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देवहूती और उसकी मौसी के घर के ठीक पीछे भीतों से घिरी हुई एक छोटी सी फुलवारी है। भाँत-भाँत के फूल के पौधे इसमें लगे हुए हैं, चारों ओर बड़ी-बड़ी क्यारियाँ हैं, एक-एक क्यारी में एक-एक फूल है-फुलवारी का समाँ बहुत ही निराला है। जो बेले पर अलबेलापन फिसला जाता है, तो चमेली की निराली छबि कलेजे में ठण्डक लाती है। नेवारी ने ही आँखों की काई नहीं निवारी है-जूही के लिए भी फुलवारी में तू ही तू की धुम है। कुन्द मुँह खोले हँस रहा है, सेवती फूली नहीं समाती। हरसिंगार की आनबान, केवड़े की ऐंठ, सूरजमुखी की टेक, केतकी का निराला जोबन, मोगरे की फबन, चंपे की चटक, मोतिये की अनूठी महँक-सब एक-से-एक बढ़कर हैं। इन फूल के पेड़ों से दूर जहाँ क्यारियाँ निबटती हैं-फूलों के छोटे-छोटे पौधे थे-इनके पीछे हरे-भरे केले के पेड़ अकड़े खड़े थे, जिनके लम्बे-लम्बे पत्ते बयार लगने से धीरे-धीरे हिल रहे थे। इन सबके पीछे फुलवारी की भीत थी, और उसके नीचे एक बहुत ही लम्बी चौड़ी खाई थी, खाई में जल भरा हुआ था, कई ओर कमल खिले हुए थे।
इस फुलवारी के बीच में एक पक्का चौतरा है, इस पर पारबती और देवहूती बैठी हुई हैं। भोर हो गया है, सूरज की सुनहली किरणें चारों ओर छिटक रही हैं। एक भौंरा एक फूल पर गूँज रहा है। गूँजता-गूँजता ठीक फूल की सीधा में आता है, ठिठकता है, सिकुड़े हुए पाँवों को फैलाकर फूल की ओर झुकता है। फिर ठिठकता है। और पहले की भाँत चक्कर लगा कर झूमने लगता है। कितने क्षण यों ही गूँजता रहा, फिर पंख समेट कर उस पर बैठ गया। कुछ बेर चुपचाप उसका रस पीता रहा। फिर अधरुँधे गले से भन्न-भन्न करने लगा। इस के पीछे गूँजता हुआ उसपर से उड़ गया। अब दूसरे फूल के पास गया, पहले इसके भी चारों ओर गूँजता रहा, फिर उसी भाँत इस पर बैठा, रस लिया, भन्नभन्न बोला, फिर गूँजता हुआ इस पर से भी उड़ गया। पारबती और देवहूती के देखते-देखते यह बीसियों फूल पर गया, पर इसका मन न भरा। धीरे-धीरे वह और फूलों पर जाकर गूँजता और रस लेता रहा। पर जिस फूल पर से एक बार वह रस लेकर उड़ा उसके पास फिर न गया।
पारबती ने कहा-देवहूती! इस भौंरे को देखती हो? जो गत इसकी है, ठीक वही कुचाली पुरुषों की है। वह अपने रस के लिए इधर-उधर चक्कर लगाते फिरते हैं। भोली-भाली स्त्रियों को झूठी-मूठी बातें बना कर ठगते हैं। जब काम निकल जाता है फिर उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखते।
मीठे सुर से हमी लोग नहीं रीझते। चिड़ियाँ ही इसको सुनकर नहीं मतवाली बनतीं। कीड़े-मकोड़े ही पर इसका रंग नहीं जमता। यह पेड़ों तक को मोह लेता है। जो अच्छा बाजा मीठे सुर से बजता हो और पास ही कोई फूल का पौधा रखा हो, तो देखोगी उसकी पत्तियाँ सगबगा उठीं। उसका हरा रंग और गहरा हो गया। फूल खिल गये और उस पर जोबन छा गया। इसीलिए भौंरा आते ही फूल पर नहीं बैठ जाता। कुछ घड़ी फूल के आस पास गूँजता है। या अपनी मीठी गूँज से उसके रस को उभाड़ता है। और तब उस पर रस लेने के लिए बैठता है।
