थे, मैं उसी के लिए मर रही थी, यह बात तो आपने ऐसी सुनायी, जो मुझ पर बिजली टूट पड़ी।

कामिनीमोहन-भगमानी को जो सौ रुपए दिये गये उसका क्या पछतावा है, उसने अपना सब काम ठीक-ठीक किया था, घर के भीतर की ओर से किवाड़ियाँ लगा ली थी, कोठे की बड़ी खिड़की खोलकर उस पर रस्सी की सीढ़ी लगा दी थी, आप भी कोठा छोड़कर कहीं चली गयी थी। काम पड़ने पर उसके घर के दूसरे कामकाजी भी सर न उठाते-पर इन दोनों ने बड़ा धोखा दिया।

बासमती-धोखा नहीं दिया, सर काट लेने का काम किया, पर मैं क्या कहूँ, मुझसे तो आज कुछ कहते ही नहीं बनता।

कामिनीमोहन-जाने दो बासमती! मुझको इन बातों की इतनी खोज नहीं है; पर देवहूती को हाथ से न जाने देना चाहिए।

बासमती-मैं कब देवहूती को छोड़नेवाली हूँ, पर दु:ख इतना ही है कि काम बिगड़ता जाता है। मैंने आपसे अभी नहीं कहा, आज पारबती ने अपने यहाँ के सब कामकाजियों को निकाल दिया। भगमानी बीसों बरस की पुरानी टहलुनी थी, आज उसको भी छुड़ा दिया। वे सब मेरे यहाँ रोते आये थे-इन सबसे मेरा बड़ा काम चलता था।

कामिनीमोहन-पारबती कैसी चाल की है, कुछ समझ में नहीं आता। पर वह कामकाजी लावेगी कहाँ से-रखेगी तो यहाँ ही के लोग! यहाँ कौन ऐसा है जो मेरा दबाव नहीं मानता, बासमती! पारबती को जो तुमने न पछाड़ा, तो कुछ न किया।

बासमती-अपने चलते तो मैं चूकती नहीं, पर होनी को क्या करूँ! मैं भी यही कहती हूँ-जो पारबती ने मुँह की न खायी तो कुछ न हुआ।

कामिनीमोहन-अब की कोई बड़ी गहरी चाल चलनी चाहिए।

बासमती-मैंने समझा, अच्छा, अब मैं इसी सोच में जाती हूँ।

यह कहकर वह चली गयी।
 
आज भादों सुदी तीज है, दिन का चौथा पहर बीत रहा है, स्त्रियों के मुँह में अब तक न एक दाना अन्न गया, न एक बूँद पानी पड़ा, पर वह वैसी ही फुरतीली हैं, काम काज करने में उनका वही चाव है, दूसरे दिन कुछ ढिलाई भी होती, पर आज उसके नाम से भी नाक भौं चढ़ती है, घर-घर में चहल-पहल है, बच्चों तक में उमंग भरी है। धीरे-धीरे घड़ी भर दिन और रहा, बनी ठनी स्त्रियों घर-घर से निकलने लगीं; थोड़ी ही बेर में गाँव के बाहर और ठौर-ठौर चलती फिरती फुलवारियाँ दिखलाई पड़ीं। बिछिया और पैजनियों की छमाछम, कड़े छड़े और घुँघुरुओं की झनकार से, सोती हुई दिशाएँ भी जाग उठीं-पवन में बीन बजने लगी। झुण्ड की झुण्ड स्त्रियों दक्खिन से उत्तर को जा रही थीं, उनके कोयल से मतवाले करनेवाले कण्ठ से जो गाना हो रहा था, उसको सुनकर योगियों के भी छक्के छूटते थे। स्त्रियों के झुण्ड में कभी-कभी हटो बचो की धुन भी सुनाई देती थी, और देखते-ही-देखते कहार पालकियाँ लिये बहुत ही फुर्ती से इनके बीच से होकर निकल जाते थे। इन पालकियों में गाँव की थोड़े दिन की आयी हुई धनियों की पतोहें और किसी-किसी बड़े धनी के घर की स्त्रियों जाती थीं।

बंसनगर गाँव के उत्तर ओर सरजू नदी अठखेलियाँ करती हुई बह रही है, स्त्रियों का झुण्ड धीरे-धीरे आगे बढ़कर इसी नदी के तीर पर पहुँचा। बंसनगर गाँव के ठीक सामने उस पार चाँदपुर गाँव था। सरजू का ढंग है-सदा अपनी धारों को पलटती रहती है, पर इन दोनों गाँवों के पास की धरती कंकरीली थी, इसलिए इन दोनों गाँवों के बीच वह सदा एक रस बहती-ये दोनों गाँव व्यापार की मण्डी थे। इस पार और उस पार बड़े अच्छे-अच्छे घाट थे। आज दोनों ओर घाट पर स्त्रियों की बड़ी भीड़ है। सरजू नदी कल-कल बह रही है, सूरज की किरणें उसमें पड़कर जगमगा रही हैं, लहर-पर-लहर उठती है-सूरज की किरणों में चमकती है-और फिर सरजू की बहती हुई धार में मिल जाती है। पानी के तल पर मगर, घड़ियाल उतरा और डूब रहे हैं, पाल से उड़ती हुई नाव आ जा रही हैं, छोटी-मोटी डोंगियाँ लहरों में डगमगा रही हैं, और दूसरी बहुत सी नाव घाट के एक ओर पाँती बांधे चुपचाप खड़ी हैं, जब कभी लहरें उठकर घाट से टकराती हैं, एक-एक बार रहकर ये नावें धीरे-धीरे हिल उठती हैं। सरजू तीर पर दोनों पार बहुत से मन्दिर और शिवालय थे, उनमें से बहुतों पर ध्वजा लगी हुई थी, बहुतों पर कलस थे, तीर पर भाँत-भाँत के फूले फले पेड़ थे, और इन सबकी छाया जल में पड़ रही थी। धीरे-धीरे तीर की स्त्रियों की छाया भी जल में पड़ी। जब कभी जल थिर रहता, उस घड़ी दोनों पार पानी के भीतर एक बहुत ही अच्छी बसी हुई बस्ती दिखलायी पड़ती, और जब लहरें उठतीं, पानी के हिलने पर उसमें सिलवटें पड़तीं, उस घड़ी टुकड़े-टुकड़े होकर गाँव उजड़ता दिखलायी देता, और धीरे-धीरे जल में लोप हो जाता। जल में यही सब लीला हो रही है-स्त्रियों नहा धो रही हैं-और उनके गीतों पर सरजू का जल लहरों के बहाने हाथ उठा-उठा कर नाच रहा है-और सारा गाँव सरजू पर खड़ा होकर यह सब लीला देख रहा है।

