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Guest
"निशी, अब हम जा रहे हैं।"
"रिया , मैं नही जा रही हूँ।"
हम दोनों के झगड़े में पंकज महाशय कूदे।
"रिया मत कर ना उसे परेशान।क्यों तू रियेक्ट कर रही है।तुझे पता है न निशी ने गलती से,,,,। "
"तू दूर हट पंकज।तुझे मना किया था कि हम दोनों है, तो ये सब मत लेकर आना। पर तुम सब लड़के हरामी ही होते हो।"
"रिया गाली मत दे।मैंने कुछ भी नहीं किया।मैं खुद भी नहीं जानता था कि ये लोग मेरे मना करने के बाद भी प्लान बना लेंगे।"
"तू रहने दे बस।जा यंहा से अभी।"
"नहीं।तू और निशी चल मैं होस्टल छोड़ देता हूँ।"
"उसको देख पहले।पागलों वाली हरकते तो खत्म हो उसकी।"
ये इशारा मेरी तरफ था जो पंकज के दोस्तो के साथ नए-नए पंगे ले रही थी।
"सॉरी यार रिया।यकीन कर मैं नही जानता था।"
"पंकज सुन।आज अगर निशी को कुछ भी हुआ तो तूने जितना सुना है न मेरे बारे में,मुझसे ही। उससे भी बुरी हूँ मैं।"
"क्यों डरा रही है यार। ठाकुर मैं भी हूँ। डरता नहीं किसी से, पर तू तो मतलब पंडित होकर राजपूत हो रखी है।"
"बेड़ा गरक।तू भी?"
"क्या तू भी?"
"तू भी ठाकुर है?मतलब कोई पंकज, सिंह..?"
"हाँ मैं पंकज सिंह तोमर।क्यों क्या हुआ?"
"हे प्रभु! एक मैं ही पंडित मिली थी तुम्हें इन ठाकुरों के बीच फ़साने को?"
"तुमने कभी पूछा नहीं।मैंने भी बताया नहीं।"
"दिखने में कश्मीरी पंडित दिखते हो न, इसलिए नहीं पूछा।पर पूछना चाहिए था यार।"
"रिया तुझे क्या हुआ?क्यों ऐसे बिहेव कर रही है जैसे तूने भी पी रखी हो?"
"नहीं मैं क्यों?पीने का ठेका तो तुम ठाकुरों ने ले रखा है ना? एक वो हैं मैडम निशी सिंह चौहान।आदर्शों पर जीने वाली,आज देखो आदर्श गए तेल लेने पंजे लड़ा रही हैं।"
"निशी भी राजपूत,मेरा मतलब ठाकुर है?"
"हाँ पंकज सिंह तोमर।वो जो उस दिन अभ्युदय जी थे वो भी ठाकुर ही हैं।तभी मैंने भगवान से पूछा कि मैं ही क्यों?"
"तू तो चाणक्य हुई हमारी।"
"बकवास बन्द कर और उसपर नजर रख।मैं फोन पर बात करके आई।"
पंकज अब निशी के पास पहुच चुका था।अब पंकज और निशी आपस मे पंजा लड़ा रहे थे लड़कियां निशी-निशी चिल्ला रही थीं और लड़के पंकज-पंकज।
ये अच्छा तरीका था शायद जो पंकज ने अपनाया था निशी के इर्द-गिर्द रहकर उसका ध्यान रखने का।
रिया बात करके आ चुकी थी।
आकर उसने सभी को बाय कहा और पंकज से मेरा एक हाथ पकडने का कहकर एक हाथ खुद पकड़ लिया।
हम नीचे आ गए और बाहर तक आने में मैंने शोर मचा लिया कि ये दोनों मुझे जबरजस्ती यंहा से भेज रहे हैं। सामने ही गाड़ी खड़ी थी अभ्युदय जी गाड़ी से उतर आए।
"रिया देख।अभ्यु है न ये?ये क्यों आये है?"