एक छोटा-सा कीड़ा जो अपना काम निकालने के लिए इतना कुछ कर सकता है-रस पाने के लिए जो वह ऐसी दूर की चाल चल सकता है, तो अपना काम निकालने के लिए मनुष्य क्या नहीं कर सकता। जिस स्त्री को वह फँसाना चाहता है, उसका सामना होने पर वह कहता है, तुम मेरी आँखों की पुतली हो, मेरे प्राण की प्यारी हो, तुमको देखकर मेरे कलेजे में ठण्डक होती है, जी में आनन्द की धारा बहती है। तुम्हीं से मेरा जीना है। तुम्हीं से मेरे अंधेरे जी में उँजाला है। जब तक आँखों के सामने रहती हो, समझता हूँ स्वर्ग में बैठा हूँ। आँखों से ओझल होते ही मुझ पर बिजली-सी टूट पड़ती है। जब उसके पास चीठी भेजता है, लिखता है-तुम्हारे बिना मेरा कलेजा जल रहा है। अनजान में ही न जाने कैसी एक पीर सी हो रही है। खाना-पीना कुछ नहीं अच्छा लगता। दिन-रात का कटना पहाड़ हो गया है। चारों ओर सूना लगता है। जी को न जाने कैसी एक चोट सी लग गयी है, हम सच कहते हैं जो तुम न मिलोगी, हम कभी न जीयेंगे। तुम्हारे बिना हमारा है कौन? हम जानते हैं तुम्हीं को, नाम जपते हैं तुम्हारा ही, जग में जहाँ देखते हैं, तुम्हीं को देखते हैं। खाते-पीते उठते-बैठते सूरत तुम्हारी ही रहती है। हम रहते हैं कहीं, पर मन हमारा तुम्हारे ही पास रहता है। उसकी सिखायी पढ़ायी कुटनियाँ आती हैं, तो कहती हैं-बहू तुम्हारा कलेजा न जाने कैसा है, पत्थर भी पसीजता है। पर कितनाहू कहो, तुम नहीं मानती हो। वह तुम्हारे लिए मर रहे हैं, पड़े तड़पते हैं, आठ आठ आँसू रोते हैं, खाना-पीना तक छूट गया है, पर तुम्हारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। भला इतना भी किसी को सताते हैं! जी की लगावट अपने हाथ नहीं, जो किसी भाँत तुम पर उनका जी आ गया, तो तुमको इतना कठोर न होना चाहिए। सबका सब दिन एक ही सा नहीं बीतता। क्या यह जोबन सदा ऐसा ही रहेगा? फिर थोड़े दिनों के लिए इतना क्यों इतराती हो? प्यासे ही को पानी पिलाया जाता है। भूखे ही को दो मूठी अन्न दिया जाता है। फिर न जाने, क्यों तुम इन बातों को नहीं समझती हो। इतना ही नहीं, गहने-कपड़े, रुपये-पैसे की अलग लालच दी जाती है। कभी-कभी हाथ जोड़ने और नाक रगड़ने से भी काम लिया जाता है। तलवे की धूल तक सर पर रख ली जाती है। पर ये सब धोखेधड़ी की बातें हैं। छल और कपट इन बातों में कूट-कूट कर भरा रहता है। सचाई और भलमनसाहत की इनमें गन्ध तक नहीं होती।
जिसकी हम भगवान के घर से हैं, जिसके लिए हम बनी हैं, जो हमारा जनम-संघाती है, आँखों की पुतली हम हैं तो उसकी, प्राणों की प्यारी हैं तो उसी की। हमारे लिए तड़प सकता है, आँसू बहा सकता है, खाना पीना छोड़ सकता है, जी सकता है, मर सकता है तो वही। जो ये सब गुण उसमें न हों तो भी जो कुछ है हमारा वही है। कहाँ तक वह हमारे काम न आवेगा। जो वह हमको छोड़ दे, जो ऐसा संयोग आन पड़े जिससे जन्म भर फिर उसके मिलने की आस न हो; तो भी उसी के नाम के सहारे हमको अपना दिन काट देना चाहिए। ऐसा होने पर यहाँ वहाँ हमारी और जैजैकार होगी। दूसरा हमारा कौन है? जिसकी परछाहीं पड़ते ही हमारा जनम बिगड़ता है, लोगों को मुँह दिखाना कठिन होता है, उससे हमको किस भलाई की आस हो सकती है? गहने कपड़े, रुपये पैसे देह और हाथ के मैल हैं! इनके पलटे क्या सतीपन ऐसा रतन मिट्टी में मिलाया जा सकता है!!! गहने कपड़े, रुपये पैसे फिर मिल सकते हैं, पर जब स्त्री का सतीपन एक बेर बिगड़ जाता है, तो वह इस जनम में फिर कभी हाथ नहीं आता। ऐसी दशा में क्या कोई भलेमानस स्त्री, क्या कोई अच्छे घर की बहू बेटी, गहने कपड़े, रुपये पैसे के लालच से अपना सतीपन गँवा सकती है?