सरजू के तीर पर पचास स्त्रियों के साथ बासमती खड़ी है, उसके साथ की बहुत सी स्त्रियों नहा-धो चुकी हैं, बहुत सी नहा-धो रही हैं, इसी बीच देवहूती अपनी मौसी और पड़ोस की दूसरी दो स्त्रियों के साथ वहाँ आयी। आते ही न जाने क्या बात हुई जो देवहूती की मौसी और बासमती में बातचीत होने लगी, बासमती के साथ की दो-चार स्त्रियों इनको घेर कर खड़ी हो गयीं। देवहूती के साथवाली पड़ोस की दो स्त्रियों को भी बासमती के साथ की दूसरी दो स्त्रियों ने बातों में फाँसा, और इनमें से भी एक एक को घेरकर बासमती के साथ की पाँच-पाँच, चार-चार स्त्रियों खड़ी हो गयीं। देवहूती आगे बढ़ गयी, ज्यों वह पानी के पास पहुँची, त्यों उसको भी घेरकर बासमती के साथ की बीस-पचीस स्त्रियों खड़ी हो गयीं। उनमें से एक जो देवहूती के जान-पहचान वाली थी, उससे बोली, देवहूती देखो यह कैसा अच्छा फूल है।

देवहूती-हाँ, बहुत अच्छा फूल है, क्या तुमने बनाया है सरला! इसकी पंखड़ियाँ बहुत ठीक उतरी हैं, मैंने पहले इसको बेले का फूल ही समझा था।

सरला-क्या मैं ऐसा फूल बना सकती हूँ-भाभी ने बनाया है। तभी आज इनको पालकी पर चढ़ाकर लिवा लायी हँ। सब से बड़ी बात इसकी महँक है-देखो न! यह फूल कैसा महँकता है!

देवहूती-क्या इसमें महँक भी है? फूल तो बहुतों को बनाते देखा है, पर उसमें महँक भी वैसी ही बना देना, निरी नई बात है।

सरला-देखो न! हाथ कँगन को आरसी क्या?

देवहूती ने हाथ में लेकर फूल सूँघा, सूँघते ही वह अचेत हो गयी, उसके हाथ के कपड़े सरजू में गिर पड़े जो आगे को वह निकले, और इसी बीच अचानक कहारों ने एक पालकी उठायी जिसको लेकर वे सब वहाँ से बड़े वेग से चलते बने। कहारों के पालकी उठाते ही उन्हीं स्त्रियों में से एक स्त्री दूसरी कई एक स्त्रियों के साथ उन्हीं बहते हुए कपड़ों को दिखला कर कहने लगी-हाय! हाय!! यह क्या हुआ, नहाते-नहाते देवहूती कहाँ चली गयी, अरे यह बिना बादलों बिजली कैसे टूट पड़ी! उन सबों का रोना-चिल्लाना सुनकर बासमती ने दूर ही से पूछा-क्या है! क्या है! तुम सब रोती क्यों हो? उन्हीं में से एक ने कहा, अभी नहाने के लिए देवहूती जल में पैठी थी, इसी बीच न जाने कौन जीव उसको पानी में खींच ले गया। यह सुनते ही देवहूती की मौसी और उसके पड़ोस की दोनों स्त्रियों हाय, हाय करते वहाँ दौड़ आयीं। उन्हीं स्त्रियों में से कई एक ने देवहूती के पानी में उतराते हुए कपड़ों को दिखला कर कहा, इन्हीं कपड़ों को फींचने के लिए देवहूती पानी में पैठी थी, अभी नहाने और कपड़ा फींचने भी नहीं पायी थी, इसी बीच घड़ियाल जान पड़ता है, उसको पकड़ ले गया। उस की बातों को सुनकर सब चिल्ला उठीं, देवहूती की मौसी की बुरी गत हुई। वह पछाड़ खाकर धरती पर गिरी, और कहने लगी, मैं बहन से जाकर क्या कहूँगी। बासमती उसकी यह गत देखकर भीतर-ही-भीतर बहुत सुखी हुई, पर ऊपर से दिखलाने के लिए, उसको समझाने-बुझाने लगी। उन सबको रोते चिल्लाते सुनकर दो चार नावें दौड़ीं, कुछ लोग भी पानी में कूदे, सबों ने समझा कोई डूब गया है-पर जब यह सुना कि किसी को घड़ियाल उठा ले गया, उस घड़ी सब हाथ मलकर पछताने लगे-किसी से कुछ न करते बना।

थोड़ी ही बेर में घाट भर में यह बात फैल गयी-देवहूती को घड़ियाल उठा ले गया। बड़ी कठिनाई से डरते-डरते नहा-धोकर देवहूती की मौसी दूसरी स्त्रियों के साथ घर आयी। देवहूती का घड़ियाल के मुँह में पड़ना सुनकर पारबती की जो गत हुई, उसको हम लिखकर नहीं बतला सकते।
 
एक बहुत ही घना बन है, आकाश से बातें करनेवाले ऊँचे-ऊँचे पेड़ चारों ओर खड़े हैं-दूर तक डालियों से डालियाँ और पत्तियों से पत्तियाँ मिलती हुई चली गयी हैं। जब पवन चलती है, और पत्तियाँ हिलने लगती हैं, उस घड़ी एक बहुत ही बड़ा हरा समुद्र लहराता हुआ सामने आता है, बड़, साल और पीपल के पेड़ों की बहुतायत है, पर बीच-बीच में दूसरे पेड़ भी इतने हैं जिससे सारा बन पेड़ों से कसा हुआ है। इस पर बेल, बूटे और झाड़ियों की भरमार, सूरज की किरणें कठिनाई से धरती तक पहुँचती थीं-कहीं-कहीं तो उनका पहुँचना भी कठिन था-वहाँ सदा अंधेरा रहता। एक चौड़ी खोर ठीक बन के बीच से होकर पच्छिम से पूरब को निकली थी, जहाँ पहुँच कर यह खोर लोप होती-वहाँ कुछ दूर तक बन बहुत घना न था। एक घड़ी दिन और है, बन में सर सर छटपट की धुन हो रही है, बरसाऊ बादल आकाश में फैले हुए हैं, पत्तों को खड़खड़ाती हुई बयार चल रही है-धीरे-धीरे सहज डरावना बन और भी डरावना हो रहा है।