"निशी चुपचाप चल।"
हम तीनों गाड़ी के पास आ गए।अभ्युदय जी की आंखे गुस्से से लाल हो रखी थीं।चेहरे पर भी इतना गुस्सा मैंने तो कभी नही देखा था,पर नशे में होने की वजह से वो गुस्से में भी क्यूट ही लग रहे थे।
"आप क्यूट लग रहे हैं अभ्यु।"
"गाड़ी में बैठो निशी।"
"हाँ। गाड़ी में बैठेगी निशी।" मैं गाड़ी में रिया की मदद से बैठ चुकी थी।दरवाजा बंद था अंदर मेरी बड़-बड़ शुरू ही थी।
अभ्युदय जी ने पास खड़े पंकज को उन्होंने एक झापड़ लगा दिया।
पंकज ने कुछ भी नहीं कहा।पर मुझसे चुप नही रहा गया। मैं गाड़ी से उतरी और बरस पड़ी।
"अभ्यु दिस इस रॉंग।से सॉरी टू हिम एंड फ़ॉर योर काइंड इन्फॉर्मेशन इट्स हिज बर्थडे टुडे। हाऊ यू कैन बी सो रूड टू एवरीबॉडी? से सॉरी और आई एम नॉट गोइंग विथ यू।"
मैंने कब पंकज का हाथ कसकर पकड़ लिया और इतना कुछ कह गई पता नहीं पर जो याद है वो इतना कि पलट कर एक उल्टी की और बेहोश हो गई थी।
जब होश आया तब अभ्युदय जी के घर पर थी कब शाम हुई नही याद कभी सुबह नही याद।लेकिन कब उठी तब रिया भी साथ ही थी।
"मेरा बर्थडे?"कुछ भी नही याद कि क्या हुआ क्या नही।मेरा बर्थडे पूरा का पूरा निकल गया ऐसे ही।बिना पार्टी, बिना मस्ती।दर्द से सिर फट रहा था।मैंने अपना सिर पकड़ा और बीते कल के बारे में सोचने की कोशिश करने लगी।
मेरा फोन कंहा है?यंहा वंहा ढूंढने पर फोन मिल गया।कपड़े भी ऐसा लगता है आंटी के ही पहने हैं मैंने।पर कब?
"रिया उठ।"
"क्या है?सोने दे मुझे।"
"उठ ना। हम यंहा क्या कर रहे हैं?"
"वेरी सिली क़ुउसशन। हम सो रहे हैं।"
"बकबास बन्द कर।हम यंहा क्यों है?कल क्या हुआ?मेरा बर्थडे कब खत्म हो गया?"
"सोने दे यार प्लीज।"
"ये कपड़े किसके हैं?कल पंकज की पार्टी में मैंने? म..मैंने शराब ??" मेरी आँखों से बड़े-बड़े आंसू टपक रहे थे।ये क्या हो गया था।
बहुत देर रोने के बाद भी जब रिया नही उठी तो मैं कमरे से बाहर निकली।सामने ही छत थी।एक छोटा सा टेरेस,जिस पर हरे रंग की आर्टिफीसियल घास बिछी थी। एक आराम कुर्सी और एक टेबल भी पड़ी थी। एक तरफ झूला लगा था और एक तरफ एक पेड़ नकली था शायद।
मैं आकर आराम कुर्सी पर बैठ गई।धूप अच्छी लग रही थी सुबह की।मैंने नीचे देखा तो अभ्युदय जी नीचे गार्डन में बैठकर चाय पी रहे थे और पेपर भी पढ़ रहे थे।
"कितने खड़ूस हैं।नाराज भी इतना होते हैं और प्यार जताना तो आता ही नहीं।अब देखो जनाब को।हुह खड़ूस।"
बिना सोचे ही बोलती जा रही थी और पीछे से आवाज़ आई।
"ऐसा ही है मेरा अभ्यु।"
"शिट सॉरी आंटी।आपको देखा नहीं।"
"अच्छा हुआ न नही देखा वरना जानने नही मिलता कि क्या सोचती हो तुम?"
"सॉरी।"मैंने अपनी आंखें नीचे झुका लीं।
"हैप्पी बर्थडे बेटा।कल तुम्हारी तबियत ठीक नही थी।ऐसे मैं तुम्हें न भेजने का फैसला मेरा ही था।रिया तुम्हें अपने घर ले जाना चाहती थी पर उसे भी अपनी लैंडलॉर्ड कप जवाब देंना पड़ता।इसलिए ही मैंने तुम दोनों को यंही रोक लिया।"
"थैंक्यू आंटी।"
"ये अभ्यु का ही कमरा है निशी।"
मैंने अब कमरे की तरफ ध्यान दिया।बिल्कुल सफेद कमरा।दीवारों से लेकर कबर्ड तक सब सफेद।
ऐसा भी क्या पागलपन सफेद रंग के लिए।गुलदस्ता,फूल,तस्वीरें भी ब्लैक एंड व्हाइट।
अजीब हैं ये भी मन में सोचते हुए अभ्युदय जी पर नजर गई तो उनकी नज़र मुझ पर थी। एक अजीब सा अहसास हुआ।क्या था ये?
प्यार?
अपनापन?
इज्जत का और बढ़ जाना?
या कुछ ऐसा जो कहने या सुनने या समझने से भी ऊपर होता है।
प्यार से भी ऊपर कुछ होता है क्या?
शायद पूजा
लेकिन अभ्युदय अचानक से भगवान से पूज्यनीय क्यों हो गए?