हमने देखा है बहुत सी भोलीभाली स्त्रियों कुचाली पुरुषों के फंदे में फँस गयी हैं औेर उनका जनम बिगड़ गया है। ऐसे पुरुषों के हाथ जो स्त्रियों पड़ीं अपने पति के साथ फिर उनका अच्छा बरताव नहीं होता। यह एक मोटी बात है। जब अच्छा बरताव न होगा, पतिे का भी वह नेह उस स्त्री में न रह जावेगा। जब ये बातें हुईं, फूट की नींव पड़ी। जब फूट की नींव पड़ी, घर नरक हुआ, फिर सुख से दिन नहीं कट सकता, जिससे बढ़कर दुख की बात कोई हो नहीं सकती। तो क्या थोड़े से सुख के लिए एक अनजान नीच, खोटे और कुचाली पुरुष के लिए अपना घर यों बिगाड़ देना चाहिए? और जो कहीं कोई रोग लग गया, क्योंकि ऐसे पुरुष रोग से भरे रहते हैं, तो सब सत्यनाश हुआ। रोग ने देह में घर किया, लड़के बालों से मुँह मोड़ना पड़ा। जो लड़के बाले हुए भी, तो पहले तो जीते नहीं, जो जीये तो वह भी जनम भर झींखते रहे। कहीं किसी ने देख सुन लिया तो भी वही बात हुई। जग में नीचा अलग देखना पड़ता है और आँख तो किसी के सामने ऊँची हो ही नहीं सकती। ये तो यहाँ की बातें हुईं। वहाँ जो भगवान इस बुरे काम का पलटा देंगे सुरत करने से भी रोंगटे खड़े होते हैं।
पारबती इतना कहकर चुप हो गयी और देवहूती के मँह की ओर देखने लगी। उसने देखा, उसके मुखड़े पर एक अनूठी ललाई झलक रही है, आँखों से जीत फूट रही है और वह बहुत ही धीरी पूरी जान पड़ती है। पारबती यह देखकर मन-ही-मन बहुत सुखी हुई। इसके पीछे दोनों वहाँ से उठकर चली गयीं।
इस फुलवारी के बीच में एक पक्का चौतरा है, इस पर पारबती और देवहूती बैठी हुई हैं। भोर हो गया है, सूरज की सुनहली किरणें चारों ओर छिटक रही हैं। एक भौंरा एक फूल पर गूँज रहा है। गूँजता-गूँजता ठीक फूल की सीधा में आता है, ठिठकता है, सिकुड़े हुए पाँवों को फैलाकर फूल की ओर झुकता है। फिर ठिठकता है। और पहले की भाँत चक्कर लगा कर झूमने लगता है। कितने क्षण यों ही गूँजता रहा, फिर पंख समेट कर उस पर बैठ गया। कुछ बेर चुपचाप उसका रस पीता रहा। फिर अधरुँधे गले से भन्न-भन्न करने लगा। इस के पीछे गूँजता हुआ उसपर से उड़ गया। अब दूसरे फूल के पास गया, पहले इसके भी चारों ओर गूँजता रहा, फिर उसी भाँत इस पर बैठा, रस लिया, भन्नभन्न बोला, फिर गूँजता हुआ इस पर से भी उड़ गया। पारबती और देवहूती के देखते-देखते यह बीसियों फूल पर गया, पर इसका मन न भरा। धीरे-धीरे वह और फूलों पर जाकर गूँजता और रस लेता रहा। पर जिस फूल पर से एक बार वह रस लेकर उड़ा उसके पास फिर न गया।
पारबती ने कहा-देवहूती! इस भौंरे को देखती हो? जो गत इसकी है, ठीक वही कुचाली पुरुषों की है। वह अपने रस के लिए इधर-उधर चक्कर लगाते फिरते हैं। भोली-भाली स्त्रियों को झूठी-मूठी बातें बना कर ठगते हैं। जब काम निकल जाता है फिर उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखते।