जिस खोर की बात हमने ऊपर कही है, उसी खोर से घोड़े पर चढ़ा हुआ एक जन पश्चिम से पूर्व को जा रहा है। मुखड़े पर उमंग झलक रही है, आँखों से जोत निकल रही है, पर माथे में सिलवटें पड़ रही हैं, जिससे जान पड़ता है वह अपने आप कुछ सोच रहा है। घोड़ा बहुत ही धीमी चाल से चल रहा है-पर कान उसके खड़े हैं। कभी-कभी वह चौंक भी उठता है, उस घड़ी उसकी हिनहिनाहट उस सुनसान बन के सन्नाटे को, तोड़ देती है औेर एक बार उसी हिनहिनाइट से सारा बन गूँज उठता है। धीरे-धीरे तानपूरे का मीठा सुर चारों ओर फैलने लगा-साथ ही एक बहुत ही सुरीले गले से गीत गाया जाने लगा। पीछे तानपूरे का मीठा सुर और सुरीले गले की तान मिलकर एक हुई और एक बहुत ही सुहावनी और जी को बेचैन करनेवाली धुन सारे बन में गूँजने लगी। यह धुन धीरे-धीरे ऊपर बयार में उठी, पीछे खोर पर जानेवाले के कानों तक पहुँचा-वह चुपचाप गीत सुनने लगा-गीत यह था-

लावनी

जग का कुछ ऐसा ही है ढंग दिखाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।

जिससे पौधों ने समा निराला पाया।

जिसने बरबस था आँखों को अपनाया।

जिसके ऊपर था जी से भौंर लुभाया।

बहती बयार को भी जिसने महँकाया।

वह खिला सजीला फूल भी है कुम्हलाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।1।

देखा जिसको जग बीच ध्वजा फहराते।

राजे जिसके पाँवों पर शीश नवाते।

सुन करके जिसका नाम बीर घबराते।

जिसकी कीरत सब ओर सभी थे गाते।

कल पड़ा हुआ वह धूल में है बिललाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।2।

पड़ते थे जिसके तीन लोक में डेरे।

यम भी डरता था आते जिसके नेरे।

थे और देवते जितने जिसके चेरे।

काँपता स्वर्ग जिसके आँखों के फेरे।

उस रावण को था गीधा नोच कर खाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।3।

कब तक कितनी हम ऐसी कहें कहानी।

अपने जी में तू समझ सोच रे प्रानी।

क्यों धरम छोड़ कर करता है मनमानी।

तू क्यों बिगाड़ता है अपना पत पानी।

है पल भर में धन जोबन सभी बिलाता।

एक रंग किसी का कभी नहीं दिन जाता।4।

घोड़े पर चढ़ा हुआ कौन जा रहा है, क्या यह बतलाना होगा? ऊपर के गीत को सुनकर आप लोग आप समझ गये होंगे, वह कौन है? जो न समझे हों तो मैं बतलाता हूँ, वह कामिनीमोहन है। ऐसे घने बन में जहाँ सूरज की किरनें भी कठिनाई से जाती हैं, इस भाँत अचानक गीत होता हुआ सुन कर वह सन्नाटे में हो गया, फिर गीत भी ऐसा जो उसके दोनों कानों को भली-भाँत मल रहा था-जो वह सोच रहा था, मानो उसी के लिए उसको जली कटी सुना रहा था। कामिनीमोहन बहुत घबराया, सोचने लगा, बात क्या है! हो न हो दाल में कुछ काला है, पर कोई बात उसकी समझ में न आयी। सोचते-सोचते उसने देखा, वन में पेड़ एक ओर बहुत घने नहीं हैं, गाने की धुन उसी ओर से आ रही थी, गीत अब तक गाया जा रहा था। वह धीरे-धीरे घोड़े पर से उतरा, घोड़े को पेड़ से बाँध और चुपचाप पाँव दबाये उसी ओर चला। ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ने लगा, गीत का गाया जाना रुकने लगा। पथ में एक बहुत ही लम्बा-चौड़ा बड़ का पेड़ था, डालियाँ इस की बहुत दूर तक फैली हुई थीं। और कई सौ जटाएँ डालियों से निकलकर धरती तक आयी थीं। इस पेड़ तक पहुँचते-पहुँचते गीत का गाया जाना रुक गया, सोचने पर जान पड़ा इसी पेड़ के नीचे गीत हो रहा था। कामिनीमोहन यहाँ पहुँच कर बड़ के चारों ओर घूमा, बहुत सी चिड़ियाँ झाड़ियों में से निकलकर ऊपर उड़ गयीं-छोटे-छोटे वन के जीव इधर-उधर भागते दिखाई पडे, पर और कोई कहीं न दिखलायी दिया। कामिनीमोहन का जीवट आप लोग जानते हैं, वह चाहता था, पेड़ पर भी चढ़कर देखें, पर कुछ समझ बूझकर न चढ़ा। उसके हाथ में एक तुपक थी, उसने डर दिलाने के लिए आकाश में उसको चलाया, सन्नाटे में उसकी धुन सारे बन में गूँजी गयी-काँ काँ करते बहुत से कौवे पेड़ पर से उड़ गये-पर और कुछ न हुआ। कामिनीमोहन कुछ घड़ी यहाँ खड़ा न जाने क्या सोचता रहा-पीछे खोर की ओर फिरा।

खोर पर पहुँच कर वह घोड़े पर चढ़ा ही था, इसी बीच उसने फिर तानपूरे की धुन और गाना सुना, अबकी बार तानपूरा बड़ी उमंग से बज रहा था, गाना भी बहुत ऊँचे सुर में हो रहा था, गीत ये थे-

गीत

कितने ही घर हैं पाप ने घाले।

कितने ही के किये हैं मुँह काले।

पाप की बान है नहीं अच्छी।

ओ न पापों से काँपनेवाले।

सोते हो तेल कान में डाले।

धर्म के हैं तुझे पड़े लाले।

नाव डूबेगी बीच धार तेरी।

ओ धरम के न पालनेवाले।

फिर इस भाँत गाना होते सुनकर कामिनीमोहन बहुत चकराया, वह कुछ डरा भी, जी में आया, फिर उस पेड़ तक चलूँ, और उस पर चढ़कर देखूँ क्या बात है, वह घोड़े पर से उतरा भी, पर इसी बीच उसको एक पालकी सामने से आती हुई दिखलायी पड़ी, कहार सब बड़े वेग से पालकी चला रहे थे, पाँच लठधर पालकी के पीछे थे। पालकी के देखते ही कामिनीमोहन का जी उस ओर गया। उसने कहारों से तो कहा ले चलो! ले चलो!! पर जो पाँच लठधर पीछे दौड़ रहे थे, उनमें से एक को पास बुलाया, जो चार रह गये थे, वे सीधे पालकी के साथ गये। जिसको कामिनीमोहन ने पास बुलाया था, जब वह पास आया, तो उसने कहा, कपूर! काम तो तुमने बड़ा किया!