"रिया , मैं नही जा रही हूँ।"
हम दोनों के झगड़े में पंकज महाशय कूदे।
"रिया मत कर ना उसे परेशान।क्यों तू रियेक्ट कर रही है।तुझे पता है न निशी ने गलती से,,,,। "
"तू दूर हट पंकज।तुझे मना किया था कि हम दोनों है, तो ये सब मत लेकर आना। पर तुम सब लड़के हरामी ही होते हो।"
"रिया गाली मत दे।मैंने कुछ भी नहीं किया।मैं खुद भी नहीं जानता था कि ये लोग मेरे मना करने के बाद भी प्लान बना लेंगे।"
"तू रहने दे बस।जा यंहा से अभी।"
"नहीं।तू और निशी चल मैं होस्टल छोड़ देता हूँ।"
"उसको देख पहले।पागलों वाली हरकते तो खत्म हो उसकी।"
ये इशारा मेरी तरफ था जो पंकज के दोस्तो के साथ नए-नए पंगे ले रही थी।
"सॉरी यार रिया।यकीन कर मैं नही जानता था।"
"पंकज सुन।आज अगर निशी को कुछ भी हुआ तो तूने जितना सुना है न मेरे बारे में,मुझसे ही। उससे भी बुरी हूँ मैं।"
"क्यों डरा रही है यार। ठाकुर मैं भी हूँ। डरता नहीं किसी से, पर तू तो मतलब पंडित होकर राजपूत हो रखी है।"
"बेड़ा गरक।तू भी?"
"क्या तू भी?"
"तू भी ठाकुर है?मतलब कोई पंकज, सिंह..?"
"हाँ मैं पंकज सिंह तोमर।क्यों क्या हुआ?"
"हे प्रभु! एक मैं ही पंडित मिली थी तुम्हें इन ठाकुरों के बीच फ़साने को?"
"तुमने कभी पूछा नहीं।मैंने भी बताया नहीं।"
"दिखने में कश्मीरी पंडित दिखते हो न, इसलिए नहीं पूछा।पर पूछना चाहिए था यार।"
"रिया तुझे क्या हुआ?क्यों ऐसे बिहेव कर रही है जैसे तूने भी पी रखी हो?"
"नहीं मैं क्यों?पीने का ठेका तो तुम ठाकुरों ने ले रखा है ना? एक वो हैं मैडम निशी सिंह चौहान।आदर्शों पर जीने वाली,आज देखो आदर्श गए तेल लेने पंजे लड़ा रही हैं।"
"निशी भी राजपूत,मेरा मतलब ठाकुर है?"
"हाँ पंकज सिंह तोमर।वो जो उस दिन अभ्युदय जी थे वो भी ठाकुर ही हैं।तभी मैंने भगवान से पूछा कि मैं ही क्यों?"
"तू तो चाणक्य हुई हमारी।"
"बकवास बन्द कर और उसपर नजर रख।मैं फोन पर बात करके आई।"
पंकज अब निशी के पास पहुच चुका था।अब पंकज और निशी आपस मे पंजा लड़ा रहे थे लड़कियां निशी-निशी चिल्ला रही थीं और लड़के पंकज-पंकज।
ये अच्छा तरीका था शायद जो पंकज ने अपनाया था निशी के इर्द-गिर्द रहकर उसका ध्यान रखने का।
रिया बात करके आ चुकी थी।
आकर उसने सभी को बाय कहा और पंकज से मेरा एक हाथ पकडने का कहकर एक हाथ खुद पकड़ लिया।
हम नीचे आ गए और बाहर तक आने में मैंने शोर मचा लिया कि ये दोनों मुझे जबरजस्ती यंहा से भेज रहे हैं। सामने ही गाड़ी खड़ी थी अभ्युदय जी गाड़ी से उतर आए।
"रिया देख।अभ्यु है न ये?ये क्यों आये है?"