मीठे सुर से हमी लोग नहीं रीझते। चिड़ियाँ ही इसको सुनकर नहीं मतवाली बनतीं। कीड़े-मकोड़े ही पर इसका रंग नहीं जमता। यह पेड़ों तक को मोह लेता है। जो अच्छा बाजा मीठे सुर से बजता हो और पास ही कोई फूल का पौधा रखा हो, तो देखोगी उसकी पत्तियाँ सगबगा उठीं। उसका हरा रंग और गहरा हो गया। फूल खिल गये और उस पर जोबन छा गया। इसीलिए भौंरा आते ही फूल पर नहीं बैठ जाता। कुछ घड़ी फूल के आस पास गूँजता है। या अपनी मीठी गूँज से उसके रस को उभाड़ता है। और तब उस पर रस लेने के लिए बैठता है।
एक छोटा-सा कीड़ा जो अपना काम निकालने के लिए इतना कुछ कर सकता है-रस पाने के लिए जो वह ऐसी दूर की चाल चल सकता है, तो अपना काम निकालने के लिए मनुष्य क्या नहीं कर सकता। जिस स्त्री को वह फँसाना चाहता है, उसका सामना होने पर वह कहता है, तुम मेरी आँखों की पुतली हो, मेरे प्राण की प्यारी हो, तुमको देखकर मेरे कलेजे में ठण्डक होती है, जी में आनन्द की धारा बहती है। तुम्हीं से मेरा जीना है। तुम्हीं से मेरे अंधेरे जी में उँजाला है। जब तक आँखों के सामने रहती हो, समझता हूँ स्वर्ग में बैठा हूँ। आँखों से ओझल होते ही मुझ पर बिजली-सी टूट पड़ती है। जब उसके पास चीठी भेजता है, लिखता है-तुम्हारे बिना मेरा कलेजा जल रहा है। अनजान में ही न जाने कैसी एक पीर सी हो रही है। खाना-पीना कुछ नहीं अच्छा लगता। दिन-रात का कटना पहाड़ हो गया है। चारों ओर सूना लगता है। जी को न जाने कैसी एक चोट सी लग गयी है, हम सच कहते हैं जो तुम न मिलोगी, हम कभी न जीयेंगे। तुम्हारे बिना हमारा है कौन? हम जानते हैं तुम्हीं को, नाम जपते हैं तुम्हारा ही, जग में जहाँ देखते हैं, तुम्हीं को देखते हैं। खाते-पीते उठते-बैठते सूरत तुम्हारी ही रहती है। हम रहते हैं कहीं, पर मन हमारा तुम्हारे ही पास रहता है। उसकी सिखायी पढ़ायी कुटनियाँ आती हैं, तो कहती हैं-बहू तुम्हारा कलेजा न जाने कैसा है, पत्थर भी पसीजता है। पर कितनाहू कहो, तुम नहीं मानती हो। वह तुम्हारे लिए मर रहे हैं, पड़े तड़पते हैं, आठ आठ आँसू रोते हैं, खाना-पीना तक छूट गया है, पर तुम्हारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। भला इतना भी किसी को सताते हैं! जी की लगावट अपने हाथ नहीं, जो किसी भाँत तुम पर उनका जी आ गया, तो तुमको इतना कठोर न होना चाहिए। सबका सब दिन एक ही सा नहीं बीतता। क्या यह जोबन सदा ऐसा ही रहेगा? फिर थोड़े दिनों के लिए इतना क्यों इतराती हो? प्यासे ही को पानी पिलाया जाता है। भूखे ही को दो मूठी अन्न दिया जाता है। फिर न जाने, क्यों तुम इन बातों को नहीं समझती हो। इतना ही नहीं, गहने-कपड़े, रुपये-पैसे की अलग लालच दी जाती है। कभी-कभी हाथ जोड़ने और नाक रगड़ने से भी काम लिया जाता है। तलवे की धूल तक सर पर रख ली जाती है। पर ये सब धोखेधड़ी की बातें हैं। छल और कपट इन बातों में कूट-कूट कर भरा रहता है। सचाई और भलमनसाहत की इनमें गन्ध तक नहीं होती।