कपूर-मैंने कौन काम किया, जो कुछ किया सो बासमती ने किया, आज वह बड़ी चाल चली।

कामिनीमोहन-हाँ, कहो तो, कैसे क्या-क्या हुआ?

कपूर-आप घोड़े पर चढ़कर धीरे-धीरे चलिए, मैं भी कहता चलता हूँ, नहीं तो कहार सब बहुत आगे बढ़ जावेंगे।

कामिनीमोहन घोड़े पर चढ़ा, धीरे-धीरे आगे बढ़ा, त्योंही बन में तानपूरे के साथ गीत होता हुआ उसको फिर सुनायी पड़ा, अब की बार पूरी-पूरी टीप लग रही थी, पवन में तान की लहर सी फैल रही थी। गीत यह था-

गीत

फिर रहे हो बने जो मतवाले।

तो किसी के पड़ोगे तुम पाले।

जो कसर काढ़ लेगा सब दिन की।

ओ किसी की न माननेवाले।

इस गीत को कपूर भी सुन रहा था। उसने कहा, बाबू! बन में यह आज गाना कैसा हो रहा है? इस ओर मैं बहुत आया-गया हूँ पर इस भाँत गाना होते कभी नहीं सुना।

कामिनीमोहन ने कहा-जान पड़ता है यह जागती हुई धरती है, तभी यहाँ ऐसा गाना सुनाई दे रहा है, नहीं तो और कोई बात तो समझ में नहीं आती-जाने दो इन पचड़ों को, बन ही है-तुम अपनी बात कहो।

कपूर-आपके कहने से जिस भाँत दस-दस पाँच-पाँच दे कर गाँव की पचास स्त्रियों को बासमती ने आपके काम के लिए गाँठा था, आप जानते हैं, बेले के बने हुए फूल में जो अचेत करनेवाली औषधी लगायी गयी थी, उसका भेद भी आपसे छिपा नहीं है। इन्हीं पचास स्त्रियों और बने हुए बेले के फूल ने आपका सब काम कर दिया।

यह कहकर कपूर ने सारी बातें कह सुनायी, पीछे कहा, फूल को सूँघ कर ज्यों देवहूती अचेत हुई त्यों पास की पाँच छ: स्त्रियों ने उसको पकड़ कर एक पालकी में सुला दिया, इसी पालकी में सरला की भौजाई घाट पर आयी थी। कहार सब भी साट में थे। ज्यों देवहूती पालकी में सुलायी गयी, त्यों उन सबों ने पालकी उठा दी। पहले ये सब सीधे सरला की भावज के द्वार पर आये, वहाँ कुछ घड़ी पालकी उतारी, पीछे पालकी को उठाकर कुछ दूर उसको इस भाँत ले चले, जैसे कोई रीती पालकी ले चलता है, गाँव के बाहर आकर वे सब पवन से बातें करने लगे-और अब तक उसी ढंग से चले आ रहे हैं।

कामिनीमोहन-यह तो हुआ, पर क्या इस बात को उसकी मौसी ने नहीं जाना?

कपूर-वह कैसे जानती! जब कहार सब पालकी उठाकर चल दिये, उन्हीं स्त्रियों में से दो एक ने देवहूती के हाथ से गिरकर पानी में बहते हुए कपड़ों को दिखलाकर ऐसी बातें कहीं, जिससे उसकी मौसी के जी में उसके घड़ियाल के मुख में पड़ने की बात ठीक जँच गयी-इस घड़ी सारे गाँव में यह बात फैल गयी है, देवहूती को घड़ियाल उठा ले गया।

कामिनीमोहन-बासमती अच्छी चाल चली-पारबती का कान काट लिया।

कपूर-बात सच है, पर यह स्त्रियों के बीच की बात है, बहुत दिन न छिपेगी।

कामिनीमोहन-न छिपे, काम निकल जाने पर कोई जानकर ही क्या करेगा। मैं देवहूती से ही ऐसी बातें कहलाऊँगा जिस को सुनकर सभी हाथ मलते रह जावेंगे।

कपूर-राम ऐसा ही करे। पर इस घड़ी जो करना है, उस को कीजिए, देखिए पालकी खोर तक पहुँच गयी।

कामिनीमोहन-कहारों से कहो पालकी रख दें।

कपूर ने पुकार कर कहा, कहारों ने पालकी रख दी, और घर की ओर फिरे। अब जो चार लठधर पीछे थे, वे पालकी लेकर वन में धंसे, कपूर ने इन चारों की आँखों पर पट्टी बाँध दी थी। दूर तक वे सब इसी भाँत पालकी लेकर चले-कपूर आगे आगे था। पीछे इन सबों से भी पालकी रखा ली गयी। कपूर साथ-साथ आकर इन सबों को खोर तक पहुँचा गया। यहाँ पहुँचने पर इनकी पट्टी खोल दी गयी-पट्टी खुलने पर ये चारों भी घर फिर आये। कपूर फिर बन में चला गया।
 
बन में जहाँ जाकर खोर लोप होती थी, वहाँ के पेड़ बहुत घने नहीं थे। डालियों के बहुतायत से फैले रहने के कारण, देखने में पथ अपैठ जान पड़ता, पर थोड़ा सा हाथ-पाँव हिलाकर चलने से बन के भीतर सभी घुस सकता। पथ यहाँ भूल-भुलइयाँ की भाँति का था, भूल-भुलइयाँ से बचकर आधा कोस तक सीधे उत्तर मुँह चलने पर कई एक ख्रडहर दिखलायी पड़ते। इन ख्रडहरों के तीन ओर बहुत ही घना बन था। इन ख्रडहरों में एक बहुत बड़ा ख्रडहर था, यह बाहर से देखने पर सब ओर गिरा पड़ा जान पड़ता। पर इसके भीतर एक बहुत ही अच्छा घर था, जिसको हम गुदड़ी का लाल कहेंगे। इस घर का आँगन बहुत ही सुथरा था। कोठे कोठरियाँ बहुत ही चिकनी और बढ़ियाँ थीं, बाहर और भीतर के सब द्वारों में अच्छी-अच्छी किवाड़ियाँ लगी थीं। इस घर के बाहर पाँच बड़े मोटे-मोटे और काले भील पहरा दे रहे थे। इसी घर की एक छोटी कोठरी में, जिसमें एक छोटा सा द्वार लगा है-देवहूती मन मारे चुपचाप एक चटाई पर बैठी है, पास ही एक बढ़िया चौकी पर कामिनीमोहन बैठा है। दो घड़ी रात बीत गयी है, एक पीतल की दीवट पर एक पीतल का चौकोर दीया जल रहा है-दीये में चारों ओर चार मोटी-मोटी बत्तियाँ लगी हैं।

कामिनीमोहन ने देवहूती को चुप देखकर कहा, क्या तुम न मानोगी, देवहूती?