"निशी चुपचाप चल।"
हम तीनों गाड़ी के पास आ गए।अभ्युदय जी की आंखे गुस्से से लाल हो रखी थीं।चेहरे पर भी इतना गुस्सा मैंने तो कभी नही देखा था,पर नशे में होने की वजह से वो गुस्से में भी क्यूट ही लग रहे थे।
"आप क्यूट लग रहे हैं अभ्यु।"
"गाड़ी में बैठो निशी।"
"हाँ। गाड़ी में बैठेगी निशी।" मैं गाड़ी में रिया की मदद से बैठ चुकी थी।दरवाजा बंद था अंदर मेरी बड़-बड़ शुरू ही थी।
अभ्युदय जी ने पास खड़े पंकज को उन्होंने एक झापड़ लगा दिया।
पंकज ने कुछ भी नहीं कहा।पर मुझसे चुप नही रहा गया। मैं गाड़ी से उतरी और बरस पड़ी।
"अभ्यु दिस इस रॉंग।से सॉरी टू हिम एंड फ़ॉर योर काइंड इन्फॉर्मेशन इट्स हिज बर्थडे टुडे। हाऊ यू कैन बी सो रूड टू एवरीबॉडी? से सॉरी और आई एम नॉट गोइंग विथ यू।"
मैंने कब पंकज का हाथ कसकर पकड़ लिया और इतना कुछ कह गई पता नहीं पर जो याद है वो इतना कि पलट कर एक उल्टी की और बेहोश हो गई थी।
जब होश आया तब अभ्युदय जी के घर पर थी कब शाम हुई नही याद कभी सुबह नही याद।लेकिन कब उठी तब रिया भी साथ ही थी।
"मेरा बर्थडे?"कुछ भी नही याद कि क्या हुआ क्या नही।मेरा बर्थडे पूरा का पूरा निकल गया ऐसे ही।बिना पार्टी, बिना मस्ती।दर्द से सिर फट रहा था।मैंने अपना सिर पकड़ा और बीते कल के बारे में सोचने की कोशिश करने लगी।
मेरा फोन कंहा है?यंहा वंहा ढूंढने पर फोन मिल गया।कपड़े भी ऐसा लगता है आंटी के ही पहने हैं मैंने।पर कब?
"रिया उठ।"
"क्या है?सोने दे मुझे।"
"उठ ना। हम यंहा क्या कर रहे हैं?"
"वेरी सिली क़ुउसशन। हम सो रहे हैं।"
"बकबास बन्द कर।हम यंहा क्यों है?कल क्या हुआ?मेरा बर्थडे कब खत्म हो गया?"
"सोने दे यार प्लीज।"
"ये कपड़े किसके हैं?कल पंकज की पार्टी में मैंने? म..मैंने शराब ??" मेरी आँखों से बड़े-बड़े आंसू टपक रहे थे।ये क्या हो गया था।
बहुत देर रोने के बाद भी जब रिया नही उठी तो मैं कमरे से बाहर निकली।सामने ही छत थी।एक छोटा सा टेरेस,जिस पर हरे रंग की आर्टिफीसियल घास बिछी थी। एक आराम कुर्सी और एक टेबल भी पड़ी थी। एक तरफ झूला लगा था और एक तरफ एक पेड़ नकली था शायद।
मैं आकर आराम कुर्सी पर बैठ गई।धूप अच्छी लग रही थी सुबह की।मैंने नीचे देखा तो अभ्युदय जी नीचे गार्डन में बैठकर चाय पी रहे थे और पेपर भी पढ़ रहे थे।
"कितने खड़ूस हैं।नाराज भी इतना होते हैं और प्यार जताना तो आता ही नहीं।अब देखो जनाब को।हुह खड़ूस।"
बिना सोचे ही बोलती जा रही थी और पीछे से आवाज़ आई।
"ऐसा ही है मेरा अभ्यु।"
"शिट सॉरी आंटी।आपको देखा नहीं।"
"अच्छा हुआ न नही देखा वरना जानने नही मिलता कि क्या सोचती हो तुम?"
"सॉरी।"मैंने अपनी आंखें नीचे झुका लीं।
"हैप्पी बर्थडे बेटा।कल तुम्हारी तबियत ठीक नही थी।ऐसे मैं तुम्हें न भेजने का फैसला मेरा ही था।रिया तुम्हें अपने घर ले जाना चाहती थी पर उसे भी अपनी लैंडलॉर्ड कप जवाब देंना पड़ता।इसलिए ही मैंने तुम दोनों को यंही रोक लिया।"
"थैंक्यू आंटी।"
"ये अभ्यु का ही कमरा है निशी।"
मैंने अब कमरे की तरफ ध्यान दिया।बिल्कुल सफेद कमरा।दीवारों से लेकर कबर्ड तक सब सफेद।
ऐसा भी क्या पागलपन सफेद रंग के लिए।गुलदस्ता,फूल,तस्वीरें भी ब्लैक एंड व्हाइट।
अजीब हैं ये भी मन में सोचते हुए अभ्युदय जी पर नजर गई तो उनकी नज़र मुझ पर थी। एक अजीब सा अहसास हुआ।क्या था ये?
प्यार?
अपनापन?
इज्जत का और बढ़ जाना?
या कुछ ऐसा जो कहने या सुनने या समझने से भी ऊपर होता है।
प्यार से भी ऊपर कुछ होता है क्या?
शायद पूजा
लेकिन अभ्युदय अचानक से भगवान से पूज्यनीय क्यों हो गए?