जिसकी हम भगवान के घर से हैं, जिसके लिए हम बनी हैं, जो हमारा जनम-संघाती है, आँखों की पुतली हम हैं तो उसकी, प्राणों की प्यारी हैं तो उसी की। हमारे लिए तड़प सकता है, आँसू बहा सकता है, खाना पीना छोड़ सकता है, जी सकता है, मर सकता है तो वही। जो ये सब गुण उसमें न हों तो भी जो कुछ है हमारा वही है। कहाँ तक वह हमारे काम न आवेगा। जो वह हमको छोड़ दे, जो ऐसा संयोग आन पड़े जिससे जन्म भर फिर उसके मिलने की आस न हो; तो भी उसी के नाम के सहारे हमको अपना दिन काट देना चाहिए। ऐसा होने पर यहाँ वहाँ हमारी और जैजैकार होगी। दूसरा हमारा कौन है? जिसकी परछाहीं पड़ते ही हमारा जनम बिगड़ता है, लोगों को मुँह दिखाना कठिन होता है, उससे हमको किस भलाई की आस हो सकती है? गहने कपड़े, रुपये पैसे देह और हाथ के मैल हैं! इनके पलटे क्या सतीपन ऐसा रतन मिट्टी में मिलाया जा सकता है!!! गहने कपड़े, रुपये पैसे फिर मिल सकते हैं, पर जब स्त्री का सतीपन एक बेर बिगड़ जाता है, तो वह इस जनम में फिर कभी हाथ नहीं आता। ऐसी दशा में क्या कोई भलेमानस स्त्री, क्या कोई अच्छे घर की बहू बेटी, गहने कपड़े, रुपये पैसे के लालच से अपना सतीपन गँवा सकती है?
हमने देखा है बहुत सी भोलीभाली स्त्रियों कुचाली पुरुषों के फंदे में फँस गयी हैं औेर उनका जनम बिगड़ गया है। ऐसे पुरुषों के हाथ जो स्त्रियों पड़ीं अपने पति के साथ फिर उनका अच्छा बरताव नहीं होता। यह एक मोटी बात है। जब अच्छा बरताव न होगा, पतिे का भी वह नेह उस स्त्री में न रह जावेगा। जब ये बातें हुईं, फूट की नींव पड़ी। जब फूट की नींव पड़ी, घर नरक हुआ, फिर सुख से दिन नहीं कट सकता, जिससे बढ़कर दुख की बात कोई हो नहीं सकती। तो क्या थोड़े से सुख के लिए एक अनजान नीच, खोटे और कुचाली पुरुष के लिए अपना घर यों बिगाड़ देना चाहिए? और जो कहीं कोई रोग लग गया, क्योंकि ऐसे पुरुष रोग से भरे रहते हैं, तो सब सत्यनाश हुआ। रोग ने देह में घर किया, लड़के बालों से मुँह मोड़ना पड़ा। जो लड़के बाले हुए भी, तो पहले तो जीते नहीं, जो जीये तो वह भी जनम भर झींखते रहे। कहीं किसी ने देख सुन लिया तो भी वही बात हुई। जग में नीचा अलग देखना पड़ता है और आँख तो किसी के सामने ऊँची हो ही नहीं सकती। ये तो यहाँ की बातें हुईं। वहाँ जो भगवान इस बुरे काम का पलटा देंगे सुरत करने से भी रोंगटे खड़े होते हैं।
पारबती इतना कहकर चुप हो गयी और देवहूती के मँह की ओर देखने लगी। उसने देखा, उसके मुखड़े पर एक अनूठी ललाई झलक रही है, आँखों से जीत फूट रही है और वह बहुत ही धीरी पूरी जान पड़ती है। पारबती यह देखकर मन-ही-मन बहुत सुखी हुई। इसके पीछे दोनों वहाँ से उठकर चली गयीं।