देवहूती-मैं न मानूँगी, तुम मेरा क्या करोगे?

कामिनीमोहन-तुमको मेरी बात माननी पड़ेगी, मैं तुम्हारा सब कुछ कर सकता हूँ। क्या तुम इतना भी नहीं समझती हो, मैंने आज क्या किया! अब तुम्हारी ऐंठ नहीं निबह सकती। इस घड़ी मैं जो चाहूँ करूँ, तुम्हारा किया कुछ नहीं हो सकता। पर रस में मैं विष नहीं घोलना चाहता।

देवहूती-क्या देवी देवते झूठ हैं! क्या परमेश्वर सो गया!! क्या धर्म रसातल को चला गया!! क्या बन-देवियाँ मर गयीं!!! जो तुम ऐसा कहते हो। कभी तुमने किसी सती स्त्री का सत इस भाँति बिगाड़ा है? कामिनीमोहन! ऐसी बात न कहो-नहीं अभी अनर्थ होगा।

कामिनीमोहन-हाँ! ऐसा!!! यह जीवट उस दिन कहाँ था-जिस दिन तू पहली बार मेरे हाथों पड़ी। उस दिन मुझको बातों में फाँसकर तू निकल गयी-पर अब वह दिन दूर गये। ऐसी झाँझ मैंने बहुत देखी है।

देवहूती-उस दिन मैं जो थी, आज भी वही हूँ। उस दिन जो तुम थे, आज भी वही हो। न तुम उस दिन कुछ कर सके-न आज कुछ कर सकोगे। उस दिन तुम्हारे हाथों से बचने के लिए मुझसे जो करते बन पड़ा, मैंने किया, आज जो करते बनेगा, फिर करूँगी। इसपर मुझको धर्म का बल है! देवतों का भरोसा है!! भगवान का सहारा है!!! फिर तुम मुझको क्या धमकाते हो। मुझको मरना होगा, मैं मरूँगी, पर तुम्हारी बात मानकर अपना धर्म न खोऊँगी।

कामिनीमोहन-देवहूती, मैं अपने जी को बहुत सम्हालता हूँ। तुम्हारी इन लगती बातों का ध्यान नहीं करता। पर इतना न बढ़ो। नहीं अभी तुमको जान पड़ेगा-मैं क्या कर सकता हूँ।

देवहूती-कामिनीमोहन, तुम मेरा जी न जलाओ, देखो मेरे पास यह बहुत ही कड़ा विष है-तुम मेरी ओर दो डग बढ़े नहीं और मैं इसको खाकर मरी नहीं-मुझ मरती का तुम क्या कर सकते हो। उस दिन जो मेरे पास विष होता, मैं तेरे सामने रंडियों का सा स्वांग न लाती। तुम्हारी उस दिन की चाल ही ने मुझको अपने पास विष रखना सिखला दिया है।

कामिनीमोहन देवहूती का जीवट देखकर चक्कर में आ गया। उसके ऊपर बहुत कड़ाई करना अच्छा न समझ कर बोला-देवहूती! तुम क्यों मरने के लिए इतना उतारू हो? क्या तुमको अपना जी प्यारा नहीं है? मरने में क्या रखा है, मरने वाले के लिए चारों ओर अंधेरा है।

देवहूती-जो पाप करके मरते हैं, उन्हीं के लिए चारों ओर अंधेरा है। जो धर्म के लिए मरते हैं, उनके लिए सब ओर वह उँजाला है, जिस पर सूरज की आँख भी नहीं ठहरती। मुझको धर्म प्यारा है, अपना जी प्यारा नहीं है। धर्म के लिए मैं जी को निछावर कर सकती हूँ।

कामिनीमोहन-देवहूती! तुम सब बातों में धर्म की दुहाई देती हो, पर क्या यह जानती हो धर्म किसे कहते हैं? काया के कसने में धर्म नहीं है-खाने, पीने सुख भोगने में धर्म है-जिस से जी का बहुत कुछ बोध होता है।

देवहूती-तुम्हारे लिए यही धर्म होगा, पर मैं तो उसी को धर्म समझती हूँ, जिसको हमारे यहाँ की पोथियों ने धर्म बतलाया है, जिसको हमारे बड़े-बूढ़े धर्म मानते आये हैं। तुम्हारा धर्म ऐसा है, तभी न वह काम करते फिरते हो, जिसको चोर और डाकू भी नहीं कर सकते।

कामिनीमोहन-तुम्हारे फूल ऐसे होठों से इतना कड़वी बातें अच्छी नहीं लगतीं देवहूती! अब मैं चोर और डाकू से भी बुरा ठहरा!!!

देवहूती-तुम्हीं सोचो! चोर किसी का धन हर लेते हैं-तो वह धन उसको फिर मिलता है। पर स्त्रियों का जो धन तुम हरते हो, वह उसको फिर इस जनम में कभी नहीं मिलता। डाकू बहुत करते हैं, किसी का जी लेते हैं; पर तुम स्त्रियों का धर्म लेते हो, जो जी से कहीं बढ़कर है। फिर क्या बुरा कहा!!!

कामिनीमोहन-जी की लगावट बुरी होती है! मैं कोई ऐसी बात नहीं कहना चाहता जिससे तुम्हारा जी दुखे; पर तुम जो भला-बुरा मुँह में आता है, कह डालती हो। तुम्हारा जी भी किसी पर आया होता तो तुमको हमारी पीर होती। जिसको काँटा चुभा रहता है; वही पाँव सम्हाल-सम्हाल कर रखता है!

देवहूती-यह तुम कैसे जानते हो। मुझको तुम्हारी पीर नहीं है!! तुम बड़े-बड़े पापों के करने में भी नहीं हिचकते-तुमने न जाने कितनी भोली-भाली स्त्रियों का सत बिगाड़ा है! न जाने कितने घर में फूट का बीज बोया है। न जाने कितने भलेमानसों को मिट्टी में मिलाया है-तो क्या यह सब करके तुम योंही छूटोगे। नहीं, इन सब पापों के पलटे तुमको नरक में बड़ा दुख भोगना पड़ेगा। यह सब समझकर मैं तुमको पापों से बचाना चाहती हूँ-ऐसी बातें कहती हूँ जिससे फिर तुम पाप करने की ओर पाँव न उठाओ। जो मुझको तुम्हारी पीर न होती, मैं ऐसी बात क्यों कहती।

कामिनीमोहन-नरक स्वर्ग कहीं कुछ नहीं है! परमेश्वर भी एक धोखे की टट्टी है!! तुम्हारा न मिलना ही मेरे लिए नरक है। तुम्हारे मिलने पर मैं इसी देह से स्वर्ग में पहुँच जाऊँगा।

जिस घड़ी कामिनीमोहन ने ये बातें कहीं, उस घड़ी सब घरों के साथ-देवहूती की चटाई-कामिनीमोहन की चौकी-घर में और जो कुछ था वे सब-अचानक हिल उठे, और चौथाई घड़ी तक हिलते रहे। यह देखकर देवहूती ने कहा, देखो कामिनीमोहन! तुम्हारी बातें धरती माता से भी न सही गयीं-वह भी काँप उठीं। पहले लोगों ने बहुत ठीक कहा है, जब पाप का भार बढ़ जाता है तभी भूचाल आता है।

कामिनीमोहन-ऐसी ही ऐसी बेजड़ बातें तुम्हारे जी में समायी हैं, तभी तो तुम किसी की नहीं सुनती हो। पाप का भार बढ़ने ही से भूचाल नहीं आता, इस धरती के नीचे आग है, जब वह कुछ जलनेवाली वस्तु पाती है, तो उसमें लवर फूटती है। यह लवर ऊपर निकलना चाहती है, पर धरती की कड़ाई से ऊपर नहीं निकल सकती। उस समय उसका एक धक्का सा धरती के ऊपर लगता है। इसी धाक्के से धरती हिल जाती है-और इसी को भूचाल कहते हैं। पर तुम तो मेरी बात मानती नहीं हो, मैं कहूँ तो क्या कहूँ।

देवहूती-अब मानूँगी! देखिए बहुत मनगढ़ंत अच्छी नहीं होती। अभी धरती काँपी है! अबकी बार छत टूट पड़ेगी।

कामिनीमोहन-भला हो, छत टूट पड़े, तुम्हारे संग मरने में भी सुख है।

देवहूती-जो ऐसे ही मरना है तो किसी भले काम के लिए मरो, इस भाँति मरकर पहुँचने में नरक में भी खलबली पड़ेगी।

कामिनीमोहन-अब इसी भाँति मरूँगा, देवहूती! नित्य के जलने से एक दिन किसी भाँति मर जाना अच्छा है। देखो! मेरे पास लाखों की सम्पत्ति है-बीसों गाँव हैं-पचासों टहलुवे हैं-भाँति-भाँति की फुलवारियाँ हैं-रंग-रंग की चिड़ियाँ हैं-अच्छे-अच्छे खेलौने हैं-सजे सजाये हाथी हैं-पवन से बातें करनेवाले घोड़े हैं-खिली चमेली सी घरनी है-सारे गाँव पर डाँट है-पर मेरा जी इनमें से किसी में नहीं लगता। रात दिन सोते-जागते तुम्हारी ही सूरत रहती है। घड़ी भर भी चैन नहीं पड़ता-फिर मैं इन सबको लेकर क्या करूँगा। मैं इन सबको तुम्हारे ऊपर निछावर करता हूँ, आप भी तुम पर निछावर होता हँ, पर तुम मुझसे जी खोलकर मिलो। जो न मिलोगी देवहूती तो अब किसी भाँत मरना ही अच्छा है।

देवहूती-लाख, करोड़ की सम्पत्ति क्या है! राज मिलने पर भी धर्म नहीं गँवाया जा सकता। महाभारत में भीष्म की कथा पढ़ो, रामायण में जानकी माता को देखो। जहाँ की मिट्टी पवन पानी से ये लोग बने थे, वहीं की मिट्टी पवन पानी से मैं भी बनी हूँ। फिर तुम मुझको धन सम्पत्ति की लालच क्या दिखलाते हो! रहा मरना-जीना यह तुम्हारे हाथ नहीं, जब तुम्हारा दिन पूरा होगा, तुम आप मरोगे। इसके लिए मैं क्या कर सकती हूँ।

कामिनीमोहन-तुमारा जी बड़ा कठोर है देवहूती! मैंने ऐसी रूखी बातें कभी नहीं सुनी, पर जैसे हो मैं तुमको मनाऊँगा। तुम भी यह सोच लो, अब हठ छोड़ने ही में अच्छा है, यहाँ से तुम किसी भाँति बाहर नहीं निकल सकती हो, न यहाँ कोई किसी भाँति आ सकता है। सब भाँति तुम मेरे हाथ में हो, कितने दिन तुम्हारी यह टेक रहेगी; हार कर तुमको मेरी होना ही पड़ेगा। पर आज तुम सारे दिन व्रत रही हो, अब तक भूखी हो, इसपर पहर भर पीछे अभी तुमको चेत हुआ है, जी तुम्हारा झुँझलाया हुआ है, इससे कोई बात तुम्हारे मुँह से सीधी नहीं निकलती। लो अब इस घड़ी मैं जाता हूँ, यह पलँग बिछा हुआ है, तुम इस पर सोओ, कल्ह मैं फिर मिलूँगा, पर मैं जो कहे जाता हूँ उसको भली भाँति सोचना।

जिस घड़ी कामिनीमोहन ने देवहूती से ये बातें कहीं, उसी समय उसको बन के भीतर फिर पहले की भाँति मीठे गले से गीत होता हुआ सुनाई दिया। साथ ही तानपूरा भी वैसे ही मीठे सुर से बज रहा था। गीत यह था-

गीत

मन की जहाँ चौकड़ी न आती।

सूरज की किरण जहाँ न जाती।

है पौन जहाँ नहीं समाती।

घुसने जहाँ डीठ भी न पाती।

वह ईश वहाँ भी है दिखाता।

बिगड़ी सब है वही बनाता।

देवहूती ने इस गीत को सुना, सुनकर बहुत सुखी हुई। और गीत के पूरा होते ही कहा, सुना! कामिनीमोहन।

कामिनीमोहन-हाँ! सुना क्यों नहीं, पर यह बन है, यहाँ ऐसी लीला बहुत हुआ करती है, चाहे तुम कुछ समझो पर इन बातों से तुम्हारा कुछ भला नहीं हो सकता।

यह कहकर कामिनीमोहन चट कोठरी के बाहर हुआ। और बाहर आकर बन के भीलों से कहा, आज बन में रहरह कर यह गीत कैसा हो रहा है। भीलों ने कहा-बाबू हम लोगों की समझ में भी कोई बात नहीं आती। अच्छा हम दो जन जाते हैं, खोज लगाते हैं। यह कहकर दो भील बन के भीतर घुस गये-और विचार में डूबा हुआ कामिनीमोहन घर के भीतर आया।
 
धीरे-धीरे रात बीती, भोर हुआ, बादलों में मुँह छिपाये हुए पूर्व ओर सूरज निकला-किरण फूटी। पर न तो सूरज ने अपना मुँह किसी को दिखलाया, न किरण धरती पर आयी। कल की बातें जान पड़ती हैं, इनको भी खल रही थीं। काले-काले बादलों की ओट में चुपचाप दिन चढ़ने लगा, धीरे-धीरे पहर भर दिन आया। देवहूती जिस छोटी कोठरी में रात बैठी थी-अब तक उसी में बैठी है। कल दिन रात भूखी रही-आज भोर ही नहा धोकर कुछ खाना-पीना चाहिए था। पर उसने अभी मुँह तक नहीं धोया। रात भी उसकी जागते ही बीती, आँखें चढ़ी हैं-मुखड़ा खिंचा हुआ है-पर घबराहट का उस पर नाम तक नहीं था-वह जैसी गम्भीर पहले रहती-अब भी थी। बासमती देवहूती के पास सब ठौर पहुँचा करती-आज यहाँ भी पहुँची। देवहूती को चुपचाप बैठे देखकर बोली-बेटी! तुम कब तक इस भाँति बैठी रहोगी? कल का दिन व्रत में बीता, आज अभी तुमने मुँह तक नहीं धोया, जो होना होगा, होगा, तुम अन्न पानी क्यों छोड़ती हो?

देवहूती-अभी एक बार धोखा खा चुकी हूँ-और उसका फल भी भुगत रही हूँ-क्या अबकी बार फिर किसी दूसरे फँदे में फँसाना है-जो तुम ऐसी चिकनी-चुपड़ी बातें कहती हो, जिसका फूल सूँघकर मेरी सुधबुध खो गयी, उसका अन्न पानी खा पीकर न जाने कौन गत होगी!!! बासमती! तुम क्यों इस भाँति मेरे पीछे पड़ी हो?

बासमती-बेटी! तू मेरी आँखों की पुतली है, मैं तेरे पीछे क्यों पड़ूँगी। तेरा दुख मुझसे देखा नहीं जाता, तेरी आँखों से आँसू गिरते देखकर मेरा कलेजा फटता है-तब मैं इस भाँति दौड़कर तेरे पास आती हूँ; नहीं तो मुझको इन पचड़ों से क्या काम था। पर मेरा भाग्य बड़ा खोटा है। मैं जिसके लिए चोरी करती हूँ-वही मुझको चोर कहता है।

देवहूती-मैं तुमको भली-भाँति जानती हूँ बासमती! बहुत लल्लो-पत्तो अच्छा नहीं होता, तुम अपना काम करो, मेरे भाग्य में जो होना होगा-होगा। मैं तुम्हारी कोई नहीं हूँ-पर तुम मुझपर इतना प्यार जतलाती हो, जितना कोई अपनी बेटी-बेटे का भी नहीं करता। तुम्हारी ये बातें ऐसी हैं, जो तुम्हारे पेट का भेद बतलाये देतीहैं।

बासमती-बेटी! तुम कहोगी क्या! कलयुग है न!!! अब के लड़के-लड़कियाँ ऐसी ही हैं। हम लोग तो बड़ी सीधी हैं! गाँव के लड़के-लड़की को अपना समझती हैं-दूसरों के लड़कों को अपने लड़के से भी बढ़कर प्यार करती हैं। हम लोगों का जैसा भीतर है, वैसा ही बाहर है, हम लोग कपट करना क्या जानें।

देवहूती-ठीक है! दूसरे के घर की बहू बेटी को बिगाड़ना, भोली-भाली स्त्रियों को ठगकर कुचाली पुरुषों के हाथ में डाल देना, तुम ऐसी सीधी सतयुग की स्त्रियों का काम थोड़े ही है-यह तो कलयुग की स्त्रियों का काम है। बासमती! मेरा बड़ा भाग्य है-जो आज मैं यह जान गयी-नहीं तो मेरा मन तुम्हारे ऊपर न जाने कितना कुढ़ता था।

बासमती-बेटी! तुम अभी कल की लड़की हो-बहुत मत उड़ो। तुम्हारा मन मेरे ऊपर कुढ़ता है-कुढे, पर मेरा मन तो तुम से नहीं कुढ़ता! मैं वही बात कहती हूँ, जिसमें तुम्हारा भला हो, पर उसको मानना तुम्हारे हाथ है।

देवहूती-मेरा बड़ा अभाग्य है! जो मैं इस बात को नहीं समझती हूँ। सच है बासमती! तुमसे बढ़कर मेरा भला चाहने वाला कौन होगा!!!

बासमती-तुम्हारी ऐंठने की बान है-इससे तुम सब बातों में ऐंठती हो। मेरी अच्छी बात भी तुमको खोटी जान पड़ती है। पर सचमुच तुम्हारा बड़ा अभाग्य है, जो तुम इस भाँति सोने को पाँव दिखलाती हो, कामिनीमोहन ऐसा चाहनेवाला भाग्य से मिलता है। डुबकी बहुत लोग लगाते हैं-पर मोती कोई पाता है। कामिनीमोहन पर कितनी स्त्रियों निछावर हुईं, पर कामिनीमोहन तुपमर आप निछावर है। इस पर लाखों की सम्पत्ति आगे रखता है-सदा के लिए तुम्हारा दास बनता है-क्या ये बातें ऐसी हैं-जिनपर तुम डीठ न डालो। पर मिठाई खाने के लिए भी मुँह चाहिए। भील की स्त्रियों घुंघची का ही आदर करती हैं-वे लाल का मरम क्या जानें।

देवहूती-सच कहा, बासमती! बनरी के गले में मोती की माला नहीं सोहती!!! पर कठिनाई तो यह है-इसपर भी मेरा जी नहीं छूटता।

बासमती-मुँह मत चिढ़ाओ बेटी! मेरी बातों को अपने जी में सोचो। क्या तुम्हारा यह जोबन सदा ऐसा ही रहेगा? क्या आँखें ऐसी ही रसीली रहेंगी? क्या गोरे-गोरे मुखड़े पर ऐसी ही छटा रहेगी? क्या देह ऐसी ही चिकनी-चुपड़ी रहेगी? क्या चितवन में सदा ऐसा ही टोना रहेगा? कभी नहीं!!! कुछ ही दिनों में, जोबन ढल जावेगा, आँखों में काली लग जायेगी, गालों में गड़हे पड़ेंगे, मोती ऐसे दाँत मिट्टी में मिलेंगे, देह पर झुर्रियाँ पड़ जाएँगी, और तुम्हारी सब ऐंठ धूल में मिल जावेगी। आज एक राजाओं सा धनी, देवतों सा सुघर और सजीला, तुम्हारी सीधी चितवन का भिखारी है। पर कुछ दिनों पीछे तुम्हारी ओर एक गया, बीता भी आँख उठाकर न देखेगा-जो धोखे से किसी की आँख पड़ भी जावेगी-तो वह नाक भौंह सिकोड़ने लगेगा। तुम्हारे ये दिन सब कुछ हैं-आगे क्या है-पर तुम इन्हीं दिनों विष खाने बैठी हो-बलिहारी है इस समझ की।

देवहूती-ठीक कहती हो बासमती! जो मैं इन्हीं दिनों कुछ कमा-धमा न लूँगी, तो आगे फिर कौन पूछेगा!!! अब तक रूप और जीवन बेंचते रंडियों ही को सुना था। पर आज जाना, भले घर की बहू बेटियाँ-भली स्त्रियों-भी अपना रूप जोबन बेंचती हैं। झख मारते हैं लोग जो रंडियों को बुरा समझते हैं।

बासमती-बहुत न बढ़ो! बहुत सी भले घर की बहू बेटियाँ देखी हैं। वह कौन स्त्री है जो कामिनीमोहन जैसे अलबेले जवान को देखकर उसकी नहीं होती। जिनकी लाखों की सम्पत्ति है, जिनका काम ऐसा सुन्दर पति है, मैं उनकी बातें कहती हूँ। जो तुम्हारी ऐसी हैं-वे किस गिनती में हैं। तुम्हारे पास न तो जैसे चाहिए वैसे गहने कपड़े हैं-न पूरा-पूरा धन है-न तुम्हारे पति का ही कहीं ठौर ठिकाना है। पर तुम इन बातों को न समझ कर उलटे मुझी से इठलाती हो-भाग्य का फेर इसी को कहतेहैं।

देवहूती-अब समझूँगी बासमती! भला तुम्हारे ऐसी समझानेवाली कहाँ मिलेगी! पर तुम भी समझो, जो सचमुच भले घर की बहू बेटी हैं! जो कहने-सुनने को भली स्त्री नहीं हैं! जो पहनने को उसके पास कपड़ा तक न हो-हाथ में चूड़ी तक न हो-खाने को दो-दो दिन पीछे मिलता हो-पति भी निकम्मा और निखट्टू हो-तो भी वह अपनी मरजाद नहीं गँवा सकती-अपना सत नहीं बिगाड़ सकती-और अपना धर्म नहीं खो सकती। जिसको रत्ती भर समझ होगी-वह थोड़े से सुख के लिए सदा नरक की आग में जलना अच्छी न समझेगी। तुम कहती हो, यह जोबन सदा ऐसा ही न रहेगा, जोबन ढल जाने पर कोई सीधे आँख उठा कर न देखेगा-इस से पाया जाता है, जब तक जोबन है, तभी तक पूछ है, पीछे घोर अंधियाला है। तो क्या ये ही बातें ऐसी हैं-जिससे जोबन के दिनों में जी खोलकर मनमानी करनी चाहिए? आँख मँद कर पाप पुण्य का विचार छोड़ देना चाहिए? ये बातें तो ऐसी नहीं हैं!!! ये बातें तो हमको और डराती हैं, डंका बजाकर कहती हैं, चार दिन के जोबन पर मत भूलो, पाप मत कमाओ, यह जोबन बाढ़ के पानी की भाँति देखते-देखते निकल जावेगा, फिर पछताना ही हाथ रहेगा। इससे पहले ही समझ बूझकर चलो, जो रंग इतना कच्चा है, उसके भरोसे पाप करना अच्छा नहीं!

बासमती-जान पड़ा बेटी! तुम नरक स्वर्ग का भेद भली-भाँति समझती हो, धर्म का मरम भी जानती हो, पर यह तो बतलाओ-अपने को आप मार देना किस पोथी में पुण्य लिखा है? क्या विष खाकर मर जाना पाप नहीं है?

देवहूती-जो मैं ऐसा न समझती, विष खाकर कभी मर गयी होती। मुझको जीना भी भारी है, पर मैं जो अब तक विष खाकर नहीं मरी, क्या उसका दूसरा कारण है? नहीं, दूसरा कारण नहीं है! मैं जानती हूँ, मेरे यहाँ की पोथियों में ऐसा करना बड़ा पाप लिखा है, तभी मैं आज तक ऐसा न कर सकी। पर धर्म की रक्षा के लिए किसी काम का करना पाप नहीं है। जब मैं देखूँगी मेरा धर्म जाता है-पापी के हाथ से अब छुटकारा नहीं मिलता, उस दिन के लिए विष मेरे पास है। उस घड़ी मैं विष खाऊँगी, और विष खाकर अपने धर्म की रक्षा करूँगी।

बासमती-यह तो विष का पचड़ा हुआ-पर अन्न पानी छोड़कर जी को कलपा-कलपा कर मारना क्या है? यह कोई पुण्य होगा?

देवहूती-नहीं, यह भी पाप है! पर अन्न पानी कौन छोड़ता है। यहाँ दो चार दिन मैं अन्न-पानी न खाऊँगी तो क्या मैं अन्न-पानी खाऊँगी ही नहीं? ऐसा तुम समझ सकती हो-मेरा यह विचार नहीं है। मुझको यहाँ अन्न-पानी खाने-पीने में भी कोई अटक नहीं है, पर क्या करूँ, अब तुम लोगां की परतीत नहीं रही।

बासमती-जो जी में आवे करो, जब तुमको अपनी ही बात रखनी है, तो मैं कहाँ तक कहँ। पर बहुत हठ अच्छा नहीं होता, यहाँ से तुम्हारा छुटकारा अब कभी नहीं हो सकता-दो चार दिन नहीं, दो चार बरस में भी यहाँ कोई नहीं पहुँच सकता। पर मुझसे रहा नहीं जाता, एक बात मैं फिर कहती हूँ। जो तुम यहाँ का अन्न-पानी काम में नहीं ला सकती हो, तो क्या बनफल और झरनों का पानी भी खा-पी नहीं सकती हो?

देवहूती-जो मेरे जी में आवेगा, मैं करूँगी। अपना प्राण सब को प्यारा होता है-पर तुम किसी भाँति मेरी आँखों के सामने से दूर हो।

बासमती-बेटी! जितना तुम टेढ़ी हो, मैं उतनी टेढ़ी नहीं हूँ। जो तुमको मेरा यहाँ रहना अच्छा नहीं लगता तो मैं जाती हूँ। मैं पहरे के भीलों से कहे जाती हूँ-वह तुमको बन में जाने से न रोकेंगे। तुम बन में जाकर अपनी भूख-प्यास बुझा आओ। पर भागना मत चाहना, नहीं तो भीलों के हाथ से दुख उठाओगी। यह कहकर बासमती चली गयी।
 
Back
Top